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शनिवार, फ़रवरी 08, 2025

इससे बड़ा सेलेब्रिटी स्टेटस भला और कौन सा होगा

 

अब तिवारी जी को अफसोस हो रहा है कि वो समय पर क्यूँ नहीं चेते। उनके चेहरे पर चिंतन, अफसोस और गुस्से की त्रिवेणी बह रही है। अफसोस का विषय भी त्रिवेणी से ही संबंधित है अतः त्रिवेणी अकारण ही नहीं है चेहरे पर।

उनके क्षोभ के केंद्र में उनके पिता जी हैं जिनको गुजरे हुए भी 30 बरस हो चुके हैं। दरअसल उनके पिता जी ही नहीं, दादा जी भी इसी शहर की उन्हीं गलियों में बड़े हुए जिसमें तिवारी जी स्वयं बड़े हुए। इस मामले में यह शहर उनका पुश्तैनी शहर है। छोटा है मगर है तो पुश्तैनी शहर। दादा जी की तरह ही तिवारी जी के पिता जी को भी इस बात का गर्व था और वही पुश्तैनी गर्व तिवारी जी को भी विरासत में मिला था जिसे वह अब तक सर पर बैठा कर रखते थे। जवानी में कोई कहता भी कि किसी बड़े शहर में जाओ और कुछ बड़े काम को अंजाम दो, तो तिवारी जी तमतमा जाते। कहते कि होते होंगे नमकहराम लोग मगर हम चंद सिक्कों की ख्वाहिश में अपने प्यारे शहर को कभी नहीं छोड़ेंगे। फिर वो नोसटॉलजिक हो जाते।

कैसे छोड़ दें यार इस शहर को। यहाँ की सड़कें, यहाँ की गलियां यहाँ के लोग, इस शहर की आबो हवा -सब तो अपनी हैं। आज तक जो भी पहचान मिली है, जो भी मुकाम हासिल किया है- सब इसी शहर की तो देन है और लोग कहते हैं कि किसी बड़े शहर चले जाओ? ये भी क्या बात हुई? बड़े शहर में भी खाएंगे तो रोटी दाल ही तो वो तो यहाँ भी मिल ही रही है, फिर किसलिए पैसे के पीछे भागें?

खैर यह तो तिवारी जी कह रहे हैं मगर जानने वाले तो जानते ही हैं कि पहचान के नाम पर सिर्फ चौराहे पर पान की दुकान पर फोकट में ज्ञान बांटना और मुकाम के नाम पर नित घर से निकल कर पान की दुकान और रात में दारू पी कर घर वापसी से आगे कुछ भी हासिल न हुआ ताजिंदगी।

थोड़ा बहुत जो पैसा आता है वो या तो दलाली से या किराये से- एक कमरे की दुकान जो एक कमरे के घर के नीचे विरासत में मिली। दलाली भी नगर निगम के कामों की किया करते क्यूंकी पार्षद उनका शागिर्द रहा हमेशा से। उसे भी ऐसे ही खाली लोगों की जरूरत रहती है चुनाव जीतने के लिए। लोग बताते हैं कि बंद कमरे में ये पार्षद महोदय के पैर छूते हैं मगर चौराहे पर उनकी अनुपस्थिति में उन्हें अपना चेला और शागिर्द बताते हैं ताकि दलाली चलती रहे।

तिवारी जी की महारत जिंदा लोगों को मरे का सर्टिफिकेट दिलाने में थी। इसमें मोटा पैसा भी था। प्रधानमंत्री रोजगार योजना में एक लाख का कर्ज लेकर उसे माफ कराने का एक मात्र तरीका था कि ऋणधारी की मृत्यु हो जाए। बस यही महीन शब्दों में लिखी जानकारी तिवारी जी के हाथ लग गई थी। तब से प्रधान मंत्री से ज्यादा इस योजना का प्रसार प्रचार तिवारी जी करने लग गए। सबसे कहा करते कि सरकार तुम्हें कर्ज देगी, मैं तुम्हें कर्ज माफी दिलाऊँगा। 25% दलाली पर भला कौन न मान जाता वो भी ऐसे शहर के वाशिंदे -जहां कर्ज ही एक मात्र पूंजी है लोगों की। वरना विकास के नाम पर ब्याज का ही विकास होता आया है।

खैर, तिवारी जी के अफसोस का विषय आज यह रहा कि इनके पिता जी बचपन में इनको लेकर मुंबई या दिल्ली क्यूँ नहीं चले गए? कुछ ढंग का काम करते। बच्चों को पढ़ाते लिखाते। तो तिवारी जी भी ऐरोस्पेस साइंस में आईआईटी कर लेते और आज इस दिव्य कुम्भ में आईआईटी वाले बाबा बन कर सेलेब्रिटी स्टेटस पा गए होते।

