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शनिवार, मई 01, 2021

आज मौसम बड़ा..बेईमान है बड़ा

 

प्रकृति प्रद्दत मौसमों से बचने के उपाय खोज लिये गये हैं. सर्दी में स्वेटर, कंबल, अलाव, हीटर तो गर्मी में पंखा, कूलर ,एसी, पहाड़ों की सैर. वहीं बरसात में रेन कोट और छतरी. सब सक्षमताओं का कमाल है कि आप कितना बच पाते हैं और मात्र बचना ही नहीं, सक्षमतायें तो इन मौसमों का आनन्द भी दिलवा देती है. अमीर एवं सक्षम इसी आनन्द को उठाते उठाते कभी कभी सर्दी खा भी जाये या चन्द बारिश की बूँदों में भीग भी जायें, तो भी यह सब सक्षमताओं के चलते क्षणिक ही होता है. असक्षम एवं गरीब मरते हैं कभी लू से तो कभी बाढ़ में बह कर तो कभी सर्दी में ठिठुर कर.

कुछ मौसम ऐसे भी हैं जो मनुष्य ने बाजारवाद के चलते गढ़ लिये हैं. इनका आनन्द भी सक्षमतायें ही उठाने देती है. इसका सबसे कड़क उदाहरण मुहब्बत का मौसम है जिसे सक्षम एवं अमीर वर्ग वैलेन्टाईन डे के रुप में मनाता है. फिर इस डे का मौसम पूरे फरवरी महीने को गुलाबी बनाये रखता है. फरवरी माह के प्रारंभ में अपनी महबूबा संग गिफ्ट के आदान प्रदान से चालू हो कर वेलेन्टाईन दिवस पर इजहारे मुहब्बत की सलामी प्राप्त करते हुए फरवरी के अंत तक यह अपने नियत मुकाम को प्राप्त हो लेता है.

रेडियो पर गीत बज रहा है...’आज मौसम बड़ा..बेईमान है बड़ा..आज मौसम...’

बेईमानी का मौसम? फिर अन्य मौसमों से तुलना करके देखा तो पाया कि इसे भी अमीर एवं सक्षम एन्जॉय कर रहे हैं. इससे बचने बचाने के उनके पास मुफीद उपाय भी है और कनेक्शन भी. कभी कभार बड़ा बेईमान पकड़ा भी जाये तो क्या? कुछ दिनों में सब रफा दफा और फिर उसी रफ्तार से बेईमानी चालू. इस बीच कुछ दिन लन्दन जाकर ही तो रहना है या अगर किसी सक्षम को जेल जाना भी पड़ा तो वहाँ भी उनके लिए सुविधायें ऐसी कि मानो लन्दन घूमने आये हों. मरता इस मौसम में असक्षम ही है जैसे पटवारी, बाबू आदि की अखबारों में खबर आती है कि २००० रुपये रिश्वत लेते हुये रंगे हाथों पकड़ाये. वे जेल की हवा तो खाते ही खाते हैं, साथ ही नौकरी से भी हाथ धो बैठते हैं. उनके पास खुद को बचाने के लिए न तो कनेक्शन होते हैं और न ही ऊँचे ओहदे वाले वकील. इसका कतई यह अर्थ न लगायें कि उन्होंने गलत काम नहीं किया. बात मात्र सजा के अलग अलग मापदण्ड़ो की है.

इधर एकाएक नया सा मौसम सुनने में आ रहे हैं- देशभक्ति का मौसम.

इस मौसम का हाल ये है कि जो हमारे साथ में है वो देशभक्त और जो हमारा विरोध करेगा वो देशद्रोही? देश भक्ति की परिभाषा ही इस मौसम में बदलती जा रही है. देशभक्ति भावना न होकर सर्टीफिकेट होती जा रही है. सर्टिफाईड देशभक्त बंदरटोपी पहने, हर विरोध में उठते स्वर को देशद्रोह घोषित करने में मशगुल हैं. सोशल मीडिया एकाएक देशभक्तों और देशद्रोहियों की जमात में बंट गया है.

भय यह है कि कल को यह देशभक्ति का मौसम भी अमीरों और सक्षम लोगों के आनन्द का शगल बन कर न रह जाये और गरीबों और असक्षम को फिर इस मौसम की भी मार सहना पड़े.

रेडियो पर गाना अब भी बज रहा है.. ’आने वाला कोई तूफान है ..कोई तूफान है.. आज मौसम है बड़ा...’

-समीर लाल ’समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार अप्रेल 25, 2021 के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/60010390

 

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शनिवार, मार्च 13, 2021

एक युग के भीतर समाप्त होते अनेक युग

 

उस रात किसी बड़ी किताब का भव्य विमोचन समारोह था. यूँ भी हिन्दी में किताबों के बड़े या छोटे होने का आंकलन उसके लेखक के बड़े या छोटे होने से होता है और लेखक के बड़े या छोटे होने का आंकलन उसके संपर्कों के आधार पर.

बड़े लेखक की बड़ी किताब का विमोचन हो तो विमोचनकर्ता का बड़ा होना भी जाहिर सी बात है. अतः इस समारोह के विमोचनकर्ता भी बहुत बड़े और नामी साहित्यकार थे. वह इतना अच्छा लिखते हैं कि वर्षों से इसी चक्कर में कुछ लिखा ही नहीं (शायद भीतर ही भीतर यह भय सताता हो कि कहीं कमतर न आंक लिए जाये) मगर फिर भी, नाम तो चल ही रहा है.

अधिकतर अच्छा लिखने वालों के साथ यही विडंबना है कि वो इतना उत्कृष्ट लिखते हैं, इतना अच्छा लिखते हैं कि कुछ लिख ही नहीं पाते. बरसों बरस बीत जाते हैं उनका अच्छा लिखा पढ़ने को. बस, उनसे दूसरों के बारे में सुनने और पढ़ने के लिए यही मिलता चला जाता है कि फलाने ने अच्छा लिखा और ढिकाने ने खराब. सलाह भी उन्हीं की ओर से लगातार बरसती है कि अच्छा लिखने की कोशिश होना चाहिये साहित्य को धनी बनाने के लिए. वे बिना अपना योगदान देखे, हर वक्त दुखी नजर आते हैं कि आजकल अच्छा नहीं लिखा जा रहा है और यह चिन्ता का विषय है.

सस्वर सरस्वती पूजन, माल्यार्पण आदि के बाद संचालक महोदय ने माईक संभाला और मुख्य अतिथि का परिचय प्रदान करते हुए स्तुति गान में ऐसा रमे कि यह कह कर मुस्कराने लगे कि माननीय मुख्य अतिथी श्रद्धेय आचार्य श्री चंडिका दत्त शास्त्री पुरुष नहीं हैं.

इतना कह वह मौन हो गये और मुस्कराते हुए मंच से लोगों के हावभाव देखते रहे. पूरे हॉल में इस सनसनीखेज खुलासे की वजह से सन्नाटा छा गया. सब छिपी आँख एक दूसरे को देखने लगे. संपूर्ण मंच भी असहज सा नजर आने लगा तब श्री विराट स्तंभी जी आगे बोले कि माननीय मुख्य अतिथी श्रद्धेय आचार्य श्री चंडिका दत्त शास्त्री जी पुरुष नहीं, महापुरुष हैं. अपने आप में संपूर्ण संस्था हैं. तब जाकर सभागृह में जान लौटी. श्री विराट स्तंभी जी के इस बयान से उनके सहज हास्य बोध का परिचय मिला जबकि कर्म एवं नाम से वह वीर रस हेतु प्रख्यात हैं. पूरे सभागृह में करतल ध्वनि की गुंजार उठ खड़ी हुई.

