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शुक्रवार, दिसंबर 14, 2018

यूँ ही..कुछ ख्यालों की स्याही, छितरी बिखरी सी..सूखी हुई सी



रेडियो पर गाना सुन रहे हैं कान में इयर फोन लगा कर:
कहीं किसी रोज यूँ भी होता
हमारी हालत तुम्हारी होती
जो रात हमने गुजारी मर के
वो रात तुमने गुजारी होती!!
कितनी गुलजार रात है आज रविवार की...बाहर बहुत कुड़कुड़ा देने वाली -१० ठंड है..सुनसान सड़क..बरफ की चादर ओढ़े हुए..घर के भीतर की हीटिंग बाहर की ठंड को धता बता रही है. यथार्थ का धरातल वो नहीं जो रुमानियत में है..शायद यही वजह हो प्रीत जब हकीकत का धरातल पाती है शादी के बाद तो युगल विचलित हो उठता है..संभल नहीं पाता..फूल की खुशबू खो जाती है और फिर वही..कहा सुनी..दूरियाँ..संबंध विच्छेद..
मगर यहाँ फायर प्लेस अपनी गरम सांसों की आगोश में समेटने की कोशिश में खुद को जला रहा है..
शमा कहे परवाने से, परे चला जा..
मेरी तरह जल जायेगा..यहाँ नही आ..   मगर सुनता कौन है..
जलना ही जब प्रारब्ध है तो कौन भला बदल सकता है उसे..
उधर गाना भी खत्म हो चुका है और अब सेक्सोफोन पर बज रही है एक रुमानी धुन और रेड वाईन का ग्लास!! गरमाहट फायर प्लेस निर्लिप्त सा भाव धरे फैला रहा है..वो मौसम और गाने के बीच सेतु बन रहा है..
मेरे साजन हैं उस पार,
मैं इस पार...
चल मेरे मांझी..चल मेरे मांझी,,
खिड़की से झांक कर देखता हूँ.. दूरआसमां में एक चाँद खिला है..मुझे मूँह चिढ़ाता..कहता है कि तुमसे उस पार मिल कर आया है पीपल के पेड़ की छांव में..जहाँ अंगना फूल खिले हैं.
दुत्तकारने को मन कर रहा है मगर सिमेट लेता हूँ उस सोच को अपनी बाँह में..बात तुम्हारी करता है वो इसलिए..प्यार तो उस पर आना ही था.
कितना नादान हूँ मैं कि नादान वो चाँद है?
दरअसल नादान और मासूम तो तुम हो कि न चाँद और न मैं..संभाल पाये खुद को..तुम्हें देख कर..
सेक्सोफोन पर बजती धुन एक पूरी रात के पार ले आई और उधर आसमान में सुबह का सूरज थपकी देकर मेरी दुनिया को जगा रहा है...
सुबह हुई अब जागो प्यारे..दुनिया खड़ी है बांह पसारे..
और मैं रात भर का जागा..अब कुछ देर आँख बंद कर सो जाने की कोशिश में जुटा सोचता हूँ..कितना अलग अंदाज है मेरा..
मगर कितनी देर ...दफ्तर तो जाना ही होगा..काम भी जरुरी है न!! ख्यालों में जिन्दगी नहीं गुजरती.
व्हाटसएप की दुनिया से बाहर जो यथार्थ है, वही व्हाटसएप की दुनिया का चिराग है.. बिना चिराग के कौन सा अंधकार मिटा है भला.
दोनों के बीच सामन्जस्य बनाना ही होगा.
दोनों एक दूसरे के पूरक हैं अब..पूरा कोई भी नहीं!!
एक दार्शनिक सा विचार..बहता हुआ सा!!
-समीर लाल ’समीर’

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गुरुवार, नवंबर 17, 2016

हम सोच रहे हैं क्यूँकि हम तकलीफ में नहीं..



साहेब के हाथ बहुत कड़क और मजबूत हैं..
एक बार मिला लो तो कई दिनों तक दुखते हैं..

ऐसे ही शिव सेना के बारे में सोचकर ख्याल आया...अब मिलाया है तो दुखना भी झेलो..
वैसे ही नई नीति को देख एक ख्याल और भी आया..

