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रविवार, दिसंबर 04, 2016

गाने की छाप: एक विश्लेषण

बदन पे सितारे लपेटे हुए, ए जाने तमन्ना कहाँ जा रही हो...यह गीत जब कभी रेडियो पर बजता है तब न तो कभी किसी सुकन्या के बदन का ख्याल आता है और न ही फलक पर चमकते सितारों का...बस, जेहन में एक चित्र खिंचता है..शम्मी कपूर का इठलाती और अंग अंग फड़काती व बल खाती शख्शियत...

ऐसे कितने ही गीत हैं जो कभी सिनेमा के पर्दे, तो कभी टीवी के स्क्रीन पर दिख दिख कर आपके दिलो दिमाग पर वो छबी अंकित कर देते हैं कि उन्हें रेडियो पर सुनो या किसी को यूँ ही गाते गुनगुनाते हुए, दिमाग में वही फिल्म का सीन चलने लगता है.

आँधी फिल्म का गाना- इस मोड़ से जाते हैं, कुछ सुस्त कदम रस्ते..कहीं दूर भी बजता हुआ सुनाई दे जाता है तो दिमाग में संजीव कुमार और सुचित्रा सेन का वो ही सीन उभर आता है.,,जो आँधी फिल्म में देखा था.

मगर कुछ ऐसे भी गीत हैं जो मौका विशेष पर ऐसे बजने लग गये कि उनका मूल सीन ही दिमाग से धुल गया और मौका विशेष से जुड़ा कोई सीन उसके उपर आकर कब्जा कर गया. जैसे शादी की बारात के दौरान बैण्ड वालों ने नागिन गाने की धुन बजा बजा कर, इस गाने की ऐसी बैण्ड बजाई कि अब कहीं दूर दराज से भी नागिन गाने की धुन सुनाई देती है तब न तो १९५४ की वैजन्ती माला याद आती है और न १९७६ की रीना राय...बस याद आता है शराब के नशे में धुत, हाथ से नागिन का फन बनाये जमीन पर लोट लोट कर नागिन बना नाचता हुआ आपका एक दोस्त और मूँह में रुमाल दबा कर उसे बीन की तरह बजाता हुआ सपेरा बना हुआ आपका दूसरा दोस्त,.. किसी अपने ही खास दोस्त की बरात में नाचते हुए. वैसे ही जैसे कि  ’दो सितारों का जमीं पर है मिलन आज की रात...भी किसी मित्र या रिश्तेदार का चेहरा ही सामने लाता है वरमाला डालते हुए.

इसकी वजह शायद ये होती होगी कि वो गीत, फिल्म और टीवी के इतर अन्य मौकों पर इतनी बार बजा और सुना गया है कि फिल्म का सीन अपना अस्तित्व बचा ही नहीं पाया. कौन जाने इसमें दोष उन गीतों का अन्य मौकों पर अत्याधिक बजा जाना है या उन पर हुए फिल्मांकन का कमजोर होना. जो भी हो, फिल्म का सीन तो दिमाग से निकल ही गया.

’तुम जिओ हजारों साल, साल में दिन हो पचास हजार..इस गीत को सोच कर देखियेगा कि क्या याद आता है? कोई भाई, बहन, भतीजा ही न?

अब बात करते हैं तीसरे आयाम की..जिसमें गीत तो अन्य मौकों पर ही बार बार सुनते आये किन्तु फिर भी वो अपनी मूल छाप ही छोड़ते आये हैं. हालात ऐसे कि जिस दृष्य की वो याद दिलाते हैं उसका मुख्य किरदार अपना चेहरा बदल कर मूल किरदार के चेहरे में नजर आता है.
याद करिये हर बेटी की विदाई के वक्त बजता हुआ वो गीत...’बाबुल की दुआयें लेती जा..जा तुझको सुखी संसार मिले..’ न जाने कितनी बार कितनी बेटियों की विदाई के वक्त यह गीत सुना होगा..मगर चेहरा वही बलराज साहनी का याद आता है.. लड़की का चेहरा तो दोस्त की बेटी का उभरता है मगर विदा करता दोस्त, बलराज साहनी में बदल जाता है मानो अपना यार बलराज साहनी को खड़ा करके बाहर सिगरेट पीने निकल लिया हो. अब न जाने इसमें किरदार का वजन है या फिल्मांकन का..मगर जिन्दा मूल किरदार ही रहा. वही १९६८ का नीलकमल फिल्म वाला बलराज साहनी..

