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शनिवार, अक्टूबर 12, 2019

हर साल नकली रावण को नकली राम ही मारते आ रहे



बचपन में वह बदमाश बच्चा था. जब बड़ा हुआ तो गुंडा हो गया. और बड़ा हुआ तो बाहुबली बना. फिर जैसा कि होता है, वह विधायक बना और फिर मंत्री भी. नाम था भगवान दास.
रुतबे और कारनामों की धमक ऐसी कि पुलिस भी काँप उठे. कम ही होते हैं जो इस कहावत को धता बता दें कि पुलिस से बड़ा कौन गुंडा. भगवान दास उन्हीं कम में से एक थे. लोग बताते थे पुलिस भी गैरकानूनी मसले सुलझाने के लिए उन्हीं की शरण लेती थी.
धता बताने को तो वो खैर इस मान्यता की भी धज्जियाँ उठा डालते हैं कि ’यथा नामे तथा गुणे’. मगर उसमें उनकी गल्ति नहीं कहूँगा वो तो आज कल का प्रचलन है जो नाम दो होवे उसका उल्टा. चाहे वो फिर ’विकास’ हो या ’स्वदेशी’.
भगवास दास के क्षेत्र में दौलत राम, नाम में यहाँ भी वही झोल है, नामक एक अत्यन्त निर्धन एवं दलित व्यक्ति रहता था. दौलत राम भगवान दास के अहाते की साफ सफाई और चाय पान लाने का काम कर दिया करता था और बदले में कुछ धन पा जाता था जीवन यापन करने को. भगवान दास उसे दौलत के बदले दो लात पुकारता और हो हो करके हँसता. गरीब की किस्मत, उसके हो हो के साथ साथ दौलत राम भी मुस्करा कर रह जाता. 
पुनः गरीब की किस्मत कि भगवान दास ने दौलात राम की पत्नी को देख लिया. ठीक ठाक नाक नक्श और भगवान दास को अपने रुतबे का नशा. नशे में ठीक ठाक कुछ ज्यादा ही मन भावन लग जाता है. अतः उठवा लिया. भगवान दास प्रचलन के अनुरुप नाम के विपरीत रावण हो गये. दौलत राम नाम में भर राम लिये बैठे रहे. न तो रावण का कुछ बिगाड़ पाये और न पत्नी को बलात्कार का शिकार होने से बचा पाये.
दौलत राम और उसकी पत्नी बाद में पुलिस से लेकर हर तरफ गुहार लगाते रहे. एक दिन थाने जाते समय उनके रिक्शे को किसी ट्रक ने टक्कर मार दी और दौलत राम की ईहलीला समाप्त हुई. उसके बाद उसकी पत्नी कहाँ गई, किसी को पता ही न चला. किसी ने कहा कि धरती फट गई और उसमें समा गई और किसी ने कहा कि आसमान लील गया. अखबार से लेकर टीवी तक सब इस हो हल्ले के बाद पुनः भगवान दास की अर्चना में जुट गये. भगवान दास मंत्री के साथ साथ आतंक का पर्याय बन गये. मंत्री हैं इसलिए आतंक है या आतंक है इसलिये मंत्री है, यह कहना जरा कठिन कार्य है.
इधर दशहरा आया. भगवान दास ने नई बुलेट प्रुफ कार खरीदी. फैशनानुरुप उसका पूजन किया गया. नींबू मिर्च की झालर टांगी. फिर नये प्रचलन के हिसाब से अपने आंगन के पिछले कमरे में अपने शस्त्रागार में एक लाईसेंसी बन्दूक, बाकी बिना लाईसेंस की तीन माऊजर, कई देशी कट्टे, सैकड़ों पैट्रोल बम और सुअर मार बम, गोलियाँ के बक्से, तलवार, बका आदि के बेहिसाब असले का शस्त्र पूजन किया. अब इस तरह की शस्त्र पूजा खुल कर तो कर नहीं सकते थे अतः हड़बड़ी में पूजन करते करते दीपक हाथ से छूट गिर पड़ा. बम दनादन छूटने लगे. भगवान दास उसी में फंस कर अपने चिथड़े उड़वा बैठे. ठीक उसी वक्त रामलीला मैदान पर रावण का पुतना धूँ धूँ कर जल उठा.
असली नकली दोनों रावण मारे गये. शहर भर में भगवान दास के मरने की खबर बिजली की तरह फैल गई.
लोग आपस मे फुसफुसाये कि भगवान के घर देर है मगर अँधेर नहीं. इस वक्त वे असली भगवान के घर की बात कर रहे थे. इस तरह से बात स्पष्ट करते रहना आज के युग की जरुरत हो गई है.
लोगों की आस्था कलयुग के एक अदृश्य राम में बहुत अरसे के बाद पुनः जाग उठी. वरना तो नकली रावण को नकली राम हर साल मारते ही आ रहे हैं.
-समीर लाल ’समीर’  
भोपाल के दैनिक सुबह सवेरे के रविवार अक्टूबर १२, २०१९ के अंक में प्रकाशित
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रविवार, जून 23, 2019

