सोमवार, अक्टूबर 24, 2016
शहर के पाँव
सोमवार, जुलाई 29, 2013
जन्मदिन पर गुरुदेव का आशीष!!
उफ़ क्यों याद दिलाता कोई
उम्र ढल रही धीरे धीरे
गाकर गीत जनम दिन वाले
और बजा कर ढोल मजीरे
लेकिन जग की रीत यही है
औपचारिकी होना ही है
घिसा हुआ वह हैपी हैपी
रोना सबको रोना ही है
लेकिन कुछ ऐसे भी तो हैं
सदा लीक से हट कर चलते
दोपहरी का दीपक बन कर
नौका एक रात की खेते
उनसे ही ले नाधुर प्रेरणा
मुझको केवल यह कहना है
हर दिन, उगते सूरज जैसे
दीप्तिमान तुमको रहना है
आंधी,बरसातें,झंझाएं
कोई बाधा बन ना पाए
दिवस आज का बरस पूर्ण यह
गीत आपके ही दोहराये.
सादर
शुभकामनाओं सहित
राकेश खंडेलवाल
http://geetkalash.blogspot.ca/
शुक्रवार, मार्च 02, 2012
६ साल पूरे हुए और हम जहाँ के तहाँ: मैं मोती होना नहीं चाहता!!!
जब ३ मार्च २००६ को अपना ब्लॉग शुरु किया था तो बताया गया था कि बस एक साल की मेहनत और फिर इससे कमाई शुरु हो जायेगी. बड़े मन से जुटे. फिर साल दर साल बीतते गये. हर साल यही उम्मीद कहीं न कहीं बँधाई गई कि अगले साल से ...कमाई शुरु.
आज ६ साल बीत गये. मगर लोगों की बात सुन आज भी आशांवित हूँ कि बस, अगले साल से कमाई शुरु होने वाली है और फिर नौकरी छोड़ो और बस, दिन भर ब्लॉगिंग...जितना करोगे, उतना मजा...उतनी कमाई...क्या बात है!!
आज हो गये हैं ६ साल पूरे इस ब्लॉग का नशा लगे. समय के पंख दिखते नहीं मगर इस तरह अहसास तो करा ही देते है. फोटो वही पुराना लगाया हुआ है ६ साल पहले का. यही विडंबना है अधेड़ावस्था की कि जवानी का जाना मानो स्वीकार ही न हो...कई बार सोचता हूँ कि इससे बेहतर तो राजनिति मे उतर जाऊँ...वहाँ स्वीकार्य है चिर युवा रहना....आडवानी जी जैसे युवा अब भी प्रधान मंत्री बनने का स्वपन पाले लगे ही हैं रथ यात्रा निकालने में तो हमारी स्थिति तो थोड़ी बेहतर ही कहलायेगी.
खैर यह सब छोड़ें..६ साल के ब्लॉगर की कविता पढ़े...बधाई दें, मुस्करायें या जो मन आये सो करें मगर शुभकामनाएँ तो दे ही जायें:
कभी मन में था कि साहित्यकार कहलाऊँ ब्लॉग लिख लिख कर...हा हा...ब्लॉग और साहित्य...कितने न मुस्करा देंगे..अनभिज्ञ एवं बेवकूफ...मगर मैं चुप रहूँगा...क्यूँ कुछ कह कर अपने संबंध खराब करुँ....अब मन नहीं हैं साहित्यकार कहलाने का...मगर मन पर तो लोभ ने कब्जा जमाया हुआ है..उसका क्या करुँ...इस कविता में दृष्य देखें तो शायद आपका मन भी बदले:
मैं मोती होना नहीं चाहता!!!
बूँद एक चली
छोड़ बादल को
प्रसन्न मन
मिलेगी नीचे धरा पर
एक तत्काल बनी नाली में
जहाँ तेरती होंगी
नन्ही नन्ही किश्तियाँ
कागज़ की
वहीं
बनायेगी साथी बून्दों को
दोस्त अपना...
खेलेगी, गुनगुनायेगी
उमंगों में डूब
उन के साथ
गली में अक्स्मात बनी
एक नाली खुश हुई
आकर मिलेंगीं और बून्दें
तो वह मिल सकेगी
शहर भर की नालियों के संग..
पूछेगी हाल सारे शहर का...
गपियायेगी..खिलखिलायेगी और
मिलेंगी
इक नदिया में जाकर
नदी खुश थी
उमड़ती हुई धाराओं से मिल
जा सकेगी वह
उस गहरे सागर तक
जहाँ आती हैं सब नदियाँ उसकी तरह
बाँटेगी उनकी खुशियाँ..
हँस लेगी उनके साथ..
रहेगी खुश...
और सागर...
समाहित कर सबको अपने भीतर
शांत और गंभीर.....
फिर एक दिन एक हिस्सा
बन जाता वाष्प...
सूर्य की उष्मा से...
और उठ जा मिलती
उष्मा से बनी वाष्पकिरणें...बूँदें...
पुनः उन्हीं बादलोंमें...
जीवन के
अनवरत गतिक्रम सी
एकाएक एक बूँद रो उठती है
इस बार विदा होते...
कहीं मैं नाली की जगह
सीप में न समा जाऊँ...
मैं मोती बनना नहीं चाहती...
माना मोती कीमती होता है पर
मुझे...हाँ.....मुझे
फिर वापस आना है
अपनों से मिलने
और बनाये रखनी है
अपने होने की अस्मिता
आज फिर एक बार
आँख नम है मेरी...
मुझे वापस आना है...
अपनों में मिल जाना है!!!!
-मैं मोती होना नहीं चाहता!!!
-समीर लाल ’समीर’
रविवार, मई 29, 2011
अभी कुछ और..बाकी है!!!
मित्र प्रवीण पाण्डेय जी का एक बहुत लोकप्रिय ब्लॉग है : न दैन्यं न पलायनम् उस ब्लॉग पर अपने आस पास की नितचर्या के माध्यम से इतना बेहतरीन जीवन दर्शन का पाठ मिलता है कि हमेशा इन्तजार रहता है कि कब नया आलेख आये और उससे कुछ लाभ मिले. कुछ दिनों पहले वहीं एक आलेख ’जीवन दिग्भ्रम’ पढ़ा था. जाने कैसे पढ़ते पढ़्ते भाव उभरे उस आलेख पर कि एकाएक दिल कह उठा:
इन्हीं राहों से गुज़रे हैं मगर हर बार लगता है
अभी कुछ और,अभी कुछ और ,अभी कुछ और बाक़ी है
बस, यही शेर दर्ज कर दिया वहाँ टिप्पणी में. टिप्पणी किये पाँच मिनट भी न बीते होंगे कि मित्र नवीन चतुर्वेदी का ईमेल आ धमका; मस्त मस्त शेर सर जी!!!!!!!!!!!!!!!!! आप का ही है न?
तब हमें समझ आया कि अरे, हम तो शायद कोई शेर कह गये. :)
मेरी स्वीकारोत्ति पाकर उन्होंने इतना अच्छा शेर पीछे छोड़ आने के बतौर जुर्माना आदेश पारित किया कि अब इस पर आप पूरी गज़ल लिखें, तभी बात होगी.
हीरे को पारखी ने पहचान लिया वरना हम तो कोयला समझ छोड़ आये थे वहीं. (आजकल खुद की पीठ ठोंकने में महारत हासिल कर रहा हूँ, नये जमाने का यही चलन है) :) नवीन जी से छंद ज्ञान ले रहे हैं और साथ ही अपनापन सदा से रहा है, तो भला उनका आदेश कैसे टालता, हामी भर दी. लगे जोड़ा जाड़ी करने. रदीफ, काफिया मिलाने. जोड़ जाड़ कर किसी तरह चार दिन भट्टी पर चढ़ाये पकाते रहे, सुबह शाम फेर बदल करते रहे और फिर प्राण शर्मा भाई साहब का आशीर्वाद लिया अपने लिखे पर और ये देखो, चले आये आपके सामने गज़ल लेकर.
अब आप पढ़े और बतायें:
इन्हीं राहों से गुज़रे हैं मगर हर बार लगता है
अभी कुछ और,अभी कुछ और ,अभी कुछ और बाक़ी है
हमेशा ज़ख़्मी दिल को दोस्तो ये खौफ रहता है
अभी कुछ और,अभी कुछ और ,अभी कुछ और बाक़ी है
दिखा मैं साथ जो तेरे तो दिल ये हंस के कहता है
अभी कुछ और,अभी कुछ और,अभी कुछ और बाक़ी है
ये शायद सोच कर आँसू मेरी आँखों से गिरता है
अभी कुछ और,अभी कुछ और,अभी कुछ और बाक़ी है
यही कह कर वो रातों में सभी तारों को गिनता है
अभी कुछ और,अभी कुछ और,अभी कुछ और बाक़ी है
हज़ारों ग्रन्थ पढ़ डाले मगर क्यों नित ये लगता है
अभी कुछ और,अभी कुछ और,अभी कुछ और बाकी है
दिलों के बैर को कोई कुछ ऐसे साफ़ करता है
अभी कुछ और,अभी कुछ और,अभी कुछ और बाक़ी है
अजब इन्सान का चेहरा हमेशा यूँ ही दिखता है
अभी कुछ और,अभी कुछ और,अभी कुछ और बाक़ी है
-समीर लाल ’समीर’
बुधवार, मार्च 02, 2011
युगपुरुष
उस रात किसी बड़ी किताब का भव्य विमोचन समारोह था. यूँ भी हिन्दी में किताबों के बड़े या छोटे होने का आंकलन उसके लेखक के बड़े या छोटे होने से होता है और लेखक के बड़े या छोटे होने का आंकलन उसके संपर्कों के आधार पर.
बड़े लेखक की बड़ी किताब का विमोचन हो तो विमोचनकर्ता का बड़ा होना भी जाहिर सी बात है. अतः इस समारोह के विमोचनकर्ता भी बहुत बड़े और नामी साहित्यकार थे. वह इतना अच्छा लिखते हैं कि वर्षों से इसी चक्कर में कुछ लिखा ही नहीं (शायद भीतर ही भीतर यह भय सताता हो कि कहीं कमतर न आंक लिए जाये) मगर फिर भी, नाम तो चल ही रहा है.
अधिकतर अच्छा लिखने वालों के साथ यही विडंबना है कि वो इतना उत्कृष्ट लिखते हैं, इतना अच्छा लिखते हैं कि कुछ लिख ही नहीं पाते. बरसों बरस बीत जाते हैं उनका अच्छा लिखा पढ़ने को. बस, उनसे दूसरों के बारे में सुनने और पढ़ने के लिए यही मिलता चला जाता है कि फलाने ने अच्छा लिखा और ढिकाने ने खराब. सलाह भी उन्हीं की ओर से लगातार बरसती है कि अच्छा लिखने की कोशिश होना चाहिये साहित्य को धनी बनाने के लिए. वे बिना अपना योगदान देखे, हर वक्त दुखी नजर आते हैं कि आजकल अच्छा नहीं लिखा जा रहा है और यह चिन्ता का विषय है.
