शनिवार, जुलाई 21, 2018

चीयर्स का मर्म अब तक कोई नहीं जान पाया है


बचपन में हमारे शहर में मेला लगा करता था और उसमें नौटंकी, नाच, दंगल आदि हुआ करते थे. दंगल में दारा सिंह, चंदगी राम जैसे बड़े बड़े नाम आते थे और लड़ा करते थे. असल मुकाबला होता था. बहुत भीड़ लगा करती थी. तब असली घी का जमाना था, हर चीज असली हुआ करती थी. पता ही नहीं चला कि कब असली घी से बदल कर बातें वनस्पति घी पर चली गईं और फिर सफोला और ओलिव ऑयल का जमाना चला आया. सब कुछ फटाफट बदलता चला गया और हम देखते रह गये.
फिर भारत में टीवी आ गया. असली दंगल नूरा कुश्ती में बदल गये. सब तय तमाम तरीके से दंगल अब स्टेजड टीवी पर देखने लगे. ड्ब्लूडब्लूएफ पर नकली पहलवानी में लोग असली दंगल से ज्यादा रोमांच पाने लगे और भूल गये कि हम अब भ्रम की दुनिया के वासी हो गये हैं. अब हम ब्रेड पर भी मख्खन की जगह ओलिव ऑयल लगाने लगे हैं और एकच्यूल से वर्चयूल में बेटर नज़र आने लगे हैं.
हालांकि टीवी जब आया था तो मात्र ३ घंटे को कृषि दर्शन, गीत माला, समाचार आदि लेकर आया था. मगर किसी भी लत को लगाने के लिए यही तरीका तो होता है. पहले पहल दोस्त एक कश ही लगवाते हैं चरस का. फिर चरसी आप खुद हो लेते हैं. फिर सुबह से शाम तक खुद ही नशे में डूबे रहते हैं. उस तीन घंटे की टीवी नें सड़को से, खेल के मैदानों से, असल दुनिया से अलग कर आज हजारों चैनलों के २४X७ के जाल में फंसा दिया है. उसी के एक्सटेशन में इन्टरनेट चरस से आगे ड्रग्स का इन्जेक्शन बन कर ऐसा चिपक गया है कि आँखे खुलना भी बंद हो गई हैं. अब तो बच्चों से भी बातें इन्टरनेट पर चैट से हो जाये तो ठीक वरना तो कोई और तरीका बर नजर नहीं आता.
सपने में दिखा कि वक्त आ रहा है जब धर परिवार में शाम को एक बार दिन भर का बुलेटिन एलेक्सा या सीरी जैसी कोई एप १ मिनट में समराईज़ करके सुना देगी और आपको पता चल जायेगा कि कौन बीमार पड़ा, किसे क्या खुशी मिली, कौन मर गया और कौन कितना दुखी है और कौन आपको कितना प्यार करता है. जब से मिलना जुलना कम हुआ है, आई लव यू वाले ईमोटिकॉन कुछ ज्यादा बिकने लगे हैं. अगले रोज आप भी एप पर ही ऑल द बेस्ट भेजते नजर आयेंगे.  