क्यूँ न अपनी ही बीबी से एक बार और शादी कर ली जाये घर में ही सादे समोरह में..और बैंक से २,५०,००० रुपये निकाल लायें..वरना तो कोई और रास्ता भी नहीं दिखता है ये ५० दिन काटने का..स्याही लगे हाथों ने इतनी तो औकात बनवा ही दी है कि एक सादा सा शादी का कार्ड छपवा लिया जाये...

एल सी डी स्क्रीन वाला कार्ड तो उन राजनेताओं को ही मुबारक हो जो बेशर्मी से ऐसे विपरीत वक्त में, ५०० करोड़ की शादी की नुमाईश लगा कर बैठे हैं और उनके साथी धन्ना सेठ उन्हें नवैद में लिफाफानशीं असली २००० रुपये की गड्डियाँ भेंट कर रहे हैं.., जब देश की ९८% जनता बैंको की कतारों में ४५०० रुपये बदलवाने के लिए कतारबद्ध, अपने ही मेहनत से कमाये धन को सफेद घोषित करने के लिए अपनी ऊँगली पर काला स्याही का धब्बा लगवाने को मजबूर है और हमारे आका कह रहे हैं कि कल से  इस सीमा को घटा कर ४५०० से २००० कर दिया गया है क्यूँकि इसका जमकर दुरुपयोग हो रहा है..किसने दुरुपयोग किया है महोदय इसका.. जरा इसकी जानकारी भी दे दी जाये तो बेहतर वरना ५०० करोड़ लाईन में लगकर तो नहीं ही न निकाले गये होंगे...

कल को यूँ न घोषणा कर दी जाये की रुपये २००० की जगह अगर रुपये १०००० निकालने हों तो ऊँगली की जगह चेहरे पर काली स्याही पुतवा कर ले सकते हैं..यह भी आमजन की सुविधा स्वरुप ही घोषित करियेगा मुस्कराते हुए...माननीय..

बस, यूँ ही सोच रहे हैं हम...और करें भी तो क्या करें सोचने के सिवाय??

आप  क्या सोच रहे हैं??

ऊपर की अपनी ही तस्वीर को देखकर फिर सोचा कि हम जैसों का विदेश में बैठकर सोचना वैसा ही तो है जैसा कि पाँच सितारा होटल के वातनुकुलित कमरे में बैठकर देश की गरीबी रेखा के नीचे रह रही आबादी के लिये नीतियाँ निर्धारित करना...और इत्मिनान से प्रेस काँफेंस में ऐसा कह देना कि..

इस घोषणा के बाद गरीब घर में आराम से चैन की नींद सोया है और अमीर कतार में खड़ा बिलबिला रहा है...


-समीर लाल ’समीर’          
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सोमवार, नवंबर 14, 2016

शहादत या ऑनर किलिंग..क्या है यह!!


सियापा और उसके सुर यूँ...इत्ती कम उम्र..बस १६ साल की उम्र..यह तो खेलने खाने की उम्र है, इस उम्र में भी भला कोई मरता है? सन २००० हजार की पैदाईश...सारा भविष्य उस पर ही टिका हुआ था..बहुत जतन उसे संभाला था..और एकाएक उसकी इस तरह हत्या..कि सब कुछ पल भर में नेस्तनाबूत हो गया..भविष्य के सारे सपने चकनाचूर..

इसे हॉनर किलिंग कहें या शहादत..

अगर पड़ोसी मुल्क को मूँह की चटा देने के लिए ही इस १००० के नोट का कत्ल हुआ है तो इसे शहादत मान कर इसकी मौत को शहीद का दर्जा मिलना चाहिये और इस तरह से शहीद हो जाने पर १ करोड़ का मुआवजा तो बनता ही है उस पालक का, जिसने इसे अब तक बड़े जतन से पाला और संभाला था.... अतः धोषणा करो..हे सत्यवादी आंदोलनकारी...,कि मैं हर उस परिवार को एक एक करोड़ रुपये देने की घोषणा करता हूँ जिसके पास उस हजार रुपये का नोट हैं, जो अभी अभी शहीद हुए है सीमा पार से आने वाले नकली नोटों से लड़ते हुए...ध्यान रहे कि इस मुआवजे के हकदार सिर्फ वो लोग होंगे जिनके नोट बदलने योग्य नहीं हैं..वो बेचारे कहाँ जायेंगे? जिनके नोट बदल दिये गये हैं वो इसे परिवार के अन्य सदस्य को उसकी शहादत की एवज में दी गई नौकरी मानें. अतः वे मुआवजे के हकदार नहीं होंगे. मुआवजा पाने के लिए नोट के धारक को, घोषणा पत्र समेत अन्य ऐसे सभी कागजत जमा करने होंगे जो  इस बात को साबित करते हों कि यह नोट बैंक में किसी भी हालत में बदले जाने योग्य नहीं है एवं खालिस काले हैं.

