गुरुवार, सितंबर 21, 2017

अपराधबोध से मुक्ति दिलाने ’कानूनी मान्यता’

मंत्री बनने के बाद सामाजिक व्यवस्था एवं उसके प्रभावविषय पर संगोष्ठी में हिस्सा लेने के लिए उन्होंने कनाडा का दौरा किया.
आख्यान सुन कर पता चला कि समाज में कोई अपराध भावना से न ग्रसित हो इस हेतु कुछ बरस पहले सरकार ने राजमार्गों पर स्पीड लिमिट को १०० से बढ़ाकर १२० किमी प्रति घंटा करने का प्रस्ताव रखा. सरकार ने अपने सर्वेक्षण से जाना था कि ९० प्रतिशत लोग १२० पर गाड़ी चलाते हैं और पुलिस भी उस सीमा तक उनको नजर अंदाज कर जुर्माना नहीं लगाती. आम जन के बीच जब यह प्रस्ताव आया तो आमजन ने इसे नहीं स्वीकारा. उनका मानना था कि अगर स्पीड लिमिट बढ़ा कर १२० कर दी गई तो लोग १४० पर गाड़ी चलाने लगेंगे और यह पूरे समाज के लिए घातक सिद्ध होगा. सरकार ने समझा और स्पीड लिमिट यथावत १०० किमी प्रति घंटा जारी रखी.
दूसरे आख्यान में बताया कि लोग पार्क और पब्लिक प्लेस में बीयर पीते हैं जो कि गैर कानूनी है मगर लोग कोक की बोतल, चाय के गिलास आदि में फिर भी पीते ही हैं. पिकनिक मनाने निकले हैं अतः थोड़ा बहुत एन्जॉय करेंगे ही. सरकार ने अहसासा कि लोग आखिर पी रहे ही हैं मगर अपराध भाव से ग्रसित छिप छिपा कर अतः तय हुआ कि एक सीमा रेखा तक इसे कानूनी कर दिया जाये. लोग भी तैयार हो गये और अब तैयारी है पार्कों में सरकारी ट्रक से एक सीमित मात्रा में बीयर खरीद कर पीने को कानूनी मान्यता देने की.
ऐसे ही आख्यान सुनते सुनाते मंत्री जी ज्ञान चक्षु खुल गये. कनाडा आने का हेतु भी यही था.
भारत लौट कर उनके दिमाग में एक नुस्खा घूम रहा था कि एक बहुत बड़ा वर्ग जिसमें नेता से लेकर सरकारी अधिकारी सभी शामिल हैं, उन्हें घूसखोरी और भ्रष्टाचार जैसे अपराधबोध से कैसे मुक्त कराया जाये? भ्रष्टाचार से मुक्ति हो नहीं पा रही तो अपराध बोध से ही मुक्ति का कोई मार्ग खोजा जाये.
विदेश से सीखी सीख विशेष मायने रखती है. कमेटी बना दी गई है कि कैसे घूस शब्द को ही शब्दकोश से अलग कर दान में परिणत किया जाये एवं कार्यों एवं सेवा के आधार पर पाँच परसेन्ट दान सुनिश्चित किया जाये ताकि उतना दान लेना कानूनी रुप से मान्य कहलाये.
देने वाला भी दान दे कर धन्य और पाने वाला तो यूँ भी खुद को भगवान माने बैठा ही था मगर अब इत्मिनान से दान स्वीकार कर अपना आशीष प्रदान करेगा.
-समीर लाल समीर
भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे के शुक्रवार २२ सितम्बर, २०१७ में:


