शुक्रवार, अप्रैल 03, 2026

कोई आखिर इतना खा कैसे सकता है?

 




जब कभी घर पर पकोड़ी वाली कढ़ी बनती है तो पकोड़ी तल कर निकलते ही दो चार पकोड़ी यूँ ही खा जाना आम सी बात है। इसका कोई बुरा भी नहीं मानता बल्कि ऐसा ही होता है मान कर चला जाता है। ऐसे ही सब्जी के लिए मटर छीलते हुए कुछ मटर खा जाना, पोहे मे पड़ने के पहले ही कुछ तली मूंगफली खा जाना सब इतना आम है कि कभी अजीब नहीं लगता। यही देखते हुए हमारे पूर्वज बड़े हुए और वही देखते हम- तो कभी ऐसा लगा ही नहीं कि जब पकोड़ी कढ़ी के लिए बनी है तो अलग से काहे खाना?

ये वैसा ही है जैसे सरकारी दफ्तरों में अपनी ही फाईल सरकवाने के लिए ऊपर से कुछ रकम दे देना – हमेशा से देखा है तो कभी अजीब लगा ही नहीं। बल्कि हालत तो ये है कि अगर न देना पड़े तो अजीब लगता है।

इधर एक मित्र पास ही के एक रेस्टोरेंट में खाना खाने गए और थाली की तस्वीर सोशल मीडिया पर डाली। मैं तो दंग ही रह गया कि कोई इतना सारा खाना कैसे खा सकता है? उस पर से उनका नोट था कि अनलिमिटेड थाली है याने जितना जी चाहे, उतना खाएं। मैं तो थाली में रखी इतनी सारी व्यंजनों से भरी कटोरियाँ देख कर ही सोच रहा था कि कैसे खाया होगा? उधर वो कह रहे हैं कि जितना चाहो उतना खाओ – कई बार कई व्यंजन बार बार मंगाए – मजा ही आ गया। जरूर जाना- मजा आएगा।

अजीब तो लगा कि हम कहाँ खा पाएंगे इतना? मगर फिर भी मित्र का सुझाव था तो पहुँच गए एक रोज। थाली परोसी गई। 10-12 कटोरियाँ – तरह तरह के व्यंजन। उस पर से ग्लास में लस्सी। थाली में भी रोटी, पूरी, पापड़, आचार, पकोड़े और भी जाने क्या क्या? खाना शुरू हुआ- कब पूरा खा गए और ऊपर से भी कई व्यंजन बार बार परोसवाये – पता ही नहीं चला और खाते चले गए। चलते चलते मीठे में गुलाब जामुन और गरमा गरम जलेबी भी खाई। लगा कि इतना खा लिया है तो अब एक दो दिन तक तो भूख लगने वाली ही नहीं है। मगर ये क्या -रात होते होते खाना पूरा पच गया और रोज की तरह ही नियमित समय पर भूख लग आई।  

मैं तो एकदम अचरज में पड़ गया कि हद हो गई। लगा कि हम इंसान भी कितने अजीब हैं अगर परोस दिया जाए तो कितना भी खाकर पचा जाते हैं। सिर्फ सोच की बात होती है। रोज रोज में कौन इतने सारे व्यंजन खाता है तो कभी दिमाग में भी नहीं आता कि हम इतना खा भी सकते हैं। खुद का न खाना तो समझे, हम तो इस पर अचरज ही करते हैं कि कोई दूसरा भी कैसे इतना खा सकता है? मगर यह मात्र एक भ्रम ही था। जैसे ही खुद को परोसा गया आखिर खा ही गए और आराम से पचा भी गए।

ऐसे ही कई बार मैं इन नेताओ को देखकर सोचने लगता हूँ कि ये सब इतना पैसा कैसे खा जाते हैं? एक चुनाव क्या जीत लेते हैं – इतना खाते हैं कि अगली तीन पीढ़ी बिना कमाए खाए आराम से जीवन गुजार ले जाए। मगर फिर भी इनका पेट नहीं भरता – हर रोज नई डील और नित पैसे पर पैसा कमाते और खाते जाने की भूख ऐसी जो कभी मरती ही नहीं।

उस रोज वो थाली खा कर सोच कुछ बदली है। हो सकता है कभी चुनाव जीत कर मैं भी नेता बन जाऊँ और फिर जब पैसा परोसा जाए तो अनलिमिटेड थाली की तरह मैं भी खाता जाऊँ। और भूख ऐसी कि फिर से लग आए। फरक शायद बस इतना हो कि इन नेताओ को थाली परोसी जा रही है और मैं अभी चूंकि नेता बना नहीं हूँ तो थाली परोसी ही नहीं गई है और मैं आश्चर्य में बैठा हूँ कि कोई आखिर इतना खा कैसे सकता है?   