बिना सेल्फी के सभी योगा बेकार हैं



कल कलेक्टर साहब शाम को ही बोतल खोल कर बैठ गये. कहने लगे कि आज जल्दी सोना है. सुबह ५ बजे से अंबेडकर मैदान में योगा डे की ड्यूटी लगी है. वैसे भी जल्दी सोना और जल्दी जागना स्वास्थय के लिए बहुत लाभदायक है. ये खासियत है हमारे देश की. अगर बिजली चली जाये तो हम अँधेरे के फायदे गिनाने लगते हैं. २ पैग लगाये और फिर तो ऐसी ज्ञान वर्षा की कि मैं तो सुनते सुनते ही फिट महसूस करने लगा.
कहने लगे कि मैं तो आज की शिक्षा प्रणाली से सहमत नहीं हूँ. हमारे वक्त में स्कूल में हमें हफ्ते में जहाँ दो दिन पीटी कराई जाती थी, वहीं हर दिन पीटा भी जाता था. उससे मांस पेशियाँ मजबूत होती थी. कम से कम तीन दिन ३० -३० मिनट मुर्गा बनने से खून का प्रवाह ठीक रहता था. हाल ही में एक अमेरीकन वैज्ञानिक ने शोध करके बताया कि कान पकड़ कर उठक बैठक करने से न सिर्फ दिमाग तेज होता है वरन अल्ज़ाईमर जैसी बीमारियों से भी बचाव होता है. हम तो हर रोज किसी न किसी पीरियड में ५० -५० उठक बैठक लगाते पाये जाते थे. कितनी बार स्कूल के पूरे मैदान के १० चक्कर लगाने के लिए मास्साब भेजा करते थे.
सुनते सुनते मूँह से निकल गया कि सर!! इसका मतलब तो यह लग रहा है कि आप स्कूल के जमाने में बहुत बदमाश रहे होंगे?
कहने लगे- अरे नहीं, वह तो सब बाल सुलभ नादानियाँ थीं. तब जरुर लगता था कि बेवजह छोटी छोटी बातों पर मास्साब सजा दे रहे हैं मगर अब जाकर पता चला कि वह तो हमें स्वास्थय दे रहे थे. हमसे योगा करवा रहे थे ताकि हमारी उर्जा सही दिशा में प्रवाहित की जा सके. धन्य थे वो शिक्षक. इतना कहते कहते कलेक्टर साहब भावुक हो गये और उनका गला रुँध आया. शायद यह तीसरे पैग का असर था कि उनकी आँखें नम थी और वह अपने पाठशाला के मास्साब को याद कर रहे थे. याद करते हुए उन्होंने अपनी तोंद पर याद फिराया और कहने लगे कि उनके बाद किसी ने मेरे स्वास्थय की परवाह न की. स्कूल क्या छूटा जैसे स्वास्थय वहीं छूट गया हो.
मैने उनको याद दिलाया कि सर, कल ५ बजे आपको अंबेडकर मैदान पहुँचना है. मगर वो अब मूड में आ चुके थे. मेरी मर्जी मैं जब पहुँचू, कोई मेरा क्या कर लेगा? वो ४ था पैग बना कर शुरु हो गये अंबेडकर जी गुणगान करने. इनके कारण आज मैं कलेक्टर हूँ. बहुत सम्मान है इनके प्रति मेरे दिल में. इन्होंने ही हम दलितों को समाज में सही स्थान दिलाया. यह मेरा सौभाग्य है कि कल मैं अंबेडकर मैदान में योगा डे में सम्मलित हूँगा. तब जाकर समझ आया कि स्कूल के दिनों का इतना बदमाश बालक आज कलेक्टर कैसे बना.
उसके बाद उन्होंने योगा के फायदे गिनाये. कई आसान हाथ से पोज बनाकर समझाये. चौथा पैग भी खात्मे की तरफ ही था. अतः उनकी जुबान भी कई बार योगा पोज बना कर लचक कर लड़खड़ा जा रही थी. टेबल से गिलास उठाने और रखने में ऐसा लगता कि ऐसा पोज तो रामदेव भी न लगा पायें. फिर उन्होंने यह ज्ञान भी दिया कि योगा करने के लिए कहीं जाने की या कुछ करने की जरुरत नहीं है.
योगा जीवन शैली है. आप कुर्सी पर बैठे हो, बिस्तर पर सोये हो, नहा रहे हो, खाना खा रहे हो, टीवी देख रहे हो. बस ऑपर्च्युनिटी खोजो. अगर आप ध्यान से सजगता के साथ मौका तलाशोगे तो हजारों पोज बनाने के मौके हाथ लगेंगे. बस हो गया योगा. इतनी गर्मी पड़ रही है. ऑपर्च्युनिटी है इसमें भी. फटाफट हॉट योगा कर लो. इसे कोसो मत. विदेशों में लोग हीटर लगा कर इतनी गर्मी पैदा करते हैं हॉट योगा करने के लिए. वाटर योगा, स्लीपिंग योगा, ईटिंग योगा, टॉकिंग योगा, वाचिंग योगा, लॉफिंग योगा. अवसर ही अवसर चौतरफा फैले पड़े हैं. बस जरुरत है आपको आँख खुली रखने की और मौके पर पोज़ बनाकर सेल्फी उतारने की. बिना सेल्फी के सभी योगा बेकार हैं, यह बात गांठ बांधने योग्य है.
यह बताते बताते साहब की आँख धीरे धीरे मुँदती जा रही थी. वो स्लीपिंग योगा मोड में जा रहे थे शनैः शनैः. अंतिम कुछ वाक्य जो लड़खड़ाती जुबान से ठीक ठीक सुनाई नहीं दिये वो शायद रोजगार के अवसर, इनोवेशन और आर्टिफिशियल इन्टेलिजेन्स जैसे मसलों को योगा के जोड़कर सोचने पर गंभीर बयान थे. सुबह तक तो उनको याद भी न रहेगा वरना पूछ कर क्लियर कर लेते.
 उन्होंने किसी तरह ईटिंग योगा के तहत मुर्गा मटन दबाकर खाया और गेस्ट हाऊस में कमरे में सोने निकल लिए.
सुबह सुबह अंबेडकर मैदान जावेंगे. खादी की मैट पर एडीडास का योगा ऑउटफिट पहन कर जमीन पर बैठ पाने की अवस्था उनकी है नहीं. तोंद आड़े आ जाती है. अतः उन्होंने पार्किग व्यवस्था का जिम्मा अपने सर ले लिया है. शाम को उन्हें मुख्य मंत्री के कर कमलों से विश्व योगा दिवस पर सम्मलित होने हेतु एक प्रमाण पत्र दिया जायेगा एवं योग के प्रचार प्रसार में उनके योगदान हेतु उन्हें सम्मानित किया जायेगा. इस अवसर पर मुख्यमंत्री के साथ उनकी तस्वीर खींची जायेगी जो कि कलेक्टर साहब अपने दफ्तर में ले जाकर टागेंगे. इससे उनके मातहत और शहर की जनता योग हेतु प्ररित होगी.
-समीर लाल ’समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जून २३, २०१९ में



