रविवार, फ़रवरी 16, 2020

आओ तुम्हें सट्टा खिलवायें!!



भाई जी, आपका ठिया तो सबसे बड़े बाजार में है. पता चला है, होल सेल में डील करते हो. कुछ हमें भी बताओ भाई, सुना है दिवाली सेल लगी है आपके बाजार में.
हमने कहा कि दिवाली कहो या दिवाला. सेल तो लगी है ६०% से ७०% की भारी छूट चल रही है. एस एम एस से विज्ञापन भी किया जा रहा है. स्लोगन भेजा जा रहा है, आपको भी मिल गया लगता है..आपके जमाने में बाप के जमाने के भाव. और जाने क्या क्या विज्ञापन किये गये हैं.
मुझे सेठ दीनानाथ की आढत याद आ गई. दिन भर मंडी के बीचों बीच अपनी दुकान पर तख्त पर बिछे सफेद गद्दे पर आधे लेटे रहते थे. बंडा और प्रदर्शनकारी धोती पहने. भई, जब प्रदर्शनकारी नेता हो सकता है तो धोती क्यूँ नहीं. जो भी प्रदर्शन करे, वो प्रदर्शनकारी, ऐसी मेरी मान्यता है. मेरी नजर में तो मल्लिका शेहरावत और राखी सावंत के डिज़ानर परिधान को भी प्रदर्शनकारी श्रेणी में ही रखता हूँ. खैर, सेठ के मूँह में हर समय पान. सामने मुनीम अपने हिसाब किताब में व्यस्त. बस, होलसेल का व्यापार था उनका भी, इसीलिए याद हो आई.
उनके ठीक विपरीत हम. न्यूयार्क स्टॉक एक्सचेंज, टोरंटो स्टॉक एक्सचेंज, नेसडेक और शिकागो कमॉडेटी एक्सचेंज पर डील तो करते हैं मगर कुर्सी पर सीधे बैठे सामने कम्प्यूटर लगाये. न आसपास घूमते बजारिया सांड और न ही पास बैठा मुनीम. मुनीम, चपरासी से लेकर सब कुछ खुद. माल की खरीदी बिक्री सब कम्प्यूटर पर. अगर अपने आप को ट्रेडर न बतायें तो कोई कम्प्यूटर ऑपरेटर ही समझे.
मित्र कहने लगे कि हाँ, विज्ञापन तो मिला. इसीलिये फोन किये हैं. भाई, बहुत घाटा लग गया. आप तो वो माल बताओ जिसको १०० टका ऊपर ही जाना हो, बस, वो ही लेंगे और एक बार लॉस पूरे हुए तो जीवन में स्टॉक एक्सचेंज की दिशा में सर रख कर सोयेंगे तक नहीं. खेलने की तो छोड़ो.
हमने उनको पहले भी समझाया था और फिर समझाया कि भाई, हम तो बस आप जो बोलो, वो खरीद देंगे और जो बोलो, वो बेच देंगे. हमारे लिए तो हर माल बराबर, हमें तो दोनों हालात में कमीशन बस लेना है. चाहे बेचो तब और खरीदो तो. जिस दिन हमें या इन बाजार एनालिस्टों को ये मालूम चलने लग जाये कि ये वाला तो पक्का ऊपर ही जायेगा तो क्या पागल कुत्ता काटे है जो सुबह से शाम तक कम्प्यूटर लिये लोगों के लिए खरीदी बेची कर रहे हैं. घर द्वार बेच कर सब लगा दें और एक ही बार में वारा न्यारा करके हरिद्वार में आश्रम खोलकर साधु न बन जाये और जीवन भर एय्याशी करें. ये सब बाजार एनालिस्ट मूँह देखी बात करते हैं आज जो दिखा वो कह दिया, कल जो दिखा तो बदल गये.
हम में और नारियल बेचने वाले किराना व्यापारी में बस यही फरक है. दोनों को माल बेचने से मतलब है मगर हर आने वाले को वो नारियल देते वक्त एक को हिलाकर कान में न जाने क्या सुनता है. फिर उसे किनारे रख दूसरा उठाकर बजाता है और कहता है कि हाँ, ये ठीक है. इसे ले जाईये और आप टांगे चले आते हैं जबकि ऐसे ही हिला हिला कर शाम तक वो सारे नारियल बेच लेता है और आप भी खुश, वो भी खुश. हमारे यहाँ ऐसा हिलाने का सिस्टम नहीं हैं. निवेशक को बाजार खुद हिला लेता है इसलिये हमें हिलाने की जरुरत नहीं.
जिस दिन आप इस दिशा में सर रख कर सोना बंद कर दोगे, उस दिन से हम क्या घास छिलेंगे. ऐसा अशुभ न कहो एन धंधे के समय भाई.
अजी, आप तो अंतिम दमड़ी तक खेलो. जब पूरा बर्बाद हो जाओ, तब मजबूरी में बंद हो ही जायेगा, इसमें प्रण कैसा करना. हमें भी तब तक १० दूसरे मूर्ख मिल जायेंगे जो रातों रात लखपति बनना चाहते, हम उनसे अपना काम चला लेंगे. कसम खाते हैं आपको याद भी न करेंगे.
तो बोलो, क्या आर्डर लिखूँ...सब माल चोखे हैं.
ऐसा मौका कहाँ बार बार आता है जब ६०% से ७०% तक छूट चले और आपके जमाने में बाप के जमाने के भाव पर माल मिलें.
जल्दी..फटाफट आर्डर बोलो. टाईम न खोटी करो.
नोट: यूँ भी अगर हम तुम्हें अपना खास मान कर बाजार से दूर रहने की सलाह दें तो तुम मानोगे थोड़ी न बल्कि किसी और ट्रेडर के यहाँ जाकर खेलोगे. फिर हम ही अपनी कमाई क्यूँ छोड़ें. ये बाजार ही अजीब है कि जब तक खुद न हार लो सब जीते हुए ही नजर आते हैं.
-समीर लाल ’समीर’
भोपाल के दैनिक सुबह सवेरे में रविवार फ़रवरी १६, २०२० में प्रकाशित:
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सोमवार, फ़रवरी 10, 2020