जान लिजिये आपकी यह घोषणा...आपको न सिर्फ पंजाब, गोवा और यूपी की गद्दी दिला जायेगी..बल्कि पूरे भारत की राजनीत को हिला जायेगी...किस्मत और कल को कौन जानता है? क्या पता इसी के चलते कल को आप प्रधान हो जायें...फिर ओबामा केयर का जो हश्र हुआ ट्रम्प के आने पर ..उसकी पुनरावृति आप इन नोटों को फिर से चलन में लाकर कर देना..कम से कम इस मामले में तो हम अमरीका के समकक्ष आ जायेंगे..है न सटीक बात?

वरना अगर यह हत्या, अपनी साख बचाने या उसमें इजाफा करने के लिए, अपने ही घर में रह रहे लोकल भ्रष्टाचारियों की कलई खोलकर, अपने ही आमजनों के सामने, अपने ही लोगों को अपराधी घोषित करने की मुहिम है..तो इसे ऑनर किलिंग का दर्जा दिया जाना चाहिए...तब यह सोचना होगा कि खाप पंचायत का फैसला मान्य होगा या अपनी संवेधानिक अदालत का..

बहुत दुविधा है.. हॉनर किलिंग..शहादत या कि बस, शरारत!!

यह एक संक्रमण काल है..मुद्रा का संक्रमण काल..

संकट तो है ही, कल को दूर भी हो जायेगा..संकट का तो स्वभाव ही आना जाना है..बस, हर बार संकट की परिभाषा बदल जाती है...

समीर लाल समीर
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रविवार, नवंबर 13, 2016

दुनिया जिसे कहते हैंं जादू का खिलौना है....



स्व. ओम व्यास 'ओम' की कविता  का अंश:
पिता से ही बच्चों के ढेर सारे सपने हैं,
पिता है तो बाज़ार के सब खिलौने अपने हैं...

बस मौका विशेष पर इसी को याद कर नम आँख लिए भावुक हो चले हमारे मित्र, हमारी ही मित्र मंडली में बैठे आज अवरुद्ध कंठ से अपनी मातम बयानी कर रहे थे. मित्र मंडली में भला किसे मालूम था कि उनकी इस मातम बयानी का आधार पिता पर लिखी स्व. पं. ओम व्यास 'ओम' की कविता है..

अघोषित आधारहीन बातों की तरह ही मित्र की इस मातम बयानी का भी वही हश्र हुआ, जो ऐसी बातों का होता है...

जब वो कहने लगे कि जब तक वो हमारे पास थे, तब तक ऐसा लगता था कि सारी दुनिया अपनी है. जो चाहिये ले लो..एक बच्चे की तरह खिलौनों का सारा जहाँ खरीद लो...आज उनके गुजर जाने पर..ऐसा लगा कि सर पर से साया हट गया है...अभी उन्हें गंगा जी में सिरा कर आया हूँ...मन उदास है. दिल में अब यही आस है कि गंगा की लहरें उन्हें वैतरणी पार करायें..

वक्त और मौके के साथ हर सोच बदल जाती है अतः मित्र मंड़ली के सारे व्यवहारिक मित्र वर्तमान पतीपेक्ष में यही समझे कि १००० और ५०० के पुराने नोटों की बात कर रहा है.. जो हाल ही में सरकारी घोषणा के तहत असमय अचानक ही मृत्यु को प्राप्त हुए हैं...वाकई जब तक वो साथ थे तब तक सारे जहाँ के खिलौने अपने थे..

