शनिवार, फ़रवरी 27, 2021

चाहे जो हो जाए – गांधीवाद पर आंच न आए।

 


तिवारी जी एक अत्यन्त जागरूक नागरिक हुआ करते थे। जागरूकता का चरम ऐसा कि सरकार अगर पटरी से जरा भी दायें बायें हुई और तिवारी जी आंदोलन पर। हर आंदोलन का अपना अपना अंदाज होता है जो कि उस आंदोलन के सूत्रधार पर निर्भर करता है। तिवारी जी के आंदोलनों का अंदाज ईंट से ईंट बजा देने वाला होता था। मजाल है कि तिवारीजी आंदोलन पर हों और सरकार का कोई भी मंत्री चैन से सो पाये। सोना तो दूर की बात है, बैठना भी मुश्किल हो जाता था।

सरकार की पुरजोर कोशिश होती कि अव्वल तो तिवारी जी आंदोलन पर बैठे ही न और अगर बैठ गए हैं तो जितना जल्दी हो सके, उनकी मांगें मान कर आंदोलन खत्म करवाया जा सके।

तब तक वह चूंकि सिर्फ अत्यन्त जागरूक नागरिक थे अतः उन्हें अपने गांधीवादी होने का गौरव भी था और गांधीवाद बचाए रखने का जज्बा भी। कई बार सरकारों ने आंदोलन न करने के लिए उन्हें रुपये, पद आदि के प्रलोभन भी देने की पेशकश भी की किन्तु हर बार उससे मामला बिगड़ा ही। सादा जीवन और उच्च विचार वो अपनाते भी थे और सिखलाते भी थे।

उनके कई चेले उन्हीं से सादा जीवन और उच्च विचार की शिक्षा लेकर आंदोलनों के राजमार्ग पर सरपट भागते हुए विधायक और सांसद हो गए।  सभी ने अपनी जमीन जायदाद, कोठियाँ, गाड़ियों और बैक बैलेंस आदि के किले को इतना मजबूत बना लिया है कि कोई बड़े से बड़ा सेंधिया भी उसमें सेंध लगा कर उनके गांधीवाद को हानि नहीं पहुंचा सकता। जैसे जैसे उन्हें गांधीवाद पर खतरे के बादल मंडराते दिखते वैसे वैसे वो अपने किले की सभी दीवारों को मजबूत करते चले जाते।

किन्तु तिवारी जी जागरूक नागरिक बने रहे। आंदोलनों की रफ्तार और अंदाज वैसे ही कायम रहा और ईंटों से ईंट बजती रहीं। तिवारी जी गांधीवाद ओढ़ते बिछाते रहे और चेले विधायक सांसद बनते रहे। तिवारी जी का मानना था कि जब तक देश में एक भी नागरिक भूखा सोएगा तब तक मैं सरकार को सोने नहीं दूंगा। तिवारी जी के लिए कहा जाता था कि गेंदबाजी तो कोई भी कर सकता है मगर तिवारी जी की तरह फिरकी फेकना सबके बस की बात नहीं। मंहगाई, बेरोजगारी, भूखमरी, स्वच्छता, बिजली पानी जैसे आम मुद्दों को भी ऐसे खास बनाकर आंदोलन किया करते जैसे ये आज आई एकदम नई समस्या है और इसके लिए मौजूदा सरकार जिम्मेदार है। न जाने कितनी सरकारें वो इन्हीं मुद्दों पर गिरवा चुके हैं।

कहते हैं हिमालय फतह करने के लिए भी एक बार में एक कदम ही बढ़ाना होता है। एक एक कर कदम बढ़ते रहे और वो दिन भी आया जब आंदोलनप्रेमी तिवारी जी की जागरूकता चरम सीमा पर पहुँच गई। बड़ी तादाद में विधायक और सांसद चेलों के संग सरकार में विराजमान हुए। गांधीवाद का सबसे बड़ा उपासक जब सत्ता में काबिज़  हुआ तो उसने गांधीवाद को सेंधियों से बचाने के इत्ता मजबूत किला बनाया कि उसकी कुछ दिवारें तो विदेशों तक जा पहुंची। स्वीटजरलैण्ड में सबसे ऊंची और गुप्त दीवार तानी गई।

अब तिवारी जी कहते पाये जाते है कि अच्छे लोग अच्छे इसीलिए कहलाते हैं क्यूँ कि बुरे लोग भी हैं समाज में। अमीर अमीर कहलाता ही इसलिए है क्यूँ कि कोई गरीब भी है। सुख का मजा ही क्या पता लगेगा अगर दुख न हों। इसलिए मंहगाई, बेरोजगारी, भूखमरी का रोना छोड़ इसे साक्षी भाव से देखो एवं स्वीकारो। हर सिक्के के दो पहलू होते हैं – उनको समझने की कोशिश करो।

पेट्रोल मंहगा हुआ है तो पैदल चलो, साईकल चलाओ और अपना स्वास्थ्य  बनाओ। स्वास्थ्य  अनमोल है। गैस मंहगी हुई है तो सब्जियां कच्ची खाओ – सलाद खाओ। पकाने से सब्जियों का नूट्रिशन खत्म होता है। अतः उत्तम भोजन करो और स्वस्थ जीवन जिओ। क्या हुआ अगर पेट्रोल और गैस महंगा हो गया? डॉक्टर और दवाई का जो खर्चा बचा आज और भविष्य में – उस को निहारो और खुश रहो। खुश रहने से भी स्वास्थ्य  मे इजाफा ही होता है।

तिवारी जी को लगता है कि देश भर में रसोई का कचरा उठाने वाली नगर निगम की सारी ट्रक बेच देना चाहिए और लोगों को कम्पोस्ट खाद आंगन में गड्ढा खोद कर इस कचरे से बनाना चाहिए। फिर इसी खाद का इस्तेमाल कर घर की बगिया में ऑर्गैनिक सब्जियां उगाओ और बिना पकाये कच्ची ही खाओ। सब्जी मंहगी होने का टंटा भी खत्म और स्वास्थ्य भी उत्तम।

सब उपाय बता कर तिवारी जी नगर निगम के सारे ट्रक बेचने में व्यस्त हो गए हैं। किला और बुलंद करना है। आखिर गांधीवाद को हर हाल में सेंधियों की सेंधबाजी से बचाना जो है।

चाहे जो हो जाए – गांधीवाद पर आंच न आए।

-समीर लाल ‘समीर’  

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार फरवरी 28, 2021 के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/58739659

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शनिवार, फ़रवरी 20, 2021

शायद फिर किसी आंदोलन की जरूरत नहीं पड़ेगी

 


आम जन हैं तो आम जन की तरह ही सुबह सुबह उठते ही फेसबुक खोल कर बैठ जाते हैँ। वो जमाने अब गुजरे जब मियां फाकता उड़ाया करते थे या लोग कहा करते थे कि 

समय बिताने के लिए, करना है कुछ काम,

शुरू करो अंताक्षरी, ले कर हरि का नाम!!

