शनिवार, जुलाई 24, 2021

जीवन में सफलता का अद्भुत रहस्य

 


तिवारी जी पान की दुकान की तरफ सर झुकाए चले आ रहे थे। हाथ में एक किताब थामे थे। किसी से कोई बात चीत नहीं। न जाने मन ही मन क्या सोच रहे थे। चेहरे की गंभीरता को देख कर अनुमान लगाया जा सकता था कि निश्चित ही किसी बड़ी योजना की उधेड़बुन में लगे हैं।

अभी सुबह का सात भी ठीक से नहीं बजा था। पान की दुकान अभी खोलने की तैयारी में चौरसिया जी लगे थे। तिवारी जी बेंच पर बैठ गए। नमस्ते बंदगी के बाद तिवारी जी अखबार में खो गए और किताब कंधे पर टंगे झोले में रख दी गई। बीच में बीच तिवारी जी झोलें में झांक लेते मानो किताब से पूछ रहे हों कि तुम ठीक से और आराम से तो हो न? कुछ चाय वगैरह तो नहीं पिओगी? ये तिवारी जी का नया सा स्वभाव था। पूर्व में कभी इतना चुप और इस तरह से बार बार झोले में झांकते उनको कभी नहीं देखा था।

याद आता है एक समय में तिवारी जी ने बिल्ली पाली थी। पाली तो क्या थी, न जाने कहां से आकर पल गई थी। सब उसे भगा देते थे और तिवारी जी ने भगाया नहीं तो उनकी होकर रह गई। तिवारी जी अकेले प्राणी – घर पर न खाना बनना और न चाय। सो दूध होने का सवाल ही नहीं, अतः बिल्ली के रह जाने से कोई नुकसान की भी संभावना नहीं थी। तिवारी जी स्वयं कभी मंदिर, कभी मित्र तो कभी रिश्तेदारी में खा पी कर मस्त रहते और चाय नाश्ता चौराहे पर कोई न कोई करा देता या कभी कदा मजबूरीवश खुद खरीद कर भी खा पी लेते थे। पिता जी कुछ दुकान मकान बनवा कर गुजरे थे अतः किराये से नित शाम की दारू और चखने का इंतजाम भी हो ही जाता था। तिवारी जी इसे बुजुर्गों का आशीष मान कर पूर्ण श्रद्धा से दारू ग्रहण करते। इसीलिए वो अक्सर पीकर भावुक हो जाते। नम आंखों से अपने बुजुर्गों को याद करते हुए कहते कि पहले के लोग कितने भविष्यदृष्टा हुआ करते थे। अब नई नस्लों में वो बात नहीं रही। बिल्ली भी मालिक का अनुसरण करते हुए अड़ोस पड़ोस में कहीं न कहीं दूध पर हाथ साफ कर ही लेती। ऐसा लगता था जैसे तिवारी जी और बिल्ली दोनों का यह मानना था कि ऊपर वाले ने जन्म दिया है तो भोजन पानी की व्यवस्था करना भी उसी की जिम्मेदारी है। कभी पड़ोसी बिल्ली की शिकायत करते भी तो तिवारी जी अव्वल तो यह कहते कि हमने उसे घर जैसी बड़ी चीज दे रखी है और तुम्हें उसको एक पाव दूध पिलाने तक में परेशानी है? तुममे कुछ मानवता बची भी है या नहीं? और अगर दान दक्षिणा से इतना परहेज है तो अपना घर बंद रखा करो। ये किसी और के घर खा पी आयेगी। प्रभु ने उसे धरती पर भेजा है तो उसके भोजन की व्यवस्था भी वो ही करता है। तुम नहीं तो किसी और का दरवाजा खुला छुड़वा देगा मगर अपने जीवों को भूखा नहीं रहने देगा। तिवारी जी तब उसे अपनी गोद में उठाये चौक आया करते थे और कोई कुत्ता उसे न झपट ले अतः उसे अपने झोले में डाल कर अखबार पढ़ने और बातचीत करने में मगन रहते। तब भी उनको बिल्ली के लिए झोले में बार बार झांकते कभी नहीं देखा था। बाद में वो बिल्ली मर गई थी मगर झोला कंधे पर बना रहा। अब बिल्ली की जगह किताब ने ले ली है मगर साथ ही तिवारी जी के व्यवहार में यह परिवर्तन भी आ गया है।

तब तक उनके मुंह लगे चेला घंसू भी चौक पर पधार चुके थे। आज उसने ठान ली थी कि वो तिवारी जी से किताब का रहस्य जानकर ही रहेगा। पहले तो तिवारी जी यह कर टालते रहे कि तुम नहीं समझोगे। मगर जब वो नहीं माना तो तिवारी जी को बताना पड़ा।

तिवारी जी ने बताया कि उन्हें व्हाटसएप से एक गहन ज्ञान की बात पता चली है कि यदि जीवन को सफल बनाना है तो किताब से दोस्ती करो। बस! तब से तिवारी जी एक बढ़िया किताब बाजार से खरीद लाए हैं। उसे एक अच्छे दोस्त की तरह साथ रखते हैं। दोस्ती और प्रगाढ़ हो जाए इस हेतु भले ही उसे झोले में रखे हों मगर कुछ कुछ समय में उसका ख्याल रखते रहते हैं। उनका विश्वास है कि जल्द ही यह दोस्ती यारी में बदल जाएगी और वे सफल हो जायेंगे।

कौन सी किताब है? पूछने पर उन्होंने बताया कि कौन सी तो नहीं पता किन्तु दुकान वाले ने बताया था कि अंग्रेजी की एक बेहतरीन किताब है। दोस्त बना ही रहे हैं तो हिन्दी की किताब को क्यूं दोस्त बनाना? वो तो खुद ही सफल नहीं हो पाती, मुझे क्या सफल बनाएगी?

अंग्रेजी किताब से दोस्ती निश्चित ही सफल बनाएगी – भले ही पढ़ न पायें उसको। मैसेज में भी तो साफ साफ लिखा था – सफल होने के लिए किताब से दोस्ती करो। पढ़ने के लिए तो कहीं न लिखा था।

व्हाटसएप का ज्ञान है- कोई मजाक थोड़े ही है।

-समीर लाल ‘समीर’

 भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जुलाई 25, 2021 के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/62022813

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शनिवार, जुलाई 17, 2021

आशीर्वादी जुमलों का एक सीमित संसार

 मानसिक रूप से तिवारी जी उम्र के उस पड़ाव में आ गए हैं जहाँ मात्र आशीर्वाद देने के सिवाय और कोई काम नहीं रहता। दरअसल उम्र से तो वह लगभग अभी 60 के आस पास ही पहुँच रहे होंगे। नेता होते तो युवा और ऊर्जावान कहलाते और अभिनेता होते तो किसी फिल्म में नई आई अभिनेत्री के साथ नाच रहे होते, मगर तिवारी जी ने उम्र का वो पड़ाव जल्दी इसलिए प्राप्त कर लिया क्यूंकि उनके पास वैसे भी कोई काम नहीं रहता है। काम न रहने को उन्होंने उम्र के पड़ाव से जोड़ दिया। यह उनके मानसिक उत्कर्ष का प्रमाणपत्र है।

