जिस किसी ने भी जीवन में कभी इश्क में चोट खाई हो या किसी को खाते हुए देखा,पढ़ा या सुना हो, उन सभी को आमंत्रण है. आईये, आईये-महफिल सजी है. गज़ल चल रही है, सुनिये. दाद दिजिये, हालात पर थोड़ा दुख जताईये और महफिल की शोभा बढ़ाईये. बाकी बचे भी आमंत्रित हैं. कुछ अनुभव ही बढ़ेगा. ऐसी द्विव्य बातें और महफिलें बार बार तो होती नहीं.
वैधानिक चेतावनी: थोड़ा मार्मिक टाईप है. आँख से अश्रुधार बह सकती है, रुमाल ले कर बैठें. वरना क्म्प्यूटर के कीबोर्ड में आँसू गिरने से शार्ट सर्किट हो सकता है. :)
तब अर्ज किया है:
सो गया मैं चैन से

रात भर दबा के पी, खुल्लम खुल्ला बार में
सारा दिन गुजार दिया बस उसी खुमार में
गम गलत हुआ जरा तो इश्क जागने लगा
रोज धोखे खा रहे हैं जबकि हम तो प्यार में.
कैश जितना जेब में था, वो तो देकर आ गये
बाकी जितनी पी गये, वो लिख गई उधार में.
यों चढ़ा नशा कि होश, होश को गंवा गया
और नींद पी गई उसे बची जो जार में.
वो दिखे तो साथ में लिये थे अपने भाई को
गुठलियाँ भी साथ आईं, आम के अचार में.
याद की गली से दूर, नींद आये रात भर
सो गया मैं चैन से चादर बिछा मजार में.
हुआ ज़फ़र के चार दिन की उम्र का हिसाब यूँ
कटा है एक इश्क में, कटेंगे तीन बार में.
होश की दवाओं में, बहक गये समीर भी
फूल की तलाश थी, अटक गये हैं खार में.
-समीर लाल ’समीर’
चित्र साभार: जोश डाट कॉम का.


















