मंगलवार, मई 17, 2016
हार......
बुधवार, अक्टूबर 28, 2015
जिल्द इक किताब का...
रविवार, अक्टूबर 18, 2015
टैटू पसंद लड़की
रविवार, मार्च 01, 2015
अदृश्य दृश्य
दफ्तर आते जाते अक्सर ही ट्रेन की उपरी मंजिल में बैठ जाता हूं. घोषित ’शांत क्षेत्र’ है अर्थात आपसी बातचीत, फोन आदि की अनुमति नहीं है. अक्सर मरघट की सी शांति की बात याद आती है इस जगह. मगर जब आप किसी से बात नहीं कर रहे होते तो मन के भीतर ही भीतर कितनी सारी बातचीत कर रहे होते हैं यह देखने वाले जान ही नहीं सकते. ऐसी बातें जो यूँ तो शायद ही कर पायें कभी मगर दोनों पात्र खुद ही के भीतर आपस में प्रश्न उत्तर करते, झगड़ते, विवाद करते, जबाब माँगते, उलझन सुलझाते, हँसते और जाने क्या क्या और एकाएक आप खुद को डपट देते हैं कि ये क्या पागलपन है, खुद ही उलझे हो अपने भीतर ही भीतर बातचीत में खुद को भ्रमित करते उसी स्वनिर्मित भ्रम की दुनिया में जो तुमने खुद ही गढ़ ली है बिना कुछ देखे, बिना कुछ जाने.
खुद की झिड़की सुन सकपकाया सा देखने लगता हूँ खिड़की से बाहर. भागती इमारतें, पेड़, सड़के और ठहरा हुआ मैं. भागती ट्रेन के भीतर बैठे यही अहसास कि सब कुछ भाग रहा है और थिर हूँ मैं और थमा हुआ है वक्त मेरा कि एकाएक नजरों की सामने से भागती इमारतें, पेड़ सब बदल जाते हैं कुछ चेहरों में, कुछ ऐसे स्थानों में जो यादों में कहीं दफन हैं और फिर बातचीत का सिलसिला शुरु- वही प्रश्न उत्तर, वही झगड़े, वही विवाद, वही उलझाव सुलझाव, हँसी ठहाके, क्रुदन, खुशबू का अहसास, साथ गुजारे पल और फिर वही खुद को खुद की झिड़की. चेहरे के बदलते भाव और फिर वही खिड़की के बाहर दिखते बदलते अदृश्य दृश्य.
कोई भीड़ में तन्हा और कोई अकेला ही भीड़..समय वही..वक्त का तकाजा जुदा जुदा..
डंडी से ढोल पीटता बाप
और दो बाँसों के बीच
बँधी रस्सी पर
संभल संभल पर खुद को संभालती
डगमग डगमग करतब दिखाती
परिवार के पेट की खातिर
मैली कुचैली फ्राक में छोटी नटनी गुड़िया..
तालियाँ बजाते तमाशबीन...
याद करता हूँ नजारा
और
उतर पड़ता हूँ मन के भीतर
यादों की डोर पर
संभल संभल कर कदम जमाते
कुछ दूर चलने की नाकाम कोशिश
सुनाई देती है खुद की झिड़क
और लौट आता हूँ फिर अपनी
आज की दुनिया में..
कल फिर इन्हीं राहों से गुजरने के लिए...
-समीर लाल ’समीर’
चित्र साभार मित्र प्रशांत के ब्लॉग से
रविवार, सितंबर 21, 2014
तितली
तितली
उस रोज ऊगी थी
बगीचे मे मेरे
गुलाब को चूमते..
आ बैठती थी काँधे पर मेरे
अपनापन पहचान
बगीचे की खुशबू से..
अब बड़ी हुई
और उड़ चली
आज शाम
रंगबिरंगी ईठलाती..
इन्तजार मेरा कहता है कि
कह सुबह वो
फिर लौटेगी उपवन मे मेरे...
कौन जाने!!
कि महज एक सोच
हर उन बुजुर्ग आँखों की...
-समीर लाल ’समीर’
बुधवार, जुलाई 30, 2014
दूर बहुत दूर…
दूर बहुत दूर
मगर मेरे दिल के आस पास
कई दरियाओं के पार
मेरी यादों में बसा
वो शहर रहता है..
