रविवार, अगस्त 12, 2018

स्वतंत्रता के दायरे समझो, मायने नहीं...



हम साल भर पाप करते ही इसलिए हैं ताकि सालाना गंगा स्नान में उन्हें धोकर गंगा माई हमको पुण्य प्रदान करे. पाप न करेंगे तो गंगा माई धोएगी क्या? पुण्य प्राप्त करना है तो पाप करो. यही हमारा सिध्द नियम है.
वही हाल स्वर्ग पहुँचने का मार्ग दिखाने वाले बाबाओं के आश्रम का है. आश्रम में ऐसे ऐसे निकृष्ट धतकरम होते हैं कि उन्हें देख जान कर अगर नरक भी पहुँच जाओगे तो लगेगा वाकई अगर कोई जगह स्वर्ग है तो वो यही है.
जितना पाप इन पावन नदियों के तट पर और इन सिद्ध बाबाओं के घर पर होता है, उसके सामने सब कुछ पुण्य ही नजर आएगा.
हम उत्सवधर्मी इसी तर्ज पर हर बरस रावण बनाते ही इसलिए हैं ताकि उसे मार सकें. उसका दहन कर सकें. फिर सब तालियाँ बजा कर नाचें कि रावण मारा गया. पाप पर पुण्य की विजय हुई. अंधेरों पर उजाले की विजय हुई भले ही दो दिन से बिजली न आई हो और सारा शहर अँधेरे में डूबा हो. अंधेरों पर उजाले के विजय जुलूसों में जेबकतरों की पौ बारह हो लेती है. रावण तो जाने कब का मारा गया. अब तो गली गली रावण का पुतला बना कर उसे मारने वाले खुद ही रावण से बदतर कृत्यों में लिप्त है. गली गली सीताओं का अपहरण हो रहा है. अब बचाने को कोई हनुमान तो दूर, थाने में रिपोर्ट लिखने को हवलदार भी तैयार नहीं. कानून बनाने वाले इन रावणों के आका हैं और कुछ तो खुद ही रावण को भी शर्मसार करने में जुटे हैं. यही आका सबसे जोरशोर से राजधानी में दशहरे पर तीर चलाते हैं नकली रावण को मारने. जनता ताली पीटती है कि रावण मारा गया. इस तरह जनता को गुमराह कर असली रावण फिर साल भर के लिए मस्ती काटने को निकल पड़ता है. पाप का घड़ा सिर्फ मुहावरे में भरता है. असल में तो अब पाप का घड़ा बनाने वाले हों या क़ानून बनाने वाले, उसमें सुराख की समुचित व्यवस्था बना कर रखते हैं. पाप करते चलो, सुराख उसे कभी भरने न देगा.
साल भर कबूतरों को पकड़ कर पिंजड़े में बंद किया ही इसलिए जाता है ताकि स्वतंत्रता दिवस पर हर शहर, राजधानी से मंत्री जी लोग उन्हें उड़ा कर आजाद करें और जनता ताली पीटे कि देखो देखो, वो आजाद हो गए. आजादी का उत्सव मन गया. झंडा लहर गया. नेता जी के भाषण हो गये. आजादी के गीत बज गए. मिठाई बाँट दी गई. तमाशा खत्म. अब घर जाओ, अगले साल फिर आना.
