बुधवार, अप्रैल 22, 2026

गुरु तो गुरु ही होता है!!

 



घँसू आज बड़े अचरज में था। वो तिवारी जी के लिए ऐसा समाचार लाया था कि उसे लगा पहली बार ऐसा होगा जब तिवारी जी से ज्यादा वो जान रहा होगा।

उसने तिवारी जी को बतलाया कि आजकल ऐसी कार आ गई है जो खुद से चलती है और चलती भी बिजली से है। आप बस बैठ जाओ और वो भीड़ में सबसे बचते बचाते बिना किसी को छूए आपको आपके गंतव्य तक पहुँचा देती है। आज जबकि शहर का ट्रेफिक इतना बीहड़ है कि कोई गाड़ी बिना खरोंच के मिल जाए यह सिर्फ शोरूम में ही संभव है। ऐसे में खुद को सब गाड़ियों और भीड़ से बचा ले जाना अजूबा ही है मगर यह हो रहा है। साथ ही बिजली से चार्ज करो तो पैट्रोल की भी झंझट नहीं। लड़ा करें अमरीका ईरान आपस में – हमारी बला से। जहाँ तक बिजली का सवाल है तो अपने यहाँ तो कितने लोगों ने आजतक घर की बिजली का बिल तक कभी नहीं भरा- कटिया जिन्दाबाद रही है तो कार की चार्जिंग भी मुफ्त ही समझो। बस लफड़ा इतना सा है कि जरूरत से ज्यादा ही मंहगी है।

तिवारी जी मुस्कराए और कहने लगे कि तुम टेसला की बात कर रहे हो। हम सब कुछ जानते हैं। हम बैठे जरूर पान की दुकान पर हैं मगर अमरीका में क्या हो रहा है और ट्रंप कब क्या सोच रहा है – सब हमारी नजर में है। हमसे कोई पूछे तो हम तो आज अमरीका ईरान की संधी करा दें मगर उनको पाकिस्तान सगा लग रहा है तो हम काहे टांग अड़ायें – वो जाने और उनका काम जाने। हमसे सलाह चाहिए तो आओ हमारे पास- हम किसी के पास जाने से रहे।

तिवारी जी आगे बोले कि अब इतनी मंहगी है टेसला कि कारों में अगर मारुति दलित कहलाई तो टेसला ब्राह्मण की श्रेणी में आएगी। तुम तो जानते ही हो कि सच्चा ब्राह्मण छुआ छूत कितनी मानता है। वो किसी को भला क्यूँ छूने लगा? इसीलिए बिना किसी को छूए बचते बचाते निकल जाती होगी। वो सामने मंदिर वाले पंडित जी भी तो सुबह सुबह स्नान करके टेसला की तरह ही मंदिर जाते हैं – मजाल है जो कोई उनसे छू भी जाए और वो भी तुम्हारी हमारी तरह खरीद कर दाल रोटी पर कहाँ चलते हैं? फल फूल मेवा दूध मलाई की डाईट है वो भी मंदिर के चढ़ावे से फ्री में – सब टेसला के ही गुण हैं। ये भी टेसला के बेसिक मॉडल ही कहलाये।

हालांकि पंडित जी अपने आप को कितना भी बड़ा ब्राह्मण माने – लाख छुआ छूत करें मगर मंगरु चमार उनको छेड़ने से कहाँ बाज आता है। आए दिन दायें बाएं से आकर टकरा ही जाता है और पंडित जी भी क्या करें? गरियाते हुए फिर नहाने चले जाते हैं।  वैसे ही टेसला भी भले ही अपने आप को कितना ही बड़ा ब्राह्मण मान ले, सबसे बचते बचाते चले मगर अगर कोई और आकर ठोंक जाए तो क्या? मारुति और ये ई – रिक्शा टोटो वाले कहीं से भी घुसते हैं- किसी मंगरु से कम थोड़े ही न हैं ये। कब आकर भिड़ जाएँ कौन जाने। फिर आप झाड़ते रहो अपनी पंडिताई – बचाते रहो अपने आप को। मानते रहो छुआ छूत।

