हास्य-विनोद लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
हास्य-विनोद लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, मार्च 25, 2017

गरमी की गरमाहट


गरमी का मौसम तो बस चार महिने में निकल लेता है फिर अगले बरस ही लौट कर आता है. इससे क्या डरना और क्या परवाह करना. मानव मष्तिक अति खुराफाती होता है, इसने इसको तो चकमा देना सीख ही लिया है. जिससे जो बन पड़ता है वो अखबार से पंखा झलने से लेकर एसी में सारा समय गुजार राहत पा ही लेता है.
साधन सम्पन्न लोग इसे छुट्टी का मौसम मान कर ठंड़े पहाड़ों से लेकर ठंड़े विदेशी शहरों में समय बिता आते हैं.
साधन सम्पन्न होने के लिए भी पैसों की या पावर की गरमी चाहिये. यूँ भी पैसों की और पावर की गरमी की आपसी संगाबीत्ती तो जग जाहिर है ही. मगर ये गरमी इतने आसानी से नहीं जाती. इस गरमी के भोगी इस गरमी से निकलना ही नहीं चाहते. उनके मोह मोह के धागे रेशमी होते हैं – टूटे नहीं टूटते.
पावर की गरमी बचाये रखने के लिए दल बदल से लेकर घर बदल तक से उन्हें गुरेज नहीं रहता. इन्हीं को देख कर एक शायर ने कहा है कि जैसे आग और पानी का कोई साथ नहीं वैसे ही पावर और शरम का कोई साथ नहीं. कब किसका हाथ थाम लें और कब किसको गले लगा लें, कौन जाने!! पावर न जाये भले ही बाप और चाचा को गाली बकना पड़ जाये.
दूसरी तरफ पैसे की गरमी. वो भी जो न करा जाये..इस गरमी को गले से चिपकाये इन्सान का मद और अहंकार उस मुकाम पर पहुँच जाता है जहाँ वो सोचने लगता है कि मैं तो दुनिया में कुछ भी खरीद सकता हूँ. फिर वो कानून हो, देश हो या देश की सरकार. मगर ये पैसे की गरमी भी जब एक दिन उतरने लगती है तब या तो लंदन भाग जाना याद आता है वरना तिहाड़ निवास बन जाता है.
एक गरमी और भी होती है जिसे जवानी की गरमी कहते हैं. वो भी उतरते उतरते ही उतरती है और कईयों की ८८ साल की उमर में भी नहीं उतरती. इस गरमी से बौराये लोगों को हिन्दी साहित्य में दीवाना कहा गया है और सरकारी भाषा में रोमियो.
आजकल एक प्रदेश विशेष में इस रोमियोयी गरमी को उतारने के वैसे ही विशेष प्रबंध किये गये हैं जैसे मौसम की गरमी उतारने के लिए जगह जगह सरकारी ठंड़े पीने के पानी की व्यवस्था की जाती है. अतः ऐसी उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले समय में यह गरमी कंट्रोल में रहेगी. वो शायद ये भूल रहे हैं कि सरकारी ठंड़े पानी की मशीनें लगाई तो जरुर जाती है मगर वो चलती भी हों और उनसे ठंडा पानी भी आता हो, ऐसा अजूबा कब देखने में आता है?
वैसे तो हम बताने निकलें तो पूरा गरमी का मौसम बीत जाये तरह तरह की गरमियाँ बताते बताते मगर जनहित में बता नहीं रहे हैं कि हर गरमी के लिए कहीं एक एक नया कानून न चला आये उस गरमी को उतारने के लिए..
बेहतर हो कि गरमी के मौसम की गरमी उतारने पर सरकार ध्यान दे ताकि कोई लू से न मरे और कोई किसान सूखे से परेशान होकर आत्म हत्या न कर ले.
हर घर बिजली, हर घर पानी...का नारा बुलंद हो तो बात बनें!!
-समीर लाल ’समीर’   
#Jugalbandi #जुगलबन्दी
   

Indli - Hindi News, Blogs, Links

शनिवार, मार्च 18, 2017

चुनाव के बाद..



चुनाव के बाद बस दो तरह के नेता बचते हैं. एक जीते हुए और दूसरे हारे हुए.

