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सोमवार, सितंबर 01, 2014

डॉ कुमार विश्वास: हिन्दी कविता के मंच का कोहिनूर

पिछले महिने जुलाई २०१४ में जिस दिन डॉ कुमार विश्वास अमेरीका पहुँचे, उसी सुबह उनसे फोन पर बात हुई. पता चला कि अमेरीका और कनाडा के १४ अलग अलग शहरों में हो रहे कार्यक्रमों में टोरंटो में कार्यक्रम भी शामिल है. पिछले साल भी २०१३ में डॉक्टर कुमार विश्वास कनाडा आये थे और एक शानदार शाम तालियों की गड़गाड़हट के बीच हास्य व्यंग्य की फुहार के साथ बीती थी. उसी शाम कनाडा के इमीग्रेशन मिनिस्टर जेसन कैनी भी कार्यक्रम में आये थे और हिन्दी के चेहतों की भीड़ जो डॉ विश्वास को सुनने के लिए उमड़ी थी को देख और डॉ कुमार विश्वास की खास मांग पर उन्होंने कार्यक्रम में ही ऑटारियो के स्कूलों में हिन्दी को एक वैक्लपिक विषय में शामिल करने की घोषणा कर दी थी. वो खुद भी तब से डॉक्टर कुमार विश्वास के फैन हो गये थे. आश्चर्य लगा कि ऐसे कवि का २० दिन बाद कार्यक्रम है और कहीं कोई चर्चा नहीं और न ही विज्ञापन आदि.

यह पहली बार देखने में आ रहा था कि मुझे पता करना पड़े कि डॉक्टर कुमार विश्वास का कार्यक्रम कहाँ होना है अन्यथा तो हिन्दी का कोई भी कवि भारत से आये तो कम से ३ महिने पहले से १०-१२ बार ईमेल तो आ ही जाती हैं कि आपको आना है और इतने प्रयासों और विज्ञापनों के बाद भी अच्छा कार्यक्रम कविता का उसे मान लिया जाता है जिसमें २५० से ३०० लोग आ जायें. लगभग ५० आमंत्रित और २०० लोग २० ऑलर की टिकिट खरीद कर.

खैर, पता करके आयोजकों को फोन किया तो पता चला कि कार्यक्रम ब्राम्पटन नामक क्षेत्र में रखा गया है और पूरा बिक (सोल्ड आऊट) है इसलिए विज्ञापन आदि नहीं कर रहे हैं. मैने जानना चाहा कि आखिर कितने की टिकिट थी जो इतनी तेजी से सारी बिक गई. पता चला कि हॉल की क्षमता सीमित है और सिर्फ ६०० टिकिट बेचना था १०० डॉलर प्रति टिकिट के हिसाब से. डॉ कुमार विश्वास का नाम सुनते ही बिना विज्ञापन कें एक मूँह की बात से दूसरे मूँह की बात जुड़ते ही ६०० टिकिट बिक गये और अब तो सबको मना करना पड़ रहा है.

मैं आश्चर्य में था कि एक हिन्दी का कवि अकेले कविता पढ़ेगा और यहॉ आ बसे हिन्दी समझने वाले लोग जो बॉलीवुड के धुनों पर शाहरुख या मीका, हनी सिंह, बब्बू मान आदि के नाच गाने पर झूमने का आदी है वो हिन्दी कविता सुनने के लिए १०० डॉलर का टिकिट देकर आ रहे हैं.

कानों को विश्वास तो न हुआ क्यूंकि अभी पिछले हफ्ते ही यानी जैसे वादक के अन्तर्राष्ट्रीय कनसर्ट को ६० डॉलर की टिकिट देकर सुनकर आया था. मैने मित्रो को बताया तो वो सब भी जिद करने लगे कि हमें भी चलना है डॉ विश्वास को सुनने और १०० डॉलर की टिकिट जरुर ले लेंगे. मैने आयोजकों से निवेदन किया कि भई हमारे कुछ परिवार और मित्र भी उनके दीवाने हैं और फिर डॉ कुमार विश्वास का रोज तो आना होता नहीं है अतः कैसे भी प्रबंध कर सीटें बढ़वाईये. यह भी तय था कि कार्यक्रम के एक दिन पूर्व जब टीवी और रेडियो वाले डॉक्टर कुमार विश्वास का इन्टरव्यू लेंगे तब एकाएक न जाने कितने लोगों को और मालूम चल जायेगा और किस किस को मना कर दिल तोड़ते जायेंगे बहुत निवेदन के बाद वो लोग माने और १०० कुर्सियाँ अलग से बढ़वाई गईं. हाल में चलने फिरने की जगह भी बच न रही.

हालांकि आयोजक उनका होटल बुक करा कर उन्हें एयरपोर्ट पर स्वागत हेतु हाजिर थे मगर पहले एक दिन डॉक्टर कुमार विश्वास हमारे परिवारिक संबंधों के चलते हमारे घर पर ही ठहरे. होटल का रुम उनके आगमन का इन्तजार में रुका रहा. अगले दिन रात को वह अपने होटल में शिफ्ट हो गये क्यूँकि उसके अगले दिन उनका कार्यक्रम होना था.

2

कार्यक्रम ठीक ८.३० बजे शाम शुरु हुआ. डॉक्टर कुमार विश्वास तालियों की गड़गाहट के बीच सिक्यूरीटी के घेरे में मंच पर पहुँचे वरना तो उनके चहेतों के बीच से गुजर मंच तक पहुँच पाना ही मुमकिन न हो पाता २ घंटे तक और फिर अपनी बातों और कविताओं का ऐसा जादू छेड़ा कि न सिर्फ भारत के विभिन्न प्रांतों से यहाँ आ बसे श्रोता बल्कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान, श्रीलंका, बंगलादेश, नेपाल आदि देशों से कनाडा में आ बसे हिन्दी समझने वाले बॉलीवुड के नाच गानों पर थिरकने वाले लोग डॉक्टर कुमार विश्वास को मगन होकर सुनते रहे. श्रोताओं की भीड़ प्रांजल हिन्दी के शुद्ध गीत:

हो काल-गति से परे चिरंतन , अभी वहाँ थे अभी यहीं हो.. ,

कभी धरा पर, कभी गगन में, कभी कहीं थे, कभी कहीं हो.. ,

तुम्हारी राधा को भान है तुम सकल चराचर में हो उपस्थित,

बस एक मेरा है भाग्य मोहन !कि जिस में हो कर भी तुम नहीं हो..

जैसी रचना मंत्रमुग्ध होकर न सिर्फ सुनती रही बल्कि

मांग की सिन्दुर रेखा...बाँ

सुरी चली आओ…. जैसे गीतों की मांग कर उन्हें जी भर कर तालियों के माध्यम से सराहती रही. एक के बाद एक नायाब मुक्तक, गीत, गज़ल और वाकिये सुनाते तालियों और हँसी ठहाकों के बीच जब डॉक्टर साहब ने अपने चिर परिचित अंदाज में डॉ बशीर बद्र साहब का यह शेर कहा:

मुसाफिर है हम भी, मुसाफिर हो तुम भी,
किसी मोड़ पर फिर मुलाकात होगी।

तब घड़ी पर नजर गई. अरे, १०:३० बज गये. २:३० घंटे तक अकेले ऐसी समा बाँधे रहे कि पता ही नहीं चला और कार्यक्रम खत्म भी हो गया.

डॉक्टर कुमार विश्वास होटल लौट गये और हम वहाँ आयोजकों को बधाई देते चर्चारत हो लिए. हालांकि हॉल, साऊन्ड, डॆकोरेशन आदि यहाँ काफी मँहगे होते हैं मगर फिर भी लग रहा था कि आयोजकों ने अच्छा कमाया होगा. जिज्ञासु हिन्दुस्तानी स्वभाव कैसे चुपचाप चले आते. आयोजकों की कमाई का मोटा मोटा अंदाजा तो लगाना ही था अतः बात बढ़ाते हुए अपनी तरफ से ही पूछ लिए कि सुना है डॉ साहब तो काफी पैसा लेते हैं २,००० डॉलर से कम तो क्या लिए होंगे. आयोजकों की हँसी से लगा कि मैने कोई बहुत बड़ी बेवकूफी के बात कर दी. कहने लगे २,००० की जगह ३,००० में भी बुलवा दिजिये तो आपको उन्हें बुलवाने भर के ३,००० हम अपनी तरफ से दे देंगे. तब भी अभी जितना दे रहे हैं उसमें आप से ज्यादा हम बचा लेंगे. तब पता लगा कि ये हिन्दी का कवि अब १०,००० डॉलर में दो घंटे लिए मंच पर आकर कविता पढ़ता है. साथ में पाँच सितारा होटल में रुकना और बिजनेस क्लास का टिकिट. आजतक सुनते आये थे कि बहुत बड़े कविता के हस्ताक्षर भी यहाँ ५०० से १००० डॉलर की रेन्ज में आ जाते हैं तब इनके विषय में ये जानकर एक तरफ तो विस्मय की स्थिति और दूसरी तरफ अपार खुशी कि कुछ तो अलग है इनमें जो आज इन ऊँचाईयों पर आ कर खड़े हैं.

