भारत जाना तो कई बरसों में एक बार
होता है मगर लौटना हमेशा ही कई कई बार में होता है। छोटी छोटी किश्तों में वापसी।
तन लौट आता है जहाज में बैठ कर। मन रुक
जाता है। धीरे धीरे टुकड़े टुकड़े में वो भी लौटता है। एक टुकड़ा किसी शहर से, एक
किसी गली से, एक किसी दोस्त के पास से, एक किसी व्यंजन से। न जाने कहाँ कहाँ मन
ठहर जाता है लौटने से पहले। कुछ टुकड़े तो कभी लौटते ही नहीं और हम
हर भारत यात्रा के बाद कुछ कम हो जाते हैं। वही रुके टुकड़े शायद वापस बुलाते होंगे
कि वापस आओ, हम यहीं छूट गए हैं। अच्छा लगता है उन छूटे टुकड़ों के सदायें सुनना।
जिस तस्वीर को लेकर भारत
जाते हैं वो कभी नहीं मिलती, वो पुरानी हो चुकी होती है। नई तस्वीर अक्सर बेहतर ही
होती है। शहर बदल चुके होते हैं। वो गालियां वो सड़कें जो याद में थी सब बदल चुकी
होती हैं। उस तस्वीर में मौजूद बहुत से दोस्त और जानने वाले या तो खुद तस्वीर हो
चुकते हैं या उम्र की चाल के चलते अब पुरानी तस्वीर से अलग से दिखने लगे होते हैं।
पुरानी तस्वीर नई तस्वीर से बदल जाती है जिसे लेकर अगली बार जाएंगे। वो भी बदल
जाएगी -जानते हुए भी तस्वीर तो सजा ही लेते हैं। मानव स्वभाव है।
बहुत से साथ गए चाहतों के पुलिंदे
भी जब भारत पहुँच कर खुलते हैं तो कुछ तो खुलते ही गुम जाते हैं और कुछ चाह कर भी पूरे
नहीं हो पाते- सीमित समय और चाहतों का अपार संसार। चाहत होती है कि यहाँ जाएंगे, वहाँ
जाएंगे। इससे मिलेंगे, उससे मिलेंगे। ये खाएंगे वो खाएंगे- मगर सिर्फ चाह लेने से क्या
होता है? इतने साल से बाहर रहते रहते न पेट इस लायक बचा कि वो खाना पचा पाए और न ही
समय इस लायक बचता है कि सब से मिल जुल लिया जाए।
इसी तरह की चाहतों की कड़ी में
बनारस जाना भी तय हुआ था। मिर्जापुर तक शादी में पहुँच ही गए थे। बनारस से शिप्रा (https://www.facebook.com/SB091979) का
भी बार बार फोन आ रहा था कि कब आ रहे हैं। बिना मिले मत जाइएगा। जापान कभी जाना हुआ
नहीं मगर सुनते थे कि बनारस को क्योटो बना दिया है तो सोचा सस्ते में जापान निपट जाएगा
और काशी विश्वनाथ जी के दर्शन तो हो ही जाएंगे। बहुत समय से ओवर ड्यू थे उनके दर्शन
और तब तक तो उनको भी नहीं मालूम था वो एक दिन जापान में होंगे।
शादी में सब परिवार आया हुआ था
और अधिकतर बनारस जाना चाह रहे थे अतः 13-14 लोग 3 गाड़ियों में भरकर रवाना हुए। मजे
की बात यह रही कि जिस गाड़ी में मैं सवार था उसके पीछे ‘गर्व से कहो – हम हिन्दू हैं’
लिखा था वरना हमारे लेखन से तो लोगों ने हमारे हिन्दू होने पर प्रश्न चिन्ह ही लगा
दिया है। कई बार तो खुद को भी भ्रम होने लगता है कि हिन्दू हैं भी या नहीं? भक्त नहीं
तो हिन्दू नहीं के फार्मूले से बड़ी दिक्कत है मगर जो है सो है। काशी विश्वनाथ के दर्शन
करने थे तो वो वाला भक्ति का फार्मूला नहीं असल आस्था का सवाल था।
हाईवे मस्त था। काशी विश्वनाथ
जाने वाला कॉरीडोर भी हाईवे तक बेहतरीन और शहर में उतरते ही भीड़भाड़ और वही पुराना आलम।
एक जगह होलिका की तैयारी भी दिखी मगर क्योटो की तो स्पेलिंग तक भूल गए और जापान के
बदले खा बनारसी पान ही याद रहा और वही नजर भी आया।
जहाँ भूमिगत पार्किंग थी वहाँ
बोर्ड पर भौकाल लिखा था और उसके नीचे बच्चों वाली रेल चल रही थी गोल गोल धुमाने के
लिए – भौकाल का बोर्ड देखकर लगा कि चलो इसी को बुलेट ट्रेन बोल देते हैं -शायद यही
भौकाल कहलाता हो।
शिप्रा का फोन आता रहा और हम
उससे कहते रहे कि फ्री होकर फोन करते हैं कि कहाँ मिलना है। काशी विश्वनाथ के दर्शन
कर वहाँ से लंका तक जाने में लंका लग गई। पूरे 3 घंटे ट्रेफिक में फंसे रहे तब जाकर
शाम घिरने तक बिड़ला मंदिर पहुंचे। इतना थक गए थे और उससे भी ज्यादा पक गए थे। तय किया
कि बस!! अब बहुत हुआ – दर्शन करके वापस मिर्जापुर चला जाए। क्योटो दर्शन अपने बस का
नहीं है। अंधेरा होने लगा था। शिप्रा को मना किया गया कि मिलना नहीं हो पाएगा। उसे
भी बुरा लगा होगा उससे ज्यादा हमें भी बुरा लगा कि इतना नजदीक पहुँच कर भी मुलाकात
नहीं हुई। ट्रेफिक और अव्यवस्था जो न करा दे सो कम। मगर चूंकि गाड़ी पर लिखा था कि ‘गर्व
से कहो हम हिन्दू हैं’। अतः गर्व करते रहे और बिना मिले अपनी ही गलती मानते हुए लौट
आए।
अब जैसे भारत यात्रा के बहुत
से टुकड़े छूटे हैं और न जाने कितनी शिकायतें कि हमसे नहीं मिले उसी तरह यह भी एक सही।
अगली बार मिलेंगे शिप्रा से और बनारस में फिर खोजने जाएंगे क्योटो – कौन जाने शायद
मिल ही जाए। हो सकता है हमारा ही दृष्टि दोष हो जो हमें नहीं दिखा वरना तो नारे जोरों
पर हैं ही।











