शनिवार, जून 16, 2018

बंगला छोड़ने का दुख और विरह पीड़ा का चरम


हमेशा सुनते आये थे कि ईट पत्थर से मकान बनता है और उसमें रहने वालों से घर. बात भी सच है कि मकान तो आप बेच खरीद सकते हो, किराये पर ले सकते हो मगर घर नहीं. घर परिवार वालों से बनता है.
टूटे परिवारों में मकान बिक जाने के दर्द से कहीं ज्यादा टीसता दर्द घर न रह जाने का और परिवार बिखर जाने का, रिश्ते टूट जाने का होता है जो ताजीवन सालता है. दोनों पक्षों का दर्द होता है यह. मगर जिस पक्ष ने षणयंत्र किया होता है वह बस  अपराधबोध से उबरने के लिए इस सोच का इस्तेमाल करता है कि दूसरा पक्ष अपना हिस्सा लूज़ कर जाने से दुखी है और इसी सोच से वह आनन्दित होने की कोशिश करता है कि देखो, मैं जीत गया. यह वैसी ही लीपा पोती है अपने अपराध बोध को खुद से और दूसरों से छिपाने के लिए जैसी कि किसी बड़े नेताओं के आने पर सड़कों में पैचवर्क करके उन रास्तों को सुधार दिया जाता है जिनसे उनकी गाड़ी गुजरने वाली होती है. वो नेता भी जानता है कि यह पैच वर्क कल मेरे चले जाने पर उखड़ जायेगा और शहर भी इस बात से भली भांति परिचित होता है. किसी को फर्क नहीं पड़ता मगर कराहती सड़के हैं और उन सड़कों का दर्द कोई नहीं समझता.
पान की दुकान पर तिवारी जी बता रहे हैं कि हम तो इस रास्ते पर तब से चल रहे हैं जब न तो यह पान की दुकान थी और न यह सड़क. बस, एक ठो कच्ची पगडंडी होती थी. अब याद करते हैं तो लगता है वो पगडंडी ही इस सड़क से बेहतर थी. कम से कम थी तो. अब तो कहते हैं कि सड़क है मगर उसे गढ्ढों के बीच में खोजना पड़ता है कि है कहाँ? जिस दिन मंत्री जी आवें उस दिन फिल्म में दिखती हिरोईन की तरह क्रीम पॉलिश लगा कर तैयार और मंत्री जी गये कि बस!! लाईट और कैमरा ऑफ..मेकअप उतरा और पहचान कर दिखाओ उसी हिरोईन को..भूत भूत चिल्ला कर भागोगे अधिकतर को देख कर.
खैर, बात चल रही थी घर और मकान की. तो रहवास के और भी अनेकों नाम हैं महल है, हवेली है, झोपड़ी है, आश्रम है, कुटिया है, झोपड़ी है, मुंबई के फुटपाथ भी बराबरी से टक्कर दे लेते हैं. होने को तो बीहड़ और जेल भी हैं जिसके राजपथ पर गुजर कर लोग वो मुकाम हासिल करते हैं जब वो चुने हुए नेता हो जाते हैं और उनको सरकारी बंगला मिल जाता है. अपवाद इसमें भी हैं कि कुछ को अपनी पढ़ाई लिखाई के जरिये और कुछ को अपनी जाति के कारण मिले आरक्षण के जरिये और कुछ को अपनी रसूक और पहचान के जरिये सरकार में ऐसे पद प्राप्त हो जाते हैं कि उन्हें भी सरकारी बंगले आवंटित हो जाते हैं.
