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मंगलवार, नवंबर 08, 2016

नोटों पर प्रतिबन्ध- एण्टी पर्यावरण कदम


ये अजब बात है कि रिजर्व बैंक के गवर्नर जैसे शिक्षित और सभ्य व्यक्ति के दस्तख्त किये हुए बयान को कि मैं धारक को इतने रुपये अदा करने का वचन देता हूं, भी चुनावी जुमला बना कर धर दिया जाये..ये बिल्कुल गलत बात है ..इसमें ऐसा कहाँ लिखा है कि जब तुम इसे बैंक में अपने खाते में जमा करोगे तब मैं इसे हर रोज २००० और कुछ दिन बाद ४००० की शक्ल में अदा करुँगा..और साथ ही तुम्हारा पैन नम्बर आयकर वालों को देकर तुम्हारी तबीयत से बैण्ड बजवाऊँगा.
जो पिछले चुनाव में वादा किया था कि हर खाते में १५ लाख डलवाओगे वो तो पूरा किया नहीं और अब हालात ऐसे कर डाले कि अपने खुद के १५ लाख रुपये से कहीं ज्यादा नगद में १००० रुपये के नोट की शकल धरे मूँह चिढा रहे हैं मगर बैंक में डाल नहीं सकते.
जन धन योजना वाले खातेदार मजे में धनधारियों की तरह ताक रहे हैं कि शायद उनके साहब अब उन्हें याद करें..कुछ खुरचन बचा ले जाने के लिए....खुरचन यूँ भी ज्यादा स्वाद देती है मलाई से..
वैसे ये बताओ हे जुमला पीर..ऐसी कौन मजबूरी आन पड़ी थी तुम पर कि तुमने अपनों की भी नहीं सोची..सिर्फ उन दो तीन खास को छोड़ कर जिनके पास ऐसा होने की खबर थी और जिनके पास अब बस १०० - १०० के नोट हैं..१००० ५०० के तो तीन दिन पहले ही छुट्टे करा कर मुस्कराते हुए धर लिए थे...लोक सभा की तरह यू पी और पंजाब चुनाव में भी तो तुम्हारा ख्याल उन्हें ही रखना है...तो इतनी सी जानकारी का तो उनको मालूम होना बनता है..
आज बहुतेरे तो जिनमें तुम्हारे भी अनेक साथी शामिल हैं.. रोते हुए घर के आंगन में नोटों का बोरा जला कर, मुस्कराते हुए बरामदे में खड़े हो कर प्रेस वालों को ये बयान दे रहे हैं कि बड़ा ही साहसिक और ऐतिहासिक कदम रहा माननीय का. फिर ध्यान से देखो तो उनके चेहरे की वही मुख मुद्रा- मूँह में राम बगल में छूरी वाली....
न जाने कितने आज इस उम्मीद में सोये होंगे...कि कल शायद माननीय उठें और राष्ट्र के नाम पुनः संदेश दें कि बड़े भाई, गल्ती हो गई थी..कल ज्यादा पी ली थी...सॉरी.. (ऐसा एक सोशल साईट पर जोक मिला है)
वैसे कल की तो कल देखेंगे...मगर आज तो वाकई ..हद ही कर दी..क्या ऐसे भी कोई करता है भला... कित्ता कागज खराब किया.....पर्यावरण के लिए कित्ती गलत बात है..एक बार भी न सोचा कि कितने पेड़ कटे होंगे इसके पीछे...
और जिस शहर में सबसे ज्यादा नोटों से भरे बोरे जलेंगे..उस शहर में ऑलरेडी स्मॉग अलर्ट है..विश्व का सबसे पोल्यूटेड शहर अभी कल ही घोषित हुआ है ..विषैली आबोहवा.. उसी का सोच लेते...मगर आपको क्या?
दिल्ली की हवा और अधिक विषैली हो भी जाये तो उसका ठीकरा फोड़ने के लिए पोल्यूशन का ब्राण्ड एम्बेसड़र, वो खाँसता हुआ बंदा तो है ही..उसी के नाम मढ़ देना...आने वाले पंजाब चुनाव में मदद भी हो जायेगी शायद..
वैसे शास्त्रों के हिसाब से भी देखें तो नोटों को जलाना लक्ष्मी जी का अपमान करने जैसा है..ऐसा करने वाला पापी है मगर फिर वही वेदों वाली बात...पापी से नहीं पाप करवाने वाले से घृणा करो..फिर तुम ही अटकोगे..बता दिया ताकि सनद रहे और वक्त पर काम आवे..
-समीर लाल ’समीर’

 चित्र: गुगल साभार
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शनिवार, नवंबर 05, 2016

विषयाभाव!!


