सोमवार, अप्रैल 24, 2017

सबसे ज्यादा तोड़ा मरोड़ा क्या जाता है?



प्रश्न वही हो तब भी जबाब देने वाले के हिसाब से जबाब अलग अलग मिल सकते हैं..
सबसे ज्यादा क्या तोड़ा जाता है..आशीक मिज़ाज होगा तो कहेगा दिल और पति होगा तो कहेगा पत्नी के द्वारा गुस्से में कांच का गिलास..आम जन होगा तो कहेगा नेताओं का वादा.
फिर आप पूछेंगे कि सबसे ज्यादा मरोड़ा क्या जाता है..फिरवही..माशूका होगी तो कहेगी..बहियां और स्कूली छात्र होगा तो कहेगा रफ कागज..
मगर आप चाहें किसी से पूछें कि सबसे ज्यादा तोड़ा मरोड़ा क्या जाता है?
एक सुर में सभी कहेंगे कि नेताओं के बयान!!
हालत ये हैं कि प्रेस कांफ्रेन्स में टीवी पर दिये बयान से भी मुकर जाते हैं और कहते हैं कि इसे तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत किया गया है. सिर्फ २५ चप्पल मारी थी एयर लाईन के स्टाफ को..प्रेस ने तोड़ मरोड़ कर मेरे बयान को ऐसे पेश किया जैसे मैने ३० चप्पल मारी हों. ये प्रेस वाले बहुत गलत लोग हैं..जनता को भड़काते हैं. इनको बस टी आर पी से मतलब रहता है.
चुनाव में १५ लाख रुपये हर खाते में डलवाने वाले जुमले को वायदा कह कर पेश कर दिया. अब इस तोड़ मरोड़ न कहें तो क्या कहें? सब जानते थे कि यह बस एक जुमला है जैसे पहले होता था गरीबी मिटायेंगे- उसी को बस क्वान्टीफाई  कर दिया. १५ लाख खाते में आना और गरीबी मिटाना एक ही बात तो है. मगर यह मुआ मीडिया..आज तक तोड़ मरोड़ किये जा रहा है...हमेशा प्रश्न करता है कि अच्छे दिन कहाँ हैं? हमारे १५ लाख कहां हैं यह जनता जानना चाहती है!! कौन सी जनता भई? अगर वो जानना चाहती तो भला यू पी में ऐसे जिताती?
अब आज का ही एक बयान देखिये...
प्रदेश में अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि राज्य भर की जेलों में बंद सभी माफिया डॉन और सामान्य अपराधियों को एक जैसा खाना और अन्य सुविधाएं दी जायें।
टीवी पर ब्रेकिंग न्यूज:
खबर आ रही है कि मुख्य मंत्री द्वारा जेल में आम कैदियों को भी एसी, मोबाईल, मुर्गा और दारु परोसने का आदेश...जेल में जो सुविधायें डॉन को दी जायें वो ही आम कैदियो को भी दी जाये...
वाह जी, क्या जलवे कर दिये. बाहर ५ रुपये की थाली का इन्तजाम शरीफों के लिए और भीतर एसी, मोबाईल, मुर्गा और दारु परोसने का आदेश..
बड़े ध्यान से दोनों न्यूज पढ़ रहा हूँ मुझे तो तोड़ मरोड़ कहीं दिख नहीं रहा है, आपको दिख रहा है क्या?
वैसे तो आजकल प्रचलन यह है कि नेता खुद ही अपना बयान ही इतना तोड़ मरोड़ कर देते हैं कि और तोड़ने मरोड़ने की ज्यादा गुँजाईश होती नहीं और जब सरल शब्दों में समझाने को कहो तो बोल देते हैं कि उपर से आदेश है मौन रहा करो.
आज से सब नेताओं को हिन्दी में भाषण देना अनिवार्य कर दिया गया है..अब तो नित तोड़ मरोड़ का ठीकरा भाषा पर टूटेगा और नाहक ही बदनाम होगी हमारी हिन्दी!!!
-समीर लाल ’समीर’
भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे में अप्रेल २३, २०१७ को:

http://epaper.subahsavere.news/c/18514205
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शनिवार, अप्रैल 22, 2017

हद है ये कैसा राज पाट ..जिसमें लाल बत्ती भी न हो?