आजकल मन भी जल्दी ऊब जाता है लोगों का हर बात से, शायद यही फटाफट हो रहे परिवर्तन की वजह हो. कोई थम कर एन्जॉय करना ही नहीं चाहता अपनी उपलब्धियों को. कल जिसकी चाह थी, उसके आज मिलते ही अगली चाहत पंख पसार कर उड़ान भरने लगती है. लोगों का मन ड्ब्लूड्ब्लूएफ से भी भरना ही था तो अब ये न्यूज चैनल उस गैप को भुनाने मे लगे हैं.
रोज शाम डीबेट के नाम पर नूरा कुश्ती का आयोजन कराते हैं. हम समझते है कि देखो वो कितना बहस कर रहे हैं हमारे लिए. वो देखो वो हार गया उस मुद्दे पर. वो देखो वो जीत गया. वो भारी पड़ गया. वो उठ कर चला गया मगर दरअसल बात टीआरपी की है. जीतता चैनल है. हारता दर्शक याने जनता और मुद्दा है. और पैनल पर आये बहसकर्ता और बहस कराने वाला टीवी का वो एंकर बहस के बाद प्रेस कल्ब में जाम टकराते जश्न मनाते हैं कि अहा!! क्या बेवकूफ बनाया!! मस्त टीआरपी मिली.
आजकल तो इन टीवी बहसों में उत्तेजना को इतना बढ़ा देते हैं कि विभिन्न दलों के प्रवक्ता मारापीटी पर उतर आते हैं. कौन जाने वो ड्ब्लूड्ब्लूएफ वाली स्टेज्ड मार कुटाई है या ६० और ७० के दशक वाली दारा सिंह की असली कुश्ती?
सुना है आजकल तो प्रेस कल्ब में ये सब जब बहस के बाद जाम टकराते हैं तो इस बात पर बहस कर रहे होते हैं कि कल टीवी पर किस बात पर बहस करना है? विषय तय होते होते सब टुन्न हो लेते हैं इसलिए अगले रोज बहस में आश्चर्यचकित नज़र आते हैं खुद के तय किये मुद्दे पर भी.
इस बदलती दुनिया की स्पीड देखकर मुझे उम्मीद है कि कल को ये डीबेट भी अपना स्वरुप बदल लेंगी. पार्टियाँ प्रवक्ताओं की जगह पहलवानों को भेजा करेंगी. टीवी स्टुडियो में कुर्सी और गोल टेबल के बदले फाईटिंग रिंग हुआ करेगा. प्रवक्ता रुपी पहलवान एकदूसरे को पटक पटक कर मारेंगे. टीवी एंकर एम्पायर होगा जो पहले से विजेता तय करके बैठा होगा. वो पिटने वाले को इसलिए विजेता घोषित करेगा कि वो कितनी जबरदस्त तरीके से पिटा. पीटने वाला इसी में खुश कि पीट दिया. जनता तो खैर हाथ मलने को बाध्य है ही सो वो भी हाथ मलेगी और फिर सब भूल भुला कर ताली पीटने लगेगी.
चुनाव और टीवी की डीबेट में इतना तो कॉमन है ही कि बेवकूफ जनता बनती है और बकिया शो और चुनाव पूरा होते ही साथ में जाम खड़काते हैं और एक दूसरे के गले लग जाते है, चीयर्स बोलते हुए.
चीयर्स का मर्म अब तक कोई नहीं जान पाया है.
-समीर लाल ’समीर’
भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे में रविवार २२ जुलाई, २०१८ में प्रकाशित:



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शनिवार, जुलाई 14, 2018

कि अफवाहें झूठ को सत्य दिखाने का फेंसीड्रेस


तिवारी जी सुबह सुबह पान के ठेले पर अपनी ज्ञान की दुकान सजा कर बैठे थे. कह रहे थे कि बहुत सी चीजें ऐसी होती हैं जिनमें पंख नहीं होते मगर उड़ती हैं.  जैसे की पतंग. पंख नहीं हैं मगर उड़ती है. चूंकि पंख नहीं है अतः स्वतः नहीं उड़ती एवं किसी को उड़ना पड़ता है. पतंग उड़ाने वाला न हो तो वो कभी उड़े ही न..
एक बार हमने अच्छी ऊँची पतंग तानी थी और एकाएक फोन आ गया तो बात करने लगे सद्दी को खंबा में बांध के. फिर १५ मिनट बाद देखा तो भी उड़ रही थी...तब कैसे उड़ी? घंसू पूछ रहे हैं.
अरे, एक ऊँचाई तक उड़ने के बाद पंख वाले हों या बिना पंख वाले, सब ये गुमान पाल लेते हैं कि वो अपने आप उड़ते हैं. हवा उड़ाती है उनको. बिना हवा के कितने भी ऊँचे उड़ रहे होते तो भी धम्म से जमीन पर गिरते..किसी सहारे के बिना उड़ पाना संभव नहीं है..तिवारी जी ने बताया और आगे समझाते हुए कहा...अगर पतंग कट भी जाये न तो भी बड़ी देर तक यह अहसास बना रहता है कि उड़ रही है. बहुत ऊँचा उड़ जाने के बाद वहाँ से उतरना भी उड़ने का अहसास देता है बड़ी देर तक भ्रमित करते हुए.
तिवारी जी समझाने पर आ जायें तो बिना पूरा समझाये मानते ही नहीं. अतः आगे समझाते हुए बोले कि इसी तरह से अफवाहें होती हैं. पंख होते नहीं मगर उड़ती हैं. अफवाह सदैव झूठी होती है. सच हो तो खबर कहलाती है. अफवाह जब बहुत ऊँचा उड़ लेती है तो सच का अहसास कराती है. लोग उसे खबर मान लेते हैं. उस ऊँचाई पर उसे लोगों की ऊँचाई में आस्था का सहारा मिलता है, जो अक्सर मीडिया प्रदान कर देता है.
मीडिया को झूठ को सच करार कर देने में महारथ हासिल है. मीडिया ऊँचाई पर चलती वो हवा है जिसे हम आमजन जमीन पर पहचान नहीं पाते और उसकी संगति प्राप्त को सत्य मानते चलते हैं.
यह वही मीडिया है जो उड़ी हुई अफवाह को उड़ाते उड़ाते सच का ताज़ पहना देती है और जब एक वक्त के बाद वो अफवाह सद्दी से काट दी जाती है तो ये ही मीडिया कुछ देर तक तो कोशिश करती है कि वो झूठ सच दिखता रहे फिर अपनी हार देख ..अपनी दूरदर्शिता का परिचय देते हो..खुद ही उस अफवाह की दुर्गति को गति दे मिट्टी में मिला देती है...
तिवारी जी आगे बोले..अभी हाल में एक अफवाह उड़ी...मुझे उम्मीद थी कि जल्द उतर आयेगी पर किसी ने बताया कि यह ऐसे न उतरने वाली..यह खानदानी अफवाह है. पुश्तें लगती हैं उतरने में.
खानदानी अफवाह? यह तो कभी सुना नहीं..घंसू पूछ रहे हैं.
तिवारी जी ने पान थूका  और समझाना शुरु किया.
अफवाहों के प्रकार होते हैं- खानदानी, आवारा और नाजायज़.
आवारा अफवाह कुछ देर उड़ती है, कुछ नुकसान पहुँचाती है और खो जाती है. नाजायज़ भी बहुत थोड़ा सा उड़ती है..कोई ध्यान नहीं देता और खो जाती है..
बच रही खानदानी अफवाह जो गुंजार करती हैं ..रुको कि हम उड़ रहे हैं अभी. इसमें दम दिखता है मगर होता नहीं, क्यूँकि अफवाह झूठ होती है, खबर नहीं. मगर खानदान का नाम इसे जिन्दा रखता है. इसके सच होने का अहसास कराता है...मगर मात्र एक सीमा तक. सद्दी के सहारे तनी पतंग को कटना ही होता है..आज नहीं तो कल. कभी कभी कोई इसे काटता भी नहीं तो भी हवा जो इसे उड़ाने की जिम्मेदार थी, उसकी गति ही इसे काट देती है और कभी उसका आभाव!! याने खेल मीडिया रुपी हवा के हाथ का ही है.
प्रभाव और आभाव के बदले एक सी स्थिति प्राप्त होने का इससे बेहतर क्या उदाहरण हो सकता है....क्या यही आम आदमी की स्थिति नहीं?
उड़ने के उदाहरणों में अफवाह के चलते नींद का उड़ना भी है..सुना है कि वो तमाम कोशिशों के बाद चुनाव हार रहे हैं..और उस रोज से उनकी जो नींद उड़ी है..क्या कहने. पंख तो नींद के भी नहीं होते मगर उड़ तो रही है. पता नहीं किसका सहारा है? शायद नींद को उड़ने के लिए उस अफवाह का सहारा मिला हो जो खुद ही मीडिया की बैसाखियों के सहारे उड़ रही है.
अफवाहों के बाजार की इससे बेहतर झाँकी और क्या पेश की जाये जो समझा सकें कि अफवाहें झूठ को सत्य दिखाने का फेंसीड्रेस हैं!! कभी कभी तो यह नाटकियता एकदम सत्य नजर आती हैं!!!
-समीर लाल ’समीर’
भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे में रविवार १५ जुलाई, २०१८ में प्रकाशित:


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मंगलवार, जुलाई 10, 2018

देखो!! हम आज के अखबार में छपे हैं.