सरकारी बंगलों और अन्य रहवासों में ठीक वही ठसक और पावर का भेद है जो नेताओं और आमजन में होता है. ये सरकारी बंगलों का ही करिश्मा हैं कि उसमें रहने वाले कभी घर नहीं जाते और न ही घर पर रहते हैं. उनसे या उनके मातहतों से पूछो कि साहेब कहाँ हैं? तब या तो वो बंगले पर होते हैं, या बंगले जा रहे होते हैं. आप को भी समाचार यही आयेगा कि मंत्री जी ने आपको बंगले पर बुलाया है.
कभी इन महानुभावों से पूछिये कि साहब, यह आपका घर है क्या? तो भले पूरा परिवार इस बंगले में रह रहा हो बरसों से मगर वो बोलेंगे कि नहीं, नहीं, मेरा घर तो मुगलसराय में है..भले ही वहाँ किरायेदार रह रहे हों. पता नहीं या तो इनको घर, मकान और बंगले की भेद नहीं समझ आता या शायद अन्य मसलों की तरह समझ कर भी समझना न चाहते हों.
जो भी हो बंगले आकर्षित करते हैं जैसे कि फिल्मी तारिकायें. वो उसमें रहने वालों को अपने मोहपाश में ठीक वैसे ही बाँध लेते हैं जैसे कि यह फिल्मी तारिकायें. जो एक बार बंगले में रहने लगता है वो यह भूल जाता है कि यह सरकारी है और इसे एक दिन खाली करना होगा. जैसे फिल्म देखते हुए तारिका के कुछ लोग ऐसे ऐसे दीवाने हो जाते हैं कि मुंबई पहुँच कर कभी उसके घर में कूद कर पक़ड़ा जायेंगे और पीटे जायेंगे, तो कभी उसकी कार पर पत्थर फेंक कर उसे न पा पाने की खीझ उतार लेते हैं. दुख तो इतना अपार कि कई बार तो फाँसी लगा कर तारिका को न पा पाने पर अपनी ईहलीला ही समाप्त कर लेने के किस्से भी हैं.
ठीक वही हाल बंगला छोड़ने के दुख का दिख रहा है. विरह पीड़ा का चरम दिखाई देता है. अव्वल तो छोड़ना नहीं चाहते, भले ही वो पद चला गया हो जिसकी वजह से बंगला मिला था. और अगर कोर्ट के आदेश के दबाव में आकर मजबूरन खाली करना ही पड़ा तो वही हिरोईन की कार पर पत्थर फैंकने और नुकसान पहुँचाने वाली बात, चलते चलते टाईल्स उखाड़ ले गये. नल तोड़ डाले, तमाम कालीन, दीवारें आदि तोड़ फोड़ डाले. बंगले को खण्डहर में तबदील कर देने की पूरी कोशिश करके रुखसती लेते हैं.
हिरोईन से मोहब्बत तो फिर भी समझे. कौन जाने कि खुदा मेहरबान हो जाये और उसका दिल एक बार को आप पर आ भी जाये और वो आपकी हो भी जाये मगर सरकारी बंगला?? वो तो हर हाल में वापस करना ही है, उससे ऐसा मोह कैसा? बात समझ के परे है.
-समीर लाल ’समीर’ 

