सोमवार, सितंबर 21, 2015
सम्मानित साहित्यकार्स!!
गुरुवार, अप्रैल 30, 2015
त्रासद मानसिकता
अभी लम्हा पहले, जैसे ही अपने थके शरीर को कुछ आराम देने की एक ख्वाहिश लिए उसने पलंग पर लेट आँख मूँदी ही थी कि उसे लगा कि मानो कई सारी रेलगाड़ियाँ धड़धड़ाती हुई उसके मकान के नीचे से गुजरी हों...आँख खोली तो देखा पूरा मकान और उसकी हर दीवार उस धड़धड़ाहट से जैसे काँप उठी हो...न कभी सोचा होगा और न कभी अहसासा होगा इस धड़धड़ाहट को तो दहल कर काँप जाना ऐसे में एकदम लाज़मी सा है.
उसने महसूस किया अपने सीने पर आ गिरी छत की उस बीम का वजन कि इंच भर मौत से दूर...सांसे दफन होने की कगार पर..और खिड़की से आती कोहराम की आवाजें..हृदय विदारक क्रंदन के बीच...पदचापों की भागती चित्कार...जाने कौन कहाँ कैसे दफन होगा..कौन से अरमान...कौन से सपने...क्या कोई सोचता होगा इस मंजर के बीच...एक जिन्दगी की भीख मांगती मौत से फरियाद करती जुबां...चुप चुप सी घुँटी हुई आवाज...
चलते चलते एक विचार...कि इस जीवन से..जाने क्या किसने पाया होगा और जाने क्या किसने खोया होगा, कौन किस अपराध बोध तले क्या महसूस करता होगा की सोच से आगे ...आज सोच मजबूर हुई होगी...इस जीवन से...मात्र जी लेने की एक ऐसी तमन्ना लिए..और आती एक साँस...
और वो भी एक और इन्तजार में कि कैसे ले लूँ एक सांस और....
त्रासदी से गुजरती मानसिकता कभी सुकूं नहीं तलाशती...
उसकी सोच के परे की बात है सुकूँ और शांति जैसी शब्दावलि....
उसे तलाश होती है तो बस इतनी कि त्रासदी का असर कुछ कम हो जाये...
दुर्गति की गति को थोड़ा विराम मिल जाये..और वो जी सके एक और पल..चाहे जैसा भी पल..
एक अगला पल..जिसका उसे न अंदाज है और न ही कोई अरमान कि कैसा गुजरेगा वो पल..
मगर वो पल आये बस इतनी सी चाह...चाह कहें कि एक मात्र बचा विकल्प..
सुकूँ और शांति से भरे बेहतर पलों को जीने की चाह सिर्फ बेहतर पलों में जीते लोगों का शगल है ..
वरना तो किसी तरह जी पायें..बस इतना सा है सारा आसमान..कहने को मुठ्ठी भर आसमान...
मगर सोचें तो चिड़िया की चोंच में सिमटा सारा जहां..न जाने कितनों का..
उस जहां में जहाँ अब इन्सानों के नाम बदले है नम्बरों में..मृतक क्रमांक ७७८... मृतक क्रमांक ९७१ ..मजहब ..न मालूम..और सरकारी इन्तजाम...सब एक साथ जले और राख हो गये!!
सड़कों पर सबके लिए एक सा कैंडिल लाईट विज़ल..एक से फूल..एक से आँसूं..और एक सी राजनीति..
कुछ गहरे उतर कर सोचो तो...
एक दौड़ क्यूँ..
अगर ठौर ये..
फिर कहर क्यूँ?
-रुको, सोचो...
कुछ पल को जी लो जरा!!
-समीर लाल ’समीर’
रविवार, जून 02, 2013
देखता हूँ मुड़ कर
इसे पढ़िये और एक नया प्रयोग किया है तो सुनिये यू ट्यूब पर….
देखता हूँ मुड़ कर
और
सोचता हूं उम्र की इस दहलीज़ तक
पहुँचने के लिए
सीढ़ी दर सीढ़ी का सफर
सीढ़ी कहूँ इन्हें या
कहूँ वक्त के साथ
नित बनते बिगड़ते रिश्तों की
कहानी की इक किताब के पन्ने
या कह दूँ इसे
कुछ पा लेने
और कुछ खो देने की
हिसाब की बही..
जी चाहता है
उन्हीं सीढ़ियों तक लौट
किसी सीढ़ी पर कुछ देर बैठूँ सुकूँ से
तनिक सुस्ताऊँ
कहीं कुछ याद कर मुस्कराऊँ और
कुछ सीढ़ियों को अनदेखा कर
बस यूँ ही लाँघ जाऊँ...
कितने पन्नों को सहेज
छिपा लूँ अपने दिल में
और कुछ पन्नों को
अलग कर दूँ किताब से..
याद आते हैं
कुछ अनायास दर्द देकर खो गये
और कुछ बेवजह निर्लज्ज मुझसे आ जुड़े पल
चलो!! मिटा दूँ इन्हें उस हिसाब की बही से
बस! अक्सर यूँ जी चाहता है मेरा...
मगर ये जिन्दगी!!
कुछ मिटता नहीं
कुछ भूलता नहीं
सब दर्ज रहता है
यहीं कहीं आस पास
उन्हीं सीढ़ियों में दफन
जिन्दा सांस लेता...
कि किताब के पन्ने
आँधी में फड़फड़ाते हों जैसे!!
-समीर लाल ’समीर’
लिंक यू ट्यूब का:
रविवार, अप्रैल 28, 2013
मेरी कविता- नई इबारत!!!
मेरी कविता
बदल दी है मैने
उन सब बातों के लिए
जो तुमको मान्य न थी...