डेश बोर्ड, रिपोर्ट कार्ड, पॉवर पाईन्ट डेक, स्कोर कार्ड की तरह ही न जाने कितने नाम हैं, जो कारपोरेट वर्ल्ड से निकल कर पॉवरफुल सरकारी दुनिया में राजनिति चमकाने के लिए आ समाये. इनको बनाना, इनको दिखाना, इनके बारे में बताना ही अपने आप में इतना भव्य हो गया कि जिन कामों को दर्शाने के लिए यह सारे आईटम कारपोरेट वर्ल्ड में बनाये जाते हैं, वो यहाँ नगण्य होकर रह गये.
फलाने मंत्रालय का प्रेजेन्टेशन, सरकार का १०० दिन का रिपोर्ट कार्ड, स्मार्ट सिटी परियोजना का डेशबोर्ड, फलाने मंत्री का स्कोर कार्ड तो खूब सुनाई पड़े और दिखे मगर कार्य क्या हुए, विकास का क्या हुआ? वो ही न तो दिखाई दिया और न सुनाई पड़ा. धीरे धीरे इन प्रेजेन्टेशनों की ऐसी धज्जी उड़ी कि विकास और क्या किया दिखाने की बजाये, पिछले ७० सालों में क्या नहीं हुआ, वो दिखाने में ही मगन हो लिए. अब तो स्कोर कार्ड और रिपोर्ट कार्ड के नाम पर पिछली सरकारों की नाकामियों की रिपोर्ट ही आती है. इनसे पूछो कि चलो उन्होंने कुछ नहीं किया मगर तुमने क्या किया वो तो बताओ? इस पर वो कहते हैं कि हमने इतनी रिपोर्टें बना डाली वो ही क्या कम है?
प्रेजेन्टेशन और मार्केटिंग का जमाना है, फिर वो भले दूसरों की नाकामियों का ही क्यूँ न हो? जब खुद से बड़ी रेखा न खींची जा सके तो दूसरे की खिंची हुई रेखा को पोंछ कर छोटा करने के सिवाय और विकल्प भी क्या है, खुद को बड़ा दिखाने के लिए? अब तो हद यहाँ तक हो ली है कि पोंछ कर छोटा करना भी बड़ा दिख पाने के लिए काफी नहीं है क्यूँकि कुछ दिखाने को है ही नहीं, तो पूरा मिटा ही देने की कोशिश है. खुद उनके वरिष्ट कह गये कि कॉपी में कुछ लिखा हो, तब तो नम्बर दूँ.
ऐसा माना जाने लगा है कि अगर कुछ किया भी हो तो भी बिना प्रजेन्टेशन के लिए आजकल नहीं दिख पाता. इस चपेट में हम लेखक वर्ग भी हैं. अखबार में छप भी गये तो संतोष नहीं है. हमें तो लगता है कि कैसे सबको बतायें कि अखबार में छप लिए हैं. फिर अखबार की कटिंग फेसबुक पर, ईमेल से, ट्वीटर पर, व्हाटसएप के सारे ग्रुपों पर, फेसबुक मेसेन्जर से, टेक्स्ट मैसेज से और फिर ब्लॉग पोस्ट से. पढ़ने वाला थक जाये मगर हम बताते बताते नहीं थकते. हमारा बस चले तो उसी अखबार में एक विज्ञापन भी लगवा दें कि देखो, हम फलाने पेज पर छपे हैं. सरकारों का बस चल जाता है तो लगवाती भी हैं विज्ञापन कि देखो, हमने फलाँ जगह यह किया, वो किया.
सोच की चरम देखो कि फेसबुक पर लगाने के बाद भी यह चैन नहीं कि सारे मित्र देख ही लेंगे अतः उनको टैग भी कर डालते हैं और ऊपर से छुईमुई सा मिज़ाज ऐसा कि कोई मित्र मना करे कि हमें टैग मत किया करो, हम यूँ ही देख लेते हैं तुम्हारे पोस्ट, तो उसको ब्लॉक ही कर मारे कि हटो!! हमें नहीं रखनी तुमसे दोस्ती. वही तो होता है वहाँ भी कि वो बोगस विडिओ भेजें और आप उसका ओरिजनल विडिओ लगा कर बता दो कि तुमने बोगस डॉक्टर्ड विडिओ लगाया है. बस!! आप देशद्रोही हैं और पाकिस्तान जा कर बस जाईये के कमेन्ट के साथ आप ब्लॉक!!
वैसे सच बतायें तो अखबार में छ्प जाने से बड़े लेखक हो जाने की फील आ जाती है. जैसे की कोई सांसद सत्ता पक्ष का मंत्री बन गया हो वरना तो होते तो निर्दलीय सांसद भी हैं. हैं भी कि नहीं कोई जान ही नहीं पाता. मगर फिर भी निर्दलीय के सांसद होने और अनछपे के लेखक होने से इंकार तो नहीं ही किया जा सकता है.
फिर सत्ता पक्ष का मंत्री अपना चार छः गाड़ियों का असला लेकर सिक्यूरीटी के साथ लाल बत्ती और सायरन बजाते न चले तो कौन जानेगा कि मंत्री जी जा रहे हैं. शायद यही सोच कर हम भी हर संभव दरवाजे की घंटी बजाते हैं कि लोगों को पता तो चले कि हम अब वरिष्ट लेखक हो गये हैं.
देखो!! हम आज के अखबार में छपे हैं.
-समीर लाल ’समीर’
 जबलपुर के पल पल इंडिया में जुलाई ११, २०१८ को प्रकाशित:

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शनिवार, जुलाई 07, 2018

नुक्कड़ नुक्कड़ रोजगार और गली गली स्वीमिंग पूल


विकसित देश विकसित कहलाता ही इसलिए है कि वहाँ साधन सम्पन्नता होती है. लोगों के पास विविध रोजगार के अवसर होते हैं.बताते हैं विकसित देशों में भी जिस घर में स्वीमिंग पूल होता है, उसका जलवा अलग होता है. उसमें रहने वालों के ठाठ बाट अलग होते हैं. 
चार साल पहले देश में एक फकीर निकला और जुट गया देश के विकास में. वादा जो किया था, वो उसको निभाता चला गया. देश में विकास का करिश्मा ऐसा दिखा कि उस फकीर के शासन के चार साल बाद एक ऐसा देश जहाँ ७० साल से विनाश के सिवाय कुछ भी न हुआ था, वहाँ आज एक ऐसा विकसित राष्ट्र है, जहाँ हर नुक्कड़ पर रोजगार हैं और हर गली गली और मोहल्ला मोहल्ला स्वीमिंग पूल बन गये हैं. हर जगह तैरने की सुविधा और हर तरफ तैराक हैं.
ओलंपिक खेल मिथ्या है. वहाँ के तैराक मानव निर्मित तरणताल में तैर कर एक दूसरे को हराने में और एक दूसरे से जीतने में लगे हैं. कोई स्वर्ण जीत कर खुश है और कोई रजत पाकर भी नाखुश. कोई कास्य चमका रहा है तो कोई अपने न चयनित होने पर गुर्रा रहा है. ओलंपिक भारतीय राजनित का दर्पण है. हर जीतने वाला सोचता है कि उसने जो कर दिखाया वो पिछले कई दशकों में न हुआ.
इस बार गरमी भरपूर पड़ी. जितने लोग गरमी से मरना चाहिये थे, उससे ज्यादा मर गये. यह पिछले ७० सालों की नाकामी का नतीजा है ऐसा बताया गया और अगले चुनाव तक बताया जाता रहेगा. गरमी में टार उखड़ गये, तो जहाँ सड़कें थीं वहाँ भी गढ्ढे बन गये हैं. जहाँ इस वजह से गढ्ढे न बन पाये, वहाँ सप्रयास शोचालयों के नाम से हफ्ते भर में ८ लाख शोचालयों के कीर्तिमान के नाम पर ८ लाख गढ्ढे बना दिये गये.
फिर बारिश भी होने लगी. बारिश में लोग पकोड़े खाते हैं और चूँकि माननीय ने पकोड़े छानने को राष्ट्रीय रोजगार योजना का शिरोमणी घोषित किया हुआ है, तो बेरोजगार हर नुक्कड़ पर पकोड़े की दुकान खोल कर रोजगार प्राप्त करने लगे. याने विकसित देशों की तर्ज पर रोजगार के अवसर गली गली ऊग आये.