-समीर लाल ‘समीर’

 

 

 

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सोमवार, मार्च 30, 2026

महत्वाकांक्षा किसी की और भुगते कोई

 

हमारी ससुराल के बाहर -तब किल्लत नहीं थी 


तिवारी जी ईरान अमरीका युद्ध को लेकर भयंकर चिंतित थे। घंसू से बता रहे थे कि रात रात भर नींद नहीं आती। पेट्रोल के दाम आकाश छू रहे हैं। गैस मिल नहीं रही। डॉलर के मुकाबले रुपया गिरता चला जा रहा है। कैसे काम चलेगा?

घंसू के साथ साथ पान की दुकान पर बैठे अन्य लोगों ने भी तिवारी जी की चिंता का साथ देते हुए चिंता जताई। सबका मानना था कि जीना हराम हो गया है बस कुछ लोगों की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के चलते। झगड़ा किसी का और भुगत रहे हैं हम। सारे दिन वो सब इसी चिंता में मशगूल कभी पान खाते तो कभी तंबाकू और कभी किसी की कृपा हो जाती तो चाय समोसा भी।

दिन पर दिन गुजर रहे थे। न युद्ध रुक रहा था और न ही चिंता। न ही महारथियों की महत्वाकांक्षाओं में कोई कमी आ रही थी। आज भी तिवारी जी का, दुनिया भी की तमाम समस्याओं की तरह, यह मानना था कि वो इस युद्ध का समाधान जानते हैं और इसे रुकवा सकते हैं। सभी पार्टियों का फायदा ही फायदा रहेगा और युद्ध भी रुक जाएगा। मगर फिर हमेशा की तरह ही उनका कहना था कि ये हमारी बात मानेंगे थोड़ी न! मरो कटो आपस में हमारा क्या? हम अपने आप से बढ़कर सलाह देने न पहले कभी गए न आज जाएंगे। जिसको चाहिए हो वो यहाँ आए तो हम बताएं। पान की दुकान पर हर समस्या का समाधान रहता है।

खैर, जहाँ भीड़ हो वहां सारे आपके अपने ही भक्त हों ये जरूरी तो नहीं। कुछ दूसरी तरफ के भक्त भी हर जगह होते ही हैं। उन्हीं मे से एक भक्त बोल उठा कि आप कैसी बात कर रहे हैं? गैस की कहां किल्लत है? खुले आम मिल रही है। बस!! बात इतनी सी बदली है कि अब उसका दाम आपकी औकात के बाहर हो गया है। फिर वो अपने दोस्तों के साथ ठहाका लगाते हुए बोला – तिवारी जी, अपनी औकात बढ़ाईए तो सब उपलब्ध है। उसने आगे बात बढ़ाते हुए कहा कि भारत में तो रुपया चलता है – ऐसे में डॉलर गिरे या उठे, उससे हमें क्या? जिस गली जाना नहीं उसका पता लिए बैठे रो रहे हो। और फिर आपको तो कहीं जाना आना है नहीं – दिन भर यहीं पान की दुकान पर बैठे रहना है। पेट्रोल का दाम बढ़े या घटे – मिले न मिले – आपको इससे क्या फरक पड़ता है?

इतना ही रोने का मन है तो इस बात पर रो लो कि एलोन मस्क एक मिलियन डॉलर में अंतरिक्ष की यात्रा करा रहा है – कितना महंगा कर रखा है थोड़ी सी देर की इस यात्रा को – लूट मचा रखी है। जाना आपको वहाँ भी नहीं है। मगर रोने में क्या बुराई है।

तभी एक दूसरे भक्त ने याद दिलाया कि तिवारी जी तो जमाने से साईकल पर चलते आए हैं – फिर पेट्रोल के लिए क्यूँ परेशान हैं? डॉलर का नोट आज तक देखा नहीं सिवाय अखबार में छपी फोटो के सिवाय और पान की दुकान की दो महीने की उधारी बाकी है मगर चिंता ऐसी मानो डॉलर में कोई बड़े सौदे की पेमेंट की ड्यू डेट आ रही हो।

