शनिवार, मई 01, 2021

आज मौसम बड़ा..बेईमान है बड़ा

 

प्रकृति प्रद्दत मौसमों से बचने के उपाय खोज लिये गये हैं. सर्दी में स्वेटर, कंबल, अलाव, हीटर तो गर्मी में पंखा, कूलर ,एसी, पहाड़ों की सैर. वहीं बरसात में रेन कोट और छतरी. सब सक्षमताओं का कमाल है कि आप कितना बच पाते हैं और मात्र बचना ही नहीं, सक्षमतायें तो इन मौसमों का आनन्द भी दिलवा देती है. अमीर एवं सक्षम इसी आनन्द को उठाते उठाते कभी कभी सर्दी खा भी जाये या चन्द बारिश की बूँदों में भीग भी जायें, तो भी यह सब सक्षमताओं के चलते क्षणिक ही होता है. असक्षम एवं गरीब मरते हैं कभी लू से तो कभी बाढ़ में बह कर तो कभी सर्दी में ठिठुर कर.

कुछ मौसम ऐसे भी हैं जो मनुष्य ने बाजारवाद के चलते गढ़ लिये हैं. इनका आनन्द भी सक्षमतायें ही उठाने देती है. इसका सबसे कड़क उदाहरण मुहब्बत का मौसम है जिसे सक्षम एवं अमीर वर्ग वैलेन्टाईन डे के रुप में मनाता है. फिर इस डे का मौसम पूरे फरवरी महीने को गुलाबी बनाये रखता है. फरवरी माह के प्रारंभ में अपनी महबूबा संग गिफ्ट के आदान प्रदान से चालू हो कर वेलेन्टाईन दिवस पर इजहारे मुहब्बत की सलामी प्राप्त करते हुए फरवरी के अंत तक यह अपने नियत मुकाम को प्राप्त हो लेता है.

रेडियो पर गीत बज रहा है...’आज मौसम बड़ा..बेईमान है बड़ा..आज मौसम...’

बेईमानी का मौसम? फिर अन्य मौसमों से तुलना करके देखा तो पाया कि इसे भी अमीर एवं सक्षम एन्जॉय कर रहे हैं. इससे बचने बचाने के उनके पास मुफीद उपाय भी है और कनेक्शन भी. कभी कभार बड़ा बेईमान पकड़ा भी जाये तो क्या? कुछ दिनों में सब रफा दफा और फिर उसी रफ्तार से बेईमानी चालू. इस बीच कुछ दिन लन्दन जाकर ही तो रहना है या अगर किसी सक्षम को जेल जाना भी पड़ा तो वहाँ भी उनके लिए सुविधायें ऐसी कि मानो लन्दन घूमने आये हों. मरता इस मौसम में असक्षम ही है जैसे पटवारी, बाबू आदि की अखबारों में खबर आती है कि २००० रुपये रिश्वत लेते हुये रंगे हाथों पकड़ाये. वे जेल की हवा तो खाते ही खाते हैं, साथ ही नौकरी से भी हाथ धो बैठते हैं. उनके पास खुद को बचाने के लिए न तो कनेक्शन होते हैं और न ही ऊँचे ओहदे वाले वकील. इसका कतई यह अर्थ न लगायें कि उन्होंने गलत काम नहीं किया. बात मात्र सजा के अलग अलग मापदण्ड़ो की है.

इधर एकाएक नया सा मौसम सुनने में आ रहे हैं- देशभक्ति का मौसम.

इस मौसम का हाल ये है कि जो हमारे साथ में है वो देशभक्त और जो हमारा विरोध करेगा वो देशद्रोही? देश भक्ति की परिभाषा ही इस मौसम में बदलती जा रही है. देशभक्ति भावना न होकर सर्टीफिकेट होती जा रही है. सर्टिफाईड देशभक्त बंदरटोपी पहने, हर विरोध में उठते स्वर को देशद्रोह घोषित करने में मशगुल हैं. सोशल मीडिया एकाएक देशभक्तों और देशद्रोहियों की जमात में बंट गया है.

भय यह है कि कल को यह देशभक्ति का मौसम भी अमीरों और सक्षम लोगों के आनन्द का शगल बन कर न रह जाये और गरीबों और असक्षम को फिर इस मौसम की भी मार सहना पड़े.

रेडियो पर गाना अब भी बज रहा है.. ’आने वाला कोई तूफान है ..कोई तूफान है.. आज मौसम है बड़ा...’

-समीर लाल ’समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार अप्रेल 25, 2021 के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/60010390

 

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शनिवार, अप्रैल 17, 2021

बाबू जी! अब आप अपने घर वापस चलिए न!!!

 

चौबे जी और उनके बेटे मुकेश का परिवार उनके साथ कटनी में रहता था। बेटा शहर की एक कंपनी मे मैनेजर था और चौबे जी रिटायर मास्साब। मुकेश अभी एक साल पहले ही मुंबई से वापस आया है, जहाँ वह एक मल्टी नेशनल में काम करता था।

कुछ साल पहले चौबे जी की पत्नी नहीं रहीं। चौबे जी अकेले रह गए थे। दमा के मरीज थे। कई बार बेटे से कहा कि बेटा, अब अकेले नहीं रहा जाता, क्या मैं तेरे पास मुंबई आ जाऊं? हर बार वही जबाब कि कंपनी का दिया छोटा सा फ्लैट है  और उसमें वो, उसकी पत्नी और दो बच्चे। हालांकि तीन बेड रूम और एक गेस्ट रूम भी है मगर उसमें से एक स्टडी और एक गेस्ट के लिए है, आप कहाँ रहेंगे?और फिर वहाँ आपके परिचित लोग हैं। यहाँ मुंबई में तो पड़ोसी भी नहीं किसी को पूछते, आप बोर हो जाएंगे।

कहते सुनते पाँच साल निकल गये थे किन्तु न कभी मुकेश उन्हें ले गया न कभी उसके फ्लैट में इतनी जगह बन पाई कि चौबे जी वहाँ जाकर रह पायें। इतने दिनों में मुकेश भी एक ही बार कटनी आया था, वो भी नगर निगम से कोई सत्यापन करवाना था। पत्नी और बच्चे तब भी नहीं आए थे। मुकेश का मानना था कि वो चूना भट्टी से उठते पलूशन से बीमार पड़ जाएंगे।