चित्र साभार: गुगल Indli - Hindi News, Blogs, Links

शनिवार, जुलाई 08, 2017

अनेकता में एकता टाईप...एक देश एक टैक्स जी एस टी

जूते पर १८ प्रतिशत जीएसटी..मगर जूते अगर ५०० रुपये से कम के हैं तो ५ प्रतिशत जीएसटी..इसका क्या अर्थ निकाला जाये?
५०० से कम का जूता पैरों में पहनने के लिए हैं इसलिए कम टैक्स और महँगा जूता शिरोधार्य...इसलिए अधिक टैक्स? 
एक देश एक टैक्स के जुमले की बरसात में एक वस्तु अनेक टैक्स टिका गये और लोग जान ही न पाये..
एक देश एक टैक्स का छाता और उसमें से बरसात की बूँदों की तरह बाजू बाजू से सरकती अनेकों टैक्स स्लैबों की बूँदें..आम जन समझ ही नहीं पा रहा है कि ये कैसा एक टैक्स है? अनेकता में एकता टाईप...
आमजन को सरल भाषा में समझाने के लिए कुछ यूं समझाना होगा कि जैसे सरकार का कहना है कि अब तक का पूरा विकास इस बरस की भारी बरसात के कहर के चलते बरसात के बट्टे खाते में चला गया है....
लेकिन सर किसान तो वैसे ही सूखे की मार से मर रहा है और आप कह रहे हैं कि बरसात का कहर हुआ है...पत्रकार पूछ रहा है..
सरकार कह रही है कि देखिये सूखा दीगर मामला है. उसे विपक्षियों नें राजनेतिक रंग दे दिया है. सूखा गरमीसे पड़ता है और बरसात बारिश से होती है..ये दोनों विपरीत मामले हैं..अतः पहले आपको यह तय करना होगा कि आप सूखे पर बात करना चाहते हैं या बरसात पर. दोनों अलग अलग मुद्दे हैं. आप हर बार पाकिस्तान से संबंध और आतंकवाद से निपाटारा की तरह दो बातों को मिला जुला देते हैं फिर तो कन्फ्यूजन होगा ही. आप सूखे की बात अगले इन्टरव्यू में करियेगा..अभी गीले की करिये..
अभी आप यूँ समझें कि हमारे वैज्ञानिक गुप्त कमरे में बन्द सुबह शाम इस हेतु कार्य में लगे हैं कि किस तरह से हम बरसात के कहर से मुक्ति पायें. जल्द ही हम भारत को बरसात मुक्त करा देंगे.
हम आपको बताते हैं कि किसान को बरसात से अपनी डिपेन्डेन्सी हटानी होगी. इस देश को विदेश बनाने के लिए इतना त्याग तो करना ही पड़ेगा. उन्हें अपने खेतों को सींचने के लिए ट्यूब वैल, नदियों और नहरों के पानी पर अपनी निर्भरता बढ़ानी होगी. उन्हें अपने खेतों में स्प्रिंकलर लगाने होंगे..ताकि खेत को लगे बरसात हो रही है मगर देश में बरसात हो ही नही रही हैं. देश बरसात मुक्त हो गया है. थोड़ा चकमा देना भी तो जरुरी है चाहे खेत हो या आम जनता..फिर देखो खेत कैसे अनाज देता है जैसे आम जनता वोट देती है!!
अब आप ही देखो एक बार ऐसे ही गुप्त कमरे में बन्द होकर हमने नोटबन्दी करके जो पाना चाहा वो भले न हुआ हो मगर जनता को एहसास करा दिया कि काले धन के रुप में छुपे नोटों की बैक खातों में बरसात हो गई है और सब काले नोट निकल आये हैं. परिणाम ये हुआ कि यूपी के चुनाव में वोटों की बरसात हो गई. 
मगर बिना बरसात के ट्यूब वैल, नदी, नहरों में भी पानी कहाँ से आयेगा सर? पत्रकार ने अपनी आशंका जताई.
आयेगा आयेगा..भरोसा रखने से आयेगा..आखिर बिना काले धन की वर्षा हुए भी यूपी में गर्जन से साथ वोट वर्षा हुई ही न..वोट आये ही न!!
पानी की आप चिन्ता न करें..उसके लिए हम बातचीत कर रहे हैं. हमें अपने किसान भाईयों की चिन्ता है. हमें चाहे कितना भी पानी आयात करना पड़े, हम आयात करेंगे और नदियों, नहरों और ट्यूब वैलों को लबालब भर देंगे.
हमारे देश की दाल जब विदेशी हो गई तो आपने देखा ही कि इस साल हमने कितनी दाल विदेशों से आयात की..मगर दाल की कमी न होने दी..भले ही महँगी मगर बाजार में थी तो न! 
इतना कुछ जानने सुनने के बाद में लगा...कि बस एक चूक हो गई...
बरसात के पानी पर कितना जीएसटी हो उसकी बात तो हुई न..फिर आयत वाले पानी पर कितना टैक्स रखा जाये वो कैसे तय होगा..
बस!! इन्तजार है सरकार दौरे से लौटे और इस पर भी जीएसटी में एक बदलाव की बरसात करे..
संशोधनों की बरसात तो खैर नित होनी ही है!!
-समीर लाल ’समीर’
भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे की जुलाई ९, २०१७ के अंक में:
http://epaper.subahsavere.news/c/20393977

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शनिवार, जून 17, 2017

भीतर कुछ तो गड़बड़ है जिसकी परदादारी है..