फेसबुक पर रोज का पहला काम कि अपनी आखिरी पोस्ट पर कितने लाइक आए और दूसरा वो जो फेसबुक मुस्तैदी से बताता है कि आज किस किस का जन्म दिन है। १०० -२०० मित्र थे तो हर एक दो दिन में एकाध का जन्म दिन होता था बस १ जनवरी और १ जुलाई को कुछ ज्यादा लोगों का। ५० पार लोगों में अधिकतर उस जमाने को याद कर सकते हैं जब मोहल्ले के चाचा बच्चों को स्कूल ले जाकर भर्ती करा देते थे। अब सब बच्चों के जन्म दिन कहां तक याद रखें तो स्कूल खुलने के दिन से ५ साल घटा कर उम्र लिखा देते थे।  १ जुलाई को हिन्दी स्कूल खुलते थे तो ऐसे सब बच्चों के जन्म दिन १ जुलाई। अंग्रेजी स्कूल का सत्र १ जनवरी से शुरू होता था अतः वहां १ जनवरी वालों की बहुतायत होती है। आज यह बात आश्चर्यजनक लग सकती है मगर आज आश्चर्य तो इस बात पर भी होता है कि उस जमाने में कुछ नेता सच में ईमानदार भी होते थे। अब तो सोच कर भी विश्वास नहीं होता।

खैर, फेस बुक पर १०० -२०० मित्र वाली बात भी १० साल से ज्यादा पहले की बात है। अब जब आंकड़ा अधिकतम पर पहुँच कर रुक गया है तो इन ५००० मित्रों में से ९०% प्रतिशत का तो पता ही तब चलता है, जब फेसबुक उनका जन्म दिन बताता है। सुबह सुबह उठ कर लाइक गिनने की आदत तो अब खैर नहीं रही। जैसे बचपन में रात में कंचे गिन कर सोते थे कि दिन भर में कितना जीते और फिर सुबह उठकर गिनते थे कि रात में किसी ने चुरा तो नहीं लिये। कभी चोरी नहीं हुए। बड़े हो गए तो अब कंचों की जगह रुपयों ने ले ली है। सुबह उठकर फिर गिनना पड़ता है। हालांकि चौकीदार रखा हुआ है, मगर हर सुबह कुछ रुपये कम ही निकलते हैं। चौकीदार से पूछो तो वो फूट फूट कर रोने लगता है, आंसू बहाने लगता है। कहता है कि अगर मैं चोर साबित हो जाऊं तो बीच चौराहे पर फांसी दे देना। आंसू सहानभूति बटोर लेते हैं और हम अपनी किस्मत को ही चोर मान कर रजाई ओढ़े कुड़कुड़ाते रहते हैं। रात भर चौकीदार आवाज लगाता रहता है -जागते रहो!! जागते रहो!! और हम सोचते रहते हैँ कि अगर हमें ही जागते रहना होता तो फिर भला तुमको रखने का अभिप्राय क्या है?   

खैर, जन्म दिन की बधाई देने के लिए जब वो सूची सुबह सुबह देखते हैं, तब पता चलता है कि अरे!! यह भी हमारे मित्र हैं? अगर जन्म दिन न आता तो हम जान ही न पाते कि यह हमारे मित्र हैं। फिर उनके मैसेज बॉक्स में बधाई टाइप करते हुए पता चलता है कि पिछले पाँच साल से बंदे को बिना नागा बधाई दे रहे हैं और वो हैं कि कभी धन्यवाद कहना भी जरूरी न समझा। एकदम से गुस्सा आ जाता है।  अपने आपको सांसद समझता है क्या? सिर्फ चुनाव आने पर दिखना है बाकी तो पता भी न चले कि ये हमारे सांसद हैं।

अच्छा है जन्म दिन हर साल आता है। अब हम जागरूक हो गए हैं। हर दिन जिन निष्क्रिय मित्रों का  जन्म दिन दिखाता है, उन्हें जन्म दिन के तोहफे में अनफ्रेंड कर उन्हें मित्रता के बोझ से मुक्त कर देते हैं और जो नए सक्रिय मित्र कतार में हैं, उन्हें अपनी मित्र मंडली में शामिल कर लेते हैं। इस जागरूकता के चलते धीरे धीरे ही सही, सक्रिय मन माफिक मित्र शामिल होते जा रहे हैं,वरना तो ये निष्क्रिय जाने कब से जगह घेरे बैठे थे।

सोचता हूँ कि अगर यही जागरूकता आमजन में भी आ गई तो वो दिन दूर नहीं, जब सिर्फ चुनाव के वक्त दिखने वाले निष्क्रिय नेताओं को जनता अनफ्रेंड करने में कतई न हिचकिचाएगी और मनमाफिक नेता ही चुनाव जीत कर जाएगा। सक्रियता ही नेता बने रहने का पैमाना होगी।

इन्तजार है इस जागरूकता आंदोलन का- फिर शायद किसी अन्य आंदोलन की जरूरत ही न पड़े।

-समीर लाल ‘समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार फरवरी २१, २०२१ के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/58582317

 

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रविवार, फ़रवरी 14, 2021

इस दुनिया में सोने के हिरन नहीं होते

 


जैसे बचपन में रेल गाड़ी के साथ साथ चाँद भागा करता था और रेल रुकी और चाँद भी थम जाता था। चाँद को भागता देखने के लिए रेल का भागना जरूरी है। जो इस बात को समझता है वो जानता है कि देश के विकास को देखना है तो खुद का विकसित होते रहना आवश्यक है। खुद का विकास रुका तो देश का विकास रुका ही नजर आयेगा। हम आप सब मिलकर ही तो देश होते हैँ। खुद का विकास रोक कर रोज पान की दुकान पर वैसे किस विकास का इन्तजार कर रहे हो और खुद को कोसने की बजाय सरकार को कोस रहे हो।

