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रविवार, जुलाई 12, 2026

तुम आदत में शुमार हो मेरी

 


प्याली से उठती भाप

जाने कहाँ खो गई

चाय की उस आखिरी

चुस्की के साथ

मगर चाय का स्वाद

घुल रहा है अब भी

जुबान पर मेरी

और नथुनों में बस रही है

अदरक की खुशबू

जो आ बसी है उस

भाप के साथ –

यही सिलसिला है हर शाम का 

यूं मुझे चाय पसंद नहीं

मगर इसी प्याली मे समाई

तुम्हारी याद ही तुम हो

और इन्हीं लम्हों से

हर लम्हा गुजरना 

आदत में शुमार है मेरी

-समीर लाल ‘समीर’

youtube पर देखें: 

https://youtu.be/9sKLddww6PE?si=TIWa0kPCScuBTj1y


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सोमवार, दिसंबर 19, 2016

मैं बेवफा सही..वादा फरामोश नहीं..


कभी मेरा मन था कि
एक कानूनी कागज पर
शपथ पत्र की शक्ल में
अपनी मोहब्बत
और
वफा की दुहाई
दर्ज कर रख छोडूँ तुम्हारे हवाले..
ताकि एक सनद मुझे रोके और बाध्य करे,
मेरे लिए बेवफा होना कानूनी अपराध हो जाये...
मगर हालिया हालातों ने
मेरी सोच को लगाम दी है..
जब नोट पर लिखे वादे से
सरकार मुकर जाती है..
तो बेहतर है कि हम मोहब्बत करने वाले
एक ही इल्जाम सर पर लेकर जायें
और वो हो बस बेवफाई का...
कम से कम वादा खिलाफी का इल्जाम
तो हम मोहब्बत करने वालों पर न आयेगा..


-समीर लाल ’समीर’

चित्र साभार: गुगल
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बुधवार, अक्टूबर 28, 2015

जिल्द इक किताब का...

दो काल खण्ड
इस जीवन के
और उन्हें जोड़ता
वो इक लम्हा
जो हाथ पसारे
लेटा है इस तरह
दोनों को समेटता
मानिंद जिल्द हो
मेरी जिन्दगी की
किताब का!!

-समीर लाल ’समीर’


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रविवार, अक्टूबर 18, 2015

टैटू पसंद लड़की



वो टैटू पसंद लड़की
चिपका लाती
दायें गाल पर तिरंगा
और
बायें गाल पर 
चाँद सितारा हरियाली
वो करवट बदलती
कि
बदल जाती जमाने की नजर!!
सहम जाती
वो टैटू पसंद लड़की!!

-समीर लाल ’समीर’
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रविवार, मार्च 01, 2015

अदृश्य दृश्य

दफ्तर आते जाते अक्सर ही ट्रेन की उपरी मंजिल में बैठ जाता हूं. घोषित ’शांत क्षेत्र’ है अर्थात आपसी बातचीत, फोन आदि की अनुमति नहीं है. अक्सर मरघट की सी शांति की बात याद आती है इस जगह. मगर जब आप किसी से बात नहीं कर रहे होते तो मन के भीतर ही भीतर कितनी सारी बातचीत कर रहे होते हैं यह देखने वाले जान ही नहीं सकते. ऐसी बातें जो यूँ तो शायद ही कर पायें कभी मगर दोनों पात्र खुद ही के भीतर आपस में प्रश्न उत्तर करते, झगड़ते, विवाद करते, जबाब माँगते, उलझन सुलझाते, हँसते और जाने क्या क्या और एकाएक आप खुद को डपट देते हैं कि ये क्या पागलपन है, खुद ही उलझे हो अपने भीतर ही भीतर बातचीत में खुद को भ्रमित करते उसी स्वनिर्मित भ्रम की दुनिया में जो तुमने खुद ही गढ़ ली है बिना कुछ देखे, बिना कुछ जाने.

खुद की झिड़की सुन सकपकाया सा देखने लगता हूँ खिड़की से बाहर. भागती इमारतें, पेड़, सड़के और ठहरा हुआ मैं. भागती ट्रेन के भीतर बैठे यही अहसास कि सब कुछ भाग रहा है और थिर हूँ मैं और थमा हुआ है वक्त मेरा कि एकाएक नजरों की सामने से भागती इमारतें, पेड़ सब बदल जाते हैं कुछ चेहरों में, कुछ ऐसे स्थानों में जो यादों में कहीं दफन हैं और फिर बातचीत का सिलसिला शुरु- वही प्रश्न उत्तर, वही झगड़े, वही विवाद, वही उलझाव सुलझाव, हँसी ठहाके, क्रुदन, खुशबू का अहसास, साथ गुजारे पल और फिर वही खुद को खुद की झिड़की. चेहरे के बदलते भाव और फिर वही खिड़की के बाहर दिखते बदलते अदृश्य दृश्य.

कोई भीड़ में तन्हा और कोई अकेला ही भीड़..समय वही..वक्त का तकाजा जुदा जुदा..

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डंडी से ढोल पीटता बाप

और दो बाँसों के बीच

बँधी रस्सी पर

संभल संभल पर खुद को संभालती

डगमग डगमग करतब दिखाती

परिवार के पेट की खातिर

मैली कुचैली फ्राक में छोटी नटनी गुड़िया..