आज जब बड़े दुखी मन से अपने तुरंत उप्र चुनाव हारे दोस्त के घर मातम जताने पहुँचा तो वह तो उसी गर्म जोशी से मिले जैसे पहले मिलते थे. नाई चंपी करके जा रहा था. नौकर जलेबी और समोसे की प्लेट के साथ गरमा गरम चाय परोस रहा था. उन्हें देख कर लगा कि जैसे मैं चुनाव हार गया हूँ और वो मुझे ढाढस बँधाने तैयार बैठे हैं. मुस्करा कर कहने लगे कि यार, पहले सरकार चलाने और फिर इधर चुनाव के चक्कर में ही उलझे रह गये. परिवार के लिए वक्त ही नहीं मिला इसलिए कल दुबई जा रहे हैं. परिवार के साथ छुट्टी मनाने १० दिनों के लिए. थोड़ा आराम भी तो जरुरी है.

हम तो गये ही यह पूछने थे कि चुनाव हारने के बाद अब क्या प्लान है? क्या कोई नया धंधा वगैरह तलाशेंगे? घर परिवर चलाने के लिए कुछ न कुछ तो करना ही होगा? चुनाव में जब चंदा मांग रहे थे तभी हमें लग गया था कि बंदा अपनी पूँजी चुक गया है,,वरना किसी से मांगने की क्या जरुरत? चुनाव में उनके द्वारा उड़ाई रकम देख कर लगा था सारी की सारी पूँजी भी खर्च कर ही दी होगी. मगर आज उनका हाल देखकर तो लगा कि चुनाव हार कर मानो लाटरी लग गई हो. बंदा सपरिवार दुबई जा रहा है छुट्टी मनाने. हम तो विभाग से एलटीसी मिलने के बावजूद भी मात्र आगरा, जयपुर और नैनीताल घूम पाये हैं छुट्टी मनाने.

अब गये थे तो पूछना भी जरुरी था कि भाई साहब, लौट कर क्या सोचा है, क्या करना है?

कहने लगे कि करना क्या है? अगले चुनाव की तैयारी करनी है..वाईफ को सत्तारुढ पार्टी ज्वाईन कराना है. बस और क्या!!

इस बार जरा सा चूक गये एक दो साथियों को पहचानने में. अगली बार तो हम ही जीत रहे हैं..ग्राऊण्ड रिपोर्ट है हमारे पास...चाहो तो शर्त लगा लो. ये जो जीते हैं न...इनकी कोई औकात थोड़े न है..वो तो हमारे अपने साथी सेबोटाज़ न करते तो इनकी जमानत जब्त हो जाती. बाप बेटे की लड़ाई के चलते हमारे शहर में अपने ही विद्रोही हो लिए.

हमने कहा चाहे जैसे भी जीते हों मगर उन्होंने तो आपको और आपकी पार्टी को सिरे से साफ कर दिया. वे हँसने लगे – बोले, तुम्हें राजनीति की समझ नहीं है. यहाँ न तो कोई सिरा होता है न ही कोई छोर, जो कोई किसी को सिरे से खत्म करे और न ही चुनाव के बाद क्या होगा जैसी कोई सोच....जो भी ऐसी सोच रखता है वो नेता हो ही नहीं सकता..

अगर नेता हो तो चुनाव में हारो या जीतो..नजर अगले चुनाव पर ही होना चाहिये. जो बीत गई वो बात गई.

और हमारी या आपकी पार्टी जैसी अवधारणा भी मूर्ख ही पालते हैं. नेता अजर अमर है. नेता मूल रुप से राजनिती की आत्मा है और पार्टी शरीर. पार्टियाँ बदलती रहती हैं.

इनकी बात सुन कर मुझे याद आया कि कभी हमारे गुरु जी ने न जाने किस संदर्भ में उदाहरण दिया था कि जरायम पेशा लोगों से यह पूछना जेल से लौट कर क्या करने का इरादा है? वो भला क्या यह बतायेगा कि लौट कर साधु हो जाऊँगा? उसका तो सीधा सादा एक जबाब होगा कि अगला असामी देखूँगा कि किसको निशाना बनाना है. पकड़ा गया तो एक बार फिर जेल यात्रा. ये तो सतत प्रक्रिया है हमारे पेशे की. विचार किया तो पाया कि दोनों पेशों के बीच है भी तो बहुत झीनी सी लकीर, जिसके इस पार उस पार आना जाना भी सतत प्रक्रिया ही है. मानो भारत और बंग्लादेश की सरहद हो.