नेताओं को देखो कितने विकसित होते जा रहे हैं दिन प्रति दिन, इसलिए उन्हें विकास भी दिखता है। जब चुन कर गए थे तो एक बंगला था, आज न जाने कितने प्लाट, मॉल, रुपयों के वाटर फॉल हैं। उनसे शिकायत करोगे कि विकास नहीं हो रहा तो वो नाराज ही होंगे न! देश का विकास देखने के लिए आत्म निर्भर बनो। खुद का विकास करो।

अपने घर में और घर के आस पास कूड़ा फैला कर रखोगे तो देश कैसे स्वच्छ होगा चाहे लाख स्वच्छता अभियान चलता रहे। स्मार्ट सिटी भी हमारी तुम्हारी स्मार्टनेस से ही बनती है। खुद ढपोरशंख बने स्मार्ट सिटी को तलाशने वालों के वही हाथ लगता है जो तुम्हें हाथ लग रहा है।

कंप्यूटर की दुनिया में एक जुमला है ‘गीगो’ – GIGO – ‘गारबेज इन गारबेज आउट’  याने कि कचरा डालोगे तो कचरा ही निकलेगा। ये बात न सिर्फ आपकी सोच पर लागू होती बल्कि इसका जीता जागता उदाहरण देखना हो तो अपने चुनी हुई सरकारें ही देख लो – कचरा चुन कर भेजोगे और आशा करोगे कि वो सोना उगलेंगे तो बौड़म कौन कहलाया- तुम कि जिनको तुमने चुन कर भेजा है?

वैसे जिसे भी चुनो उसको रोल मॉडल बना लो तो अजब सा सुकून मिलता है वरना ठगे से होने का अहसास होता है। ९० फसीदी जनता इसी चक्कर में मुंह बाये बैठी है। यहाँ रोल मॉडल का भक्त हो जाना भी जरूरी है। भक्ति भाव हार्ड वर्क जैसा ही है, जिसका कोई आल्टर्नेट नहीं है। जैसे कि एक थे जो गरीबी को मानसिक अवस्था मानते थे और एक हैँ कि पकोड़े तलने को रोजगार मानते हैँ। दोनों का निचोड़ गीगो ही है मगर काँटों को दरकिनार कर गुलाब तोड़ लाना या कीचड़ से दामन बचा कर न सिर्फ कमल तोड़ लाना बल्कि उसकी डंठल से कमलगट्टे की सब्जी बना कर सुस्वादु भोजन उदरस्थ कर संतुष्ट हो लेना भी इसी मान्यता को प्रमाणित करना है।

सूरज को शीशे में कैद कर उसकी जगमग से किसी की आखों को जगमग कर उसे किसी तिलस्म में गुमा देना ही राजनीति का आधार है। यही राजनीति का मूल मंत्र है। हमारे सभी नेता ऐसा ही आईना थामे हमें दिगभ्रमित करने की महारत हासिल किये हुए हैँ और हम हैं कि उन्हें अपना रहनुमा मानकर भक्तिभाव में लीन सोचते हैं कि वो हमें राह दिखा रहे हैं। चौंधियाई आंखों से दिखते मंजर में सरकार में छिपे मक्कार भी परोपकार करते नजर आते हैँ। इससे बेहतर और मुफ़ीद बात क्या हो सकती है सत्ता में काबिज लोगों के लिए।

काश!! कोई ऐसी क्रिस्टल बॉल बने जो आमजन को उस आईने का सच बताए जो हर नेता अपने हाथ में थामें उनकी आँखों को चौंधिया रहा है। यूवी रे वाले चश्मे तो बाजार का वैसा ही भ्रम है जैसे कि गोरा बनाने वाली बाजार में बिकती क्रीम। हम से बेहतर इसे कौन जान पाएगा? अब तो कन्हैया लाल बाजपेई की निम्न पंक्तियां जीवन का सूत्र बन गई है:

आधा जीवन जब बीत गया, बनवासी सा गाते रोते
तब पता चला इस दुनियां में, सोने के हिरन नहीं होते।

काश!! आमजन भी इस सत्य को जितना जल्दी पहचान ले – उतना बेहतर!!    

मगर आमजन का क्या है- इतना उदार है कि सीटी बजाने को ओंठ गोलियाता है मगर निकलती बस हवा है वो दोष ठंड को मढ़ देता है। ठंड भी सोचती होगी कि तेरी सीटी न बजने में मेरा क्या दोष! नाच न आवे आँगन टेढ़ा!!

हम वही तो हैँ जो सड़क की टूट फूट का जिम्मेदार बरसात को मानने के आदी हैँ।

-समीर लाल ‘समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के सोमवार फरवरी १५, २०२१  के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/58444040

 

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शनिवार, फ़रवरी 06, 2021

काश! हर मौन साधक बुद्ध बन जाता!!

 


तिवारी जी सुबह से पान की दुकान पर बैठे बार बार थूक रहे थे। पूछने पर पता चला कि बहुत गुस्से में हैं और गुस्सा थूक रहे हैं। वह इस मामले में एकदम आत्म निर्भर हैं। खुद ही मसला खोजते हैं, खुद ही गुस्सा हो जाते हैं और फिर खुद ही गुस्सा थूक कर शांत भी हो जाते हैं। उनका मानना है कि पान खाकर यूं भी थूकना तो है ही, फिर क्यूँ न साथ गुस्सा भी थूक दिया जाए।

गुस्से का कारण पूछने पर वो चुप्पी साध गए। ऐसा नहीं कि तिवारी जी को चुप रहना पसंद हो। वह तो बहुत बोलते हैं और कई बार तो क्या अक्सर ही इतना बोलते हैं कि बोलते बोलते पता ही नहीं चलता कि तिवारी जी बोल रहे हैं या मुंगेरीलाल के हसीन सपने का एपिसोड चल रहा है। बोलने की प्रेक्टिस ऐसी कि श्रोता सामने न भी हो तो भी रेडियो पर ही बोल डालते हैं उसी त्वरा के साथ।

रेडियो पर बोलने वालों को मैंने सदा ही अचरज भरी निगाहों से देखा है। गाना सुनवाना या समाचार पढ़ना तो फिर भी एक बार को समझ में आ जाता है मगर टीवी के रहते रेडियो से बात कहना? यह समझ के परे है। आज जब घर घर टीवी है और हर टीवी दिखाने वाला अपने घर का है तो भी रेडियो पर अपनी बात कहना कभी कभी संशय की स्थिति पैदा करता है? घंसु का सोचना है कि कई बार तिवारी जी दुख जताते हुए आँख से मुस्करा रहे होते हैं तो रेडियो ही सुरक्षा कवच बनता है।