जहाँ गुजरा था मेरा बचपन
जिसकी सड़को पर मैं जवान हुआ
वहाँ अब यूँ तो अपना कहने को
कुछ भी नहीं है बाकी
लेकिन उस शहर की गलियों से
मेरा कुछ ऐसा नाता है
कि शाम जब ढलता है सूरज
एक अक्स उस पूरे शहर का
मेरे जहन में उतर आता है...
जाने क्या क्या याद दिलाता है..
और मेरी नजरों के सामने से
अब तक का बीता सारा जीवन
एक पल में गुजर जाता है..
-समीर लाल ’समीर’
बुधवार, अक्टूबर 02, 2013
कुछ वाँ की.. तो कुछ याँ की...
एक नये तरह का प्रयोग किया है...देखें जरा...कैसी गज़ल निकली है:
कब परिंदो को पता था, आंगनों में भेद का
एक दाना वाँ चुगा था, एक दाना याँ चुगा...
सरहदों से जा के पूछो, कौन किसका खून है
एक कतरा वाँ गिरा था, एक कतरा याँ गिरा..
राज इतना जान लो, तब हर अँधेरा दूर हो
एक दीपक वाँ जला था, एक दीपक याँ जला
आसमां को कब पता था, कौन मांगे है दुआ
एक तारा वाँ गिरा था, एक तारा याँ गिरा
है जमाना लाख बदला, पर न बदला है ’समीर’
दिल तुम्हारा वाँ छुआ था, दिल तुम्हारा याँ छुआ..
-समीर लाल ’समीर’
रविवार, सितंबर 08, 2013
फासला - कोई एक हाथ भर का!!
जब रात आसमान उतरा था
झील के उस पार
अपनी थाली में
सजाये अनगिनित तारे
तब ये ख्वाहिश लिए
कि कुछ झिलमिल तारों को ला
टांक दूँ उन्हें
बदन पर तुम्हारे
तैरा किया था रात भर
उस गहरी नीले पानी की झील में
पहुँच जाने को आसमान के पास
तोड़ लेने को चंद तारे
बच रह गया था फासला
कोई एक हाथ भर का
कि दूर उठी आहट
सूरज के पदचाप की
और फैल गई रक्तिम लाली
पूरे आसमान में
खो गये तारे सभी
कि जैसे खून हुआ हो चौराहे पर
मेरी ख्वाहिशों का अभी
और बंद हो गये हो कपाट
जो झांकते थे चौराहे को कभी...
टूट गया फिर इक सपना..
कहते हैं
हर सपने का आधार होती हैं
कुछ जिन्दा घटनाएँ
कुछ जिन्दा अभिलाषायें..
बीनते हुए टूटे सपने के टुकड़े
जोड़ने की कोशिश उन्हें
उनके आधार से..
कि झील सी गहरी तेरी नीली आँखे
और उसमें तैरते मेरे अरमान
चमकते सितारे मेरी ख्वाहिशों के
माथे पर तुम्हारे पसरी सिन्दूरी लालिमा
और वही तुम्हारे मेरे बीच
कभी न पूरा हो सकने वाला फासला
कोई एक हाथ भर का!!
सोचता हूँ .............
फिर कोई हाथ किसी हाथ से छूटा है कहीं
फिर कोई ख्वाब किसी ख्वाब में टूटा है कहीं..
क्या यही है-आसमान की थाली में, झिलमिलाते तारों का सबब!!
-समीर लाल ’समीर’
सोमवार, जुलाई 01, 2013
पहाड़ के उस पार….इस बार मेरी आवाज़ में
सुनिये:
मेरे कमरे की खिड़की से दिखता
वो ऊँचा पहाड़
बचपन गुजरा सोचते कि
पहाड़ के उस पार होगा
कैसा एक नया संसार...
होंगे जाने कैसे लोग...
क्या तुमसे होंगे?
क्या मुझसे होंगे?
आज इतने बरसों बाद
पहाड़ के इस पार बैठा
सोचता हूँ उस पार को
जिस पार गुज़रा था मेरा बचपन...