हिन्दी कविता के इतिहास में कब किसने सोचा होगा कि यह विधा भी कभी इस तरह धन वर्षा करवा सकती है इसके साधक पर. तय है कि यह अकेली हिन्दी कविता तो हो नहीं सकती. इसके साथ न जाने और क्या क्या जैसे ब्रेन्डींग, मार्केटिंग, बोलने और पढ़ने की विशिष्ट शैली, अथक परिश्रम और उन सबके आगे माँ शारदा का वरद हस्त- तब जाकर एक डॉक्टर कुमार विश्वास बनता है.

वाह!! डॉक्टर कुमार विश्वास!! हिन्दी कविता के मंच को ऐसा आयाम देने के लिए और इस मुकाम पर पहुँचाने के लिए साधुवाद, अनेक बधाई एवं हार्दिक शुभकामनायें.

अगले साल फिर इन्तजार रहेगा आपका इस टोरंटो शहर को.

-समीर लाल ’समीर’

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सोमवार, जुलाई 01, 2013

पहाड़ के उस पार….इस बार मेरी आवाज़ में

सुनिये:

समीर लाल ’समीर’ की आवाज में उनकी एक कविता

 

मेरे कमरे की खिड़की से दिखता

वो ऊँचा पहाड़

बचपन गुजरा सोचते कि

पहाड़ के उस पार होगा

कैसा एक नया संसार...

होंगे जाने कैसे लोग...

क्या तुमसे होंगे?

क्या मुझसे होंगे?

आज इतने बरसों बाद

पहाड़ के इस पार बैठा

सोचता हूँ उस पार को

जिस पार गुज़रा था मेरा बचपन...

कुछ धुँधली धुँधली सी स्मृति लिए

याद करने की कोशिश में कि

कैसे था वहाँ का संसार..

कैसे थे वो लोग...

क्या तुमसे थे?

क्या मुझसे थे?

इसी द्वन्द में उलझा

उग आता है

एक नया ख्याल

जहन में मेरे

दूर

क्षितिज को छूते आसमान को देख...

कि आसमान के उस पार

जहाँ जाना है हमें एक रोज

कैसा होगा वो नया संसार...

होंगे जाने कैसे वहाँ के लोग...

क्या तुमसे होंगे?

क्या मुझसे होंगे?

पहुँचुंगा जब वहाँ...

कौन जाने कह पाऊँगा

तब वहाँ की बातें..

कुछ ऐसे ही या कि

बनी रहेगी वो तिलस्मि

यूँ ही अनन्त तक

अनन्त को चाह लिए!!

बच रहेंगे अधूरे सपने इस जिन्दगी के

जाने कब तक...जाने कहाँ तक...

तब कहता हूँ..

“कैसे जीना है किसी को ये सिखाना कैसा

वक्त के साथ में हर सोच बदल जाती है”

-समीर लाल ’समीर’

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मंगलवार, मार्च 05, 2013

चचा का यूँ गुजर जाना....हाय!!

चचा मेरे - नाम मिर्ज़ा असदुल्लाह बेग खान और लोग उन्हें प्यार से गालिब कहते थे- वो १८६९ में क्या निकले कि तड़प कर रह गये उनके चाहने वाले अच्छा पढ़ने को...आज मुझे लगा कि भतीजा हूँ भले ही नाम समीर लाल ’समीर’ है ऊउर लोग प्यार से समीर बुलाते हैं..तो भी दायित्व तो बनता है- कुछ तो फर्ज़ निभाना होगा भतीजा होने का.

बस, इसी बोझ तले-दबे दबे…करहाते..पेश है तीन ठो...पहला शेर तो खैर कालजयी होना ही है...दम साध के दाद उठाना....वरना प्रश्न पढ़ने वाले की समझ पर उठ जायेगा कि समझ नहीं पाया..और वो होगे आप- यह तय जानो!! J

नफरत की इन्तहां का, यह हाल देख ’समीर’

जब भी मिलते हैं, गले लग जाते हैं तपाक से..

 

अब अगला चचा को याद करते:

chachabhatija

वो पूछते हैं हमसे, क्या हाल-ए-दिल सनम

कुछ गमज़दां थे गालिब, कुछ गमज़दां हैं हम...

 

और फिर ...बस, यूँ ही...कुछ आज के समय पर कुछ कह आने को मन कर आया भतीजे का...चचा तो खैर त्रिवेणी (गुलज़ार साहेब की विधा) का शौक रखते नहीं थे..... मगर उससे भतीजे ने कब सीमा आंकी है… Smile

 

यारों कि इल्तज़ा है कि कुछ कहानियाँ अपनी आवाज़ में सुनाऊँ..

हाल पता हैं फिर लोग तड़पेंगे मिलने को, और मैं मिल न पाऊँ

-इतना भी अमिताभ हुआ जाना, अभी हाल तो मुझे मंजूर नहीं.

 

और अब चलते चलते अपने भी मन कुछ कह जाऊँ (एक का तो अधिकार बनता है भतीजा हूँ आखिर)  तो यह लिजिये:

 

मंहगाई के इस दौर में भी, वो ईमानदारी से कमाता है..

हर वक्त खुश रहता है, हँसता है और खिलखिलाता है...

-बुजुर्गों का कहना है, वो कोई सिरफिरा नज़र आता है.

-समीर लाल ’समीर’

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शुक्रवार, जून 08, 2012

कोहरे के आगोश में...

मैं उससे कहता कि यह सड़क मेरे घर जाती है- फिर सोचता कि भला सड़क भी कहीं जाती है. जाते तो हम आप हैं. एक जोरदार ठहाका लगाता और अपनी ही बेवकूफी को उस ठहाके की आवाज से बुनी चादर के नीचे छिपा देता.

फिर तो हर बेवकूफियाँ यूँ ही ठहाकों में छुपाने की मानो आदत सी हो गई. आदत भी ऐसी कि जैसे सांस लेते हों. बिना किसी प्रयास के, बस यूँ ही सहज भाव से. इधर बेवकूफी की नहीं कि उधर ठहाके लगा उठे और सोचते रहे कि इसकी आवाज में सब दब छुप गया- अब भला कौन जान पायेगा?

यूँ गर कोई समझ भी जाये तो हँस तो चुके ही है, कह लेंगे मजाक किया था.

उम्र का बहाव रुकता नहीं और तब जब आप बहते बहते दूर चले आये हों इस बहाव में तो एकाएक ख्याल आता है कि वाकई, एक मजाक ही तो किया था. अब ठहाका उठाने का मन नहीं करता. एक उदासी घेर लेती है ऐसी सोच पर. और उस उदासी की वजह सोचो- तो फिर वहीं ठहाका- बिना किसी प्रयस के- सहज ही.

कहाँ चलता है रास्ता? कहाँ जाती है सड़क? वो तो जहाँ है वहीं ठहरी होती है. हम जब चलते हैं तब भी ठहरे से. सुबह जहाँ से शुरु हों- शाम बीतते फिर उसी बिन्दु पर.

हासिल- एक दिन गुजरा हुआ. हाँ, दिन चलता है. चलते चलते गुजर जाता है- जैसे की हमारी सोच, हमारे अरमान, हमारी चाहतें. सब चलती हैं- गुजर जाती हैं. ठहर जाता हूँ मैं- जाने किस ख्याल में डूबा- उस रुके हुए रास्ते पर- सड़क कह रहा था न उसे. जो जाती थी मेरी घर तक.

वो कहता कि सड़क जाती है वहाँ जो जगह वो जानती है. अनजान मंजिलों पर तो हम उड़ कर जाते हैं सड़क के सहारे. एक अरमान थामें.

मगर सड़क जायेगी घर तक. तो मेरी सड़क क्यूँ नहीं जाती मेरे उस घर तक- जहाँ खेला था बचपन, जहाँ संजोये थे सपने- अपने खून वाले रिश्तों के साथ.

कहते हैं फिर कि वो जाती है उन जगहों पर जिसे वो जानती है.

