शनिवार, अक्तूबर 19, 2019

सत्य की नहीं, जुमलों की चलती है बाजारवाद में



बाजार जाता हूँ तो देख कर लगता है कि जमाना बहुत बदल गया है. साधारण सी स्वभाविक बातें भी बतानी पड़ती है. कल जब दही खरीदने लगा तो उसके डिब्बे पर लिखा था कि यह पोष्टिक दही घास खाने वाली गाय के दूध का है. मैं समझ नहीं पाया कि इसमें बताने जैसा क्या है? गाय तो घास ही खाती है. मगर इतना लिख देने मात्र से वो दही सबसे तेजी से बिक रहा था. बाकी के दही के डिब्बे जैसे सजे थे वैसे ही सजे थे. किसी को तो क्या कहें, हमने खुद भी वही खरीदा जबकि बाकी दहियों से मंहगा भी था.
ऐसे ही एक दिन बिकते देखा फ्रेश ब्रेड’. अब भला बाजार में बाकी के ब्राण्ड क्या बासी ब्रेड बेच रहे हैं? और फिर यह जानने के लिए उस पर एक्सपायरी डेट भी तो लिखी होती है. फ्रेश ब्रेड भी तो एक्सपायरी के बाद बासी ही हो जायेगी मगर पन्नी पर तो फिर भी फ्रेश ब्रेड ही लिखा रहेगा.
ऐसा ही युग है बाजारवाद का यह. लोगों की मानसिकता पर प्रहार करके उन्हें अपने जाल में फंसा कर अपना उल्लु सीधा करने का युग. अण्डा है तो पाश्चर रैज्ड एग याने कि जिन मुर्गियों का यह अण्डा है वो पिंजरे की शकिस्ति में न पलकर खुले में घास पर बड़ी जगह में टहल टहल कर खाकर अंडा देती है. अब अंडा तो अंडा है, पिंजरे में दो तो या खुले में दो तो. मगर बाजार उन्हें ज्यादा ताकतवर और स्वादिष्ट बता कर बेच ले रहा है.
अब निंबू को पेड़ से हाथ से तोड़कर या टूट कर गिरा हुआ निंबू उठाकर आपने उसके ताजा रस को मिलाकर मेरे कपड़े धोने का साबुन बनाया, उससे क्या फरक पड़ेगा? निंबू का रस तो वो ही है मगर बताने का तरीका ऐसा कि लगा फेक्टरी वाले सिर्फ मेरे लिए कांटों के बीच अपना हाथ जख्मी करते हुए निंबू तोड़कर उसका ताजा रस निचोड़े हैं मेरे कपड़े धोने का साबुन बनाने के लिए. तो बेचारे कुछ रुपया ज्यादा मांग रहे हैं तो बनती है उनकी. वरना इतना ख्याल तो बीबी भी नहीं रखती. शिकंजी मांगो तो बोतल वाले निंबू के रस से फटाफट बनाकर टिका देती है. कौन जहमत उठाये निंबू निचोड़ने की. वही निचोड़ कर के तो फेक्टरी वालों ने बोतल में पैक करके दिया है.
हर बार बेवकूफ बनते हैं मगर बाजार उस्ताद है. बार बार बेवकूफ बना देता है. बचपन में ६ हफ्ते में गोरा बनाने का वादा करके हमको फेयर एण्ड लवली क्रीम बेच दी थी. ६ हफ्ते में रंग २० का १९.९ भी न हुआ तो उम्मीद त्याग दी और कसम खाई कि भगवान को अगर यही रंग मंजूर है तो यही सही. अब कभी इस पर पैसा नहीं खर्च करेंगे. साल भर बाद फिर यह कह कर कि अबकी बार पहले से ज्यादा मुलायम और पहले से ज्यादा असरदार, एक बार फिर मन ललचवा दिया. हम फिर ६ हफ्ते घिसते रहे और वही ढाक के तीन पात.
फिर तो जीवन भर बाजार तरह तरह के नुस्खे हमें बेचता रहा हर बार नया प्रलोभन देकर. कभी इसमें आंवला है तो कभी हल्दी. नुस्खे बदलते रहे, बैंक का बेलेन्स बदलता रहा मगर जिस रंग को बदलने की कवायद थी वो कभी न बदला. सब काम नकली, प्रभु का काम असली. अब जाकर समझ आया है.
हालिया हालात देखकर तो लगा कि अगली बार नोबल पुरुस्कार देते समय नोबल वालों को बताना पड़ेगा कि ये असली वाला नोबल है जो असली अर्थशास्त्री को दिया जा रहा है वरना तो ये सब मिलकर नोबल की धज्ज उतार ही चुके हैं इस बार. यही हालत रहे तो इनके चलते किसी दिन नोबल भारतियों को मिलना ही न बंद हो जाये.
इनके पास भी नुस्खे हैं हर पांच साल में खुद को बेच लेने के तो फिर क्यूँ न मन की करें? क्यूँ निंदा सुनें, क्यूँ सुधरें? बाजार का भरपूर ज्ञान है. कभी विनाश को टाइपो बता कर विकास कर देंगे और कभी देशभक्ति का अर्थ ही हिन्दुत्व रख देंगे. जनता का क्या है उसे तो बाजार सदा से ही बेवकूफ बनाता आ रहा है तो सत्ता के बाजार ने भी बेवकूफ बना दिया तो इसमें नया क्या है?
अच्छा हुआ कबीर समय पर निकल लिए वरना यह कहने पर तो निकाल ही दिये जाते:

निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय,

बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय!!’

 

जब अच्छे खासे अंतरराष्ट्रीय के अर्थशास्त्री जिनका लोहा विश्व मान रहा है, नोबल से नवाज़ रहा है, वो नहीं बर्दाश्त सिर्फ इसलिए कि उन्होंने इनकी नितियों की निंदा कर दी, सही राय दे दी, तो खैर कवि की तो क्या बिसात!!

बाजारवाद में सत्यता कोई नहीं परखता, जुमलों की चलती है.

-समीर लाल समीर


भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे में रविवार अक्टूबर २०, २०१९ में:


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शनिवार, अक्तूबर 12, 2019

हर साल नकली रावण को नकली राम ही मारते आ रहे



बचपन में वह बदमाश बच्चा था. जब बड़ा हुआ तो गुंडा हो गया. और बड़ा हुआ तो बाहुबली बना. फिर जैसा कि होता है, वह विधायक बना और फिर मंत्री भी. नाम था भगवान दास.
रुतबे और कारनामों की धमक ऐसी कि पुलिस भी काँप उठे. कम ही होते हैं जो इस कहावत को धता बता दें कि पुलिस से बड़ा कौन गुंडा. भगवान दास उन्हीं कम में से एक थे. लोग बताते थे पुलिस भी गैरकानूनी मसले सुलझाने के लिए उन्हीं की शरण लेती थी.
धता बताने को तो वो खैर इस मान्यता की भी धज्जियाँ उठा डालते हैं कि यथा नामे तथा गुणे’. मगर उसमें उनकी गल्ति नहीं कहूँगा वो तो आज कल का प्रचलन है जो नाम दो होवे उसका उल्टा. चाहे वो फिर विकासहो या स्वदेशी’.
भगवास दास के क्षेत्र में दौलत राम, नाम में यहाँ भी वही झोल है, नामक एक अत्यन्त निर्धन एवं दलित व्यक्ति रहता था. दौलत राम भगवान दास के अहाते की साफ सफाई और चाय पान लाने का काम कर दिया करता था और बदले में कुछ धन पा जाता था जीवन यापन करने को. भगवान दास उसे दौलत के बदले दो लात पुकारता और हो हो करके हँसता. गरीब की किस्मत, उसके हो हो के साथ साथ दौलत राम भी मुस्करा कर रह जाता. 
पुनः गरीब की किस्मत कि भगवान दास ने दौलात राम की पत्नी को देख लिया. ठीक ठाक नाक नक्श और भगवान दास को अपने रुतबे का नशा. नशे में ठीक ठाक कुछ ज्यादा ही मन भावन लग जाता है. अतः उठवा लिया. भगवान दास प्रचलन के अनुरुप नाम के विपरीत रावण हो गये. दौलत राम नाम में भर राम लिये बैठे रहे. न तो रावण का कुछ बिगाड़ पाये और न पत्नी को बलात्कार का शिकार होने से बचा पाये.