विचार आया कि यदि दो वाक्यों के बीच मौन के दौरान बिजली महारानी की कोप दृष्टि पड़ जाती, तब क्या होता?

संस्था का नाम सुनते ही मेरी रीढ़ की हड्ड़ी में न जाने क्यूँ एक अरसे से एक सुरसुरी सी दौड़ जाती है. एक चित्र खींच आता है मानस पटल पर किसी संस्था का, जिसे अपने पापों, घोटालों को अंजाम देने के लिए सबसे मुफीद और पावन उपाय मान व्यक्ति, व्यक्ति न रह संस्था में बदल जाता है. फिर गोपनीय वार्षिक बैठक, बेनामी पदाधिकरी और स्वयंभू अध्यक्ष की आसंदी पर विराजमान स्वयं वह.

देश में आजतक जितना संस्थाओं के नाम पर घोटालों को अंजाम दिया गया है, उतना शायद ही कहीं और हुआ होगा.

शायद संस्था ही वह वजह हो जिससे उनका स्टेटस बिना बरसों तक लिखे भी बहुत ऊँचा लिखने वाले का बरकरार रहा आया हो, कौन जाने? संस्था के भीतर की बात जानना तो सरकारी ऑडीटर के लिए भी टेढ़ी खीर ही रहा है अतः भीतर जाने की बजाय वो बाहर के बाहर पैसे लेकर निपटारा करना सदा से सरल उपाय मानता रहा है.

अब तो ऐसी संस्थाएं भी आ गई हैं, जिसमें न तो ऑडिट और न आर टी आई का प्रावधान है.

खैर, समारोह बहुत भव्य रहा. उतना ही भव्य मुख्य अतिथि का उदबोधन जिसमें उन्होंने पुनः साहित्य और लेखन के गिरते स्तर पर गहरी चिन्ता जतलाई और इस पुस्तक को इस दिशा में सुधार लाने का एक ऐतिहासिक कदम निरुपित किया.

इस कार्यक्रम के बाद एक और वरिष्ट साहित्यकार की श्रद्धांजलि सभा में जाना था. वहाँ भी श्रद्धांजलियों के दौर में अनेक संदेशों में मृतात्मा को एक व्यक्ति नहीं, युग बताया गया और उनके अवसान को एक युग का पटाक्षेप.

एक युग के भीतर समाप्त होते अनेक युग. हर वरिष्ठ, हर गरिष्ठ के प्रस्थान के साथ एक युग का पटाक्षेप, और एक ऐसे रिक्त का निर्माण, जिसकी भरपाई कभी संभव नहीं. शुरु से आजतक ऐसे रिक्त स्थानों की जिनकी भरपाई संभव न थी, एक एक बिन्दी के आकार का भी गिन लें तो शीघ्र ही, या कौन जाने पूर्व में ही, शायद ही कोई स्थान बचे जो रिक्त न हो.

-समीर लाल ‘समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार मार्च 14, 2021 के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/59066272

                                               

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शनिवार, मार्च 06, 2021

नींद में वोट देना हर आमजन जानता है

 


देर रात गये सोने की कोशिश मे हूँ. जब नींद नहीं आती तो ख्याल आते हैं. अकेले में ख्याल डराते है और इंसान अध्यात्म की तरफ भागता है भयवश. यह इन्सानी प्रवृति है, मैं अजूबा नहीं.

आधुनिक हूँ तो आधुनिक तरीके अपनाता हूँ अध्यात्म के. बड़े महात्मा जी का आध्यात्मिक प्रवचन सीडी प्लेयर में लगा कर उससे मुक्ति के मार्ग के बदले नींद का मार्ग खोजने में लग जाता हूँ. नीरस बातें नींद में ढकेल देती हैं. नीरसता टंकलाईज़र (नींद की गोली) का काम करती है.

कुछ देर मन लगा कर सुनता हूँ. महात्मा जी के कहे अनुसार, जीवन रुपी नैय्या से इच्छायें, चाह, लालच और वासना की गठरी उठा उठा कर फैंकता जाता हूँ पाप की बहती दरिया में. खुद को हल्का किये बगैर उपर नहीं उठा जा सकता, महत्मा जी मात्र १०० रुपये लेकर सीडी में समाये कह रहे हैं. मैं सुन रहा हूँ. कहते हैं चाहविहिन हो जाओ तो मुक्ति का मार्ग पा जाओगे और यह जीवन सफल हो जायेगा.

सोचता हूँ कि क्या मुक्ति का मार्ग पाना भी एक चाह नहीं? क्या चाहविहिन होने की चेष्टा भी एक चाह नहीं? क्या आमजन से उपर उठ अध्यात्मिक हो जाना भी एक चाह नहीं? जब एक चाह की गठरी को पाप की नदिया में फैंका सिर्फ इसीलिये कि दूसरी चाह की गठरी लाद लें, तो क्या यह व्यर्थ प्रयत्न और प्रयोजन नहीं?

मानव स्वभाव से बाध्य हूँ. चाहत की जो गठरियाँ अर्जित कर ली है, उसे फेंकने में दर्द सा कुछ उठता है किन्तु नई चाहत की नई गठरी तपाक से आकर जुट जाती है. प्रवचन सुन सुन कर ऐसी ही कितनी चाहतों की गठरियों का आना तो अनवरत जारी है लेकिन फैंकना, बहुत मद्धम गति से हो पाता है. अगर ऐसा ही चलता रहा और नई गठरियाँ इसी गति से जुड़ती रहीं तो वो दिन दूर नहीं, जब यह नाँव डगमगा जायेगी और सारा बोझ लिए इसी पाप की दरिया में डूब जायेगी. अब तो एक चाहत और जुड़ गई कि किसी तरह नैय्या डूबने से बची रहे.

स्वामी जी बोल रहे हैं सीडी प्लेयर में से और मैं अपने मन की बात सुनने में व्यस्त हूँ. मन भारी पड़ रहा है उन सिद्ध महात्मा जी की वाणी पर. खुद को कब नीचा दिखा सकते हैं खुद की नजरों में? वरना तो सो गये होते.

इस बीच स्वामी जी और भी न जाने क्या क्या बोल गये, मैं सुन नहीं पाया और एलार्म से नींद खुली तो सीडी प्लेयर से घूं घूं की आवाज आती थी. जाने कब स्वामी जी ने बोलना बंद कर दिया. रात बीत चुकी है और प्लेयर अब भी चालू है.

प्लेयर ऑफ कर फिर तैयार होता हूँ एक नया दिन शुरु करने को. नींद पूरी हो गई है तो फिर दिनचर्या में जुटने की तैयारी करता हूँ.

क्या पाप, क्या पुण्य, कैसा मुक्ति मार्ग? सब अब रात में सोचेंगे जब दिन भर की थकन के बाद भी मन कचोटेगा और नींद आने से मना करेगी. यही दैनिक चक्र है.