अब वे अपने से बड़े उम्र की महिलाओं एवं पुरुषों को भी बेटा बेटी बच्चा आदि से संबोधित करने लगे हैं। पड़ोस में रहने वाली 70 वर्षीय महिला सुशीला ने जब नमस्ते किया तो बोले ‘अरे सुशीला बिटिया – खूब खुश रहो। बड़ा सुखद लगा सुनकर कि तुम अभी से इत्ती कम उम्र में ही नानी बन गई। प्रभु का बहुत आशीर्वाद है। अब नाती पोतों के साथ खूब खेलो। जुग जुग जिओ।’ अब सुशीला भी ठहरी महिला। कोई किसी भी उम्र में महिलाओं के इतने उच्चतम सम्मान ‘इत्ती कम उम्र’ से नवाज़ दे तो उसके लिए तो वह पद्म श्री से भी बड़ा सम्मान कहलाया। वो भी इसी सम्मान से लहालहोट हो तिवारी जी के चरण स्पर्श कर गई। तिवारी जी थोड़ा पीछे हटे और कहने लगे ‘अरे नहीं नहीं, हमारे यहां बच्चियों से पैर नहीं छुलवाते।‘ लेकिन तब तक सुशीला पैर छू चुकी थी, अतः सर पर हाथ धर कर पुनः आशीर्वाद देते हुए ‘सदा सुहागन रहो’ कहने जा ही रहे थे कि एकाएक याद आ गया कि सुशीला के पति को गुजरे तो सात साल हो गए हैं। अतः सदा के साथ खुश रहो लगा कर आशीर्वाद रफू कर दिया। रटे रटाए वन लाईनर वाले आशीर्वाद भी सतर्कता की दरकार रखते हैं। सही कहा गया है ‘सतर्कता हटी और दुर्घटना घटी’। अभी अभी तिवारी जी की फजीहत होते होते बच ही गई। 

आशीर्वादों का भी अपना एक वाक्य कोष होता है। सारे बुजुर्ग उसी में से उठा उठा कर आशीष दिया करते हैं। भाषा से भी यह अछूते हैं। लगभग सभी भाषाओं में आशीर्वाद का अंदाज और अर्थ एक सा ही होता है। चुनावी जुमलों की तरह ही आशीर्वादी जुमलों का एक सीमित संसार है मगर लुटाया दोनों को ही हाथ खोल कर जाया जाता है।

आशीर्वाद पाने वाला भी जानता है कि जेब खस्ता हाल में है। मंहगाई ऐसी कि निहायत जरूरत तक के सारे सामान नहीं जुटा पा रहे हैं। पेट्रोल भरवाने जाओ तो गैलन तो सोचना भी पाप हो गया है बल्कि लीटर की जगह मिली लीटर चलन में आने को तैयार हो रहा है। इस दौर में जब घर से मंहगाई और दुश्वारियों से जूझने निकलो और पान की दुकान पर बैठे तिवारी जी मुस्कराते हुए आशीर्वाद देने मे जुटे मिलें ‘खूब खुश रहो। दिनोंदिन ऐसे ही तरक्की करते रहो।‘ तब सिर्फ भीतर भीतर कोफ्त खाने के और क्या हो सकता है। बुजुर्ग की उम्र का लिहाज ऐसा कि कुछ कह भी नहीं सकते। बुजुर्ग भी अपनी उम्र का पावर जानता है। नेता भी तो अपने पावर के चलते जुमले पर जुमले उठाए रहते हैं और आम जानता भी सब कुछ जानते समझते भी सिवाय कुढ़ कर रह जाने के क्या कर सकती है।

घंसू, जिससे विगत में तिवारी जी का शराब पीने से लेकर गाली गलौज तक का करीबी नाता रहा, उसे भी आजकल वह ‘बेटा, सदा खुश रहो- ऐसे ही खूब तरक्की करते रहो ’ का आशीर्वाद देते हुए न थकते हैं। घंसू भी आश्चर्य चकित सा तिवारी जी का मुंह ताक रहा है। जब उम्र के पाँच दशक से ज्यादा समय में आजतक कुछ भी कर ही नहीं पाया और यह बात तिवारी जी भी जानते हैं तो ये ‘ऐसे ही तरक्की करते रहो’ में किस तरक्की का जिक्र कर रहे हैं?

अभी घंसू इस विषय में सोच ही रहा था की उसे याद आया कि कुछ साल पहले जब एक मंच से नेता जी का भाषण हो रहा था। नेता जी ने कहा था  ‘आप और आपका धर्म संकट में हैं। मैं जीतते ही आपको संकट से उबारूँगा।‘ तब भी जिन्हें वह संकट में बता रहे थे, उन लोगों को खुद ही नहीं पता था कि वो और उनका धर्म संकट में हैं। वो भी तो यही सोच रहे थे कि नेता जी किस संकट से उबारेंगे, जब कोई संकट है ही नहीं। तब उस वक्त के युवा और ऊर्जावान तिवारी जी ने ही बताया था कि इसे जुमला कहते हैं। चुनाव में काम आता है। याद कर लो और जब चुनाव लड़ोगे तो काम आएगा। तब तुम भी यही बोलना।‘

बस, घंसू भी अब तिवारी जी की बात ‘ऐसे ही खूब तरक्की करते रहो’ का भावार्थ समझ गया। यह बुजुर्गों का एक आशीर्वादी जुमला है। याद कर लो और जब बुजुर्ग हो जाओगे तो काम आएगा।

ऐसा ही पुश्त दर पुश्त ये सिलसिला चलता आया है और ऐसे ही आगे भी चलता

रहेगा।

-समीर लाल ‘समीर’  

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जुलाई 18, 2021 के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/61871028

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शनिवार, जुलाई 10, 2021

जाने कौन सा जुमला हकीकत में साहित्य सम्मान दिला जाये

 

आज फिर लिखने के लिए एक विषय की तलाश थी और विषय था कि मिलता ही न था, तब विचार आया कि इसी तलाश पर कुछ लिखा जाये.

वैसे भी अगर आपको लिखने का शौक हो जाये तो दिमाग हर वक्त खोजता रहता है-कि अब किस विषय पर लिखा जाये? उठते-बैठेते, सोते जागते, खाते-पीते हर समय बस यही तलाश. इस तलाश में मन को को यह खास ख्याल रहता है कि एक ऐसा मौलिक विषय हाथ लग जाये कि पाठक पढ़कर वाह-वाह करने लगे. .. पाठक इतना लहालोट हो जाये कि बस साहित्य अकादमी अवार्ड की अजान लगा बैठे..और साहित्य अकादमी वाले उसकी कान फोडू अजान की गुहार सुनकर अवार्ड आपके नाम कर चैन से सो पायें.

यूँ तो जब भी कोई पाठक आपके लिखे से अभिभूत होकर या आपसे कोई कार्य सध जाने  की गरज के चलते ये पूछता है कि- भाई साहब, आप ऐसे-ऐसे सटीक और गज़ब के ज्वलंत विषय कहाँ से लाते हैं? तो मन प्रफुल्लित हो कर मयूर सा नाचने लग जाता है. किन्तु मन मयूर का नृत्य पब्लिक के सामने दिखाना भी अपने आपको कम अंकवाने जैसा है. कौन भला अपनी पब्लिक स्टेटस गिरवाना चाहेगा...

तो अब सोचिये कि अगर आप तक यह प्रश्न पहुँचा है, इसका मतलब ही यह है कि सामने वाले ने आपको ज्ञानी माना हुआ है अन्यथा मूर्खों से भी भला कोई प्रश्न करता है कोई? अतः आपको गभीरता का लबादा चेहरे पर लादे हुए ज्ञान मुद्रा बनाये व्याख्यान कुछ इस तरह शुरु कर देना पड़ता है कि..