आज फिर लिखने के लिए एक विषय की तलाश थी और विषय था कि मिलता ही न था, तब विचार आया कि इसी तलाश पर कुछ लिखा जाये.
वैसे भी अगर आपको लिखने का शौक हो जाये तो दिमाग हर वक्त खोजता रहता है-कि अब किस विषय पर लिखा जाये? उठते-बैठेते, सोते जागते, खाते-पीते हर समय बस यही तलाश. इस तलाश में मन को को यह खास ख्याल रहता है कि एक ऐसा मौलिक विषय हाथ लग जाये कि पाठक पढ़कर वाह-वाह करने लगे. .. पाठक इतना लहालोट हो जाये कि बस साहित्य अकादमी अवार्ड की अजान लगा बैठे..और साहित्य अकादमी वाले उसकी कान फोडू अजान की गुहार सुनकर अवार्ड आपके नाम कर चैन से सो पायें.
यूँ तो जब भी कोई पाठक आपके लिखे से अभिभूत होकर या आपसे कोई कार्य सध जाने  की गरज के चलते ये पूछता है कि- भाई साहब, आप ऐसे-ऐसे सटीक और गज़ब के ज्वलंत विषय कहाँ से लाते हैं? तो मन प्रफुल्लित हो कर मयूर सा नाचने लग जाता है. किन्तु मन मयूर का नृत्य पब्लिक के सामने दिखाना भी अपने आपको कम अंकवाने जैसा है. कौन भला अपनी पब्लिक स्टेटस गिरवाना चाहेगा...
तो अब सोचिये कि अगर आप तक यह प्रश्न पहुँचा है, इसका मतलब ही यह है कि सामने वाले ने आपको ज्ञानी माना हुआ है अन्यथा मूर्खों से भी भला कोई प्रश्न करता है कोईअतः आपको गभीरता का लबादा चेहरे पर लादे हुए ज्ञान मुद्रा बनाये व्याख्यान कुछ इस तरह शुरु कर देना पड़ता है कि..
’देखियेआप तो स्वयं ज्ञानी हैं (इसे नमस्ते के बदले नमस्ते वाले का संस्कार मानें कि उसने आपको ज्ञानी माना है अतः आप उसका उधार वापस कर रहे हैं ऐसा कह कर, वरना तो आप जानते ही हैं उसको)विषय तो आपके आस पास ही हजारों बिखरे होते हैं,,जैसे कि कंकड़ पत्थर.. बात आपकी सजगता और उन्हें पहचान लेने की है. आपका नित आचरण, मित्रों की गतिविधियाँ, समाज का व्यवहार और रीतियाँ, कुरितियाँ, सरकार और सरकारी तंत्र को चलाने के यंत्र और मंत्र आदि-आदि नित हजारों हजार विषयों के वाहक होते है, मगर जो हीरे को पहचान जाये, वो पारखी कहलाता है वरना तो मूरख उसे कंकड़ मान कर लात मार मार कर निकल ही रहे हैं. वैसे असल बात ये है कि मात्र हीरे को पहचान लेना ही पारखी को जोहरी नहीं बना देता..(इस बहाने आप सामने वाले के मन में आपके ही बयान से उपज आये उस भ्रम को नेस्तनाबूत भी कर देते हैं कि वो भी आस पास सजगता से देख कर विषय तलाश सकता है).
जैसे एक अच्छा जोहरी बनने के लिए जीवन में कुछ अलग सा कर जाने का संकल्पइक हुनर सीख लेने की ललक, एक निष्ठ लगन, तराशने का सधा हुआ हुनर और एक इमानदार मेहनत की जरुरत होती है वैसे ही किसी भी विषय पर लिखने वाले एक अच्छे लेखक को शब्दकोश का धनी, विविध साहित्य का अपार पठन और मेहनत और लगन से अपने लेखन को अंजाम देने की जरुरत होती है. विषय निश्चित ही अपने आप में महत्वपूर्ण होता है. विषय कथानक की घूमती हुई धूरी होता है जिसके आस पास आपको, शब्दों का उचित चयन करते हुए एवं उनको गूथने के हुनर का जतन से इस्तेमाल करते हुए, एक ऐसे आभा मण्डल का निर्माण करना होता है कि पढ़ने वाला उसी आम से दिखने वाले विषय को एकदम खास सा विषय मान ’वाह वाह” कर उठे...

