मंगलवार, दिसंबर 06, 2016

सलाहकारों के देश को एक सलाह मेरी भी

समाचार पत्रों से ताजा खबर ये है कि ब्रिटेन में 5 पाउंड के नोट पर विवाद हो गया है, इस नये प्लास्टिक नोट में बीफ की वसा का प्रयोग किया गया है, जिसे TALLOW कहते हैं. इस समाचार का पता चलते ही शाकाहारियों ने तीखा विरोध दर्ज कराया. इन नोटों के विरोध में करीब एक लाख लोगों ने पिटीशन साइन किया है.

खैर, ब्रिटेन के सिखाये तो हम शुरु से हैं. चाय से लेकर संविधान तक. तो इस प्रयोग ने भी एक विचार दे ही दिया. भ्रष्टाचार मुक्त भारत में अब नये बड़े प्लास्टिक वाले नोट ऐसे लाये जायें जिसमें बीफ और पोर्क की वसा का इस्तेमाल हो. अब भ्रष्टाचारी चूँकि रुपये खाता है, घूस खाता है अतः एक बड़ी आबादी तो इसे नहीं खायेगी और नोट खाने खिलाने की समस्या यूँ ही चुटकी बजाते ही खत्म हो जायेगी. बाकी जिन्होंने इसे मेहनत से कमाया है वो इसका इस्तेमाल वैसे ही धड्डले से करेंगे जैसे अपने पर्स, जूते या अन्य लेदर के आईटम का करते हैं. इस्तेमाल से भला किसी को कहाँ गुरेज? निषिद्ध तो खाना है. फिर भी कुछ लोग तो बीफ और पोर्क खाते ही हैं मगर उनकी संख्या हमारे देश में कम ही है तो उन्हें आसानी से धर पकड़ लेंगे.

वैसे भी हम नोट के लिये कागज तो आयात करते ही है, तब ऐसे प्लास्टिक के नोट की छपाई के लिए भी  प्लास्टिक विदेश से आयात कर लेंगे. पाप भी नहीं पड़ेगा कि हमने बीफ और पोर्क की वसा मिलाई.

सलाहकारों के देश में, जहाँ इन दिनों हर पान की दुकान पर ऐसा लग रहा है कि अर्थ शास्त्रियों और सलाहकारों का जमावड़ा लगा है, यह एक सलाह हमारी भी जोड़ ली जाये.

प्लास्टिक के नोटों का छपना छपाना तो वक्त के साथ हो ही जायेगा. जनता को भी आदत पड़ ही गई है बदलाव की घोषणा सुनने और लाईन में लग कर नये नोटों के इन्तजार करने की. एक बार और सही मगर इलाज पुख्ता हो जायेगा.

अगर किसी को इन प्लास्टिक के नोटों के इस्तेमाल से भी परेशानी या परहेज हो तो उनके लिए अन्य रास्ते हैं न..मोबाईल बैंकिंग, कार्ड और ढ़ेरों तरीके अभी नये आ रहे हैं.. सलाहें नित आ रही हैं..सलाहकारों का देश है..चिन्ता की क्या बात है?.


-समीर लाल ’समीर’

भोपाल के सुबह सवेरे में ५ दिसम्बर,२०१६ के अंक में प्रकाशित
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रविवार, दिसंबर 04, 2016

गाने की छाप: एक विश्लेषण

बदन पे सितारे लपेटे हुए, ए जाने तमन्ना कहाँ जा रही हो...यह गीत जब कभी रेडियो पर बजता है तब न तो कभी किसी सुकन्या के बदन का ख्याल आता है और न ही फलक पर चमकते सितारों का...बस, जेहन में एक चित्र खिंचता है..शम्मी कपूर का इठलाती और अंग अंग फड़काती व बल खाती शख्शियत...

ऐसे कितने ही गीत हैं जो कभी सिनेमा के पर्दे, तो कभी टीवी के स्क्रीन पर दिख दिख कर आपके दिलो दिमाग पर वो छबी अंकित कर देते हैं कि उन्हें रेडियो पर सुनो या किसी को यूँ ही गाते गुनगुनाते हुए, दिमाग में वही फिल्म का सीन चलने लगता है.