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे में रविवार १७ जून, २०१८:

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शनिवार, जून 09, 2018

काम पर नहीं वायरल होने पर ध्यान दो!!


आज पान की दुकान पर तिवारी जी बता रहे थे कि उनके मोहल्ले के ९० प्रतिशत घरों में अब भूत नाचा करते हैं. सभी घरों के बच्चे बड़े शहरों या विदेशों में जाकर बस गये हैं. किसी के यहाँ दोनों बुजुर्ग और किसी के यहाँ एक बचा, कभी बच्चों के पास चले जाते हैं तो कभी वापस आकर भी तबीयत और बुढ़ापे के चक्कर में घर में ही बंद रह जाते हैं. मोहल्ले में अब पहले वाली हलचल नहीं रही. हमारे जमाने की बात ही कुछ और थी. वैसे यह बात हर जमाने के बुजुर्ग के मुख से सुनी जा सकती है चाहे कितने ही युग बदल जायें कि हमारे जमाने की बात ही कुछ और थी.

चाय पर चर्चा और मन की बात से विपरीत पान की चुकान पर चर्चा में जन की बात सच होती है और फिर भी बहुत देर तक गंभीर नहीं रह पाती, कोई न कोई मनचला कुछ मजाक का पुट लगा ही देता है. यही तो जिन्दगी जीने का तरीका है वरना तो एक तरफा मन की बात के हाल देख ही रहे हैं.
तिवारी जी की गंभीर बात पर घन्सु ने चुटकी लेते हुए कहा कि चलिये इसी बहाने आप भूतों का नाच देख ले रहे हैं, कितनों के नसीब में होता है इसे देखना. कभी सेल्फी विडीओ उतरवाईये भूतों के साथ नाचते हुए. एकदम्मे वायरल हिट होगा आपका विडीओ. बस, उसमें लोग कन्फ्यूज न हो जायें कि कौन तिवारी जी हैं और कौन भूत!! वैसे वो भूत हैं कौन मजहब के..देख लिजियेगा हिन्दु ही हों? इतना कह कर घन्सु भाग लिया. तिवारी जी मूँह में इस बीच पान तम्बाकू घुल गई थी तो उसी के लोभ में घन्सु को गाली भी फेंक कर नहीं मार पाये और झुंझला कर रह गये. घन्सु जैसी हरकत सोशल मीडिया पर भी चल रही हैं सुबह से शाम तक. किसी भी गंभीर बात को करने ही नहीं देते हैं लोग. बस, संप्रदायिकता की तीली से आग लगाई और दौड़ लगा दी. हर चर्चा का अंत संप्रदायिकता और मजहबी टच. किसी भी समस्या के निदान पर कोई बात ही नहीं करता है.
थोड़ा ठहर कर तिवारी जी ने पान थूका और कहने लगे कि घन्सु को तो मैं शाम को देखता हूँ. तब बीन होगा हमारा ये जूता और नागिन डांस करेंगे घन्सु और तुम उतारना पूरे काण्ड के सेल्फी. तब उसे समझ आयेगी कि वायरल हिट कौन सी सेल्फी होती है.
नया जमाना है. परिभाषायें बदल रही हैं. आज फोटो, विडीओ चाहे खुद खींचों या कोई और- कहलाती सेल्फी ही है. फोटोग्राफ, विडीओग्राफ, सेल्फी चाहे जो हो, कहेंगे सेल्फी है. सेल्फी न हुई मुई सरकार हो गई हो. चाहे जो जीते, जो हारे, सरकार तो उनकी ही बनेगी.