बत्ती उतरी कार से, मंत्री जी झुंझलायें
ये वीआईपी कार है, कैसे यह बतलायें
कैसे यह बतलायें, कोई तो राह बताओ..
मंत्री न हो आम, कोई तो साख बचाओ..
मैं बोला कि आप अब कर दो एक कमाल
बैठो छत पे कार की, पहन के टोपी लाल!!
-समीर लाल ’समीर’

किसी जमाने में कुण्डली बांच कर पंडित जी बताया करते थे कि तुम्हारी कुण्डली में राज योग है. १६ अश्वों के रथ में सवार होकर एक दिन चक्रवर्ती सम्राट बनोगे.
सम्राटों को जमाना तो खैर लद गया मगर राज पाट और राज योग तो फिर भी जारी रहा.
कुछ बरसों पूर्व हरिद्वार में एक पंडित मेरी हथेली थामे मेरा भाग्य बांच रहा था...राज योग है..एक दिन लाल बत्ती की गाड़ी में घूमोगे. खजाने में हजारों हजार के नोट भरे होंगे. फिर इस भविष्यवाणी के साथ मुस्कराते हुए पंडित जी बोले- तब हमको ही अपना राज ज्योतिष रखना...ऐसा प्रसन्न किया पंडित ने कि उसके चढ़ावे में मांगे गये उस समय के वैध्य हजार के नोट के २१ नोट मूँगफली के दाने के समान नजर आये.
मगर अब क्या बतायें?
आशीष था..खजाने में हजारों हजार के नोट भरे होंगे....इसे तो नोट बन्दी ने ऐसा खारिज किया गया कि जित्ते जमा थे वो भी जार जार रोये कि क्यूँ जमा हुए? बेहतर होता कि खर्च ही हो लिए होते..अब तो उनका धोबी के गधे सा हाल हो गया है..न घर के न घाट के...घर में रखें तो कोहराम..बैंक में जमा करें तो कोहराम... मन किया कि उसी पंडित को बुलवायें और कहें चलो, इसे भी समेटो और अब कभी अपना चेहरा न दिखाना? मगर फिर शाप न दे दे...यह डर भी तो होता है पंडित से डील करने में..संस्कार डीएनए गढ़ देते हैं..इसलिए चुप रहे कि जब लाल बत्ती मिल जायेगी तो इस नुकसान की भरपाई कर लेंगे दो हजार वालों से...पंडित हर बार थोड़े न गलत साबित होगा?
मगर बुरे दिन फिसलपट्टी के समान होते हैं..संभलने का मौका ही नहीं देते,,,फिसलाते ही चले जाते हैं जब तक की मन भर न फिसला लें.. आज सुनते हैं कि अब लाल बत्ती से भी गये!! अब वो भी नसीब न होगी,,,
हद है ये कैसा राज पाट ..जिसमें लाल बत्ती भी न हो?
एक जमाने में कहते थे कि क्लर्क से प्रमोटेड..नामित आईएएस..जब कोई बिल पास करता है तो टोटल खुद से लगा कर देखता है..यही अंतर होता है असली आईएएस और नामित आईएएस में..असली काम करता है और नामित काम करने लग जाता है. बिना लाल बत्ती वाला मंत्री..टोटल ही लगायेगा...नई योजना तो भला क्या ला पायेगा...योजना बनाने का समय ही कहाँ बच रहेगा?
लाल बत्ती एक कॉन्फीडेन्स देती है पावर का..बिना इस कॉन्फीडेन्स के तो भला हनुमान भी जान पाते क्या कि वो उड़ सकते हैं? उन्हें भी बताया गया था कि सर, आपके पास लालबत्ती है..आप उड़ सकते हैं..तब जाकर वो उड़े थे..संजीवनी लाने वरना तो लक्ष्मण जी तभी नमस्ते हो लिए होते..
मगर अब न होगी लाल बत्ती तो न होगी!!
आदत पड़ जायेगी लाल बत्ती वाले पावर को बिना लाल बत्ती वाले पॉवर से रिप्लेस करने की..बाकी का सारा ढोल मजीरा...कमांडो..सब तो हैं ही..बस लाल बत्ती ही तो बुझी है.
वैसे भी लाल बत्ती..रेड लाईट..याद दिलाती है या यूं कहें कौंधाती है रेड लाईट एरिया का ख्याल...अंतर क्या है...कहीं तन बिकता है तो कहीं वतन बिकता है...
अपवाद तो दोनों तरफ हैं..उस रेड लाईट एरिया में भी तो मूँगफली बेचने वाले होते हैं..और इस रेड लाईट एरिया में..कुछ फकीरी की नुमाईश लगाने वाले भी दिखाई पड़ ही जाते हैं..
मगर अपवादों से दुनिया नहीं चलती..
अपवाद चिन्हित होते हैं और वास्तविक दुनिया अपवादों से इतर परिभाषित!!