अब तिवारी जी को कौन समझाए कि दिल्ली मुंबई में भी 12 वीं फेल बच्चे बैठे हैं- सब बच्चे आईआईटी में नहीं चले जाते हैं। छोटे छोटे कस्बों से भी बच्चे आईआईटी में जाते हैं। साथ ही हर आईआईटी पास कर लेने वाला बच्चा बाबा नहीं बन जाता और हर बाबा आईआईटी वाला नहीं होता।

और जहां तक सेलेब्रिटी स्टेटस की बात है तो वह तो आप गाँव में चाय बेच कर और 12 वीं फेल होकर भी पा सकते हैं। जरूरत है जज्बे की। महा जन नायक से बड़ा सेलेब्रिटी स्टेटस भला और कौन सा होगा।

-समीर लाल ‘समीर’    

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार 9 फरवरी, 2025 के अंक में:

https://epaper.subahsavere.news/clip/15907

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शनिवार, जुलाई 11, 2020

टूटे चश्में से दिखता नव भारत का घोषणा पत्र


जब चपरासी रामलाल जाले हटाता, धूल झाड़ता हुआ कबाड़घर के पिछले हिस्से में गाँधी जी की मूर्ति को खोजता हुआ पहुँचा तो उड़ती हुई  धूल के मारे गाँधी जी की मूर्ति को जोरों की छींक आ गई. अब छड़ी सँभाले या चश्मा या इस बुढ़ापे में खुद को? ऐसे में चश्मा आँख से छटक कर टूट गया. गुस्से के मारे लगा कि रामलाल को तमाचा जड़ दें मगर फिर वो अपनी अहिंसा के पुजारी वाली डीग्री याद आ गई तो मुस्कराने लगे. सोचने लगे कि एक चश्मा और होता तो वो भी इसके आगे कर देता कि चल, इसे भी फोड़ ले. मेरा क्या जाता है? जितने ज्यादा चश्में होंगे, उतने ज्यादा लंदन से नीलाम होंगे. मुस्कराते हुए बोले- कहो रामलाल, कैसे आना हुआ? पूरे साल भर बाद दिख रहे हो?
गाँधी जी की मूर्ति को सामने बोलता देखकर रामलाल बोला-चलो बापू, बुलावा आया है. नई पार्टी बन रही है. नये मूल्यों के साथ. नये जमाने की पार्टी  है. नये लोग हैं. नया इस्टाईल है. गाते बजाते हैं. हल्ला मचाते हैं. एक अलग तरह की पार्टी बना रहे हैं. आज आपका जन्म दिन है, आपके सामने आपका नाम लेकर बनायेंगे. नहा लो, नये कपड़े पहने लो और चलो, फटाफट. बहुत भीड़ लगने वाली है. आपको नई पार्टी की योजनाओं, प्रत्याशियों और भविष्य को शुभकामनाएँ देनी हैं. बहुत बड़ी महत्वाकांक्षा की उड़ान है. खैर, आप तो जानते ही हो कि ऐसा ही होता आया है हमेशा नई पार्टी के साथ. आपके लिए भला नया क्या है. आप तो हमेशा से ऐसी घटनाओं के साक्षी रहे हो- साबरमती के संत!
गाँधी जी बोले, देख भई रामलाल. एक तो तू ज्यादा चुटकी न लिया कर ये संत वंत बोल कर. बस, आज का ही दिन तो होता है जब मैं थोड़ा बिजी हो जाता हूँ. हर सरकारी दफ्तर से लेकर हर भ्रष्ट से शिष्ट मंडल तक लोग मेरी पूछ परक करके अपने इमानदार और कर्तव्यनिष्ट होने का प्रमाण देते हैं. ऐसे में ये एक और...कह दो भई इनसे कि कल रख लेंगे कार्यक्रम. नई पार्टी ही तो है. आज नहीं जन्मी तो क्या- कल जन्म ले लेगी. रंग तो अगले चुनाव में ही दिखाना है. एक दिन में क्या घाटा हो जायेगा? मेरा भी एक के बदले दो दिन मन बहला रहेगा.