वैसे तुमको एक बात बताएं ज्ञानी घँसू जी – आने वाले समय में टेसला एक और मंहगा मॉडल ला रही है जो अपने पास इन मंगरुओं को फटकने भी न देगा। जैसे ही पास आने लगेंगे वो उनको दूर कर देगा। वो न सिर्फ बिजली से चलेगी बल्कि स्पेयर में कई बेटरी भी रहेगी जो पहली की चार्जिंग खत्म होते ही उससे चलने लगेगी। ये इन पंडितों से भी बड़े छूआ छूत वाली हैं। ये तो अपनी कीमत के चलते बहुत ज्यादा रईसों के बस की होगी खरीदना। ब्राह्मणों से भी बढ़कर है ये -ऐसा समझो कि जैसे जेड सिक्युरिटी वाले नेता। वो न आमजन की पहुँच में हैं – न कोई उनके आस पास फटक सकता है – छूना और टकराना तो बहुत दूर की बात है। और रही पेट्रोल वाली बात तो सरकारी और जनता के पैसों से न सिर्फ पेट भर खाते हैं बल्कि अपनी आने वाली कई पीढ़ियों के खाने का इंतजाम भी कर लेते हैं।   

आज फिर घँसू तिवारी जी के ज्ञान का लोहा मान गए और पुनः सेवा में लग गए।

-समीर लाल ‘समीर’


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रविवार, अप्रैल 12, 2026

मुफ्त का चंदन घिस मेरे लाला

 


हर चीज सबके लिए नहीं होती। यह बात तिवारी जी को तब समझ आई जब जोश जोश में मोहल्ले के पार्क में वो भी सबकी देखा देखी योगा दिवस के दिन योगा करने पहुँच गए। सरकारी आयोजन था अतः अच्छी खासी भीड़ थी। कार्यक्रम की शुरुवात लॉफ्टर योगा से हुई। आजकल सरकारी आयोजनों पर हँसी आ जाना यूँ भी सहज होता है। पहले ही ठहाके में न सिर्फ तिवारी जी अपना कुर्ता लाल कर लिए बल्कि अपने सामने अच्छी खासी ठहाका लगाती श्रीमती पाण्डे की सफेद साड़ी भी लाल कर डाली। पान तंबाकू मुंह में घुलाने की ऐसी आदत कि भूल ही गए ठहाका लगाते ही पूरा माल मसाला बाहर आ जाएगा। थूक तो जानता नहीं कि सामने पीकदान है या श्रीमती पाण्डे की सफेद साड़ी।

ठहाका लगाती श्रीमती पाण्डे रुआंसी हो गई। इसके पहले वो तिवारी जी को हड़काती, तिवारी जी खुद ही दबे पाँव पार्क से निकल लिए। उसके बाद सीधे पान की दुकान पर आकर अपने नियमित आसान पर विराजमान हो लिए। तब से आज वो सबको यही समझा रहे हैं कि भाई, सब चीजें सबके लिए नहीं होती फिर वो भले ही योगा क्यूँ न हो।

अपने इसी चिंतन को आगे बढ़ाते हुए वह बोले कि बताओ तो जरा- बनारस से चुनाव जीते हैं और दिन रात योगा दिवस की रट लगाते हैं। यह बनारस का और बनारसी पान का सरासर अपमान है। इतना कहते हुए उनके भीतर का नेता जागा और वो कहने लगे कि या तो बनारस से इस्तीफा दो या योगा बैन करो। घँसु ने भी सदा की तरह हाँ मे हाँ मिलाई। तिवारी जी ने तब तक सुबह सुबह हुए पान के नुकसान और कुर्ता खराब हो जाने के लिए योगा को गरियाते हुए नया पान मुंह में भर लिया। अब वे कुछ घंटे मुंह में पान घुलाएंगे और मौन चिंतन में डूबे रहेंगे।

