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शनिवार, अक्टूबर 29, 2016

दीपावली पर सफाई



उस रोज जब अपनी संक्षिप्त भारत यात्रा के दौरान उनके घर मिलने पहुँचा तो देखा पूरा परिवार पूरे जोर शोर के साथ साफ सफाई में जुटा है. पता चला कि दीपवली की सफाई चल रही है.
दीपावली पर धार्मिक मान्यता है कि पूरे घर की साफ सफाई और पुताई करना चाहिये..इससे लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है.
अब अगर साल भर गंदा नहीं करोगे तो फिर भला साफ क्या करोगे? इसी धार्मिक बाध्यता के चलते साल भर पलंग के नीचे सामानों की भराई और अलमारी के उपर सामानों की चढ़ाई नित जारी रहती है.
ठीक दीपावली के पहले, कमरों में साल भर पलंग के नीचे खिसकाया और अलमारी के उपर चढ़ाया गया सामान पलंग के उपर पर निकाल कर रखा जाता है..फिर उसमें से बेकार का सामान और कचरा, छाँटा बीना और बाँटा जाता है और बाकी का साफ सूफ करके पुनः रख दिया जाता है.
मकड़ियाँ और छिपकलियाँ भी जानती है कि ये सब दीपावली का तमाशा है जो लगभग हफ्ते भर तक चलता रहेगा अतः एक हफ्ते के लिए वो भी किसी सीढ़ी के नीचे या छज्जे के उपर अनजान कोने में जाकर छिप जाती है और दीपावली गुजरते ही पुनः अपने पूर्ववत स्थायी पते पर लौट आती हैं -अगले एक बरस तक के लिए बिना किसी खटके के शांतिपूर्ण जीवन जीने के लिए. उन्हें देखकर लगता है जैसे कि पुलिस टीम ने किसी सरकारी मुहिम के तहत सड़क के किनारे रेहड़ी लगाने वाले अवैध कब्जाधारियों को खदेड़ा हो, जिन्होंने पुलिस की दबिश खत्म होते ही वापस आकर पुनः पूर्ववत कब्जा जमा लिया हो.
मुझे अच्छा लगता है दीपावली के पहले इस तरह सालाना साफ सफाई का अभियान देखना हर घर द्वार पर.
सोचता हूँ कि यह पिछले साल के कचरे की सफाई की है या अगले साल का कचरा इक्कठा करने की जगह बनाई है.
फिर दीपावली की दिन से ही शुरु हो जाता है एक नया साल गंदगी फैलाने का.. बम, पटाखों, लड़ियों को रात भर सड़कों पर फोड़ फोड़ कर उनकी गन्दगी फेला कर मानो नये सिरे से गंदगी फैलाने का आगाज किया हो ...
जिज्ञासु मन मित्र से पूछ बैठा कि इतने सारे सामान की सफाई कैसे करते हो?
मित्र ने यह कहते हुए ज्ञान दिया कि अगर सफाई करनी है तो बस दो ही तरीके हैं..एक तो सारे के सारे सामान को कचरा मान कर एक जगह इक्कठा कर लो ..और फिर उसमें से जो अच्छा अच्छा काम योग्य हो, उसे निकाल कर साफ सूफ करके वापस जमा कर रख दो..बाकी का बचा सामान मसलन कटे फटे या छोटे हो चुके कपड़े, जूते, टूटे बरतन, सूटकेस आदि ...जो बांट दिये जाने योग्य है नौकर चाकर को देकर दानवीर की तरह मुस्कराओ और बाकी का बचा कचरे में बाहर निकाल फेंको.
दूसरा...सब सामान जैसे रखा हुआ है वैसा ही रखा रहने दो और उसमें से कचरा छांट छांट कर अलग कर दो..यह तरीका थोड़ा ज्यादा मेहनत माँगता है...मगर सामान को फिर से जमाने की झंझट भी तो कम हो जाती है.
उनकी बात सुनकर मुझे एकाएक अभी हाल में जाना सफाई का तीसरा तरीका याद हो आया,,,
इसका हालांकि दीपावली से कुछ लेना देना नहीं है,...इसमें तो बस जब भी किसी सांसद महोदय या मंत्री जी से समय मिल जाये - सफाई की घोषणा कर दो...कचरा मंगवाओ...कचरा फैलवाओ...कचरा झाडू से किनारे करते हुए सांसद महोदय या मंत्री जी के साथ..फोटो खिंचवाओ...अखबारों में छपवाओ और सोशल मीडिया पर चढ़ाकर मस्त हो जाओ..हैश टैग #CleanIndia.#स्वच्छभारत……..बस्स!
वैसे सही मायने में ऐसा संपर्क और अपनी राजनैतिक पैठ बनाने का ऐसा मौका हाथ लगना भी कोई दीपावली से कम तो नहीं..ऐसा मौका सबको नहीं मिलता है...इसके लिए भी लक्ष्मी गणेश की विशेष कृपा चाहिये...

-समीर लाल समीर’ 
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सोमवार, सितंबर 01, 2014

डॉ कुमार विश्वास: हिन्दी कविता के मंच का कोहिनूर

पिछले महिने जुलाई २०१४ में जिस दिन डॉ कुमार विश्वास अमेरीका पहुँचे, उसी सुबह उनसे फोन पर बात हुई. पता चला कि अमेरीका और कनाडा के १४ अलग अलग शहरों में हो रहे कार्यक्रमों में टोरंटो में कार्यक्रम भी शामिल है. पिछले साल भी २०१३ में डॉक्टर कुमार विश्वास कनाडा आये थे और एक शानदार शाम तालियों की गड़गाड़हट के बीच हास्य व्यंग्य की फुहार के साथ बीती थी. उसी शाम कनाडा के इमीग्रेशन मिनिस्टर जेसन कैनी भी कार्यक्रम में आये थे और हिन्दी के चेहतों की भीड़ जो डॉ विश्वास को सुनने के लिए उमड़ी थी को देख और डॉ कुमार विश्वास की खास मांग पर उन्होंने कार्यक्रम में ही ऑटारियो के स्कूलों में हिन्दी को एक वैक्लपिक विषय में शामिल करने की घोषणा कर दी थी. वो खुद भी तब से डॉक्टर कुमार विश्वास के फैन हो गये थे. आश्चर्य लगा कि ऐसे कवि का २० दिन बाद कार्यक्रम है और कहीं कोई चर्चा नहीं और न ही विज्ञापन आदि.

यह पहली बार देखने में आ रहा था कि मुझे पता करना पड़े कि डॉक्टर कुमार विश्वास का कार्यक्रम कहाँ होना है अन्यथा तो हिन्दी का कोई भी कवि भारत से आये तो कम से ३ महिने पहले से १०-१२ बार ईमेल तो आ ही जाती हैं कि आपको आना है और इतने प्रयासों और विज्ञापनों के बाद भी अच्छा कार्यक्रम कविता का उसे मान लिया जाता है जिसमें २५० से ३०० लोग आ जायें. लगभग ५० आमंत्रित और २०० लोग २० ऑलर की टिकिट खरीद कर.

खैर, पता करके आयोजकों को फोन किया तो पता चला कि कार्यक्रम ब्राम्पटन नामक क्षेत्र में रखा गया है और पूरा बिक (सोल्ड आऊट) है इसलिए विज्ञापन आदि नहीं कर रहे हैं. मैने जानना चाहा कि आखिर कितने की टिकिट थी जो इतनी तेजी से सारी बिक गई. पता चला कि हॉल की क्षमता सीमित है और सिर्फ ६०० टिकिट बेचना था १०० डॉलर प्रति टिकिट के हिसाब से. डॉ कुमार विश्वास का नाम सुनते ही बिना विज्ञापन कें एक मूँह की बात से दूसरे मूँह की बात जुड़ते ही ६०० टिकिट बिक गये और अब तो सबको मना करना पड़ रहा है.

मैं आश्चर्य में था कि एक हिन्दी का कवि अकेले कविता पढ़ेगा और यहॉ आ बसे हिन्दी समझने वाले लोग जो बॉलीवुड के धुनों पर शाहरुख या मीका, हनी सिंह, बब्बू मान आदि के नाच गाने पर झूमने का आदी है वो हिन्दी कविता सुनने के लिए १०० डॉलर का टिकिट देकर आ रहे हैं.

कानों को विश्वास तो न हुआ क्यूंकि अभी पिछले हफ्ते ही यानी जैसे वादक के अन्तर्राष्ट्रीय कनसर्ट को ६० डॉलर की टिकिट देकर सुनकर आया था. मैने मित्रो को बताया तो वो सब भी जिद करने लगे कि हमें भी चलना है डॉ विश्वास को सुनने और १०० डॉलर की टिकिट जरुर ले लेंगे. मैने आयोजकों से निवेदन किया कि भई हमारे कुछ परिवार और मित्र भी उनके दीवाने हैं और फिर डॉ कुमार विश्वास का रोज तो आना होता नहीं है अतः कैसे भी प्रबंध कर सीटें बढ़वाईये. यह भी तय था कि कार्यक्रम के एक दिन पूर्व जब टीवी और रेडियो वाले डॉक्टर कुमार विश्वास का इन्टरव्यू लेंगे तब एकाएक न जाने कितने लोगों को और मालूम चल जायेगा और किस किस को मना कर दिल तोड़ते जायेंगे बहुत निवेदन के बाद वो लोग माने और १०० कुर्सियाँ अलग से बढ़वाई गईं. हाल में चलने फिरने की जगह भी बच न रही.

हालांकि आयोजक उनका होटल बुक करा कर उन्हें एयरपोर्ट पर स्वागत हेतु हाजिर थे मगर पहले एक दिन डॉक्टर कुमार विश्वास हमारे परिवारिक संबंधों के चलते हमारे घर पर ही ठहरे. होटल का रुम उनके आगमन का इन्तजार में रुका रहा. अगले दिन रात को वह अपने होटल में शिफ्ट हो गये क्यूँकि उसके अगले दिन उनका कार्यक्रम होना था.

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कार्यक्रम ठीक ८.३० बजे शाम शुरु हुआ. डॉक्टर कुमार विश्वास तालियों की गड़गाहट के बीच सिक्यूरीटी के घेरे में मंच पर पहुँचे वरना तो उनके चहेतों के बीच से गुजर मंच तक पहुँच पाना ही मुमकिन न हो पाता २ घंटे तक और फिर अपनी बातों और कविताओं का ऐसा जादू छेड़ा कि न सिर्फ भारत के विभिन्न प्रांतों से यहाँ आ बसे श्रोता बल्कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान, श्रीलंका, बंगलादेश, नेपाल आदि देशों से कनाडा में आ बसे हिन्दी समझने वाले बॉलीवुड के नाच गानों पर थिरकने वाले लोग डॉक्टर कुमार विश्वास को मगन होकर सुनते रहे. श्रोताओं की भीड़ प्रांजल हिन्दी के शुद्ध गीत:

हो काल-गति से परे चिरंतन , अभी वहाँ थे अभी यहीं हो.. ,

कभी धरा पर, कभी गगन में, कभी कहीं थे, कभी कहीं हो.. ,

तुम्हारी राधा को भान है तुम सकल चराचर में हो उपस्थित,

बस एक मेरा है भाग्य मोहन !कि जिस में हो कर भी तुम नहीं हो..

जैसी रचना मंत्रमुग्ध होकर न सिर्फ सुनती रही बल्कि

मांग की सिन्दुर रेखा...बाँ

सुरी चली आओ…. जैसे गीतों की मांग कर उन्हें जी भर कर तालियों के माध्यम से सराहती रही. एक के बाद एक नायाब मुक्तक, गीत, गज़ल और वाकिये सुनाते तालियों और हँसी ठहाकों के बीच जब डॉक्टर साहब ने अपने चिर परिचित अंदाज में डॉ बशीर बद्र साहब का यह शेर कहा:

मुसाफिर है हम भी, मुसाफिर हो तुम भी,
किसी मोड़ पर फिर मुलाकात होगी।

तब घड़ी पर नजर गई. अरे, १०:३० बज गये. २:३० घंटे तक अकेले ऐसी समा बाँधे रहे कि पता ही नहीं चला और कार्यक्रम खत्म भी हो गया.

