बुधवार, फ़रवरी 22, 2017

गधों का गधा संसार

इधर भी गधे हैं, उधर भी गधे हैं
जिधर देखता हूं, गधे ही गधे हैं

गधे हँस रहे, आदमी रो रहा है
हिन्दोस्तां में ये क्या हो रहा है

जो खेतों में दीखे वो फसली गधा है
जो माइक पे चीखे वो असली गधा है

इन पंक्तियों के रचयिता ओम प्रकाश आदित्य तो अब रहे नहीं..मगर कविता कालजयी है..


आज की उत्तर प्रदेश में हुई चुनावी बयानबाजी ने इन पंक्तियों की याद ताजा की जब उसमें गधो का जिक्र आया..गधों के बीच भी जब तक गधों का जिक्र न आये तब तक गधा गधा नहीं होता..इन्सान सा नजर आता है..

बताते चलें कि यह गधों का स्वभाव नहीं...इन्सानों का स्वभाव है.

गधों की भी कई नस्लें होती हैं..उनमें से एक नस्ल होती है जिसे जुमेराती कहते हैं...मात्र इस नस्ल को लेकर भगवान और खुदा दोनों एकमत हुए होंगे शायद कभी..और तब दोनों ने मिल कर सिर्फ इस नस्ल को यह वरदान दिया होगा कि वो शोहरत और बेईज्जती के बीच के अंतर को न समझ पायें..जूते और फूल माला सब उनके लिए एक समान हों....

अतः ये वाली सारी नस्ल अपनी मोटी चमड़ी और मोटी बुद्धि के साथ संसद के दोनों सदनों और विधानसभाओं से लेकर अनेकों स्थानों पर विराजमान है..इन्हें इन्सानों से अलग पहचान देने हेतु नेता पुकारा गया है..दिखने में इन्सान सा दिखने का वरदान भी मिल कर ही दिया है भगवान और खुदा ने..इसके बाद भगवान और खुदा फिर कभी न मिले..ऐसा शास्त्र बताते हैं..एक दूसरे को अलविदा कह गये...अतः बाकी के सारे गधे धोबी के साथ साथ घाट घाट घूम रहे हैं...और इन्सान तो हर घट का पानी पिये अपने जुमेराती गधा हो पाने के मातम में डूबा ही है..

बस आज आगह करने को मन किया कि अगर ईश्वर कभी आपको गधा बनाये तो प्रार्थना करना...जुमेराती बनाये..इत्ती च्वाईस तो मिलती ही है जब पुनर्जन्म होता है...पुनर्जन्म में तो हर मजहब भरोसा धरता है..अतः इस वयक्तव्य में सेक्यूलरवाद की महक न आयेगी किसी को.. मगर लोगों को पता नहीं होता...अतः वो बस मायूस हो कर कह देते हैं कि अब गधा बना ही रहे हो तो कोई सा भी बना दो..

याद रखना इस मायूसी का अंजाम...फिर वही धोबी मिलता है...घाट घाट घुमाने को..संसद के सपने न देखना..

इस हेतु यह लिखा कि जान जाओ :)


-समीर लाल ’समीर’
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रविवार, फ़रवरी 19, 2017

जोगी रा सा रा रा रा

आज के जमाने के ७ वीं कक्षा के बच्चे की कॉपी में होली पर निबंध पढ़ने का मौका लगा.

कुछ अंश:

होली के दिन स्कूल की छुट्टी होती है. इस दिन हम मम्मी, पापा और उनके खूब सारे दोस्तों के साथ मिल कर पिकनिक पर जाते है. सब एक दूसरे से गले मिलते हैं और हैप्पी होली बोलते हैं. बच्चे दिन भर खूब खेलते हैं. पापा मम्मी और उनके दोस्त बीयर पीते है. केटरर खूब सारा खाना बनता है. डी जे वाला गाना बजाता है. सब लोग नाचते हैं. देर शाम को सब थक कर घर वापस आ कर सो जाते हैं...

ऐसा होली का बदला स्वरुप देखकर लगता है आने वाले दस पंन्द्रह सालों में गुजिया, सलोनी, टेसू के रंग, पिचकारी, अबीर गुलाल, काली स्याही, सिल्वर कलर आदि तो होली के नाम का साथ पूरी तरह से छोड़ देंगे. गुजिया, सलोनी की जगह बरफी, काजू कतली ने ले ली, भांग की जगह बीयर, रम, व्हिस्की ने ले ली और घर में पकते पकवानों की जगह केटरर की केटरिंग ने ले ली और जोगी रा सा रा रा के बदले डीजे गाना बजाने लगा और मोहल्ले सड़को पर नाचते गाते घूमते रंगों में सारोबार टोलियों की जगह पिकनिक और पिकनिक पर डीजे की धुन पर थिरकते लोगों ने ले ली है.

