प्याली से उठती भाप
जाने कहाँ खो गई
चाय की उस आखिरी
चुस्की के साथ
मगर चाय का स्वाद
घुल रहा है अब भी
जुबान पर मेरी
और नथुनों में बस रही है
अदरक की खुशबू
जो आ बसी है उस
भाप के साथ –
यही सिलसिला है हर शाम का
यूं मुझे चाय पसंद नहीं
मगर इसी प्याली मे समाई
तुम्हारी याद ही तुम हो
और इन्हीं लम्हों से
हर लम्हा गुजरना
आदत में शुमार है मेरी
-समीर लाल ‘समीर’
youtube पर देखें:
https://youtu.be/9sKLddww6PE?si=TIWa0kPCScuBTj1y










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