मेरी कविता
बदल दी है मैने
उन सब बातों के लिए
जो सबको मान्य न थी...
मेरी कविता
बदल दी है मैने
उन सब बातों के लिए
जो समाज को मान्य न थी...
मेरी कविता
बदल दी है मैने
उन सब बातों के लिए
जो मजहब को मान्य न थी...
मेरी कविता
बदल दी है मैंने
उन सब बातों के लिए
जो आलोचकों को मान्य न थी..
मेरी कविता- इन सब मान्यताओं की
निबाह की इबारत बनी
अब मेरी कहाँ रही
वो बदल कर ढल गई है
एक ऐसे नये रुप में जो
काबिल है साहित्य के सर्वश्रेष्ठ प्रकाशन में
प्रकाशित किए जा सकने के लिए
मेरी कविता अब इस नये रुप में
काबिल है साहित्य के सर्वश्रेष्ठ सम्मान से
सम्मानित किए जा सकने के लिए..
-कर दो न प्लीज़, अब और कितना बदलूँ मैं!!
-समीर लाल ’समीर’
मंगलवार, मार्च 05, 2013
चचा का यूँ गुजर जाना....हाय!!
चचा मेरे - नाम मिर्ज़ा असदुल्लाह बेग खान और लोग उन्हें प्यार से गालिब कहते थे- वो १८६९ में क्या निकले कि तड़प कर रह गये उनके चाहने वाले अच्छा पढ़ने को...आज मुझे लगा कि भतीजा हूँ भले ही नाम समीर लाल ’समीर’ है ऊउर लोग प्यार से समीर बुलाते हैं..तो भी दायित्व तो बनता है- कुछ तो फर्ज़ निभाना होगा भतीजा होने का.
बस, इसी बोझ तले-दबे दबे…करहाते..पेश है तीन ठो...पहला शेर तो खैर कालजयी होना ही है...दम साध के दाद उठाना....वरना प्रश्न पढ़ने वाले की समझ पर उठ जायेगा कि समझ नहीं पाया..और वो होगे आप- यह तय जानो!! J
नफरत की इन्तहां का, यह हाल देख ’समीर’
जब भी मिलते हैं, गले लग जाते हैं तपाक से..
अब अगला चचा को याद करते:
वो पूछते हैं हमसे, क्या हाल-ए-दिल सनम
कुछ गमज़दां थे गालिब, कुछ गमज़दां हैं हम...
और फिर ...बस, यूँ ही...कुछ आज के समय पर कुछ कह आने को मन कर आया भतीजे का...चचा तो खैर त्रिवेणी (गुलज़ार साहेब की विधा) का शौक रखते नहीं थे..... मगर उससे भतीजे ने कब सीमा आंकी है…
यारों कि इल्तज़ा है कि कुछ कहानियाँ अपनी आवाज़ में सुनाऊँ..
हाल पता हैं फिर लोग तड़पेंगे मिलने को, और मैं मिल न पाऊँ
-इतना भी अमिताभ हुआ जाना, अभी हाल तो मुझे मंजूर नहीं.
और अब चलते चलते अपने भी मन कुछ कह जाऊँ (एक का तो अधिकार बनता है भतीजा हूँ आखिर) तो यह लिजिये:
मंहगाई के इस दौर में भी, वो ईमानदारी से कमाता है..
हर वक्त खुश रहता है, हँसता है और खिलखिलाता है...
-बुजुर्गों का कहना है, वो कोई सिरफिरा नज़र आता है.
-समीर लाल ’समीर’
शुक्रवार, मार्च 02, 2012
६ साल पूरे हुए और हम जहाँ के तहाँ: मैं मोती होना नहीं चाहता!!!
जब ३ मार्च २००६ को अपना ब्लॉग शुरु किया था तो बताया गया था कि बस एक साल की मेहनत और फिर इससे कमाई शुरु हो जायेगी. बड़े मन से जुटे. फिर साल दर साल बीतते गये. हर साल यही उम्मीद कहीं न कहीं बँधाई गई कि अगले साल से ...कमाई शुरु.
आज ६ साल बीत गये. मगर लोगों की बात सुन आज भी आशांवित हूँ कि बस, अगले साल से कमाई शुरु होने वाली है और फिर नौकरी छोड़ो और बस, दिन भर ब्लॉगिंग...जितना करोगे, उतना मजा...उतनी कमाई...क्या बात है!!
आज हो गये हैं ६ साल पूरे इस ब्लॉग का नशा लगे. समय के पंख दिखते नहीं मगर इस तरह अहसास तो करा ही देते है. फोटो वही पुराना लगाया हुआ है ६ साल पहले का. यही विडंबना है अधेड़ावस्था की कि जवानी का जाना मानो स्वीकार ही न हो...कई बार सोचता हूँ कि इससे बेहतर तो राजनिति मे उतर जाऊँ...वहाँ स्वीकार्य है चिर युवा रहना....आडवानी जी जैसे युवा अब भी प्रधान मंत्री बनने का स्वपन पाले लगे ही हैं रथ यात्रा निकालने में तो हमारी स्थिति तो थोड़ी बेहतर ही कहलायेगी.
खैर यह सब छोड़ें..६ साल के ब्लॉगर की कविता पढ़े...बधाई दें, मुस्करायें या जो मन आये सो करें मगर शुभकामनाएँ तो दे ही जायें:
कभी मन में था कि साहित्यकार कहलाऊँ ब्लॉग लिख लिख कर...हा हा...ब्लॉग और साहित्य...कितने न मुस्करा देंगे..अनभिज्ञ एवं बेवकूफ...मगर मैं चुप रहूँगा...क्यूँ कुछ कह कर अपने संबंध खराब करुँ....अब मन नहीं हैं साहित्यकार कहलाने का...मगर मन पर तो लोभ ने कब्जा जमाया हुआ है..उसका क्या करुँ...इस कविता में दृष्य देखें तो शायद आपका मन भी बदले:
मैं मोती होना नहीं चाहता!!!
