बुधवार, जुलाई 22, 2009

यादों की डोर- ले चली किस ओर!!!

यादों का विज्ञान-शायद कुछ ऐसा-


काश!!

तुम

तुम न होती

तुम्हारी याद होतीं...

हर वक्त

मेरे साथ होतीं...


ये यादें भी मुई ऐसी होती हैं, कब किस बात के संग डोर बाँधे चले आयें, कुछ कहा नहीं जा सकता.

मंच से कभी कविता सुनाता हूँ, कोई वाह वाह कहता है और मैं सिहर जाता हूँ. याद आ जाती है जैन मास्साब के द्वारा की गई पिटाई, जब हिन्दी की कक्षा में मैथली शारण गुप्त की ’पंचवटी’ पढ़ाते समय उन्होंने सुनाया:

चारु चन्द्र की चंचल किरणें,
खेल रही थीं जल थल में...


और हमारे मूँह से बेसाख्ता निकल पड़ा...वाह वाह!! बहुत खूब!! एक बार और..फिर क्या होना था. रोते रोते घर लौटे और चुपचाप सो गये. उस जमाने में मास्साब की शिकायत घर में करने का मतलब आज के अभिभावकों जैसा मास्साब से जाबाब तलब करना नहीं था, बल्कि उल्टा बिना कुछ जाने पुनः उससे भी ज्यादा पीटा जाता था कि जरुर बदमाशी की होगी, तभी मास्साब ने मारा. दो बार पिटने से बेहतर -चुपचाप सो जाओ. मगर उस पिटाई की सिहरन आज भी है.

ऐसा ही एक वाकया याद आता है जब बहुत मूसलाधार बारिश होती है. हमारे पड़ोस में रहने वाले अंकल बिजली विभाग में ही थे. मैं बी कॉम कर रहा था. बहुत डरा करते थे हम मोहल्ले के लड़के उनसे. उन्हें और मुहल्ले के अन्य बुजुर्गों को पिता जी की तरह डांटने, मारने के सारे अधिकार प्राप्त थे.

एक शाम भीगते हुए खेल कर लौटा तो वो घर के बरामदे में बैठे थे. तुरंत रोक लिया. बहुत तेज मूसलाधार बारिश हो रही थी और वो पूछने लगे, इसे अंग्रेजी में क्या कहेंगे. अंग्रेजी में हाथ ऐसा तंग कि क्या बताते. बस, बोल दिये कि ’ईट ईज रेनिंग वेरी मच’. फिर पिटाई..और वहीं बैठा दिया गया कि १०० बार कहो, ’इट्स रेनिंग कैट्स एण्ड डॉग्स’-खैर सीख गये मगर आज तक जीवन में यह वाक्य बोलने की जरुरत नहीं पड़ी. जाने क्यूँ पिटे. मगर हर मूसलाधार वर्षा वो दिन याद दिला जाती है.

खैर पिटाई और हमारे बचपन का चोली दामन का साथ था. आज अगर पिट जायें तो पिटाई के दर्द से ज्यादा बचपन की यादों का दर्द उठ पड़ेगा, यह मेरा दावा है.

चलिये, ये सब फिर कभी, अब गंभीर नोड पर ऐसी ही एक यादों की डोर स्मरण में आ गई:


हाय!! ये गंध!!


मेरे पूजा के कमरे में

अंगड़ाई लेता हुआ

अगरबत्ती का धुँआ

गुजरता है मेरे पहलु से

अपनी खास गंध के साथ


तो याद आता है मुझे

वो संकट मोचन मंदिर

जहाँ गुजारी थी मैने

इलाहाबाद की

अनगिनत शामें.....


याद आता है मुझे

अपनी भूख समेटे

प्रसाद की आस में

मंदिर की सीढ़ी पर बैठा

वो बच्चा

जिसकी उदास आँखों में

पलती थी बस एक चाहत

पत्थर होने की

ताकि वो भी पूजा जाता

भक्त भोग चढ़ाते

और

कभी न भूखा सोता....


याद आता है मुझे

अपना मौन रह जाना

उसे कैसे समझाता

इंसानो की तरह ही

हर पत्थर के

अलग अलग नसीब होते हैं

कोई मंदिर में जड़ता है

कोई गहनों में,

तो कोई कब्र पर

मुर्दों के करीब होते हैं...


और


याद आती है मुझे



माँ!!

जिसके पार्थिव शरीर के करीब भी

यही खास अगरबत्ती जलती थी

और उस कमरे में भी

बिखरती थी यही गंध...

जो बसी है मेरे रग रग में

और रहती है मेरे संग!!


-समीर लाल ’समीर’ Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, जुलाई 19, 2009

हम तो थक गये अब!!!!

थक गये भाई पूछ पूछ कर.

जिसको देखो बस एक लाईन बोल कर भाग जाता है कि साहित्य नहीं रचा जा रहा है ब्लॉग पर.

मगर कोई ये बताने तैयार ही नहीं कि आखिर साहित्य होता क्या है, क्या है इसकी परिभाषा और हमें क्या करना होगा कि साहित्य रच पायें. बहुत बार और बहुत जगह जाकर पूछा, रिरिया कर पूछा, गिड़गिड़ा कर पूछा मगर जैसे ही पूछो कि आखिर साहित्य है क्या, भाग जाते हैं. बताते ही नहीं..मानो सरकार बता रही हो कि भारत का विकास हो रहा है. पूछो कहाँ, तो भाग जाते हैं? आप खुद खोजो.

अरे, हम खुद ही खोज या जान पाते तो आपको इतना कहने की तकलीफ भी न देते कि साहित्य नहीं रचा जा रहा है. रच ही रहे होते और तब आप इतना बोलने के पहले ही भाग लिये होते. प्रेम चन्द के गुजर जाने का दुख आज से पहले कभी इतना ज्यादा नहीं हुआ. वो होते तो उनसे पूछ लेते.

बहुत शोध किया. यहाँ वहाँ पढ़ा. एक दो वीरों ने इसे परिभाषित करने की नाकाम कोशिश भी की. पिछले वाक्य में नाकाम अंडरलाईन मानें. कर नहीं रहे बस आप मानें. जब वो बिना ’साहित्य क्या है’ बताये बता सकते हैं कि ’यह साहित्य नहीं है’ तो हम भी बिना अंडर लाईन लगाये बता दे रहे हैं कि नाकाम शाब्द अंडारलाईन है. इस पर भी मन न भरा हो तो और लो, बोल्ड भी है.

भारत के विकास को लेकर सोचता हूँ कई बार इसी तरह. किसको विकास मानूँ: बढ़्ती मँहगाई को, अवय्वस्था में आये इजाफे को, बिजली पानी की अनुपलब्धता की बढ़ती दर को, गिरते सेन्सेक्स को, एकता कपूर के सीरियलस में बढ़ते एक्स्ट्रा मेरिटल अफेयरर्स को, बढ़ती किसानों की खुदकुशी को या फिर बढ़ती नेताओं की ढिटाई और उनके बढ़ते भ्रष्टाचार को.

जैसे साहित्य की परिभाषा हो वैसे ही कोई ज्ञानी बता जाता है कि भारत भी विकास की राह पर है. विनती बस इतनी सी है कि बम्बई, दिल्ली, कलकत्ता, मद्रास और बैंगलोर को ही भारत मानें और उसकी भी पाँच प्रतिशत आबादी को. विकास के आंकलन में कृप्या ट्रेफिक जाम, बिजली, पानी आदि को रोड़ा न बनायें, वह इस आंकलन में शामिल नहीं है. यह सब सामन्य परिस्थियाँ हैं जिसके आप सब आदी हैं. इसमें सिर्फ मॉल, कॉल सेन्टर (प्राफिट वाले) अंबानी लेवल के उद्योगपति, अमर सिंग लेवल के नेता, लीलावति अस्पताल का वी आई पी एरिया, बिना गिरा हुआ दिल्ली मेट्रो का भाग, अम्बे वेली पूणे का रहवासी इलाका, बिग सिनेमा, नेता घराने के नव नेता, मल्लिका सेहरावत, मुटुकनाथ जूली कथा, कानून की धारा ३७७, ब्रेन मैपिंग, चन्द्र यान के साथ चाँद और फिज़ा कथा, मकाओ में अंग्रेजी में हुआ भारतीय हिन्दी सिनेमा का समारोह, चीयर बालायें (२०-२० कुछ दिन इस लिस्ट से अलग किया गया है), पेज ३ पार्टियाँ एवं विजय मलैय्या, आदि आदि को शामिल माना जाये. देखिये, भारत कितना विकास कर गया है.

कहते हैं जल्दी ही विकसित भारत में व्यक्ति को नाम की बजाय यूनिक नम्बर आईडेन्टिटी से जाना जायेगा. अरे, जहाँ इंसान परेशान हो कर चन्द रुपये में किडनी बेच दे रहा है, वहाँ नम्बर कब तक सहेजे रहेगा? पुलिस की गोली से मरेगा कोई और जेब से प्राप्त आई डी से मृत दर्ज होगा कोई. खैर, उम्मीद तो अच्छे की ही होना चाहिये, तब अच्छा ही होगा.

तो ऐसे ही मानने न मानने के चक्कर में, पत्रिकाओं के गरिष्ट ओह नो!! वरिष्ट साहित्यिक संपादकों से संबंधो के आभाव में, आलोचकों और अनेक साहित्यकारों के कम्प्यूटर ज्ञान के आभाव में, ब्लॉग पर साहित्य नहीं रचा जा रहा है विषय पर सारे ब्लॉगर चिंतित हैं.

चिंता है तो कभी न कभी निवारण भी होगा ही, यही एक आशा की किरण है जो जिन्दा रखे है इस अफलातूनी लेखन को.

खैर, जो अब तक प्राप्त जानकारी के आधार पर एक बुद्धु ब्लॉगर (साहित्यकारों के नज़रिये से) की परिकल्पना है साहित्य के बारे में, उसे देखें:

साहित्य

अब जो है, जैसा है. वैसा है.

हमने अपनी तरफ से कोशिश की है यह बता पाने की कि कविता क्या है. कुछ हद तक तो बता ही पाये होंगे, आप देखिये.


कविता क्या है ?

कविता है,

शब्दों मे व्यक्त
भावों की अभिव्यक्ति
जीने की शक्ति
समाज की संरचना
मानवियता की रचना
ईश्वर की अर्चना
कुरितियों पर वार
आशा का संचार

कविता है
मन के भाव
कड़ी धूप में
पेड़ की छांव
संजोये हुए अहसास
और गहरे अँधेरे में
चमकती हुई आस

कविता है
संस्कृति की वाहक
भ्रांतियों की निवारक
और क्षुब्ध ह्रदय में
चेतना की कारक

कविता है
एक समर्पण
दिल का सच्चा दर्पण
निस्सीम ऊँचाई
अंतहीन गहराई

कविता
मिटाती है संशय
बढ़ाती है
आदि से अंत का परिचय
जगाती है निश्चय
और
अमावस में
लाती है सूर्योदय

कविता है
पूर्ण सॄष्टि
लौकिक और
अलौकिक दृष्टि

इसका रचयिता कवि

कभी हँसाता
कभी गुदगुदाता
तो
कभी रुलाता
सूरज की सीमा
के पार ले जाता
फिर भी
अक्सर
भूखा ही सो जाता

-समीर लाल ’समीर’

नोट:
१. कोई भी प्रोफेशनल कार्टूनिस्ट इसे हमारे द्वारा किया गया उनके क्षेत्र का अतिक्रमण न मानें, ये कोशिश तो हम साहित्य के क्षेत्र में करेंगे. :)

२. यह आलेख कल के लावण्या जी के आलेख के पहले ही लिख गया था और इसलिये उसकी विषय वस्तु यह यह कतई प्रभावित नहीं है. Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, जुलाई 16, 2009

इत्ते सारे..बाप रे!!

ये स्कैचिंग वाले भी-इनका तो क्या कहें. ये जो न करवा दें, कम ही है.

कितने ही आतंकवादियों की, कितने हत्यारों की, कितने चोरों की स्कैच बना चुके. क्या कोई जानकारी रखता है कि इस आधार पर कितनों को पकड़ पाये आज तक?



इस डिपार्टमेन्ट का औचित्य ही समझ के परे है और इनकी कला का नमूना तो क्या कहा जाये, आप ही देखिये इस उदाहरण से.

अब देखिये, एक प्रदेश की मुखिया. मुखिया हैं तो व्यस्त तो होंगी ही, काहे क्यूँ पूछते हो-बहुत प्रश्न करते हो यार-कथा सुनों न बस!! हाँ तो इतना बड़ा प्रदेश, सो ताकतवर भी होंगी ही और ताकतवर हैं तो गुस्सवर भी होंगी. दुबला पतला कोई क्या दम दिखायेगा, उल्टा मार ही खा जायेगा.

अब व्यस्त है और उस पर भी फोटो खिंचवाई ताकि उसके आधार पर मूर्तियाँ बन जाये तो उसे पार्क में लगवा दें और दलितों का उसके दर्शन प्राप्त कर उत्थान हो जाये. टोटल फंडा पत्थर पूजन वाला. जब केसरिया पत्थर पूज पूज कर लोगों का भला हुआ जा रहा है, सारे संकट मूँच जाते हैं तो यह तो संगमरमरी बनना है. इत्ता मंहगा कि भला तो होना तय ही है, कम से कम तब तक, जब तक की मूर्तियाँ लगी रहती हैं. शायद मुखिया बदले तो मूर्तियाँ बदलें.

चेले फोटो मूर्तिकारों के सरगना को दे आये कि ऐसी ६० संगमरमर की मूर्तियाँ बना कर पार्क में लगनी है. मामला मुखिया का है इसलिये टाईम सेन्सेटिव है और ताकतवर मुखिया है इसलिये कोई मुर्रुव्वत नहीं. सबसे जरुरी बात यह है मामला सीधे दलितों के उत्थान से संबंधित है अतः टॉप प्रियारिटी पर किया जाना स्वभाविक प्रक्रिया है, इसे समझाया जाना आवश्यक नहीं, यह तो खुद ही समझ आ जाना चाहिये.

बड़ा ठेका वो भी सीधे मुखिया के दरबार से. ठेकेदार प्रसन्न हो लिया और इसके इजहार की जैसी सामान्य प्रक्रिया है-मित्रों और अधिकारियों के साथ जम कर पार्टी चली और खूब पी पिलाई गई.