बोलने के इतने शौकीन होने के बावजूद भी, तिवारी जी हर उस मौके पर चुप्पी साध लेते जब उन्हें वाकई बोलना चाहिए। पान की दुकान पर जब जब भी लोगों को उम्मीद बंधी कि आज तिवारी जी बोलें तो शायद समस्या का समाधान मिले, तब तब तिवारी जी पान दबाए चुप बैठे रहे। अहम मुद्दों पर उनकी मौन साधना देख कर लगता है कि इतनी लंबी साधना के बाद जब कभी वह बोलेंगे तो शायद बुद्ध वचन झरेंगे लेकिन हर मौन साधना तोड़ने के साथ साथ उन्होंने बुद्ध वाणी का सपना भी तोड़ा है। ढाक के तीन पात कहावत को हमेशा चरितार्थ किया है।

आज जब गुस्सा थूकने के बाद उन्होंने मुंह खोला तो मुझे लगा कि करोना राहत पर कुछ बोलेंगे। मगर वो कहने लगे, अब जमाना पहले वाला नहीं रहा। आजकल के तरीके बदल गए हैं। हम जब नगर निगम के सामने आंदोलन किया करते थे तो सरकारें थर्राती थीं। आंदोलन पर जाने के पहले घर से कंकड़ उछाल कर चलते थे कि अब लौटेंगे तभी जब या तो हमारी मांग मान ली जाए या सरकार खुद चली जाए। आमरण अनशन पर बैठा करते थे। आज यहां जिंदा बैठे हैं यही इस बात का गवाह है कि आजतक के सभी आमरण अनशन सफल रहे और कभी मरण तक जाने की नौबत ही नहीं आई।

बताते बताते भूख हड़तालों की दौरान होने वाली रजाई दावतों की गौरवशाली परंपरा के पर भी प्रकाश डाला। किस तरह रात में पंडाल के पीछे से खाने और पीने की सप्लाई सीधे रजाई के भीतर हो जाया करती थी। भरी गरमी में भी हड़ताली दोपहर में रजाई ओढ़े समोसे दबा लेता था। मान्यता यह थी कि चोरी करने में कोई बुराई नहीं है, चोरी करते पकड़े जाना बुरा है। खैर, यह मान्यता तो आज भी उतनी ही हरी है और यह हरियाली सदाबहार है जो कभी न जाने वाली है।

आगे कहने लगे कि एक बात का मलाल हमेशा रहेगा कि हमारे समय ट्विटर नहीं था वरना विदेशों में अपनी पहचान भी कम न थी। हमारे पड़ोसी शर्मा जी लड़की अमरीका में ब्याही है, और कुछ नहीं तो वो ही समर्थन में ट्वीट कर देती। जिस बात को मनवाने या सरकार को गिरवाने में जो 6 -6 महीने लगा करते थे, वो काम चार ट्वीट में दो महीने में ही हो लेता।

खैर, नया जमाना है, नया तरीका है तो मांगे मनवाना और मांगे न मानना भी नया ही होगा। बाड़ देख ली, कील की पैदावार देख ली। अब देखना है कि फसल कौन सी और कब कटती है?

-समीर लाल ‘समीर’

 

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार फरवरी ०७, २०२१ के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/58262690

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शनिवार, जनवरी 30, 2021

आपदा से निकली ज्ञान की गंगा

 


आपदा में चाहे लाख बुराई हो लेकिन एक बात तो है कि वह एक बड़ी आबादी को ज्ञानी बना जाती है। एक दफा हमारे शहर में बहुत तगड़ा भूकंप आया था। देखते देखते घंसु से लेकर तिवारी जी तक को न सिर्फ इपि सेंटर, रिक्टर स्केल, आफ्टर शॉक आदि जैसे शब्दों का पहली बार पता चला बल्कि वो उनका खुल कर इस्तेमाल भी करने लगे। एक दिन तिवारी जी गुस्से में घंसु से बोल रहे थे अगर हमने मूँह खोल दिया तो संसद में कम से कम ८ रिक्टर स्केल का भूकंप आ जाएगा। हमको ऐसे ऐसे राज पता हैं कि सब लपेटे जायेंगे। घंसु हँसते हुए बोल रहा था कि जो बच जाएंगे, वो आफ्टर शॉक में लपेटे जाएंगे। ज्ञान के स्तर में एकाएक इतना इजाफा तो आपदा के ही बस की बात है। वरना तो घंसु ३ साल तक भरपूर कोशिश के बाद भी ८ वीं न पास कर पाये थे।

फिर जब सुनामी आया तो उनको पता चला कि सुनामी की स्पेलिंग टी से शुरू होती है, तो तिवारी जी ने भी आईने में खुद को इवारी जी बुला कर देखा था। पसंद नहीं आया तो खारिज कर दिया – कोई कृषि कानून तो है नहीं कि खारिज न किया जा सके। सुनामी के मद्दे नजर तब वो नेता जी के लिए कहते पाये गए कि गजब का बंदा है। रेडियो से भी इतनी इतनी ऊंची ऊंची फेंकता है कि सुनामी की लहरें भी बौनी नजर आयें। समुन्द्र वाली सुनामी का तो फिर भी पता कर लो मगर इनके फेके का इपि सेंटर कहाँ है, कोई नहीं जान पाता है। घंसु कहने लगा कि हमने सुना है – ये फेंकते दिल्ली से हैँ और इपि सेंटर मुंबई में होता है।

खैर ये सब आपदा तो क्षण पर को आईं थी, तब इतना ज्ञान दे गईं। अब जो आपदा आई है जो जाने का नाम ही नहीं ले रही है, इससे प्राप्त ज्ञान का तो क्या कहा जाए? लोग पीएचडी हुये जा रहे हैं। तिवारी जी तो अपने नाम के आगे मानद उपाधि प्राप्त डॉक्टर लिखने भी लगे हैँ। किसने दी यह मानद उपाधि पूछने पर उनके बोलने से पहले ही उनके भक्त घंसु गाली बकने लग जाते हैं। तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई डॉक्टर साहेब से ये पूछने की? डॉक्टर साहेब कितनी मेहनत करते हैं। पान के ठेले पर १६ १६ घंटे बैठे राष्ट्र हित में बिना थके ज्ञान बिखरते हैं। इनके बिखेरे ज्ञान कणों को न जाने कितने मोर चुग चुग कर अपना जीवन यापन करते हैँ और सेल्फी खिंचाते हैं और तुम पूछते हो किसने दी यह मानद उपाधि? तुम उस समय कहाँ थे जब बाकियों को मानद उपाधि दी जाती थी? पूछने वाला अपना सा मूँह लेकर रह जाता और तिवारी जी और घंसु एक दूसरे को देखकर मुस्कराते।