एक सांस आती है. फिर एक सांस जाती है. इसके बाद सांस आने का इन्तजार छोड़ दें क्या? नेता जी मुस्कराते हुए समझा रहे हैं..

नेता जी की सिंगापुर की टिकिट देने के लिए बंदा आ चुका है.

क्या दुबई क्या सिंगापुर..विदेश तो विदेश है..नजर भी न गई इस ओर...

-समीर लाल ’समीर’
#जुगलबन्दी #jugalbandi
Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, मार्च 15, 2017

फेस बुकिया कैसे कैसे


कई लोग फेस बुक पर इस तरह लाईक करते नजर आते हैं मानो कोई नेता रोड़ शो में सबका हाथ हिला हिला कर अभिवादन कर रहा हो. देखा पहचाना किसी को नहीं, हाथ हिलाया सबको. इनका संघर्ष मात्र इतना सा है कि आप देख लो कि यह सक्रिय हैं और आपको पसंद करते हैं.
एक सज्जन है उनके बारे में दावे से कह सकता हूँ कि या तो वो कोई टू डू टास्क टाईप की लिस्ट मेन्टेन करते हैं कि किस दिन किस की वाल पर जाना है या फिर तोते से नाम की पर्चियाँ कढ़वाते हैं, तोता जिनके नाम निकाल दे, उन्हीं के वाल पर निकल लिये और धड़धड़ाते हुए सबसे नई पोस्ट से लेकर पिछली बार की लाईक की आखिरी पोस्ट तक लाईक करते चले गये.७ मिनट में १७ आलेख वो भी ५००-५०० शब्दों वाले लाईक किये और ये चले. इनका नाम लिमका बुक में फास्टेस्ट रीडिंग में दर्ज होना चाहिये.
उनकी बेइन्तहा लाईक देखकर कई बार लगने लगता है कि सही उम्र के मोड़ पर मिले होते तो मोहब्बत हो गई होती. इतना भी भला कोई किसी को चाहता है क्या?
इनसे उपर की पायदान पर वे फेसबुकिया बैठे हैं जिनकी वाल आपके भरोसे चलती है. वे मात्र शेयर में भरोसा रखते हैं. जो पोस्ट दिखी, बस शेयर. आपको भी अच्छा लगता है कि उनको इतना अच्छा लगा कि शेयर किया है अपने चहेतों के बीच और जाकर देखिये तो शेयर पर एक भी लाईक नहीं. इनकी वाल लदी रहती है शेयर्ड पोस्टों से और यह निर्लिप्त भाव से उस बोझ को बढ़ाते चलते हैं. आपने नेताओं के साथ ऐसे समर्थक को जन प्रचार के वक्त डोर टू डोर अपने पहचान वालों के यहाँ ले जाकर मिलवाते देखा होगा जो दरवाजा खोल कर मिल तो लेते हैं, मगर उनके चेहरे के भाव साफ कहते हैं कि चलो, मिल लेते हैं मगर हमसे कोई आशा न रखना.
फिर वो दिग्गज हैं जिनकी लिए किसी ने इमोटिकॉन बनाये होंगे. वे निश्चित ही पोस्ट पढ़ कर ही इमोटिकॉन चिपकाते होंगे, वरना खुशी में नाचने वाला, चिंतन में आँख घुमाने वाला और गुस्से में लाल मूँह वाला इमोटिकॉन चिपकाना भी आसान काम नहीं. यह मात्र अपने को जमीन से जुड़ा नेता दिखाने की कोशिश मात्र है बिना टिप्पणी लिखने की मेहनत किये हुए. जैसे वो सारे राज्य सभा के सदस्य. जनता के प्रतिनिधी, जनता के प्रतिनिधियों के द्वारा चुने हुए या उनके द्वारा नामित हुए वाले.
फिर आते हैं असल ग्राऊण्ड ट्रोडन..जमीन से जुड़े नेता. पूरा कायदे से पढ़ेंगे, पढ़ कर सारगर्भित टिप्पणी करेंगे और अपने द्वार पधारने का निमंत्रण भी देंगे. सुधार के सुझाव भी छोड़ जायेंगे. नमन है इनको निश्चित ही मगर इनकी आड़ में कई लिख कर दिखने जैसा कट पेस्ट लगाने वाले कि बहुत खूब, उम्दा, सतीक, बेहतरीन...आदि वो लोग हैं जो मात्र इस लिए चुनाव जीत जाते हैं कि फलानी पार्टी के हैं और उस पार्टी की लहर क्या सुनामी चल रही है..इनसे सतर्क रहना चाहिये थोड़ा सा..बहुत नहीं.
कुछ तो अध्यात्म के उस अंतिम मुकाम पर पहुँचे पीर हैं जो हर घटित होने वाली घटना को मात्र साक्षी भाव से निहारते रहते हैं. वे फेसबुक पर होते हुए भी नहीं हैं. देखते सब कुछ हैं मगर बस साक्षी भाव से. न लाईक करते हैं न कमेंट और न ही शेयर. यह महामना इन सब से बहुत उपर उठ चुके हैं. कभी व्यक्तिगत तौर पर मिलो तब जान जाओगे जब ये कहेंगे कि हाँ, देखी थी तुम्हारे पोते की फोटो, बहुत प्यारा है या फिर कि काफी जगह घूम आयेहो इन छुट्टियों में...यात्रा वृतांत अच्छा था. ये फेसबुक की अनजान कुंदराओं में बैठे फेसबुकिया बाबा हैं. अक्सर किसी प्रदेश के गवर्नर या कभी कभी देश के मुखिया बनने की भरपूर गुजांइश लिए लोग.
एक और होते हैं जो टैग करते हैं, मगर हम उनके बारे मॆं कुछ नहीं कहेंगे क्यूँकि यह काम अलग अलग उद्देश्यों से किया जाता है, हर बात में राजनिती नहीं होती. बात तो हमने निर्दलियों की भी नहीं की.
ये फेसबुक है कि राजनीत का अखाड़ा...हम भी कहाँ की लेकर बैठ गये..आप तो बस कमेंट करो जी!!
-समीर लाल ’समीर’
आज मार्च १६,२०१७ के भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे में

