्व्यंग्य लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
्व्यंग्य लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, नवंबर 23, 2019

दुआओं की पुड़िया पकड़ाते चलो!!!



दुआ, प्रार्थना, शुभकामना, मंगलकामना, बेस्ट विशेस आदि सब एक ही चीज के अलग अलग नाम हैं और हमारे देश में हर बंदे के पास बहुतायत में उपलब्ध. फिर चाहे आप स्कूल में प्रवेश लेने जा रहे हों, परीक्षा देने जा रहे हों, परीक्षा का परिणाम देखने जा रहे हों, बीमार हों, खुश हों, इंटरव्यू के लिए जा रहे हों, शादी के लिए जीवन साथी की तलाश हो, शादी हो रही हो, बच्चा होने वाला हो, पुलिस पकड़ के ले जाये, मुकदमा चल रहा हो, या जो कुछ भी आप सोच सकें कि आप के साथ अच्छा या बुरा घट सकता है, आपके जानने वालों की दुआयें, उनकी प्रार्थना, उनकी शुभकामनायें आपके मांगे या बिन मांगे सदैव आपके लिए आतुर रहती हैं और मौका लगते ही तत्परता से आपकी तरफ उछाल दी जाती हैं.
भाई जी, हमारी दुआयें आपके साथ हैं. सब अच्छा होगा या हम आपके लिए प्रार्थना करेंगे या आपकी खुशी यूँ ही सतत बनी रहे, हमारी मंगलकामनायें. आप अपने दुख में और अपनी खुशी में मित्रों और परिचितों की दुआयें और शुभकामनायें ले लेकर थक जाओगे मगर देने वाले कभी नहीं थकते.
उनके पास और कुछ हो न हो, दुआओं और प्रार्थनाओं का तो मानो कारु का खजाना होता है- बस लुटाते चलो मगर खजाना है कि कम होने का नाम ही नहीं ले रहा.
अक्सर दुआ प्राप्त करने वाला लोगों और परिचितों की आत्मियता देखकर भावुक भी हो उठता है. अति परेशानी या ढेर सारी खुशी के पल में एक समानता तो होती है कि दोनों ही आपके सामान्य सोचने समझने की शक्ति पर परदा डाल देते हैं और ऐसे में इस तरह से परिचितों की दुआओं से आत्मियता की गलतफहमी हो भावुक हो जाना स्वभाविक भी है.
असल में सामान्य मानसिक अवस्था में यदि इन दुआओं का आप सही सही आंकलन करें तब इसके निहितार्थ को आप समझ पायेंगे मगर इतना समय भला किसके पास है कि आंकलन करे. जैसे ही कोई स्वयं सामान्य मानसिक अवस्था को प्राप्त करता है तो वो खुद इसी खजाने को लुटाने में लग लेता है. मानों की जैसे कर्जा चुका रहा हो. भाई साहब, आप मेरी मुसीबत के समय कितनी दुआयें कर रहे थे, मैं आज भी भूला नहीं हूँ. आज आप पर मुसीबत आई है, तो मैं तहे दिल दुआ करता हूँ कि आप की मुसीबत भी जल्द टले. उसे उसकी दुआ में तहे दिल का सूद जोड़कर वापस करके वैसी ही कुछ तसल्ली मिलती है जैसे किसी कब्ज से परेशान मरीज को पेट साफ हो जाने पर. एक जन्नती अहसास!!