पहली ही मुलाकात में वे बड़े गर्व के साथ बता रहे हैं कि खेल ही उनका जीवन है और किरकिट में उनकी जान बसती है. रणजी से लेकर आई पी एल और वर्ल्ड चैम्पियनशीप सब खेलते हैं. उनकी नजर में कोई भी मैच छोटा बड़ा नहीं होता. वो २०-२०, डे नाईट, ५० ओवर, वन डे, ५ डे टेस्ट किरकिट को बस खेल मानते हैं. फॉर्मेट अलग हैं तो क्या, किरकिट तो किरकिट ही है न..वे बता रहे हैं. वे क्रिकेट को किरकिट कुछ इतने प्यार से कहते कि लगता कि दुलार में अपने प्यारे दुलारे बच्चे को पुकार रहे हैं.
हम भी बड़ा इम्प्रेस हुए कि बंदा, इतना बड़ा खिलाड़ी है और इतना डाउन टू अर्थ. ऐसे में संपर्क बढ़ाने की जिज्ञासा का जाग जाना स्वभाविक सी बात है. हमने उन्हें तुरंत ही सुझाया कि भाई जी, कभी फुरसत हो तो बतायें..हमारी मेहमान नवाजी स्वीकारें. घर आईये डिनर पर.. नम्बर का आदान प्रदान हो गया.
दो हफ्ते पहले उनका फोन आया और कहने लगे कि यार, आपको फोन न कर पाया. जरा ये चैम्पियन ट्राफी निपटा लूँ फिर मिलता हूँ.  हम तो नतमस्तक हो लिए कि बंदा चैम्पियन ट्राफी के बीच से समय निकाल कर फोन लगा रहा है. ऐसे होते हैं सच्चे मेहनती और जमीन से जुड़े लोग. दोस्ती निभाना जानते हैं. वरना तो आजकल के बड़े लोग, हमीं उनको चुनें, हमीं उनको बड़ा बनायें और नेता मंत्री बनते ही हमारे बीच ज़ेड स्क्यूरिटी लिए आयें.. हमीं से सौ गज की दूरी बनाकर.
पिछले हफ्ते फिर फोन आया कि पाकिस्तान से मैच है..आप भी आईये खेलने, मजा आयेगा. हम तो एकदम शरमा से गये..हमने कहा कि भाई साहब, आप तो मजाक कर रहे हैं. हम और क्रिकेट...बचपन से लेकर आजतक बल्ला गेंद सिर्फ इसलिए उठाया है कि भारतीय होने का धर्म निभाना है वरना तो इस खेल से क्या हमें तो किसी भी खेल से बचपन से कोई साबका नहीं रहा..बड़े होकर भी जरा बहुत खेले राजनीति का खेला ..वो भी बहुत रास न आ पाया..न तो चमड़ी इतनी मोटी दी प्रभु नें कि राजनीति कर पायें और न ही काया इतनी पतली कि क्रिकेट खेल पायें.
वे हँसने लगे..कहने लगे कि आप आईये तो ..गाड़ी भिजवा देंगे आपको लेने. शहर के सभी गणमान्य आवेंगे खेलने..सबसे परिचय भी हो जायेगा..चलिये आप मत खेलियेगा मगर देखने और एन्जॉय करने से कैसा परहेज...कुछ ड्रिंक, डिनर ही हो जायेगा साथ साथ..अब इससे भला कैसे इंकार करते कि भाई साहब का खेल भी देख लेंगे और साथ में वी वी आई पी महफिल में शामिल भी हो लेंगे.
गाड़ी आई लेने और पहुँचे हम ..तो माहौल देख कर दंग रह गये..शहर के सभी नामी गिरामी जमा हुए हैं..सामने बड़े स्क्रिन पर मैच चालू है..शराब और खाने की महफिल जमीं है,..वो नेता जो अपनी प्रजा के बीच जेड़ सिक्यूरिटी लिए आते हैं, यहाँ सबके बीच बिना किसी परवाह के गिलास पर गिलास चढ़ा रहे हैं और नेता से अधिकारी से व्यापारी तक सब व्यस्त हैं सट्टा खेलने में..सट्टा खिलाने वाले फोन पर बुकिंग लिए जा रहे हैं ..१ के ५ का भाव..पूरे मैच का..फेन्सी किरकिट खेलने वाले हर बाल और ओवर पर सट्टा लगा रहे हैं..करोड़ों के वारे न्यारे हो रहे हैं..भाई साहब के घर के बाहर पुलिस और सिक्यूरिटी का सख्त पहरा वैसे ही है जैसे नेता के आसपास जेड सिक्यूरिटी का होता है. जाने किसको संरक्षण मिल रहा है ..सट्टा खिलाने वालों का या खेलने वालों का..मगर जब दोनों की हमजोली इतनी उजागर हो तो दोनों को ही मिल रहा होगा.. 
मानों ये पहरा वो पिंजरा हो जिसमें शेर बंद है कि झप्पटा मार कर आपको नुकसान न पहुँचा दे और नेता समझ रहा है कि उसे जनता से सुरक्षित किया जा रहा है..
यूँ भी पुलिस और सिक्यूरिटी का पहरा अक्सर ही यह गवाही देता है कि भीतर कुछ तो गड़बड़ है जिसकी परदादारी है..

