शनिवार, जून 05, 2021

चाय की गरमागरम चुस्की के नाम

 


भारत में जब रहा करते थे तब अक्सर पंखे के ऊपर और रोशनदान आदि में लगभग हर ही जगह चिड़िया का घोसला देख पाना एक आम सी बात थी. अक्सर घोसले से उड़ कर घास और तिनके जमीन पर, बाल्टी में और कभी किसी बरतन में गिरे देख पाना भी एकदम सामान्य सी घटना होती थी.

उस रोज एक मित्र के कार्यालय पहुँचा तो एकाएक उनकी टेबल पर एक कप में गरम पानी पर वैसे ही तिनके और घास फूस गिरे दिखे. अनायास ही नजर छत की तरफ उठ गई. न पंखा और न ही घोसला. सुन्दर सी साफ सुथरी छत. पूरे कमरे में एयर कन्डिशन और काँच की दीवारें. समझ नहीं आया कि फिर ये तिनके कप में कैसे गिरे? जब तक मैं कुछ सोचता और पूछता, तब तक मित्र ने कप उठाया और उसमें से एक घूँट पी लिया जैसे की चाय हो. मैं एकाएक बोल उठा कि भई, देख तो ले पीने से पहले? कचरा गिरा है उसमें.

वो कहने लगा कि अरे, ये कचरा नहीं है, हर्बस हैं और यह है हर्बल टी. हमारे जमाने में तो बस एक ही चाय होती थी वो काली वाली. चाय की पत्ती को पानी, दूध और शक्कर में मिला कर खौला कर बनाई जाती थी. उसी का जो वेरीयेशन कर लो. कोई मसाले वाली बना लेता था तो कोई अदरक वाली. एक खास वर्ग के नफासत वाले लोग चाय, दूध और शक्कर अलग अलग परोस कर खुद अपने हिसाब से मिलाया करते थे. कितने चम्मच शक्कर डालें, वो सिर्फ इसी वर्ग में पूछने का रिवाज़ था. फिर एक वर्ग ऐसा आया जो ब्लैक टी पीने लगा. न दूध न शक्कर. समाज में अपने आपको कुछ अलग सा दिखाने की होड़ वाला वर्ग जैसे आजकल लिव ईन रिलेशन वाले. अलग टाईप के कि हम थोड़ा बोल्ड हैं. कुछ डाक्टर के मारे, डायब्टीज़ वाले बेचारे उसी काली चाय में नींबू डालकर ऐसे पीते थे जैसे कि दवाई हो.

फिर एकाएक न जाने किस खुराफाती को यह सूझा होगा कि चाय की पत्ती को प्रोसेसिंग करके सुखाने में कहीं इसके गुण उड़ तो नहीं जाते तो उसने हरी पत्ती ही उबाल कर पीकर देखा होगा. स्वाद न भी आया हो तो कड़वा तो नहीं लगा अतः हल्ला मचा ग्रीन टी ..ग्रीन टी..सब भागे ..हां हां..ग्रीन टी. हेल्दी टी. हेल्दी के नाम पर आजकल लोग बाँस का ज्यूस पी ले रहे हैं. लौकी का ज्यूस भी एक समय में हर घर में तबीयत से पिया ही गया. फिर बंद हो गया. अब फैशन से बाहर है.

हालत ये हो गये कि ठेले से लेकर मेले तक हर कोई ग्रीन टी पीने लगा. अब अलग कैसे दिखें? यह ग्रीन टी तो सब पी रहे हैं. तो घाँस, फूस, पत्ती, फूल, डंठल जो भी यह समझ आया कि जहरीला और कड़वा नहीं है, अपने अपने नाम की हर्बल टी के नाम से अपनी जगह बना कर बाजार में छाने लगे. ऐसा नहीं कि असली काली वाली चाय अब बिकती नहीं, मगर एक बड़ा वर्ग इन हर्बल चायों की तरफ चल पड़ा है.

