सोमवार, अप्रैल 06, 2026

आज इंसान खुद को भगवान बना बैठा है

 



अब AI (आर्टिफिशियल इन्टेलिजेंस) का जमाना है। बनाने वाले ने तो न जाने क्या सोच कर बनाया होगा मगर इस्तेमाल करने वालों के तो क्या कहने।

बनाया तो भगवान ने भी इंसानों को कुछ सोच कर ही होगा मगर अब जब वो इनकी हरकतें देखता होगा तो पछताता ही होगा कि ये क्या बना डाला मैंने। हालत तो ये है आज इंसान खुद को भगवान बना बैठा है और वो भी ऐसा भगवान जो उस भगवान से भी ज्यादा पॉवरफुल खुद को समझ रहा है। उस भगवान ने तो फिर भी सब काम अलग अलग भगवानों में बाँट रखे थे। बारिश इन्द्र करवाते थे। रुपया पैसा कुबेर तो पाप पुण्य का हिसाब चित्रगुप्त महाराज। शिक्षा दीक्षा किसी और के पास तो बीमारी हजारी के लिए दूसरे भगवान। काम और क्रोध भी अलग अलग भगवानों के पास। सबके अपने अपने कार्य क्षेत्र और एक दूसरे में कोई दखलंदाजी नहीं।

इंसान जब भगवान बना तो सारा कुछ खुद समेट कर बैठ गया। किसी की दखलंदाजी तो बर्दाश्त ही कहाँ इन इंसानी भगवानों को। कोई ऐसा भगवान बना कि आपका भविष्य बाँचते बाँचते अपना ही भविष्य बनाने में लग गया। पैसे और पॉवर का अंबार लगा कर बैठ गया। वहाँ तक भी रुक जाता तो ठीक -कामदेव की जिम्मेदारी भी अपने दोनों काँधों पर उठा ली। इन्द्र तो अप्सरा भला क्या भेजते, लोकल अप्सराएं जाने किस लालच में आकर खुद ही अपने आप को भेंट चढ़ाने लगीं। एक भगवान पकड़ाता है तब तक दूसरा खड़ा हो जाता है। मानो भगवान न हुआ -असुरों का सरदार हो। हर कतरा खून से एक नया असुर तैयार। सिलसिला खत्म होने का नाम ही नहीं लेता।

कहीं ज्योतिष, कहीं हकीम, कहीं प्रवचनबाज तो कहीं नेता – रूप अनेक -काम एक -सब भगवान बने बैठे हैं अलग अलग रूप धरे जाने कितनों की नाव पार लगाते। मकसद है अपना उल्लू साधना।

हालत ये हो गई है जो भी बनाओ वो ही अपना मकसद भटक जा रही है। सरकार अपनी भलाई के लिए बनवाओ तो वो ऐसी हालत कर देती है कि भलाई तो छोड़ो रुलाई छूट जाए। जिन्हें आपके लिए रोजी रोटी के इंतजाम का जिम्मा दिया था, उनका खुद का पेट खा खाकर नहीं भर रहा वो भला अपको क्या ही देंगे।

खैर बात आर्टिफिशियल इन्टेलिजेंस की हो रही थी। जो काम उसे करना था वो अपनी जगह और जो हमें उससे कराना था वो अपनी जगह। दुनिया में जैसे किसी की असली तस्वीर तो बची ही नहीं। सबने खुद की तस्वीरें AI से ऐसी चमकवा ली हैं कि खुद ही अपनी तस्वीर देखकर पूछते होंगे- आप कौन? देखे हुए से लगते हो। फेसबुक पर देखो तो कुछ और दिखते हैं -सामने मिलों तो कुछ और। पहले यह सिर्फ उनकी फितरत को लेकर होता था मगर अब तो शक्ल सूरत से भी यही होने लगा है।

निदा फाजली जी ने शायद इन्हीं को सोच कर जमाने पहले लिख दिया था:

हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी

जिस को भी देखना हो कई बार देखना।

कोई अपनी तस्वीर बनाए ले रहा है तो कोई अपना वीडियो। कोई किसी के साथ अपनी तस्वीर जोड़ दे रहा है तो कोई किसी के साथ नाच ले रहा है। और कुछ नहीं तो कोई किसी और की आवाज में गाना ही गा डाल रहा है। पहचान पाना मुश्किल हो रहा है कि क्या सचमुच की तस्वीर और वीडियो है और कौन सा AI वाला।

एक समय था जब कहते थे सच ही बोल रहा होगा- कोई बेवजह झूठ क्यूँ बोलेगा? आज समय आया है कि लोग कह रहे हैं AI वाला ही होगा – कोई सचमुच वाली तस्वीर क्यूँ चढ़ाएगा बेवजह बेकार दिखने के लिए।

आज फेसबुक का बैनर बदलने के लिए जब अपनी तस्वीर उठाई तो लगा कि बेवजह क्यूँ असली चढ़ा रहे हैं- AI से बनवा लेते हैं। मगर कुछ लोग तो हमेशा बाकी बच रहते हैं पुरानी मशाल थामें तो यही सोच कर असली वाली तस्वीर इस्तेमाल कर ली। मित्र पूछ रहे हैं कि फ्री वाला AI इस्तेमाल कर लिया है क्या? कोई अच्छा सा सबस्क्राइब करो ठीक ठाक बना देगा!! अब उनको क्या जबाब दें?

-समीर लाल ‘समीर’


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शुक्रवार, अप्रैल 03, 2026

कोई आखिर इतना खा कैसे सकता है?

 




जब कभी घर पर पकोड़ी वाली कढ़ी बनती है तो पकोड़ी तल कर निकलते ही दो चार पकोड़ी यूँ ही खा जाना आम सी बात है। इसका कोई बुरा भी नहीं मानता बल्कि ऐसा ही होता है मान कर चला जाता है। ऐसे ही सब्जी के लिए मटर छीलते हुए कुछ मटर खा जाना, पोहे मे पड़ने के पहले ही कुछ तली मूंगफली खा जाना सब इतना आम है कि कभी अजीब नहीं लगता। यही देखते हुए हमारे पूर्वज बड़े हुए और वही देखते हम- तो कभी ऐसा लगा ही नहीं कि जब पकोड़ी कढ़ी के लिए बनी है तो अलग से काहे खाना?

ये वैसा ही है जैसे सरकारी दफ्तरों में अपनी ही फाईल सरकवाने के लिए ऊपर से कुछ रकम दे देना – हमेशा से देखा है तो कभी अजीब लगा ही नहीं। बल्कि हालत तो ये है कि अगर न देना पड़े तो अजीब लगता है।

इधर एक मित्र पास ही के एक रेस्टोरेंट में खाना खाने गए और थाली की तस्वीर सोशल मीडिया पर डाली। मैं तो दंग ही रह गया कि कोई इतना सारा खाना कैसे खा सकता है? उस पर से उनका नोट था कि अनलिमिटेड थाली है याने जितना जी चाहे, उतना खाएं। मैं तो थाली में रखी इतनी सारी व्यंजनों से भरी कटोरियाँ देख कर ही सोच रहा था कि कैसे खाया होगा? उधर वो कह रहे हैं कि जितना चाहो उतना खाओ – कई बार कई व्यंजन बार बार मंगाए – मजा ही आ गया। जरूर जाना- मजा आएगा।

अजीब तो लगा कि हम कहाँ खा पाएंगे इतना? मगर फिर भी मित्र का सुझाव था तो पहुँच गए एक रोज। थाली परोसी गई। 10-12 कटोरियाँ – तरह तरह के व्यंजन। उस पर से ग्लास में लस्सी। थाली में भी रोटी, पूरी, पापड़, आचार, पकोड़े और भी जाने क्या क्या? खाना शुरू हुआ- कब पूरा खा गए और ऊपर से भी कई व्यंजन बार बार परोसवाये – पता ही नहीं चला और खाते चले गए। चलते चलते मीठे में गुलाब जामुन और गरमा गरम जलेबी भी खाई। लगा कि इतना खा लिया है तो अब एक दो दिन तक तो भूख लगने वाली ही नहीं है। मगर ये क्या -रात होते होते खाना पूरा पच गया और रोज की तरह ही नियमित समय पर भूख लग आई।  