’देखिये, आप तो स्वयं ज्ञानी हैं (इसे नमस्ते के बदले नमस्ते वाले का संस्कार मानें कि उसने आपको ज्ञानी माना है अतः आप उसका उधार वापस कर रहे हैं ऐसा कह कर, वरना तो आप जानते ही हैं उसको), विषय तो आपके आस पास ही हजारों बिखरे होते हैं,,जैसे कि कंकड़ पत्थर.. बात आपकी सजगता और उन्हें पहचान लेने की है. आपका नित आचरण, मित्रों की गतिविधियाँ, समाज का व्यवहार और रीतियाँ, कुरितियाँ, सरकार और सरकारी तंत्र को चलाने के यंत्र और मंत्र आदि-आदि नित हजारों हजार विषयों के वाहक होते है, मगर जो हीरे को पहचान जाये, वो पारखी कहलाता है वरना तो मूरख उसे कंकड़ मान कर लात मार मार कर निकल ही रहे हैं. वैसे असल बात ये है कि मात्र हीरे को पहचान लेना ही पारखी को जोहरी नहीं बना देता..(इस बहाने आप सामने वाले के मन में आपके ही बयान से उपज आये उस भ्रम को नेस्तनाबूत भी कर देते हैं कि वो भी आस पास सजगता से देख कर विषय तलाश सकता है).

जैसे एक अच्छा जोहरी बनने के लिए जीवन में कुछ अलग सा कर जाने का संकल्प, इक हुनर सीख लेने की ललक, एक निष्ठ लगन, तराशने का सधा हुआ हुनर और एक इमानदार मेहनत की जरुरत होती है वैसे ही किसी भी विषय पर लिखने वाले एक अच्छे लेखक को शब्दकोश का धनी, विविध साहित्य का अपार पठन और मेहनत और लगन से अपने लेखन को अंजाम देने की जरुरत होती है. विषय निश्चित ही अपने आप में महत्वपूर्ण होता है. विषय कथानक की घूमती हुई धूरी होता है जिसके आस पास आपको, शब्दों का उचित चयन करते हुए एवं उनको गूथने के हुनर का जतन से इस्तेमाल करते हुए, एक ऐसे आभा मण्डल का निर्माण करना होता है कि पढ़ने वाला उसी आम से दिखने वाले विषय को एकदम खास सा विषय मान ’वाह वाह” कर उठे...’

 

और इतना सब कह कर भी इस बात को तय कर पाने के लिए, कि आप पूछने वाले पर अपने ज्ञानी होने की पूरी छाप छोड़ पाये या नहीं और उसे सदैव मूरखता से अभिशप्त रहने का अहसास दिला पाये या नहीं...., आप उससे यह पूछने से बाज नहीं आते कि ’क्या समझे? समझे कि नहीं?”

सामने वाला साहित्य का ज्ञान भले न रखता हो पर प्रश्नकर्ता भारतीय है और हर पान की दुकान पर खड़े से रेल में बैठे आम भारतीय की तरह उसे राजनीत का ज्ञान तो जरुर ही होगा....हर भारतीय पर इस हेतु विशेष ईश कृपा है और इस ज्ञान का होना तो उसके डी एन ए में शामिल है अतः उसी आधार पर वो ’क्या समझे? समझे कि नहीं?’ का जबाब देता है. और कहता है कि...जी, मैं समझ गया और मैं इसे ऐसे समझा कि जैसे राजनीत में तमाम मुद्दे आपके आस पास बिखरे पड़े होते हैं.. बस बात उन्हें पहचानने की है और इतना और जान लिजिये कि मात्र उन मुद्दों को पहचान जाने से भर आप राजनेता नहीं बन जाते...बात उन आम मुद्दों को शब्दों और जुमलों के मायाजाल में बाँध कर आमजन के सामने ऐसे पेश करने की है कि वो मुद्दे इतने खास हो जायें...कि आमजन महसूस करने लगे..’वाह, बस इस बंदे को चुनना है इस बार और फिर देखो...जल्दी ही अच्छे दिन आने वाले हैं!!’ और आमजन का यह इन्तजार आमजन वो ख्वाब बन जायेगा जो आपको राज गद्दी दिला जायेगा...

उसकी यह व्याख्या इस लेखक श्रेष्ठ के दिल को छू गई ..बस, पाठको में इसी तरह के इन्तजार को जगाना अब मात्र इस लेखक की तमन्ना बची है और लेखक की राजगद्दी यानि अकादमी का साहित्य सम्मान.वो तो फिर मिल ही जायेगा एक दिन...जुमले पर जुमले गढ़ते रहेंगे इसी इन्तजार को जगाने के लिए...कौन जाने कौन सा जुमला हकीकत में साहित्य सम्मान दिला जाये..

-समीर लाल ’समीर’

 

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जुलाई 11, 2021 के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/61727731

 

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शनिवार, जुलाई 03, 2021

हम अब वरिष्ट लेखक हो गये हैं

 डेश बोर्ड, रिपोर्ट कार्ड, पॉवर पाईन्ट डेक, स्कोर कार्ड की तरह ही न जाने कितने नाम हैं, जो कारपोरेट वर्ल्ड से निकल कर पॉवरफुल सरकारी दुनिया में राजनिति चमकाने के लिए आ गये. इनको बनाना, इनको दिखाना, इनके बारे में बताना ही अपने आप में इतना भव्य हो गया कि जिन कामों को दर्शाने के लिए यह सारे आईटम कारपोरेट वर्ल्ड में बनाये जाते हैं, वो यहाँ नगण्य होकर रह गये.

फलाने मंत्रालय का प्रेजेन्टेशन, सरकार का १०० दिन का रिपोर्ट कार्ड, स्मार्ट सिटी परियोजना का डेशबोर्ड, फलाने मंत्री का स्कोर कार्ड तो खूब सुनाई पड़े और दिखे मगर कार्य क्या हुए, विकास का क्या हुआ? वो ही न तो दिखाई दिया और न सुनाई पड़ा. धीरे धीरे इन प्रेजेन्टेशनों की ऐसी धज्जी उड़ी कि विकास और क्या किया दिखाने की बजाये, पिछले ७० सालों में क्या नहीं हुआ, वो दिखाने में ही मगन हो लिए. अब तो स्कोर कार्ड और रिपोर्ट कार्ड के नाम पर पिछली सरकारों की नाकामियों की रिपोर्ट ही आती है. इनसे पूछो कि चलो उन्होंने कुछ नहीं किया मगर तुमने क्या किया वो तो बताओ? इस पर वो कहते हैं कि हमने इतनी रिपोर्टें बना डाली वो ही क्या कम है?

प्रेजेन्टेशन और मार्केटिंग का जमाना है, फिर वो भले दूसरों की नाकामियों का ही क्यूँ न हो? जब खुद बड़ी रेखा न खींच पाओ तो दूसरे की खींची हुई रेखा को पोंछ कर छोटा करने के सिवाय और विकल्प भी क्या है, खुद को बड़ा दिखाने के लिए? अब तो हद यहाँ तक हो ली है कि पोंछ कर छोटा करना भी बड़ा दिख पाने के लिए काफी नहीं है क्यूँकि कुछ दिखाने को है ही नहीं, तो पूरा मिटा ही देने की कोशिश है. खुद उनके वरिष्ट कह गये कि कॉपी में कुछ लिखा हो, तब तो नम्बर दूँ.