आँधी फिल्म का गाना- इस मोड़ से जाते हैं, कुछ सुस्त कदम रस्ते..कहीं दूर भी बजता हुआ सुनाई दे जाता है तो दिमाग में संजीव कुमार और सुचित्रा सेन का वो ही सीन उभर आता है.,,जो आँधी फिल्म में देखा था.

मगर कुछ ऐसे भी गीत हैं जो मौका विशेष पर ऐसे बजने लग गये कि उनका मूल सीन ही दिमाग से धुल गया और मौका विशेष से जुड़ा कोई सीन उसके उपर आकर कब्जा कर गया. जैसे शादी की बारात के दौरान बैण्ड वालों ने नागिन गाने की धुन बजा बजा कर, इस गाने की ऐसी बैण्ड बजाई कि अब कहीं दूर दराज से भी नागिन गाने की धुन सुनाई देती है तब न तो १९५४ की वैजन्ती माला याद आती है और न १९७६ की रीना राय...बस याद आता है शराब के नशे में धुत, हाथ से नागिन का फन बनाये जमीन पर लोट लोट कर नागिन बना नाचता हुआ आपका एक दोस्त और मूँह में रुमाल दबा कर उसे बीन की तरह बजाता हुआ सपेरा बना हुआ आपका दूसरा दोस्त,.. किसी अपने ही खास दोस्त की बरात में नाचते हुए. वैसे ही जैसे कि  ’दो सितारों का जमीं पर है मिलन आज की रात...भी किसी मित्र या रिश्तेदार का चेहरा ही सामने लाता है वरमाला डालते हुए.

इसकी वजह शायद ये होती होगी कि वो गीत, फिल्म और टीवी के इतर अन्य मौकों पर इतनी बार बजा और सुना गया है कि फिल्म का सीन अपना अस्तित्व बचा ही नहीं पाया. कौन जाने इसमें दोष उन गीतों का अन्य मौकों पर अत्याधिक बजा जाना है या उन पर हुए फिल्मांकन का कमजोर होना. जो भी हो, फिल्म का सीन तो दिमाग से निकल ही गया.

’तुम जिओ हजारों साल, साल में दिन हो पचास हजार..इस गीत को सोच कर देखियेगा कि क्या याद आता है? कोई भाई, बहन, भतीजा ही न?

अब बात करते हैं तीसरे आयाम की..जिसमें गीत तो अन्य मौकों पर ही बार बार सुनते आये किन्तु फिर भी वो अपनी मूल छाप ही छोड़ते आये हैं. हालात ऐसे कि जिस दृष्य की वो याद दिलाते हैं उसका मुख्य किरदार अपना चेहरा बदल कर मूल किरदार के चेहरे में नजर आता है.
याद करिये हर बेटी की विदाई के वक्त बजता हुआ वो गीत...’बाबुल की दुआयें लेती जा..जा तुझको सुखी संसार मिले..’ न जाने कितनी बार कितनी बेटियों की विदाई के वक्त यह गीत सुना होगा..मगर चेहरा वही बलराज साहनी का याद आता है.. लड़की का चेहरा तो दोस्त की बेटी का उभरता है मगर विदा करता दोस्त, बलराज साहनी में बदल जाता है मानो अपना यार बलराज साहनी को खड़ा करके बाहर सिगरेट पीने निकल लिया हो. अब न जाने इसमें किरदार का वजन है या फिल्मांकन का..मगर जिन्दा मूल किरदार ही रहा. वही १९६८ का नीलकमल फिल्म वाला बलराज साहनी..

बहुत खोजा..शोध किया..बातचीत की मगर एक ऐसा आयाम खोजने में मैं सफल नही हो पाया जिसमें जब उस गीत के बोल सुनूँ तो न तो फिल्म का सीन याद आये, न मौके पर अत्याधिक बजने की वजह से उस मौके से जुड़े दृष्य का..बल्कि कोई नया सा दृष्य उभरे, एक नया सा चेहरा उभरे...