तालियाँ बजाते तमाशबीन...

याद करता हूँ नजारा

और

उतर पड़ता हूँ मन के भीतर

यादों की डोर पर

संभल संभल कर कदम जमाते

कुछ दूर चलने की नाकाम कोशिश

सुनाई देती है खुद की झिड़क

और लौट आता हूँ फिर अपनी

आज की दुनिया में..

कल फिर इन्हीं राहों से गुजरने के लिए...

-समीर लाल ’समीर’

 

चित्र साभार मित्र प्रशांत के ब्लॉग से

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सोमवार, सितंबर 01, 2014

डॉ कुमार विश्वास: हिन्दी कविता के मंच का कोहिनूर

पिछले महिने जुलाई २०१४ में जिस दिन डॉ कुमार विश्वास अमेरीका पहुँचे, उसी सुबह उनसे फोन पर बात हुई. पता चला कि अमेरीका और कनाडा के १४ अलग अलग शहरों में हो रहे कार्यक्रमों में टोरंटो में कार्यक्रम भी शामिल है. पिछले साल भी २०१३ में डॉक्टर कुमार विश्वास कनाडा आये थे और एक शानदार शाम तालियों की गड़गाड़हट के बीच हास्य व्यंग्य की फुहार के साथ बीती थी. उसी शाम कनाडा के इमीग्रेशन मिनिस्टर जेसन कैनी भी कार्यक्रम में आये थे और हिन्दी के चेहतों की भीड़ जो डॉ विश्वास को सुनने के लिए उमड़ी थी को देख और डॉ कुमार विश्वास की खास मांग पर उन्होंने कार्यक्रम में ही ऑटारियो के स्कूलों में हिन्दी को एक वैक्लपिक विषय में शामिल करने की घोषणा कर दी थी. वो खुद भी तब से डॉक्टर कुमार विश्वास के फैन हो गये थे. आश्चर्य लगा कि ऐसे कवि का २० दिन बाद कार्यक्रम है और कहीं कोई चर्चा नहीं और न ही विज्ञापन आदि.

यह पहली बार देखने में आ रहा था कि मुझे पता करना पड़े कि डॉक्टर कुमार विश्वास का कार्यक्रम कहाँ होना है अन्यथा तो हिन्दी का कोई भी कवि भारत से आये तो कम से ३ महिने पहले से १०-१२ बार ईमेल तो आ ही जाती हैं कि आपको आना है और इतने प्रयासों और विज्ञापनों के बाद भी अच्छा कार्यक्रम कविता का उसे मान लिया जाता है जिसमें २५० से ३०० लोग आ जायें. लगभग ५० आमंत्रित और २०० लोग २० ऑलर की टिकिट खरीद कर.

खैर, पता करके आयोजकों को फोन किया तो पता चला कि कार्यक्रम ब्राम्पटन नामक क्षेत्र में रखा गया है और पूरा बिक (सोल्ड आऊट) है इसलिए विज्ञापन आदि नहीं कर रहे हैं. मैने जानना चाहा कि आखिर कितने की टिकिट थी जो इतनी तेजी से सारी बिक गई. पता चला कि हॉल की क्षमता सीमित है और सिर्फ ६०० टिकिट बेचना था १०० डॉलर प्रति टिकिट के हिसाब से. डॉ कुमार विश्वास का नाम सुनते ही बिना विज्ञापन कें एक मूँह की बात से दूसरे मूँह की बात जुड़ते ही ६०० टिकिट बिक गये और अब तो सबको मना करना पड़ रहा है.

मैं आश्चर्य में था कि एक हिन्दी का कवि अकेले कविता पढ़ेगा और यहॉ आ बसे हिन्दी समझने वाले लोग जो बॉलीवुड के धुनों पर शाहरुख या मीका, हनी सिंह, बब्बू मान आदि के नाच गाने पर झूमने का आदी है वो हिन्दी कविता सुनने के लिए १०० डॉलर का टिकिट देकर आ रहे हैं.

कानों को विश्वास तो न हुआ क्यूंकि अभी पिछले हफ्ते ही यानी जैसे वादक के अन्तर्राष्ट्रीय कनसर्ट को ६० डॉलर की टिकिट देकर सुनकर आया था. मैने मित्रो को बताया तो वो सब भी जिद करने लगे कि हमें भी चलना है डॉ विश्वास को सुनने और १०० डॉलर की टिकिट जरुर ले लेंगे. मैने आयोजकों से निवेदन किया कि भई हमारे कुछ परिवार और मित्र भी उनके दीवाने हैं और फिर डॉ कुमार विश्वास का रोज तो आना होता नहीं है अतः कैसे भी प्रबंध कर सीटें बढ़वाईये. यह भी तय था कि कार्यक्रम के एक दिन पूर्व जब टीवी और रेडियो वाले डॉक्टर कुमार विश्वास का इन्टरव्यू लेंगे तब एकाएक न जाने कितने लोगों को और मालूम चल जायेगा और किस किस को मना कर दिल तोड़ते जायेंगे बहुत निवेदन के बाद वो लोग माने और १०० कुर्सियाँ अलग से बढ़वाई गईं. हाल में चलने फिरने की जगह भी बच न रही.