इस बीच किसी ने सलाह दी कि आप काहे लॉफ्टर योगा करने लगे। बाकी का योगा कर लेते, लॉफ्टर योगा जाने देते। अब तक तिवारी जी चिंतन के दौरान इस निष्कर्ष तक जा पहुंचे थे कि यदि कोई योगा की तारीफ कर रहा है मतलब वो सरकार की तारीफ कर रहा है। मन ही तो है जो सोच लो। सोचने वाले ही तो सोच पाए कि अगर आप सरकार के साथ नहीं हैं तो आप धर्म विरोधी हैं- सोचने पर क्या लगाम और उस पर से सोचने का तो कोई पैसा भी नहीं लगता।

‘मुफ्त का चंदन घिस मेरे लाला’ का मंत्र थामे सब अपने अपने हिसाब से सोच ले रहे हैं। सच्चाई क्या है इससे किसी को कोई लेना देना नहीं है। आधी आबादी को तो जैसा सोचवा दो वैसा सोच लेती है और बाकी की आधी अपनी सुविधा और श्रद्धा के आधार पर सोच समझ रही है।

अतः जैसे ही उसने बाकी के योगा करने की सलाह दी -तिवारी जी उसे ही गरियाने लगे। तुम जाओ करो अपना योगा और अपनी भक्ति। हमको मत समझाओ – हम अपना अच्छा बुरा समझते हैं। गुसा इतना तेज आया कि न तो गुस्सा पी पाए और न ही पान थूक और इस बार लाल हुआ सफेद कुर्ता समझाने वाले सलाहकार का था।

वो अपना कुर्ता खराब होने पर भड़कता, इससे पहले ही घँसु ने मैदान संभाला- काहे बेवजह सलाह देने चले आते हो? तिवारी जी का गुस्सा जानते नहीं हो। अभी तो कुर्ता लाल हुआ है। अगर ज्यादा रुके रहे तो तिवारी जी गाल लाल करने में भी पीछे नहीं रहेंगे।

पिटना भला किसे पसंद है अतः सलाहकार भी अपना कुर्ता पौंछते हुए वहाँ से निकाल लिया। तिवारी जी का सुबह से तीसरा पान अब मुंह में था।

-समीर लाल ‘समीर’  

  

  

 

 


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सोमवार, अप्रैल 06, 2026

आज इंसान खुद को भगवान बना बैठा है

 



अब AI (आर्टिफिशियल इन्टेलिजेंस) का जमाना है। बनाने वाले ने तो न जाने क्या सोच कर बनाया होगा मगर इस्तेमाल करने वालों के तो क्या कहने।

बनाया तो भगवान ने भी इंसानों को कुछ सोच कर ही होगा मगर अब जब वो इनकी हरकतें देखता होगा तो पछताता ही होगा कि ये क्या बना डाला मैंने। हालत तो ये है आज इंसान खुद को भगवान बना बैठा है और वो भी ऐसा भगवान जो उस भगवान से भी ज्यादा पॉवरफुल खुद को समझ रहा है। उस भगवान ने तो फिर भी सब काम अलग अलग भगवानों में बाँट रखे थे। बारिश इन्द्र करवाते थे। रुपया पैसा कुबेर तो पाप पुण्य का हिसाब चित्रगुप्त महाराज। शिक्षा दीक्षा किसी और के पास तो बीमारी हजारी के लिए दूसरे भगवान। काम और क्रोध भी अलग अलग भगवानों के पास। सबके अपने अपने कार्य क्षेत्र और एक दूसरे में कोई दखलंदाजी नहीं।

इंसान जब भगवान बना तो सारा कुछ खुद समेट कर बैठ गया। किसी की दखलंदाजी तो बर्दाश्त ही कहाँ इन इंसानी भगवानों को। कोई ऐसा भगवान बना कि आपका भविष्य बाँचते बाँचते अपना ही भविष्य बनाने में लग गया। पैसे और पॉवर का अंबार लगा कर बैठ गया। वहाँ तक भी रुक जाता तो ठीक -कामदेव की जिम्मेदारी भी अपने दोनों काँधों पर उठा ली। इन्द्र तो अप्सरा भला क्या भेजते, लोकल अप्सराएं जाने किस लालच में आकर खुद ही अपने आप को भेंट चढ़ाने लगीं। एक भगवान पकड़ाता है तब तक दूसरा खड़ा हो जाता है। मानो भगवान न हुआ -असुरों का सरदार हो। हर कतरा खून से एक नया असुर तैयार। सिलसिला खत्म होने का नाम ही नहीं लेता।