आज तक कोई भी राजनेता ऐसा न कर पाया कि फिल्म का गीत बजे जिसमें उसका जिक्र न हो और आप के जेहन में उसका चित्र उभर आये.

मगर अभी अभी कुछ रोज पहले एक ऐसी घटना हुई कि, सोशल मीडिया में दिलचस्पी रखने वाले इसे अच्छी तरह से समझ पायेंगे.. बाकी के लोग इस पैराग्राफ को लाँघ कर आगे पढ़ सकते हैं, एक बड़े टीवी चैनल के एक दिवसीय सरकारी प्रतिबन्ध के मद्दे नजर बने एक कार्यक्रम और हैश टैग ट्रेन्ड की दुनिया में ट्वीटर पर सबको पछाडते हुए ट्रेन्ड #बागों मे बहार है..ने ऐसा माहौल बनाया कि..अब जब भी वो गीत सुनाई देता है तो दिमाग में उभरता है..एक फेमस टीवी चैनल का ब्लैक आऊट हुआ टीवी स्क्रीन और फिर उस ब्लैक आऊट के भीतर से उभरता हुआ मेरे मित्र एक बड़े एन्कर का चेहरा और साथ में दो चेहरों पर सफेदा पोते एथॉरिटी और लठैत बने माईम कलाकार... वो आराधना फिल्म के साथ साथ राजेश खन्ना और फरीदा जलाल का चेहरा जाने कहाँ खो गया और कब..समझ ही नहीं आया. ऐसा पहली बार, कम से कम मेरी याद में हुआ.

आपको कुछ ऐसा याद हो तो बतायें कि जब गाना बजे फिल्म का और आपको याद आये कोई राजनेता या पत्रकार.. या कोई ऐसा चेहरा..जो किसी मौका विशेष के नाम से आपके दिमाग में हथोड़ान्कित न हो....

शायद राजनेताओं के लिए ऐसा कुछ प्रयोग करने का समय आ गया है...करना भी चाहिये..कोई एक फेमस गाना..अपनी याद दिलवाने के लिए...

जोड़ कर देखो न भई नेता जी..शायद कहीं गुंजाईश बने!!

-समीर लाल समीर

भोपाल के सुबह सवेरे में ४ दिसम्बर,२०१६ के अंक में प्रकाशित

http://epaper.subahsavere.news/c/15111168
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आज मौसम बड़ा..बेईमान है बड़ा



प्रकृति प्रद्दत मौसमों से बचने के उपाय खोज लिये गये हैं. सर्दी में स्वेटर, कंबल, अलाव, हीटर तो गर्मी में पंखा, कूलर ,एसी, पहाड़ों की सैर. वहीं बरसात में रेन कोट और छतरी. सब सक्षमताओं का कमाल है कि आप कितना बच पाते हैं और मात्र बचना ही नहीं, सक्षमतायें तो इन मौसमों का आनन्द दिलवा देती है. अमीर एवं सक्षम इसी आनन्द को उठाते उठाते कभी कभी सर्दी खा भी जाये या चन्द बारिश की बूँदों में भीग भी जायें, तो भी यह सब सक्षमताओं के चलते क्षणिक ही होता है. असक्षम एवं गरीब मरते हैं कभी लू से तो कभी बाढ़ में बह कर तो कभी सर्दी में ठिठुर कर.

कुछ मौसम ऐसे भी हैं जो मनुष्य ने बाजारवाद के चलते गढ लिये हैं. इनका आनन्द भी सक्षमतायें ही उठाने देती है. इसका सबसे कड़क उदाहरण मुहब्बत का मौसम है जिसे सक्षमएवं अमीर वर्ग वैलेन्टाईन डे के रुप में मनाता है फिर इस डे का मौसम पूरे फरवरी महीने को गुलाबी बनाये रखता है. फरवरी माह के प्रारंभ में अपनी महबूबा संग गिफ्ट के आदान प्रदान से चालू हो कर वेलेन्टाईन दिवस पर इजहारे मुहब्बत की सलामी प्राप्त करते हुए फरवरी के अंत तक यह अपने नियत मुकाम को प्राप्त हो लेता है.

