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शुक्रवार, नवंबर 11, 2022

डे लाईट सेविंग – एक गुदगुदाता सा मजाक

 

     Sometime falling back is good- it gives you one hour of extra sleep 


जब दिन और रात दोनों में रोशन है यहाँ

हर इक बुलंद इमारत का हर कोना कोना

उन जगमग एलईडी लाइटों की रोशनी से

रोशन धूप दुपहर मे भी न जाने किस अबुझ

चौंधआई आँखों के परे अंधेरे को चुनौती देता हुआ

मानिंद अखंड भारत को बेवजह जोड़ने का प्रयास

कुछ यूं ही तो प्रतीत होता ये एक नया फलसफा   

तब आज इस नवंबर के महीने के शुरुवाती दौर में  

सोचता हूँ क्यूँ अनायास घड़ी की सुई घूम जाती है

अपने आज के समय से एक घंटे पीछे की तरफ

एक रिवाजतन उस डे टाइम सेविंग के नाम पर,

क्या पता कुछ थके हारे लोग राहत पा जाते हों  

इसी बहाने निद्रामग्न एक घंटा और नींद निकाल

या किसी और को बोनस में मिल जाता है यूं ही  

एक घंटा और बेशकीमती इसी फिसलती जिंदगी का

और वो यूं ही कह उठता हो वाह कमाल है जिंदगी!!

और मैं न जाने क्यूँ सोचता रह जाता हूँ नाहक ही

यूं इस तरह बेवजह ही इस समय की बर्बादी क्यूं?

मशीनवाली घड़ी की सुई कब से तय करने लगी है  

मेरे अपने ही दिल के जज़्बातों की गहरी गहराईयां

मेरे अपने मन में पलते ख्वाबों की ऊँची ऊँचाईयां?

मैं नहीं सुनता आजकल एक और घड़ी की झंकार

मैं नहीं सोता आजकल पुनः फिर सुनकर ये हुंकार

कि मेरे अलावा सा है मेरा यह ख्वाबों का संसार!!

-समीर लाल ‘समीर’

  

 दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंट मे आज दिनांक 11-11- 2022 को 

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मंगलवार, सितंबर 20, 2022

नीले पानी का पुल

पानी भी पुल बन जाता है
उस नदी के इस पाट पर
जहाँ मिलते हैं दो किनारे
उस नीले पानी के सहारे-
पानी भी पुल बन जाता है
गर तुम्हारी गहरी सोच को
तैराकी में महारत हासिल हो!!
वरना कई पानी पर चलते देवता
उसी नदी में समाधिस्त बैठे हैं।
नदी का तो बस काम है बहना
नदी आज भी अविरल बहती है!!
मगर हर नदी की गहरी तलहटी में
एक ठहरा हुआ अडिग तटस्थ थल है!!
वो कहीं नहीं जाता नदी के साथ
थमा हुआ साक्षी है असंख्य जलधाराओं का -
कोई उस नदी को माता पुकारे तो क्या?
कोई उस नदी को जलधारा पुकारे तो क्या?
-समीर लाल ‘समीर’
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मंगलवार, अप्रैल 11, 2017

कल हो न हो!!



कुछ उलझन को सुलझाने में..
नादां दिल को समझाने में..
बीती, फिर  रात बिताने में..
उगती सुबह को सजाने में
अपने रुठों को मनाने में..
कोई बिगड़ी बात बनाने में….
कुछ  यादों में खो जाने में..
खुद को कुछ देर रुलाने में..
खोई कोई साख जुटाने में.
टूटे रिश्ते के जुड़ जाने में..
सब कुछ खोकर कुछ पाने में
हम गुम हो गये  जमाने में..

कुछ जामों के  टकराने में..
कुछ बहके कदम बढ़ाने में..
नासूरों  के भर जाने में
कुछ जख्म हरे हो  जाने में
हर झूठ को सच बतलाने में
और सच को यूँ झुठलाने में..
उसको नीचा दिखलाने में..
खुद को हर पल भरमाने में..
इस जीवन को जी जाने में..
और जीते जी मर जाने में..
सब कुछ खोकर कुछ  पाने में
हम गुम हो गये हैं जमाने में..

सोचो गर ये जो सोच सको
कल रो कर न हँस पाये तो..
चुप रह कर न कह पाये तो
मन ही मन हम पछताये तो
कल सोकर  उठ पाये तो..
बस रह जायेंगे अफसाने में..
सब कुछ खोकर
क्या पाने में?
हम गुम हो गये हैं जमाने में..

इस जीवन को जी जाने में..
और जीते जी मर जाने में..
सब कुछ खोकर ! क्या  ? पाने में
हम गुम हो गये हैं जमाने में..
-समीर लाल समीर

नोट: मित्र पुष्पेन्द्र पुष्प की दो पंक्तियाँ पढ़ी..और बह निकली एक पूरी रचना..कुछ बरस पहले...


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सोमवार, दिसंबर 19, 2016

मैं बेवफा सही..वादा फरामोश नहीं..


कभी मेरा मन था कि
एक कानूनी कागज पर
शपथ पत्र की शक्ल में
अपनी मोहब्बत
और
वफा की दुहाई
दर्ज कर रख छोडूँ तुम्हारे हवाले..
ताकि एक सनद मुझे रोके और बाध्य करे,
मेरे लिए बेवफा होना कानूनी अपराध हो जाये...
मगर हालिया हालातों ने
मेरी सोच को लगाम दी है..
जब नोट पर लिखे वादे से
सरकार मुकर जाती है..
तो बेहतर है कि हम मोहब्बत करने वाले
एक ही इल्जाम सर पर लेकर जायें
और वो हो बस बेवफाई का...
कम से कम वादा खिलाफी का इल्जाम
तो हम मोहब्बत करने वालों पर न आयेगा..