मैं तो एकदम अचरज में पड़ गया कि हद हो गई। लगा कि हम इंसान भी कितने अजीब हैं अगर परोस दिया जाए तो कितना भी खाकर पचा जाते हैं। सिर्फ सोच की बात होती है। रोज रोज में कौन इतने सारे व्यंजन खाता है तो कभी दिमाग में भी नहीं आता कि हम इतना खा भी सकते हैं। खुद का न खाना तो समझे, हम तो इस पर अचरज ही करते हैं कि कोई दूसरा भी कैसे इतना खा सकता है? मगर यह मात्र एक भ्रम ही था। जैसे ही खुद को परोसा गया आखिर खा ही गए और आराम से पचा भी गए।

ऐसे ही कई बार मैं इन नेताओ को देखकर सोचने लगता हूँ कि ये सब इतना पैसा कैसे खा जाते हैं? एक चुनाव क्या जीत लेते हैं – इतना खाते हैं कि अगली तीन पीढ़ी बिना कमाए खाए आराम से जीवन गुजार ले जाए। मगर फिर भी इनका पेट नहीं भरता – हर रोज नई डील और नित पैसे पर पैसा कमाते और खाते जाने की भूख ऐसी जो कभी मरती ही नहीं।

उस रोज वो थाली खा कर सोच कुछ बदली है। हो सकता है कभी चुनाव जीत कर मैं भी नेता बन जाऊँ और फिर जब पैसा परोसा जाए तो अनलिमिटेड थाली की तरह मैं भी खाता जाऊँ। और भूख ऐसी कि फिर से लग आए। फरक शायद बस इतना हो कि इन नेताओ को थाली परोसी जा रही है और मैं अभी चूंकि नेता बना नहीं हूँ तो थाली परोसी ही नहीं गई है और मैं आश्चर्य में बैठा हूँ कि कोई आखिर इतना खा कैसे सकता है?   

-समीर लाल ‘समीर’

 

 

 

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सोमवार, मार्च 30, 2026

महत्वाकांक्षा किसी की और भुगते कोई

 

हमारी ससुराल के बाहर -तब किल्लत नहीं थी 


तिवारी जी ईरान अमरीका युद्ध को लेकर भयंकर चिंतित थे। घंसू से बता रहे थे कि रात रात भर नींद नहीं आती। पेट्रोल के दाम आकाश छू रहे हैं। गैस मिल नहीं रही। डॉलर के मुकाबले रुपया गिरता चला जा रहा है। कैसे काम चलेगा?

घंसू के साथ साथ पान की दुकान पर बैठे अन्य लोगों ने भी तिवारी जी की चिंता का साथ देते हुए चिंता जताई। सबका मानना था कि जीना हराम हो गया है बस कुछ लोगों की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के चलते। झगड़ा किसी का और भुगत रहे हैं हम। सारे दिन वो सब इसी चिंता में मशगूल कभी पान खाते तो कभी तंबाकू और कभी किसी की कृपा हो जाती तो चाय समोसा भी।

दिन पर दिन गुजर रहे थे। न युद्ध रुक रहा था और न ही चिंता। न ही महारथियों की महत्वाकांक्षाओं में कोई कमी आ रही थी। आज भी तिवारी जी का, दुनिया भी की तमाम समस्याओं की तरह, यह मानना था कि वो इस युद्ध का समाधान जानते हैं और इसे रुकवा सकते हैं। सभी पार्टियों का फायदा ही फायदा रहेगा और युद्ध भी रुक जाएगा। मगर फिर हमेशा की तरह ही उनका कहना था कि ये हमारी बात मानेंगे थोड़ी न! मरो कटो आपस में हमारा क्या? हम अपने आप से बढ़कर सलाह देने न पहले कभी गए न आज जाएंगे। जिसको चाहिए हो वो यहाँ आए तो हम बताएं। पान की दुकान पर हर समस्या का समाधान रहता है।