शराब का नशा और उस पर से ऐसे विकट ठेके की मस्ती याने तीन गुना नशा और इस चक्कर में सेंपल में आई फोटो न जाने कहाँ गुम गई?

इतनी बड़ी भूल..कैसे सुधारें. मुखिया से तो कह नहीं सकते कि फिर एक हाथ उठा कर टाटा बाय बाय वाली नजाकत में फोटो खिंचवाओ और कम से कम ऐसी मुखिया से जो ताकतवर भी हो अतः गुस्सवर भी.
साथ पीने पिलाने का फायदा कुछ तो मिलना ही था. नये मित्र अधिकारियों से बात की गई. उस रात पार्टी में सभी ने कनखियों से उस फोटू को निहारा था. एकजुट मिल तय पाया गया कि पुलिस स्कैचिंग डिपार्टमेन्ट से मदद ले फिर से वैसा ही स्कैच बनवा लेते है और मूर्तियाँ तैयार करा लेंगे.

सबने अपने अपने ब्यौरे स्कैचिंग अधिकारियों को दिये और मुखिया की सेवा सुसुर्शा में व्यस्त भये.

स्कैच तैयार हो गया. वैसा ही जैसा हर बार तैयार होता है और पुलिस उस स्कैच के आधार पर मशक्कत करके हार जाती है. मूर्तियाँ निश्चित तिथि पर तैयार हो पार्क में पहुँच गईं, आप भी देखें कि क्या तैयार हुआ इन स्कैचिंग वालों की कला के चलते, अब भई जैसा डिस्क्रिप्शन दिया था वैसा बना दिया. मुस्कराने की जरुरत नहीं है, खुद ही जुबानी संरचना देकर स्कैच बनवा कर देख लो, करो जरा जुबानी विवेचना कि क्या बताओगे:




और आप तो जानते ही हैं कि टाईम बॉड में प्रोग्राम में उतना समय तो होता नहीं कि त्रुटियाँ सुधारी जा सके, वो तो बस सनातन सरकारी परंपरा का पालन करते हुए आदतन ढाकीं जा सकती हैं और वो भी एक दो नहीं जब पूरी साठ हों.

अब या तो पूरा प्रोजेक्ट पुनः जारी किया जाये या इनको ही एडजस्ट करें किसी तरह, जिस एडजस्टमेन्ट में तो पूरा मोहकमा सिद्ध हस्त है ही. छः दिन बचे हैं तो उसमें तो एक प्रति दिन के हिसाब से भी लगायें तो छः ही मूर्ति बन पायेगी सो वो फिर से बनाई गईं फोटो खींच कर.

अब ठेकेदार का क्या हुआ और उन अधिकारियों पर क्या गाज गिरी, यह इस आलेख की विषय वस्तु नहीं है और बँधा हुआ लिखना भी तो टाईम बॉउंड प्रोग्राम है, वरना तो लिखते ही रह जायें. स्कैचिंग वाला भी कहाँ बाजू में खड़े आदमी की फोटू स्कैच करता है मात्र मुख्य पात्र के- तो हम क्यूँ लिखें उन ठेकेदारों और अधिकारियों के बारे में.

अब समझे इत्ते सारे कहाँ से आ गये?



सुरक्षा कवच (डिसक्लेमर):
यह पोस्ट मात्र स्कैचिंग में हो रही भूल का नमूना प्रदर्शीत करने के लिए है. अन्य किसी आत्मा या परमात्मा से इस पोस्ट का कुछ लेना देना नहीं. अगर कोई फिर भी आहत हो ही जाता है तो सूचित करें, हटाने का प्रयास किया जायेगा.
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मंगलवार, जुलाई 14, 2009

न जाने क्यूँ-एक घुटन!!!

न जाने क्यूँ?

अब एक घुटन का अहसास होता है जब अपने आसपास की दुनिया देखता हूँ.

अपने बिल्कुल करीब, अपने ही लोगों के बीच.

किस तरह से इन्सान ही इन्सान के साथ व्यवहार कर रहा है. पहले मुझे यह एहसास शायद नहीं होता था. शायद मैं भी ऐसा ही करता रहा हूँ, याद नहीं. किन्तु मुझे यह तो जरुर याद है कि मैने हमेशा ही अपने आप को दूसरे की जगह भी रख कर देखा है. इतनी क्षमता मुझमें हमेशा ही रही है और मुझे इस बात का गर्व है.

हर बात पर अपने मातहतों और नौकरों को डाँटना, फटकारना और चार लोगों के बीच उनकी बेईज्जती करके खुद को बेहतर साबित करना, यह कैसी मानसिकता है? मैं समझ नहीं पाता. बस, मैं उस निरिह मजबूर इन्सान की आँखों को पढ़ने का प्रयास करता हूँ, जो तुम्हारा घरेलु नौकर है.

कितनी वेदना दिखती है और कितनी मजबूरी. शायद वो प्रतिकार करने की क्षमता भी खो चुका है और इस फटकार को उसने अपनी नियति मान लिया है. तभी तो वह क्षण भर में पूर्ववत हो जाता है और काम में तल्लीन और मैं उदासी और घुटन के माहौल से घंटों जूझ कर उबर पाता हूँ. ऐसा मुझे लगता है कि उबर गया मगर शायद यह सच नहीं..मैं खुद को झुठलाता भी तो हूँ.

तुम खुद की भूल को उसके मत्थे मढ़कर कितना खुश हो लेते हो. देखता हूँ तबियत तुम्हारी खराब है, दूध तुमको पीना है और समय पर न देने के लिये वह डाँट खाता है कि तुम्हें कुछ याद नहीं रहता. माना कि सत्तर आदेशों के बीच उसके दिमाग से यह और कोई अन्य बात उतर गई होगी मगर तुम्हारी तो खुद की तबीयत है, तुम कैसे भूल गये? और जिस वक्त वो भूला तब भी वह तुम्हारे ही किसी अन्य आदेश का पालन कर रहा होता है. एक बार फिर से कह कर तो देखो. जब भूले तो बस याद दिला दो. उसका तो काम ही सेवा करना है. फिर डांट कैसी और फटकार कैसी?

मगर इससे तुम्हारा अहम सम्मानित होता है. तुम अपने आप को कुछ उँचा समझने लगते हो इस पतनशील व्यवहार को अपनाकर. जब तुम और तुम्हारा परिवार सारा दिन बैठे बैठे आदेश पारित कर रहे होते हैं तब वह दो पांवों पर दौड़ दौड़ कर उन्हें निष्पादित कर रहा होता है मगर फिर भी उसके आराम करने की घड़ियाँ तुम्हारे आराम करने के समय से मेल खाना चाहिये अन्यथा वो आलसी एवं कामचोर कहलायेगा. घबरा जाता हूँ ऐसे माहौल से.

india

मगर यही तो माहौल है सब तरफ.फिर कहाँ जाऊँ? क्या बार बार लोगों को याद दिलाऊँ कि जिसे तुम बैल की तरह खदेड़ रहे हो वो भी तुम्हारी ही तरह एक इन्सान है. माना कि तुम उसे पैसा देते हो, खाना देते हो तो क्या तुमने उसे खरीद लिया है? क्या उसे पशु मानने का अधिकार प्राप्त कर लिया है? क्या उसे अपमानित कर तुम सम्मानित हो जाते हो वो भी बीच भीड़ में.

एक जवान लड़का-नाम बहादुर हो या रम्मू या कि धनिया, क्या फरक पड़ता है, मजबूरी में तुम्हारा नौकर या चपरासी और तुम २४ घंटे मय परिवार उसे पेर रहे हो. फिर भी कोई साहनभूति नहीं. तुम बैठे बैठे थक गये इसलिये वो पैर दबाये और वो दिन भर का खड़ा?? खैर, वो तो तुम्हारी नजरों में इन्सान है ही नहीं मगर तुम कैसे इन्सान हो? हो भी या इन्सानियत पूरे से मर गई है?

क्या तुम अपने इसी उम्र के बेटे से ऐसा ही व्यवहार करोगे? उसे तो तुम शाम को खेलने भेजते हो, आऊटिंग के लिये ले जाते हो. दो घंटे पढ़ क्या ले, नौकर को आदेश देते हो कि उसके सर में तेल लगा दे. दोपहर में सो जाने को कहते हो तो यह भी तो ऐसे ही किसी माँ बाप का बेटा है. वैसा ही तन, वैसा ही मन. सब कुछ एक. बस, परिस्थियों की मार से इतना अंतर-वो भी तब, जब वह स्वयं इन परिस्थियों के लिये जिम्मेदार नहीं.

मत उसके अभिमान को चार लोगों के सामने चकनाचूर करो सिर्फ इसलिये कि तुम्हारा झूठा स्वाभिमान बना रहे!!

मत अपनी भूलों को उस पर टालो!!! क्या पा लोगे तुम इससे? क्यूँ खुद को धोखा देते हो?

क्यूँ उसे इन्सान नहीं समझते!! क्यूँ खुद की नजरों में गिरने का काम करते हो? कभी अकेले में खुद से ईमानदारी से मिल कर देखना और पूछना.

थोड़ा एक अंश अपने बेटे का उसमे भी देखो...!! मदद लो, अहसानमंद हो- क्या चला जायेगा तुम्हारा इसमें? बेटा तो यूँ भी तुम्हारे साथ नहीं. उसे अब आगे भी कभी तुम्हारे लिए समय न होगा. वो तुमसे अपने हिस्से का समय लेकर निकल गया है. ऐसा ही होता है पुश्त दर पुश्त. कभी तुम निकले थे ऐसे ही.

बस, मन थका है. बहुत उदास!! क्या करुँ? शायद मेरे बस में कुछ भी बदल पाना नहीं..

हे गरीब बालक!! तेरी यही किस्मत है..तू इसे झेल. बस, मेरे सामने वो उदास आँखें लेकर मत आना. मुझसे नहीं देखी जाती. मैं परेशान हो जाता हूँ.

कल को मैं तो चला जाऊँगा मगर तू और तेरी बिरादरी का प्रस्थान मुझे तो कहीं नजर नहीं आता....दूर दूर तक!!!!! बस कोहरा ही कोहरा है...एक उदास धुंध!!!

दोस्त, मुझे दोष न देना-तुम ही नहीं-मैं भी मजबूर हूँ. वक्त और रिवायतों के हाथों!!

चन्द पंक्तियों के साथ अपनी बात खत्म करता हूँ:

देख कर हालत जहां की
संवेदनायें सब
सो गई हैं
और मेरे दिल से उठती
कवितायें अब
खो गई हैं.

-समीर लाल ’समीर’ Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, जुलाई 12, 2009

२ जुलाई की वो मोहक शाम..

२ जुलाई की मोहक शाम, मैं, मेरा कम्प्यूटर और सामने एग्रीगेटर धाम!!

एकाएक ब्लॉगवाणी से गुजरते ’कनाडा से’ शीर्षक पर नजर गई. स्वाभाविक था क्लिक करना. पता चला अंतर्मंथन वाले डॉ टी एस दराल साहब कनाडा पधारे हैं. तुरंत उन्हें ईमेल कर मिलने की जिज्ञासा प्रकट की. जबाबी पोस्ट से फोन नम्बर आ गया. बातचीत हुई और तय हुआ कि ९ तारीख को शाम को हमारे घर खाने पर पधारेंगे.

निश्चित समय पर डॉ दराल अपने मित्र डॉ विनोद वर्मा के साथ आये. मिलकर लगा ही नहीं कि पहली बार मुलाकात हो रही है. ४-५ घंटे गप्प सटाके में यूँ गुजरे कि कब रात के १ बज गये, पता ही नहीं लगा. डॉ दराल दिल्ली हास्य हुल्लड़ २००७ के चैम्पियन रहे हैं तो उत्सुकता थी, कुछ सुनने की. उत्सुकता कुछ यूँ भी बन जाती है कि जब हम कहेंगे कि कुछ सुनाईये तो सामने वाले का भी फर्ज बन जायेगा कि कहे, आप भी कुछ सुनाईये. अंधा क्या चाहे, दो आँखे. बस, जैसे ही उन्होंने सुना कर खत्म किया और हम से निवेदन किया कि आप भी कुछ सुनाऐं, हम शुरु. हम तो बैठे ही इसी इन्तजार में थे. :)


डॉ टी एस दराल


और

डॉ दराल, समीर, डॉ वर्मा


खैर, खूब सुना-सुनाया गया. हमें तो आप सब सुनते ही रहते हैं, इसलिए आज आपको डॉ दराल को सुनवाते हैं:



आज शाम डॉक्टर साहब अपने बीस दिवसीय प्रवास के बाद भारत लौट जायेंगे और हम यहाँ बैठे उनसे हुई मुलाकात की याद सहेजे फिर कभी मुलाकात की बाट जोहते रहेंगे. यही सिलसिला है.


संशोधन: जब यह आलेख पोस्ट किया गया तो एक भीषण भूल हुई जो कि क्षमनीय तो नहीं फिर भी भूल सुधार की गई है: दरअसल डॉ टी एस दराल का नाम भूलवश डॉ टी एस दरल टंकित हो गया था, क्षमाप्रार्थी हूँ. भूल सुधार कर ली गई है. Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, जुलाई 08, 2009

बाज़ार से गुजरा था, खरीदार नहीं था -विल्स कार्ड भाग ४

पिछले दिनों विल्स कार्ड भाग १ , भाग २ और भाग ३ को सभी पाठकों का बहुत स्नेह मिला और बहुतों की फरमाईश पर यह श्रृंख्ला आगे बढ़ा रहा हूँ.

(जिन्होंने पिछले भाग न पढ़े हों उनके लिए: याद है मुझे सालों पहले, जब मैं बम्बई में रहा करता था, तब मैं विल्स नेवीकट सिगरेट पीता था. जब पैकेट खत्म होता तो उसे करीने से खोलकर उसके भीतर के सफेद हिस्से पर कुछ लिखना मुझे बहुत भाता था. उन्हें मैं विल्स कार्ड कह कर पुकारता......)

आज उन्हीं विल्स कार्डों में से कुछ और, एक साथ एक पुराने रबर बैण्ड से बँधे निकाले. शायद एक ही मूड के होंगे इसलिये एक साथ बाँध दिया होगा.

हमारी यादों की दराज भी तो ऐसी ही होती है, एक मूड की यादें एक बस्ते में बंद एक दराज के अंदर.