दो साल पहले मुकेश की नौकरी जाती रही। ७-८ महीने कोशिश की किन्तु कहीं कोई उम्मीद नजर न आई। हार कर सपरिवार वो कटनी चला आया। चौबे जी के पुराने परिचय के चलते एक अच्छी कंपनी में मैनेजर हो गया। बच्चे यहीं स्कूल में भर्ती हो गए। उसकी पत्नी और बच्चों की तबीयत भी ठीक रही। रिटायर्ड मास्साब चौबे जी का घर बहुत बड़ा तो नहीं था किंतु फिर भी तीन बेडरूम, ड्राइंग और डाइनिंग तो था ही। एक बेडरूम मुकेश और उसकी पत्नी ने ले लिया। एक एक दोनों बच्चों ने और चौबे जी का बिस्तर ड्राइंग रूम में लगा दिया गया। कुछ दिन तो सब ठीक चला किन्तु चौबे जी दमा के चलते रात भर खाँसते तो मुकेश की पत्नी को शिकायत रहती कि न तो खुद सोते हैँ न ही हमको सोने देते हैं। उसने कई बार मुकेश से अलग घर लेने के लिए कहा किन्तु अब न तो सेलरी इतनी ज्यादा थी और ७-८ महीने मुंबई की बेरोजगारी के बाद बचत ही। अतः मन मार कर साथ रहते रहे।

पत्नी की शिकायत बढ़ती रही। मुकेश सोचता रहता कि क्या किया जाए। एक दिन गुस्से में पत्नी ने कहा कि इतना भी क्या सोचने में लगे हैं? बाबू जी को ओल्ड एज होम में अच्छा सा कमरा दिलवा दीजिये। वहाँ इनकी उम्र के मित्र भी मिल जाएंग एवं मन भी लग जाएगा। फिर मेडिकल और भोजन की व्यवस्था भी अच्छी खासी है वहाँ। पेंशन से इतना पैसा तो आ ही जाता है कि ओल्ड एज होम का किराया भरने के बाद भी कुछ जेब खर्च बचा रहे। फिर हम तो हैं ही अगर कुछ और जरूरत हुई तो। बीच बीच में मिल आया करना।

मुकेश भी सोचता रहा कि कैसे कहे बाबू जी से। कोई तरीका नहीं सूझ रहा था। ऐसे में एकाएक महामारी ने देश में अपने पाँव पसारे। करोना का हाहाकार मच गया। बुजुर्गों पर तो उसका कहर ऐसा कि जिस घर में बुजुर्ग हों उस घर के बच्चे और जवानों को घर से न निकलने की सख्त हिदायत दे दी गई।

मुकेश की नौकरी ऐसी थी कि उसे तो दफ्तर जाना ही था। न जाने क्यूं उसे इस आपदा में अवसर नजर आया। उसने तुरंत बाबूजी से कहा कि आप घर में सेफ नहीं हैं। मुझे आपकी बहुत चिंता हो रही है। मैं दफ्तर जाता हूं। बच्चे बाहर खेलते हैं। न जाने कब कौन करोना साथ ले आए और आपकी तबीयत पर बन आए। मैंने पास के ओल्ड एज होम में बात कर ली है। उन्होंने बुजुर्गों की कोविड से रक्षा की विशेष व्यवस्था की है। आप कुछ दिन वहाँ रह लें और जैसे ही माहौल ठीक हो जाएगा, हम आपको वापस ले आएंगे। चौबे जी का मन तो न था और वो सब समझ भी रहे थे मगर क्या करते। हाँ कह दिया।

अगले दिन जब मुकेश उन्हें वहाँ पहुंचाने गया तो पास वाला ओल्ड एज होम शहर से कई सौ किमी दूर इंदौर में था। मुकेश उन्हें वहाँ छोड़ कर उसी रात कार से वापस लौट गया। चौबे जी धीरे धीरे वहाँ रहने की आदत डालने लगे। घर के ड्राइंग रूम के एकाकीपन से बेहतर धीरे धीरे यहाँ का माहौल अच्छा लगने लगा। कुछ हम उम्र हम व्यथा से गुजरते साथी बन गए। बीच बीच में मुकेश को फोन करते तो पता चलता कि हालत बहुत खराब हैं, आप वहीं रहें।

साल बीत गया। वैक्सीन आ गई। ओल्ड ऐज होम वालों को प्राथमिकता की श्रेणी में रखा गया था अतः चौबे जी को वैक्सीन लग गई। उन्होंने फोन पर मुकेश को बताया कि अब टीका लग गया है। अब मुझे कुछ नहीं होगा, मुझे वापस घर ले चलो। मुकेश ने कहा कि अभी संभव नहीं है। जब तक घर में सबको नहीं लग जाता, तब तक आप वहीं रहिये। वैसे भी आपको वहाँ तकलीफ क्या है? आराम से रहिये। यहाँ धूल धक्कड़ में आकर क्या करिएगा। बात सुनकर चौबे जी को थोड़ा धक्का तो लगा और यह भी समझ में आ गया कि अब बाकी का जीवन भी यहीं बिताना होगा।

एकाएक सरकार का आदेश आया कि जो लोग अपने बुजुर्ग माता पिता के साथ रहते हैं, उन्हें भी प्राथमिकता की  श्रेणी में रख कर वैक्सीन लगाया जाएगा। यह खबर टीवी पर चौबे जी ने ओल्ड ऐज होम में और मुकेश और उसकी पत्नी ने अपने घर पर सुनी।

उस शाम मुकेश और उसकी पत्नी का फोन बाबू जी के पास पहुंचा। अब तो आपको वैक्सीन लग गई है, अब आप वहाँ ओल्ड ऐज होम में क्या कर रहे हैं? अब आप अपने घर वापस आ जाइये। हम आपको कल लेने

आ रहे हैं।

चौबे जी मुस्कराये और बोले- रहने दो बच्चों। अब यही मेरा घर है और यही मेरा परिवार, मैं यहाँ बहुत खुश हूँ।

-समीर लाल ‘समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार अप्रेल 18, 2021 के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/59852255

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रविवार, अप्रैल 11, 2021

धंधा जो न करवाये सो कम

 

सर्दी की सुबह।  घूप सेकने आराम से बरामदे में बैठा हुआ अखबार पलट रहा था गरमागरम चाय की चुस्कियों के साथ।

भाई साहब, जरा अपने स्वास्थय का ध्यान रखिये।  इतने मोटे होते जा रहे हैं। ऐसे में किसी दिन कोई अनहोनी न घट जाये, आप मर भी सकते हैं।  ये बात हमसे तिवारी जी कह रहे हैं।

