शनिवार, दिसंबर 08, 2018

पहले भी अमृत कहाँ निकला था?



तिवारी जी रिटायरमेन्ट के पहले विभागाध्यक्ष थे एवं उनके विभाग में अनेक कर्मचारी उनके अन्तर्गत काम करते थे. घंसु ने उनसे आज एक मेनेजमेन्ट फंडा पूछा कि यदि आपका कोई कर्मचारी दिन में १८-१८ घंटे कार्य करे. कभी छुट्टी पर न जाये तो आप उसे कैसे पुरुस्कृत करेंगे और क्यूँ?

तिवारी जी ने पान थूका और प्रवचन मोड में आ गये जैसे कि भरे बैठे हों.
’मैं उसको तुरंत नौकरी से निकाल देता’
और अब सुनो क्यूँ?
ये जो फेक्टरियों में, दफ्तरों में, स्कूलों में एक पाली का समय दिन में ८ घंटे (+/- १ घंटे) का तय किया गया है सारी दुनिया में वो बहुत ही वैज्ञानिक अध्ययनों के आधार पर किया गया है. अगर कार्य ज्यादा है तो तीन पाली चला लो और हर पाली में अलग कर्मचारी लाओ.
ऐसा माना जाता है कि ८ घंटे तक मन लगा कर काम कर लेने के बाद आपकी कार्यक्षमता में कमी आने लगती है, यह शरीर और दिमाग की प्राकृतिक प्रक्रिया है. यह ठीक वैसा ही है जैसा ८ घंटे शरीर को आराम देने के लिए सोने की सबसे उत्तम अवधि है.
अब यदि कोई, जैसे टॉप मैनेजमेन्ट आदि यदि ८ घंटे से ज्यादा काम करते हैं तो दरअसल वो अपना सोशलाईजेशन और काम दोनों एक ही समय करते हैं. डॉक्टर को दिखाना, बाल की हजामत बनवाना, दर्जी को कपड़े सिलने के नाप देना, निमंत्रण पर फिल्म देखना, विदेश से आये मित्रों के साथ झूला झूल आना, उनको आरती में चार घंटे टहला लाना, अपने शहर में रोड शो टाईप करके घूमा लाना, भी काम के समय ही कर लेने को, क्यूँकि किसी को जबाब तो देना नहीं है, काम नहीं कहते हैं. एक आम कर्मचारी को इन सबके लिए छुट्टी लेना पड़ती है.
कम्पनी का मालिक अपनी माँ से मिलने जाये या किसी मित्र की बिटिया की शादी में शामिल हो आना और साथ ही उस शहर में एक दो व्यापारियों से कुछ देर मिलकर कुछ नये व्यापार की सोच लेते आना तो इसे घर जाना कहेंगे कि बिजनेस ट्रिप? अब किसी कम्पनी के मालिक अपने दोस्त के साथ खाना खाने जाता है या विदेश घूमने जाता है और साथ ही वो एक दो बिजनेस की डील भी कर आता है या बिजनेस डील करने जाता है और समुन्द्र घूमना या ढोलक बजाना भी साथ ही कर आये तो भी जब निचोड़ निकालोगे तो ८ घंटे ही काम के निकलेंगे या निकलने चाहिये. बाकी तो जो लोग छुट्टी लेकर करने जाते हैं वो तुम फ्री में कम्पनी या देश के खर्च पर कर आये.
तिवारी जी आगे बोले:
मेरी नजर में अगर कोई ८ घंटे से ज्यादा काम कर रहा है या छुट्टी नहीं ले रहा है तो इसके कारण तलाशना चाहिये. वर्क लाईफ बैलंस की चिन्ता न भी हो क्यूँकि परिवार की चिन्ता ही नहीं है, उनको तो कब का छोड़ दिया सिवाय जरुरतवश इस्तेमाल करने के तो भी:
·         क्या उसे अपना काम समझ नहीं आ रहा है जो वो उसे ८ घंटे में खत्म नहीं कर पा रहा है? क्या उसे ट्रेनिंग की जरुरत है या उसे कार्य से मुक्त कर देना चाहिये क्यूँकि वो इस योग्य नहीं है?
·         क्या उसे काम को अपने मातहतों को देना नहीं आता या फिर सब अपने कंट्रोल में रखने के लिए वो देना नहीं चाहता. अपने कंट्रोल में रखने का कारण क्या है?
·         क्या वो कोई ऐसा कार्य कर रहा है जिसके उसके छुट्टी पर जाने से खुलासा हो जाने का खतरा है?
·         क्या वो मित्रों को सामान्य प्रणाली के बाहर जाकर मदद करने के लिए एक्स्ट्रा टाईम में लेखा जोखा बदल रहा है?
·         क्या वो काम के समय को मक्कारी में काट रहा है और फिर एकस्ट्रा टाईम काम में दिखाकर वाह वाही लूटना चाहता है.