बदलाव का जमाना है. नये नये प्रयोग होते हैं. खिचड़ी भी फाईव स्टार में जिस नाम और विवरण के साथ बिकती है कि लगता है न जाने कौन सा अदभुत व्यंजन परोसा जाने वाला है और जब प्लेट आती है तो पता चलता है कि खिचड़ी है. चाय की बढ़ती किस्मों और उसको पसंद करने वालों की तादाद देखकर मुझे आने वाले समय से चाय के बाजार से बहुत उम्मीदें है. अभी ही हजारों किस्मों की मंहगी मंहगी चाय बिक रही हैं.

हो सकता है कल को बाजार में लोग कुछ अलग सा हो जाने के चक्कर में मेनु में पायें बर्ड नेस्ट टी - चिड़िया के घोसले के तिनकों से बनाई हुई चाय. एसार्टेड स्ट्रा बीक पिक्ड बाई बर्ड फॉर यू याने कि चिड़िया द्वारा चुने हुए घोसले के तिनके अपनी चोंच से खास तौर पर आपके लिए. इस चाय में चींटियों द्वारा पर्सनली दाने दाने ढ़ोकर लाई गई चीनी का इस्तेमाल हुआ है.

अब जब ऐसी चाय होगी तो बिकेगी कितनी मँहगी. क्या पता कितने लोग अफोर्ड कर पायें इसे. मुश्किल से कुछ गिने चुने और यही वजह बनेगी इसके फेमस और हेल्दी होने की.

गरीब की थाली में खिचड़ी किसी तरह पेट भरने का जरिया होती है और रईस की थाली में वही खिचड़ी हेल्दी फूड कहलाता है, यह बात बाजार समझता है.

बस डर इतना सा है कि चाय के बढ़ते बाजार का कोई हिस्सा हमारा कोई नेता न संभाल ले वरना बहुत संभव है कि सबसे मंहगी चाय होगी- नो लीफ नेचुरल टी. बिना पत्ती की प्राकृतिक चाय और चाय के नाम पर आप पी रहे होंगे नगर निगम के नल से निकला सूर्य देव का आशीर्वाद प्राप्त गरमा गरम पानी.

-समीर लाल ’समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जून 6, 2021 के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/60940261

ब्लॉग पर पढ़ें

 

#Jugalbandi

#जुगलबंदी

#व्यंग्य_की_जुगलबंदी

#हिन्दी_ब्लॉगिंग

#Hindi_Blogging


Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, मई 30, 2021

फड़कते हुए शीर्षक की तलाश

 


बहुत दिनों से परेशान था कि आखिर अपना नया उपन्यास किस विषय पर लिखूँ और उसको कौन सा फड़फड़ाता हुआ शीर्षक दूँ.

उपन्यास लिखने वाले दो तरह के होते हैं, एक तो वो जो विषय का चुनाव कर के पूरा उपन्यास लिख मारते हैं और फिर उसे शीर्षक देते हैं और दूसरे वो जो पहले शीर्षक चुन लेते हैं और फिर उस शीर्षक के इर्द गिर्द कहानी और विषय बुनते हुए उपन्यास लिख लेते हैं.

लुगदी साहित्य, वो उपन्यास जो आप बस एवं रेल्वे स्टेशन पर धड्ड़ले से बिकता दिखते है, से जुड़े उपन्यासकार अक्सर ऐसा फड़कता हुआ शीर्षक पहले चुनते हैं जो बस और रेल में बैठे यात्री को दूर से ही आकर्षित कर ले और वो बिना उस उपन्यास को पलटाये उसे खरीद कर अपनी यात्रा का समय उसे पढ़ते हुए इत्मेनान से काट ले.

इन उपन्यासों की उम्र भी बस उस यात्रा तक ही सीमित रहती है, कोई उन्हें अपनी लायब्रेरी का हिस्सा नहीं बनाता. न तो उनका नया संस्करण आता है और न ही वो दोबारा बाजार में बिकने आती हैं. मेरठ में बैठा प्रकाशक नित ऐसा नया उपन्यास बाजार में उतारता हैं. इनके शीर्षक की बानगी देखिये – विधवा का सुहाग, मुजरिम हसीना, किराये की कोख, साधु और शैतान, पटरी पर रोमांस, रैनसम में जाली नोट.. आदि..उद्देश्य होता है मात्र रोमांच और कौतुक पैदा करना..