बारिश होने लगी तो रुकने का नाम नहीं ले रही. गढ्ढे पानी से भरने लगे, जिन्हें स्वीमिंग पूल के रुप में गरीब जनता को साहब का तोहफा माना जाना चाहिये और उसमें तैर तैर का तैराकी में महारात हासिल करना चाहिये. मजबूरी में सही, देश तैराकों का देश बन जायेगा. फिर ओलम्पिक में भी झंड़ा फहरा ही लेंगे.  
मगर ये क्या? जल्द ही बारिश के चलते बाढ़ आ गई. हाहाकार मचने लगा. पकोड़ा रोजगार नुक्कड़ से बह कर नाली में चला गया और उसी में समा गया. कर्जा चढ़ा सो अलग. अब इसका ठीकरा भी कहीं तो फोड़ना ही है अतः वजह पाई कि देश पिछले ७० साल से नालियों और निस्तार के साधनों में प्लास्टिक भरता रहा है, तो हर तरफ बाढ़ का सा माहौल हो गया है. हमने तो विकास किया है. यह पिछले वालों की ७० साल की मक्कारी है और आप मात्र ४ सालों में कैसे आशा कर सकते हैं कि इसे निपटा दिया जायेगा?
घंसु आज पान के ठेले पर तिवारी जी को बता रहे हैं कि उसने कहीं सुना है कि साहब आजकल चीन से एक ऐसी टेक्नोलॉजी की बात करने बार बार आ जा रहे हैं, जिसे डिजिटल इंडिया के अजेंडा आईटम में भी रखा गया है. इससे २०२२ तक देश में डिजिटल मीटर स्विच से तय किया जायेगा कि कितनी बारिश चाहिये और बाकी की बारिश पड़ोसी राष्ट्रों को बेच दी जायेगी. फिर बाढ़ की समस्या खत्म और बारिश से कमाई अलग से चालू.
घंसु आगे बोले कि सुना तो मैने यह भी है कि उसी में एक स्विच सूरज की हीट कंट्रोल करने के लिए भी लगवा रहे हैं ताकि गरमी की उचित मात्रा भी तय की जा सके मगर उसको बनने में जरा समय लगेगा और बताते है कि वो शायद २०२६ तक तैयार हो जायेगा. राष्ट्र निर्माण में समय लगता है, जब खुद करना होता है तब.
याने बारिश वाली टेक्नोलॉजी से २०१९ का और सूरज वाली टेक्नोलॉजी से २०२४ का चुनाव तो जीत ही लेंगे, तिवारी जी हँसते हुए घंसु से पूछ रहे हैं कि इतनी लम्बी लम्बी कहाँ से फेंकना सीख लिए हो बे तुम?
घंसु मुस्कराते हुए तिवारी जी को बोल रहे हैं कि वो जब मंच से फेंकते हैं तब तो आप उनसे नहीं पूछते. हम तो चलो आपसे मसखरी में फेंक रहे हैं मगर सच बतायें तो चार साल में फेंकने में ही तो देश ने महारत हासिल की है और विकास के नाम पर दिखाने को है ही क्या?
तिवारी जी आज पहली बार घंसु से सहमत दिखे.
-समीर लाल ’समीर’
भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे में रविवार ८ जुलाई, २०१८: 

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