रविवार, मार्च 22, 2026

नए जमाने के बदलते शहर

 

सेल्फ़ी 

बुकमार्क 

अपनी सीट पर विराजमान 

होली के दिन सुबह का ७ बजा था। मित्र अपनी गाड़ी लेकर आ गया था मुझे पूना जाने के लिए एयरपोर्ट छोड़ने। मेरे मन में बचपन का जबलपुर था, अतः मैं सोच रहा था कहीं कोई रंग न लगा दे। मित्र ने बताया कि चिंता मत करिए। अब कोई अनजान को रंग नहीं लगाता और वैसे भी लोग १० बजे तक आराम से निकलते हैं होली खेलने वो भी सिर्फ पहचान वालों के साथ। अचरज लगा मगर हर बात तो बदल गई है किस किस पर अचरज करते? लोग अपने ही मोहल्ले में रहने वालों को नहीं जानते।

हमारे समय में हम अड़ोस पड़ोस के मोहल्ले तक में हर घर को पहचानते थे। कोई किसी का घर पूछता तो घर तक छोड़ कर आते थे। अब तो छोड़ने जाना तो दूर घर का पता तक नहीं जान रहे हैं लोग मात्र दो घर छोड़ कर या जो बिल्डिंगों में रह रहे हैं वो अपनी पूरी फ्लोर तक को नहीं जान रहे हैं। बड़ी तेजी से बदला है शहर इस मामले में।

उस रोज पान की दुकान पर भी गया था। काफी देर रुका मगर न पहले जैसी कोई पंचायत दिखी और न ही परमानेंट फालतू बैठे लोग। जाने कहाँ चले गए सब जबकि न तो कोई बहुत नए उद्योग लगे हैं और न ही बहुत से नए रोजगार के अवसर पैदा हुए हैं। खबरों की मानें तो बेरोजगारी बढ़ी ही है मगर वो बेरोजगार अगर पान की दुकान पर नहीं हैं तो कहाँ हैं? कोई नया बतकही और समय काटने का अड्डा खुल गया है क्या शहरों में जिसका मुझे पता ही नहीं लग पा रहा है। पान की दुकानें मोहल्ले से लेकर देश विदेश तक की खबरों का सबसे तेज और शक्तिशाली माध्यम हुआ करती थीं।

आज तक जैसे सबसे तेज चैनल न तो तब तक आए थे और न ही खबरें बनाए जाने फैशन था। अंदर तक की खबर जस की तस बाहर आती थी। फलां की लड़की का किसके साथ चक्कर चल रहा है से लेकर क्रिकेटर ने कितने पैसे लेकर मैच फिक्सिंग की है वर्ल्ड कप में तक – सबके खबरी दिन भर पान की दुकान पर बैठे खबरें सुनाया करते थे। ताजा खबरें तो वहीं होती थीं -अखबार तो कल का इतिहास बता रहा होता था। अब न तो पान की दुकानों पर वो रौनक बची और न ही वो अपनापन जो दिन भर आपको रोके रखता था वहीं दुकान पर। पान की दुकान पर बैठे लोग पूरे क्षेत्र का जीपीएस होते थे- हर घर परिवार को जानते थे।

खैर एयरपोर्ट पहुँच भी गए और वाकई कहीं कोई रंग न खेलते दिखा और न लगाते। ९ बजे सुबह का जहाज – होली की सुबह भी पूरा भरा हुआ और रंग का कहीं नामों निशान भी नहीं। जबलपुर से हैदराबाद और वहाँ से पूना- हम भूल भी गए की आज होली है।

एयरपोर्ट पर भी और फिर पूरे सफर में सभी लोग अपने अपने फोनों में घुसे मानो फोन नहीं देश चला रहे हों – सब एकदम धीर गंभीर। कान में इयरफोन और उँगलियाँ फोन की स्क्रीन पर घूमती। पति पत्नी भी आपस में बात करने की बजाय अपने अपने फोन में मशगूल दिखे। अच्छा लगा कि इसी बहाने उनका सफर बिना झगड़े और बहस के कट गया।

मेरे पास न तो कोई मैसेज आना था और न ही रील देखने का बहुत शौक तो मैं अपनी किताब पढ़ने में खो गया। आदतन हाईलाइटर भी चलता रहा और नोट बुक में नोट्स भी अंकित होते रहे। इतना सुकून से बैठ कर पढ़ने का समय तो और कहाँ मिलता? मुझे लगता है कि एयरहोस्टेस को मैं कुछ अजूबा सा लगा हूँगा और उसे शायद ओरिगामी आर्ट में महारत हासिल रही होगी तो वो मेरे लिए एक बुकमार्क बना कर ले आई सुंदर सा। न जाने क्या सोच कर बिना ऑर्डर के ही एक बढ़िया सी कॉफी भी दे गई।