कभी वायरल होता था तो एण्टी बायोटिक खाना पड़ती थी. बुखार देकर बदन तोड़ कर रख देता था वायरल. उस रोज तिवारी को बताया कि पिछले एक हफ्ते वायरल हो गया था इसलिए आ नहीं पाये पान की दुकान तक तो पूछने लगे व्हाटसएप पर फारवर्ड नहीं किये? कौन सा वाला विडीओ वायरल हुआ तुम्हारा? इस तरह बदली हैं परिभाषायें.
कभी किसी को डाऊन फील कराना हो तो अच्छे खासे मुस्कराते बंदे को चार पांच लोग थोड़े थोड़े अन्तराल पर अलग अलग इतना बस पूछ लें-’क्या भाई, तबीयत गड़बड़ है क्या? बड़े बुझे बुझे लग रहे हो, बुखार वगैरह तो नहीं है?’ विश्वास जानिये शाम होते तक अगर सही में बुखार न भी आया तो भी बंदा घर पर रजाई ओढ़े मिलेगा. इसी तर्ज पर बार बार बोल कर सारे देशवासियों को विकास और अच्छे दिन भी दिखा ही दे रहे हैं और लोग भ्रमित हुए जिता भी दे रहे हैं.
आज बड़ी से बड़ी समस्या चाहे वो कितनी भी वायरल क्यूँ न हो गई हो, का निदान उससे भी अधिक वायरल कोई और विषय कर देना हो गया है.
इधर हाल ही में पेट्रोल के दामों का हल्ला वायरल हो चला तो एकाएक डब्बू जी अपने भतीजे की शादी में गोविंदा का नाचा हुआ गाना नाच दिये. मीडिया ने उसे हाथों हाथ लिया. जब मीडिया ने उसे वायरल बताना शुरु किया तब तक वो सही मायने वायरल भी नही हुआ था. मगर फिर तो जो स्पीड पकड़ी की ऐसा लगा इतना मँहगा पेट्रोल फुल टैंक भरवा कर जेट उड़ा हो. लोग पेट्रोल भूल भाल कर डब्बू जी के नाच में ऐसा मस्त हुए कि कहीं गोविन्दा का इन्टरव्यू आ रहा है तो कहीं किसी फिल्म स्टार का ट्वीट. प्रदेश के मुख्य मंत्री डब्बू जी को सपरिवार घर बुलवा रहे हैं तो मीडिया डब्बू जी के घर के बाहर पूरी तरह मुस्तैद. डब्बू जी समझ ही नहीं पा रहे हैं कि आखिर उनके ठुमके में ऐसा क्या था कि पूरा देश झूम उठा?
बारात में भला कौन नहीं नाचा है? यह तो वैसा ही प्रश्न है कि किस नेता ने घोटाला नहीं किया है. बमुश्किल एक दो मिल जायें तो भी बहुत.ऐसे में आज देश के न जाने कितने नागिन डांसर जिन्होंने बारातों में सड़क पर गोबर की परवाह न करते हुए लोट लोट कर नाच का नायाब प्रदर्शन किया है, अपने आप को ठगा महसूस कर रहे हैं. उनकी कमी इतनी ही रह गई कि उनको मीडिया नें वायरल नहीं घोषित किया.
आज अगर छा जाना है तो काम पर नहीं वायरल होने पर ध्यान दो!! वायरल होने का जमाना है!!
-समीर लाल समीर


भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जून १०, २०१८ के अंक में:



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रविवार, जून 03, 2018

इसलिए खुद को साइकिल से अपग्रेड किया ही नहीं


पेट्रोल के तो न जाने कितने इस्तेमाल हैं. वाहन चलाने से लेकर विमान उड़ाने तक सब जगह पेट्रोल इस्तेमाल होता है. होने को तो साफसफाई, जनरेटर आदि में भी होता है, मगर वह इस्तेमाल मुख्य धारा का नहीं है इसलिए वो अगर बैगर जिक्र के भी रह जाये तो कोई फरक नहीं पड़ता. जैसे किसी नेता के द्वारा कोई नेक कार्य कर देने का जिक्र. आखिर ऐसा कार्य होता ही कितना है जो जिक्र में लाया जाये.
हाँ, पेट्रोल का एक कार्य जरुर और ऐसा है जिसका जिक्र करना चाहिये और वो है दंगाईयों द्वारा पेट्रोल बम का इस्तेमाल. सुविधा ये रहती है कि जब तक इसे चला न दिया जाये तब तक दंगाई महज पार्टी का कार्यकर्ता है और बम, शीशी में रखा पेट्रोल, जिसे ढिबरी की तरह इस्तेमाल किया जाना बताया जाता है. दोनों ही बातें दंगाई द्वारा बम चला देने के ठीक पहले तक पुलिस के द्वारा गैर कानूनी नहीं मानी जा सकती.
समाज ऐसा सुविधाभोगी हो गया है कि आज पेट्रोल के बिना जीवन सोच पाना भी कठिन हो गया है. ज्ञानी बताते हैं कि देश में ६७ साल में कुछ भी नहीं हुआ. पता नहीं फिर ६७ साल पहले बेलगाड़ी और साईकिलों से चलने वाला देश कब वाहनों से चलने लग गया और चल कर गया कहाँ अगर कुछ किया ही नहीं तो.
मेरी याद में ही दिल्ली से लेकर मेरे शहर तक को गाड़ियों से पटते देखा है. सड़कों पर गाड़ियों की संख्या में इतनी बड़ा इजाफा हो गया है कि महानगरों में सड़कें अब सड़के कम और पार्किंग लॉट ज्यादा नजर आती है. -१० किमी की दूरी भी कई घंटों में रेंगते हुए पूरी होती है. ये सब पिछले ४ सालों में तो नहीं हो गया होगा. और अगर हुआ है तो मतलब दिल्ली को प्रदुषण में ढकलने के लिए जिम्मेदार कौन? आज एक एक घर में चार चार वाहन रखना स्टेटस सिंबल बन गया है.
जिन देशों में पेट्रोल के कुएं है, उनके तो ठाठ बस पूछो न. एक जमाने में ऐसी तूती बोलती थी कि फिल्मों में किसी को बहुत पैसे वाला दिखाना होता था तो शेख की ड्रेस पहना कर खड़ा कर देते थे. जब बहुत तूती बोलती है तो एक न एक दिन नजर लग ही जाती है. अपने यहाँ ही देख लो. चार साल में ही नजर खा लिए- हद से ज्यादा तूती जो बुलवा ली. तो सारे तेल उपजाऊ देश भी नजर खाने लगे. ईराक, कुवैत सबका नूर उतर गया.अब तो खैर खाड़ी देशों की नौकरियों में भी पहले जैसी बात न रही.
दोहन की अति से अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में पेट्रोल के दामों में खलबली मची. खलबली का फायदा उठाना बाजार जानता है. जब अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में दाम १ रुपये बढ़ता तो ये ५ रुपये बढ़ा देते और जब ५ रुपये गिरता तो ये १ रुपया घटा देते. दाम बढ़ाने घटाने के खेल में सरकार को इतना मजा आने लगा कि धीरे धीरे ये सिलसिला अन्तर्राष्ट्रीय बाजार के दामों से हटकर चुनाव में अटक गया.चुनाव पास तो दाम कम और चुनाव खत्म तो दाम आसमान छूने लगे.
हालत ये हो लिए हैं कि जिस पेट्रोल से राकेट उड़ान भरता है, उसी के दामों ने ऐसी उड़ान भर ली है कि राकेट भी शरमा गया है.वो भी पेट्रोल के दाम से कह रहा है कि प्रभु आप ही नई ऊँचाई नापो, हम अब आराम करते हैं.
एक वर्ग को छोड़ दें –उनको छोड़ना ही बेहतर हैं क्यूँकि वो आम नहीं हैं तो सभी की कमर टूट गई है. तमाम कार्टून आ रहे हैं. कोई कहता है कि पेट्रोल टंकी में न डाल, गाड़ी पर डाल दे – आग लगानी है. कोई कह रहा है कि जल्दी पेट्रोल पाऊच में आयेगा ५० ग्राम के..जब इन्सान बहुत परेशान हो जाता है तो हँसने लगता है, यही चरितार्थ हो रहा है इससे भी.
तिवारी जी पान की दुकान पर बता रहे थे कि हमें तो पता था कि एक दिन ऐसा दौर आयेगा इसलिए हमने तो कभी खुद को साईकिल से अपग्रेड किया ही नहीं. इस तरह अपनी दूर दृष्टि का लोहा मनवा लेने बाद वे आगे बोले- और अब हमसे सुनो. इस सरकार ने पेट्रोल को खेला बना कर इसका पलिता खुद अपनी दुम में लगा लिया है, देखना अगले चुनाव में..खुद अपनी लंका में आग लगा कर धूं धूं तमाशा देखेंगे. समझदार साथी तो कन्ना भी काटने लगे हैं अभी से.
पेट्रोल का तो स्वभाव भी है कि आग लगती फटाक से है मगर बुझाना बहुत ही मुश्किल होता है. तो अब जब आग लगा ली है तो भुगतने के सिवाय और रास्ता भी क्या है?
कोशिश तो फिर भी करना चाहिये, कुछ तो तरीके हैं ही, शायद दुर्गति की गति को विराम न सही, विश्राम ही मिल जाये.
-समीर लाल ’समीर’
भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे में जून ३, २०१८ में:

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बुधवार, मई 30, 2018

बंदी है कि हरी झंड़ी है?