समीर लाल ’समीर’

भोपाल के दैनिक सुबह सवेरे में तारीख १८ जून, २०१७ को प्रकाशित 
http://epaper.subahsavere.news/c/19883575


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शनिवार, मई 13, 2017

टॆलीफोन



टॆलीफोन विषय पर यह निबंध क्लास ५ की रंजू की उत्तर पुस्तिका से उड़ाया है.
टॆलीफोन मुख्यतः तीन प्रकार के होते हैं. एक आई फोन, दूसरा सेमसंग और तीसरा अन्य.
इसे ऐसे समझे जैसे भारत में तीन प्रकार के लोग होते हैं- एक नेता, दूसरे उनसे गाढ़े संबंध रखने वाले व्यापारी और बाकी के अन्य.
आई फोन एक स्टेटस सिंबल..सब कुछ इन्हीं के इर्द गिर्द नाचता, सेमसंग गुणवत्ता का प्रतीक ये न टेका लगाये तो स्टेटस वालों की स्टेटस भी न बन पाये और बाकी चायनीज फोन से लेकर नोकिया तक अन्य..हैं तो ठीक ..न हैं तो ठीक..काम हैं आई फोन और सेमसंग को उनके उचित स्थान पर बनाये रखना.
फोन हमारे जीवन में बहुत उपयोगी हैं. फोन का मुख्य इस्तेमाल स्लेफी लेना है. इस्तेमाल की द्वितीय पायदान पर स्लेफी को शेयर करने से लेकर औरों की फोटो खींचना, चैट, व्हाटसएप, एस एम एस, फेसबुक, नेट, इन्स्टाग्राम, ट्वीटर, पिन, वेब सर्फिंग, नेवीगेशन, स्काईप, फेस टाईम आदि है. इस्तेमाल की एक प्रमुख कड़ी जो दूसरी पायदान को बराबरी से शॆयर कर रही है वो है एम एम एस बनाकर ओर बात रिकार्डिंग कर के ब्लैक मेल करना है. तीसरी पायदान पर गाने सुनना है. इसके बाद ऑन लाईन आर्डर, मूवी टिकिट,  बैंकिंग, रेल्वे से हावाई जहाज की यात्रा आदि आता है. चौथी ओर अन्य पिछड़ी पायदानों पर मौसम की जानकारी, केलकूलेटर एप के बाद ऑन लाईन पोलिंग, गेम्स और  मिस्ड काल का नम्बर आता है. अंतिम पायदान पर कुछ लोग इसका इस्तेमाल, अगर मिस्ड काल का जबाब न आये और काम अपना अटका हो तो, फोन लगा कर बातचीत के लिए भी करते हैं.
सब्जी और अन्य जरुरत की चीजें जो खराब होने और खत्म हो जाने पर खरीदी जाती हैं के विपरीत फोन नये फोन के माँडल आ जाने पर परिवार में और आपकी समाज में स्टेटस के हिसाब से खरीदा जाता है.
मैं एक आई फोन परिवार का हिस्सा हूँ. हमारे घर में मम्मी के पास लेटेस्ट आई फोन ७ है. पापा के पास उसके एक पहले वाला आई फोन ६ एस है..और उनका पुराना आई फोन ६ मेरे पास है. यह क्रम इसी क्रम में नये मॉडल आने पर बदल जायेगा जैसे की अब तक बदलता रहा है.
मम्मी के पास सेल्फी के लिए एक सेमसंग का लेटेस्ट मॉडल भी है. पापा सेल्फी कम खींचते हैं मगर उनका काम आई फोन से चल जाता है.  उनकी सेल्फी भी अक्सर मम्मी ही सेमसंग से खींच देती हैं. उनके पास एक फोटोशाँप ५०३० है जो ५० साल के इंसान को ३० साल का बना कर दिखाता है. वो अपनी और पापा की सेल्फी इस साफ्टवेयर से पास करा कर शॆयर करती हैं. मित्रों की वॉव और लाईक ही उनके जीवन का लक्ष्य है.
मेरे फेस बुक पर मेरी क्लास के बहुत बच्चे ओर २०० अलग से फ्रेंण्ड हैं. आश्चर्य है कि इनमें से ११ लोगों को मैं पर्सनली भी जानती हूँ. इट इज ए बिग एचिवमेन्ट इन दिस फोन ऐरा....आई फील प्राऊड...कितनी लकी हूँ न मैं....कभी कभी सेलिब्रेटी वाली फीलिंग आती है.
अगर ये फोन न होता तो दुनिया कितनी सूनी होती...मैं तो कल्पना भी नहीं कर सकती. तब मैं भला अपने बेस्ट फ्रेण्ड  राहुल से कैसे कनेक्ट हो पाती?? आई कान्ट इवन थिंक...वैसे मिली तो अभी नहीं हूँ उससे मगर उसके बिना कितना अधूरा सा होता ये जीवन!!
राहुल का सपना है कि एक दिन वो ऊबर टैक्सी चलायेगा..काश!! किसी दिन जब मैं अकेली टैक्सी बुलाने लगूँगी..तब राहुल ड्राईव करता हुआ मेरे दर पर आये..
आई एम सो एक्साईटेड...इस फोन ने जीवन को कितना रसमय बना दिया है..एक परपज दिया है जीने का..
कैसे होंगे उस युग के लोग जब आई फोन और सेमसंग नहीं रहा होगा..
मुझसे तो सोचा भी नहीं जा रहा...
-समीर लाल ’समीर’
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शनिवार, अप्रैल 15, 2017