हालांकि आयोजक उनका होटल बुक करा कर उन्हें एयरपोर्ट पर स्वागत हेतु हाजिर थे मगर पहले एक दिन डॉक्टर कुमार विश्वास हमारे परिवारिक संबंधों के चलते हमारे घर पर ही ठहरे. होटल का रुम उनके आगमन का इन्तजार में रुका रहा. अगले दिन रात को वह अपने होटल में शिफ्ट हो गये क्यूँकि उसके अगले दिन उनका कार्यक्रम होना था.

2

कार्यक्रम ठीक ८.३० बजे शाम शुरु हुआ. डॉक्टर कुमार विश्वास तालियों की गड़गाहट के बीच सिक्यूरीटी के घेरे में मंच पर पहुँचे वरना तो उनके चहेतों के बीच से गुजर मंच तक पहुँच पाना ही मुमकिन न हो पाता २ घंटे तक और फिर अपनी बातों और कविताओं का ऐसा जादू छेड़ा कि न सिर्फ भारत के विभिन्न प्रांतों से यहाँ आ बसे श्रोता बल्कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान, श्रीलंका, बंगलादेश, नेपाल आदि देशों से कनाडा में आ बसे हिन्दी समझने वाले बॉलीवुड के नाच गानों पर थिरकने वाले लोग डॉक्टर कुमार विश्वास को मगन होकर सुनते रहे. श्रोताओं की भीड़ प्रांजल हिन्दी के शुद्ध गीत:

हो काल-गति से परे चिरंतन , अभी वहाँ थे अभी यहीं हो.. ,

कभी धरा पर, कभी गगन में, कभी कहीं थे, कभी कहीं हो.. ,

तुम्हारी राधा को भान है तुम सकल चराचर में हो उपस्थित,

बस एक मेरा है भाग्य मोहन !कि जिस में हो कर भी तुम नहीं हो..

जैसी रचना मंत्रमुग्ध होकर न सिर्फ सुनती रही बल्कि

मांग की सिन्दुर रेखा...बाँ

सुरी चली आओ…. जैसे गीतों की मांग कर उन्हें जी भर कर तालियों के माध्यम से सराहती रही. एक के बाद एक नायाब मुक्तक, गीत, गज़ल और वाकिये सुनाते तालियों और हँसी ठहाकों के बीच जब डॉक्टर साहब ने अपने चिर परिचित अंदाज में डॉ बशीर बद्र साहब का यह शेर कहा:

मुसाफिर है हम भी, मुसाफिर हो तुम भी,
किसी मोड़ पर फिर मुलाकात होगी।

तब घड़ी पर नजर गई. अरे, १०:३० बज गये. २:३० घंटे तक अकेले ऐसी समा बाँधे रहे कि पता ही नहीं चला और कार्यक्रम खत्म भी हो गया.

डॉक्टर कुमार विश्वास होटल लौट गये और हम वहाँ आयोजकों को बधाई देते चर्चारत हो लिए. हालांकि हॉल, साऊन्ड, डॆकोरेशन आदि यहाँ काफी मँहगे होते हैं मगर फिर भी लग रहा था कि आयोजकों ने अच्छा कमाया होगा. जिज्ञासु हिन्दुस्तानी स्वभाव कैसे चुपचाप चले आते. आयोजकों की कमाई का मोटा मोटा अंदाजा तो लगाना ही था अतः बात बढ़ाते हुए अपनी तरफ से ही पूछ लिए कि सुना है डॉ साहब तो काफी पैसा लेते हैं २,००० डॉलर से कम तो क्या लिए होंगे. आयोजकों की हँसी से लगा कि मैने कोई बहुत बड़ी बेवकूफी के बात कर दी. कहने लगे २,००० की जगह ३,००० में भी बुलवा दिजिये तो आपको उन्हें बुलवाने भर के ३,००० हम अपनी तरफ से दे देंगे. तब भी अभी जितना दे रहे हैं उसमें आप से ज्यादा हम बचा लेंगे. तब पता लगा कि ये हिन्दी का कवि अब १०,००० डॉलर में दो घंटे लिए मंच पर आकर कविता पढ़ता है. साथ में पाँच सितारा होटल में रुकना और बिजनेस क्लास का टिकिट. आजतक सुनते आये थे कि बहुत बड़े कविता के हस्ताक्षर भी यहाँ ५०० से १००० डॉलर की रेन्ज में आ जाते हैं तब इनके विषय में ये जानकर एक तरफ तो विस्मय की स्थिति और दूसरी तरफ अपार खुशी कि कुछ तो अलग है इनमें जो आज इन ऊँचाईयों पर आ कर खड़े हैं.

हिन्दी कविता के इतिहास में कब किसने सोचा होगा कि यह विधा भी कभी इस तरह धन वर्षा करवा सकती है इसके साधक पर. तय है कि यह अकेली हिन्दी कविता तो हो नहीं सकती. इसके साथ न जाने और क्या क्या जैसे ब्रेन्डींग, मार्केटिंग, बोलने और पढ़ने की विशिष्ट शैली, अथक परिश्रम और उन सबके आगे माँ शारदा का वरद हस्त- तब जाकर एक डॉक्टर कुमार विश्वास बनता है.