दौलत राम और उसकी पत्नी बाद में पुलिस से लेकर हर तरफ गुहार लगाते रहे. एक दिन थाने जाते समय उनके रिक्शे को किसी ट्रक ने टक्कर मार दी और दौलत राम की ईहलीला समाप्त हुई. उसके बाद उसकी पत्नी कहाँ गई, किसी को पता ही न चला. किसी ने कहा कि धरती फट गई और उसमें समा गई और किसी ने कहा कि आसमान लील गया. अखबार से लेकर टीवी तक सब इस हो हल्ले के बाद पुनः भगवान दास की अर्चना में जुट गये. भगवान दास मंत्री के साथ साथ आतंक का पर्याय बन गये. मंत्री हैं इसलिए आतंक है या आतंक है इसलिये मंत्री है, यह कहना जरा कठिन कार्य है.
इधर दशहरा आया. भगवान दास ने नई बुलेट प्रुफ कार खरीदी. फैशनानुरुप उसका पूजन किया गया. नींबू मिर्च की झालर टांगी. फिर नये प्रचलन के हिसाब से अपने आंगन के पिछले कमरे में अपने शस्त्रागार में एक लाईसेंसी बन्दूक, बाकी बिना लाईसेंस की तीन माऊजर, कई देशी कट्टे, सैकड़ों पैट्रोल बम और सुअर मार बम, गोलियाँ के बक्से, तलवार, बका आदि के बेहिसाब असले का शस्त्र पूजन किया. अब इस तरह की शस्त्र पूजा खुल कर तो कर नहीं सकते थे अतः हड़बड़ी में पूजन करते करते दीपक हाथ से छूट गिर पड़ा. बम दनादन छूटने लगे. भगवान दास उसी में फंस कर अपने चिथड़े उड़वा बैठे. ठीक उसी वक्त रामलीला मैदान पर रावण का पुतना धूँ धूँ कर जल उठा.
असली नकली दोनों रावण मारे गये. शहर भर में भगवान दास के मरने की खबर बिजली की तरह फैल गई.
लोग आपस मे फुसफुसाये कि भगवान के घर देर है मगर अँधेर नहीं. इस वक्त वे असली भगवान के घर की बात कर रहे थे. इस तरह से बात स्पष्ट करते रहना आज के युग की जरुरत हो गई है.
लोगों की आस्था कलयुग के एक अदृश्य राम में बहुत अरसे के बाद पुनः जाग उठी. वरना तो नकली रावण को नकली राम हर साल मारते ही आ रहे हैं.
-समीर लाल समीर 
भोपाल के दैनिक सुबह सवेरे के रविवार अक्टूबर १२, २०१९ के अंक में प्रकाशित
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रविवार, अक्तूबर 06, 2019

अन्तरराष्ट्रीय स्तर के होने की योग्यता


बहुत सूक्ष्म अध्ययन एवं शोध के बाद लेखक इस निष्कर्ष पर पहुँचा है कि यदि आपके नाम के अन्त में आ की मात्रा लगाने के बाद भी नाम आप ही का बोध कराये तो आप अन्तरराष्ट्रीय स्तर के हो सकते हैं.

जैसे उदाहरण के तौर पर लेखक का नाम समीर है. यदि आपको समीर नाम सुनाई या दिखाई पड़े तो आपकी नजरों के आगे मेरी तस्वीर उभरती है, शायद कविता पढ़ते हुए या आपकी रचनाओं पर दाद देते हुए मगर जैसे ही मेरे नाम के अंत में आ की मात्रा लगा दी जाती है याने समीरा तो आपकी आँखों के आगे फिल्मों वाली समीरा रेड्डी की तस्वीर उभर आती है बीच पर गीत गुनगुनाते. समीर और समीरा- एकदम दो विपरीत ध्रुव. अतः समीर नाम अन्तरराष्ट्रीय स्तर का होने की पात्रता नहीं रखता.

