शनिवार, जून 18, 2022

नमन चिन्तक के चिंतन को!!

साहित्यकारों में कोई कहानीकार होता है, कोई व्यंग्यकार होता है, कोई गीतकार होता है. माननीय स्वयं को चिन्तक बताते हैं. लोग भूलवश उनका परिचय मात्र साहित्यकार के रूप में दे देते हैं तो वह स्वयं माइक पर जाकर भूलसुधार करवाते कि बताइये सबको कि मैं मूलतः चिन्तक हूँ एवं यही मेरी साहित्य साधना का मूल है. चिन्तन करते करते वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि लोगों में साहित्यिक चेतना विकसित करना उनके अन्य चिन्तन कार्यों में व्यवधान डाल रहा है अतः उन्होंने अपना तखल्लुस ही चिन्तक रख लिया. राधे श्याम तिवारी ‘चिन्तक’.

चिन्तक हैं तो विभिन्न विषयों पर चिंता स्वाभाविक है. आज उनसे जब उनकी चिंता का विषय जानना चाहा तो बड़ी मुश्किल से खुले. कहने लगे यार, कमाने की तो इच्छा ही मर गई. लिखने से मन हट गया. मैंने उनसे कहा कि माननीय आप तो हिंदी के साहित्यकार हैं. आपकी कमाने की इच्छा और लेखन दो दीगर विषय हैं. इन्हें एक साथ जोड़ कर क्यूँ चिंतित होते हैं? आप अपना लेखन जारी रखें और जहाँ तक कमाई की इच्छा है वो तो पेट अपने आप उसे जगवा देगा. आप ट्यूशन पढ़ा कर काम भर का कमा लेते हैं, काहे चिंतित होते हैं?

कहने लगे तुम नहीं समझोगे. विचार यूँ था कि ये ट्यूशन वगैरह का झंझट कुछ दिनों में छोड़ कर पूर्णकालिक लेखक हो जायें. फिर लेखन की कमाई से ख़ुशी ख़ुशी जीवनयापन करें और विश्व भ्रमण कर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चिन्तन किया जाए.

मुझे ज्ञात है कि चिन्तक महोदय मदिरापान या अन्य किसी नशाखोरी में लिप्त नहीं हैं फिर इस तरह की बहकी बहकी बातें? हिंदी लेखन और कमाई? मानो कि राजनीतिज्ञ और ईमानदारी? बहुत मुश्किल से हंसी रोक पाया और मैंने जानना चाहा कि कहीं आप चिन्तक के बदले व्यंग्यकार तो नहीं बनने की कोशिश कर रहे हैं?

कहने लगे ‘मरा हाथी भी तो सवा लाख का’..इतना थोड़ी गिर जाऊँगा. चिंता ये नहीं है कि कमाई कैसे होगी- चिंता यह है कि २८% जीएसटी और फिर इनकम टैक्स भरने के पैसे कहाँ से आवेंगे?

मैंने उन्हें समझाया कि हिंदी लेखन में कमाई है ही कहाँ, जो आप टैक्स की चिंता कर रहे हो?

उन्होंने समझाया कि देख भई, यूं तो न किसी के पास समय की कमी है और न देश में रेल ट्रैक के हालात ऐसे है, फिर भी साहेब बुलेट ट्रेन की चिंता कर ही रहे है न ताकि लोगों का समय बचाया जा सके?

इस तर्क पर भला मैं क्या कहता?

नमन कर वापस चला आया.


-समीर लाल ‘समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जून 19,2022 के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/68698291

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रविवार, जून 12, 2022

देखो!! हम अब वरिष्ठ लेखक हो गये हैं!!


डेश बोर्ड, रिपोर्ट कार्ड, पॉवर पाईन्ट डेक, स्कोर कार्ड की तरह ही न जाने कितने नाम हैं, जो कारपोरेट वर्ल्ड से निकल कर पॉवरफुल सरकारी दुनिया में राजनिति चमकाने के लिए आ समाये. इनको बनाना, इनको दिखाना, इनके बारे में बताना ही अपने आप में इतना भव्य हो गया कि जिन कामों को दर्शाने के लिए यह सारे आईटम कारपोरेट वर्ल्ड में बनाये जाते हैं, वो यहाँ नगण्य होकर रह गये.