वाह!! डॉक्टर कुमार विश्वास!! हिन्दी कविता के मंच को ऐसा आयाम देने के लिए और इस मुकाम पर पहुँचाने के लिए साधुवाद, अनेक बधाई एवं हार्दिक शुभकामनायें.

अगले साल फिर इन्तजार रहेगा आपका इस टोरंटो शहर को.

-समीर लाल ’समीर’

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रविवार, अप्रैल 20, 2014

कतरा कतरा

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कभी जिन यादो से दिन,

खिल कर संवर जाता था..

आज सोचता हूँ

वही बचपन,

वही स्पर्श,

वही नाते,

उतारता हूँ जब

दिल के कागज पर वो यादें

और उनकी जिन्दा गवाह वो मकां..

कि कतरा कतरा हुआ

कागज भी बिखर जाता है..

एक लम्हा गुजरता है

और

कितना कुछ बदल जाता है..

-समीर लाल ’समीर’

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बुधवार, अक्टूबर 02, 2013

कुछ वाँ की.. तो कुछ याँ की...

एक नये तरह का प्रयोग किया है...देखें जरा...कैसी गज़ल निकली है:

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कब परिंदो को पता था, आंगनों में भेद का

एक दाना वाँ चुगा था, एक दाना याँ चुगा...

सरहदों से जा के पूछो, कौन किसका खून है

एक कतरा वाँ गिरा था, एक कतरा याँ गिरा..

राज इतना जान लो, तब हर अँधेरा दूर हो

एक दीपक वाँ जला था, एक दीपक याँ जला

आसमां को कब पता था, कौन मांगे है दुआ

एक तारा वाँ गिरा था, एक तारा याँ गिरा

है जमाना लाख बदला, पर न बदला है ’समीर’

दिल तुम्हारा वाँ छुआ था, दिल तुम्हारा याँ छुआ..

 

-समीर लाल ’समीर’

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रविवार, सितंबर 08, 2013

फासला - कोई एक हाथ भर का!!

जब रात आसमान उतरा था

झील के उस पार

अपनी थाली में

सजाये अनगिनित तारे

तब ये ख्वाहिश लिए

कि कुछ झिलमिल तारों को ला

टांक दूँ उन्हें

बदन पर तुम्हारे

तैरा किया था रात भर

उस गहरी नीले पानी की झील में

पहुँच जाने को आसमान के पास

तोड़ लेने को चंद तारे

बच रह गया था फासला

कोई एक हाथ भर का

कि दूर उठी आहट

सूरज के पदचाप की

और फैल गई रक्तिम लाली

पूरे आसमान में

खो गये तारे सभी

कि जैसे खून हुआ हो चौराहे पर

मेरी ख्वाहिशों का अभी

और बंद हो गये हो कपाट

जो झांकते थे चौराहे को कभी...

टूट गया फिर इक सपना..

कहते हैं

हर सपने का आधार होती हैं

कुछ जिन्दा घटनाएँ

कुछ जिन्दा अभिलाषायें..

बीनते हुए टूटे सपने के टुकड़े

जोड़ने की कोशिश उन्हें

उनके आधार से..

कि झील सी गहरी तेरी नीली आँखे

और उसमें तैरते मेरे अरमान

चमकते सितारे मेरी ख्वाहिशों के

माथे पर तुम्हारे पसरी सिन्दूरी लालिमाclip_image001

और वही तुम्हारे मेरे बीच

कभी न पूरा हो सकने वाला फासला

कोई एक हाथ भर का!!

सोचता हूँ .............

फिर कोई हाथ किसी हाथ से छूटा है कहीं

फिर कोई ख्वाब किसी ख्वाब में टूटा है कहीं..

क्या यही है-आसमान की थाली में, झिलमिलाते तारों का सबब!!

-समीर लाल ’समीर’

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सोमवार, अगस्त 05, 2013

तुमको सलाम लिखता हूँ.....

याद करो वो रात..

वो आखिरी मुलाकात..

जब थामते हुए मेरा हाथ

हाथों में अपने

कहा था तुमने...

लिख देती हूँ

मैं अपना नाम

हथेली पर तुम्हारी

सांसों से अपनी ...

फिर ...

कर दी थी तुमने..

अपनी हथेली सामने मेरे ..

कि लिख दूँ मैं भी

अपना नाम उस पर

सांसों से अपनी.....

कहा था तुमने...

सांसों से लिखी इबारत..

कभी मिटती नहीं..

कभी धुलती नहीं..

चाहें आसूँओं का सैलाब भी

उतर आये उन पर..

वो दर्ज रहती हैं

खुशबू बनी हरदम.. हर लम्हा...

साथ में हमारे.....

आज बरसों बाद जब...

बांचने को कल अपना...

खोल दी है मैने.... मुट्ठी अपनी.....

तब...हथेली से उठी...

उसी खुशबू के आगोश में...

ए जिन्दगी!!..

एक बार फिर .....अपने बहुत करीब....

अहसासा है तुम्हें!!....

“मैं ज़िन्दगी की किताब में, यूँ अपना पसंदीदा कलाम लिखता हूँ..

लिख देता हूँ तुम्हारा नाम, और फिर तुमको सलाम लिखता हूँ......”