http://epaper.subahsavere.news/c/17556138
Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, फ़रवरी 19, 2017

जोगी रा सा रा रा रा

आज के जमाने के ७ वीं कक्षा के बच्चे की कॉपी में होली पर निबंध पढ़ने का मौका लगा.

कुछ अंश:

होली के दिन स्कूल की छुट्टी होती है. इस दिन हम मम्मी, पापा और उनके खूब सारे दोस्तों के साथ मिल कर पिकनिक पर जाते है. सब एक दूसरे से गले मिलते हैं और हैप्पी होली बोलते हैं. बच्चे दिन भर खूब खेलते हैं. पापा मम्मी और उनके दोस्त बीयर पीते है. केटरर खूब सारा खाना बनता है. डी जे वाला गाना बजाता है. सब लोग नाचते हैं. देर शाम को सब थक कर घर वापस आ कर सो जाते हैं...

ऐसा होली का बदला स्वरुप देखकर लगता है आने वाले दस पंन्द्रह सालों में गुजिया, सलोनी, टेसू के रंग, पिचकारी, अबीर गुलाल, काली स्याही, सिल्वर कलर आदि तो होली के नाम का साथ पूरी तरह से छोड़ देंगे. गुजिया, सलोनी की जगह बरफी, काजू कतली ने ले ली, भांग की जगह बीयर, रम, व्हिस्की ने ले ली और घर में पकते पकवानों की जगह केटरर की केटरिंग ने ले ली और जोगी रा सा रा रा के बदले डीजे गाना बजाने लगा और मोहल्ले सड़को पर नाचते गाते घूमते रंगों में सारोबार टोलियों की जगह पिकनिक और पिकनिक पर डीजे की धुन पर थिरकते लोगों ने ले ली है.

अब ये सब फिल्मों और टीवी के लिए बनते फिल्मी कार्यक्रमों में होली में दिख जाता है और एक एलिट वर्ग उसे ही घर में बैठ कर टीवी पर देखकर होली मना लेता है.

जोगिया को गुम हुए तो यूं भी एक अरसा बीता. यदा कदा व्यंग्य वाणों के तौर पर इसका इस्तेमाल होते दिख जाता है बस्स!!