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बुधवार, सितंबर 20, 2017

बुलेट विचार

सुना कि बुलेट ट्रेन आने वाली है अतः इसी घोषणा के साथ बुलेट गति से उपजे विचार बुलेट पाईंट में आपकी खिदमत में पेश किये जा रहे हैं:
  • ·         बुलेट ट्रेन में एक डिब्बा मुंबई लोकल टाईप स्टैंडिंग का भी रहेगा. कुल दो घंटे की तो बात है.
  • ·         बुलेट फिल्म प्रोडक्शन के नाम से एक नई प्रोडक्शन कंपनी बनेगी जो डेढ़ घंटे की फिल्में बनायेगी सिर्फ बुलेट ट्रेन के लिए. देखना है तो यात्रा करो..पधारो म्हारे देश गुजरात में!!
  • ·         अगर गलत बोगी में चढ लिए तो सही बोगी की तलाश न करें..मुंबई आ गया है. अतः जहाँ चढ़ लिए, वहीं के होकर रह जायें.
  • ·         कोई कहेगा कि अहमदाबाद से मुंबई तो २ घंटे में आ गये थे मगर बान्द्रा टर्मिनस से कोलाबा आने में ट्रेफिक में फंसे रहे तो ३ घंटे और लग गये. अतः बान्द्रा टर्मिनस से मुंबई में कहीं जाने के लिए बुलेट टैक्सी का प्रबंध होना चाहिये..इस हेतु टेक्नॉलाजी बैंकाक से ली जा सकती है. साहेब का घुमना भी हो जायेगा और वहाँ के प्रधान का रोड शो भी करवा लेंगे अहमदाबाद मे. भले बुलेट टैक्सी मुंबई में आयेगी..मगर दूसरे सिरे पर तो अहमदाबाद है ही न.. चुनाव भी तो गुजरात में होने हैं.
  • ·         बुलेट टैक्सी की बारे में फिर साहेब कह सकते हैं कि बुलेट से मेरा बहुत पुराना साथ रहा है..मैने पूरे गुजरात के कोने कोने को घूमा हूँ बुलेट पर बैठकर. आज इसे टैक्सी हुआ देख कर मन प्रफुल्लित है कि कितना विकास किया है इस बुलेट ने इतने सालों में. कभी दबंगों की सवारी रही बुलेट आज आमजन की टैक्सी हो गई है. अब इससे बड़ा विकास मॉडल क्या दिखाऊँ?
  • ·         बुलेट ट्रेन में मुंगफली खाने की सख्त मनाही रहेगी. एक आम भारतीय की रेल यात्रा में मुंगफली खाकर समय काटने की आदत होती है और फिर छिलके जमीन पर फैला कर निकल जाता है. बुलेट ट्रेन में हम नहीं चाहते कि हम आपके जाने के बाद कुछ ऐसा महसूस करें छिलके बीनते हुए:

            आये भी वो, गये भी वो..
            बस एक फसाना रह गया..
  • ·         बुलेट ट्रेन के बाथरुम की दीवारों पर मौलिक आलोकिक चित्रकारी, गंधर्व गालिबी शायरी एवं प्रेम के अबुझ इजहार जैसे कि सन्नी लव्स टिंकी...आदि अंकित करना जघन्य अपराध की श्रेणी में आयेंगे और इस हेतु कानून की किताबों में राम रहीम अध्याय जोड़ा जा रहा है..जिसके तहत आपको १०-१० साल की सजा दो दो बार भुगतनी पड़ सकती है..एक बार सोचने के लिए और दूसरी बार दीवार पर गोदने के लिए.