डॉक्टर कुमार विश्वास होटल लौट गये और हम वहाँ आयोजकों को बधाई देते चर्चारत हो लिए. हालांकि हॉल, साऊन्ड, डॆकोरेशन आदि यहाँ काफी मँहगे होते हैं मगर फिर भी लग रहा था कि आयोजकों ने अच्छा कमाया होगा. जिज्ञासु हिन्दुस्तानी स्वभाव कैसे चुपचाप चले आते. आयोजकों की कमाई का मोटा मोटा अंदाजा तो लगाना ही था अतः बात बढ़ाते हुए अपनी तरफ से ही पूछ लिए कि सुना है डॉ साहब तो काफी पैसा लेते हैं २,००० डॉलर से कम तो क्या लिए होंगे. आयोजकों की हँसी से लगा कि मैने कोई बहुत बड़ी बेवकूफी के बात कर दी. कहने लगे २,००० की जगह ३,००० में भी बुलवा दिजिये तो आपको उन्हें बुलवाने भर के ३,००० हम अपनी तरफ से दे देंगे. तब भी अभी जितना दे रहे हैं उसमें आप से ज्यादा हम बचा लेंगे. तब पता लगा कि ये हिन्दी का कवि अब १०,००० डॉलर में दो घंटे लिए मंच पर आकर कविता पढ़ता है. साथ में पाँच सितारा होटल में रुकना और बिजनेस क्लास का टिकिट. आजतक सुनते आये थे कि बहुत बड़े कविता के हस्ताक्षर भी यहाँ ५०० से १००० डॉलर की रेन्ज में आ जाते हैं तब इनके विषय में ये जानकर एक तरफ तो विस्मय की स्थिति और दूसरी तरफ अपार खुशी कि कुछ तो अलग है इनमें जो आज इन ऊँचाईयों पर आ कर खड़े हैं.

हिन्दी कविता के इतिहास में कब किसने सोचा होगा कि यह विधा भी कभी इस तरह धन वर्षा करवा सकती है इसके साधक पर. तय है कि यह अकेली हिन्दी कविता तो हो नहीं सकती. इसके साथ न जाने और क्या क्या जैसे ब्रेन्डींग, मार्केटिंग, बोलने और पढ़ने की विशिष्ट शैली, अथक परिश्रम और उन सबके आगे माँ शारदा का वरद हस्त- तब जाकर एक डॉक्टर कुमार विश्वास बनता है.

वाह!! डॉक्टर कुमार विश्वास!! हिन्दी कविता के मंच को ऐसा आयाम देने के लिए और इस मुकाम पर पहुँचाने के लिए साधुवाद, अनेक बधाई एवं हार्दिक शुभकामनायें.

अगले साल फिर इन्तजार रहेगा आपका इस टोरंटो शहर को.

-समीर लाल ’समीर’

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सोमवार, जून 25, 2012

यादों में परसाई जी: ‘व्यंग्य यात्रा’

‘व्यंग्य यात्रा’ का हरिशंकर परसाई की साहित्यिक यात्रा पर केंद्रित अंक का पहला खंड प्रकाशित होकर अपने पाठकों तक पहुंच गया है। 192 पृष्ठ के इस अंक में मेरा भी संस्मरण है, आप भी पढ़ें:

vyangyayatra

तब शायद छठवीं कक्षा में रहा हूँगा. स्वतंत्रता दिवस के उत्सव के दौरान स्कूल की तरफ से लेखन प्रतियोगिता रखी गई थी जिसमें अपने स्कूल, शिक्षक के बारे में आलेख, कहानी, कविता कुछ भी लिखकर जमा की जानी थी. १५ अगस्त से एक सप्ताह पहले ही प्रतियोगिता हो गई और कापियाँ जमा करा ली गई.

एक घंटे का समय दिया गया था. मुझे कुछ न सूझा तो एक कहानी लिखी अपने शिक्षक के बारे में, जो पढ़ाते कम थे मगर प्राचार्य महोदय की खुशामद में दिन बिता देते थे. कभी उनके लिए सब्जी खरीदने जाते, कभी उनके लिए पान चाय का इन्तजाम करते. खुद भी पूरे समय पान खाते रहते थे. प्राचार्य जी की उन पर विशेष कृपा रहती थी. मैने उन्हें सच्चा आदर्श शिक्षक बताया कि इस तरह से शिक्षण कार्य करके आप अपना स्थान स्कूल में विशिष्ट बना सकते हैं अन्यथा सिर्फ पढ़ाते हुए जीवन में क्या रस है. अंत मैने किया था कि यदि मैं शिक्षक बना तो इनके समान बनूँगा और पान खाऊँगा. और भी जितना कुछ उनकी रंगीन कमीज, ट्यूसन क्लास, स्कूटर और स्टाईल के बारे में एक घंटे में लिख पाया, लिख डाला. बस, नाम नहीं लिया उनका मगर पढ़कर कोई भी समझ सकता था कि किसके बारे में लिखा है.

प्रतियोगिता में जीतने की कोई उम्मीद तो थी नहीं बल्कि यह अंदेशा जरुर था कि अगर उन मास्साब ने पढ़ लिया तो पिटाई जरुर होगी. मन ही मन बहाने सोचता रहता कि क्या बोल कर बचना है कि आपके बारे में नहीं लिखा था. क्लास ६ से लेकर ८ तक के विद्यार्थी एक ग्रुप में रखे गये थे. १०० से ज्यादा प्रतियोगियों के बीच मेरा तो खैर क्या होना था, बस अपनी प्रतिभागिता दर्ज करानी थी सो करवा दिया.

१५ अगस्त को आयोजन के दौरान विजेता घोषित होने थे और उन्हें पुरुस्कार देने हरि शंकर परसाई जी आ रहे थे. परसाई जी शहर के जाने पहचाने लोगों में अपना नाम रखते थे. अक्सर पिताजी और उनके दोस्तों से उनका नाम सुना था और उन्हें परसाई जी को अखबार में पढ़कर हँसते देखा था. एक उत्सुक्ता तो थी ही उन्हें देखने की. बस, प्रथम पंक्ति में बैठ गया. परसाई जी कुरता पायजाम पहने आये और मंच पर प्राचार्य महोदय के साथ बैठे.

झंडा वादन, जन गन मन, मिष्ठान वितरण हुआ और फिर फुल माला, सरस्वति वंदन के साथ कार्यक्रम शुरु हुआ. प्राचार्य महोदय का भाषण हुआ. कुछ सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए और फिर परसाई जी अपना अभिभाषण देने आये.

अपने भाषण के दौरान ही जहाँ उन्होंने अच्छी शिक्षा दीक्षा पर जोर दिया, वहीं एक जागरुक नागरीक बन अपने आस पास हो रहे गलत कार्यों पर ऊँगली उठाने की बात की और इस हेतु कलम और कलमकारों की सजग भूमिका पर प्रकाश डालते हुए उद्धरण देते हुए मेरा नाम ले डाला और मुझे मंच पर आने को कहा.

मैं तो समझ ही नहीं पाया कि ऐसा मैने क्या कर दिया. मुझे प्रतियोगिता में अपने लिखे पर प्रथम पुरुस्कार देते हुए उन्होंने मेरे लिखे को व्यंग्य बताया और कहा कि ऐसा लिखने के लिए साहस की जरुरत होती है और यह हर जागरुक नागरिक का कर्तव्य है.

फिर कार्यक्रम के बाद उन्होंने मुझे खूब पढ़ने, पाठय पुस्तक के इतर भी अन्य पुस्तकों को पढ़ने और लिखने आदि की समझाईश देकर आशीर्वाद दिया.

उम्र के उस पठाव में कुछ खास तो समझ नहीं आया किन्तु यह जरुर अहसास हुआ कि इतने बड़े आदमी और नामी लेखक ने मुझको सराहा है. मैं खुशी से फूला न समाता था. पिता जी और परिवार को जब बताया तो उन्हें जैसे विश्वास ही न हुआ. सब बहुत खुश हुए.

फिर सालों निकल गये. पढ़ाई के इतर छोटा मोटा लेखन भी न हुआ और पढ़ना भी नहीं. बीच बीच में कभी कभी शहर के कार्यक्रमों में पिता जी के साथ जाता रहा और परसाई जी होते तो उन्हें देखता रहा.

फिर सी ए बन कर जबलपुर में ही प्रेक्टीस शुरु की तो दफ्तर नेपियर टाऊन में परसाई जी के घर के पास ही था. एक शाम जाने क्या सोच कर उनके घर मिलने पहुँच गया. परसाई जी की तबीयत ठीक न थी और वो लेटे हुए थे.

धीरे से अपनी चिर गंभीर मुद्रा में उन्होंने मुझे देखा और पूछा, “कहिये?”

मैने उन्हें अपना सी ए वाला कार्ड पकडाया और चरण स्पर्श किये. वो ध्यान से कार्ड देखने के बाद धीरे से मुस्कराये और कहने लगे कि आप जैसे लोगों से तो हमारा क्या वास्ता? पैसा हो तो हिसाब बनवायें. कोई और दर खटखटाईये जनाब. इसी मोहल्ले में आपकी सेवा लेने लायक बहुत से हैं और यह कह कर वो जोर से हँसने लगे.

मैं झेंप गया और कहा कि सर, आपके दर्शन हेतु आया था बस. आपने मुझे पहचाना नहीं.

कहने लगे कि आज की दुनिया में बिना प्रसाद की उम्मीद में तो कोई दर्शन करने मंदिर भी नहीं जाता और आप यहाँ? वे पुनः हँसे.

मैने उन्हें याद दिलाया कि कैसे स्कूल की प्रतियोगिता में उन्होंने मुझे पुरुस्कार दिया था तो वह तुरंत बोले – अरे, तो तुम पान खाते हुए आते और कहते कि स्कूल में मास्साब हो गया हूँ, प्राचार्य महोदय की कृपा बनी हुई है- तब तो पहचान पाता. फिर एक बार वही हँसी.

मैं तो उनकी याददाश्त का कायल हो गया. इतना पढ़ने लिखने वाला इन्सान, इतने वर्षों बाद मेरे उस छिट्पुट लेखन का मसौदा याद रखे हुए है. नतमस्तक हो गया मैं.

फिर उन्होंने मुझसे पूछा कि इधर कुछ लिखते हो?

मेरे न कहने पर और नई प्रेक्टिस की व्यस्तता के बहाने का सहारा लेने पर बहुत देर ध्यान से मुझे देखते रहे और कहा कि जीवन जीने के लिए वह भी जरुरी है किन्तु जीवन का असली आनन्द लेने के लिए और एक जागरुक नागरिक होने के कर्तव्य निभाने के लिए लिखना भी जरुरी है. लिखा करो समय निकाल कर.

मैने भी सहमति में सर हिला दिया. वो मुस्कराये-शायद समझ गये होंगे कि मैं झूठ सहमति दर्ज कर रहा हूँ.

फिर तो अक्सर ही उनके यहाँ जाना होता. बार बार वो लिखने पर जोर देते और मैं सहमति में सिर हिला कर आ जाता. वो कहते कि तुममें प्रतिभा है. तुम अच्छा लिख सकते हो मगर कोशिश तुमको ही करना पड़ेगी. उसमें तो मैं कुछ नहीं कर सकता.

उनकी बीमारी के दौरान काफी काफी देर उनके पास बैठा रहता. एक सुकून सा मिलता. उनसे मिलने आने जाने वालों का सिलसिला हमेशा ही होता. मैं उनके किस्से सुनता रहता और उनकी जिन्दा दिली पर नत मस्तक रहता.

मैं एक बार हमारे एक परिचित के घर बैठा था. परसाई जी का भी उनके घर आना जाना था. परसाई जी उसी बीच भेड़ाघाट से लौट कर उनके घर आये. जब तक चाय पानी का इन्तजाम होता, परसाई जी ने उनसे एक कागज पैन माँगा और लिखने बैठे गये. कुछ ही देर में उनका आलेख तैयार था जिसे उन्होंने मेरे परिचित के बेटे को देकर अखबार के दफ्तर में छपने भेज दिया. इतना फटाफट लिख देना वो भी इतना पैना-शायद उन जैसे महाज्ञानियों के ही बस की बात है. लिखते भी तो मुद्रा वैसी ही धीर गंभीर होती- लगता ही नहीं इनके लेखन में कितना हास्य का पुट लिए करारा कटाक्ष होगा.

समय उड़ता रहा और जिस दिन परसाई जी इस दुनिया से विदा हुए, मैं शहर में नहीं था. पूरा शहर स्तब्ध था. साहित्यजगत को एक भारी धक्का लगा था. लगभग एक हफ्ते बाद लौटा, तो खबर सुनकर जैसे विश्वास ही नहीं हुआ. आज भी जब उनको पढ़ता हूँ तो अहसासता हूँ कि जैसे परसाई जी बाजू में बैठे अपने किस्से सुना रहे हैं.

