हर चीज सबके लिए नहीं होती। यह बात तिवारी
जी को तब समझ आई जब जोश जोश में मोहल्ले के पार्क में वो भी सबकी देखा देखी योगा दिवस के दिन योगा करने पहुँच गए। सरकारी आयोजन
था अतः अच्छी खासी भीड़ थी। कार्यक्रम की शुरुवात लॉफ्टर योगा से हुई। आजकल सरकारी आयोजनों
पर हँसी आ जाना यूँ भी सहज होता है। पहले ही ठहाके में न सिर्फ तिवारी जी अपना कुर्ता
लाल कर लिए बल्कि अपने सामने अच्छी खासी ठहाका लगाती श्रीमती पाण्डे की सफेद साड़ी भी
लाल कर डाली। पान तंबाकू मुंह में घुलाने की ऐसी आदत कि भूल ही गए ठहाका लगाते ही पूरा
माल मसाला बाहर आ जाएगा। थूक तो जानता नहीं कि सामने पीकदान है या श्रीमती पाण्डे की
सफेद साड़ी।
ठहाका लगाती श्रीमती पाण्डे रुआंसी
हो गई। इसके पहले वो तिवारी जी को हड़काती, तिवारी जी खुद ही दबे पाँव पार्क से निकल
लिए। उसके बाद सीधे पान की दुकान पर आकर अपने नियमित आसान पर विराजमान हो लिए। तब से
आज वो सबको यही समझा रहे हैं कि भाई, सब चीजें सबके लिए नहीं होती फिर वो भले ही योगा
क्यूँ न हो।
अपने इसी चिंतन को आगे बढ़ाते
हुए वह बोले कि बताओ तो जरा- बनारस से चुनाव जीते हैं और दिन रात योगा दिवस की रट लगाते
हैं। यह बनारस का और बनारसी पान का सरासर अपमान है। इतना कहते हुए उनके भीतर का नेता
जागा और वो कहने लगे कि या तो बनारस से इस्तीफा दो या योगा बैन करो। घँसु ने भी सदा
की तरह हाँ मे हाँ मिलाई। तिवारी जी ने तब तक सुबह सुबह हुए पान के नुकसान और कुर्ता
खराब हो जाने के लिए योगा को गरियाते हुए नया पान मुंह में भर लिया। अब वे कुछ घंटे
मुंह में पान घुलाएंगे और मौन चिंतन में डूबे रहेंगे।
इस बीच किसी ने सलाह दी कि आप
काहे लॉफ्टर योगा करने लगे। बाकी का योगा कर लेते, लॉफ्टर योगा जाने देते। अब तक तिवारी
जी चिंतन के दौरान इस निष्कर्ष तक जा पहुंचे थे कि यदि कोई योगा की तारीफ कर रहा है
मतलब वो सरकार की तारीफ कर रहा है। मन ही तो है जो सोच लो। सोचने वाले ही तो सोच पाए
कि अगर आप सरकार के साथ नहीं हैं तो आप धर्म विरोधी हैं- सोचने पर क्या लगाम और उस
पर से सोचने का तो कोई पैसा भी नहीं लगता।
‘मुफ्त का चंदन घिस मेरे लाला’
का मंत्र थामे सब अपने अपने हिसाब से सोच ले रहे हैं। सच्चाई क्या है इससे किसी को
कोई लेना देना नहीं है। आधी आबादी को तो जैसा सोचवा दो वैसा सोच लेती है और बाकी की
आधी अपनी सुविधा और श्रद्धा के आधार पर सोच समझ रही है।
अतः जैसे ही उसने बाकी के योगा
करने की सलाह दी -तिवारी जी उसे ही गरियाने लगे। तुम जाओ करो अपना योगा और अपनी भक्ति।
हमको मत समझाओ – हम अपना अच्छा बुरा समझते हैं। गुसा इतना तेज आया कि न तो गुस्सा पी
पाए और न ही पान थूक और इस बार लाल हुआ सफेद कुर्ता समझाने वाले सलाहकार का था।
वो अपना कुर्ता खराब होने पर
भड़कता, इससे पहले ही घँसु ने मैदान संभाला- काहे बेवजह सलाह देने चले आते हो? तिवारी
जी का गुस्सा जानते नहीं हो। अभी तो कुर्ता लाल हुआ है। अगर ज्यादा रुके रहे तो तिवारी
जी गाल लाल करने में भी पीछे नहीं रहेंगे।
पिटना भला किसे पसंद है अतः सलाहकार
भी अपना कुर्ता पौंछते हुए वहाँ से निकाल लिया। तिवारी जी का सुबह से तीसरा पान अब
मुंह में था।
-समीर लाल ‘समीर’