बूँद एक चली
छोड़ बादल को
प्रसन्न मन
मिलेगी नीचे धरा पर
एक तत्काल बनी नाली में
जहाँ तेरती होंगी
नन्ही नन्ही किश्तियाँ
कागज़ की
वहीं
बनायेगी साथी बून्दों को
दोस्त अपना...
खेलेगी, गुनगुनायेगी
उमंगों में डूब
उन के साथ
गली में अक्स्मात बनी
एक नाली खुश हुई
आकर मिलेंगीं और बून्दें
तो वह मिल सकेगी
शहर भर की नालियों के संग..
पूछेगी हाल सारे शहर का...
गपियायेगी..खिलखिलायेगी और
मिलेंगी
इक नदिया में जाकर
नदी खुश थी
उमड़ती हुई धाराओं से मिल
जा सकेगी वह
उस गहरे सागर तक
जहाँ आती हैं सब नदियाँ उसकी तरह
बाँटेगी उनकी खुशियाँ..
हँस लेगी उनके साथ..
रहेगी खुश...
और सागर...
समाहित कर सबको अपने भीतर
शांत और गंभीर.....
फिर एक दिन एक हिस्सा
बन जाता वाष्प...
सूर्य की उष्मा से...
और उठ जा मिलती
उष्मा से बनी वाष्पकिरणें...बूँदें...
पुनः उन्हीं बादलोंमें...
जीवन के
अनवरत गतिक्रम सी
एकाएक एक बूँद रो उठती है
इस बार विदा होते...
कहीं मैं नाली की जगह
सीप में न समा जाऊँ...
मैं मोती बनना नहीं चाहती...
माना मोती कीमती होता है पर
मुझे...हाँ.....मुझे
फिर वापस आना है
अपनों से मिलने
और बनाये रखनी है
अपने होने की अस्मिता
आज फिर एक बार
आँख नम है मेरी...
मुझे वापस आना है...
अपनों में मिल जाना है!!!!
-मैं मोती होना नहीं चाहता!!!
-समीर लाल ’समीर’
सोमवार, फ़रवरी 13, 2012
बुरा हाल है ये मेरी जिन्दगी का...
इधर कुछ दिनों से खाली समय में किताबों में डूबा हूँ. न लिख पाने के लिए एक बेहतरीन आड़ कि अभी पढ़ने में व्यस्त हूँ.
हाथ में आई पैड है और उस पर खुली है “शान्ताराम”. नाम से तो शुद्ध हिन्दी तो क्या, मराठी की किताब लगती है मगर है अंग्रेजी में. ईबुक के हिसाब से १७०० पन्नों की है और पढ़ते हुए अबतक लगभग २५० पन्नों के पार आ पाया हूँ मैं.
शायद २५० पन्ने शुरुआत ही है. अभी अभी नामकरण हुआ है न्यूजीलैण्ड के लिन का (जो मुंबई में आकर लिनबाबा हुआ), लिनबाबा से “शान्ताराम”. बहुत चाव से लिन अपने नये नाम शान्ताराम को महाराष्ट्र के एक गांव में आत्मसात कर रहा है जिसका अर्थ है शान्ति का प्रतीक और मैं अब जब शान्ताराम के मुंबई प्रवास और फिर रेल और राज्य परिवहन की बस में सुन्दर गांव की यात्रा को पढ़ रहा हूँ तो अपने मुंबई के ५ वर्षीय प्रवास और अनेक बस और रेल यात्राओं की याद में डूब पुस्तक से इतर न जाने किस दुनिया में खो जाता हूँ. पठन रुक रुक कर चलता है मगर रुकन में भी जीवंतता है. एकदम जिन्दा ठहराव...लहराता हुआ- बल खाता हुआ एक इठलाती नदी के प्रवाह सा- जिसके बहाव में भी नजरों का ठहराव है.
ऐसे लेखकों को पढ़कर लगता है कि कितना थमकर लिखते हैं हर मौके पर- हर दृष्य और वृतांत को इतना जिन्दा करते हुए कि अगर फूल का महकना लिखेंगे तो ऐसा कि आप तक उस फूल की महक आने लगती हैं. माहौल महक उठता है.
नित पढ़ते हुए कुछ गाना सुनते रहने की आदत भी लगी हुई है. अक्सर तो यह कमान फरीदा खानम, आबीदा परवीन, नूरजहां, मुन्नी बेगम, मेंहदी हसन, बड़े गुलाम अली खां साहब आदि संभाले रहते हैं- एक अपनेपन सा अहसासते हुए जी भर कर सुनाते हैं अपने कलाम..पिछले दिनों रेशमा नें भी खूब सुर साधे- जी भर कर जी बहलाया- शुक्रिया रेशमा.
आज मन था सुनने का तो सोचा कि औरों को मौका न देने से कहीं जालिम न कहलाया जाऊँ. तो आज इन पहुँचे हुए नामों को आराम देने की ठानी और मौका दिया सबा बलरामपुरी को. सबा ने भी उसी तरह अपनेपन से मुस्कराते हुए अपने दिलकश अन्दाज में सुनाया:
अजब हाल है मेरे दिल की खुशी का
हुआ है करम मुझ पे जब से किसी का
मुहब्बत मेरी ये दुआ मांगती है
कि तेरे साथ तय हो सफर जिन्दगी का...