मैं मुम्बई में गिरगांव रोड, ओपेरा हाऊस के सामने चर्नी रोड पर रहा करता था एक हॉस्टल में. दक्षिण मुम्बई का व्यापारिक इलाका, मुख्य चौपाटी से लगा हुआ. जो लोग बम्बई के भूगोल से वाकिफ हैं वो समझ जायेंगे कि मैं किस इलाके में रहता था और कुछ ही दूर पर बम्बई का नजारा क्या हैं. फॉकलैण्ड रोड, पीला हाऊस, कांग्रेस हाऊस का मुज़रा, ग्राण्ट रोड़, नाज़ सिनेमा के पास लेमिंग्टन रोड का बदनाम इलाका..सब मानो मेरे हॉस्टल को घेरे ले रहे हो. टहलने निकलो तो गाड़ियों की चिल्ल पौं के बीच तबलों की थाप और घुंघरुओं की छनक.

एकदम नजदीक से देखा है -द कांग्रेस हाऊस-कैनेडी ब्रिज से लगे कोठे और उस ब्रिज पर पर घूमते दलाल, आपको आपकी हैसियत से उपर का अहसास दिलाते- क्या साहब!! एन्जॉय करना मांगता क्या? ए क्लास गर्ल!! एक अजब सा अहसास होता...गिजगिजा सा..गर्ल-ए क्लास..ये कैसी डेफिनिशन..ईश्वर ने तो ऐसे नहीं गढ़ा था.हम मानव अपनी सुविधा से कैसा वर्गीकरण कर देते हैं और सब समझने भी लगते हैं..

अब जब सब आस पास है तो कैसे न सामना हो..कभी कुछ और कभी कुछ वजह मगर काफी करीब से जाना. एक पूरा अलग सा फलसफा है इस तरह की जिन्दगी का, गर समझो तो.

हॉस्टल के करीब जो कोठा था, उसकी मालकिन से तो उस राह से आते जाते एक पहचान सी हो गई..एक अपनापन सा..उसकी ढ्योरी चढ़ने की हम हॉस्टल में रहने वालों को इजाजत न थी. वो हम हॉस्टल के लड़कों को अपना बेटा मानती. इन्सान ही तो थी, दिल रखती थी एक अलग सा..धंधे से जुदा. जाने क्यूँ और कब सब अड़ोसियों पड़ोसियों की तरह उसे मौसी बुलाने भी लगा-गंगा मौसी. मेरी नजर में तो वो बस मौसी थी और बस मौसी..एक आदरणीया..जो प्यार देना जानती थी अपने बच्चों को!!

आज भी याद करता हूँ अक्सर उस गंगा मौसी को..जाने कहाँ होगी वो. उस बाजार में अस्तित्व की उम्र बहुत थोड़ी होती है.

उसी दौरान बहुत कुछ अहसासा-कभी यूँ ही गुजरते, कभी यूँ ही सोचते और अहसास शब्द बन उतरे विल्स कार्ड पर जबकि मौसी तो हमेशा रोकती थी सिगरेट पीने को. मगर वो यादें उन्हीं विल्स कार्डों पर सहेजी गईं, शायद मौसी भी ये न जानती थी वरना कभी मना न करती.

उसी माहौल और वातावरण को मद्दे नजर रख उस दौरान लिखे गये कुछ कार्ड, चौंकियेगा मत इस अँधेरे को देख कर!! अक्सर ही उजाले में खड़े हो लोग इस अँधेरे की तरफ देखने से कतराते हैं.

अहसास करिये पाक आत्मा की भावनाओं की उसी तह को जिनसे ये उभरी हैं:

आत्मा तो हमेशा पाक होती है..
ये मुए कर्म हैं
जो परिभाषित होते हैं -
सतकर्म और दुष्कर्म में.


खिड़कियों से झांकती आँखें

और

एक जिन्दगी यह भी

*१*

कारों के चलने की आवाज
बसों की घरघराहट
उनके भोपूंओं का चिल्लाना
समुन्दर की लहरों की हुंकार
और उनके बीच
गुम होती
उस लड़की की चीख...
इस शहर में एक अजब
दम घोटूं
सन्नाटा है!!


*२*

वो
कातर निगाहें
जाने किस आशा से
खिड़की पर खड़ी
मुझे देखती रहीं ..
और
मैं
पूर्ण स्वस्थ
युवा
एकाएक
कर पाया
अपनी नपुंसकता का अहसास!!

*३*

कुछ सपने
वहाँ भी दिखते होंगे
कुछ अरमान
वहाँ भी जगते होंगे
जो दम तोड़ते होंगे
उस ६ बाई ६ के कमरे में
हर नये ग्राहक के
बोझ तले दब कर!!

हाय! कितनी छोटी उम्र है...

उन सपनों की
उन अरमानों की
बिल्कुल
उस ६ बाई ६ के
कमरे की तरह!!


*४*

वो
तबलों
और
हारमोनियम के साथ
थिरकते घुंघरुओं की आवाज..

वो फूलों की महक
और
इत्र की तीखी खुशबू..

वो खामोश उदासी..

वो मजबूरी की सड़ांध...

-बाज़ार से गुजरा हूँ आज!!


*५*

मजबूरियों की बेडियाँ

लोहे की बेडियों से

मजबूत देखी है मैने..

खिड़कियों से झांकती

कितनी ही आँखें

मजबूर देखी हैं मैने..

*६*

सोचती है

कहीं कुछ

रियाज़ में कमी होगी..

वरना

उसकी अदाओं से रीझे

सब चले आते हैं..

नहीं आती तो बस

मुई!! मौत नहीं आती...

रियाज़ कुछ बढ़ाना होगा!!


*७*


वो नाम बताती है

शमा!!

दूसरी वाली

शन्नो!!

तीसरी

लाजो!!

ये वो बाज़ार है

जहाँ तन बिकता है...

नाम में क्या रखा है?

शेक्सपीअर याद आते हैं!!

*

चित्र साभार: गुगल Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, जुलाई 05, 2009

मैं नॉन प्रेक्टिकल कहलाया..निहायत फालतू!!

पिछले हफ्ते किसी परिवारिक प्रयोजन में मॉन्ट्रियल जाना हुआ.

६०० किमी की यात्रा और ड्राईविंग लगभग ५ से सवा ५ घंटे की.

पत्नी बाजू में बैठे बतियाती हुई पूरे ५ से सवा ५ घंटे जागृत रखने में सक्षम फिर भी कॉफी साथ में रख ही ली कि आराम रहेगा.

हाईवे घर से बाजू में ही है तो ५ मिनट में पहुँच गये और स्पीड पूरे १२० किमी प्रति घंटे की रफ्तार से मिलाकर सामने और पीछे वाली गाड़ी से एक समदूरी बना कर जाँच लिया कि वो भी १२० पर हैं और क्रूज लगा कर गाना सुनने में मग्न हो गये. पत्नी की समझ से उसकी बात सुनने में, जिसमें मात्र हां हूं करना ही एकमात्र उपाय है. बहस या तू तकड़ की गुँजाईश ही नहीं. (डिटेल न पूछना)

क्रूज यह सुविधा दे देता है कि जिस स्पीड पर आपने क्रूज लगा दिया, गाड़ी उसी पर चलती रहेगी. अब आपको एक्सीलेटर या ब्रेक पर पाँव धरे रहने की जरुरत नहीं. सड़कें भी अधिकतर एकदम सिधाई में चलती हैं तो स्टेरिंग पर भी एक उँगली धरे रहना पर्याप्त है.

बीच बीच में पीछे वाली गाड़ी को बैक मिरर में देख ले रहे थे और सामने वाली तो दिख ही रही थी.

सामने ट्रक था, जिसमें ढेरों सुअर लदे चले जा रहे थे और पीछे नीले रंग की पोन्टियक. एक भद्र महिला उसे चला रही थी लगभग ३५ से ४० साल के बीच की. यह उम्र यूँ हीं नहीं लिख दी है. एक लम्बा अनुभव है इसे आँकने का, कम से कम महिलाओं के मामले में. अब तक तो ९९% सही ही गया है. यह बालों की सफेदी जो आप मेरे फोटो में देखते हैं वो घूप की वजह से नहीं है. अनुभव है मित्र. धूप ने तो सिर्फ चेहरे के रंग पर कहर बरपाया है.

सुअरों से लदा ट्रक

जब बैक मिरर में नज़र डालूँ वो देखती मिले. मैं मुस्कराऊँ ( अरे, संस्कार का तकाजा है और कुछ नहीं) और वो मुस्कराये. बस, और क्या?

सामने का ट्रक- सुअर लादे, सुअर की तरह घूँ घूँ की आवाज के साथ चला जा रहा है. हालांकि खिड़कियाँ बंद होने के कारण घूँ घूँ की आवाज डिस्टर्ब नहीं कर रही थी. उसके साईड मिरर में ड्राईवर नजर आ रहा है. उम्र न जाने क्या हो, पुरुष की उम्र, मैं आँकने में सक्षम नहीं क्यूँकि पुरुष तो किसी भी उम्र में कब क्या कर गुजरे, कहना मुश्किल है. विकट मानसिकता होती है उसकी और अजब फितरत.

कुछ ही समय में एक सबंध सा स्थापित हो गया. हमसफरों को रिश्ता. कुछ दूर ही सही, तुम मेरे साथ चलो..टाईप. सामने ट्रक देखने की आदत पड़ गई और पीछे उस महिला को. अरे, उसने तो सिगरेट जला ली. मन किया कि उसे मना करुँ, यह अच्छी आदत नहीं. मगर कैसे और किस अधिकार से? फिर भी एक जुड़ाव की भावना, मात्र कुछ देर कदम से कदम मिला कर चलने पर. लगता है कि डांटूं उसे. मगर सोचता हूँ कि बड़ी हो गई है. अच्छा बुरा समझती है, क्या कहना उससे. कहते हैं कि जब बेटे के पैर में अपने जूते आने लगे तो अधिकार छोड़ उसे दोस्त मान लेने में ही भलाई है. बुढ़ापा ठीक कटेगा. यही कुछ सोच कर जाने देता हूँ.

सामने ट्र्क को देखता हूँ. सुअर लदे हैं. एक छेद से मूँह निकाले ठंडी हवा की मौज लेने की फिराक में दिखा. उसे क्या पता कि गंतव्य पर पहुँचते ही मशीन उसे फाइनल नमस्ते कहने का इन्तजार कर रही है. उस पर गुलाबी निशान है और बहुतों की तरह. शायद गुलाबी मतलब, पहला स्टॉप. तो वहीं कटेगा और फैक्टरी में से दूसरी तरफ पैकेट में पैक निकलेगा पीसेस में बिकने को.

छेद से झाँकता सुअर

वैसे ये तो हमें भी पता नहीं कि कौन सा निशान हम पर लगा है, तभी तो गाना सुनते, कॉफी पीते, पत्नी की चैं चैं (सॉरी, बातचीत) सुनते, पिछली कार में महिला को ताकते, कोई बुरी नजर से नहीं, चले जा रहे हैं खुशी खुशी.

अगर निशान कब मिटेगा पता चल जाये तो आज जीना दुभर हो जाये एक पल को भी. सही है सुअर महाराज, लूटो मजे ठंडी हवा के. मस्त है यह पावन पवन और बहती समीर!!

३०० किमी पर ऑटवा को मुड़ने का एक्जिट आता है और ट्रक निकल लेता है उस पर. हमें सीधे जाना है मांट्रियाल की तरफ. मन में एक खालीपन सा आ जाता है कि कहाँ चला गया मेरा हमसफर. जाने किस हाल में चले जा रहा होगा. खैर, मिलना, बिछुड़ना जीवन का क्रम है, यह सोच मन को मना लेता हूँ और पीछे बैक मिरर पर नजर डालता हूँ.

वो मुस्कराती है, मैं मुस्कराता हूँ. वो सिगरेट पी रही है और मैं कॉफी. उसे शायद कॉफी के खतरे मालूम होंगे और वो भी मुझे रोकना चाहती हो. कौन जाने?

१०० किमी और बीते. इस बीच चार पाँच बार झूटमूठ मुस्कराये. फिर कोबर्ग आया और वो भी निकल गई उस राह और मै अकेला..मांट्रियल गंत्वय के लिए..आगे बढ़ता..और मन गुनगुना रहा है फुरसतिया जी के मित्र ’प्रमोद तिवारी’ का गीत:

राहों में भी रिश्ते बन जाते हैं
ये रिश्ते भी मंजिल तक जाते हैं
आओ तुमको एक गीत सुनाते हैं
अपने संग थोड़ी सैर कराते हैं।..... (बाकी लिंक पर पढ़ें, सुन्दर गीत हैं)


-कहाँ जा पाये मंजिल तक..राह में ही साथ छोड़ गये. मगर यह तय है कि एक रिश्ता कायम कर गये. उन्हें तव्वजो देना या न देना, यही सारी बात तो हमारा खुद का स्वभाव निर्धारित करता है. शायद साथ की मंजिल वही रही हो.

चाहें तो उसे भूल जाये, मगर मैं नहीं भूल पाता...भूल जाना बेहतर माना जाता है...कुछ लोग इसे प्रेक्टिकल होना कहते हैं.

-मैं नॉन प्रेक्टिकल कहलाया..निहायत फालतू विचारधारा का पालक!!



रिश्तों और नातों के
बीच कुछ
इस तरह से
बंट गया हूँ मैं..
कि
खुद से..
कट गया हूँ मैं....

-समीर लाल ’समीर’ Indli - Hindi News, Blogs, Links

मंगलवार, जून 30, 2009

ॐ जय बेनामी देवा!!!

आजकल पूरे ब्लॉगजगत में बेनामियों का तहलका है. बिना नाम के मन मर्जी अनाप शनाप, अच्छी बुरी जैसा जी आया, टिप्पणी कर गये, अब आप आपस में लड़ते रहो. वो बीच बीच में आकर हवन सामग्री और घी डालते रहेंगे. न जाने उनके पक्ष विपक्ष में, उनसे बचने के उपायों पर कितने आलेख लिखे जा चुके, सब बिना किसी हल के ही रहे. कोई भी एकदम सफल और कारगर उपाय बताने में असक्षम रहा. कुछ तो उन्हें पकड़ने के लिए अभी भी जाल बिछाये बैठे हैं मगर हाथ लग रहा है वही सिफर.

