तिवारी जी आज पान की दुकान पर बैठे घँसु को दिखा कर बोले कि इन्ही के लिए यह कहावत लिखी गई
होगी: करत करत अभ्यास ते, जड़मति होत सुजान।
दरअसल बरसों से बेइज्जती
कराते कराते अब घँसु पर बेइज्जती का कोई भी असर ही
होना अब बंद हो गया था – बकोल तिवारी जी- घँसु अब बेइज्जती प्रूफ हो चुका था। कोई
कुछ भी कह जाए मगर घँसु बस मुस्कराता रहता। पूछने पर कहता कि बेइज्जती करना सामने
वाले का काम है – उसे महसूस करना या न करना तो हमारे हाथ में है। इन अर्थों में
मैं लगभग बुद्ध हो गया हूँ। बुद्ध का भी यही मानना था कि यदि कोई तुमसे अपशब्द कहे
और तुम उसे स्वीकारो ही मत तो वो अपशब्द देने वाले के पास ही रह जाते हैं। तेरा
तुझको अपर्ण क्या लागत है मेरा।
इस बात को सुनकर तिवारी जी जोर से
हँसे और बोले- घँसु, तुम बुद्ध नहीं बुद्धू
हो चुके हो और इस बुद्धूत्व के अपने अलग फायदे हैं। पान की दुकान पर खड़े सब लोगों
को आश्चर्य हुआ कि इसमें भला कैसा फायदा? तिवारी जी अक्सर ही ऐसी विवादित बात कह
कर घंटों प्रवचन देने के लिए वैसे भी मशहूर हैं। उनका तो दिन ही ऐसी बकैती करते
गुजरता है वरना उनके पास काम ही क्या है। सारा जीवन यही किया है। ऐसे तिवारी हर
मोहल्ले की पान की दुकान पर बैठे मिल जाते हैं।
लोगों की उत्सुकता देखकर
तिवारी जी बताने लगे कि ऐसा बुद्धूत्व प्राप्त व्यक्ति जिसे बेइज्जती का कोई असर
ही न हो हमेशा स्वस्थ रहता है – उसे न बीपी होता है और न ही कोई तनाव। तनाव के
मुख्य कारण पर तो वो विजय प्राप्त कर ही चुका होता है। दूसरा वो एक बहुत ही अच्छा
पति बनने की मान्यता प्राप्त कर लेता है। एक पति जिस पर बेइज्जती का कोई असर ही न
हो, उससे बेहतर पति भला कौन हो सकता है? हर पत्नी का सारा जीवन अपने पति को इसी
बात की ट्रेनिंग देते गुजर जाता है और उनके बीच सारे झगड़ों की मुख्य वजह यही तो
होती है कि बेचारा पति अपनी बेइज्जती बर्दाश्त न कर पाया और नाहक ही झगड़ बैठा जबकि
अंततः उससे भी ज्यादा बेइज्जती करा कर हार मान लेता है।
इन सबसे भी ज्यादा फायदा यह
है कि वो नेता बनने के लिए भी एकदम फिट हो जाता है। नेताओं की धूर्तता का मानक ही
उनकी बेइज्जती झेल जाने की क्षमता है। खुले आम चोरी पकड़े जाना, नित झूठ बोल कर
अपनी बेइज्जती करवाते रहने के बावजूद खी खी कर हँसते रहने का नाम ही तो आज
नेतागिरी है।
और फिर घँसु की तरफ देखते
हुए बोले कि ये तो मंत्री बनने की पात्रता रखते हैं। शादी हुई भी तो पत्नी कभी साथ
रहने आई ही नहीं अतः सदा अपने को अविवाहित बताते रहे। आठवीं फेल हो गए दो बार और फिर
क्लास मॉनिटर जैसे छोटे से चुनाव में वोट चोरी करते पकड़े गए तो स्कूल से निकाल दिए
गए और फिर आगे कभी पढ़ न पाए मगर शहर भर को बताते फिरते हैं कि बीए पास हैं। जो
जानते हैं वो याद दिलाते है कि आप तो आठवीं फेल हैं तो हंसने लग जाते हैं।झूठ
बोलने और एक्टिंग करने में महारत ऐसी कि साहनुभूति बटोरेने के लिए कुछ भी कहानी गढ़
कर कभी भी आँसू बहाने लगते हैं। ऐसे में इन्हें मंत्री बनने से कौन रोक सकता है।
और जब कभी पूरी पोल पट्टी
खुल भी जाए तो क्या फरक पड़ता है -एक्टिंग का फील्ड तो खुला ही है – लोग अभिनेता से
नेता बनते हैं – इनमें काबिलियत ये है कि एक नया प्रतिमान गढ़ेंगे – ये नेता से
अभिनेता बनेंगे।
घँसु यह सब सुन कर कुछ बोलने
की बजाए सिर्फ मुस्करा रहे थे – उन्हें लगा कि यह सब उनकी तारीफ में कहा जा रहा
है। बेइज्जती प्रूफ हो जाने फायदा ही तो है यह!!
-समीर लाल ‘समीर’










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