गाड़ी, घोड़ा, मकान आदि तमाम चीजें सब खिलौने ही तो हैं इस भौतिक जगत में.. जब तक सांसे हैं.. खरीदने, बेचने, छीनने, छिपाने, लूटने, टूटने के सिलसिले में इन्सान मशगूल रहता है और जैसे ही सांसे रुकी, सब कुछ यहीं छूट जाने हैं. अतः सब कह उठे कि जब तक दूध दिया ..तब तक तो खूब दुहा मियाँ..अब गंगा में बहा कर चले भी आये हो तो इसमें अफसोस कैसा? दो नम्बर का था..दो नम्बर में गया..यही तो दुनिया की रीत रही है,,तुम कौन सा कुछ नया कर आये??

मित्र स्तब्ध सा सोच रहा है कि ये कैसा समाज हो चला है? पिता के गुजर जाने पर..दोस्तों से जो एक संवेदना की उम्मीद थी वो भी जाती रही..


और मैं सोच रहा हूँ कि उसने भी यह कब बताया कि उसके पिता नहीं रहे..वह बस मान कर चला कि सबको उसकी व्यक्तिगत क्षति की जानकारी तो होगी ही...

इसी मान कर चलने में न जाने कितने संबंधों के महल नेस्तनाबूत हो जाते हैं...और हम अवाक से बस देखते रह जाते हैं...

-समीर लाल ’समीर’
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शनिवार, नवंबर 12, 2016

नमक की नमकीनीयत


प्रभु से बड़ा प्रभु का नाम..वही हालत मुझे नमक की भी लगती है. जितना नमक बतौर नमक खाने में इस्तेमाल होता होगा, उससे कहीं अधिक इसके नाम की उपयोगिता है.

वैसे तो नमक अपने आप में ही महान है. भगोना भर दाल में यूँ तो इसका रोल एक चम्मच भर का है मगर दाल में डालने से रह जायें या ज्यादा पड़ जायें, दोनों ही हालातों में इतनी मँहगी दाल की कीमत कौड़ी भर की कर देता है.ये मिली जुली सरकार में शामिल उस निर्दलीय सांसद की हैसियत रखता है, जिसके नाराज होते ही पूरा सरकार संकट में आ जाती है.

इसके अपने औषधीय गुण भी जग जाहिर हैं..सरसों के तेल को नमक में डाल कर दाँतों पर घिसने पर मसूड़ों को बलवान करने से लेकर गरम पानी में मिलाकर पैर डुबा देने मात्र से सारे शरीर का दर्द और सूजन खींच लेने की क्षमता रखता है.

नमक का महत्व ऐसा कि गाँधी जी इसके नाम से सत्याग्रह ही कर डाला और एक मुठ्ठी नमक का कमाल ऐसा कि अंग्रेजी हुकुमत की जड़ें हिल गई.

ये लड़कियों के चेहरे की एक अलग सी सुन्दरता का परिचायक भी होता है..न जाने कितनी बार लोगों को कहते सुना होगा कि फलानी लड़की के चेहरे पर कितना नमक है..

अमरीका, कनाडा जैसे बर्फीले देशों में तो बर्फ गिरते ही इसका सड़को और साईड वॉक पर छिड़काव न हो तो न तो गाड़ियाँ चल पायें और न ही पैदल चलना संभव हो. सार्दियों में नमक लाईफ लाईन होता है ऐसे देशों में..

इसके प्रयोग ने उन मुहावरों को मुहावरों की अग्रिम पंक्ति में लाकर खड़ा कर दिया जिसमें इसका जिक्र आता है कि क्यूँ जले पर नमक छिड़कते हो?’ या ’उसकी तो आदत ही है हर बात में नमक मिर्च लगा कर बताना’

वैसे जिन्दगी की असलियत बताने के लिए, अवधी में जिस कहावत का हर तरफ जबरदस्त इस्तेमाल हुआ है, उसमें भी नमक जिसे नून भी कहते हैं, अपनी पैठ जमाये बैठा है-  कहावत का अपभ्रंश ’ भूल गये राग रंग भूल गये छकड़ी, तीन चीज याद रही, नून तेल लकड़ी’

यहाँ तक की फिल्मी गानों पर भी इसने अपनी छाप छोड़ी है..’समुन्दर में नहाकर और भी, नमकीन हो गई हो..’

और इसी नमक का अफवाह के तौर पर हालिया इस्तेमाल देखकर लगा कि वाकई इसकी ताकत का कोई जबाब नहीं.

