गुरुवार, फ़रवरी 22, 2018

साईज़ डज़ नॉट मैटर!!



जब लिखना शुरु करते हैं तो सोचते हैं कि न जाने सबजेक्ट मैटर इतना सारा कहाँ से आयेगा? चलो, लिखना तो शुरु करें भले ही ५०० शब्दों पर रुक जायेंगे.
लोग बताते हैं कि ५०० शब्दों का आलेख आज की इस भाग दौड़ वाली फेसबुकिया दुनिया में बेस्ट रहता है. इन्सान भागते दौड़ते थोड़ा पढ़ भी लेता है और लाईक करने की उस हीन भावना से भी मुक्त रहता है कि बिना पढ़े लाईक कर दिया.
बताया गया कि बड़े आलेख पढ़वाने की क्षमता रखने वाले सूरमा कोई और होते हैं, मगर वो कौन होते हैं यह नहीं बता पाये. जैसे आजकल बताया जाता है कि पिछली सारी सरकारें निक्कमी थीं, सब भ्रष्टाचारी थे, उन्होंने देश के लिए कुछ नहीं किया, मगर किसने किया है इस देश के लिए कुछ, वो नहीं बता पा रहे हैं. यहाँ तक कि अपना खुद का नाम बताने में हिचकिचा जाते हैं. अच्छे कार्यों के लिए किसी भी लकीर को छोटा करने के लिए उससे बड़ी लकीर खींचने का प्रचलन अब नहीं रहा. अब बस उस पर आरोपों का पानी फेर कर छोटा किया जाता है.
यूँ तो व्यंग्य के धुरंधर वन लाईनर लिख कर भी तूफान उठा दे रहे हैं. कटाक्ष के परचम लहरा रहे हैं. मानो व्यंग्य न होकर नेताओं के बयान हो गये हों. चल गया तो ठीक वरना कह दिया कि जुबान फिसल गई थी या मेरे कहने का वो मतलब नहीं था या ये तो जुमला था. ज्ञानी कहते हैं कम बोलने के बड़े फायदे हैं. कम मुसीबत आती है. बोलना और लिखना एक सा ही है बस लिख देने से सबूत दर्ज हो जाता है. इसलिए नेता बोल कर भाषण और बयान देते हैं, लिख कर नहीं.
बहुत कोशिश और प्रयोग किये कि कितने शब्दों की सीमा में अपना व्यंग्य आलेख बाँधे कि लोग पढ़ने में कम्फर्टेबल महसूस करें और पढ़कर आनन्दित हों. आनन्दित से तात्पर्य लाईक करें से है.
ज्ञानी मित्र बता रहे है कि ये तो औकात की बात है. फिर समझाने की मुद्रा में आकर कहने लगे कि इसे बाजार में बिक रहे मकानों की तरह समझो. मेनशन भी बिकता है जो हजारों स्क्वायर फुट का होता है और ३५० स्क्वायर का माईक्रो अपार्टमेंट भी आज की नई दुनिया में धड्ड़ले से बिक ही रहा है. हर चीज के खरीददार हैं, तय आपको करना है कि क्या और किसे बेचना है?
मित्र का ज्ञान जारी हैं अतः आगे बताते हैं कि हजारों फुट का मेनशन भी न बिके यदि उसे ठीक से डिजाईन न किया जाये और ३५० वाला माईक्रो अपार्टमेन्ट भी छोटे में सब कुछ समाहित कर देने की कला को हाईलाईट कर देने से मंहगे दामों में बिक रहे हैं.