आजकल लोग एक नया शब्द सीख गए हैं ‘एसिम्प्टमैटिक’। पूछने पर अर्थ बताया कि जिसके लक्षण नहीं दिखते किन्तु वो चीज होती है। जैसे कइयों को न जुकाम, न खांसी है, न बुखार मगर टेस्ट करवाओ तो कोविड निकल आता है।

‘एसिम्प्टमैटिक’ शब्द पर डॉक्टर तिवारी फरमाते हैं कि अगर आप समझना चाहते हैं तो मैं आपको उदाहरण देकर समझा सकता हूँ। इसका सबसे अच्छा उदाहरण देश में हो रहा विकास है। एकदम एसिम्प्टमैटिक विकास। लक्षण कुछ दिखते नहीं, टेस्टिंग के कोई साधन नहीं मगर बताया जा रहा है कि कितना सारा विकास हो गया है।

अक्सर तो एक शिक्षा मंत्री का शिक्षित होना भी एसिम्प्टमैटिक ही रहता है। न डिग्री, न ज्ञान मगर हैं शिक्षा के मंत्री।

बाकी सब तो छोड़ो, यहाँ तो चुनाव के नतीजे भी एसिम्प्टमैटिक ही हैं। हवा चलती है किस दिशा की और नतीजे की पतंग उड़ती है विपरीत दिशा में। विपक्ष है कि चुनावी रणनीति बनाने की बजाए पतंग कटने के इन्तजार में ‘काइट रनर’ होने की प्रेक्टिस कर रहा है। कब किसान इनकी पतंग काटे और ये भाग कर लूट लें। खुद के भरोसे तो कुछ होने से रहा। एक उम्मीद ये भी है कि कभी कभी पतंग खुद ही पेड़ और झाड़ियों में उलझ जाती है और उड़ाने वाले को खुद ही धागा तोड़ कर छोड़ देना पड़ता है।

बाकी नए आयाम और भी आ गए हैँ जैसे कि वादों की होम डिलेवरी, आभासी सेवाओं का कर्ब साईड पिक अप और आपकी उम्मीदों पर अनिश्चित कालीन लॉकडाउन।

अभी तो जाने में समय है इस आपदा को – ज्ञानियों की सुनामी ही न आ जाए।

-समीर लाल ‘समीर’

 भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जनवरी ३१,२०२१ के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/58094761


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शनिवार, जनवरी 23, 2021

बिजली रानी, बड़ी सयानी

 



समाचार पढ़ा:

"मेसाचुसेट्स विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने प्रयोग कर दिखा दिया है कि अब बिजली के तार की जरूरत नहीं पडेगी। उन्होंने बिना तार के बिजली को एक स्थान से दूसरे स्थान पहूँचा कर दिखा दिया. वैज्ञानिकों ने बताया है कि यह रिजोनेंस नामक सिद्धांत के कारण हुआ है।"

यह खबर जहां एक तरफ खुशी देती है तो दूसरी तरफ न जाने कैसे कैसे प्रश्न खड़े कर देती है दिमाग में. अमरीका में तो चलो, मान लिया.

मगर भारत में?

एक मात्र आशा की किरण, वो भी जाती रहेगी. अरे, बिजली का तार दिखता है तो आशा बंधी रहती है कि आज नहीं तो कल, भले ही घंटे भर के लिए, बिजली आ ही जायेगी. आशा पर तो आसमान टिका है, वो आशा भी जाती रहेगी.

सड़कें विधवा की मांग की तरह कितनी सूनी दिखेंगी. न बिजली के उलझे तार होंगे और न ही उनमें फंसी पतंगे होंगी. जैसे ही नजर उठी और सीधे आसमान. कैसा लगेगा देखकर. आँखे चौंधिया जायेंगी. ऐसे सीधे आसमान देखने की कहाँ आदत रह गई है.

चिड़ियों को देखता हूँ तो परेशान हो उठता हूँ. संवेदनशील हूँ इसलिये आँखें नम हो जाती हैं. उनकी तो मानो एक मात्र बची कुर्सी भी जाती रही बिना गलती के. ये पंछी तो बेचारे चुपचाप ही बैठे थे बिना किसी बड़ी महत्वाकांक्षा के. पेड़ तो इन निर्मोहि मानवों ने पहले ही नहीं छोड़े. बिजली के तार ही एकमात्र सहारा थे, लो अब वो भी विदा हो रहे हैं.

विचार करता हूँ कि जैसे ही ये बिना तार की बिजली भारत के शहर शहर पहुँचेगी तो उत्तर प्रदेश और बिहार भी एक न एक दिन जरुर पहुँचेगी. तब जो उत्तर प्रदेश का बिजली मंत्री इस कार्य को अंजाम देगा वो राजा राम मोहन राय सम्मान से नवाज़ा जायेगा.

राजा राम मोहन राय ने भारत से सति प्रथा खत्म करवाई थी और यह महाशय, उत्तर प्रदेश से कटिया प्रथा समाप्त करने के लिए याद रखे जायेंगे. जब तार ही नही रहेंगे तो कटिया काहे में फसांयेंगे लोग. वह दिन कटिया संस्कृति के स्वर्णिम युग का अंतिम दिन होगा और आने वाली पीढ़ी इस प्रथा के बारे में केवल इतिहास के पन्नों में पढ़ेगी जैसा यह पीढ़ी नेताओं की ईमानदारी के बारे में पढ़ रही है.

थोड़ा विश्व बैंक से लोन लेने में आराम हो जायेगा. अभी तो उनका ऑडीटर आता है तो झूठ नहीं बोल पाते, जब तक तार-वार नहीं बिछवा दें कि इस गाँव का विद्युतिकरण हो गया है. तब तो दिन में ऑडीटर को गाँव गाँव की हेलिकॉप्टर यात्रा करा कर बता दो कि १००% विद्युतिकरण हो गया है. तार तो रहेंगे ही नहीं तो देखना दिखाना क्या? शाम तक दिल्ली वापिस. पाँच सितारा होटल में पार्टी और लोन अप्रूव अगले प्रोजेक्ट के लिए भी.