इन्सानियत में आस्था का प्रतीक होते हैं खम्भे!



बिजली विभाग और उसकी रहवासी कॉलिनियों से मेरा बड़ा करीब का साबका रहा है. पिता जी बिजली विभाग में थे और हम बचपन से ही उन्हीं कॉलिनियों में रहते आये.
मैने बहुत करीब से बिजली से खम्भों को लगते देखा है, एक से एक ऊँचे ऊँचे. उच्च दाब विद्युत वाले लंबे लंबे खम्भे और टॉवर भी, सब लगते देखें हैं.
जब बड़े टॉवर और खम्भे लगाये जाते थे साईट पर, तब खूब सारे मजदूर जमा होते थे. खम्भा उठाते और खड़ा करते वक्त सामूहिक ताकत एकत्रित करने के लिये वो नारे के तर्ज पर गंदी गंदी गालियाँ बका करते थे. गाली का पहला भाग उनका हेड मजदूर चिल्ला कर बोलता और बाकी के सारे मजदूर सुर में उसे पूरा करते हुये ताकत लगाते थे और खम्भा खड़ा कर देते.
जब भी कोई मंत्री निरीक्षण के लिये आते, तब उन मजदूरों को गाली बकने के निर्देश दिये जाते. मैं आश्चर्य किया करता. अरे, खम्भा तो निर्जीव चीज है. इन गालियों के असली हकदार की उपस्थिती में ही उन पर पाबंदी! यह तो अजब बात हुई!! मगर यही तो होता है लोकतंत्र में. जो जिस चीज का असली हकदार होता है, वो ही उससे वंचित रहता है. सब कुछ उल्टा पुलटा. जिन लोगों को जेल में होना चाहिये वो संसद में होते हैं और जिनको संसद में होना चाहिये वो पड़े होते हैं गुमनामी में, बिल्कुल उदासीन और निर्जीव-बिना गड़े खम्भे के समान. उनसे बेहतर तो मुझे यह निर्जीव खम्भा ही लगता है. शायद कल को गड़ा दिया जाये तो खड़ा तो हो जायेगा. ये तो यूँ उदासीन ही पड़े पड़े व्यवस्था पर कुढते हुए इसी मिट्टी में मिल जायेंगे एक दिन.
तो बात चल रही थी, मंत्री जी के निरीक्षण की. तब सब मजदूर ताकत इकट्ठा करने और दम लगाने के लिये दूसरे नारों का प्रयोग करते. सरदार कहता, "दम लगा के" पीछे पीछे सारे मजदूर ताकत लगाते हुए कहते, "हइस्सा" और बस खम्भा लग जाता. मंत्री जी के सामने तो यह महज एक शो की तरह होता. हल्के फुल्के खम्भे खड़े कर दिये जाते. फिर मंत्री जी का भाषण होता. वो चाय नाश्ता करते. कार्य की प्रगति पर साहब की पीठ ठोकी जाती और वो चले जाते. और फिर भारी और बड़े खम्भों की कवायद चालू...बड़ी बड़ी मशहूर हीरोइनों के नाम लिये जाते सरदार के द्वारा और बाकी मजदूर उन नारों वाली गालियों को पूरा करते हुए ताकत लगाते और खम्भे खड़े होते जाते.
मैं तब से ही गालियों के महत्व और इनके योगदान से परिचित हूँ. क्रोध निवारण के लिये इससे बेहतर कोई दवा नहीं. बहुत आत्म विश्वास और ताकत देती हैं यह गालियाँ. जितनी गंदी गाली, जितनी ज्यादा तर्रनुम में बकी जाये, उतनी ज्यादा ताकत दिलाये. काश इस बात का व्यापक प्रचार एवं प्रसार किया जाता, तो तो च्यवनप्राश बिकता और ही गुप्त रोग विशेषज्ञों की दुकान चलती. जड़ी बूटियों से ज्यादा ताकत तो इन गालियों में हैं, वरना वो मजदूर जड़ी बूटी ही खाते होते.