मंचासीन श्रृद्धास्पद विभूतियों में एक तो लेखक स्वयं, फिर मुख्य अतिथी की आसंदी को सुशोभित करते ’सुकलम सम्मान’, २००८ से सम्मानित वरिष्ठ साहित्यकार, कविमना, उपन्यासकार, आलोचक माननीय श्रद्धेय आचार्य श्री चंडिका दत्त शास्त्री, किताब के प्रकाशक एवं कार्यक्रम के संचालक स्थानीय साहित्यकार एवं कवि श्री विराट स्तंभी जी.
सस्वर सरस्वती पूजन, माल्यार्पण आदि के बाद संचालक महोदय ने माईक संभाला और मुख्य अतिथि का परिचय प्रदान करते हुए स्तुति गान में ऐसा रमे कि यह कह कर मुस्कराने लगे कि माननीय मुख्य अतिथी श्रद्धेय आचार्य श्री चंडिका दत्त शास्त्री पुरुष नहीं हैं.
इतना कह वह मौन हो गये और मुस्कराते हुए मंच से लोगों के हावभाव देखते रहे. पूरे हॉल में इस सनसनीखेज खुलासे की वजह से सन्नाटा छा गया. सब छिपी आँख एक दूसरे को देखने लगे. संपूर्ण मंच भी असहज सा नजर आने लगा तब श्री विराट स्तंभी जी आगे बोले कि माननीय मुख्य अतिथी श्रद्धेय आचार्य श्री चंडिका दत्त शास्त्री जी पुरुष नहीं, महापुरुष हैं. तब जाकर सभागृह में जान लौटी. श्री विराट स्तंभी जी के इस बयान से उनके सहज हास्य बोध का परिचय मिला जबकि कर्म एवं नाम से वह वीर रस हेतु प्रख्यात हैं. पूरे सभागृह में करतल ध्वनि की गुंजार उठ खड़ी हुई.
विचार आया कि यदि दो वाक्यों के बीच मौन के दौरान बिजली महारानी की कोप दृष्टि पड़ जाती, तब क्या होता?
अपनी बात आगे बढ़ाते हुए श्री विराट स्तंभी जी नें अन्य बातों के अलावा यह भी बताया कि माननीय मुख्य अतिथी श्रद्धेय आचार्य श्री चंडिका दत्त शास्त्री एक व्यक्ति नहीं, अपने आप में संपूर्ण संस्था हैं.
संस्था का नाम सुनते ही मेरी रीढ़ की हड्ड़ी में न जाने क्यूँ एक अरसे से एक सुरसुरी सी दौड़ जाती है. एक चित्र खींच आता है मानस पटल पर किसी संस्था का, जिसे अपने पापों, घोटालों को अंजाम देने के लिए सबसे मुफीद और पावन उपाय मान व्यक्ति, व्यक्ति न रह संस्था में बदल जाता है. फिर गोपनीय वार्षिक बैठक, बेनामी पदाधिकरी और स्वयंभू अध्यक्ष की आसंदी पर विराजमान स्वयं वह.
देश में आजतक जितना संस्थाओं के नाम पर घोटालों को अंजाम दिया गया है, उतना शायद ही कहीं और हुआ हो किन्तु फिर भी यह प्रचलन हर जगह और खास तौर पर ऐसे समारोहों में मुख्य अतिथि के लिए लगातार देखने मिलता रहता है कि वह व्यक्ति नहीं, एक संस्था हो गये हैं.
शायद संस्था ही वह वजह हो जिससे उनका स्टेटस बिना बरसों तक लिखे भी बहुत ऊँचा लिखने वाले का बरकरार रहा आया हो, कौन जाने? संस्था के भीतर की बात जानना तो सरकारी ऑडीटर के लिए भी टेढ़ी खीर ही रहा है अतः भीतर जाने की बजाय वो बाहर के बाहर पैसे लेकर निपटारा करना सदा से सरल उपाय मानता रहा है. यह पुराणों में भी संस्था और ऑडीटर दोनों के लिए ही सहूलियत का मार्ग माना गया है.
खैर, समारोह बहुत भव्य रहा. उतना ही भव्य मुख्य अतिथि का उदबोधन जिसमें उन्होंने पुनः साहित्य और लेखन के गिरते स्तर पर गहरी चिन्ता जतलाई और इस पुस्तक को इस दिशा में सुधार लाने का एक ऐतिहासिक कदम निरुपित किया.
इस कार्यक्रम के बाद एक और वरिष्ट साहित्यकार की श्रद्धांजलि सभा में जाना था. वहाँ भी श्रद्धांजलियों के दौर में अनेक संदेशों में मृतात्मा को एक व्यक्ति नहीं, युग बताया गया और उनके अवसान को एक युग का पटाक्षेप.
एक युग के भीतर समाप्त होते अनेक युग, हर वरिष्ठ, हर गरिष्ठ के प्रस्थान के साथ एक युग का पटाक्षेप, और एक ऐसे रिक्त का निर्माण, जिसकी भरपाई कभी संभव नहीं. शुरु से आजतक ऐसे रिक्त स्थानों की जिनकी भरपाई संभव न थी, एक एक बिन्दी के आकार का भी गिन लें तो शीघ्र ही, या कौन जाने पूर्व में ही, शायद ही कोई स्थान बचे जो रिक्त न हो.
कैसी ये
भीषण त्रासदि
न गरीब बचे,
न अमीर
भाषा
संवेदनशीलता
इन्सानियत
सब जाते रहे....
एक उम्मीद थी जिनसे
लिखेंगे शोकगीत इनपर
उनका भी यूँ गुजर जाना
एक युग की समाप्ति नहीं
तो और क्या है?
-समीर लाल ’समीर’
<< आज उड़न तश्तरी के ५ साल पूरे हुए. इस बीच आपसे प्राप्त स्नेह और उत्साहवर्धन के लिए हृदय से आभारी. कृपया अपना स्नेह बनाये रखें>>
गुरुवार, नवंबर 25, 2010
दिल्ली में मिले दिल वालों से..१३ नवम्बर, २०१०
इतना सारा स्नेह, इतना सम्मान-ढेरों रिपोर्टिंग.
आनन्द आ गया दिल्ली मिलन समारोह में.
अक्षरम हिंदी संसार और प्रवासी टुडे से जुडे अनिल जोशी जी एवं अविनाश वाचस्पति जी जिस दिन मैं दिल्ली पहुँचा, उसके अगले दिन ही आकर मिले. बहुत देर चर्चा हुई, चाय के दौर चले और तय पाया कि सभी ब्लॉगर मित्र कनाट प्लेस में मुलाकात करेंगे. १३ तारीख को शाम ३ बजे मिलना तय पाया.
१३ तारीख को सतीश सक्सेना जी का फोन आया और उन्होंने मुझे अपने साथ चलने का ऑफर दिया. अंधा क्या चाहे, दो आँख. मैं तुरंत तैयार हो गया मगर जब बाद में पता चला कि वह मुझे लेने नोयडा से दिल्ली विश्व विद्यालय नार्थ कैम्पस तक आये हैं और उसकी दूरी और ट्रेफिक को जाना तो लगा कि काश!! मैं खुद से चला जाता तो उन्हें इतना परेशान न होना पड़ता.
कनाट प्लेस जैन मंदिर सभागर में बहुत बड़ी तादाद में ब्लॉगर मित्र पधारे थे, सभी के नाम आप विभिन्न रिपोर्टों में पढ़ ही चुके हैं उन सबके साथ साथ वहाँ प्रसिद्ध व्यंग्यकार मान. प्रेम जनमजेय जी को पाकर मन प्रफुल्लित हो उठा. फिर पाया कि वहाँ मीडिया रिसर्च स्कॉलर श्री सुधीर जी के साथ अनेक बच्चे मीडिया शिक्षार्थी ब्लॉगिंग के विषय में कुछ जानने समझने आए हैं. बहुत अद्भुत नजारा था सब का मिलना. इन्हीं शिक्षार्थियों में एक छात्रा रिया नागपाल जिसने हिंदी ब्लॉगिंग को ही शोध के विषय के रूप में चुना है, से मुलाकात हुई और उसने मुझे याद दिलाया कि एक बार वह मेरा इसी विषय पर कनाडा से साक्षात्कार ले चुकी है. बहुत अच्छा लगा सबसे मिलकर.
लगभग सभी ब्लॉगर मित्रों को मैं तुरंत पहचान गया. राजीव तनेजा (संजू तनेजा जी से फोन पर बात हुई थी पहले), मोहिन्दर जी और सुनिता शानु जी से तो पहले भी मिला था बस, रतन सिंह जी बिना पगड़ी के पहचान नहीं आये और अजय कुमार झा को देख लगा जैसे कोई कालेज के फर्स्ट ईयर का छात्र है, जबरदस्त मेन्टेनेन्स के लिए वो बधाई के पात्र हैं. शहनवाज से भी एक दिन पूर्व फोन पर चर्चा हुई और वहाँ इस उर्जावान युवा मिलना से बहुत अच्छा लगा. श्री तारकेश्वर गिरि जी ,श्री नीरज जाट जी (पहले चैट पर आवाज तो सुन ही चुका था इनकी, बस दर्शन बाकी थे) , श्री अरुण सी रॉय जी, श्री एम वर्मा जी, श्री सुरेश यादव जी (आप विशेष तौर पर मिलने के लिए एक दिन रुके रहे दिल्ली में) , श्री निर्मल वैद्य जी , श्री अरविन्द चतुर्वेदी जी, एलोवेरा वाले राम बाबू सिंह जी, डॉ वेद व्यथित जी, मयंक सक्सेना (बाद में मयंक ने टीवी के लिए इन्टरव्यू भी लिया), कनिष्क कश्यप (बहुत व्यस्तता के बीच पधारे), दीपक बाबा, भतीजे पद्म सिंह , श्री राजीव तनेजा जी ,श्री कौशल मिश्र , पुरबिया जी, नवीन चंद्र जोशी जी, ,पंकज नारायण जी , सुश्री अपूर्वा बजाज सुश्री प्रतिभा कुशवाहा , आदि से मिलना अद्भुत रहा.
डॉ दराल सा: अपने पिता जी की तबीयत बहुत खराब होने के बावजूद भी समय निकाल कर मिलने आये.
रचना जी ने अपनी माता जी की कविताओं की पुस्तक सस्नेह भेंट की और चूँकि अगले दिन मुझे जबलपुर के लिए रवाना होना था तो बड़ी बहन का फर्ज निभाते हुए रास्ते में खाने के लिए बिस्कुट का पैकेट भी दिया. वाकई, रास्ते में काम आया चाय के साथ खाने में.
मुझे इस बात की कतई उम्मीद न थी कि वहाँ पहुँच कर चर्चा के अलावा भाषण जैसा कुछ देकर अपने विचार रखने होंगे अतः सबसे मिलने के उत्साह में कुछ तैयारी तो की नहीं थी. मेरे पहले श्री प्रेम जनमजेय जी ने और फिर बालेन्दु दधीची जी ने अपने विचार रखे. बालेन्दु जी पूरी तैयारी में थे. पाईण्ट बना कर लाये थे और बहुत सार्थक आंकड़े प्रस्तुत किये. साथ ही ब्लॉगर्स पर आधारित एक बेहतरीन कविता भी सुनाई. उनकी तैयारी देख कर मैं घबराया कि अब मैं क्या बोलूँगा मगर जब नम्बर आया तो बस, बिना तैयारी शुरु हो गये जैसे जैसे विचार मन में आते गये, कहते चले गये. मित्रों नें अपनी जिज्ञासाएँ भी प्रकट की और मैने हर संभव प्रयत्न किया कि उसका निवारण हो सके. भाषण खतम होते ही सबने ताली बजाकर मामला ही ठप्प कर दिया कि बहुत देर हो रही है, अशोक चक्रधर जी के कार्यक्रम में जाना है तो मुझे कविता झिलाने का समय ही नहीं मिला, वरना सोचा था कि गाकर सुनाऊँगा. :) खैर, फिर कभी सही. वरना बालेन्दु जी कविता सुना जायें और हमारी सुने बिना निकल जायें, यह कैसे संभव है. बस, समय का खेल है. उनको तो पक्का दो तीन सुनानी है खूब लम्बी लम्बी.
