शनिवार, नवंबर 19, 2022

प्रभु तेरी महिमा अपरंपार!!

 


एक मित्र ने आज शाम घर पर भोजन का निमंत्रण दिया था, अतः निर्धारित समय पर सपत्नीक उनके घर पहुँचे। राजनीतिक मित्रता है अतः पारिवारिक मेल जोल अब तक न था और न कभी उनके पतिदेव से मुलाकात थी। वो जरूर मेरी पत्नी से मिली हुई थी क्यूंकि मेरी पत्नी भी राजनीति में सक्रिय हिस्सेदारी रखती हैं।  

पतिदेव का नाम न जानने की ग्लानि भी थी कि इतने दिन से मिलजुल रहे हैं, इतना तो पूछ ही लेना था। हालांकि पूछ तो मेरी पत्नी भी सकती थीं मगर उन्होंने भी कभी नहीं पूछा और आज गलती मेरी बताई गई कि कोई भी जरूरी जानकारी रखते ही नहीं हो।   

ये देश भी ऐसा है और नया जमाना है, कौन जाने उसका लास्ट नेम पतिदेव का लास्ट नेम भी हो या न हो। वरना भारत वाला हमारा जमाना होता तो उसके लास्ट नेम के साथ साहब लगा कर पतिदेव का नाम ले लेते। जैसे श्रीमती तिवारी के पतिदेव को आप बेझिझक तिवारी साहब कह कर संबोधित कर सकते हैं। मगर अब तो मैडन नेम का जमाना है। आजकल लड़कियाँ मां बाप की इज्जत करें न करें, मगर उनसे मिले अपने लास्ट नेम को अपनी आइडेंटिटी का फोकल पाईण्ट बना लेती हैं। पति का लास्ट नेम इस्तेमाल करना उसकी गुलामी स्वीकार करना है। युगों तक महिला इन्हीं गुलामी की जंजीरों मे जकड़ी थी, अब बस बहुत हुआ!!

आज हम जाग गई हैं। अब पुरानी जंजीरें तोड़ कर ही नई आजाद महिला सशक्तिकरण का अध्याय लिखा जाना शुरू हो गया है। अब यह धीमे धीमे ग्रंथ का रूप लेगा। पुरुष सत्ता अपने अंतिम सौपान पर है। शंखनाद की ध्वनि पूरे वातावरण में गुंजायमान है।

पुरानी रूढ़ियों को तोड़ते हुए इस सशक्तिकरण के युग में बच्चों के नाम के साथ लगने वाले लास्ट नेम भी जंग का विषय बने हुए हैं। पति का लास्ट नेम ही क्यूं, हमारा मैडन नेम क्यूँ नहीं? इस चक्कर में समझौते के तौर पर एक बालक का लास्ट नेम देखकर हैरान रह गया। अवान अनी, आदतन पूछे बिना न रहा सका कि बच्चा दिख तो भारत का रहा है फिर ये लास्ट नेम कैसा, ये तो कभी सुना नहीं? हमारे जमाने मे तो लास्ट नेम और शहर के नाम को जोड़कर रिश्तेदारी निकल आती थी। इस पर अवान की मम्मी ने बताया कि दरअसल मेरा नाम अलका शर्मा है और पति का नाम नीरज डाबर। इसलिए दोनों के फर्स्ट नेम का पहला अक्षर ले लिया- पहले मेरा फिर इनका। आखिर मैं बच्चे की माँ हूं तो पहले तो मेरा ही आएगा ना!! मेरे पास भी सहमत होने के अलावा क्या चारा था तो मुस्कराते हुए मुंडी हिला दी सहमति में। मगर जंबू द्वीप के वासी हम भारतीय, बिना सलाह दिये कब फारिग हो पाते हैं। अतः मुफ्त ही सलाह दे डाली कि पतिदेव के लास्ट नेम का पहला अक्षर बच्चे के लास्ट नाम के बीच में डाल दीजिए, कौन जाने नाम से ही किस्मत चमक जाए। अडानी नाम तो ऐसा है कि सरकार झुकी है कदमों में। ‘प्रभु से बड़ा प्रभु का नाम’ -बस इसी के भरोसे रख डालिए। पुरानी कहावतें यूं ही नहीं होती, उनकी पहुँच बहुत दूर तक जाती है। वो देखिए न कहावत कि ‘सौ बार बोला झूठ सच हो जाता है’। ईसेल सुबह शाम इसी में लगी है। अब हम तो सिर्फ सलाह ही दे सकते थे सो दे आए आगे अलका और नीरज जानें।