अब मेरा नियमित लेखन हो रहा है. परसाई जी को न जाने कितनी कितनी बार पढ़ चुका और बार बार पढ़ता हूँ और हर बार यही ख्याल आता है कि काश!! उनके रहते कलम उठा ली होती तो उनके मार्गदर्शन में आज लेखनी की धार ही दूसरी होती. मगर कब किसी को किस्मत से ज्यादा मिलता है.

लेकिन आज भी जब कलम उठाता हूँ तो परसाई जी नजर आ जाते हैं ख्यालों में यह कहते: जीवन का असली आनन्द लेने के लिए और एक जागरुक नागरिक होने के कर्तव्य निभाने के लिए लिखना भी जरुरी है. लिखा करो समय निकाल कर.

हमारा वो युग आज जैसा डिजिटल युग क्यूँ न हुआ यह भी एक मलाल रहता है हर वक्त वरना न जाने उनके सानिध्य की कितनी तस्वीरें दिल के साथ दीवारों पर भी सजा कर रखता.

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रविवार, जुलाई 24, 2011

चलती सांसो का सिलसिला....

अपनी लम्बी यॉर्क, यू के की यात्रा को दौरान जब अपनी नई उपन्यास पर काम कर रहा था तो अक्सर ही घर के सामने बालकनी में कभी चाय का आनन्द लेने तो कभी देर शाम स्कॉच के कुछ घूँट भरने आ बैठता और साथ ही मैं घर के सामने वाले मकान की बालकनी में रोज बैठा देखता था उस बुजुर्ग को.

उसके चेहरे पर उभर आई झुर्रियाँ उसकी ८० पार की उम्र का अंदाजा बखूबी देती. कुर्सी के बाजू में उसे चलने को सहारा देने पूर्ण सजगता से तैनात तीन पाँव वाली छड़ी मगर उसे इन्तजार रहता दो पाँव से चल कर दूर हो चुके उस सहारे का जिसे उसने अपने बुढ़ापे का सहारा जान बड़े जतन से पाल पोस कर बड़ा किया था. जैसे ही वह इस काबिल हुआ कि उसके दो पैर उसका संपूर्ण भार वहन कर सकें, तब से वो ऐसा निकला कि इस बुजुर्ग के हिस्से में बच रहा बस एक इन्तजार. शायद कभी न खत्म होने वाला इन्तजार.

बालकनी में बैठे उसकी नजर हर वक्त उसके घर की तरफ आती सड़क पर ही होती. साथ उसकी पत्नी, शायद उसी की उम्र की, भी रहती है उसी घर में. वो ही सारा कुछ काम संभालते दिखती. कुछ कुछ घंटों में चाय बना कर ले आती, कभी सैण्डविच तो कभी कुछ और. दोनों आजू बाजू में बैठकर चाय पीते, खाना खाते लेकिन आपस मे बात बहुत थोड़ी सी ही करते. शायद दोनों को ही चुप रहने की आदत हो गई थी या इतने साल के साथ के बाद अकेले में एक दूसरे से कहने सुनने के लिए कुछ बचा ही न हो. कुछ नया तो होता नहीं था. वही सुबह उठना, दिन भर बालकनी में बिताना और ज्यादा से ज्यादा फोन पर ग्रासरी वाले को सामान पहुँचाने के लिए कह देना. पत्नी बीच बीच में उठकर गमलों में पानी डाल देती. उनमें भी जिसमें अब कोई पौधा नहीं बचा था. जाने क्या सोच कर वो उसमें पानी डालती थी. शायद वैसे ही, जैसे जानते हुए भी कि अब बेटा अपनी दुनिया में मगन है, वो कभी नहीं आयेगा- फिर भी निगाह घर की ओर आने वाली सड़क पर उसकी राह तकती.

उनके घर से थोड़ा दूर सड़क पार उसकी पत्नी की कोई सहेली भी रहती थी. नितांत अकेली. कई महिनों में दो या तीन बार इसको उसके यहाँ जाते देखा और शायद एक बार उसे इनके घर आते. जिस रोज वो उसके यहाँ जाती या वो इनके यहाँ आती, उस शाम पति पत्नी आपस में काफी बात करते दिखते. शायद कुछ नया कहने को होता.

अक्सर मेरी नजर अपनी बालकनी से उस बुजुर्ग से टकरा जाती. बस, एक दूसरे को देख हाथ हिला देते. शायद उसने मेरे बारे में अपनी पत्नी को बता दिया था. अब वो भी जब बालकनी में होती तो हाथ हिला देती. हमारे बीच एक नजरों का रिश्ता सा स्थापित हो गया था. बिना शब्दों के कहे सुने एक जान पहचान. मैं अक्सर ही उन दोनों के बारे में सोचा करता. सोचता कि ये बालकनी में बैठे क्या सोचते होंगे?  क्या सोच कर रात सोने जाते होंगे और क्या सोच कर नया दिन शुरु करते होंगे?

मुझे यह सब अपनी समझ के परे लगता. कभी सहम भी जाता, जब ख्याल आता कि यदि इस महिला को इस बुजुर्ग के पहले दुनिया से जाना पड़ा तो इस बुजुर्ग का क्या होगा? मैने तो उसे सिर्फ छड़ी टेककर बाथरुम जाते और रात को अपने बिस्तर तक जाने के सिवाय कुछ भी करते नहीं देखा. यहाँ तक की ग्रासरी लाने का फोन भी वही महिला करती. तरह तरह के ख्याल आते. मैं सहमता, घबराता और फिर कुछ पलों में भूल कर सहज हो जाता हूँ.

मैं भरी दुपहरी अपने बंद अँधेरे कमरे में ए सी को अपनी पूरी क्षमता पर चलाये चार्ल्स डी ब्रोवर की पुस्तक ’फिफ्टी ईयर्स बिलो ज़ीरो’ को पढ़ता आर्कटिक अलास्का की ठंड की ठिठुरन अहसासता भूल ही जाता हूँ कि बाहर सूरज अपनी तपिश के तांडव से न जाने कितने राहगीरों को हालाकान किये हुए है. कितना छोटा आसमान बना लिया है हमने अपना. कितनी क्षणभंगुर हो चली है हमारी संवेदनशीलता भी. बहुत ठहरी तो एक आँसूं के ढुलकने तक.

समय के पंख ऐसे कि कतरना भी अपने बस में नहीं तो उड़ चला. कनाडा वापसी को दो तीन दिन बचे. उस शाम बहाना भी अच्छा था कि अब तो वापस जाना है और कुछ मौसम भी ऐसा कि वहीं बालकनी में बैठे बैठे नियमित से एक ज्यादा ही पैग हो गया स्कॉच का. शराब पीकर यूँ भी आदमी ज्यादा संवेदनशील हो जाता है और उस पर से एक्स्ट्रा पी कर तो अल्ट्रा संवेदनशील. कुछ शराब का असर और कुछ कवि होने की वजह से परमानेन्ट भावुकता का कैरियर मैं एकाएक उन बुजुर्गों की हालत पर अपने दिल को भर बैठा याने दिल भर आया उनके हालातों पर. सोचा, आज जा कर मिल ही लूँ और इसी बहाने बता भी आऊँगा कि दो दिन में वापस कनाडा जा रहा हूँ. एक बार को थोड़ा सा अनजान घर जाते असहजता महसूस हुई किन्तु शराब ने मदद की और मैं अपनी सीढ़ी से उतर कर उनकी सीढ़ी चढ़ते हुए उनकी बालकनी में जा पहुँचा.

वो मुझे देखकर जर्मन में हैलो बोले. जर्मन मुझे आती नहीं, मैने अंग्रेजी में हैलो कहा. हिन्दी में भी कहता तो शायद उनके लिए वही बात होती क्यूँकि अंग्रेजी उस बुजुर्ग को आती नहीं थी. इशारे से वो समझे और इशारे से ही मैं समझा. फिर उनका इशारा पा कर उनके बाजू वाली कुर्सी पर मैं बैठ गया. उनकी गहरी ऑखों में झांका. एकदम सुनसान, वीरान. मैने उनके हाथ पर अपना हाथ रखा. भावों ने भावों से बात की. शायद एक लम्बे अन्तराल के बाद किसी तीसरे व्यक्ति का स्पर्श पा दबे भावों का सब्र का बॉध टूटने की कागर पर आ गया हो. उनकी आँखें नम हो आईं. मैं तो यूँ भी अल्ट्रा संवेदनशील अवस्था में था. अति संवेदनशीलता में शराब आँख से आँसू बनकर टप टप टपकने लगी. बुजुर्ग भी रो दिये और मेरा जब पूरा एक्स्ट्रा पैग टपक गया, तो मैं उठा. उन्हें हाथ पर थपकी दे ढाढस बँधाई और उन्हें नमस्ते कर बिना उनकी तरफ देखे सीढ़ी उतर कर लौट आया.

सुबह उठकर जब उनकी बालकनी पर नजर पड़ी तो वह बुजुर्ग हाथ हिलाते नजर आये. एक बार फिर मेरी आँख नम हुई यह सोचकर कि कल से यह मेरा भी इन्तजार करेंगे हाथ हिलाने को. आँख में आई नमी ने अहसास करा दिया कि कल जो बहा था वो शराब नहीं थी. दिल की किसी कोने से कोई टीस उठी थी उस एकाकीपन और नीरसता को देख, जो आज न जाने उस जैसे कितने बुजुर्गों की साथी है....

Old-Man

सुबह जागते
चलती सांसो का सिलसिला
दिलाता है याद मुझे..
फिर एक दिन
फिर एक शाम
और
फिर एक रात
बाकी है अभी...

-समीर लाल ’समीर’

<<इस बीच यू के यात्रा की व्यस्तता में पोस्ट डालने का क्रम कम होकर भी जारी तो रहा ही किन्तु मुझे याद ही न रहा कि कब मेरी ५०० पोस्ट पूरी भी हो गईं और आज यह पोस्ट ५०५ वीं है>>

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गुरुवार, जुलाई 21, 2011

बड़ी दूर से आये हैं….ब्लॉगर मिलने!!!