बचपन से समझाया गया है कि जब कोई रास्ता न दिखे तो बस, ईश्वर की शरण में चले जाओ. खूब आरती भजन पूजन में मन लगाओ, कुछ न कुछ हल भगवान दिखा ही देगा. उसके पास और कोई काम भी क्या है, बाकी तो सब इन्सानों ने उससे छीन ही लिया है.

बस, उन्हीं संस्कारों की गठरी बाँधे हम तो शुरु हो गये हैं-दिन में दो बार पूरे झाम से बेनामी याने बिन नामियों की आरती उतारने में. बड़ा फायदा लग गया है. अतः, विचारा कि आम जन की साहयतार्थ स्वामी समीरानन्द जी के आश्रम से यह आरती सब लोगों तक पहुँचाई जाये.

बेनामी महाराज!!

चाहें तो इस रिकार्डिंग को अपने ब्लॉग पर लगा लें और सुबह शाम बजा दिया करें या जैसे ही कम्प्यूटर ऑन करें, इसे गाकर फिर ब्लॉगलेखन में जुटें, निश्चित फायदा मिलेगा. फायदे का वादा वैसा ही है जैसा मानसून को बुलाने और गरमी को भगाने जगह जगह आरतियों और यज्ञों के पंडाल से किया जा रहा है इस वक्त भारत में. कितनी जगह तो इन आरतियों के प्रताप से मानसून बड़ी सून आ गया और बाकी जगह भी आ ही जायेगा. मानो कि आरती न होती तो मानसून आता ही न!! जय हो!!

तो नीचे आरती सुनिये, पढ़िये, समझिये, गुनिये और गुनगुनाईये. धुन और आवाज इलाहाबद के एक पंडे से कॉपी करने की कोशिश की है: :)




ॐ जय बिन नामी देवा, स्वामी जय बे नामी देवा
तुमको पकड़ न पाये, गुगल की सेवा.

ॐ जय बिन नामी देवा....

क्म्प्यूटर के जोधा, करते हैं धंधे
तुमको खोज सके न, हो गये वो अंधे

ॐ जय बिन नामी देवा....

तुम नर हो या नारी, सब अनुमान करें
ब्लॉगजनों मे हर कोई, हर पल खूब डरें

ॐ जय बिन नामी देवा....

कितनी मेहनत करके, टिप्पणी हो करते
फिर काहे को अपना, नाम नहीं धरते.

ॐ जय बिन नामी देवा....

तेरी सब पर नजरें, तुम से कौन बचा
ब्लॉगजगत में कितना, तुमसे विवाद मचा..

ॐ जय बिन नामी देवा....

तुम हो अगम अगोचर, कभी नहीं थकते
किस बिधि बचूँ दयामय, गाली तुम बकते.

ॐ जय बिन नामी देवा....

तुमसे उसने सीखा, कैसे बात करें
कुछ न कुछ तो कह दें, काहे मौन धरें...

ॐ जय बिन नामी देवा....

तुम हो ज्ञान के सागर, अपना ब्लॉग लिखो
छुप कर के क्या जीना, खुल कर खूब दिखो!!

ॐ जय बिन नामी देवा....



-समीर लाल ’समीर’

निवेदन:
१.कोई भक्त अगर इसे करयोके पर मय ढपली, मंजिरा और शंखनाद आदि के संग गाये तो कृप्या रिकार्डिंग आश्रम तक भी पहुँचाये और साथ ही स्वामी समीरानन्द का क्रेडिट भी लगा देगा तो स्वामी जी प्रसाद स्वरुप टिप्पणियों की मानसून का वादा करते हैं.

२. यदि किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँची हो तो कृप्या बेनामी टिप्पणी न करें, हम तो पहले ही क्षमा मांग लेते हैं. :) Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, जून 28, 2009

किस बात का गुस्सा? कहीं कोई भय तो नहीं?

पहली मंजिल की खिड़की पर बैठा बैकयार्ड में बगीचा देख रहा हूँ. मौसम बहुत सुहाना लग रहा है.

विज्ञान ने यह संभव कर दिया है कि मौसम चाहे कैसा भी गरम या ठंडा क्यूँ न हो, आप अपने घर का तापमान अपने मन के अनुरुप ढाल कर बाहर शीशे से निहारें और प्रसन्न रहें. क्या फरक पड़ता है बाहर के तापमान से, जब कमरे में ही बैठे रहना हो.

ऐसी सुविधा विज्ञान ने तन के लिए दी और हम ऐसे आदी हुए कि मन नें भी वही आदत बना ली. तन की संगत का असर होगा. कहते हैं न कि संगत अपना प्रभाव छोड़ ही देती है. अब तो कौन कितनी तकलीफ में है या खुश हैं, उससे मन न तो विचलित होता है और न खुश. मायने रखता है तो बस इतना कि क्या हम पर दुख गिरा है या हमें खुशी मिली है. बस, वही कमरे का तापमान. सब कुछ उसी भी निर्भर है. हीटिंग ऑन कर दी तो गरम और कूलिंग चालू तो ठंडा. कितना गरम हो या कितना ठंडा, सब अपने ही हाथ तो है. अखबार की खबरें मात्र शब्द बन कर रह गई हैं. कोई अन्तर नहीं पड़ता. संवेदनाऐं मृत प्राय हो चली है.

खिड़की से देखता हूँ कि सेब के पेड़ में नये फूल आ गये है. कल यही फूल फल बन जायेंगे-मीठे मीठे लाल लाल सेब. एक स्वास्थयवर्धक और स्वादिष्ट फल. तभी एक काली, नारंगी रंग की मिली जुली चिड़िया जंगल से उड़ कर यहाँ चली आई है. सुना है उसे मैने बोलते. घर के बाजू में जंगल है. अक्सर टहलने जाते समय देखा है इस प्रजाति को. बहुत सुन्दर गाती है, बेहद मीठा. जंगल में टहलते, सामने ओन्टारियो लेक से आती शीतल बयार और उसके साथ इसका गायन, मन को आहलादित कर देता है. आज पहली बार उसे अपने बगीचे में देख रहा हूँ.

जंगल से आई: चिड़िया

न जाने किस बात का गुस्सा है. सारे सेब के फूल नोंच नोंच कर बिखराती जा रही है. बीच बीच में दो तीन और चिड़िया भी आ जाती है. कुछ इस तहस नहस में उसका साथ देती है. कुछ जोर जोर से चूँ चूँ कहती लड़ती हैं. शायद इनको समझा रही होंगी कि क्यूँ नुकसान कर रही हो? क्यूँ तोड़ रही है इन नई आती कलियों को और फूलों को? कुछ सब्र करो, फल तो आ जाने दो, तब खा लेना. पेड़ खुद खुशी खुशी खिलायेगा. पेड़ अपने फल खुद तो खाता नहीं, तुम्हारे लिए ही तो हैं. फिर ऐसी क्या नाराजगी कि तुम फूलों को ही खत्म किये दे रही हो.

समझाती होगी कि देखो, यही फूल हैं जिस पर आकर भ्रमर बैठेगे, गुनगुनायेंगे इस पेड़ से उस पेड़. साथ ही झील से आती पावन पवन भी इसके फूलों से पराग अपने साथ बहा कर दूसरे पेड़ तक ले जायेगी और नव सृजन होगा. नये पेड़ होंगे, नये फूल आयेंगे. नये फल होंगे. कितना खुशहाल वातावरण होगा.

कहती होगी कि अगर तुम फूलों का ही नाश कर दोगी तब फिर यह सब कैसे संभव हो पायेगा. नव सृजन ही रुक जायेगा. ये पेड़ भी पूरे परिपक्व होने के पहले ही खत्म हो जायेंगे. सूख कर बस ठूंठ. विचारो मित्र, हर तरफ बस ठूंठ ही ठूंठ. तुम्हारा तो सीमित जीवन है. अब तक उपलब्ध पेड़ पौधों से कट जायेगा पर आने वाली भावी पीढ़ियाँ, तुम्हारे बच्चे..उनका क्या होगा. वो क्या खायेंगे और कहाँ चहकेंगे?

मगर वो माने तब न!! अपने सुन्दर गाने का ऐसा दंभ, ऐसा धमंड कि फूलों की सुन्दरता कैसे बरदाश्त हो. बस, मिटा गई दिन भर में बगिया के दोनों सेब के पेड़.

अब उसमें इस बरस सेब नहीं आयेंगे. क्या पता आने वाले साल में भी आते हैं या नहीं. कल उन हरे भरे पेड़ों की जगह मेरी सुन्दर बगिया में भी ठूंठ होंगे. सोच कर ही दिल दहल जाता है. कितने प्यार से सींचा, संजोया था इस बगिया को. सब बस उस पागल चिड़ियों के दंभ के चलते मिट गया. वो तो वैसे भी जंगल में रहती थी और रह ही रही है, उसे क्या जरुरत आन पड़ी थी इस करीने से सजी बगिया में. शायद जंगल में अपनी पहचान ठीक से काबिज न कर पा रही हो या इस सुन्दर बगिया से घबरा गई हो कि इस बगिया के रहते भला जंगल में कौन आयेगा हरियाली निहारने और उसके गीत सुनने.

कैसे समझाऊँ उसे कि तुम्हारी महत्ता तुम्हारी जगह है ही और अगर बगिया में आती हो तो भी स्वागत करने सब फूल पत्ती फल खुला दिल लिए खड़े ही हैं फिर ऐसी क्या नाराजगी?

आज मुझे जंगली चिड़ियों की भाषा न आ पाने का बहुत दुख हुआ. काश, भाषा समझता होता तो मैं उनका मनतव्य तो जान लेता और उसके अनुरुप ही, उनमें न सही अपनी बगिया में ही कुछ बदलाव या सुधार कर लेता.

तो हे कलमपीरों, हे तथाकथित साहित्यकारों!! हमें दुख है कि हम आपकी भाषा नहीं बोल पाते, हम आपकी भाषा नहीं समझ पाते हैं!! हमारी अपनी छोटी सी बगिया है. नये पौधे रोपें जा रहा हैं. बड़े प्यार से उन्हें सींचा जा रहा है. स्नेह से दुलराकर बड़ा किया जा रहा है. कुछ में फूल भी आने लगे हैं. कुछ तो फलदायी वृक्ष भी हो गये हैं. स्वागत आपका भी है इस बगिया मे.

आप तो ज्ञानी हैं इसलिये भले हम न समझ पायें, आप तो हमारी बात समझ ही जायेंगे. बस!! अपने अहंकार पर काबू पा लिजिये और अपने दंभ को किनारे रख कर आईये. हम तो आपके आने से लाभांवित ही होंगे मगर, यह तहस नहस कैसी? कैसी यह नाराजगी? क्यूँ फूलों को नोंच ले रहे हैं. क्या पा लेंगे इससे? कहीं यह अपना असतित्व खो जाने का भय या इसी तरह की कुंठा तो नहीं?

ऐसा मत करों वीरों. याद है न वो ठूंठ वाली दुनिया. क्या आप वैसी दुनिया चाहते हो!!

चलिये, ऐसा कर लिजिये कि अगर नव-आगंतुको को उत्साहित करने से आपका कद घटता हो तो कम से कम हतोत्साहित न करिये.

वैसे, चलते चलते एक बात और बता दूँ, सेब का पेड़ भारत में लगे, जंगल में लगे या फिर विदेश में-सेब तो सेब ही होता है.मीठे मीठे लाल लाल सेब. एक स्वास्थयवर्धक और स्वादिष्ट फल.

ऐसे ही तो हैं?

नोट: अभी पिछले दिनों किसी कवि की कविता को लेकर किसी वरिष्ट साहित्यकार ने बहुत हंगामा खड़ा किया था कि उन्हें कविता लिखना नहीं आती, फिर भी लिख रहे हैं. फिर, दो-चार दिन पहले किसी वरिष्ट साहित्यकार द्वारा विदेशों में किये जा रहे हिन्दी लेखन को दौ कौड़ी का घोषित कर देना मन दुखी कर गया और उपरोक्त भाव उभरे. Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, जून 24, 2009

कुछ विल्स कार्ड और...

दो रोज पहले हॉस्टल के मित्र, जो उस जमाने में मेरा रुम मेट हुआ करता था, का पत्र प्राप्त हुआ भारत से. बड़ा आश्चर्य का विषय था कि आज के जमाने में कोई पत्र लिखे. ईमेल से काम चला जा रहा है. लेकिन उसने मेरे ब्लॉग पर विल्स कार्ड पर उतरी बातें पढी और फिर यह पत्र भेजा.

(याद है मुझे सालों पहले, जब मैं बम्बई में रहा करता था, तब मैं विल्स नेवीकट सिगरेट पीता था. जब पैकेट खत्म होता तो उसे करीने से खोलकर उसके भीतर के सफेद हिस्से पर कुछ लिखना मुझे बहुत भाता था. उन्हें मैं विल्स कार्ड कह कर पुकारता......)

जाने कब और किस मूड में लिखे मेरे कुछ कार्ड उसके पास रखे हुए थे, वही उसने पत्र के माध्यम से भिजवाये. सोचता हूँ ऐसा कुछ खास था भी नहीं उसमें, फिर भी बस याददाश्त बतौर शायद रखे रहा होगा सहेज कर. इतने सालों से सहेजे इन चन्द कागज के टुकड़ों को अपने से अलग करते क्या अहसासा होगा उसने. एक टीस तो उठी होगी. मैं तो भूल भी चुका था फिर क्यूँ उसने वो मुझे वापस भेजा.बस सोच रहा हूँ. बरसों बीते उससे मुलाकात हुए भी. बहुत यादें जुड़ी हैं उस समय के साथ, उन प्यारे दोस्तों के साथ बम्बई की सड़के नापते, सारा समय अपना, अपनी मौज.

क्या भूलूँ क्या याद करुँ को चरितार्थ करता.

ज्यादा नहीं लिखता. भावुकता जकड़ने लगती है फिर उससे उबरने की जद्दोजहद, तो इतना ही लिख वो विल्स कार्ड नोट्स पेश कर देता हूँ.




-१-

कल मैं नहीं रहूँगा..

यह तय है..

रहोगे तो तुम भी नहीं..

फिर ये अकड़ कैसी ?



-२-

कब्र पर

खारे आंसूओं का सबब

कुछ अनकही बातें

और

अपूर्ण वादों का पाश्चाताप.



