शनिवार, जनवरी 14, 2017

किताब का मेला या मेले की किताब



बचपन में जब शहर में मेला भरा करता था तो उसमें ब़ए उत्साह से जाया करते थे. तरह तरह के झूले, नाच गाना, खूब सारी दुकाने मसलन चुड़ियाँ, बिंदी, टिकली, गमझा, कुर्ता, खूब खाने पीने की दुकान, बरफ के गोले, शरबत, गुब्बारे, चरखी, ताजमहल के सामने मोटर साइकिल पर बैठ कर फोटो खिंचवाने की दुकान, मौत का कुँआ, जानवरों के करतब, रस्सी पर चल कर करतब दिखाते नट नटनियाँ, भालू का नाच- बड़े लम्बे चौड़े मैदान में मेला भरता था. बच्चों के गुम होने और मिल जाने के लाऊड स्पीकर पर एनाउन्समेन्ट होते रहते थे. 
जब बड़े हुए तो पता चला कि उधर कोने वाले स्टालों में जो चारों तरफ से घिरे होते थे, जहाँ बचपन में कभी हमें नहीं ले जाया गया, वहाँ बम्बई से आई नृत्यांगनाओं का फिल्मी नाच होता है. बैन्च पर बैठ कर खूब लोग सीटियाँ बजाते और नाचने वाली की अदाओं पर नोट और सिक्के भी उठाये जाते थे. मेले से लौटते तो गुब्बारे, पूँगी और चकरी तो जरुर ही साथ लाते थे. हमारे जेहन में तो यही चित्र उभरता है आज भी जब कभी मेले की बात उठती है. उस वक्त मेले पर निबंध की किताब आती है और उसमें भी ऐसा ही कुछ मेले का विवरण होता था.
बढ़ती उम्र के साथ बाल गिरने, दाँत गिरने आदि के साथ एक और घटना अनजाने में घटित होती है कि न जाने कितनी ही महत्वपूर्ण चीजों का इतिहास हमसे छोटा हो जाता है और हम बैठे डंडा पीटते रहते हैं कि यह भी कोई बात हुई, हमारे जमाने में ऐसा होता था.
आज जब विश्व पुस्तक मेला की धूम मची है तब हम इस मात्र ४१ साल के इतिहास वाले मेले को, अपने जमाने के मेले की तस्वीर के फ्रेम में बैठालने की नाकाम कोशिश में लगे झुंझला रहे हैं.
कोई पूछता है तो बस वही घिसा पिटा टेप शुरु, ये मेला भी कोई मेला है भला..दुकानों के नाम पर बस किताबों के प्रकाशकों की दुकानें..मेले में अधिकांशातः आने वाले भी लेखक, जिनकी किताब उन्होंने उन्हीं में से किसी प्रकाशक से, आधुनिक प्रकाशन प्रक्रिया (इसका विवरण वैसे तो आपको पता है क्यूँकि हमें पढ़ने वाले भी तो अधिकतर लेखक ही हैं- इसे अलग से आलेख में बतायेंगे कभी) के तहत, छपवाई होती है, खरीदने वाले भी लेखक, पुस्तक का प्रचार प्रसार कर बिकवाते भी लेखक, विमोचन करने वाले भी लेखक, विमोचन में आने वाले भी लेखक, फोटो खींचने वाले भी लेखक, फोटो छापने वाले भी लेखक, समीक्षा करने वाले भी लेखक, समीक्षा छापने वाले भी लेखक, समीक्षा पर टिप्पणी करने वाले भी लेखक. एक लेखक दस स्टालों में घूम घूम कर पुस्तकें खरीद रहा है, जिसकी पुस्तक खरीद रहा है, वो भी वहीं स्टाल के आसपास कलम थामे हस्ताक्षर करने को बेताब घूम रहा है और उससे अधिक बेताबी हस्ताक्षर करते हुए खरीददार लेखक के साथ सेल्फी खिंचवाने की है. खरीददार भी किताब खरीदते, फोटो खिंचवाते बार बार लेखक को अपने उस स्टाल पर आने का निमंत्रण दे रहा है, जहाँ उसकी पुस्तक है. 