-समीर लाल समीर
ब्लॉग: उड़न तश्तरी http://udantashtari.blogspot.ca/

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शनिवार, सितंबर 16, 2017

बुलेट ट्रेन और ‘है की नहीं’ पर हां में हां

दैनिक निपटान के लिए पटरी के किनारे बैठे घंसु और बिस्सु नित क्रिया कर्म के साथ नित देश की बनती बिगड़ती स्थितियों पर विमर्श भी कर लिया करते हैं. बैठे हैं तो बातचीत भी की जाये की तर्ज पर. यूँ भी देश में अधिकतर निर्णय इसी तर्ज पर लिए जा रहे हैं.
आज घंसु ज्यादा चिन्तित दिखा. पढ़ाई लिखाई का यह फायदा तो होता ही है कि और कहीं कुछ हासिल हो या न हो, चिन्तन में तो आप अपनी धाक जमा ही सकते हैं. घंसु दसवीं पास था और बिस्सु आठवीं फेल.
चिन्तित होने का कारण नई रेल गाड़ी बताई गई. घंसु ने बिस्सु को बताया कि एक ठो नई रेल गाड़ी आने वाली है २०२२ में जो गोली की स्पीड़ से भागेगी..मने की इत्ता तेज कि अगर तुम यहाँ पटरी के किनारे १० फुट के भीतर बैठ कर निपटान कर रहे होगे..तो साथ ही में खींच कर ले जायेगी..निपटान शुरु करोगे अहमदाबाद में..और धुलोगे मुंबई जाकर टाईप.
बिना पढ़े लिखे होने के अलग फायदे हैं. बिस्सु प्रसन्न हो लिये..भईया, इसी बहाने मुंबई घूम लेंगे!! कटरीना को देख आवेंगे..
घंसु बोले..अबे, बचोगे, तब न देखोगे!! खैर पढ़ा लिखा बंदा कम पढ़े लिखे से गंभीर विमर्श इसीलिए करता है कि कम पढ़ा लिखा उसे सही मान कर हामी भरता चलता है..उसकी हर है कि नहीं में हाँ करता है..यही सोच कर शायद मंत्री भी बनाये जाते होंगे कि हर है कि नहीं में हाँ करेंगे..करेंगे क्या..कर ही रहे हैं..वरना १२ वीं पास को शिक्षा मंत्री बनाने की और क्या वजह बताई जा सकती है?
गंभीर विमर्श के नाम पर एक तरफा चिन्तन जारी रहा और हर है कि नहींको हाँ मिलती रही...उसी विमर्श के कुछ बुलेट पाईंट:
-अगर अहमदाबाद से मुंबई दो घंटे में पहुँचने की इत्ती जल्दी है आपको तो हवाई जहाज से काहे नहीं चले जाते, वो तो और जल्दी सस्ते में छोड़ आयेगा..है कि नहीं?
-जित्ते पैसे में नया ट्रैक और रेलगाड़ी बना रहे हो..उत्ते में तो कित्ते सारे हवाई जहाज आ जायेंगे और आकाश में तो वैसे ही कोई ट्रेफिक जाम नहीं लगता है..कम से कम अब तक..बेहतर हो कि उस पैसे से बिना बुलेट वाली जो ट्रेने नित आत्म हत्या करने पर उतारु हैं, उनको मनाया जाये कि देवी, आपके मार्ग को हम प्रशस्त करेंगे.. आपका ट्रैक सुधारेंगे..आप की राह में रेड कार्पेट हम बिछावेंगे ताकि आप की जान को जोखिम न हो और आप पर सवार हमारे देशवासी निश्चिंत होकर भले ही खरामा खरामा मगर अपने निर्धारित गंतव्य तक पहुँच जायें बजाय इसके कि अंतिम गंतव्य तक बिना समय आये ही...है कि नहीं?