मैं सभी मित्रों का हृदय से आभारी हूँ जिन्होंने अपनी व्यस्त दिनचर्या से समय निकाल कर मुझे समय प्रदान किया एवं श्री अविनाश वाचस्पति, श्री अनिल जोशी जी का इस विराट आयोजन के लिए विशेष आभार.
आयोजन की समाप्ति पर फिर वापस छोड़ने भी सतीश सक्सेना जी गये तो लगा कि कितना दुष्कर कार्य वह मित्रतावश मुस्कराते हुए कर गये. लौटते वक्त सतीश भाई ने डीनर का ऑफर भी दिया लेकिन तब तक भारत के हिसाब से पेट एडजस्ट नहीं हो पाया था तो जुबान की मांग के बावजूद भी मना करना पड़ा. अगली बार के लिए ड्यू है सतीश भाई. इस दौरान भाई विनोद पाण्डे भी साथ थे और मौके का फायदा उठाते हुए विनोद जी ने रास्ते में ही दो गज़लें भी सुना डाली. वैसे थी बहुत बेहतरीन. मैं जब तक माहौल बनाता कि बदला लिया जाये, तब तक शायद सतीश भाई भाँप गये और उन्होंने स्पीड बढ़ा कर यूनिवर्सिटी पहुँचा कर उतार दिया. ये नाईंसाफी है, एक न एक दिन घेर कर सुनाऊँगा जरुर.
आशा करता हूँ हम सभी मित्र समय समय पर ऐसे आयोजन कर हिन्दी ब्लॉगिंग को समृद्ध करते रहेंगे. अनेक शुभकामनाएँ.
नोट: फोटो सभी अजय झा के यहाँ से चुराई हुई हैं.
बुधवार, अगस्त 18, 2010
एक बेहतरीन कलाकार, गायक एवं इंसान: मिलिये इनसे
आज आपको मिलवाता हूँ एक बेहतरीन कलाकार, गायक और उससे भी उपर एक बेहतरीन इन्सान श्री राजेन्द्र स्वर्णकार से. न कभी मुलाकात हुई, न कभी बात. बस, इन्टरनेट और ब्लॉग के माध्यम से परिचय हुआ और एक आत्मियता का रिश्ता कायम हो गया.
सिलसिला जारी रहा और उन्होंने एक दिन अपनी पसंद से मेरे दो गीतों को अपनी आवाज में रिकार्ड करके भेजा. गीत सुनने के बाद आप सबको सुनवाने का लोभ संवरण नहीं कर पाया और आज वही प्रस्तुत करता हूँ.
भाई राजेन्द्र स्वर्णकार का ब्लॉग शस्वरं है और उस ब्लॉग पर उनकी एक से एक बेहतरीन कृतियाँ उपलब्ध हैं. उनका परिचय, उन्हीं की जुबानी:
मोम हूं , यूं ही पिघलते एक दिन गल जाऊंगा फ़िर भी शायद मैं कहीं जलता हुआ रह जाऊंगा... मूलतः काव्य-सृजक हूं। काव्य की हर विधा में मां सरस्वती की कृपा से लेखनी निरंतर सक्रिय रहती है। अब तक 2500 से अधिक छंदबद्ध गीत ग़ज़ल कवित्त सवैये कुंडलियां दोहे सोरठे हिंदी राजस्थानी उर्दू ब्रज भोजपुरी भाषा में लिखे जा चुके हैं मेरी लेखनी द्वारा । 300 से भी ज़्यादा मेरी स्वनिर्मित मौलिक धुनें भी हैं । मंच के मीठे गीतकार-ग़ज़लकार के रूप में अनेक गांवों-शहरों में काव्यपाठ और मान-सम्मान । आकाशवाणी से भी रचनाओं का नियमित प्रसारण । 100 से ज़्यादा पत्र - पत्रिकाओं में 1000 से अधिक रचनाएं प्रकाशित हैं । अब तक दो पुस्तकें प्रकाशित हैं- राजस्थानी में एक ग़ज़ल संग्रह रूई मायीं सूई वर्ष 2002 में आया था , हिंदी में आईनों में देखिए वर्ष 2004 में । कोई 5-6 पुस्तकें अभी प्रकाशन-प्रक्रिया मे हैं! स्वय की रचनाएं स्वयं की धुनों में स्वयं के स्वर में रिकॉर्डिंग का वृहद्-विशाल कार्य भी जारी है। चित्रकारी रंगकर्म संगीत गायन मीनाकारी के अलावा shortwave listening और DXing करते हुए अनेक देशों से निबंध लेखन सामान्यज्ञान संगीत और चित्र प्रतियोगिताओं में लगभग सौ बार पुरस्कृत हो चुका हूं । CRI द्वारा चीनी दूतावास में पुरस्कृत-सम्मानित … … और यह सिलसिला जारी है … !!
तो चलिए अब आपको अपने दोनों गीत उनके स्वर में:
गीत
मैं जो भी गीत गाता हूँ, वही मेरी कहानी है
मचल जो सामने आती, वही मेरी जवानी है
मैं ऐसा था नहीं पहले, मुझे हालात ने बदला
कोई नाजुक बदन लड़की, मेरे ख्वाबों की रानी है.
नहीं उसको बुलाता मैं, मगर वो रोज आती है
मेरी रातों की नींदों में, प्यार के गीत गाती है
मेरी आँखें जो खुलती हैं, अजब अहसास होता है
नमी आँखों में होती है, वो मुझसे दूर जाती है.
मगर ये ख्वाब की दुनिया, हकीकत हो नहीं सकती
थिरकती है जो सपने में, वो मेरी हो नहीं सकती
भुला कर बात यह सारी, हमेशा ख्वाब देखे हैं
न हो दीदार गर उसके, तो कविता हो नहीं सकती.
-समीर लाल ’समीर’
गज़ल: (यह गज़ल एकदम ताजा है, जो आपने अभी तक नहीं पढ़ी है.)
हमारी महफिल में आज आ कर, हमीं को हमसे मिला रहे हो.
अभी तो तुमसे जमीं न संभली, क्यूँ आसमां को हिला रहे हो.
तुम्हें यह लगता है बिन तुम्हारे, यूँ महफिलें क्यूँ सजी हुई हैं
हमें जलाने की कोशिशों में, क्यूँ खुद को ही तुम जला रहे हो.
गमे जुदाई में जो तुम्हारी, है वो ही हालत हमारी होगी
तुम्हें तो हम यूँ मना भी लेंगे, हमें क्यूँ आखिर रुला रहे हो
तुम्हें मुबारक तुम्हारी शोहरत, हमें भला क्या मलाल होगा
ये नाम बख़्शा है जिसने उसको मिटा के दे क्या सिला रहे हो.
नशा तुम्हारी आँख में जो, डूबा डूबा कर ये होश ले लो
न जाने क्यूँ मैकदे में लाकर, मुझे तुम इतना पिला रहे हो.
हवा की जो तुम सदायें सुन लो, हमारी आहट सुनाई देगी
समीर तेरे ही सामने है, ये किसको फिर तुम बुला रहे हो
-समीर लाल ’समीर’
रविवार, अगस्त 01, 2010
बहुत पहले से उन कदमों की आहट....
| आप सभी का जन्म दिन पर दी गई शुभकामनाओं एवं स्नेह के लिए बहुत बहुत आभार. |
| सूचना |
| नए तेवर और नए कलेवर के साथ..''हिन्दी चेतना'' का जुलाई-सितम्बर, २०१० अंक प्रिन्ट हो चुका है. हिन्दी चेतना को आप पढ़ सकते हैं-हिन्दी चेतना या विभोम पर. इस अंक में प्रकाशित मेरा व्यंग्य आलेख नीचे पढ़िये. |
बहुत पहले से उन कदमों की आहट....
जगजीत सिंह-चित्रा सिंह का गाया "बहुत पहले से उन कदमों की आहट जान लेते है”...फिराक गोरखपुरी साहब ने यह गाना जाने कब लिखा, किसके लिए लिखा, क्या सोच के लिखा. किसकी तस्वीर सामने थी? मगर रचा तो भारत में गया यह तय है क्यूँकि हमने सुना भी पहली बार वहीं और फिराक साहब रहते भी वहीं थे. यूँ भी उस समय आज की तरह, जैसा की मुझ जैसे लोग कर रहे हैं, भारत की समस्याओं पर भारत के बाहर बैठे कर भारतीयों के द्वारा लिखने का फैशन नहीं आया था.
खैर, बात चल रही है गाने की "बहुत पहले से उन कदमों की आहट जान लेते है"...
गौरवशाली भविष्यवक्ताओं के महान देश में तो यह मुमकिन हमेशा ही है कि बहुत पहले से उन कदमों की आहट जान लो.
अगले माह मंगल पर शनि की वक्र दृष्टि रहेगी, व्यापार में घाटा पड़ेगा. लो जान ली पहले से उन कदमों की आहट जो अगले महीने आने वाले हैं.
कई तो इन सब भविष्यवाणियों का गणित भी नहीं समझते मगर इस ब्रह्म एवं गुढ़ ज्ञान के आभाव के बावजूद भी आत्मविश्वास का स्तर ऐसा कि वो अपनी बात यहीं से शुरु करते हैं कि अरे, हम तो आपको गारंटी करते हैं कि इस बार बीजेपी सत्ता में आ रही है. न आये तो कहना, जो कहोगे सो हार जायेंगे. अब बीजेपी न आये तो क्या कहें और उनके पास है क्या जो हारेंगे? जहाँ खड़े होकर घोषणा कर रहे हैं उस पान वाले का तो चार महिने का उधार चुका नहीं पा रहे और बात करेंगे कि जो कहो, सो हारे. उनका आत्म विश्वास देख कर कई बार घबराहट होती है मगर ऐसे आत्म विश्वासी हर पान ठेले पर मिल जायेंगे.
मुझे कई बार सही भी लगता है कि बहुत पहले से उन कदमों की आहट जान लेते हैं... जब अपने देश की पुलिस के बारे में सोचता हूँ.
कोई मर्डर कब होना है? कौन करेगा? किसका होना है? चोरी कहाँ होगी? कौन करेगा? सब पुलिस बहुत पहले से जानती है..मगर अफसोस, यह गाना यहीं खत्म हो जाता है इसलिए शायद वो बाद में नहीं जान पाते कि अपराधी कहाँ गया? बेचारे ढूंढते रह जाते हैं और अपराधी कभी मिलता नहीं.
काश, कोई लिखता कि तू छिपा है कहाँ ये भी हम जान लेते हैं!! तो पुलिस को कितनी सुविधा हो जाती.
मगर लिखने वाले..धत्त, बस इतना लिख कर गुजर लिए और भुगतान देने खड़ा है पूरा भारत देश.