कुछ धुँधली धुँधली सी स्मृति लिए
याद करने की कोशिश में कि
कैसे था वहाँ का संसार..
कैसे थे वो लोग...
क्या तुमसे थे?
क्या मुझसे थे?
इसी द्वन्द में उलझा
उग आता है
एक नया ख्याल
जहन में मेरे
दूर
क्षितिज को छूते आसमान को देख...
कि आसमान के उस पार
जहाँ जाना है हमें एक रोज
कैसा होगा वो नया संसार...
होंगे जाने कैसे वहाँ के लोग...
क्या तुमसे होंगे?
क्या मुझसे होंगे?
पहुँचुंगा जब वहाँ...
कौन जाने कह पाऊँगा
तब वहाँ की बातें..
कुछ ऐसे ही या कि
बनी रहेगी वो तिलस्मि
यूँ ही अनन्त तक
अनन्त को चाह लिए!!
बच रहेंगे अधूरे सपने इस जिन्दगी के
जाने कब तक...जाने कहाँ तक...
तब कहता हूँ..
“कैसे जीना है किसी को ये सिखाना कैसा
वक्त के साथ में हर सोच बदल जाती है”
-समीर लाल ’समीर’
रविवार, मई 05, 2013
हे नीलकंठ मेरे!!
एक अंगारा उठाया था कर्तव्यों का
जलती हुई जिन्दगी की आग से,
हथेली में रख फोड़ा उसे
फिर बिखेर दिया जमीन पर...
अपनी ही राह में, जिस पर चलना था मुझे
टुकड़े टुकड़े दहकती साँसों के साथ और
जल उठी पूरी धरा इन पैरों के तले...
चलता रहा मैं जुनूनी आवाज़ लगाता
या हुसैन या अली की!!!
ज्यूँ कि उठाया हो ताजिया मर्यादाओं का
पीटता मैं अपनी छाती मगर
तलवे अहसासते उस जलन में गुदगुदी
तेरी नियामतों की,
आँख मुस्कराने के लिए बहा देती
दो बूँद आँसूं..
ले लो तुम उन्हें
चरणामृत समझ
अँजुरी में अपनी
और उतार लो कंठ से
कह उठूँ मैं तुम्हें
हे नीलकंठ मेरे!!
-सोच है इस बार
कि अब ये प्रीत अमर हो जाये मेरी!!
-समीर लाल ’समीर’
मंगलवार, अप्रैल 23, 2013
मैं वही अँधेरों का आदमी…
तुमने छुड़ा कर हाथ मेरा
जो पीछे छोड़ दिये थे अँधेरे
उनसे अभ्यस्त होती मेरी ये आँखे
आज जरा सी टिमटिमटाहट से
उस दीपक की, जो बुझने को है अभी
चौंधिया जाती है...
और मेरा बाँया हाथ....
जिस ओर बैठा कर थमवा दिया था हाथ
उस ब्राह्मण ने मेरा तुम्हारे हाथ में
ये कहते हुए कि हे वामहस्थिनी!!
जगमग होगा भविष्य तेरा
शायद कहा होगा चन्द रुपयों की चाहत में
दक्षिणा स्वरुप कि जी सके वो
और उसका परिवार उस रोज..
हाँ, वही बाँया हाथ आज बढ़ उठता है
बुझाने उस त्य़ँ भी बुझती लौ को दीपक की...
और बुझा करके उसे
खुद जल कर रोशन हो उठता हूँ मैं
जगमग जगमग बुझ जाने को
मगर खुद की रोशनी में अचकचाये
आँख मिचमिचाता मैं
उठा लेता हूँ एक पत्थर
उसी बाँये हाथ से...
फोड़ देने को दर्पण...जो सामने है मेरे
कि खुल सकें ये आँखें..
देखो....यही तो तुम कहती थी कि
कितना अजीब है
यह अँधेरों का जहान...
नहीं बर्दाश्त कर पाता
खुद का रोशन होना भी!!
-मैं फिर खो जाता हूँ अँधेरों में..
मैं हूँ ही अँधेरों का आदमी...
न बर्दाश्त कर पा सकने वाला, खुद के साये को भी!!