सबा की आवाज की खनक, अजीब से एक बेचैनी, एक कसक और कसमसाहट के साथ ही उसकी लेखनी मुझे खींच कर ले गई उस अपनी जिन्दगी की खुशनुमा वादी में..जहाँ शायद भाव यूँ ही गुनगुनाये थे मगर शब्द कहाँ थे तब मेरे पास.न ही सबा की लेखनी की बेसाखियाँ हासिल थी उस वक्त....जिसकी मल्लिका सबा निकली. वो यादें तो मेरी थीं और हैं भी. उन पर सबा का कोई अधिकार नहीं तो उनमें डूबा मैं तैरता रहा मैं हरपल तुम्हें याद करता...गुनगुनाता:
मुहब्बत मेरी ये दुआ मांगती है
कि तेरे साथ तय हो सफर जिन्दगी का...
दुआएँ यूँ कहाँ सब की पूरी होती हैं. मेरी न हुई तो कोई अजूबा नहीं. अजूबा तो दुआओं के पूरा होने पर होता है अबकी दुनिया में. मानों खुशी के पल खुशनसीबी हो और दुख तो लाजिमी हैं.
मैं सोचता ही रहा और फिर डूब गया शान्ताराम की कहानी में जो भाग रहा था डर कर कि सुन्दर गांव में नदी का स्तर मानसून में एकाएक बढ़ रहा है और शायद गांव डूब ही न जाये. वो गांव के निवासियों को जब सचेत करता है तो सारे गांव वाले हँसते हैं उसकी सोच पर. सब निश्चिंत हैं कि आजतक वो नदी इतना बढ़ी ही नहीं कि गांव डूब जाये. उन्हें वो स्तर भी मालूम था कि जहाँ तक नदी ज्यादा से ज्यादा बढ़ सकती है.
न्यूजीलैण्ड में रहते भी शान्ताराम को ऐसे किसी विज्ञान का ज्ञान ही नहीं हो सका जो ऐतिहासिक आधार पर ऐसा कुछ निर्णय निकाल पाये. भारत की स्थापित न जाने कितनी मान्यताओं के आगे विज्ञान यूँ भी हमेशा बौना और पानी ही भरता नजर आया है और इस बार भी पानी उस स्तर के उपर न जा पाया. लिनबाबा उर्फ शान्ताराम नतमस्तक है उन भारतीय मान्यताओं के आगे. मैं तो खुद ही नतमस्तक था. उसी भूमि पर पैदा हुआ था तो मुझे कोई विशेष आश्चर्य नहीं हुआ...
सबा है कि छोटे छोटे मिसरे सरल शब्दों मे बहर में गाये जा रही है:
मेरा दिल न तोड़ो जरा इतना सोचो
मुनासिब नहीं तोड़ना दिल किसी का...
तुम्हें अब तरस मुझपे आया तो क्या है
भरोसा नहीं अब कोई जिन्दगी का..
छा गई सबा और उसकी आवाज दिलो दिमाग पर...याद आ गया बरसों बाद उस दिन तुम्हारा मुझको अपने फेस बुक की मित्रों की सूची में शामिल करना इस संदेश के साथ: “हे बड्डी, ग्रेट टू सी यू हियर..रीयली लाँग टाईम..काइन्ड ऑफ पॉज़.... वाह्टस अप- हाउज़ लाईफ ट्रीटिंग यू-होप आल ईज़ वेल”
हूँ ह...पॉज कि रीस्टार्ट आफ्टर ए फुल स्टॉप? नो आईडिया!!!
भूल ही चुका था मैं यूँ तो अपनी दैनिक साधारण सी बहती हुई जिन्दगी में..कभी ज्वार आये भी तो उससे उबर जाना सीख ही गया था स्वतः ही..जिन्दगी सब सिखा देती है..यही तो खूबी है जिन्दगी में...जिसके कारण दुनिया पूजती है इसे..कायल है इसकी. मन कर रहा है कि फेस बुक में तुम्हारी वाल पर जाकर सबा की ही पंक्तियाँ लिख दूँ और थैंक्यू कह दूँ सबा को मुझे रेस्क्यू करने के लिए...बचाने के लिए:
तुम्हें अब तरस मुझपे आया तो क्या है
भरोसा नहीं अब कोई जिन्दगी का..
जाने क्या सोच रुक जाता हूँ और बिना कोशिश हाथ आँख पोंछने बढ़ जाते हैं. आँख और हाथ का भी यह अजब रिश्ता आज भी समझ के बाहर है मगर है तो एक रिश्ता. ...अनजाना सा..अबूझा सा,,,हाथ आँखों को नम पाता है..शायद सबा को सुन रहा होगा वो भी मेरे साथ:
अभी आप वाकिफ नहीं दोस्ती से
न इजहार फरमाईये दोस्ती का...
शायद आप तो क्या, हम भी कभी अब वाकिफ न हो पायेंगे. वक्त जो गुजरना था...गुजर गया. बेहतर है मिट्टी डालें उस पर. मगर हमेशा बेहतर ही हो तो जिन्दगी सरल न हो जाये? जिन्दगी तो जूझने का नाम है ऐसा बुजुर्गवार कह गये हैं. गालिब भी कहते थे तो हम क्या और किस खेत की मूली हैं...
शान्ताराम जूझ रहा है..एक भगोड़ा..जिसकी तलाश है न्यूजीलैण्ड की पुलिस को. जमीन छूट जाने की कसक उसे भी है और मजबूरी यह है की कि कैद उसे मंजूर नहीं. कैद की यातना से भागा है..एक आजाद सांस लेने..वो किसे नसीब है भला जीते जी..जमीन की खुशबू से कौन मुक्त हुआ है भला...रिश्तों की गर्माहट को कैसे छोड़ सकता है कोई...बुलाते हैं वो रिश्ते और महक के थपेड़े....खींचते है वो...