एंटी ईवीएम छेड़छाड़ स्क्वाड


मृत्यु को एक वरदान मिला है. मृत्यु को कभी बदनामी नहीं मिलती. जब कभी किसी की मृत्यु होती है उसका दोष सदा ही कभी बुढ़ापे, कभी बीमारी, कभी दुर्घटना को जाता है. यहाँ तक की जब कोई कारण नहीं मिलता तब भी यही कहा जाता है कि अच्छे खासे थे, न जाने क्या हुआ और गुजर गये..  
वही हाल चुनाव में प्रत्याशियों की हार का है..मानो तुलसी दास कह रहे हों कि प्रत्याशी को नहीं दोष गुसांई..हार याने की इनके न जीतने का दोष प्रत्याशी के सिवाय चाहे जिस बात पर डाल दिया जाये मगर प्रत्याशी तो मानो गालिब हो, कुछ भी कर ले..कितना भी बदनाम क्यूँ न हो..उसके आका से लेकर उसके चहेतों तक बस एक ही बात:
’नेता तो वो अच्छा है, बदनाम बहुत है’
ये कभी नहीं हारते. जीतने वाला जीत गया, ये नहीं जीते..बस, इतनी सी घटना होती है.
कभी सामने वाले की लहर के चलते तो कभी जनता के आदेश के चलते सामने वाला जीत जाता है और यह नहीं जीतते.
शास्त्रों में लिखा है कि सब हार कर भी जो इन्सान उम्मीद नहीं हारता, आशा का हाथ थामें रहता है- एक दिन सफलता उसके कदम जरुर चूमती है, इस सूत्र का इस धरती पर यदि अगर एक वर्ग के रुप में कोई अक्षरशः पालन करता है तो वो नेता वर्ग ही है.
पहले अक्सर इनके न जीतने का ठीकरा बूथ केप्चरिंग पर फोड़ा जाता था. बाहुबलियों का बोल बाला हुआ करता था. जिसके पास जितने लठैत, वह उतना सफल नेता. लठैत मात्र लट्ठ लिए लोग नहीं बल्कि चाकू, तलवार, दोनाली से लेकर रिवाल्वरधारी भी हुआ करते थे. लठैत अपने नेता की जीत सुनिश्चित कराते थे, जीतने वाला नेता अपने लठैतों को जेल से बचाये रखने की गारंटी दिया करता था. दोनों का चोली दामन का साथ था. बूथ केप्चरिंग में यह बूथ इन्चार्ज को धमका कर, मार पीट कर मत पेटी पर कब्जा करके अपने मन मर्जी के वोट डाल लेते थे.
जिस किसी नेता को पहले से यह अंदाजा हो जाता कि वह नहीं जीतेगा इस बार, वह वोटिंग वाले दिन ही बूथ केप्चरिंग का इल्जाम लगा देता था और बाकी के न जीत पाने वाले, चुनाव के नतीजे आने के बाद उसके इल्जाम का समर्थन करने लग जाते थे. मगर जो जीत गया सो जीत गया.  
बताते हैं कि आज लैठेतों की जगह तकनीक के ज्ञाता सॉफ्टवेयर इन्जीनियरों ने ले ली. ये तकनिकीयुगीन लठैत अपने तकनिकी ज्ञान की दोनाली लिए अपने आकाओं के आदेश पर ईवीएम (इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन) पर धावा बोलते हैं. उसका अपने ज्ञान से ऐसा हृदय परिवर्तन करते हैं कि जनता चाहे जो आदेश दे, लहर भले किसी की चले..एवीएम जितायेगी इनके आकाओं को ही.
बाकी के न जीत पाये नेता, वही पूर्ववत अब दोषारोपण ईवीएम मशीन पर कर देते हैं कि इनसे छेड़छाड़ की गई है.
जल्दी ही इस छेड़छाड़ के खिलाफ भी एण्टी रोमियो कानून की तरह ही कोई कानून लाना पड़ेगा वरना यह छेड़छाड़ की बीमारी प्लैग से भी ज्यादा संक्रामक है, पूरे देश में फैलते वक्त न लेगी. कुछ ही बरसों में पूरे देश में फैल जायेगी.
वक्त रहते न संभले तो फिर कुछ ही बरसों में फैली इस बीमारी के उन्मूलन में कई दशक लग जायेंगे.
-समीर लाल ’समीर’
भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे में आज:

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गुरुवार, मार्च 23, 2017

जागो, हथेली के बाहर एक दुनिया और भी है!!!


यह घनघोर आत्म मुग्धता का युग है. जिसे देखो, जहाँ देखो सेल्फी खींच रहा है और उसे फारवर्ड करके पहले से बंटा बंटाया ज्ञान ऐसे बांट रहा है मानो अगर वो अपनी सेल्फी ताजमहल के सामने खड़े होकर न लेता और फारवर्ड करके न बताता तो विश्व जान ही नहीं पाता कि ताजमहल विश्व के सात आश्चर्यों में से एक है. आत्म मुग्धता की इससे बड़ी और क्या मिसाल होगी कि बाजार भी इसे भुनाना सीख गया है और जगह जगह फोटोग्राफर बोर्ड लगा कर बैठे हैं कि हमारे यहाँ सेल्फी खींची जाती है.
हालात ये हैं कि एक मोबाईल के माध्यम से सारी दुनिया अपनी हथेली में उठाये अपने आपको विश्व गुरु कोचिंग सेन्टर का प्रधानाध्यापक घोषित करने में हर व्यक्ति जुटा है. जाने कौन इनको बता गया है कि आने वाले समय में भारत विश्व गुरु होगा. याने सारी दुनिया भारत से ट्य़ूशन पढ़ेगी. कोई से भी मास्साब की क्लास खाली न रह जाये इसलिए बिना पूछे सभी ज्ञान बांटने में लगे हैं. एक सफल केन्डीडेट की सफलता का श्रेय सारे के सारे मास्साब लिए जा रहे हैं कि इसे व्हाटसएप पर हमने ही दिया था यह ज्ञान. जैसे आई आई टी और जे ए ई की टॉप मेरिट में आने वाले सब कोचिंग सेन्टर के बोर्ड पर अपनी फोटो के साथ विराजमान रहते हैं कि बस यही हैं जिनकी वजह से हम आई आई टी में हैं. यहाँ तक कि जिसे खुद नहीं पता था कि कोई योगी से कभी मुख्य मंत्री बन जायेगा, उसके लिए ये दावा करने वालों की तादाद कि हमने तो पहले ही बताया था बीजेपी को मिले कुल मतों से अधिक निकल रही है और दावों का आना मय सेल्फी अभी भी जारी है.
किसी घटना स्थल पर वारदात को रोकने में साहयता पहुँचाने की बजाय वारदात को अपनी सेल्फी के संग दिखाने की होड़ लगी है. सबसे पहले कैसे अपने चाहने वालों को बता दूँ कि अगर मैं न होता तो तुम इस घटना के बारे में जान भी न पाते,
पहले जो लोग हथेली में अपना भविष्य बांचने के लिए ताका करते थे आज वो अपनी हथेली में विराजमान मोबाईल से दुनिया का भविष्य बांच रहे हैं.
इन्सान इस कदर मोबाईल में खो गया है कि जब सामने की बिल्ड़िंग में रहने वाला मित्र अपना स्टेटस अपटेड करता है कि क्या गजब नजारा है..सामने वाली बिल्ड़िंग में भीषण आग...और साथ में अपनी खिड़की से खुद की सेल्फी बैकग्राऊन्ड में आग में लिपटी बिल्ड़िंग के साथ लगाता है..तब उसे लाईक कर कमेंन्ट में वॉव!! गजब का नजारा...लिख देने के बाद ख्याल आता है कि अरे, यह तो मेरी ही बिल्ड़िग है. और तब तक बाहर निकलने की लॉबी का रास्ता भी बंद पाकर... खिड़की की तरफ भागते हुए भी एक स्टेटस अपडेट...फीलिंग स्केयर्ड..कान्ट स्केप...(बहुत डर गया हूँ, बचने का कोई रास्ता नहीं) और साथ में अपने डरे चेहरे की सेल्फी..
इस अजब सी हो चली आत्म मुग्ध दुनिया से ज्यादा तो क्या कहें ...बस इतना कहना है कि अगर किसी सुबह उठ कर जब तुम आईने में देखो और तुम्हें अपने चेहरे को घेरे हुए एक आभा मण्डल सा दिखाई दे ( अंग्रेजी में ऑरा ) तो स्वयं को दिव्य पुरुष मानकर सेल्फी खींचने और दोस्तों को भेजने की गल्ती करने की बजाय चुपचाप आँख के डॉक्टर के पास जाकर सलाह लेना, यह मोतियाबिन्द के आरंभिक लक्षण हैं.  
आभा मण्डल जैसी चीजें इस जमाने में नहीं होती..
जागो, हथेली के बाहर एक दुनिया और भी है!!!