भला कैसे बर्दाश्त करें इस बात को।  हमने भी पलट वार किया कि भई तिवारी जी, आप दुबले पतले हैं तो क्या आप अमर हो लिये, कभी मरियेगा नहीं।  खबरदार जो इस तरह की उल्टी सीधी बात हमसे की तो और वो भी सुबह सुबह।

मैने उन्हें समझाया कि जब मिलो तो पहले नमस्ते बंदगी किया करो।  हाल चाल पूछो, यह क्या नई आदत पाल ली कि मिलते ही मरने की बात कहने लगते हो।

तिवारी जी इतने ढीठ कि जरा भी विचलित नहीं हुए।  बस मुस्कराते रहे और कुर्सी खींच कर बैठ गये और कहने लगे कि चाय तो पिलवाईये।

खैर, पत्नी उनके लिए चाय लेकर आई।  नमस्कार चमत्कार हुआ और पत्नी भी वहीं बैठ गई।

अब तिवारी जी उनसे बातचीत करने लगे कि भाभी जी, आप कोई नौकरी करती हैं क्या?

पत्नी से ना में जबाब पाकर उनकी मुद्रा एकदम चिन्तित बुजुर्ग की सी हो गई और वह कह उठे कि भाभी जी, कहना तो नहीं चाहिये मगर यदि कल को भाई साहब को कुछ हो जाये तो आपका क्या होगा? कैसे गुजर बसर होगी?

मेरा तो गुस्सा मानो सातवें आसमान पर कि सुबह सुबह यह क्या मनहूसियत फैला कर बैठ गये तिवारी जी।  मगर घर आये मेहमान को कोई कितना कुछ कह सकता है भला और यदि गहराई में उतर कर सोचा जाये तो ऐसा हो भी सकता है किसी के भी साथ, कभी भी।

मौत के नाम पर वैसे भी दार्शनिक विचार मन में आने लगते हैं इसलिए मैने संयत स्वर में कहा कि जो उपर वाले की मरजी होगी सो होगा।  उसकी छत्र छाया में दुनिया पल रही है तो इनका क्या है? आपकी पत्नी भी तो नौकरी नहीं करती, कल को आपको ही कुछ हो जाये तो उनका क्या होगा? इस प्रश्न से मैने अपनी कुटिल सोच का परिचय दिया।

तिवारी जी तो मानो इसी बात को सुनना चाह रहे हों।  बस एक चमक आ गई उनके चेहरे पर।  कहने लगे भाई साहब, हमने पूरा बंदोबस्त कर रखा है।  मान लिजिये यदि कल को हमें कुछ हो जाता है तो जिस आर्थिक स्थिति में हमारी पत्नी आज है, उससे बेहतर स्थिति में हो जायेगी।  इतनी बेहतरीन बीमा पॉलिसी ली है कि मेरे मरते ही ५ करोड़ रुपये पत्नी के हाथ में होंगे।

बस, इतना सुनते ही अब तिवारी जी को बोलने की जरुरत न रही और हमारी पत्नी हमारे पीछे पड़ गईं कि आप भी बीमा कराईये अपना और मानो तिवारी जी तो आये ही उसी लिये थे।  तुरंत झोले से फार्म निकाल कर भरने लग गये।  दोनों की तत्परता और अधीरता देख जरा घबराहट भी होने लगी कि कहीं शाम तक निपट ही न जाने वाले हों और इन दोनों को मालूम चल गया हो इसलिए हड़बड़ी मचाये हैं।

सारी कार्यवाही पूरी करके चैक आदि लेकर जब चलने को हुए तो तिवारी जी ने पहली बार कायदे की बात की कि ईश्वर आपको लम्बी उम्र दे।  काश, ऐसी नौबत न आये कि भाभी जी को बीमा का भुगतान लेना पड़े।

सोचता हूँ धंधा जो न करवाये सो कम।  बीमा एजेन्ट अगर मौत का डर न दिखाये तो भला फिर खाये क्या?

बीमा एजेन्ट का तो मैं मात्र इसलिए भी साधुवाद कहता हूँ कि वो अपने धंधे को लाभदायी सिद्ध करने के लिए आपको कम से कम मार तो नहीं डालता। वरना तो एक धंधेबाज वो कौम भी है जो जिस तंत्र से जीत कर जाते  हैं, जीतते ही उन्हें वही लोकतंत्र खतरे में नजर आने लगता है। देश सांप्रदायिक ताकतों में बंटता नजर आने लगता है। फिर अपनी बात सिद्ध करने के लिए वो लोकतंत्र को न सिर्फ खतरे में डाल देते हैं बल्कि सांप्रदायिकता और धर्म के नाम का ऐसा तांडव करवाते हैं कि आमजन दांतों तले उंगली दबाए सोचने को मजबूर हो जाता है कि साहेब ने कितना सही कहा था।

-समीर लाल ‘समीर’     

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार अप्रेल 11, 2021 के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/59715369

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शनिवार, अप्रैल 03, 2021

हे गंगा पुत्र, अपने उदगम का तो ध्यान धरो!!

 


सब आदत की ही तो बात होती. कोई भी आदत शुरु में शौक या मजबूरी से एन्ट्री लेती है पर बाद में लत बन जाती है. अच्छी या बुरी दोनों ही बातें अगर लत बन जायें और फिर न उपलब्ध हों तो फिर तकलीफदायी हो चलती हैं. इन्सान छटपटाने लगता है. कुछ भी कर गुजरने को आतुर हो जाता है.

किसी ड्रग के आदी, शराब के लती, सिगरेटबाज और यहाँ तक कि शतरंजी को अपने व्यसन की उपलब्धता के आभाव में तड़पते तो सभी ने देखा ही होगा. शायद शुरु में चार दोस्तों के बीच फैशन में या स्टेटस बघारने को एक पैग स्कॉच ले ली होगी. नशे की किक में मजा आया होगा. फिर कभी कभार और, फिर महीने में एक बार, फिर हफ्ते में, फिर एक दिन छोड़ एक दिन और फिर रोज पीने लग गये होंगे. बस, लग गई लत. अब एक दिन न मिले, तो बिस्तर में उलटते पलटते नजर आयें. नींद न पड़े. बेबात बीबी बच्चों पर बरसने लगें.