धन्यवाद के साथ मैंने उसे अपना बिजनेस कार्ड भी दे दिया और बात आई गई हो गई। बिजनेस कार्ड में जाने क्या देखा कि  जहाज से उतरते समय वो हवाई जहाज के दरवाजे के पास खड़ी मिली और साथ में सेल्फ़ी लेने का आग्रह किया। बड़ी सेलिब्रेटी टाइप फीलिंग आई और सेल्फ़ी वहीं दरवाजे पर उसने पहले अपने फोन से फिर मेरे फोन से ले ली। आग्रह भी मात्र यह कि सर्वे भर दीजिएगा।

यह एक नया अनुभव था भारत में। बच्चियां अब पहले की तरह संकोची नहीं दिखीं और अपने प्रोफेशन के प्रति सजग भी। मुझे लगता है कि यह एक सकारात्मक बदलाव है।

     

         


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बुधवार, मार्च 18, 2026

छोटी छोटी किश्तों में वापसी

होलिका 

भीड़ -क्योटो खोजते हुए 

मालवीय जी -माला पहने सावधान की मुद्रा में 

भौकाल वाली बुलेट ट्रेन 

 

भारत जाना तो कई बरसों में एक बार होता है मगर लौटना हमेशा ही कई कई बार में होता है। छोटी छोटी किश्तों में वापसी। तन लौट आता है जहाज में बैठ कर। मन रुक जाता है। धीरे धीरे टुकड़े टुकड़े में वो भी लौटता है। एक टुकड़ा किसी शहर से, एक किसी गली से, एक किसी दोस्त के पास से, एक किसी व्यंजन से। न जाने कहाँ कहाँ मन ठहर जाता है लौटने से पहले। कुछ टुकड़े तो कभी लौटते ही नहीं और हम हर भारत यात्रा के बाद कुछ कम हो जाते हैं। वही रुके टुकड़े शायद वापस बुलाते होंगे कि वापस आओ, हम यहीं छूट गए हैं। अच्छा लगता है उन छूटे टुकड़ों के सदायें सुनना।

जिस तस्वीर को लेकर भारत जाते हैं वो कभी नहीं मिलती, वो पुरानी हो चुकी होती है। नई तस्वीर अक्सर बेहतर ही होती है। शहर बदल चुके होते हैं। वो गालियां वो सड़कें जो याद में थी सब बदल चुकी होती हैं। उस तस्वीर में मौजूद बहुत से दोस्त और जानने वाले या तो खुद तस्वीर हो चुकते हैं या उम्र की चाल के चलते अब पुरानी तस्वीर से अलग से दिखने लगे होते हैं। पुरानी तस्वीर नई तस्वीर से बदल जाती है जिसे लेकर अगली बार जाएंगे। वो भी बदल जाएगी -जानते हुए भी तस्वीर तो सजा ही लेते हैं। मानव स्वभाव है।

बहुत से साथ गए चाहतों के पुलिंदे भी जब भारत पहुँच कर खुलते हैं तो कुछ तो खुलते ही गुम जाते हैं और कुछ चाह कर भी पूरे नहीं हो पाते- सीमित समय और चाहतों का अपार संसार। चाहत होती है कि यहाँ जाएंगे, वहाँ जाएंगे। इससे मिलेंगे, उससे मिलेंगे। ये खाएंगे वो खाएंगे- मगर सिर्फ चाह लेने से क्या होता है? इतने साल से बाहर रहते रहते न पेट इस लायक बचा कि वो खाना पचा पाए और न ही समय इस लायक बचता है कि सब से मिल जुल लिया जाए।

इसी तरह की चाहतों की कड़ी में बनारस जाना भी तय हुआ था। मिर्जापुर तक शादी में पहुँच ही गए थे। बनारस से शिप्रा (https://www.facebook.com/SB091979) का भी बार बार फोन आ रहा था कि कब आ रहे हैं। बिना मिले मत जाइएगा। जापान कभी जाना हुआ नहीं मगर सुनते थे कि बनारस को क्योटो बना दिया है तो सोचा सस्ते में जापान निपट जाएगा और काशी विश्वनाथ जी के दर्शन तो हो ही जाएंगे। बहुत समय से ओवर ड्यू थे उनके दर्शन और तब तक तो उनको भी नहीं मालूम था वो एक दिन जापान में होंगे।