उत्साहित तो थे ही लन्दन जाकर मित्रों से मिलने को और साथ ही सुबह ७:५० की बस जानी थी यॉर्क बस अड्डे से. ५ बजे ही उठ गये. सूरज महाराज पहले से ही तैनात थे खिड़की के रास्ते. जाने कब सोते हैं और कब उठते हैं यहाँ गर्मियों में. रात १० बजे तक तो आसमान में टहलते नजर आते हैं और सुबह ४ बजे से फिर आवरगी. पावर के नशे में नींद नहीं आती होगी शायद. विचित्र नशा होता है यह भी.
खैर, दो दिन का सामान, लैपटॉप, एक किताब बाँध कर निकल पड़े घर से ७.१५ बजे बस अड्डे के लिए और ठीक ७.५० पर बस चल पड़ी लन्दन ले जाने को. दीपक मशाल से पहले ही भारत से बात हो गई थी कि वह शाम ६ बजे तक भारत से लन्दन पहुँच जायेंगे. होटल बुक कर लिया था, वहीं हम दोनों का रुकना तय हुआ. दिन इतवार था अतः तय पाया कि शाम होटल में बिताई जायेगी इतने दिनों की ढेरों बात करते और फिर अगले दिन सुबह शिखा वार्ष्णेय जी के घर धावा बोला जायेगा. वहीं डॉ कविता वाचक्नवी जी भी आ जायेंगी. नाश्ता, लंच, शाम का नाश्ता, रात रास्ते के लिए पैक करवा कर एक बार में ही पूरा हिसाब किताब तय कर शाम को अपने अपने घरों के लिए वापसी, मैं यॉर्क, दीपक नार्थ आयरलैण्ड और कविता जी अपने घर लन्दन में ही लौट जायेंगे. इस तरह एक अन्तर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन की योजना बनी जिसमें लन्दन, कनाडा और आयरलैण्ड का ब्लॉगर मिलन होना तय पाया था.
रास्ता आरामदायक, दर्शनीय और ’दिल वाले दुल्हनिया ले जायेंगे’ फिल्म के सरसों के खेत की याद दिलाता मजेदार था. ७.५० को बस चली और बादलों ने सूरज को आ घेरा. बरसे नहीं, बस घेर कर बैठ गये. शायद सूरज से पूर्व में समझौता करके आये थे कि बस, कुछ देर घेर कर बैठे रहेंगे और फिर निकल जायेंगे. बरसे बरसायेंगे नहीं सिर्फ जनता को बरसात का मनोरम सपना दिखायेंगे. मगर दो घंटे बीत गये. बस रास्ते में एक शहर मिडलैण्ड भी पहुँच गई, जहाँ से लन्दन के यात्री ट्रेन में बैठा दिये जाते हैं उसी टिकट पर लन्दन जाने को मगर बादल थे कि हटने का नाम ही न लें. ट्रेन भी १२.३० बजे लन्दन किंग क्रास इन्टरनेशनल स्टेशन पहुंच गई और बादल अपना घेराव जारी रखे हुए थे अनशन पर डटे से नजर आये.
इस बीच मैने मेन से लोकल स्टेशन बदला. मकड़ी के रंग बिरंगे जालेनुमा उलझा उलझा नक्शा देख समझ कर लन्दन ट्यूब ट्रेन (शहर के भीतर चलने वाली ट्रेन) पकड़ी और निकल पड़ा उस जगह जाने को जहाँ होटल मौजूद था और वो था शिखा जी के घर से मात्र १० मिनट की दूरी पर. एक स्टेशन पर ट्यूब बदलकर फिर जिस स्टेशन पर उतरा, वही स्टेशन शिखा जी के घर जाने के लिए उतरने का उचित स्थान है मगर वहाँ से होटल पैदल जाने के लिए जरा ज्यादा दूर और टैक्सी पकड़ने के लिए जरा ज्यादा नजदीक था सो बीच का रास्ता संभालते हुए सामने से उस दिशा में जाती बस पर चढ़ लिए. १० मिनट में होटल पहुँच गये.
दोपहर का तीन बजने को था. कमरे में चाय बना कर पी गई और लैपटॉप कनेक्ट करके बैठ गये. दीपक का इन्तजार शुरु हुआ. इस बीच जाने कहाँ से ख्याल उड़ते आये और विदेश का धन- भगवान पद्मनाभम वाला आलेख भी लिख गया और पब्लिश करने हेतु शेड्यूल भी कर दिया. खिड़की के बाहर नजर पड़ी तो देखा बादल सूरज द्वारा खदेड़े जा रहे हैं. लगा कि पूर्व समझौते के अनुसार समय पर न हट कर जनता याने मेरी पसंद देखते हुए उनके अनशन पर डटे रहने से खफा सूरज ने लाठी चार्ज करवा दिया हो. कोई बादल कहीं भागा, कोई कहीं कूदा, कोई कहीं काले से सफेद बादल का वेश बदल कर भागा. बादल भी न!! समझते नहीं हैं- उनका क्या है- आज है, कल नहीं होंगे. सूरज को तो हमेशा रहना है. रामलीला मैदान और बाबा रामदेव की याद हो आई बिल्कुल से.
इन्हीं सब में दो घंटे बीत गये. आम जन की भाँति इस अफरा तफरी भरे मौसम का मैने भी आनन्द उठाया. तब तक दीपक का फोन भी आ गया कि एयरपोर्ट पहुँच गया है. १ घंटे में होटल पहुँच जायेगा. भारत से आया था इतने दिन रह कर और वो भी शादी करके तो मैने स्वतः उसके अनुमान को ठीक करते हुए उसके कहे १ घंटे को २ घंटे मानते हुए सोच लिया कि ७.३० से ८ के बीच आयेगा और मैं आसपास के इलाके में घूमने निकल पड़ा.
इल्फोर्ड नामक इलाका- पूरा पाकिस्तान, बंगलादेशी और पिण्ड के सरदारों से भरा पड़ा. सब नौजवान सरदार लेटेस्ट मॉडल के बर्बाद से बर्बाद हेयर स्टाईल, कान में बाली, लगभग घुटने तक झूलती जिन्स, गैन्ग टाईप बनाकर घूमते, लड़कियाँ छेड़ते, गालियाँ बक बक कर बात करते, संदिग्ध गतिविधियों में लिप्त से नजर आते बड़ा असहज सा वातावरण निर्मित कर रहे थे. जगह जगह देशी दुकानें, रेस्टारेन्ट, पान की दुकानें, साड़ी, ज्वेलरी, सलवार सूट, ग्रासरी से लेकर हर देशी सामान का बाजार. थोड़ा सा परेशान करता माहौल. कुछ देर उस भीड़ भरे माहौल में टहलकर मैं कमरे में वापस आ गया. अनुमान से ज्यादा भारत से अपना आना साबित करते दीपक महाराज ९.३० बजे अवतरित हुए. फिर शुरु हुआ कुछ जामों का दौर, लम्बी चर्चायें, कविताबाजी, खाने का आर्डर और देखते देखते, बतियाते बतियाते, पीते पीते रात दो बजे हालात ऐसे कि बिना गुड नाईट कहे अपने अपने बिस्तर में कब सो गये, पता ही नहीं चला.
सुबह ८ बजे उठकर होटल में ही ब्रेकफास्ट कर लिया और ११ बजे चैक आऊट कर शिखा जी के घर पहुँच गये.
स्वागत की पूरी तैयारी बेहतरीन नाश्ते के साथ. तैयारी देखकर यह बताने की हिम्मत ही नहीं हुई कि नाश्ता करके आये हैं बल्कि अफसोस ही हुआ कि क्यूँ करके आ गये. खैर, एक दिन की बात थी तो फिर से काजू, बदाम से लेकर तले हुए प्रान्स खाये गये. कविता जी लन्च टाईम तक पहुँचने वाली थी. अतः शिखा जी द्वारा बनाई मनपसंद चाय के साथ बातों का सिलसिला प्रारंभ हुआ. किताबें दी गईं. संगीता स्वरुप जी कविता की किताब प्राप्त की गई. शिखा जी से उनकी आने वाली किताब, हाल के हिन्दी सम्मेलन और जावेद अख्तर, शबाना आज़मी और प्रसून जोशी से मुलाकात का ब्यौरा और नेहरु सेन्टर की गतिविधियों के बारे में जानकारी ली गई. तब तक कविता जी आ गई.

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लन्च हुआ. एक से एक लज़ीज़ पकवान बनाये थे शिखा जी ने. कुछ ज्यादा ही खा लिए. फिर चाय का दौर.
कविता जी के आ जाने से पुनः ढ़ेर वार्तालाप. उनकी रचना यात्रा, ब्लॉगिंग पर चिन्तन. फेसबुक पर पलायन करती ब्लॉगरों की भीड़. इस व्यवहार पर अपने अपने मत. एग्रीगेटर्स की भूमिका और आवश्यक्ता. कमेंटस की महत्ता आदि पर विमर्श किया गया.
इस बीच दीपक को मौसम की बदलाव की मार पड़ती रही और उनकी नाक धीरे धीरे दिल्ली के पीक ट्रेफिक की स्थिति को प्राप्त होते हुए लगभग बन्द हो गई. दवाई खाकर वो इस लायक हुए कि अब चुपचाप सो जाये. अतः वह उपर सोने चले गये. तभी शिखा जी के प्यारे प्यारे बेटा और बेटी भी स्कूल से आ गये. दोनों ने मिलकर हम लोगों की तस्वीरें खींची.
घंटा भर सो लेने के बाद दीपक इस लायक हुए कि फोटो खिंचवा कर ट्रेन पकड़ी जाये और वो एयरपोर्ट जायें और मैं यॉर्क के लिए ट्रेन लेने किंग क्रास स्टेशन. कविता जी, मैं और दीपक एक साथ ही ट्यूब ट्रेन से शिखा जी की मेहमान नवाजी का लुत्फ उठा कर गदगद हो निकले. रास्ते में पहले कविता जी उतरी. फिर चन्द स्टेशन बाद दीपक और आखिर में मैं. रात ११ बजे जब ट्रेन से यॉर्क घर वापस पहुँचा, तो दीपक का फोन आ चुका था कि वो आयरलैण्ड पहुँच चुके हैं और घर जाने के लिए एयरपोर्ट से बस ले रहे हैं.
इन दो दिनों में दीपक जितना हमारे साथ थे, उससे दुगना भारत में थे. एक माह भी पूरा नहीं हुआ है अभी विवाह को. उनकी पत्नी का भारत से लगातार फोन पर उनके मूमेन्टस का लिया जाना और दीपक का बार बार किनारे जाकर बात करना मजा दे रहा था. दीपक इस मिलन और अपनी भारत यात्रा पर दो दिन पूर्व लिख ही चुके हैं. शायद शिखा जी और कविता जी की कलम भी चले.
एक यादगार यात्रा, ढेरों वार्तालाप, मधुर कभी न भूल सकने वाली मुलाकात साथ में सहेज लाये हैं. लगा ही नहीं कि सबसे पहली बार मिले हैं.

कुछ चित्र देखें इस मिलन के.

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रविवार, जून 26, 2011

बचपन के दिन भुला न देना....

ठीक ठीक तो याद नहीं किन्तु शायद दूसरी या तीसरी कक्षा में रहा हूँगा. सरकारी कॉलोनी का माहोल. सब अड़ोस पड़ोस के घर एक दूसरे के जानने वाले.

हमारे एकदम पड़ोस के घर में एक मेरी ही हमउम्र लड़की रहती थी. नाम था डॉली. सभी दोस्त दिन भर साथ खेलते, वो भी हमारे साथ खेलती थी. एकदम गोरी थी और सुन्दर भी. मुझे डॉली बहुत भाती थी. मैं उसके साथ अकेले में भी बहुत बात करता और खेलता.

उसकी तरफ मेरा खास रुझान और आकर्षण देख कर सब बड़े भी मेरा खूब मजाक बनाते.

सब बड़े पूछते कि तुम बड़े होकर किससे शादी करोगे और मैं नन्हा बालक सहज ही कहता कि डॉली से.

बड़ो का क्या है- बिना बालमन पर हो रहे आघात को विचारे वो कहते कि डॉली तो इतनी गोरी है, वो क्यूँ तुझ जैसे कल्लू राम से शादी करेगी?

मुझे बड़ा बुरा लगता और मैं परेशान हो उठता कि मेरा रंग काला क्यूँ हुआ. बच्चों की सोच ही कितनी होती है आखिर. दिन दिन भर इसी उधेड़ बून में रहता.

इसी सोच और परेशानी में एक दिन मैने डॉली से पूछ ही लिया कि वो आखिर इतनी गोरी कैसे है? क्या करती है अपने आपको इतना गोरा बनाने के लिए?

डॉली के घर का माहौल थोड़ा हाई स्टेन्डर्ड का था. उस जमाने में भी उसके घर में लोग चम्मच से चावल दाल खाते थे. वो खुद भी अंग्रेजी माध्यम में पढ़ती थी और घर में भी अंग्रेजों का सा माहौल था. उसके घर में जब सब सोने जाते थे तो एक दूसरे को गुड नाईट कहते थे और सुबह उठकर गुड मार्निंग. अपनी मम्मी से बाय करके डॉली स्कूल निकलती थी. यह सब बातें उस जमाने के मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए एक अजूबा सी थी.

मेरे प्रश्न पर उसने बताया कि वो रोज क्रीम खाती है, इसलिए गोरी है.

हम सरकारी स्कूल के हिन्दी माध्यम से पढ़ने वाले नादान बालक. अपनी बुद्धि भर का समझ कर अपने घर लौट आये और शाम को ड्रेसिंग टेबल से उठाकर एक चम्मच अफगान स्नो क्रीम (उस जमाने में चेहरे पर लगाने के लिए यही क्रीम चला करती थी) गोरा होने की फिराक में खा गये. फिर तो बेहिसाब उल्टियाँ हुई. दीदी ने पूछा कि क्या हुआ? कैसे हुआ? तो उसको पूरा किस्सा बताया.

वो हँस हँस कर पागल हो गई और उसने घर भर में सबको बता दिया. इधर हम उल्टी पर उल्टी किये जा रहे थे और घर वाले सब हँसते रहे. गरम दूध वगैरह पिलाया गया, तो तबीयत संभली और फिर दीदी ने बताया कि डॉली क्रीम खाती है का मतलब मलाई खाती है, ऐसा कहा होगा उसने और तुम अफगान स्नो खा गये.

किसी बडे के द्वारा अनजाने में भी  की गई मजाक कोमल मन पर कितना गहरा असर कर सकती है और आहत बालमन अपने भोलेपन में क्या से क्या कर बैठता है. बच्चों से बात करते समय बड़े और समझदार इतना सा ख्याल रखें....काश!!!