लेखनी का सम्मोहन ही तो तय करता है कि आप पाठक को कब तक और कहाँ तक बांध सकते हैं?
बात जँची तो आजकल लिखते समय अपने खुद को बिल्डर होने जैसा का अहसास होने लगता है. इस चक्कर में २ बीएचके, ३ बीएचके, मोड्यूलर किचन टाईप व्यंग्य आलेख साधने के चक्कर में छोटे छोटे खूब सारे आलेख लिख डाले. मगर हाय री किस्मत.. बिल्कुल रियल स्टेट मार्केट की तरह ..अपना भी भट्टा बैठ लिया. लिख तो लिये हैं मगर न तो कोई छापने वाला मिल रहा है और न ही कोई पढ़ने वाला मिल रहा है.
लोग बता रहे हैं बदलते डिजिटल भारत में विकास की आवाज ये है कि रहने को मकान नहीं आधार कार्ड चाहिये. खाने को हो न हो, शौचालय होना जरुरी है.रियल स्टेट मार्केट तो छोटी सी बात है...पूरा मार्केट भी गिर जाये तो कोई बात नहीं, जीडीपी बढ़ा दिखना चाहिये. प्रपोगंडा के जमाने में तथ्य..मजाक सी बात है.
हम कई बातें समझ ही नहीं पा रहे हैं. चिड़िया के पंख नोच कर खुद के शरीर पर चिपका लेने से आप आकाश में नहीं उड़ सकते..बस!! आपने उस चिड़िया की उड़ान को भी रोक कर उसे विकलांग बना दिया है. वही उसकी लकीर छोटी करने वाली बात...उस लकीर को पौंछ कर. हासिल किसी को कुछ नहीं होता..बस!! आकाश में उड़ते पक्षी गायब हो जाते हैं...और आप खुश!! देखो, मुझसे उपर उडान किसकी? न आप उड़ो न कोई और!!
सजग न सिर्फ लेखक, व्यंग्यकार, कवि और शायर को होने की जरुरत है..बल्कि समाज में हर व्यक्ति को..हमें बस यह जानना और ध्यान में रखना चाहिये कि हीरे का खजाना भी होता है और खदान भी.
खजाने को सहेजना होता है, पोसना होना है और खदान का दोहन करना होता है, खोदना होता है.
आज दुविधा यह है कि जिन्हें हमने चुन कर भेजा है... वो यह तो जानते हैं कि उन्हें हीरा दिया गया है..मगर यह समझने में ही पूरे पांच साल गुजार दे रहे हैं कि खजाना हाथ लगा है कि खदान..और फिर बाद में पछताते हुए और मूँह की खाते हुए, बस खिसियाये हुए इतना ही कह पाते हैं कि हम तो जनसेवक हैं..सेवा करने आये थे....राजनिती का हमें ज्ञान नहीं है, इसीलिए समझ न पाये.....ऐसे में अब तय तो आपको ही करना है..कि सपोर्ट किस ओर देना है..
वरना हम भी लिख रहे हैं और दूसरे व्यंग्यकार भी...पढ़ने वाले तय करेंगे कि मेनशन चाहिये कि माईक्रो अपार्टमेन्ट!! या दोनों..मेनशन में रहेंगे और माईक्रो में इन्वेस्ट करेंगे.
सही मायने में पूछो तो सोच कर देखना..मकान चाहिये कि घर? फिर चाहे वो बड़ा सा मेनशन हो या छोटू सा माईक्रो अपार्टमेन्ट!!
साईज़ डज़ नॉट मैटर!!
-समीर लाल समीर