बहुत खोजा..शोध किया..बातचीत की मगर एक ऐसा आयाम खोजने में मैं सफल नही हो पाया जिसमें जब उस गीत के बोल सुनूँ तो न तो फिल्म का सीन याद आये, न मौके पर अत्याधिक बजने की वजह से उस मौके से जुड़े दृष्य का..बल्कि कोई नया सा दृष्य उभरे, एक नया सा चेहरा उभरे...

आज तक कोई भी राजनेता ऐसा न कर पाया कि फिल्म का गीत बजे जिसमें उसका जिक्र न हो और आप के जेहन में उसका चित्र उभर आये.

मगर अभी अभी कुछ रोज पहले एक ऐसी घटना हुई कि, सोशल मीडिया में दिलचस्पी रखने वाले इसे अच्छी तरह से समझ पायेंगे.. बाकी के लोग इस पैराग्राफ को लाँघ कर आगे पढ़ सकते हैं, एक बड़े टीवी चैनल के एक दिवसीय सरकारी प्रतिबन्ध के मद्दे नजर बने एक कार्यक्रम और हैश टैग ट्रेन्ड की दुनिया में ट्वीटर पर सबको पछाडते हुए ट्रेन्ड #बागों मे बहार है..ने ऐसा माहौल बनाया कि..अब जब भी वो गीत सुनाई देता है तो दिमाग में उभरता है..एक फेमस टीवी चैनल का ब्लैक आऊट हुआ टीवी स्क्रीन और फिर उस ब्लैक आऊट के भीतर से उभरता हुआ मेरे मित्र एक बड़े एन्कर का चेहरा और साथ में दो चेहरों पर सफेदा पोते एथॉरिटी और लठैत बने माईम कलाकार... वो आराधना फिल्म के साथ साथ राजेश खन्ना और फरीदा जलाल का चेहरा जाने कहाँ खो गया और कब..समझ ही नहीं आया. ऐसा पहली बार, कम से कम मेरी याद में हुआ.

आपको कुछ ऐसा याद हो तो बतायें कि जब गाना बजे फिल्म का और आपको याद आये कोई राजनेता या पत्रकार.. या कोई ऐसा चेहरा..जो किसी मौका विशेष के नाम से आपके दिमाग में हथोड़ान्कित न हो....

शायद राजनेताओं के लिए ऐसा कुछ प्रयोग करने का समय आ गया है...करना भी चाहिये..कोई एक फेमस गाना..अपनी याद दिलवाने के लिए...

जोड़ कर देखो न भई नेता जी..शायद कहीं गुंजाईश बने!!

-समीर लाल समीर

भोपाल के सुबह सवेरे में ४ दिसम्बर,२०१६ के अंक में प्रकाशित

http://epaper.subahsavere.news/c/15111168
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सोमवार, नवंबर 14, 2016

शहादत या ऑनर किलिंग..क्या है यह!!


सियापा और उसके सुर यूँ...इत्ती कम उम्र..बस १६ साल की उम्र..यह तो खेलने खाने की उम्र है, इस उम्र में भी भला कोई मरता है? सन २००० हजार की पैदाईश...सारा भविष्य उस पर ही टिका हुआ था..बहुत जतन उसे संभाला था..और एकाएक उसकी इस तरह हत्या..कि सब कुछ पल भर में नेस्तनाबूत हो गया..भविष्य के सारे सपने चकनाचूर..