खैर, बचपन बीता, कौन जाने वो कहाँ गई? पिता जी की ट्रांसफर वाली नौकरी थी. शहर बदलते गये, दोस्त बदलते गये.

मगर मेरे बहुत बड़े हो जाने तक याने यहाँ तक कि मेरी शादी हो गई, उसके बाद तक भी गाहे बगाहे यह बात निकाल कर कि ये गोरा होने के लिए एक बार अफगान स्नो खा गया था, खूब हँसी उड़ाई जाती रही और हम अपना सा मूँह लिये आजतक उसी रंग के हैं, जिससे भला कौन डॉली शादी करती. 

बालमन कहाँ जानता था कि पूछ सीरत की होती है, सूरत की नहीं. बीबी तो हमको भी गोरी ही मिली और सुन्दर भी.

डॉली की रीसेन्ट तस्वीर तो है नहीं सो अपनी सांट दे रहे हैं. यू के में हैं और तस्वीर भी यॉर्क मे ही कल खींची - अपनी पत्नी के साथ.

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गुरुवार, मई 26, 2011

और उसका यूँ चले जाना.....

सन २००६. तब बोलू इस घर में आई थी ऐना की साथी बनकर. नामकरण बोलू करने के पीछे भी एक यादगार कारण ही रहा वरना नाम भला बोलू कौन रखता है.

" हमारी ससुराल मिर्ज़ापुर की है. एक बार जब हम गये वहाँ और हमारे ससुर साहब ने,(जो कि  अब नहीं हैं इस दुनिया में), मुझे उनके एक मित्र ,(जो कालिन का धंधा करते थे) की फेक्टरी देखने भेजा ,वहां जाने पर मालिक ने हमारी खातिरदारी की, दामाद जो थे हम और वो भी विदेश से आये. अपने खास नौकर को न जाने क्या समझा कर हमारे साथ किया. वो हमें गोदाम दिखाने लगा, पहली कालीन दिखाई और कहा कि ई बोलू है हम सोचे कि यह कोई क्वालिटी होती होगी. तब तक दूसरी कालीन दिखाई और कहा कि ई रेड है, लाल रंग की थी वो. तब हम यह समझ पाये कि पहले वाली नीली थी इसलिये बोलू (ब्लू)....यह नयी वाली भी नीले रंग की है सो नामकरण हुआ "बोलू". :)

बोलू-एना की साथी-अब दो-तोते |

मगर कुछ दिन का ही साथ रहा दोनों का और ऐना चल बसी. तब बोलू कुछ उदास और बुझी बुझी रहने लगी. बोलू का अकेलापन हमसे देखा नहीं गया और हम इसके लिए भी एक साथी लेते आये. भारतीय हैं तो नाम तो मिलता जुलता रखना ही था रो बेसिर पैर का नाम मोलू नये वाले को मिला. अब बोलू मोलू का साथ हो गया. खूब खेलते आपस में, दिन भर गाना गाते, खाना खाते मगर पिंजड़ा खुला भी रहे तो बाहर न आते. आपस में एक दूसरे का साथ ही इनकी दुनिया बन गई. इन्हें हमारी जरुरत न रही कम से कम खेलने और दिल बहलाने को.

लेकिन फिर भी शायद कभी सोचते हों कि चलो, इतना ख्याल रखते हैं मियां बीबी हमारा तो इनका दिल बहला दें तो पिंजड़े से निकालने पर निकल आते. कुछ देर साथ बैठते और मौका लगते ही पिंजड़े में वापस. माँ बाप को क्या चाहिये कि बच्चे खुश रहे बस!! कभी कभार हाल पूछ लें वरना तो उनकी अपनी दुनिया और उनका अपना परिवार. ये बात ये दोनों भी भली भाँति समझ चुके थे.

इस बीच हमारे घर तोते (इनको मैं तोता कहता हूँ मगर यह उसी प्रजाती के किन्तु बज़्ज़ी कहलाते हैं) का हँसता खेलता परिवार देखकर हमारी अफगानी पड़ोसी भी तोता पालने का मोह लगा बैठी. इन्हीं दोनों की ब्रीड का एक तोता वो भी लेती आई. पिंजड़ा खरीदा, खाना आया. सब करने की कोशिश की हमारी तरह मगर, जैसे छोटे बच्चों की बदमाशी भी तभी अच्छी लगती है, जब वो दूसरों के घर हो रही हो. यह बात हमारे पड़ोसी को भी जल्दी ही समझ आ गई और एक दिन कहने लगी कि मैं उसे उड़ाने जा रही हूँ. मुझसे नहीं पाला जायेगा.

जो बच्चा पैदा होते ही घर में पला हो वो भला जंगल में कैसे रह पायेगा? मुझे चिन्ता होने लगी. जंगल में रहने के कायदे अलग होते हैं, वो इस बच्चे ने कभी सीखे ही नहीं भले ही चिड़िया हो. वही हाल उन भारतियों के बच्चों का होता है जो अमेरीका/कनाडा में जन्म लेते हैं. उन्हें भारत जाकर रहने को बोल दिजिये तो चार दिन न रह पायेंगे. उन्होंने कभी सीखा ही नहीं वो लाईफ स्टाईल जहाँ आपको अपनी जगह खुद बनानी होती है. अपने ही अधिकार को हासिल करने के लिए लड़ना होता है. घूस खिलानी होती है.

यही सब सोच कर मैने पड़ोसी से कहा कि उसे उड़ाओ मत, वो मर जायेगी. एक शेर कहीं पढ़ा था, वो याद हो आया:

क़फ़स से निकल कर किधर जायेगी
रिहाई मिलेगी तो मर जायेगी...

(क़फ़स=पिंजड़ा)

हमने उससे कहा कि हमारे घर तो दो पल ही रही हैं, तीन पल जायेंगी. हमें दे दो. हम पिंजड़ा बड़ा ले आये और तीनों उसमें रहने लगे. इस नये सदस्य का नाम खुशाल रखा गया क्यूँकि उसका प्रारंभिक लालन पालन एक मुसलमान के घर हुआ था. हम चाहते थे कि वो अपनी जड़ों से कटा न महसूस करे तो उसे खुशाल पुकारते. जानवरों में मजहबी विवाद जैसा रोग अभी नहीं पहुँचा है इसलिए तीनों घुल मिल कर रहने लगे, खूब खेलते. गाना गाते तो एक सुर में, चिल्लाते तो एक सुर में, सोते तो एक समय, जगते तो एक समय.

कई बार इच्छा हुई कि हम इन्सान इनसे कुछ सीखें, इनके रहन-सहन पर लिखूँ मगर टलता ही रहा.

तीनों शाम सात बजते ही हल्ला मचाते याने कि अब नींद आ गई है, कंबल उढ़ा दो. जैसे ही कंबल उठाया जाता, तीनों अपने अपने झूले पर सो जाते. सुबह जब तक हम सोते, वो भी सोते रहते मगर जैसे ही मेरे पैर बिस्तर से नीचे उतरते, मेरे कमरे से एक मंजिल नीचे १५ सीढ़ी दूर इन तीनों का कंबल के भीतर से ही कोरस गान शुरु हो जाता. समझते की मम्मी पापा दोनों उठ गये हैं. फिर मैं इनका कंबल हटाता और कहता कि बच्चों, मम्मी अभी सोई हैं. अभी तो हमें ही चहकना अलाऊड नहीं है तो तुम कैसे चहक सकते हो, तो तीनों चुप होकर मम्मी के उठने का इन्तजार करते. जब वो उठती, तो तीनों का फिर चहकना चालू. हालांकि चहक तो हम भी साथ ही उठते थे उस वक्त.

पिछले तीने दिन से ६ साल की बोलू जरा ढीली दिख रही थी. उम्र तो हो ही चली थी. अधिकतर ये प्रजाति ३ से ४ साल जीती है मगर शायद घर का खाना और माहौल उसे ज्यादा उम्र दे गया. बाकी मोलू और खुशाल उसे हैरान करते रहे कि साथ खेलो मगर वो निढाल सी थोड़ा सा खेलती और फिर बैठे बैठे सो जाती. दोनों उसे हिलाते, जगाते तो फिर थोड़ा खेलती. अपने साथियों का मन बहला देती

२१ तारीख को दुनिया खत्म होने की भविष्यवाणी थी. शाम सात बजे बोलू अपने झूले से उतर पिंजड़े के फर्श पर आ बैठी. यह एक प्रकार से इस बात का ऐलान होता है कि मेरे दिन अब पूरे हुए. उसके लिए शायद भविष्यवाणी सही हो रही थी. पत्नी की नजर पड़ी तो उसे सफेद कपड़े में लपेट कर पिंजड़े के बाहर निकाला. अभी सांसे बाकी थी. वो मुझे ताक रही थी. मैने उसके सर पर हाथ फेरा और कहा कि बेटा, निश्चिंत होकर जाओ और अब दादी के साथ वहाँ खेलना. ऐना भी उनके पास है, वो इन्तजर कर रही हैं तुम्हारा. बस दोनों दादी को परेशान मत करना. फिर मैने उसे एक बून्द पानी पिलाया कि प्यासी न जाये. क्या पता कितना लम्बा रास्ता हो दादी के पास तक पहुँचने का. सर पर हाथ फेरा, उसने आँख बंद की और अपनी मम्मी के हाथ में लुढक गई.

हम पति पत्नी एक दूसरे को बहती आँखों से लुटे से देखते रह गये और बोलू चली गई.

सूर्यास्त हो चुका था, इस समय हमारे यहाँ अंतिम संस्कार नहीं किया जाता तो एक डब्बे में उसे आराम से लिटा कर सफेद कपड़ा उढ़ा दिया और अगली सुबह के इन्तजार में अगरबत्ती जला कर रख दी.

मोलू और खुशाल ने फिर कुछ खाया नहीं तो उन्हें भी कंबल से ढक कर सुला दिया. शायद समझ गये हों कि बोलू का साथ यहीं तक था. इतना लम्बा साथ रहा और उसका एकाएक यूँ चले जाना, कैसे कुछ भी खा पाते बेचारे.

सुबह उठकर घर के पास ही बोलू को ओन्टारियों लेक में कुछ पुष्पों के साथ प्रवाहित कर दिया.

मोलू, खुशाल धीरे धीरे सामान्य हो रहे हैं. कुछ खाने भी लगे हैं और बीच बीच में चिल्लाना और गाना भी शुरु कर दिया है मगर ज्यादा तो मिस ही कर रहे हैं अपनी साथी को. जीवन तो रुकता नहीं, फिर सामान्य होना ही होता है.

मुझे पता है कि हमारी प्यारी बिटिया बोलू, दिल की इतनी कोमल और शीशा देखकर अपने चेहरे को निहारने की शौकीन, अगले जन्म में किसी अच्छे घर में सुन्दर सी इन्सानी बिटिया बन कर जन्म लेगी..कभी दिखी तो मैं पहचान लूँगा उसे.

माँ बाप तो बच्चों को हर रुप में पहचान ही जाते हैं.

बहुत याद आ रही हो तुम बोलू.....मुझे, मम्मी को और मोलू और खुशाल को भी. तुम्हारा झूला पिंजड़े में खाली टंगा है, उसे अलग करने की हिम्मत मुझमें अभी तो नहीं है बिटिया. शायद कल को यह हिम्मत हो जाये मगर दिल के पिंजड़े में तो तुम हमेशा टंगी ही रहोगी उस झूले पर गाना गाती.

तुम खुश रहना हमेशा, जहाँ भी रहो!!!!

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मंगलवार, मार्च 22, 2011

बेवकूफियों का पुलिंदा

पिछले दिनों वन्दना जी का ईमेल आया कि देर से इत्तला करने की माफी और जल्दी से जल्दी अपनी कोई ऐसी बेवकूफी का प्रसंग भज दें, जो यादगार बन गई हो, होली पर छापना है.

एक बार विचारा तो चारों तरफ अपनी बेवकूफियों का भंडार ही भंडार छितरा नजर आया. शायद नॉन बेवकूफी यादगार पूछी होती तो भेजने में समय लगता. तुरंत भेज दी. छप भी गई. अगर वहाँ न देखी हो तो यहाँ देख लें:

***************************

एक दिन दफ्तर जाने के लिए सुबह सुबह ट्रेन पकड़ी. भीड़ तो काफी थी किन्तु बैठने के लिए सीट मिल गई. अब तक ट्रेन पूरी भर चुकी थी, शायद अगले स्टेशन से पकड़ते तो खड़े खड़े ही जाना पड़ता एक घंटे ऑफिस तक.

