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शनिवार, जून 01, 2019

आत्ममुग्धता अभिशाप नहीं..खुश रहने के लिए प्रसाद है



अगर आपको यह लगता है कि बुद्धिजीवी बुद्धिमान होता है तो यह आपकी गलतफहमी हैं. बुद्धिजीवी और बुद्धिमानी का वो ही रिश्ता होता है जैसा कि जगमग रोशन ईमारतों का अपनी घुप्प अंधेरी नींव से होता है. बड़ी बड़ी बेवकूफियों की आधारशीला पर इन ऊँचे बुद्धिजीवियों के गुंबद खड़े है.
मूलतः बुद्धिमान व्यक्ति कभी चर्चा में नहीं रहता जैसे कि ईमानदार व्यक्ति. उसके पास कहानी गढ़ने को कुछ नहीं होता. वो बहुत बोरिंग किस्म का इन्सान होता है और उसका बुढ़ापा बड़ी तकलीफ में गुजरता है. उसे कोई सुनना नहीं चाहता. वो एकाकी रह जाता है.
इसके ठीक उलट बुद्धिजीवी के पास एक चिल्लाहट होती है खोखले चने वाली जिसे कहावत में कहा जाता है कि थोथा चना, बाजे घणा!! छद्म ज्ञान के तौर पर उसके पास तीन से चार रेफरेन्स होते हैं जिसमें पोलेण्ड की एक कवियत्री, शेक्सपियर का एक नाटक, राबर्ट फ्रास्ट की दो कवितायें, एक आयरलेण्ड के लेखक का नाम और मुंशी प्रेमचन्द्र की कहानी भाभी’. यह भी तय है कि इसे पढ़ते ही आधे लोग मुंशी प्रेमचन्द्र की कहानी भाभी गुगल करने लगेंगे और उसे न पाकर गुगल को गलत मान बुद्धिजीवी की चरण वन्दना करने लगेंगे. यही वह अखंड सत्य है जो बुद्धिजीवी को बुद्धिजीवी बनाता है. वरना तो बुद्धुओं की जमात में भी वो कोई दर्जा न प्राप्त कर पायें.
बुद्धिमान व्यक्ति शांत स्वभाव का होता है और किसी बहस में नहीं पड़ता. वो इमानदार व्यक्ति की तरह सौम्य होता है. बेईमान व्यक्ति के पास कई किस्से होते हैं. वो भ्रष्टाचार कर के बैंकाक, मलाया, पताया घूमता है. डांस बार में जाता है. नेपाल और वेगस में जुँआ खेलता है. वो बुढ़ापे में जब अपने जवानी के किस्से सुनाता है तो उसमें रस होता है. लोगों को मजा आता है. वो महफिल लूट लेता है अपने किस्सों को सुना कर के. सो ही बुद्धिजीवी का हाल है. एकदम भ्रष्टाचारी से एकरसता और तारतम्य बनाता हुआ.
अगर सही मायने में बुद्धिजीवी की परिभाषा तलाशेंगे और गहराई में उतरेंगे तो आप पायेंगे कि असल बुद्धिजीवी आतंकवादी होता है. वो बोद्धिक आंतक फैलाता है. वो अपने सीमित ज्ञान को एक मीनी वैन में भरकर इतना बड़ा धमाका करता है कि बुद्धिमान व्यक्ति भी दहल जाता है. वो भरी महफिल में सबसे पूछ बैठता है कि जैगलोस्की को तो आप सबने पढ़ा ही होगा?अब जो हाँ बोले वो मरे और जो न बोले वो मरे. हाँ बोल दो तो पूछे जाने का डर कि आप सुनाईये उनकी फलानी रचना और न बोलो तो मूरख ठहराये जाने का डर. इसमें एक ही राज मार्ग है बच निकलने का और अपनी अस्मिता बचाये रखने का कि चुप रह जाओ. बुद्धिजीवी इसे समझता है और ये ही पैतरा बुद्धिजीवी को बुद्धिजीवी बनाता है क्यूँकि सुना तो उसने भी नहीं है? अतः वो मात्र इतना कह कर अपनी बात की इति श्री कर लेता है कि कभी पढ़ियेगा उनको, तब आप जानेगे कि आप कितने अल्प ज्ञानी हैं!! और आपने जिन्दगी में अब तक क्या हासिल नहीं किया है?
यही सिद्ध तरीका है अपने आपको बुद्धिजीवी कहलवाने का. इस सिद्ध प्रक्रिया में कभी कोई भूलवश आपसे कोई प्रश्न कर बैठे पलट कर तो बस इतना ही करना है कि नाराज हो जाओ उसके ऊपर. वो भी इस कदर कि पूछने वाला ही घबरा जाये कि कितनी बड़ी गल्ती कर दी बुद्धिजीवी जी से प्रश्न करके?
पूछने वाले को गालियाँ बको कि एक तो तुम ज्ञान शून्य हो और उस पर से मुझसे बहस करते हो? मुझसे सवाल करते हो? उससे ऐसे संबंध विच्छेद कर लो कि उसे फिर कभी मौका ही न लगे कि वो आपसे जबाब मांग पाये और बस!! आत्म मगन रहे आओ कि मैं बुद्धिजीवी हूँ. ऐसे लोगों के लिए आत्ममुग्धता अभिशाप नहीं..खुश रहने के लिए प्रसाद है.
यही तरीका तो है, जिसका पालन. सभी बुद्धिजीवी कर रहे हैं. बुद्धिमान हाशिये पर हैं. उनमें बहस करने का माददा नहीं है. उन्हें यह साबित करने की लालसा भी नहीं है कि वे बुद्धिमान हैं. वो जानते हैं कि
हाथ कंगन को आरसी क्या,
पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या..
वैसे आप बतायें कि आप बुद्धिजीवी हैं या बुद्धिमान!
समीर लाल ’समीर’
भोपाल के दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जून २,२०१९ के अंक में प्रकाशित