-बुलेट ट्रेन तो खैर २०२२ में आयेगी मगर अनाऊन्समेंट तो कान में आज से सुनाई दे रही है गाँधीनगर स्टेशन से..यात्रीगण कृप्या ध्यान दें -अहमदाबाद से मुंबई की ओर जाने वाली बुलेट ट्रेन अपने निर्धारित समय से अनिश्चितकालीन देर से चल रही है..यात्रियों को हुई असुविधा के लिए हमें खेद है..इसका क्या बंदोबस्त किया गया है? इस पर भी विमर्श होना चाहिये..है कि नहीं?
-क्या इस बुलेट रेल के आने के बाद से रेल्वे में आऊटर खत्म हो जायेंगे? अक्सर रेल पहुँच तो समय पर जाती हैं मगर आऊटर में खड़ी इन्तजार करती नजर आती हैं..मानो सरकारी अनुदान की फाईलें बंट जाने को तैयार साहेब की टेबल पर पड़ी उनकी नजरें ईनायत का इन्तजार कर रही हों..ऐसे में क्या बुलेट ट्रेन आऊटर में खड़े रहने से एक्जेम्पट रहेगी..यह बताया जाना चाहिये..है कि नहीं?
-बताया गया कि बुलेट ट्रेन एक मिनट से ज्यादा लेट न होने, जीरो एक्सीडेंट और पर्यावरण संतुलन का जापान में अपना प्रमाण दे चुकी है..क्या इतने बस से हम भारतीयों को आशवस्त हो जाना चाहिये क्यूँकि जापान में तो बिजली न जाने का प्रमाण बिजली कम्पनियाँ और सरकारी वादे पूरा होने का प्रमाण भी सरकारें दे चुकी हैं...है कि नहीं?
-आज जब इस बुलेट ट्रेन की घोषणा की गई तो साहेब ने कहा कि वो एवं जापान के प्रधान मंत्री सन २०२२ में इस रेल का उदघाटन इसमें एक साथ सफर करके करेंगे..इससे विपक्षियों का ईवीएम में सेटिंग होने के आरोप कुछ सही सा ही लगता है वरना २०१९ के चुनाव परिणाम में यही जीतेंगे..वो अभी से कैसे पता? याद है जब युधिष्टर ने भिक्षुक से कहा था कि कल आकर भिक्षा ले जाना. तब भीम नगाड़ा बजाते हुए सबको बताने निकल पड़े थे कि भ्राता श्री ने काल को जीत लिया है..उन्हें मालूम है कि कल वह जिन्दा रहेंगे!! जिन्दा रहना तो दूर..खुद को चुनाव जितवा देने के लिए पूरी तरह आश्वस्त..शिंजो आबे तक की, जिनके यहाँ चुनाव दिसम्बर २०१८ में होना है, सेटिंग करवा दी न जाने कैसे कि २०२२ में भी वही जापान का प्रधान मंत्री होंगे..है कि नहीं?
-इस बीच सुना है कि शिंजो ने साहेब से नार्थ कोरिया जैसे उधमी पड़ोसी पर समाधान मांगा..साहेब ने बताया कि कड़ी निंदा करो..घबरा जायेगा...हमने अपने पड़ोसी को ऐसे ही काबू में रखा है...हर बार नियम से कड़ी निंदा कर देते हैं...और वो घबरा जाता है..है कि नहीं?
अभी तो २०२२ आने में समय है.. बहुत कुछ देखना सुनना बाकी है, विमर्श जारी रहेगा..तब तक शेर शायरी से मन बहलाया जाये:
बुलेट ट्रेन चलाने की बात, कुछ इस तरह से तूने छोड़ी है..
मेरी ये इक उम्र भी तुझको समझ पाने के लिए थोड़ी है...