लेखक को भी यह कर्ज उतारु प्रक्रिया में जाकर उस लेखक की किताब खरीदना जरुरी है, इस बार दस्तखत करने वाला और सेल्फी लेने वाले आपस में बदल जाते हैं. अगर किताब की तस्वीर साथ न हो, तो दोनों तस्वीरें एक सी लगें. खरीदते हुए और बेचते हुए. संस्कारवान देश है..आप नमस्ते करो तो हम जरुर मनस्ते करेंगे आपको. कई बार सोचता हूँ कि एक सीढी और सब मिल कर चढ़ें तो वो दिन भी दूर नहीं जब प्रकाशक भी लेखक ही हो लेगा. आखिर प्रकाशन के इतने टूल आ ही गये हैं अन्तर्जाल पर. लोग छाप ही रहे हैं अपनी खुद की किताबे अब. तब सोचिये मेले के अंत में पूरे जमा खर्च का हिसाब लगाया जायेगा, तो पता चलेगा कि ५० किताब घूम घूम कर मैने खरीदी और वो ५० लेखक जिनकी किताब मैने खरीदी वो मेरे आमंत्रण को स्वीकारते हुए आ आ कर मेरी किताब खरीद ले गये. जुबानी जमा खर्च निल बटे सन्नाटा. मेला केश लेस बनाया जा सकता है तब...किताब के बदले किताब...कैश कैसा?
हमारे साहेब तो इस मेले के ब्राँण्ड एम्बेसेडर बन जायेंगे तुरंत..विश्व पुस्तक मेले के झंड़े पर समीर लाल ’समीर’ की किताब पढ़ते उनकी तस्वीर होगी..
किस्सा सुनने वाले मुझसे पूछ रहे हैं कि पशु मेले में भी तो सिर्फ पशु ही बिकने आते हैं. मैं समझा नहीं पा रहा हूँ कि सिर्फ पशु ही बिकने आते हैं मगर बेचने वाले बेच कर नगद घर ले जाते हैं न कि अच्छी नसल का घोड़ा बेच कर मजबूरी में बेनसली गधा खरीद कर, सेल्फी सांटे घर चले जा रहे हैं मेले की रिपोर्ट फेसबुक पर चढ़ाने.
वैसे आप किसी भी तरह से इसे मेरे विश्व पुस्तक मेले में न पहुँच पाने की मजबूरी में बिल्ली द्वारा खंभा नोंचने जैसी बात कतई न समझियेगा. बहुत मन होता है आने का. किताब छपे भी समय गुजर गया..तब भी नहीं आ पाये थे. अगले बरस कोशिश करेंगे आने की मगर इससे यह अंदाजा भी मत लगाईयेगा कि इस बरस मेरी कोई किताब आने वाली है और इसलिए भूमिका बाँध रहा हूँ.
एक सोच है कि मेले में सब कुछ तो है बस पूरी भीड़ में से जो गायब है वो है विशुद्ध पाठक. मन करता है कि एक पुस्तक मेला ऐसा लगे जिसमें सिर्फ विशुद्ध पाठक आयें और लेखकों के आने पर पूर्ण पाबंदी हो.. पाबंदी जैसा बड़ा कदम..बड़ा है तो क्या हुआ, उठाया तो जा ही सकता है. भले ही सफल न हो तो न हो..देख ही रहें हैं आजक्ल बड़े बड़े पाबंदी वाले कदमों के अंजाम.
डिसक्लेमर: कोई बुरा न माने प्लीज..महज हास्य व्यंग्य हेतु बातचीत है...पता चला कि हम लेखक समुदाय से ही निकाल दिये गये. वैसे मैने शुरु में ही कहा था कि अधिकांशतः..फिर आप तो अपवाद हैं जी!! लिखते रहें.