सोचता हूँ हालात तो मेरे भी वो ही हैं...मुझे तो कैद का भी डर नहीं...फिर क्यूँ नहीं लौट पाता हूँ मैं..उस मिट्टी की सौंधी खुशबू के पास..अपने रिश्तों की गरमाहट के बीच...उस मधुवन में...क्या मजबूरी है...जाने क्या...सोच के परे रुका हूँ इस पार....एक अनसुलझ उधेड़बून में...अबूझ पहेली को सुलझाता....
सबा कह रही है:
बुरा हाल है ये तेरी जिन्दगी का...
-समीर लाल “समीर”
आप भी सुनें सबा बलरामपुरी को, शायद मुझ सा ही कुछ अहसास कर पायें:
बुधवार, जून 30, 2010
सर, आपके घर चोर आये हैं!!!
एक बार कहीं का सुना किस्सा याद आ रहा है:
अमरीकी, जपानी और हिन्दुस्तानी पुलिस के मुखिया मिटिंग में थे. अमरीकी बोला कि हम तो चोरी के बीस मिनट के अन्दर चोर की पहचान कर लेते हैं. जपानी बोला कि हमारे यहाँ तो दस मिनट में पता कर लेते हैं कि किसने चोरी की. भारतीय पुलिस के मुखिया हँसने लगे. दोनों ने पूछा कि हँस क्यूँ रहे हैं. उसने कहा कि हमें तो चोरी के पहले से ही मालूम होता है कि कौन चोरी करेगा.
मगर उस पहले से मालूम वाले को पकड़वाने के लिए आपकी कितनी पहुँच होना चाहिये, ये सोचने का विषय है वरना भारत में कोई चोर भला बाद में कब पकड़ाया है सिवाय रसूकदारों के घर चोरी करने के इल्जाम में.
वैसे तो कनाडा में आम तौर पर घरों में चोरी के किस्से सुनाई नहीं देते. फिर किसी का घर में घुसना, तो दरवाजा ही पूरा काँच का है, जिसका जी चाहे, फोड़े और घूस आये. मगर ऐसा होता नहीं है. इसीलिए तो काँच का है. कितनी बार रात भर दरवाजा खुला रह जाता है, गैरेज खुला पड़ा रहता है, कभी कुछ मिसिंग तो दिखा नहीं मगर फिर भी, इन्तजामात करने में कोई चूक नहीं.
कुछ दिन पहले एक पोस्ट में फोटो छापी थी जिसमें एलार्म फोर्स का बोर्ड भी आ गया था. भारत से मित्र ने जिज्ञासा प्रकट की कि यह एलार्म फोर्स क्या है? सोचा कि इसी विषय पर लिख दूँ, उनकी जिज्ञासा भी दूर हो जाये और मित्रों को पता भी चल जाये.
एलार्म फोर्स हाऊस सिक्यूरीटी कम्पनी है जो हमारे घर की सिक्यूरिटी देखती हैं. उनके एलार्म हमारे दरवाजे और खिड़कियों पर लगे हैं. अगर एलार्म ऑन है और उसे बिना कोड डाले ऑफ किए बिना कोई खिड़की या दरवाजा खोलता है तो घर सिक्यूरिटी कम्पनी से कनेक्ट हो जाता है और एनाउन्समेन्ट होता है कि आप कौन हैं और सिक्यूरिटी कोड बताओ. अगर वो नहीं बता पाया तो सायरन बजने लगता है जिससे पड़ोसी सजग हो जाते हैं और पुलिस स्टेशन को सूचना हो जाती है.
तीन से चार मिनट में पुलिस आ जाती है. इस बीच एनाउन्समेन्ट होता रहता है घर भर में कि पुलिस चल चुकी है, आ रही है. यह सब फोन लाईन से जुड़ा है किन्तु यदि फोन लाईन कोई बाहर से काट दे तो भी वायरलेस से एनाउन्समेन्ट शुरु हो जाता है और पूरी प्रक्रिया की जाती है.
यह भी संभव नहीं कि कोई बंदूक की नोक पर हमसे कोड बुलवा दे और पुलिस न आये. अगर हमने गलत कोड बोल दिया तो फिर वो अनाउन्समेन्ट चुप हो जाता हैं मगर पुलिस आ जाती है. फिर आप लाख कहिये कि कुछ नहीं हुआ, वो आपके घर वालों को बाहर निकाल कर पूरा घर चैक करते हैं कि किसी को गन पाईन्ट पर रखकर तो ऐसा नहीं कहलवा रहे हैं.
अगर हम घर में हैं तो होम अलार्म लगाते हैं याने बिना एलार्म ऑफ किए कोई घर में नहीं घुस सकता या निकल सकता. अगर हम घर में नहीं हैं तो अवे का अलार्म लगाते हैं, तब न कोई घुस सकता है न घर में कोई चीज हिल सकती है याने मोशन डिटेक्टर भी लगा रहता है अर्थात अगर कोई पहले से घुस कर बैठा हो तो बाद में चोरी करके भागे, वो संभव नहीं. घर एयर पैक्ड रहते हैं अतः हवा से कुछ हिलने का सवाल नहीं.
अवे के अलार्म में हम जहाँ भी हों, अलार्म कम्पनी हमें मोबाईल पर घटना की सूचना भी तुरंत देती है एवं नामित पड़ोसी/ मित्र को फोन पर भी सूचना दी जाती है कि वो भी आ कर चैक कर लें पुलिस के साथ.
इसी के साथ एक पैनिक बटन भी या तो बाथरुम या बिस्तर के पास लगा देते हैं ताकि ऐसे किसी अंदेशे पर आप बाथरुम में छिप गये हो या बिस्तर पर हो तो उसे दबा दें, तब भी बिना एनाउन्समेन्ट के पुलिस भिजवा दी जाती है.