ऐसा माना जाने लगा है कि अगर कुछ किया भी हो तो भी बिना प्रजेन्टेशन के आजकल नहीं दिख पाता. इस चपेट में हम लेखक वर्ग भी हैं. अखबार में छप भी गये तो संतोष नहीं है. हमें तो लगता है कि कैसे सबको बतायें कि अखबार में छप लिए हैं. फिर अखबार की कटिंग फेसबुक पर, ईमेल से, ट्वीटर पर, व्हाटसएप के सारे ग्रुपों पर, फेसबुक मेसेन्जर से, टेक्स्ट मैसेज से और फिर ब्लॉग पोस्ट से. पढ़ने वाला थक जाये मगर हम बताते बताते नहीं थकते. हमारा बस चले तो उसी अखबार में एक विज्ञापन भी लगवा दें कि देखो, हम फलाने पेज पर छपे हैं. सरकारों का बस चल जाता है तो लगवाती भी हैं विज्ञापन कि देखो, हमने फलाँ जगह यह किया, वो किया.

सोच की चरम देखो कि फेसबुक पर लगाने के बाद भी यह चैन नहीं कि सारे मित्र देख ही लेंगे अतः उनको टैग भी कर डालते हैं और ऊपर से छुईमुई सा मिज़ाज ऐसा कि कोई मित्र मना करे कि हमें टैग मत किया करो, हम यूँ ही देख लेते हैं तुम्हारे पोस्ट, तो उसको ब्लॉक ही कर मारते हैं कि हटो!! हमें नहीं रखनी तुमसे दोस्ती. वही तो होता है वहाँ भी कि वो बोगस विडिओ भेजें और आप उसका ओरिजनल विडिओ लगा कर बता दो कि तुमने बोगस डॉक्टर्ड विडिओ लगाया है. बस!! आप देशद्रोही हैं और पाकिस्तान जा कर बस जाईये के कमेन्ट के साथ आप ब्लॉक!!

वैसे सच बतायें तो अखबार में छ्प जाने से बड़े लेखक हो जाने की फील आ जाती है. जैसे की कोई सांसद सत्ता पक्ष का मंत्री बन गया हो वरना तो होते तो निर्दलीय सांसद भी हैं. हैं भी कि नहीं कोई जान ही नहीं पाता. मगर फिर भी निर्दलीय के सांसद होने और अनछपे के लेखक होने से इंकार तो नहीं ही किया जा सकता है.

फिर सत्ता पक्ष का मंत्री अपना चार छः गाड़ियों का असला लेकर सिक्यूरीटी के साथ लाल बत्ती और सायरन बजाते न चले तो कौन जानेगा कि मंत्री जी जा रहे हैं. शायद यही सोच कर हम भी हर संभव दरवाजे की घंटी बजाते हैं कि लोगों को पता तो चले कि हम अब वरिष्ट लेखक हो गये हैं.

देखो!! हम आज के अखबार में छपे हैं.

-समीर लाल ’समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जुलाई 3, 2021 के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/61571543

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शनिवार, जून 26, 2021

सुझाव देने का समय नहीं रहा अब

 



शाम टहलने निकला था. सामने से आती महिला के कारण तो नहीं मगर उसके साथ पतले से धागेनुमा किसी डोरी में बँधे बड़े से खुँखार दिखने वाले कुत्ते के कारण वॉक वे छोड़ कर किनारे घास पर डर कर खड़ा हो गया. कुत्ता मेरे सामने से बिना मुझे देखे निकल गया मगर शायद वह महिला मेरा डर भाँप गई और मुस्कराते हुए बोलीं- डरो मत. यह मेरा कुत्ता है, वेरी हम्बल. किसी से कुछ नहीं कहता और न भौंकता है. मुझे उस कुत्ते की स्थिति पर थोड़ी दया भी आई मगर यूँ तो कितनी ही महिलाओं के पतियों को भी इसी हाल से गुजरते देखा है तो किस किस पर रोईये का भाव ओढ़ कर पहले तो मैं चुप रहा.

फिर महिला का बातूनी नेचर देख कोतुहलवश उससे पूछ ही लिया कि क्या कभी घर में कोई चोर घुस आये तब भी नहीं भौंकेगा या काटेगा उसे?

महिला पुनः मुस्कराई और बोलीं- कहा न, मेरा कुता है. वेरी हम्बल..न भौंकता है और न काटता है. दूसरे कुत्ते इस पर भौंकते भी हैं तो ये मेरे पीछे आकर छुप जाता है मगर मजाल है कि कभी भौंका हो या काटा हो किसी को. मेरा कुत्ता है, वेरी हम्बल!!

बहुत कोशिश की कि अपनी टहल जारी रखूँ मगर रहा नहीं गया..मूँह से निकल ही गया कि इससे अच्छा होता कि आप इसके बदले में बकरी पाल लेती..कम से कम रोज १.५ से २ लीटर दूध ही दे देती.बाकी का स्वभाव, व्यवहार तो बिल्कुल ऐसा ही रहता.

मुझे लगा था कि उन्हें मेरा सुझाव पसंद आयेगा मगर वो तो उल्टा ही भड़क गई. कहने लगी मैं आप पर अपनी मान हानि का मुकदमा कर दूँगी.

मैं समझ नहीं पा रहा था कि मैडम की क्या मानहानि हो गई? अगर किसी की हुई भी तो वो तो कुत्ते की हुई और वो मैडम के पीछे दुबका खड़ा था.

मानाहानि भी अजब चीज है. स्वभावतः हम गवां उसी चीज को सकते हैं जो हमारे पास होती है. जैसे अगर रुपया है ही नहीं, तो उसे आप गवां कैसे सकते हैं? बाल अगर हैं ही नहीं सर पर, तो उसकी हानि कैसे होगी.

मात्र मान (इज्जत) ऐसी चीज है जिसकी हानि उसके बिना हुए भी होती रहती है. यह हानि भी संसद की केन्टीन में सस्ते खाने से लेकर हवाई जहाज के बिजनेस क्लास में फ्री चलने की तरह ही सिर्फ नेताओं के लिए आरक्षित है.

जैसे व्यापार में हुये लॉस को निगेटिव प्राफिट भी कहते हैं, वैसे ही मानहानि को आपमान में वॄद्धि भी कह सकते हैं. लेकिन नेताओं को पब्लिक में यह कहना अच्छा नहीं लगता, इस हेतु मानहानि को जुमले के तौर पर इस्तेमाल किये जाने का फैशन है.

मन में आया कि पूछ लूँ कि मैडम आप या आपका कुत्ता राजनीति में हैं क्या? हमारे यहाँ यह मानहानि वाली लग्जरी सिर्फ उनको ही हासिल है. फिर नहीं पूछा. मन में आई हर बात करना आमने सामने उचित नहीं होता है.  मन की बात कहने के लिए रेडियो ज्यादा मुफीद है और फैशन में भी है.

फिर सोचा कि तुलसी दास का दोहा सुना दूँ और मैडम का धन्यवाद कर दूँ कि उन्होंने मुझे विधाता माना:

हानि लाभु जीवनु मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ..

बिधि मतलब विधाता. 