यह सब सतर्क होने के अलार्म हैं. जो भी व्यक्ति अपनी निर्धारित समय से ज्यादा दफ्तर में बैठा है और निर्धारित छुट्टी नहीं लेता, उसे फोर्सड छुट्टी पर भेज दिया जाना चाहिये और उस दौरान उसका कार्यभार किसी ऐसे व्यक्ति को दे दिया जाना चाहिये जो इन्डिपेन्डेन्ट हो और इस बात की जाँच होना चाहिये कि आखिर बंदा छुट्टी पर क्यूँ नहीं जाता? कुछ तो वजह रही होगी वरना कोई यूँ ही दीवाना नहीं होता!!
यह भी जान लेना चाहिये कि शराब का लति हो (अल्कोहलिक) या काम का लति हो (वर्कोहलिक), नशे की हालत में कोई भी सही निर्णय ले पाना संभव नहीं है अतः उनको नशा उतर जाने तक न तो गाड़ी चलाना चाहिये और न ही कोई जिम्मेदारीपूर्ण कार्य करना चाहिये. देश चलाना तो बहुत दूर की है.
कोई भी अजर अमर तो होता नहीं. उसके आने के पहले भी काम चल ही रहा था और उसके जाने के बाद भी काम चलता ही रहेगा.
अगर पहले समुन्द्र मंथन होकर अमृत नही निकला था तो वो तो अब भी नहीं निकला तो आखिर १८ घंटे किया क्या और छुट्टी न लेकर कौन सा अमृत निकल आया, यह समझ नहीं आया. १८ घंटे बिना छुट्टी लिए कार्य करने का निष्कर्ष सिर्फ इतना निकला है कि पहले भी अमृत कहाँ निकला था?
रिपोर्ट कार्ड तो यही कहता है.
समीर लाल ’समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार ९ दिसम्बर, २०१८ के अंक में:
 http://epaper.subahsavere.news/c/34707280





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चित्र साभार: गुगल Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, दिसंबर 02, 2018

ठेके पर तलाक और आईनों का सरकारी हो जाना...