हर मूंह में माइक घुसा कर प्रश्न पूछने वाला ये मीडिया कभी इन कबूतरों से अपना जाना पहचाना प्रश्न क्यूँ नहीं पूछता है कि हे कबूतर जी, आपको आजाद होकर कैसा लग रहा है? अब आप उड़कर कहाँ जायेंगे,क्या कमाएंगे, क्या खायेंगे?
कबूतर भी आम जनता की तरह वैसा ही मूक और निरीह प्राणी है, जिसे अपनी नियति पता है. वो हर मुसीबत में आँख मींच कर राम नाम जपने लगता है और हर दशा को प्रभु की मरजी मान कर इत्मीनान धर लेता है. उसके लिए ‘स्वतंत्रता मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है’ मात्र एक वैसा ही आजादी के समय का नारा है, जैसा आज ‘गरीबी हटाओ, फलाने को जिताओ’ जो १०० रुपये की एवज में वो हर चुनावी सभा में लगाता है. यह चुनावों के महापर्व पर उसकी कमाई का साधन है. सच सोच है कि हकीकत में अगर गरीबी हट जाए तो अगले चुनाव में नारे कौन लगाएगा? और स्वतंत्रता अगर सबको दे दें तो अगले साल स्वतंत्रता दिवस पर आजाद किसे करेंगे?
इन आजाद किए गए कबूतरों में कुछ कबूतर तो बार बार पकडे जाने के इतना अभ्यस्त हो गए हैं कि नेता जी के आजाद करते ही कुछ देर में उड़ कर खुद ही फिर से पिंजड़े में आकर बैठ जाते हैं. कबूतरों का एक वर्ग ऐसा भी होता है जो कुछ देर उड़ने के बाद नजदीक के पेड़ो में बैठकर, बहेलिओं के आने का इंतज़ार करने लगता है. जैसे ही बहेलिया आता है, यह आत्मसमर्पण कर देते हैं. कुछ के लिए बहेलिओं को जाल बिछाना पड़ता है मगर आखिरकार कैद में आ ही जाते हैं.
एक छोटा सा उत्साही युवा कबूतरों का वर्ग ऐसा भी होता है, जो इस आजादी को असल आजादी मान कर, नेता जी के भाषण पर भरोसा करते हुए, खुले आसमान में ऊँची स्वच्छंद उड़ान भर देता है. उसे क्या पता कि उस उंचाई पर इन्हीं के पाले बाज़ उसके आने का इंतज़ार कर रहे हैं. बाजों को भी तो उत्सव की दावत उड़ाना है.
इसीलिए बुजुर्ग कबूतर युवा कबूतरों को समझाते पाये जाते हैं कि साल में एक दफा थोड़ी देर के लिए ही सही, अगर आजाद उड़ान भरना चाहते हो, तो इनकी गुलामी को अपनी नियति मानकर चुपचाप पिंजड़े में बंद रहना सीख लो, वरना ये धरती पर दिखते जरुर हैं, इनके हाथ आसमान तक जाते हैं. यहाँ ये नेता और वहां बाज कहलाते हैं. ऊँचा उड़ोगे तो बाज का शिकार बन जान गंवाने के सिवाय कुछ हाथ न आयेगा.
स्वतंत्रता के दायरे समझो, मायने नहीं. तभी इस स्वतंत्रता के उत्सव का मजा आयेगा वरना तो कौन आजाद है भला?
-समीर लाल ‘समीर’
भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे में अगस्त १२, २०१८ में:


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शनिवार, अगस्त 04, 2018

अगले चुनाव में वापसी के लिए वापसी ही मुख्य मुद्दा



लड़की रईस परिवार की और लड़का नौकरीपेशा मध्यमवर्गीय परिवार का. मोहब्बत में पड़ लड़की लड़का शादी की जिद्द ले बैठे. रईस पिता के रईसी चोचले. लड़के को घर जमाई बनाना है मगर सीधे कहेंगे तो कौन मानेगा भला? वो भी तो अपने पिता की इकलौती संतान है. अतः लड़के के पिता को फरमान भेजा गया कि क्या आपका घर इस काबिल है कि हमारी बेटी वहाँ आरामपूर्वक रह पायेगी? लड़के का पिता भी बेटे के प्यार में अपमान झेलने को मजबूर रहा. उसने खबर भिजवाई कि जी, एकदम फिट व्यवस्था है. बहु के लिए कमरे में टीवी लगवा दिया है और कमरे से जुड़ा बाथरुम भी बनवा दिया है जिसमें वेस्टर्न स्टाईल टॉयलेट भी लगवा दिया है. गरीब का बोला सच भी रईस की नजर में झूठ ही होता है. अतः रईस ने कहा कि तस्वीरें दिखाओ. बहरहाल, एक बार अपमान झेल लो तो आप बार बार अपमान झेलने को बाध्य हो जाते हैं. अतः तस्वीरें खिचवाई गई अलग अलग कोणों से और भिजवाई गई. मगर बात मान लेने के लिए तस्वीर मंगवाई गई हो तब तो मानें. इधर तो मामला ही दूसरा था.
अतः कहा गया कि तस्वीर से पता नहीं चल रहा है कि आपके घर में नेचुरल लाईट आती भी है कि नहीं. एक विडिओ बना कर लाओ जिसमें घर की गली के मोड़ से घर में घुसने और कमरे तक जाने का और टायलेट का स्पष्ट चित्र हो. इस मांग का उद्देश्य मात्र इतना है कि या तो परेशान होकर लड़के वाले खुद ही कह दें कि आप अपनी लड़की अपनी रईसों की बिरादरी में ब्याह दो या फिर कह दें कि हमसे इससे ज्यादा न हो पायेगा. अगर आपको नहीं पसंद आ रहा है तो हमारा लड़का ही आपके यहाँ आकर घरजमाई बन कर रह लेगा. बेटी रईस की है. नाजो नखरों में पली है, पिता उसे भला कैसे मना करे तो यह पैतरा काम आ जायेगा.
फिलहाल तो विडिओ का इन्तजार है मगर यह भी तय है विडिओ भी भला क्या तसल्ली करा पायेगा? फिर फरमान आयेगा कि आपके यहाँ एसी नहीं है. दिन रात एसी मकान और कारों में बंद रहने वाली लड़की के लिए नेचुरल लाईट की मांग, यह बात अपने आप में अचंभित करती है. वो भी तब जब बिजली कम्पनी की लाईट सिरे से नदारत है- घंटे भर भी आ जाये तो बहुत. फिर जनरेटर या इन्वर्टर से एक मध्यमवर्गीय परिवार में पंखा भी चल जाये तो जन्नत माना जाता हौ. यूँ भी महानगर के घोर प्रदुषण में कौन भला चाहेगा कि नेचुरल रोशनी और हवा में रहा जाये. होना तो यूँ चाहिये कि ऑक्सीजन मास्क है कि नहीं, वह पता किया जाना चाहिये. पता तो यह  करना चाहिये कि घर पूरी तरह से सील बंद है कि नहीं ताकि बाहर का प्रदुषण घर में न घुसे.