फिर वो भी नहीं सुनाया और शुद्ध आम नागरिक होने का परिचय देते हुए उनसे क्षमा मांग ली. वो कहने लगी  मुझसे नहीं मेरे कुत्ते से मांगिये. अजब बात है मानहानि हुई मैडम की और माफी देगा कुत्ता. कौन झंझट में पड़े अतः कुत्ते से माफी मांग कर चल पड़े.

टहलने निकला था सो टहल के वापस आ गया.

लगा कि सुझाव देने का समय नहीं रहा अब.

-समीर लाल ’समीर’

 

 

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जून 27 , 2021 के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/61414044

 

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चित्र साभार: गूगल 

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शनिवार, जून 19, 2021

ऑक्सीजन की चाह में वृक्षारोपण

 


अस्पतालों में ऑक्सीजन की भीषण कमी हो गई। हाहाकार मचा। जिसको जो समझ में आ रहा था वो उस पर तोहमत लगा रहा था। दोषारोपण हेतु लोगों को खोजा जा रहा था। कई दशकों पहले परलोक सिधार चुके लोग भी चपेट में आ रहे थे। जानवरों के डॉक्टर तक व्हाटसएप पर फेफड़ों में ऑक्सीजन की कमी न आने देने के उपाय बता रहे थे। एक ओर जहाँ भीषण कमी थी वहीं दूसरी ओर सोशल मीडिया पर ऑक्सीजन बिखरी पड़ी थी। कोई कहता था कि दो सिलेंडर फलानी जगह हमारे पास हैं, जरूरत मंद संपर्क करें। किसी के पास पाँच होते थे। दिया गया फोन उठता नहीं था। वे जरूरतमंदों को व्हाटसएप पर खोज रहे थे और जरूरतमंद उन्हें अस्पतालों में। व्हाटसएप और अस्पताल के बीच का पुल टूट गया था और लोग उसी टूटे पुल से गिर गिर कर ऑक्सीजन के आभाव में दम तोड़ रहे थे।

इसी बीच किसी ज्ञानी ने ऑक्सीजन के बारे में अपना वीडियो वायरल किया। उसने कमी का दोषी आम जनता को बताया। उसने कहा कि तुमने पेड़ काटकाट कर अपने मकान बना लिये। कारखाने खोल लिए। नए पेड़ लगाए नहीं तो ऑक्सीजन कहां से आए? अब भुगतो। दोषारोपण की आग असल आग से भी तेजी से फैलती है। आमजन ने अपना बचाव किया कि हमारे एक पेड़ काटने या लगाने से क्या होता है? सरकार को देखो, पूरे के पूरे जंगल साफ कर डाले।

आरोप का निशाना अपनी ओर घूमते देख वन मंत्री चौंके। उन्हें सपने में भी उम्मीद न थी कि स्वास्थय मंत्रालय की बजाए उनका मंत्रालय ऑक्सीजन की कमी के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया जाएगा। इसके पहले की बात ज्यादा आगे बढ़ती, उन्होंने आनन फानन में एक सार्वजनिक कार्यक्रम कर कलेक्टर कार्यालय के सामने वृक्षारोपण कर पर्यावरण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जाहिर की। प्रमाण स्वरूप शिलालेख लगाया गया। तस्वीरें खींची गईं जिन्हें अगले रोज प्रमुख अखबारों ने मुख्य पृष्ठ पर छापा। वनों में सौ पेड़ कट जाते हैं, तब न कोई समारोह, न सेल्फी और न कोई समाचार मगर एक वृक्षारोपण की ऐसी कवरेज। मंत्री जी द्वारा बताया गया कि पेड़ बड़ा होकर ऑक्सीजन की समस्या का निदान कर डालेगा। एक फुट का पेड़ भी मंत्री जी के मुखार बिन्द से अपनी भावी उपलब्धि को सुन मंत्री जी के सामने नतमस्तक हो गया। उसे बिना फल आए ही झुकता देख लोगों को ख्याल आया कि भारी गरमी में उसे बो तो दिया है मगर पानी डाला ही नहीं। मंत्री जी अभी भाषण दे ही रहे थे अतः उनकी उपस्थिति ने कमाल दिखाया और तुरंत ही वृक्ष के लिए पानी की व्यवस्था की गई। पेड़ पुनः सीधा खड़ा हो गया।   

वृक्षारोपण करके मंत्री जी जा चुके थे। शाम को घर लौटती बकरी उस पेड़ को खा गई। जानवरों मे मंत्री जी द्वारा लगाये या आमजन द्वारा लगाये या खुद से उग आये पेड़ में भेद करने की परम्परा अभी तक नहीं आई है। उन्हें तो इससे भी मतलब नहीं है कि अमीर ने पेड़ लगाया है या गरीब ने या किसी हिन्दू ने लगाया या मुसलमान ने। मजहब के भेद तो इंसानों की फितरत है, जानवर इससे अछूते हैं। बकरी हिंदुस्तान की हो या पाकिस्तान की, दोनों का स्वभाव एक ही है।

सरकारी अधिकारियों से जानवर इसीलिए भिन्न हैं। अधिकारी घूस खाता है, और उसे अलमारी में बंद करके धर देता है अपने भविष्य के लिए। बकरी का मूलतः स्वभाव पत्ती खाना, दूध देना, और आगे पत्तियों की उपज जारी रहे, नए नए पेड़ फूले फलें, इस हेतू ऑर्गैनिक खाद की नित उपलब्धता बनाए रखना होता है।

जब बकरी पेड़ खाकर चली गई तब वहां सिर्फ एक शिलालेख लगा रह गया कि  ‘इस वृक्ष का वृक्षारोपण माननीय तिवारी जी, मंत्री, वन विभाग द्वारा आज दिनांक को किया गया’। किसी व्हाटसएप जागरूक नागरिक की नजर इस पर पड़ी तो उसने शिलालेख और उसके पीछे नदारत वृक्ष की फोटो खींच कर सोशल मीडिया पर इस कैप्शन के साथ डाल दी कि जैसे व्हाटसएप पर ऑक्सीजन उपलब्ध है वैसे ही मंत्री जी का पेड़ कलेक्टरेट के सामने। किसी ने उसे फॉरवर्ड करते हुए लिखा कि फिर एक पेड़ फाईलों में उगा। किसी ने उसे ऑक्सीजन की फैक्टरी का भूमि पूजन बताया। किसी ने उसे मंत्री जी को टैग कर दिया। मंत्री जी आग बबूला हो उठे और वहाँ पुनः वैसा ही वृक्ष लगवा कर उसके साथ सेल्फी खिंचा कर सोशल मीडिया पर डाली और वायरल हो रही पोस्ट को विपक्षियों की साजिश बताया।

बकरी का कोई सोशल मीडिया पर एकाउंट तो था नहीं अतः वह प्रसन्न चित्त इस बवाल से अनभिज्ञ पुनः शाम को उसी राह से घर लौटती हुई नया पेड़ भी खा गई। यहीं जानवर और इंसान एक जैसे हैँ, दोनों को ही नियमित अंतराल पर भूख लगती है। 

फिर सोशल मीडिया पर बवाल कटा, फिर पेड़ लगा किन्तु इस बार जासूस भी लगा दिए गए। पता किया जाए कि कौन सी विपक्षी पार्टी इस साजिश में लगी है। बकरी को क्या पता कि उसकी जासूसी हो रही है। वो फिर पेड़ खाने को हाजिर हो गई मगर इस बार पकड़ ली गई। जो बात वृक्ष के आजू बाजू एक बाड़ा लगाकर रोकी जा सकती थी उसे जासूसी विभाग की मदद से रोका गया।