शादी में सब परिवार आया हुआ था और अधिकतर बनारस जाना चाह रहे थे अतः 13-14 लोग 3 गाड़ियों में भरकर रवाना हुए। मजे की बात यह रही कि जिस गाड़ी में मैं सवार था उसके पीछे ‘गर्व से कहो – हम हिन्दू हैं’ लिखा था वरना हमारे लेखन से तो लोगों ने हमारे हिन्दू होने पर प्रश्न चिन्ह ही लगा दिया है। कई बार तो खुद को भी भ्रम होने लगता है कि हिन्दू हैं भी या नहीं? भक्त नहीं तो हिन्दू नहीं के फार्मूले से बड़ी दिक्कत है मगर जो है सो है। काशी विश्वनाथ के दर्शन करने थे तो वो वाला भक्ति का फार्मूला नहीं असल आस्था का सवाल था।

हाईवे मस्त था। काशी विश्वनाथ जाने वाला कॉरीडोर भी हाईवे तक बेहतरीन और शहर में उतरते ही भीड़भाड़ और वही पुराना आलम। एक जगह होलिका की तैयारी भी दिखी मगर क्योटो की तो स्पेलिंग तक भूल गए और जापान के बदले खा बनारसी पान ही याद रहा और वही नजर भी आया।

जहाँ भूमिगत पार्किंग थी वहाँ बोर्ड पर भौकाल लिखा था और उसके नीचे बच्चों वाली रेल चल रही थी गोल गोल धुमाने के लिए – भौकाल का बोर्ड देखकर लगा कि चलो इसी को बुलेट ट्रेन बोल देते हैं -शायद यही भौकाल कहलाता हो।

शिप्रा का फोन आता रहा और हम उससे कहते रहे कि फ्री होकर फोन करते हैं कि कहाँ मिलना है। काशी विश्वनाथ के दर्शन कर वहाँ से लंका तक जाने में लंका लग गई। पूरे 3 घंटे ट्रेफिक में फंसे रहे तब जाकर शाम घिरने तक बिड़ला मंदिर पहुंचे। इतना थक गए थे और उससे भी ज्यादा पक गए थे। तय किया कि बस!! अब बहुत हुआ – दर्शन करके वापस मिर्जापुर चला जाए। क्योटो दर्शन अपने बस का नहीं है। अंधेरा होने लगा था। शिप्रा को मना किया गया कि मिलना नहीं हो पाएगा। उसे भी बुरा लगा होगा उससे ज्यादा हमें भी बुरा लगा कि इतना नजदीक पहुँच कर भी मुलाकात नहीं हुई। ट्रेफिक और अव्यवस्था जो न करा दे सो कम। मगर चूंकि गाड़ी पर लिखा था कि ‘गर्व से कहो हम हिन्दू हैं’। अतः गर्व करते रहे और बिना मिले अपनी ही गलती मानते हुए लौट आए।

अब जैसे भारत यात्रा के बहुत से टुकड़े छूटे हैं और न जाने कितनी शिकायतें कि हमसे नहीं मिले उसी तरह यह भी एक सही। अगली बार मिलेंगे शिप्रा से और बनारस में फिर खोजने जाएंगे क्योटो – कौन जाने शायद मिल ही जाए। हो सकता है हमारा ही दृष्टि दोष हो जो हमें नहीं दिखा वरना तो नारे जोरों पर हैं ही।

  

 

 

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रविवार, मार्च 15, 2026

भारत यात्रा 2026: ज्ञानदत्त पाण्डे जी से एक मुलाकात

 

बहुत सालों बाद भारत जाना हुआ मिर्जापुर एक पारिवारिक शादी के सिलसिले में। जबलपुर से बाई रोड गए। हाई  वे जो पहले खाई वे की तरह हुआ करते थे वो अब बहुत बढ़िया हो गए हैं। जिस यात्रा में पहले 10 से 12 घंटे लगा करते थे और वो भी हिचकोले के चलते थका देने वाले वो अब मात्र 6-7 घंटे में आराम से पूरी हो गई। शहरों के भीतर तो खैर पहले से भी बेहाल गालियां और सड़कें मिलीं। हाई वे पर गाड़ी की तेज रफ्तार और वहीं मवेशियों को खुले आम घूमते देख कर कई बार दिल धक से हो गया किन्तु वहाँ के ड्राइवर और मवेशी दोनों ही एक दूसरे के सानिध्य में सहज नजर आए।   