इस व्यवस्था के लिए महिना दर महिना एक निश्चित फीस ली जाती है एवं साल में दो बार बिना कोड डाले दरवाजा खोल देने की भूल को माफ करते हुए बाकी बार फाल्स एलार्म के लिए एक पेनाल्टी की रकम ली जाती है.
वैसे तो यहाँ चोरी होती नहीं (इंसान तो हैं ही, कम या न के बराबर होती है) मगर इस एलार्म से बहुत सुकून रहता है. खास कर जब हम ६-६ महिने भारत में पड़े रहते हैं. उसी के साथ स्मोक अलार्म भी है. घर के भीतर धुँआ या आग से फायर ब्रिगेड आ जाती है. अब हम ठहरे हिन्दुस्तानी, कभी अगरबत्ती जलाने या हवन करने लग जायें, तो उस समय का जुगाड़ बना लिया है और स्मोक सेन्सर पर टावेल लगा देते हैं ताकि एलार्म न बजे.
मित्र को यह बात जब ईमेल से बताई और आशा व्यक्त की कि ऐसा भारत में भी होने लग जाए तो कितना बढ़िया. उनकी जिज्ञासा और बढ़ गई और भारत के परिपेक्ष में इतने प्रश्न सामने आये कि क्या कहना:
- जब चोर घूसे और बिजली गुल हुई हो तो क्या? एलार्म कैसे बजेगा और कम्पनी को कैसे पता लगेगा?
- फोन लाईन अगर खराब चल रही हो कई दिन से, तब?
- खिड़की तो खुली ही रहती है, हवा को कैसे रोकेंगे किसी वस्तु को हिलाने से?
- स्मोक सेन्सर पर धूल जमने के बाद भी काम करेगा क्या?
- क्या मोशन डिटेक्टर ऐसा नहीं बन सकता जो सिर्फ इन्सानों के मोशन पहचाने बाकि को जाने दे?
- अगर एक ही लाईन में चार पांच घरों के एलार्म एक साथ बज उठे, तो पड़ोसी को किसके घर पहले जाना चाहिये?
- अगर घर मालिक बाहर गया है तो क्या एलार्म कम्पनी मिस्ड काल दे सकती है? (सस्ता पड़ेगा)
- पुलिस स्टेशन से आपके घर की दूरी साईकिल से तय करने में हवलदार को कितना समय लगेगा?
- अगर छुट्टी के दिन चोर घुसा, तब?
- अगर भारत बंद के दौरान चोर चला आये, जब?
- अगर चोर की सेटिंग हो थाने में, और पुलिस आये ही न?
- जब अलार्म बजे और सिक्यूरिटी कम्पनी वाला चाय पीने या पान खाने गया हुआ हो तो?
- अगर फोन का बिल या बिजली का बिल भुगतान न होने के कारण लाईन काटी जाये, तब?
यक्ष प्रश्न:
- क्या हिन्दी ब्लॉग में रचनाओं की चोरी रोकने के लिए इन कम्पनियों के पास कोई एलार्म सिस्टम है?
अगर...अगर..अगर...और जाने कितने प्रश्न...मगर इन्हें सुन कर मैने अपना स्टेटमेन्ट वापस ले लिया कि ऐसा भारत में भी होने लगए तो कितना बढ़िया.
लेकिन जैसे हम देशी वैसा ही हमारा मित्र भी, ठेठ भारत से भारत में रहने वाला. आखिर बात ऐसे ही खतम कैसे हो जाने दे.
अब आखिरी प्रश्न एक आँख दबा कर उछाला कि गुरु, इतनी सिक्यूरीटी लगाये हो मतलब मोटी रकम धरे होगे घर में. अब उनको क्या बतलायें कि भई, जब हमारे देश में जिनकी जान की कीमत कौड़ी की नहीं है, वो जेड सिक्यूरीटी लिए घूम रहे हैं तब हमारे पास मेहनत का कमाया गुजारे लायक तो है ही, फिर क्यूँ न लगायें सिक्यूरीटी.
लगता तो है कि शायद मेरे जबाब से आशवस्त हो गये होंगे क्यूँकि उनकी एक दबी आँख खुली दिखी बाद में.
बस, अब एक ही बात कहता हूँ कि मेरा भारत जैसा भी है, वैसा ही बढ़िया. कौन जरुरत है इन सब नौटंकियों की. सायरन तो कोई सड़क पर से निकलता हुआ ट्र्क भी बजा देगा मगर पड़ोसी, वो अब कहाँ निकलते हैं सायरन सुन कर. बल्कि वो तो यह सुनिश्चित करने में जुट जायेंगे कि उनका घर ठीक से बंद है कि नहीं...बाकी खिड़की से झांक कर मजा तो पूरा ले लेंगे आपको लुटता देखने का.
रविवार, जून 20, 2010
जरा सा बखान, कुछ तस्वीरें और एक लघु कथा
पारिवारिक व्यस्तताओं के बीच नेट पर आना न के बराबर चल रहा है और इस बीच देख रहा हूँ कि ब्लॉगवाणी भी किन्हीं तकनिकी समस्यायों के तहत नई पोस्ट नहीं दिखा रहा है.
आज हालांकि एक नई पोस्ट लगाने का मन था किन्तु चूँकि इस बीच किसी को पढ़ा नहीं तो मैं अपने आपको नया कुछ लिखने या पढ़वाने का अधिकारी नहीं पाता. पहले कुछ पढ़ लूँ मित्रों को, फिर लिखूँगा भी और पढ़वाऊँगा भी. मेरी यह आदत नहीं कि किसी को पढ़ूँ न या किसी को बताऊँ न कि तुमको पढ़ लिया है और बस, अपनी अपनी पढ़वाता चलूँ और आशा लगा कर बैठ जाऊँ कि वो मुझे बतायेंगे कि आपको पढ़ा. कम से कम मुझे असहज लगता है. अपनी अपनी आदत है.
