शनिवार, अक्तूबर 12, 2019

हर साल नकली रावण को नकली राम ही मारते आ रहे



बचपन में वह बदमाश बच्चा था. जब बड़ा हुआ तो गुंडा हो गया. और बड़ा हुआ तो बाहुबली बना. फिर जैसा कि होता है, वह विधायक बना और फिर मंत्री भी. नाम था भगवान दास.
रुतबे और कारनामों की धमक ऐसी कि पुलिस भी काँप उठे. कम ही होते हैं जो इस कहावत को धता बता दें कि पुलिस से बड़ा कौन गुंडा. भगवान दास उन्हीं कम में से एक थे. लोग बताते थे पुलिस भी गैरकानूनी मसले सुलझाने के लिए उन्हीं की शरण लेती थी.
धता बताने को तो वो खैर इस मान्यता की भी धज्जियाँ उठा डालते हैं कि यथा नामे तथा गुणे’. मगर उसमें उनकी गल्ति नहीं कहूँगा वो तो आज कल का प्रचलन है जो नाम दो होवे उसका उल्टा. चाहे वो फिर विकासहो या स्वदेशी’.
भगवास दास के क्षेत्र में दौलत राम, नाम में यहाँ भी वही झोल है, नामक एक अत्यन्त निर्धन एवं दलित व्यक्ति रहता था. दौलत राम भगवान दास के अहाते की साफ सफाई और चाय पान लाने का काम कर दिया करता था और बदले में कुछ धन पा जाता था जीवन यापन करने को. भगवान दास उसे दौलत के बदले दो लात पुकारता और हो हो करके हँसता. गरीब की किस्मत, उसके हो हो के साथ साथ दौलत राम भी मुस्करा कर रह जाता. 
पुनः गरीब की किस्मत कि भगवान दास ने दौलात राम की पत्नी को देख लिया. ठीक ठाक नाक नक्श और भगवान दास को अपने रुतबे का नशा. नशे में ठीक ठाक कुछ ज्यादा ही मन भावन लग जाता है. अतः उठवा लिया. भगवान दास प्रचलन के अनुरुप नाम के विपरीत रावण हो गये. दौलत राम नाम में भर राम लिये बैठे रहे. न तो रावण का कुछ बिगाड़ पाये और न पत्नी को बलात्कार का शिकार होने से बचा पाये.
दौलत राम और उसकी पत्नी बाद में पुलिस से लेकर हर तरफ गुहार लगाते रहे. एक दिन थाने जाते समय उनके रिक्शे को किसी ट्रक ने टक्कर मार दी और दौलत राम की ईहलीला समाप्त हुई. उसके बाद उसकी पत्नी कहाँ गई, किसी को पता ही न चला. किसी ने कहा कि धरती फट गई और उसमें समा गई और किसी ने कहा कि आसमान लील गया. अखबार से लेकर टीवी तक सब इस हो हल्ले के बाद पुनः भगवान दास की अर्चना में जुट गये. भगवान दास मंत्री के साथ साथ आतंक का पर्याय बन गये. मंत्री हैं इसलिए आतंक है या आतंक है इसलिये मंत्री है, यह कहना जरा कठिन कार्य है.
इधर दशहरा आया. भगवान दास ने नई बुलेट प्रुफ कार खरीदी. फैशनानुरुप उसका पूजन किया गया. नींबू मिर्च की झालर टांगी. फिर नये प्रचलन के हिसाब से अपने आंगन के पिछले कमरे में अपने शस्त्रागार में एक लाईसेंसी बन्दूक, बाकी बिना लाईसेंस की तीन माऊजर, कई देशी कट्टे, सैकड़ों पैट्रोल बम और सुअर मार बम, गोलियाँ के बक्से, तलवार, बका आदि के बेहिसाब असले का शस्त्र पूजन किया. अब इस तरह की शस्त्र पूजा खुल कर तो कर नहीं सकते थे अतः हड़बड़ी में पूजन करते करते दीपक हाथ से छूट गिर पड़ा. बम दनादन छूटने लगे. भगवान दास उसी में फंस कर अपने चिथड़े उड़वा बैठे. ठीक उसी वक्त रामलीला मैदान पर रावण का पुतना धूँ धूँ कर जल उठा.
असली नकली दोनों रावण मारे गये. शहर भर में भगवान दास के मरने की खबर बिजली की तरह फैल गई.
लोग आपस मे फुसफुसाये कि भगवान के घर देर है मगर अँधेर नहीं. इस वक्त वे असली भगवान के घर की बात कर रहे थे. इस तरह से बात स्पष्ट करते रहना आज के युग की जरुरत हो गई है.
लोगों की आस्था कलयुग के एक अदृश्य राम में बहुत अरसे के बाद पुनः जाग उठी. वरना तो नकली रावण को नकली राम हर साल मारते ही आ रहे हैं.
-समीर लाल समीर 
भोपाल के दैनिक सुबह सवेरे के रविवार अक्टूबर १२, २०१९ के अंक में प्रकाशित
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1 टिप्पणी:

Gyan Vigyan Sarita ने कहा…

Excellently brought out abberation in contemporary scenario where people like Bhagwan Das are real Ravan, and rarely that too only by accident meet a destiny they deserve.