-समीर लाल ’समीर’ 
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शुक्रवार, जनवरी 13, 2017

निन्दक नियरे राखिये मगर तुम जैसे नहीं..


हर बात में किसी की निन्दा करना कहाँ तक उचित है. जो भी काम करे, उसकी निन्दा.
समरथ को नहीं दोष गुसांई तो सुना था मगर फकीर की तो हर बात में दोष निकालो, ऐसा कहाँ लिखा है?.
सूट बूट पहने तो बुराई कि इत्ता महँगा पहन लिया और कुर्ता पायजामा पहने तो बुराई कि दिन भर में तीन तीन बार बदलता है. ये तो देखते ही नहीं ये बंदा एक दिन में कर भी तो तीन दिन का काम रहा है, तो तीन बार नये कुर्ते पायजामें पहन लिए तो क्या बुरा कर दिया? पहले हर मंत्री अपना अपना काम किया करता था और उसे उसका पूरा श्रेय भी मिल जाता था. आज जब बेचारे अकेले पर सब कुछ आन पड़ा है और बस दो तीन साथी थोड़ा बहुत हाथ बटा देते हैं तो कपड़े बदलने पर आप चले आये बुराई करने. बताओ, उन तीन चार, बहुत ज्यादा गिनोगे तो पाँच मंत्रियों के सिवाय अभी बाकी मंत्रियों के नाम भी ९० प्रतिशत देश न बता पायेगा, काम क्या कर रहे हैं इसका तो पूछना भी मत.
पुराने नोट बंद करता है तो चिल्लाते हो कि ये क्या कर डाला? नये नोट लाता है तो फिर चिल्लाते हो कि ये कैसा चूरन वाला नोट निकाल डाला? कभी कोई बुराई तो कभी कोई बुराई..कभी कहते हो कि नोट रंग छोड़ता है तो कभी कहते हो कि नोट में चिप लगी है? कभी सिद्ध करने लगते हो कि नोट में सोलर एनर्जी वाले सेल हैं, एक ने तो बल्ब जला कर भी दिखा दिया ... ये तो अच्छा ही है न!! बिजली नहीं आती है तो भी तुम चिल्लाते हो..अब बिजली नोट से चल जायेगी तो भी परेशानी.
५६ इंच का सीना बता दिया तो लोग नापने लग गये कि ५६ नहीं ५४ ही है...भले खुद का ४० इंच ही क्यूं न हो..उनका ५६ नहीं होना चाहिये. हद हो गई बुराई करने की.
देशाटन हो या विदेशाटन, दोनों ही को जीवंत ज्ञानार्जन का सर्वश्रेष्ट गुरु माना गया है. अब देश का प्रधान मूर्ख हो ये तो तुम कभी बर्दाशत करोगे नहीं और अगला ज्ञानार्जन के लिए लगभग ९०% समय विदेशाटन में गुजार रहा है तब भी तुम हल्ला मचा रहे हो..कि एन आर आई प्रधान हैं. विदेश घूमते रहते हैं. वो करें तो क्या करें? घर बैठ जायें तो कहते हो निकलते नहीं और निकल जायें तो कहते हो कि घर बैठते नहीं.
पहले चिल्लाते रहे कि अपनी माँ, पत्नी को छोड़ दिया..हाल ही में योगा छोड़ कर माँ से मिलने जाने का ट्वीट किया तो उसका बखेड़ा खड़ा कर दिया कि हर बात का माइलेज लेते हैं.
अभी कुछ दिन पहले बैंक से नोट निकालने की कतार में माँ के खड़ा कर देने की खबर का बवाल मचा कि कैसा बेटा है? इतनी बुजुर्ग माँ को बैंक की कतार में खड़ा कर दिया..मात्र ४५०० रुपये निकालने के लिए.. धिक्कार है...
और आज जब खुद के ही नहीं बल्कि समूचे राष्ट्र के पिता, राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का पद भार ग्रहण करते हुए उनको आराम देने की मंशा दिल में सजाये उनका चरखा हाथ में थाम सूत कातते हुए अपनी तस्वीर खादी ग्रामोध्योग के कलेंडर और डायरी पर छपवा दी, तो फिर बवाल कि ऐसा कैसा कर सकते हैं? क्या खुद को गाँधी समझने लगे हैं? क्या कल से खुद के काते सूत के कपड़े बनवा कर पहनेंगे?
कितने नादान हो..खुद के काते सूत के कपड़े? हद करते हो...जब आप पनचक्की से बिजली बनाते हैं तो क्या खुद उसका उपभोग करते हो? नहीं न, आप उसे मेन ग्रीड में डालकर उसका क्रेडिट ले लेते हैं बस...
अगर मेरे प्रधान ने सूत काता है, भले ही फोटो में, तो इतना क्रेडिट बनता है कि नहीं? फिर कपड़ा किसी और के काते सूत का भी पहना तो कहलायेगा तो इसी का क्रेडिट..मगर मुदा है कि काता कितना है..वो तुमको कभी भी पता न चलेगा..आर टी आई में ये इन्फार्मेशन लेना मना है थीक वैसे ही..जैसे कि आर बी आई में कितने नोट छपे या जमा हुए..
काहे बवाल मचाते हो..अभी तो अनेक ऐसे मौके मिलेंगे जब बवाल मचाने के बदले कलेजा ही मूँह मे आ जायेगा और कुछ बोल भी न पाओगे..
बस!! एक काम करो..यूपी और पंजाब का चुनाव जिता कर तो देखों..२ अक्टूबर को भूल जाओगे और फिर १७ सितम्बर मनाया करोगे..अब मुझसे मत पूछना कि १७ सितम्बर को क्या है..कुछ खुद भी तो गुगल करो!!
आज न जाने क्यूँ फिर वो कविता याद आई जो बचपन में बाल भारती में पढ़ते थे:

माँ, खादी का कुर्ता दे दे, मैं गाँधी बन जाऊँ,
सब मित्रों के बीच बैठ फिर रघुपति राघव गाऊँ!

निकर नहीं धोती पहनूँगा, खादी की चादर ओढूँगा,
घड़ी कमर में लटकाऊँगा, सैर सवेरे कर आऊँगा!

मैं बकरी का दूध पिऊँगा, जूता अपना आप सिऊँगा!
आज्ञा तेरी मैं मानूँगा, सेवा का प्रण मैं ठानूँगा!

मुझे रुई की पूरी दे दे, चर्खा खूब चलाऊँ,
माँ, खादी की चादर दे दे, मैं गाँधी बन जाऊँ!
-साभार: बालगीत साहित्य (इतिहास एवं समीक्षा), निरंकारदेव सेवक

-समीर लाल ’समीर’
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शनिवार, जनवरी 07, 2017

चुनाव एवं दंगल



नोटबंदी के बाद ऐसा माना जा रहा था कि अब लोगों के पास कैश खत्म हो गया है. लोग एटीएम की लाईन में खड़े ४५०० रुपये का इन्तजार करते ही रह जायेंगे और उधर वो चुनाव करवा कर धीरे से जीत कर निकल जायेंगे. लाईन में खड़े लोग जिन लोगों का वोट बैंक हैं, वो गरीब, मध्यम वर्गीय और शोषित समाज के आका अपना सिर धुनते रह जायेंगे
ऐसे में दंगल फिल्म ने इनकी आँखें खोली और सबित कर दिया कि कैशलेस के दौर में भी फ्लॉलेस दंगल का जलवा ऐसा होता है कि आप स्वयं आश्चर्यचकित रह जायेंगे. जो देश सुबह से शाम तक सारा व्यापार और नौकरी चाकरी छोड़ कर एटीएम की लाईन में खड़ा था, वो एकाएक सिनेमा देखने चला आया. १५ दिन में ४०० करोड़ रुपये इक्कठे कर लिए. हालाँकि यह डाटा अभी आना बाकी है कि इसमें से कितना कैशलेस माध्यम से और कितना नगदी में आया. वैसे ऐसे समय में इसमें कुछ भी आश्चर्यजनक बात नहीं है कि हमारे पास यह डाटा मौजूद नहीं है जबकि डिजिटल युग के स्वयंभू प्रणेता और उनके सिपहसालर यह नहीं जानते कि रिजर्व बैंक में कितना रुपया लौट आया.
ऐसी हालत में जग हंसाई और आगामी चुनावों में धुलाई से बचने के लिए यह एक मंत्र सा नजर आया. उन्हें लगने लगा कि लोगों के दिलो दिमाग पर दंगल का जबरदस्त असर पड़ता है. तो एक ऐसा बड़ा दंगल कराया जाये और लोगों का ध्यान अपनी विफल नोटबंदी और किसी तरह पांव जमाती कैशलेस समाज की स्थापना की आड़ से भटकाया जाये –वैसे मैं सिद्धांतः इसके खिलाफ नहीं हूँ किन्तु जिस तरह से तुगलकी तौर पर बिना किसी प्लानिंग के इसे लागू किया गया वह असहनीय एवं नितांत अनुभवहीनता का परिचायक है.
अतः एक विशाल समाजवादी दंगल की रुपरेखा तैयार हुई. परिवार और पार्टी टूट की कागार पर खड़े हो गये. बाप बेटे में सत्ता को लेकर तलवारें तन गई. दिल्ली और राजनीति से इतना तो सीख ही लिया है कि किसी का ठीकरा किसी के भी सिर फोड़ दो और किनारे खड़े होकर तमाशा देखो तो इस समाजवादी दंगल का ठीकरा भी उनके नाम कर के इस दंगल का भी आनन्द उठाया जाये. किसी का मानना है कि मुलायम के पुराने साथी जिनके आने की वजह से यह समाजवादी सियासी दंगल मचा हुआ है, उनका आगमन स्पॉन्सर्ड है. हो सकता है..राजनीति में कुछ भी हो सकता है. अधिकतर कदम स्पॉन्सर्ड एवं स्टेज़्ड ही होते हैं आम जनता की आँख में धूल झौंकने के लिए.
अब देखना यह है आमिर खान के दंगल ने जिस सफलता से लोगों का ध्यान नोटबंदी से उठी समस्या से हटाया है और सरकार को कुछ राहत का अहसास कराया है (वैसे सच मायने में तो अंगूठा दिखाया है),  यह समाजवादी दंगल भी कुछ मददगार साबित होगा कि नहीं.
वरना ढ़लान पर तो सरकार की गाड़ी आ ही गई है – बस, दुर्गति की गति को कुछ विराम मिले, यही एक प्रयास है.