आज सड़क के किनारे लगे नए विज्ञापन के बोर्ड को देखकर चौंक गया. फ्लैट १००० डॉलर + जीएसटी में डाइवोर्स और उस पर से विज्ञापन भी एकदम ज़िंदा- बोर्ड जिस तार से गाड़ा गया था वो हवा के थपेड़े न झेल पाया और एक टांग से उखड़ा टेड़ा टंगा था.
सही मायने में देखा जाए तो तलाक भी तो इसी तरह का होता है. परिवार उखड़ जाता है जिंदगी की झंझावातों के थपेड़े खाकर. फिर न वो खुश और न ये खुश . एक तिरछा जीवन मात्र इसलिए कि जब आंधी आई तो दोनों अपने अहम् में खुद को साबित करने में अकेले ही भिड़ पड़े बिना एक दूसरे का हाथ थामें और बिना एक दूजे की साथ की ताकत को समझे. मैं भला क्यूँ हाथ थामूं तुम्हारा? क्या मैं सक्षम नहीं? दिखा ही दूंगा कि मैं अकेला ही काफी हूँ.
पहले लोगों को समाज की नजर की चिंता होती थी तो बड़ी से बड़ी बात हो जाए मगर निभा जाते थे यह सोच कर कि समाज क्या कहेगा? तलाकशुदा व्यक्ति समाज की नज़रों में गिर जाते थे अतः लाख खटपट और असामंजस्य के बावजूद भी संबंध निभा ले जाते थे.
अब समाज की चिंता तो छोड़ो, माँ बाप तक से तो नजर की शर्म बची नहीं है. कॉमन लॉ, सेम सेक्स मैरेज जैसे वक्त में क्या समाज की नजर और क्या माँ बाप की? खुद की नजर की तो परवाह रही नहीं. जाने इनके घरों में आईने हैं भी या नहीं? या आईने होंगे भी तो सिर्फ मेकअप के लिए, असली चेहरा दिखाने को नहीं. आईने भी तो सरकारी हो गए हैं अब ..झूठ बोलना सीख चुके हैं. सेल्फी और आईने की शक्ल एक सी हुई जाती है ..फिल्टर लगा कर जैसी चाहो वैसी तस्वीर देखो!
ऐसे वक्त में अहम की टकराहट में तलाक को रोकने और टालने के लिए मात्र अर्थ (रुपया हो या डॉलर) ही बचा था जिसके डर से नई पीढ़ी इस ओर कदम बढ़ाने से कतराती है. वकीलों की मोटी फीस, वो भी न जाने कब तक भरनी पड़े, जब तक की केस न खत्म हो जाए और फिर भारी भरकम सेटेलमेंट और मेन्टनेन्स का पैसा. इंसान सोचता है कि इससे अच्छा तो बिना तलाक के ही खरी खोटी सुनते सुनाते, लड़ते झगड़ते  ही काट लेते हैं.
आज उस रोक की दीवार को भी जब इस विज्ञापन के माध्यम से आधा गिरते देखा तो लगा की आह! यह रोक भी चल बसी.  कम से कम वकील की फीस की चिंता तो हटी. १००० + जीएसटी. देशी बन्दे हैं हम. इसे इस तरह पढ़ते हैं कि फीस १००० है, नगद दे देंगे. रसीद भी नहीं चाहिये. तब कैसा जीएसटी?
किसी ने कहा की जीएसटी न देना तो नैतिकता के आधार पर धोखा है सरकार के साथ. हमने सिर्फ उसकी आँख से आँख मिलाई और वो सॉरी कह कर चला गया.
जाने क्या समझा होगा नजर मिलाने को इनमें से:
१.     धोखेबाजों से धोखा भी कोई धोखा होता है बुध्धु?
२.     नैतिकता की उम्मीद उससे जो यूं भी नैतिक जिम्मेदारी से मूंह मोड़ने की तैयारी में है?
३.     तुम उस वक्त कहाँ चले जाते हो जब राजनेतिक गठबंधन अपने गठबंधन तोड़ते हैं? उस वक्त जीएसटी का ख्याल आता है क्या तुम्हें?
४.     जीएसटी दे भी दें मगर ऐसे व्यक्ति को जिसका काम ही झूठ को सच साबित करना है? उसे अगर हम जीएसटी दे भी देंगे तो भी वो साबित कर ही देगा कि जीएसटी उसका मेहनताना है.
५.     फिर सरकार लाख सर पटके, अदालत से वो आदेश ले ही आयेगा कि तलाक के केस में वसूले गए जीएसटी पर सरकार का कोई हक नहीं है.
६.     एक रास्ता और है कि जीएसटी का आधा हिस्सा पार्टी फंड में बेनामी जमा करा दो तो कोई पूछताछ न होगी.
खैर, जो भी समझा हो, हमें क्या? चला तो गया.
अब मुझे इंतज़ार है एक ऐसे विज्ञापन का जो ये कहे कि फ्लैट फीस ५००० + जीएसटी. जीरो सेटलमेंट और मेंटेनेंस की गारंटी. जैसे कह रहा हो कि तलाक और ठिकाने लगाने की सुपारी मानो इसे. आज ही संपर्क करें – इमेल: फलाना @ फलाना डॉट कॉम.
वैसे आज कल चल निकला प्री नेपच्युल एग्रीमेंट भी तो इसी दिशा में एक कदम है मानो शादी नहीं हो रही बल्कि पार्टनरशिप में बिजनेस करने जा रहे हों.
ये शादी, तलाक, प्री नेपच्युल को आज न जाने क्यूँ राजनितिक बनते गठबंधंन, टूटते गठबंधंन और मुद्दा आधारित समर्थन से जोड़ कर देखने का मन किया. कोई खास अंतर तो अब बचा नहीं है.
-समीर लाल ‘समीर’

भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे में रविवार दिसम्बर ०२, २०१८

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शनिवार, नवंबर 24, 2018

काश! राजनीतिक जोड़ियाँ भी ईश्वर बना कर भेजता


कहते हैं जोड़ियाँ ऊपर से बन कर आती हैं. मान लेते हैं कि आती होंगी. मगर जोड़ियों के पहले इंसान पधारता है और वो धीरे धीरे इतनी तिकड़म बैठालना सीख गया है कि ईश्वर को तो ठेंगा दिखाये बैठा है और बदमाशी की इंतहा तो देखें कि दिखाता है ठेंगा और कहता है लाईक किया, थम्स अप. ईश्वर भी ठेंगे को लाईक मान कर फेसबुकिया हुए गिन गिन कर मुग्ध होता रहता होगा. खुद ही सोचें कि न ईश्वर बदला और न ही इंसानों को पूंछ लगने लगी तो फिर जोड़ियों के यह स्वरुप कैसे बदल गये कि कोर्ट तय करने लगा कि चलेगा, तुम भी जोड़ी ही हो, रह लो सुरेश और मुकेश साथ में. और तुम रीना और टीना, तुम भी जोड़ी ही कहलाओगी. इतने पर भी चैन न पड़ा तो शादी करके जोड़ी कहलाना भी जरुरी नहीं रहा, ऐसे ही रह लो साथ तो भी जोड़ी.
अब तो हालत ये हो लिए हैं कि चाईना अपना चांद बना रहा है. उधर अमेरीका जुटा है कि हम अपना खुद का आसमान बनायेंगे. पूरा शहर कृत्रिम आसमान से ढक देंगे और उसके भीतर का मौसम जैसा हम चाहें, वैसा. जैसे ही मौसम खराब हो, कृत्रिम आसमान से शहर को ढक दो और बेहतरीन सावन का मौसम लाकर झूला झूलो. वैसे इस बात का ज्यादा प्रचार प्रसार अभी हुआ नहीं है क्यूँकि अभी ऐसा कुछ बना नहीं है. वरना इस बार कम से कम दिल्ली तो यह कृत्रिम आसमान का जुमला ही जितवा दे. प्रदुषण मुक्त शहर कि धुँआ कृत्रिम आसमान में लगे एग्जॉस्ट से बाहर और अंदर सब हरा ही हरा.
खैर, कृत्रिम आसमान का सपना तो अभी नहीं दिखा पायेंगे क्यूँकि फोटो में ही सही, अभी उदाहरण दिखाने के लिए कहीं भी वो है नहीं. तो इस बार भी झूठ का आसमान ही तानेंगे, करना धरना तो कुछ है नहीं. करना होता तो आज रेल्वे ट्रैक पर खाली समय में प्राईवेट ट्रेन चल रही होती. सारे शहर स्मार्ट सूटेड बूटेड हो गये होते. पूरे देश की नहरों पर सोलर पैनल लगे होते, हर वस्तु डिजिटल होती है. हालांकि एक वस्तु तो वाकई स्मार्ट भी हो गई और वो है ईवीएम. 
बात चल रही थी जोड़ियों की और भटक कर कहाँ जा पहुँची? महत्वाकांक्षायें और आशायें इतना बढ़ गई हैं कि ऊपर से बनाई जोड़ी में अगर अटक भी जायें तो उससे निकलने के रास्ते भी इन इन्सानों ने कई बना लिये हैं. जैसे अपने यहाँ कानून बनाते समय उसमें एक लूपहोल जरुर छोड़ देते हैं ताकि सक्षम बच निकलें. उनका बड़ा से बड़ा लोन माफ करके उनको विदेशवास पर भेज दिया जाता है और किसान का छोटा से छोटा लोन उसे फंदे पर लटकने को मजबूर कर इहलोक की यात्रा पर भेज देता है.
आजकल माहौल देख कर तो वाकई ऐसा लगने लगा है कि शादियाँ कम हो रही हैं और तलाक ज्यादा. जिसे देखो वो ही तलाक की राह पर है. समझौता करने को कोई तैयार ही नहीं.
संबंधों के निर्वहन भी जरुरतों और सहूलियत की वजह से हो रहे हैं. शादियाँ और तलाक देखकर लग रहा है कि मानों राजनितिक दलों का गठबंधंन और जरुरत खत्म हो जाने पर या महात्वाकांक्षा पूरी न होने पर संबंध विच्छेद. कॉमन लॉ की तरह बाहरी समर्थन के गठबंधंन. कुल को आगे ले जाने के लिए नहीं मगर अपने लिए किए गये सेमसेक्स विवाह की तरह देश को आगे बढ़ाने की बजाय खुद के सत्ता सुख के लिए गठबंधंन.
कहने को तो यह भी कहते हैं कि नेता बनाये नहीं जाते, पैदा होते हैं. सही है मगर जो नेता पैदा होते हैं और सही की राजनीति में आते हैं वो उस स्व-व्यक्तित्व में अपनी तिकड़म से घूर्तता मिलाते हैं, संवेदनशीलता को मारते हैं और तब जाकर सत्ता सुख पाते हैं.
दोष किसे दें- ईश्वर को या इंसान को, जिसे ईश्वर ने बनाया.
हम तो यह भी नहीं प्रार्थना कर सकते कि काश! राजनीतिक जोड़ियाँ भी ईश्वर बना कर भेजता. ये धूर्त तो उसे बदल कर ईश्वर को ठेंगा दिखा देते हैं और जनता को भ्रमित करते हैं कि हमने ईश्वर के निर्णय को लाईक किया है.
-समीर लाल ’समीर’     

भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे में रविवार नवम्बर २५, २०१८

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शनिवार, नवंबर 17, 2018

काठ की हांडी बार बार नहीं चढ़ती


कल शाम दफ्तर से लौट कर हेयर कटिंग करवाने चला गया. पहले से फोन पर एप से रिजर्वेशन करा लिया था तो तुरंत ही नम्बर आ गया. दिन भर दफ्तर की थकान, फिर लौटते वक्त ट्रेन में भी कुछ ज्यादा भीड़ और उस पर से बरफ भी गिर रही थी तो मोटा भारी जैकेट. जैकेट उतार कर जरा आराम मिला नाई की कुर्सी पर बैठते ही और नींद के झौके ने आ दबोचा.
इस बीच कब वो बाल काटने आई, उसने रिकार्ड से पिछली बार के कटिंग की पर्ची निकाल कर कब पढ़ा कि साईड में १ नम्बर और ऊपर २, वैसे ही काटना है क्या? और कब हमने हमेशा की तरह पूरे भरोसे के साथ मुंडी हिला कर हामी भर दी, पता ही न चला.
वैसे भी अब यहाँ इतने भारतीय हो गये हैं कि ये भी जान गये हैं कि एक सच्चा भारतीय हाँ कहने के लिए मुंडी ऊपर नीचे हिलाने के बदले साईड बाई साईड हिलाता है अन्यथा पहले यह पूछ लिया करते थे कि हाँ बोल रहे हो या ना? 
बाल काटने के बाद जब उसने गरम तौलिया माथे पर रख कर हल्की सी मसाज की तो जैसे पुनः स्फूर्ति लौटी. सामने शीशॆ पर नजर पड़ी तो एकाएक पहचान वाले को देखकर हैलो बोलने ही वाले थे कि समझ आया अरे, यह तो हम ही हैं. मगर हमारे बाल? सफाचट?  सफाचट मतलब कि एकदम छोटे छोटे. मरा हाथी भी तो सवा लाख टाईप.
एकदम से घबरा कर हमने उस लड़की से पूछा कि ये बाल इतने छोटे क्यूँ काट डाले? ये किस बात का बदला निकाल लिया. हमारे खिलाफ तो कोई #मीटू भी नहीं है फिर हमसे यह बर्ताव? इस पर उसने पिछली कटिंग की पर्ची दिखलाई और कहा कि मैने आपको यह पढ़कर सुनाई भी थी और आपने हाँ भी कहा था, तो काट दिये.
हमने कहा कि चलो हाँ तो भले ही नींद में कहा होगा या इतने सालों में आजतक ऐसा धोखा नहीं हुआ इस हेतु अति अविश्वास में कह दिया होगा मगर हमारी तो पिछली बार क्या कभी भी ऐसी हजामत नहीं बनी है जो आपने बना डाली. तो ये नम्बर कहाँ से आये हमारी पर्ची पर?
बड़ी हलचल मची. खोजबीन की गई तो पता चला कि किसी और की पर्ची प्रिंट हो गई थी और हजामत बन गई हमारी. मगर अब क्या हो सकता है? भले ही पर्ची गलत प्रिंट हुई हो मगर हामी तो हमने भी भरी थी. हमारा आलस्य, हमारी नींद, हमारा सजग न रहना, हमारे हाँ और ना के बीच कोई भेद न रहना और भी न जाने क्या क्या वजह हो सकती हैं जिस पर दोष डाला जा सकता है मगर भुगतना तो हमको ही है और वो भी तब तक, जब तक बाल फिर से एक निश्चित समय के बाद स्वतः उग नहीं आते.