फलाने मंत्रालय का प्रेजेन्टेशन, सरकार का १०० दिन का रिपोर्ट कार्ड, स्मार्ट सिटी परियोजना का डेशबोर्ड, फलाने मंत्री का स्कोर कार्ड तो खूब सुनाई पड़े और दिखे मगर कार्य क्या हुए, विकास का क्या हुआ? वो ही न तो दिखाई दिया और न सुनाई पड़ा. धीरे धीरे इन प्रेजेन्टेशनों की ऐसी धज्जी उड़ी कि विकास और क्या किया दिखाने की बजाये, पिछले ७० सालों में क्या नहीं हुआ, वो दिखाने में ही मगन हो लिए. अब तो स्कोर कार्ड और रिपोर्ट कार्ड के नाम पर पिछली सरकारों की नाकामियों की रिपोर्ट ही आती है. इनसे पूछो कि चलो उन्होंने कुछ नहीं किया मगर तुमने क्या किया वो तो बताओ? इस पर वो कहते हैं कि हमने इतनी रिपोर्टें बना डाली वो ही क्या कम है?

प्रेजेन्टेशन और मार्केटिंग का जमाना है, फिर वो भले दूसरों की नाकामियों का ही क्यूँ न हो? जब खुद से बड़ी रेखा न खींची जा सके तो दूसरे की खिंची हुई रेखा को पोंछ कर छोटा करने के सिवाय और विकल्प भी क्या है, खुद को बड़ा दिखाने के लिए? अब तो हद यहाँ तक हो ली है कि पोंछ कर छोटा करना भी बड़ा दिख पाने के लिए काफी नहीं है क्यूँकि कुछ दिखाने को है ही नहीं, तो पूरा मिटा ही देने की कोशिश है. खुद उनके वरिष्ट कह गये कि कॉपी में कुछ लिखा हो, तब तो नम्बर दूँ.

ऐसा माना जाने लगा है कि अगर कुछ किया भी हो तो भी बिना प्रजेन्टेशन के लिए आजकल नहीं दिख पाता. इस चपेट में हम लेखक वर्ग भी हैं. अखबार में छप भी गये तो संतोष नहीं है. हमें तो लगता है कि कैसे सबको बतायें कि अखबार में छप लिए हैं. फिर अखबार की कटिंग फेसबुक पर, ईमेल से, ट्वीटर पर, व्हाटसएप के सारे ग्रुपों पर, फेसबुक मेसेन्जर से, टेक्स्ट मैसेज से और फिर ब्लॉग पोस्ट से. पढ़ने वाला थक जाये मगर हम बताते बताते नहीं थकते. हमारा बस चले तो उसी अखबार में एक विज्ञापन भी लगवा दें कि देखो, हम फलाने पेज पर छपे हैं. सरकारों का बस चल जाता है तो लगवाती भी हैं विज्ञापन कि देखो, हमने फलाँ जगह यह किया, वो किया.

सोच की चरम देखो कि फेसबुक पर लगाने के बाद भी यह चैन नहीं कि सारे मित्र देख ही लेंगे अतः उनको टैग भी कर डालते हैं और ऊपर से छुईमुई सा मिज़ाज ऐसा कि कोई मित्र मना करे कि हमें टैग मत किया करो, हम यूँ ही देख लेते हैं तुम्हारे पोस्ट, तो उसको ब्लॉक ही कर मारे कि हटो!! हमें नहीं रखनी तुमसे दोस्ती. वही तो होता है वहाँ भी कि वो बोगस विडिओ भेजें और आप उसका ओरिजनल विडिओ लगा कर बता दो कि तुमने बोगस डॉक्टर्ड विडिओ लगाया है. बस!! आप देशद्रोही हैं और पाकिस्तान जा कर बस जाईये के कमेन्ट के साथ आप ब्लॉक!!

वैसे सच बतायें तो अखबार में छ्प जाने से बड़े लेखक हो जाने की फील आ जाती है. जैसे की कोई सांसद सत्ता पक्ष का मंत्री बन गया हो वरना तो होते तो निर्दलीय सांसद भी हैं. हैं भी कि नहीं कोई जान ही नहीं पाता. मगर फिर भी निर्दलीय के सांसद होने और अनछपे के लेखक होने से इंकार तो नहीं ही किया जा सकता है.