अब देखिये, भविष्यवक्ताओं के ऐसे देश में जहाँ यह गीत लब लब गुनगुनाया जाता हो कि बहुत पहले से उन कदमों की आहट जान लेते हैं...उस देश में भला देश के तयशुदा भावी प्रधानमंत्री...जो कि युवा शक्ति का नेतृत्व करता हो और जिसे प्रधानमंत्रित्व का विरासती अधिकार हो, उसके कदमों की आहट न जानें. उनका नाम लेना उचित न होगा. हमारे कदम भी तो आहट करते हैं, कहीं वो इनको जान न लें.
ऐसा युवा भावी प्रधानमंत्री एकाएक गांवों की हालत और ग्रमीणों की जीवनशैली को जानने की जिज्ञासा लिए एक गांव में अपना हेलिकॉप्टर उतरवा देता है. इस एकाएक और आकस्मिक दौरे के लिए वो गाँव भी और उसका पूरा प्रशासन विगत दो माह से तैयारी में जुटा है. हेलीपैड भी इस आकस्मिक दौरे के तैयार है और जिस गरीब की कुटिया में भईया जी ठहरेंगे वो भी और साथ है पूरा तंत्र भी. पूरे दिन में एक घंटे को बिजली के लिए आदिकाल से तरसते इस गांव में उनके आकस्मिक प्रवास के दौरान अचानक पूरे समय बिजली रहती है और उस कुटिया में पोर्टेबल ए सी से ठंडाई ताकि भईया जी मूंझ की खटिया पर बिछे डनलप के गद्दे पर एक रात सो सकें. चुल्हे पर ग्रमीण द्वारा बना, पी एम लेब से चखने के बाद एप्रूव, खाना खा कर ग्रमीण की हालत की पहचान करने के बाद उस पर संसद में एक घंटे का मार्मिक भाषण दे सकें, भला ऐसे अमर गीतों के बिना कैसे संभव हो पाता कि बहुत पहले से उन कदमों की आहट जान लेते हैं.....
जाने कब रच गये फिराक साहब...ऐसा गीत काश मैं रच पाता. अमर हो जाता. कालजयी कहलाता.
कल अखबार में पढ़ता था कि कॉमनवेल्थ खेलों में आने वाले विदेशी अथिति और खिलाड़ी शौकीन मिजाज हैं अतः भारत में गैर कानूनी ही सही (मगर वो भी धड़ल्ले से धंधा कर लेते है क्यूँकि उन्हें भी पहले से पुलिस से ही पता होता है कब पुलिस का छापा पड़ने वाला है..याने वो भी बहुत पहले से उन कदमों की आहट जान लेते हैं...उन्हें गाना आता है) मगर दिल्ली के कोठों की सबकी सहमति से साज सज्जा, फेस लिफ्ट, एयर कन्डिशनिंग आदि की जा रही है, भले ही हमारे जो खिलाड़ी खेलने वाले हैं, वो आज लॉज का पैसा खुद की जेब से भर पसीना बहाते न सिर्फ प्रेक्टिस कर रहे हैं बल्कि गर्मी से और मच्छरों से जुझते सो भी रहे हैं और सस्ते रेस्टॉरेन्ट की तलाश में पैदल भी चल रहे हैं.
उन्हें जितना दैनिक भत्ता मिल रहा है उसमें न तो ए सी रुम लिया जा सकता है, न ढंग का रेस्टॉरेन्ट और न ही सस्ते रेस्टॉरेन्ट तक पहुँचने की टैक्सी. वो भी तो आहट सुन रहे हैं उन कदमों की, जो विदेशों से आने वाले हैं. जाने कैसे हमारे खिलाड़ियों के कदमों में आहट क्यूँ नहीं? शायद इसीलिए हार जाते होंगे चूँकि बिना आहट के चलते हैं भारत के एक आम आदमी की तरह जिसके कदमों में कोई आहट ही नहीं, जो सरकार भले पहले से नहीं, मगर कभी तो सुन पाती. मुझे लगता है कि हमारे खिलाड़ियों को खेल का रियाज़ करने से ज्यादा अपने कदमों से ऐसे चलने का रियाज़ करना चाहिये कि आहट हो और सरकार जान पाये.
शायद राहू, शानि, मंगल की वक्र दृष्टि के विपरीत, आम आदमी पर सरकार और मंत्रियों की वक्र दृष्टि ज्योतिष पंचाग से आऊट ऑफ सिलेबस हो इसीलिए उन पर यह गीत न लागू होता हो कि बहुत पहले से उन कदमों की आहट जान लेते हैं...
एक अंतरंग खबर यह भी है कि बम्बई, पुणे, बेंगलौर, कलकत्ता, मद्रास जैसे महानगरों की कालगर्ल्स कॉमन वेल्थ गेम्स के समय स्थानीय ग्राहकों के लिए उपलब्ध नहीं हैं..वो भी विदेशी कदमों की आहट जान गई हैं. डॉलर रुपी घूंघरु बँधे कदमों की आहट छन छन बोलती है न...वो ही बहुत पहले से और दूर से ही सुन रही होंगी.
इसी डॉलर घूंघरु ने तो भारत का ब्रेन ड्रेन कर डाला और हम उनकी आहट सुन कर मुग्ध हुए अपने कोठे ठीक कराने में लगे हैं..
इसीलिए तो मेरा भारत महान..जहाँ का हर नेता पहलवान. बस गीत गाना आना चाहिये कि:
बहुत पहले से उन कदमों की आहट जान लेते हैं...
-समीर लाल ’समीर’
बुधवार, जून 16, 2010
राम मिलन: इन्टरनेशनल ब्लॉगर मीट
राम त्यागी शिकागो से क्या आये और ऐसी इन्टरनेशनल ब्लॉगर मीट कर गये कि तबसे अब तक समय का ही आकाल पड़ गया है.
व्यस्तता की हद ऐसी कि अपना प्रिय टिप्पणी दर्ज करने का भी शौक पूरा नहीं कर पा रहा हूँ तो मिलन कथा क्या लिखूँ. वैसे मिलन का पूरा वृतांत तो राम लिख ही चुके हैं मय तस्वीर के तो फिर से क्या बखाने सिवाय इसके कि राम का आना एक यादगार शाम दे गया. उनको घेरा मूलतः इसलिए था कि मुलाकात के बहाने हिन्दी ब्लॉगर से मिलन में कविता सुनाने का मौका हाथ लग जाता है.
राम हालांकि जरा देर से पहुँचे किन्तु मौका तलाशते उन्हें हम अपने घर की बार में ले गये. सोच रहे थे कि एक दो पैग हो जायें तो शुरु करें. बंदा हल्के सुरुर में मना भी नहीं कर पायेगा और पूरा ठीक से समझ भी नहीं पायेगा तो वाह वाह के सिवाय क्या करेगा. कवि सम्मेलनों में भी जब कठिन कविता समझ नहीं आती तो भी लोग खुद को बुद्धिजीवियों की कटेगरी में लाने के प्रयास में वाह वाह करने लगते हैं.
मगर पासा थोड़ा उल्टा पड़ा. हम सुनाना शुरु करते उसके पहले ही, पहले पैग के बाद ही भाई जी शुरु हो गये. कहने लगे समीर भाई, आपके लिए एक कविता लिखी है और जब तक हम कुछ कहते, सुनाने भी लगे. हमारी तो अटकी ही थी कि अभी हमें भी सुनाना है, इसलिए वाह वाह करना ही था मगर वाकई की वाह वाह वाली कविता ही उन्होंने सुनाई.
बस, एक कविता के बाद मंच हमने खींच लिया अपनी तरफ और शुरु हुए चाँद वाली मार्मिक रचनाओं के साथ माहौल बनाने के जुगाड़ में. उद्देश्य यह भी था कि दो दिन बाद किसी कार्यक्रम में कुछ मुक्तक पढ़ना था तो उसकी टेस्टिंग भी हो जाये तो वो भी सुनाये. राम का चेहरा भाँपते रहे, मोहित हो कर सुन रहे थे और वाकई वाली वाह वाह कर रहे थे. इसलिए फिर खाना भी मन लगा कर खिलाया और फिर गाड़ी से स्टेशन भी छोड़ा. इस बीच मौका छान बीन कर राम ने पुनः एक रचना सुनाई.
शाम बड़ी मजेदार गुजरी. वादा रहा है कि आगे राम आते रहेंगे और परिवार के साथ भी पधारेंगे. हम तो खैर शिकागो जायेंगे ही.
कुछ तस्वीरें:
राम के उदगार और कविता (हम अकेले क्यूँ झेलें, आप भी झेलिए)
हमारे मुक्तक:विवाहोत्सव के लिए
एक वर की तरफ से
जब से तेरा साथ मिला है, मन कहता कि अंबर छू
दिल की हर धड़कन को कैसे, गीत बना देती है तू
सप्त पदी के वचन लिए थे, इक दिन हमने तुमने जो
उन को ताजा कर जाती है, सांसो की तेरी खूशबू.
एक वधु की तरफ से
बाबू से मैने सीखा था, कैसे दुख को पीना है
अम्मा से मैने सीखा था, कैसे रिश्ते सीना है
जबसे तेरा साथ मिला है, मैने ये भी सीख लिया
वक्त भला कैसा भी आये, हमको हँस कर जीना है.
एक हमारी तरफ से :)
मैं जब भी गीत रचता हूँ, ये आँखें भीग जाती हैं
तुझे जब याद करता हूँ, ये आँखें भीग जाती हैं
मैं हँसता हूँ तुझे ही भूलने की कोशिशों में, पर
ठहाकों में भी देखा है, ये आँखें भीग जाती हैं.
-समीर लाल ’समीर’
अब सुन भी लें उस दिन की रिकार्डिंग में हमारे मुक्तक:
बाकी उम्मीद कर रहा हूँ कि जल्द ही काम से फुरसत मिले, तो ब्लॉग पर नियमित हुआ जाये.
बुधवार, मई 05, 2010
४०० वीं पोस्ट और एक गज़ल
आज सुबह किसी कार्यवश ओकविल (मेरे घर से करीब १०० किमी) जाना हुआ. जिस दफ्तर में काम था, उसके समने ही मेन रोड थी, जिस पर साईड वाक बनने का कार्य जोर शोर से चल रहा था. पूरी मिट्टी के जो ढेर लगाये गये थे, उन्हें बड़ी बड़ी मशीनों से लेवल किया जा रहा था.
दफ्तर से जब काम पूरा करके निकला, तो उस दफ्तर का मालिक भी साथ था. यूँ ही चर्चा में मैने जानना चाहा कि जब यह वाक वे पूरा बन रहा है, तो यह पहाड़ जैसी मिट्टी बीच में क्यूँ छोड़कर दोनों तरफ का काम चालू है, एक लाईन से क्यूँ नहीं करते यह लोग. बेवजह बीच में काम छोड़ कर, गाड़ी दूसरी तरफ ले जाते हैं बार बार, और आगे काम जारी रखते हैं.
तब उसने मुझे थोड़ा पास ले जाकर वो मिट्टी का ढेर दिखाया, जो बीच में लगभग १०० मीटर की जगह घेरा हुआ था. उस पर एक "गूस" महारानी बड़े ठसके से विराजमान थी. बताया गया कि एक रात उसने वहाँ अंड़े दे दिये हैं तो अब जब तक बच्चे नहीं हो जाते, सरकार उतना हिस्सा नहीं छुएगी और बच्चा हो जाने के बाद जब वो चली जायेगी, तब ही उस हिस्से को बनाया जायेगा.