तब देखा कि फेसबुक कुछ देर को क्या बैठा, लगे लोग ट्विटर पर ट्विटियाने,व्हाटसएप भर गया - हाय, फेसबुक नहीं चल रहा. क्या आपका भी नहीं चल रहा? जबकि फेसबुक की साईट साफ साफ लिख कर बता रही थी कि मेन्टेनेन्स चल रहा है, अभी आते हैं. मगर लतियों को चैन कहाँ? वो तो लगे यहाँ वहाँ भड़भड़ाहट मचाने. यहाँ तक कि जब कुछ ही देर में फेसबुक चालू हुआ तो फिर हल्ला मचा और कम से कम १०० ट्विट और व्हाटसएप अपडेट मिले कि हुर्रे, चालू हो गया!! अच्छा है यहाँ चीयर बालाओं का चलन नहीं है वरना तो क्या नाच होता कि देखने वाले देखते ही रह जाते.

लम्बे समय तक कोई आदत रहे तो लत बन जाने पर क्या हालत होती है, उसका जो जायजा आज मिला उसे देख कर एकाएक परेशान हो उठा. सोचने लगा कि भारत का क्या होगा?

सुनते हैं कि साहब किसी भी तरह हार मानने को तैयार नहीं. लगे हैं कि न खाऊँगा न खाने दूंगा. भ्रष्ट्राचार बंद हो ही जाना चाहिये. उनकी इस हठ से और आज के अनुभव से मुझे डर लगने लगा है. न सिर्फ भ्रष्ट्राचारियों से बल्कि उनसे भी जो इतने सालों तक भ्रष्ट्राचार झेलने के आदी हो गये हैं.

यूँ भी पूरे भारत में मात्र दो पार्टियाँ ही हैं जिन्हें मिलाकार भारत को भारत कहा जाता है. एक जो भ्रष्ट्राचार करते हैं और एक वो जो भ्रष्ट्राचार झेलते हैं.

एकाएक चुनाव के नतीजे आते ही भ्रष्ट्राचार बंद हो जायेगा तो इन दोनों पार्टियों की क्या हालत होगी, ये भी तो सोचो. पूरे देश में हर तरफ अफरा तफरी मच जायेगी. हाहाकार का माहौल होगा. आदमी स्टेशन पहुँचेगा, बिना रिश्वत दिये रिजर्वेशन मिल जाने पर भी ट्रेन में चढ़ने की हिम्मत न जुटा पायेगा कि जरुर कुछ घपला है. ऐसे भला रिजर्वेशन मिलता है क्या कहीं? ट्रेन का कन्फर्म टिकिट लिए वो बौखलाया सा बस में बैठ जायेगा और भी इसी तरह की कितनी विकट स्थितियाँ निर्मित हो जायेंगी-सोच सोच कर माथे की नसें फटी जा रही हैं.

साहब, मान जाओ, प्लीज़. कुछ तो सीख लो आज के इस फेसबुक भीषण कांड से. क्या अच्छा लगेगा जब सब कहेंगे कि पूरा देश जो तांडव कर रहा है, उसके जिम्मेदार आप हैं? नाहक इतना बड़ा इल्जाम क्यूँ अपने माथे लगवाना चाहते हैं?

मान जाइये न प्लीज़!!! चलने दो जैसा चल रहा है? कुछ घंटों के लिए मेनटेनेन्स टाईप भ्रष्ट्राचार रुकवाना हो तो पूर्व सूचना देकर रुकवा लो, दोनों पार्टियाँ झेल लेंगी किसी तरह,आपकी भी बात रह जायेगी- मगर इसे पूरे से खात्मे की जिद न ही करो तो ठीक.

विकास का वादा भी तो आपका ही है- फिर भ्रष्ट्राचार के विकास में आप क्यूँ बाधक बन रहे हैं?

सदियाँ बीती – विकास ही तो भ्रष्ट्राचार की गंगोत्री रहा है.  

हे गंगा पुत्र, अपने उदगम (गंगोत्री) का तो ध्यान धरो.

समीर लाल ’समीर’

 

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार अप्रेल 4, 2021 के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/59540993


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शनिवार, मार्च 20, 2021

कैसा तेरा प्यार- कैसा गुस्सा है तेरा

 

सुबह जब मैं उनके घर के सामने से निकला तो भैय्या जी दण्ड बैठक लगा रहे थे..११०, १११ उनके बाजू में खड़ा उनका चेला दण्ड की गिनती गिन रहा था. सामने दालान में ही एक चूल्हे पर मावा मिला दूध औंटाया जा रहा था. आजकल रोज सुबह हजार दण्ड लगाने के बाद भैय्या जी की सरसों के तेल से मालिश होती है. फिर कुनकुने पानी से स्नान कर औंटाया हुअ दूध ग्रहण करते हैं और इस तरह उनके दिन की शुरुआत होती है.

फिर चेलों की आवाजाही शुरु हो जाती है. योजनायें बनती हैं. चेले लठ्ठ को तेल पिला रहे होते हैं और भैय्या जी कान खोदते, बतियाते पान चबा रहे होते हैं.

पूछने पर पता चला कि त्यौहार की तैयारी चल रही है. आश्चर्यजनक तौर पर कोई त्यौहार तो आस पास आता दिखता न था. नागपंचमी भी आने में तो पूरा आधा साल बाकी है कि उस वजह से पहलवानी की तैयारी कर रहे हों.

हाँ, चुनावी माहौल जरुर है चारों ओर और उसके लिए इस तरह की तैयारी भी मुफ़ीद है. मगर भैय्या जी ने चुनाव को कभी त्यौहार का दर्जा नहीं दिया. वो उनकी जीवन शैली है, उनकी धड़कन है और उनके जीवन यापन का साधन है. चुनाव हैं तो बाकी सब त्यौहार हैं वरना तो यह जीवन ही बेकार है की तर्ज पर जीने वाले भैय्या जी, राजनिती के बाहुबलियों की बस्ती के सरगना हैं, जिन पर अनेकों हत्याओं और बलात्कार के मामले दर्ज हैं.  उनके लिए चुनाव उनका एक ऐसा दायित्व है जिसे निभाने के लिए वह इस मृत्युलोक में पधारे हैं और इसी दायित्व के चलते कितने लोगों को मृत्यु के घाट तक पहुँचा आये हैं, वो भला चुनाव को त्यौहार मानें, न!! ऐसा हो ही नहीं सकता.

अतः मन की शांति के लिए पूछना ही पड़ा कि भैय्या जी किस त्यौहार की तैयारी में जुटे हैं?

पता चला कि वेलेन्टाईन डे की तैयारी कर रहे हैं. दो दिन बचे हैं बस!! एकदम युद्ध स्तर पर तैयारियाँ चल रही हैं.