फिर सत्ता पक्ष का मंत्री अपना चार छः गाड़ियों का असला लेकर सिक्यूरीटी के साथ लाल बत्ती और सायरन बजाते न चले तो कौन जानेगा कि मंत्री जी जा रहे हैं. शायद यही सोच कर हम भी हर संभव दरवाजे की घंटी बजाते हैं कि लोगों को पता तो चले कि हम अब वरिष्ठ लेखक हो गये हैं.

देखो!! हम आज के अखबार में छपे हैं.

-समीर लाल ’समीर’


भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जून 12,2022 के अंक में:

https://www.readwhere.com/read/c/68587190



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शनिवार, जून 11, 2022

आजादी के इन्तजार में!!

हरि बाबू  गांव के सबसे बुजुर्ग रहे होंगे. टूटती काया, माथे पर चिन्ता की गहरी गहरी लकीरें, मोटे से चश्में से ताकती बुझी हुई आँखें, शायद ८४ बरस की उम्र रही होगी. हर दोपहर वो अपने अहाते में कुर्सी पर धूप में बैठे दिखते मानो किसी का इन्तजार कर रहे हों.

दो बेटे हैं. शहर में रहते हैं और हरि बाबू यहाँ अकेले. निश्चित ही बेटों का इन्तजार तो नहीं है, क्योंकि हरि बाबू जानते हैं कि वो कभी नहीं आयेंगे. बहु और बच्चों के लिए हरि बाबू अनपढ़ और देहाती हैं, तो हरी बाबों के उनके वहाँ जाने का भी प्रश्न नहीं. फिर आखिर किसका इन्तजार करती हैं वो आँखें? माथे पर यह चिंता की लकीरें किस बात के लिए.  कहते हैं जब कोई उम्मीद बाकी नहीं रह जाती, तब भी किसी चमत्कार का इन्तजार लगा ही रहता है और वही चिन्ता का कारण भी बन जाता है.  बात सही भी लगती है.  सारा देश जाने किस चमत्कार के इन्तजार में टकटकी लगाए बैठा ही है.      

उम्र की मार के कारण हरि बाबू की स्मृति धोखा देती है, पर बेटों से थोड़ा कम. आसपास देखी घटनायें ४-६ दिन तक याद रह जाती हैं. कुछ पुरानी यादें भी और कुछ पुरानी बातें भी, कुछ टीसें-नश्तर सी चुभती हैं. इतना सा संसार बना हुआ है उनका और उसी में वो जिये जा रहे हैं. यही आधार है उनका और उनकी सोच का. कभी कभी गली के कोने तक चल कर जाते हैं और शहर से आते हुए राजमार्ग की तरफ बहुत दूर तक नजर दौड़ाते हैं और वापस लौट आते हैं.  

अकेले आदमी की भला कितनी जरुरतें? खुद से थोप थाप कर एक दो रोटी, कभी गुड़ तो कभी सब्जी के साथ खा लेते हैं और अहाते में बैठे-बैठे दिन गुजार देते हैं. बोलते कुछ नहीं. न ही कभी मुस्कराते हैं.  

जब मुझसे नहीं रहा गया तो एक दिन उनके पास चला गया. हमदर्दी से ज्यादा जिज्ञासावश पूछ बैठा कि ’चाचा, किसका इन्तजार करते हो? किस बात की चिन्ता में रहते हो?

हरि बाबू पहले तो चुप रहे और फिर धीरे से बोले,’देश आजाद हो जाता तो चैन से मर पाता. बस वही इन्तजार लगा है और इसी बात की चिन्ता खाये जाती है.

मैं हँसा. आजादी को लेकर भले ही कितना कन्फ्यूजन पसरा हो आजकल मगर अब देश आजाद है यह तो सब ही मान चुके हैं.  मैने कहा कि ’चाचा, देश तो कब का आजाद हो गया…. देश को आजाद हुए तो ७५ बरस हो गये. सन ४७ में ही आजाद हो गया था.’

अरे वाह! देश तो आजाद हो गया…. सुनते ही एकाएक हरि बाबू के होंठों पर एक मुस्कान फैली और चेहरा बिल्कुल चिन्ता मुक्त, जाने कितना बड़ा बोझ उतर गया हो. फिर उन्होंने दीवाल का सहारा लेकर आंखे मुंद ली.

हरि बाबू नहीं रहे.