रामलाल उखड़ पड़ा. कहने लगा एक तो साल भर आपको कोई पूछता नहीं. चुपचाप यहाँ पड़े रहते हो. आज पूछ रहे हैं तो आप भाव खा रहे हो कि आज नहीं कल. तो सुन लिजिये- यह कोई आपसे निवेदन या प्रार्थना नहीं है. बस, बुलाया है और आपको चलना है. आदेश ही मानो इसे. उन लोगों ने सारी जनता से पूछ लिया है  देश भर की. सब ने कहा है की पार्टी बना कर चुनाव लड़िये.
गाँधी जी ने परेशान होते हुए पूछा कि सारी जनता से कैसे पूछ लिया भई उन्होंने वो भी बिना वोट डलवाये?
रामलाल ने मुस्कराते हुए कहा कि बापू, आप तो बिल्कुले बुढ़ पुरनिया हो गये. इतना भी नहीं जानते कि उन्होंने फेसबुक से बताया था और खूब लोगों नें लाइक चटकाया. आजकल तो ऐसे ही पूछा जाता है.
गाँधी जी सकपका गये. कहने लगे- मैं क्या जानूँ? मेरा तो फेसबुक एकाउन्ट है नहीं- चल भई, तू कहता है तो चलता हूँ. मगर मेरा चश्मा तो बनवा दे. वरना उनका घोषणा पत्र पढ़े बिना उन्हें कैसे आशीर्वाद दूँगा?
रामलाल हँसने लगा- अरे बापू, इतनी जल्दी भला कोई घोषणा पत्र बनता है. अभी चार दिन पहले तो बात हुई पार्टी बनाने की. सब कार्यक्रम पहले से तय है. आप वहाँ मंच पर विराजमान रहेंगे. आपका माल्यार्पण होगा. ततपश्चयात वो आपको घोषणा पत्र (कोरे कागज का पुलिंदा) पकड़ायेंगे. आप अपना बिना शीशे का चश्मा पहने उसे देखने का नाटक करियेगा और फिर कह दिजियेगा कि मुझे बहुत उम्मीद है इनसे. मैं इन्हें आशीष देता हूँ. ये एक नव भारत का निर्माण करेंगे. अब अच्छा या बुरा- ये तो आपने कहा नहीं- होगा तो नव ही. आप सेफ रहोगे और पूजे जाते रहोगे तो नो टेंसन.
दूर बैठी जनता को क्या समझ आयेगा कि घोषणा पत्र भी कोरा है और आपके चश्में में भी शीशा नहीं है.
गाँधी जी बोले कि रामलाल ऐसा तो मैं सभी पार्टियों के साथ करता आया हूँ मगर तू तो कह रहा था कि यह नई पार्टी है. नये मूल्यों के साथ, नये जमाने की. एक अलग तरह की पार्टी.
अरे बापू, सभी तो एक न एक दिन नये थे. सभी कुछ नया ही करने आये थे. वो तो धीरे धीरे पुराने हो जाते हैं. ये भी हो जायेंगे.  
गाँधी जी रामलाल को देख मुस्कराये. रामलाल उन्हें देख कर एक आँख दबाता है और चल पड़ते हैं गाँधी जी नई धोती पहने. बिना शीशे का चश्मा, एक हाथ में लाठी और दूसरे हाथ से रामलाल का कँधा थामे. पार्टी घोषणा स्थल की ओर. कोशिश बस इतनी सी कि कोई टूटा चश्मा न देख ले.
-समीर लाल ‘समीर’
भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार जुलाई १२,२०२० के अंक में:
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शनिवार, अप्रैल 11, 2020