एक आयाम बेरोजगारी का संकट भी है. अभी भी हालांकि अधिकतर बिजली की लाईनें शो पीस ही हैं, लेकिन टूट-टाट जायें, चोरी हो जायें तो कुछ काम विद्युत वितरण विभाग के मरम्मत कर्मचारियों के लिए निकल ही पड़ता है. एक अच्छा खासा भरा पूरा अमला है इसके लिए. उनका क्या होगा?

न तार होंगे, न टूटेंगे, न चोरी होगी. वो बेचारे तो बेकाम हो जायेंगे नाम से भी.

न मरम्मत कर्मचारियों की नौकरी बचेगी, न तार चोरों की रोजी और न उनको पकड़ने वाली पुलिस की रोटी. बड़ा विकट सीन हो जायेगा हाहाकारी का. कितनी खुदकुशियाँ होंगी, सोच कर काँप जाता हूँ. किसानों की खुदकुशी की घटना तो इस राष्ट्रव्यापी घटना के सामने अपना अस्तित्व ही खो देगी हालांकि अस्थित्व बचाकर भी क्या कर लिया. कौन पूछ रहा है. सरकार तो शायद अन्य झमेलों में उन्हें भूला ही बैठी है.

चलो चोर तो फिर भी गुंडई की सड़क से होते हुए डकैती का राज मार्ग ले कर विधान सभा या संसद में चले जायेंगे, जाते ही है, सिद्ध मार्ग है मगर ये बेकार बेकाम हुए मरम्मत कर्मचारी और पुलिस. इनका क्या होगा?

एक तार का जाना और इतनी समस्यायों से घिर जाना. कैसे पसंद करेगी मेरे देश की भोली और मासूम जनता!!

योजना अधिकारियों से करबद्ध निवेदन है कि जो भी तय करना, इन सब बातों पर चिन्तन कर लेना.

मेरा क्या, मैं तो बस सलाह ही दे सकता हूँ. भारतीय हूँ, निःशुल्क हर मामले में सलाह देना मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है.

-समीर लालसमीर

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जनवरी २४, २०२१ के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/57940740


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शनिवार, जनवरी 16, 2021

कलयुग का सेल्फी युग

 



जैसे एक आदमी होते हैं कई आदमी उसी तरह एक युग में होते हैं कई युग.

कलयुग के इस सेल्फी युग में जब व्यक्ति फोन खरीदने निकलता है तब उसमें फोन की नहीं, उस फोन में लगे कैमरे की खूबियाँ देखता है.. फोन की साऊन्ड क्वालिटी में भले ही थोड़ी खड़खड़ाहट हो, चाहे जगह जगह सिगनल लूज हो जायें.. मगर कैमरे की रिजल्ट चौचक होना चाहिये. यहाँ चौचक से यह तात्पर्य नहीं है कि तस्वीर की डीटेल एकदम विस्तार से दिखाये. अच्छे और चौचक रिजल्ट वाले कैमरे का यहाँ अर्थ है कि हम भले ही सच में कैसे भी दिखते हों, फोटो में कैमरा हमें सलमान और पत्नी को कटरीना दिखाये. बाकी की सारी डीटेल विस्तार से छिपाये, यही उम्मीद रहती है दिल में.

कहने का तात्पर्य यह कि आदतें कुछ यूँ बदली कि व्यक्ति खरीदता फोन है, चाहता अद्भुत कैमरा है जो उसे हीरो दिखाये. यह वैसा ही है जैसे इन्सान चुनता अपना नेता है मगर उसे मिलता फकीर है. और फकीर भी ऐसा..जिसके सेल्फी के चलते तो कई बार सेल्फी सोचती होगी अगर ये न होते तो मेरा क्या होता?  इसी शौक के चलते जब वे कश्मीर में नई बनी लंबी सुरंग में खड़े सेल्फी खींच कर यहाँ मोह मोह के धागे सुलझा रहे थे, उस वक्त ज्ञानी लोग उनकी इस सेल्फी के खींचने के कारण की पहेली बुझा रहे हैं.

सेल्फी का माहौल ऐसा चला कि सेल्फी खींचना एक विधा हो निकली. फटो का नाम बदल कर सेल्फी हो गया.   फोटो स्टूडियो खुल गये सेल्फी खींचने वाले..अपना अटपटा सा विज्ञापन करते कि हमारे यहाँ नेचुरल सेल्फी खींची जाती है..बिना सोचे हुए कि नेचुरल चाहता कौन है? लोग तो अपने अच्छे खासे चेहरे को पाऊट बना बना कर बन्दर सा कर लेते हैं..उस पर से फोटो शॉप फोन में ही..कभी कुकर जुबान लगा कर तो कभी सींग लगा कर.

ग्रुप टूर बस से उतरे लोग, हर पर्यटन स्थल के फेमस प्वाईंटस पर कतारबद्ध सेल्फी खींचने के लिए भीड़ लगाये खड़े हैं..दूर से देखो तो भेद कर पाना मुश्किल हो जाये कि सेल्फी खींचने वालों की कतार है या नोट बन्दी के समय वाली एटीएम की कतार है या अच्छे दिनों का इन्तजार करने वालों की..यहाँ भी संभावना वही कि जब तक नम्बर आये आये, बस चलने का समय हो गया..जो सेल्फी खींच पाया उसके चेहरे पर वही विजयी भाव जैसे उस वक्त जो नोट निकाल लेता था मशीन में नोट खत्म होने के पहले.

लम्बी लम्बी सेल्फी स्टिक निकल पड़ी हैं..हाथ का विस्तार सीमित है..लट्ठ का असीमित..शायद इसी लिए लठेतों से लोग डरते हैं. स्टिक दूर से सेल्फी लेगा..मतलब की ज्यादा कवरेज..कवरेज का जमाना है. जितना ज्यादा कवरेज, उतना सफल व्यक्तित्व.

बुजुर्ग परिशां दिखे..कि यह तो हद हुई कि दादी मर गई और बंदा उनकी डेथ बॉडी के साथ सेल्फी उतार कर फेस बुक अपडेट कर रहा है..है तो हद ही मगर उससे कम..जहाँ बंदें को बचाने के बदले उसकी आत्म हत्या की कोशिश को अपने बैकग्राऊण्ड में कैच कर शेयर कर देने की होड़ मची हो.