हमारे तो पाँव तले धरती ही खिसक गई. अगर मोहब्बत की उम्र की एक्सपायरी का आधार नेताओं की मोहब्बत की कहानियों से भी उठाये तो भी ६० बसंत से उपर तो क्या तय कर पायेंगे कुछ अपवादों को छोड़ कर. इस आधार पर भी मोहब्बत की एक्सपायरी डेट पार किये भैय्या जी को लगभग आधा दशक से उपर बीत चुका है.

ऐसी उम्र में वेलेन्टाईन डे? क्या मूँह दिखायेंगे घर परिवार में ये? हालांकि राजनेताओं को इन सब बातों की चिन्ता तो होती नहीं है, यह सब तो आप हम जैसे आमजनों के लिए बनाई गई सामाजिक बाध्यतायें हैं.

फिर भी भैय्या जी इतने उत्साह्पूर्वक वेलेन्टाईन डे का त्यौहार मनाने की तैयारी करें, वो भी ऐसे कि जब नव युवा प्रेमी नये कपड़े बनवा रहे हैं, गिफ्ट खरीदने की तैयारी कर रहे हैं, गुलाब के बुके पसंद कर रहे हैं, तब भैय्या जी दण्ड लगाकर और मालिश करा कर बदन बना रहे हैं, दूध औंटा कर मावे डाल कर पी रहे हैं, फूल की जगह लठ्ठ सजा रहे हैं तेल पिलवा कर...अजब तरीका है भैय्या जी का. बाहुबलियों की बात यूँ भी निराली होती है. यह तो खुश हों तो बंदुक दागें, गुस्सा हों तो बंदुक दागें...शायद इन्हीं की प्रेमिकायें गाती होंगी... कैसा तेरा प्यार कैसा गुस्सा है तेरा, तौबा सनम तौबा सनम…

वेलेंटाईन डॆ के दिन हम भैय्या जी के घर के सामने पेड़ के नीचे खड़े हो गये यह देखने के लिए कि क्या नजारा बनेगा इनके इस उम्र में वेलेन्टाईन डे मनाने के जोश का…

कुछ ही देर में भैय्या जी अपने सैकड़ों चेलों के साथ लट्ठ लिये निकलते दिखाई दिये…जय श्री राम का नारा आकाश में गुंजायमान हो गया..

शाम को टीवी में शहर भर के हजारों प्रेमी प्रेमिकाओं के पीटे जाने की खबर ब्रेकिंग न्यूज बनीं और भैय्या जी अपने साथियों के साथ प्रेस कांफ्रेस करते नजर आये…हम अपनी संस्कृति से खिलवाड़ नहीं होने देंगे.

-समीर लाल ’समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार मार्च 21, 2021 के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/59227517

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शनिवार, मार्च 13, 2021

एक युग के भीतर समाप्त होते अनेक युग

 

उस रात किसी बड़ी किताब का भव्य विमोचन समारोह था. यूँ भी हिन्दी में किताबों के बड़े या छोटे होने का आंकलन उसके लेखक के बड़े या छोटे होने से होता है और लेखक के बड़े या छोटे होने का आंकलन उसके संपर्कों के आधार पर.

बड़े लेखक की बड़ी किताब का विमोचन हो तो विमोचनकर्ता का बड़ा होना भी जाहिर सी बात है. अतः इस समारोह के विमोचनकर्ता भी बहुत बड़े और नामी साहित्यकार थे. वह इतना अच्छा लिखते हैं कि वर्षों से इसी चक्कर में कुछ लिखा ही नहीं (शायद भीतर ही भीतर यह भय सताता हो कि कहीं कमतर न आंक लिए जाये) मगर फिर भी, नाम तो चल ही रहा है.

अधिकतर अच्छा लिखने वालों के साथ यही विडंबना है कि वो इतना उत्कृष्ट लिखते हैं, इतना अच्छा लिखते हैं कि कुछ लिख ही नहीं पाते. बरसों बरस बीत जाते हैं उनका अच्छा लिखा पढ़ने को. बस, उनसे दूसरों के बारे में सुनने और पढ़ने के लिए यही मिलता चला जाता है कि फलाने ने अच्छा लिखा और ढिकाने ने खराब. सलाह भी उन्हीं की ओर से लगातार बरसती है कि अच्छा लिखने की कोशिश होना चाहिये साहित्य को धनी बनाने के लिए. वे बिना अपना योगदान देखे, हर वक्त दुखी नजर आते हैं कि आजकल अच्छा नहीं लिखा जा रहा है और यह चिन्ता का विषय है.

सस्वर सरस्वती पूजन, माल्यार्पण आदि के बाद संचालक महोदय ने माईक संभाला और मुख्य अतिथि का परिचय प्रदान करते हुए स्तुति गान में ऐसा रमे कि यह कह कर मुस्कराने लगे कि माननीय मुख्य अतिथी श्रद्धेय आचार्य श्री चंडिका दत्त शास्त्री पुरुष नहीं हैं.

इतना कह वह मौन हो गये और मुस्कराते हुए मंच से लोगों के हावभाव देखते रहे. पूरे हॉल में इस सनसनीखेज खुलासे की वजह से सन्नाटा छा गया. सब छिपी आँख एक दूसरे को देखने लगे. संपूर्ण मंच भी असहज सा नजर आने लगा तब श्री विराट स्तंभी जी आगे बोले कि माननीय मुख्य अतिथी श्रद्धेय आचार्य श्री चंडिका दत्त शास्त्री जी पुरुष नहीं, महापुरुष हैं. अपने आप में संपूर्ण संस्था हैं. तब जाकर सभागृह में जान लौटी. श्री विराट स्तंभी जी के इस बयान से उनके सहज हास्य बोध का परिचय मिला जबकि कर्म एवं नाम से वह वीर रस हेतु प्रख्यात हैं. पूरे सभागृह में करतल ध्वनि की गुंजार उठ खड़ी हुई.

विचार आया कि यदि दो वाक्यों के बीच मौन के दौरान बिजली महारानी की कोप दृष्टि पड़ जाती, तब क्या होता?

संस्था का नाम सुनते ही मेरी रीढ़ की हड्ड़ी में न जाने क्यूँ एक अरसे से एक सुरसुरी सी दौड़ जाती है. एक चित्र खींच आता है मानस पटल पर किसी संस्था का, जिसे अपने पापों, घोटालों को अंजाम देने के लिए सबसे मुफीद और पावन उपाय मान व्यक्ति, व्यक्ति न रह संस्था में बदल जाता है. फिर गोपनीय वार्षिक बैठक, बेनामी पदाधिकरी और स्वयंभू अध्यक्ष की आसंदी पर विराजमान स्वयं वह.