एक नेता की डायरी का पन्ना!!



कल एक जरुरी काम से नेता जी के घर जाना हुआ. वहीं से उनकी डायरी का पन्ना हाथ लग गया, साहित्यकार बनने की फिराक में लगा शिष्टाचारी लेखक हूँ सो इस मैदान के सामान्य शिष्टाचारवश चुरा लाया. बहुत ही सज्जन पुरुष हैं. सच बोलना चाहते हैं मगर बोल नहीं पाते. देखिये, उनका आत्म मंथन-उन्हीं की लेखनी से (अभी साहित्यकार बनने की फिराक में लगा हूँ अतः ऐसा कहा अन्यथा लिखता मेरी लेखनी से):
झूठ बोलते बोलते तंग आ गया हूँ. कब मुझे इससे छुटकारा मिलेगा. क्या करुँ, प्रोफेशन की मजबूरियाँ हैं.
रोज सोचता हू कि झूठ को तिलांजलि दे दूँ. सच का दामन थाम लूँ. मगर कब कर पाया है मानव अपने मन की.
कुछ महिने में चुनाव आने वाले हैं और ऐसे वक्त इस तरह के भाव-क्या हो गया है मुझे? लुटिया ही डूब जायेगी चुनाव में अगर एक भी शब्द सच निकल गया तो.
क्या सच कह दूँ जनता से??
-यह कि तुम जैसे गरीब हो वैसे ही रह जाओगे, हमारे बस में नहीं कि तुम्हें अमीर बनवा दें?
-यह कि मँहगाई बढती ही जायेगी. क्या आज तक कुछ भी सस्ता हुआ है जो अब होगा.
-यह कि मैं तुम्हारे बीच ही रहूँगा? ( तो दिल्ली कौन जायेगा, विदेशों में कौन घूमेगा?)
-यह कि तुम्हारी समस्यायों से मुझे कुछ लेना देना नहीं. तुम जानो, तुम्हारा काम जाने.
-यह कि मैं बिना घूस खाये अगर सब काम करता रहा तो चुनाव का खर्चा और विदेशों में पढ़ रहे मेरे बच्चों का खर्चा क्या तुम्हारा बाप उठायेगा.
-यह कि मैँ हिन्दु मुसलमानों के बीच दरार डालूंगा ताकि मैं लगातार चुनाव जीतता रहूँ.
- यह कि मुझे जब कुछ समझ न आयेगा तो तुमको झुनझुना बजाने की सलाह दे कर उलझाये रखूंगा. तुम झुनझुना बजाते रहाने और मेरे गुन गाते रहना.
-यह कि मेरे हर फैसले को, चाहे वो सही हो या गलत, अपने चेलों के माध्यम से सही सिद्ध करवा ही लूंगा.
- यही कि तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम मुझे खुदा मानो
..यह कि..यह कि....
क्या क्या बताऊँ, लोग तो सभी ज्ञानी हैं, सब समझते हैं. मेरी मजबूरी भी समझ ही गये होंगे.
फिर मैं ही क्यूँ अपराध बोध पालूँ?
आज इतना ही, एक विडियो कांफ्रेन्स में जाना है. देश हित में एक सौदे की बात है. (लम्बी डील है, मोटा आसामी है.)
संपादकीय टिप्पणी: ध्यान दिया जाये कि नेता भाषण कितना भी लम्बा दे ले, लिखता जरा सा ही है.
-समीर लाल ’समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार अप्रेल १२, २०२० के अंक में:

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शनिवार, अप्रैल 04, 2020

हम मि.कायल, अब आदतन भी कायल हो जाते हैं!!