Published in 7th Quarterly  e-Bulletin – Gyan Vigyan Sarita:शिक्षा dt 1st April’2018
एक नया कॉलम : अंदाज ए बयां - समीर लाल ’समीर’ by renowned author in Hindi, settled at Canada.


दिल्ली के मच्छर भी अगर बस मलेरिया के कारक हों तो फिर दिल्ली में रहने का क्या फायदा? मलेरिया तो गली गली, गाँव गाँव की बात है. दिल्ली में रहने की ठसक अलग होती है. ग्रेजुएट गाँव में पटवारी बनता है और १२ वीं पास  दिल्ली में मंत्री, वो भी ऐसा वैसा नहीं- शिक्षा मंत्री. इसी सम्मान का ध्यान रखते हुए दिल्ली के मच्छर भी मलेरिया नहीं, डेंगू देकर जाते हैं.
एक फिल्म में नाना पाटेकर को कहते सुना था कि एक मच्छर आदमी को हिजड़ा बना देता है. तब ताली बजाकर मच्छर मारे जाते थे. अब एक मच्छर आदमी को घर बैठे बेडमिन्टन की प्रेक्टिस करा देता है. आजकल जिसे देखो रेकेट से मच्छर मारता दिखता है. ताली बजाने का काम अब मंच से भाषण देते हुए जनता को चिढ़ाने के लिए किया जाता है अपने आप को सफल बताने के लिए. हालांकि ताली बजाकर मच्छर ही मार रहे होते हैं, इससे बड़ा तो कोई काम दिखता नहीं जो किया हो.
दिल्ली में चाहे जो भी दे दो उसका विरोध होता ही है फिर वो चाहे आरक्षण हो या अनुदान. अतः डेंगू जैसा मच्छरों के द्वारा प्रद्दत इस समस्यायुक्त जीवन की मुक्ति का सुगम मार्ग भी विरोध का सामना करने लगा. सारे बाबा आजकल मुक्ति के सुगम मार्ग पर ही प्रवचन दे दे कर पूरे देश को लूट रहे हैं. सब को धन मोह से मुक्त करा कर अपना खजाना भर रहे हैं. उसी जीवन से मुक्ति का मार्ग जब यह बेचारे दिल्ली के मच्छर प्रद्द्त करते हैं तो उन्हें मार डालने के उपाय पर चर्चा होती है. उनके नाम पर राजनिती होती है. दिल्ली सरकार कहती है कि दिल्ली में गंदगी की जिम्मेदार नगर महापालिका है जो हमारी पार्टी की नहीं है, जिसमें यह मच्छर पैदा होते हैं. फिर हमारे अंडर में दिल्ली पुलिस भी नहीं है कि हम इन मच्छरों को गिरफ्तार कर सकें. केन्द्र सरकार इन मच्छरों को संरक्षण दे रही है ताकि हम बदनाम हो जायें.
सुझाव आया कि दिल्ली में फॉग मशीन से धुँआ करवा कर इन मच्छरों को मरवा दिया जाये. मच्छर हैं कोइ गाय तो है नहीं कि इनको मारना धर्म विरोधी बात हो जाये. मगर जो फॉग मशीन नें धुँआ छोड़ा वो दिल्ली के वातावरण में ऑलरेडी घुले गाड़ियों के धुंए से कम जहरीला सा साबित हुआ और मच्छर तो मानो खुश होकर खुली हवा में दुगनी गति से साँस लेने लगे. उन्हें इन्तजार रहने लगा कि कब फॉग वाली गाड़ी आये और उन्हें बेहतर आबो हवा मिले.