देश में आजतक जितना संस्थाओं के नाम पर घोटालों को अंजाम दिया गया है, उतना शायद ही कहीं और हुआ होगा.

शायद संस्था ही वह वजह हो जिससे उनका स्टेटस बिना बरसों तक लिखे भी बहुत ऊँचा लिखने वाले का बरकरार रहा आया हो, कौन जाने? संस्था के भीतर की बात जानना तो सरकारी ऑडीटर के लिए भी टेढ़ी खीर ही रहा है अतः भीतर जाने की बजाय वो बाहर के बाहर पैसे लेकर निपटारा करना सदा से सरल उपाय मानता रहा है.

अब तो ऐसी संस्थाएं भी आ गई हैं, जिसमें न तो ऑडिट और न आर टी आई का प्रावधान है.

खैर, समारोह बहुत भव्य रहा. उतना ही भव्य मुख्य अतिथि का उदबोधन जिसमें उन्होंने पुनः साहित्य और लेखन के गिरते स्तर पर गहरी चिन्ता जतलाई और इस पुस्तक को इस दिशा में सुधार लाने का एक ऐतिहासिक कदम निरुपित किया.

इस कार्यक्रम के बाद एक और वरिष्ट साहित्यकार की श्रद्धांजलि सभा में जाना था. वहाँ भी श्रद्धांजलियों के दौर में अनेक संदेशों में मृतात्मा को एक व्यक्ति नहीं, युग बताया गया और उनके अवसान को एक युग का पटाक्षेप.

एक युग के भीतर समाप्त होते अनेक युग. हर वरिष्ठ, हर गरिष्ठ के प्रस्थान के साथ एक युग का पटाक्षेप, और एक ऐसे रिक्त का निर्माण, जिसकी भरपाई कभी संभव नहीं. शुरु से आजतक ऐसे रिक्त स्थानों की जिनकी भरपाई संभव न थी, एक एक बिन्दी के आकार का भी गिन लें तो शीघ्र ही, या कौन जाने पूर्व में ही, शायद ही कोई स्थान बचे जो रिक्त न हो.

-समीर लाल ‘समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार मार्च 14, 2021 के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/59066272

                                               

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शनिवार, मार्च 06, 2021

नींद में वोट देना हर आमजन जानता है

 


देर रात गये सोने की कोशिश मे हूँ. जब नींद नहीं आती तो ख्याल आते हैं. अकेले में ख्याल डराते है और इंसान अध्यात्म की तरफ भागता है भयवश. यह इन्सानी प्रवृति है, मैं अजूबा नहीं.

आधुनिक हूँ तो आधुनिक तरीके अपनाता हूँ अध्यात्म के. बड़े महात्मा जी का आध्यात्मिक प्रवचन सीडी प्लेयर में लगा कर उससे मुक्ति के मार्ग के बदले नींद का मार्ग खोजने में लग जाता हूँ. नीरस बातें नींद में ढकेल देती हैं. नीरसता टंकलाईज़र (नींद की गोली) का काम करती है.

कुछ देर मन लगा कर सुनता हूँ. महात्मा जी के कहे अनुसार, जीवन रुपी नैय्या से इच्छायें, चाह, लालच और वासना की गठरी उठा उठा कर फैंकता जाता हूँ पाप की बहती दरिया में. खुद को हल्का किये बगैर उपर नहीं उठा जा सकता, महत्मा जी मात्र १०० रुपये लेकर सीडी में समाये कह रहे हैं. मैं सुन रहा हूँ. कहते हैं चाहविहिन हो जाओ तो मुक्ति का मार्ग पा जाओगे और यह जीवन सफल हो जायेगा.

सोचता हूँ कि क्या मुक्ति का मार्ग पाना भी एक चाह नहीं? क्या चाहविहिन होने की चेष्टा भी एक चाह नहीं? क्या आमजन से उपर उठ अध्यात्मिक हो जाना भी एक चाह नहीं? जब एक चाह की गठरी को पाप की नदिया में फैंका सिर्फ इसीलिये कि दूसरी चाह की गठरी लाद लें, तो क्या यह व्यर्थ प्रयत्न और प्रयोजन नहीं?

मानव स्वभाव से बाध्य हूँ. चाहत की जो गठरियाँ अर्जित कर ली है, उसे फेंकने में दर्द सा कुछ उठता है किन्तु नई चाहत की नई गठरी तपाक से आकर जुट जाती है. प्रवचन सुन सुन कर ऐसी ही कितनी चाहतों की गठरियों का आना तो अनवरत जारी है लेकिन फैंकना, बहुत मद्धम गति से हो पाता है. अगर ऐसा ही चलता रहा और नई गठरियाँ इसी गति से जुड़ती रहीं तो वो दिन दूर नहीं, जब यह नाँव डगमगा जायेगी और सारा बोझ लिए इसी पाप की दरिया में डूब जायेगी. अब तो एक चाहत और जुड़ गई कि किसी तरह नैय्या डूबने से बची रहे.

स्वामी जी बोल रहे हैं सीडी प्लेयर में से और मैं अपने मन की बात सुनने में व्यस्त हूँ. मन भारी पड़ रहा है उन सिद्ध महात्मा जी की वाणी पर. खुद को कब नीचा दिखा सकते हैं खुद की नजरों में? वरना तो सो गये होते.

इस बीच स्वामी जी और भी न जाने क्या क्या बोल गये, मैं सुन नहीं पाया और एलार्म से नींद खुली तो सीडी प्लेयर से घूं घूं की आवाज आती थी. जाने कब स्वामी जी ने बोलना बंद कर दिया. रात बीत चुकी है और प्लेयर अब भी चालू है.

प्लेयर ऑफ कर फिर तैयार होता हूँ एक नया दिन शुरु करने को. नींद पूरी हो गई है तो फिर दिनचर्या में जुटने की तैयारी करता हूँ.

क्या पाप, क्या पुण्य, कैसा मुक्ति मार्ग? सब अब रात में सोचेंगे जब दिन भर की थकन के बाद भी मन कचोटेगा और नींद आने से मना करेगी. यही दैनिक चक्र है.