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शुक्रवार, दिसंबर 14, 2018

यूँ ही..कुछ ख्यालों की स्याही, छितरी बिखरी सी..सूखी हुई सी



रेडियो पर गाना सुन रहे हैं कान में इयर फोन लगा कर:
कहीं किसी रोज यूँ भी होता
हमारी हालत तुम्हारी होती
जो रात हमने गुजारी मर के
वो रात तुमने गुजारी होती!!
कितनी गुलजार रात है आज रविवार की...बाहर बहुत कुड़कुड़ा देने वाली -१० ठंड है..सुनसान सड़क..बरफ की चादर ओढ़े हुए..घर के भीतर की हीटिंग बाहर की ठंड को धता बता रही है. यथार्थ का धरातल वो नहीं जो रुमानियत में है..शायद यही वजह हो प्रीत जब हकीकत का धरातल पाती है शादी के बाद तो युगल विचलित हो उठता है..संभल नहीं पाता..फूल की खुशबू खो जाती है और फिर वही..कहा सुनी..दूरियाँ..संबंध विच्छेद..
मगर यहाँ फायर प्लेस अपनी गरम सांसों की आगोश में समेटने की कोशिश में खुद को जला रहा है..
शमा कहे परवाने से, परे चला जा..
मेरी तरह जल जायेगा..यहाँ नही आ..   मगर सुनता कौन है..
जलना ही जब प्रारब्ध है तो कौन भला बदल सकता है उसे..
उधर गाना भी खत्म हो चुका है और अब सेक्सोफोन पर बज रही है एक रुमानी धुन और रेड वाईन का ग्लास!! गरमाहट फायर प्लेस निर्लिप्त सा भाव धरे फैला रहा है..वो मौसम और गाने के बीच सेतु बन रहा है..
मेरे साजन हैं उस पार,
मैं इस पार...
चल मेरे मांझी..चल मेरे मांझी,,
खिड़की से झांक कर देखता हूँ.. दूरआसमां में एक चाँद खिला है..मुझे मूँह चिढ़ाता..कहता है कि तुमसे उस पार मिल कर आया है पीपल के पेड़ की छांव में..जहाँ अंगना फूल खिले हैं.
दुत्तकारने को मन कर रहा है मगर सिमेट लेता हूँ उस सोच को अपनी बाँह में..बात तुम्हारी करता है वो इसलिए..प्यार तो उस पर आना ही था.
कितना नादान हूँ मैं कि नादान वो चाँद है?
दरअसल नादान और मासूम तो तुम हो कि न चाँद और न मैं..संभाल पाये खुद को..तुम्हें देख कर..
सेक्सोफोन पर बजती धुन एक पूरी रात के पार ले आई और उधर आसमान में सुबह का सूरज थपकी देकर मेरी दुनिया को जगा रहा है...
सुबह हुई अब जागो प्यारे..दुनिया खड़ी है बांह पसारे..
और मैं रात भर का जागा..अब कुछ देर आँख बंद कर सो जाने की कोशिश में जुटा सोचता हूँ..कितना अलग अंदाज है मेरा..
मगर कितनी देर ...दफ्तर तो जाना ही होगा..काम भी जरुरी है न!! ख्यालों में जिन्दगी नहीं गुजरती.
व्हाटसएप की दुनिया से बाहर जो यथार्थ है, वही व्हाटसएप की दुनिया का चिराग है.. बिना चिराग के कौन सा अंधकार मिटा है भला.
दोनों के बीच सामन्जस्य बनाना ही होगा.
दोनों एक दूसरे के पूरक हैं अब..पूरा कोई भी नहीं!!
एक दार्शनिक सा विचार..बहता हुआ सा!!
-समीर लाल ’समीर’