भक्त जब बात की बाल की खाल निकालते हैं तो बड़ी दूर तक जाते हैं – कभी कभी तो आज की स्थितियों के लिए आजादी के पहले का इतिहास खोद डालते हैं तो तिवारी जी कैसे अछूते रह जाते? उन्होंने याद दिलाया कि तिवारी जी ने आज तक गैस का सिलेंडर लिया ही कब- हमेशा सिगड़ी पर खाने का अलग ही स्वाद होता है का नारा लगाते रहते थे। स्वाद की तो कौन जाने मगर रेलवे लाइन के पास घर होने के कारण उनका चेला अरसों से रेलवे का कोयला बीन कर उनके घर की सिगड़ी सुलगाता आया है, यह बात कम ही लोग जानते थे।

तिवारी जी आखिर क्या कहते? बस इतना ही बोले- तुम लोग और कुछ बना पाओ या न बना पाओ – बातें बनाना खूब जानते हो!!

-समीर लाल ‘समीर’

 

   

     


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शनिवार, मार्च 28, 2026

चमत्कार कर्मों से होते हैं

 


एक पहचान 


अपने शहर का बदला हुआ रूप 


लौटकर जाना होता है जब उस शहर तक जहां आपका बचपन और जवानी गुजरी हो। यादों के कितने जगमग महल होते हैं वहाँ जिन तक पहुँच जाने का मन होता है और साथ ही नत्थी रहती हैं खण्डहर में तब्दील हो चुकी वो यादें जिन्हें अनदेखा कर गुजर जाने को जी चाहता है। तय भी खुद को ही करना होता है किस में खो जायें और किसे नजर अंदाज कर आगे बढ़ जायें

पाकिस्तानी शायरा नोशी गिलानी का शेर है:

उस शहर में कितने चेहरे थे, कुछ याद नहीं सब भूल गए

इक शख़्स किताबों जैसा था, वो शख़्स जुबानी याद हुआ।

तब एक नई किताब उठाई पढ़ने के लिए। पहले ५० पन्ने पढ़ने में दो दिन लगे बस!! जितना समय मिला फटाफट पढ़ गए। आनंद आ रहा था। समय उड़ता गया और हम पढ़ते गए।

फिर न जाने क्यूँ किताब के पाठ नीरस लगने लगे। पता नहीं क्यूँ अध्याय ने अपनी पकड़ खो दी थी। ५१ वां पन्ना और आज चौथा दिन है, वहीं अटक कर रह गया हूँ। 

याद आता है एक बार और ऐसे ही अटक गया था किसी और किताब के किसी पन्ने पर। मगर तब बात और थी- उस पन्ने ने बांध लिया था। डूब गया था उस पन्ने में और डूब इतनी गहरी कि उबर पाना ही नहीं हो पा रहा था। न जाने यादों की किस दुनिया में डूबो कर ले गया। किताब बंद कर के किनारे रख दी फिर भी न जाने कैसे वो पन्ना आंखों में तैरता रहा। कई दिनों तक जब वो किताब खोलता तो बस वही पन्ना बाँचता और सब कुछ ठहर जाता जैसे किसी गहरे शांत समुन्द्र का पानी मगर भीतर वैसी ही हलचल मचाता।

कई दिन लगे थे उस पन्ने से आगे बढ़ने में। मगर न जाने क्यूँ कुछ आगे बढ़ कर फिर लौटा उसी पन्ने पर और फिर उस किताब को वहीं पढ़ना रोक दिया। उस अध्याय को खतम करने का कभी मन ही नहीं हुआ। उसमें डूबे रहना अच्छा लगता था। किसी तरह खुद को समझाया कि यादें अच्छी हों या बुरी- उसमें जीते रहना तो ठीक नहीं। न जाने क्या मन ने समझा मगर कुछ नई किताबें उठा ली बाँचने को। कुछ नयापन आया – बहाव ने एक नया मायने दिया यात्रा को। शायद कुछ ताजगी भी आगे बढ़ते रहने की।

मगर यह अध्याय – इसने रोका तो मगर डुबाया नहीं। बस!! एक रोक सी लगा दी आगे बढ़ने की चाह पर। बार बार लौटता उस पन्ने पर और रुका रहता – इतनी नीरसता और कभी किसी किताब के किसी अध्याय में पहले कभी नहीं दिखी। शायद मेरे पठन का दायरा ही कम रहा होगा।

आज तय किया कि अब इस किताब को आगे नहीं पढ़ूँगा। एक नई किताब उठा ली – इसमें नयापन है, बहाव का अहसास है अतः मनभावन है। अच्छा लग रहा है इसे पढ़ना हाल फिलहाल तो। पुनः पठन ढर्रे पर आया है। रफ्तार भी मिली है और आनंद का भाव भी।