उसी को याद करते जोगिया सी कुछ व्यंग्यात्मक कोशिश:

बाथरुम में झाँक के बोले अपनी ये सरकार
रेनकोट में नल के नीचे, बैठे हैं  सरदार
जोगी रा सा रा रा रा, जोगी रा सा रा रा रा

खोद रहे थे चला कुदाली, इत्ता बड़ा पहाड़
निकली चुहिया नाच के बोले, पकड़ा गई मक्कार.....
जोगी रा सा रा रा रा, जोगी रा सा रा रा रा

वेलेन्टाईन की शाम को उनको, चढ़ा प्रेम खुमार
रात गुजारी साथ साथ में, सुबह हुई तकरार..
जोगी रा सा रा रा रा, जोगी रा सा रा रा रा

दूध पिये भगवन की मूरत, भूखे मरते लोग
क्या अंधों का देश है, या अंधे भक्तो का लोक...
जोगी रा सा रा रा रा, जोगी रा सा रा रा रा

सच को झूठ बताने वाले, जीत रहे हैं जंग
सीएनएन को रोज झिड़कते, राष्ट्रपति जी ट्रम्प..
जोगी रा सा रा रा रा, जोगी रा सा रा रा रा

-समीर लाल ’समीर’

#जुगलबन्दी  #Jugalbandi
Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, फ़रवरी 15, 2017

मुख्य मंत्री का मुख

तामिलनाडू एक ऐसा राज्य है, जहाँ चुनाव नहीं हुए मगर मुख्यमंत्री स्वर्गवासी हो गईं इस हेतु मुख्यमंत्री पद संकट काल से गुजर रहा है.. राज्यपाल लाइम लाईट में हैं..सब दावेदार उनसे मिल जुल रहे हैं और वो अपना फैसला सुरक्षित रखे हैं. ऐसे कम ही मौके होते है जब लोग राज्यपाल निवास की तरफ टकटकी लगायें बैठे हों अतः जितना खींच सके की तर्ज पर खीचन का माहौल बना हुआ है.
टकटकी लगाये बैठी मुख्यमंत्री की मुख्य दावेदार एकाएक यात्रा पर निकल गईं जेल की...वो भी चार साल के लिए और उनकी दावेदारी अब दस वर्षों के लिए स्थगित रहेगी न्यायालीन फैसले के चलते. मगर दस साल का क्या है? सत्ता की चाह ऐसी शै है कि दशक मिनटों में गुजर जाते हैं? और उम्र भी कोई खास नहीं..६१ बरस..राजनीति में तो यह उम्र अभी सीख रहा हूँ...मेरा साथ दीजिये भाईयों बहनों वाली होती है...जब यात्रा से वापस आकर सन्यास पूर्ण करेंगी, ७१ वर्षीय युवा नेत्री के हाथ फिर प्रदेश की कमान होगी. ये मैं नहीं कह रहा...मेरी राजनीतिक विषयों पर विशेषज्ञ कलम कह रही है...हम तो बस निमित्त मात्र हैं...