अब दफ्तर के लिए कार लेकर निकला हूँ तो रेडियो लगा लिया है. अब नए वाले साधु मन की बात कर रहे हैँ. मैं रेडियो बंद कर देता हूँ – बताया था न कि नीरस बातों से नींद आ जाती है. गाड़ी चलाते समय सो जाना कितना खतरनाक साबित हो सकता है.

लेकिन ये बात रेडियो से मन की बात बोलने वाले बाबाजी बहुत भली भांति जानते हैँ और उनके लिए सोया हुआ देश का आमजन ही मुफीद है. नींद में चलना और वोट देना हर आमजन जानता है. दुर्घटना के शिकार कितने आमजन हुए, वो भला कौन गिनता है।

कुछ मुश्किलों को सुलझाने की खातिर

खुद को ही उलझाता चला जाता हूँ मैं

आईने में एक अजनबी नजर आता हूँ मैं...

-समीर लाल ’समीर’      

 

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार मार्च 07, 2021 के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/58909357

 

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रविवार, फ़रवरी 14, 2021

इस दुनिया में सोने के हिरन नहीं होते

 


जैसे बचपन में रेल गाड़ी के साथ साथ चाँद भागा करता था और रेल रुकी और चाँद भी थम जाता था। चाँद को भागता देखने के लिए रेल का भागना जरूरी है। जो इस बात को समझता है वो जानता है कि देश के विकास को देखना है तो खुद का विकसित होते रहना आवश्यक है। खुद का विकास रुका तो देश का विकास रुका ही नजर आयेगा। हम आप सब मिलकर ही तो देश होते हैँ। खुद का विकास रोक कर रोज पान की दुकान पर वैसे किस विकास का इन्तजार कर रहे हो और खुद को कोसने की बजाय सरकार को कोस रहे हो।

नेताओं को देखो कितने विकसित होते जा रहे हैं दिन प्रति दिन, इसलिए उन्हें विकास भी दिखता है। जब चुन कर गए थे तो एक बंगला था, आज न जाने कितने प्लाट, मॉल, रुपयों के वाटर फॉल हैं। उनसे शिकायत करोगे कि विकास नहीं हो रहा तो वो नाराज ही होंगे न! देश का विकास देखने के लिए आत्म निर्भर बनो। खुद का विकास करो।

अपने घर में और घर के आस पास कूड़ा फैला कर रखोगे तो देश कैसे स्वच्छ होगा चाहे लाख स्वच्छता अभियान चलता रहे। स्मार्ट सिटी भी हमारी तुम्हारी स्मार्टनेस से ही बनती है। खुद ढपोरशंख बने स्मार्ट सिटी को तलाशने वालों के वही हाथ लगता है जो तुम्हें हाथ लग रहा है।

कंप्यूटर की दुनिया में एक जुमला है ‘गीगो’ – GIGO – ‘गारबेज इन गारबेज आउट’  याने कि कचरा डालोगे तो कचरा ही निकलेगा। ये बात न सिर्फ आपकी सोच पर लागू होती बल्कि इसका जीता जागता उदाहरण देखना हो तो अपने चुनी हुई सरकारें ही देख लो – कचरा चुन कर भेजोगे और आशा करोगे कि वो सोना उगलेंगे तो बौड़म कौन कहलाया- तुम कि जिनको तुमने चुन कर भेजा है?

वैसे जिसे भी चुनो उसको रोल मॉडल बना लो तो अजब सा सुकून मिलता है वरना ठगे से होने का अहसास होता है। ९० फसीदी जनता इसी चक्कर में मुंह बाये बैठी है। यहाँ रोल मॉडल का भक्त हो जाना भी जरूरी है। भक्ति भाव हार्ड वर्क जैसा ही है, जिसका कोई आल्टर्नेट नहीं है। जैसे कि एक थे जो गरीबी को मानसिक अवस्था मानते थे और एक हैँ कि पकोड़े तलने को रोजगार मानते हैँ। दोनों का निचोड़ गीगो ही है मगर काँटों को दरकिनार कर गुलाब तोड़ लाना या कीचड़ से दामन बचा कर न सिर्फ कमल तोड़ लाना बल्कि उसकी डंठल से कमलगट्टे की सब्जी बना कर सुस्वादु भोजन उदरस्थ कर संतुष्ट हो लेना भी इसी मान्यता को प्रमाणित करना है।

सूरज को शीशे में कैद कर उसकी जगमग से किसी की आखों को जगमग कर उसे किसी तिलस्म में गुमा देना ही राजनीति का आधार है। यही राजनीति का मूल मंत्र है। हमारे सभी नेता ऐसा ही आईना थामे हमें दिगभ्रमित करने की महारत हासिल किये हुए हैँ और हम हैं कि उन्हें अपना रहनुमा मानकर भक्तिभाव में लीन सोचते हैं कि वो हमें राह दिखा रहे हैं। चौंधियाई आंखों से दिखते मंजर में सरकार में छिपे मक्कार भी परोपकार करते नजर आते हैँ। इससे बेहतर और मुफ़ीद बात क्या हो सकती है सत्ता में काबिज लोगों के लिए।

काश!! कोई ऐसी क्रिस्टल बॉल बने जो आमजन को उस आईने का सच बताए जो हर नेता अपने हाथ में थामें उनकी आँखों को चौंधिया रहा है। यूवी रे वाले चश्मे तो बाजार का वैसा ही भ्रम है जैसे कि गोरा बनाने वाली बाजार में बिकती क्रीम। हम से बेहतर इसे कौन जान पाएगा? अब तो कन्हैया लाल बाजपेई की निम्न पंक्तियां जीवन का सूत्र बन गई है:

आधा जीवन जब बीत गया, बनवासी सा गाते रोते
तब पता चला इस दुनियां में, सोने के हिरन नहीं होते।

काश!! आमजन भी इस सत्य को जितना जल्दी पहचान ले – उतना बेहतर!!    

मगर आमजन का क्या है- इतना उदार है कि सीटी बजाने को ओंठ गोलियाता है मगर निकलती बस हवा है वो दोष ठंड को मढ़ देता है। ठंड भी सोचती होगी कि तेरी सीटी न बजने में मेरा क्या दोष! नाच न आवे आँगन टेढ़ा!!

हम वही तो हैँ जो सड़क की टूट फूट का जिम्मेदार बरसात को मानने के आदी हैँ।

-समीर लाल ‘समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के सोमवार फरवरी १५, २०२१  के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/58444040

 

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शनिवार, दिसंबर 05, 2020

बहुत कमजोर होता है जिज्ञासुओं का पाचन तंत्र

 


तिवारी जी का कहना है कि आजकल वो फैशनेबल हो गए हैं। अचरज बस इस बात का है कि तिवारी जो पहले भी इसी लिबास में रहते थे और आज भी, चलते भी उसी साइकिल पर हैं पिछले कई दशकों से, फिर फैशनबेल होने से क्या फरक पड़ा?