आज का इन्सान वक्त की महत्ता को अहसासता नहीं...आज का इन्सान गुलाब की महक को महकता नहीं..आज का इन्सान किसी के दर्द से गमजदा होता नहीं..आज का इन्सान उन्हें कैद करता है अपने फोन के कैमरे के माध्यम से..अपनी सेल्फी के साथ.....मात्र वक्त के साथ वो लम्हे बाँटने के लिए जो उसने खुद मिस कर दिये सेल्फी खींच कर बांटने में...बिना उन्हें अहसासे..

न जाने किस ओर ले जायेगा ये सेल्फी का युग इस युग को..इसलिए आज एक सेल्फी खींच लेते हैं कि कल काम आयेगी आज को परिभाषित करने के लिए...

-समीर लाल ’समीर’  

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जनवरी १७, २०२१ के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/57776633

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शनिवार, जनवरी 09, 2021

हे मानस के राजहंस, तुम भूल न जाने आने को!!

 

जिन्दगी का सफ़र भी कितना अजीब है. रोज कुछ नया देखने या सुनने को मिल जाता है और रोज कुछ नया सीखने.

पता चला कि दफ्तर की महिला सहकर्मी का पति गुजर गया. बहुत अफसोस हुआ. गये उसकी डेस्क तक. खाली उदास डेस्क देखकर मन खराब सा हो गया. आसपास की डेस्कों पर उसकी अन्य करीबी सहकर्मिणियाँ अब भी पूरे जोश खरोश के साथ सजी बजी बैठी थी. न जाने क्या खुसुर पुसुर कर रहीं थी. लड़कियों की बात सुनना हमारे यहाँ बुरा लगाते हैं, इसलिए बिना सुने चले आये अपनी जगह पर.

जो भी मिले या हमारे पास से निकले, उसे मूँह उतारे भारत टाईप बताते जा रहे थे कि जेनी के साथ बड़ा हादसा हो गया. उसका पति गुजर गया. खैर, लोगों को बहुत ज्यादा इन्टरेस्ट न लेता देख मन और दुखी हो गया. भारत होता तो भले ही न पहचान का हो तो भी कम से कम इतना तो आदमी पूछता ही कि क्या हो गया था? बीमार थे क्या? या कोई एक्सीडेन्ट हो गया क्या? कैसे काटेगी बेचारी के सामने पड़ी पहाड़ सी जिन्दगी? अभी उम्र ही क्या है? फिर से शादी कर लेती तो कट ही जाती जैसे तैसे और भी तमाम अभिव्यक्तियाँ और सलाहें. मगर यहाँ तो कुछ नहीं. अजब लोग हैं. सोच कर ही आँख भर आई और गला रौंध गया.

हमारे यहाँ तो आज मरे और गर सूर्यास्त नहीं हुआ है तो आज ही सूर्यास्त के पहले सब पहुँचाकर फूँक ताप आयें. वैसा अधिकतर होता नहीं क्यूँकि न जाने अधिकतर लोग रात में ही क्यूँ अपने अंतिम सफर पर निकलते हैं. होगी कोई वजह..वैसे टोरंटो में भी रात का नजारा दिन के नजारे की तुलना में भव्य होता है और वैसा ही तो बम्बई में भी है. शायद यही वजह होगी. सोचते होंगे कि अब यात्रा पर निकलना ही है तो भव्यता ही निहारें. खैर, जो भी हो मगर ऐसे में भी अगले दिन तो फूँक ही जाओगे.

मगर यहाँ अगर सोमवार को मर जाओ तो शनिवार तक पड़े रहो अस्पताल में. शानिवार को सुबह आकर सजाने वाले ले जायेंगे. सजा बजा कर सूट पहना कर रख देंगे बेहतरीन कफन में और तब सब आपके दर्शन करेंगे और फिर आप चले दो गज जमीन के नीचे या आग के हवाले. आग भी फरनेस वाली ऐसी कि ५ मिनट बाद दूसरी तरफ से हीरा का टुकड़ा बन कर निकलते हो जो आपकी बीबी लाकेट बनवाकर टांगे घूमेगी कुछ दिन. गज़ब तापमान..हड्ड़ी से कोयला, कोयले से हीरा जैसा परिवर्तन जो सैकड़ों सालों साल लगा देता है, वो भी बस ५ मिनट में.

खैर, पता लगा कि जेनी के पति का फ्यूनरल शनिवार को है. अभी तीन दिन हैं. घर आकर दुखी मन से भाषण भी तैयार कर लिया शेर शायरी के साथ जैसा भारत में मरघट पर देते थे. शायद कोई कुछ कहने को कह दे तो खाली बात न जाये इतने दुखी परिवार की. बस, यही मन में था और क्या.

शुक्रवार को दफ्तर में औरों से पूछा भी कि भई, कितने बजे पहुँचोगे? कोई जाने वाला मिला ही नहीं. बड़ी अजीब बात है? इतने समय से साथ काम कर रहे हैं और इतने बड़े दुखद समय में कोई जा नहीं रहा है. हद हो गई. सही सुना था एक शायर को, शायद यही देखकर कह गया होगा:

सुख के सब साथी, दुख का न कोई रे!!’

आखिर मन नहीं माना तो अपने एक साथी से पूछ ही लिया कि भई, आप क्यूँ नहीं जा रहे हो?

वो बड़े नार्मल अंदाज में बताने लगा कि वो इन्वाईटेड नहीं है.

लो, अब उन्हें फ्यूनरल के इन्विटेशन का इंतजार है. हद है यार, क्या भिजवाये तुम्हें कि:

भेज रही हूँ नेह निमंत्रण, प्रियवर तुम्हें बुलाने को,

हे मानस के राजहंस, तुम भूल न जाने आने को.’

हैं? मगर बाद में पता चला कि वाकई उनका फ्यूनर है STRICTLY ONLY BY INVITATION याने कि निमंत्रण नहीं है तो आने की जरुरत नहीं है.

गजब हो गया भई. तो निमंत्रण तो हमें भी नहीं आया है. फिर कैसे जायेंगे. कैसे बाँटूं उसका दर्द. हाय!!