-समीर लाल ’समीर’

चित्र साभार: गुगल
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शनिवार, अक्टूबर 29, 2016

दीपावली पर सफाई



उस रोज जब अपनी संक्षिप्त भारत यात्रा के दौरान उनके घर मिलने पहुँचा तो देखा पूरा परिवार पूरे जोर शोर के साथ साफ सफाई में जुटा है. पता चला कि दीपवली की सफाई चल रही है.
दीपावली पर धार्मिक मान्यता है कि पूरे घर की साफ सफाई और पुताई करना चाहिये..इससे लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है.
अब अगर साल भर गंदा नहीं करोगे तो फिर भला साफ क्या करोगे? इसी धार्मिक बाध्यता के चलते साल भर पलंग के नीचे सामानों की भराई और अलमारी के उपर सामानों की चढ़ाई नित जारी रहती है.
ठीक दीपावली के पहले, कमरों में साल भर पलंग के नीचे खिसकाया और अलमारी के उपर चढ़ाया गया सामान पलंग के उपर पर निकाल कर रखा जाता है..फिर उसमें से बेकार का सामान और कचरा, छाँटा बीना और बाँटा जाता है और बाकी का साफ सूफ करके पुनः रख दिया जाता है.
मकड़ियाँ और छिपकलियाँ भी जानती है कि ये सब दीपावली का तमाशा है जो लगभग हफ्ते भर तक चलता रहेगा अतः एक हफ्ते के लिए वो भी किसी सीढ़ी के नीचे या छज्जे के उपर अनजान कोने में जाकर छिप जाती है और दीपावली गुजरते ही पुनः अपने पूर्ववत स्थायी पते पर लौट आती हैं -अगले एक बरस तक के लिए बिना किसी खटके के शांतिपूर्ण जीवन जीने के लिए. उन्हें देखकर लगता है जैसे कि पुलिस टीम ने किसी सरकारी मुहिम के तहत सड़क के किनारे रेहड़ी लगाने वाले अवैध कब्जाधारियों को खदेड़ा हो, जिन्होंने पुलिस की दबिश खत्म होते ही वापस आकर पुनः पूर्ववत कब्जा जमा लिया हो.
मुझे अच्छा लगता है दीपावली के पहले इस तरह सालाना साफ सफाई का अभियान देखना हर घर द्वार पर.
सोचता हूँ कि यह पिछले साल के कचरे की सफाई की है या अगले साल का कचरा इक्कठा करने की जगह बनाई है.
फिर दीपावली की दिन से ही शुरु हो जाता है एक नया साल गंदगी फैलाने का.. बम, पटाखों, लड़ियों को रात भर सड़कों पर फोड़ फोड़ कर उनकी गन्दगी फेला कर मानो नये सिरे से गंदगी फैलाने का आगाज किया हो ...
जिज्ञासु मन मित्र से पूछ बैठा कि इतने सारे सामान की सफाई कैसे करते हो?
मित्र ने यह कहते हुए ज्ञान दिया कि अगर सफाई करनी है तो बस दो ही तरीके हैं..एक तो सारे के सारे सामान को कचरा मान कर एक जगह इक्कठा कर लो ..और फिर उसमें से जो अच्छा अच्छा काम योग्य हो, उसे निकाल कर साफ सूफ करके वापस जमा कर रख दो..बाकी का बचा सामान मसलन कटे फटे या छोटे हो चुके कपड़े, जूते, टूटे बरतन, सूटकेस आदि ...जो बांट दिये जाने योग्य है नौकर चाकर को देकर दानवीर की तरह मुस्कराओ और बाकी का बचा कचरे में बाहर निकाल फेंको.
दूसरा...सब सामान जैसे रखा हुआ है वैसा ही रखा रहने दो और उसमें से कचरा छांट छांट कर अलग कर दो..यह तरीका थोड़ा ज्यादा मेहनत माँगता है...मगर सामान को फिर से जमाने की झंझट भी तो कम हो जाती है.
उनकी बात सुनकर मुझे एकाएक अभी हाल में जाना सफाई का तीसरा तरीका याद हो आया,,,
इसका हालांकि दीपावली से कुछ लेना देना नहीं है,...इसमें तो बस जब भी किसी सांसद महोदय या मंत्री जी से समय मिल जाये - सफाई की घोषणा कर दो...कचरा मंगवाओ...कचरा फैलवाओ...कचरा झाडू से किनारे करते हुए सांसद महोदय या मंत्री जी के साथ..फोटो खिंचवाओ...अखबारों में छपवाओ और सोशल मीडिया पर चढ़ाकर मस्त हो जाओ..हैश टैग #CleanIndia.#स्वच्छभारत……..बस्स!
वैसे सही मायने में ऐसा संपर्क और अपनी राजनैतिक पैठ बनाने का ऐसा मौका हाथ लगना भी कोई दीपावली से कम तो नहीं..ऐसा मौका सबको नहीं मिलता है...इसके लिए भी लक्ष्मी गणेश की विशेष कृपा चाहिये...

-समीर लाल समीर’ 
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