जिज्ञासुओं का पाचन तंत्र हमेशा से कमजोर माना गया है। कोई भी जिज्ञासा पचा ही नहीं पाते। इसीलिए जिज्ञासु अच्छे नेता नहीं बन पाते होंगे। कठोर त्वचा और घनघोर पाचन क्षमता तो नेतागिरी के लिए आवश्यक तत्व हैं। गाली खाने से लेकर पैसा पचा जाने तक में न कोई शर्म आए और न ही डकार, तो ही आप सफल नेता बन सकते हैं।

जिज्ञासु प्रवृति का होने की वजह से मैं भी अपनी जिज्ञासा पचा न पाया और उनसे पूछ बैठा कि आप अपनी ही बात कर रहे हैं न? मुझे तो आप बिल्कुल पहले वाले ही नजर आ रहे हैं, क्या बदला है आपके फैशनेबल हो जाने से?

तिवारी जी उन्हीं जानी पहचानी नजरों से मुस्कराते हुए मुझे देखा जिसमें वो बिना बोले ही बोल जाते है कि तुम कितने बड़े बेवकूफ हो, कुछ समझते ही नहीं? इन नजरों का फायदा उनको तब पक्का मिलेगा जब कभी वो चुनाव जीत कर मंत्री बन जाएंगे। हर नेता चुनाव जितने के बाद उनके वादे याद दिलाने पर ऐसे ही तो मुस्कराता है और बिना बोले बोल जाता है कि तुम कितने बड़े बेवकूफ हो!!

मुस्कराने के बाद करीबी संबंधों की वजह से उन्होंने बताया कि आजकल वो अधिकतर समय स्व-उत्थान में लगा रहे हैं। सफलता के सिद्धांत सीख रहे हैं। जीवन में तरक्की करने के सूक्ष्म सूत्र समझ रहे हैं। ऐसी ऐसी गहन विधायें जान गए हैं कि किसी भी मनचाही मंजिल पर पहुँचने के लिए मंजिल खुद चल कर आप तक आए।

मैं आश्चर्य चकित सा उनकी बात सुन रहा था। मैंने कहा कि आप कहाँ से और कैसे सीख रहे हैं यह बाद में बताइएगा मगर पहले यह बतायें कि उम्र के इस पड़ाव में, जहाँ से इंसान ढलान पर उतरने की तैयारी करता है, तब आप चढ़ने के गुर सीखने निकले हैं?

तिवारी जी पुनः उन्हीं जानी पहचानी नजरों से मुस्कराये। फिर बोले उसका भी जबाब देता हूँ।  मगर पहले यह जान लो कि यूट्यूब पर ज्ञान का सागर है। आजकल यही फैशन ट्रेंड है। हजारों मोटिवेशनल स्पीकर सुबह से शाम तक यही सिखा रहे हैं। बस आपमें सीखने की ललक होना चाहिए। पिछले दो दिनों से तो एक स्पीकर को सुन कर मैं चार बजे सुबह उठ जाता हूँ यूट्यूब सुनने के लिए। वो बता रहे थे कि यदि आप २१ दिन तक कोई भी कार्य लगातार करें तो वह आपकी आदत बन जाता है। २१ दिन के बाद ४ बजे सुबह उठना मेरी आदत बन जाएगा। मैंने तिवारी जी से पूछा तो नहीं किन्तु जो बंदा रात में नींद की गोली खाकर सोता हो, वो चार बजे सुबह जागने की आदत डालने पर क्यूँ उतारू है? और अगर आदत पड़ भी गई तो जाग कर करेगा क्या? सारा दिन जो चौक पर पान की दुकान पर बैठा समय काटता है, उस अकेले के लिए पान वाला चार बजे तो दुकान खोलने से रहा। वैसे भी इन मोटिवेशनल स्पीकर्स को जरूरत से ज्यादा सुनने में और गंजेड़ी हो जाने में कोई खास फरक नहीं है। दोनों ही  निष्क्रियता के चरम पर बैठे मंजिल के खुद चले आने की ललक जगाए बैठे हैं।

तिवारी जी आगे बोले कि उम्र की तो हमसे बात करो मत – जब ७८ साल में बंदा अमरीका का राष्ट्रपति बन सकता है तो मैं कुछ तो बन ही सकता हूँ। मैं उनको क्या बताता कि वो ७८ साल की उम्र में राष्ट्रपति बना जरूर है मगर वो इसके पहले सारा जीवन पान की दुकान पर बैठा ज्ञान नहीं बाँट रहा था।

मैंने उनको समझाया कि नेता बनने के लिये ही अगर यह सब सीख रहे हैँ तो २१ दिन लगातार झूठ, वादा खिलाफी, गुंडई, रिश्वतखोरी, असंवेदनशीलता, अमानवीयता, घड़ियाली आँसू बहाने की प्रेक्टिस करके इन सबको   अपनी आदत बनाइये, फिर देखिए कैसे सफलता की मंजिल आप तक खुद चल कर आती है।  कैसे आपका ही नहीं आपके जानने वालों का जीवन भी सफल हो जाता है।

तिवारी जी आज पहली बार कुछ अलग तरह से मुस्कराये, मानो कह रहे हों कि मैं भी कहाँ यूट्यूब के चक्कर में पड़ा था, असली गुरु तो तुम निकले। आज पहली बार तिवारी जी एकदम मोटिवेटेड दिखे।

उनके इस भाव को देखकर मेरा मन हो रहा है कि मैं भी अपना यूट्यूब चैनल शुरू कर ही दूँ मोटिवेशनल स्पीकिंग का। लोग यही तो चाहते हैं इसीलिए फैशन में भी है।

-समीर लाल ‘समीर’

 

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार दिसम्बर ६, २०२० के अंक में:

http://epaper.subahsavere.news/c/56820874

 

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शनिवार, अक्टूबर 03, 2020

घोटालों के राज की तरह ही कई चीजें एकाएक खुलती हैं

 


आज तिवारी जी सुबह सुबह चौक से दाढ़ी मूंछ सेट करवा कर और बाल रंगवा कर जल्दबाजी में  घर लौटते दिखे। साथ ही धोबी से प्रेस करवा कर अपना कुर्ता भी लिए हुए थे। मैंने उन्हें प्रणाम करके जब चाय पीने की पेशकश की तो वो कहने लगे कि ये चाय वाय के ठेले पर बैठ कर गप्प सटाका करना तुम निट्ठलों का काम है। मुझे समझ नहीं आया कि हरदम खाली बैठे रहने वाले तिवारी जी जो हमेंशा इसी फिराक में चौक की पान की दुकान पर बैठे रहते थे कि कोई चाय पिलवा दे, उनको अचानक क्या हुआ? ऐसी कौन सी व्यस्तता आ गई कि चाय की दुकान पर बैठने वाले सभी निट्ठले नजर आने लगे। व्यस्तता न हुई जैसे कोई ज्ञान हो गया, जरा सा आ क्या जाये, सारी दुनिया मूर्ख नजर आने लगती है।

दूसरों के बारे में  बेवजह जानने की उत्सुकता ही शायद इंसानों को जानवरों से भिन्न करती हो, अतः मैं भी इंसान होने का कर्तव्य निभाते हुए तिवारी जी के साथ टहलते हुए उनके घर की तरफ ही चलने लगा। हालांकि उनका घर मेंरे घर से विपरीत दिशा में है मगर अपने घर जाकर तो उनकी व्यस्तता का पता चलेगा नहीं। रास्ते में  मैंने उनसे उनकी व्यस्तता की वजह जाननी चाही। एकाएक गंभीर भाव से उन्होंने बताया कि आज तीन मंच करना है और अब तो यह लगभग रोज ही की व्यस्तता हो चली है।