शायद विडिओ बनाया जा रहा है, पेश किया जायेगा मगर साथ ही साथ रईस के घर में यह तैयारी भी चल रही है कि अगला कदम क्या होगा? जल्दबाजी में भले और कुछ न सोच पायें तो भी कम से कम समय खरीदने के लिए इतना तो कह ही सकते हैं कि हम यह चाहते हैं कि आप बरातियों का स्वागत पान पराग से करें, क्या आपके पास इसका बजट और इन्तजाम है, कृपया सबूत भेजें.
यही हाल देश से कर्जा ले भागे देश के दामाद भूपू सांसद दारुकिंग का है. रुपया बोलता है तो सुना था मगर रुपया पोण्ड में भी बोलता है, यह अब जाना. रईस रुपये में हो, पोण्ड में हो या डॉलर में, रईस तो रईस ही होता है और उसके चोचले हर जगह एक से होते हैं.
नागरिक हमारा, कर्जा खाया वो हमारा, सारा जीवन जिस देश में गुजारा वो हमारा और अब जब जेल जाने का समय आया तो फैसला तुम्हारा? तुम हमसे पूछ रहे हो कि उसे कहाँ रखोगे? क्या खिलाओगे? कैसे स्वागत करोगे?
हर बात में झूठ बोलने के आदी हम, इस केस में क्यूँ सच्ची तस्वीर और विडिओ लेकर उस विदेशी कोर्ट में घिघिया रहे हैं. हजार फोटोशॉप करके देश को गुमराह करने वाले आज एक फोटोशॉप ऐसी नहीं कर पा रहे हैं कि वो विदेशी कोर्ट गुमराह हो कर ही सही, हमारे अपराधी को जो हमारे देश का नागरिक है, उसे हमें हमारी न्यायिक प्रक्रिया से गुजारने के हमें सौंप दें. अरे, भेज दो ताज होटल की तस्वीर और बता तो उसे आर्थर रोड़ जेल. चुनाव जीतने के लिए ऐसी हरकत कर सकते हो मगर अपराधी को लाने के लिए नहीं?
जरुर कुछ न कुछ तो बात है कि आज हम फोटोशॉप न कर वही तस्वीर भेज रहे हैं जो सही के हालात हैं. डिजिटल और स्मार्ट इंडिया की यह कैसी तस्वीर कि एक विदेशी कोर्ट आपको आपका नागरिक सौंपने को तैयार नहीं डिजिटल इंडिया में ले जाने के लिए?
एक बार हिम्मत दिखा कर कहो तो कि घर मेरा, नाच भी मेरा है, तुम कौन हो कहने वाले कि आंगन टेढ़ा है?
मगर अगर हम यह हिम्मत दिखायेंगे तो कहीं कुछ राज ऐसे न खुल जायें कि हिम्मत का दिवाला निकल जाये!! एन्टीगुआ ने तो बता ही दिया कि कैसे भारत से उन्हें क्लीयरेन्स दिया गया ऐसी ही दूसरे कर्जा खाकर भागे नागरिक के लिए जो अब एन्टीगुआ का नागरिक बन गया है.
ऐसे में यही मुफीद है कि भूल जाओ वो हमारा नागरिक है फिलहाल तो उनका मेहमान है जो अब वापस नहीं आने वाला. ये वही वाला काला धन है जिसे सब जानते हैं कि देश का है मगर विदेश में हैं और लाख दावों के बावजूद भी वापस नहीं आने वाला. वापस से खैर भारत में आ बसे गैर नागरिक भी नहीं जाने वाले. दिखावे के लिए दो पाँच हजार घुसपैठिये इधर उधर कर भी देंगे तो भी चुनाव के लिए एक मस्त मुद्दा तो मिल ही गया है.
अगले चुनाव में वापसी के लिए वापसी ही मुख्य मुद्दा बन कर रह जायेगा – चाहे काला धन की हो, काले धनधारी की हो या घुसपैठियों की हो.
-समीर लाल ’समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे में रविवार अगस्त ५, २०१८ के अंक में:
http://epaper.subahsavere.news/c/30913506