अगले स्टेशन पर ट्रेन रुकी तो बहुत से लोग और चढ़े. अब ट्रेन में भी कुच्च्मकुच्चा हो गई. ऐसे में शिष्टाचारवश लोग किसी बुजुर्ग या गर्भवति महिला या छोटे बच्चों के साथ आई महिला के लिए जगह खाली कर देते हैं और खुद खड़े हो जाते हैं. मेरे बाजू में भी एक महिला आ कर खड़ी हुई. देखा तो गर्भवति महिला थी अतः मैं अपनी सीट से खड़ा होकर उनसे आग्रह करने लगा कि आप बैठ जाईये.

उस महिला ने मुझसे कहा कि नहीं, मैं ठीक हूँ. आप बैठिये.

मैने पुनः निवेदन किया कि आप गर्भवति हैं, आपको इतनी दूर खड़े खड़े यात्रा नहीं करना चाहिये, आप बैठ जाईये. देर तक खड़े रहना स्वास्थय और आने वाले बेबी के लिए ठीक नहीं है.

उसने चौंकते हुए मुझे देखा और बोली- मैं..गर्भवति...यू मस्ट बी किडिंग (आप जरुर मजाक कर रहे होंगे) और वो मुँह बनाकर डिब्बे के दूसरी तरफ चली गई.

मैं झेंपा सा अपने आस पड़ोस वालों को देखने लगा. सभी मुस्करा रहे थे. मैने तो बस उसका पेट देख अंदाजा लगाया था. काश, मैं मोटी महिला और गर्भवति महिला का स्पष्ट भेद जानता होता.

मगर अब हो भी क्या सकता था-बेवकूफी तो कर ही बैठे थे. सो अपना सा मुँह लिए वापस बैठ गए सर झुकाये और राम-राम करते रहे, कि जल्दी से जल्दी मेरा स्टेशन आये और मैं उतर कर गुम हो जाऊँ भीड़ में.

आज भी जब यह वाकिया याद आता है तो अपनी बेवकूफी पर एक बार फिर शरम आ जाती है.

fat and pregnant

चलते चलते:

कभी न रहा शर्मिंदा मैं, नमालूम वाणियों की सूफियों से
मगर मैं बच नहीं पाया, गुजर कर अपनी बेवकूफियों से...

और फिर:

खाली बैठा

आज

रोजानामचा (ट्रायल बैलेन्स) बनाता रहा

अपनी समझदारी

और

बेवकूफियों का...

बेवकूफियों का पलड़ा

भारी निकला...

और

अपने हल्केपन को भूल

समझदारियाँ

भरती रहीं

अपनी समझ की

दंभ भरी

उड़ान......

-कितने कमजर्फ होते हैं यह गुब्बारे
जो चंद साँसों में फूल जाते हैं....
थोड़ा ऊपर उठ जायें तो
औकात भूल जाते हैं... (शायर नामालूम)

-संस्मरण द्वारा समीर लाल ’समीर’

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रविवार, मार्च 06, 2011

कॉफी हाऊस में शाम…

तनेजा जी मित्र हैं अतः ये बात जोर देकर साधिकार कहते हैं, ’अमां, तुम समझते नहीं. हम जहाँ हैं, वहाँ शहर की चारों दिशाओं से आकर सड़कें खत्म हो जाती है.’

दरअसल, हम कुछ मित्र रोज ही शाम को शहर के चौक बाज़ार के कॉफी हाऊस में बैठ कर कॉफी पीते-समय गुजारा करते थे. मेरा मानना होता कि इस चौराहे पर आकर सड़कें खत्म नहीं होती बल्कि इस चौराहे पर आप कहीं से भी आयें, आपको चार विकल्प मिलते हैं कि अगर चाहो तो जिस राह आये हो उसी राह वापस लौट जाओ या फिर अन्य तीन में से कोई सी चुन कर नई मंजिल की ओर बढ़ जाओ. जीवन में भी न जाने कितने ही ऐसे चौराहे मिलते हैं. कुछ उसे राह का ख्त्म हो जाना मान मंजिल मान लेते हैं तो कुछ नई मंजिल तक पहुँचने के लिए उपस्थित विकल्प. स्थितियाँ सभी के लिए एक सी उपस्थित होती हैं बस यह आपकी सोच पर आधारित है कि आप उसे किस रुप में लेते हैं, मै हमेशा तीन में से विकल्प तलाश कर नई मंजिल की ओर बढ़ चलता हूँ।.

मित्र मंडली में सभी को पता रहता था कि शाम की महफिल कॉफी हाऊस में जमेगी. जैसे जैसे जिसे दिन भर के काम से निवृत हो कर समय मिलता जाता, आकर वहाँ जम जाता. वो कोने वाली १२ कुर्सियों से घिरी टेबल नित हमारा इन्तजार करती. सफेद कोट और पैन्ट में हरी बेल्ट और फुनगी वाली टोपी लगाया वेटर ’श्रीनि’ भी लगभग तय था और वो जानता था कि कौन कैसी कॉफी पीता है. उसे यह भी पता था कि तिवारी जी कॉफी के साथ दो ब्रेड बटर स्लाईस भी लेते हैं और अग्रवाल जी ८.३० बजे के आसपास डोसा खाकर घर लौटते हैं क्यूँकि वो घर पर अकेले ही रहते हैं और खाना बनाने के लिए उनके पास न तो व्यवस्था है और न हुनर. अग्रवाल जी अक्सर दुखी मन से कहते सुने जाते थे कि काश!! रसोई भी देश की सरकार के समान होती तो झंझट ही खत्म हो जाता, बिना व्यवस्था और हुनर के भी चल ही जाती.

मैं सोचा करता था कि श्रीनि का पूरा नाम शायद कभी माँ बाप ने बड़े जतन से श्रीनिवास रखा होगा लेकिन फिर खुद ही प्यारवश और सुविधा के लिए घर में श्रीनि पुकारने लगे होंगे. पूछने पर उसने बताया कि नहीं, उसका पूरा नाम वैंकटैय्या श्रीनिवासन है और ’श्रीनि’ श्रीनिवासन से निकला है. मुझे अचरज हुआ कि श्रीनि ही क्यूँ, वैंकी क्यूँ नहीं? अव्वल तो नाम उसका, मुझे अचरज करने की क्या वजह? किन्तु कॉफी हाऊस में खाली बैठे हिन्दुस्तानी, उनसे और आशा भी क्या की जा सकती है जबकि व्यस्त हिन्दुस्तानी तक उन्हीं बातों में व्यस्त हैं, जिनसे उनका कुछ लेना देना नहीं. फिर भी श्रीनि ने ही निराकरण भी किया कि उसके बड़े भाई का नाम वैंकटैय्या राधाकृष्णन है और ’पहले आओ, पहले पाओ’ की स्कीम में उसने वैंकी पर अधिकार जमाया हुआ है.

तब उस शाम मित्रों के बीच चर्चा का विषय यही बना कि आखिर भारत में हम अधिकतर हर व्यक्ति के दो नाम रखने में क्यूँ विश्वास रखते हैं. एक घर का, एक बाहर का. माना कि घर में उस व्यक्ति को ज्यादा बार बुलाने में/पुकारने में मेहनत कम करना पड़े तो नाम छोटा करके या प्यार वाला नाम पुकार कर काम चला सकते हैं तो फिर बाहर वालों से ऐसी क्या दुश्मनी कि उनसे ज्यादा मेहनत करवाने की ठान बैठे. उनके लिए भी वही प्यारा वाला नाम रख छोड़ते?

किन्हीं मित्र का कहना था कि वो तो छोटे नाम से हम स्नेहवश एवं अपनेपन के कारण पुकारते हैं. मैं समझ नहीं पाता कि फिर बाहर वालों से आप बाई डिफाल्ट ऐसा ही क्यूँ मान कर चल रहे हैं कि वो स्नेहवश न पुकारेगा या अपनेपन से पेश न आयेगा. यह तो कुछ कुछ पूर्वाग्रह पाल लेने जैसा हुआ.

पूरी शाम गुजरी वैसी ही और जैसी कि उस कॉफी हाउस में अधिकतर शामें गुजरती थीं, कोई निष्कर्ष न निकला दो नामों के औचित्य पर और बस मान लिया गया कि ऐसा ही होता है तो होता है. इसमें बहस कैसी?

सभी मुस्कराते हुए घर लौट लिए, मानों संसद से लौटते सांसद हों. निष्कर्ष निकले या न निकले, कोई फर्क नहीं पड़ता-दिन निकल जाना चाहिये, बस!!

 

coffeehouse

यूँ ही कुछ और:

बड़ी बेशऊर होती है वो खिड़कियाँ
जो भीतर का नज़ारा दिखलायें......
कभी खुद को जिताने की खातिर
वो अपनों को ही हारा दिखलायें...

-समीर लाल ’समीर’

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बुधवार, दिसंबर 08, 2010

पहाड़ी ओहदे..

सरकारी घर मिला हुआ था पिता जी को, पहाड़ के उपर बनी कॉलोनी में- अधिकारियों की कॉलोनी थी- ओहदे की मर्यादा को चिन्हित करती, वरना कितने ही अधिकारी उसमें ऐसे थे कि कर्मों से झोपड़ी में रखने के काबिल भी नहीं, रहना तो दूर की बात होती. मजदूरों और मातहतों का खून चूसना उन्हें उर्जावान बनाता था.

वो अपने पद के नशे में यह भूल ही चुके थे कि कभी उन्हें सेवानिवृत भी होना है. खैर, सेवा के नाम पर तो वो यूँ भी कलंक ही थे तो निवृत भला क्या होते लेकिन एक परम्परा है, जब साथ सारे अधिकार भी पैकेज डील में जाते रहते हैं. खुद तो खैर औपचारिक रुप से सेवानिवृत होने के साथ ही शहर में कहीं आकर बस जाते मगर बहुत समय लगता उन्हें, जब वो वाकई उस पहाड़ वाली कॉलोनी से अपनी अधिकारिक मानसिकता उतार पाते. जिनका जीवन भर खून पी कर जिन्दा रहे, उन्हीं से रक्त दान की आशा करते. कुछ छोड़ा हो तो दान मिले. खाली खजाने से कोई क्या लुटाये.

उसी पहाड़ पर उन्हीं अधिकारियों के बच्चे, हम सब भरी दोपहरिया में निकल लकड़ियाँ और झाड़ियाँ बीन कर चट्टानों के बीच छोटी छोटी झोपड़ियाँ बनाते और उसी की छाया में बैठ घर घर खेलते. अपने घर से टिफिन में लाया खाना खाते मिल बाँट कर और उस झोपड़ी को अपना खुद का घर होने जैसा अहसासते. मालूम तो था कि शाम होने के पहले घर लौट जाना है या अगर ज्यादा गरमी लगी तो शाम से कोई वादा तो है नहीं कि तुम्हारे आने तक रुकेंगे ही, और होता भी तो वादा निभाता कौन है? फिर रात तो गर्मी में कूलर और सर्दी में हीटर में सोकर कटेगी (आखिर अधिकारी के बेटे जो ठहरे) तो झोपड़ी की गर्मी/सर्दी की तकलीफ का कोई अहसास ही नहीं होता. घर से बना बनाया खाना और बस लगता कि काश इसी में रह जायें.

वातानुकूलित ड्राईंगरुम में बैठकर गरीबी उन्मूलन पर भाषण देने और शोध करने जैसा आनन्द मिला करता था उन झोपड़ियों में बैठ कर.

पहाड़ों पर तफरीह के लिए घूमने जाना और पहाड़ों की दुश्वारियों को झेलते हुए पहाड़ों पर जीवन यापन करना दो अलग अलग बातें हैं, दो अलग अलग अहसास जिन्दगी के.

सुनते हैं आजकल युवराज ऐसे ही कुछ अहसास रहे हैं शासन की बागडोर संभालने के पहले.

काश!! दुश्वारियाँ, परेशानियाँ और दर्द बिना झेले अहसासी जा सकती.

भरी रसोई में ही उपवास भी धार्मिक कहलाता है वरना तो फक्कड़ हाली को कौन पूछता है. न कोई पुण्य मिलता है, न ही पुण्य प्राप्ति की आशा उन दो रोटियों की उम्मीद में.

भगवान भी कैसे भेदभाव करता है-शौकिया भूखा रहने वालों को पुण्य और मजबूरीवश भूखा रहने वालों को अगले दिन फिर भूख झेलने की सजा.

ahode

 

कहने को

बहुत कुछ है

मगर लंगड़े हालात ऐसे

कि

जुबान लड़खड़ा जाती है...