मैं अज्ञानी समझ न पाया कि मंच करना क्या होता है? मैंने कहा कि चुनाव आने वाले हैं इसलिए मंच बनाने का ठेका लेने लगे हैँ क्या? वह मेंरी अज्ञानता पर झुंझलाहट भरा ठहाका लगाते हुए कहने लगे कि ३-३ कवि सम्मेलनों में  शिरकत करनी है। कविताएं पढ़नी हैं। सब अलग अलग शहरों में  हैं और एक तो अमरीका में  है।

मेंरी तो बुद्धि ही चकरा गई कि कोई व्यक्ति एक ही दिन में  दो अलग अलग शहरों में और फिर उसी दिन अमरीका में भी कवि सम्मेलन में कैसे शिरकत कर सकता है? हालांकि मैं यह तो जानता हूँ कि कई कवि एवं विद्वान साहित्यकार बिना अमेंरिका गए भी अपने बायोडाटा में  अमरीका एवं अन्य अनेकों देशों की यात्रा लिखते लिखते अमरीका हो भी आए।

मैं हँसा और मैंने तिवारी जी से कहा कि माना आपके मन में आगे चल कर चुनाव लड़ने का विचार है। लेकिन अभी तो आपको सत्ता मिली भी नहीं है और फेंकने में तो आप सत्ताधीष को भी पछाड़ दे रहे हैं।

उन्होंने सभी बुद्धिजीवियों द्वारा कहा जाने वाला वाक्य दुहराया कि तुम नहीं समझोगे! अरे, आजकल कवि सम्मेलन के लिए कहीं जाना नहीं पड़ता, घर से बैठे बैठे कंप्यूटर से हो जाता है। सारी दुनिया जान गई है ज़ूम, टीम, फेसबुक लाईव और भी न जाने क्या क्या!! मगर तुम निट्ठलों को चाय की दुकान पर गप्प मारने से फुरसत मिले तब न।  

घोटालों के राज की तरह ही कई चीजें एकाएक खुलती हैं। उसी तर्ज पर एकाएक मेंरे ज्ञानचक्षु खुले। मैंने जाना कि  कैसे आजकल सुबह से रात तक कवि सम्मेलन चला करते हैं। सुनने वाले तारीफ में कमेंट कर करके अपने होने का पता देते हैं ताकि अगले कवि सम्मेलन में उनको भी बुलाया जावे और जिनको आज बुलाया है वो उस वक्त सुनने आवें। उन्होंने बताया कि आम कवि सम्मेलन की तरह ही ऑनलाइन कवि सम्मेलन के भी कई गुर एवं हथकंडे हैं, जो इसे अलग विधा बनाता है। उस पर फिर कभी विस्तार से तुमसे बात करूंगा।

मैंने कहा जी बस एक शंका का निवारण और कर दें कि आपने कुर्ता प्रेस करा लिया और पायजामा क्यूँ नहीं?   

वो बोले इस हेतु प्रशासनिक समझ की जरूरत होती है। मंत्री जी की जायजा यात्रा के दौरान उतना ही हिस्सा सजाया जाता है जो उन्हें दिखाया जाना है। पायजामा भला स्क्रीन में कहाँ दिखता है। आजकल पायजामें की प्रेस का और जूता पालिश का खर्च तो एकदम रुक गया है, यह बड़ा आराम है। मैंने पूछा मगर कवि सम्मेलन के पैसे भी तो मिलना बंद हो गए होंगे? इस पर वह शरमाते हुए कहने लगे कि पैसे तो पहले भी नहीं मिलते थे, इस बहाने कम से कम कवि सम्मेलन तो मिलने लगे। 

-समीर लाल ‘समीर’

भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे में रविवार अक्टूबर ४, २०२०

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शनिवार, सितंबर 19, 2020

सकारात्मकता ही सफलता की कुंजी है।

 


कहते हैं आज के इस कोविड काल में सकारात्मकता ही सफलता की कुंजी है। सकारात्मक सोच एवं सुरक्षात्मक उपाय अपनाते रहें तो शायद इस काल का पार कर जाएं।

शुरुवात में तो दिन दिन भर बैठ कर यही देखते थे टीवी पर की कितने और मरे? हर बढ़ते आंकड़े के साथ दिल की धड़कन बढ़ती जाती। जितनी बार वो टीवी पर विज्ञापन आते कि हाथ साबुन से २० सेकेंड तक धोते जाओ, उतनी बार उठाकर हाथ धोने जाते। फिर सीएनएन ने बताया की जितनी देर मे दो बार हैप्पी बर्थ सांग  गाओगे, २० सेकेंड पूरे हो जायेगे। देखते देखते धुलते धुलते हाथ बाकी के शरीर से गोरा हो गया और कंठ हैप्पी बर्थडे गाने में माहिर मगर करोना का भय टिका रहा यथावत।

विशेषज्ञों ने सलाह दी कि टीवी दिन में एकबार १० मिनट के लिए देखो वो भी सिर्फ यह देखने के लिए कि सरकार का कोई नया आदेश तो नहीं आया जो आपको पालन करना है। टीवी देखना बंद कर दिया। हाथ धोना बंद नहीं किया अतः भय मानस पर छाया रहा। अब हैप्पी बर्थ डे याने तुम जिओ हजारों साल, साल के दिन हों पचास हजार गाते हुए लगता कि करोना उससे अपने लिए गाया मान कर दिन प्रति दिन विस्तार प्राप्त कर रहा है। आखिर दुनिया भर में उसे याद करके कितने सारे लोग हाथ धोते हुए यही गा रहे है तो दुआओं का असर तो होना ही था। जब गुडडु ये गाना १ साल की उम्र से सुनते आज ८० के होकर चुस्त दुरुस्त हैं तो भला करोना का क्या बिगड़ना है। यही सोच कर अब गाना बिना गाए हाथ धोने लगे हैं।

टीवी पर समाचार देखने की आदत तो शराब पीने की लत से भी ज्यादा खराब बताई गई है। शराब और गांजे की आदत तो छुड़वाई जा सकती है। मगर टीवी पर समाचार देखने का चस्का ऐसा होता है कि बिना देखे जीवन नीरस लगने लगता है। दरअसल दूरदर्शन वाले समाचारों में वो नशा न था जो आजकल वालों में हैं। धूमधड़ाके के साथ ऐसा लगता है समाचार नहीं, कोई फिल्म देख रहे हैं जिसकी एकदम मस्त पटकथा लिखी गई है, सटीक डॉयलॉग लिखे गए हैं और जैसा निर्देशक ने चाहा है वैसा ही मनभावन अभिनय किया गया है अपने फाइनेंसर का पूरा ध्यान रखते हुए। हर समाचार रूपी फिल्म का उद्देश्य मात्र इतना की फाइनेंसर को किसी न किसी रूप से फायदा मिलता रहे। फाइनेंसर आका होता है। उसे नाराज नहीं किया जा सकता। इतिहास गवाह है की जिसने भी उसे नाराज किया है, उसकी दुकान सिमट गई है।