खैर, जहाँ भीड़ हो वहां सारे आपके अपने ही भक्त हों ये जरूरी तो नहीं। कुछ दूसरी तरफ के भक्त भी हर जगह होते ही हैं। उन्हीं मे से एक भक्त बोल उठा कि आप कैसी बात कर रहे हैं? गैस की कहां किल्लत है? खुले आम मिल रही है। बस!! बात इतनी सी बदली है कि अब उसका दाम आपकी औकात के बाहर हो गया है। फिर वो अपने दोस्तों के साथ ठहाका लगाते हुए बोला – तिवारी जी, अपनी औकात बढ़ाईए तो सब उपलब्ध है। उसने आगे बात बढ़ाते हुए कहा कि भारत में तो रुपया चलता है – ऐसे में डॉलर गिरे या उठे, उससे हमें क्या? जिस गली जाना नहीं उसका पता लिए बैठे रो रहे हो। और फिर आपको तो कहीं जाना आना है नहीं – दिन भर यहीं पान की दुकान पर बैठे रहना है। पेट्रोल का दाम बढ़े या घटे – मिले न मिले – आपको इससे क्या फरक पड़ता है?

इतना ही रोने का मन है तो इस बात पर रो लो कि एलोन मस्क एक मिलियन डॉलर में अंतरिक्ष की यात्रा करा रहा है – कितना महंगा कर रखा है थोड़ी सी देर की इस यात्रा को – लूट मचा रखी है। जाना आपको वहाँ भी नहीं है। मगर रोने में क्या बुराई है।

तभी एक दूसरे भक्त ने याद दिलाया कि तिवारी जी तो जमाने से साईकल पर चलते आए हैं – फिर पेट्रोल के लिए क्यूँ परेशान हैं? डॉलर का नोट आज तक देखा नहीं सिवाय अखबार में छपी फोटो के सिवाय और पान की दुकान की दो महीने की उधारी बाकी है मगर चिंता ऐसी मानो डॉलर में कोई बड़े सौदे की पेमेंट की ड्यू डेट आ रही हो।

भक्त जब बात की बाल की खाल निकालते हैं तो बड़ी दूर तक जाते हैं – कभी कभी तो आज की स्थितियों के लिए आजादी के पहले का इतिहास खोद डालते हैं तो तिवारी जी कैसे अछूते रह जाते? उन्होंने याद दिलाया कि तिवारी जी ने आज तक गैस का सिलेंडर लिया ही कब- हमेशा सिगड़ी पर खाने का अलग ही स्वाद होता है का नारा लगाते रहते थे। स्वाद की तो कौन जाने मगर रेलवे लाइन के पास घर होने के कारण उनका चेला अरसों से रेलवे का कोयला बीन कर उनके घर की सिगड़ी सुलगाता आया है, यह बात कम ही लोग जानते थे।

तिवारी जी आखिर क्या कहते? बस इतना ही बोले- तुम लोग और कुछ बना पाओ या न बना पाओ – बातें बनाना खूब जानते हो!!

-समीर लाल ‘समीर’

 

   

     


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शनिवार, मार्च 28, 2026

चमत्कार कर्मों से होते हैं

 


एक पहचान 


अपने शहर का बदला हुआ रूप 


लौटकर जाना होता है जब उस शहर तक जहां आपका बचपन और जवानी गुजरी हो। यादों के कितने जगमग महल होते हैं वहाँ जिन तक पहुँच जाने का मन होता है और साथ ही नत्थी रहती हैं खण्डहर में तब्दील हो चुकी वो यादें जिन्हें अनदेखा कर गुजर जाने को जी चाहता है। तय भी खुद को ही करना होता है किस में खो जायें और किसे नजर अंदाज कर आगे बढ़ जायें

पाकिस्तानी शायरा नोशी गिलानी का शेर है:

उस शहर में कितने चेहरे थे, कुछ याद नहीं सब भूल गए

इक शख़्स किताबों जैसा था, वो शख़्स जुबानी याद हुआ।

तब एक नई किताब उठाई पढ़ने के लिए। पहले ५० पन्ने पढ़ने में दो दिन लगे बस!! जितना समय मिला फटाफट पढ़ गए। आनंद आ रहा था। समय उड़ता गया और हम पढ़ते गए।