सोचा कि शायद इतने दुख में भूल गई होगी. इसलिये अगले दिन सुबह फोन लगा ही लिया. शायद फोन पर ही इन्वाईट कर ले. चले जायेंगे. भाषण पढ देंगे. आंसू बहा लेंगे. भारत में राजनीति की है , आंसू तो कभी भी बहा सकते हैं

पता चला कि ब्यूटी पार्लर के लिए निकल गई है फ्यूनरल मेकअप के लिए. भारतीय हैं तो थोड़ा गहराई नापने की इच्छा हो आई और जरा कुरेदा तो पता चला कि ब्लैक ड्रेस तो तीन दिन पहले ही पसंद कर आई थी आज के लिए और मेकअप करवा कर सीधे ही फ्यूनरल होम चली जायेगी. कफन का बक्सा प्यूर टीक का डिज़ायनर रेन्ज का है फलाना कम्पनी ने बनाया है और गड़ाने की जमीन भी प्राईम लोकेशन है मरघटाई की. अगर इन्विटेशन नहीं है तो आप फ्यूनरल अटेंड नहीं कर सकते हैं मगर अगर चैरिटी के लिए डोनेशन देना है तो ट्रस्ट फण्ड फलाने बैंक में सेट अप कर दिया गया है, वहाँ सीधे डोनेट कर दें.

हम भी अपना मूँह लिए सफेद कुर्ता पजामा वापस बक्से में रख दिए और सोचने लगे कि अगर हमारे भारत में भी ऐसा होता तो भांजे का स्टेटमेन्ट भी लेटेस्ट फैशन के हिसाब से निमंत्रण पत्र में जरुर रहता:

"मेले मामू को छनिवाल को फूँका जायेगा. आप जलूल आना....चोनू"

-समीर लाल ‘समीर’

 

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जनवरी १० ,२०२१ के अंक में:

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शनिवार, जनवरी 02, 2021

नए जमाने के साथ कदमताल

 


नया जमाना आ गया था. एक या दो बच्चे बस. बेटा या बेटी-क्या फरक पड़ता है? दोनों ही एक समान.

शिब्बू नये जमाने के साथ कदम से कदम मिलाकर चलाने में विश्वास करने वाला था. खुली सोच का मालिक. ऐसा वो भी सोचता था और उसके जानने वाले भी.

एक प्राईवेट फर्म में सुपरवाईजर था.

एक बेटी की और बस! तय कर लिया कि इसी को पाल पोस कर इसे बहुत अच्छा भविष्य देना है. सबने खूब तारीफ की. माँ बाप ने कहा कि एक बेटा और कर लो, वो नहीं माना. माँ बाप को पुरातन ठहारा दिया और खुद को प्रगतिशील घोषित करते हुए बस एक बेटी पर रुक गया. पत्नी की भी कोई बात नहीं मानी. पौरुष पर उठती उंगलियों को प्रगतिशील मानसिकता ठेंगा दिखाती रही और वो अपने फैसले पर अडिग रहा.

खूब पढ़ाया बिटिया को. इंजिनियर बना गई आई टी में. नया जमाना था. आई टी का फैशन था. कैम्पस इन्टरव्यू हुआ और बिटिया का मल्टी नेशनल में सेलेक्शन हो गया. सब जैसा सोचा था वैसा चला.

मंहगाई इस बीच मूँह खोलती चली गई. माँ की लम्बी बिमारी ने जमा पूंजी खत्म कर दी. उम्र के साथ रिटायरमेन्ट हो गया. नया जमाना, नये लोग. पढ़ाई और नया काम सीखने में वह पुराना ही रह गया, बिना अपडेट हुआ..वर्कफोर्स से बाहर हो गया. उम्र ५८ पार हो गई. नया कुछ करने का जज्बा और ताकत खो गई. घर बैठ गया. बेटी उसी शहर में नौकरी करती रही. कई लाख का पैकेज. जरुरत भी क्या है कुछ करने की, वह सोचा करता. प्राईवेट कम्पनी में था तो न कोई पेंशन ही बनी और न कोई फंड मिला.

बिटिया को तो समय के साथ साथ बड़ी होना ही था तो बड़ी होती गई. शादी की फिक्र माँ को घुन की तरह खाने लगी मगर शिब्बू-उसे जैसे इस बात की फिक्र ही न हो.

पत्नी कहती तो झल्ला जाता कि तुम क्या सोचती हो, मुझे चिन्ता नहीं? जवान बेटी घर पर है. बाप हूँ उसका..चैन से सो तक नहीं पाता मगर कोई कायदे का लड़का मिले तब न!! किसी भी ऐरे गैरे से थोड़े ही न बाँध दूँगा. यह उसका सधा हुआ पत्नी को लाजबाब कर देना वाला हमेशा ही जबाब होता.

पत्नी अपने भाई से भी अपनी चिन्ता जाहिर करती. उसने भी रिश्ता बताया मगर शिब्बू बात करने गया तो उसे परिवार पसंद न आया. दो छोटी बहनों की जिम्मेदारी लड़के पर थी. कैसे अपनी बिटिया को उस घर भेज दे.

पत्नी इसी चिन्ता में एक दिन चल बसी. घर पर रह गये शिब्बू और उसकी बिटिया.

जितने रिश्ते आये, किसी न किसी वजह से शिब्बू को पसंद न आये. लड़की पैंतीस बरस की हो गई मगर शिब्बू को कोई लड़का पसंद ही नहीं आता.

लड़की की तन्ख्वाह पर ठाठ से रहता था और बिटिया ही उसकी देखरेख करती थी.

उस रोज शिब्बू को दिल का दौरा पड़ा और शाम को वो गुजर गया.

उसको डायरी लिखने का शौक था. उसकी डायरी का पन्ना जो आज पढ़ा: १० वर्ष पूर्व यानि जब बिटिया २५ बरस की थी और नौकरी करते तीन बरस बीत गये थे तथा शिब्बू रिटायर हो चुका था उस तारीख के पन्ने में दर्ज था...

शीर्षक: बिटिया की शादी

और उसके नीचे मात्र एक पंक्ति:

" मैं स्वार्थी हो गया हूँ."

आज भी न जाने कितने शिब्बू हमारे समाज में हैं जो कभी प्रगतिशील कहलाये मगर अपने स्वार्थवश बिटिया का जीवन नरक कर गये. प्रगतिशील इंसान की सोच भी कभी कितनी पतनशील हो सकती है?

बिटिया अब घर पर अकेले रहती है. अभी अभी दफ्तर सर घर जाने के लिये निकली है-बेमकसद!!

-समीर लाल ‘समीर’

 

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जनवरी ०३,२०२१ के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/57462723


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