किसी ज्ञानी ने सलाह दी कि ये ऐसे न मानेंगे.इनको मार कर क्यूँ हत्या का पाप लेना सर पर.इनकी नसबंदी करा दो..जैसे जैसे मरते जायेंगे..कम होते जायेंगे और धीरे धीरे खत्म हो जायेंगे. फिर पुराने नसबंदी के आंकड़े निकाले गये. उस पर आधारित शोध पत्र को जांचा गया और पाया गया कि भारत की जनसंख्या की वृद्धि में जितना नसबंदी का योगदान रहा है, उतना तो आयुर्वेदिक शिलाजीत का भी नहीं रहा. इमरजेंसी में जबरन नसबन्दी के बाद एकाएक भारत की जनसंख्या में जो बढ़ोतरी हुई वो कई कम आबादी वाले देशों को नसबन्दी के लिए प्रेरित करने के लिए पर्याप्त है. ये ठीक वैसा ही है जैसे जब जब भी सरकार ने भ्रष्टाचार को रोकने के लिए कड़क कदम उठायें हैं, भ्रष्टाचार एकाएक बढ़ता चला जाता है. मानो कड़क कदम न हों..फर्टीलाईजर हो..कि भ्रष्टाचार की फसल लहलहा उठी.
दरअसल बंदी शब्द ही हमारे देश में कमाल करता है. नशाबंदी वाले प्रदेशों में शराब की धड़ाधड़ बिक्री, नोटबंदी के बाद हजारों करोड़ के घोटालों का आंकड़ा, नसबंदी के बाद आबादी की वृद्धि, यहाँ तक कि नाकाबंदी को धता बताकर विदेश निकल लेने की आजादी में सुलभता..मानो बंदी न हो कर हरी झंड़ी हो. बंदी का रिकार्ड देखते हुए तो लगता है कि भारत में एक बार ईमानदारी पर पाबंदी लगा कर देखना चाहिये. कौन जाने भ्रष्टाचार बंद हो ही जाये.
फिर तय पाया कि इन मच्छरों को सम्मेलन बुलाकर इनको समझाईश दी जाये कि दिल्ली की जनता तुम्हारी दुश्मन नहीं हैं. उनके साथ मिल जुल कर प्रेमपूर्वक रहो. अगर तुमको खून ही पीना है तो तुम्हारे लिए सरकार ब्लड बैंक के दरवाजे खोल देगी. वो खून तो यूँ भी जरुरतमंदों तक कभी पहुँच ही नहीं पाता और अगर पहुँच भी जाये तो पीना तो तुमको ही है. तुम लोग सीधे ही पी लेना. समझाईश देने के लिए पेशकश करने वाले बाबा श्री ने बताया कि वे मच्छरों को आर्ट ऑफ बिना काटे लिविंग सिखायेंगे और इसके लिए जमुना किनारे मच्छरों का महा सम्मेलन बुलवाया जायेगा. पिछले इंसानी सम्मेलन का कचरा अब तक वहाँ पसरा है जो मच्छरों के लिए मुफीद माहौल रहेगा.
पिछले इंसानी सम्मेलन का जिक्र आते ही सरकार सतर्क हो गई और फिर नये सिरे से बदनामी न हो जाये ऐन चुनाव के पहले, इस हेतु यह पेश्कश भी दर किनार कर दी गई.
एकाएक इस ताजी सलाह पर सरकार गंभीरता से विचार कर रही है कि इन मच्छरों को बैंकों से तगड़ा लोन दिलवा दो ..ये खुद ही विदेश भाग जायेंगे.
फिर न मच्छर रहेंगे..न डेंगू.
सरकार इन मच्छरों का पासपोर्ट केंसल कर अपने हाथ झाड़ लेगी...फिर विदेश वाले अपनी देखें.
-समीर लाल समीर    


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