अब ये सब फिल्मों और टीवी के लिए बनते फिल्मी कार्यक्रमों में होली में दिख जाता है और एक एलिट वर्ग उसे ही घर में बैठ कर टीवी पर देखकर होली मना लेता है.

जोगिया को गुम हुए तो यूं भी एक अरसा बीता. यदा कदा व्यंग्य वाणों के तौर पर इसका इस्तेमाल होते दिख जाता है बस्स!!

उसी को याद करते जोगिया सी कुछ व्यंग्यात्मक कोशिश:

बाथरुम में झाँक के बोले अपनी ये सरकार
रेनकोट में नल के नीचे, बैठे हैं  सरदार
जोगी रा सा रा रा रा, जोगी रा सा रा रा रा

खोद रहे थे चला कुदाली, इत्ता बड़ा पहाड़
निकली चुहिया नाच के बोले, पकड़ा गई मक्कार.....
जोगी रा सा रा रा रा, जोगी रा सा रा रा रा

वेलेन्टाईन की शाम को उनको, चढ़ा प्रेम खुमार
रात गुजारी साथ साथ में, सुबह हुई तकरार..
जोगी रा सा रा रा रा, जोगी रा सा रा रा रा

दूध पिये भगवन की मूरत, भूखे मरते लोग
क्या अंधों का देश है, या अंधे भक्तो का लोक...
जोगी रा सा रा रा रा, जोगी रा सा रा रा रा

सच को झूठ बताने वाले, जीत रहे हैं जंग
सीएनएन को रोज झिड़कते, राष्ट्रपति जी ट्रम्प..
जोगी रा सा रा रा रा, जोगी रा सा रा रा रा

-समीर लाल ’समीर’

#जुगलबन्दी  #Jugalbandi
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बुधवार, फ़रवरी 15, 2017

मुख्य मंत्री का मुख

तामिलनाडू एक ऐसा राज्य है, जहाँ चुनाव नहीं हुए मगर मुख्यमंत्री स्वर्गवासी हो गईं इस हेतु मुख्यमंत्री पद संकट काल से गुजर रहा है.. राज्यपाल लाइम लाईट में हैं..सब दावेदार उनसे मिल जुल रहे हैं और वो अपना फैसला सुरक्षित रखे हैं. ऐसे कम ही मौके होते है जब लोग राज्यपाल निवास की तरफ टकटकी लगायें बैठे हों अतः जितना खींच सके की तर्ज पर खीचन का माहौल बना हुआ है.
टकटकी लगाये बैठी मुख्यमंत्री की मुख्य दावेदार एकाएक यात्रा पर निकल गईं जेल की...वो भी चार साल के लिए और उनकी दावेदारी अब दस वर्षों के लिए स्थगित रहेगी न्यायालीन फैसले के चलते. मगर दस साल का क्या है? सत्ता की चाह ऐसी शै है कि दशक मिनटों में गुजर जाते हैं? और उम्र भी कोई खास नहीं..६१ बरस..राजनीति में तो यह उम्र अभी सीख रहा हूँ...मेरा साथ दीजिये भाईयों बहनों वाली होती है...जब यात्रा से वापस आकर सन्यास पूर्ण करेंगी, ७१ वर्षीय युवा नेत्री के हाथ फिर प्रदेश की कमान होगी. ये मैं नहीं कह रहा...मेरी राजनीतिक विषयों पर विशेषज्ञ कलम कह रही है...हम तो बस निमित्त मात्र हैं...
अम्मा का स्वर्गवास विचलित करने वाला निकला...खास कर उत्तर भारतियों के लिए...उनके आशीर्वाद प्राप्त नव मुख्यमंत्री के नाम का उच्चारण करना अभी सीख ही रहे थे कि शशीकला के जेल जाने से उछले एक नये नाम को सीखने की जुगत में लगे हैं. अब दर रोज नये नये नाम बोलना सीखें कि उत्तर भारत में हो रहे चुनाव की सोचें.
सोचने की बात से एक सोच उभरी कि मृत्यु से बड़ा पाप विनाशक कोई भी नहीं. गंगा में नहा कर भी पापी पापॊ कहला सकता है मगर जीते जी भले ही जनता यान्यायालय आदि आपको पापी, दुष्ट, अपराधी घोषित कर दें किन्तु मृत्यु के भुजपाश में जाते ही आप स्वर्गवासी हो जाते हैं. आज तक नरकवासी होते किसी को नहीं सुना...एकदम खाली खाली सी..सूनसान जगह होगी..
दक्षिण से दिमाग हटे तो चार और राज्य ऐसे हैं जहाँ माहौल गरम है. मगर वहाँ मुख्यमंत्री पद का सवाल अभी उलझा नहीं है अतः राज्यपाल अभी लाइम लाईट में नहीं हैं.
अधिकतर जनता वोट डाल चुकी है या डाल रही है...जाने कौन सत्तासीन होगा और जाने कौन मुख्य मंत्री मगर नूरा कुश्ति के नतीजे के लिए इन्तजार लगा है और अनुमानों का बाजार गर्म है.
अनुमान का क्या है वो तो हम भारतवासियों का शगल है..और अनुमान भी ताल ठोक कर लगाते हैं कि बॉस, गलत निकल जाये तो आधी मूँछ मुड़ा कर शहर घूमा देना.
पनवाड़ी की दुकान पर चर्चा चल रही है कि हमसे पूछो हम बताते हैं..नोट करो.. पंजाब में झाडू आ रही है...गोवा में झाडू आई ही समझो ..थोड़ा ऊँच नीच हुई तो कांग्रेस है ही...बाहर से टेका लगा देगी तो भी चल जायेगा....उत्तराखण्ड तो सब जानते ही हैं कि क्या होना है..(ये स्टेटमेन्ट इसलिए कि कोई नहीं जानता है) ..और फिर यूपी..उसके लिए क्या कहें...
अब बताओ..इसमें पंजाब छोड़ क्या नोट करें?
चैलेन्जर सामने से बोल रहा है कि ये जो यूपी में कमल है भैय्या...कीचड़ मे खिलता है..सोच लेव!! साईकिल से जाकर हाथ से तोड़ोगे तो साईकिल भी और पंजा भी, दोनों कीचड़ में सन जायेगा...खुद से टूटा तो वहीं कीचड़ में गिर कर रह जायेगा...एक्के तरीका है कि हाथी जाये..और अपनी सूँड़ से तोड़कर लाये तो ही सुरक्षित आ सकता है...हाथी का कीचड़ में सना पाँव तो यूँ भी वेदों में पवित्र और दिव्य माना गया है...
चैलेन्जर ने दर्शन शास्त्र की बुद्धिजीवी टाईप बात कर दी है...पान की दुकान से भीड़ छट चुकी है...
सड़क पर हर तरफ पान की पीक के निशान नजर आ रहे हैं...