-समीर लाल ’समीर’
बुधवार, फ़रवरी 27, 2013
जीत: अब लौट भी तुम आओ
वह सफेद कार में था...
उसने रफ्तार बढ़ा दी...नीली कार पीछे छूटी..फिर पीली वाली...
एक धुन सी सवार हुई कि सबसे जीत जाना है.
वह रफ्तार बढ़ाता गया. जाने कितनी कारें पीछे छूटती चली गईं.
कुछ देर बाद एक मोड़ पर उसकी कार और उसका शरीर क्षत विक्षत पड़ा मिला.
मृत शरीर रह गया, वो सबसे आगे निकल गया- जाने कहाँ?
ये कैसी जीत?
एक कविता- अब लौट भी तुम आओ:
मेरी बाँसुरी की सरगम
वो भी हो गई है मद्धम
कोई जाकर उसे बता दे
कि रुठा हुआ है मौसम....
अब लौट भी तुम आओ
कि ठहरा हुआ है सावन!!
-समीर लाल ’समीर’
रविवार, जनवरी 20, 2013
आहिस्ता आहिस्ता!!
सफ़हा दर सफ़हा
लम्हा दर लम्हा
बरस दर बरस
दर्ज होता रहा
किताब में मेरे दिल की
तुम्हारे मेरे साथ की
यादों का सफर
और मैं
अपने दायित्वों का निर्वहन करता
चलता रहा इस जीवन डगर पर
लादे उस किताब को अपनी पुश्त पर...
कि कभी फुरसत में
मुस्करा लूँगा फिर
पढ़ कर उन यादों को
किश्त दर किश्त
आहिस्ता आहिस्ता!!
-समीर लाल ’समीर’
मंगलवार, मई 29, 2012
एक समय जो गुजर जाने को है
एक बार फिर- तीन कविताओं के साथ प्रस्तुत. शायद जल्द नियमित हो जाऊँ इस उम्मीद के साथ. एक नये उपक्रम को अंजाम देने की चाहत में कुछ पुरानी नियमित दिनचर्या से दूर:
-१-
कह तो गये...
उत्तेजना में आकर
युवा मन के भाव जताने...
धूप
कोई आईना नहीं..
बस अंधकार को मिटा
राह देखने का साधन...
तो फिर..
मिट्टी के कसोरे में
भरो कडुवा तेल..
बना लो रुई की बाती
रगड़ कर हथेलियों में..
और सुलगा उसे
चकमक पत्थर को घिस...
पुकार लेना...
सूरज!!!
कहो!!
पुकार सकोगे यूँ??
नहीं न!!
तभी तो कहता हूँ मैं...
गाँधी को समझ पाने के लिए
एक उम्र चाहिये!!
युवा उत्तेजना से
अनर्गल प्रलाप के सिवाय
क्या पा जाऊँगा मैं इस बाबत!!
-२-
एक चश्मा
उन वादियों के बीच
उतरता है सोच में..
मानिंद
चश्मा
तेरी आँखों की
नम गहराई में..
चौंधियाता है
इन आँखों को..
गर न पहनूँ...
वो चश्मा...
जो खरीदा था तुमने..
मेरे वास्ते..
-३-
कि सोचता हू मैं.. कहानी पढ़ूँ...
कुछ जाम गले से उतारुँ..और
फिर एक कहानी गढ़ूँ...
कि गीत सुन लूँ कोई...
कि गीत गुन लूँ कोई..
और ओढ़ लूँ एक नई शक्शियत..
बदल जाऊँ इन उपकरणों की दुनिया में..
बन एक नया उपकरण...
अचम्भित कर दूँ तुम्हें!!!
बात- एक जाम की...
बात- तेरे नाम की...
-समीर लाल ’समीर’
मंगलवार, अप्रैल 24, 2012
सेन फ्रेन्सिसको से कविता...
फिलहाल इस एतिहासिक शहर सेन फ्रेन्सिसको से लिखी और फेस बुक पर इस बीच मेरे द्वारा चढ़ा दी गई कुछ पंक्तियाँ – चाहें तो ३ कवितायें कह लें...अभिव्यक्ति...अनुभूति...विचार...भाव!!! आपकी इच्छा- हम तो छाप ही रहे हैं.