जब आपके उपर सबसे बड़ी मुसीबत टपकती है जैसे कि परिवार में किसी अपने की मृत्यु, तब इस दुआ में ईश्वर से आपको एवं आपके परिवार को इस गहन दुख को सहने की शक्ति देने की बोनस प्रार्थना भी चिपका दी जाती है मगर स्वरुप वही दुआ वाला होता है याने कि इससे आगे और किसी सहारे की उम्मीद न करने का लाल लाल सिगनल.
दुआओं का मार्केट शायद इसी लिए हर वक्त सजा बजा रहता है क्यूँकि इसमें जेब से तो कुछ लगना जाना है नहीं और अहसान लदान मन भर का. शायद इसी दुआ के मार्केट सा सार समझाने पुरनिया ज्ञानी ये हिन्दी का मुहावरा छाप गये होंगे:
हींग लगे न फिटकरी और रंग भी चोखा आये’
दरअसल अगर गहराई से देखा जाये तो जैसे ही आप सामने वाले को दुआओं की पुड़िया पकड़ाते हो, वैसे ही आप उसके मन में आने वाले या आ सकने वाले ऐसे किसी भी अन्य मदद के विचार को, जिसकी वो आपसे आशा कर सकता था, खुले आम भ्रूण हत्या कर देते हो और वो भी इस तरह से कि हत्या की जगह मिस कैरेज कहलाये.
जब कोई आपकी परेशानी सुन कर या जान कर यह कहे कि आप चिन्ता मत करिये मैं आपके लिए दुआ करुँगा और मेरॊ शुभकामनाएँ आपके साथ है तो उसका का सीधा सीधा अर्थ यह जान लिजिये कि वो कह रहा है कि यार, आप अपनी परेशानी से खुद निपटो, हम कोई मदद नहीं कर पायेंगे और न ही हमारे पास इतना समय और अपके लिए इतने संसाधन है कि हम आपके साथ आयें और समय खराब करें. आप कृपया निकल लो और जब सब ठीक ठाक हो जाये और उस खुशी में मिठाई बाँटों तो हमें दर किनार न कर दो इसलिए ये दुआओं की पुड़िया साथ लेते जाओ.
ऐसे ही सरकार भी जब जनहित की योजनायें घोषित करती है  - जिसमें पैसे आपके ही लगने है और उसी के आधार पर आगे लाभ प्राप्त करना है, तब घोषणा करते हुए उनका ओजपूर्ण अंदाज भी कुछ ऐसा ही दुआओं और प्रार्थना वाला नजर आता है. इसका सार उनके भाषण के शुरुआती ब्रह्म वाक्य में ही नजर आ जाता है जब वे कहते हैं कि गरीब को सहारा नहीं, शक्ति चाहिये.
और बस मैं सोचने को मजबूर हुआ कि चलो, अब सरकार भी हम आम जनों जैसे ही दुआ करने में लग गई है और अधिक जरुरत पड़ने पर आपको और आपके परिवार को शक्ति प्रदान करने हेतु प्रार्थना में.
याने कि अब आप अपने हाल से खुद निपटिये और सरकार आपकी मुसीबतों से निपटने के लिए दुआ और उस हेतु आपको शक्ति प्रदान करने हेतु प्रार्थना करेगी.
मौके का इन्तजार करो कि जब ये ही लोग पाँच साल बाद आपके पास अपनी चुनाव जीतने की मुसीबत को लेकर आयें तो आप सूद समेत तहे दिल से दुआ देना, बस!!
वोट किसे दोगे ये क्यूँ बतायें! ये तो गुप्त मतदान के परिणाम बतायेंगे.
-समीर लाल ’समीर’
भोपाल के दैनिक सुबह सवेरे में रविवार नवम्बर २४, २०१९ में प्रकाशित:
ब्लॉग पर पढ़ें:

#Jugalbandi
#जुगलबंदी
#व्यंग्य_की_जुगलबंदी
#हिन्दी_ब्लॉगिंग
#Hindi_Blogging


Indli - Hindi News, Blogs, Links

शनिवार, सितंबर 08, 2018

तेल में आग और रुपये पर पानी


तिवारी जी का पुराना बकाया है घंसू पर. आज जब तिवारी जी ने पुनः तकादा किया तो घंसू भड़क उठे. उधार का व्यवहार ही यह है कि जब अपना ही पैसा वापस मांगो तो भीखमंगे से बत्तर नजर आते हो.
क्या मतलब है तिवारी जी आपका? कोई भागे जा रहे हैं क्या?
तिवारी जी भी गुस्से में आ गये बोले कि भाग तो नहीं रहे मगर रुपया भी तो वापस नहीं कर रहे हो? चार साल हो गये. दो महिना में लौटा देंगे बोल कर लिया था. हर चीज की एक हद होती है. रकम भी छोटी मोटी तो है नहीं, पूरे ५० हजार हैं. वो तो भला मानो कि हम ब्याज नहीं लगा रहे! किसी किसान से पूछ कर देखो कि सरकार कैसे ऋण देती है और कैसे ब्याज वसूलती है? हमारी जगह सरकार से कर्जा लिए होते तो अब तक किसी पेड़ में टंगे मिलते आत्म हत्या करके.
घंसू थोड़ा सकते में आ गये मगर रुपये तो हैं नहीं लौटाने को, तो कुछ न कुछ तो माहौल खींचना ही पड़ेगा. ये घंसू ने मौजूदा सरकार से खूब सीख लिया है पिछले चार सालों में. अतः घंसू ने पैंतरा बदला और बोले कि तिवारी जी आप तो पढ़े लिखे हैं. आप समझदार हैं. ऐसा बोल देने से सामने वाला बेवकूफ बनने को तैयार हो जाता है, यह घंसू जानता है. वो आगे बोला - देखिये रुपये की हालत? कितना गिर गया है. फिर इसके चलते पैट्रोल और डीज़ल के भाव में भी आग लगी है. थोड़ा बाजार संभल जाने दिजिये. रुपया मजबूत हो जाने दिजिये, लौटा देंगे आपका पैसा.
तिवारी भड़क गये कि क्या सोच कर लिये थे उधार? और फिर रुपये के गिरने से तुम्हारा क्या लेना देना? कोई डॉलर में कर्जा लौटाने की सोच रहे हो क्या हमारा? पैट्रोल में आग लगे या पानी, तुम तो अपनी साईकिल में घूमते हो, तुम्हारा क्या बनना बिगड़ना है इससे? जबरदस्ती की बहानेबाजी करते हो. कभी तेल में आग तो कभी रुपये पर पानी.
’कमजोर इन्सान पर तो सब जोर चलाते हैं’ घंसू रुँआसे से हुए बोल रहे हैं. साहेब भी तो चार साल पहले बोले थे कि १५ लाख सबके खाते में डलवा देंगे, उनसे क्यूँ नहीं कुछ कहते आप? वो ही आ जाते तो हम आप का कर्जा आपके मूँह पर दे मारते. हमें भी कोई अच्छा नहीं लगता है कर्जा अपने उपर रख कर.
आजकल तो वैसे भी अपनी गल्ती का ठीकरा दूसरे के सर पर फोड़ने का फैशन चल पड़ा है. रुपया गिरा तो १० साल पहले की नीतियों का दोष. पैट्रोल के दाम बढ़े तो पुरानी सरकार के कर्जे की वजह से. काला धन नहीं आया तो २० साल पहले के किसी नियम की वजह से. नोटबंदी फेल हो गई तो पुरानी सरकार की अदूरदर्शीता से. जी एस टी, दलित कानून सब पुरानी सरकार के कारण. हिन्दु मुस्लिम तो नेहरु की गल्ती. तो फिर ये जो सरकार आई इसने क्या किया, इसका कोई हिसाब है क्या? कि सिर्फ पुरानी फिल्मों को चलता देखते रहे? और ये पता करते रहे कि पिछले ७० साल में क्या गलत हुआ? उसमें खुद के भी ५ साल गिना गये वो पता ही नहीं. तिवारी जी चिल्ला रहे हैं.
और घंसू, तुम सुनो!! ये सब सरकारी चोचले, इसकी गल्ति उसकी गल्ति वाले इन राजनितिज्ञों के लिए छोड़ दो. ये इनको ही सुहाते हैं. हम तुम साधारण लोग हैं, इनके चक्कर में हम भी लड़ बैठेंगे. फिर न हम आपस में बात करेंगे और न ही आपस में मदद.
तुम कोशिश करके जब सुविधा हो मेरा पैसा लौटा देना मगर इनका जामा पहन कर मानवता से मानव का विश्वास मत डिगाना. ५०,००० रुपये बहुत कम कीमत है मानवता को दांव पर लगाने के लिए.
-समीर लाल ’समीर’    
भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे के रविवार सितम्बर ०९, २०१८ में:

#Jugalbandi
#जुगलबंदी
#व्यंग्य_की_जुगलबंदी
#हिन्दी_ब्लॉगिंग
#Hindi_Blogging

Indli - Hindi News, Blogs, Links

सोमवार, जनवरी 08, 2018

रंग और नूर की बारात किसे पेश करूँ...