इसे हॉनर किलिंग कहें या शहादत..

अगर पड़ोसी मुल्क को मूँह की चटा देने के लिए ही इस १००० के नोट का कत्ल हुआ है तो इसे शहादत मान कर इसकी मौत को शहीद का दर्जा मिलना चाहिये और इस तरह से शहीद हो जाने पर १ करोड़ का मुआवजा तो बनता ही है उस पालक का, जिसने इसे अब तक बड़े जतन से पाला और संभाला था.... अतः धोषणा करो..हे सत्यवादी आंदोलनकारी...,कि मैं हर उस परिवार को एक एक करोड़ रुपये देने की घोषणा करता हूँ जिसके पास उस हजार रुपये का नोट हैं, जो अभी अभी शहीद हुए है सीमा पार से आने वाले नकली नोटों से लड़ते हुए...ध्यान रहे कि इस मुआवजे के हकदार सिर्फ वो लोग होंगे जिनके नोट बदलने योग्य नहीं हैं..वो बेचारे कहाँ जायेंगे? जिनके नोट बदल दिये गये हैं वो इसे परिवार के अन्य सदस्य को उसकी शहादत की एवज में दी गई नौकरी मानें. अतः वे मुआवजे के हकदार नहीं होंगे. मुआवजा पाने के लिए नोट के धारक को, घोषणा पत्र समेत अन्य ऐसे सभी कागजत जमा करने होंगे जो  इस बात को साबित करते हों कि यह नोट बैंक में किसी भी हालत में बदले जाने योग्य नहीं है एवं खालिस काले हैं.

जान लिजिये आपकी यह घोषणा...आपको न सिर्फ पंजाब, गोवा और यूपी की गद्दी दिला जायेगी..बल्कि पूरे भारत की राजनीत को हिला जायेगी...किस्मत और कल को कौन जानता है? क्या पता इसी के चलते कल को आप प्रधान हो जायें...फिर ओबामा केयर का जो हश्र हुआ ट्रम्प के आने पर ..उसकी पुनरावृति आप इन नोटों को फिर से चलन में लाकर कर देना..कम से कम इस मामले में तो हम अमरीका के समकक्ष आ जायेंगे..है न सटीक बात?

वरना अगर यह हत्या, अपनी साख बचाने या उसमें इजाफा करने के लिए, अपने ही घर में रह रहे लोकल भ्रष्टाचारियों की कलई खोलकर, अपने ही आमजनों के सामने, अपने ही लोगों को अपराधी घोषित करने की मुहिम है..तो इसे ऑनर किलिंग का दर्जा दिया जाना चाहिए...तब यह सोचना होगा कि खाप पंचायत का फैसला मान्य होगा या अपनी संवेधानिक अदालत का..

बहुत दुविधा है.. हॉनर किलिंग..शहादत या कि बस, शरारत!!

यह एक संक्रमण काल है..मुद्रा का संक्रमण काल..

संकट तो है ही, कल को दूर भी हो जायेगा..संकट का तो स्वभाव ही आना जाना है..बस, हर बार संकट की परिभाषा बदल जाती है...

समीर लाल समीर
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शनिवार, नवंबर 12, 2016

नमक की नमकीनीयत


प्रभु से बड़ा प्रभु का नाम..वही हालत मुझे नमक की भी लगती है. जितना नमक बतौर नमक खाने में इस्तेमाल होता होगा, उससे कहीं अधिक इसके नाम की उपयोगिता है.

वैसे तो नमक अपने आप में ही महान है. भगोना भर दाल में यूँ तो इसका रोल एक चम्मच भर का है मगर दाल में डालने से रह जायें या ज्यादा पड़ जायें, दोनों ही हालातों में इतनी मँहगी दाल की कीमत कौड़ी भर की कर देता है.ये मिली जुली सरकार में शामिल उस निर्दलीय सांसद की हैसियत रखता है, जिसके नाराज होते ही पूरा सरकार संकट में आ जाती है.