अभी मेन रोड़ की तरफ एक प्लास्टिक की जाली भी लगा दी गई है कि भूल से वो सड़क पर न चली जाये और किसी तेज रफ्तार गाड़ी की चपेट में आ जाये. निर्माण कर्मचारी भी उसे रोज खाने के लिए पॉपकार्न और चिप्स डाल देते हैं ताकि भोजन की तलाश में उसे भटकना न पड़े.
क्या हम कभी ऐसी कल्पना सरकार की तरफ से अपने देश में कर पायेंगे या फिर सिर्फ कागज पर गिनती लगाते रहेंगे कि अब १४११ बाघ बचें हैं?
नीचे चित्र में ये दो गीस (goose (plural: geese)) कल मेरे घर के सामने घास में टहलने आये. पड़ोस में एक छोटा सा तालाब हैं, वहीं रहते हैं. सोचा, आपसे भी मिलवा दूँ.
खैर, यह है मेरी ४०० वीं पोस्ट. बहुत रोचक और दिलचस्प सफर रहा इन ४०० पोस्टों का. टिप्पणी के माध्यम से अब तक लगभग ३५०० लोगों का, अवागमन में लगभग १६४००० लोगों ने और फीडस स्बासक्राईब करने में लगभग ५७० लोगों नें अपना स्नेह और प्रोत्साहन दर्ज किया.
उम्मीद करता हूँ कि आप सबका स्नेह यूँ ही मिलता रहेगा और यह सफर यूँ ही खुशनुमा बना रहेगा.
पिछली बार जो गज़ल साधना की आवाज में आपको सुनवाई थी, उसमें जैसा मैने कहा था तीन शेर किसी और के थे और तीन मेरे. अब फिर से वही गज़ल मगर इस बार इसमें सारे शेर मेरे ही हैं और आवाज साधना की. इस चौथे शतक के मौके पर लुत्फ उठाईये.
जाने क्या बात है जो तुमसे बदल जाती है
जिन्दगी मौत के साये से निकल जाती है
नब्ज को छू के वो खुशहाल हुए जाते है
सांस तो रेत है हाथों से फिसल जाती है
देख तो आज के मौसम का नजारा क्या है
ये तबियत भी हमारी तो मचल जाती है
मुझको तो चाँद दिखे या कि तुम्हारी सूरत
दिल की हस्ती मेरी दोनों से बहल जाती है
कैसे जीना है किसी को ये सिखाना कैसा
वक्त के साथ में हर सोच बदल जाती है.
जब भी होता है दीदार तेरा साहिल पर
डूबी कश्ति मेरी किस्मत की संभल जाती है.
बात करने का सलीका जो सिखाया हमको
बात ही बात में नई बात निकल जाती है.
दास्तां प्यार की तुमको ही सुनाई है ’समीर’
दर्द के देश में यह बन के गज़ल जाती है.
-समीर लाल ’समीर’
यहाँ क्लिक करके सुनिये:
रविवार, अप्रैल 04, 2010
ब्लॉगर मीट- परिवारिक मीट-संगीत संध्या
कल याने ३ अप्रेल को स्वप्न मंजुषा शैल याने अदा जी का अपने पतिदेव संतोष शैल जी और बिटिया प्रज्ञा के साथ आना हुआ. मात्र ४०० किमी की दूरी तय करने में निर्धारित कार्यक्रम से बस २ घंटे देरी से (रेल्वे के हिसाब से तो राईट टाईम ही कहलाया) आप लोग आये. :)
तय था कि लंच साथ में करेंगे लेकिन इन्तजार करते जब फोन पर पता चला कि दोपहर ३.३० बजे तक आना होगा तो थोड़ा सा शरम त्यागते हुए मैने और साधना ने खाना खा लिया. सोचा था कि इनके आने पर थोड़ा थोड़ा फिर से खा लेंगे और बतायेंगे ही नहीं इ खा चुके हैं. ऐसा हो नहीं पाया और फिर तीनों मेहमानों को अकेले ही खाना पड़ा.
खाना खाकर तमाम तरह की बातचीत का सिलसिला चल पड़ा और फिर शाम ७ बजे से हमने अपने ४/५ मित्रों को सपरिवार डिनर पर इन्वाईट कर लिया था ताकि संतोष जी और अदा जी के गीत भरी शाम का लुत्फ हमारे मित्र भी उठा लें.
देखते देखते शाम भी हो गई. बेसमेंट हॉल में ही महफिल जमी और यह महफिल एक यादगार शाम में तब्दील हो गई. एक से एक बेहतरीन गाने संतोष जी और अदा जी ने गाये.
हमने मौका तड़ कर अदा जी को याद दिलाया कि वो कवयित्री भी है तो कुछ कवितायें सुनायें. इच्छा यह थी कि रिस्पॉन्स में वो भी कहेंगी कि आप भी सुनाईये और ऐसा ही हुआ. :) मौके की नजाकत और आतिफ असलम से रीसेन्टली मिली प्रेरणा के मद्देनजर हमने अपना गीत गाकर सुनाया और वो भी एक नहीं, दो दो!! फिर हमारी लिखी गज़ल का साधना जी ने गायन किया. आपको ज्यादा अंदाजा लगाने की जरुरत नहीं, यह सब उपस्थित लोगों द्वारा काफी सराहा गया. अदा जी की कवितायें (भी) श्रोताओं नें बहुत पसंद की.
महफिल रात २ बजे जाकर डिनर के साथ समाप्त हुई. सुबह उठकर संतोष जी, अदा जी और बिटिया प्रज्ञा नाश्ता करके ऑटवा निकल गये. लगा ही नहीं कि पहली बार मिले हैं. अब तो फोन भी आ गया कि टोरंटो का बाजार घूमने के बाद वे ऑटवा अपने घर पहुँच चुके हैं.
एकाएक बने कार्यक्रम से उपजी यह मुलाकात और यादगार गीतों भरी शाम वाकई आनन्ददायी रही. विडियों जल्द ही पेश करते हैं अभी दो चार फोटो देखकर काम चलायें.
| साधना एवं अदा जी |
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| रिहर्सल |
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| घर के सामने |
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| मित्रगण |
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| कार्यक्रम शुरु होने के पहले: माईक टेस्टिंग!! |
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| समीर, संतोष जी और अदा जी |
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रविवार, अक्टूबर 11, 2009
बिखरे मोती का विमोचन एवं समीर लाल सम्मानित
आखिरकार ’बिखरे मोती’ का दीर्घ प्रतिक्षित विमोचन विगत ४ अक्टूबर, २००९ को गुरुदेव श्री राकेश खण्डेलवाल, वाशिंगटन, यू. एस.ए. के कर कमलों द्वारा गया चौहान बैन्केट हॉल, टोरंटो में समपन्न हुआ. इस अवसर पर श्री अनूप भार्गव एवं रजनी भार्गव जी, न्यू जर्सी, यू एस ए, मानोषी चटर्जी जी, शैलजा सक्सेना जी ने शिरकत की. श्रोताओं से खचाखच भरे हॉल में कार्यक्रम की शुरुवात मानोषी चटर्जी ने की. कार्यक्रम की अध्यक्षता अनूप भार्गव जी एवं संचालन श्री राकेश खण्डेलवाल जी ने किया.
कार्यक्रम के आरंभ मे प्रसिद्ध शायर फिराक गोरखपुरी जी की भांजी, मेरी दादी श्रीमति कनकलता जी ने अपने आशीर्वचन दिये एवं ’बिखरे मोती’ पर अपने विचार व्यक्त किये.
मेरी दादी फिराक गोरखपुरी जी की भांजी श्रीमति कनक वर्मा
तदोपरान्त मनोषी चटर्जी ने अपनी गज़ल अपनी मधुर आवाज में गाकर श्रोताओं को मुग्ध कर लिया:
आपकी आँखों में मुझ को मिल गई है ज़िंदगी
सहरा-ए-दिल में कोई बाक़ी रही ना तश्नगी
रात के बोसे का शम्मे पर असर कुछ यूँ हुआ
उम्र भर पीती रही रो-रो के उस की तीरगी
उससे मिलके एक तुम ही बस नहीं हैरां कोई
है गली-कूचा परेशां देख ऐसी सादगी
आजकल दिखने लगा है मुझको अपना अक़्स भी
आजकल क्या आइना भी कर रहा है दिल्लगी
झुक गया हूँ जब से उसके सजदे में ऐ ’दोस्त’ मैं
उम्र बन के रह गई है बस उसी की बंदगी
चूँकि कार्यक्रम के साथ ही मेरे पुत्र एवं पुत्रवधु के प्रथम गृह-आगमन का समारोह भी रखा गया था. अतः सभी कवियों एवं कवियत्रियों ने विमोचन हेतु एवं वर वधु को अपने आशीर्वचन भी काव्यात्मक प्रस्तुत किए.
मनोषी के बाद रजनी भार्गव जी ने अपना काव्यपाठ किया. पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गुंजायमान हो गया.
सुरमई शाम चुपके से सुरमई हो गयी है शाम
रात ने सर रख दिया है काँधे पर
तारों ने बो दिये हैं चन्द्रकिरण से मनके वीराने में
धवल, चमकीली चाँद की निबोली
अटकी हुई है नीम की टहनी पर
नीचे गिरी तो बाजूबंद सी खुल जाएगी
सुरमई शाम
अनुपम और प्रगति के अनुराग
में ढल जाएगी।
उसके बाद शैलजा सक्सेना जी कविता ’सात फेरे’ ने सभी को अभिभूत कर दिया.
दो-दो खुशियाँ एक साथ हैं
घर और कलम प्रफुल्लित
इसी तरह से बढ़े वाटिका
गीत पुष्प हों प्रमुदित॥
अनुपम -प्रगति के लिये....
मधुमय जीवन बने तुम्हारा
स्वप्न सुगंधित सब हो
रहे आस्था संबंध में
चंदन-चाँदनी मन हो॥
-*-
सात फेरे
सात फेरे लिए तुमने
सात फेरे लिए मैंने
मन की सेज पर
हर रात, सुहाग रात।
तुम्हारे पुरुषार्थ ने
मेरी कल्पना की कोख में
सपनों का बीज बोया
और हम विश्वास का फल लिए
चढ़ते चले आए जीवन की कठिन सीढ़ियाँ
कुछ फूलों से लदी
कुछ रपटन से भरी
फिसलने को हुए तुम तो
हाथ थामा मैंने
गिरने को हुई मैं तो
हाथ पकड़ा तुमने।
सात फेरे लिए तुमने.......
सुहाग का सोना
तन से ज़्यादा रचा मन पर।
समय झरता रहा
हरसिंगार सा हमारी देहों पर
सोख ली वह गंध स्वयं में
गंध बढ़ रही है तुम्हारी
गंध बढ़ रही है मेरी
झील की लहरों सी
मुस्कान उठती है तुम्हारे होंठों से
और मेरी आँखों का सूरज छूने की होड़ करती है
साँसों में हवन-धूम भरती है
उस दिन जो लिए थे सप्तपदी-वचन
भूलने को हुए तुम तो
याद दिलाए मैंने
भूलने को हुई मैं
तो याद दिलाए तुमने।
सात फेरे लिए तुमने
सात फेरे लिए मैंने
मन की सेज पर
हर रात, सुहाग रात।।
उनके बाद अनूप भार्गव जी ने अपने काव्यपाठ से समा बाँधा.