दूसरी ओर ऐसे उपन्यासकार हैं जिन्हें जितनी बार भी पढ़ो, हर बार एक नया मायने, एक नई सीख...पूरा विषय पूर्णतः गंभीर...समझने योग्य.पीढी दर पीढी पढ़े जा रहे हैं. शीर्षक उतना महत्वपूर्ण नहीं जितनी की विषयवस्तु. ये आपकी लायब्रेरी का हिस्सा बनते हैं. आजीवन आपके साथ चलते हैं. प्रेमचन्द कब पुराने हुए भला और हर लायब्रेरी का हिस्सा बने रहे हैं और बने रहेंगे..शीर्षक देखो तो एकदम नीरस...गबन, गोदान, निर्मला...भला ये शीर्षक किसे आकर्षित करते...मगर किसी भी नये उपन्यास से ऊपर आज भी अपनी महत्ता बनाये हैं..

हम जैसे लोधड़ और नौसीखिया उपन्यासकार, अगर उपन्यासकार कहे जा सकें तो, इन दोनों श्रेणियों के बीच हमेशा टहलते रहते हैं कि कहीं से भी किसी भी तरह दाल गल जाये और एक उपन्यास निकल जाये.

हालांकि ऐसा नहीं है कि पहले उपन्यास लिखा नहीं..एक लिखा है मगर हाय रे किस्मत, वो बिना नया उपन्यास आये ही पुराना हो चला है. अब उसका कोई जिक्र भी नहीं करता. ५ साल भी तो गुजर गये उसको आये और आकर भुलाये. कौन पाँच साल पुरानी बात याद रखता है भला. वरना तो पिछले चुनाव में किये वादे नेताओं को कभी अगला चुनाव जीतने न देते.

इसी विषय और/ या शीर्षक की तलाश में जब हम भटक रहे थे कि तभी किसी बंदे ने कहा- अमां, नये जमाने का  नया रोग की आजकल बाजर मे बड़ी चर्चा है, घर घर लोग परेशान है – कौन है जो उससे अछूता है. हाहाकार मचा हुआ है. उस पर ही कुछ लिख डालो. नये लेखकों की चुटकी लेने वालों की कमी कभी नहीं होती, भले ही पाठकों का आभाव बना रहे.

सुझावदाता ने तो शायद चुटकी ली होगी मगर हम न जाने किस गुमान में उसे अपना प्रशंसक माने गंभीरता से इस विषय पर पिछले तीन चार दिन से विचार में डूबे हुये संजिदा से दिखने लगे हैं और तरह तरह के पिछले कई महीनों से चल रहे विचार जैसे कि नये नोट, पुराने नोट, काला धन, चुनाव, तिजोरी, तहखाना, व्यापारिक मित्रता, काला धन, कुटिलता, टैक्स चोरी, भ्रष्टाचार..आदि को खारिज करते हुए.. आज इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि चलो, एक फड़कता हुआ शीर्षक तो मिल ही गया..अब कहानी बुनेंगे..

और नए जमाने के सबसे जटील नए रोग पर विचार कर जो शीर्षक दिमाग में आया है वो है..

सफेद दाढ़ी वाला फकीर’

-अब इसके आसपास कहानी बुनना है..आप बतायें अगर शीर्षक उस बंदे के सुझाव से मेल न खा रहा न तो!!

-समीर लाल ‘समीर’

 

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार मई 30, 2021 के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/60802130

ब्लॉग पर पढ़ें:

 

#Jugalbandi

#जुगलबंदी

#व्यंग्य_की_जुगलबंदी

#हिन्दी_ब्लॉगिंग

#Hindi_Blogging

 

चित्र साभार: गूगल 

 

Indli - Hindi News, Blogs, Links

शनिवार, मई 22, 2021

बचना है तो मोशन लैस हुए घर में बैठे रहो

 

यह उस भक्तिकाल की बात है जब भक्त का अर्थ होता था प्रभु की सेवा में रत. भगवान की पूजा अर्चना करके भक्त अपनी भक्ति भाव को प्रदर्शित करते थे. उन दिनों की अच्छे दिन का कान्सेप्ट नहीं हुआ करता था, तब सिर्फ बुरे, बहुत बुरे और कम बुरे दिन हुआ करते थे, ऐसा बताया है अभी अभी किसी ने.