और इतना सब कह कर भी इस बात को तय कर पाने के लिए, कि आप पूछने वाले पर अपने ज्ञानी होने की पूरी छाप छोड़ पाये या नहीं और उसे सदैव मूरखता से अभिशप्त रहने का अहसास दिला पाये या नहीं...., आप उससे यह पूछने से बाज नहीं आते कि ’क्या समझे? समझे कि नहीं?
सामने वाला साहित्य का ज्ञान भले न रखता हो पर प्रश्नकर्ता भारतीय है और हर पान की दुकान पर खड़े से रेल में बैठे आम भारतीय की तरह उसे राजनीत का ज्ञान तो जरुर ही होग....हर भारतीय पर इस हेतु विशेष ईश कृपा है और इस ज्ञान का होना तो उसके डी एन ए में शामिल है अतः उसी आधार पर वो ’क्या समझे? समझे कि नहीं?’ का जबाब देता है. और कहता है कि...
जी, मैं समझ गया और मैं इसे ऐसे समझा कि जैसे राजनीत में तमाम मुद्दे आपके आस पास बिखरे पड़े होते हैं.. बस बात उन्हें पहचानने की है और इतना और जान लिजिये कि मात्र उन मुद्दों को पहचान जाने से भर आप राजनेता नहीं बन जाते...बात उन आम मुद्दों को शब्दों और जुमलों के मायाजाल में बाँध कर आमजन के सामने ऐसे पेश करने की है कि वो मुद्दे इतने खास हो जायें...कि आमजन महसूस करने लगे..वाह, बस इस बंदे को चुनना है इस बार और फिर देखो...जल्दी ही अच्छे दिन आने वाले हैं!!और आमजन का यह इन्तजार आमजन वो ख्वाब बन जायेगा जो आपको राज गद्दी दिला जायेगा...
उसकी यह व्याख्या इस लेखक श्रेष्ठ के दिल को छू गई ..बस, पाठको में इसी तरह के इन्तजार को जगाना अब मात्र इस लेखक की तमन्ना बची है और लेखक की राजगद्दी यानि अकादमी का साहित्य सम्मान.वो तो फिर मिल ही जायेगा एक दिन...जुमले पर जुमले गढ़ते रहेंगे इसी इन्तजार को जगाने के लिए...कौन जाने कौन सा जुमला हकीकत में साहित्य सम्मान दिला जाये..
कभी जब कोई विषय नहीं सूझता है
तब ऐसे में खुद ही एक विषय बनकर..
खुद अपनी तलाश में निकल जाता हूँ मैं ..
मानो खुद को ही आईना दिखलाता हूँ मैं...

-समीर लाल समीर
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गुरुवार, अक्टूबर 20, 2016