१.
प्रणय की प्रेरणा तुम हो
विरह की वेदना तुम हो
निगाहों में तुम्ही तुम हो
समय की चेतना तुम हो ।
२.
तृप्ति का अहसास तुम हो
बिन बुझी सी प्यास तुम हो
मौत से अब डर नहीं है
ज़िन्दगी की आस तुम हो ।
३.
सपनों का अध्याय तुम्ही हो
फ़ूलों का पर्याय तुम्ही हो
एक पंक्ति में अगर कहूँ तो
जीवन का अभिप्राय तुम्ही हो ।
४.
सुख दुख की हर आशा तुम हो
चुम्बन की अभिलाशा तुम हो
मौत के आगे जाने क्या हो
जीवन की परिभाषा तुम हो ।
५.
ज़िन्दगी को अर्थ दे दो
इक नया सन्दर्भ दे दो
दूर कब तक यूँ रहोगी
नेह का सम्पर्क दे दो ।
अनूप जी के बाद राकेश खण्डेलवाल जी ने अपना काव्यपाठ कर पुस्तक का विमोचन किया एवं शिवना प्रकाशन की ओर से पुस्तक की एक प्रति मेरी पुत्र वधु को भेंट की.
शुभ हो प्रणय पर्व हम सब मिल कर नूतन हर्ष संजोयें
अभिनन्दन के भाव आज हम भेंट कर रहे हैं स्वीकारो
भावी जीवन के सपनों की मधुपूरित खुशियों से
विविध रूप में र~मगा तुम्हारा वर्त्तमान सजाता हो
साथ ही अनूप और रजनी भार्गव, विकास और शैलजा सक्सेना, मानोशी छटर्जी और राकेश जी की ओर से राकेश जी ने वर वधु के लिए मंगलकामना करते हुए गीत प्रेषित किया:
सदा रहे मंगलमय जीवन
शुभ आशीष तुम्हें देते हैं
तुम्हें मुबारक गुल औ’ कलियाँ
रस भीगे दिन रस की रतियाँ
रसिक सुबह हो, शाम सुगन्धी
गगन बिखेरे रस मकरन्दी
जिसमें सदा खिलें नवकलियाँ
ऐसा चमन तुम्हें देते हैं
जो छू लें अन्त:स्तल तल को
घुटनलिप्त नभ के मंडल को
नयनों के बेसुध काजल को
हियरा के उड़ते आँचल को
फिर उच्चार करें गीता सा
ऐसे अधर तुम्हें देते हैं
जो बिखरे तिनकों को जोड़ें
मांझी को साहिल तक छोड़ें
अन्तर्मन को दिशा दिखायें
पथ में नूतन सरगम गायें
जो उड़ छू लें मंज़िल का सर
ऐसे पंख तुम्हें देते हैं
जो सपनों की अँगनाई में
मन की गुंजित शहनाई में
उषा की मॄदु अँगड़ाई में
घुल जाते हैं परछाईं में
इन्द्रधनुष नित बन कर सँवरें
ऐसे पंख तुम्हें देते हैं.
सदा रहे मंगलमय जीवन
शुभ आशीष तुम्हें देते हैं.
समीर लाल सम्मानित:
इसी अवसर पर वाशिंगटन हिन्दी समिति यू एस ए द्वारा हिन्दी भाषा एवं हिन्दी चिट्ठाकारी की विशिष्ट सेवा के लिए मुझे ‘साहित्य गौरव’ के सम्मान से विभूषित किया गया एवं शिवना प्रकाशन, सिहोर के द्वारा से ’शिवना सारस्वत सम्मान’ से अलंकृत किया गया. श्री अनूप भार्गव जी ने इस मौके पर दोनों सम्मान पत्रों का अंग्रेजी मे अनुवाद कर उन कनेडियन मेहमानों को सुनाया जिन्हें हिन्दी नहीं आती थी.
मास्साब पंकज सुबीर जी, हटीला जी और कासट जी को इस मौके पर विशेष रुप से याद किया गया जिनके अथक प्रयास से यह ’बिखरे मोती’ का संकलन मूर्त रुप ले पाया.
| साहित्य गौरव | शिवना सारस्वत सम्मान |
| |
इसके बाद मेरे द्वारा सभी के आभार प्रदर्शन एवं काव्यपाठ के बाद विमोचन का कार्यक्रम समाप्त हुआ और मेरे पुत्र एवं पुत्रवधु के प्रथम गृह-आगमन का समारोह शुरु हुआ.
मेरे द्वारा पढ़ी गई रचना:
चाँद गर रुसवा हो जाये तो फिर क्या होगा
रात थक कर सो जाये तो फिर क्या होगा.
यूँ मैं लबों पर, मुस्कान लिए फिरता हूँ
आँख ही मेरी रो जाये तो फिर क्या होगा.
यों तो मिल कर रहता हूँ सबके साथ में
नफरत अगर कोई बो जाये तो फिर क्या होगा.
कहने मैं निकला हूँ हाल ए दिल अपना
अल्फाज़ कहीं खो जाये तो फिर क्या होगा.
किस्मत की लकीरें हैं हाथों में जो अपने
आंसू उन्हें धो जाये तो फिर क्या होगा.
बहुत अरमां से बनाया था आशियां अपना
बंट टुकड़े में दो जाये तो फिर क्या होगा.
ये उड़ के चला तो है घर जाने को ’समीर;
हवा ये पश्चिम को जाये तो फिर क्या होगा.
-समीर लाल ’समीर’
नोट: विडियो अभी उपलब्ध नहीं हो पाये हैं. समय समय पर मौका देखकर लगाये जायेंगे. इन्तजार करिये.
रविवार, अगस्त 30, 2009
शादी की सालगिरह और तुम...
२५ अगस्त को जब हमारी शादी की सालगिरह थी, तब बहुत से ईमेल और कमेंट से पाठकों ने अपनी बधाई प्रेषित करते हुए बहुत सी बातें कहीं. सभी का स्नेह हेतु आभार. जो नहीं कर पाये, उनका भी. आगे बने रहना, अभी और आयेंगे, इस हेतु.
किसी ने पूछा कि आपने क्या गिफ्ट दिया?
काहे भाई, गिफ्ट देने को हम ही बनें हैं क्या? उनका काहे नहीं पूछ रहे कि उन्होंने क्या दिया आपको, यू नारी सपोर्टर!! :)
वैसे सच बतायें...उन्होंने हमें हमारे हाल पर रहम खा कर चोरी गया अज़ारो परफ्यूम नया लाकर दे दिया. और हमने क्या दिया?? अरे, सामान तो हमारा चोरी हुआ था न..उनके पास तो है ही..फिर भी लंच पर ले गये और खाकर बड़ी प्यारी सी क्यूट वाली स्माईल दे आया हूँ. कैसी रही?? इससे अच्छी गिफ्ट और क्या दें भई इस उम्र में?
लेकिन क्या बतायें हमारे ही परफ्यूम वाले पैकेट में उससे तीन गुना मँहगा एक लेडीज़ परफ्यूम भी निकला-हमने पूछा कि ये किसके लिए? वो हसीन मुस्कराहट चेहरे पर लाकर बोलीं, जरा शरमाते हुए-ये आपकी तरफ से मेरे लिए. कैसी लगी? अब क्या कहे, हमारी तरफ से है तो खराब, मंहगा आदि कुछ कहने के काबिल तो बचे ही कहाँ..हाँ हाँ हें हें, बहुत बेहतरीन कहने के सिवाय क्या रास्ता रह बचा, सो कह कर चुप हो लिए. बहुते आत्म निर्भर बीबी टकरा गई है भई. हाँ हाँ हें हें की आदत तो खैर ब्लॉगजगत का टिप्पणी विश्व बखूबी डाल ही गया है. :)
कोई पूछता है कितने साल हो गये शादी के?
काहे बतायें जी? इन्श्योरेन्श एजेंट हो क्या? हमारे हिसाब से तो अभी अभी हुई है..साल भी नहीं बीता और सालगिरह मना लिए हैं..अब कहो? दिखा दो आज तक पर..सनसनी खेज खुलासा..साल के पहले सालगिरह मनाई...अमाँ यार, मिठाई खाओ और खुश रहो-काहे याद दिलाते हो!!
तुम्हारे चक्कर में एक सज्जन की बात याद आती है. बड़ा अपना सा लगता है वह भाई.
एक रात उसकी पत्नी की आँख खुली तो देखा, हर पत्नी की तरह आदतन टतोलते हुए,पतिदेव बाजू में नहीं हैं. खोजते खोजते नीचे उतर कर आई तो देखा, वो ड्राईंगरुम में बैठा सुबक सुबक कर रो रहा है.
पत्नी परेशान, पूछा कि अजी, आज हमारी शादी की २० वीं सालगिरह है खुशी का मौका है और आप रो रहे हैं?
पति बोला-डार्लिंग, तुम्हें याद है कि जब हम छिप छिप कर प्यार किया करते थे तो तुम्हारे पिता जी हमें रंगे हाथों पकड़ लिया था एक रात अस्विकार्य अवस्था में..
पत्नी बोली-हाँ हाँ, याद है.
फिर तुम्हारे कर्नल पिता जी ने बोला था कि मेरी लड़की से शादी करो वरना मैं अपने आपको गोली मार लूँगा. इल्जाम तुम सिर पर लिख जाऊँगा और तुमको आजीवन बीस साल की सजा पड़ेगी.
हाँ हाँ, याद है मगर रो क्यूँ रहे हो?
अरे, इसीलिए तो रो रहा हूँ कि आज तो मैं जेल से छूट गया होता... :)
लेकिन ये तो उस मित्र की बात है जो अपना सा लगता है, हमारी नहीं. हमें क्या लेना देना उससे. हम तो बंदी ही सही. आखिर, जीवन से समझौता भी तो एक चीज होती है.
किसी ने कहा कि हमें तो लगा था कि आज आप साधना जी पर कुछ गज़ल लिख कर पेश करेंगे मगर आप तो चुप मार गये.
अब क्या बतायें-शादी के इतने साल बाद अपने हाथ में कहाँ कुछ कि कुछ बोल पायें. जितना आदेश हो, उतना बोल लेते हैं. आपकी सूचना हमने उनको भी दे दी कि पाठक (हमने प्रशंसक बताया ताकि ऐठन बरकरार रहे) ऐसा चाहते हैं, तब जाकर एक दो दिन में परमिशन मिली और हम जुटे लिखने में.
लिखना तो क्या था, दिल के भाव है. बस, शब्द देने थे. कोशिश की और आप देखिये कि कोशिश कारगर रही कि नहीं. व्यवहार वैसा करो जो सरकार चाहे के आधार पर.
आपका एप्रूवल मिले तो फिर उनको सुनाई जाये.
तस्वीर सामने धर कर आँख बंद कर, तुलसी दास बने लिखे हैं. कुछ त्रुटि हो तो बंद आँख को याद करना वरना तो आप जानते ही हैं कि हमने लिखी है:
तुम...
शून्य में भी चेतना का पूर्ण एक आधार हो तुम
हर सुखद अनुभूतियों में, बसा एक संसार हो तुम.