वक्त को सबसे बलवान माना गया है, वो कितना कुछ बदल देता है. बन्दर को मनुष्य बना कर दिखा देता है.यह अलग बाद है कि एक जमात इतनी सदियों बाद भी स्वभाव और हरकतों से बन्दर ही रह गई. उस पर से आमजन का दुर्भाग्य यह कि वो उन्हीं को अपना रहनुमा चुन कर उस्तरा थमा देता है. ऐसे में वो बन्दर आमजन का सिर नहीं मूढ़ेंगे तो करेंगे क्या? यही उनका स्वभाव है. इसमें शिकायत कैसी?

वक्त के साथ बदलाव की बयार ऐसी चली कि भगवान के भक्त पाखंडियों की कतार में लगा दिये गये और भक्त शब्द पर कब्जा किसी खास आका के अनुयायिओं का हो गया. इनका भक्ति भाव प्रदर्शन करे का तरीका भी पूजा अर्चना से बदल कर अभक्तों को गाली गलौच करने में बदल गया.

आभाव, जिसे अंग्रेजी में लैस पुकारा गया, का प्रभाव भी बदलते वक्त के साथ ऐसा हुआ कि जिस क्लॉथ लैस को कभी निवस्त्र या नंगा कहा जाता था वो फैशन का परिमाण बन गया. जो कभी शेम लैस माना  जाता था वो आज बोल्ड की परिभाषा बन गई.

नये युग को नई की पहचान देता, हर तरफ लैस ही लैस का परचम लहराने लगा है. लैस कभी इतना ज्यादा हो जायेगा, इसकी उम्मीद न तो लैस ने की होगी और न ही मोर ने. ये मोर वो वाला नहीं है जिसे दाना खिलाया जाता है. वैसे तो उसने भी इस तरह डायना खिलाए जाने की उम्मीद कब की थी?  

कारों में की लैस एन्ट्री, ड्राईवर लैस कारें, पेपर लैस दफ्तर, पल्युशन लैस वातावरण, वर्कर लैस एसेम्बली लाईन (रोबोटिक्स), कमिटमेन्ट लैस रिलेशनशीप, पॉयलट लैस हवाई जहाज, फीमेल/ मेल लैस कपल आदि आदि न जाने कितने सारे लैस.

हिदी मे लिखे जा रहे इस आलेख को भी आप इत्मिनान से हिन्दी लैस आलेख कह सकते हैं. ब्लेम लैस भला मैं कैसे बच कर निकल सकता हूँ मगर मजबूरी है क्या करें? जिस देश की राज भाषा हिन्दी होते हुए भी, हिन्दी दिवस हिन्दी लैस हो गये हैं, हिन्दी दिवस पर कवियों को सम्मान पत्र अंग्रेजी में दिये जा रहे हैं. राष्ट्र विकास की अधिकतर योजनाओं के नाम हिन्दी लैस हुए जा रहे हैं- मेक इन इन्डिया हो, डिजिटल इन्डिया हो, स्मार्ट सिटी हो या कैशलैस सोसाईटी की अवधारणा और तो और सेंट्रल विस्टा ही देख लें. सभी हमारे हिन्दी लैस हुए जाने की चुगली कर रहे हैं.  

कैश लैस सोसाईटी तो खैर जब होगी तब होगी लेकिन फिलहाल तो कैश लैश बैंक और कैश लैस आमजन की जेबें हैं.

आज की ताजा ताजा लैस में वैक्सीन लैस दौर में 18 साल से ऊपर के सभी को वैक्सीन देने की घोषणा, आक्सिजन और बेड लैस अस्पताल और उन सब के ऊपर आसूँ लैस विलाप करती मोशन आउए संवेदन लैस सरकार.