अब दूसरा उदाहरण लें. नरेन्द्र- सुनते ही आँखो के सामने ५६ इंच का सीना तन गया न और कान में गूँजा- मितरों......!!! अब अगर आप इस नाम के अन्त में आ की मात्रा लगा दें याने कि नरेन्द्रा – तब भी आँख के आगे वही ५६ इंच की सीना और कान में..मितरों..!!!!! याने की इनमें अन्तरराष्ट्रीय हो जाने की योग्यता है और हो ही रहे हैं. राष्ट्र में तो होते ही कब हैं? अधिकतर अन्तर्राष्ट्र में ही बने रहते हैं. मित्र भी अन्तरराष्ट्रीय- जैसे बराक!! वरना तो किस की हिम्मत कि ओबामा साहब को बराक पुकारे. इसके लिए तो ५६ इंच के सीने के साथ साथ अन्तरराष्ट्रीय होना भी जरुरी है. अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर जहाँ जाते हैं वहीं नाम का डंका बज रहा होता है.

इनसे जब अरविन्द, राहुल टक्कर लेते हैं तो ये क्यूँ नहीं सोचते कि उनके नाम में अन्तरराष्ट्रीय होने की योग्यता नहीं है तो वो क्या होंगे. बेवजह टकराते हैं. अरविन्दा और राहुला- न जाने कोई होगा भी या नहीं कहीं पर इस नाम का तो तस्वीर क्या खाक उभरेगी भला?

एकदम ताजा ताजा- योग और योगा. योग कहो तो बाबा रामदेव गुलाटी खाते नजर आयें और कान में आवाज गूँजे- करत की विद्या है. करने से होता है- करो करो. और आ की मात्रा लगा कर योगा कह दो तो भी बाबा राम देव ही नजर आयें गुलाटी लगाते और कान में वही- करत की विद्या है. करने से होता है- करो करो.

और फिर ये तो संपूर्ण योग्यता वाले हैं- योग और योगा, राम और रामा और देव और देवा. ’समरथ को नहीं दोष गोसाईं’

अब तो मान जाओ इनका लोहा.

मितरों!! चलो करो- योग (योगा) का जोर है. करो करो- करने से होता है.

-समीर लाल ’समीर’



भोपाल के दैनिक सुबह सवेरे के रविवार अक्टूबर ५, २०१९ के अंक में प्रकाशित

http://epaper.subahsavere.news/c/44391570



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शनिवार, सितंबर 07, 2019

अच्छी नींद लेना मौलिक अधिकारों में से एक है



आजकल मौलिक अधिकारों पर लगातार चर्चा हो रही है. किसी गलत बात को भी सही ठहरा देना और उसे राष्ट्रहित में बताना भी एक वर्ग विशेष के लिए आजकल मौलिक अधिकार की श्रेणी में आ गया है. मौलिक अधिकारों से छेड़छाड़ कतई बर्दाश्त नहीं की जायेगी. अगर आप उनके मौलिक अधिकार में दखल देंगे तो आप देशद्रोही करार कर दिए जायेंगे,
एक जमाने में सुप्रीम कोर्ट ने बताया था कि अच्छी नींद लेना मौलिक अधिकारों में से एक है. यही खबर थी जो उस दिन सभी चैनलों के ट्रिकर पर चल रही थी. तुरंत ही इन्टरनेट पर आग की तरह फैल गई थी. देख-सुन कर लगा था कि मानो हनुमान जी को समुन्दर की किनारे खड़ा करके याद दिलाया जा रहा हो कि तुम उड़ सकते हो. उड़ो मित्र, उड़ो.
बहुत अच्छा किया जो आज सुप्रीम कोर्ट ने बतला दिया वरना हम तो अपने और बहुत से अधिकारों की तरह इसे भी भुला बैठे थे. अच्छी नींद- यह क्या होता है? हम जानते ही नहीं थे. हमें तो अब यह भी भूल जाना होता है कि महंगाई आई है या मंदी है क्यूंकि उस वर्ग विशेष के लिए यह सही राह तक पहुँचने के लिए वो पगडंडी है जिसे पर पहले से ही बबूलके कांटे कोई बिछा गया था.
गरमी की उमस भरी रात- और रात भर बिजली गुम और पास के बजबजाते नाले में जन्में नुकीले डंक वाले मच्छरों का आतंकी हमला वो भी डेंगू जैसे परमाणु बम के साथ. ओह!! मेरे मूल अधिकार पर हमला. केस दर्ज करना ही पड़ेगा. ऐसे कैसे भला एक मच्छर मेरे मूल अधिकारों का हनन कर सकता है. कैसे बिजली विभाग इसका हनन कर सकता है. गरमी की इतनी जुर्रत कि सुप्रीम कोर्ट से प्राप्त मेरे मूल अधिकार पर हमला करे.
भुगतेंगे यह सब राष्ट्रद्रोही. रिपोर्ट लिखाये बिना तो मैं मानूँगा नहीं. जेल की चक्की पीसेंगे यह तीनों, तब अक्ल ठिकाने आयेगी. पचास बार सोचेंगी इनकी पुश्तें भी मेरी नींद खराब करने के पहले.
वैसे मूल अधिकार तो और भी कई सारे लगते हैं जैसे खुल कर अपने विचार रखना (चाहे फेसबुक पर ही क्यूँ न हो), बिना भय के घूमना, शांति से रहना, स्वच्छ हवा में सांस लेना, शुद्ध खाद्य सामग्री प्राप्त करना, अपनी योग्यता के आधार पर मेरिट से नौकरी प्राप्त करना, बिना गड्ढे वाली सड़कें, अपने द्वारा ही चुने नेता से प्रश्न करना आदि मगर ये सब अभी पेंडिंग भी रख दूँ तो भी अच्छी नींद लेने को तो सुपर मान्यता मिल गई है. इसके लिए तो अब मैं जाग गया हूँ. सोच लेना कि मेरी नींद डिस्टर्ब हुई तो मैं जागा हूँ. फट से शिकायत दर्ज करुँगा. जेल भिजवाये बिना मानूँगा नहीं. पता नहीं पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराना मेरा मूल अधिकार है कि नहीं? खैर, वो तो मैं चैक कर लूँगा वरना ले देकर तो दर्ज तो हो ही जायेगी रिपोर्ट.