आगे कभी आपको इस शहर की गलियाँ, सड़कें और तापमान के साथ इसका चेहरा और व्यवहार पढ़वायेंगे. फिलहाल तो यह पढ़ें:
देखा उसे मैने
इलाहाबाद के पथ पर
वो तोड़ती पत्थर...
दो बूँद पसीना....
सुखा पाने की कोशिश
घूप दिखा ..
ज्यूँ सूखता हो चद्दर...
देखा उसे मैने
इलाहाबाद के पथ पर
ज्यूँ सूखता हो चद्दर...
बदल गये युग......
मात्र कुछ पलों में...
निराला गुजरे..
हुए छिन्न तार...
लुटी इस्मत...
वो पहने था खद्दर...
देखा उसे मैने
इलाहाबाद के पथ पर....
वो पहने था खद्दर...
(आदरणीय निराला जी की रचना से प्रेरित और उनको नमन करते हुए आभारी)
शुक्रवार, मार्च 02, 2012
६ साल पूरे हुए और हम जहाँ के तहाँ: मैं मोती होना नहीं चाहता!!!
जब ३ मार्च २००६ को अपना ब्लॉग शुरु किया था तो बताया गया था कि बस एक साल की मेहनत और फिर इससे कमाई शुरु हो जायेगी. बड़े मन से जुटे. फिर साल दर साल बीतते गये. हर साल यही उम्मीद कहीं न कहीं बँधाई गई कि अगले साल से ...कमाई शुरु.
आज ६ साल बीत गये. मगर लोगों की बात सुन आज भी आशांवित हूँ कि बस, अगले साल से कमाई शुरु होने वाली है और फिर नौकरी छोड़ो और बस, दिन भर ब्लॉगिंग...जितना करोगे, उतना मजा...उतनी कमाई...क्या बात है!!
आज हो गये हैं ६ साल पूरे इस ब्लॉग का नशा लगे. समय के पंख दिखते नहीं मगर इस तरह अहसास तो करा ही देते है. फोटो वही पुराना लगाया हुआ है ६ साल पहले का. यही विडंबना है अधेड़ावस्था की कि जवानी का जाना मानो स्वीकार ही न हो...कई बार सोचता हूँ कि इससे बेहतर तो राजनिति मे उतर जाऊँ...वहाँ स्वीकार्य है चिर युवा रहना....आडवानी जी जैसे युवा अब भी प्रधान मंत्री बनने का स्वपन पाले लगे ही हैं रथ यात्रा निकालने में तो हमारी स्थिति तो थोड़ी बेहतर ही कहलायेगी.
खैर यह सब छोड़ें..६ साल के ब्लॉगर की कविता पढ़े...बधाई दें, मुस्करायें या जो मन आये सो करें मगर शुभकामनाएँ तो दे ही जायें:
कभी मन में था कि साहित्यकार कहलाऊँ ब्लॉग लिख लिख कर...हा हा...ब्लॉग और साहित्य...कितने न मुस्करा देंगे..अनभिज्ञ एवं बेवकूफ...मगर मैं चुप रहूँगा...क्यूँ कुछ कह कर अपने संबंध खराब करुँ....अब मन नहीं हैं साहित्यकार कहलाने का...मगर मन पर तो लोभ ने कब्जा जमाया हुआ है..उसका क्या करुँ...इस कविता में दृष्य देखें तो शायद आपका मन भी बदले:
मैं मोती होना नहीं चाहता!!!
बूँद एक चली
छोड़ बादल को
प्रसन्न मन
मिलेगी नीचे धरा पर
एक तत्काल बनी नाली में
जहाँ तेरती होंगी
नन्ही नन्ही किश्तियाँ
कागज़ की
वहीं
बनायेगी साथी बून्दों को
दोस्त अपना...
खेलेगी, गुनगुनायेगी
उमंगों में डूब
उन के साथ
गली में अक्स्मात बनी
एक नाली खुश हुई
आकर मिलेंगीं और बून्दें
तो वह मिल सकेगी
शहर भर की नालियों के संग..
पूछेगी हाल सारे शहर का...