जाने कौन सी परिकल्पना को अंजाम देने की तैयारी है, ये तो वो ही जाने मगर एक आमजन के दिल में तो बस यही तमन्ना है कि वक्त एक ऐसा चमत्कार कर दे कि सरकार पॉवर लैस हो, फिर अपने आप करप्शन लैस सोसाईटी से लेकर विकसित देश की अवधारणा तक पूरी होने में वक्त नहीं लगेगा. फिलहाल तो मोशन लैस हुए घर में बैठे रहो वो ही सांस लैस होने से बचे रहने का एकमात्र उपाय है.

 

-समीर लाल ’समीर’

 

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार मई 23, 2021 के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/60625187

 

ब्लॉग पर पढ़ें:

 

#Jugalbandi

#जुगलबंदी

#व्यंग्य_की_जुगलबंदी

#हिन्दी_ब्लॉगिंग

#Hindi_Blogging




Indli - Hindi News, Blogs, Links

शनिवार, मई 15, 2021

वर्तमान दौर के आस्तिक एवं नास्तिक

 


मांसाहारी को यह सुविधा रहती है कि मांसाहार न उपलब्ध होने की दशा में वो शाकाहार से अपना पेट भर ले. उसे भूखा नहीं रहना पडता. जबकि इसके विपरीत एक शाकाहारी को, शाकाहार न उपलब्ध होने की दशा में कोई विकल्प नहीं बचता. वो भूखा पड़ा मांसाहारियों को जश्न मनाता देख कुढ़ता है. उन्हें मन ही मन गरियाता है. वह खुद को कुछ इस तरह समझाता है कि देख लेना भगवान इनको इनके किए की सजा जरुर देगा. ये जीव हत्या के दोषी हैं और फिर चुपचाप भूखा सो जाता है.

नास्तिक ओर आस्तिक में भी कुछ कुछ ऐसा ही समीकरण है. नास्तिक आस्तिकों की भीड़ में भी नास्तिक बना ठाठ से आस्तिकों की आस्था को नौटंकी मान मन ही मन मुस्करता रहता है. नास्तिक स्वभावतः एकाकी रहना पसंद करता है और जब तक उसे आस्तिक होने के उकसाया न जाये, अपने नास्तिकपने का ढिंढोरा बेवजह नहीं पीटता है.

आस्तिक गुटबाज होता है. वो आस्तिकों की भीड़ में रहना पसंद करता है. वह किसी नास्तिक को देख मन ही मन मुस्करता नहीं है बल्कि उसे बेवकूफ मान प्रभु से प्रार्थना करता है कि हे प्रभु, यह अज्ञानी है, इसे नहीं पता कि यह क्या कर रहा है. इसे माफ करना.

आस्तिक बेवजह नास्तिक को अपनी आस्था के चलते जीवन में हुए चमत्कारों को रस ले ले कर सुनता है ताकि नास्तिक भी उन चमत्कारों की बातों के प्रभाव में आकर आस्तिक बन उसके गुट में आ जाये. बस, इसी उसकाये जाने के चलते नास्तिक भड़कता है और पचास ऐसे किस्से सुनाता है जिसमें हर किस्से का अंत मात्र इस बात से होता है अगर भगवान होता है तो वो उस वक्त कहाँ था?  तार्किक जबाब के आभाव में आस्तिक इसे नास्तिक की नादानी मान उसे उसके हाल पर छोड़ते हुए नाक भौं सिकोड़ कर  मात्र इतना कह कर निकल लेता है कि एक दिन तुम्हें खुद अहसास होगा तब तुम अपनी बेवकूफी पर पछताओगे.

आस्तिक स्वभावतः भीरु एवं आलसी प्रवृति का प्राणी होता है अतः एक सीमा तक कोशिश करने के बाद आस्था की रजाई ओढ कर सो जाने का स्वांग रच, रजाई से कोने से किसी चमत्कार की आशा लिए झांकता रहता है और यह मान कर चलता है कि जैसा ईश्वर को मंजूर होगा, वैसा ही होगा. प्रभु जो करेंगे, अच्छा ही करेंगे. उसे अपनी मेहनत से ज्यादा यकीन आस्था के प्रभाव से हुए चम्त्कार पर होता है.