अब दफ्तर के लिए कार लेकर निकला हूँ तो रेडियो लगा लिया है. अब नए वाले साधु मन की बात कर रहे हैँ. मैं रेडियो बंद कर देता हूँ – बताया था न कि नीरस बातों से नींद आ जाती है. गाड़ी चलाते समय सो जाना कितना खतरनाक साबित हो सकता है.

लेकिन ये बात रेडियो से मन की बात बोलने वाले बाबाजी बहुत भली भांति जानते हैँ और उनके लिए सोया हुआ देश का आमजन ही मुफीद है. नींद में चलना और वोट देना हर आमजन जानता है. दुर्घटना के शिकार कितने आमजन हुए, वो भला कौन गिनता है।

कुछ मुश्किलों को सुलझाने की खातिर

खुद को ही उलझाता चला जाता हूँ मैं

आईने में एक अजनबी नजर आता हूँ मैं...

-समीर लाल ’समीर’      

 

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार मार्च 07, 2021 के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/58909357

 

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शनिवार, फ़रवरी 27, 2021

चाहे जो हो जाए – गांधीवाद पर आंच न आए।

 


तिवारी जी एक अत्यन्त जागरूक नागरिक हुआ करते थे। जागरूकता का चरम ऐसा कि सरकार अगर पटरी से जरा भी दायें बायें हुई और तिवारी जी आंदोलन पर। हर आंदोलन का अपना अपना अंदाज होता है जो कि उस आंदोलन के सूत्रधार पर निर्भर करता है। तिवारी जी के आंदोलनों का अंदाज ईंट से ईंट बजा देने वाला होता था। मजाल है कि तिवारीजी आंदोलन पर हों और सरकार का कोई भी मंत्री चैन से सो पाये। सोना तो दूर की बात है, बैठना भी मुश्किल हो जाता था।

सरकार की पुरजोर कोशिश होती कि अव्वल तो तिवारी जी आंदोलन पर बैठे ही न और अगर बैठ गए हैं तो जितना जल्दी हो सके, उनकी मांगें मान कर आंदोलन खत्म करवाया जा सके।

तब तक वह चूंकि सिर्फ अत्यन्त जागरूक नागरिक थे अतः उन्हें अपने गांधीवादी होने का गौरव भी था और गांधीवाद बचाए रखने का जज्बा भी। कई बार सरकारों ने आंदोलन न करने के लिए उन्हें रुपये, पद आदि के प्रलोभन भी देने की पेशकश भी की किन्तु हर बार उससे मामला बिगड़ा ही। सादा जीवन और उच्च विचार वो अपनाते भी थे और सिखलाते भी थे।

उनके कई चेले उन्हीं से सादा जीवन और उच्च विचार की शिक्षा लेकर आंदोलनों के राजमार्ग पर सरपट भागते हुए विधायक और सांसद हो गए।  सभी ने अपनी जमीन जायदाद, कोठियाँ, गाड़ियों और बैक बैलेंस आदि के किले को इतना मजबूत बना लिया है कि कोई बड़े से बड़ा सेंधिया भी उसमें सेंध लगा कर उनके गांधीवाद को हानि नहीं पहुंचा सकता। जैसे जैसे उन्हें गांधीवाद पर खतरे के बादल मंडराते दिखते वैसे वैसे वो अपने किले की सभी दीवारों को मजबूत करते चले जाते।

किन्तु तिवारी जी जागरूक नागरिक बने रहे। आंदोलनों की रफ्तार और अंदाज वैसे ही कायम रहा और ईंटों से ईंट बजती रहीं। तिवारी जी गांधीवाद ओढ़ते बिछाते रहे और चेले विधायक सांसद बनते रहे। तिवारी जी का मानना था कि जब तक देश में एक भी नागरिक भूखा सोएगा तब तक मैं सरकार को सोने नहीं दूंगा। तिवारी जी के लिए कहा जाता था कि गेंदबाजी तो कोई भी कर सकता है मगर तिवारी जी की तरह फिरकी फेकना सबके बस की बात नहीं। मंहगाई, बेरोजगारी, भूखमरी, स्वच्छता, बिजली पानी जैसे आम मुद्दों को भी ऐसे खास बनाकर आंदोलन किया करते जैसे ये आज आई एकदम नई समस्या है और इसके लिए मौजूदा सरकार जिम्मेदार है। न जाने कितनी सरकारें वो इन्हीं मुद्दों पर गिरवा चुके हैं।

कहते हैं हिमालय फतह करने के लिए भी एक बार में एक कदम ही बढ़ाना होता है। एक एक कर कदम बढ़ते रहे और वो दिन भी आया जब आंदोलनप्रेमी तिवारी जी की जागरूकता चरम सीमा पर पहुँच गई। बड़ी तादाद में विधायक और सांसद चेलों के संग सरकार में विराजमान हुए। गांधीवाद का सबसे बड़ा उपासक जब सत्ता में काबिज़  हुआ तो उसने गांधीवाद को सेंधियों से बचाने के इत्ता मजबूत किला बनाया कि उसकी कुछ दिवारें तो विदेशों तक जा पहुंची। स्वीटजरलैण्ड में सबसे ऊंची और गुप्त दीवार तानी गई।

अब तिवारी जी कहते पाये जाते है कि अच्छे लोग अच्छे इसीलिए कहलाते हैं क्यूँ कि बुरे लोग भी हैं समाज में। अमीर अमीर कहलाता ही इसलिए है क्यूँ कि कोई गरीब भी है। सुख का मजा ही क्या पता लगेगा अगर दुख न हों। इसलिए मंहगाई, बेरोजगारी, भूखमरी का रोना छोड़ इसे साक्षी भाव से देखो एवं स्वीकारो। हर सिक्के के दो पहलू होते हैं – उनको समझने की कोशिश करो।

पेट्रोल मंहगा हुआ है तो पैदल चलो, साईकल चलाओ और अपना स्वास्थ्य  बनाओ। स्वास्थ्य  अनमोल है। गैस मंहगी हुई है तो सब्जियां कच्ची खाओ – सलाद खाओ। पकाने से सब्जियों का नूट्रिशन खत्म होता है। अतः उत्तम भोजन करो और स्वस्थ जीवन जिओ। क्या हुआ अगर पेट्रोल और गैस महंगा हो गया? डॉक्टर और दवाई का जो खर्चा बचा आज और भविष्य में – उस को निहारो और खुश रहो। खुश रहने से भी स्वास्थ्य  मे इजाफा ही होता है।