अग्नि प्रज्जवलित हो चुकी, अब होम की बातें करें
यज्ञ की संपूर्णता में, तेज बन साकार हो तुम.
सात जन्मों तक रहेगा, साथ मेरा और तुम्हारा
इन प्रचारित रीतियों का, खुला मंगलद्वार हो तुम
मैं भटकता जा रहा था, जिन्दगी की राह पर
पथ दिखाती सूक्तियों का, स्वयं एक उच्चार हो तुम.
कुछ गढ़ा कुछ अनगढ़ा आकार है इन मूर्तियों का
अनगढ़ी इन मूर्तियों में प्रणय बन साकार हो तुम.
-समीर लाल ’समीर’
मंगलवार, अप्रैल 07, 2009
मेरी माँ लुटेरी थी-याद आया बिखरे मोती के अंतरिम विमोचन में

मेरी माँ लुटेरी थी...
माँ!!
तेरा
सब कुछ तो दे दिया था तुझे
विदा करते वक्त
तेरा
शादी का जोड़ा
तेरे सब जेवर
कुंकुम,मेंहदी,सिन्दूर
ओढ़नी
नई
दुल्हन की तरह
साजो
सामान के साथ
बिदा
किया था...
और हाँ
तेरी छड़ी
तेरी एनक,
तेरे नकली दांत
पिता
जी ने
सब कुछ ही तो
रख दिये थे
अपने हाथों...
तेरी
चिता में
लेकिन
फिर भी
जब से लौटा हूँ घर
बिठा कर तुझे
अग्नि रथ पर
तेरी छाप क्यों नजर आती है?
वह धागा
जिसे तूने मंत्र फूंक
कर दिया था जादुई
और बांध दिया था
घर
मोहल्ला,
बस्ती
सभी को एक सूत्र में
आज
अचानक लगने लगा है
जैसे टूट गया वह धागा
सब कुछ
वही तो है
घर
मोहल्ला
बस्ती
और वही लोग
पर घर की छत
मोहल्ले का जुड़ाव
और
बस्ती का सम्बन्ध
कुछ ही तो नहीं
सब कुछ लुट गया है न!!
हाँ माँ!
सब कुछ
और ये सब कुछ
तू ही तो ले गई है लूट कर
मुझे पता है
जानता हूं न बचपन से
तेरा लुटेरा पन.
तू ही तो लूटा करती थी
मेरी पीड़ा
मेरे दुख
मेरे सर की धूप
और छोड़ जाती थी
अपनी लूट की निशानी
एक मुस्कान
एक रस भीगा स्पर्श
और स्नेह की फुहार
अब सब कुछ लुट गया है!!
स्तम्भित हैं
पिताजी तो
यह भी नहीं बताते
आखिर
कहां लिखवाऊँ
रपट अपने लुटने की
घर के लुटने की
बस्ती और मोहल्ले के लुटने की
और सबसे अधिक
अपने समय के लुट जाने की....
-समीर लाल ’समीर’
रविवार, मार्च 01, 2009
आओ, ब्लॉग सालगिरह का केक तो खाते जाओ!!
इस सालगिरह के मौके पर आप सब के लिए केक:

वैसे तो तीन साल की उम्र कुछ खास तो नहीं होती है किन्तु उम्र से न सही, दूसरों के अनुभवों से तो सीखा ही जा सकता है. यूँ भी एक उम्र के बाद व्यक्ति उम्र के साथ साथ जिम्मेदारियों से बड़ा होना शुरु होता है. जैसे कि माँ बाप का साया हटना, बच्चों, भाईयों, बहनों की जिम्मेदारी व्यक्ति को खुद ब खुद बड़ा एवं जिम्मेदार बना देती है.
अमिताभ के ब्लॉग पर पढ़ता था कि:
दूसरों की गलतियों से सीखें। आप इतने दिन नहीं जी सकते कि आप खुद इतनी गलतियां कर सके।
बात जचीं. बचपन में और बड़े होने पर भी बाल सुलभ हरकतें और बाल मन अच्छे लगते हैं किन्तु एक उम्र के बात भी वही रट कि मैं तो अभी बच्चा हूँ, मैं तो अभी बच्चा हूँ और उज्जडता जारी, जरा अच्छा सा नहीं लगता और सहज तो कतई नहीं. बस, इन तीन सालों में सही उम्र के सही लोग, बड़ी उम्र के बड़े, बड़े होकर भी उज्जड बच्चे बने आदि सभी से मिलने का मौका मिला. सभी से अनुभव लिए और सभी से सीखने का मौका मिला, उनका आभार दर्ज करना चाहता हूँ.
आजकल पोस्ट भी अनियमित है और टिप्पणी तो न के बराबर ही कर पा रहे हैं. कल ही दिल्ली से बहुरानी को लंदन के लिए रवाना करके लौटे. अब शायद कुछ समय मिले. दिल्ली में फिल्म भी देखी, उसी के बारे में सुन लें:
दाँये और बाँये दोनो तरफ दिल वालों की दिल्ली
दो रोज पहले पत्नी और बहू की जिद पर दिल्ली में दिल्ली ६ देखी. ये छूट दोनों को ही जबलपुर के बाहर है कि हमें साथ फिल्म ले जा पायें.
फिल्म में बताया गया दिल्ली दिल वालों की-जिसके दोनों तरफ दिल है-दाँये भी और बाँये भी. याने हृदयाधात की डबल गुँजाईश. जाहिर सी बात है कि जहाँ दिल होगा, वहीं धड़केगा और वहीं हृदयाघात भी होगा.
मरना तो खैर सबको एक दिन है ही. चाहो तो गैस विकार मान कर हृदयाधात को नजर अंदाज कर दो, और बिना उचित कारण के असमय सिधार गये-कहलाओ या फिर उचित बॉयपास वगैरह कराकर सब की सहानभूति पाते सादा एवं उच्च जीवन गुजार दो सिर्फ इस विचार में कि इसमें सादे के सिवाय उच्च क्या है? ढ़ूँढ़ते रह जाओगे.
खैर, यह सब छोड़ो. नसीब और सेहत अपनी अपनी. देखे हैं लोग जो बिन पान खाये मुख कैंसर से मरे और वो भी जो पान खाते खाते शान से शहनाई बजाते गये. दो दिल हैं तो हैं. जैसी लिखी होगी वैसी ही होगी-मान लो न!! ९९ फिसदी हिन्दुस्तान इसे मानता है.
फिल्म देखी, अंसल प्लाजा के ग्रेटर नोयडा स्थित बिग सिनेमा में. बिग याने इतना बिग कि क्या बतायें. नया बना है तो कोई था ही नहीं और जितना खाली, उतना बिग. हर तरफ जगह, जगह ही जगह.
देखते देखते फिल्म चालू हो गई..ढ़ाँय ढ़ाँय...न जाने क्या क्या..छत पर टायलेट..एक छत से दूसरी छत मिली हुई..जलेबी..रामलीला..पतंगबाजी, जवान सपने, इन्डियन आईडियल, दो भाईयों का बँटा घर फिर भी दीवार मे छेद से जुड़ा घर . हैण्ड पम्प से पानी भर टायलेट जाता अभिषेक फोन पर अटका हुआ, गाय बछड़े को जन्म देती हुई और उससे जुड़ी हमारी अंधविश्वासी धार्मिक आस्था, पाँच साल से सूखी तुलसी फिर एकाएक हरी भरी होती, कबूतर बाजी, गैंदा फूल ससुराल और फिर वही, जलेबी अछूत लड़की जिसे हर किसी में छूने की ललक. जाने क्या क्या.
न सिर न पैर और उस पर से थाना इंचार्ज दुबे जी (मानसून वेडिंग फेम)-एक मात्र ऐसा करेक्टर जो वाकई में हो सकता है.
विदेश-देश-सीन पर लादे हुए सीन तो ऐसे लादे कि न्यू यार्क में चाँदनी चौक दिखवाये दिये. पता नहीं कहाँ रामलीला हो रही थी कि सारे लोग चंद लोगों को पहचान रहे थे और उसी में ईद भी हो ली. जामा मज्जिद भी सज ली. संप्रदायिक झगड़े भी हो लिये. पुराने जमाने के हिन्दु मुस्लिम विवाह की वजह से देश त्यागा युगल और उसका घर लौटता बालक अभिषेक, सब कुछ की पैकेज डील और पैकेट खाली. गिफ्ट हैम्पर के बड़े बक्स टाइप. आखिर तक समझ ही नहीं आया कि आखिर दिखा क्या रहे हैं?
एक किरदार था जिसका नाम था गोबर. बिल्कुल नॉन रसूकदार एक आम आदमी सा.. रसूकदारों/ रईसों का मनोरंजन का साधन और जीवन यापन की जुगत में पगला सा बना जीवन काटता.
खैर, पूरी फिल्म में जिसने घुमाया वो था काला बन्दर. आखिर तक नहीं पकड़ाया. अगर अभिषेक नाटक में काला बंदर न बन कर पकड़ाता तो नोयडा के आरूषि केस टाईप लटक कर रह लेता काला बंदर और हम आदतानुसार भूल जाते उसे. जय हो अभिषेक तुम्हारी. तुम आरुषि केस के समय कहाँ थे? सुना है उस केस जो उगलवानी केपसूल थी नारको टेस्ट वाली डॉ मालिनी, वो बरखास्त हो गई है सबूतों से छेड़छाड़ करने के आरोप में अरे, उसी पर तो यह जिम्मा था कि सबूत उगलवाये और वो ही बरखास्त.

खैर, काला बन्दर - अंत तक एनोनिमस रहा..और अब भी है. आगे भी रहेगा. उसका अस्तित्व शास्वत है झूठ की तरह हरदम सत्य पर विजय पाता. बस, समय समय पर अपनी उपस्थिति दर्ज करता रहता है. कभी किसी ने समझा मुसलमान है. कभी किसी ने हिन्दु माना. सब आपस में लड़ते रहे और वो अफवाहों को दोनों तरफ से जन्म देता रहा, लोगों को लड़वाता रहा और पकड़ में आया गरीब-फेन्सी ड्रेस टाईप सजा अभिषेक. काला बन्दर था या हमारा नेता?
या कहीं वो हमारे ब्लॉगजगत के अनाम टिप्पणिकार तो नहीं?? उनका भी तो यही काम है और वो जब फेवर में बोले तो मन ही मन हम खुश और विरोध में जाये तो धमकी कि हिम्मत है तो खुल कर सामने आओ. आ भी जायेगा तो क्या कर लोगे मात्र मॉडरेशन की तलवार चलाने के?
अरे जलेबी, गोबर को अपने सर के बाल तो काट कर दे-अभी स्वाहा करते हैं इन अनाम महारज को!! जय हो..ओ..के....!!!!