जहां इस यात्रा की उपलब्धि पारिवारिक शादी, मिर्जापुर की गंगा आरती और विंध्याचल देवी और काशी विश्वनाथ के दर्शन रहे, वहीं विंध्याचल देवी और काशी विश्वनाथ के दर्शन में भीड़ और अव्यवस्था की हालत देखते हुए दर्शन से ज्यादा बड़ी उपलब्धि मानो जेब का न कटना और भगदड़ का न होना ही रहा। भीड़ से गुजरते पूरे समय बस यही दिमाग में था कि किसी तरह दर्शन पूरे हों और नैया उस पार लगे। वीआईपी कतारों में जब ये विचार उठें तो विषय निश्चय ही चिंताजनक है। आजकल सभी धार्मिक स्थलों के यही हाल हो लिए हैं और वीआईपी कल्चर और पैसे लेकर दर्शन कराने का सिलसिला अपनी अति पर दिखता है। श्रद्धा भाव से ज्यादा पावर और पैसे का भाव दिखता है। अवसर उपलब्ध था तो फायदा हमें भी मिला मगर कुछ उचित सा नहीं लगा।

बहरहाल, इसी यात्रा की अन्य उपलब्धि पुराने मित्र और ब्लॉगर साथी ज्ञानदत्त पांडे जी (मानसिक हलचल https://gyandutt.com/ ) उनके गाँव में घर जाकर मिलना भी रहा। जहां हम ठहरे थे वहाँ से उनका गाँव 30-35 किमी दूर था किन्तु अच्छी सड़क के चलते 1 या 1:30 घंटे में पहुँच गए थे। पिछली बार उनसे 16-17 साल पहले इलाहाबाद स्टेशन पर मुलाकात हुई थी उनके लावा-लश्कर के साथ। तब वह एनई रेलवे के सर्वेसर्वा थे।

इतने बरसों बाद मिलने पर भी कतई नहीं लगा कि इतना समय हुआ न मिले हुए। बड़ा आत्मिक मिलन रहा। पाण्डे जी भी पहले की तरह ही एकदम फिट और मुस्कराते हुए मिले। हालांकि पहुँचने के पहले उन्होंने फोन पर बताया था कि वो तुरंत ही दांत के डॉक्टर से इलाज करा कर लौटे हैं। मगर उनकी मुस्कराहट के पीछे दांत का दर्द न जाने कहाँ छिप गया था कि हम बीमार का हाल पूछना ही भूल गए। गाँव के शांत वातावरण में शानदार मकान और वहीं बरामदे में बैठे कर चाय और भाभी जी द्वारा बनाये गए स्वादिष्ट गाजर के हलवे के साथ ढेरों बातचीत हुई। हमने उन्हें उनके आलेखों को पुस्तक के रूप में लाने के लिए बहुत उकसाया। लगता तो है कि जल्द ही वो इस दिशा में प्रयासरत होंगे।

समय की कमी थी। शादी ब्याह के कार्यक्रम भी अटेन्ड करना थे अतः बहुत लंबा न रुक पाए मगर जितना भी रुके पाण्डे दंपति की मेहमान नवाजी ने दिल जीत लिया। हमारे साथ हमारे साडू भाई भी थे वो भी शहर के इतना नजदीक गाँव के माहौल से बहुत प्रभावित हुए। खास तौर पर पाण्डे जी के सानिध्य में चिड़ियों का दाना चुगना उन्हें काफी भाया।

एक छोटी सी आत्मिक मुलाकात निश्चित ही लंबे समय तक याद रहेगी। शायद भविष्य में जल्द फिर भारत यात्रा हो और उस दिशा में जाना हो तो पुनः मुलाकात का वादा है। मैं उनसे अपनी पुस्तकों को पहुंचाने का वादा करके आया था – अब कनाडा वापस आ गए हैं तो जल्द ही मेल करते हैं ईबुक संस्करण।


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रविवार, मार्च 23, 2025

वादा किया वो कोई और था, वोट मांगने वाला कोई और

तिवारी जी जब से कुम्भ से लौटे हैं तब से बस अध्यात्म की ही बातें करते हैं। कई ज्ञानी जो उनकी बातें सुनते हैं वो पीठ पीछे यह भी कहते सुने जाते हैं कि तिवारी जी को अध्यात्म और धर्म का मूल अंतर ही नहीं पता है। सब घाल मेल करके ऐसी बातें सुनाते हैं कि न तो दाल दाल रह जाये और न ही चावल चावल और उसे खिचड़ी मान भी लो तो बिल्कुल बेस्वाद। मगर उनकी उम्र का लिहाज करके कोइ सामने कुछ न बोलता अतः उनके आध्यात्मिक प्रवचनों की शृंखला चलती चली जाती। 