फिर न जाने क्यूँ किताब के पाठ नीरस लगने लगे। पता नहीं क्यूँ अध्याय ने अपनी पकड़ खो दी थी। ५१ वां पन्ना और आज चौथा दिन है, वहीं अटक कर रह गया हूँ। 

याद आता है एक बार और ऐसे ही अटक गया था किसी और किताब के किसी पन्ने पर। मगर तब बात और थी- उस पन्ने ने बांध लिया था। डूब गया था उस पन्ने में और डूब इतनी गहरी कि उबर पाना ही नहीं हो पा रहा था। न जाने यादों की किस दुनिया में डूबो कर ले गया। किताब बंद कर के किनारे रख दी फिर भी न जाने कैसे वो पन्ना आंखों में तैरता रहा। कई दिनों तक जब वो किताब खोलता तो बस वही पन्ना बाँचता और सब कुछ ठहर जाता जैसे किसी गहरे शांत समुन्द्र का पानी मगर भीतर वैसी ही हलचल मचाता।

कई दिन लगे थे उस पन्ने से आगे बढ़ने में। मगर न जाने क्यूँ कुछ आगे बढ़ कर फिर लौटा उसी पन्ने पर और फिर उस किताब को वहीं पढ़ना रोक दिया। उस अध्याय को खतम करने का कभी मन ही नहीं हुआ। उसमें डूबे रहना अच्छा लगता था। किसी तरह खुद को समझाया कि यादें अच्छी हों या बुरी- उसमें जीते रहना तो ठीक नहीं। न जाने क्या मन ने समझा मगर कुछ नई किताबें उठा ली बाँचने को। कुछ नयापन आया – बहाव ने एक नया मायने दिया यात्रा को। शायद कुछ ताजगी भी आगे बढ़ते रहने की।

मगर यह अध्याय – इसने रोका तो मगर डुबाया नहीं। बस!! एक रोक सी लगा दी आगे बढ़ने की चाह पर। बार बार लौटता उस पन्ने पर और रुका रहता – इतनी नीरसता और कभी किसी किताब के किसी अध्याय में पहले कभी नहीं दिखी। शायद मेरे पठन का दायरा ही कम रहा होगा।

आज तय किया कि अब इस किताब को आगे नहीं पढ़ूँगा। एक नई किताब उठा ली – इसमें नयापन है, बहाव का अहसास है अतः मनभावन है। अच्छा लग रहा है इसे पढ़ना हाल फिलहाल तो। पुनः पठन ढर्रे पर आया है। रफ्तार भी मिली है और आनंद का भाव भी।

कभी सोचता हूँ तो किताबों से गुजरना और हमारा जीवन- कितनी समानता है दोनों में। जीवन भी तो एक किताब ही है। पन्ना दर पन्ना, एक अध्याय के बाद दूसरा अध्याय – न जाने कितने पात्र और न जाने कितने वाकयात।

इस किताब में भी कभी कहीं हम डूब जाते हैं तो कभी कहीं खो जाते हैं- खुश होते हैं तो कभी किसी पन्ने पर मन विचलित हो जाता है और हम खिन्नता का भाव लिए उचाट मन से जीने लगते हैं।

शायद हम भूल जाते हैं कि जिंदगी के सफर की किताब भी हम खुद ही चुन रहे होते हैं और हर मोड पर उस किताब को बदल कर नई किताब उठा लेने का विकल्प भी हमारे ही हाथ में होता है। होता तो नए सिरे से नई किताब लिख देने का विकल्प भी है मगर हम उस पन्ने से उबर ही नहीं पाते हैं। हम उस पन्ने को, उस अध्याय को ही अपना प्रारब्ध मान कर किसी चमत्कार की प्रतीक्षा करते रहते हैं। कभी तो प्रभु कृपा होगी और जीवन बदलेगा।

काश हम जान पाते कि चमत्कार आसमान से नहीं बरसते वो कर्मों का परिणाम होते हैं।

अगर जीवन में परिवर्तन देखना है तो खुद को बदलना होगा। खुद को नहीं बदलोगे तो कुछ भी नहीं बदलेगा।

-समीर लाल ‘समीर’

  

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