-समीर लाल ‘समीर’

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रविवार, जून 05, 2022

मन की हारे हार है, मन के जीते जीत!

 


कल शाम ५ बजे बेटे के घर से अपने घर जाने के लिए निकलने के पहले खिड़की से झांक कर देखा तो हर तरफ एकदम अँधेरा एवं सड़कों पर सन्नाटा दिखा. सर्दियों की शाम वो भी शनिवार को..यही माहौल होता है यहाँ कनाडा में. अपनी कार घर के पास के स्टेशन पर छोड़ आया था अतः बेटे ने बस स्टेशन तक पहुँचा दिया. बाकी का सफर बस एवं ट्रेन से करना था.

मैं जब घर से निकला था तो टीवी पर कोने में तापमान दिखा रहा था -१२ डिग्री सेन्सियस. उस हिसाब से एक मोटा जैकेट पहन कर निकल लिया था. कार गरम थी पता न चला मगर बस स्टेशन पर सामने से आती बस का ३ मिनट का इन्तजार भी ऐसा लगा कि मानो बरफ की सिल्ली पर लेटे हों. लगा कि वाकई अगर डेथ बाडी की डेथ न हो गई होती तो वो बरफ पर लिटाने के लिए पूरे घर वालों की ऐसी तैसी कर डालता. हमें तो दया सी आने लगी डेथ बाडियों पर कि कैसे लेटती होंगी? शायद यह सोच कर झेल जाती होंगी कि इकलौता बेटा आ रहा है अमरीका से. आकर चिता पर आराम से लिटा कर आग लगायेगा तो ठंड से निजात पा जावेंगे. बेटा कितना ख्याल रखता है सोच कर उसकी आँखे भर आती होंगी बरफ पर लेटे लेटे. वो तो भला हो बरफ का कि उसकी चुअन में आंसू छिप गये वरना लोग कित्ता कमजोर समझते उसे. उसे तो अंदाज भी न होगा कि ठंड से निजात दिलाने के बाद बेटा तुरंत ही जमीन जायजाद से भी निजात दिला कर वापस अमरीका लौट लेगा फिर कभी न आने के लिए.

मैं ठंड से कुड़कुड़ाते हुए बस में बैठा तो देखा कि बस में मात्र ड्राईवर साहब हैं, जिनकी सीट पर लिखा था पायलट और दूसरा मैं, ५० सीटों वाली बस में अकेला यात्री, मेरी सीट पर लिखा था पैसेन्जर. न लिखते तो चेहरा और रुप रंग देख कर कोई अनुमान लगा सकता था कि शायद मैं कन्डक्टर हूँ और फिर उसकी निगाह ड्राईवर साहब की सीट की पायलट लिखी पट्टी पर पड़ती तो मुझे एयर होस्टेस मानने को तो कतई तैयार न होता. लिखे का बहुत अंतर पड़ता है वरना कभी वीवीजआईपी सीटों पर बैठे लोगों को सिर्फ चेहरे के आधार पर आंकना हो तो पन्डाल में दरी पर बैठने का भी मुश्किल से नम्बर आये.  सब झांकी कैसे सजाई और दिखाई गई पर निर्भर करता है. वरना तो क्या पंत प्रधान, क्या पी एम, क्या प्रधान सेवक – सब एक ही बात है. प्रस्तुतिकरण का अंदाज बदल बदल कर एक नया तमाशा दिखाना होता है. जनता के हाथ तो हर हाल में सिफर ही आना है.

तकरीबन १०० किमी की इस यात्रा में मेरे जैसा सहृदयी व्यक्ति अगर साथ न देता तो बस में अकेला ड्राईवर चला जा रहा होता. उसकी तो खैर नौकरी है. मगर देश का तो नुकसान होता ही, इतनी लम्बी यात्रा और कोई आया ही नहीं साथ निभाने. राष्ट्र की विकास यात्रा में भी अगर लोग साथ नहीं देंगे तो बस वो भी एक नुकसान का कारण ही बन कर रह जायेगी. सब को साथ देना चाहिये इस विकास यात्रा में जितना बन सके. तभी उन्होंने बोला होगा कि सब का साथ, सबका विकास. वे जानते हैं बिना सबके साथ के कुछ होगा नहीं भले ही यूँ अह्म ब्रह्म का जयकारा भरते हों.

