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मंगलवार, मार्च 14, 2017

होली पर भंगेड़ियों के लिए जनहित में जारी वैधानिक चेतावनी


कृप्या भांग के नशे में निम्न कार्य न करें:
  • बुलेट ट्रेन के आने का इन्तजार कतई न करें. जो भी पैसेन्जर ट्रेन मिले, लटक कर निकल लिजिये. कभी न कभी गंतव्य पहुँच ही जायेंगे.
  • अच्छे दिन आ चुके हैं, यह आप खुद अपने मताधिकार का इस्तेमाल करके बता चुके हैं अत: अब अच्छे दिन का इन्तजार करना दंडनीय अपराध की श्रेणी में आ गया है.
  • ई वी एम मशीन कभी सॉरी नहीं बोलती, जो बोल दिया है वो ही सत्य है. अतः भांग के नशे में आकर इस जनमत के बदलने का इन्तजार मत करना.
  • स्मार्ट सिटी स्मार्ट शहरवासियों से बनती है, इसलिये अपने शहर के स्मार्ट होने का इन्तजार न करें. खुद स्मार्ट बनिये और सबको बताने लगिये कि आपका शहर अब स्मार्ट हो गया है. इसी तर्ज पर सभी शहर स्मार्ट हो जायेंगे.
  • भांग के नशे में उपजे किसी भी क्रांतिकारी विचार को फेसबुक या व्हाटसएप्प पर डालने की हिम्मत मत करिये, वरना परिणाम घातक सिद्ध हो सकते हैं.
  • बैंक खाता खोलना जरुरी है, खोलिये मगर उसका इस्तेमाल मत करिये, वरना महिने में ४ बार से ज्यादा इस्तेमाल के बाद हर बार दण्ड भरना पड़ेगा.
  • नोटबंदी पर बात करना भी अब सश्रम दंडनीयअपराध है. इसमें पेरोल पर भी छूटने का कोई प्रावधान नहीं है. पूरा देश (उप्र + उत्तराखण्ड) जब इससे इत्ता खुश है तो इससे दुखी व्यक्ति मात्र अराजकता फैलाने के लिए दुखी दिखा माना जायेगा.
  • सेल्फी खींच कर फेसबुक पर डालने के पहले फोटो में एक बार अपने आसपास देख लें कि कहीं कोई कचरा तो नहीं फेला है. स्वच्छ भारत अभियान का साथ न देना नैतिक अपराध माना जायेगा. आप धरे जा सकते हैं.
  • डिजिटल इण्डिया कार्यक्रम लागू कर दिया गया है, अतः मात्र इसलिए कि कोई देख नहीं रहा है, कुछ भी ऐसा क्रांतिकारी बयान न दें जिससे आप धर लिए जायें. हमेशा किसी बड़े शायर का यह शेर ध्यान रखें 
ये सोचना गलत है कि तुम पर नजर नहीं
मसरूफ हम बहुत हैं ; मगर बेखबर नहीं ...

 इन सारी सावधानियों के बाद भी जब नशा टूटे तो सब से जाने अनजाने में हुई अपनी भूलों के लिए क्षमा अवश्य मांग लिजियेगा. इसके लिए फेस बुक और व्हाटसएप्प पर स्टेटस लगा सकते हैं.
इतना समझाने के बाद भी अगर न माने, जो कि आप नहीं ही मानेंगे तो आप अपनी सुरक्षा का इन्तजाम स्वंय करें. मित्र जबाबदार नहीं होंगे.

डिस्क्लेमर: इसे मात्र होली का हुड़दंग के सिवाय कुछ भी मान लेने वाले अपनी समझ के लिए खुद जिम्मेदार माने जायेंगे.

-समीर लाल ’समीर’
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रविवार, जनवरी 01, 2017