बताते हैं कि सड़क के उस मुहाने पर जहाँ मेरा घर होता था, अब एक मकान रहता है. मकान नहीं पहचानती सड़क- घर रहा नहीं. कई बरस हुए उसे गुजरे.

तो खो गया फिर उस रुकी सड़क के उस मोड़ पर- जहाँ से सुबह चलता हूँ और शाम फिर वहीं नजर आता हूँ इस अजब शहर में- जो खोया रहता है बारहों महिने- छुपा हुआ कोहरे की चादर में. किसी बेवकूफी को ढापने का उसका यह तरीका तो नहीं?? एक ठहाका लगाता हूँ- ये मेरा तरीका पीछा नहीं छोड़ता और रास्ता है कि चलता नहीं.

तो कुछ कदमों पर समुन्दर है और पलटता हूँ तो पहाड़ी की ऊँचाई...जिसे छिल छिल कर बनाये छितराये चौखटे मकान...अलग अलग बेढब रंगों के...कहते हैं यह सुन्दरता है सेन फ्रान्सिसको की..हा हा!! मेरा ठहाका फिर उठता है और यह शहर- छिपा देता है उसे भी अपनी कोहरे की चादर की परत में...और मैं गुनगुनाता हूँ अपनी ताजी गज़ल.....

गज़ल जरा डूब कर सुनना तो सुनाई देगी इसी कोलाज़ की झंकार धड़कन धड़कन:

 

fogdaly

भले हों दूरियाँ कितनी कभी घर छोड़ मत देना

हैं जो ये खून के रिश्ते , उन्हें तुम तोड़ मत देना

 

उसी घर के ही आँगन में बसी है याद बचपन की

खज़ाना बंद गुल्लक का कभी तुम फोड़ मत देना

 

गमकती खुशबू कमरे में उतरती है झरोखे से

वो डाली मोंगरे वाली कभी तुम तोड़ मत देना

 

बरसती खुशियाँ तुम पर हों रहो हर हाल में हँसते

मिले कोई दुख का मारा तो नज़र को मोड़ मत देना

 

पड़ी है नीचे सीढ़ी के पिता की वो छड़ी अब भी

सहारा उनकी यादों का कहीं तुम तोड़ मत देना

-समीर लाल ’समीर’

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रविवार, जुलाई 26, 2009

पुरुष सत्ता-हाय हाय!!



हाय हाय!! हाय हाय!!
पुरुष सत्ता-हाय हाय!!

हाय हाय!! हाय हाय!!
पुरुष सत्ता-हाय हाय!!

नारी सशक्तिकरण- जिन्दाबाद!!
नारी सशक्तिकरण- जिन्दाबाद!!

नारी शोषण-बंद करो!!
नारी शोषण-बंद करो!!

पुरुषों का अत्याचार-नही चलेगा!!
पुरुषों का अत्याचार-नही चलेगा!!

नारी तुम संघर्ष करो-हम तुम्हारे साथ हैं!!
नारी तुम संघर्ष करो-हम तुम्हारे साथ हैं!!

नारी शक्ति-जाग उठी है!!
जाग ठीक है-जाग उठी है!!

हाय हाय!! हाय हाय!!
पुरुष सत्ता-हाय हाय!!

हाय हाय!! हाय हाय!!
पुरुष सत्ता-हाय हाय!!

दरवाजे पर नारे सुन शर्मा जी भागे भागे आये. दरवाजा खोला तो देखा बहुत सारी महिलायें दरवाजे पर झंडा लिए नारे लगा रही थी. शर्मा जी बेचारे बुजुर्ग और उस पर से भाग कर दरवाजा खोला और सामने इतनी महिलाओं को नारी सशक्तिकरण का झंडा उठाये और नारे लगाता देखकर हाँफने लगे.

उन्हें घबराया देख नारी सशक्तिकरण की नेत्री ने तुरंत मोर्चा संभाला और बोली-क्यूँ शर्मा जी, घबरा गये. अकेली नारी को प्रताडित करते हो और अब घबरा रहे हो.

शर्मा जी ने अपने आप को संभालते हुए कहा कि मैने क्या किया है? आप खामखाँ मुझ पर आरोप लगा रही है.

नेत्री आदतानुसार चिल्लाकर बोली: क्या किया है? अब ये भी हमें बताना पड़ेगा?

हम सब जानतीं हैं, हमसे कुछ भी नहीं छुपा. जब भी महिला पर अत्याचार होता है, हमें खुद ब खुद खबर मिल जाती है.

अरे, कैसा अत्याचार? मैने तो कुछ भी नहीं किया. आपको शायाद किसी ने यूँ ही गलतफहमी में शिकायत भिजवा दी होगी.

ज्यादा बनने की जरुरत नहीं है. कल शाम हमारी एक सक्रिय सदस्या यहाँ से गुजर रही थी, उसने देखा है.

देखा है?? शर्मा जी ने आश्चर्य से पूछा..

नहीं नहीं, देखा नहीं, सुना है..एक दूसरी उपनेत्री ने आगे बढ़ते हुए कहा.

क्या सुना है? शर्मा जी अचंभित से पूछने लगे.

आप अपनी पत्नी को प्रताड़ित कर रहे थे. उनसे ऊँची आवाज में उन्हें जानवरों की तरह मान कर चिल्ला रहे थे.

नहीं जी, मैने तो ऐसा कुछ नहीं किया.

अच्छा, कल शाम आपने उनसे चिल्ला चिल्ला कर खाना देने को नहीं कहा.

अब शर्मा जी को कुछ कुछ समझ में आया और उन्होंने अपनी पत्नी को बुलवाया.

तब जा कर खुलासा हुआ कि वो ऊँचा सुनती हैं और इसलिए उन्हें चिल्ला कर ही बोलना पड़ता है, तब सुन पाती हैं.

अब महिला सशक्तिकरण वाली क्या करें. बिना सोचे समझे हमेशा की तरह चले तो आये ही हैं. तो ये कहते हुये कि अभी अगर नहीं भी हुआ है तो भी आगे ध्यान रखिये, हमारी सदस्यायें हर तरफ हैं. आगे भी ऐसा करने की सोचना भी मत, वरना धरना दिया जायेगा, नारे लगाये जायेंगे. हम बरदास्त करने वालों में से नहीं.

शर्मा जी, बेचारे बुजुर्ग क्या करते. हाथ जोड़ कर वादा किया कि कभी भी कोई अत्याचार नहीं करेंगे.

और पूरा महिला सशक्तिकरण मोर्चा आगे बढ़ गया अगले केस की तलाश में, नारे लगाते हुए!!


हाय हाय!! हाय हाय!!
पुरुष सत्ता-हाय हाय!!

हाय हाय!! हाय हाय!!
पुरुष सत्ता-हाय हाय!!

नारी सशक्तिकरण- जिन्दाबाद!!
नारी सशक्तिकरण- जिन्दाबाद!!

देखो, कौन जाने, अगला कौन अटकता है. हम तो बस शुभकामनाऐं ही दे सकते हैं. सोचता हूँ अत्याचार करो न करो, उनकी पैनी नजर तो अत्याचार खोज ही लेगी. उन्हें सामान्य बात में भी दमन नजर आ ही जायेगा. शोषण हो न हो, उभर कर सामने आ ही जायेगा. फिर क्या विचारना, जो होगा देखा जायेगा.

अब समय आ गया है जब पुरुषों को भी अपनी रक्षा हेतु पुरुष सशक्तिकरण न सही, तो भी अस्तित्व रक्षण समिति तो बना ही लेना चाहिये.

नारे तो इसी तर्ज पर गढ़ जायेंगे-पूरी बहर का निर्वहन करते हुए.


नारी शक्ति को नमन

माफीनामा:
----------------------------------
बहर:
२२ २२ २२ २२
फालुन फालुन फालुन फालुन
----------------------------------

ममता भरी कहानी नारी
मिष्टी सी है वाणी नारी.

पावन झरने से जो बहता
शीतल ऐसा पानी नारी.

बहना, पत्नी, दादी, काकी
बिटिया, अम्मा, नानी नारी

सबकी किस्मत अपनी अपनी
राजा की है रानी नारी.

हुई खता गर पुरुषों से तब
जेवर से ही मानी नारी.

पुरुषों को अब नाच नचाये
करे नहीं नादानी नारी.

कालिज में जाकर के देखो
फैशन की दीवानी नारी.

जीवन मेरा उसके हाथों
लगती हमें भवानी नारी.

यह सब पढ़कर बक्श दिया जो
कहलाओगी दानी नारी.

-समीर लाल ’समीर’

नोट: इस आलेख का उस आलेख से कुछ लेना देना नहीं है. यह अलग से है. Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, जनवरी 11, 2009

फिर सजी एक और महफिल..