कहीं ज्योतिष, कहीं हकीम, कहीं प्रवचनबाज तो कहीं नेता – रूप अनेक -काम एक -सब भगवान बने बैठे हैं अलग अलग रूप धरे जाने कितनों की नाव पार लगाते। मकसद है अपना उल्लू साधना।

हालत ये हो गई है जो भी बनाओ वो ही अपना मकसद भटक जा रही है। सरकार अपनी भलाई के लिए बनवाओ तो वो ऐसी हालत कर देती है कि भलाई तो छोड़ो रुलाई छूट जाए। जिन्हें आपके लिए रोजी रोटी के इंतजाम का जिम्मा दिया था, उनका खुद का पेट खा खाकर नहीं भर रहा वो भला अपको क्या ही देंगे।

खैर बात आर्टिफिशियल इन्टेलिजेंस की हो रही थी। जो काम उसे करना था वो अपनी जगह और जो हमें उससे कराना था वो अपनी जगह। दुनिया में जैसे किसी की असली तस्वीर तो बची ही नहीं। सबने खुद की तस्वीरें AI से ऐसी चमकवा ली हैं कि खुद ही अपनी तस्वीर देखकर पूछते होंगे- आप कौन? देखे हुए से लगते हो। फेसबुक पर देखो तो कुछ और दिखते हैं -सामने मिलों तो कुछ और। पहले यह सिर्फ उनकी फितरत को लेकर होता था मगर अब तो शक्ल सूरत से भी यही होने लगा है।

निदा फाजली जी ने शायद इन्हीं को सोच कर जमाने पहले लिख दिया था:

हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी

जिस को भी देखना हो कई बार देखना।

कोई अपनी तस्वीर बनाए ले रहा है तो कोई अपना वीडियो। कोई किसी के साथ अपनी तस्वीर जोड़ दे रहा है तो कोई किसी के साथ नाच ले रहा है। और कुछ नहीं तो कोई किसी और की आवाज में गाना ही गा डाल रहा है। पहचान पाना मुश्किल हो रहा है कि क्या सचमुच की तस्वीर और वीडियो है और कौन सा AI वाला।

एक समय था जब कहते थे सच ही बोल रहा होगा- कोई बेवजह झूठ क्यूँ बोलेगा? आज समय आया है कि लोग कह रहे हैं AI वाला ही होगा – कोई सचमुच वाली तस्वीर क्यूँ चढ़ाएगा बेवजह बेकार दिखने के लिए।

आज फेसबुक का बैनर बदलने के लिए जब अपनी तस्वीर उठाई तो लगा कि बेवजह क्यूँ असली चढ़ा रहे हैं- AI से बनवा लेते हैं। मगर कुछ लोग तो हमेशा बाकी बच रहते हैं पुरानी मशाल थामें तो यही सोच कर असली वाली तस्वीर इस्तेमाल कर ली। मित्र पूछ रहे हैं कि फ्री वाला AI इस्तेमाल कर लिया है क्या? कोई अच्छा सा सबस्क्राइब करो ठीक ठाक बना देगा!! अब उनको क्या जबाब दें?

-समीर लाल ‘समीर’


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शुक्रवार, अप्रैल 03, 2026

कोई आखिर इतना खा कैसे सकता है?

 




जब कभी घर पर पकोड़ी वाली कढ़ी बनती है तो पकोड़ी तल कर निकलते ही दो चार पकोड़ी यूँ ही खा जाना आम सी बात है। इसका कोई बुरा भी नहीं मानता बल्कि ऐसा ही होता है मान कर चला जाता है। ऐसे ही सब्जी के लिए मटर छीलते हुए कुछ मटर खा जाना, पोहे मे पड़ने के पहले ही कुछ तली मूंगफली खा जाना सब इतना आम है कि कभी अजीब नहीं लगता। यही देखते हुए हमारे पूर्वज बड़े हुए और वही देखते हम- तो कभी ऐसा लगा ही नहीं कि जब पकोड़ी कढ़ी के लिए बनी है तो अलग से काहे खाना?