और

बैसाखी मुहैया कराने को

सक्षम हाथ

कहते हैं

मैं

नशे में हूँ!!

-समीर लाल ’समीर’

 

नोट: जब यह पोस्ट आयेगी, तब मैं देहरादून के रास्ते में रहूँगा. शायद देहरादून ९ तारीख की रात पहुँच कमेंट अप्रूव कर पाऊँ अगर कनेक्शन मिला तो..वरना तो भगवान भरोसे देश चल रहा है तो हम तो चल ही जायेंगे. :)

देहरादून और नजदीकी ब्लॉगर अगर मिलना और संपर्क करना चाहें तो नम्बर ०८८८ ९३७ ६९३७…

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बुधवार, अक्टूबर 27, 2010

लबड़हत्था....

बचपन से ही मैं बाँये हाथ से लिखता था. लिखने से पहले ही खाना खाना सीख गया था, और खाता भी बांये हाथ से ही था. ऐसा भी नहीं था कि मुझे खाना और लिखना सिखाया ही बाँये हाथ से गया हो लेकिन बस जाने क्यूँ, मैं यह दोनों काम ही बांये हाथ से करता.

पहले पहल सब हँसते. फिर डाँट पड़ने का सिलसिला शुरु हुआ.

अम्मा हुड़कती कि लबड़हत्थे से कौन अपनी लड़की ब्याहेगा? (उत्तर प्रदेश में बाँये हाथ से काम करने वालों को लबड़हत्था कहते हैं)

आदत छुड़ाने के लिए खाना खाते वक्त मेरा बाँया हाथ कुर्सी से बाँध दिया जाता. मैं बहुत रोता. कोशिश करता दाँये हाथ से खाने की लेकिन जैसे ही बाँया हाथ खुलवा पाता, उसी से खाता. मुझे उसी से आराम मिलता.

एक मास्टर साहब रखे गये थे, नाम था पं.दीनानाथ शर्मा. रोज शाम को आते मुझे पढ़ाने और खासकर दाँये हाथ से लिखना सिखाने. जगमग सफेद धोती, कुर्ता पहनते और जर्दे वाला पान खाते. ऐसा नहीं कि बाद में और किसी मास्टर साहब ने मुझे नहीं पढ़ाया लेकिन उनका चेहरा आज भी दिमाग में अंकित है.

बहुत गुस्से वाले थे, तब मैं शायद दर्जा तीन में पढ़ता था. जैसे ही स्कूल से लौटता, वो घर पर मिलते इन्तजार करते हुए. पहला प्रश्न ही ये होता कि आज कौन से हाथ से लिखा? स्कूल में दाँये हाथ से लिख रहे थे या नहीं. मैं झूठ बोल देता, ’हाँ’. तब वो मुझसे हाथ दिखाने को कहते और बाँये हाथ की उँगलियों में स्याहि लगी देख रुलर से हथेली पर मारते. उनकी मुख्य बाजार में कपड़े की दुकान थी. पारिवारिक व्यवसाय था. उन्हीं में से थान के भीतर से निकला रुलर लेकर आते रहे होंगे क्यूँकि जिन दो साल उन्होंने मुझे पढ़ाया, एक सा ही रुलर हमेशा लाते.

फिर मैं जान गया कि वो स्याहि देखकर समझ जाते हैं. तब स्कूल से निकलते समय वहीं पानी की टंकी पर बैठ कर मिट्टी लगा धो धोकर स्याहि छुड़ाता और फिर घर आता.

मगर दीनानाथ मास्टर साहब फिर दाँये हाथ पर स्याहि का निशान न पाकर समझ जाते कि कुछ बदमाशी की है. मैं फिर मार खाता.

इसी दौर में मैने यह भी सीख लिया कि सिर्फ स्याहि धोने से काम नहीं चलेगा तो दाँये हाथ की उँगलियों में जानबूझ कर स्याहि लगा कर लौटता. ऐसा करके काफी हद तक मास्टर साहब को चकमा देता रहा और मार खाने से बचता रहा.

फिर जाने कैसे उनकी पहचान मेरे क्लास टीचर से हो गई. फिर तो वो उनसे पूछ कर घर पर इन्तजार करते मिलते. गनीमत यह रही कि परीक्षा में नम्बर बहुत अच्छे आ जाते तो बाँये हाथ से लिखना धीरे धीरे घर में स्वीकार्य होता चला गया और दीनानाथ मास्टर साहब को विदा दे दी गई. हाँ, खाने के लिए फिर भी बहुत बाद तक टोका गया.

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उसी बीच जाने कहाँ की शोध किसी अखबार में छपी कि बाँये हाथ से काम करने वाले विलक्षण प्रतिभा के धनी होते हैं और किसी सहृदय देवतुल्य व्यक्ति ने पिता जी को भी वो पढ़वा दिया. पिता जी ने पढ़ा तो माता जी को ज्ञात हुआ. एकाएक मैं लबड़हत्थे से प्रमोट हो कर विलक्षण प्रतिभाशाली व्यक्तियों की जमात में आ गया.

तब मैं चाहता था कि वो मेरे बड़े भाई को अब डांटे और मास्टर साहब को लगवा कर उसे रुलर से मार पड़वाये कि बाँये हाथ से लिखो. मगर न जाने क्यूँ ऐसा हुआ नहीं. बालमन था, मैं इसका कारण नहीं जान पाया या शायद मेरी विलक्षणता अलग से दिखने लगे इसलिये उसे ऐसे ही छोड़ दिया होगा. ऊँचा पहाड़ तो तभी ऊँचा दिख सकता है, जब नापने के लिए कोई नीचा पहाड़ भी रहे. वरना तो कौन जाने कि ऊँचा है कि नीचा.

लबड़हत्थों की जमात में अमिताभ बच्चन जैसे लोगों का साथ मिला तो आत्मविश्वास में और बढ़ोतरी हुई और मेरी उस शोध परिणाम में घोर आस्था जाग उठी. काश, उस पेपर की कटिंग मेरे पास होती तो फ्रेम करा कर नित दो अगरबत्ती लगाता और ताजे फूल की माला चढ़ाता.

शोध परिणाम तो खैर समय, जरुरत, बाजार और स्पान्सरर्स/ प्रायोजकों के हिसाब से बदलते रहते हैं मगर अपने मतलब का शोध फ्रेम करा कर अपना काम तो निकल ही जाता. फिर नये परिणाम कोई से भी आते रहते, उससे मुझे क्या?

किन्तु सोचता हूँ क्या इससे वाकई कोई फरक पड़ता है कि आप बाँये हाथ से काम करते हैं या दाँये? फिर क्यूँ न जो सहज लगे, सरल लगे और जो स्वभाविक हो, उसे उसके स्वतंत्र विकास की लिए जगह दे दी जाये..प्रतिभा दाँया, बाँया देखकर नहीं आती. प्रतिभा तो मेहनत और लगन का परिणाम होती है,मेहनत किस हाथ/तरह से की गई उसका नहीं.

 

 
नोट:
सोच रहा हूँ कि जल्दी से इसे लिखकर छाप देता हूँ इससे पहले कि कोई शोध परिणाम ऐसा कहे कि ब्लॉग पर लिखने से इन्सान पागल हो जाता है इसलिए प्रिंट की पत्र पत्रिकाओं में लिखना चाहिये. वैसे कुछ कदम इस दिशा में बढ़ते दिखे तो हैं.

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रविवार, जुलाई 11, 2010

मेरा सजन चॉकलेटी...

तब तो नया नया आया था कनाडा. हालांकि नये पुराने से इस वाकिये पर कोई फरक नहीं पड़ता और न ही इस वजह से कि मैं समीर लाल हूँ. पूरा फरक सिर्फ इस बात का है कि मैं भारतीय पुरुष हूँ.

बहुत पहले भी एक बार मैं जिक्र कर चुका हूँ कि रंगों की पहचान के मामले में भारतीय पुरुष से ज्यादा निर्धन, दयनीय और निरीह प्राणी कोई नहीं होता. हम भारतीय पुरुषों को बस गिने चुने रंग मालूम होते है जैसे नीला, पीला, लाल ,गुलाबी, भूरा, हरा, सफेद और काला आदि. ज्यादा स्मार्ट रहे तो नीला और बैंगनी में फर्क कर लेंगे या काला और सिलेटी में. इसके आगे का काम लगभग से चल जाता है जैसे हल्का, गाढ़ा या करीब करीब हरा कह कर.

हुआ ऐसा कि एक मित्र का फोन आया कि उनके मित्र के पास एक शो के दो पास रखे हैं और वो कल शो देखने नहीं जा पायेंगे. मेरा मित्र जो फोन कर रहा था वो भी बिजी था, अतः मुझसे पूछा कि अगर जाना हो तो आप और भाभी चले जाओ. एक तो हम नये नये और फ्री का पास मिल रहा हो तो क्यूँ मना करते. हाँ कर दी. उसने अपने दोस्त का फोन नम्बर दे दिया और कहा कि जब ऑडिटोरियम जाने लगो तो उसे फोन कर देना. वो टिकिट भिजवा देगा वहीं.

इण्डिया से नये नये आये थे तो कमीज जो सबसे रंगीन सिलवा लाये थे, वही पहन कर निकले. ऑडिटोरियम के पास स्टेशन पर पहुँच कर फोन लगाया तो मित्र के मित्र, जो कि कनेडियन थे, ने कहा कि उनका लड़का ऑडिटोरियम की तरफ ही से निकल रहा है, आप उसको पार्किंग के सामने मिल जाना और टिकिट ले लेना. वैसे आप किस कलर की शर्ट पहने हैं, वो बता दिजिये तो मैं उसे मोबाईल पर इन्फार्म कर देता हूँ वो आपको देख लेगा और हाथ हिला देगा.


अब हमारी रंगीन कमीज फिरोजी. अंग्रेजी मे क्या बोलें?  बचाव का एक ही रास्ता था कि हमने कह दिया कि आप चिन्ता न करें, हम कार पहचान कर खुद ही पहुँच जायेंगे.आप हमें कार के बारे में बता दिजिये. पार्किंग में वो कार ले जाता तो उसे जबरदस्ती पार्किंग चार्जेज लग जाते अतः पार्किंग के बाहर सड़क पर मिलना ही तय पाया. पास भर तो लेना है, रुकने का क्या काम. उन्होंने बताया कि  वो टील कलर की सेडान कार से आयेगा. आप पहचान लेना और हाथ हिला देना.

फोन रख दिया और लगे सोचने कि ये भला कौन सा रंग होता है? आने जाने वाली कारों का ताँता लगा था और उनमें कम से कम पाँच तो ऐसे ऐसे रंग रहे होंगे आती जाती कारों के, जिन्हें हमारी सीमित पहचान क्षमता कोई भी नाम देने से इन्कार कर रही थी. एक होता तो बाकी पहचान कर उसे मान लेते टील. मगर यहाँ तो अनजान रंगों की भीड़ चली जा रही थी. ऐसे में हाथ हिलाने लगे तो सब पागल ही समझेंगे हर कार को हाथ हिलाता देख कर.

दस मिनट खड़े सोचते रहे. अपनी कमीज के रंग का अंग्रेजी भी याद नहीं आ रहा था आखिरकार हार कर बेवकूफ नजर आने से बेहतर विकल्प का सहारा लिया.

उन मित्र के मित्र को फिर से फोन लगाया और कहा कि एकाएक पत्नी की तबीयत खराब लगने लगी है. अतः तुरंत घर वापस जाना होगा. आप अपने बेटे से कह दिजिये कि वो परेशान न हो और किसी को भी पास दे दे या वेस्ट जाने दे.

उन्होंने ने भी सॉरी फील किया इस एकाएक तबीयत खराब हो जाने पर और हमारी तारीफ भी की कि हाँ, ऐसे शो तो होते रहेंगे. आप घर लौट जाईये. तबीयत ज्यादा जरुरी है.

पत्नी को बता दिया कि उनका लड़का कहीं जरुरी फंस गया है तो आ नहीं पा रहा है. लौटना पड़ेगा. घर आकर नेट पर अधिक से अधिक रंगों के नाम अंग्रेजी में सीखे. फिरोजी मतलब टर्काईस जान गये. टील रंग भी नेट पर देखा. खड़ी तो थी बिल्कुल उसी रंग की सेडान पार्किंग के सामने. मगर अब क्या, वो तो पास फेंक कर ४ घंटे पहले जा चुका होगा और शो भी खत्म हो चुका होगा.