-समीर लाल ’समीर’

 

सुनें इसे मेरी आवाज़ में:

 

तुमको सलाम लिखता हूँ……
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सोमवार, जुलाई 01, 2013

पहाड़ के उस पार….इस बार मेरी आवाज़ में

सुनिये:

समीर लाल ’समीर’ की आवाज में उनकी एक कविता

 

मेरे कमरे की खिड़की से दिखता

वो ऊँचा पहाड़

बचपन गुजरा सोचते कि

पहाड़ के उस पार होगा

कैसा एक नया संसार...

होंगे जाने कैसे लोग...

क्या तुमसे होंगे?

क्या मुझसे होंगे?

आज इतने बरसों बाद

पहाड़ के इस पार बैठा

सोचता हूँ उस पार को

जिस पार गुज़रा था मेरा बचपन...

कुछ धुँधली धुँधली सी स्मृति लिए

याद करने की कोशिश में कि

कैसे था वहाँ का संसार..

कैसे थे वो लोग...

क्या तुमसे थे?

क्या मुझसे थे?

इसी द्वन्द में उलझा

उग आता है

एक नया ख्याल

जहन में मेरे

दूर

क्षितिज को छूते आसमान को देख...

कि आसमान के उस पार

जहाँ जाना है हमें एक रोज

कैसा होगा वो नया संसार...

होंगे जाने कैसे वहाँ के लोग...

क्या तुमसे होंगे?

क्या मुझसे होंगे?

पहुँचुंगा जब वहाँ...

कौन जाने कह पाऊँगा

तब वहाँ की बातें..

कुछ ऐसे ही या कि

बनी रहेगी वो तिलस्मि

यूँ ही अनन्त तक

अनन्त को चाह लिए!!

बच रहेंगे अधूरे सपने इस जिन्दगी के

जाने कब तक...जाने कहाँ तक...

तब कहता हूँ..

“कैसे जीना है किसी को ये सिखाना कैसा

वक्त के साथ में हर सोच बदल जाती है”

-समीर लाल ’समीर’

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शुक्रवार, मई 17, 2013

मैच फिक्सिंग: सरकार इस्तिफा दे!

इतना बड़ा खुलासा. लाखों करोड़ों रुपयों का लेन देन और साथ में सेक्स स्कैंडल.

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श्री शांत के साथ साथ दो और खिलाड़ी. खिलाड़ियों समेत कई अन्यों पर शक की सुई. विपक्ष फिर भी चुप. आप की पार्टी तक चुप. ओए, क्या हो गया है इनको?? इतना चुप तो पहले कभी न थे ये...

हद हो गई आश्चर्य में डालने की. कलमाड़ी तो खुद से खेले भी नहीं थे कॉमन वेल्थ में, तो खेल की दिशा तो खैर क्या मोड़ते या बदलते, उस पर से इस मंहगाई के जमाने में उन्हें मात्र अपनी सूखी सेलरी के अलावा केवल कमीशन का आसरा जीवन बसर करने के लिए. सेलरी के सिवाय, न तो घूस घूस खेलने की हर क्रिकेट मैच की तरह फीस, न ही घूस के खेल में मैन ऑफ द मैच घोषित हो जाने के बावजूद क्रिकेट की तरह इनामों की बारिश, न ही माडलिंग के अलग से रोल और पैसे, न किसी प्रॉडक्ट के ब्राण्ड एम्बेस्डरी से कमाई. मगर उनके पैसे खा जाने पर इतना हल्ला. लोकपाल बिल, जेल और बस, मात्र एक डिमाण्ड- सरकार इस्तिफा दे.

टू जी, हैलीकाप्टर, बोफोर्स, गैंग रेप, बिजली के भाव, सरबजीत की मौत, शाराबी को शहीद का दर्जा, नल में पानी का आभाव, टूटी सड़क, पटवारी की सौ रुपये की घूस- हर बात में सरकार इस्तिफा दे. प्रधान मंत्री नैतिक जिम्मेदारी लें.

मगर आज इतने बड़े स्कैंडल में विपक्ष की भूमिका फिक्स सी सिखती है- जिसमें सारे चैनल जान दिये दे रहे हैं पिछले २४ घंटों से- हर पहले से ज्ञात सट्टेबाजी की जानकारी को सनसनीखेज खुलासा बताते हुए. ड्रामेबाजी में जाने किस किस अज्ञानी को पकड़े स्ट्रिंग ऑपरेशन की शूटिंग में व्यस्त- जहां सटोरीया और पंटर और बुकी की परिभाषा गलत बताई जा रही है. इतना बड़ा बुकी, इनको इन्टरव्यू देते हुए कोड लैग्वेज की जानकारी देते हुए- ५०० करोड़ को कोड में ५०० पेटी बताता है और सारी दुनिया जानती है कि इसे उस कोड भाषा (क्या वाकई में वो कोड है??) में ५०० खोखे कहते हैं – ५०० पेटी ५०० लाख को कहते हैं. मगर हड़बड़ी बताने की ऐसी कि कोई एडिट तो क्या करता इन सब खुलासों को. बस चला दी खबर. बुला ली पैनल और लगे सवाल पर सवाल करने. जैसे ही कोई पेनल का सदस्य कोई लॉजिकल बात करे जो इनके खुलासे को काटती हो या उसे गलत साबित करे तो उसे समय की कमी बता कर तुरंत छोटी सी ब्रेक और फिर ब्रेक से लौट कर आये तो वो बंदा ही गुम. गज़ब!! मानो श्रीशान्त की मकर का तौलिया- इस ओवर में है और देखते देखते अगले ओवर में गुम.