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रविवार, दिसंबर 02, 2018

ठेके पर तलाक और आईनों का सरकारी हो जाना...



आज सड़क के किनारे लगे नए विज्ञापन के बोर्ड को देखकर चौंक गया. फ्लैट १००० डॉलर + जीएसटी में डाइवोर्स और उस पर से विज्ञापन भी एकदम ज़िंदा- बोर्ड जिस तार से गाड़ा गया था वो हवा के थपेड़े न झेल पाया और एक टांग से उखड़ा टेड़ा टंगा था.
सही मायने में देखा जाए तो तलाक भी तो इसी तरह का होता है. परिवार उखड़ जाता है जिंदगी की झंझावातों के थपेड़े खाकर. फिर न वो खुश और न ये खुश . एक तिरछा जीवन मात्र इसलिए कि जब आंधी आई तो दोनों अपने अहम् में खुद को साबित करने में अकेले ही भिड़ पड़े बिना एक दूसरे का हाथ थामें और बिना एक दूजे की साथ की ताकत को समझे. मैं भला क्यूँ हाथ थामूं तुम्हारा? क्या मैं सक्षम नहीं? दिखा ही दूंगा कि मैं अकेला ही काफी हूँ.
पहले लोगों को समाज की नजर की चिंता होती थी तो बड़ी से बड़ी बात हो जाए मगर निभा जाते थे यह सोच कर कि समाज क्या कहेगा? तलाकशुदा व्यक्ति समाज की नज़रों में गिर जाते थे अतः लाख खटपट और असामंजस्य के बावजूद भी संबंध निभा ले जाते थे.
अब समाज की चिंता तो छोड़ो, माँ बाप तक से तो नजर की शर्म बची नहीं है. कॉमन लॉ, सेम सेक्स मैरेज जैसे वक्त में क्या समाज की नजर और क्या माँ बाप की? खुद की नजर की तो परवाह रही नहीं. जाने इनके घरों में आईने हैं भी या नहीं? या आईने होंगे भी तो सिर्फ मेकअप के लिए, असली चेहरा दिखाने को नहीं. आईने भी तो सरकारी हो गए हैं अब ..झूठ बोलना सीख चुके हैं. सेल्फी और आईने की शक्ल एक सी हुई जाती है ..फिल्टर लगा कर जैसी चाहो वैसी तस्वीर देखो!
ऐसे वक्त में अहम की टकराहट में तलाक को रोकने और टालने के लिए मात्र अर्थ (रुपया हो या डॉलर) ही बचा था जिसके डर से नई पीढ़ी इस ओर कदम बढ़ाने से कतराती है. वकीलों की मोटी फीस, वो भी न जाने कब तक भरनी पड़े, जब तक की केस न खत्म हो जाए और फिर भारी भरकम सेटेलमेंट और मेन्टनेन्स का पैसा. इंसान सोचता है कि इससे अच्छा तो बिना तलाक के ही खरी खोटी सुनते सुनाते, लड़ते झगड़ते  ही काट लेते हैं.