अम्मा का स्वर्गवास विचलित करने वाला निकला...खास कर उत्तर भारतियों के लिए...उनके आशीर्वाद प्राप्त नव मुख्यमंत्री के नाम का उच्चारण करना अभी सीख ही रहे थे कि शशीकला के जेल जाने से उछले एक नये नाम को सीखने की जुगत में लगे हैं. अब दर रोज नये नये नाम बोलना सीखें कि उत्तर भारत में हो रहे चुनाव की सोचें.
सोचने की बात से एक सोच उभरी कि मृत्यु से बड़ा पाप विनाशक कोई भी नहीं. गंगा में नहा कर भी पापी पापॊ कहला सकता है मगर जीते जी भले ही जनता यान्यायालय आदि आपको पापी, दुष्ट, अपराधी घोषित कर दें किन्तु मृत्यु के भुजपाश में जाते ही आप स्वर्गवासी हो जाते हैं. आज तक नरकवासी होते किसी को नहीं सुना...एकदम खाली खाली सी..सूनसान जगह होगी..
दक्षिण से दिमाग हटे तो चार और राज्य ऐसे हैं जहाँ माहौल गरम है. मगर वहाँ मुख्यमंत्री पद का सवाल अभी उलझा नहीं है अतः राज्यपाल अभी लाइम लाईट में नहीं हैं.
अधिकतर जनता वोट डाल चुकी है या डाल रही है...जाने कौन सत्तासीन होगा और जाने कौन मुख्य मंत्री मगर नूरा कुश्ति के नतीजे के लिए इन्तजार लगा है और अनुमानों का बाजार गर्म है.
अनुमान का क्या है वो तो हम भारतवासियों का शगल है..और अनुमान भी ताल ठोक कर लगाते हैं कि बॉस, गलत निकल जाये तो आधी मूँछ मुड़ा कर शहर घूमा देना.
पनवाड़ी की दुकान पर चर्चा चल रही है कि हमसे पूछो हम बताते हैं..नोट करो.. पंजाब में झाडू आ रही है...गोवा में झाडू आई ही समझो ..थोड़ा ऊँच नीच हुई तो कांग्रेस है ही...बाहर से टेका लगा देगी तो भी चल जायेगा....उत्तराखण्ड तो सब जानते ही हैं कि क्या होना है..(ये स्टेटमेन्ट इसलिए कि कोई नहीं जानता है) ..और फिर यूपी..उसके लिए क्या कहें...
अब बताओ..इसमें पंजाब छोड़ क्या नोट करें?
चैलेन्जर सामने से बोल रहा है कि ये जो यूपी में कमल है न भैय्या...कीचड़ मे खिलता है..सोच लेव!! साईकिल से जाकर हाथ से तोड़ोगे तो साईकिल भी और पंजा भी, दोनों कीचड़ में सन जायेगा...खुद से टूटा तो वहीं कीचड़ में गिर कर रह जायेगा...एक्के तरीका है कि हाथी जाये..और अपनी सूँड़ से तोड़कर लाये तो ही सुरक्षित आ सकता है...हाथी का कीचड़ में सना पाँव तो यूँ भी वेदों में पवित्र और दिव्य माना गया है...
चैलेन्जर ने दर्शन शास्त्र की बुद्धिजीवी टाईप बात कर दी है...पान की दुकान से भीड़ छट चुकी है...
सड़क पर हर तरफ पान की पीक के निशान नजर आ रहे हैं...