जब सारा देश असली और नकली नोटों की अदला बदली और ठिकाने लगाने की जुगत में हलाकान था. किसी को भी और कुछ सोचने की फुरसत ही न थी, तब न जाने किसने यह अफवाह उड़ा दी कि देश में नमक का स्टॉक खतम होने को है..

फिर तो पूछिये मत...गरीबों से लेकर अमीरों के बीच और सभी की पहुँच में रहने वाला नमक ऐसा नमकीन हुआ..कि १००० के नोट की ललाई फीकी पड़ गई. २००० के नोट का गुलाबी रंग तक अपना आकर्षण खो बैठा और लोग भागे नमक खरीदने के लिए...

ऐसा उत्कर्ष मिले तो जमीन भूल जाने में वक्त ही कितना लगता है..गरीबों के दर्द को खुद जीने का दावा करने वाला भी इसी उत्कर्ष के उन्माद में, खुद ही गरीबों के दर्द का कारण बन जाता है...तब नमक की क्या गल्ती...यह भी बिकने लगा ७०० रुपया किलो...

इतिहास में काले धन से निपटने की अब तक की सबसे बड़ी मुहिम की चर्चा को कालाबाजारियों नें मिनट भर में नमक चटा दिया.

बहुत मुश्किल से अफवाह को विराम दिया गया और नमक लौटा है अपनी जमीनी हकीकत पर...  


-समीर लाल ’समीर’
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शनिवार, नवंबर 05, 2016

विषयाभाव!!


आज फिर लिखने के लिए एक विषय की तलाश थी और विषय था कि मिलता ही न था, तब विचार आया कि इसी तलाश पर कुछ लिखा जाये.
वैसे भी अगर आपको लिखने का शौक हो जाये तो दिमाग हर वक्त खोजता रहता है-कि अब किस विषय पर लिखा जाये? उठते-बैठेते, सोते जागते, खाते-पीते हर समय बस यही तलाश. इस तलाश में मन को को यह खास ख्याल रहता है कि एक ऐसा मौलिक विषय हाथ लग जाये कि पाठक पढ़कर वाह-वाह करने लगे. .. पाठक इतना लहालोट हो जाये कि बस साहित्य अकादमी अवार्ड की अजान लगा बैठे..और साहित्य अकादमी वाले उसकी कान फोडू अजान की गुहार सुनकर अवार्ड आपके नाम कर चैन से सो पायें.
यूँ तो जब भी कोई पाठक आपके लिखे से अभिभूत होकर या आपसे कोई कार्य सध जाने  की गरज के चलते ये पूछता है कि- भाई साहब, आप ऐसे-ऐसे सटीक और गज़ब के ज्वलंत विषय कहाँ से लाते हैं? तो मन प्रफुल्लित हो कर मयूर सा नाचने लग जाता है. किन्तु मन मयूर का नृत्य पब्लिक के सामने दिखाना भी अपने आपको कम अंकवाने जैसा है. कौन भला अपनी पब्लिक स्टेटस गिरवाना चाहेगा...
तो अब सोचिये कि अगर आप तक यह प्रश्न पहुँचा है, इसका मतलब ही यह है कि सामने वाले ने आपको ज्ञानी माना हुआ है अन्यथा मूर्खों से भी भला कोई प्रश्न करता है कोईअतः आपको गभीरता का लबादा चेहरे पर लादे हुए ज्ञान मुद्रा बनाये व्याख्यान कुछ इस तरह शुरु कर देना पड़ता है कि..
’देखियेआप तो स्वयं ज्ञानी हैं (इसे नमस्ते के बदले नमस्ते वाले का संस्कार मानें कि उसने आपको ज्ञानी माना है अतः आप उसका उधार वापस कर रहे हैं ऐसा कह कर, वरना तो आप जानते ही हैं उसको)विषय तो आपके आस पास ही हजारों बिखरे होते हैं,,जैसे कि कंकड़ पत्थर.. बात आपकी सजगता और उन्हें पहचान लेने की है. आपका नित आचरण, मित्रों की गतिविधियाँ, समाज का व्यवहार और रीतियाँ, कुरितियाँ, सरकार और सरकारी तंत्र को चलाने के यंत्र और मंत्र आदि-आदि नित हजारों हजार विषयों के वाहक होते है, मगर जो हीरे को पहचान जाये, वो पारखी कहलाता है वरना तो मूरख उसे कंकड़ मान कर लात मार मार कर निकल ही रहे हैं. वैसे असल बात ये है कि मात्र हीरे को पहचान लेना ही पारखी को जोहरी नहीं बना देता..(इस बहाने आप सामने वाले के मन में आपके ही बयान से उपज आये उस भ्रम को नेस्तनाबूत भी कर देते हैं कि वो भी आस पास सजगता से देख कर विषय तलाश सकता है).
जैसे एक अच्छा जोहरी बनने के लिए जीवन में कुछ अलग सा कर जाने का संकल्पइक हुनर सीख लेने की ललक, एक निष्ठ लगन, तराशने का सधा हुआ हुनर और एक इमानदार मेहनत की जरुरत होती है वैसे ही किसी भी विषय पर लिखने वाले एक अच्छे लेखक को शब्दकोश का धनी, विविध साहित्य का अपार पठन और मेहनत और लगन से अपने लेखन को अंजाम देने की जरुरत होती है. विषय निश्चित ही अपने आप में महत्वपूर्ण होता है. विषय कथानक की घूमती हुई धूरी होता है जिसके आस पास आपको, शब्दों का उचित चयन करते हुए एवं उनको गूथने के हुनर का जतन से इस्तेमाल करते हुए, एक ऐसे आभा मण्डल का निर्माण करना होता है कि पढ़ने वाला उसी आम से दिखने वाले विषय को एकदम खास सा विषय मान ’वाह वाह” कर उठे...