जिस दिल्ली के पुलिस मुखिया को कल तक यही चैनल नकारा घोषित कर विदा कुये जाने की तैयारी करवाये दे रहे थे वही आज इन्हीं के कारण इस खुलासे के बाद हीरो का स्टार दर्जा हासिल किये नये खुलासों के साथ आने की तैयारी में हैं. स्टारडम तो ऐसा ही होता है. आज है- कल नहीं -परसों फिर हासिल. अमिताभ होना आसान नहीं. बहुत कुछ फिक्स करना होता है.

अब तक शक हो रहा है कि विपक्ष भी शामिल है इस मामले में वरना ऐसा कौन सा मामला इस लेवल का रहा है जिसमें सरकार से इस्तिफा न मांगा गया हो.

आई पी एल फिक्स- अंडरवर्ल्ड शामिल- लड़कियों का इस्तेमाल. किसी का कहना कि आई पी एल बना ही सट्टेबाजी के लिए है. आई पी एल सट्टेबाजी की धूरी. एकाएक सट्टेबाजों की देश भर में धरपकड़- जैसे कल तक इस बारे में पुलिस को कुछ मालूम ही नहिम था. धन्यवाद मिडिया, आपने पुलिस को सूचना दे दी वरना उनको कौन बताता और वो कैसे जान पाते.

सिद्धु कहते हैं कि सांसदों के घोटालों के बाद भी अगर संसद पाक साफ है तो फिर आई पी एल अपवित्र कैसे? शायद—न न पक्का ही ये बी जे पी के सांसद हैं. वो ही बी जे पी- जिसे सरकार से इस्तिफा चाहिये क्यूँकि ...क्यूँकि क्या. बस चाहिये.

हालात कुछ ऐसे बन गये हैं कि अब अगर कोइ खिलाड़ी बैटिंग या बॉलिंग के पहले- ईश्वर को याद करने के लिए आँख बंद कर हाथ जोड़ ले..तो लोग अनुमान लगा लेंगे कि इसका मतलब इशारा कर दिया कि ये फिक्स वाली खेल है. सर खुजाये, टावेल हिलाये, रिस्ट बैंड घुमाये, जूते का फीता बांधे, पसीना पोंछे..हो गया इशारा..लग गया सट्टा.

ये तो वही हालात हो गये हैं कि जैसे रिश्तेदारों पर से विश्वास हट गया है बच्चियों को माँ बापों के- बार बार मीडिया पर सुन सुन कर कि ९७% बलात्कारों में घर के लोग शामिल रहते हैं.

जो मानसिक दहशत इन रेप केसों ने आम परिवारों में पैदा की है उससे आई पी एल देखते हुए, कुछ देर को ही सही, वो माँ बाप उस दहशत को भूल खुश हो लेते थे, वो भी अब उनके हिस्से से जाता रहा. क्या देखें जो पहले से फिक्स है- कैसा एक्साईटमेन्ट और कैसा खेल!! बाकी तो टी वी पर मनोरंजन के लिए कुछ आता नहीं....

आज के इस सफर में

हाय! ये कैसी दिशा है,

हाय! ये कैसी हवा है,

जिस तरफ निकलता हूँ

किश्ती डूबती है मेरी ही!!

और वो हँसते हुए कहता है

नौसिखिया निकला ये नाविक भी!!

-समीर लाल ’समीर’

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रविवार, मई 05, 2013

हे नीलकंठ मेरे!!

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एक अंगारा उठाया था कर्तव्यों का

जलती हुई जिन्दगी की आग से,

हथेली में रख फोड़ा उसे

फिर बिखेर दिया जमीन पर...

अपनी ही राह में, जिस पर चलना था मुझे

टुकड़े टुकड़े दहकती साँसों के साथ और

जल उठी पूरी धरा इन पैरों के तले...

चलता रहा मैं जुनूनी आवाज़ लगाता

या हुसैन या अली की!!!

ज्यूँ कि उठाया हो ताजिया मर्यादाओं का

पीटता मैं अपनी छाती मगर

तलवे अहसासते उस जलन में गुदगुदी

तेरी नियामतों की,

आँख मुस्कराने के लिए बहा देती

दो बूँद आँसूं..

ले लो तुम उन्हें

चरणामृत समझ

अँजुरी में अपनी

और उतार लो कंठ से

कह उठूँ मैं तुम्हें

हे नीलकंठ मेरे!!

-सोच है इस बार

कि अब ये प्रीत अमर हो जाये मेरी!!

-समीर लाल ’समीर’

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रविवार, अप्रैल 28, 2013

मेरी कविता- नई इबारत!!!

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मेरी कविता

बदल दी है मैने

उन सब बातों के लिए

जो तुमको मान्य न थी...

मेरी कविता

बदल दी है मैने

उन सब बातों के लिए

जो सबको मान्य न थी...

मेरी कविता

बदल दी है मैने

उन सब बातों के लिए

जो समाज को मान्य न थी...