आस्तिक एवं नास्तिक


मांसाहारी को यह सुविधा रहती है कि मांसाहार उपलब्ध होने की दशा में वो शाकाहार से अपना पेट भर ले. उसे भूखा नहीं रहना पडता. जबकि इसके विपरीत एक शाकाहारी को, शाकाहार उपलब्ध होने की दशा में कोई विकल्प नहीं बचता. वो भूखा पड़ा मांसाहारियों को जश्न मनाता देख कुढ़ता है. उन्हें मन ही मन गरियाता है. वह खुद को कुछ इस तरह समझाता है कि देख लेना भगवान इनको इनके किए की सजा जरुर देगा. ये जीव हत्या के दोषी हैं और फिर चुपचाप भूखा सो जाता है.
नास्तिक ओर आस्तिक में भी कुछ कुछ ऐसा ही समीकरण है. नास्तिक आस्तिकों की भीड़ में भी नास्तिक बना ठाठ से आस्तिकों की आस्था को नौटंकी मान मन ही मन मुस्करता रहता है. नास्तिक स्वभावतः एकाकी रहना पसंद करता है और जब तक उसे आस्तिक होने के उकसाया जाये, अपने नास्तिकपने का ढिंढोरा बेवजह नहीं पीटता है.
आस्तिक गुटबाज होता है. वो आस्तिकों की भीड़ में रहना पसंद करता है. वह किसी नास्तिक को देख मन ही मन मुस्करता नहीं है बल्कि उसे बेवकूफ मान प्रभु से प्रार्थना करता है कि हे प्रभु, यह अज्ञानी है, इसे नहीं पता कि यह क्या कर रहा है. इसे माफ करना.
आस्तिक बेवजह नास्तिक को अपनी आस्था के चलते जीवन में हुए चमत्कारों को रस ले ले कर सुनता है ताकि नास्तिक भी उन चमत्कारों की बातों के प्रभाव में आकर आस्तिक बन उसके गुट में जाये. बस, इसी उसकाये जाने के चलते नास्तिक भड़कता है और पचास ऐसे किस्से सुनाता है जिसमें ह्र किस्से का अंत मात्र इस बात से होता है अगर भगवान होता है तो वो उस वक्त कहाँ थातार्किक जबाब के आभाव में आस्तिक इसे नास्तिक की नादानी मान उसे उसके हाल पर छोड़ते हुए नाक भौं सिकोड़ कर  मात्र इतना कह कर निकल लेता है कि एक दिन तुम्हें खुद अहसास होगा तब तुम अपनी बेवकूफी पर पछताओगे.
आस्तिक स्वभावतः भीरु एवं आलसी प्रवृति का प्राणी होता है अतः एक सीमा तक कोशिश करने के बाद आस्था की रजाई ओढ कर सो जाने का स्वांग रच, रजाई से कोने से किसी चमत्कार की आशा लिए झांकता रहता है और यह मान कर चलता है कि जैसा ईश्वर को मंजूर होगा, वैसा ही होगा. प्रभु जो करेंगे, अच्छा ही करेंगे. उसे अपनी मेहनत से ज्यादा यकीन आस्था के प्रभाव से हुए चम्त्कार पर होता है.
नास्तिकों में एक बड़ा प्रतिशत उन नास्तिकों का होता है जिन पर अब तक कोई ऐसी विपदा नहीं पड़ी है जिसका कोई उपाय न हो और मात्र प्रभु पर भरोसा ही एक सहारा बच रहे. ऐसे नास्तिक अधिकतर उस उम्र से गुजरते हुए युवा होते हैं जिस उम्र में में उन्हें अपने मां बाप दकियानूसी लगते हैं या गाँधी को वो भारत की आजादी नहीं, भारत की बर्बादी जिम्मेदार मानते हैं. उनकी नजरों में गाँधी की वजह से देश इस हालत में है वरना तो देश की तस्वीर कुछ और होती. उम्र का यह दौर उसकी मानसिकता पर अपना ऐसा शिकंजा कसता है कि उसे अपने आप से ज्ञानी और तार्किक कोई नहीं नजर आता. वो अक्सत गंभीर सी मुद्रा बनाये दुनिया की हर उस चीज को नाकारता दिखता है जिससे की यह दुनिया और इसकी मान्यतायें चल रहीं हैं. उसकी नजर में वह सब मात्र बेवकूफी, हास्यास्पद एवं असफल जिन्दगियों के ढकोसले हैं जो उनके माँ बाप गुजार रहे हैं.
उम्र के साथ साथ समय की थपेड़ इन नास्तिकों का दिमाग ठिकाने लगाने में सर्वदा सक्षम पाई गई है. जैसा कहा गया है कि गाँधी को समझने के लिए पुस्तक नहीं, एक उम्र की जरुरत है..ऐसे नास्तिक भी उम्र के साथ साथ आस्तिक की आस्था को समझने में सक्षम हो जाते हैं और फिर सही पाला तय कर पाते हैं.
कभी आस्तिक व नास्तिक मात्र भगवान के प्रति आस्था और विश्वास रखने एवं न रखने का प्रतीक था. आज के अस्तिक ,अपने बदलते स्वरुप के साथ, अपने राजनैतिक आकाओं को भगवान का दर्जा देकर उनके भक्त बने आस्तिकता का परचम लहरा रहे हैं ओर जो उनके भगवान में आस्था न रखते, उन्हें गाली बकने से लेकर उनके साथ जूतमपैजार करने तक को आस्था का मापदण्ड बनाये हुए.
इसी की परिणिति है कि आज भक्त का अर्थ भी मात्र एक राजनैतिक पार्टी के आका में आस्था रखने वालों तक सीमित होकर रह गया है, शेष सभी जो बच रहे, उन्हें आप अपनी इच्छा अनुसार दुष्ट, नास्तिक या देशद्रोही आदि पुकार सकते हैं. आज का आस्तिक भक्ति भाव से नाच नाच कर भजन पूजन का स्वांग रच रहा है और फिर थक कर आस्था की रजाई में मूँह ढाँपे अच्छे दिन लाने वाले चमत्कार का इन्तजार कर रहा है.
नास्तिक मानो मंदिर की दीवार पर सर टिकाये बीड़ी के धुँएं के छल्ले बना कर उड़ा रहा है उसे मालूम है कि अच्छे दिन आना मात्र एक चुनावी जुमला है. भला ऐसा भी कभी होता है कहीं.

-समीर लाल ’समीर’
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