बकरी को पकड़ कर मंत्री जी बंगले पर ले जाया गया। उस रात मंत्री जी ने अपने बंगले पर मित्रों के साथ शराब और उसी बकरी के कबाब की दावत उड़ाते हुए भविष्य में ऑक्सीजन सप्लाई की व्यवस्था के लिए किए गए सुरक्षा प्रबंधों की जानकारी दी और ठहाकों की आवाज गूंज उठी।

दूध से मिली ताकत को दूध देने वाले को मारकर खा जाने की फितरत भी बस इन्सानों की है। जो ताकत देता है उसी को मार देना यूं ही तो सीखा है।     

-समीर लाल ‘समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जून 20, 2021 के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/61254470

 

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शनिवार, जून 12, 2021

अब शराफत और ईमानदारी का जमाना नहीं रहा

 

किस्मत कुछ ऐसी रही कि जहाँ भी पहुंचते हैं तो लगता है वक्त कह रहा है ‘थोड़ा देर कर दी यार तुमने आने में, वरना तो क्या जलवा देखते’. वो तो हमने खैर पैदा होने में भी देर कर दी वरना 1947 के पहले पैदा हो गए होते तो स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कहलाते. एक दो 1945 और 1946 की पैदाईश वालों को तो मैं भी जानता हूँ जो खुद को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बता बता कर सांसद हो लिये जबकि स्वतंत्रता प्राप्ति के समय 1 बरस और दो बरस के ही थे. मगर कौन चैक करने जाता है? वरना अगर चैक करने की प्रथा होती तो इनके चरित्र चैक होने के बाद तो एक भी वोट न मिलता. 

खैर, जिस जमाने में हम पैदा हुए, तब तक एक तो देश की सोने की चिड़िया फुर्र हो चुकी थी और दूसरा शराफत और ईमानदारी इस दुनिया से विदा हो चुके थे. ऐसा हम नहीं कह रहे हैं हमारे शहर भर के बुजुर्ग बताया करते थे. हम देर से पैदा हुए. जिससे सुनो बस यही सुनते थे कि अब शराफत और ईमानदारी का जमाना नहीं रहा. विदा तो खैर तब तक गाँधी जी भी हो चुके थे मगर उनके बारे में जान लेने के लिए और बताने के लिए इतिहास की किताबें थी और ज्ञानी लोग थे. अभी उतनी देर भी नहीं हुई थी कि गांधी जी का नाम इतिहास की किताबों से भी मिटा देने का प्रयास शुरू हो गया हो. वैसे इतिहास बहुत जिद्दी होता है, यह बात इस प्रयास में लगे लोग शायद भूल रहे हैं. पाठ्य पुस्तकों से निकाल देने के बाद भी इतिहास तो दर्ज रहता ही है. उसी इतिहास में इस प्रयासकर्ता के रूप में तुम्हारा नाम भी दर्ज हो जाएगा, बस्स!! इतिहास में सिर्फ महापुरुषों का ही नाम दर्ज हो, ऐसा कतई जरूरी नहीं. जनरल डायर भी जलिया वाले बाग के नरसंहार को लेकर जिस इतिहास में दर्ज हैं, उसी में गाँधी जी एक अहिंसा के पुजारी के रूप में शामिल हैं.

शराफत के विषय में किताब में जो कुछ भी दर्ज पाया या लोगों से जाना वो बड़ा कन्फ्यूज करने वाला रहा अतः कभी कोई निश्चित जबाब मिला ही नहीं. जब तक हम किसी की किसी हरकत को शराफत समझते, वो उसे छोड़ने की घोषणा करता मिलता है कि बस, अब तक हम शराफत से पेश आ रहे थे तो तुमको समझ नहीं आ रहा था, अब हम बताते हैं तुमको अपनी असली औकात!

पुलिस वाला तक शराफत और ईमानदारी की बात करता नजर आता है तो सारा पढ़ा लिखा पानी हो जाता है. उस दिन पुलिस वाला कहता मिला कि शराफत से पूछ रहा हूँ, ईमानदारी से बता दो वरना तो फिर तुम जानते ही हो हमें उगलवाना आता है.

लोग शराफत को कपड़ो की तरह उतारते पहनते दिखते हैं. कोई उसे कही छोड़ आता है, तो कोई कहता है कि शराफत गई तेल लेने. एक सज्जन का तो तकिया कलाम ही यही मिला कि हमसे शराफत की उम्मीद मत रखना, उधार देना जानते हैं तो ब्याज वसूलना भी जानते हैं.

एक तरफ तो बुजुर्ग बता गये कि शराफत का जमाना गया तो दूसरी तरफ ऐसे ऐसे विवादास्पद दृष्य देखकर आज तक ये ही नहीं समझ आया कि शराफत होती क्या है. ऐसे में कल को जब बच्चे पूछेंगे कि शराफत क्या होती है तो क्या जबाब देंगे?

यही सब सोच कर अब तो हम भी आजकल इतना ही कहते हैं कि अब शराफत का जमाना नहीं रहा. हालांकि उम्र के इस दौर में बच्चों के लिए हम शहर के वैसे ही बुजुर्ग है जिनका शुरु में हमने जिक्र किया था हमारे जमाने वाले.

क्या पता उन्होंने भी कभी शराफत और ईमानदारी को देखा था या हमारी तरह ही अपने बुजुर्गों से सुना सुनाया जुमला उछालते रहे ‘अब शराफत और ईमानदारी का जमाना नहीं रहा?’

आप में से किसी ने देखा है क्या ‘शराफत और ईमानदारी का जमाना’? अगर देखा हो तो मुझ अज्ञानी का ज्ञानवर्धन कर दें.

-समीर लाल ‘समीर’

 

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जून 13 , 2021 के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/61094652

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शनिवार, जून 05, 2021

चाय की गरमागरम चुस्की के नाम

 


भारत में जब रहा करते थे तब अक्सर पंखे के ऊपर और रोशनदान आदि में लगभग हर ही जगह चिड़िया का घोसला देख पाना एक आम सी बात थी. अक्सर घोसले से उड़ कर घास और तिनके जमीन पर, बाल्टी में और कभी किसी बरतन में गिरे देख पाना भी एकदम सामान्य सी घटना होती थी.

उस रोज एक मित्र के कार्यालय पहुँचा तो एकाएक उनकी टेबल पर एक कप में गरम पानी पर वैसे ही तिनके और घास फूस गिरे दिखे. अनायास ही नजर छत की तरफ उठ गई. न पंखा और न ही घोसला. सुन्दर सी साफ सुथरी छत. पूरे कमरे में एयर कन्डिशन और काँच की दीवारें. समझ नहीं आया कि फिर ये तिनके कप में कैसे गिरे? जब तक मैं कुछ सोचता और पूछता, तब तक मित्र ने कप उठाया और उसमें से एक घूँट पी लिया जैसे की चाय हो. मैं एकाएक बोल उठा कि भई, देख तो ले पीने से पहले? कचरा गिरा है उसमें.