जब कभी कोई कदम उठाने जा रहे हो तो बस एक बार, हाँ हाँ सिर्फ एक बार उसका तुम्हारे भविष्य पर अंजाम सोच लो-बस, तुम देखना कि तुम अपने आचरण में कितना बड़ा बदलाव पाओगे. ऐसा गुरु जी कह गये थे. कल एक जेबकतरा मेरी जेब काट रहा था. मैने उसे पकड़ लिया और उसे मारने के लिए हाथ उठाया ही था कि यह सूत्र याद हो आया. विचार आया कि कहीं ये जेबकतरा कल को मंत्री हो गया तब? जेबकतरों का स्वभाविक रुपांतरण वाया चोर, गुण्डा होकर मंत्री ही तो है. बस, हाथ नीचे आ गया. कितना बड़ा परिवर्तन पाया मैने अपने आचरण में वरना तो मेरा हाथ देश के इस भावी कर्णधार पर उठ ही गया था.

खैर, जाने दो. इन सब बातों में क्या रखा है?

मूड दुरुस्त करने बैठक जमीं फिर बवाल के साथ. खूब सुनी और खूब सुनाई गई. देर रात महफिल सजती रही और फिर बैठे हम और बवाल कुछ शेरो शायरी के दौर पर और जो गज़ल निकल कर आई, वो ही पेश कर देते हैं. जरा गहरा उतरियेगा तो मजा आयेगा.

लाल संग बवाल की तस्वीर:




गर दुआ उनकी है, तो असर देखिए
रह गई हो कहीं कुछ, कसर देखिए

इसमें उसमें सभी में नज़र आएँगे
आप अपनी यहाँ पर बसर देखिए

भूल सा ही गया है, वो इस गाँव को
देगा कैसी सज़ा, अब शहर देखिए

आबे-ज़म-ज़म* को पीकर मेरे सामने
मुझपे उगला है, कितना ज़हर देखिए

काटे कटती नहीं थी कभी रात वो
हो रही है उधर, इक सहर देखिए

ये तमाशा सही, फिर भी रखने को दिल,
मेरे दर पे ज़रा सा, ठहर देखिए

कह गया हूँ ग़ज़ल, मैं ज़रा झौंक में
गिरती-पड़ती, सँभलती बहर देखिए

--लाल एण्ड बवाल

* आबे-ज़म-ज़म=मक्का के पवित्र कुँऐं का जल Indli - Hindi News, Blogs, Links

सोमवार, नवंबर 03, 2008

बीबी साथ में है फिर कैसा!!!!!!!!

आज शाम भर सोचता रहा कि किस रस में रचना लिखूँ. विचार कई उठे और खारिज होते गये. अधिकतर क्या लगभग सभी का कारण था कि बीबी साथ में है.

देखिये, सोचा विरह गीत लिखूँ मगर कैसे-बीबी साथ में है फिर कैसा विरह और किसका विरह. अतः खारिज.

फिर विचार बना कि वीर रस-मगर फिर वही, बीबी साथ में है तो काहे के वीर. बीबी के सामने तो अच्छे अच्छे पीर तक वीर नहीं हो पाये तो हम क्या होंगे. अतः खारिज.

अब सोचा, प्रेम गीत-मगर बीबी साथ में है. मियां बीबी मे प्रेम तो एक अनुभुति है, एक दिव्य अहसास है, एक साझा है-प्रेम तो इसका एक अंग है और एक अंग पर क्या लिखना. लिखो तो संपूर्ण लिखो वरना खारिज. अतः खारिज.

फिर रहा श्रृंगार रस तो बीबी साथ में है और वो चमेली का तेल लगाती नहीं फिर कैसे होगा पूर्ण श्रृंगार. अपूर्ण पर क्या रचूँ. अतः यह भी खारिज.

बच रहा हास्य रस- तो बीबी साथ हो या न हो. मगर यहाँ ब्लॉग पर हंसना मना है. यह हा हा ठी ठी ठीक नहीं वो भी जब बीबी साथ में हो तो गंभीर रहने की सलाह है. अतः खारिज.

अब क्या करुँ. कई विचारों के बाद नये रस ’टेंशन रस’ की रचना बन पाई यानि किसी भी चीज से बेवजह परेशान. ऐसा होगा तो फिर क्या होगा. वैसा होगा तो फिर क्या होगा. इस तरह की फोकट टेंशन में जीने वाले बहुत से हैं. इस तरह जीना भी एक कला ही कहलाई और जो जिये, वो कलाकार. तो ऐसे सभी कलकारों को प्रणाम करते हुए सादर समर्पित:




चाँद गर रुसवा हो जाये तो फिर क्या होगा
रात थक कर सो जाये तो फिर क्या होगा.

यूँ मैं लबों पर, मुस्कान लिए फिरता हूँ
आँख ही मेरी रो जाये तो फिर क्या होगा.

यों तो मिल कर रहता हूँ सबके साथ में
नफरत अगर कोई बो जाये तो फिर क्या होगा.

कहने मैं निकला हूँ हाल ए दिल अपना
अल्फाज़ कहीं खो जाये तो फिर क्या होगा.

किस्मत की लकीरें हैं हाथों में जो अपने
आंसू उन्हें धो जाये तो फिर क्या होगा.

बहुत अरमां से बनाया था आशियां अपना
बंट टुकड़े में दो जाये तो फिर क्या होगा.

ये उड़ के चला तो है घर जाने को ’समीर;
हवा ये पश्चिम को जाये तो फिर क्या होगा.


-समीर लाल ’समीर’ Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, अक्टूबर 19, 2008

चलो, एक बार फिर हम तुम!!!

आज तो आनन्द ही आ गया, जब चिट्ठाजगत में आज जुड़े चिट्ठों के बारे में पता चला. पिछले २४ घंटो में ११७ नये चिट्ठे. अगर इसी तरह यह आंकड़ा चलता रहा तो १०००० चिट्ठों का दिन बहुत दूर नहीं. रोज पोस्टें सैकड़ा पार कर रही हैं. वक्त की अपनी बंदिशें हैं. सभी जगह पहुँच पाना कठिन होता जा रहा है. फिर भी कोशिश यही होती है कि जितना अधिक देख सकें.

एक सलाह सी है, कुछ लोग एक ही दिन में अभी भी चार चार पांच पांच या उससे भी ज्यादा पोस्ट कर रहे हैं. आपको दिनभर लिखना है, दिन भर लिखिये मगर कोशिश करके सबको अगर एक पोस्ट बना कर पोस्ट कर दें तो बेहतर हो जाये.

राजू श्रीवास्तव का लॉफ्टर होता तो वो जरुर कह उठते:

हम तो भरे बैठे हैं. हमारा मूँह न खुलवाओ. उनकी एक पोस्ट पर टिप्पणी लिख ही रहे हैं. सबमिट की कि उन्हीं की दूसरी पोस्ट हाजिर. वो टिपियाये, सबमिट की तो अगली हाजिर. पोस्ट लिख रहे हो कि हमको चिढ़ा रहे हो कि लगे रहो मुन्ना भाई टिपियाने में..हम भी न दौड़ाये तो कहना!!

महाराज!! कुछ तो रहम खाओ, इस काया पर. और साथ ही दूसरों की पोस्ट को भी कुछ देर रह लेने दो पहले पन्ने पर. बस, निवेदन ही बाकि तो जैसा जी में आये और जो उचित लगे, सो करिये.

एक तो लोगों को यूँ ही चैन नहीं. बार बार वही बात कि ये आदमी इतनी टिप्पणी कैसे करता है, क्यूँ करता है, कट पेस्ट करता है, रेडीमेड टिप्पणी चिपकाता है, नेटवर्क बनाता है, टिप्पणी पाने के लिए करता है..

मानो ये सब करके मुझे खजाना मिलने वाला है कि वाह, उड़न तश्तरी-इस साल तुमने सबसे ज्यादा टिप्पणियाँ पाईं तो तुमको नोबल पुरुस्कार दिया जाता है या फिर कोई खद्दरधारी चले आयेंगे कि भाई, बहुत बेहतरीन जनाधार है. आओ मैडम ने बुलाया है, तुमको सरदार बनायेंगे. आज से तुम भारत के प्रधान मंत्री. हम कहेंगे कि मैडम, हम तो चुनाव तक नहीं लड़े हैं और वो कहेंगी कि पहले प्रधान मंत्री बन लो, बाकि सब सेट हो जायेगा. ऐसे जनाधार वाले लोगों को हम नहीं छोड़ते.