-३-

वो नहीं रहे...

अति दुखद..

रहोगे तो तुम भी नहीं..

ऐसा कुछ कर जाओ

कि कोई तो कहे..

अति दुखद!!


-४-

एक आम आदमी मर गया...

क्या आंसूं बहाना....

वो तो मरा ही पैदा हुआ था!!



-५-

वो मर गया

चलो,

आज उसका शरीर फूँक आयें...

आत्मा तो अपनी

उसने सालों पहले ही फूँक दी थी...

-नेता था हमारा!!


-६-

( बम्बई के छोटे से फ्लैट में रह रहे मेरे दोस्त के दादा जी मृत्यु पर मेरे दोस्त की माता जी के व्यक्तव के आधार पर-आज का भौतिकवाद)

बाबू जी नहीं रहे!!

हमारे परिवार की बगिया को

बिन माली कर गये....

बस, तसल्ली इतनी है कि

कमरा खाली कर गये!!


-७-

मेरी कलम से

निकलते

वो

नीले आँसूं

बरबस ही

खींच लाते हैं

तेरी आँखों से

वो

पनीले आँसूं

जो

लुढ़क कर

जब जा मिलते हैं

मेरी कलम के

उन नीले आँसूंओं से

तब छा जाता है

एक धुंधलका सा

अपने साथ लिए

सन्न सन्नाटा

और

गहरी उदास उदासी!!



-समीर लाल ’समीर’ Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, जून 21, 2009

आप जलूल आना.....चोनू!!

जिन्दगी का सफ़र भी कितना अजीब है. रोज कुछ नया देखने या सुनने को मिल जाता है और रोज कुछ नया सीखने. पहले भी इसी पहलु पर कुछ सीखा था और आज नया सीखा.

पता चला कि दफ्तर की महिला सहकर्मी का पति गुजर गया. बहुत अफसोस हुआ. गये उसकी डेस्क तक. खाली उदास डेस्क देखकर मन खराब सा हो गया. यहीं तो वो चहकती हुई हमेशा बैठे रहती थी. यादों का भी खूब है, तुरन्त चली आती हैं जाने क्या क्या साथ पोटली में लादे. उसकी खनखनाती हँसी ही लगी गुँजने कानों में बेवक्त. आसपास की डेस्कों पर उसकी अन्य करीबी सहकर्मिणियाँ अब भी पूरे जोश खरोश के साथ सजी बजी बैठी थी. न जाने क्या खुसुर पुसुर कर रहीं थी. लड़कियों की बात सुनना हमारे यहाँ बुरा लगाते हैं, इसलिए बिना सुने चले आये अपनी जगह पर. हालांकि मन तो बहुत था कि देखें, क्या बात कर रही हैं?

जो भी मिले या हमारे पास से निकले, उसे मूँह उतारे भारत टाईप बताते जा रहे थे कि जेनी के साथ बड़ा हादसा हो गया. उसका पति गुजर गया. खैर, लोगों को बहुत ज्यादा इन्टरेस्ट न लेता देख मन और दुखी हो गया. भारत होता तो भले ही न पहचान का हो तो भी कम से कम इतना तो आदमी पूछता ही कि क्या हो गया था? बीमार थे क्या? या कोई एक्सीडेन्ट हो गया क्या? कैसे काटेगी बेचारी के सामने पड़ी पहाड़ सी जिन्दगी? अभी उम्र ही क्या है? फिर से शादी कर लेती तो कट ही जाती जैसे तैसे और भी तमाम अभिव्यक्तियाँ और सलाहें. मगर यहाँ तो कुछ नहीं. अजब लोग हैं. सोच कर ही आँख भर आई और गला रौंध गया.

हमारे यहाँ तो आज मरे और गर सूर्यास्त नहीं हुआ है तो आज ही सूर्यास्त के पहले सब पहुँचाकर फूँक ताप आयें. वैसा अधिकतर होता नहीं क्यूँकि न जाने अधिकतर लोग रात में ही क्यूँ अपने अंतिम सफर पर निकलते हैं. होगी कोई वजह..वैसे टोरंटो में भी रात का नजारा दिन के नजारे की तुलना में भव्य होता है और वैसा ही तो बम्बई में भी है. शायद यही वजह होगी. सोचते होंगे कि अब यात्रा पर निकलना ही है तो भव्यता ही निहारें. खैर, जो भी हो मगर ऐसे में भी अगले दिन तो फूँक ही जाओगे.

मगर यहाँ अगर सोमवार को मर जाओ तो शनिवार तक पड़े रहो अस्पताल में. शानिवार को सुबह आकर सजाने वाले ले जायेंगे. सजा बजा कर सूट पहना कर रख देंगे बेहतरीन कफन में और तब सब आपके दर्शन करेंगे और फिर आप चले दो गज जमीन के नीचे या आग के हवाले. आग भी फरनेस वाली ऐसी कि ५ मिनट बाद दूसरी तरफ से हीरा का टुकड़ा बन कर निकलते हो जो आपकी बीबी लाकेट बनवाकर टांगे घूमेगी कुछ दिन. गज़ब तापमान..हड्ड़ी से कोयला, कोयले से हीरा जैसा परिवर्तन जो सैकड़ों सालों साल लगा देता है, वो भी बस ५ मिनट में.

साभार: गुगल

खैर, पता लगा कि जेनी के पति का फ्यूनरल शनिवार को है. अभी तीन दिन हैं. घर आकर दुखी मन से भाषण भी तैयार कर लिया शेर शायरी के साथ जैसा भारत में मरघट पर देते थे. शायद कोई कुछ कहने को कह दे तो खाली बात न जाये इतने दुखी परिवार की. बस, यही मन में था और क्या.

शुक्रवार को दफ्तर में औरों से पूछा भी कि भई, कितने बजे पहुँचोगे? कोई जाने वाला मिला ही नहीं. बड़ी अजीब बात है? इतने समय से साथ काम कर रहे हैं और इतने बड़े दुखद समय में कोई जा नहीं रहा है. हद हो गई. सही सुना था एक शायर को, शायद यही देखकर कह गया होगा:

’सुख के सब साथी, दुख का न कोई रे!!’

आखिर मन नहीं माना तो अपने एक साथी से पूछ ही लिया कि भई, आप क्यूँ नहीं जा रहे हो?

वो बड़े नार्मल अंदाज में बताने लगा कि वो इन्वाईटेड नहीं है.

लो, अब उन्हें फ्यूनरल के इन्विटेशन का इंतजार है. हद है यार, क्या भिजवाये तुम्हें कि:

’भेज रही हूँ नेह निमंत्रण, प्रियवर तुम्हें बुलाने को,
हे मानस के राजहंस, तुम भूल न जाने आने को.’

हैं? मगर बाद में पता चला कि वाकई उनका फ्यूनर है STRICTLY ONLY BY INVITATION याने कि निमंत्रण नहीं है तो आने की जरुरत नहीं है.

गजब हो गया भई. तो निमंत्रण तो हमें भी नहीं आया है. फिर कैसे जायेंगे. कैसे बाँटूं उसका दर्द. हाय!!

सोचा कि शायद इतने दुख में भूल गई होगी. इसलिये अगले दिन सुबह फोन लगा ही लिया. शायद फोन पर ही इन्वाईट कर ले. चले जायेंगे. भाषण पढ देंगे. दो बूँद आँसूं बहा कर कँधा आगे कर देंगे कि वो भी सर रख कर इस दर्द भरी घड़ी में हल्की हो ले. इन्सानयित का तकाज़ा तो यही कहता है और इसमें अपना जाता भी क्या है. कँधा कोई शक्कर का तो है नहीं कि उस दुखिया के आँसूओं से गल जायेगा.

पता चला कि ब्यूटी पार्लर के लिए निकल गई है फ्यूनरल मेकअप के लिए. भारतीय है तो थोड़ा गहराई नापने की इच्छा हो आई और जरा कुरेदा तो पता चला कि ब्लैक ड्रेस तो तीन दिन पहले ही पसंद कर आई थी आज के लिए और मेकअप करवा कर सीधे ही फ्यूनरल होम चली जायेगी. कफन का बक्सा प्यूर टीक का डिज़ायनर रेन्ज का है फलाना कम्पनी ने बनाया है और गड़ाने की जमीन भी प्राईम लोकेशन है मरघटाई की. अगर इन्विटेशन नहीं है तो आप फ्यूनरल अटेंड नहीं कर सकते हैं मगर अगर चैरिटी के लिए डोनेशन देना है तो ट्रस्ट फण्ड फलाने बैंक में सेट अप कर दिया गया है, वहाँ सीधे डोनेट कर दें एण्ड एक स्पेशल हिदायत, स्वाईन फ्लू के चलते, कृप्या फ्लावर्स न भिजवायें. स्वीकार्य नहीं होंगे.

हम भी अपना मूँह लिए सफेद कुर्ता पजामा वापस बक्से में रख दिए और सोचने लगे कि अगर हमारे भारत में भी ऐसा होता तो भांजे का स्टेटमेन्ट भी लेटेस्ट फैशन के हिसाब से निमंत्रण पत्र में जरुर रहता:

"मेले मामू को छनिवाल को फूँका जायेगा. आप जलूल आना....चोनू" Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, जून 14, 2009

गज़ल मुझसे रुठी है..

पिछले तीन हफ्तों से हर हफ्ते तीन चार दिन बाहर जाना हो रहा है. मौका ही नहीं लग पा रहा है कि ब्लॉगजगत की बहुत सुध ली जाये मगर फिर भी प्रयास जारी है. अगला हफ्ता फिर व्यस्त है. उसके बाद शायद कुछ राहत हो. अभी दो हफ्ते पहले कैलिफोर्निया यात्रा के दौरान इन प्यारे तोताराम जी से मुलाकात हुई और कुछ बात हुई.

तोताराम

कैद!!


कुछ सोच की
आसमानी सरहदें..
कुछ अनुभव के
नुकीले किनारे..

कुछ सामाजिक मर्यादाओं की
चहारदीवारियाँ..
कुछ कुटुम्बीय मान्यताऐं
मानिंद खेत की मेढ़ें..

कुछ व्यक्तिगत व्यवहारजनित
मान्यताऐं..

इन सबके भीतर
सिमटता हुआ
इक
मेरा जहाँ..

और

मैं

उस जहाँ को सोचता हूँ!!

-कैद में कौन कब खुश रहा है?






अहमियत!!


उपर से चौथी पंक्ति में
बायें से तीसरा शब्द
दायें से गिनों
तो पाँचवां
और नीचे से हिसाब लगायें
तो
सातवीं पंक्ति..

ये वो जगह है
जहाँ बहर टूटी है
और
गज़ल मुझसे रुठी है..

कितनी अहमियत है
हर स्थल की!!!


-समीर लाल 'समीर'



एक जरुरी सूचना: मेरी पुस्तक ’बिखरे मोती’ जीतने का सुनहरा मौका

आप कविता लिखते हैं और हिन्दी ब्लॉगरों के बीच ख़ास मुकाम बनाना चाहते हैं? आप कविता के अच्छे पाठक हैं, कविताओं की समालोचना में यक़ीन रखते हैं। तो हिन्द-युग्म की यूनिकवि एवं यूनिपाठक प्रतियोगिता के जून 2009 अंक में भाग लीजिए और उपहार स्वरूप ले जाइए मेरी नवीनतम प्रकाशित कविता-संग्रह 'बिखरे मोती' की एक प्रति। अंतिम तिथि- 15 जून 2009। अधिक जानकारी के लिए यहाँ देखें।


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मंगलवार, जून 09, 2009

कमबख्त, पसीने की बू नहीं जाती!!!

कमरे में वापस आ गया हूँ. दिन थकान भरा रहा हमेशा की तरह.

गगनचुंबी इमारत की गगन के पास वाली फ्लोर.

यह है टोरंटो की 'क्वीन्स के' नामक सड़क पर..ओन्टारियो लेक से सटी हुई अभिजात्य रहवासी कॉलोनी.


टोरंटो



कल रात यहीं तो इसी कमरे में मैं और लिंडा बैठे थे वाईन सुड़कते हुए, एक दूसरे से सटे हुए भारत की हालत पर बात कर रहे थे. एक निहायत थकी हुई बात. यहाँ के हिसाब से बेबात की बात.

हाँ, पिछले साल ही तो मैं और लिंडा भारत गये थे. लिंडा पहली बार भारत गई थी कितनी ही किताबें पढ़कर, मुझसे सुन कर और तस्वीरें देखकर ख्वाब सजाये. उन्हें सच होता देखने.

यहाँ से दिल्ली तक का थकाऊ २२ घंटे का हवाई सफर-बैठे बैठे. बीच में पेरिस के ४ घंटे का अल्प विराम कैसे गुजरा टर्मिनल बदलते कि पता ही नहीं चला कि कहीं रुके भी.

एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही गर्म हवा का भभका और साथ घुली पसीने की खुशबू-(लिंडा उसे बदबू की संज्ञा दे गई-बेवकूफ!!)

फिर रेल में जबलपुर और आगे सिवनी के पास गांव तक की रोडवेज की यात्रा. लगा कि कहाँ आ गये. सब तरफ उड़ती धूल..उधड़ी सड़कों पर चलते..हवा में गोबर की महक. लिंडा की गोरी चमड़ी देख ग्रमिणों की अचरज भरी आंखें और अपनी ओर ध्यानाकर्षण करवाने विचित्र भाव भंगिमा बनाते लोग.

मैं भी बिना ज्यादा चले थका हुआ साथ चलता रहा एक खीज, एक घृणा का दायरा अपने आसपास साधते..कैसे लोग हैं बिल्कुल अनपढ़...एकदम लिंडा जैसी सोच हो गई मेरी भी. २१ दिन की यात्रा..तालाब के किनारे मंदिर. बरगद के नीचे सिंदूरी पत्थर याने हनुमान जी-बुझी हुई अगरबत्तियो की जलती खुशबू. कोई सार्थकता नहीं बस एक निष्ठ भाव. भूली हुई पुरानी यादों का साक्षी, जो मुझे न जाने क्या क्या याद दिला जाता है और लिंडा नाक पर रुमाल रखे पास से आती पैशाब और पैखाने की बदबू से एक हारी लड़ाई लड़ती हुई और मैं उस हवा की महक में अपना बचपन अहसासता.

बस, एक दिन में ही २१ दिन की यात्रा १५ दिन में बदल गई.