बस गरम थी सो राहत तुरंत मिल गई. फोन पर समाचार सुनने लगा. समाचारवाचक बोला कि अभी का तापमान -१२ डिग्री है याने मैने ठीक देखा था और उसी के हिसाब से तो तैयार भी हुआ था, फिर क्यूँ ठंड बर्दाश्त न हुई? समाचरवाचक जारी था- किन्तु हवा के साथ साथ यह तापमान -२५ डिग्री महसूस होगा. ओह!! यह मैं देखने से चूक गया था. मन में आया कि टीवी वाले को फोन करके गरियाये कि महाराज, -१२ भले हो उससे मुझे क्या करना? जब मुझे ठंड -२५ की लगना है तो वो ही बताओ न!! उसी हिसाब से तैयार होता.

जुमलेबाजी का ऐसा फैशन चला है कि किसी फील्ड को न छोड़ा. जीडीपी के आंकड़े भले गिर गये हों, जीएसटी से व्यापारी की कमर टूट गई हो, गल्ले में कैश के नाम पर बस दिवाली पर चढ़ाये १०१ रुपये ही पड़े हों मगर भाषणों से आपको महसूस होगा कि व्यापार बहुत बढ़ा है और व्यापारी वर्ग चहुं ओर खुशियाँ मना रहा है. नोटबंदी एकदम सक्सेसफुल रही. सारा काला धन बेकार चला गया. काला धनधारी आज भीख मांग रहे हैं भले ही आरबीआई कह रही हो कि सारे पुराने नोट वापस आ गये.

सब महसूस क्या हो रहा है, महसूस क्या कराया जा रहा है उसका खेल है. आंकड़े क्या बोल रहे हैं वो मत देखो, वो महज एक नम्बर है. आंकड़ा कह रहा है कि -१२ डिग्री तापमान है तो इससे क्या? आप महसूस तो -२५ कर रहे हैं न!! उससे मतलब रखना चाहिये.

कल एक मोटिवेशनल स्पीकर का ज्ञान बटुव्वल सुन रहा था. सुबह उठ कर तैयार हो कर घर से निकलने के पहले एक बार शीशे के सामने खड़े होकर खुद को कहो कि यू लुक गुड मैन!! फिर देखिये कि लोग भी आपको देखकर मन ही मन कहेंगे कि ही लुक गुड मैन. अब उस स्पीकर ने शायद मुझे न देखा होगा. वरना ईश्वर की ऐसी कृपा रही कि न तो रंग पे दया बरती, न तन पे और न ही कद पे. किस मूँह से कहूँ कि यू लुक गुड मैन!!  मैं तो बिना शीशा देखे निकल लूँ तो ही ऐसा भ्रम पाल सकता हूँ बमुश्किल. शीशा देख कर इत्ता बड़ा झूठ अव्वल तो बोल ही न पाऊँगा और बोल भी गया तो इस आत्म ग्लानी को दिन भर ढो तो बिल्कुल भी न पाऊँगा. वह आगे बोले कि फिर दफ्तर के रास्ते में ट्रेन की खिड़की के बाहर देखो और कहो कि व्हाट अ ब्यूटीफुल डे. कितना सुन्दर दिन निकला है, मन प्रफुल्लित हो गया. फिर आप पायेंगे कि मन सारा दिन कितना प्रफुल्लित रहता है. अब उसे कौन समझाये कि दिल्ली में बैठ कर ज्ञान बांटना सरल है, ग्राऊन्ड पर निकल कर देखो तब समझ में आयेगा. यहाँ एक एक फुट बरफ में पैर धंसा धंसा कर कुड़कुड़ाते हुए ट्रेन में दुबके बैठे हैं कि कुछ देर में गरमी आये और ये समझा रहे हैं खिड़की के बाहर देखकर कहो कि व्हाट ए ब्यूटीफुल डे. मन प्रफुल्लित हो गया. आकर बोल कर दिखाओ तब जाने.

फील गुड फेक्टर हर जगह काम नहीं आता. ये तुम्हारे खेत में गेहूँ के दाने नहीं, सोने के दाने हैं. हीरे मोती हैं. ऐसा सब गाने में तो ठीक कि मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती...मगर उस किसान से पूछो जो कर्ज में दबा है. जो आत्महत्या कर रहा है. जो दो वक्त की रोटी नहीं जुटा पा रहा है, वो बतायेगा कि क्या सोना क्या हीरे मोती? सब तुम रख लो और उसके बदले हमें दो टाईम के खाने का जुगाड़ करवा दो और कर्जा माफ करा दो.