कायल एक ऐसी विकट और विराट चीज है जो कोई भी हो सकता है, कभी भी हो सकता है, किसी भी बात से हो सकता है और किसी पर भी हो सकता है.
मैने देखा है कि कोई किसी की आवाज का कायल हो जाता है, कोई किसी की सुन्दरता का, कोई किसी के लेखन का, कोई किसी के स्वभाव का, कोई किसी के नेतृत्व का और यहाँ तक कि कोई किसी की मौलिकता पर ही कायल हो जाता है.
अब मौलिकता पर भी कायल सिर्फ शुद्ध मौलिकता की वजह से नहीं बल्कि इसलिये कि वैसी मौलिकता और कहीं कम से कम उन्होंने नहीं देखी. कायल होने की और करने की स्वतंत्रता सभी को हासिल है. जहाँ आप अपनी सूक्ष्म दृष्टि या बुद्धि की कुशाग्रता की वजह से कुछ आंक कर कायल हो सकते हैं, वहीं आप अपने दृष्टि दोष के कारण या मूढ़ता की वजह से भी कायल हो सकते है.
’कायलता’ की इसी स्वतंत्रता का तो मैं कायल हूँ.
भाई साहब, आपने लालू का नाम तो सुना होगा?
अरे, हम तो उनकी स्टाईल के कायल हैं.
याने कि इससे अर्थ निकलता है कि कायल होने के लिए यह जरुरी नहीं कि आप किसी की बुद्धि के कायल हों,  तो वो उसकी कुशाग्रता के ही हों.. तब तो वह कुशाग्रता की कायलियत कहलाई. बुद्धि का कायल होना बेवकूफी पर कायल होना भी अपने आप में समाहित करता है.
’कायल’ शब्द की यह व्यापकता भी कायल कर जाती है.
जब आप अपनी ओजपूर्ण रचना सुना कर फारिग हों तो सुना होगा, भाई साहब, क्या आत्मविश्वास है आप में. हम तो कायल हो गये.
आप खुश हो गये?
अगर आप की रचना वाकई अच्छी होती तो वो रचना का कायल होता या फिर आपकी ओजपूर्ण शैली अगर वाकई ओजस्वी होती, तो वो आपकी शैली का कायल होता. इन दोनों बातों को छोड़ वो आपके आत्मविश्वास का कायल हुआ-सोचिये.
याने अगर इसका गुढ़ अर्थ निकालने के लिए अगर गहराई में उतरा जाये तो आप जान पायेंगे कि न तो आपकी रचना इतनी प्रभावशाली है और न ही ओजपूर्ण शैली इतनी ओजस्वी है कि उसका कायल हुआ जाये, उसके बावजूद भी आप पूरी ताकत से खड़े अपनी रचना पूरी होने तक मंच और माईक संभाले रहे और मुस्कराते हुए मंच से उतर रहे हैं तो इसे आपका आत्मविश्वास नहीं तो और क्या कहेंगे. वाकई, आपका आत्मविश्वास कायल होने योग्य है. बस, इतना ही तो वो आपको बताना चाह रहा था.
’कायल’ शब्द के इसी सामर्थ्य पर तो मैं कायल हुआ जाता हूँ.
मैने कई शरीफों को गुण्डों के आतंक से और पिटने से बचने के चक्कर में यह कहते सुना है कि भाई, हम तो आपके नाम के ही कायल हैं, क्या सिक्का जमाया है आपने एरिया में. ये लो, नाम के ही कायल हो गये और वो भी इसलिये कि क्या सिक्का जमाया है.
ऐसी कायलता चमचागीरी में भी देखने में आती है अपना काम साधने के लिए.
कोई अपने गुरु के ज्ञान का, कोई चेले के चेलत्व का, कोई इसका और कोई उसका कायल होते दिख ही जाता है. यहाँ तक की गुरु अपने गुरुत्व को बचाने और चेले को सहजने के लिए भी चेलत्व का कायल हो लेता है. वो भी जानता है कि अगर चेला ही नहीं रहा तो गुरु कैसा? एक दूसरे की पूरकता बनाये रखने के लिए भी इस कायलता रुपी सेतु को टिकाये रखना अपरिहार्य हो जाता है.
कायल होना और कायल करना अक्सर एकाकीपन भी दूर करता है. कायल किये और कायल हुए लोग एक दूसरे के करीब से आ जाते हैं, इस तरह से एक गैंग जैसा संगठन बन जाता है और फिर सामूहिकता की ताकत को कौन नकार सकता है. अगर कोई सामूहिकता की ताकत को नकार सके तो बताये, मैं उनकी अल्पबुद्धि का आजीवन कायल रहूँगा.
मैं यह कतई सिद्ध करने की कोशिश में नहीं हूँ कि कायलता का कोई महत्व नहीं है. बहुत महत्वपूर्ण है किसी बात का कायल हो जाना या किसी को कायल कर देना किन्तु मेरा उद्देश्य मात्र यह है कि कायल होने या करने की महत्ता आंकते समय ये जरुर देख और परख लें कि कौन, किस बात पर, किससे और किसलिये कायल हुआ.
यूँ ही व्यर्थ खुश न हों मात्र किसी के कायल हो जाने पर या किसी को कायल करके. वरना कोई आपकी खुशी का ही कायल न हो जाये.
हम तो खैर अब आदतन भी कायल हो जाते हैं चाहे कोई ताली बजाने बोले या थाली बजाने या फिर बत्ती बुझाकर दिया जलाने! हम मि.कायल, इन सब से कायल हुए आदेशों को पूरे धूमधाम से तामील करते हैं. \
-समीर लाल ’समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार अप्रेल ५, २०२० के अंक में:

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रविवार, मार्च 29, 2020

अगर मैसेज न आये तो फिर आयेगा क्या?