थोड़ी देर दुखी होने के बाद तय किया कि मायूसी की चादर उतारी जाये और इसमें भी कुछ खुश होने का कारण खोजा जाये. यूँ भी तकलीफ जब हद से गुजर जाये तो आंसू हंसी में तब्दील हो जाते हैं. बस कुछ ऐसी ही सोच लिए विचार कर मुस्कराये कि अब कम से कम कुछ दिन तक सुबह कंघी करने की झंझट से मुक्ति मिलेगी और उससे भी बड़ी मुक्ति उस ग्लानी से मिलेगी जो कंघी से लिपट कर आये कभी न लौटने वाले बालों को देखकर होती थी कि हाय!! अब के बिछड़े तो शायद फिर कभी ख्वाबों में मिलें. फिर अब ठंक का मौसम आ गया है, टोपी उतारो तो सब बाल बिखरे छितरे, उससे भी छुटकारा मिला..बाल हों तो बिखरें. टोपी भी उदास होगी कि अब किसे छेडूँ? अब कौन मुझ पर #मीटू लगायेगा? कल को हालात ऐसे ही रहे तो लड़के लड़कियों से ऐसी दूरी बनायेंगे कि लड़कियाँ भी सोचेंगी कि अब किस पर #मीटू लगायें. घिघियायेंगी लड़को के सामने कि बात तो करो हमसे..कसम #मीटू की ..कभी जो #मीटू का नाम भी लिया तो.
खैर, तेल, जैल, शेम्पू आदि के पैसे भी तो बचेंगे ही कुछ समय के लिए. मगर बड़ी बात तो यह है कि एक आध साल में वैसे भी समस्त बालों का ओम नमः स्वाहा तो होना ही है तो एकाएक झटका लगने की बजाय ये उसी का एक रिहर्सल मान लेते हैं. सही रिहर्सल रहे तो मंच पर सही में उतरते वक्त कम नरवसनेस रहती है. यह हम कवियों से बेहतर कौन जानता है. 
चलो, हमारी तो जो गत हुई सो हुई, आप अपनी देखो. चुनाव सामने हैं. कुछ सीख ले सको तो ले लो हमारी हालत से. अभी वो आयेंगे आपके पास कि प्रभु!! आपको पिछले चुनाव में हमने यह पर्ची सुनाई थी कि आपका विकास होगा, अच्छे दिन आवेंगे, आपके खाते में १५ लाख हम पहुँचावेंगे, हम आपकी गरीबी मिटावेंगे, आपकी पूजा पाठ के लिए हम राम मंदिर यहीं बनायेंगे आदि आदि. और तुम पिछले पांच साल से भागते दौड़ते हमारी तरह नींद और आलस्य की चादर ओढ़े कहीं बिना सजग हुए मुंड़ी न हिला बैठना वरना इनके जीतते ही जब ये अपने गुरुर और पॉवर की गरमी का असर तुमको ऐसा दिखायेंगे तो स्फूर्ति की बजाय करेंट लगेगा. फिर तुम्हारे हाथ बच रहेगा अगले पाँच साल तक मुंड़ी हिलाते रहना. फिर उसमें से खोजने को खुश होने के साधन भी न बचेंगे क्यूंकि एक ही बहाने से आखिर कितनी बार खुश हो सकते हो.
काठ की हांडी बार बार थोड़े न चढ़ती है.
-समीर लाल ’समीर’

भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे के रविवार नवम्बर १८,२०१८ में:

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