भारत छोड़े तो दो दशक हुए मगर याद करता हूँ वो समय जब पड़ोस के घर में अगर हिजड़े नाच जाते थे तो सास अपनी बहु को जला कटा सुनाना न भूलती थी. देख तो इस कलमूही को..इसके चलते तो हिजड़े भी हमारे घर नहीं झांकते...न जाने, जीते जी पोते को गोद में खिला भी पायेंगे कि नहीं. नाश पिटे इसका...
बताओ भला!! बच्चा होना है पड़ोसी के यहाँ..हिजड़े नाचे पड़ोसी के यहाँ..उनको चढ़ावा चढ़ाया प़ड़ोसियों ने...और जली कुटी सुनी घर की बेकसूर बहु ने...जिसका कसूर महज इतना सा है कि वो इस घर के उस बेटे से ब्याही है जिस पर पूरा घर यह विश्वास साधे हैं कि वो वंश आगे बढ़ा सकता है मगर जो रिपोर्टें बहु की डॉक्टर बता रहे हैं कि वो एकदम नार्मल है, वो गलत हैं. वो अपने बेटे में खामी न तो सोच सकते हैं और न ही किसी डॉक्टर से उसके विषय में सलाह लेने की जरुरत समझते हैं. खैर, उनकी बात और सोच उनको मुबारक ..हमें तो जमाना गुजरा देश छोड़े. हम काहे पड़े इन झंझटों में.जिसके घर जिसे नाचना हो वो नाचे, जिसके घर जिसे कोसना हो वो कोसे. हमारी बला से.
मगर यह सब याद क्यूँ आया मुझे? दरअसल, कल सुबह से मन कर रहा है कि कैसे मूँह छुपायें? कैसे सारे पहचान वालों से बच जायें? कैसे उन पहचान वालों के प्रश्न मेरे कानों तक नहीं पहुँचें.. यह तमाशा शुरु हुआ पुस्तक मेले के साथ...जो कि एक सालाना जलसा है..
जितने साथी उतनी पुस्तक..उतने आमंत्रण...जिसे देखो वो ही बोल रहा है कि फलानी तारीख को हमारे स्टाल पर मेरी पुस्तक के लोकार्पण में आपको जरुर आना है..आप आयेंगे तो मुझे खुशी होगी..
मन कहता है कि खुशी तो हमें भी होगी मगर भारत यात्रा की टिकिट...वो कौन खरीदेगा? १५०० डॉलर अगर बड़ी रकम न भी लगे तो कम भी नहीं कही जा सकती. है न? वैसे जब निमंत्रण और आमंत्रण का जखीरा देखा, गिना, आंका तो लगा कि अगर हर आमंत्रणकर्ता अपने आमंत्रण के साथ मात्र २५० रुपया याने ५ डॉलर बतौर आने का शगुन भेज देता तो आमंत्रण की संख्या देखते हुए, न सिर्फ आने जाने ठहरने का खर्च निकल जाता, बल्कि उनकी किताब खरीद कर झोला भरने का भी झंझट निपटा देता...ये दीगर बात है कि उतना वजन लाद कर लाना तो एयर लाईन अलाऊ न करती तो बिना पढ़े उसे वहीं छोड़ कर आना पड़ता...मगर वो तो वैसा ही है कि जो किताबों को घर लाद के ले जा रहे हैं, वो ही कौन सा पढ़ ले रहे हैं? हमारे न पढ़ने का तो फिर भी एक जायज कारण है कि एयर लाईन ने अलसेट दे दी तो क्या करें?
अब आप सोच रहे होंगे कि हम मूँह काहे छिपा रहे हैं?
काल्पनिक तौर पर यह मान भी लिया जाये कि लोग दान दक्षिणा देकर हमें बुलाकर अपने लोकार्पण को अंतर्राष्ट्रीय बना भी लेंगे तो भी उन्हें हम क्या मूँह दिखायेंगे?
दरअसल, रिवाज यह है कि तू मेरी पुस्तक के लोकार्पण में आ और मैं तेरी में..तू मेरी पुस्तक खरीद और मैं तेरी...तू मेरी तारीफ करना और मैं तेरी...तू मेरे साथ सेल्फी उतारना और मैं तेरे साथ... तू भी खूश रहना और मैं भी खुश,,,,
मगर मेरी तकलीफ का क्या..कोई समझे तो बताऊँ...साल भर लिखते रहे..अखबारों और पत्रिकाओं में छपते रहे मगर किताब...ऊँ ऊँ ऊऊऊऊऊ ऊऊऊऊऊऊऊऊउ..छपी ही नहीं...तो किस बात का लोकार्पण और किस बात का आमंत्रण?
ठेले पर मेला सजा लें क्या अपने ही घर में कनाड़ा में?..अखबार की कटिग एक दूसरे के साथ नत्थी करा के...कि आओ भई हमारे ठेले पर..हमारा ठेला..अहसासो पुस्तक मेला...अखबारी लाल का ख्याल..:)
एक ठेला..पूरा पुस्तक मेला...बिना छपे इससे ज्यादा क्या पेश करुँ?
बस ठेला सजा है और गाना लगा देता हूँ पुराने ग्रामोफोन पर...
रंग और नूर की बारात किसे पेश करूँ...
अब बाताओ..
इससे बड़ी बारात क्या पेश करुँ?
-समीर लाल समीर