कभी सोचता हूँ तो किताबों से गुजरना और हमारा जीवन- कितनी समानता है दोनों में। जीवन भी तो एक किताब ही है। पन्ना दर पन्ना, एक अध्याय के बाद दूसरा अध्याय – न जाने कितने पात्र और न जाने कितने वाकयात।

इस किताब में भी कभी कहीं हम डूब जाते हैं तो कभी कहीं खो जाते हैं- खुश होते हैं तो कभी किसी पन्ने पर मन विचलित हो जाता है और हम खिन्नता का भाव लिए उचाट मन से जीने लगते हैं।

शायद हम भूल जाते हैं कि जिंदगी के सफर की किताब भी हम खुद ही चुन रहे होते हैं और हर मोड पर उस किताब को बदल कर नई किताब उठा लेने का विकल्प भी हमारे ही हाथ में होता है। होता तो नए सिरे से नई किताब लिख देने का विकल्प भी है मगर हम उस पन्ने से उबर ही नहीं पाते हैं। हम उस पन्ने को, उस अध्याय को ही अपना प्रारब्ध मान कर किसी चमत्कार की प्रतीक्षा करते रहते हैं। कभी तो प्रभु कृपा होगी और जीवन बदलेगा।

काश हम जान पाते कि चमत्कार आसमान से नहीं बरसते वो कर्मों का परिणाम होते हैं।

अगर जीवन में परिवर्तन देखना है तो खुद को बदलना होगा। खुद को नहीं बदलोगे तो कुछ भी नहीं बदलेगा।

-समीर लाल ‘समीर’

  

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बुधवार, मार्च 25, 2026

चुनना गलियों से कलियों का

 


साधु महाराज - नाम -तिवारी 


स्वास्थ्यवर्धक अंकुरित 


मुस्तैद पुलिसिया ऑन ड्यूटी 


इलाकाबंदी मास्टर 


आज चाय बेच रहे हैं तो क्या?


धर्म का व्यापार 

इधर स्ट्रीट फोटोग्राफी का चलन तेजी से बढ़ा है। दरअसल चलन तो फोटोग्राफी का ही बढ़ गया है। फोन जब से कैमरा हुए हैं, जितने हाथ उतने कैमरे और उतनी ही तस्वीरें। लोग फोन बातचीत के लिए न खरीद कर उसके कैमरे की गुणवत्ता के आधार पर खरीद रहे हैं।

शादी ब्याह हो, जन्म दिन हो, किसी से मिलना हो या अकेले हो- कैमरा मुस्तैदी से तस्वीरें खींचता रहता है। उत्सवों में प्रोफेशनल फोटोग्राफर भी होते हैं मगर जब तक उनके द्वारा खींची तस्वीरें एडिट होकर आती हैं तब तक उन्हीं अवसरों की तस्वीरें सब परिवार और मित्रों द्वारा पहले ही फोन से खींच खींच कर साझा हो चुकी होती हैं अतः कुछ बांटने को बचता ही नहीं। बस समझो खुद को खुश करने के लिए गालिब ख्याल अच्छा है सोचकर वो फोटोग्राफर वाली तस्वीरें देखी जाती हैं।

खैर बात चल रही थी स्ट्रीट फोटोग्राफी की। जिसे देखो वो ही इस कार्य में जुटा है। गधा खड़ा दिख जाए। कुत्ता बैठा दिख जाए। रिक्शा खींचता इंसान दिख जाए। वजन ढोता मजदूर दिख जाए। चाय बेचता बालक दिख जाए। ड्यूटी बजाता पुलिस वाला – असीमित दायरा है स्ट्रीट फोटोग्राफी का। खींचने के बाद बांटने के भी असीमित सोशल मीडिया के साधन हैं। हर जगह लोग तस्वीरें ठेल रहे हैं और लोग लाइक भी कर रहे हैं। फोन तो सभी के पास हैं और स्ट्रीट पर भी सभी घूम रहे हैं – भीड़ और मजमे की भी कोई कमी नहीं है तो तस्वीर खींचने में भला वक्त ही कितना लगता है। खींची और लगे हाथ सोशल मीडिया पर डाल दी। उद्देश्य – नहीं पता। क्यूँ खींची – नहीं पता। क्यूँ बांटी – नहीं पता। क्यूँ लाइक की – नहीं पता। बस -सब होता जा रहा है बेवजह। वैसे भी आज के जीवन में अधिकतर चीजें क्यूँ हो रही हैं – नहीं पता। क्यूँ फोन से चिपके हो? क्यूँ रील देख रहे हो? क्यूँ चुनाव में वोट दे रहे हो? क्यूँ एक दूसरे मजहब से नफरत कर रहे हो? नहीं पता!!