रेडियो पर गीत बज रहा है...’आज मौसम बड़ा..बेईमान है बड़ा..आज मौसम...’

बेईमानी का मौसम? फिर अन्य मौसमों से तुलना करके देखा तो पाया कि इसे भी अमीर एवं सक्षम एन्जॉय कर रहे हैं. इससे बचने बचाने के उनके पास मुफीद उपाय भी है और कनेक्शन भी. कभी कभार बड़ा बेईमान पकड़ा भी जाये तो क्या? कुछ दिनों में सब रफा दफा और फिर उसी रफ्तार से बेईमानी चालू. इस बीच कुछ दिन लन्दन जाकर ही तो रहना है या अगर किसी सक्षम को जेल जाना भी पड़ा तो वहाँ भी उनके लिए सुविधायें ऐसी कि मानो लन्दन घूमने आये हों. मरता इस मौसम में असक्षम ही है जैसे पटवारी, बाबू आदि की अखबारों में खबर आती है कि २००० रुपये रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ाये. वे जेल की हवा तो खाते ही खाते हैं, साथ ही नौकरी से भी हाथ धो बैठते हैं. उनके पास खुद को बचाने के न तो कनेक्शन होते हैं और न ही ऊँचे ओहदे वाले वकील. इसका कतई यह अर्थ न लगायें कि उन्होंने गलत काम नहीं किया बात मात्र सजा के अलग अलग मापदण्ड़ो की है.

इधर एकाएक नया सा मौसम सुनने में आ रहे हैं- देशभक्ति का मौसम.

इस मौसम का हाल ये है कि जो हमारे साथ में है वो देशभक्त और जो हमारा विरोध करेगा वो देशद्रोही? देश भक्ति की परिभाषा ही इस मौसम में बदलती जा रही है. देशभक्ति भावना न होकर सर्टीफिकेट होती जा रही है. सर्टिफाईड देशभक्त बंदरटोपी पहने, हर विरोध में उठते स्वर को देशद्रोह घोषित करने में मशगुल हैं. सोशल मीडिया एकाएक देशभक्तों और देशद्रोहियों की जमात में बंट गया है.

भय यह है कि कल को यह देशभक्ति का मौसम भी अमीरों और सक्षम लोगों के आनन्द का शगल बन कर न रह जाये और गरीबों और असक्षमों को फिर इस मौसम की भी मार सहना पड़े.

रेडियो पर गाना अब भी बज रहा है..आने वाला कोई तूफान है ..कोई तूफान है.. आज मौसम है बड़ा...’

-समीर लाल ’समीर’  Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, दिसंबर 01, 2016

तोता और उसकी पर्ची

सोशल मीडिया में यह खबर गरम है कि साहेब के पास एक पर्ची निकालने वाला तोता है.

हमें पता चला है कि वो तोता उन्हें उनके एक खास दोस्त ने गिफ्ट किया था और तब से वो तोता साहेब के साथ उनके घर पर ही रहता है और साहेब उसी तोते से पर्ची निकलवा कर नित नई घोषणा करते हैं.
आज सुबह जब साहेब जागे तब तोता बोला...’जिओ’
साहेब ने समझा कि तोता आशीष दे रहा है इतना अच्छा बहादुरीपूर्ण अथक काम करने के लिए ...
साहेब भावुक हो उठे कि और कोई समझे न समझे, कम से कम यह पंछी तो समझ रहा है. आँख में नमी एवं अवरुद्ध कंठ लिए अनु्ग्रहित होने वाले ही थे कि तोता हँसा और बोला ...अब ३१ मार्च तक फ्री :)
साहब मुस्करा दिये और फिर दोस्त को फोन करके पूरी घटना विस्तार से बताई.
फिर साहेब भी खूब हँसे और दोस्त भी खूब हँसा..
तोता खून के आँसू पीकर अगली पर्ची निकालने के इन्तजार में लाल मिर्ची खाने लगा....
//नोट: कृप्या इस को किसी भी घटना या व्यक्ति विशेष से जोड़ कर न देखें. तोते को दुख होगा.//
-समीर लाल ’समीर’
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मंगलवार, नवंबर 29, 2016

अहम ब्रह्मा!!