आज उस रोक की दीवार को भी जब इस विज्ञापन के माध्यम से आधा गिरते देखा तो लगा की आह! यह रोक भी चल बसी.  कम से कम वकील की फीस की चिंता तो हटी. १००० + जीएसटी. देशी बन्दे हैं हम. इसे इस तरह पढ़ते हैं कि फीस १००० है, नगद दे देंगे. रसीद भी नहीं चाहिये. तब कैसा जीएसटी?
किसी ने कहा की जीएसटी न देना तो नैतिकता के आधार पर धोखा है सरकार के साथ. हमने सिर्फ उसकी आँख से आँख मिलाई और वो सॉरी कह कर चला गया.
जाने क्या समझा होगा नजर मिलाने को इनमें से:
१.     धोखेबाजों से धोखा भी कोई धोखा होता है बुध्धु?
२.     नैतिकता की उम्मीद उससे जो यूं भी नैतिक जिम्मेदारी से मूंह मोड़ने की तैयारी में है?
३.     तुम उस वक्त कहाँ चले जाते हो जब राजनेतिक गठबंधन अपने गठबंधन तोड़ते हैं? उस वक्त जीएसटी का ख्याल आता है क्या तुम्हें?
४.     जीएसटी दे भी दें मगर ऐसे व्यक्ति को जिसका काम ही झूठ को सच साबित करना है? उसे अगर हम जीएसटी दे भी देंगे तो भी वो साबित कर ही देगा कि जीएसटी उसका मेहनताना है.
५.     फिर सरकार लाख सर पटके, अदालत से वो आदेश ले ही आयेगा कि तलाक के केस में वसूले गए जीएसटी पर सरकार का कोई हक नहीं है.
६.     एक रास्ता और है कि जीएसटी का आधा हिस्सा पार्टी फंड में बेनामी जमा करा दो तो कोई पूछताछ न होगी.
खैर, जो भी समझा हो, हमें क्या? चला तो गया.
अब मुझे इंतज़ार है एक ऐसे विज्ञापन का जो ये कहे कि फ्लैट फीस ५००० + जीएसटी. जीरो सेटलमेंट और मेंटेनेंस की गारंटी. जैसे कह रहा हो कि तलाक और ठिकाने लगाने की सुपारी मानो इसे. आज ही संपर्क करें – इमेल: फलाना @ फलाना डॉट कॉम.
वैसे आज कल चल निकला प्री नेपच्युल एग्रीमेंट भी तो इसी दिशा में एक कदम है मानो शादी नहीं हो रही बल्कि पार्टनरशिप में बिजनेस करने जा रहे हों.
ये शादी, तलाक, प्री नेपच्युल को आज न जाने क्यूँ राजनितिक बनते गठबंधंन, टूटते गठबंधंन और मुद्दा आधारित समर्थन से जोड़ कर देखने का मन किया. कोई खास अंतर तो अब बचा नहीं है.
-समीर लाल ‘समीर’

भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे में रविवार दिसम्बर ०२, २०१८

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शनिवार, अक्टूबर 20, 2018

शेक्सपियर सही कहे थे कि नाम में क्या धरा है?