मै भी भारत की स्थितियों की बुराई करते हुए उसी के साथ वापस आ गया. उसी शाश्वत झिड़कन के साथ कि यह हालात कभी नहीं सुधरेंगे जबकि भीतर से मैं ही जानता था कि कितना कुछ बदल चुका है.

मगर लिंडा तो अपने जेहन में बसे किताब वाला भारत, दूध दही की नदियों वाला भारत, सोने की चिड़िया वाला भारत, दुनिया के माथे की बिंदिया वाला भारत, जान से प्यारा मेहमान को मानने वाला भारत और न जाने कौन कौन सा भारत खोज रही थी. वो नाक पर रुमाल रखे तलाशती थी उस भारत को जिसके दामन से आने वाली हवाओं को सलाम करने का जी चाहता है वो उसे कहाँ दिखाता? उसे कैसे बताता कि यही वो दामन से उठने वाली हवा है, यही वो माहौल है जो मुझे वापस बुलाता है..मुझे मेरा अतीत याद दिलाता है. मुझे मेरा अपना लगता है. मेरा दिल इन्हें ही सलाम करने को मचलता है. वो नहीं समझेगी.

आज खिड़की के नजदीक जाता हूँ..इतने उपर..सामने आकाश..सामने तैरता ओन्टारियो लेक..मानो जैसे लेक नहीं महासागर हो. खिडकी से सट कर सड़क देखता हूँ तो लगता है कि सड़कों पर कारें नहीं हजारों चिटिंया कतार बनाये घूम रही हैं.

बचपन में गांव के खेत में लाल चीटीं की बांबि पर पैर रख दिया था अनजाने में. सब पैर पर चढ़ गईं थी और जी भर के काटा. मैं रोने लगा था तब माँ ने पुचकारते हुए उस पर घी और नमक मिला कर लगाया था तब जाकर जलन कम हुई थी... मन में सिरसिरी सी चढ़ जाती हैं. अचकचा कर खिड़की से दूरी बना लेता हूँ. गोड़ झटक लेता हूँ, तब थोड़ा ठीक लगता है. आँख पोंछ कर देखता हूँ, न जाने कहाँ से आज फिर एक नमी सी है बस पुचकारने वाला कोई नहीं. घी नमक लगाने वाला कोई नहीं. मैं और बस मैं-निपट अकेला.

सब मन की उड़ान है.

आज से मुझे, न जाने क्यूँ, लिंडा अच्छी नहीं लगती. अब नहीं मिलूँगा उसे.

लगता है कि अभी मर जाऊँ इतने उपर की मंजिल में..तो जितना समय इस फ्लोर से जमीन तक जाने में लगेगा..उतने ही समय में ही उपर पहूँच जाऊँगा.. आधा रास्ता तय कर लिया है अपनी जड़ों को छोड़ कर.

मन नहीं मानता..दराज खोल लेता हूँ..१३ साल पहले भारत छोड़ते समय टीका लगाते हुए माँ ने लिफाफा दिया था....उसे आज खोलता हूँ...१०१ रुपये हैं - १०० का नोट और १ का सिक्का. यह कह कर कि रास्ते के लिए रख ले. क्या पता कब काम आ जाये. सच, अभी रास्ते में ही हूँ..देखो, आज आ ही गया. माँ की फिर से याद हो आई. लिफाफे ने उनके होने का अहसास दिया. पैर में जलन कुछ राहत पा गई.

आँख भर आई है. उठ कर बाथरुम में आ गया हूँ..आईना देखता हूँ ..मैं दिखता हूँ उसमें. आँख मे नमी लिए. मगर खुद से आँख मिलाने की हिम्मत कहाँ....सर झटक देता हूँ...यथार्थ में लौटने के लिए.

कमरे में वापस आ जाता हूँ.

मैं तो अब भारतीय ही नहीं रहा...मगर यहाँ का भी तो नहीं हो पाया. ब्राउन स्किन्ड, हाऊ कैन यू बिकम व्हाईट स्किन्ड गाय!!!

ए सी कमरे में मैं घबरा कर अदबदाया सा पसीने में भीग जाता हूँ.. पसीने की बू..काँख से उठती हुई.. वही..गांव वाली....

कमबख्त..पसीने की बू नहीं बदलती...क्या करुँ? क्यूँ नहीं जाती यह..कोलोन और महक वाले साबुन..सब इस्तेमल कर लिए...!! और फिर मैं तो भारत में रहता भी नहीं. इतने साल हो गये यहाँ रहते..शायद ये मेरे खून में रची बसी है. मेरे साथ ही जायेगी.

नाईट सूट गड़ने लगता है. न जाने क्यूँ..आज लूँगी न होने की कमी खली.

वरना घुटने तक उसे खींचें अधलेटा सा मसनद टिकाये पड़ा रहता, पिता जी की तरह जब वो टूर से थक कर लौटते थे. मैं भी तो बहुत थक गया हूँ. कितना दूर चला आया हूँ.

वाईन का गिलास!! इसे बदल देता हूँ स्कॉच से. वो ज्यादा स्ट्रांग होती है. शायद कुछ बेहतर अहसास दे. एक भ्रम ही सही मगर और रास्ता भी क्या है?

मैं फिर स्कॉच का गिलास लिये खिड़की पर खड़े उस आईलेन्ड को निहारने लगता हूँ जिसे लोग सेन्ट्रल आईलेण्ड कहते हैं.

टोरंटो का मुख्य आकर्षण केन्द्र. दिन भर सेलानियों का फेरी से आने जाने का तांता लगा रहता है.

चारों तरफ सिर्फ पानी मगर फिर भी अपना जमीनी अस्तित्व बरकरार रखे हुये लोगों को आकर्षित करता!!

लेकिन मेरा अस्तित्व, उसे मैं बरकरार नहीं रख पाया और न ही मुझमें अब कोई आकर्षण शेष रहा!!!

यही हाल होता है अपनी जड़ों से दूर-उपर से महकती क्लोन की खुशबू और भीतर से उठती पसीने की वही गांव वाली बू!!

दोनों की मिली जुली गंध- तेजाब से तीखी गंध का भीतरी अहसास-जो सिर्फ मैं महसूस कर सकता हूँ. उस गंध की जलन से मेरी आँखें जलने लगती हैं और बह निकलती है एक अविरल अश्रुधारा.

ऐसे आँसू, जो किसी को नहीं दिखते. दिखती है तो सिर्फ मेरी वो मुस्कराहट और आती है सिर्फ मेरे उस कोलोन की खुशबू, जिसमें दफन किये फिरता हूँ अपने इन आँसूओं को और उस गांव वाली पसीने की बू को. Indli - Hindi News, Blogs, Links

सोमवार, जून 08, 2009

मृत्यु का बुलावा जब भेजेगा तो आ जाऊँगा....

आज सुबह सुबह एक हृदय विदारक दुखद समाचार मिला.

एक सड़क दुर्घटना में मंच के लोकप्रिय कवि ओम प्रकाश आदित्य, नीरज पुरी और लाड सिंह गुज्जर का निधन हो गया और ओम व्यास तथा ज्ञानी बैरागी गंभीर रूप से घायल हुए हैं. सभी विदिशा से भोपाल एक इनोवा द्वारा म.प्र. संस्मृति विभाग द्वारा आयोजित कवि सम्मेलन में भाग ले कर वापस आ रहे थे.

एक शोक सूचना और- वरिष्ठ रंग-कर्मी हबीब तनवीर का भोपाल में ८६ वर्ष की उम्र में निधन हो गया. रंगमंच की एक महत्वपूर्ण कठपुतली को जगत-नियंता ने अपने पास वापस बुला लिया.

हबीब तनवीर जी, आदित्य जी, नीरज पुरी जी, और लाड सिंह गुज्जर जी को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि

और

ओम व्यास तथा बैरागी जी शीघ्र स्वास्थय लाभ की कामना.

वाकई, आज का दिन "मंच" पर वज्रपात का दिन है.

आदित्य जी



नीरज पुरी जी




लाड सिंह गुज्जर जी



हबीब तनवीर जी



जब जब ख्याल आता है तो आदित्य जी की यह रचना उनकी विशिष्ट स्वर लहरी में कानों में गुँजने लगती है.


दाल रोटी दी तो दाल रोटी खाके सो गया मैं
आँसू तूने दिये आँसू पीये जा रहा हूँ मैं
दुख तूने दिये मैने कभी न शिकायत की
सुख दिये तूने सुख लिए जा रहा हूँ मैं
पतित हूँ मैं तो तू भी पतित पावन है
जो तू कराता है वही किए जा रहा हूँ मैं
मृत्यु का बुलावा जब भेजेगा तो आ जाऊँगा
तूने कहा जिये जा तो जिये जा रहा हूँ मैं

बचपन में खिलौने, जवानी में जोश
और बुढ़ापे में आदमी का धन साथ देता है
संपत्ति में साथ देने तो हजारों आ जाते हैं
विपत्ति में प्रभु का मनन साथ देता है
तन स्वस्थ रहे तो ये मन भी न होता पस्त
मन मस्त रहे तो ये तन साथ देता है
हिम्मत के हथियार हाथ से जो खिसके तो
तन साथ देता है न मन साथ देता है.


-बस, आज इतना ही. अगर इस रचना को आदित्य जी की आवाज में सुनने का मन हो तो यू ट्यूब पर यहाँ सुनें. Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, मई 31, 2009

कुछ निवेदन और पहेली का जबाब एवं विजेता

जब कालेज में पढ़ा करते थे, अमिताभ बच्चन टॉप पर थे. जो फिल्म आये, हिट होती थी. हॉल में नई फिल्म में सुबह ६ बजे से शो शुरु हो जाते थे और रात १२ बजे तक चलते रहते थे.

जमाने में बहुत कुछ नहीं बदला, उनमें से एक बात यह भी नहीं बदली कि तब भी टिकिट के ब्लैकिये तबीयत से पुलिस की मिलिभगत में कारोबार करते थे और आज भी. अमिताभ की किसी भी नई फिल्म के शुरुवाती हफ्ते उनके लिए धन्धे का व्यस्त समय होते थे.

अब का पता नहीं मगर तब अमिताभ का ऐसा क्रेज होता था कि कालेज के आधे से ज्यादा लड़के, जिसमें हम खुद भी शामिल थे, कान को ढके बाल के साथ उल्टा सेवन वाली कलम रखा करते थे. फिल्म खत्म होने पर यही वीर दोनों हाथ पाकेट में डाले सर झुकाये टहलते हुए निकलते थे मानो खुद ही अमिताभ हों. हर चेहरे पर उसी के समान गुस्सा और एक विद्रोह का भाव.

हमारे साथ पढ़ते थे नीरज शर्मा. एक मात्र योग्यता के आधार पर कि वह ६ फुट से कुछ ज्यादा थे, वो अपने आप को अमिताभ बच्चन समझते थे. वही स्टाईल बिल्कुल कॉपी. शायद शीशा देखने के आदी न रहे होंगे तो मुगालते में पलते रहे.

हम दोस्तों का सच्चा झूठा प्रोत्साहन तो साथ रहता ही था बाफर्ज, सब उसे अमित कह कर ही पुकारते थे और वह दिन भी आ गया, जब वो एक ऑर्केस्ट्रा के साथ अमिताभ बच्चन की नकल करते मंच पर नज़र आने लगे. मंच की चकाचौंध, स्टाईल ,चश्मा, बाल आदि में वो वाकई अमिताभ सा ही लगता था दर्शक दीर्घा से.

देखा, प्रोत्साहन का नतीजा!!


यह सूत्र जीवन हर क्षेत्र में लागू होता है. लेखक या कवि लिख रहा है, माना कि नया है और बहुत अच्छा न भी लिख रहा हो मगर एक मुगालते में तो है ही कि वो लेखक है या कवि है. ६ फुट से ज्यादा होने की तरह एकाध क्वालिटी तो है ही तभी तो कम्प्यूटर पर लिख पा रहा है ब्लॉग खोल कर. उसे भी लाइम लाईट में लाओ भाई.

जरुरत है बस तुम्हारे प्रोत्साहन की और तुम हो कि अपनी लेखनी पर फूले पिचके मूँह फुलाये बैठे हो. कुछ बोलते ही नहीं. कभी अपने शुरुवाती लेखन को भी देखना और फिर आज का. क्या शुरु से ही ऐसा ही लिख रहे हो. फिर?? वो भी नया आया है लेखन में जैसे कभी तुम आये थे. बस, दरकार है उसे तुम्हारे प्रोत्साहन की.

भय मत खाओ कि वो तुम्हें पीछे छोड़ कर आगे निकल जायेगा.
सो तो अपने इस दंभ के तले यूँ भी छूट जाओगे. विश्वास करो प्रोत्साहन देने से तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ेगा मगर उसका बहुत कुछ बन जायेगा.

बस, आज इतना ही. किसी की ईमेल आई है जिसने ब्लॉग जगत में आई टिप्पणियों की मंदी और पुराने लिख्खाड़ों द्वारा नये लोगों के ब्लॉग पर टिप्पणी न देने पर चिन्ता और मायूसी जाहिर की गई है. बात उनकी सही लगी, तो निवेदन दर्ज कर दिया.


अब, पिछली पोस्ट पर पूछी गई पहेली:

पहली बात तो उस आलेख का उदगम स्थल था निशान्त मिश्र जी का ब्लॉग हिन्दी जेन पर २९ मई को पूछी गई पहेली पर आई बेनामी जी की टिप्पणी.

पहेली के चित्र:



का सही जबाब:

ऊपर: श्री ज्ञान दत्त पांडे

चश्मा: श्री अजीत वडनेकर

नीचे: डॉ अनुराग आर्या



विजेता रहे:

प्रथम: ताऊ रामपुरिया



द्वितीय: सैयद

तीसरे नम्बर पर: संजय तिवारी ’संजू’

चौथे: श्री ज्ञान दत्त पांडे जी


विजेताओं को बधाई.


सभी प्रतिभागियों का बहुत आभार और बधाई.