वो कहने लगा कि अरे, ये कचरा नहीं है, हर्बस हैं और यह है हर्बल टी. हमारे जमाने में तो बस एक ही चाय होती थी वो काली वाली. चाय की पत्ती को पानी, दूध और शक्कर में मिला कर खौला कर बनाई जाती थी. उसी का जो वेरीयेशन कर लो. कोई मसाले वाली बना लेता था तो कोई अदरक वाली. एक खास वर्ग के नफासत वाले लोग चाय, दूध और शक्कर अलग अलग परोस कर खुद अपने हिसाब से मिलाया करते थे. कितने चम्मच शक्कर डालें, वो सिर्फ इसी वर्ग में पूछने का रिवाज़ था. फिर एक वर्ग ऐसा आया जो ब्लैक टी पीने लगा. न दूध न शक्कर. समाज में अपने आपको कुछ अलग सा दिखाने की होड़ वाला वर्ग जैसे आजकल लिव ईन रिलेशन वाले. अलग टाईप के कि हम थोड़ा बोल्ड हैं. कुछ डाक्टर के मारे, डायब्टीज़ वाले बेचारे उसी काली चाय में नींबू डालकर ऐसे पीते थे जैसे कि दवाई हो.

फिर एकाएक न जाने किस खुराफाती को यह सूझा होगा कि चाय की पत्ती को प्रोसेसिंग करके सुखाने में कहीं इसके गुण उड़ तो नहीं जाते तो उसने हरी पत्ती ही उबाल कर पीकर देखा होगा. स्वाद न भी आया हो तो कड़वा तो नहीं लगा अतः हल्ला मचा ग्रीन टी ..ग्रीन टी..सब भागे ..हां हां..ग्रीन टी. हेल्दी टी. हेल्दी के नाम पर आजकल लोग बाँस का ज्यूस पी ले रहे हैं. लौकी का ज्यूस भी एक समय में हर घर में तबीयत से पिया ही गया. फिर बंद हो गया. अब फैशन से बाहर है.

हालत ये हो गये कि ठेले से लेकर मेले तक हर कोई ग्रीन टी पीने लगा. अब अलग कैसे दिखें? यह ग्रीन टी तो सब पी रहे हैं. तो घाँस, फूस, पत्ती, फूल, डंठल जो भी यह समझ आया कि जहरीला और कड़वा नहीं है, अपने अपने नाम की हर्बल टी के नाम से अपनी जगह बना कर बाजार में छाने लगे. ऐसा नहीं कि असली काली वाली चाय अब बिकती नहीं, मगर एक बड़ा वर्ग इन हर्बल चायों की तरफ चल पड़ा है.

बदलाव का जमाना है. नये नये प्रयोग होते हैं. खिचड़ी भी फाईव स्टार में जिस नाम और विवरण के साथ बिकती है कि लगता है न जाने कौन सा अदभुत व्यंजन परोसा जाने वाला है और जब प्लेट आती है तो पता चलता है कि खिचड़ी है. चाय की बढ़ती किस्मों और उसको पसंद करने वालों की तादाद देखकर मुझे आने वाले समय से चाय के बाजार से बहुत उम्मीदें है. अभी ही हजारों किस्मों की मंहगी मंहगी चाय बिक रही हैं.

हो सकता है कल को बाजार में लोग कुछ अलग सा हो जाने के चक्कर में मेनु में पायें बर्ड नेस्ट टी - चिड़िया के घोसले के तिनकों से बनाई हुई चाय. एसार्टेड स्ट्रा बीक पिक्ड बाई बर्ड फॉर यू याने कि चिड़िया द्वारा चुने हुए घोसले के तिनके अपनी चोंच से खास तौर पर आपके लिए. इस चाय में चींटियों द्वारा पर्सनली दाने दाने ढ़ोकर लाई गई चीनी का इस्तेमाल हुआ है.

अब जब ऐसी चाय होगी तो बिकेगी कितनी मँहगी. क्या पता कितने लोग अफोर्ड कर पायें इसे. मुश्किल से कुछ गिने चुने और यही वजह बनेगी इसके फेमस और हेल्दी होने की.

गरीब की थाली में खिचड़ी किसी तरह पेट भरने का जरिया होती है और रईस की थाली में वही खिचड़ी हेल्दी फूड कहलाता है, यह बात बाजार समझता है.

बस डर इतना सा है कि चाय के बढ़ते बाजार का कोई हिस्सा हमारा कोई नेता न संभाल ले वरना बहुत संभव है कि सबसे मंहगी चाय होगी- नो लीफ नेचुरल टी. बिना पत्ती की प्राकृतिक चाय और चाय के नाम पर आप पी रहे होंगे नगर निगम के नल से निकला सूर्य देव का आशीर्वाद प्राप्त गरमा गरम पानी.

-समीर लाल ’समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जून 6, 2021 के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/60940261

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रविवार, मई 30, 2021

फड़कते हुए शीर्षक की तलाश

 


बहुत दिनों से परेशान था कि आखिर अपना नया उपन्यास किस विषय पर लिखूँ और उसको कौन सा फड़फड़ाता हुआ शीर्षक दूँ.

उपन्यास लिखने वाले दो तरह के होते हैं, एक तो वो जो विषय का चुनाव कर के पूरा उपन्यास लिख मारते हैं और फिर उसे शीर्षक देते हैं और दूसरे वो जो पहले शीर्षक चुन लेते हैं और फिर उस शीर्षक के इर्द गिर्द कहानी और विषय बुनते हुए उपन्यास लिख लेते हैं.

लुगदी साहित्य, वो उपन्यास जो आप बस एवं रेल्वे स्टेशन पर धड्ड़ले से बिकता दिखते है, से जुड़े उपन्यासकार अक्सर ऐसा फड़कता हुआ शीर्षक पहले चुनते हैं जो बस और रेल में बैठे यात्री को दूर से ही आकर्षित कर ले और वो बिना उस उपन्यास को पलटाये उसे खरीद कर अपनी यात्रा का समय उसे पढ़ते हुए इत्मेनान से काट ले.

इन उपन्यासों की उम्र भी बस उस यात्रा तक ही सीमित रहती है, कोई उन्हें अपनी लायब्रेरी का हिस्सा नहीं बनाता. न तो उनका नया संस्करण आता है और न ही वो दोबारा बाजार में बिकने आती हैं. मेरठ में बैठा प्रकाशक नित ऐसा नया उपन्यास बाजार में उतारता हैं. इनके शीर्षक की बानगी देखिये – विधवा का सुहाग, मुजरिम हसीना, किराये की कोख, साधु और शैतान, पटरी पर रोमांस, रैनसम में जाली नोट.. आदि..उद्देश्य होता है मात्र रोमांच और कौतुक पैदा करना..

दूसरी ओर ऐसे उपन्यासकार हैं जिन्हें जितनी बार भी पढ़ो, हर बार एक नया मायने, एक नई सीख...पूरा विषय पूर्णतः गंभीर...समझने योग्य.पीढी दर पीढी पढ़े जा रहे हैं. शीर्षक उतना महत्वपूर्ण नहीं जितनी की विषयवस्तु. ये आपकी लायब्रेरी का हिस्सा बनते हैं. आजीवन आपके साथ चलते हैं. प्रेमचन्द कब पुराने हुए भला और हर लायब्रेरी का हिस्सा बने रहे हैं और बने रहेंगे..शीर्षक देखो तो एकदम नीरस...गबन, गोदान, निर्मला...भला ये शीर्षक किसे आकर्षित करते...मगर किसी भी नये उपन्यास से ऊपर आज भी अपनी महत्ता बनाये हैं..