अच्छा हुआ शेक्सपियर मौका देख कर १६१६ में ही निकल लिए. अगर आज होते और भारत में रह रहे होते तो देशद्रोही ठहरा दिये गये होते और कुछ लोग उन्हें बोरिया बिस्तर बाँध कर पाकिस्तान जाने की सलाह दे रहे होते. ये भी कोई बात हुई कि कह दिया ’नाम में क्या रखा है, गर गुलाब को हम किसी और नाम से भी पुकारें तो वो ऐसी ही खूबसूरत महक देगा’. इतनी बुरी बात करनी चाहिये क्या?
मैने भी एक बार कोशिश की थी जब मंचों से गज़ल पढ़ना शुरु की. तब मन में आया था कि अपने नाम ’समीर’ में से एक शब्द साईलेन्ट मोड में डाल देते हैं और खुद को मीर पुकारेंगे तो शायद मंच लूट पायें. बाद में मंच बुजुर्गों की सलाह मान कर नाम मे ’स’ पर से साइलेन्सर हटाया और गज़ल के व्याकरण समझने में मन लगाया. सिर्फ मीर और गालिब नाम रख लेने से आप मीर और गालिब सा लिखने लगेंगे, इससे फूहड़ और क्या सोच हो सकती है.
उस रोज पान की दुकान पर तिवारी जी बोले कि अब अपने घंसु को ही देख लो. माँ बाप ने कितनी उम्मीद से नाम घनश्याम दास रखा था मगर वे रह गये घंसु के घंसु. सुबह खाने को रुपये हैं तो शाम जेब खाली. घनश्याम दास नाम रख देने से कोई अपने आप बिड़ला तो नहीं हो जाता. सारा जीवन गुजार दिया घंसु ने मगर साईकल को ही गाड़ी कहते रह गया.
घंसु भी भला कहाँ चुप रहते. उखड़ पड़े कि ऐसे में आप ही कौन कमाल किये हैं? नाम के बस तिवारी हो और रोज शाम सूरज ढलते ही दारु और मुर्गा दबाते हो. सोचते हो कि अँधेरा हो गया अब भगवान क्या देख पायेगा कि आप क्या कर रहे हो? वहाँ ऊपर सब नोट हो रहा है. नाम तो आपका बदला जाना चाहिये.
तिवारी जी क्या जबाब देते. अब वे मूँह में पान भरे धीरे से मुस्कराते हुए कह रहे हैं कि शेक्सपियर सही कहे थे ’नाम में क्या धरा है..’
घंसु बोले कि तिवारी जी कुछ उधार मिल जाता तो सोच रहा हूँ एक चाय का ठेला खोल लूँ. नाम में तो वाकई कुछ नहीं धरा. अब काम में क्या धरा है वो अजमा कर देख लूँ. कौन जाने कल को देश की बागडोर ही हाथ लग जाये?
तिवारी जी उधार तो तब दें जब खुद के पास कुछ हो, अतः जैसा कि होता है सलाह ही दे दी. देख घंसु, देश में लाखों चाय वाले हैं. उस लाईन से देश की बागडोर पाने में काम्पटिशन बहुत है. उससे अच्छा तो एक बार फिर नाम बदल कर ललित, नीरव, विजय टाईप कुछ रख ले और बैंक से लम्बा कर्जा मांग. मांगने में तो तेरी क्षमताओं के आगे वो निश्चित ही फीके हैं, फिर भी कर्जा लेकर देश के बाहर भाग ही लिये. तो तू भी कोशिश करके देख ले. मिल जाये तो विदेश निकल लेना वरना तो विदेश जाना इस जन्म में तेरे भाग्य में नहीं.
घंसु असमंजस में है कि बात देश की बागडोर संभालने की थी और तिवारी जी कर्जा लेकर विदेश भाग जाने की बात कर रहे हैं?
तिवारी जी समझा रहे हैं कि तूँ असमंजस में न प़ड़. एक बार कर्जा लेकर विदेश निकल कर तो देख. जो देश की बागडोर संभालते हैं न, तब तू उनकी बागडोर संभालेगा. कुछ समझा? अब घंसु की मोटी बुद्धि भी समझ चुकी थी कि आगे क्या करना है?
मगर एक बात फिर भी नहीं समझ आई कि शहर का नाम बदलने से क्या हासिल? क्या इलाहाबाद का नाम बदल प्रयागराज कर देने से इलाहाबाद हिन्दु हो गया या पहले मुसलमान था? क्या संगम स्नान अब और अधिक पाप धो डालेगा? क्या गंगा अपने आप साफ हो जायेगी? क्या सुलाकी के लड्डु अब ज्यादा मीठे हो जायेंगे? क्या कुँभ की महत्ता बढ़ जायेगी? क्या पुराने दबंगों की दबंगाई अब नये दबंगो के हाथ चली जायेगी? किसी भी क्या का क्या जबाब होगा, कौन जाने मगर यह हर सरकार के हथकंड़े हैं. किसी के किसी वजह से, तो किसी के किसी के किसी वजह से.
मुझे अपना बचपन का साथी रमेश याद आ रहा है. जब वो होमवर्क न करके लाता तो मास्साब की मार से बचने के लिए वो उनको अन्य बातों में उलझाता कि मास्साब मुझे फलाने ने गाली बकी. फलाने ने मारा. मास्साब उसी को सुलझाने में ऐसा उलझते कि असल मुद्दा होम वर्क पूछने का वक्त ही नहीं मिल पाता. रमेश मेरी ओर देख मंद मंद मुस्कराता और धीरे से आँख मारता.
बाकी तो आँख मारने का अर्थ निकालने में आप समझदार हैं ही!
-समीर लाल ’समीर’

भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे में रविवार अक्टूबर २१, २०१८

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रविवार, अगस्त 12, 2018

स्वतंत्रता के दायरे समझो, मायने नहीं...



हम साल भर पाप करते ही इसलिए हैं ताकि सालाना गंगा स्नान में उन्हें धोकर गंगा माई हमको पुण्य प्रदान करे. पाप न करेंगे तो गंगा माई धोएगी क्या? पुण्य प्राप्त करना है तो पाप करो. यही हमारा सिध्द नियम है.
वही हाल स्वर्ग पहुँचने का मार्ग दिखाने वाले बाबाओं के आश्रम का है. आश्रम में ऐसे ऐसे निकृष्ट धतकरम होते हैं कि उन्हें देख जान कर अगर नरक भी पहुँच जाओगे तो लगेगा वाकई अगर कोई जगह स्वर्ग है तो वो यही है.
जितना पाप इन पावन नदियों के तट पर और इन सिद्ध बाबाओं के घर पर होता है, उसके सामने सब कुछ पुण्य ही नजर आएगा.
हम उत्सवधर्मी इसी तर्ज पर हर बरस रावण बनाते ही इसलिए हैं ताकि उसे मार सकें. उसका दहन कर सकें. फिर सब तालियाँ बजा कर नाचें कि रावण मारा गया. पाप पर पुण्य की विजय हुई. अंधेरों पर उजाले की विजय हुई भले ही दो दिन से बिजली न आई हो और सारा शहर अँधेरे में डूबा हो. अंधेरों पर उजाले के विजय जुलूसों में जेबकतरों की पौ बारह हो लेती है. रावण तो जाने कब का मारा गया. अब तो गली गली रावण का पुतला बना कर उसे मारने वाले खुद ही रावण से बदतर कृत्यों में लिप्त है. गली गली सीताओं का अपहरण हो रहा है. अब बचाने को कोई हनुमान तो दूर, थाने में रिपोर्ट लिखने को हवलदार भी तैयार नहीं. कानून बनाने वाले इन रावणों के आका हैं और कुछ तो खुद ही रावण को भी शर्मसार करने में जुटे हैं. यही आका सबसे जोरशोर से राजधानी में दशहरे पर तीर चलाते हैं नकली रावण को मारने. जनता ताली पीटती है कि रावण मारा गया. इस तरह जनता को गुमराह कर असली रावण फिर साल भर के लिए मस्ती काटने को निकल पड़ता है. पाप का घड़ा सिर्फ मुहावरे में भरता है. असल में तो अब पाप का घड़ा बनाने वाले हों या क़ानून बनाने वाले, उसमें सुराख की समुचित व्यवस्था बना कर रखते हैं. पाप करते चलो, सुराख उसे कभी भरने न देगा.
साल भर कबूतरों को पकड़ कर पिंजड़े में बंद किया ही इसलिए जाता है ताकि स्वतंत्रता दिवस पर हर शहर, राजधानी से मंत्री जी लोग उन्हें उड़ा कर आजाद करें और जनता ताली पीटे कि देखो देखो, वो आजाद हो गए. आजादी का उत्सव मन गया. झंडा लहर गया. नेता जी के भाषण हो गये. आजादी के गीत बज गए. मिठाई बाँट दी गई. तमाशा खत्म. अब घर जाओ, अगले साल फिर आना.