और इतना सब कह कर भी इस बात को तय कर पाने के लिए, कि आप पूछने वाले पर अपने ज्ञानी होने की पूरी छाप छोड़ पाये या नहीं और उसे सदैव मूरखता से अभिशप्त रहने का अहसास दिला पाये या नहीं...., आप उससे यह पूछने से बाज नहीं आते कि ’क्या समझे? समझे कि नहीं?
सामने वाला साहित्य का ज्ञान भले न रखता हो पर प्रश्नकर्ता भारतीय है और हर पान की दुकान पर खड़े से रेल में बैठे आम भारतीय की तरह उसे राजनीत का ज्ञान तो जरुर ही होग....हर भारतीय पर इस हेतु विशेष ईश कृपा है और इस ज्ञान का होना तो उसके डी एन ए में शामिल है अतः उसी आधार पर वो ’क्या समझे? समझे कि नहीं?’ का जबाब देता है. और कहता है कि...
जी, मैं समझ गया और मैं इसे ऐसे समझा कि जैसे राजनीत में तमाम मुद्दे आपके आस पास बिखरे पड़े होते हैं.. बस बात उन्हें पहचानने की है और इतना और जान लिजिये कि मात्र उन मुद्दों को पहचान जाने से भर आप राजनेता नहीं बन जाते...बात उन आम मुद्दों को शब्दों और जुमलों के मायाजाल में बाँध कर आमजन के सामने ऐसे पेश करने की है कि वो मुद्दे इतने खास हो जायें...कि आमजन महसूस करने लगे..वाह, बस इस बंदे को चुनना है इस बार और फिर देखो...जल्दी ही अच्छे दिन आने वाले हैं!!और आमजन का यह इन्तजार आमजन वो ख्वाब बन जायेगा जो आपको राज गद्दी दिला जायेगा...
उसकी यह व्याख्या इस लेखक श्रेष्ठ के दिल को छू गई ..बस, पाठको में इसी तरह के इन्तजार को जगाना अब मात्र इस लेखक की तमन्ना बची है और लेखक की राजगद्दी यानि अकादमी का साहित्य सम्मान.वो तो फिर मिल ही जायेगा एक दिन...जुमले पर जुमले गढ़ते रहेंगे इसी इन्तजार को जगाने के लिए...कौन जाने कौन सा जुमला हकीकत में साहित्य सम्मान दिला जाये..
कभी जब कोई विषय नहीं सूझता है
तब ऐसे में खुद ही एक विषय बनकर..
खुद अपनी तलाश में निकल जाता हूँ मैं ..
मानो खुद को ही आईना दिखलाता हूँ मैं...

-समीर लाल समीर
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