गपियायेगी..खिलखिलायेगी और
मिलेंगी
इक नदिया में जाकर
नदी खुश थी
उमड़ती हुई धाराओं से मिल
जा सकेगी वह
उस गहरे सागर तक
जहाँ आती हैं सब नदियाँ उसकी तरह
बाँटेगी उनकी खुशियाँ..
हँस लेगी उनके साथ..
रहेगी खुश...
और सागर...
समाहित कर सबको अपने भीतर
शांत और गंभीर.....
फिर एक दिन एक हिस्सा
बन जाता वाष्प...
सूर्य की उष्मा से...
और उठ जा मिलती
उष्मा से बनी वाष्पकिरणें...बूँदें...
पुनः उन्हीं बादलोंमें...
जीवन के
अनवरत गतिक्रम सी
एकाएक एक बूँद रो उठती है
इस बार विदा होते...
कहीं मैं नाली की जगह
सीप में न समा जाऊँ...
मैं मोती बनना नहीं चाहती...
माना मोती कीमती होता है पर
मुझे...हाँ.....मुझे
फिर वापस आना है
अपनों से मिलने
और बनाये रखनी है
अपने होने की अस्मिता
आज फिर एक बार
आँख नम है मेरी...
मुझे वापस आना है...
अपनों में मिल जाना है!!!!
-मैं मोती होना नहीं चाहता!!!
-समीर लाल ’समीर’
मंगलवार, दिसंबर 20, 2011
ये कौन मसीहा निकसा है….
एक कोशिश करता रहता हूँ
मैं बस.. मैं.. नहीं
कुछ और हो जाऊँ
उलझन उलझन तैर रहा हूँ
जाने क्या से क्या हो जाऊँ
कभी सोचता धूप बनूँ मैं
या पेड़ों की छाया हो जाऊँ..
कभी लगा कि बनूँ आसमां
या फिर धरा हरी हो जाऊँ..
लू के मैं बनूँ गरम थपेड़े
या सौंधी सौंधी नमीं माटी की हो जाऊँ...
नदिया बन झर झर बहूँ
या पहाड़ एक बुलन्द हो जाऊँ
कहानी लिखूँ, कविता रचूँ
या तुकबंदी कर कवि हो जाऊँ...
सोचा कि कोयल हो जाऊँ
या कोयल की धुन में खो जाऊँ
सीना मानिंद फौलाद रखूँ
या मोम सरीखा दिल रख कर
पर पीड़ा पर रो आऊँ...
कुछ राज दफन कर लूँ दिल में
या बिगुल बजा आह्वान करुँ
या बदलूँ इन हालातों को
और नैतिकता का सम्मान करुँ
कि भीड़ अकेला बन जाऊँ..
अनशन कर अभिमान करुँ...
फिर तुम आना और कह देना
ये कौन मसीहा निकसा है
जब दमित करें आवाज मेरी
हो मौन-फकीरा फिरता है...
यूँ याद रखेगा जग मुझको
कि आने वाली नस्लों को
मैं याद बना भयभीत करुँ
समझौता करना जीवन है..
ऐसा कानों में गीत भरुँ...
फिर कौन मसीहा जागेगा..
षड़यंत्रों के इस जाले में..
घिर करके यूँ डर जाने को....
यूँ मौन धरे मर जाने को...
-समीर लाल ’समीर’
चित्र साभार: गुगल
रविवार, सितंबर 25, 2011
पावन मकड़जाल ....
पढ़ता हूँ कुछ साहित्यिक पुरस्कार प्राप्त कहानियाँ और कवितायें नये जमाने की और सोचता हूँ:
शब्द शब्द जोड़
कुछ ऐसा सजाऊँ
जैसे काढ़ी हो सलीके से
कुछ बूटियाँ
और तैयार कर....
एक जामा
पहना दूँ अपनी कविता को...
इस खूबसूरती से
कि निखर जाए उसका रूप सौन्दर्य भी
उकेर दूँ उसके अंग अंग...
उसकी निश्चेत
फेन्टिसीज को उभारती हुई..
शायद
जीत लूँ
एक ईनाम मैं भी
साहित्य के इस तथाकथित
पावन मकड़जाल में....