हम जैसे लोधड़ और नौसीखिया उपन्यासकार, अगर उपन्यासकार कहे जा सकें तो, इन दोनों श्रेणियों के बीच हमेशा टहलते रहते हैं कि कहीं से भी किसी भी तरह दाल गल जाये और एक उपन्यास निकल जाये.

हालांकि ऐसा नहीं है कि पहले उपन्यास लिखा नहीं..एक लिखा है मगर हाय रे किस्मत, वो बिना नया उपन्यास आये ही पुराना हो चला है. अब उसका कोई जिक्र भी नहीं करता. ५ साल भी तो गुजर गये उसको आये और आकर भुलाये. कौन पाँच साल पुरानी बात याद रखता है भला. वरना तो पिछले चुनाव में किये वादे नेताओं को कभी अगला चुनाव जीतने न देते.

इसी विषय और/ या शीर्षक की तलाश में जब हम भटक रहे थे कि तभी किसी बंदे ने कहा- अमां, नये जमाने का  नया रोग की आजकल बाजर मे बड़ी चर्चा है, घर घर लोग परेशान है – कौन है जो उससे अछूता है. हाहाकार मचा हुआ है. उस पर ही कुछ लिख डालो. नये लेखकों की चुटकी लेने वालों की कमी कभी नहीं होती, भले ही पाठकों का आभाव बना रहे.

सुझावदाता ने तो शायद चुटकी ली होगी मगर हम न जाने किस गुमान में उसे अपना प्रशंसक माने गंभीरता से इस विषय पर पिछले तीन चार दिन से विचार में डूबे हुये संजिदा से दिखने लगे हैं और तरह तरह के पिछले कई महीनों से चल रहे विचार जैसे कि नये नोट, पुराने नोट, काला धन, चुनाव, तिजोरी, तहखाना, व्यापारिक मित्रता, काला धन, कुटिलता, टैक्स चोरी, भ्रष्टाचार..आदि को खारिज करते हुए.. आज इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि चलो, एक फड़कता हुआ शीर्षक तो मिल ही गया..अब कहानी बुनेंगे..

और नए जमाने के सबसे जटील नए रोग पर विचार कर जो शीर्षक दिमाग में आया है वो है..

सफेद दाढ़ी वाला फकीर’

-अब इसके आसपास कहानी बुनना है..आप बतायें अगर शीर्षक उस बंदे के सुझाव से मेल न खा रहा न तो!!

-समीर लाल ‘समीर’

 

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार मई 30, 2021 के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/60802130

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शनिवार, मई 22, 2021

बचना है तो मोशन लैस हुए घर में बैठे रहो

 

यह उस भक्तिकाल की बात है जब भक्त का अर्थ होता था प्रभु की सेवा में रत. भगवान की पूजा अर्चना करके भक्त अपनी भक्ति भाव को प्रदर्शित करते थे. उन दिनों की अच्छे दिन का कान्सेप्ट नहीं हुआ करता था, तब सिर्फ बुरे, बहुत बुरे और कम बुरे दिन हुआ करते थे, ऐसा बताया है अभी अभी किसी ने.

वक्त को सबसे बलवान माना गया है, वो कितना कुछ बदल देता है. बन्दर को मनुष्य बना कर दिखा देता है.यह अलग बाद है कि एक जमात इतनी सदियों बाद भी स्वभाव और हरकतों से बन्दर ही रह गई. उस पर से आमजन का दुर्भाग्य यह कि वो उन्हीं को अपना रहनुमा चुन कर उस्तरा थमा देता है. ऐसे में वो बन्दर आमजन का सिर नहीं मूढ़ेंगे तो करेंगे क्या? यही उनका स्वभाव है. इसमें शिकायत कैसी?

वक्त के साथ बदलाव की बयार ऐसी चली कि भगवान के भक्त पाखंडियों की कतार में लगा दिये गये और भक्त शब्द पर कब्जा किसी खास आका के अनुयायिओं का हो गया. इनका भक्ति भाव प्रदर्शन करे का तरीका भी पूजा अर्चना से बदल कर अभक्तों को गाली गलौच करने में बदल गया.

आभाव, जिसे अंग्रेजी में लैस पुकारा गया, का प्रभाव भी बदलते वक्त के साथ ऐसा हुआ कि जिस क्लॉथ लैस को कभी निवस्त्र या नंगा कहा जाता था वो फैशन का परिमाण बन गया. जो कभी शेम लैस माना  जाता था वो आज बोल्ड की परिभाषा बन गई.

नये युग को नई की पहचान देता, हर तरफ लैस ही लैस का परचम लहराने लगा है. लैस कभी इतना ज्यादा हो जायेगा, इसकी उम्मीद न तो लैस ने की होगी और न ही मोर ने. ये मोर वो वाला नहीं है जिसे दाना खिलाया जाता है. वैसे तो उसने भी इस तरह डायना खिलाए जाने की उम्मीद कब की थी?  

कारों में की लैस एन्ट्री, ड्राईवर लैस कारें, पेपर लैस दफ्तर, पल्युशन लैस वातावरण, वर्कर लैस एसेम्बली लाईन (रोबोटिक्स), कमिटमेन्ट लैस रिलेशनशीप, पॉयलट लैस हवाई जहाज, फीमेल/ मेल लैस कपल आदि आदि न जाने कितने सारे लैस.

हिदी मे लिखे जा रहे इस आलेख को भी आप इत्मिनान से हिन्दी लैस आलेख कह सकते हैं. ब्लेम लैस भला मैं कैसे बच कर निकल सकता हूँ मगर मजबूरी है क्या करें? जिस देश की राज भाषा हिन्दी होते हुए भी, हिन्दी दिवस हिन्दी लैस हो गये हैं, हिन्दी दिवस पर कवियों को सम्मान पत्र अंग्रेजी में दिये जा रहे हैं. राष्ट्र विकास की अधिकतर योजनाओं के नाम हिन्दी लैस हुए जा रहे हैं- मेक इन इन्डिया हो, डिजिटल इन्डिया हो, स्मार्ट सिटी हो या कैशलैस सोसाईटी की अवधारणा और तो और सेंट्रल विस्टा ही देख लें. सभी हमारे हिन्दी लैस हुए जाने की चुगली कर रहे हैं.  

कैश लैस सोसाईटी तो खैर जब होगी तब होगी लेकिन फिलहाल तो कैश लैश बैंक और कैश लैस आमजन की जेबें हैं.

आज की ताजा ताजा लैस में वैक्सीन लैस दौर में 18 साल से ऊपर के सभी को वैक्सीन देने की घोषणा, आक्सिजन और बेड लैस अस्पताल और उन सब के ऊपर आसूँ लैस विलाप करती मोशन आउए संवेदन लैस सरकार.

जाने कौन सी परिकल्पना को अंजाम देने की तैयारी है, ये तो वो ही जाने मगर एक आमजन के दिल में तो बस यही तमन्ना है कि वक्त एक ऐसा चमत्कार कर दे कि सरकार पॉवर लैस हो, फिर अपने आप करप्शन लैस सोसाईटी से लेकर विकसित देश की अवधारणा तक पूरी होने में वक्त नहीं लगेगा. फिलहाल तो मोशन लैस हुए घर में बैठे रहो वो ही सांस लैस होने से बचे रहने का एकमात्र उपाय है.

 

-समीर लाल ’समीर’

 

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार मई 23, 2021 के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/60625187

 

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