नारियल



नारियल का भी निराला स्वरुप है.
दुकानदार के पास नारियल खरीदने जाओ तो वो बोरा भर नारियल में से पहला उठा कर कान के पास ले जाकर उसे हिलायेगा और जाने क्या सुन कर उसे उसी बोरे में वापस रख कर दूसरा नारियल उठाकर सुनेगा और कहेगा, हाँ ये ठीक है बाबू जी, इसी ले लिजिये. ऐसे छांट कर शायद वो आपको कान्फिडेन्स देता हो कि मैं आपका कितना ख्याल रखता हूँ. आगे से भी मुझसे ही खरीदना. मगर इसी तरह कान के पास ले जाकर सुनते सुनते शाम तक वो सारे नारियल बेच कर मुस्कराते हुए घर निकल लेता है.
उधर भगवान को नारियल चढ़ाओ और यदि फोड़ने पर खराब निकल जाये तो कहा जाता है कि भगवान प्रसन्न हो गये, उन्होंने खा लिया इसलिए तुम्हारे हिस्से कुछ नहीं आया. अब तुम्हारी मनोकामना अवश्य पूरी होगी.
जाने किसने यह मान्यता बनाई होगी किन्तु यह तो तय है कि इसके पीछे नारियल चढ़ाने वाले की आस्था न टूटे, दिल न बैठ जाये और आगे से नारियल चढ़ाना ही न बंद कर दे आदि किसी सोच का समर्थन रहा होगा.
जब कोई मंदिर आता है और नारियल चढ़ाता है तो सिर्फ नारियल भर तो चढ़ाता नहीं. साथ में मंदिर की बाहर की दुकान से खरीदे फूल माला, कपूर अगरबत्ती, पेड़ा मिठाई भी तो चढ़ाता है. दान पेटी से लेकर पंडित जी के चरणों में नगद दान की परम्परा भी रही है.
एक खराब नारियल के पीछे पूरी व्यवस्था चरमरा जाये, ऐसा कैसे होने दिया जाये भला.
आप तो बस इन्तजार करिये कि जल्द ही मनोकामना पूरी हो जाये.
मगर ऐसा कभी नहीं सुना कि १०० मे से जिन ९९ के नारियल सही निकल रहे हैं और वो उसे प्रसाद के रुप में खा बांट रहे हैं, उनसे पंडित कह रहा हो कि भक्त, तुम्हारा नारियल सही निकल गया मतलब प्रभु ने उसे स्वीकार नहीं किया. अब इसे तुम ही खाओ और भागो यहाँ से, तुम्हारा काम नहीं बन पायेगा.
मगर ये नारियल का कमाल ही है कि चाहे नारियल की दुकान हो या मंदिर में भगवान, नारियल सभी खप जाते हैं.
मुद्दा बस एक ऐसा माहौल और मान्यता रच देने का है कि किसी भी हाल में नारियल कभी निराश नहीं करता.
यह बात हमारे नेता बखूबी समझते हैं.

-समीर लाल ’समीर’

भोपाल के सुबह सवेरे में प्रकाशित:
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शनिवार, दिसंबर 31, 2016

नये साल का नया प्रश्न:



नया साल आते ही एक नया प्रश्न मूँह बाये खड़ा हो जाता है कि इस साल क्या संक्ल्प लिया जाये? हालांकि नया साल एकाएक नहीं आता. पिछली बार जब नया साल आया था तब से पता था कि अगली बार नया साल कब आयेगा मगर नये साल में क्या नया किया जाये, यह प्रश्न नया साल आते ही एकदम नया हो कर फिर से खड़ा हो जाता है.
फिर लोग बहुत सोच समझ कर किन्तु भगदड़ में इस नये प्रश्न के जबाब में तरह तरह के संकल्प करते हैं. एक बहुत बड़ी आबादी का निरंतर साल दर साल का संकल्प होता है कि इस साल सेहत पर ध्यान देना. वजन कम से कम ३० पोण्ड कम करना है. कोई इस साल शादी कर के मानेगा तो किसी को इस साल कार लेना है. कोई मकान खरीदेगा तो कोई हम माह एक नई किताब पढ़ेगा. किसी का कहना कि अब बस बहुत हुआ, अब से बस १ घंटा देंगे फेस बुक को रोज.
किसी के पास बचत की योजना है तो किसी को यूरोप घूमना है.
कोई अपनी दिनचर्या में बदलाव करेगा तो कोई नई नौकरी पाने के लिए जी जान लगा देगा.
याने कि संकल्पों की एक फौज खड़ी हो जाती है नया साल आते ही और ९९.९ प्रतिशत संकल्पों की नियति एकदम ठीक चुनावी वादों की तरह कभी न पूरा होना है. हर संकल्पकर्ता हर वर्ष अपने नये के जबाब में एक नया संकल्प यह भी जोड़ देता है कि इस बार पहले की तरह नहीं होगा, इस बार तो पूरा करके ही मानूँगा. पुनः जैसा हर नेता हर चुनाव में अपने चुनावी वादे के लिए कहता है इस बार यह जुमला नहीं वादा है. मगर वक्त के साथ फिर से वादा जुमले में तब्दील हो जाता है.
२०१७ कुछ अलग सा है. इसमें नये प्रश्न के उतत्तर में कुछ नये संकल्प भी जुड़ेंगे मसलन किसी को आप कहते सुनेंगे कि इस साल तो काला धन आते ही ठिकाने लगाना है, नगद रखने का तो सवाल ही नहीं. कोई कह रहा था कि सारी प्रापर्टी गलानी है इसके पहले की इस दिशा में कोई दीमक पकड़ने निकले. चुहिया तो पकड़ा गई जो नोट कुतरती थी. एक सज्जन अजब सा संकल्प लेते दिखे कि इस साल अजगर बनना है. हम पूछने को मजबूर हो गये कि ऐसा क्यूँ? तो कहने लगे कि अजगर कुतरता नहीं, निगलता है और उसके साथ साहेब की संगाबित्ती है, बीन सपेरा डांस खेलने की. अजगर को सजा का प्रवधान नहीं है. मानो अजगर न हुआ..राजनितिक दल हो गया हो.
सरकार के संकल्प हैं कि चुन चुन कर मारुँगा. कोई नहीं बचेगा सिवाय उनके जिन्हें हम बचाना चाहेंगे और आम जन के संकल्प हैं कि काश!! किसी तरह उस श्रेणी में आ जायें जिसे वो बचाना चाहते हैं.
पता है कि संकल्पों का क्या हश्र होना है मगर फिर भी, कुछ अपवाद स्वरुप, संकल्प पूरे भी तो होते हैं.