तिवारी जी को लगता है कि देश भर में रसोई का कचरा उठाने वाली नगर निगम की सारी ट्रक बेच देना चाहिए और लोगों को कम्पोस्ट खाद आंगन में गड्ढा खोद कर इस कचरे से बनाना चाहिए। फिर इसी खाद का इस्तेमाल कर घर की बगिया में ऑर्गैनिक सब्जियां उगाओ और बिना पकाये कच्ची ही खाओ। सब्जी मंहगी होने का टंटा भी खत्म और स्वास्थ्य भी उत्तम।

सब उपाय बता कर तिवारी जी नगर निगम के सारे ट्रक बेचने में व्यस्त हो गए हैं। किला और बुलंद करना है। आखिर गांधीवाद को हर हाल में सेंधियों की सेंधबाजी से बचाना जो है।

चाहे जो हो जाए – गांधीवाद पर आंच न आए।

-समीर लाल ‘समीर’  

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार फरवरी 28, 2021 के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/58739659

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शनिवार, फ़रवरी 20, 2021

शायद फिर किसी आंदोलन की जरूरत नहीं पड़ेगी

 


आम जन हैं तो आम जन की तरह ही सुबह सुबह उठते ही फेसबुक खोल कर बैठ जाते हैँ। वो जमाने अब गुजरे जब मियां फाकता उड़ाया करते थे या लोग कहा करते थे कि 

समय बिताने के लिए, करना है कुछ काम,

शुरू करो अंताक्षरी, ले कर हरि का नाम!!

फेसबुक पर रोज का पहला काम कि अपनी आखिरी पोस्ट पर कितने लाइक आए और दूसरा वो जो फेसबुक मुस्तैदी से बताता है कि आज किस किस का जन्म दिन है। १०० -२०० मित्र थे तो हर एक दो दिन में एकाध का जन्म दिन होता था बस १ जनवरी और १ जुलाई को कुछ ज्यादा लोगों का। ५० पार लोगों में अधिकतर उस जमाने को याद कर सकते हैं जब मोहल्ले के चाचा बच्चों को स्कूल ले जाकर भर्ती करा देते थे। अब सब बच्चों के जन्म दिन कहां तक याद रखें तो स्कूल खुलने के दिन से ५ साल घटा कर उम्र लिखा देते थे।  १ जुलाई को हिन्दी स्कूल खुलते थे तो ऐसे सब बच्चों के जन्म दिन १ जुलाई। अंग्रेजी स्कूल का सत्र १ जनवरी से शुरू होता था अतः वहां १ जनवरी वालों की बहुतायत होती है। आज यह बात आश्चर्यजनक लग सकती है मगर आज आश्चर्य तो इस बात पर भी होता है कि उस जमाने में कुछ नेता सच में ईमानदार भी होते थे। अब तो सोच कर भी विश्वास नहीं होता।

खैर, फेस बुक पर १०० -२०० मित्र वाली बात भी १० साल से ज्यादा पहले की बात है। अब जब आंकड़ा अधिकतम पर पहुँच कर रुक गया है तो इन ५००० मित्रों में से ९०% प्रतिशत का तो पता ही तब चलता है, जब फेसबुक उनका जन्म दिन बताता है। सुबह सुबह उठ कर लाइक गिनने की आदत तो अब खैर नहीं रही। जैसे बचपन में रात में कंचे गिन कर सोते थे कि दिन भर में कितना जीते और फिर सुबह उठकर गिनते थे कि रात में किसी ने चुरा तो नहीं लिये। कभी चोरी नहीं हुए। बड़े हो गए तो अब कंचों की जगह रुपयों ने ले ली है। सुबह उठकर फिर गिनना पड़ता है। हालांकि चौकीदार रखा हुआ है, मगर हर सुबह कुछ रुपये कम ही निकलते हैं। चौकीदार से पूछो तो वो फूट फूट कर रोने लगता है, आंसू बहाने लगता है। कहता है कि अगर मैं चोर साबित हो जाऊं तो बीच चौराहे पर फांसी दे देना। आंसू सहानभूति बटोर लेते हैं और हम अपनी किस्मत को ही चोर मान कर रजाई ओढ़े कुड़कुड़ाते रहते हैं। रात भर चौकीदार आवाज लगाता रहता है -जागते रहो!! जागते रहो!! और हम सोचते रहते हैँ कि अगर हमें ही जागते रहना होता तो फिर भला तुमको रखने का अभिप्राय क्या है?   

खैर, जन्म दिन की बधाई देने के लिए जब वो सूची सुबह सुबह देखते हैं, तब पता चलता है कि अरे!! यह भी हमारे मित्र हैं? अगर जन्म दिन न आता तो हम जान ही न पाते कि यह हमारे मित्र हैं। फिर उनके मैसेज बॉक्स में बधाई टाइप करते हुए पता चलता है कि पिछले पाँच साल से बंदे को बिना नागा बधाई दे रहे हैं और वो हैं कि कभी धन्यवाद कहना भी जरूरी न समझा। एकदम से गुस्सा आ जाता है।  अपने आपको सांसद समझता है क्या? सिर्फ चुनाव आने पर दिखना है बाकी तो पता भी न चले कि ये हमारे सांसद हैं।

अच्छा है जन्म दिन हर साल आता है। अब हम जागरूक हो गए हैं। हर दिन जिन निष्क्रिय मित्रों का  जन्म दिन दिखाता है, उन्हें जन्म दिन के तोहफे में अनफ्रेंड कर उन्हें मित्रता के बोझ से मुक्त कर देते हैं और जो नए सक्रिय मित्र कतार में हैं, उन्हें अपनी मित्र मंडली में शामिल कर लेते हैं। इस जागरूकता के चलते धीरे धीरे ही सही, सक्रिय मन माफिक मित्र शामिल होते जा रहे हैं,वरना तो ये निष्क्रिय जाने कब से जगह घेरे बैठे थे।

सोचता हूँ कि अगर यही जागरूकता आमजन में भी आ गई तो वो दिन दूर नहीं, जब सिर्फ चुनाव के वक्त दिखने वाले निष्क्रिय नेताओं को जनता अनफ्रेंड करने में कतई न हिचकिचाएगी और मनमाफिक नेता ही चुनाव जीत कर जाएगा। सक्रियता ही नेता बने रहने का पैमाना होगी।

इन्तजार है इस जागरूकता आंदोलन का- फिर शायद किसी अन्य आंदोलन की जरूरत ही न पड़े।

-समीर लाल ‘समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार फरवरी २१, २०२१ के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/58582317

 

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