नास्तिकों में एक बड़ा प्रतिशत उन नास्तिकों का होता है जिन पर अब तक कोई ऐसी विपदा नहीं पड़ी है जिसका कोई उपाय न हो और मात्र प्रभु पर भरोसा ही एक सहारा बच रहे. ऐसे नास्तिक अधिकतर उस उम्र से गुजरते हुए युवा होते हैं जिस उम्र में उन्हें अपने मां बाप दकियानूसी लगते हैं या गाँधी को वो भारत की आजादी नहीं, भारत की बर्बादी जिम्मेदार मानते हैं. उनकी नजरों में गाँधी की वजह से देश इस हालत में है वरना तो देश की तस्वीर कुछ और होती. उम्र का यह दौर उसकी मानसिकता पर अपना ऐसा शिकंजा कसता है कि उसे अपने आप से ज्ञानी और तार्किक कोई नहीं नजर आता. वो अक्सर गंभीर सी मुद्रा बनाये दुनिया की हर उस चीज को नाकारता दिखता है जिससे की यह दुनिया और इसकी मान्यतायें चल रहीं हैं. उसकी नजर में वह सब मात्र बेवकूफी, हास्यास्पद एवं असफल जिन्दगियों के ढकोसले हैं जो उनके माँ बाप गुजार रहे हैं.

उम्र के साथ साथ समय की थपेड़ इन नास्तिकों का दिमाग ठिकाने लगाने में सर्वदा सक्षम पाई गई है. जैसा कहा गया है कि गाँधी को समझने के लिए पुस्तक नहीं, एक उम्र की जरुरत होती  है.

यह आस्तिक व नास्तिक मात्र भगवान के प्रति आस्था और विश्वास रखने एवं न रखने का प्रतीक था. आज के अस्तिक, अपने बदलते स्वरुप के साथ, अपने राजनैतिक आकाओं को भगवान का दर्जा देकर उनके भक्त बने आस्तिकता का परचम लहरा रहे हैं और जो उनके भगवान में आस्था नहीं रखते, उन्हें गाली बकने से लेकर उनके साथ जूतमपैजार करने तक को आस्था का मापदण्ड बनाये हुए.

इसी की परिणिति है कि आज भक्त का अर्थ भी मात्र एक राजनैतिक पार्टी के आका में आस्था रखने वालों तक सीमित होकर रह गया है, शेष सभी जो बच रहे, उन्हें आप अपनी इच्छा अनुसार दुष्ट, नास्तिक या देशद्रोही आदि पुकार सकते हैं. आज का आस्तिक भक्ति भाव से नाच नाच कर भजन पूजन का स्वांग रच रहा है और फिर थक कर आस्था की रजाई में मूँह ढाँपे अच्छे दिन लाने वाले चमत्कार का इन्तजार कर रहा है. उनके प्रभु हैं तो मुमकिन है,

और उनके इतर आज का नास्तिक तो मानो मंदिर की बॉउन्ड्री वाल पर पीठ टिकाये बीड़ी के धुँएं के छल्ले बना कर उड़ा रहा है. उसे बस इतना मालूम है कि अच्छे दिन आना मात्र एक चुनावी जुमला है. भला ऐसा भी कभी होता है कहीं? मगर उसे ये नहीं मालूम कि अगर नास्तिकों का भी कोई कृतिम भगवान होता तो वो है कौन? वो आका विहीन संसार का वाशिंदा है.

-समीर लाल ’समीर’



भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार मई 16, 2021 के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/60478728

 

ब्लॉग पर पढ़ें:

 

#Jugalbandi

#जुगलबंदी

#व्यंग्य_की_जुगलबंदी

#हिन्दी_ब्लॉगिंग

#Hindi_Blogging

 


Indli - Hindi News, Blogs, Links