प्याली
से उठती भाप
जाने कहाँ खो गई
चाय की उस आखिरी
चुस्की के साथ
मगर चाय का स्वाद
घुल रहा है अब भी
जुबान पर मेरी
और नथुनों में बस रही है
अदरक की खुशबू
जो आ बसी है उस
भाप के साथ –
यही सिलसिला है हर शाम का
यूं मुझे चाय पसंद नहीं
मगर इसी प्याली मे समाई
तुम्हारी याद ही तुम हो
और इन्हीं लम्हों से
हर लम्हा गुजरना
आदत में शुमार है मेरी
-समीर लाल ‘समीर’
youtube पर देखें:
https://youtu.be/9sKLddww6PE?si=TIWa0kPCScuBTj1y










4 टिप्पणियां:
"यूं मुझे चाय पसंद नहीं"
अच्छा लगा नापसंद का आदत में शुमार हो जाना
चाय भले ही पसंद नहीं, लेकिन उसमें कुछ तो बात है जो ध्यान खींच लेती है बरबस ही,,,
आज लगभग १०-१२ साल बाद सही से ब्लॉग खोल कर देखा , जितने भी उस समय के ब्लॉग थे सभी पर अंतिम रचना 10 12 साल या 8 -9 साल पुराणी दिख रही है! 5 -4 ब्लॉग पर नयी रचनाए देखने को मिली! बहुत अच्छा लगा जो आप अभी तक ब्लॉग पर निरंतर बने हुए हो... कुछ व्यक्ति टाइम प्रूफ होते है....
आभार :)
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