ये वैसा ही है जैसे सरकारी दफ्तरों में अपनी ही फाईल सरकवाने के लिए ऊपर से कुछ रकम दे देना – हमेशा से देखा है तो कभी अजीब लगा ही नहीं। बल्कि हालत तो ये है कि अगर न देना पड़े तो अजीब लगता है।

इधर एक मित्र पास ही के एक रेस्टोरेंट में खाना खाने गए और थाली की तस्वीर सोशल मीडिया पर डाली। मैं तो दंग ही रह गया कि कोई इतना सारा खाना कैसे खा सकता है? उस पर से उनका नोट था कि अनलिमिटेड थाली है याने जितना जी चाहे, उतना खाएं। मैं तो थाली में रखी इतनी सारी व्यंजनों से भरी कटोरियाँ देख कर ही सोच रहा था कि कैसे खाया होगा? उधर वो कह रहे हैं कि जितना चाहो उतना खाओ – कई बार कई व्यंजन बार बार मंगाए – मजा ही आ गया। जरूर जाना- मजा आएगा।

अजीब तो लगा कि हम कहाँ खा पाएंगे इतना? मगर फिर भी मित्र का सुझाव था तो पहुँच गए एक रोज। थाली परोसी गई। 10-12 कटोरियाँ – तरह तरह के व्यंजन। उस पर से ग्लास में लस्सी। थाली में भी रोटी, पूरी, पापड़, आचार, पकोड़े और भी जाने क्या क्या? खाना शुरू हुआ- कब पूरा खा गए और ऊपर से भी कई व्यंजन बार बार परोसवाये – पता ही नहीं चला और खाते चले गए। चलते चलते मीठे में गुलाब जामुन और गरमा गरम जलेबी भी खाई। लगा कि इतना खा लिया है तो अब एक दो दिन तक तो भूख लगने वाली ही नहीं है। मगर ये क्या -रात होते होते खाना पूरा पच गया और रोज की तरह ही नियमित समय पर भूख लग आई।  

मैं तो एकदम अचरज में पड़ गया कि हद हो गई। लगा कि हम इंसान भी कितने अजीब हैं अगर परोस दिया जाए तो कितना भी खाकर पचा जाते हैं। सिर्फ सोच की बात होती है। रोज रोज में कौन इतने सारे व्यंजन खाता है तो कभी दिमाग में भी नहीं आता कि हम इतना खा भी सकते हैं। खुद का न खाना तो समझे, हम तो इस पर अचरज ही करते हैं कि कोई दूसरा भी कैसे इतना खा सकता है? मगर यह मात्र एक भ्रम ही था। जैसे ही खुद को परोसा गया आखिर खा ही गए और आराम से पचा भी गए।

ऐसे ही कई बार मैं इन नेताओ को देखकर सोचने लगता हूँ कि ये सब इतना पैसा कैसे खा जाते हैं? एक चुनाव क्या जीत लेते हैं – इतना खाते हैं कि अगली तीन पीढ़ी बिना कमाए खाए आराम से जीवन गुजार ले जाए। मगर फिर भी इनका पेट नहीं भरता – हर रोज नई डील और नित पैसे पर पैसा कमाते और खाते जाने की भूख ऐसी जो कभी मरती ही नहीं।

उस रोज वो थाली खा कर सोच कुछ बदली है। हो सकता है कभी चुनाव जीत कर मैं भी नेता बन जाऊँ और फिर जब पैसा परोसा जाए तो अनलिमिटेड थाली की तरह मैं भी खाता जाऊँ। और भूख ऐसी कि फिर से लग आए। फरक शायद बस इतना हो कि इन नेताओ को थाली परोसी जा रही है और मैं अभी चूंकि नेता बना नहीं हूँ तो थाली परोसी ही नहीं गई है और मैं आश्चर्य में बैठा हूँ कि कोई आखिर इतना खा कैसे सकता है?   

-समीर लाल ‘समीर’

 

 

 

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