-समीर लाल ’समीर’
Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, फ़रवरी 12, 2017

रिंग टोन: खोलती है राज आपके व्यक्तित्व का

कनाडा से इतर भारत में हर दूसरा मोबाईल फोन, रिंग टोन में गाना बजाता और सुनाता है. अब की भारत यात्रा में तरह तरह की रिंग टोन सुनते और उससे जुड़े फोनधारक के व्यक्तित्व का अध्ययन करते जो परिणाम आये, वह जनहित में प्रकाशित कर रहा हूँ..पुनः आप जैसे अपवादों को छोड़ कर: 
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे..
रिंग टोन रखने वाले लोग ऐसे लगे जैसे हजार पाप कर के गंगा जी में में डुबकी लगा कर समस्त पापों से मुक्ति पा लेने का आभास पाले पुनः नये पाप करने निकल पड़े हों...हर आने वाले फोन पर पिछले फोन काल पर किये पापो से मुक्ति और नये पाप करने का मार्ग सुद्दण होता नजर आता है इन्हें...
मेरे महबूब कयामत होगी...आज रुसवा तेरी गलियों में मोहब्बत होगी...
ये वो फ्रस्टेटेड बन्दे हैं जिन्हें इस बात पर कोई भरोसा ही नहीं कि उनकी मोहब्बत भी कभी कामयाब हो सकती है...उन्होंने वैसे भी अपनी मोहब्बत कभी कामयाब होने की तमन्ना से की भी नहीं...मानो और कुछ न सुझा और पिता जी लतिया रहे हों तो एल एल बी कर ली...फिर कहते फिर रहे हों कि वकालत दिमाग नहीं दलाली का काम है और वो हम से न हो पायेगा...अपना इन्फिरियारीटी काम्पलेक्स छिपायें भी तो भला कैसे?
बहारों फूल बरसाओ, मेरा महबूब आया है...
ये हर वक्त आलस्य की रजाई ओढ़े वो अलाल लोग हैं जो अपना काम दूसरों पर टाल में माहिर होते हैं. खुद कुछ करना नहीं...अरे प्रभु, महबूब तुम्हारा आ रहा है तो फूल भी तुम ही बरसाओ, बहारों को क्यूँ घसीटते हो..उनका काम फूल खिलाना और उसकी महक फैलाना है और तुम हो कि अपना काम उन पर डाले दे रहे हो..
सुन रहा है न तू, रो रहा हूँ मैं..
ये महाराज अपनी प्रेमिका और पत्नी से झूठ बोलने में महारत हासिल कर चुके हैं...रो वो कुछ नहीं रहे हैं..दोस्तों के साथ ही बैठे बीयर पी रहे हैं और जैसे ही रिंग टोन बजी...बस...मानो कि किसी गायक को हारमोनियम पर किसी ने स्केल दे दिया हो..साआआ...और फिर उसी स्केल पर इनका गीत शुरु...जानूं, सुन रही हो न...आई एम मिसिंग यू सो मच...और यह बोलते हुए भी..पठ्ठा दोस्तों आँख मार कर बता रहा है कि उसका फोन है...
सीटी बजने की आवाज...
सारी जिन्दगी सीटी बजाकर किसी को पलटवाने की ख्वाहिश पाले वो भयभीत इन्सान जिसे आजतक ठीक से सीटी बजाना भी नहीं आ पाया कभी..बस...इसे ऐसा समझे कि हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले...दम तो खैर क्या निकलता...हर काल पर अब सीटी जरुर निकल जा रही है...
पुराने जमाने वाले फोन की घंटी...ट्रिन ट्रिन...
काश!! कि वो दिन लौट आयें..हमारा जमाना ही कुछ और था..का नारा बुलंद करने वाले और.नये जमाने से साथ कदम ताल न मिला सकने की वजह से पुराने जमाने के पल्लु में मूँह छिपाये उसी फोन की ट्रिंन ट्रिन सुन रहे हैं..इनके पास उस जमाने के किस्सों के सिवाय कुछ भी नहीं.
वाइब्रेशन मोड में हूम्म्म्म्म्म, हूम्म्म्म की आवाज करता फोन...
न छिपा पाये..न बता पाये...बस यूँ ही हूम्म्म हूम्म में जिन्दगी बिता आये,..अरे, इत्ता तो सोचो..कि उपर जाकर क्या जबाब दोगे...न घंटी बजी और न ही चुप रहे......ये बड़े खतरनाक टाईप के लोग होते हैं मानो कि कोई निर्दलीय उम्मीदवार..क्या पता कब सरकार का समर्थन कर दे...या कब विरोधियों के खेमे में जाकर सरकार गिरा दे....
साईलेंट मोड पर रखा हुआ फोन..
अपने हक की भी तिलांजलि दिये हर हाल में कम्प्रोमाईज़ किये ...बेवजह खुद को खुश दिखाने वाले...और अन्दर से इतना मायूस कि कहीं कोई उनकी खुशी देख कर नाराज न हो जाये...इस हेतु आने वाले फोन को झुठलाते लोग...जो बाद में उन्हीं मिस हुये कॉलों को फोन करके माफी मांगेगे कि भाई, कहीं व्यस्त था जरा!! सॉरी..
अब सौंप दिया इस जीवन का, सब भार तुम्हारे हाथों में..
ये रिंग टोन इस यात्रा के दौरान जब अपनी पत्नी के फोन से सुनी तो लगा कि शायद, भारत घुमाने लायें हैं इस हेतु अनुग्रहित टाईप हुई लगा ली होगी रिंग टोन...मगर असल मायने कनाडा लौट कर समझ आया...जब सारा सौंपा हुआ भार क्रेडिट कार्ड के बिल रुप में सामने आया ..उस खरीददारी का जो इनने भारत में की थी...अब जो भार हमारे हाथों में सौंपा है सो तो उतारना ही है...

खैर...और अनेकों रिंग टोन सुनाई पड़ी...जैसे बेबी डॉल मैं सोने की...उनका व्यक्तित्व आप आंकिये ...

-समीर लाल ’समीर’

-Published in subahasavere Bhopal me 11 Feb, 2017 
Indli - Hindi News, Blogs, Links