होती है कईयों की आदत कि खुद तो किसी को नमस्ते नहीं करना मगर सामने वाला नमस्ते न करे तो उसे बदतमीज करार देना और बुरा मान जाना. सही है कि जब तक तुम पावर में हो शायद लोग तुम्हारे बिना नमस्ते किये भी नमस्ते करते चलें. मगर पावर का क्या है, आज है और कल नहीं रहेगा. ये व्यवहार ही है जो जीवन भर साथ निभाता है.
तब तक आपको अपनी एक लघुकथा जो कुछ दिनों पूर्व महावीर जी के ब्लॉग मंथन पर प्रकाशित हुई थी, वो पढ़वाता हूँ. साथ ही बगीचे में नये फूल आ गये हैं, चेरी और सेब भी बस पकने की तैयारी में हैं. मौसम गरमी का सुहाना हो गया है. बैकयार्ड में पार्टियों का दौर चालू है, कुछ तस्वीरें बैक यार्ड की:
लघु कथा:
कर्ज चुकता हुआ??
इकलौता बेटा है.
हाल ही बी ई पूरी कर ली. मास्टर माँ बाप की आँख का तारा, उनका सपना. एक शिक्षक को और क्या चाहिये, बेटा पढ़ लिख कर इन्जिनियर बन गया.
विदेश जाकर आगे पढ़ने की इच्छा है.
शिक्षक का काम ही शिक्षा का प्रसार है, वो भला कब शिक्षा की राह में रोड़ा बन सकता है वो भी तब, जब उसका इकलौता बेटा उनका नाम रोशन करने और उनके सपने पूरे करने के लिए माँ बाप से बिछोह का गम झेलते हुए अकेला अपनी मातृ भूमि से दूर अनजान देश में जा संघर्ष करने को तैयार हो.
बैंक से एक मात्र जमा पूँजी, अपना मकान गिरवी रख, लोन लेकर मास्साब ने बेटे को आशीषों के साथ विदेश रवाना किया.
दो बरस में बेटा कमाने लायक होकर, मुश्किल से साल भर में कर्ज अदा कर देगा फिर मास्साब की और उनकी पत्नी की जिन्दगी ठाट से कटेगी. फिर वो ट्यूशन नहीं पढ़ायेंगे. बस, मन पसंद की किताबें पढ़ेंगे और साहित्य सृजन करेंगे.
अब चौथा बरस है. बेटे ने एक गोरी से वहीं विदेश में शादी कर ली है. उससे एक बेटा भी है. भारत की बेकवर्डनेस बहु और पोते दोनों के आने के लिए उचित नहीं . इसके चलते बेटा भारत आ नहीं सकता और वहाँ विदेश में घर में माँ बाप के लिए जगह नहीं और न ही कोई देखने वाला.
नई फैमली है, खर्चे बहुत लगे हैं. फोन पर भी बात करना मंहगा लगता है अतः लोन वापस करने की अभी स्थितियाँ नहीं है और न ही निकट भविष्य में कोई संभावना है. बेटे और उसकी पत्नी को बार बार का तकादा पसंद नहीं अन्यथा भी अनेक टेंशन है, जो भारतीय माँ बाप समझते नहीं, अतः इस बारे में बात न करने का तकादा वो माँ को फोन पर दे चुका है वरना उसे मजबूर होकर फोन पर बात करना बंद करना होगा. माँ ने पिता जी को समझा दिया है और पिता ने समझ भी लिया है.
आज रिटायर्ड मास्साब ने अपने ट्यूशन वाले बच्चों को नये घर का पता दिया. कल वो उस किराये के घर में शिफ्ट हो जायेंगे.
जाने कौन सा और किसका कर्ज चुकता हुआ. कम से कम बैंक का तो हो ही गया.
साहित्य सृजन की आशा इतिहास के पन्ने चमका रही है.
इतिहास भी तो साहित्य का ही हिस्सा है!!
उसकी चमक बरकरार रखने का श्रेय तो मिलना ही चाहिये!!
-समीर लाल ’समीर’
बुधवार, मई 05, 2010
४०० वीं पोस्ट और एक गज़ल
आज सुबह किसी कार्यवश ओकविल (मेरे घर से करीब १०० किमी) जाना हुआ. जिस दफ्तर में काम था, उसके समने ही मेन रोड थी, जिस पर साईड वाक बनने का कार्य जोर शोर से चल रहा था. पूरी मिट्टी के जो ढेर लगाये गये थे, उन्हें बड़ी बड़ी मशीनों से लेवल किया जा रहा था.
दफ्तर से जब काम पूरा करके निकला, तो उस दफ्तर का मालिक भी साथ था. यूँ ही चर्चा में मैने जानना चाहा कि जब यह वाक वे पूरा बन रहा है, तो यह पहाड़ जैसी मिट्टी बीच में क्यूँ छोड़कर दोनों तरफ का काम चालू है, एक लाईन से क्यूँ नहीं करते यह लोग. बेवजह बीच में काम छोड़ कर, गाड़ी दूसरी तरफ ले जाते हैं बार बार, और आगे काम जारी रखते हैं.
तब उसने मुझे थोड़ा पास ले जाकर वो मिट्टी का ढेर दिखाया, जो बीच में लगभग १०० मीटर की जगह घेरा हुआ था. उस पर एक "गूस" महारानी बड़े ठसके से विराजमान थी. बताया गया कि एक रात उसने वहाँ अंड़े दे दिये हैं तो अब जब तक बच्चे नहीं हो जाते, सरकार उतना हिस्सा नहीं छुएगी और बच्चा हो जाने के बाद जब वो चली जायेगी, तब ही उस हिस्से को बनाया जायेगा.