चलते चलते:

तीन चार पोस्ट पहले कविता पर एक टिप्पणी आई:

’सहनीय रचना’

हम चकित. सब इतनी तारीफ मचाये हैं और ये भाई जी कह रहे हैं ’सहनीय रचना’. रात भर जागे रहे कि ये क्या हुआ. फिर एकाएक सुबह के सूरज के साथ दिमाग खुला कि टंकण त्रुटि के चलते ’सराहनीय रचना’ की जगह ’सहनीय रचना’ लिख गया होगा. बस, पूरे उत्साह से टिप्पणीकर्ता को ईमेल लिखी गई और निवेदन किया गया कि शायद टंकण त्रुटि रह गई है और प्रोत्साहन की आदत के चलते जोड़ दिया कि अक्सर जल्दबाजी में ऐसा हो जाता है. जबाब आने में जरा भी समय नहीं लगा. लिखा कि ’भाई उड़न जी, आपसे सहमत हूँ कि जल्दबाजी में ऐसा हो जाना संभव है किन्तु यह टिप्पणी तो जल्दबाजी में नहीं लिखी है. दरअसल मैं वही कहना चाह रहा था जो आप पढ़ रहे हैं.
अब??

अब क्या-रिजेक्ट-मॉडरेशन का फायदा उठा लिया. इसीलिए कहता हूँ कि मॉडरेशन लगाओ. यह तो अच्छी सलाह थी जिसने मुझे अपनी रचनाओं पर पुनर्विचार का मौका दिया, बस जरा दंभ आड़े आ गया. इन्सान हूँ और गलत फैसले लेना इन्सानी स्वभाव, मैं कैसे अछूता रह सकता हूँ तो हो गया गलत फैसला रिजेक्ट करने का. मगर अक्सर लोग उट पटांग बातें लिख कर भाग जाते हैं, यहाँ तक की गाली गलोज भी. उसे तो आप कंट्रोल कर ही सकते हो मॉडरेशन से बात बढ़ाने की बजाये. Indli - Hindi News, Blogs, Links

शुक्रवार, मई 29, 2009

क्या बूझूँ, क्या याद करुँ? : पहेलियों का माया जाल!!

लिखने के पहले साफ कर दें कि हम तो खुद ही पहेली बूझने सबसे पहली पंक्ति में खड़े रहते हैं और ताऊ पहेली पर हैट्रिक लगाकर ’महा ताऊ श्री’ एवं संचालक मंडल का हिस्सा भी बन गये हैं लेकिन यह आलेख किसी बेनामी की भावनाओं की गिरफ्त में लिखा जा रहा है. अब बूझ के बताओ कि उस बेनामी नें कब और कहाँ ऐसी टिप्पणी की कि इस आलेख का जन्म हुआ.

वैसे भी सदाचार का भाषण देने के लिए सदाचारी होना कोई जरुरी थोड़े ही है वरना तो बाबा लोगों के मंचो पर आकाल पड़ जायेगा. ये दूसरी बात है कि मोटी चमड़ी वाले ये बाबा आकाल के बाद भी मासूम किसानों की तरह आत्म हत्या नहीं करने वाले. इनका क्या है, नेता हो लेंगे.

आजकल पूरा ब्लॉगजगत लाल बुझक्कड़ बना हुआ है.

लाल बुझक्कड बूझ गए,और ना बूझा कोय
पैर में चक्की बांध के हिरणा कूदा होय


जिसे देखो, एक ठो तस्वीर लिए चला आ रहा है कि ’पहचानों कौन?’ और हम जैसे दसियों पीर जुटे हैं अटकल लगाने में. जितनी देर लगती है एक पहेली का जबाब ढ़ूंढने में, उतनी देर में कम से कम दस ब्लॉग को जिन्दाबाद कर आये होते. भारत जैसा हाल है, जितने का गबन हुआ, उससे कई गुना ज्यादा जाँच समितियाँ निपटा गईं और हाथ आया सिफर.

मगर नाम का मोह छूटे जब न!! यहाँ भी हमारा नाम रहे, वहाँ भी और वहाँ भी. कई बार तो खुद से कहने लगता हूँ कि अरे महाराज, जितना गुगल पर दौड़ रहे हो जबाब ढूंढने, इतने का दस परसेन्ट भी अगर ब्लॉगजगत के बाहर दौड़ लगाई होती तो इतनी सॉलिड और छरहरी बॉडी बन जाती कि खुद का फोटू लगा कर पूछ सकते थे, ’पहचान कौन?’

लोग अटकलें लगाते कि पक्का अमिताभ है, कोई कहता सलमान है तो कोई कहता शाहरुख मगर कोई सच न बता पाता. फिर हम क्लू देते कि हैं उन्हीं टाईप, वेरी क्लोज मगर वो नहीं हैं. दाई ओर देख, बाईं ओर देख और जाने क्या क्या क्लू!!

अब आजकल तो हिट ही हो रही है. किसी भी ब्लॉगर का फोटू उठाया, फोटो शॉप खोली, स्मज टूल पकड़ा और लगे फोटू की बैण्ड बजाने और चिपका दिया-’पहचान कौन?’ क्या खाक पहचानें? जिसकी है वो तक तो पहचान नहीं पा रहा. यहाँ तक कि अगर पूछने वाले के पास से नाम गुम जाये तो पहेली का परिणाम घोषित करना भारी पड़ जाये.

फोटो पर कुछ कलाकारी करो कि जैसे आँख किसी की, मूँह पर आधा किसी का और आधा किसी का, फिर पूछो कि तीनों को पहचानों, तो फिर भी समझे. पूरा रगड़ मारो और फिर पूछो कि ’पहचान कौन?’ यह तो नाईन्साफी है. इतना भी पूछ लेते कि यह क्या है तो भी न बता पाते कि किसी ब्लॉगर की तस्वीर है. बस, आधे कहते कि फूल है, कोई कहता समुन्द्र तो कोई आसमान बताता. ऐसी हालत कर देते हो तुम फोटू की.

इनके लफड़े में पड़े तो अपनी आदत खराब हुई जा रही है. कहीं फोन करो अगला नेचुरली पूछता है कि कौन बोल रहे हैं और हम बिगड़ी आदत लिए, ’बूझो तो जाने?’. फिर वो कहता है कि ’नहीं पहचान पा रहे हैं’ हम इधर से पूछ रहे हैं कि ’क्लू दूँ क्या?’ दोस्त पागल सा समझने लगे हैं.

कहीं पत्ती मिल जाये, मरा जानवर मिल जाये, टूटा फल मिल जाये, कोई उल्टा टंगा दिख जाये-बस, लगे फोटो लेने. पत्नी पूछा रही है कि इस फोटू का क्या करोगे तो बस एक जबाब, ’पहेली पूछूँगा’.. मानो पहेली न हुई, किसी गरीब का हाल हो गया. जो नेता आ रहा है, पूछ कर चला जा रहा है. बूझने को कोई बूझ नहीं पा रहा है. अब, पत्नी ने भी ध्यान देना बंद कर दिया है. पागल के साथ जीना भी इन्सान सीख ही जाता है खास तौर पर अगर वो आपकी पत्नी हो.


अब तुम पहेलीबाजों से क्या कहूँ कि एक तो ये बूझने, पूछने वाली नित नौटंकी फैलाये हो फिर उस पर से तुर्रा यह कि ’यह १०० वीं पोस्ट है’ बधाई दो..अरे, अगर यही पोस्ट है तो हफ्ते भर में १०० कर डालें. :) फिर देते रहना ’साप्ताहिक बधाई’.

पहेली वो पूछ मेरे आका जिससे कुछ ज्ञान बढ़े. वाकई कुछ जानकारी मिले. ब्लॉगर कायदे के पन्नों में जाकर स्मारकों को, ज्ञानियों को ढूंढे और उनके बारे में जाने. ताऊ को देखो, एक से एक स्मारक ला रहा है, ऐतिहासिक महत्व की और फिर उसके बारे में पूरी जानकारी. कितना ज्ञावर्धन होता है. कुछ तो सीखो.



सिर्फ खेल खेल करना है तो आओ, ताश वाला जुआ खेलें. अगर समय खोटी जाये तो कुछ कमाई धमाई का जुगाड़ भी बैठे.

वैसे तो जिसको जो खेल खिलाना हो, खिलाओ. हम तो बस मौज लेने निकले थे सो ले ली.


अब बुरा लगा हो तो इसका जबाब देना:


तीन ब्लॉगर्स

इस एक फोटो में तीन ब्लॉगर है. माथा और उपर-एक, चश्मा और आँख-दो और आधी नाक और उसके नीचे-तीन. तीन के तीनों नामी गिरामी धाकड़ ब्लॉगर.

पहचानो कौन??

वैसे, मैं इस फील्ड में नहीं आ रहा हूँ तो निश्चिंत रहो. आज पूछ इसलिए लिया कि तुम्हारे पास कहने को रहे कि तुम भी तो वही कर रहे हो. माईनोरटि में जाते डर लग रहा है न इसलिए.

अंत मे: कोई बुरा मत मान जाना भाई. आज कहीं एक बेनामी टिप्पणी पढ़ी, उसी का सार संक्षेप है. :)


जरुरी सूचना: कल ५ दिन के लिए केलिफोर्निया जा रहे हैं. ७ घंटे की लम्बी दूरी की हवाई यात्रा है. नेट से दूरी रहेगी मगर पहुँच कर जुड़ने का प्रयास रहेगा. Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, मई 27, 2009

सावधानी हटी और दुर्घटना घटी

कल कहीं एक बहुत बेहतरीन चेतावनी पढ़ रहा था:

’यदि आपकी उम्र ५० से अधिक है और सुबह नींद खुलने पर आपके शरीर के किसी भी हिस्से में दर्द नहीं है तो शायद आप मर चुके हैं. जरा, चैक कर लिजिये.’

अब मर ही गये हैं तो क्या खाक चैक करें जी. मरे ही ठीक. डले रहेंगे. कोई न कोई मरघट तक पहुँचा ही देगा.

मुझे लगता है कि यह पंक्ति बदली जा सकती है:

’यदि आप ब्लॉगर हैं या कम्प्यूटर पर ३ घंटे से ज्यादा समय बिताते हैं तो आप ने उम्र पर विजय प्राप्त कर ली है. आपको ५० का होने की जरुरत नहीं. किसी भी उम्र में उपरोक्त वाक्य सिद्ध माना जा सकता है.’

मर जाने का उम्र से क्या लेना देना. आजकल तो २२-२३ साल के युवाओं को हार्ट अटैक आये जा रहे हैं.

ऐसे नहीं कि इन पर विजय नहीं प्राप्त की जा सकती. निश्चित ही अनुशासित जीवन, नियमित और पौष्टिक खुराक और सही व्यायाम के साथ इनको हराया जा सकता है.
(मेरी तस्वीर इतने आश्चर्य से क्या देख रहे हो? ज्ञान बाँटने के लिए ज्ञानी होना जरुरी थोड़े है और ज्ञान बाँटने वाला अगर सारी बातों पर अमल करे तो ये जितने बाबा हवाई जहाज से आकर मंच पर तुम्हें भाषण देकर ऐश कर रहे हैं, वो भीख मांग रहे होते और जंगल में रहते)

तो बात करें सही व्यायाम की. ५० के बाद वाले छोड़ो, उसे तो हम भी छोड़े ही हुए हैं. अभी तो बस वो कम्प्यूटर पर ३ घंटे से ज्यादा बिताने वालों की देखो. वो ज्यादा जरुरी हैं तुम्हारे लिए क्योंकि जब यह ब्लॉग पढ़ रहे हो तो कम्प्यूटर प्रेमी तो होगे ही वरना तो अंग्रेजी की कुछ वेब साईट देख कर खिसक लेते.

मैं एक ऐसे सज्जन को जानता हूँ जो रोज नियम से सुबह आधा घंटे नेट पर टाईम्स ऑफ इंडिया पढ़ते हैं और बस!! इसके सिवाय कम्प्यूटर से कुछ लेना देना नहीं. पान की दुकान में गर्व से सीना चौड़ा कर बताते हैं कि हम तो न्यूज कम्प्यूटर पर ही देखते हैं. भले आदमी, सिर्फ टाईम्स ऑफ इंडिया पढ़ने के लिए कम्प्यूटर और फिर नेट का कनेक्शन, कम्प्यूटर ढ़कने की चादर, टेबल, कुर्सी, एसी और जाने क्या क्या इन्वेस्टमेन्ट कर डाला. अब समझे मंदी का असल जिम्मेदार कौन. सारा का सारा डेड इन्वेस्टमेन्ट.

उनकी वो जाने आप तो व्यायाम देखो:

व्यायाम

१. कभी २० मिनट से ज्यादा स्क्रीन पर लगातार मत देखो.

-हर २० मिनट बाद, आँख कम्प्यूटर स्क्रीन से हटाकर चार बार एक आँख जोर से मींचो और चार बार दूसरी और फिर चार बार दोनों एक साथ. फिर दोनों हथेलियों को आपस में ७ से ८ बार घिसो, घिसो और दोनों आँखों पर हथेली लगाओ. फिर घिसो, फिर लगाओ-ऐसा भी चार बार करो. अब फिर से काम करने को तैयार. समय खर्च हुआ ३० सेकेंड से कम और आँख रहे चकाचक.

सावधानी: अगर दफ्तर में या साईबर कैफे में हो, तो आँख मींचने के पहले देख लो कि मूँह किसी लड़की की ओर तो नहीं. वरना आँख तो सही हो जायेगी और जो मार पड़ेगी, उससे बाकी हड्डियाँ हिल सकती हैं.

२.कुर्सी पर बैठे बैठे काम करते करते पंजे के बल ऐड़ी उपर उठाओ, कुछ देर रुको और फिर ऐड़ी जमीन पर छुलाओ. ऐसा जब भी याद आये, कर लो. कोई समय सीमा नहीं, कोई निश्चित आवृति नहीं. पैरों का ब्लड सर्कूलेशन बना रहेगा. कई जो धुटने में दिमागधारी हैं, उनके लिए तो रामबाण.

सावधानी: सिर्फ ऐड़ी उठाना है, खुद को नहीं वरना अगर हमारी जैसी कायाधारी हो तो मोच आ सकती है और दूसरा पड़ोस के क्यूबिकल में बैठी सुकन्या को गलतफहमी हो सकती है कि तुम उचक उचक कर उसे ताक रहे हो. कहीं कम्पलेन्ट कर दी तो मंदी में तो दूसरी नौकरी भी मिलने से रही.