पल पल इंडिया में सोमवार ८ जनवरी, २०१८ में प्रकाशित:

http://palpalindia.com/2018/01/08/sarokar-Sameer-Lal-Rang-and-Noor-procession-child-neighbor-doctor-news-in-hindi-224289.html

#हिन्दी_ब्लॉगिंग
Indli - Hindi News, Blogs, Links

शुक्रवार, मार्च 03, 2017

अहंकार का दौर


अहंकार का दौर है. हालात यूँ बदले कि जब एक साहित्य रत्न से नवाजे गये उच्च श्रेणी के साहित्यकार से मुलाकात हुई तो उन्हें कविता की शुरुवात पूर्ण विराम लगा कर करते देखा.
आज तक पंक्ति के अंत में पूर्ण विराम देखते आये थे. यही बचपन से पढ़ाया लिखाया गया था. आश्चर्य हुआ कि इतना नामी साहित्यकार आखिर पंक्ति की शुरुवात पूर्ण विराम से कैसे कर रहा है? पूछने का मन तो हुआ मगर साहित्य रत्नों से प्रश्न पूछने के न तो संस्कार हैं और न ही अनुमति. ये सब साहित्यकार साहित्य रत्नों से नवाजे जाते ही मानो आर टी आई से बाहर हो जाते हैं. न तो आप उनसे ये पूछ सकते हैं कि किस बात पर नवाजे गये और न ही यह कि आज तक आपका साहित्य के प्रति क्या योगदान रहा है?
वैसे आर टी आई लगा भी दिया जाये तो साहित्य रत्न से नवाजे जाते ही ये सब अपने बारे में न तो कुछ बोलते हैं और न ही बताते हैं. समय ही नहीं होता. न लिखने का वक्त मिलता है और न पढ़ने का वक्त. इतने समारोह अटेंड करने पड़ते हैं कि उसी में साहित्य के गिरते स्तर पर चिंता व्यक्त करते ही पूरा दिन निकल जाता है. फिर नवांकुरितो को सलाह देने के बहाने अपने गुट में शामिल करते चलने में भी भरपूर परिश्रम की आवश्यक्ता होती है.
ऐसे व्यस्तता के दौर में महोदय लिख रहे हैं, वही काफी है. भले ही पूर्णविराम से पंक्ति की शुरुवात कर रहे हैं तो क्या?
समरथ को नहीं दोष गोसाईं...अमिताभ बच्चन छेद वाली बनियान पहन कर आ जाते थे तो हमारे जमाने में वही फैशन बन जाता था. हो सकता है पूर्ण विराम से लेखन की शुरुवात का ही फैशन चल निकले इन नामचीन महोदय चलते. बड़े लोगों का अन्दाज कुछ तो अलग होता ही है तभी तो बड़े कहलाते हैं. यही विचार कर चुप्पी साधे बैठे रहे.
फिर जब आज एक समारोह में माननीय ने कहा कि प्रश्न पूछना ही अज्ञान के अंधकार को दूर करने का एक मात्र उपाय है और आज की नई पीढ़ी प्रश्न पूछने से कतरा रही है. वो भयभीत है कि उनकी अज्ञानता के बारे में दूसरे न जान जायें. यह सुन कर एकाएक मेरी हिम्मत जागी.
उस शाम उनके घर जाकर अपनी शंका का समाधान चाहा तो जबाब सुनकर दंग रह गया. कहने लगे कि मेरे लेखन का स्तर ही ऐसा है कि जहाँ आकर सारी कलमें थम जाती हैं मेरी कलम वहाँ से बात शुरु करती है. इसलिए मैं पूर्णविराम शुरु में लगाता हूँ कि अब तक जो कुछ भी पढ़ा सुना हो उसके आगे की बात सुनो..यही तो वजह है कि ....
बस!! फिर वह अन्य नवांकुरितों के साथ व्यस्त हो गये और हमने उनका छोड़ा अधूरा वाक्य खुद ही पूरा कर लिया मन ही मन...
यही तो वजह है कि हमें साहित्य रत्न से नवाजा गया है...
कुछ न कुछ अलग सा नहीं करोगे तो बस!! लिखते रह जाओगे ..कुछ अलग करो मितरों!!

-समीर लाल ’समीर’
Indli - Hindi News, Blogs, Links