उम्र के साथ साथ बाद में इन गालियों के सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व के विषय में भी ज्ञानवर्धन होता रहा.
तब हमारे पास एक कुत्ता होता था. हम चाहते तो उसका नाम कुत्ता ही रख देते. मगर फैशन के उस दौर की दौड़ में हाजिरी लागाते हुए हम ने उसका नाम रखा - टाईगर. बस नाम टाईगर था अन्यथा तो वो था कुत्ता ही. वो तो हम उसका नाम टाईगर की जगह बकरी भी रख देते तो भी वो रहता कुत्ता ही, !! नाम से कोई अंतर नहीं पड़ता, चाहे छ्द्म या असली. भूरे भूरे रोयेदार बालों के साथ बड़ा गबरु दिखता था टाईगर. नस्ल तो मालूम नहीं. उसकी माँ को शायद विदेशियों से बहुत लगाव था, इसलिये वो जरमन सेपर्ड, लेबराडोर और शायद बुलडाग भी, की मिली जुली संतान था. कोई एक नस्ल नहीं, कोई एक धर्म नहीं, बिल्कुल धर्म निरपेक्ष. बस एक कुत्ता. सब घट एक समान में विश्वास रखने वाला प्यारा टाईगर.
जब भी टाईगर हमारे नौकर के साथ घूमने निकलता, तो उसकी एक अजब आदत थी. हर खम्भे के पास जाकर वो नाक लगाता मानो कोई मंत्र बुदबुदा रहा हो और फिर एक टांग उठा कर उसका मूत्राभिषेक करता. चाहे कितने भी खम्भे राह में पड़ें, वो यह क्रिया सबके साथ समभाव से निपटाता. खम्भों के अलावा वो सिर्फ नई स्कूटर और नई कार को पूजता था. अन्य किसी चीजों से उसे कोई मतलब नहीं होता था. भले ही आप उसके सामने नई से नई मंहगी पैन्ट पहन कर खम्भे की तरह खड़े हो जाये, वो आपको नहीं पूजेगा. आप उसकी नजरों में पूजनीय नहीं हैं तो नहीं हैं. पैसे की चमक दमक से आप अपने को पूजवा लेंगे, यह संभव नहीं था. इस मामले में वो आज की मानव सभ्यता से अछूता था. कुत्ता था !!
बाद में हमारे घर के पिछवाड़े में मीलों तक फैले खुले मैदान में बिजली का सब-स्टेशन बना. खूब खम्भे गड़े. हमें, जाने कितनी हीरोईनों के नाम मालूम चले और खूब तरह तरह की गालियाँ सीखीं. दिन भर खम्भे गड़ते और हम दिन भर गालियों का रसास्वादन करते और नई नई गालियाँ सीखते.
सब-स्टेशन लगभग तैयार हो गया था. हर तरफ खम्भे ही खम्भे. निर्माण कार्य अंतिम चरणों में था. टाईगर उसी तरफ घूमने जाने लगा. भाग भाग कर हर खम्भा कवर करता. अति उत्साह और अति आवेग में भूल गया कि " अति सर्वत्र वर्जयेत" . बस उसकी अपनी उमंग. इसी अति उत्साह में शायद विद्युत प्रवाहित खुले तार पर, जो कि किसी खम्भे से छू रहा था, मूत्राभिषेक कर गुजरा और भगवान को ऑन स्पॉट प्यारा हो गया. नौकर उसके मृत शरीर को गोद में उठाकर लाया था. फिर वहीं उसी मैदान के एक कोने में उसे गड़ा दिया गया. टाईगर नहीं रहा, मगर खम्भे खड़े रहे.कई और छद्म और दूसरे नामों के टाईगर उन पर मंत्र फूकते रहते हैं और अभिषेक भी अनवरत जारी है. एक टाईगर के चले जाने से तो अभिषेक रुक जाते हैं और ही स्थापित खम्भे गिर जाते हैं.
मेरा मानना है, स्थापित खम्भे इन्सानियत में आस्था का प्रतीक होते हैं, स्थिर और अडिग. चन्द हैवानी हवाओं से बिल्कुल अविचलित - तटस्थ!!
-समीर लाल ’समीर’