खैर टीवी का नशा छुड़ाने के लिए सोशल मीडिया का हाथ थामा तो पाया की यह तो गाँजा छुड़ाने के लिए चरस पीने लगे। व्हाट्सअप्प, ट्वीटर, फेसबुक, ईमेल जहाँ जाओ, वहाँ करोना पसरा पड़ा है। कोई इलाज बता रहा है तो कोई इसे लाइलाज बता रहा है। कुछ बुद्धत्व को प्राप्त लोग इसे बीमारी मानने को ही तैयार नहीं और इसे अफवाह बता कर निकल जा रहे हैं।  कोई घर पर हैन्ड सेनेटाइज़र बता रहा है तो कोई इम्यूनिटी बढ़ाने का तरीका मगर ले देकर बात करोना की ही हो रही है और हम अभी भी हाथ धो धो कर करोना भगाने में लगे हैं और वो दिमाग पर चढ़ अपनी विकास यात्रा में लगा है।

लगने लगा की कहां चले जाएं जहाँ इसकी कोई बात न हो। कोई जिक्र ही न आए और यह हमारे सिर से उतरे। कहते हैं न कि उदण्ड बच्चे की बदमाशी बंद करवानी हो तो उसे इग्नोर करो। उसकी बात ही न करो। थोडी देर में अपनी उपेक्षा देख कर वो बदमाशी करना बंद कर देगा।

मगर वैसी कौन सी जगह है? क्या देखूँ -क्या सुनूँ? कुछ नहीं समझ आता- जित देखूँ तित लाल की तर्ज पर हर तरफ करोना की बात – कारोना मय वातावरण।

तब एकाएक एक ईश्वर का भेजा कोई दूत मुझे मन की बात सुनने की सलाह दे गया। तब जा कर इस बैचेन दिल को करार आया। न करोना की कोई बात, न आंकडे और न इससे होने वाले नुकसानों की कोई बात। अहा!! कोई तो ऐसी जगह मिली। आराम से बैठो- देशी कुत्तों की प्रजातियाँ जानो। मोर को दाना खिलाओ। सब सुनो बस करोना को छोड़ कर। ऐसे शुद्ध वातावरण और करोना मुक्त स्थल आज बचे कहाँ हैं।

आज फिर हमने अपने आपको विश्व गुरु साबित कर दिया। मैं करोना भय से मुक्त हुआ। आपको भी भय मुक्त होना है तो मन की बात सुनो।

गौतम बुद्ध भी कहा करते थे की जब बाहर बहुत कोलाहल हो तो मन की बात सुनना चाहिए। आज जाकर उनकी बात का गूढ़ अर्थ समझ आया।

-समीर लाल ‘समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार सितंबर २०,२०२० के अंक में:

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शनिवार, अगस्त 22, 2020

सुझावों का व्यक्तित्व बहुत कमजोर होता है


तिवारी जी को किसी ने बताया था कि अगर जीवन में सफल होना है, तो अपना एक मेंटर (उपदेशक) बनाओ। साफ शब्दों मे कहा जाए तो उस्ताद बनाओ। उन्हीं उस्ताद से उन्होंने सीखा था कि जनसेवक को जनता के लिए किए जा रहे कार्यों और योजनाओं के लिए जनता से सुझाव लेना चाहिये। उन सुझावों को अच्छी नजर से देखना परखना चाहिये। फिर अपने साथियों (जिसे मंत्रीमंडल भी कहते हैं) से सलाह करना चाहिये। परियोजना अमल हो जाने पर जनता से फीडबैक लेते रहना चाहिये। साथ ही यह भी समझाया कि  ‘निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय।
आई आई टी में दाखिले के लिए जो मास्साब ट्यूशन पढ़ाने आते थे, उनकी दाखिले के बाद क्या जरूरत? अतः जैसे ही सफल हो गए तो सबसे पहले तो मेंटर (उस्ताद) को अलग किया। मगर सलाहें झोले में सहेज कर रख लीं।
कुर्सी पर काबिज होते ही जो मकान मिला वो एकड़ों में फैला था। उसी के आंगन के आखिरी कोने में निंदक की कुटिया बनवा दी गई। निंदक शोर मचाता तो काम में विघ्न पड़ता अतः तिवारी जी का घर साउण्ड प्रूफ कर दिया गया। कुर्सी में बड़ी ताकत होती है अतः आनन फानन में उस कुटिया में निंदक के आने जाने का मार्ग भी पिछली सड़क से करवा दिया गया। लेकिन उस्ताद की सलाह से टस से मस न हुए। बहुत बाद में पता चला कि निंदक का दर्जा देकर उस्ताद को ही उस कुटिया में रखा गया था। जिसकी बातें सफल होने तक सलाह हुआ करती थीं, उसी की सलाहें सफल होने के बाद निंदा लगने लगी थीं। यही दुनिया का नियम हैं और मानव का स्वभाव।
जनता के सुझावों को इतना अधिक महत्व दिया गया की तिवारी जी ने एक सुझाव मंत्रालय ही बना डाला। उस मंत्रालय का स्वतंत्र प्रभार भी खुद अपने पास रखा।
जनमानस की भलाई हेतु हर परियोजना के लिए सुझाव मँगवाए जाते। जैसे ही सुझाव जनता से चल कर मंत्रालय में दाखिल होते वो सरकारी हो जाते। उन्हें फाइल में रखवाया जाता। सुझावों को किसी की बुरी नजर न लग जाए अतः उन्हें देखने पर ही अघोषित पाबंदी लगा दी गई। उन फाइलों को अलमारी में ताला लगा कर बंद करवा दिया जाता।
सुझावों का व्यक्तित्व बहुत कमजोर होता है। जैसे ही परियोजना पूरी हो जाती है तब कुछ सुझाव, सुझाव से बदल कर यथार्थ हो जाते हैं और कुछ सुझाव बेकार। अब किसका क्या हुआ, ये तो पता करोगे तो पता चलेगा मगर यह तय है कि परियोजना आ गई है अतः सुझाव अब सुझाव नहीं रहे। अब उन्हें सरकारी रद्दी का दर्जा प्राप्त हो गया है। जनता के मासूम हाथों से चलकर सरकारी कागजों के राजमार्ग से गुजरते हुए सरकारी रद्दी में तबदील होना ही  सुझावों की जीवन यात्रा है।
अतः उस परियोजना से संबंधित सुझावों की सरकारी रद्दी को कतरन बनवा कर उसे पैकिंग मटेरीयल की तरह से इस्तेमाल करने के लिए नीलाम करवा दिया जाता। इस तरह से तिवारी जी ने, न सिर्फ पैकिंग के श्रेत्र में देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए एक सफल कदम उठाया बल्कि पर्यावरण के प्रति अपनी सजगता भी दर्शाई। एक तीर से दो निशाने तो बहुतेरे लगा लेते हैं, लेकिन तिवारी जी का तो अंदाज ही निराला है। अतः तीसरा निशाना उनके चाहने वालों ने यह कह कर लगवाया कि इसे कहते हैं मौलिक सोच।
वह अपने साथियों से सभी परियोजनाओं पर सलाह लेते। सभी मंत्रीमंडल के साथी बारी बारी अपनी सलाह रखते, जिसे तिवारी जी कान में यूएनओ स्टैन्डर्ड वाले ट्रांसलेटर हैडफोन लगा कर ध्यान से सुना करते। ट्रांसलेटर हैडफोन की खासियत यह होती हैं कि उसमें से आ रहा संवाद किसी भी भाषा में बोला गया हो, सुनने वाले की भाषा में परिवर्तित होकर सुनाई देता है। यह प्रोग्रामिंग के जरिए उस हैडफोन को सिखाया जाता है।  तिवारी जी के निर्देश पर उनके हैडफोन से हर संवाद का अनुवाद सिर्फ इतना ही होता था कि  ‘जी  साहब, आपने बिल्कुल सही सोचा है और मैं आपका अनुमोदन करता हूँ। आपकी जय हो, आप हो तो सब मुमकिन है’। तिवारी जी अपने साथियों की सलाह सुन कर आनंदित होते और उनको धन्यवाद ज्ञापित करते। धन्यवाद पाकर सभी साथी प्रसन्न होते कि  उनकी सलाह तिवारी जी पसंद आई। एक प्रसन्न टीम ही टीम लीडर की लीडरशिप की सफलता का प्रमाण होती है। इस तरह से तिवारी जी ने अपनी लीडरशिप का लोहा मनवा लिया था।
परियोजना के अमल होते ही तिवारी जी अपने उस्ताद की अंतिम सलाह को अमली जामा पहनाते हुए जनता का फीडबैक लेने के सर्वे कराते। जनता से निवेदन किया जाता की बिना किसी दबाव के निष्पक्ष सर्वे का विकल्प चुन कर तिवारी जी के कार्यों का आंकलन करें। जनता को चार विकल्प में से कोई भी एक चुनना होता बिना किसी दबाव के – (अ) बेहतरीन, (ब) अतुलनीय, (स)अद्भुत, (द) विश्व स्तरीय
अगले दिन सर्वे का परिणाम सार्वजनिक कर दिया जाता। तिवारी जी पुनः किसी नई परियोजना में पुनः इसी परिपाटी को अपनाते हुए अथक लगे रहते और एक सच्चे जनसेवक होने का श्रेय अर्जित करते रहते।  
-समीर लाल ‘समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार अगस्त २३ ,२०२० के अंक में:


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शनिवार, अगस्त 08, 2020

जादूनगरी से आया है कोई जादूगर



नाम है सेवकराम। वह शुरू से पैदावार के पक्षधर रहे। पैदावार में उनकी अटूट आस्था का चरम यह रहा कि जब गाँव मे भीषण सूखा और अकाल पड़ा, तब भी उनके घर में मुन्ना पैदा हुआ। बाकी बरसों में जब जब खेतों में फसल लहलहाती, उनके आँगन में भी नई नई किलकारियाँ गूँजा करतीं।
उनका दूसरा स्वभाव खुद किसी भी बात का श्रेय न लेने का था। अपने खेत में भी चाहें वह खुद कितनी भी मेहनत करके फसल की पैदावार करें, श्रेय सदा मजदूरों को देते। उनका मानना था कि बिना इन मजदूर भाईयों के पसीना बहाये इतनी फसल कभी न होती। इसी वजह से मजदूर और मेहनत करते और वह फसल बेचकर मजदूरों को अच्छी मजदूरी देते। उनके परिवारों का ख्याल रखते और पूरे गांव में खुशहाली पैदा करते। इस तरह मजदूरों की मदद से धन पैदा करके वह खुद भी खासे धनवान हो चले थे।     
देखते देखते उनके आंगन में एक पूरी क्रिकेट टीम मय अंपायर के तैयार हो गई। खुद कभी श्रेय न लेने की आदत के चलते वह इस टीम को भगवान का दिया प्रसाद बताते। प्रसाद को जिस श्रद्धापूर्वक ग्रहण किया जाता है, उसी तरह ग्रहण करते रहे।
उनका यही स्वभाव उन्हें न सिर्फ अपने मजदूरों के बीच बल्कि पूरे गांव में लोकप्रियता के चरम पर ले गया। जैसा कि लोकप्रियता का परिणाम होता है, उनके अंदर भी लोकप्रियता भुनाने की ललक पैदा हो गई, जिसे उन्होंने पुनः ईश्वर का प्रसाद एवं आदेश माना और वह सरपंच हो गए।  कहते हैं न कि वातावरण और माहौल मानसिकता पैदा करता है और इसीलिए शायद आपसी रिश्तों में रोमांस पैदा करने के लिए नवयुगल हनीमून मनाने कश्मीर और स्वीटजरलैण्ड जाते हैं।
राजनीति के वातावरण और माहौल में आते ही उनके भीतर भी कूटनीति और चालबाजी पैदा हुई किन्तु भीतर की पैदाइश का बाहर किसी को पता न लगने देना भी उनके चतुर्भुजीय स्वभाव का तीसरा कोण था। इसी स्वभाव के चलते गाँव वाले सिर्फ उनके आँगन में खेल रही क्रिकेट टीम से परिचित थे अन्यथा अगर भीतर की बात जानें तो वह सब मिला जुला कर कम से कम दो टीमों की मैनेजरी तो काट ही रहे थे। इसे भी वह ईश्वर का गुप्तदान की तर्ज पर दिया गया गुप्तप्रसाद मान कर गुप्त ही बनाए रहते।
सरपंची में भी समस्त कार्यों का श्रेय ठेकेदारों को देकर वह गुप्तदान प्राप्त करते रहे। इस तरह एकत्रित दान से पैदा हुई अकूत संपदा को भी कुछ ऐसा गुप्त रखा कि कोई कानों कान न जान पाया। गुप्त बनाए रखने की इस आदत ने लोकप्रियता में इत्र का काम किया। लोकप्रियता हवा के संग लहराती बलखाती गांव की सरहद पार करके पूरे राज्य में सर्वत्र फैल गई।
इस तरह सेवकराम ने पूरे राज्य की सेवा करने का अवसर पैदा कर लिया। इस सफलता की चढ़ाई चढ़ते हुए उन्होंने तमाम पायदानों को पाठशाला माना और लगन से चालबाजियों के नये नये पैंतरे सीखते रहे। हर पैंतरे को वो नए नए नाम देकर उनके नए स्वरूप पैदा करते। किसी को समाजसेवा, तो कभी जनहित और कभी गरीबों के प्रति अपना दुलार आदि आदि न जाने क्या क्या बताते। इन नामों की पैकेजिंग के भीतर क्या है, उसे वह आदतानुसार गुप्त ही रखते। इस तरह वह आमजन में उनके परिणाम के इन्तजार की ललक पैदा करते। जब इंतजार की घड़ियां असह्य होने लगती, तब वह एक नई ललक पैदा कर देते। सतत ललक की पैदावारी में वह महारत की उस चोटी पर जा पहुंचे, जहाँ से महारत जादूगरी नजर आती है।
इस जादूगरी ने उनके भीतर एक ऐसा जादूगर पैदा कर दिया जो एक पूरी आबादी को हिपनोटाईज करना जान गया था। वो गांव में कचरे के ढेर पर बैठे कव्वे को हरियाली भरे बाग में नाचता मोर बताता और सम्मोहितजन नृत्य करने को मचल उठते और उसका जयकारा लगाते। अब वह नित नए खेल दिखाता। सम्मोहितजनों को कभी देश को सिंगापुर तो कभी हस्तिनापुर बताकर नए नए नजारे दिखाता और तालियां बटरोता।
पैदावारी का वो आज भी उतना ही बड़ा पक्षधर है। इसी के चलते भले ही किसी को रोजगार मिले न मिले मगर वह रोजगार के अवसर पैदा करने में जुटा है। जिस वक्त आपदा की रोकथाम पर काम होना चाहिये, वह उस आपदा से अवसर पैदा करने में जुटा है।
बचपन में जादूगर पी सी सरकार का जादू देखने जाया करते थे और आज सेवकराम की सरकार का जादू। दोनों में ही तालियों की गड़गड़ाहट के रुकते ही अगला खेला पेश कर दिया जाता है। अंतर सिर्फ इतना है कि वो तीन घंटे दिखाते थे और ये पाँच साल।
-समीर लाल ‘समीर’

भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे में रविवार अगस्त ९ , २०२०




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शनिवार, जुलाई 25, 2020

जाओ तो जरा स्टाईल से...