-समीर लाल ’समीर’
मैं पूछता उस अंधेरी रात में बिस्तर पर लेटे अंधेरे में छत को ताकते तुमसे:
’कोई गाना सुनोगी?’
तुम कहती
’क्या तुम गाओगे अपना गीत?’
मैं कहता...
’न, मैं थका हूँ.. सी डी लगा देता हूँ...फरीदा गा देगी.. दिल जलाने की बात करते हो...आशियाने की बात करते हो..’
तुम कहती...
-हूंह्ह...फिर आगे से ऐसी बात न छेड़ना...जो तुम न कर पाओ...बस, सो जाओ...अब...’
मैं सोचता हूँ....
’अब बात क्या छेडूँ???’
मौन की न जाने क्या ताकत है...अब जानूँगा मैं!!!
फेरीवाले की
इकतारे की धुन..
और
बचपन
भाग निकलता था गलियों में....
उस धुन को बजा लेने की कोशिश में
न जाने कितने दीपक फोड़े हैं मैने
न जाने कितने ख्वाब जोड़े हैं मैने
लेकिन
मन है कि
मानता नहीं!!
और
वो फेरीवाला...
ये बात
जानता ही नहीं...
-समीर लाल ’समीर’
जिंदगी की आंधी में
फड़फड़ाते भावों के पन्ने
शब्दों की कलम में
आँसूओं की स्याही..
कुछ खास रच जाने को है..
एक आत्म कथा..
एक कविता...
या
नज़्म पुकारेंगे लोग उसे...
तुम-
चुप रह जाना..
बिना कुछ कहे..
सब सह जाना...
-समीर लाल ’समीर’
(फेसबुक पर बिखेरे टुकड़े सहेजते हुए)
मंगलवार, फ़रवरी 08, 2011
एक रात कुछ यूँ गुजरे....वीरान कविता रचते
पूरे ८५ दिन याने लगभग तीन माह भारत में रह जब कनाडा वापस आने को ट्रेन में बैठा तो लगा कि क्या क्या सोच कर आया था और कितना कम पड़ गया समय. सोचा था कि १० दिनों को केरल भी घूम आयेंगे इस बार, वो भी रह गया. समय ऐसा पंख लगा कर उड़ा कि कुछ पता ही नहीं लगा.
लगता था जैसे कल ही आये हों और आज वापस चल दिये. कितने सारे मित्रों से कितनी सारी बातें करनी थी. कितने ही रिश्ते नातेदारों से मिलने का दिल था.कितने ही शहरों में पहुँचने की नाकाम कोशिश. बस, यूँ ही कुछ कारण बनते गये, दिन बीतते रहे और आज वापसी. सब आधा अधूरा सा, छूटा हुआ.
अब न जाने कब आना हो फिर से? यदि कुछ विशिष्ट कारण न हो जाये तो साल भर के पहले तो क्या आना होगा.
मन उदास होने लगता है. सोचता हूँ, अगली बार ज्यादा दिन के लिए आऊँगा और जरा ज्यादा व्यस्थित कार्यक्रम बना कर. केरल घूमने का कार्यक्रम तो निश्चित ही शामिल रहेगा.
भारी मन से एक नजर रेल की खिड़की के बाहर देखता हूँ. रेल भाग रही है और कितना कुछ पीछे छूटा जा रहा है.
सामने की सीट पर नजर पड़ती है. लगभग ३४/३५ वर्ष का एक दुबला पतला युवक, अपनी पत्नी के साथ बैठा है एकदम शांत. चेहरे पर कोई भाव नहीं. उसकी पत्नी की आँखों के नीचे पड़े काले गोले उसके परेशान होने की गवाही दे रहे हैं.
बात चलती है.
दोनों एक रोज पहले ही बम्बई से लौटे हैं. महैर में रुक माँ शारदा देवी के दर्शन करके अब अपने घर आगरा लौट रहे हैं. टाटा मेमोरियल में पति का ईलाज चल रहा था. केंसर अंतिम स्टेज में है. डॉक्टर कहता है कि ज्यादा से ज्यादा ३० दिन के मेहमान है. घर ले जाओ.