मेरी कविता

बदल दी है मैने

उन सब बातों के लिए

जो मजहब को मान्य न थी...

मेरी कविता

बदल दी है मैंने

उन सब बातों के लिए

जो आलोचकों को मान्य न थी..

मेरी कविता- इन सब मान्यताओं की

निबाह की इबारत बनी

अब मेरी कहाँ रही

वो बदल कर ढल गई है

एक ऐसे नये रुप में जो

काबिल है साहित्य के सर्वश्रेष्ठ प्रकाशन में

प्रकाशित किए जा सकने के लिए

मेरी कविता अब इस नये रुप में

काबिल है साहित्य के सर्वश्रेष्ठ सम्मान से

सम्मानित किए जा सकने के लिए..

-कर दो न प्लीज़, अब और कितना बदलूँ मैं!!

-समीर लाल ’समीर’

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मंगलवार, अप्रैल 23, 2013

मैं वही अँधेरों का आदमी…

ss

 

तुमने छुड़ा कर हाथ मेरा

जो पीछे छोड़ दिये थे अँधेरे

उनसे अभ्यस्त होती मेरी ये आँखे

आज जरा सी टिमटिमटाहट से

उस दीपक की, जो बुझने को है अभी

चौंधिया जाती है...

और मेरा बाँया हाथ....

जिस ओर बैठा कर थमवा दिया था हाथ

उस ब्राह्मण ने मेरा तुम्हारे हाथ में

ये कहते हुए कि हे वामहस्थिनी!!

जगमग होगा भविष्य तेरा

शायद कहा होगा चन्द रुपयों की चाहत में

दक्षिणा स्वरुप कि जी सके वो

और उसका परिवार उस रोज..

हाँ, वही बाँया हाथ आज बढ़ उठता है

बुझाने उस त्य़ँ भी बुझती लौ को दीपक की...

और बुझा करके उसे

खुद जल कर रोशन हो उठता हूँ मैं

जगमग जगमग बुझ जाने को

मगर खुद की रोशनी में अचकचाये

आँख मिचमिचाता मैं

उठा लेता हूँ एक पत्थर

उसी बाँये हाथ से...

फोड़ देने को दर्पण...जो सामने है मेरे

कि खुल सकें ये आँखें..

देखो....यही तो तुम कहती थी कि

कितना अजीब है

यह अँधेरों का जहान...

नहीं बर्दाश्त कर पाता

खुद का रोशन होना भी!!

-मैं फिर खो जाता हूँ अँधेरों में..

मैं हूँ ही अँधेरों का आदमी...

न बर्दाश्त कर पा सकने वाला, खुद के साये को भी!!

-समीर लाल ’समीर’

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मंगलवार, मार्च 05, 2013

चचा का यूँ गुजर जाना....हाय!!

चचा मेरे - नाम मिर्ज़ा असदुल्लाह बेग खान और लोग उन्हें प्यार से गालिब कहते थे- वो १८६९ में क्या निकले कि तड़प कर रह गये उनके चाहने वाले अच्छा पढ़ने को...आज मुझे लगा कि भतीजा हूँ भले ही नाम समीर लाल ’समीर’ है ऊउर लोग प्यार से समीर बुलाते हैं..तो भी दायित्व तो बनता है- कुछ तो फर्ज़ निभाना होगा भतीजा होने का.

बस, इसी बोझ तले-दबे दबे…करहाते..पेश है तीन ठो...पहला शेर तो खैर कालजयी होना ही है...दम साध के दाद उठाना....वरना प्रश्न पढ़ने वाले की समझ पर उठ जायेगा कि समझ नहीं पाया..और वो होगे आप- यह तय जानो!! J

नफरत की इन्तहां का, यह हाल देख ’समीर’

जब भी मिलते हैं, गले लग जाते हैं तपाक से..

 

अब अगला चचा को याद करते:

chachabhatija

वो पूछते हैं हमसे, क्या हाल-ए-दिल सनम

कुछ गमज़दां थे गालिब, कुछ गमज़दां हैं हम...

 

और फिर ...बस, यूँ ही...कुछ आज के समय पर कुछ कह आने को मन कर आया भतीजे का...चचा तो खैर त्रिवेणी (गुलज़ार साहेब की विधा) का शौक रखते नहीं थे..... मगर उससे भतीजे ने कब सीमा आंकी है… Smile

 

यारों कि इल्तज़ा है कि कुछ कहानियाँ अपनी आवाज़ में सुनाऊँ..

हाल पता हैं फिर लोग तड़पेंगे मिलने को, और मैं मिल न पाऊँ

-इतना भी अमिताभ हुआ जाना, अभी हाल तो मुझे मंजूर नहीं.

 

और अब चलते चलते अपने भी मन कुछ कह जाऊँ (एक का तो अधिकार बनता है भतीजा हूँ आखिर)  तो यह लिजिये:

 

मंहगाई के इस दौर में भी, वो ईमानदारी से कमाता है..

हर वक्त खुश रहता है, हँसता है और खिलखिलाता है...

-बुजुर्गों का कहना है, वो कोई सिरफिरा नज़र आता है.