आज एक चिट्ठी आई. उसे देखकर बहुत पहले सुना हुआ एक चुटकुला याद आया.
एक सेठ जी मर गये. उनके तीनों बेटे उनकी अन्तिम यात्रा पर विचार करने लगे. एक ने कहा ट्रक बुलवा लेते हैं. दूसरे ने कहा मंहगा पडेगा. ठेला बुलवा लें. तीसरा बोला वो भी क्यूँ खर्च करना. कंधे पर पूरा रास्ता करा देते हैं. थोड़ा समय ही तो ज्यादा लगेगा. इतना सुनकर सेठ जी ने आँख खोली और कहा कि मेरी चप्प्ल ला दो, मैं खुद ही चला जाता हूँ.
चिट्ठी ही कुछ ऐसी थी. एक बीमा कम्पनी की. लिखा था कि अपने अंतिम संस्कार का बीमा करा लें. पहले बताया गया कि यहाँ अंतिम संस्कार में कम से कम ५००० से ६००० डालर का खर्च आता है और अक्सर तो १०००० डालर तक भी चला जाता है अगर जरा भी स्टेन्डर्ड का किया. साथ में पिछले १० सालों में बढ़े दाम का ग्राफ भी था. पहली नजर में ग्राफ देख कर लगा की इन्होंने भारत के पेट्रोल के भाव का ग्राफ क्यूँ भेजा है? पेट्रोल छिड़क कर जलाएंगे क्या घी के बदले? फिर ध्यान से पढ़ा तो इनके पैकेज का भाव था जो पिछले १० सालों में बढ़ा था. जरा विचारिये कि जब तक आप का नम्बर आयेगा तब तक मुद्रा स्फिति की दर को देखते हुए यह २५००० डालर तक भी हो सकता है. अब अंतिम संस्कार का मामला है, चाहे जो भाव कर दें, करना तो पड़ेगा. यूरोप घूमना तो मंहगाई के चलते आप टाल भी लो. 
आगे बताया गया कि आप अपनी मनपसन्द का ताबूत चुनिये, डिजाईनर. जिसमें आप को आराम से रखा जायेगा. कई डिजाईन साथ में भेजे ताबूत सप्लायर के ब्रोचर के साथ. सागौन, चीड़ और हाथी दाँत की नक्काशी से लेकर प्लेन एंड सिंपल तक. उसके अन्दर भी तकिया, गुदगुदा गद्दा और न जाने क्या क्या.
फिर आपके साईज का सूट, जूते, मोजे, टाई आदि जो आपको पहनाये जायेंगे पूरी बामिंग और मेकअप के साथ. फेमस मेकअप स्पेशलिस्ट मेकअप करेगी, वाह!! यह तो हमारी शादी में तक नहीं हुआ. खुद ही तैयार हो गये थे. मगर उस समय तो खुद से तैयार हो नहीं पायेंगे तो मौका भी है और मौके की नजाकत भी. मलाल इस बात का रह जाएगा कि न तो जिसने सजाया उसको देख पायेंगे और न ही सज धज हम कितने राजा बाबू लगे वो देख पायेंगे.
फिर अगर आपको गड़ाया जाना है तो प्लाट, उसकी खुदाई, उसकी पुराई, रेस्ट इन पीस का बोर्ड आदि आदि. अगर जलाया जाना है तो फर्नेस बुकिंग और ताबूत समेत उसमें ढकेले जाने की लेबर. सारे खर्चे गिनवाये गये. साथ ही आपको ले जाने के लिये ब्लैक लिमोजिन आयेगी उसका खर्चा. अभी तक तो बैठे नहीं हैं उतनी लम्बी वाली गाड़ी मे. चलो, उसी बहाने सैर हो जायेगी. वैसे बैठे तो ट्रक में भी कितने लोग होते हैं? मगर लेकर तो ट्रक में ही जाते हैँ.
हिट तो ये है कि आप हिन्दु हैं और राख वापस चाहिये तो हंडिया का सेम्पल भी है और उसे लकड़ी के डिब्बे में रखकर, जिस पर बड़ी नक्काशी के साथ आपका नाम खोदा जायेगा और आपके परिवार को सौंप दिया जायेगा. हिन्दुत्व का इतना विश्वव्यापी डंका बज रहा है और कोई बता रहा था कि हिन्दुत्व खतरे में है.
इतने पर भी कहाँ शांति-फूल कौन से चढ़वायेंगे अपने उपर, वो भी आप ही चुनें. गुलाब से लेकर गैंदा तक सब च्वाइस उपलब्द्ध है.
अब जैसी आपकी पसंद वैसा बीमा का भाव तय होगा. चाहो तो इत्र भी छिड़क देंगे. थोड़ा एक्स्ट्रा दाम और दे देना. अम्मा कहा करती थीं कि जितना गुड़ डालोगे, उतनी मीठी खीर बनेगी. खीर तो चलो अगर मीठी बनाते तो खाते भी खुद ही न. यहाँ तो जब निकल लेंगे उसके बाद की खीर पकवाई जा रही है.
तब से रोज उस बीमा वाले का फोन आता है कि क्या सोचा? जल्दी करिए वरना देर हो जायेगी. आधा दिल तो उसकी हड़बड़ी देखकर बैठा जाता है की पट्ठे ने कहीं कुंडली बांचना तो नहीं सीख लिया है इसलिए उसे पता है देर हो जायेगी? कोई आश्चर्य नहीं होगा की उसने कुंडली बांचना सीख लिया हो इस हड़धप में कि भावी विश्वगुरु की विधा में पारंगत रहेंगे तो काम ही आयेगा. 
क्या समझाऊँ उन्हें कि भाई, यह सब आप धरो. हम तो भारत के रहने वाले हैं. समय से कोशिश करके भारत लौट जायेंगे. यह सब हमको शोभा नहीं देता.
हमारे यहाँ तो दो बांस पर लद कर जाने का फैशन है, अब किसी का कंधा दर्द करे कि टूटे. यह उठाने वाला जाने और उस पर खर्चा भी उसी का. अपनी अंटी से तो खुद के लिये कम से कम इस काम पर खर्च करना हमारे यहाँ बुरा मानते है.
भाई, अमरीका/कनाडा वालों, आप लोगों की हर अदा निराली है. कम से कम ये वाली अदा तो आपकी आपको ही मुबारक.
समीर लाल ‘समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जुलाई 26,२०२० के अंक में:
http://epaper.subahsavere.news/c/53749498

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