तुम अनंत हो -----------------
मैं रेत पर लिखता हूँ अपना नाम और
फिर देर तक उसमें खोजता हूँ तुमको!
तुम दिखने ही वाली थी कि
आकर एक लहर पोंछ जाती है मुझे,
मेरे अरमान,
और बहा ले जाती है तुमको अपने साथ –
खो जाने को उस अनंत में।
और मैं सोचता हूँ तुमको...
क्या मेरे नाम में तुम हो,
या तुम्हारे होने से है मेरा नाम?
जाने किस इबारत में तुम हो,
और मैं खोजता हूँ तुमको कहाँ!
कितना वक्त गुजर गया,
तब जाकर जाना है मैंने-
कि तुम तो अनंत हो,
और अनंत में ही तुम हो!
-समीर लाल ‘समीर’