शनिवार, फ़रवरी 11, 2017

कैसा तेरा प्यार- कैसा गुस्सा है तेरा


सुबह जब मैं उनके घर के सामने से निकला तो भैय्या जी दण्ड बैठक लगा रहे थे..११०, १११ उनके बाजू में खड़ा उनका चेला दण्ड की गिनती गिन रहा था. सामने दालान में ही एक चूल्हे पर मावा मिला दूध औंटाया जा रहा था. आजकल रोज सुबह हजार दण्ड लगाने के बाद भैय्या जी की सरसों के तेल से मालिश होती है. फिर कुनकुने पानी से स्नान कर औंटाया हुअ दूध ग्रहण करते हैं और इस तरह उनके दिन की शुरुआत होती है.
फिर चेलों की आवाजाही शुरु हो जाती है. योजनायें बनती हैं. चेले लठ्ठ को तेल पिला रहे होते हैं और भैय्या जी कान खोदते, बतियाते पान चबा रहे होते हैं.
पूछने पर पता चला कि त्यौहार की तैयारी चल रही है. आश्चर्यजनक तौर पर कोई त्यौहार तो आस पास आता दिखता न था. नागपंचमी भी आने में तो पूरा आधा साल बाकी है कि उस वजह से पहलवानी की तैयारी कर रहे हों.
हाँ, चुनावी माहौल जरुर है चारों ओर और उसके लिए इस तरह की तैयारी भी मुफ़ीद है.  मगर भैय्या जी ने चुनाव को कभी त्यौहार का दर्जा नहीं दिया. वो उनकी जीवन शैली है, उनकी धड़कन है ओर उनके जीवन यापन का साधन है. चुनाव हैं तो बाकी सब त्यौहार हैं वरना तो यह जीवन ही बेकार है कि तर्ज पर जीने वाले भैय्या जी, राजनिती के बाहुबलियों की बस्ती के सरगना हैं, जिन पर अनेकों हत्याओं और बलात्कार के मामले दर्ज हैं.  उनके लिए चुनाव उनका एक ऐसा दायित्व है जिसे निभाने के लिए वह इस मृत्युलोक में पधारे हैं और इसी दायित्व के चलते कितने लोगों को मृत्यु के घाट तक पहुँचा आये हैं, वो भला चुनाव को त्यौहार मानें, न!! ऐसा हो ही नहीं सकता.
अतः मन की शांति के लिए पूछना ही पड़ा कि भैय्या जी किस त्यौहार की तैयारी में जुटे हैं?
पता चला कि वेलेन्टाईन डे की तैयारी कर रहे हैं. दो दिन बचे हैं बस!! एकदम युद्ध स्तर पर तैयारियाँ चल रही हैं.
हमारे तो पाँव तले धरती ही खिसक गई. अगर मोहब्बत की उम्र की एक्सपायरी का आधार नेताओं की मोहब्बत की कहानियों से भी उठाये तो भी ६० बसंत से उपर तो क्या तय कर पायेंगे कुछ अपवादों को छोड़ कर. इस आधार पर भी मोहब्बत की एक्सपायरी डेट पार किये भैय्या जी को लगभग आधा दशक से उपर बीत चुका है.
ऐसी उम्र में वेलेन्टाईन डे? क्या मूँह दिखायेंगे घर परिवार में ये? हालांकि राजनेताओं को इन सब बातों की चिन्ता तो होती नहीं है, यह सब तो आप हम जैसे आमजनों के लिए बनाई गई सामाजिक बाध्यतायें हैं.
फिर भी भैय्या जी इतने उत्साह्पूर्वक वेलेन्टाईन डे का त्यौहार मनाने की तैयारी करें, वो भी ऐसे कि जब नव युवा प्रेमी नये कपड़े बनवा रहे हैं, गिफ्ट खरीदने की तैयारी कर रहे हैं, गुलाब के बुके पसंद कर रहे हैं, तब भैय्या जी दण्ड लगाकर और मालिश करा कर बदन बना रहे हैं, दूध औंटा कर मावे डाल कर पी रहे हैं, फूल की जगह लठ्ठ सजा रहे हैं तेल पिलवा कर...अजब तरीका है भैय्या जी का. बाहुबलियों की बात यूँ भी निराली होती है. यह तो खुश हों तो बंदुक दागें, गुस्सा हों तो बंदुक दागें...शायद इन्हीं की प्रेमिकायें गाती होंगी... कैसा तेरा प्यार कैसा गुस्सा है तेरा, तौबा सनम तौबा सनम…
वेलेंटाईन डॆ के दिन हम भैय्या जी के घर के सामने पेड़ के नीचे खड़े हो गये यह देखने के लिए कि क्या नजारा बनेगा इनके इस उम्र में वेलेन्टाईन डे मनाने के जोश का…
कुछ ही देर में भैय्या जी अपने सैकड़ों चेलों के साथ लट्ठ लिये निकलते दिखाई दिये…जय श्री राम का नारा आकाश में गुंजायमान हो गया..
शाम को टीवी में शहर भर के हजारों प्रेमी प्रेमिकाओं के पीटे जाने की खबर ब्रेकिंग न्यूज बनीं और भैय्या जी अपने साथियों के साथ प्रेस कांफ्रेस करते नजर आये…हम अपनी संस्कृति से खिलवाड़ नहीं होने देंगे.
-समीर लाल ’समीर’
#jugalbandi #जुगलबन्दी


Indli - Hindi News, Blogs, Links