 -समीर लाल ’समीर’
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शनिवार, फ़रवरी 11, 2017

कैसा तेरा प्यार- कैसा गुस्सा है तेरा


सुबह जब मैं उनके घर के सामने से निकला तो भैय्या जी दण्ड बैठक लगा रहे थे..११०, १११ उनके बाजू में खड़ा उनका चेला दण्ड की गिनती गिन रहा था. सामने दालान में ही एक चूल्हे पर मावा मिला दूध औंटाया जा रहा था. आजकल रोज सुबह हजार दण्ड लगाने के बाद भैय्या जी की सरसों के तेल से मालिश होती है. फिर कुनकुने पानी से स्नान कर औंटाया हुअ दूध ग्रहण करते हैं और इस तरह उनके दिन की शुरुआत होती है.
फिर चेलों की आवाजाही शुरु हो जाती है. योजनायें बनती हैं. चेले लठ्ठ को तेल पिला रहे होते हैं और भैय्या जी कान खोदते, बतियाते पान चबा रहे होते हैं.
पूछने पर पता चला कि त्यौहार की तैयारी चल रही है. आश्चर्यजनक तौर पर कोई त्यौहार तो आस पास आता दिखता न था. नागपंचमी भी आने में तो पूरा आधा साल बाकी है कि उस वजह से पहलवानी की तैयारी कर रहे हों.
हाँ, चुनावी माहौल जरुर है चारों ओर और उसके लिए इस तरह की तैयारी भी मुफ़ीद है.  मगर भैय्या जी ने चुनाव को कभी त्यौहार का दर्जा नहीं दिया. वो उनकी जीवन शैली है, उनकी धड़कन है ओर उनके जीवन यापन का साधन है. चुनाव हैं तो बाकी सब त्यौहार हैं वरना तो यह जीवन ही बेकार है कि तर्ज पर जीने वाले भैय्या जी, राजनिती के बाहुबलियों की बस्ती के सरगना हैं, जिन पर अनेकों हत्याओं और बलात्कार के मामले दर्ज हैं.  उनके लिए चुनाव उनका एक ऐसा दायित्व है जिसे निभाने के लिए वह इस मृत्युलोक में पधारे हैं और इसी दायित्व के चलते कितने लोगों को मृत्यु के घाट तक पहुँचा आये हैं, वो भला चुनाव को त्यौहार मानें, न!! ऐसा हो ही नहीं सकता.
अतः मन की शांति के लिए पूछना ही पड़ा कि भैय्या जी किस त्यौहार की तैयारी में जुटे हैं?
पता चला कि वेलेन्टाईन डे की तैयारी कर रहे हैं. दो दिन बचे हैं बस!! एकदम युद्ध स्तर पर तैयारियाँ चल रही हैं.
हमारे तो पाँव तले धरती ही खिसक गई. अगर मोहब्बत की उम्र की एक्सपायरी का आधार नेताओं की मोहब्बत की कहानियों से भी उठाये तो भी ६० बसंत से उपर तो क्या तय कर पायेंगे कुछ अपवादों को छोड़ कर. इस आधार पर भी मोहब्बत की एक्सपायरी डेट पार किये भैय्या जी को लगभग आधा दशक से उपर बीत चुका है.
ऐसी उम्र में वेलेन्टाईन डे? क्या मूँह दिखायेंगे घर परिवार में ये? हालांकि राजनेताओं को इन सब बातों की चिन्ता तो होती नहीं है, यह सब तो आप हम जैसे आमजनों के लिए बनाई गई सामाजिक बाध्यतायें हैं.
फिर भी भैय्या जी इतने उत्साह्पूर्वक वेलेन्टाईन डे का त्यौहार मनाने की तैयारी करें, वो भी ऐसे कि जब नव युवा प्रेमी नये कपड़े बनवा रहे हैं, गिफ्ट खरीदने की तैयारी कर रहे हैं, गुलाब के बुके पसंद कर रहे हैं, तब भैय्या जी दण्ड लगाकर और मालिश करा कर बदन बना रहे हैं, दूध औंटा कर मावे डाल कर पी रहे हैं, फूल की जगह लठ्ठ सजा रहे हैं तेल पिलवा कर...अजब तरीका है भैय्या जी का. बाहुबलियों की बात यूँ भी निराली होती है. यह तो खुश हों तो बंदुक दागें, गुस्सा हों तो बंदुक दागें...शायद इन्हीं की प्रेमिकायें गाती होंगी... कैसा तेरा प्यार कैसा गुस्सा है तेरा, तौबा सनम तौबा सनम…
वेलेंटाईन डॆ के दिन हम भैय्या जी के घर के सामने पेड़ के नीचे खड़े हो गये यह देखने के लिए कि क्या नजारा बनेगा इनके इस उम्र में वेलेन्टाईन डे मनाने के जोश का…
कुछ ही देर में भैय्या जी अपने सैकड़ों चेलों के साथ लट्ठ लिये निकलते दिखाई दिये…जय श्री राम का नारा आकाश में गुंजायमान हो गया..
शाम को टीवी में शहर भर के हजारों प्रेमी प्रेमिकाओं के पीटे जाने की खबर ब्रेकिंग न्यूज बनीं और भैय्या जी अपने साथियों के साथ प्रेस कांफ्रेस करते नजर आये…हम अपनी संस्कृति से खिलवाड़ नहीं होने देंगे.
-समीर लाल ’समीर’
#jugalbandi #जुगलबन्दी