पूरा भारत घर में बंद है सिर्फ उनको छोड़कर जिनको बाहर होना चाहिये जैसे डॉक्टर, पुलिस आदि. साथ ही कुछ ऐसे भी बाहर हैं जो पुलिस से प्रसाद लिए बिना अंदर नहीं जाना चाहते. मगर घर में बंद लोग पूरी ताकत से व्हाटसएप पर चालू हैं. अगर व्हाटसएप का मैसेज मैसेज न हो कर एक पैसे वाली करेंसी भी होता, तो आज हर घर करोड़ पति बस रहे होते. लखपति तो खैर वो जब घर में नहीं बंद थे, तब भी होते.
एकदम से बाढ़ आ गई है मैसेज और फॉरवर्ड की. बाढ़ कहना भी शराफत ही कहलायेगी दरअसल आई तो सुनामी है. सोना जागना खाना पीना मुश्किल हो गया है. अच्छा खासा मोबाईल है महंगा वाला फुल्टूस मेमोरी के साथ. मगर घड़ी घड़ी मेमोरी फुल दिखा रहा है. साफ करो, फिर भर जाये. स्वच्छता अभियान से भी बुरा हाल हो गया है इसका. वहाँ भी कम से कम मंत्री जी की सेल्फी हो जाने के बाद कुछ घंटे तो लगते ही हैं पुनः कूड़े को सेल्फी की जद वाले स्थल पर पुनर्स्थापित होने में. मगर यहाँ तो वो मौका भी नहीं.
जितने ग्रुप हैं. सब के सब वही के वही फॉरवर्ड भेज रहे हैं. लगने लगता है कि सिर्फ ग्रुप के नाम अलग अलग हैं, सदस्य वही के वही हैं. फिर जाकर उनके सदस्यों के नाम पढ़ो कि अगर ऐसा है तो सारे ग्रुप डिलीट करके एक ही रखें, तो सदस्य भी अलग अलग निकलते हैं.
जितनी परेशानी हो रही है, उत्सुक्ता भी उतनी ही बनी है तो कोई ग्रुप छोड़ा भी नहीं जा रहा है. भले ही बाहर आकर बस गये हैं मगर डीएनए तो वही भारतीय है न!! बस जैसे ही नया मैसेज पकड़ आया, धड़ाक से अपने भी सभी ग्रुपों में भेजे चले जा रहे हैं कि कोई कम न आंक बैठे.
अब जब फॉरवर्ड करना है तो मोबाईल में मेमोरी भी चाहिये तो पुराने मैसेज साफ करो. फिर वही दुविधा कि कौन से वाले? क्या पता कोई फॉरवर्ड होने से रह गया हो वो भी डीलीट न हो जाये.
कुछ मैसेज जरुरी जानकारी से भरे हैं. कुछ तब तक जरुरी जानकारी से भरे हैं जब तक उनके फेक होने का दूसरा किसी और का मैसेज नहीं आ जाता. कुछ हँसी मजाक वाले. ऐसे विषम समय में उनकी भी जरुरत है. कुछ करोना से डराने वाले, तो कुछ करोना से बचने के उपाय बताने वाले. कोई कह रहा है बीस सेकेंड हाथ धोते रहो तो कोई गरारे करा रहा है तो कोई पूरा ही नहलवा दे रहा है. कोई कपूर, लौंग, इलाईची का जंतर बनाकर गले में बांध कर घूमने की सलाह दे रहा है. तो कोई हल्दी पिलवा दे रहा है. कोई करोना के आंकड़े बता रहा है. कोई ज्योतिष के हिसाब से कब तक करोना का कहर समाप्त हो जायेगा, उसकी घोषणा कर रहा है. कुछ लोग अपने गाने की कला पर हाथ साफ करके झिलवा रहे हैं तो कुछ की छिपी प्रतिभा सामने आ रही है. 
मने कि जितने हाथ, उतने मोबाईल और उतने गुणित १२ घंटे के हिसाब से ७२० मैसेज. सोचो भला. अभी भारत में करोना बंदियों का चौथा ही दिन है. १७ और गुजरने हैं. कैसे संभालेगे इतनी आमद रफ्त इतने सारे मैसेजों की.
एक सोच यह भी आती है कि अगर मैसेज न आये तो फिर आयेगा क्या? विकल्प क्या है? लोगों का आना जाना तो बंद ही है. अतः आने देते हैं मैसेज ही. कम से कम कुछ तो आ रहा है. हम तो वो लोग हैं जो विकल्प के आभाव में सरकार तक उनकी बनवा देते हैं जिनके हटने की दिन रात प्रार्थना करते हैं. फिर यह तो मैसेज मात्र है. कम से कम इसको डिलीट कर हटाने की सुविधा तो है.
-समीर लाल ’समीर’

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे के रविवार मार्च २९, २०२० के अंक में:
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शनिवार, मई 25, 2019