वैसे भी तिवारी जी का इस बात में अटूट विश्वास है कि ज्ञान बांटने के लिए होता है और जितना बांटोगे उतना ही बढ़ेगा। इस हेतु बस दो चीजों की आवश्यकता होती है - एक तो मुंह जो कि उनके पास है और दूसरा दो सुनने वाले के कान जो घंसू हर क्षण भक्ति भाव से तिवारी जी की हर बात सुनने के लिए खुला रखता है। उसके ज्ञान का एक मात्र स्त्रोत तिवारी जी ही थे, बाकी तो कोई पास भी न फटकने देता था तो ज्ञान क्या देता। 

कुम्भ से लौटने के बाद ऐसा नहीं कि तिवारी जी का मूल आचरण बदल गया हो। बस आजकल  जबसे अध्यात्ममय हुए हैं तबसे दोपहर का भोजन करने जाते वक्त सबसे कह कर निकलते हैं कि बस, प्रसाद ग्रहण करके आता हूँ। रात की शराब भी बदस्तूर जारी है मगर अब शराब नहीं पीते बल्कि सुरापान करते हैं। सुरापान के बाद तो अध्यात्म संबधित प्रवचन एक नई ऊंचाई प्राप्त कर लेते हैं। 

तिवारी जी देर रात गए घंसू और उसके द्वारा सुरा के इंतजाम हेतु घेर कर लाए गए दो अन्य भक्तों को ज्ञान दे रहे थे। उन्होंने कहा कि जिस तरह बहती नदी में जब आप डुबकी लगाते हैं तो जिस पानी में आप डुबकी लगाते हैं वो अलग पानी होता है और जिस में से आप डुबकी लगाकर निकलते हो वो अलग पानी होता है। नदी निरंतर प्रवाहमान रहती है। हम चाहे उसे गंगा कहें या नर्मदा – नाम भले जो रख लें मगर पानी निरंतर बह रहा है और स्वरूप निरंतर बदल रहा है। 

ठीक वैसे ही हम इंसान हैं। जो हम कल थे वो आज नहीं हैं। नाम भले ही मेरा तिवारी है और इसका घंसू – लेकिन जो मैं कल था वो आज नहीं हूँ – मेरा दिमाग, मेरा अंग प्रत्यंग निरंतर प्रति-क्षण बदल रहा है। कल मैं कोई और था और आज कोई और। परिवर्तन भले आज और कल में न दिखे मगर परिवर्तन हो रहा है। अगर आज से दस साल पहले की मेरी तस्वीर देखो तो वो तो कोई और ही आदमी था। उसका ज्ञान, व्यवहार और रहन सहन सब कुछ अलग था। और वैसे ही आज से दस साल बाद होगा। तुम लंबे अंतराल में आप भेद कर पाते हो किन्तु यह प्रतिक्षण हो रहा है। पुराना स्वरूप खत्म - नया स्वरूप उत्पन्न। 

आज के तकनीकी युग में जिस तरह फाईलों में छोटे छोटे बदलाव को एक नए वर्जन का नाम देते हैं जैसे प्रोजेक्ट अ वर्जन 1, फिर कुछ बदला प्रोजेक्ट अ वर्जन 2, फिर कुछ बदला प्रोजेक्ट अ वर्जन 3. याने कि सब फाइल अलग अलग हैं। वैसे ही मैं खुद परसों तिवारी वर्जन 1 था आज तिवारी वर्जन 3 हूँ। 

कल जो तुम थे वो कल थे- वो कोई और था और आज जो तुम हो और वो कोई और है। तुम अपनी सुविधा के लिए उसे उसी नाम से पुकारे जा रहे हो। 

जो कभी डाकू अंगुलीमाल था वो बाद में संत हो लिया। डाकू खत्म हो गया और संत का जन्म हो गया। 

घंसू को तो मानो अथाह ज्ञान प्राप्त हो गया हो। वो तिवारी जी के चरणों में गिर पड़ा। कल शहर का एक साहूकार जिससे घंसू ने काफी उधार ले रखा है वो वसूली के लिए आने वाला है। घंसू उसको यही ज्ञान देगा कि जिसे तुमने उधार दिया था वो घंसू वर्जन 1 था वो अब खत्म हो चुका है और आज जिससे तुम मिल रहे हो वो घंसू वर्जन 2 है- उसे उस घंसू से कुछ लेना देना नहीं है। 

सब नेता भी तो वादा करके यही सोचते होंगे कि जिसने वादा किया था वो कोई और था और आज जो वोट मांग रहा है वो कोई और। 

-समीर लाल ‘समीर’       

  

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के सोमवार मार्च 23, 2025

 https://epaper.subahsavere.news/clip/16764

 

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