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मंगलवार, जुलाई 31, 2018

चाय की गरमागरम चुस्की के नाम


भारत में जब रहा करते थे तब अक्सर पंखे के ऊपर और रोशनदान आदि में लगभग हर ही जगह चिड़िया का घोसला देख पाना एक आम सी बात थी. अक्सर घोसले से उड़ कर घास और तिनके जमीन पर, बाल्टी में और कभी किसी बरतन में गिरे देख पाना भी एकदम सामान्य सी घटना होती थी.
उस रोज एक मित्र के कार्यालय पहुँचा तो एकाएक उनकी टेबल पर एक कप में गरम पानी पर वैसे ही तिनके और घास फूस गिरे दिखे. अनायास ही नजर छत की तरफ उठ गई. न पंखा और न ही घोसला. सुन्दर सी साफ सुथरी छत. पूरे कमरे में एयर कन्डिशन और काँच की दीवारें. समझ नहीं आया कि फिर ये तिनके कप में कैसे गिरे? जब तक मैं कुछ सोचता और पूछता, तब तक मित्र ने कप उठाया और उसमें से एक घूँट पी लिया जैसे की चाय हो. मैं एकाएक बोल उठा कि भई, देख तो ले पीने से पहले? कचरा गिरा है उसमें.
वो कहने लगा कि अरे, ये कचरा नहीं है, हर्बस हैं और यह है हर्बल टी. हमारे जमाने में तो बस एक ही चाय होती थी वो काली वाली. चाय की पत्ती को पानी, दूध और शक्कर में मिला कर खौला कर बनाई जाती थी. उसी का जो वेरीयेशन कर लो. कोई मसाले वाली बना लेता था तो कोई अदरक वाली. एक खास वर्ग के नफासत वाले लोग चाय, दूध और शक्कर अलग अलग परोस कर खुद अपने हिसाब से मिलाया करते थे. कितने चम्मच शक्कर डालें, वो सिर्फ इसी वर्ग में पूछने का रिवाज़ था. फिर एक वर्ग ऐसा आया जो ब्लैक टी पीने लगा. न दूध न शक्कर. समाज में अपने आपको कुछ अलग सा दिखाने की होड़ वाला वर्ग जैसे आजकल लिव ईन रिलेशन वाले. अलग टाईप के कि हम थोड़ा बोल्ड हैं. कुछ डाक्टर के मारे, डायब्टीज़ वाले बेचारे उसी काली चाय में नींबू डालकर ऐसे पीते थे जैसे कि दवाई हो.
फिर एकाएक न जाने किस खुराफाती को यह सूझा होगा कि चाय की पत्ती को प्रोसेसिंग करके सुखाने में कहीं इसके गुण उड़ तो नहीं जाते तो उसने हरी पत्ती ही उबाल कर पीकर देखा होगा. स्वाद न भी आया हो तो कड़वा तो नहीं लगा अतः हल्ला मचा ग्रीन टी ..ग्रीन टी..सब भागे ..हां हां..ग्रीन टी. हेल्दी टी. हेल्दी के नाम पर आजकल लोग बाँस का ज्यूस पी ले रहे हैं. लौकी का ज्यूस भी एक समय में हर घर में तबीयत से पिया ही गया. फिर बंद हो गया. अब फैशन से बाहर है.
हालत ये हो गये कि ठेले से लेकर मेले तक हर कोई ग्रीन टी पीने लगा. अब अलग कैसे दिखें? यह ग्रीन टी तो सब पी रहे हैं. तो घाँस, फूस, पत्ती, फूल, डंठल जो भी यह समझ आया कि जहरीला और कड़वा नहीं है, अपने अपने नाम की हर्बल टी के नाम से अपनी जगह बना कर बाजार में छाने लगे. ऐसा नहीं कि असली काली वाली चाय अब बिकती नहीं, मगर एक बड़ा वर्ग इन हर्बल चायों की तरफ चल पड़ा है.
बदलाव का जमाना है. नये नये प्रयोग होते हैं. खिचड़ी भी फाईव स्टार में जिस नाम और विवरण के साथ बिकती है कि लगता है न जाने कौन सा अदभुत व्यंजन परोसा जाने वाला है और जब प्लेट आती है तो पता चलता है कि खिचड़ी है. चाय की बढ़ती किस्मों और उसको पसंद करने वालों की तादाद देखकर मुझे आने वाले समय से चाय के बाजार से बहुत उम्मीदें है. अभी ही हजारों किस्मों की मंहगी मंहगी चाय बिक रही हैं.
हो सकता है कल को बाजार में लोग कुछ अलग सा हो जाने के चक्कर में मेनु में पायें बर्ड नेस्ट टी - चिड़िया के घोसले के तिनकों से बनाई हुई चाय. एसार्टेड स्ट्रा बीक पिक्ड बाई बर्ड फॉर यू याने कि चिड़िया द्वारा चुने हुए घोसले के तिनके अपनी चोंच से खास तौर पर आपके लिए. इस चाय में चींटियों द्वारा पर्सनली दाने दाने ढ़ोकर लाई गई चीनी का इस्तेमाल हुआ है.
अब जब ऐसी चाय होगी तो बिकेगी कितनी मँहगी. क्या पता कितने लोग अफोर्ड कर पायें इसे. मुश्किल से कुछ गिने चुने और यही वजह बनेगी इसके फेमस और हेल्दी होने की.
गरीब की थाली में खिचड़ी किसी तरह पेट भरने का जरिया होती है और रईस की थाली में वही खिचड़ी हेल्दी फूड कहलाता है, यह बात बाजार समझता है.
बस डर इतना सा है कि चाय के बढ़ते बाजार का कोई हिस्सा हमारा कोई नेता न संभाल ले वरना बहुत संभव है कि सबसे मंहगी चाय होगी- नो लीफ नेचुरल टी. बिना पत्ती की प्राकृतिक चाय और चाय के नाम पर आप पी रहे होंगे नगर निगम के नल से निकला सूर्य देव का आशीर्वाद प्राप्त गरमा गरम पानी.
-समीर लाल ’समीर’