मेरी नजरों में स्ट्रीट फोटोग्राफी का सार होना चाहिए गलियों से कलियाँ चुनना। वजह यह बताने की हो कि तस्वीर क्या कहानी कह रही है?

मुझे एक साधु दिखे – बातचीत हुई। नाम बताया तिवारी। मैंने पूछा कि तिवारी तो सरनेम हुआ, नाम क्या है? वो कहने लगे कि गाँव से परेशान होकर जब विंध्याचल आए थे तो एक बाबा की शरण में रहने लगे थे, वो ही तिवारी पुकारने लगे तो तिवारी हो गए वरना तो एक दलित परिवार से आते हैं। रामसुख नाम है। गाँव में गरीबी की मार थी और पढे लिखे कुछ थे नहीं तो यहाँ आकर साधु हो गए। गुरु ने तिवारी नाम दे दिया और अब दान दक्षिणा से बढ़िया गुजारा चल रहा है। मंदिर के पास ही रहते हैं। सुबह से तैयार होकर दिन भर यहीं घूमते हैं। मंदिर आए दर्शनार्थी दान दक्षिणा दे जाते हैं और बदले में यह आशीर्वाद दे देते हैं। चेहरे पर थोड़े न लिखा है कि ब्राह्मण नहीं है और तिवारी नाम से भी आशीर्वाद देने की मुहर लगी ही है।

एक अंकुरित बेचता ठेला दिखा। बताया कि अंकुरित खाना स्वास्थ्य के लिए अच्छा रहता है अतः एक सज्जन समोसा खा लेने के बाद भी एक दोना अंकुरित खाने से नहीं चूके ताकि स्वास्थ्य अच्छा रहे। वहीं कुछ नवयुवा एक पैकेट में उसकी अंकुरित चाट बनवा कर चखने के लिए लेते गए। बता रहे थे कि शाम को ठंडी बियर के साथ इस चाट का अलग ही आनंद है। देवी दर्शन को आए हैं अतः आज नॉनवेज नहीं खाएंगे।

एक पुलिस वाला फोन पर बात करने में मगन आधी नींद में मुस्तैदी से अपनी ड्यूटी बजा रहा था उसे देख कर लगा कि वो निश्चिंत है अगर कुछ गड़बड़ हुआ तो देवी माँ सब संभाल लेंगी। इसी आस्था पर पूरा देश चल रहा है तो उसे तो बस एक पुलिस चौकी की जिम्मेदारी निभानी है। वहीं एक स्वान अपने इलाके में शांत भाव से खड़ा प्रसाद प्राप्त करने का इंतजार कर रहा था। उसे तब तक कोई परेशानी नहीं थी जब तक कोई दूसरा कुत्ता उसके इलाके में न आ जाए। देखकर लगा कि काफी समय से प्रांगण में है और खासा दबदबा बना लिया है क्योंकि कोई और कुत्ता उसके इलाके में आने की हिम्मत करता दिखा नहीं। इलाका बंदी के सबके अपने तरीके होते हैं।

बाकी तो आज के समय में चाय वाले को आप कैसे नजरअंदाज कर सकते हैं? उसकी तो फोटो बनती है – कौन जाने कल को दिल्ली में नजर आए। उसी के आस पास धर्म के नाम पर बिकती पूजा सामग्री की दुकान – अपने आप में एक पूरी इंडस्ट्री और वहीं से संचालित पैसा लेकर जल्दी अलग से दर्शन करवा देने का व्यापार – वो भी अपने आप में एक पूरी कहानी कहता नजर आया। पैसा और पॉवर जो न करवा दे फिर यहाँ तो मात्र देवी दर्शन की बात थी।  

बस!! उस रोज तो गलियों से कलियाँ चुनने में यही कुछ हासिल रहा तो तस्वीरें लगा दे रहे हैं बाकी तो कहानियां ही कहानियाँ फैली हैं हर गली में - कितनी तस्वीरें ली जाए उनकी, कम ही है। लेते रहेंगे आगे भी – क्योंकि हमारे पास फोन भी है, गलियां भी हैं और पता हमें भी नहीं है कि आखिर कहानी सुना क्यूँ रहे हैं। मगर कहानी सुनाने की आदत है तो सुनाते रहेंगे।  

   

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