भोपाल के दैनिक सुबह सवेरे में रविवार फरवरी ०९, २०२० में प्रकाशित:
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रविवार, फ़रवरी 02, 2020

हिन्दी हैं हम वतन है, हिन्दुस्तां हमारा...



मौका है भारत से सात समंदर पार कनाडा में हिन्दी के प्रचार एवं प्रसार के लिये आयोजित समारोह का. अब समारोह है तो मंच भी है. माईक भी लगा है.टीवी के लिये विडियो भी खींचा जा रहा है. मंच पर संचालक, अध्यक्ष, मुख्य अतिथि विराजमान है और साथ ही अन्य समारोहों की तरह दो अन्य प्रभावशाली व्यक्ति भी सुसज्जित हैं. माँ शारदा की तस्वीर मंच पर कोने में लगा दी गई है और सामने दीपक प्रज्ज्वलित होने की बाट जोह रहा है.
कार्यक्रम पूर्वनियोजित समय से एक घंटा विलम्ब से प्रारंभ हो चुका है. संचालक महोदय सब आने वालों का जुबानी और मंचासीन लोगों का पुष्पाहार से स्वागत कर चुके हैं. अब वह मुख्य अतिथि महोदय से दीप प्रज्ज्वलित कर हिन्दी के प्रचार एवं प्रसार कार्यक्रम की विधिवत शुरुवात का निवेदन कर रहे हैं.
मुख्य अतिथि ने अपनी टाई बचाते हुए दीपक प्रज्ज्वलित कर दिया है. हिन्दी द्वैदीप्तिमान होने लगी है. उसका प्रकाश फैलने लगा है. मुख्य अतिथि वापस अपना स्थान ग्रहण कर चुके हैं. अध्यक्ष महोदय अपना उदबोधन कर रहे हैं. हिन्दी के प्रचार और प्रसार कार्यक्रम के अध्यक्ष बनाये जाने के लिये आभार व्यक्त करते हुए आयोजकों का नाम ले लेकर गिर गिर से पड़ रहे हैं.
वहीं मंच पर विराजित सूट पहने मुख्य अतिथि, जो कि भारत में मंत्रालय के हिन्दी विभाग में उच्चासीन पदाधिकारी हैं और यहाँ किसी अन्य कार्य से भारत से पधारे हैं एवं उन दो मंचासीन प्रभावशाली व्यक्तियों में से एक के संयोजन से मंच पर महिमा मंडित हो रहे हैं, अपने चेहरे से पसीना पोंछ रहे हैं.
उनको पसीना आने के दो मुख्य कारण समझ में आ रहे हैं. पहला, गर्मी के मौसम में वो ऊनी सूट पहने हैं और दूसरा, मंच से बोलने का भय. दोनों ही कारण स्वभाविक हैं.
भारत से आने वाले अधिकारियों द्वारा यहाँ के किसी भी मौसम में गरम सूट पहनना तो एकदम सहज और सर्व दृष्टिगत प्रक्रिया है, इससे मुझे कोई आश्चर्य भी नहीं होता. और दूसरा मंच से बोलने का भय, वह भी मौकों और अभ्यास के अभाव में सामान्य ही है. वहाँ भारत में भी दफ्तर में यह न सिर्फ बिना बोले ही काम चला लेते हैं बल्कि बिना लिखे भी. मात्र दस्तखत करने में महारत हासिल है और उसका इस मंच से कोई कार्य नहीं, तो पसीना आना स्वभाविक ही कहलाया.
उनकी हालत देखकर कार्यक्रम के प्रथम स्तरीय संयोजक, जो कि संचालक की हैसियत से मंचासीन हैं, मंच के आसपास घूमते द्वितीय स्तरीय संयोजक को इशारा करते हैं और वो द्वितीय स्तरीय संयोजक उपस्थित श्रोताओं के पीछे घूमते तृतीय स्तरीय संयोजक को इशारा करता है जो कि भाग कर कनैडियन एयरफ्लो पंखे का इन्तजाम कर मंच के बाजू में लगा देता है.
पंखे से चलती अंग्रेजी हवा से, जहाँ एक ओर मुख्य अतिथि महोदय राहत की सांस ले रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ हिन्दी को प्रचारित, प्रसारित और प्रकाशित करती दीपक की लौ लड़खड़ाते हुए अपने अस्तित्व को बचाने का भरसक प्रयास कर रही है. आखिरकार उसकी हिम्मत जबाब दे गई.
हिन्दी का प्रचार और प्रसार थम गया. दीपक में अंधेरा छा गया. संचालक महोदय दीपक की तरफ भागे. अध्यक्ष का भाषण एकाएक रुक गया. पंखा बंद कर उस अंग्रजी हवा को रोक दिया गया. माचिस से जला कर दीपक पुनः प्रज्ज्वलित हुआ. हिन्दी का प्रचार एवं प्रसार पुनः प्रारंभ हुआ. हिन्दी प्रकाशित हुई.
हिन्दी के प्रचार एवं प्रसार को बाधित करने का जिम्मेदार वह तृतीय स्तरीय संयोजक द्वितीय स्तरीय संयोजक से डांट खाकर किनारे खड़े खिसियानी हंसी हंस रहा है.
कार्यक्रम सुचारु रुप से चलता जा रहा है. सभी भाषण हो रहे हैं. कुछ कवितायें भी पढ़ी जा रहीं हैं और अंत में मुख्य अतिथि द्वारा हिन्दी के प्रचार प्रसार में विशिष्ठ योगदान देने वाले पाँच लोगों को प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया जा रहा है, जिस पर लिखा है:
इन रिक्गनिशन ऑफ योर कॉन्ट्रिब्यूशन टूवर्डस हिन्दी………..
( In Recognisition of your contribution towards Hindi.)..
इसके आगे मुझसे पढ़ा नहीं जा पा रहा है. मैंने हिन्दी का ऐसा प्रचार और प्रसार पहले कभी नहीं देखा शायद इसलिये.
कार्यक्रम समाप्त हो गया है. माँ शारदा की तस्वीर को झोले में लपेट कर रख दिया गया है. दीपक बुझा कर रख दिया गया है. अब अगले साल फिर यह दीप प्रज्जवलित हो हिन्दी का प्रचार, प्रसार करेगा और हिन्दी को प्रकाशित करेगा.
तब तक के लिये जय हिन्दी.
-समीर लाल ’समीर’