खैर दरवाजा खटखटाया और मन ही मन प्रभु से प्रार्थना करने लगे कि मोहतरमा ही दरवाजा खोलें ताकि जब वो उनके पति से मिलवायेंगी तो नाम भी बतायेंगी। कहते हैं कि अगर सच्चे मन से प्रार्थना करो तो प्रभु आपको सब हासिल करा देता है सिर्फ उन सुविधाओं को छोड़ कर जो सरकार मुहैया कराती है। उस पर प्रभु का भी जोर नहीं चलता। दरवाजा मोहतरमा ने ही खोला। हम दोनों से नमस्ते बंदगी के बाद उन्होंने अपने पति  को आवाज लगाई- हनी, समीर भाई आ गए हैं साधना जी के साथ। आओ यहाँ! मिलो इनसे!

पतिदेव तुरंत हाजिर। हम भी लपक कर गले मिले और बोले – हनी भाई!! मिलकर मजा आ गया!! हमारी पत्नी ने भी देखादेखी ‘हनी भईया, नमस्ते – आपसे मिल कर बहुत अच्छा लगा।‘

हम सब मिलकर जब बैठक में इत्मीनान से बैठे तब तक पत्नी के पास बेटे का फोन आ गया और उसने बेटे को बताया कि बाद में बात करते हैं अभी तुम्हारे हनी अंकल आंटी के यहाँ डिनर पर आए हैं और फोन रख दिया।

बस!! फिर तो जो हंसी का समा बंधा कि क्या कहने!! बताया गया कि ये नाम वाला हनी नहीं है, यह प्यार वाला हनी है। जैसे भारत का ‘सुनो जी’ । अब हमारे देशी कानों को देशी जुबान से हनी सुनने की आदत तो दो दशक से ज्यादा समय तक यहाँ रहने के बाद भी न पड़ी तो इसमें हमारा क्या कसूर? असल नाम कुछ और ही निकला।

लगता है अब अपने आपको अपग्रेड कर लेना चाहिए – हनी, जानू, बेबी, पप्पू, फेंकू आदि को डीकोड करना सीख लेना चाहिए वरना इस तरह हर तरफ शर्मिंदगी उठानी पड़ेगी।

प्रभु भी कब कहाँ ले जाकर क्या सीख दिलवाएगा, कोई नहीं जानता!!

प्रभु तेरी महिमा अपरंपार!!

-समीर लाल ‘समीर’    

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार नवंबर 20, 2022  के अंक में:

#1092 - Page 8 - Bhopal - Subah Savere Epaper



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शुक्रवार, नवंबर 11, 2022

डे लाईट सेविंग – एक गुदगुदाता सा मजाक

 

     Sometime falling back is good- it gives you one hour of extra sleep 


जब दिन और रात दोनों में रोशन है यहाँ

हर इक बुलंद इमारत का हर कोना कोना

उन जगमग एलईडी लाइटों की रोशनी से

रोशन धूप दुपहर मे भी न जाने किस अबुझ

चौंधआई आँखों के परे अंधेरे को चुनौती देता हुआ

मानिंद अखंड भारत को बेवजह जोड़ने का प्रयास

कुछ यूं ही तो प्रतीत होता ये एक नया फलसफा   

तब आज इस नवंबर के महीने के शुरुवाती दौर में  

सोचता हूँ क्यूँ अनायास घड़ी की सुई घूम जाती है

अपने आज के समय से एक घंटे पीछे की तरफ

एक रिवाजतन उस डे टाइम सेविंग के नाम पर,

क्या पता कुछ थके हारे लोग राहत पा जाते हों  

इसी बहाने निद्रामग्न एक घंटा और नींद निकाल

या किसी और को बोनस में मिल जाता है यूं ही  

एक घंटा और बेशकीमती इसी फिसलती जिंदगी का

और वो यूं ही कह उठता हो वाह कमाल है जिंदगी!!