हिन्दी चिट्ठाकारी की टिप्पणी साईकिल: वर्तमान परिपेक्ष में:




भई, अपना अपना काम शांति से करो न. कुछ मदद चाहिये तो बताओ. ये क्या है कि वो ये क्यूँ करते हैं. हम तो ऐसा नहीं करेंगे चाहे कोई हमारे द्वारे आये या न आये. अगर इतने ही निर्मोहि हो तो इसमें बताना क्या?

क्या फरक पड़ता है कि शास्त्री जी ने क्या कहा या उन्होंने १० चिट्ठों पर टिप्पणी करने की सलाह दी. अरे, हमसे पूछोगे तो हम १०० पर करने की देंगे और एक दो को जानता हूँ, उनसे पूछोगे तो वो कहेंगे कि एक ही जगह इक्कठे होकर गाली बको. सबकी अपनी सोच है, जो जिसे प्रभावित कर जाये.

सलाहकारों के देश में एक भारतीय मौलिक अधिकार के तहत सलाह ही दी जा रही है अपनी समझ से निवेदन के माध्यम से. मानना है मानो वरना कोई कानून तो पारित किया नहीं है उन्होंने. फिर कैसी परेशानी?

सब सोच की बात है-मान लो तो नये लोगों को जोड़ कर परिवार सुदृढ किया या मान लो नये लोगों को लाकर भीड़ की भभ्भड़ मचवाई दिहिन. जैसा दिल चाहे मानो.

कुछ पंक्तियाँ जेहन में आईं:

वो
दूर खड़ा

चाँद को
कोसता रहा..


रोशन जहाँ
उसे
रास नहीं आता!!!


खैर, लिखो-और कुछ हो न हो पोस्ट की संख्या तो बढ़ती चलेगी. थोड़ा सनसनी भी मची रहेगी. चहल पहल बाजार की पहचान है शायद कल को व्यापार और सौदे होने लगे तो कुछ फायदा भी हो जाये. इन्तजार तो है ही ऐसे शुभ दिवस का.

अनेकों शुभकामनाऐं.

***********************************************************


आज एक नया हाथ आजमाने का मन किया है.

बहर-ए-रमल २१२२,२१२२,२१२२,२१२ में एक गज़ल लिखने का प्रयास किया है.

मास्साब पंकज सुबीर से डांट खा खा कर कुछ सुधार तो आ ही गया होगा.


भूल बैठे हैं उसे, जीते थे जिसके नाम से
दूरियां कुछ हो गई हैं, आज उनकी राम से.

मत लगा नारे यहाँ पर, धर्म के ईमान के,
सो रहे हैं मौलवी जी, तान कर आराम से.

अब न जागे तो समझ लो, हाथ आयेगा सिफर
खेलते हैं रोज कितने, देश की आवाम से.

कल मरे थे लोग कितने, रो रही थी ये जमीं
महफिलें सजने लगेंगीं, देख लेना शाम से.

कौन कैसे मर रहा है, कौन पूछेगा यहाँ
बेच आये ये जमीरां, कौड़ियों के दाम से.

नाम जिसका है खुदा, भगवान भी तो है वही
भेद करते हो भला क्यूँ, इस जरा से नाम से.

-समीर लाल 'समीर' Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, सितंबर 24, 2008

ब्लॉगर्स कैसे कैसे!!

ब्लॉगजगत अब इतनी विविधता से भर गया है और ब्लॉगर याने कि यहाँ की जनता इतना कुछ कर रही है कि क्या कहें. जब विचार आया कि चिट्ठाकारी पर चिट्ठाकार को जनता मानते हुआ कुछ गज़लनुमा आईटम लिखा जाये, तब सोचा कि एक गज़ल में साधारणतः ५ या ७ शेर होते हैं तो इतने में कैसे समायेगी ये मेरी इतनी बड़ी दुनिया. फिर दूसरा विचार आया कि जब मेरी अपनी दुनिया है तो जितना चाहो, पैर पसार लो..कोई बुरा थोड़े न मानेगा..तो शेरों की संख्या बढ़ गई..थोड़ी बहुत नहीं..३० पर जाकर भी रोकना पड़ी, वरना एक गज़ल नुमा चीज़ एक किताब माफिक लिखी जा सकती है. जितना ख्याल और अनुभव ने साथ दिया, उतना लिखा..बाकी आप जोड़ लिजिये...फ्री गज़ल है...क्या फरक पड़ता है जोड़ने घटाने में. (ध्यान दिया जाये कि जनता = ब्लॉगर)


जाने क्या लिख लाती जनता
उस पर यह इठलाती जनता

सुबह सुबह उठते ही पहले
अपनी पोस्ट चढा़ती जनता

टिपटिप टिपटिप जाने कैसे
दूजों पर टिपयाती जनता

जो भी इनकी पीठ खुजाये
उसकी पीठ खुजाती जनता

दिन भर फिर अपने चिट्ठे पर
टिप्पणी गिनने आती जनता

कुछ लोगों को छेड़छाड़ कर
टंकी पर चढ़वाती जनता

नर नारी में भेद बता कर
लोगों को भिड़वाती जनता

हिन्दु मुस्लिम बात चले जब
तेवर बहुत दिखाती जनता.

नये नये आते लोगों को
हिम्मत खूब दिलाती जनता

गाली खाने से बचने को
सम्पादन अपनाती जनता

भारी भरकम शब्दों के संग
साहित्यिक कहलाती जनता

लिखने को जब लाले पड़ते
गाने भी सुनवाती जनता.

गाना जिनको समझ न आये
फोटो ही दिखलाती जनता

सबसे अच्छा तुम लिखते हो
सबको यूँ भरमाती जनता.

मैं आया हूँ तुम भी आना
ऐसे ये बुलवाती जनता.

दुनिया भर के मातम लेकर
आँसू रोज बहाती जनता

मसला कितना भी पेचीदा
हल सबके सुझवाती जनता

भूखा उनको जो दिख जाये
दाल भात खिलवाती जनता

भूत विनाशक संग मे रखकर
भूतों को डरवाती जनता

मन के भाव कलम से लिखकर
लय में उनको गाती जनता

तारीफों के दो शब्दों को
गुटबाजी बतलाती जनता

खबर एक और दर्जन खबरी
कैसी यह मायावी जनता.

खाना कैसे आप बनायें
पाककला सिखलाती जनता

खुल कर जब कुछ कहना चाहे
अपना नाम छुपाती जनता

खुद का मूँह बुरके में ढक कर
सबका राज बताती जनता.

अब तक जिनको सुना नहीं है
उनकी गज़ल सुनाती जनता

जाने किन किन शहरों वाले
रस्तों को समझाती जनता.

आपस में कुछ भिड़ जाते हैं
झगड़ों को सुलझाती जनता.

जाने कैसे लेख बनाने
पन्ने* रोज चुराती जनता. (*डायरी के)

कैसी भी है जैसी भी है
हमको बहुत लुभाती जनता.

--समीर लाल ’समीर’

(अब माड़स्साब पंकज सुबीर छड़ी लेकर आयेंगे और गल्ती बतायेंगे...उनकी सौ मार बरदास्त..आखिर मास्साब हैं हमारे..भले के लिए ही बोलेंगे....माड़स्साब आ जाओ..कुछ तो सिखला जाओ!! ३० शेर तक बहर साधते अच्छे खाँ बोल जायें तो हम तो फुस्सु खाँ भी नहीं.!!)

कुश की खास सलाह पर एक सुन्दर फोटो: :)

बोतल तो खुद से भी बड़ी है, कम तो नहीं पड़ना चाहिये.. :)

slbecardi Indli - Hindi News, Blogs, Links

सोमवार, मई 19, 2008

पी गये उधार में...

जिस किसी ने भी जीवन में कभी इश्क में चोट खाई हो या किसी को खाते हुए देखा,पढ़ा या सुना हो, उन सभी को आमंत्रण है. आईये, आईये-महफिल सजी है. गज़ल चल रही है, सुनिये. दाद दिजिये, हालात पर थोड़ा दुख जताईये और महफिल की शोभा बढ़ाईये. बाकी बचे भी आमंत्रित हैं. कुछ अनुभव ही बढ़ेगा. ऐसी द्विव्य बातें और महफिलें बार बार तो होती नहीं.

वैधानिक चेतावनी: थोड़ा मार्मिक टाईप है. आँख से अश्रुधार बह सकती है, रुमाल ले कर बैठें. वरना क्म्प्यूटर के कीबोर्ड में आँसू गिरने से शार्ट सर्किट हो सकता है. :)

तब अर्ज किया है:

सो गया मैं चैन से




रात भर दबा के पी, खुल्लम खुल्ला बार में
सारा दिन गुजार दिया बस उसी खुमार में

गम गलत हुआ जरा तो इश्क जागने लगा
रोज धोखे खा रहे हैं जबकि हम तो प्यार में.