-समीर लाल समीर
भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे के सितम्बर १७,२०१७ में प्रकाशित
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शनिवार, सितंबर 09, 2017

भीड़ कुत्ता बन भौकती रही और राजहंस मंद मंद मुस्कराता रहा

सन १९७६ के आसपास की है यह बात...अखबार में उनकी एक कहानी छपी जो अंततः उनकी एकमात्र कहानी बन कर रह गई. उनका कहना है कि बहुत चर्चित रही..अतः आपने पढ़ी ही होगी ऐसा मैं मान लेता हूँ..वो राज हंस वाली, जिसमें एक राज हंस होता है और वो तीन बंदर जिनको वो राज हंस चुनावी मंच पर ले आया था और लोगों से कहा कि यह गाँधी जी वाले तीनों बंदर हैं..एक बुरा मत कहो, दूसरा बुरा मत सुनो और तीसरा बुरा मत देखो..वाला...उद्देश्य मात्र इतना था कि आम जनता उसे गाँधी का उपासक मानकर उनके पद चिन्हों पर चलने वाला समझे..और यथा नाम..तथा पद के आधार पर राज हंस सत्ता पर काबिज हो.
हंस पर खादी का लिबास..फिर साथ में तीन बंदर खादी का गमछा कंधे पर लटकाये और गाँधी टोपी पहने...यह अजूबा देख कर जनसभा में कुत्तों की भीड़ एकदम आवारा हो गई और लगी भौंकने..कुतों की तो खैर आदत होती है अजूबा देख कर भौंकना मगर भीड़ का स्वभाव होता है कि भीड़ के साथ अपना विवेक खो भीड़ बन जाना...अतः आमजन भी भीड़ बने साथ में भौंकने लगे..बंदर गाँधी वाले तो थे नहीं कि दूसरा गाल आगे बढ़ाने के लिए बैठे रहते..केले की लालच में चले आये थे..सो आवारा भीड़ के खतरों को भाँपते हुए कूद फांद कर पेडों पर चढ़ कर छलांग लगाते हुए भाग लिए जंगल की तरफ..
बच रहा मंझे हुआ सियासत का खिलाड़ी मंचासीन राज हंस....कुत्ते भौंकते रहे...उनको देखा देखी आम जन भौंकते रहे..मगर वो सीजन्ड राज हंस मुस्कराता रहा..मंद मंद...
बीच बीच में माईक पर कहता कि शांत हो जाईये..वे बंदर ढ़ोंगी थे...मुझसे पहचानने में भूल हुई...मुझे अपने चाहने वाले आप जैसे समर्थकों पर गर्व है कि आपने उनको पहचान लिया और मुझे गुमराह होने से बचा लिया..आप सबका साधुवाद.
मुझे आपकी सुचिता पर गर्व है..चुनाव में आप जो भी निर्णय लेंगे वो निश्चित ही क्षेत्र और जनता के लिए लाभदायी होगा...कुत्तों ने अपनी प्रशंसा सुन भौंकना बंद दिया, आमजनों की भीड़ फिर से भीड़ हो गई और उन्होंने भी भौंकना बंद कर दिया.
कुछ रोज बाद राज सत्ता के परिणाम घोषित हुए..राज हंस पुनः सत्तासीन हुआ..तीनों बंदर शपथ ग्रहण समोरह के विशिष्ट अतिथि बने. बाद में उन तीन बंदरों की इन्क्यावरी कमेटी ने सीसी टीवी की फुटेज देखकर उन कुत्तों के झुंड का पता लगाया जिन्होंने उस शाम भौंक भौंक कर भीड़ को उकसाया था और उन पर राष्ट्रद्रोह का मुकदमा कायम हुआ और दो को फांसी और अस्सी कुत्तों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई. जेल में जगह की कमी की वजह से कुछ हार्ड कोर क्रिमनल्स को बाईज्जत रिहा कर दिया गया. वे सभी इस रिहाई से अनुग्रहित होकर राजहंस की पार्टी में शामिल हो गये.
देशद्रोहियों को सजा की वजह से क्षेत्र में आई कुत्तों की कमी की भरपाई के लिए चीन से कुत्ते मंगाये गये. चीनी माल के बहिष्कार वाले देशी आंदोलन में चीनी कुत्तों को माल की श्रेणी से बाहर रखा गया एवं उनको जीएसटी के दायरे से भी बाहर रखा गया.