www.gyanvigyansarita.in के अगस्त अंक में प्रकाशित पेज १४ और १५ पर

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सोमवार, जुलाई 30, 2018

मजे काटना हमारे डीएनए में है


पड़ोसी से संबंध अच्छे नहीं हैं, कहना भी संबंधों की लाज रखने जैसी ही बात है. दरअसल संबंध इतने खराब हैं कि दोनों ही ऐसा कोई मौका नहीं छोड़ते, जब वो दूसरे को जान माल का नुकसान पहुँचा सकें. पड़ोसी के घर शादी की खबर सुन कर फिर भी आदतन बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना की तर्ज पर नाचना शुरु हो जाता है. मालूम है कि न तो शादी में आपको बुलाया जायेगा और न ही शादी के बाद आपसे कोई संबंध अच्छे बना लिये जायेंगे. मगर फिर भी मात्र इस बात के कारण हुई शांति को कि शादी निर्विघ्न संपन्न हो जाये और उसके बाद लड़की की विदाई और अगुवाई में कोई बाधा न पड़े, अच्छे संबंधों की तरफ उनके बढ़ते कदम मान लेने की गल्ती हर दफा करते नजर आते हैं और फिर लड़ाई पर उतर आते हैं. पकवान न सही, उसकी महक से ही तर हो लेते हैं.मजा आता है.  
मजे काटना हमारे डीएनए में है. मजे हम पान की दुकानों पर काटते हैं, मीडिया की डीबेट में काटते हैं. संसद में भाषण देते हुए काटते हैं. चुनाव लड़ने में काटते हैं. चुनाव जीत कर काटते हैं. चुनाव हार कर काटते हैं.
आश्चर्य तब होता है जब लोग मजे काटने में इतना लिप्त हो जाते हैं कि उन्हें किसी की जान बचाने की परवाह से बढ़कर उसके मरने का विडिओ बनाना ज्यादा जरुरी लगता है. दिल्ली के चिड़ियाघर में जब एक बालक शेर के पिंजरे में गिर गया था तो तमाम लोगों ने हर एंगल से १५ मिनट का तब तक उसका विडिओ बनाया, जब तक की शेर ने उसे मार नहीं दिया. कोइ भी बंदा रस्सी लटकाते, कुछ बचाने का इन्तजाम करते नजर नहीं आया. फिर मजे काटने के लिए दिन भर उसे जगह जगह फॉरवर्ड करते रहे. ऐसी ही न जाने कितनी घटनायें रोज हो रही हैं. लोग मजे ले रहे हैं.
एक भीड़ बंदों को पीट पीट जान से मार डाल रही है और तो दूसरी एक भीड़ उसका विडिओ बना कर मजे काटने का जुगाड़ बना रही है मगर वो भीड़ न जाने कहाँ गुम है, जो उस बंदे को बचाये. फिर सब इसे मॉब लिंचिंग का नाम दे देते हैं और नेता ऐसे करने वालों पर आगे से कड़ी कार्यवाही का उदघोष कर फिर अगली घटना के इन्तजार में लग जाते हैं. मीडिया सर पीट पीट कर डीबेट करा कर अलग मजे लूटती है.
मजे लूटते लूटते अब हमारी संवेदना भी लुप्त होती जा रही हैं. किसी को कोई फर्क नहीं पड़ रहा है, जब तक बात खुद पर न आ जाये. हम भी किसी के खींचे हुए विडिओ को फॉरवर्ड करने में व्यस्त हैं.
जिन बातों से हमें कुछ लेना देना नहीं, बल्कि नुकसान ही होना है, उसमें भी हम मजे लेने लगते हैं. चुनाव पाकिस्तान के, खुश हम हो रहे हैं कि वो हमारे प्रधान मंत्री जी की तारीफ कर रहा है. मीडिया डीबेट सजाये बैठा टीआरपी लूट रहा है. पाकिस्तान के चुनाव का एनालिसिस पाकिस्तान से ज्यादा हमारे यहाँ हो रहा है. ७१ सालों में न जाने कितने चुनाव हो गये, कभी उनसे न तो संबंध सुधरे और न ही दोनों तरफ से कोई कठोर कदम उठाये जाते हैं इस दिशा में. दोनों के लिए मुफीद है संबंधों का खराब रहना. दोनों को ही चुनाव जिताने में काम आता है आपसी संबंधों के सुधार का जुमला. कड़े कदम उठाने की बात इतनी कड़ी है कि कदम उठते ही नहीं कभी.
यह वैसा ही है जैसे कि गरीबी हटायेंगे, बेरोजगारी मिटायेंगे आदि. गरीबी हटा देंगे तो अगले चुनाव में वोट कहाँ से लायेंगे? बेरोजगारी मिटा दें तो अगले चुनाव में रैलियों में भीड़ कहाँ से जुटायेंगे? पड़ोसी मुल्क से संबंध सुधार हो जाये तो फिर देश के अन्य मसलों से जनता का समय समय पर ध्यान भटकाने के लिए बमों की फोड़ा फाड़ी का कार्यक्रम कहाँ संपन्न करायें?
उधर भी नये प्रधान आ गये हैं. उनकी जुमलेबाजी भी जारी है. भारत एक कदम बढ़ाये तो हम दूसरा बढ़ायेंगे.
अब इसका अर्थ क्या है और कौन से कदम को पहला मानेंगे? किस तरह से मानेंगे? यह मजा लूटने का मुद्दा है. खूब डीबेट चल रही है. सोशल मीडिया पर भक्त इसे साहब से प्रभावित होकर दिया गया बयान बता रहे हैं और कह रहे हैं कि अब पड़ोसी मुल्क से संबंध सुधर कर ही रहेंगे और जो कोई उनकी इस बात का विरोध कर रहा है कि संबंध नहीं सुधर सकते, उसे पाकिस्तान चले जाने की सलाह दे जा रहे हैं.
अजब विरोधाभास है. मजा काटने के चक्कर में हम कर क्या रहे हैं, कह क्या रहे हैं, यही नहीं पता.
-समीर लाल ’समीर’
भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे में रविवार जुलाई २९,२०१८ के अंक में:



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