कैश जितना जेब में था, वो तो देकर आ गये
बाकी जितनी पी गये, वो लिख गई उधार में.

यों चढ़ा नशा कि होश, होश को गंवा गया
और नींद पी गई उसे बची जो जार में.

वो दिखे तो साथ में लिये थे अपने भाई को
गुठलियाँ भी साथ आईं, आम के अचार में.

याद की गली से दूर, नींद आये रात भर
सो गया मैं चैन से चादर बिछा मजार में.

हुआ ज़फ़र के चार दिन की उम्र का हिसाब यूँ
कटा है एक इश्क में, कटेंगे तीन बार में.

होश की दवाओं में, बहक गये समीर भी
फूल की तलाश थी, अटक गये हैं खार में.

-समीर लाल ’समीर’


चित्र साभार: जोश डाट कॉम का. Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, मई 08, 2008

मेरी कामना!!

Pipe copy

मेरा घर

उस बड़े से पाईप के अंदर

जो सामने ओवर ब्रिज के नीचे लगना था

आज उजड़ गया....

ब्रिज बन कर तैयार हो गया

शहर के विकास का जीता जागता प्रमाण

और मैं और मेरा परिवार

नये घर की तलाश में हूँ....

यह शहर विकसित होता रहे...

बस, कभी विकसित न हो..

नये पाईप गिरें..

मुझे नया घरोंदा मिले...

यही कामना है-


--समीर लाल ’समीर’

(विकासशील मानसिकता भी विकसित होने में बाधक है शायद?
देश/ शहर बस विकसित होता रहे-हमारे नेता भी तो यही चाहते हैं यह एक क्रिया ही बनी रहे, संज्ञा न बन पाये)
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गुरुवार, अगस्त 23, 2007

दिन का सूरज उगा




तेरी सूरत दिखी आज फिर याद में,
दिन का सूरज उगा यूँ लगा रात में.

फल से लदने लगे पेड़ अंगनाई के
तुम लिए ही रहे बीज बस हाथ में.

उसकी आदत बुरी है वो रोता रहा
जिसने पाई है दौलत भी खैरात में

बेवफा इश्क के जो भी किस्से उठे
जिक्र तेरा ही आया है हर बात में.

तुम मिलोगे उसी मोड़ पर, इसलिये
भीगते ही गये हम तो बरसात में.

प्यार से जो तुम्हारी नजर पड़ गई
आग जैसे लगी मेरे जज्बात में.

घर तुम्हारा यहीं पर कहीं है समीर
देर क्यूँ लग रही फिर मुलाकात में.

--समीर लाल 'समीर' Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, अगस्त 19, 2007

क्या आप मल्लन चाचा को जानते हैं??


भटक गई है जो हवा, उनको दिखाने रास्ते
जल रहा बनकर दिया मैं, रोशनी के वास्ते.


एक बड़े शायर का शेर है. नाम है समीर लाल और तख़ल्लुस 'समीर' लिखते हैं. क्या बलिदान की भावना है शायर की. जानता है कि जब भी हवा सही राह पर आ गई, सबसे पहले वही बूझेगा मगर जज़बा है. सलाम करती हूँ शायर को. यह तो हो गई उड़न तश्तरी की बात. अब हमारी सुनो.

आज पढ़ता था भाई फुरसतिया जी को. स्वतंत्रता की ६०वीं वर्षगांठ पर झूठी आजादी के विषय में सेंटिया रहे थे . कहते हैं 'यह मत पूछो कि देश तुम्हारे लिये क्या कर सकता है बल्कि यह देखो तुम देश के लिये क्या कर सकते हो'.

फिर कलाम साहब के वचन सुनाने लगे कि क्या आपके पास देश के लिये पन्द्रह मिनट हैं? पढ़कर एक बंदे का ख्याल आ गया. उनकी तो पूरी पूँजी ही समय है और जी भर कर है. मगर देश के लिये नहीं, बकबकाने के लिये.

चलिये उनसे परिचय करवाता हूँ, नाम है मल्लन चाचा:




मल्लन चाचा ने जीवन भर कुछ नहीं किया. पिता जी तीन मकान बनवा कर मर गये. दो मकान किराये पर चलते थे और एक में मल्लन चाचा खुद रहते थे. किराये की आमदनी से ठीक ठाक गुजर बसर हो जाती है.

मल्लन चाचा को बात करने का बहुत शौक है और हर बात के लिये वो सामने वाले को ही दोषी मानते हैं. यह उनका स्वभाव था कि कभी किसी बात पर खुश नहीं होना और मीन मेख निकाल कर सामने वाले पर मढ़ देना.




मल्लन चाचा से मिलने उनके घर पहुँचा तो वहीं अहाते में लूंगी लपेटे पेड़ के नीचे चबूतरे पर पालथी मारे बैठे थे.





‘पाय लागूँ, चाचा’

‘खुश रह बचुआ. जरा वो सामने आले से बटुआ तो उठा ले और वहीं चूना भी रखा है. थोड़ा तम्बाखू मल दे.’

मैं तम्बाखू मलता उनके पास ही में बैठ जाता हूँ.

‘का बात है, बचुआ. बहुत दिन बाद दिखे.’

‘चाचा, वो तबियत खराब थी न इसी से.’

‘वो तो होना ही थी. न कसरत, न सैर सपाटा. तो का होगा. यहिये न!!’

‘नहीं चाचा, बस जुकाम पकड़ लिये था.’

‘काहे गरम कपड़ा नहीं पहनते.’

‘चाचा, इतनी गरमी में? वो तो जरा ठंडा गरम हो गया था बस.’

‘तब काहे इतनी शराब पीते हो?’

‘कहाँ चाचा, हम शराब नहीं पीते.’

‘तो फिर कौन ठंडा चीज पिया जा रहा है? बीयर..हा हा!! शहरी का नाती नाही तो! खैर, जाये दो. इ बताओ कि क्या समाचार है शहर का.’

‘चाचा, देश बहुत तरक्की कर रहा है. ढेरन विकास हो रहा है. GDP बहुते बढ़ गया है और मुद्रा स्फिती की दर भी एकदम्मे नियंत्रण में है. विदेशी मुद्रा का भंडार भी लबालब है.’

‘बचुआ, इ सब चोचलेबाजी हमसे न बतियाया करो. हम सब समझते हैं. ई GDP को तो तुम मानो घी, रोटी पर मलने के लिये और मुद्रा स्फिती नियंत्रण को जानो दाल का तड़का. अब रह गये विदेशी मुद्रा भंडार तो वो हैं सलाद और ये तुम्हारे मॉल और कॉल सेन्टरवे सब हइन केक और पेस्ट्री. जब रोटिये, दाल का जुगाड़ नहीं तो इनका का करीं. यह सब तो उनकी सुभीता के लिये हैं जिनके पास रोटी, दाल पहलवें से है. हमार तुहार के लिये नाही. समझे बचुआ.’

‘चाचा, हम तो जो सुनें है वो बताये दिये. बाकि हम तो कुछ किये नहीं हैं. हम पर काहे बिगड़ रहे हैं.’

‘तुम तो यूँ भी किसी कारज के हो नहीं, हें हें हे…’

‘अच्छा, अब चलता हूँ,चाचा. पाय लागी.’

‘ठीक है बचुआ. फिर आना.’

मैं उठता हूँ. चबूतरे के नीचे की जमीन ऊबड़ खाबड़ है पाँव डगमगा जाता है.

‘का बचुआ. जरा संभल कर. कुछ वजन कम करो. बेडौल हुये जा रहे हो. अपना ही वजन तक तो संभल नहीं रहा.’

मैं भी ‘जी’ कह कर चल पड़ता हूँ.

सोचता हूँ कि अगर वो चबूतरे के नीचे दो तसला भी बालू पुरवा दें तो जमीन समतल हो जाये. मगर उन्हें दोष तो दूसरे में ही दिखता है कि तुम वजन कम करो.

अरे चाचा, खुद भी तो कुछ करो कि बस दूसरे की गल्ती देखते रहोगे और हर बात के लिये सबको कोसते रहोगे. फलाना रोटी वालों के लिये है. फलाना हमारे लिये कुछ नहीं करता.

आज हर गली, मोहल्ले में न जाने कितने ही मल्लन चाचा हैं. क्या आप मिले हैं मल्लन चाचा से?