-समीर लाल ’समीर’
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बुधवार, जनवरी 04, 2017

तरक्की की राह पर दौड़ने के आशय


यहाँ कनाडा में हम साल में दो बार समय के साथ छेड़छाड़ करते हैं जिसे डे लाईट सेविंग के नाम से जाना जाता है. एक तो मार्च के दूसरे रविवार को समय घड़ी में एक घंटा आगे बढ़ा देते हैं और नवम्बर के पहले रविवार को उसे एक घंटे पीछे कर देते हैं. ऐसा सूरज की रोशनी के अधिकतम उपयोग हेतु किया जाता है.
नवम्बर में जब एक घंटा पीछे घड़ी करते हैं तब ऑफिस से लौटते वक्त पूरा अँधेरा घिर आता है, जो एक दिन पहले तक रोशनी में होता था. यह दिन कनाडा में वो दिन होता है जब सबसे ज्यादा दुर्घटनायें पैदल सड़क क्रास करते लोगों की कार से टकराने से होती है. कार चालको की आँखे पहले दिन उस वक्त लौटते हुए अँधेरे से अभयस्त नहीं हुई होती है और न ही एक दिन में अधिक सतर्कता बरतने की आदत लौटी होती है. बरफ में इससे ज्यादा खतरनाक हालात रहते हैं मगर लोग सतर्क होते हैं और उन्हें मालूम होता है कार फिसल सकती है.
उस दिन घड़ी पीछे करके जब स्टेशन पर कार पार्क करके प्लेटफार्म की तरफ बढ़ा तो क्षेत्र के एम पी (सांसद), एम एल ए, पार्षद और साथ में एरिया के पुलिस अधिकारी लोगों को शाम को सतर्क रह कर कार चलाने और सड़क पार करने का निवेदन करते हुए कॉफी के साथ रिफ्लेक्टर बाँट रहे थे जो अँधेरे में चमकता है. अपने कोट, बैग, गाड़ी पर रिफ्लेक्टर लगा लेने से एक उम्मीद होती है कि अँधेरे में सड़क पार करते पैदल चल रहे व्यक्ति पर कार चालक की नजर आसानी से पड़ जायेगी.
मैं रिफ्लेक्टर अपने बैग पर लगा कर प्लेटफार्म पर आकर अपनी ट्रेन का इन्तजार करने लगा. सामने हाई वे पर ११०/१२० किमी तेज रफ्तार भागती गाड़ियों से दफ्तर पहुँचने की जल्दी में जाते लोग. मैं सोचने लगा कि इस विकसित देश में इतनी तेजी से गाड़ी दौड़ा कर कहाँ और आगे जाने की जल्दी है इन लोगों को. थोड़ा आराम से भी जाओ तो भी विकसित हो ही, क्या फरक पड़ जायेगा और कितना विकसित होना चाहते हो? मगर नहीं, शायद मेरी सोच गलत हो..शायद यही समय की पाबंदी और सदुपयोग इनको विकसित बना गया होगा और ये अब भी विकास की यात्रा पर सतत अग्रसर हैं. अच्छा लगता है ऐसी रफ्तार से कदमताल मिलाना.
ट्रेन अभी भी नहीं आई है और मैं इन्तजार में खड़ा हूँ और मेरे विचार सामने भागती गाड़ियों के साथ भाग रहे हैं. भागते विचार में आती है पिछली भारत यात्रा.
यह यात्रा दो माह पूर्व उस युग में हुई थी जब एटीएम एवं लोगों की जेबों में में रुपये हुआ करते थे और लोग गाडियों, रिक्शों, बसों, मोटर साईकिलों पर सवार सड़क जाम में आड़ी तिरछी कतार लगाये खड़े घंटो व्यतित कर दे रहे थे अपने गन्तव्य तक पहुँचने के लिए. वह युग आज के युग से बहुत अलग था. आज वही लोग एटीएम की कतार में खड़े हैं. एटीएम और जेब से रुपये नदारत हैं और गन्तव्य २५०० रुपये बदलवाने की छाँव में कहीं खो गया है. मगर दोनों ही युगों की समानता इस जुमले में बरकरार रहीं कि अच्छे दिन आने वाले हैं और भारत विकास की यात्रा पर है.