भोपाल के दैनिक सुबह सवेरे में मंगलवार जनवरी २८, २०२० में प्रकाशित:
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शनिवार, जनवरी 18, 2020

एक ना एक शम्मा अन्धेरे में जलाये रखिये


भारत की आबादी को अगर आप त्रिवेणी पुकारना चाहते हैं, तो इत्मिनान से पुकार लिजिये. आपके पास तो अपने त्रिवेणी कहने का आधार भी होगा वरना तो लोग कुछ भी जैसे अंध भक्त, भक्त, देश द्रोही, गद्दार, पप्पू, गप्पू आदि जाने क्या क्या पुकारे चले जा रहे हैं, कोई कहाँ कुछ पूछ पा रहा है.

त्रिवेणी आबादी याने कि वह आबादी जो तीन तरह के लोगों से मिलकर बनी है. एक तो वो जो आंदोलनकारी हैं, एक वो जो आंदोलनकारी थे और आज आंदोलन के राजमार्ग पर चलते हुए सत्ता कब्जा कर बैठे हैं और एक वो जिन्हें निचोड़ने में सत्ताधीष लगे हैं और आंदोलनकारी उन्हें भविष्य में निचोड़ने की फिराक में हैं. यह तीसरा वर्ग इस विचारधारा का होता है कि

कोउ नृप होई हमै का हानि, चेरी छांड़ि कि होइब रानी’.