और मैं न जाने क्यूँ सोचता रह जाता हूँ नाहक ही

यूं इस तरह बेवजह ही इस समय की बर्बादी क्यूं?

मशीनवाली घड़ी की सुई कब से तय करने लगी है  

मेरे अपने ही दिल के जज़्बातों की गहरी गहराईयां

मेरे अपने मन में पलते ख्वाबों की ऊँची ऊँचाईयां?

मैं नहीं सुनता आजकल एक और घड़ी की झंकार

मैं नहीं सोता आजकल पुनः फिर सुनकर ये हुंकार

कि मेरे अलावा सा है मेरा यह ख्वाबों का संसार!!

-समीर लाल ‘समीर’

  

 दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंट मे आज दिनांक 11-11- 2022 को 

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शनिवार, अक्तूबर 15, 2022

पहाड़ी ओहदों की बस्ती में जिंदगी का अहसास..

 



सरकारी घर मिला हुआ था पिता जी को, पहाड़ के उपर बनी कॉलोनी में- अधिकारियों की कॉलोनी थी- ओहदे की मर्यादा को चिन्हित करती, वरना कितने ही अधिकारी उसमें ऐसे थे कि कर्मों से झोपड़ी में रखने के काबिल भी नहीं, रहना तो दूर की बात होती. मजदूरों और मातहतों का खून चूसना उन्हें उर्जावान बनाता था.

वो अपने पद के नशे में यह भूल ही चुके थे कि कभी उन्हें सेवानिवृत भी होना है. खैर, सेवा के नाम पर तो वो यूँ भी कलंक ही थे तो निवृत भला क्या होते लेकिन एक परम्परा है, जब साथ सारे अधिकार भी पैकेज डील में जाते रहते हैं. खुद तो खैर औपचारिक रुप से सेवानिवृत होने के साथ ही शहर में कहीं आकर बस जाते मगर बहुत समय लगता उन्हें, जब वो वाकई उस पहाड़ वाली कॉलोनी से अपनी अधिकारिक मानसिकता उतार पाते. जिनका जीवन भर खून पी कर जिन्दा रहे, उन्हीं से रक्त दान की आशा करते. कुछ छोड़ा हो तो दान मिले. खाली खजाने से कोई क्या लुटाये.

उसी पहाड़ पर उन्हीं अधिकारियों के बच्चे, हम सब भरी दोपहरिया में निकल लकड़ियाँ और झाड़ियाँ बीन कर चट्टानों के बीच छोटी छोटी झोपड़ियाँ बनाते और उसी की छाया में बैठ घर घर खेलते. अपने घर से टिफिन में लाया खाना खाते मिल बाँट कर और उस झोपड़ी को अपना खुद का घर होने जैसा अहसासते. मालूम तो था कि शाम होने के पहले घर लौट जाना है या अगर ज्यादा गरमी लगी तो शाम से कोई वादा तो है नहीं कि तुम्हारे आने तक रुकेंगे ही, और होता भी तो वादा निभाता कौन है? फिर रात तो गर्मी में कूलर और सर्दी में हीटर में सोकर कटेगी (आखिर अधिकारी के बेटे जो ठहरे) तो झोपड़ी की गर्मी/सर्दी की तकलीफ का कोई अहसास ही नहीं होता. घर से बना बनाया खाना और बस लगता कि काश इसी में रह जायें.

वातानुकूलित ड्राईंगरुम में बैठकर गरीबी उन्मूलन पर भाषण देने और शोध करने जैसा आनन्द मिला करता था उन झोपड़ियों में बैठ कर.