३. हर १ से १.३० घंटे में अपने दोनों हाथ सामने सीधे फैला लो. दोनों हथेली जमीन को देख रही हो. फिर हाथ को यथास्थिति में रखते हुए हथेली के उपर उठाओ ताकि वो सामने की दीवाल देखने लगे, जितना ज्यादा देख सके. फिर उसे नीचे झुकाओ ताकि अब वो उल्टा हो तुम्हें देखे और उँगलियों की पोर जमीन को. ऐसा दस बार करो. फिर हाथ सीधा रखते हुए १० बार मुट्ठी भींच कर बंद करो और पूरी हथेली फैला कर खोलो. फिर पांच बार बंद मुठ्ठी को कलाई से बाईं ओर घुमाओ और पांच बार दाईं ओर. फिर हाथ सामन्य स्थिति में ले आओ और काम पर लग जाओ.

सावधानी: समझदार तो हो ही. मुठ्ठी खोलते और बंद करते वक्त कंडिका १ वाली ही सावधानी बरतो, वरना कोई सिर फिरी हुई तो कंडिका १ वाली ही परेशानी हो सकती है. ये उपर वाले फोटो से कन्फ्यूज मत होना. इन्हें तो कहीं भी बिना सावधानी कुछ भी करना एलाउड है. इनका साथ देने हजार आ जायेंगे और तुमको पीटने भी हजार.

४. दिन में कम से कम दो से तीन बार दोनों हथेलियों को बैठे बैठे गरदन के पीछे ले जाओ और हथेलियों की आपस में उँगलियों से फंसा लो. फिर दोनों हथेलियों को गरदन से धक्का दो. सामान्य हो जाओ और फिर धक्का दो जब तक बरदाश्त हो. ऐसा कम से कम पाँच बार करो, फिर सामान्य स्थिति में आ जाओ.

सावधानी: इसमें क्या सावधानी?? आदत पड़ गई सावधानी पूछने की ३ ही बार में तो चलो बता देते हैं: ध्यान रखो कि बॉस आस पास न हो वरना इस मुद्रा में वो समझेगा कि तुम काम से बोर हो गये हो. फिर अन्जाम तो तुम जानते ही हो.


और भी अनेक व्यायाम है मगर अभी के लिए इतना करते रहो. ज्यादा समय तक कम्प्यूटर पर बैठ पाओगे और इसके लिए तैयार नहीं हो तो ब्लॉग डिलिट करो और चाय की दुकान पर जा कर पहले की तरह गपियाओ और पान खाकर चले आना. मुद्दे बहस के वहाँ भी खूब हैं, बोर नहीं होगे.

पान की दुकान पर सावधानी: यहाँ ब्लॉग पर फालतू बहस करने में लिख कर गाली पड़ती है और वहाँ चाय की दुकान पर फालतू बहस करने पर सीधे गरियाये जाओगे और लतियाये जाने का भी खतरा है. Indli - Hindi News, Blogs, Links

सोमवार, मई 25, 2009

मैं अनाथ हुआ!!


आज कुछ भी भूमिका बाँधने की न तो इच्छा है और न ही जरुरत!!


सीधे पढ़िये मनोभाव, बड़े अजीब से हैं:

जाने क्या सोचता रहता हूँ?

माँ
नही रही...

और

पिता जी..

उन्होंने कत्ल कर दिया..

अपने जीने की

चाहत का...

बतौर सजा,

कर लिया

कैद

खुद को

खुद के भीतर...

एक अँधेरी काल कोठरी में..

और


पाल ली एक नफरत

जिन्दगी से...


बना ली

एक दूरी

हर शख्स से...

किन्तु

मैं..?

मैं तो

जिन्दा हूँ अभी....

और

वो

होते हुए..

नहीं रहे!!

-मैं अनाथ हुआ!!

-समीर लाल ’समीर’ Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, मई 20, 2009

लुटी जवानी तेरे दर पर!!

टिप्पणी के माध्यम से संदेश प्राप्त हुआ:

आदरणीय तश्तरी जी,

मान्यवर, अत्यन्त दुखद समाचार है.

सारी रात इसी सोच में गुजर गई कि किस तरह यह खबर आपको दूँ? कुछ समझ नहीं आता. मैं आपका अपराधी हूँ और आज नहीं तो कल, आपको पता लग ही जाना है तो क्यूँ न मैं ही सीधे आपको बता दूँ. फिर आप जो सजा तय करेंगे, वो मैं भुगतने को तैयार हूँ. यूँ तो जितना टूट कर आपने उसे प्यार दिया है, बचपन से आजतक कि मैं केवल नाममात्र का स्वामित्व लिए था बाकी तो सब आपकी हौसला अफजाई और स्नेह का ही नतीजा था.

दरअसल, परसों दफ्तर से दिन भर का थका हारा, भीषण गर्मी झेलता जब देर शाम घर पहुँचा तो कुछ भी लिखने पढ़ने का मन नहीं था. भरपूर स्नान के बाद कुछ तरावट आई और एक प्याली चाय ने हिम्मत बँधाई तो सोचा, कुछ लिखा जाये. आप इन्तजार कर रहे होंगे.

गरमी इतनी भीषण पड़ रही है कि थोड़ा सा काम करो और शरीर जबाब देने लगता है किन्तु फिर आपका ख्याल आया तो किसी तरह लिखता चला गया और रात एक बज गई. आपके स्नेह और प्रेम वर्षा के सामने मेरी थकन की कीमत दो कौड़ी की नहीं है.

किसी तरह पोस्ट शेड्यूल करके बस बिस्तर पर लुढ़क गया. फिर ख्याल आया कि कल सुबह कुछ साज सजावट भी कर दूँगा ताकि आप जैसे स्नेही स्वजनों को अच्छा लगे और आप अपने स्नेह आशीषों के पनपते परिणामों को देख खुश हों. यह मेरा दायित्व एवं कर्तव्य भी है आपके प्रति.

सुबह सुबह ६ बजे उठकर जल्दीबाजी में कुछ फॉण्ट, कुछ ले आऊट आदि में फेर बदल की और बस, उसी समय, शायद नींद पूरी न होने की वजह से, एक ऐसी घटना हुई कि मेरा तो मानो जीवन ही बदल गया.

सब कुछ लुट गया. मैं कंगाल हो गया. आपके स्नेहाशीष में बढ़ रहा वृक्ष बस फल देने ही वाला था कि मानो मुझ माली ने अपने ही हाथों उसे काट दिया. जाने कैसे कौन सा बटन दब गया और जल्दबाजी में मैने क्या कनफर्मेशन दबा दिया कि आपका पसंदीदा ब्लॉग अब नहीं रहा. पूरा कुछ डिलीट हो गया, भाई साहब. मैं हत्यारा हूँ, मैं तो आपको मूँह दिखाने के काबिल भी नहीं रहा.

राम नाम सत्य!!

अपराध तो अपराध ही है किन्तु शायद यदि मैंने बैक-अप रखा होता तो कुछ हद तक क्षम्य होता. अब तो कोई चारा भी नहीं.

मैं अपना गुनाह बिना किसी साफ सफाई के कबूल करता हूँ और आपसे निवेदन करता हूँ कि आप जो भी सजा देना चाहें, दें. मैं उसे सहर्ष कबूल करुँगा.

आज मेरे हाथों इस साहित्य जगत में वो क्षति हुई है, जिसका पूरा किया जाना अब संभव नहीं. आप तो तकनीक के ज्ञाता भी हैं. यदि आप उचित समझें तो अपने प्रभाव से गुगल को लिख कर बात कर सकते हैं कि क्या ऐसी स्थितियों में कुछ किया जा सकता है.

अतयन्त दुखी मन से,

आपका अपराधी
मैं अभागा

संजय




अब जबसे यह टिप्पणी आई है, चमकने की बारी हमारी है.

अव्वल तो यह बालक है कौन?

दूसरा, आदरणीय तश्तरी जी- अभिवादन कर रहा है कि हमारी तस्वीर देखकर मजाक उड़ा रहा है?

भाई मेरे, हमारे ब्लॉग का नाम उड़न तश्तरी है और हमारा समीर लाल. कहीं क्न्फ्यूजन तो नहीं कि हमारा सरनेम तश्तरी और नाम उड़न है. और समीर लाल इनके चपरासीनुमा पॉयलट. ये अनुमान भी तस्वीर देख लगा लिया हो, तो कोई अतिश्योक्ति न होगी.

कहीं वो यह गलतफहमी तो नहीं पाल बैठा कि हम मात्र और एक मात्र ब्लॉग उसी का पढ़ते हैं. वैसे पाल भी ली हो तो आश्चर्य नहीं. जो हमारे नाम को लेकर गलतफहमी पाल सकता है, उसे हमारी टिप्पणी से इस तरह की गलतफहमी और फिर यह भी, साहित्यजगत में तुम्हारा योगदान अतुलनीय है, हो जाना बहुत सहज और स्वभाविक सी बात है.

माना भाई, मगर जरा ब्लॉग का नाम भी तो बता देते तो पता तो रहता कि किसकी याद में आँसूं बहाऊँ और किसे अश्रुपूरित श्रृद्धांजलि अर्पित करुँ.

इनके नाम पर क्लिक करो तो कहीं जाता ही नहीं. हो सकता है कि इतना दुखी हों कि हिल डुल भी न पा रहे हों और ब्लॉग तो डिलिट हो गया है तो उसके माध्यम से तो टिप्पणी कर न पाये होंगे. कम से कम मृत आत्मा का नाम तो बताना ही था.

दिमाग पर जोर डाल रहा हूँ कि कौन सा ऐसा ब्लॉग था जिसे मैने उसके जन्म से ही अपना स्नेह दिया और देता चला गया. वो बढ़ कर वृक्ष हो गया और वो फल भी देने वाला था. वो साहित्य में योगदान कर रहा था. वो लिखता बहुत सटीक था. मैं उसकी हौसला अफजाई किया करता था. उसे बेहतरीन कहता था. उसकी अगली पोस्ट का इन्तजार करता था. सर फटा जा रहा है बोरा भर नामों में से एक नाम छांटने में. संजय गुगल करो तो हजार ब्लॉग निकल आते हैं, उसमें से बीसों डिलिटेड होंगे तो वो राह लेना ही बेकार है.

अपने ब्लॉग की ग्यारह हजार टिप्पणियों में से सब संजय क्लिक करता घूम भी लूँ और एक दो डिलिटेड पर चले भी जायें, तो ढ़ाढ़स बँधाने कहाँ जाऊँगा जब तक ईमेल एड्रेस न हो और डिलिटेड ब्लॉग की प्रोफाईल तो दिखेगी भी नहीं कि ईमेल मिल जाये और मैं उनके दर्द में सहभागी बन पाऊँ.

और जहाँ तक रही उनके मूँह न दिखा पाने की बात तो जब हमें कुछ याद ही नहीं तो दिखाओ या न दिखाओ, क्या फरक पड़ेगा. सभी सूरमाओं को मैं जानता हूँ ऐसा भी नहीं.

डर लगता है कि इतना संवेदनशील और भावुक व्यक्ति, जो अपनी थकन भूल, सिर्फ इसलिये इतनी गर्मी में लिखने बैठ गया और लिखता चला गया जब तक निढाल होकर बिस्तर में न गिर पड़ा कि मैं उसके लिखे का इन्तजार कर रहा हूँगा, वो इतनी हृदय विदारक घटना पर, मेरे किसी भी जबाब को न पाकर कुछ ऐसा वैसा न कर बैठे. यूँ भी वो अपने आपको हत्यारा अपराधी माने बैठा है, कहीं बतौर-ए-सजा वो खुद को.................न..हीं........!! ऐसा नहीं होना चाहिये.

कोई तो राह सुझाओ, मित्रों कि करुँ क्या?

इस बीच मेरे परमप्रिय संजय जी, आपने कोई अपराध नहीं किया है. यह मानवजन्य भूलवश हुई क्रिया है जो किसी के साथ भी हो सकती है. अपराधबोध मन से निकाल दें. उपर पढ़कर आप समझ ही गये होंगे, आपका दिल भी टुकड़े टुकड़े हो गया होगा कि मैं आपको पहचान तक नहीं पा रहा हूँ, जबकि आज तक आपको यह मुगालता पलवाता रहा, अपरोक्ष रुप से ही सही, कि आप हैं तो ब्लॉगजगत है और जो कुछ है बस आप ही हैं.

तो मैं क्षमाप्रार्थी हूँ. आपकी तरह ही भूलवश मैने आपको इस मुगालते की सबसे उपर वाली मंजिल पर ला खड़ा किया. आगे से टिप्पणी करते वक्त ध्यान रखूँगा कि कोई और आपकी तरह ही परेशान हो अपराधबोध न पाल बैठे.

वैसे सत्य तो यह है कि आज की दुनिया में शिष्टाचार और किसी के स्नेहवर्षा को इतनी संवेदनशीलता और भावुकता से लेने वालों को बेवकूफ ही कहा जाता है और अंततः ऐसे लोग अपनी सजा खुद ही मुकर्रर करते हैं. सामने वाला तो क्या सजा देगा. सामने वाले पर चलोगे तो फिर तो इस देश में अफज़ल की फाँसी भी माफ है-इसका यह अर्थ तो कतई नहीं कि हत्या अपराध नहीं है.

तश्तरी और तश्तराईनलंदन में

चलते चलते:


फोटू तो आप देख ही रहे हैं. २० दिन पहले की है. उम्र भी मुझे कम से कम अपनी तो सही ही मालूम है. अभी कोई खास तो है नहीं और बाल भी फैशनवश ही सफेदी झलका रहे हैं वरना तो कब का रंग लेते.

मगर इसी तरह के स्नेहियों ने नाम के साथ आदरणीय, परम श्रद्धेय, माननीय, अंकल जी, महोदय, पित्रतुल्य, पूज्यनीय आदि न जाने क्या क्या लगा लगा कर ऐसा बुढ़ापे का एहसास कराया है कि कई बार तो अपना डेट ऑफ बर्थ प्रमाणपत्र और केलकुलेटर लिए पूरा दिन गुजार देता हूँ, फिर भी हल नहीं ढ़ूंढ़ पाता.बस, कान बजते रहते हैं:

दिल में इक तूफां और आँखों में ये नमीं सी क्यूँ है......

कहीं यह मुझ युवा के खिलाफ कोई षणयंत्र तो नहीं?

ब्लॉगजगत में आकर मात्र यही एक घाटा लगा है कि हम अपना युवत्व असमय खोते नजर आ रहे हैं. Indli - Hindi News, Blogs, Links