 जबलपुर से प्रकाशित पल पल इंडिया में फरवरी २१, २०१८ को:
http://palpalindia.com/2018/02/21/kla-sanskriti-Satire-Sameer-Lal-Size-Does-not-Matter-Corrupt-Writing-Hypnosis-news-in-hindi-229656.html


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रविवार, फ़रवरी 18, 2018

मेड इन इण्डिया डिफॉल्टर

उतने पांव पसारिये, जितनी लंबी सौर

ये कहावत उस समय की है जब हम बड़े हो रहे थे. हमें समझाया जाता है कि पहले बचाओ फिर खर्च करो. तब इन्सान मकान और कार आदि उस समय लेता था जब उसकी उन सुविधाओं को एन्जॉय करने की उम्र गुजर रही होती थी. सारा जीवन किफायत करते करते, अपने सभी सपनों को मारते सिर्फ एक बचत की मानसिकता के साथ गुजार देते थे ताकि अगली पीढ़ी के लिए विरासत में कुछ सुविधायें छोड़ जायें. सब प्रयास अगली पीढ़ी के लिए होता था. लोग कठहल और आम के पेड़ अहाते में लगवाते ही इसलिए थे कि अगर नाती पोते नालायक निकल गये तो भी बगिया उनके परिवार को संभाल देगी.
वक्त और सोच का आधार बदल गया है. आज का युवा मेहनत ही इसलिए करने को तैयार होता है क्यूँकि उसके सिर पर ईएमआई का भूत नाच रहा है. यह नई सोच है नई पीढ़ी की. आज कहावत बदल कर यूँ हो गई है कि
उतने पांव पसारिये, जितनी ईएमआई होय...
याने कि घर भी हो, कार भी हो, वेकेशन भी हो, हर लक्जरी हो..ध्यान बस यह रहे कि इतनी कमाई हो जाये कि ईएमआई समय पर भर पायें. इस भागम दौड़ में वो यह भी भूल जाता है कि कल को नौकरी न रही तो क्या? चलो, अपनी क्षमाताओं पर अति आत्म विश्वास हो कि यह नहीं तो दूसरी नौकरी तुरंत ही मिल जायेगी मगर अपनी साँसों पर आत्म विश्वास कैसा? कौन जाने अगली आये कि न आये मगर फिर भी..यह ईएमआई आधारित जीवनी..मेरे गले से तो अब भी नहीं उतरती है...बच्चे समझते हैं कि हम सठिया गये हैं और नये जमाने के चाल चलन की समझ खो बैठे हैं...
खैर आज की तो सरकार भी ईएमआई वाली मानसिकता से चल रही है कि यह महिना निकल जाये, फलां चुनाव निकल जाये तब आगे की देखें. लम्बे समय की कोई योजना ही हाथ में नहीं है सब दिवा स्वप्न देख रहे हैं और सब दिवा स्वप्न दिखा रहे हैं.
हमारे समय में बैंक से लोन लेना ही समाज में बदनामी का कारण बन जाया करता था कि फलाना कर्जे में है..बस फोकट की रईसी झाड़ता है..उस पर से अगर लोन न चुका पाओ तो शहर भर डुगडुगी पिटने और समाज में बदनामी के डर से बंदा आत्म हत्या ही कर लेता था. आज जो डिफॉल्टर होना स्टेटस सिंबल बना हुआ है वो हमारे समय में आत्म हत्या कर लेने सबब हुआ करता था.
अमीर और गरीब के बीच आज बस यही फरक है. एक अमीर डिफॉल्टर आज भी फक्र से अपने डिफॉल्ट को तमगे की तरह लगा कर सर उठा कर समाज में रईसी का परचम लहराता है और एक गरीब किसान, छोटे से लोन के चक्कर में पेड़ पर लटक जाता है.
वक्त अपनी करवट अपने हिसाब से लेता है और चीजों के मायने बदल जाते हैं.
आज पूरे देश की आम जनता शायद एक भी ऐसे किसान का नाम न जानती होगी जो लोन न चुका पाने के कारण आत्म हत्या कर बैठा मगर हर बंदा उनके नाम जरुर जानता होगा जो लोन न चुका पाने के कारण विदेश में जा बैठे..चाहे वो ललित मोदी है, विजय मलैय्या हो या आज का नया सितारा निरव मोदी हो..सभी सरकारी संरक्षण प्राप्त हैं मानो कि जेड सिक्यूरिटी मिली हो और विदेश में सुरक्षित हैं. गाँधी के चश्में की तरह मानो तो या इन्हें कोहिनूर मान लो तो..जाने कब कौन इनको भारत वापस लायेगा...और लायेगा भी तो कहीं गाँधी के चश्में कि तरह विजय मलैय्या बन कर न ले आये तो ही भला..वरना तो बात अंगूठे के घाव पर बैण्ड एड लगा कर हाथ काट लेने जैसी हो जायेगी.
इनके चलते आज के वक्त में देश में हाल तो यह हो गया है कि अगर बैंक लोन लेने जा रहे हो तो मित्र पूछते हैं कि विदेश जाकर बस जाने का इरादा है क्या? और विदेश बस जाने के लिए इमिग्रेशन लेने के लिए एप्लाई करो तो पूछते हैं कि बैंक से लोन लेने का इरादा है क्या?
अपनी क्षमताओं और नॉलेज के आधार पर विदेश जाकर बस जाने का रास्ता तो यूँ भी ट्रम्प बंद करने की फिराक में है ही..अमरीका फर्स्ट के नारे के साथ...तो अब विदेश जाकर बसने के लिए एक ही रास्ता बच रहेगा और वो होगा हमारे देशी नारे के साथ...मेक इन इण्डिया वाले का...कि बस भारत में इत्ते बड़े डिफॉल्टर बन जाओ..कि विदेश में आकर आराम फरमाओ..और खुद को मेड इन इण्डिया डिफॉल्टर का खिताब पहनाओ!!
-समीर लाल समीर’     
भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे में फरवरी १८, २०१८ के अंक में प्रकाशित:

 
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शनिवार, फ़रवरी 10, 2018

हमारे जमाने की बात ही कुछ और थी..


उत्सवधर्मी हमारा देश है और ईश्वर की महान कृपा है कि हमारे देश में उत्सवों के कारणों की कमी भी नहीं है. त्यौहारों एवं पर्व विशेष पर मनाये जाने वाले उत्सव ही हमें परिभाषित करते हैं. शायद यही हमें हर हाल में जी लेने का संबल भी देते हैं.
कभी सोचता हूं कि यूं कहूँ कि हम तो वो शै हैं जानी, जो पर्व भी खुद घोषित करते हैं और उत्सव भी खुद मनाते हैं.
इस सीरिज़ में वो पर्व आते हैं जो सत्ताधारी राजनितिक दल अपनी राजनितिक आस्था प्रकट करने के लिए घोषित करते हैं..नाम लेना उचित न होगा इन पर्वों का..कौन गाँधी, कौन सावरकर..सब जरुरी हैं देश के इतिहास को पढ़ते हुए.
कुछ त्यौहार सदियों पुराने पुरातन काल से चले आ रहे हैं और बिना बहुत ज्यादा सोचे समझें हम उन्हें मनाते चले जा रहे हैं. काल के अनुरुप इनके रुप बदलते गये मगर त्यौहार तो वही रहे. दिये की जगह झालर वाली लाईटों ने ले ली. पटाखों की जगह अब सरकारी आदेशों ने अपने धमाके के आगे इनके धमाके को बंद करा कर ले ली है. धुँआ, जो कभी कीड़े मकोड़े और मच्छरों को भगाने और मारने में सहायक माना जाता था, आज प्रदुषण रुपी दानव का रुप धर कर इन्सानों को निगलने को अमादा है.
कुछ त्यौहार ऐसे भी हैं जो पहले थे तो मगर आंचलिक स्तर पर. जैसे कि छठ, लोहड़ी, करवाचौथ, संक्राति की पतंगबाजी. इनको राष्ट्रीय स्तर का बनाने का पूरा श्रेय टीवी के सीरियलों को जाता है. जिस तरह से इन त्यौहारों ने टीवी के माध्यम से लोकप्रियता हासिल की है, न जाने कितने ही लोकल त्यौहार आज इस इन्तजार में लगे होंगे कि हे एकता कपूर, हमें भी दिखला दो न त्यौहार सा मनता हुआ अपने सीरियल में प्लीज.
मगर टीवी के अपने नखरे हैं, कहो तो रामदेव बना दें, या राम रहिम या आशाराम बना कर जेल पहुँचा दें. यही सोच कर कई त्यौहार भी डर के मारे चुप्पी साध जाते होंगे. दक्षिण के जल्लीकट्टू का भी राष्ट्रीय स्तर पर आते आते न आ पाना, इसी कड़ी से जोड़ कर देखा जा सकता है.
इनके इतर कुछ त्यौहार बस कुछ दशक पुराने हैं हमारे देश में. ज्यादा उम्र नहीं हुई है हमारे देश में उन्हें पधारे. जैसे कि वेलेन्टाईन डे, मदर्स डे, फादर्स डे, हेलोविन आदि आदि. ये पश्चिम से पधारे हैं तो ताम झाम भी वैसे ही है. गरीब के बस के नहीं हैं ये. बस, संभ्रांत और फेशनेबल लोगों के हिस्से में आये हैं. बाजार की देन यह त्यौहार बाजार के लिए ही हैं. बाजार की चमक दमक इनके लिए है..और चमक दमक के हकदार वो अमीर तबका ...इसे मान्यता देता है.