पहाड़ों पर तफरीह के लिए घूमने जाना और पहाड़ों की दुश्वारियों को झेलते हुए पहाड़ों पर जीवन यापन करना दो अलग अलग बातें हैं, दो अलग अलग अहसास जिन्दगी के.

काश!! दुश्वारियाँ, परेशानियाँ और दर्द बिना झेले अहसासी जा सकती. तब इन नेताओं की कपोल कल्पनाएं भी कम से कम कुछ तो वास्तविकता के करीब होतीं. झूठ में थोड़ा सी सही कुछ तो सच भी होता.

एक जमाने में अंधों की बस्ती के राजा ने प्रजा से कहा कि तुम सब खतरे में हो, बस्ती में शेर घुस आया है. सारी अंधी प्रजा राजा के ऐलान पर यहाँ वहाँ भागने लगी. कुछ समय बाद फिर राजा ने ऐलान कराया कि अब आप सब निश्चिंत हो जाओ, मैंने शेर को पीट पीट कर वापस जंगल भगा दिया है. प्रजा ने राजा का जयकारा लगाया. अब जब जब भी राजा को अपना मतलब साधना होता वो ऐसा ही ऐलान करता और फिर शेर को पीट पीट कर भगा देता किन्तु उसे मारता कभी नहीं वरना भविष्य में शेर फिर कैसे आता? बस अंधों की बस्ती थी – न कोई शेर था, न कोई खतरा. राजा अपना मतलब साध रहा था. सदियों पुरानी परंपरा आज भी चल रही है – आज धर्म खतरे में है.     

सुनते हैं आजकल युवराज भी ऐसे ही कुछ अहसास पाने के लिए देशाटन कर रहे हैं वाकई में कुछ दर्द सह कर, मगर न जाने किस आशा में जुड़े हुए भारत को फिर से जोड़ने की एक अथक कोशिश में.

सबके अपने राग हैं और सबके अपने ढोल – आम जनता का काम तो हर हाल में नाचना बस है.

ये सामर्थ्यवान है इनकी हर ढाप सुहानी मगर जनता के नाच में अब दुश्वारियां और दर्द उभरने लगा है.  

कहते हैं न कि भरी रसोई में ही उपवास भी धार्मिक कहलाता है वरना तो फक्कड़ हाली को कौन पूछता है. न कोई पुण्य मिलता है, न ही पुण्य प्राप्ति की आशा उन दो रोटियों की उम्मीद में.

भगवान भी कैसे भेदभाव करता है-शौकिया भूखा रहने वालों को पुण्य और मजबूरीवश भूखा रहने वालों को अगले दिन फिर भूख झेलने की सजा.

-समीर लाल ‘समीर’

 

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार अक्टूबर 16, 2022 के अंक में:

https://epaper.subahsavere.news/clip/619

 

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बुधवार, अक्तूबर 05, 2022

जिंदगी शायद इसी कशमकश का नाम है!!

 


आज सुबह जब टहलने निकला तब

आदतन हर रोज की तरह अरमानों का

इक बादल उठा लाया था साथ अपने ,

दिन गुजरा और बदला कुछ मौसम,

सूरज अब डूबने को हुआ है लालायित –

और मैं खोज रहा हूँ उस बादल को

वो भी खो गया कुछ मुझसा मेरे साथ

या फिर बरस गया है कहीं कुछ यूं ही

पसीनों की उन झिलमिल बूंदों के साथ

जो मुझे ले आई हैं दिन के उस पार से

इस पार तक एक नया मैं बनाते हुए !!

हर रोज इक बादल खो जाता है मेरा

इन मेहनतकश पसीने की बूंदों के साथ –

जिंदगी शायद इसी कशमकश का नाम है!!

मगर साथ ही मुझे इस बात का भी भान है-

सूरज डूबता ही है फिर से ऊग आने के लिए!!

-समीर लाल ‘समीर’  

 


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