ऐसे में हम विकास की बात करें भी तो कैसे? Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, मई 31, 2007

"हास्य-दर्शन"- कवि अभिनव का जयकारा

"हास्य-दर्शन" - कवि अभिनव की प्रभावशाली प्रस्तुति - एक समीक्षा

भाई अभिनव शुक्ल का नाम यूँ तो किसी परिचय का मोहताज नहीं है. आप नियमित उन्हें निनाद गाथा ब्लॉग पर पढ़ते और सराहते आये हैं. यह मेरा सौभग्य ही है कि मेरे पहले कवि सम्मेलन में मंच प्रस्तुतिकरण के समय वो मेरे बाजू में बैठे मेरा हौसला बढ़ाते रहे. हमको अपना बड़ा भाई मानने वाले स्नेही अभिनव ने उसी कवि सम्मेलन के दौरान अपनी नई सी.डी. "हास्य-दर्शन" भेंट की. हमने बड़ी खुशी खुशी अपना अधिकार जताते हुये ले भी ली और धन्यवाद भी शायद नहीं दिया. फिर कभी दे लेंगे सोचते हुए. तब से अब तक वो सी.डी. कई बार सुन चुका हूँ, मगर मन ही नहीं भरता तो सोचा कि धन्यवाद स्वरुप उसकी समीक्षा ही पेश कर दी जाये.



'हास्य-दर्शन' में अभिनव की १९ कविताओं को उनकी अपनी आवाज़ में सुना जा सकता है। इसमें हास्य, व्यंग्य, राष्ट्रीय चेतना तथा जीवन दर्शन से जुड़ी हुई कविताओं को बहुत सुंदर रूप में प्रस्तुत किया गया है। अपनी इसी विविधता के कारण यह एलबम हास्य से दर्शन तक की यात्रा तय करता प्रतीत होता है। 'हास्य-दर्शन' का विमोचन 'अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति' के रजत जयंती समारोह में अमेरिका की राजधानी वाशींगटन डी सी में हुआ। 'हास्य-दर्शन' को कवि अभिनव की प्रथम काव्य प्रस्तुति होने का गौरव भी प्राप्त है। अभिनव की कविताओं में जो लोक तत्व है वह अनुकरणीय है। उन्होंने बड़ी सहज भाषा में जटिल से जटिल भावों को कुशलतापूर्वक प्रस्तुत किया है।

जिन्होने अभिनव को मंच पर बोलते सुना है, वे सभी जानते हैं कि उनमें भाषा की गहनता तथा प्रस्तुति का सौंदर्य एकमएक हो गया है। मैं अभिनव के साथ 'नियाग्रा फाल्स कवि सम्मेलन' के मंच पर काव्य पाठ कर चुका हूँ। मैंने वहाँ देखा कि किस प्रकार श्रोताओं को सम्मोहित करते हुए अभिनव अपने पिटारे में से एक के बाद एक उत्कृष्ट रचना निकाल रहे थे। एक ओर जहाँ उनमें मंचीय कवियों की अदाएँ हैं तो वहीं दूसरी ओर भीषण साहित्यिक रचनाकारों की गम्भीरता भी उनके व्यक्तित्व का अंग है। सामान्य से सामान्य विषय पर बात करते करते वे न जाने कब गहनता के महासागर में प्रवेश कर जाते हैं। यह विषयांतर तथा विविधता अभिनव के काव्य पाठ को तथा उनकी रचनाओं को समृद्ध करती है।

हास्य दर्शन हमें हास्य से दर्शन तक की एक यात्रा पर ले जाता है। एलबम का प्रारंभ भाषा की भावपूर्ण वंदना, "राष्ट्रभाषा हिंदी" नामक रचना से होता है तथा फिर अभिनव हमें हास्य-व्यंग्य लोक में ले जाते हैं। एलबम के अंत में चार गम्भीर कविताओं को स्थान दिया गया है, मेरे विचार से ये कविताएँ बहुत ज़रूरी थीं क्योंकि इन्हीं से श्रोता को दर्शन की अनुभूति होती है। एलबम के दो पड़ाव हैं, एक जब हास्य रचनाएँ व्यंगय में विलीन हो जाती हैं तथा दूसरा जब व्यंग्य रचनाएँ दार्शनिकता को स्थान देती प्रतीत होती हैं। सुस्पष्ट और कानों को अच्छी लगने वाली सुमधुर प्रवाहपूर्ण भाषा तथा सरल प्रस्तुति के कारण कवि सामने बैठ कर आपसे संवाद करता सा प्रतीत होता है।

अभिनव की बहुआयामी काव्य प्रतिभा तथा उत्कृष्ट प्रस्तुति के कारण 'हास्य दर्शन' काव्य प्रेमियों में खासा लोकप्रिय हुआ है। मेरी कार में भी 'हास्य दर्शन' जब तब बज कर मुझे काव्य लोक की यात्रा करवाता रहता है। अगली बार जब आप अभिनव से मिलें तो उनके आटोग्राफ सहित 'हास्य दर्शन' की सीडी को भी अपने साथ संजो लीजिएगा।

एलबमः 'हास्य-दर्शन' - A journey from laughter to philosophy.
कविः अभिनव शुक्ल
परिकल्पनाः अखिल अग्रवाल
परिचयः डा आदित्य शुक्ल
चित्रः कल्पा रमैया
फोटोः शबरेज़ इरफान खान
सर्वाधिकारः दीप्ति शुक्ल

अनुक्रमः

१ राष्ट्रभाषा हिंदी - (हिंदी भाषा से कवि के संबंध की अंतर्गाथा।)
२ वैलेंटाइन डे - (घनाक्षरी छन्दों में प्रस्तुत विनोदपूर्ण प्रेम संदर्भ।)
३ रेल-यात्रा - (बरेली से लखनऊ तक की रेल यात्रा का व्यंग्यपूर्ण वर्णन करती हास्य कविता।)
४ रसगुल्ला - (हलवाईगिरी करने की आनंददायक संस्मरणात्मक कविता।)
५ हमें तो बहुत पैसा कमाना है - (प्लास्टिक समाज पर प्रहार करती सटीक व्यंगय रचना।)
६ मुट्टम् मंत्र - (चेतावनीः स्वास्थय के प्रति जागरुकता मोटापे के लिए हानिकारक है।)
७ इंटरव्यू - (इलेक्ट्रिकल इंजीनियर के साक्षात्कार पर मज़ेदार हास्य कविता।)
८ वर्लड वार - (आखिर क्यों होती है।)
९ जेब में कुछ नहीं है - (प्रेम के पीछे के सच का खुलासा।)
१० हम तो आई आई एम जाएँगे - (संसद और आई आई एम के मध्य झूलती व्यंग्य रचना।)
११ कोई तो जीवित है - (संवेदनहीनता पर चुटीला व्यंग्य।)
१२ मोटा काग़ज - (शिक्षा व्यवस्था पर क़रारा व्यंग्य।)
१३ साहस - (जोश और हिम्मत का संचार करती उत्साहपूर्ण कविता।)
१४ मशाल दीपक और चिंगारियाँ - (चिंगारी से मशाल बनने की प्रेरणा देती छोटी सी रचना।)
१५ एक स्वप्न - (राष्ट्र भक्ति से परिपूर्ण ओज कविता।)
१६ अंदर से बाहर तक - (तुलनात्मक अध्यनात्मक कविता।)
१७ हम भी वापस जाएँगे - (प्रवासी मनोभावों की सशक्त प्रस्तुति।)
१८ नदी के दो किनारे - (जीवन को प्रकृति से जोड़ती हुई अद्भुत कविता।)
१९ पिता का जन्मदिवस - (बुज़ुर्ग पिता की अवस्था का मार्मिक चित्रण।)




भाई अभिनव और उनके सशक्त प्रस्तुतिकरण की एक झांकी आप यहाँ भी देख सकते हैं. इसी प्रस्तुतिकरण से आप समझ जायेंगे कि हमें अभिनव से इतना लगाव क्यूँ है, आखिर मोटापे का घोर समर्थक जो है. अभिनव के उज्जवल भविष्य के लिये अनेकों शुभकामनायें. उसका नाम होगा तो हमारा भी तो करवायेगा, यह हम तय मान कर चल रहे हैं. :)


पुनश्चः : इस समीक्षा के छप जाने पर अभिनव भाई ने घोषणा की है कि जिसे भी यह सी.डी. चाहिये, उनके हस्ताक्षर के साथ, वो यहाँ टिप्पणी के माध्यम से प्राप्त कर सकता है. हर संभव प्रयास होगा कि आप को सी.डी. जल्द मिले, जब भी आपसे अभिनव भाई की मुलाकात होगी. Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, दिसंबर 28, 2006

हमेशा देर कर देता हूँ मैं..