अब इस कहानी की कालजयिता देखें..कि तब जीएसटी का किसी को अता पता न था मगर उससे इन कुत्तों को इस कहानी में एक्जेमप्ट रखा गया..कितनी दूरगामी सोच है लेखक की..ऐसे में यह कहानी हर युग में जिन्दा कहानी ही कहलायेगी. ऐसा उनके एक पाठक ने हाल ही में जीएसटी के प्रवधानों पर आख्यान देते हुए संदर्भित किया.
कहानी लिखने के तीन चार साल बाद किसी ने उन्हें बताया कि यह तो करारा कटाक्ष कर बैठे हैं आप सिस्टम पर..तब उन्होंने अपने नये विजिटिंग कार्ड छपवाये जिसमें उनके नाम के बाद लेखक को बदल व्यंग्यकार लिखा गया.. तब से वह सबसे कहा करते हैं कि व्यंग्य लिखने से कोई व्यंग्यकार नहीं बन जाता. व्यंग्यकार को उसका पाठक व्यंग्यकार बनाता है. व्यंग्यकार बनना है तो पाठक साधो, लिख तो कोई भी लेता है.
फिर उनका लेखन इस हेतु स्थगित रहा कि अब इससे बेहतर ही लिखेंगे किन्तु वैसा कभी हुआ नहीं अतः वह हर बेहतर लिखने वाले को झुठलाते एवं कोसते रहते और एकाएक इसके चलते आलोचक कहलाने लगे.
नये कार्ड में समय बीत जाने की वजह से व्यंग्यकार को वरिष्ट व्यंग्यकार एवं साथ में आलोचक छापा गया. पुराने कार्ड उन्होंने खुद से जला दिये.
पिछले हफ्ते मुलाकात हुई. हमने पूछा कि कुछ नया ताजा लिखा है क्या? कहने लगे अब समय ही नहीं मिलता तो लिखें कैसे? आलोचना, प्राकथन एवं प्रस्तावना लिखने और विमोचनों में ही समय चला जाता है...वैसे एक नये उपन्यास पर काम कर रहा हूँ..ऐसा कह कर वह मुस्कराने लगे..यह बहाना हर लेखक को न लिख पाने के हीन भावना से बहुत समय तक बरी रखता है और यह बात हर लेखक जानता है.
उनकी अलमारी में परसाई समग्र के तीन भाग, शरद जोशी की कुछ किताबें, कुछ पत्रिकायें और एक अजीब सी भाषा में लिखी हुई किताब सजी रहती थी. कमरे की दीवार पर एक तो परसाई जी और एक मिस्टर स्त्रासोवान की तस्वीर... हमने पूछा यह कौन हैं? तो जिस किताब की भाषा हमें समझ न आई थी उसका जिक्र करते हुए बोले कि यह इनकी लिखी हुई है..हंगरी के महान व्यंग्यकार..मैने इन्हीं को पढ़कर सीखा है..विदेश से सीखना भी एक महारत है इसे कौन नकारता अतः हम भी नत मस्तक हो लिए..
हमें नत मस्तक होता देख उन्होंने कार्ड बढ़ाया..अब नाम के आगे इजाफा दिखा ..शुरुवात में आचार्य और अगली पंक्ति में साहित्य कमल २०१४ से सम्मानित लिखने लगे हैं..पता नहीं कैसे?
न लिखने के फायदे देखते हुए ..मन कर रहा है कि हम बेवजह क्यूँ जुटे हैं अगड़म बगड़म कुछ भी लिखने में? थोड़ा थम कर तो देखें..शायद बेहतर परिणाम मिल जाये आचार्य जी की तरह..
लिखना रोक देंगे तो समय भी हाथ में बच रहेगा कि कुछ जुगाड़ लगाया जाये ताकि कोई सरकारी  सम्मान से सम्मानित हो सकें..लिख कर भी भला कोई सम्मानित साहित्यकार हुआ है क्या कभी कि हम ही हो लेंगे? ये कैसा भ्रम जी रहे हैं हम?
जुगाड़ का वक्त है..और जुगाड़ वक्त मांगता है...
-समीर लाल समीर
भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे के सितम्बर १०,२०१७ में प्रकाशित
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