(ऐसे ही एक स्वामी जी स्वाहा करने वाले थे काले बंदर को फिल्म में-गोबर से काले बंदर का बाल मंगवा कर जिसे जलेबी ने अपने सर से काट कर गोबर को दे दिये थे)
मंगलवार, सितंबर 09, 2008
रजिया का बाप मरा, आसिफ की ऐश
यह मुहावरा हमारे कालेज के दिनों में हमारे मोहल्ले से ही हमारी कोख से जन्मा था. आसिफ, हमारे बाल सखा और रजिया उनके पड़ोस में रहने वाली सुन्दर कन्या. यूँ तो आसिफ का पड़ोसी होने के कारण उनके घर आना जाना था मगर उनके मन में उपजे रजिया के प्रति प्रेम को वो मात्र हम दोस्तों के बीच ही बखान कर पाते थे. रजिया को छूना तो दूर, कभी सीधे नजर मिला कर बात भी न कर पाते, मन में चोर जो था. मगर अरमान ऐसे कि रजिया के नाम पर किसी से भी लड़ जायें. रजिया रोजा रखे, दुबले ये हों टाईप.
एक रोज रजिया के अब्बू गुजर गये. वो क्या गुजरे मानो आसिफ की लाटरी ही लग गई. खूब गले लगा लगा कर चुप कराया रजिया को. जितनी बार उसकी सिसकी फूटे वो आसिफ का कँधा सेवा में हाजिर पाये. आँसू पोछे गये, बालों को सहला कर ढाढस बंधाया गया गोया कि जितना संभव था, उससे भी ज्यादा आसिफ मियाँ ने मौके का फायदा उठाया. वहाँ साथ में रोयें और दोस्तों के बीच आँख दबा दबा कर हंसते हुए किस्से सुनाये. हालात ये हो गये कि दिन गुजरने के साथ उनके परिवार का मय रजिया के रोना बंद हो गया तो भी आसिफ मियाँ उनके घर जाकर अब्बू का किस्सा छेड याद में स्वयं रोने लगें. रजिया और उसकी अम्मा को भी मजबूरी में रोना पड़े और फिर आसिफ मियाँ को चुप कराने का मौका मिले.
कुल कथा का सार कि जब लोगों को मौका मिलता है, वो अपने मन की कर ही लेते हैं.
दो दिन पहले हमने पोस्ट लिखी कि हम थके हैं, दुखी हैं और कुछ पढ़कर अपने लेखन में कुछ सु्धार लाने के आकांक्षी. बस, मानो कि मौका हाथ लगा लोगों के. बहुतो ने क्या अधिकतर ने तो वाकई बहुत दुख जताया, मान मनोहार किया. सो तो खैर रजिया के यहाँ भी बहुतों नें किया था वाकई दुख व्यक्त.
मगर कुछ ऐसे दुख व्यक्त किये कि समझ ही नहीं आया कि मना रहे हैं, समझा रहे हैं, कविता लिख रहे हैं, धमका रहे हैं, डांट रहे हैं कि लतिया रहे हैं. कुछ की टोन तो ऐसी भी रही कि ठीक है, ठीक है-रो गा के जल्दी फुरसत हो लो. हम आते हैं अभी तुम्हारे लिए ड्रिक बनाकर (वो भी हमारी पसंदीदा-स्क्रू ड्राइवर- ऐसा प्रलोभन कि ज्यादा देर रोना भी भारी लगने लगा).
मास्साब पंकज भाई भी मौका ताड़े और इतने दिनों से जज्ब दिल की बात कह गये कि हमारे यहाँ का सबसे होशियार (शरारत में) छात्र और उधर हमारी छोटी बहना विनिता मनाते हुए कह रही हैं कि बुरा मत मानना मगर आप सत्या फिल्म के कल्लू मामा के जैसे दिखते हो-लो, एक तो हम पहले ही बुरा माने बैठे हैं तो सोचा होगा कि मान भी जायें तो क्या-एक दिन और नहीं लिखेंगे. मुर्दे पे क्या नौ मन माटी और क्या दस मन माटी. इतना हक तो बनता ही है छोटी बहन का. सही है, तुम्हें तो हक हईये है.
प्रिय ई-गुरु राजीव ने एक ही बार में मनुहार, अपना ब्लॉग खोलने का एजेंडा, फ्यूचर प्लान, शिकायत कि आपने आज तक हमें टिप्पणी नहीं दी, धमकी, सौगंध सब एक ही टिप्पणी में: अपनी टिप्पणी का समापन कुछ इस हृदय स्पर्शी अंदाज में किया-आप एक भीषण योद्धा की तलवार ( लेखनी ) छीन रहे हैं और कुछ नहीं. अब जब तक आप की टिपण्णी के दर्शन मैं अपने ब्लॉग पर नहीं कर लूँगा, महादेव की सौगंध मैं एक शब्द भी नहीं लिखूंगा.
अलग सा भाई टिप्पणी किये और फिर उसे पोस्ट बना कर लाये-मनुहार जैसा कि बहुतों ने किया घुड़की के अंदाज में-आप ऐसा कैसा कर सकते हैं? यही तो स्नेह है.
बालक आदित्य यानि हमारा प्यारा सा बबुआ, उसने तो रुला ही दिया कि मैं आपको बहुत मिस करुँगा. वहीं बेजी ने ऐसा लताड़ा कि हमारी तो घिघ्घी ही बंध गई.
पुराने योद्धा निश्चिंत थे तो ज्यादा इन्टरेस्ट नहीं लिये. इस टंकी पर उतरते चढ़ते हमारे संग संग उन्होंने कईयों को देखा है. इसे फैशन में लाने का और बाद में अपने नाम कॉपी राइट करा ले जाने का सेहरा अनुज सागर चन्द्र नहार के सर है.
एक जमाने में वो हर छठे छः मासे टंकी पर चढ़ा करते थे. फिर हम सब चिट्ठाकार फुरसतिया जी समेत जाकर उनकी मान मनुव्वल करके उतारा करते थे. बाद में तो उनका ऐसा रियाज बना कि जब तब दौड़ कर टंकी पर चढ़ जाते और जब कोई न भी मनाता तो भी खुद ही उतर आते कि मैं जानता हूँ, आप लोग आने ही वाले थे. कुछ ऐसे ही रास्तों पर महाशक्ति ने भी अपने जोहर दिखाये थे. फिर धीरे धीरे यह टंकी चढन कार्यक्रम फैशन से जाता रहा और आज हमारा कृत्य पुराने दिनों को याद बस करा गया.
अभ्यस्त फुरसतिया जी अमिताभ स्टाईल बैठे चाय पीते रहे, कहे बबुआ का मनोना चल रहा है, परसों चिट्ठाचर्चा करेंगे, वो बिल्कुल निश्चिंत थे कि परसों तक तो हम टंकी से उतर ही आयेंगे वरना वो लेपटॉप टंकी पर भिजवा देते कि पहले चिट्ठाचर्चा लिख लो फिर जो मन आये सो करो, गुरुदेव राकेश खंडेलवाल भी पुराने हैं, कहे कि मुझे पता है लौट कर फिर आओगे, तो पंकज बैंगाणी ’नो कमेन्ट’ कह कर अकर्मण्यता की पूर्व स्थिति को प्राप्त भये. सब अनुभव के सीखे हैं.
नवांगतुक वीनस केसरी बेचारे भागते रहे हमारे और मास्साब पंकज सुबीर जी के चिट्ठे के बीच, टिप्पणियां गिनते और कहते कि अब तक नहीं माने. सोच रहे होंगे कि कितना बड़ा पेट है., आखिर कब भरेगा.
किसी ने वीर कहा तो किसी ने हाथी- हाथी अपनी मस्त चाल चलता है, भले ही... कितना भी भौंके. अतः आप चलते रहें. सेकेंड हाफ से हमारा साबका नहीं किन्तु पहला हिस्सा तो हमारे लिये ही कहा है न!!
पंगेबाज ईमेल के जरिये सारी दुनिया से पंगा लेने तैयार खड़े नजर आये और कहने लगे, बस दुख का कारण बता दो बाकि हम देख लेंगे. बहुत स्नेही जीव हैं!!! धार्मिक तो खैर हैं ही!!
एक दो तो इतने भावुक हो उठे लिखते लिखते ऐसा लिख गये कि हमें लगा अपना ही शोक संदेश पढ़ रहा हूँ. घबरा सा गया मैं.
भाई अरविन्द मिश्रा तो ऐसा सटपिटियाये कि कहने लगे आगे से जितनी कविता सुनाओगे, बिना कुछ बोले सुना करुँगा, बस वापस आ जाओ. हमें लगा ये तो एक उपलब्धि ही कहलाई.
अनेकों ईमेल मिले, कोशिश की कि जितना बन पाये, जबाब दे दूँ, फिर भी कितने अब भी पेन्डिंग है. सभी का आभार.
वैसे दो एक ईमेल ऐसे भी रहे कि क्या कहें. कहते हैं अच्छा ही हुआ कि आप खुद ही हट गये वरना तो हटाने के क्रेन बुलवाना पड़ती. यह आभास आपकी फोटो देख कर हो रहा है.
इन सबके साथ आज जब मां भवानी ने फटकारा, पुचकारा, प्यार जताया तब तो कुछ सोचने को शेष रहा ही नहीं. मां भवानी, क्षमा करना, आपको दुखी किया बेवजह.
कल मेरे अनुज शिव मिश्र जी के ससुर साहब का निधन हो गया. ऐसी दुखद घड़ी में भी वो समय निकाल कर मनुहार करने आये ईमेल द्वारा, कैसे रुकता वापस आने से भाई.
ऐसा अपार स्नेह, ऐसा प्रेम, ऐसा मनुहार-आँख भर भर आती है, गला रुँध जाता है, शब्द अटक जाते हैं-क्या कहूँ.
सभी तो आये-सच कहूँ तो भले ही एक वाकया पृष्ट भूमि बन गया मगर वाकई एक दो दिन का आराम चाहता था, अनुराग भाई और अन्य मित्र समझ भी रहे थे, सो हो गया. किसी से भी कोई शिकायत नहीं, कोई गुस्सा नहीं. सभी तो अपने हैं.
ऐसा ही स्नेह बनाये रखिये. सफर पर पुनः हाजिर होता हूँ आप सबके साथ.
सभी का बहुत आभार.
बेहतरीन मुक्तक भी मिले मान मुन्नव्वल में:
रवि कान्त ने मास्साब की पोस्ट पर कहा:
उड़न तश्तरी के उड़ने का हुआ है क्या असर देखो
चरागें लेके ढूँढे हर गली औ हर शहर देखो
गजल की रूह व्याकुल है रदीफ़ो काफ़िया हैरां
गुरू मायूस बैठे हैं हुई है नम नजर देखो
मास्साब पंकज जी ने कहा:
हमें आवाज देकर के चले हो तुम कहां साहिब
चलो हम साथ चलते हैं चले हो तुम जहां साहिब
यहां तनहाई सूनापन अकेलापन बहुत होगा,
करेगा कौन मेहफिल को हमारी अब जवां साहिब.
राकेश खंडेलवाल जी मेरी पोस्ट पर :
जानता हू लौट कर वापिस पुन: आ जाओगे तुम
क्योंकि यह विश्वास मेरा है, तुम्हें लौटा सकेगा
चाह कर भी राम क्या पथ मोड़ पाये थे शिला से
है पठन संकल्प मेरा जो तुम्हें प्रेरित करेगा
छोड़ सकती लेखनी क्या उंगलियों का साथ बोलो
या जुदा परछाई होती है कभी अपने बदन से
शब्द चाहे बोलिये कुछ और जो चाहे लिखें भी
धार इक बहती रहेगी, नित तुम्हारी इस कलम से
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एक और ग्रेंड केनियन की फोटो:




