आलू से सोना निकालने वाली मशीन का झांसा एकाध बार चुनाव तो जितवा सकता है मगर किसान के घर चूल्हा नही जलवा सकता. उसका कर्जा नहीं माफ करवा सकता.

शास्त्रों में भी कहा गया है कि मन के हारे हार है, मन के जीते जीत अर्थात यहाँ भी इसी बात पर जोर है कि अहसासने की बात है और उसे उस रुप में ग्रहण करने के लिए तैयारी की बात है. अगर -२५ महसूस कर रहे हो तो वैसे गरम कपड़े पहनों. -१२ महज आंकडा है उस पर न जाओ.

लोग तो यहाँ तक कह रहे हैं कि मन के जीते जीत का इतना स्ट्रांग असर है कि आप वोट किसी को डालो, जीतेंगे वो ही. काहे से कि उन्होंने मन के जीते जीत का मंत्र जगा लिया है. बताते हैं कि मंत्र जगाने के लिए बहुत जुगत करना होती है जो कि सबके बस की बात नहीं.

एक फिल्म में बड़ा फेमस डायलाग हुआ कि अगर पूरी शिद्दत से किसी को चाहो तो पूरी कायनात आपको उससे मिलाने में जुट जाती है. चाह का क्या है अहसास ही तो है. शिद्दत से चाह लिया कि इस राज्य की सरकार हमको हासिल हो फिर तो पूरी कायनात, क्या सिस्टम, क्या एवीएम, क्या वजीर क्या नजीर..सब जुट जाते हैं और सत्ता से मिलवा ही देते हैं. मने कि बात चली है तो एक उदाहरण दिया.

महसूस होने और करने के तो अनेकानेक उदाहरण आसपास छितरे पड़े हैं.

मानो तो मैं गंगा माँ हूँ न मानो तो बहता पानी..इसके चलते गंगा का बेटा अपनी नैय्या खेवा गया. अब माँ खोज रही है कि बेटा आया था. साफ सफाई करवाने वाला था फिर न जाने कहाँ चला गया? अंततः गंगा माँ को भी स्वयं ही महसूस करना पड़ेगा कि वह स्वच्छ हो गई हैं वरना तो कुछ होने जाने वाला नहीं. अच्छे दिन भी अहसास की बात है, महसूस करो तो हैं वरना तो क्या? बाबा जी तो हमेशा से कहते आये हैं कि करने से होता है? करो करो..महसूस करो!!

खैर, देर रात बस से ट्रेन, ट्रेन से कार, कार से घर पहुँचा तो हीटिंग से गरमागरम घर में आराम से बिस्तर पर सो गया. सुबह जागा, खिड़की से झांका..बेहतरीन धूप खिली थी..बासाख्ता बोल पड़ा- व्हाट अ ब्यूटीफुल डे! कल की सारी तकलीफें भूल गया और धूप देखकर यह भी याद न रहा कि बरफबारी के बाद जब धूप निकलती है तब तापमान और गिर जाता है. सब नेता यह स्वभाव जानते हैं कि जनता एक नये चमकदार वादे में पुरानी सारी तकलीफें भुला कर खुश हो जाती है.

फिलहाल तो धूप देखकर अच्छा लगा. घंटे भर में जब दफ्तर के लिए निकलूँगा तब की परेशानियाँ तब देखी जायेंगी. यह तो सिलसिला है. अच्छा बुरा लगा रहेगा. ये जीवन के अंग है. जब मौका आये तो अच्छा जरुर महसूस कर लो. देखो, कितनी अच्छी धूप खिली है और मन कितना प्रफुल्लित है...मगर यह भी तय है मै शीशे के सामने जा कर खुद से अब भी यह नहीं कहने वाला कि यू लुक गुड मैन!! इत्ता बड़ा झूठ..यह मैं नेताओं के लिए छोड़ देता हूँ.

हम आमजन यूँ ही ठीक!!

-समीर लाल ’समीर’

 

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जून 5,2022 के अंक में:

https://www.readwhere.com/read/c/68457672

 

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