इसके अपने औषधीय गुण भी जग जाहिर हैं..सरसों के तेल को नमक में डाल कर दाँतों पर घिसने पर मसूड़ों को बलवान करने से लेकर गरम पानी में मिलाकर पैर डुबा देने मात्र से सारे शरीर का दर्द और सूजन खींच लेने की क्षमता रखता है.

नमक का महत्व ऐसा कि गाँधी जी इसके नाम से सत्याग्रह ही कर डाला और एक मुठ्ठी नमक का कमाल ऐसा कि अंग्रेजी हुकुमत की जड़ें हिल गई.

ये लड़कियों के चेहरे की एक अलग सी सुन्दरता का परिचायक भी होता है..न जाने कितनी बार लोगों को कहते सुना होगा कि फलानी लड़की के चेहरे पर कितना नमक है..

अमरीका, कनाडा जैसे बर्फीले देशों में तो बर्फ गिरते ही इसका सड़को और साईड वॉक पर छिड़काव न हो तो न तो गाड़ियाँ चल पायें और न ही पैदल चलना संभव हो. सार्दियों में नमक लाईफ लाईन होता है ऐसे देशों में..

इसके प्रयोग ने उन मुहावरों को मुहावरों की अग्रिम पंक्ति में लाकर खड़ा कर दिया जिसमें इसका जिक्र आता है कि क्यूँ जले पर नमक छिड़कते हो?’ या ’उसकी तो आदत ही है हर बात में नमक मिर्च लगा कर बताना’

वैसे जिन्दगी की असलियत बताने के लिए, अवधी में जिस कहावत का हर तरफ जबरदस्त इस्तेमाल हुआ है, उसमें भी नमक जिसे नून भी कहते हैं, अपनी पैठ जमाये बैठा है-  कहावत का अपभ्रंश ’ भूल गये राग रंग भूल गये छकड़ी, तीन चीज याद रही, नून तेल लकड़ी’

यहाँ तक की फिल्मी गानों पर भी इसने अपनी छाप छोड़ी है..’समुन्दर में नहाकर और भी, नमकीन हो गई हो..’

और इसी नमक का अफवाह के तौर पर हालिया इस्तेमाल देखकर लगा कि वाकई इसकी ताकत का कोई जबाब नहीं.

जब सारा देश असली और नकली नोटों की अदला बदली और ठिकाने लगाने की जुगत में हलाकान था. किसी को भी और कुछ सोचने की फुरसत ही न थी, तब न जाने किसने यह अफवाह उड़ा दी कि देश में नमक का स्टॉक खतम होने को है..

फिर तो पूछिये मत...गरीबों से लेकर अमीरों के बीच और सभी की पहुँच में रहने वाला नमक ऐसा नमकीन हुआ..कि १००० के नोट की ललाई फीकी पड़ गई. २००० के नोट का गुलाबी रंग तक अपना आकर्षण खो बैठा और लोग भागे नमक खरीदने के लिए...

ऐसा उत्कर्ष मिले तो जमीन भूल जाने में वक्त ही कितना लगता है..गरीबों के दर्द को खुद जीने का दावा करने वाला भी इसी उत्कर्ष के उन्माद में, खुद ही गरीबों के दर्द का कारण बन जाता है...तब नमक की क्या गल्ती...यह भी बिकने लगा ७०० रुपया किलो...

इतिहास में काले धन से निपटने की अब तक की सबसे बड़ी मुहिम की चर्चा को कालाबाजारियों नें मिनट भर में नमक चटा दिया.

बहुत मुश्किल से अफवाह को विराम दिया गया और नमक लौटा है अपनी जमीनी हकीकत पर...  


-समीर लाल ’समीर’
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