-समीर लाल ’समीर’
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मंगलवार, फ़रवरी 14, 2017

पुतनी वोट डालने नहीं जायेगी, बस्स!!

पिछले साल वेलेन्टाईन डे पर सब को कुछ न कुछ अपनी बीबी, प्रेमिका के लिए खरीदता और खिलाता देख कर मुन्ना ने यह तय किया था कि चलो, इस बार तो अम्मा की तबीयत पर खर्चा लगा है मगर अगली बार तुमको पक्का वो गुलाबी वाला मंहगा सलवार सूट दिलवायेंगे. अम्मा भी चला चली की बेला में हैं तब तक न रुक पायेंगी तो तुम पर कोई रोक टोक भी न होगी. एक चश्मा भी खरीद देंगे. खूब सलवार सूट पहन कर और चश्मा लगा कर सेल्फी खींचना.पुतनी भी मुन्ना की बात सुन कर बहुत खुश हो गई थी.
अम्मा स्वास्थय में ऊँच नीच लगाये छः माह पूर्व समय रहते निकल गई. कुछ दिन कमी खली मगर जीना तो है ही यही सोच कर पुतनी वेलेन्टाईन डे का इन्तजार करने लगी. अक्सर सोचती तो चेहरे पर गुलाबी रंग उतर आता. उसके गांव में तो ऐसे त्यौहार का पता भी नहीं था शादी से पहले उसे. शहर का यही तो अन्तर होता.
मगर होनी को कौन टाल सकता है? इस बार मुन्ना की ऐन वेलेन्टाईन डे से पहले चुनाव की ड्यूटी लग गई. मुन्ना बोल कर गया है कि कोई बात नहीं, अगले साल दिला देंगे और साथ में वो घूमने वाले रेस्टॉरेन्ट में खाना भी खिलवायेंगे. बिना मौके के ये सब भला कब होता है एक आम निम्न वर्गीय परिवार में.
पुतनी उदास भी है और सरकार से गुस्सा भी कि ये भी कोई समय है क्या चुनाव कराने का?
पुतनी इस बार गुस्से में वोट डालने नहीं जायेगी, बस्स!!
किसी को अच्छा लगे या बुरा...किसी ने उसके अच्छा बुरा लगने की भी कहाँ सोची भला?

-समीर लाल ’समीर’
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