इतनी अफरा तरफी, हाहाकार, परेशानियाँ, व्यापार का अरबों का नुकसान, थमा सहमा कतारों में खड़ा भारत, पेटीएम का फायदा, पहले से बंद भारत को ही फिर और बंद करने की विपक्षियों की जुगत, भक्तों की भक्ति की परीक्षा (सब अव्वल नम्बर से पास कहलाये), अभक्तों की साफ साफ पहचान (कुछ जो सरेन्डर हो गये वो ग्रेस मार्क से पास माने गये, बाकी के सब फेल और स्पेशल केस में नीतिश गुड सैकेण्ड क्लास से पास घोषित).

संभाले नहीं संभलते हालात, नित बदलते नियम, अदूरदर्शिता और अहम ब्रह्मा की खुले आम नुमाईश, हड़बड़ी में लिए गये सभी स्वमेव फैसले, मगरमच्छीय आँसूं और हड़बड़ाहट में छपते नकली जैसे असली और असली जैसे नकली नोट और अंततः एक समझौता..सभी मित्रों और दलों के साथ...सब खुश हो जाओ..हम सब एक ही जमात के हैं फिर आपस में कैसा मनमुटाव. 

एक आम प्रोजेक्ट का नियम..ये प्रोजेक्ट मेरा है जब तक सब बढ़िया चल रहा है...और मेरा ही रहेगा अगर सफल हो गया तो....जैसे ही फेल होने लगो तो पूरी टीम को शामिल कर लो..कि ये प्रोजेक्ट सबका है..तीम एफर्ट से ही प्रोजेक्ट चलता है जैसा ज्ञान बांटने लगो, फिर फेल हो तो फेल..पास हो तो पास...मेरा क्या?


पूरा निचोड़:

१००० और ५०० के पुराने नोट बंद करके उसके बदले नये ५०० और २००० के नोट आ गये हैं. आपके पास अगर कालाधन है, जिस पर महिलाओं को रुपये २५०००० तक की छूट है तो उसे बैंक में जमा कर उस पर ५०% आयकर अदा कर दें तो बाकी का एकदम सफेद हो जायेगा. बाकी लोग पुराने बंद नोट अपने खाते में जमा कर दें और नये नोट में परिवर्तित कर लें.

इसमें बस एक लाईन और जोड देते कि पुराने ५०० और १००० के नोट ३१ दिसम्बर के बाद मान्य नहीं होंगे तो सारा टंटा ही खत्म हो जाता.

अब उस ५०% से गरीब कल्याण योजना चलाओ या बजट में से गरीब कल्याण योजना के लिए आवंटन घोषित करो, जो इसी टैक्स की रेवन्यू से घोषित होता है, क्या फरक पड़ता है? मगर दिल बहलाने के लिए गालिब ख्याल अच्छा है. गरीब को भी अच्छा लगेगा और जो उन योजनाओं का संचालन करेगा, उसे भी. लुटेरे का धन था तो उसे लूट लेने में ग्लानी कैसी?

इतनी सी बात और ढोल मजीरा सारे जहाँ का.

और सीना तना रहे इस हेतु:

देखो, एक और आखिरी मौका दे दिया है उस ८ नवम्बर के आखिरी मौके के बाद. संभल जाओ वरना बाद में मैनें पकड़ा न तो छोडूँगा नहीं..८५% ले लूँगा?

अरे महाराज, जो काला है जो चोरी से छिपा कर रखा गया है और जिसे आप पकड़ रहे हैं, उसमें से १५% किस बात के लिए छोड़ रहे हैं??

काला धन छिपा कर रखने के लिए जो जगह लगी उसका किराया तो बनता है न जी..इसलिये!

बस, अंत में गालिब की जुबां:

थी खबर गर्म के ग़ालिब के उड़ेंगे पुर्ज़े ,
देखने हम भी गए थे पर तमाशा न हुआ

-अब इन्तजार अगले तमाशे का!!


-समीर लाल ’समीर’
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