याने जितना उसे पेरा जा सकता है, उतना तो उसे पेरा ही जायेगा. न उससे ज्यादा और न उससे कम. अतः क्या फर्क पड़ता है कि कौन सत्ता कब्जा लेता है और कौन आंदोलन की राह पकड़ लेता है.

मगर ऐसी मानसिकता यह तीसरा वर्ग सिर्फ दिखावे के लिए रखता है. भीतर ही भीतर उसके सुप्त मन को आंदोलनकारियों से यह उम्मीद रहती है कि शायद ये मेरे हक की बात कर रहे हैं और इनके आने से मेरे अच्छे दिन आ जायेंगे. तभी तो जो आंदोलनकारी थे वो इनके सुप्त मन की आवाज के साहरे आज सत्ता पर काबिज हैं और जो सत्ता में थे वो आज आंदोलन की राह पर हैं कल को फिर सत्ता में काबिज होने की राह तकते. वर्तमान से कब मानव मन खुश रहा है? उसे तो बस आने वाले अच्छे दिनों की आशा में जीना आता है.

वैसे तो इस तीसरे वर्ग में अपवाद भी बहुत हैं. कुछ तो इतने उदासीन हैं कि मान बैठे हैं, अब अच्छे दिन तो अगले जनम में ही आयेंगे, यह जन्म तो पाप काटने को मिला है. वैसे सच भी यही है. जिस गति और दिशा में देश चल रहा है, इस जन्म में अच्छे दिनों की आशा करना भी तो अतिश्योक्ति ही कहलायेगी.

यूँ तो जैसी मान्यता है कि मरने पर बस शरीर बदलता है और आत्मा एक नये शरीर में प्रवेश कर पुनः जीवन यात्रा प्रारंभ करती है. ऐसे में अगले जन्म तो क्या, अगले सात जन्म की गुंजाईश भी कम से कम अभी तो नहीं दिखती. अभी तो हमने रसातल की ओर रुख किया है, यात्रा बहुत लम्बी है और मंजिल अभी बहुत दूर है. रसातल के धरातल तक ले जाने का समय तो देना ही होगा तभी तो फिर उछाल आयेगा. वो उछाल हर रोज यह अहसास करायेगा कि अच्छे दिन आ गये. भले वो आज से कितने बुरे क्यूँ न हो.

इसी तीसरे वर्ग के अपवाद में वो लोग भी हैं जो ’परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है’ में विश्वास रखते हैं और उसी को मंत्र मानकर माला जपते रहते हैं. उनका मानना है कि परिवर्तन आकर ही रहेगा. यह वर्ग चुनाव के समय मतदान के बदले पिकनिक मनाने निकल पड़ता है सब कुछ प्रकृति के हाथ छोड़ कर कि वो परिवर्तित कर देगी. प्रकृति इन दयनीय विचारधारकों के लिए परिवर्तन करती भी है मगर बरबादी की दिशा में एक कदम और बढ़ा कर. और फिर यह वर्ग पिकनिक से वापस आकर प्रकृति को कोसता है कि यह सब ग्लोबल वार्मिंग का नतीजा है. उम्मीद थी कि गर्मी होगी मगर पड़ रही है बर्फ. दरअसल केमिकल लोचा इनकी सोच में है. प्रकृति तो वो ही कर रही है जो इन्होंने पोसा है. पेड़ काट कर सर्दी में हाथ ताप लेने के बाद गर्मी में उस पेड़ से छाया की आशा करना कहाँ तक जायज है.

जब बात चली है अपवादों की तो बताते चलें कि सभी आंदोलनकारी भी सत्ता लोलुप्ताधारी नहीं होते. कुछ तो प्रोफेशनल आंदोलनकारी होते हैं और कुछ एक शौकिया भी. इन्हें सत्ता और विपक्ष से कुछ लेना देना नहीं होता. इन्हें आंदोलन से मतलब होता है. यही इनकी जीवनी है और यही इनकी जीवनचर्या. ये तो कई बार इसलिये आंदोलन कर बैठेते हैं कि कोई आंदोलन क्यूँ नहीं हो रहा.
भारत आंदोलनों का देश बन कर रह गया है. यही इसकी पहचान हो चली है. चलो एक आंदोलन करें कि आंदोलन का चिराग कभी बुझने न पाये.

एक ना एक शम्मा अन्धेरे में जलाये रखिये
सुब्ह होने को है माहौल बनाये रखिये.

-समीर लाल ’समीर’

भोपाल के दैनिक सुबह सवेरे में रविवार जनवरी १९, २०२० में प्रकाशित:

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