मैं एक गहरी सांस छोड़ता हूँ-बस, ३० दिन. क्या कुछ करने की सोचता होगा इन ३० दिनों में वो. कितने कुछ अरमान साथ लिये जायेगा और फिर उसे तो अगली बार की तसल्ली भी नहीं.....
एक बार फिर भारी मन से खिड़की के बाहर नजर गड़ा देता हूँ. हल्का अँधेरा घिर आया है. वीरान सा पड़ा रेलवे का ’एबेन्डन्ड सिग्नल केबिन’ सामने से गुजर जाता है और जागते है कुछ उजड़े से ख्यालात मेरे जेहन में, बस यूँ ही दम तोड़ देने को.
रात आसमान में
अपनी उजली चादर
बिछाता चाँद...
झाड़ियों की झुरमुट में
अँधेरों को हराने की
नाकाम कोशिश में जुटे
जुगनुओं की जगमगाहट
कहीं दूर से आती
मालगाड़ी की सीटी का
कर्णभेदी हुँकार
नजदीक के खेत की
कच्ची झोपड़ी से उठती
एक बुढिया की
सूखी खाँसी की खंखार..
चूल्हे से
ओस में भीगी लकड़ियों के
जलने से उठते
धुँए की घुटन
और
उस पर
अलमुनियम की ढक्कन वाली केतली
में चढ़ी
काली कॉफी का
कड़वा घूँट भरते हुए
पटरी किनारे
उस निर्जन वीरान रेलवे के
’एबेन्डन्ड सिग्नल केबिन’ में
एक रात गुजारुँ
और
कुछ
अजब सी
बेवजह
वीरान
कविता रचूँ
मैं!!!
-समीर लाल ’समीर’
रविवार, अक्टूबर 10, 2010
प्यार तुम्हारा इक दिन..
एक बार भारत यात्रा के दौरान एक कवि सम्मेलन में शिरकत कर रहा था. एक कवि महोदय ने गीत प्रस्तुत किया. उसकी धुन मुझे बहुत पसंद आई और कई दिनों तक जेहन में गुँजती रही. फिर उसी धार पर मिसरा लिया और रचा अपना गीत. बहुत बार तो मंच से सुना चुका लेकिन फिर वही. ब्लॉग पर खोज रहा था तो पता लगा कि आप सबको तो पढ़वाया ही नहीं. तो आज वो ही सही:
प्यार तुम्हारा इक दिन हासिल हो शायद
बस्ती बस्ती आस लिए फिरता हूँ मैं....
प्यार की पाती जितनी भी लिख डाली है
यूँ नाम गज़ल दे लोग उसे पढ़ जाते हैं...
अपने दिल के भाव जहाँ भी मैं कहता हूँ
गीतों की शक्लों में क्यूँ वो ढ़ल जाते हैं...
मुझको ज्ञान नहीं है तनिक इन छंदों का
बस मन में अपनी राग लिये फिरता हूँ मैं..
प्यार तुम्हारा इक दिन हासिल हो शायद
बस्ती बस्ती आस लिए फिरता हूँ मैं....
तनहा तनहा सर्दीली भीगी रातों में
विरह अगन से बदन मेरा जल जाता है
बरसाती आँधी वो जब जब भी चलती है
महल हमारे सपनों का फिर ढह जाता है
मौसम चाहे जितने रंग आज बदल डाले
दिल में इक मधुमास लिए बस फिरता हूँ मैं..
प्यार तुम्हारा इक दिन हासिल हो शायद
बस्ती बस्ती आस लिए फिरता हूँ मैं....
जो दूर हुए मुझसे वो मेरे अपने थे
फिर पाऊँगा प्यार, वो मेरे सपने थे
ऐसा नहीं कि रिश्ते कोई बन्धन हैं,
जाने फिर क्या तोड़ चला मेरा मन है.
सारे रिश्ते तोड़ के अपने अपनों से
बेगानों संग प्रीत किए बैठा हूँ मैं.
प्यार तुम्हारा इक दिन हासिल हो शायद
बस्ती बस्ती आस लिए फिरता हूँ मैं....
-समीर लाल ’समीर’