हर मूंह में माइक घुसा कर प्रश्न पूछने वाला ये मीडिया कभी इन कबूतरों से अपना जाना पहचाना प्रश्न क्यूँ नहीं पूछता है कि हे कबूतर जी, आपको आजाद होकर कैसा लग रहा है? अब आप उड़कर कहाँ जायेंगे,क्या कमाएंगे, क्या खायेंगे?
कबूतर भी आम जनता की तरह वैसा ही मूक और निरीह प्राणी है, जिसे अपनी नियति पता है. वो हर मुसीबत में आँख मींच कर राम नाम जपने लगता है और हर दशा को प्रभु की मरजी मान कर इत्मीनान धर लेता है. उसके लिए ‘स्वतंत्रता मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है’ मात्र एक वैसा ही आजादी के समय का नारा है, जैसा आज ‘गरीबी हटाओ, फलाने को जिताओ’ जो १०० रुपये की एवज में वो हर चुनावी सभा में लगाता है. यह चुनावों के महापर्व पर उसकी कमाई का साधन है. सच सोच है कि हकीकत में अगर गरीबी हट जाए तो अगले चुनाव में नारे कौन लगाएगा? और स्वतंत्रता अगर सबको दे दें तो अगले साल स्वतंत्रता दिवस पर आजाद किसे करेंगे?
इन आजाद किए गए कबूतरों में कुछ कबूतर तो बार बार पकडे जाने के इतना अभ्यस्त हो गए हैं कि नेता जी के आजाद करते ही कुछ देर में उड़ कर खुद ही फिर से पिंजड़े में आकर बैठ जाते हैं. कबूतरों का एक वर्ग ऐसा भी होता है जो कुछ देर उड़ने के बाद नजदीक के पेड़ो में बैठकर, बहेलिओं के आने का इंतज़ार करने लगता है. जैसे ही बहेलिया आता है, यह आत्मसमर्पण कर देते हैं. कुछ के लिए बहेलिओं को जाल बिछाना पड़ता है मगर आखिरकार कैद में आ ही जाते हैं.
एक छोटा सा उत्साही युवा कबूतरों का वर्ग ऐसा भी होता है, जो इस आजादी को असल आजादी मान कर, नेता जी के भाषण पर भरोसा करते हुए, खुले आसमान में ऊँची स्वच्छंद उड़ान भर देता है. उसे क्या पता कि उस उंचाई पर इन्हीं के पाले बाज़ उसके आने का इंतज़ार कर रहे हैं. बाजों को भी तो उत्सव की दावत उड़ाना है.
इसीलिए बुजुर्ग कबूतर युवा कबूतरों को समझाते पाये जाते हैं कि साल में एक दफा थोड़ी देर के लिए ही सही, अगर आजाद उड़ान भरना चाहते हो, तो इनकी गुलामी को अपनी नियति मानकर चुपचाप पिंजड़े में बंद रहना सीख लो, वरना ये धरती पर दिखते जरुर हैं, इनके हाथ आसमान तक जाते हैं. यहाँ ये नेता और वहां बाज कहलाते हैं. ऊँचा उड़ोगे तो बाज का शिकार बन जान गंवाने के सिवाय कुछ हाथ न आयेगा.
स्वतंत्रता के दायरे समझो, मायने नहीं. तभी इस स्वतंत्रता के उत्सव का मजा आयेगा वरना तो कौन आजाद है भला?
-समीर लाल ‘समीर’
भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे में अगस्त १२, २०१८ में:


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