अब मैं सबकी लिस्ट बना रहा हूँ- सबकी शिकायत लगाऊँगा.

नगर निगम सुबह ५ से ५:३० बजे तक बस पानी देते हो, मेरी नींद खराब करते हो. संभल जाओ, बक्शने वाला नहीं हूँ अब मैं तुम्हें.
और आयकर और जी एस टी वालों- कितना टेंशन देते हो यार. जरा सा कमाया नहीं कि बस तुम सपने में आकर नींद तोड़ देते हो. तुमसे तो मैं बहुत समय से नाराज हूँ- तुम तो बचोगे नहीं अब. बस, अब गिनती के दिन बचे हैं तुम्हारे. तुम तो भला क्या आओगे अब- मैं ही आ जाता हूँ.
और हाँ, तुम- बहुत बड़े स्कूल के प्रिंसपल बनते हो. मेरे बच्चे के एडमीशन को अटका दिया मेरा टेस्ट लेकर. मेरी बेईज्जती करवाई मेरी ही बीबी, बच्चों की नजर में- कितनी रात करवट बदलते गुजरी. नोट हैं मेरे पास सारी तारीखें. अब जागो तुम-जेल में. बस, तैयारी में जुट जाओ जेल जाने की.
बाकी लोग भी संभल जाओ- बहुतेरे हैं मेरी नजर की रडार पर. एक वो नालायक चौकीदार- जिसे मैने ही रखा है कि इत्मिनान से सो पाऊँ. वो रात भर सीटी बजा बजा कर चिल्लाता घुमता है- जागते रहो, जागते रहो. अरे, अगर हमें जागते ही रहना होता तो क्या मुझे पागल कुत्ता काटे है जो तुम्हें पगार दे रहा हूँ. तुम कोई धर्म गुरु तो हो नहीं कि बेवजह तुमको चढ़ावा चढ़ायें और अपने मूल अधिकार वाले अधिकार प्राप्त कर प्रसन्न हो लें. चौकीदार हो चौकीदार की तरह रहो- यह अधिकार मूल अधिकारों से उपर सिर्फ धर्म गुरुओं को प्राप्त है.
आज कुछ संविधान की पुस्तकें निकालता हूँ. सारे मूल अधिकारों की लिस्ट बनाता हूँ. फिर देखो कैसी बारह बजाता हूँ सब की.
अब मैं पूरी तरह से जाग गया हूँ इत्मिनान से सोने के लिए.
-समीर लाल ’समीर’

भोपाल के दैनिक सुबह सवेरे में रविवार सितम्बर ८, २०१९ में प्रकाशित:
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चित्र साभार: गुगल Indli - Hindi News, Blogs, Links