अब जनता के आत्म मंथन का समय है


चुनाव के परिणाम आ गये हैं. जनता ने अपना आदेश दे दिया है. टीवी पर तो सभी नेताओं ने इसे जनादेश कहते हुए सर माथे से लगा लिया है. यही एक मात्र दिन होता हैं जब जनता को आदेश देने की अनुमति होती है. अब इसके बाद पाँच साल तक वो इस गुस्ताखी की सजा काटती है कि तेरी इतनी हिम्मत कि हमें आदेश देगा. महीने भर तुम्हारे आगे पीछे क्या घूम लिए, तुम तो खुद को कलेक्टर ही समझने लगे.
तिवारी जी और घंसु ने भी परंपरा का पालन करते हुए जनादेश का स्वागत किया. दोनों हार गये. २ लोगों वाली नई नई बनी गैर मान्यता प्राप्त पार्टी नेस्तनाबूत हो गई. शाम आत्म मंथन के लिए बैठक बुलाई गई पान की दुकान के पीछे पुलिया पर. एक बोतल, नमकीन और चार उबले अड़े के साथ आत्ममंथन शुरु हुआ. दोनों ने ही हार की नैतिक जिम्मेदारी ली. घंसू को दो वोट मिले. एक खुद का और दूसरा तिवारी जी का. तिवारी जी को भी दो वोट मिले. वो अपनी ससुराल से जाकर लड़े थे. जहाँ उनकी पत्नी का, सास का और एक ससुर का वोट था. जनादेश पर मंथन इस बात का था कि तीन में से तिवारी जी को वोट किसने नहीं दिया? ससुर ने वादा किया था कि वो वोट उनको ही देंगे मगर ससुर उनसे हमेशा झूठ बोल कर वादा खिलाफी करते आये हैं. इस बात के साक्ष्य के तौर पर तिवारी जी ने बताया कि विवाह के समय भी उनकी पत्नी को गौर वर्णीय एवं गाय स्वभाव की बता कर ब्याह दिया था. दोनों ही बातें कोरा झूठ साबित हुई. पक्का उन्होंने ही वोट न दी होगी. कभी सच नहीं कहते. उनको तो चुनाव ल़अना चाहिये. एक शक की सुई पत्नी पर भी घूमी कि उसी सुबह कुर्ता ठीक से प्रेस न करने पर तिवारी जी पत्नी पर भड़क गये थे और पत्नी ने उन्हें ऐसी नजर से देखा था जैसे कह रही हो कि देख लूँगी. शायद इस तरह ही उसने देख लिया हो. जनता भी इसी तरह कन्फ्यूज करती है.किसी का पुराना रिकार्ड खराब है तो कोई नजर से बता देता है. सामने तो कौन न कहेगा.
मंथन बोतल के साथ खत्म हुआ. तिवारी जी ने राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद से अपना इस्तिफा घंसु को सौंपा और घंसु ने राष्ट्रीय सह अध्यक्ष पद से अपना इस्तिफा तिवारी जी को सौंपा.दोनों ने एक दूसरे का इस्तिफा स्वीकार नहीं किया. फिर दोनों ने एक दूसरे को गले लगाया और प्रण लिया कि पूरे जोश खरोश से अब अगले चुनाव की तैयारी करनी है. ससुर और पत्नी से संबंध सुधारने होंगे तिवारी जी को एवं ससुर जी को अगली बार उनके गुणो को देखते हुए पार्टी से चुनाव लड़वाना होगा. फिर दोनों पुलिया से निकल कर पान की दुकान पर आ गये थे. बोतल अपना असर दिखाने लगी थी.
पान की दुकान पर खड़ी आम जनता अब तिवारी जी और घंसु से गालियों का प्रसाद प्राप्त कर रही थी. किसी ने तिवारी जी से चुटकी लेते हुए १२००० रुपये प्रति माह देने के वादे की याद दिला दी. घंसु उखड़ पड़े. अगर १२००० चाहिये थे तो हमें वोट देते. अब जाओ मांगो उन्हीं से, जिनको वोट देकर आये हो. हमसे तो अब बस १२ लातें मिलेंगी. भगो यहाँ से..
जनता हतप्रभ थी कि ये एक ही दिन में क्या हुआ इनको कि कल तक सभी को भईया जी, बाबू जी, चाचा जी कहने वाले आज सबको गाली बक रहे हैं. जबकि हमने तो इनको आदेश भी नहीं दिया. जिनको आदेश दिया है वो तो दिल्ली चले गये हैं. अब पाँच साल बाद ही मुलाकात होगी.
तब तक अब जनता के आत्म मंथन का समय है कि जिन्हें आदेश दिया है उनका क्या कहर बरपेगा?
मगर यही तो हर बार होता है. कहाँ कुछ बदलता है?
आदत भी तो कोई चीज होती है, इतनी आसानी से कहाँ बदलती है!!
-समीर लाल ’समीर’
दैनिक सुबह सवेरे में रविवार मई २६, २०१९ को:




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शनिवार, मार्च 09, 2019

सबूत मांगने वालों को मूँह तोड़ जबाब


आज सुबह जब नींद खुली तो खिड़की से झांक कर देखा. सूरज अपने चरम पर झिलमिल मोड में चमक रहा था. खुश हुए कि आज बड़े दिन बाद सही मौसम है. तैयार होकर जैसे ही बाहर निकले, लगा जैसे करेंट लग गया हो. भाग कर वापस घर में आये और ऐलेक्सा से पूछा कि क्या तापमान है? ऐलेक्सा अभी राजनिति नहीं सीख पाई है और न ही गोदी मीडिया हुई है, अतः फिलहाल सच बोलती है. वैसे वो मशीन लर्निंग से लबरेज है, आसपास के माहौल से सीखती है अतः वो दिन दूर नहीं जब वो भी यह सब सीख जायेगी कि कैसे लफ्फाजी करनी है बंदो को खुश रखने के लिए. उसने बताया कि बाहर का तापमान -१८ डीग्री सेल्सियस है मगर हवा के साथ -२५ डीग्री का तापमान महसूस होगा. मेरी नजर के सामने तो शाईनिंग इंडिया घूम गया. खिड़की से जो दिखाया जा रहा है और जो बाहर सच में हालत हैं, कितना जमीन आसमान का फर्क.
एक सेकेंड को बाहर निकले थे और तुरंत जान गये कि असलियत क्या है. खिड़की से देखा गया भ्रमित करने वाला नज़ारा आखिर कितनी देर भ्रम में रखेगा. बाहर कदम रखते हैं असलियत सामने आ ही जानी है. अतः अब सत्य जानकर पूरा तैयार हुए गर्म कपड़ों में और तब निकले सुरक्षित.
शाईनिंग इंडिया की बात चली है तो शाईनिंग से याद आई ’बिल्ली छाप जूता शाईनिंग क्रीम’. सफेद रंग की होती थी, जूते पर पॉलिश के बाद उसे चमकदार बनाने के लिए लगाते थे, पता नहीं अब भारत में मिलती भी है कि नहीं? आजकल तो अधिकतर शाईनिंग जुमलों के जुबानी जमा खर्च से हो रही है.
शक इसलिए हो रहा है कि कल एक वीडियो में एक सांसद मोहदय को एक विधायक मोहदय की जूते से मरम्मत करते देखा. आश्चर्य यह रहा कि जूता पड़ तो मस्त रहा था मगर चमक नहीं रहा था. सत्ता पक्ष में होते हुए इतनी विलासिता की तो बनती है कि जूता सदा चमकता रहे, लहराये भले ही कम. जब जैकेट कुर्ता पजामा दिन में चार चार बार बदल कर हर वक्त चमचमा सकता है तो जूता क्यूँ नहीं?
वीडियो को जब बारीकी से देखा तो सांसद महोदय को जिस तरह जूता उतारने में समय लगा, उन्हें पीटने की लिए कुर्ते की जेब में एक जूता अलग से लेकर चलना चाहिये ताकि उसका सानिद्ध्य रहे और वक्त पर तुरंत काम आवे. ऐसा करते तो शायद दो तीन जूते और लगा लेते.
जूतम पैजार में एक बात और पता चली कि इन सत्ताधारियों की गणित बड़ी कमजोर है. पहले ही उनके आंकड़ों पर प्रश्न उठे हुए हैं जो अभी शान्त भी नहीं हुए हैं और वो कभी सेटेलाईट की तस्वीरों को, तो कभी करांची की पुरानी तस्वीरों को पेश कर कर के आंकड़े सिद्ध करवाने पर तुले है जबकि आंकड़ें हैं क्या, वो ही अभी तक आपस में तय नहीं कर पाये हैं. कोई २०० कहता है, कोई ३०० तो कोई ३५० बताता फिर रहा है. वही हाल उन्होंने जूते बरसाने में किया जिसका की जिन्दा फुटेज़ उपलब्ध है. वरिष्ट उठे थे कहते हुए कि ७० जूता मारुँगा मगर फुटेज़ देखिये तो मारे सिर्फ ७.
एक पुरानी कहावत है यू पी की कि ’हमसे बहस न करियेगा वरना सौ जूता मारेंगे और गिनेंगे दस!!’ इनकी आदतानुसार जैसे अब तक हुई हर पुरानी चीज को यह गलत साबित कर देते हैं, वैसे ही इन्होंने इस मुहावरे को भी सर के बल खड़ा कर दिया. मारा १ और गिने १०. तब ही तो ७ जूते मारकर गिने ७०. बाकी दूसरे वाले आंकड़े ३०० पर भी अगर यही अनुपात लगा लें तो भी हमारे ४० शहीदों के बदले ३० कम तो नहीं..मगर कोई ३०० तो कन्फर्म करे?
खैर, जूते बाजी और आंकड़े अपनी जगह मगर सही नमन उस बंदे को बनती है, जिसने जूते बाजी होने के चन्द सेकेन्ड पहले ही भाँप लिया था कि काण्ड होने वाला है और वो अपने फोन के कैमरे से वीडियो बनाने में जुट गया था.
काश कोई समझे और उस बंदे को सही जगह पर मान सम्मान के साथ बैठाये. ताकि भविष्य में हम किसी भी बड़े काण्ड होने के कुछ क्षण पहले ही सतर्क हो जायें. काण्ड रोक पायें या न रोक पायें वो बाद की बात है, कम से कम वीडियो रिकार्डिंग तो हो ही जायेगी. दुश्मन का तो जो होना हैं सो होगा, उसकी किसे फिकर? मगर सबूत मांगने वालों को मूँह तोड़ जबाब तो दिया ही जा सकता है वीडियो दिखा कर.
-समीर लाल ’समीर’
भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे में रविवार मार्च १०, २०१९ को:     http://epaper.subahsavere.news/c/37446703
 किंचित कारणों से अखबार में पूरा छपने से रह गया है)

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