-समीर लाल ’समीर’
#vyangyakijugalbandi
#व्यंग्यकीजुगलबंदी

भोपाल के दैनिक सुबह सवेरे में प्रकाशित
http://epaper.subahsavere.news/c/18459983


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शनिवार, अप्रैल 15, 2017

एंटी ईवीएम छेड़छाड़ स्क्वाड


मृत्यु को एक वरदान मिला है. मृत्यु को कभी बदनामी नहीं मिलती. जब कभी किसी की मृत्यु होती है उसका दोष सदा ही कभी बुढ़ापे, कभी बीमारी, कभी दुर्घटना को जाता है. यहाँ तक की जब कोई कारण नहीं मिलता तब भी यही कहा जाता है कि अच्छे खासे थे, न जाने क्या हुआ और गुजर गये..  
वही हाल चुनाव में प्रत्याशियों की हार का है..मानो तुलसी दास कह रहे हों कि प्रत्याशी को नहीं दोष गुसांई..हार याने की इनके न जीतने का दोष प्रत्याशी के सिवाय चाहे जिस बात पर डाल दिया जाये मगर प्रत्याशी तो मानो गालिब हो, कुछ भी कर ले..कितना भी बदनाम क्यूँ न हो..उसके आका से लेकर उसके चहेतों तक बस एक ही बात:
नेता तो वो अच्छा है, बदनाम बहुत है
ये कभी नहीं हारते. जीतने वाला जीत गया, ये नहीं जीते..बस, इतनी सी घटना होती है.
कभी सामने वाले की लहर के चलते तो कभी जनता के आदेश के चलते सामने वाला जीत जाता है और यह नहीं जीतते.
शास्त्रों में लिखा है कि सब हार कर भी जो इन्सान उम्मीद नहीं हारता, आशा का हाथ थामें रहता है- एक दिन सफलता उसके कदम जरुर चूमती है, इस सूत्र का इस धरती पर यदि अगर एक वर्ग के रुप में कोई अक्षरशः पालन करता है तो वो नेता वर्ग ही है.
पहले अक्सर इनके न जीतने का ठीकरा बूथ केप्चरिंग पर फोड़ा जाता था. बाहुबलियों का बोल बाला हुआ करता था. जिसके पास जितने लठैत, वह उतना सफल नेता. लठैत मात्र लट्ठ लिए लोग नहीं बल्कि चाकू, तलवार, दोनाली से लेकर रिवाल्वरधारी भी हुआ करते थे. लठैत अपने नेता की जीत सुनिश्चित कराते थे, जीतने वाला नेता अपने लठैतों को जेल से बचाये रखने की गारंटी दिया करता था. दोनों का चोली दामन का साथ था. बूथ केप्चरिंग में यह बूथ इन्चार्ज को धमका कर, मार पीट कर मत पेटी पर कब्जा करके अपने मन मर्जी के वोट डाल लेते थे.
जिस किसी नेता को पहले से यह अंदाजा हो जाता कि वह नहीं जीतेगा इस बार, वह वोटिंग वाले दिन ही बूथ केप्चरिंग का इल्जाम लगा देता था और बाकी के न जीत पाने वाले, चुनाव के नतीजे आने के बाद उसके इल्जाम का समर्थन करने लग जाते थे. मगर जो जीत गया सो जीत गया.  
बताते हैं कि आज लैठेतों की जगह तकनीक के ज्ञाता सॉफ्टवेयर इन्जीनियरों ने ले ली. ये तकनिकीयुगीन लठैत अपने तकनिकी ज्ञान की दोनाली लिए अपने आकाओं के आदेश पर ईवीएम (इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन) पर धावा बोलते हैं. उसका अपने ज्ञान से ऐसा हृदय परिवर्तन करते हैं कि जनता चाहे जो आदेश दे, लहर भले किसी की चले..एवीएम जितायेगी इनके आकाओं को ही.
बाकी के न जीत पाये नेता, वही पूर्ववत अब दोषारोपण ईवीएम मशीन पर कर देते हैं कि इनसे छेड़छाड़ की गई है.
जल्दी ही इस छेड़छाड़ के खिलाफ भी एण्टी रोमियो कानून की तरह ही कोई कानून लाना पड़ेगा वरना यह छेड़छाड़ की बीमारी प्लैग से भी ज्यादा संक्रामक है, पूरे देश में फैलते वक्त न लेगी. कुछ ही बरसों में पूरे देश में फैल जायेगी.
वक्त रहते न संभले तो फिर कुछ ही बरसों में फैली इस बीमारी के उन्मूलन में कई दशक लग जायेंगे.
-समीर लाल ’समीर’
भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे में आज:

#jugalbandi

#जुगलबन्दी
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शुक्रवार, अप्रैल 14, 2017

बम था कि बमों का बाप


अमिताभ बच्चन की फिल्म शहंशाह का वो डायलॉग जो उस जमाने में बच्चा बच्चा सीख गया था..
’रिश्ते में तो हम तुम्हारे बाप लगते हैं और नाम है शहंशाह!!’
हर जगह जब कभी अपनी ताकत दिखाने की जरुरत पड़ती तो लोग कहा करते कि रिश्ते में तो हम तुम्हारे बाप लगते हैं.
एक गुँडा चाकू चमका रहा है और दूसरा गुँडा उसे चमका रहा है कि धर ले अपना चाकू अपनी जेब में..ये तो कुछ भी नहीं है.. मेरे पास इसका बाप है ये देख..और वो हवा में फरसा घुमाने लग गया. चाकू वाला गुँडा डर कर भाग गया.
कभी ऐसा भी सुनने में आ जाता है कि यार, सोचा था उससे कुछ रकम झटकी जाये मगर वो तो मेरा भी बाप निकला, उल्टी टोपी पहना कर चला गया.
खूब जोर का धमाका सुनाई पड़े तो इन्सान स्वतः ही बोल उठता है बाप से बाप, क्या धमाका था, कान सुन्न हो गये.
कहने का तात्पर्य यह है जब भी किसी चीज को बड़ा बताना हो, उसकी विशालता का बखान करना हो, तो उसे बाप बताया जाता है.
क्या आपने कभी इसके बदले में मम्मी या मदर का इस्तेमाल होते देखा?
कोई ऐसा कैसे कह सकता है कि अपना चाकू अपनी जेब में रख, मेरे पास इसकी मम्मी है और लगे तलवार हवा में लहराने.
माँ शब्द के साथ आप ये जरुर कह सकते हैं ओह माँ, आज सर में बहुत दर्द है. एक संवेदना है, एक ममता की उम्मीद है..बाप शब्द के साथ एक जोश है, एक धमक है.
आज जब सुबह से सुन रहा हूँ कि अमरीका ने अफगानिस्तान के आई एस आई एस के ठिकाने पर विश्व का सबसे बड़ा गैर परमाणु बम गिराया है, जिसे मदर ऑफ ऑल बॉम्बके नाम से पुकारा जाता है, तब से इस उलझन में हूँ कि आखिर इसे सब बमों के बाप याने फादर ऑफ ऑल बॉम्ब क्यूँ नहीं बुलाया गया?
माना महिला सश्क्तिकरण का जमाना है मगर मेरा दावा है कि इस बम का धमाका सुन कर भी लोगों के मूँह से एकाएक यही निकला होगा –बाप रे बाप, क्या धमाका था..बम था कि बमों का बाप?
हाँ, जो इसकी चपेट में आकर मरे होंगे या चोटिल हुए होंगे..उनके मूँह से उई माँजरुर निकला होगा..
मैं समझता भी हूँ और महिला सशक्तिकरण का घोर पक्षधर भी हूँ मगर भावनायें और उनसे जुड़े शब्द डी एन ए का हिस्सा होते है, उन्हें कैसे समझायेंये तो जब पूर्ण पुरुष प्रधान समाज था, तब भी दर्द में माँ की शक्ति और ममता को ही याद करता था..
-समीर लाल समीर
आज के भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे में:

http://epaper.subahsavere.news/c/18310508

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