-समीर लाल ’समीर’
#Jugalbandi #जुगलबन्दी
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रविवार, दिसंबर 04, 2016

गाने की छाप: एक विश्लेषण

बदन पे सितारे लपेटे हुए, ए जाने तमन्ना कहाँ जा रही हो...यह गीत जब कभी रेडियो पर बजता है तब न तो कभी किसी सुकन्या के बदन का ख्याल आता है और न ही फलक पर चमकते सितारों का...बस, जेहन में एक चित्र खिंचता है..शम्मी कपूर का इठलाती और अंग अंग फड़काती व बल खाती शख्शियत...

ऐसे कितने ही गीत हैं जो कभी सिनेमा के पर्दे, तो कभी टीवी के स्क्रीन पर दिख दिख कर आपके दिलो दिमाग पर वो छबी अंकित कर देते हैं कि उन्हें रेडियो पर सुनो या किसी को यूँ ही गाते गुनगुनाते हुए, दिमाग में वही फिल्म का सीन चलने लगता है.

आँधी फिल्म का गाना- इस मोड़ से जाते हैं, कुछ सुस्त कदम रस्ते..कहीं दूर भी बजता हुआ सुनाई दे जाता है तो दिमाग में संजीव कुमार और सुचित्रा सेन का वो ही सीन उभर आता है.,,जो आँधी फिल्म में देखा था.

मगर कुछ ऐसे भी गीत हैं जो मौका विशेष पर ऐसे बजने लग गये कि उनका मूल सीन ही दिमाग से धुल गया और मौका विशेष से जुड़ा कोई सीन उसके उपर आकर कब्जा कर गया. जैसे शादी की बारात के दौरान बैण्ड वालों ने नागिन गाने की धुन बजा बजा कर, इस गाने की ऐसी बैण्ड बजाई कि अब कहीं दूर दराज से भी नागिन गाने की धुन सुनाई देती है तब न तो १९५४ की वैजन्ती माला याद आती है और न १९७६ की रीना राय...बस याद आता है शराब के नशे में धुत, हाथ से नागिन का फन बनाये जमीन पर लोट लोट कर नागिन बना नाचता हुआ आपका एक दोस्त और मूँह में रुमाल दबा कर उसे बीन की तरह बजाता हुआ सपेरा बना हुआ आपका दूसरा दोस्त,.. किसी अपने ही खास दोस्त की बरात में नाचते हुए. वैसे ही जैसे कि  ’दो सितारों का जमीं पर है मिलन आज की रात.’..भी किसी मित्र या रिश्तेदार का चेहरा ही सामने लाता है वरमाला डालते हुए.

इसकी वजह शायद ये होती होगी कि वो गीत, फिल्म और टीवी के इतर अन्य मौकों पर इतनी बार बजा और सुना गया है कि फिल्म का सीन अपना अस्तित्व बचा ही नहीं पाया. कौन जाने इसमें दोष उन गीतों का अन्य मौकों पर अत्याधिक बजा जाना है या उन पर हुए फिल्मांकन का कमजोर होना. जो भी हो, फिल्म का सीन तो दिमाग से निकल ही गया.