अब तो मैं मर्जेन्टा, टैन, बर्गेन्डी जैसे कठिन रंग भी पहचान जाता हूँ मगर पत्नी की मूँह से सुना धानी रंग अभी पहचानना बाकी है. नेट पर मिल नहीं रहा और उससे पूँछू तो फिर वो ही-कौन बेवकूफ नजर आना चाहेगा.

कोई बता तो दो जी, कैसा होता है धानी रंग?

वैसे खुद के रंग के बारे में तो एक प्रमोशन तब मिला था, जब कनाड़ा आये थे. भारत में हमारा रंग काला कहलाता था और यदि किसी का जबरदस्त काम हमसे अटका हो तो मैक्सिमम सांवला कह लेता था मगर यहाँ तो सारे साऊथ एशियन ब्राउन कहलाते हैं. काले तो अफ्रीकन होते हैं. तो प्रमोट होकर हम काले से ब्राऊन हो लिए खुशी खुशी.

अभी एक रोज किसी बात पर किसी ने जिक्र के दौरान किसी चीज का रंग बताते हुए एक प्रमोशन और दे दिया..कि अमुक वस्तु लगभग चॉकलेट कलर की है लगभग तुम्हारे कलर के जैसी ही. आह!! वाह!! चॉकलेट कलर!! अब मैं तो इसे भी प्रमोशन ही मान कर चल रहा हूँ.

साधना को भी बता दिया है कि आज से हमारा रंग अंग्रेजी में चॉकलेटी..अब उसकी तरफ से एक गज़ल लिखूँगा..मिसरा है:

मेरा सजन चॉकलेटी, मैं वारी वारी जाऊँ.. :)

 

वैसे, कभी सोचता हूँ कि अगर रंग होते ही न तो क्या होता? दुनिया भले बेरंग होती मगर रंग भेदियों की जमात से तो कितनों को मुक्ति मिल गई होती. लेकिन इन्सान तो इन्सान है, तब झगड़ने का कोई और मुद्दा निकाल लेता.

नोट:
कृपया कोई भारतीय पुरुष सिर्फ इसलिए इस बात से आहत न महसूस करे कि उसे सब रंग मालूम हैं, अपवाद हर तरफ होते हैं और अगर आपको सारे रंग मालूम हैं तो आप अपवाद की श्रेणी के कहलाये.

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बुधवार, मई 19, 2010

बहता दरिया है शब्दों का!!

जबलपुर प्रवास में शायद ही कोई ऐसा सप्ताह गुजरता हो जब हमारी और बवाल की अकेले महफिल न जमें. फिर लगभग हर दूसरे तीसरे दिन कहीं न कहीं महफिल जमीं रहती, कभी लोक गीतों की, कभी गज़लो की तो कभी कव्वालियों की तो कभी कविताओं की, उसमें तो खैर बवाल और संजय तिवारी ’संजू’ साथ होते ही.

लाल-बवाल बैठक हो और कोई नई गज़ल, नया गीत न उपजे हमारी कलम से और उसमें बवाल का पुट और फिर गीतों को सुर ताल में ढालना न हो बवाल के द्वारा तो फिर कैसी महफिल.

इसीलिए जब भी भारत जाता हूँ और जबलपुर कितने भी दिन रह जाऊँ, कम ही लगता है. अगर कोई दीगर जरुरी काम न हो और रात घिरे तो यह मान ही लिजिये कि कहीं महफिल जमी है.

उन्हीं महफिलों के दौर में यह गीत उपजा था. बवाल ने इसे अपने स्वर में गाया भी बहुत जबरदस्त था लेकिन वो आलसी इतना कि आज तक रिकार्डिंग ही नहीं मुहैया करा पाया.

शुरु से साथ रहा, छोटा है तो मूँह लगा होना तो स्वभाविक है, इसलिए कुछ कह भी नहीं पाते सिवाय आलस्य त्यागने के लिए लताड़ने के सिवाय. जब लताड़ो, उनका क्या: हँस दिये और कहने लगे, जय हो, महाराज!!

आज सोचा कि अब कब तक गायन का इन्तजार किया जाये, जब आयेगा तब फिर से. रीठेल पर कोई रोक तो है नहीं, फिर लगा देंगे. रोक तो किसी बात पर नहीं है, अभी कोई उठ खड़ा हो और इसकी पैरोडी गाने लगे, तब भी कैसी रोक.

आज टहलते हुए राह में..

बहता दरिया है शब्दों का,
तुम छंदों की कश्ती ले लो!
जब गीत कमल खिल जाएँ तब,
तुम भँवरों की मस्ती ले लो!!

टूटे-फूटे थे शब्द वहाँ,
फिर भी वो गीत रचा लाया!
कोई बहरों वाली बात न थी,
फिर भी वो ग़ज़ल सजा लाया!!

परिहासों की उस बस्ती का,
संजीदा हुक्म बजा लाया!!!
उसने सीखा खाकर ठोकर,
तुम सीख यहाँ यूँही ले लो
बहता दरिया है शब्दों का
तुम छंदों की कश्ती ले लो!

ये मज़हब-वज़हब की बातें,
आपस के रिश्ते तोड़ रहीं!
और सहन-शक्तियाँ भी अब तो,
दुनिया भर से मुँह मोड़ रहीं!!

धर्मों के झूठे गुरुओं की,
तक़रीरें हृदय झंझोड़ रहीं!!!
या दाम चुका कर लो नफ़रत,
या दिल की प्रीत युँही ले लो
बहता दरिया है शब्दों का
तुम छंदों की कश्ती ले लो!
आदर्शों और बलिदानों की,
उसको तो रस्म निभानी है!
हाँ मातृ-मूमि पर न्यौछावर,
होने की वही जवानी है!!

हृदयों को जिसने है जीता,
उसकी ही कोकिल बानी हैं !!!
दिन रोकर काटो या हँसकर,
जो चाहो रीत, यहीं ले लो
बहता दरिया है शब्दों का
तुम छंदों की कश्ती ले लो!


(इस गीत को जब मैने लिखा था, तभी चार जगह तो बवाल नें कैची चला ही दी थी गाते गाते..अब जब सच में गा कर रिकार्ड करेगा तो जाने क्या निकल कर आये. :))

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सोमवार, नवंबर 09, 2009

चिट्ठाचर्चा और मैं..

कल रात वापस लौट आये दो दिवसीय मॉन्ट्रियल यात्रा से. कोई विशेष उल्लेखनीय कुछ भी नहीं. चाहें तो कहानी बनायें मगर अभी उद्देश्य कुछ और ही है.

शुक्रवार को मॉन्ट्रियल जाना पड़ा. वही ५.३० घंटे में ६०० किमी पूरा करने की आदत जिसमें आधे घंटे की कॉफी ब्रेक भी ली गई. एक बार आदत हो जाये तो कोई विशेष प्रयास नहीं करने होते. गाड़ी चालन में टोरंटो से मॉन्ट्रियल और वापसी भी आदत का हिस्सा सा ही बन गई है. बिना प्रयास ५.३० घंटे में जाना और उतने ही घंटे में वापसी.

कुछ ऐसा ही मेरे साथ टिप्पणी करने में भी है. कुछ खास प्रयास नहीं करने होते. बस, कुछ पढ़ा उर टिप्पणी हो ही जाती है. शायद आदत हो गई है इसलिए.

जब से ब्लॉग जगत में आया तकरीबन तब से ही चिट्ठाचर्चा पढ़ना भी आदत में शुमार हो गया. अच्छा लगता था सभी उल्लेखनीय पोस्टों की चर्चा एक ही जगह पढ़कर. जब भी कुछ लिखता था, इच्छा होती थी कि उसका उल्लेख भी चिट्ठाचर्चा में हो. शायद मेरे जैसे ही बहुतों को होती हो. फिर जब अपना उल्लेख चिट्ठाचर्चा में आया देखता तो मन पुलकित हो उठता.

सोचा करता था कि यह चर्चाकार किस आधार पर पोस्टों का चुनाव करते होंगे. कितना पढ़ना पड़ता होगा उन्हें, तब जाकर चर्चा कर पाते होंगे.

हमेशा कुछ ऐसे ही भाव मन में उमड़ते घुमड़ते रहते थे कि एकाएक एक दिन अनूप फुरसतिया जी ने मुझसे चिट्ठाचर्चा करने के लिए कहा. यकीन जानिये, पहली चर्चा करने के लिए मात्र लगभग १५ पोस्टों को मैने सारा दिन पढ़कर तब शाम को चर्चा की घबराते हुए.

अनूप जी और अन्य साथियों का खूब सहयोग और प्रोत्साहन मिला. फिर तो नियमित चर्चा करने की आदत सी बन गई.

मुझे याद आता है, उस वक्त संजय बैंगाणी जी मध्यान चर्चा किया करते थे. तब इतनी कम पोस्टें आती थी कि अक्सर मध्यान चर्चा में ही सारी पोस्टों का जिक्र हो जाता था तो रात में हमारे पास चर्चा करने को कुछ बाकी ही नहीं रह जाता था.

फिर जब पोस्टों की संख्या बढ़ने लगी तो बहुत प्रयासों के बाद भी बहुत सी पोस्टों का जिक्र छूट जाता. हमारे साथ रचना बजाज जी जुड़ीं और हम और रचना जी मिलकर अपने निर्धारित दिन चर्चा करने लगे..आधी हम लिखकर भेज देते और आगे आधी वो.

बहुत यादगार पल गुजरे चिट्ठाचर्चाकार मण्डली के सदस्य की हैसियत से. कभी मतभेद भी हुए, हिन्द युग्म में कॉपी पेस्ट का ताला लगा तो अच्छा खासा तूफान भी खड़ा किया इसी मंच से. फिर सब मामला रफा दफा हो गया. उस वक्त के विवादों में अच्छाई यह होती थी कि न तो कभी वो बहुत व्यक्तिगत हुए न ही कभी दीर्घकालिक. अनेक मुण्डलियाँ रची गई, लोगों द्वारा पसंद की गईं.

मुझसे एक दिन पहले शायद मंगलवार को गीतकार राकेश खण्डॆलवाल जी गीतों में चिट्ठाचर्चा किया करते थे जो कि चिट्ठाकारों के बीच खासा लोकप्रिय था.

समय बीतता रहा. अक्सर कोई चर्चाकार व्यक्तिगत वजहों से अपने निर्धारित दिन चर्चा न कर पाता तो अनूप जी डंडा लिए खड़े नजर आते कि चलिये, आज आप चर्चा किजिये. कभी अनूप जी लखनऊ निकल लिए तो टिका गये.

जब हम जरा सीनियर हुए चर्चामंडल में, तो हम भी यह गुर सीख गये और अपना निर्धारित दिन लोगों को टिकाने लगे.

टिकाते टिकाते मौका देखकर कब हम इस जिम्मेदारी से निकल भागे, खुद को भी समझ नहीं आ पाया.

फिर आदत तो आदत होती है, चर्चा न करने की आदत नई लग गई. आराम तो मिलने ही लगा जिम्मेदारी से भाग कर. बस, भाग निकले. निट्ठल्लों को भी निट्ठलाई में कितना आनन्द आता है, यह तब जाना और आज तक उसका आनन्द उठा रहे हैं जैसे हमारे नेता, फिर देश जाये भाड़ में, की तर्ज पर हमने भी चिट्ठाचर्चा तज दी.

जब आपको मेहनत न करनी हो, तो नुस्ख निकालना सरल होता है और अपने मेहनत न कर पाने की हीन भावना को मलहम भी लग जाता है, गल्तियाँ निकाल कर. सो, अन्य अनेकों की तरह आजकल वह भी कर लेते हैं कभी कभी. बड़ा स्वभाविक सा प्रोगरेशन है.

इन सबके बावजूद, आज भी जब कभी पोस्ट लिखते हैं तो उसके बाद आई चिट्ठाचर्चा में नजर अपनी पोस्ट तलाशती जरुर है. भले ही वो मिले या न मिले.

आज पता चला कि चिट्ठाचर्चा मंच से १००० वीं पोस्ट आ रही है. इस ऐतिहासिक दिवस पर इस मंच का हिस्सा होने का गर्व है, प्रसन्नता है और मेरी समस्त शुभकामनाएँ इस मन्च को और इससे जुड़े तमाम लोगों को.

आशा करता हूँ कि समय के साथ मंच और सुदृढ़ होता जायेगा और नये कीर्तिमान स्थापित करेगा.

हार्दिक बधाई एवं अनन्त शुभकामनाएँ.

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