वेलेन्टाईन डे से याद आया कि अब तो इसे मनाते हुए हमारे देश में एक अरसा हो गया. अब इसे मनाने वालों की श्रेणी में वैसे भी लोग आ चुके हैं जो इसे अब नहीं मनाते. अब वे बुजुर्ग टाईप हो लिए हैं.
जैसे आम बुजुर्ग कहता है कि अब जमाना पहले जैसा नहीं रहा. हमारे समय तो बात ही कुछ और थी. घी कटोरी से मूँह लगा कर पीते थे. अब तो न धी सच्चा और न शरीर ही ऐसा है कि शुद्ध घी पचा पाये. कोई दिखा दे आज एक कटोरी घी पी कर, न हगहगी लग जाये तो नाम बदल देना हमारा.
जमाना और समय बदलने की जब भी बात आती है मुझे शराबी वाले अमिताभ बच्चन का वो डायलॉग जरुर याद आता है:
अब तो उतनी भी मयस्सर नहीं मयख़ाने में
जितनी हम छोड़ दिया करते थे पैमाने में...
ये शेर तो बहुत से उन राजनितिक दलों पर लागू होता है जो कि कभी जितनी सीटें समझौते में दूसरे दलों को लड़ने के लिए छोड़ दिया करते थे, आज उससे भी कम लिए खुद बैठे हैं, चाहें लोकसभा हो या विधान सभा. वक्त सबको सबक सिखा ही जाता है जिन्दगी जीने का.
तो भूतपूर्व वेलेन्टाईनबाज जो अब इसे मनाने के क्षेत्र में बुजुर्ग होकर बाहर हो लिए हैं, उनको कहते सुनते हैं कि हमारे समय में वेलेन्टाईन डे एकदम ताजा ताजा आया था बाजार में. हम तो एक दिन में तीन तीन पतों पर गुलाब भिजवाते थे और तीनों गुलाब अलग अलग किताबों में सूखे हुए फूल किताबों में मिले तक शिद्दत से पाये जाते थे.
अब तो न वो पते हैं और न किताबें. अब का जमाना देखो कि एक ही पते पर चार चार गुलाब पहुँच रहे हैं और किताब का स्थान नाली ने ले लिया है. सब बहा दिया जा रहे हैं. मलैच्छ हो गया है बाजार.
मने कि पुरुष प्रधान मानसिकता से उभर कर, स्त्री की अपनी पसंद नापसंद की मानसिकता को स्वीकार न कर पाने को भी बाजार पर थोप देने वाले ये बुजुर्ग भी बाजार में मिलने लगे हैं..है तो अफसोसजनक मगर है तो!
बाजार बहुत आगे बढ़ गया है. कुछ और नये त्यौहार आयेंगे आने वाले समय में..यह अनवरत है, मगर तब तक पुराने त्यौहारों में कुछ और बुजुर्ग पैदा हो जायेंगे.
यही तो चक्र है जो सदा चलता रहेगा और आने वाला जमाना भी यही कहता रहेगा कि अब जमाना पहले जैसा नहीं रहा.
सच में देखा जाये तो कुछ भी बदलता नहीं.एक मृग मरिचिका है हर जमाने की...जो आज मन की बात है वो कल बात मन की होकर सुनाई जायेगी और हम उत्सवधर्मी मानसिकता के वाहक, हर हाल में उत्सव मनाते रहेंगे...प्रसन्न होते रहेंगे.
यही हमारे जीने का तरीका है!
-समीर लाल समीर

भोपाल के सुबह सवेरे में रविवार फरवरी ११, २०१८ में प्रकाशित:
http://epaper.subahsavere.news/c/26148349




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