-समीर लाल ’समीर’

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बुधवार, फ़रवरी 27, 2013

जीत: अब लौट भी तुम आओ

एक लघु कथा - जीत:
वह सफेद कार में था...
उसने रफ्तार बढ़ा दी...नीली कार पीछे छूटी..फिर पीली वाली...
एक धुन सी सवार हुई कि सबसे जीत जाना है.
वह रफ्तार बढ़ाता गया. जाने कितनी कारें पीछे छूटती चली गईं.
कुछ देर बाद एक मोड़ पर उसकी कार और उसका शरीर क्षत विक्षत पड़ा मिला.
मृत शरीर रह गया, वो सबसे आगे निकल गया- जाने कहाँ?
ये कैसी जीत?
win
एक कविता- अब लौट भी तुम आओ:
मेरी बाँसुरी की सरगम
वो भी हो गई है मद्धम
कोई जाकर उसे बता दे
कि रुठा हुआ है मौसम....
अब लौट भी तुम आओ
कि ठहरा हुआ है सावन!!
-समीर लाल ’समीर’ Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, फ़रवरी 20, 2013

मतवाली बेखौफ़ गज़ल

बस कोशिश थी कि कुछ कहें मगर जब बात बिगड़नी होती है तो यूँ बिगड़ती है कि साधे नहीं सधती....काफिया उखड़ा बार बार...कोई बात नही....माईने ही उखड़ गया कि जिसे शिद्दत से चाहा उसे ही कुर्बान कर देने को तैयार...खैर, यही तो है मतवाला पन- यही तो दीवानापन...पढ़ ही लिजिये...सुधार, व्याकरण आदि तो खैर चलता रहेगा...सुधार बता देंगे तो कोशिश होगी कि आगे महफिलों में सुधार कर पढ़ी जाये वरना तो आजकल की महफिलें...किस बात पर दाद मिलेगी ...ये तो आप पर निर्भर हैं...शेर पर नहीं.

जबकि लोग लिख रहे हैं कि फलाने गुरु का आशीर्वाद प्राप्त गज़ल...तब ऐसे में बेआशीष गज़ल का लुत्फ उठायें….और कुछ नहीं तो हिम्मत की दाद दे देना Smile

 

face

 

आज इस धूप पर हम भी, जरा अहसान कर देंगे

कि मेहनत का पसीना भी, इसी के नाम कर देंगे.

जरा पलकें झुका ली जो, मेरी महबूब ने थक कर

जहाँ जगने को थी सुबह, वहीं पर शाम कर देंगे

अजब सा हौसला मेरा, अजब सी हसरतें दिल में

जिसे चाहा था शिद्दत से, उसे कुर्बान कर देंगे.

अगर मज़हब बना रोड़ा, प्रेम की राह में अपने

इबारत लेके भजनों की, बुलंद अज़ान कर देंगे.

लिखे ’समीर’ ने अपने, प्यार के गीत में किस्से

ये सारे प्यार के दुश्मन, उसे बदनाम कर देंगे.

-समीर लाल ’समीर’

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रविवार, जनवरी 20, 2013

आहिस्ता आहिस्ता!!

past

सफ़हा दर सफ़हा

लम्हा दर लम्हा

बरस दर बरस

दर्ज होता रहा

किताब में मेरे दिल की

तुम्हारे मेरे साथ की

यादों का सफर

और मैं

अपने दायित्वों का निर्वहन करता

चलता रहा इस जीवन डगर पर

लादे उस किताब को अपनी पुश्त पर...

कि कभी फुरसत में

मुस्करा लूँगा फिर

पढ़ कर उन यादों को

किश्त दर किश्त

आहिस्ता आहिस्ता!!

-समीर लाल ’समीर’

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सोमवार, नवंबर 19, 2012

अधूरे सपने- अधूरी चाहतें!!

mountains

मेरे कमरे की खिड़की से दिखता

वो ऊँचा पहाड़

बचपन गुजरा सोचते कि

पहाड़ के उस पार होगा

कैसा एक नया संसार...

होंगे जाने कैसे लोग...

क्या तुमसे होंगे?

क्या मुझसे होंगे?

आज इतने बरसों बाद

पहाड़ के इस पार बैठा

सोचता हूँ उस पार को

जिस पार गुज़रा था मेरा बचपन...

कुछ धुँधले चेहरों की स्मृति लिए

याद करने की कोशिश में कि

कैसे थे वो लोग...

क्या तुमसे थे?

क्या मुझसे थे?

तो फिर आज नया ख्याल उग आता है

जहन में मेरे

दूर

क्षितिज को छूते आसमान को देख...

कि आसमान के उस पार

जहाँ जाना है हमें एक रोज

कैसा होगा वो नया संसार...

होंगे जाने कैसे वहाँ के लोग...

क्या तुमसे होंगे?

क्या मुझसे होंगे?

पहुँच जाऊँगा जब वहाँ...

कौन जाने बता पाऊँगा तब यहाँ..

कुछ ऐसे ही या कि

चलती जायेगी वो तिलस्मि

यूँ ही अनन्त तक

अनन्त को चाह लिए!!

बच रहेंगे अधूरे सपने इस जिन्दगी के

जाने कब तक...जाने कहाँ तक...

तभी अपनी एक गज़ल में

एक शेर कहा था मैने

“कैसे जीना है किसी को ये सिखाना कैसा

वक्त के साथ में हर सोच बदल जाती है”

-समीर लाल ’समीर’

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