उर्दु और पंजाबी के मशहूर शायर मुनीर नियाज़ी. कौन जानता था कि मंच से गुंजती यह आवाज़ २६ दिसम्बर, २००६ की रात में दिल का दौरा पड़ने से हमेशा के लिये चुप हो जायेगी. वैसे नियाज़ी साहब साँस की बीमारी से एक अर्से से परेशान थे.


जिंदा रहे तो क्या हैं जो मर जायें हम तो क्या
दुनिया में खामोशी से गुजर जायें हम तो क्या.


उर्दु और पंजाबी की शायरी को मुनीर नियाज़ साहब, जिनका असली नाम मुनीर अहमद था, के निराले अंदाज को सुनकर मुशायरों में आये श्रोता मंत्र मुग्ध हो जाया करते थे. आपका जन्म १९ अप्रेल, १९२८ को होशियारपुर, पंजाब, भारत में हुआ. आपकी प्रारंभिक शिक्षा साहिवाल जिले में और फिर उच्च शिक्षा के लिये आपने दियाल सिंग कॉलेज, लाहौर मे दाखिला लिया.

नियाज़ी साहब बंटवारे के बाद साहिवाल में बस गये थे और सन १९४९ में ‘सात रंग’ नाम मासिक का प्रकाशन शुरु किया. बाद में आप फिल्म जगत से जुड़े और अनेकों फिल्मों में मधुर गीत लिखे. आपका लिखा मशहूर गीत ‘उस बेवफा का शहर है’ फिल्म ‘शहीद ‘ के लिये स्व. नसीम बेगम ने १९६२ में गाया. बकौल शायर इफ़्तिकार आरिफ़, मुनीर साहब उन पांच उर्दु शायरों में से एक हैं, जिनका कई यूरोपियन भाषाओं में खुब अनुवाद किया गया है.

आपको मार्च २००५ में ‘सितार-ए-इम्तियाज’ के सम्मान से नवाज़ा गया.

मुनीर नियाज़ी साहब के ११ उर्दु और ४ पंजाबी संकलन प्रकाशित हैं, जिनमें ‘तेज हवा और फूल’, ‘पहली बात ही आखिरी थी’ और ‘एक दुआ जो मैं भूल गया था’ जैसे मशहूर नाम शामिल हैं.

मुनीर नियाज़ी साहब को श्रृद्धांजली अर्पित करते हुए, उनकी मशहूर रचना पेश करता हूँ:


हमेशा देर कर देता हूँ मैं, हर काम करने में.

जरुरी बात कहनी हो, कोई वादा निभाना हो,
उसे आवाज देनी हो, उसे वापस बुलाना हो.
हमेशा देर कर देता हूँ मैं…..

मदद करनी हो उसकी, यार की ढ़ाढ़स बंधाना हो,
बहुत देहरीना रस्तों पर, किसी से मिलने जाना हो.
हमेशा देर कर देता हूँ मैं…..

बदलते मौसमों की सैर में, दिल को लगाना हो,
किसी को याद रखना हो, किसी को भूल जाना हो.
हमेशा देर कर देता हूँ मैं…..

किसी को मौत से पहले, किसी गम से बचाना हो,
हकीकत और थी कुछ, उसको जाके ये बताना हो.
हमेशा देर कर देता हूँ मैं…..


और मुनीर साहब को आगे सुनें:



फूल थे बादल भी था और वो हंसीं सूरत भी थी
दिल में लेकिन और ही एक शक्ल की हसरत भी थी.

क्या कयामत है मुनीर अब याद भी आते नहीं
वो पुराने आसनां जिनसे हमें उल्फत भी थी.



मैं तो मुनीर आईने में खुद को ताक कर हैरां हुआ
ये चेहरा कुछ और तरह था पहले किसी जमाने में


डर के किसी से छुप जाता है जैसे सांप खजाने में,
ज़र के जोर जिंदा हैं सब खाक के इस वीराने में.
जैसे रस्म अदा करते हों, शहरों की आबादी में,
सुबह को घर से दूर निकल कर, शाम को वापस आने में.



और यह गज़ल देखें:



जिंदा रहे तो क्या हैं जो मर जायें हम तो क्या
दुनिया में खामोशी से गुजर जायें हम तो क्या.

अब कौन मुंतजीर है हमारे लिये वहां,
शाम आ गई है, लौट के हम घर जायें तो क्या.

दिल की खलिश तो साथ रहेगी तमाम उम्र
दरिया-ए-गम के पार उतर जायें हम तो क्या.


मुनीर साहब को पुनः एक बार नमन और भावभीनी श्रृद्धांजली.

--समीर लाल ‘समीर’ Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, दिसंबर 27, 2006

हजारों ख्वाहिशें ऐसी….

मिर्ज़ा असदुल्ला बेग खान यानि गालिब का आज २७ दिसम्बर को जन्मदिन है. ज्ञात सूत्रों के अनुसार गालिब का जन्म २७ दिसम्बर, १७९७ में आगरा में हुआ था.




चित्र साभार: बोलोजी.कॉम

इसी मौके पर गालिब को याद करते हुये उनके चन्द शेर और गज़ल पेश कर रहा हूँ:

उनके देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है


देखिये पाते हैं, उश्शाक बुतों से क्या फ़ैज़
इक बराह्मन ने कहा है कि ये साल अच्छा है


हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल के खुश रखने को ग़ालिब ये खयाल अच्छा है!


मंज़र इक बुलंदी पर और हम बना सकते
अर्श के परे होता काश के मकां अपना
हम कहां के दाना थे, किस हुनर में याक्ता थे
बेसबब हुआ "ग़ालिब" दुश्मन आसमां अपना

अर्श: आकाश ; मकां: घर ; दाना: अमीर ; याक्ता: माहिर ; बेसबब: बिना कारण


ये जो हम हिज्र में दीवारो-दर को देखते हैं
कभी सबा को कभी नामाबर को देखते हैं
वो आये घर में हमारे खुदा की कुदरत है
कभी हम उनको, कभी अपने घर को देखते हैं

हिज्र : वियोग , जुदाई ; सबा : हवा ; नामाबर : संदेश पहुंचाने वाला


फिर उसी बेवफ़ा पे मरते हैं
फिर वो ही ज़िन्दगी हमारी है
बेखुदी बेसबब नहीं ग़ालिब
कुछ तो है जिसकी पर्दादारी है

बेसबब : बिना कारण ; पर्दादारी : छुपाया जाना


रग़ो में दौडते फिरने के हम नहीं कायल
जब आँख ही से ना टपका तो फिर लहू क्या है
जला है जिस्म जहां दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो अब राख जुस्तजु क्या है.

रग़ो में : नसो में ; कायल होना : किसी बात को चाहना ; जुस्तजु :इच्छा

ये इश्क नहीं आसां, बस इतना समझ लीजे
एक आग का दरिया है और डूब के जाना है



और अब गालिब की एक गज़ल:-

हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमाँ, लेकिन फिर भी कम निकले

डरे क्यों मेरा कातिल क्या रहेगा उसकी गर्दन पर
वो खून जो चश्म-ऐ-तर से उम्र भर यूं दम-ब-दम निकले

निकलना खुल्द से आदम का सुनते आये हैं लेकिन
बहुत बे-आबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले

भ्रम खुल जाये जालीम तेरे कामत कि दराजी का
अगर इस तुर्रा-ए-पुरपेच-ओ-खम का पेच-ओ-खम निकले

मगर लिखवाये कोई उसको खत तो हमसे लिखवाये
हुई सुबह और घर से कान पर रखकर कलम निकले

हुई इस दौर में मनसूब मुझसे बादा-आशामी
फिर आया वो जमाना जो जहाँ से जाम-ए-जम निकले

हुई जिनसे तव्वको खस्तगी की दाद पाने की
वो हमसे भी ज्यादा खस्ता-ए-तेग-ए-सितम निकले

मुहब्बत में नहीं है फ़र्क जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफिर पे दम निकले

जरा कर जोर सिने पर कि तीर-ऐ-पुरसितम निकले
जो वो निकले तो दिल निकले, जो दिल निकले तो दम निकले

खुदा के बासते पर्दा ना काबे से उठा जालिम
कहीं ऐसा न हो याँ भी वही काफिर सनम निकले

कहाँ मयखाने का दरवाजा 'गालिब' और कहाँ वाइज़
पर इतना जानते हैं, कल वो जाता था के हम निकले .

-समीर लाल ‘समीर’ Indli - Hindi News, Blogs, Links