स्वभावतः यात्रा गति माँगती है गन्तव्य की दिशा में. लम्बे ठहराव की परिणिति दुर्गंधयुक्त अंत है. चाहे वो पानी का हो, जीवन का हो या विचारों का हो.लम्बी यात्रा में विश्राम हेतु ठहराव सुखद है किन्तु सतत ठहराव का भाव दुर्गंध युक्त प्रदुषित माहौल के सिवाय कुछ भी नहीं देता.
विकास यात्रा पर अग्रसित होने का दावा करने वाले देश के हालात उस युग में भी ट्रेफिक जाम रुपी ठहराव के चलते यूँ थे कि जब मैं अपने मित्र के घर से, जहाँ में रुका हुआ था, अपना कुछ जरुरी काम निपटाने बैंक जाने को तैयार हुआ, जो कि उनके घर से दो किमी की दूरी पर था, तो मित्र ने कहा कि ड्राईवर आ गया है उसके साथ गाड़ी में चले जाओ. बैंक बंद होने में मात्र एक घंटे का समय था और मुझे उसी शाम दिल्ली से वापस निकलना था. मेरे पास यह विकल्प न था कि अगर आज न जा पाये तो कल चले जायेंगे. अतः पिछले तीन दिनों के अनुभव के आधार पर मैने मित्र से कहा कि भई, मैं पैदल चले जाता हूँ और आप गाड़ी और ड्राईवर बैक भेज दो. लौटते वक्त उसके साथ आ जाऊँगा. मित्र मुस्कराये तो मगर मना न कर पाये. उनको तो दिल्ली का मुझसे ज्यादा अनुभव था.
मैं विकास की ओर बढ़ते मेरे देश की राजधानी की मुख्य सड़क पर धुँए से जलती आँख और धूल से खांसते हुए पैदल बैंक जाकर काम करा कर जब पैदल ही लौट रहा था तो मित्र के घर के पास ही मात्र एक मोड़ दूर उनकी गाड़ी में ड्राईवर को ट्रैफिक से जूझते देख उसे फोन किया कि जब मौका लगे, गाड़ी मोड़ कर घर चले आना.. मैं वापस पैदल ही पहुँच रहा हूँ. 
घर जाकर ठंडे पानी से स्नान कर आराम से बैठे नीबू का शरबत पीकर खत्म किया ही था कि ड्राईवर वापस गाड़ी लेकर मुस्कराते हुए हाजिर पूछ रहा था कि साहेब, शाम एयरपोर्ट कब छोड़ना है?
मन आया कि कह दूँ कि फ्लाईट तो रात दो बजे हैं मगर चलो, अभी दोपहर चार बजे ही निकल पड़ते हैं...इन्तजार यहाँ करने से बेहतर है कि एयरपोर्ट पर कर लेंगे कम से कम फ्लाईट तो न मिस होगी.
विचारों में विकासशील और विकसित देशों के बीच की दूरी नापते नापते ट्रेन आ गई और मैं फिर वही, दफ्तर पहुँच कर विकसित को और विकसित कर देने के राह पर चल पड़ा,, 
आंकलन ही तो है वरना मुझे भी यहाँ क्यूँ होना चाहिये?
वो विकासशील देश भी तो मेरा योगदान मांगता है.

-समीर लाल ’समीर’

’गर्भनाल’ के वासी प्रवासी अप्रवासी- जनवरी २०१७ कें अंक में प्रकाशित
http://www.garbhanal.com/2017-Jan?PAGE=44

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