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शनिवार, जनवरी 21, 2017

बदलाव का डीएनए


परिवर्तन संसार का नियम है. जो कल था वो आज नहीं है और जो आज है, वो कल नहीं रहेगा. नित बदलाव ही जीवन है. जो भी इस बदलाव की आँधी से कदमताल नहीं मिला पायेगा वो बहुत पीछे छूट जायेगा और कालांतर में भूला दिया जायेगा.
इसे ऐसे समझिये जैसे कि नवम्बर और दिसम्बर माह में आपने खुद को और लोगों को नोट बदलते देखा था. जिसने इसके साथ वक्त पर कदम ताल नहीं मिलाई वो अब पुराने नोट धरे बैठा है और कालांतर में इनकी रईसी को लोग भूल जायेंगे.
बदलाव की बयार अलग अलग क्षेत्र के हिसाब से अलग अलग होती है मगर होती जरुर है.
नोटों के बदलाव की बयार थमीं भी न थी कि चुनाव के मौसम के आने की दस्तक के साथ आस्था और मित्रता के बदलाव की बयार बह निकली. परिवार टूटने जुड़ने लगे, रिश्ते बदलने लगे, मित्र बदलने लगे. एक दूसरे के प्रति आस्थायें बदलीं. कोई इधर झुका था वो बदल कर उधर झुक गया. कोई उधर झुला था वो इधर झुक गया. उस दल वाले इस दल में चले आये तो इस दल के कुछ बदल कर उस दल में चले गये.
कुछ तो दल बदलने के बजाये दल के दलदल में पूरा दल ही धँसाये चले जा रहे हैं. पूरा का पूरा दल कभी इसके साथ तो कभी उसके साथ दिल्लगी कर रहा है. दल न भी बदला हो तो दिल बदल लिया. जो दल कल तक उस दल के साथ गलबहियाँ कर रहा था वो आज इस दल के साथ कर रहा है. इसे गठबंधन कह कर पुकार रहा है. है तो बदलाव ही. जो अपने दल को कभी दल नहीं जीवन शैली कहते थे वो वोंटों की थैली का वजन तौल रहे हैं और जो इसे विचार धारा मान कर चलते थे, उनके विचार कहीं ताक पर धरे रह गये हैं. सबका उद्देश्य मात्र इतना ही कि सत्ता कबजिया लें किसी भी तरह से. दलबदली, दिलबदली सब जायज है सत्ता के सियासी खेल में.
इसी बीच दिल्लगी का त्यौहार वेलेन्टाईन डे भी पड़ जायेगा. इस मौसम का फायदा उठाते हुए लाखों दिल बदलेंगे, और लाखों दिल लग लेंगे. यूँ तो प्रेम में दिल लगाना, बदलना, टूटना सालों साल फुटकर में यहाँ वहाँ चलता ही रहता है मगर वेलेन्टाईन डे इसी का एक मेला जैसा स्वरुप है जहाँ महा सेल सा होल सेल में दिल लगने, टूटने कौर बदलने का कारोबार होता है, ठीक वैसे ही जैसे दलबदल और दिलबदल की राजनितिक प्रक्रिया यूँ तो नित खुदरा तौर पर चलती रहती है मगर चुनाव के उत्सव के दौरान होल सेल में यही खेला देखना नित नये अनुमानों को जन्म देता है.
जिसका सत्ता में आना कल तक तय माना जा रहा था, आज, इसी दलबदल और दिलबदल के चलते, शंका के दायरे में खड़ा है और शायद कल एक नया दिल लगे, एक नया दलबदल हो और फिर कोई नया अनुमान सत्ता पर काबिज होता दिखे.
सियासी खिलाड़ियों से इतर आम जनता तमाशबीन बनी बदलाव की इन कहानियों को नित बदलता देखती रहेगी बस इस आशा में कि शायद उनकी किस्मत भी बदले..कभी इस बदलाव की बयार में...
मगर आम जनता का डीएनए, विकासशील संसार के डीएनए से कभी मैच करता ही नहीं..और हाय रे उसकी किस्मत, बदलती तो है मगर बस दुर्गति की गति!!
ये वैसा ही बदलता शाईनिंग इंडिया है जो आठ बड़े शहरों की जगमग से निर्धारित होता है वरना तो आज भी न जाने कितने शहर नित सड़कों को गहरे से और गहरे गढ्ढों में परिवर्तित होते देखने के लिए अभिशप्त है.

-समीर लाल ’समीर’ 
#Jugalbandi #जुगलबन्दी

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