’तुम जिओ हजारों साल, साल में दिन हो पचास हजार.’.इस गीत को सोच कर देखियेगा कि क्या याद आता है? कोई भाई, बहन, भतीजा ही न?

अब बात करते हैं तीसरे आयाम की..जिसमें गीत तो अन्य मौकों पर ही बार बार सुनते आये किन्तु फिर भी वो अपनी मूल छाप ही छोड़ते आये हैं. हालात ऐसे कि जिस दृष्य की वो याद दिलाते हैं उसका मुख्य किरदार अपना चेहरा बदल कर मूल किरदार के चेहरे में नजर आता है.
याद करिये हर बेटी की विदाई के वक्त बजता हुआ वो गीत...’बाबुल की दुआयें लेती जा..जा तुझको सुखी संसार मिले..’ न जाने कितनी बार कितनी बेटियों की विदाई के वक्त यह गीत सुना होगा..मगर चेहरा वही बलराज साहनी का याद आता है.. लड़की का चेहरा तो दोस्त की बेटी का उभरता है मगर विदा करता दोस्त, बलराज साहनी में बदल जाता है मानो अपना यार बलराज साहनी को खड़ा करके बाहर सिगरेट पीने निकल लिया हो. अब न जाने इसमें किरदार का वजन है या फिल्मांकन का..मगर जिन्दा मूल किरदार ही रहा. वही १९६८ का नीलकमल फिल्म वाला बलराज साहनी..

बहुत खोजा..शोध किया..बातचीत की मगर एक ऐसा आयाम खोजने में मैं सफल नही हो पाया जिसमें जब उस गीत के बोल सुनूँ तो न तो फिल्म का सीन याद आये, न मौके पर अत्याधिक बजने की वजह से उस मौके से जुड़े दृष्य का..बल्कि कोई नया सा दृष्य उभरे, एक नया सा चेहरा उभरे...

आज तक कोई भी राजनेता ऐसा न कर पाया कि फिल्म का गीत बजे जिसमें उसका जिक्र न हो और आप के जेहन में उसका चित्र उभर आये.

मगर अभी अभी कुछ रोज पहले एक ऐसी घटना हुई कि, सोशल मीडिया में दिलचस्पी रखने वाले इसे अच्छी तरह से समझ पायेंगे.. बाकी के लोग इस पैराग्राफ को लाँघ कर आगे पढ़ सकते हैं, एक बड़े टीवी चैनल के एक दिवसीय सरकारी प्रतिबन्ध के मद्दे नजर बने एक कार्यक्रम और हैश टैग ट्रेन्ड की दुनिया में ट्वीटर पर सबको पछाडते हुए ट्रेन्ड #बागों मे बहार है..ने ऐसा माहौल बनाया कि..अब जब भी वो गीत सुनाई देता है तो दिमाग में उभरता है..एक फेमस टीवी चैनल का ब्लैक आऊट हुआ टीवी स्क्रीन और फिर उस ब्लैक आऊट के भीतर से उभरता हुआ मेरे मित्र एक बड़े एन्कर का चेहरा और साथ में दो चेहरों पर सफेदा पोते एथॉरिटी और लठैत बने माईम कलाकार... वो आराधना फिल्म के साथ साथ राजेश खन्ना और फरीदा जलाल का चेहरा जाने कहाँ खो गया और कब..समझ ही नहीं आया. ऐसा पहली बार, कम से कम मेरी याद में हुआ.

आपको कुछ ऐसा याद हो तो बतायें कि जब गाना बजे फिल्म का और आपको याद आये कोई राजनेता या पत्रकार.. या कोई ऐसा चेहरा..जो किसी मौका विशेष के नाम से आपके दिमाग में हथोड़ान्कित न हो....

शायद राजनेताओं के लिए ऐसा कुछ प्रयोग करने का समय आ गया है...करना भी चाहिये..कोई एक फेमस गाना..अपनी याद दिलवाने के लिए...

जोड़ कर देखो न भई नेता जी..शायद कहीं गुंजाईश बने!!

-समीर लाल ’समीर’

भोपाल के सुबह सवेरे में ४ दिसम्बर,२०१६ के अंक में प्रकाशित

http://epaper.subahsavere.news/c/15111168
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