अभी मेन रोड़ की तरफ एक प्लास्टिक की जाली भी लगा दी गई है कि भूल से वो सड़क पर न चली जाये और किसी तेज रफ्तार गाड़ी की चपेट में आ जाये. निर्माण कर्मचारी भी उसे रोज खाने के लिए पॉपकार्न और चिप्स डाल देते हैं ताकि भोजन की तलाश में उसे भटकना न पड़े.
क्या हम कभी ऐसी कल्पना सरकार की तरफ से अपने देश में कर पायेंगे या फिर सिर्फ कागज पर गिनती लगाते रहेंगे कि अब १४११ बाघ बचें हैं?
नीचे चित्र में ये दो गीस (goose (plural: geese)) कल मेरे घर के सामने घास में टहलने आये. पड़ोस में एक छोटा सा तालाब हैं, वहीं रहते हैं. सोचा, आपसे भी मिलवा दूँ.
खैर, यह है मेरी ४०० वीं पोस्ट. बहुत रोचक और दिलचस्प सफर रहा इन ४०० पोस्टों का. टिप्पणी के माध्यम से अब तक लगभग ३५०० लोगों का, अवागमन में लगभग १६४००० लोगों ने और फीडस स्बासक्राईब करने में लगभग ५७० लोगों नें अपना स्नेह और प्रोत्साहन दर्ज किया.
उम्मीद करता हूँ कि आप सबका स्नेह यूँ ही मिलता रहेगा और यह सफर यूँ ही खुशनुमा बना रहेगा.
पिछली बार जो गज़ल साधना की आवाज में आपको सुनवाई थी, उसमें जैसा मैने कहा था तीन शेर किसी और के थे और तीन मेरे. अब फिर से वही गज़ल मगर इस बार इसमें सारे शेर मेरे ही हैं और आवाज साधना की. इस चौथे शतक के मौके पर लुत्फ उठाईये.
जाने क्या बात है जो तुमसे बदल जाती है
जिन्दगी मौत के साये से निकल जाती है
नब्ज को छू के वो खुशहाल हुए जाते है
सांस तो रेत है हाथों से फिसल जाती है
देख तो आज के मौसम का नजारा क्या है
ये तबियत भी हमारी तो मचल जाती है
मुझको तो चाँद दिखे या कि तुम्हारी सूरत
दिल की हस्ती मेरी दोनों से बहल जाती है
कैसे जीना है किसी को ये सिखाना कैसा
वक्त के साथ में हर सोच बदल जाती है.
जब भी होता है दीदार तेरा साहिल पर
डूबी कश्ति मेरी किस्मत की संभल जाती है.
बात करने का सलीका जो सिखाया हमको
बात ही बात में नई बात निकल जाती है.
दास्तां प्यार की तुमको ही सुनाई है ’समीर’
दर्द के देश में यह बन के गज़ल जाती है.
-समीर लाल ’समीर’
यहाँ क्लिक करके सुनिये:
बुधवार, मार्च 24, 2010
निंदिया न आये-जिया घबराए
देर रात गये सोने की कोशिश मे हूँ. नींद नहीं आती तो ख्याल आते हैं. अकेले में ख्याल डराते है और इंसान अध्यात्म की तरफ भागता है भयवश. यह इन्सानी प्रवृति है, मैं अजूबा नहीं.
आधुनिक हूँ तो आधुनिक तरीके अपनाता हूँ अध्यात्म के. बड़े महात्मा जी का आध्यात्मिक प्रवचन सीडी प्लेयर में लगा कर उससे मुक्ति के मार्ग के बदले नींद का मार्ग खोजने में लग जाता हूँ. नीरस बातें नींद में ढकेल देती हैं. नीरसता टंकलाईज़र (नींद की गोली) का काम करती है.
जो हमें अपनी पहुँच के बाहर दिखता है, जिससे हम भौतिक रुप से, रुपये पैसे से लाभांवित नहीं होते, वो हमें हमेशा ही नीरस लगता है. ज्ञान प्रप्ति के नाम पर कभी कैमिस्ट्री भी पढ़ी थी, तब मजबूरी थी परीक्षा पास करना. आज मजबूरी है, पाप कर्मों के बोझ से खुद को अकेले में उबारना, तो यही मार्ग, भले ही नीरस हो, बच रहता है.
कुछ देर मन लगा कर सुनता हूँ. महात्मा जी के कहे अनुसार, जीवन रुपी नैय्या से इच्छायें, चाह, लालच और वासना की गठरी उठा उठा कर फैंकता जाता हूँ पाप की बहती दरिया में. खुद को हल्का किये बगैर उपर नहीं उठा जा सकता, महत्मा जी मात्र १०० रुपये लेकर सीडी में समाये कह रहे हैं. मैं सुन रहा हूँ. कहते हैं चाहविहिन हो जाओ तो मुक्ति का मार्ग पा जाओगे और यह जीवन सफल हो जायेगा.
सोचता हूँ कि क्या मुक्ति का मार्ग पाना भी एक चाह नहीं? क्या चाहविहिन होने की चेष्टा भी एक चाह नहीं? क्या आमजन से उपर उठ अध्यात्मिक हो जाना भी एक चाह नहीं? जब एक चाह की गठरी को पाप की नदिया में फैंका सिर्फ इसीलिये कि दूसरी चाह की गठरी लाद लें, तो क्या यह व्यर्थ प्रयत्न और प्रयोजन नहीं?
एक तरफ मैनें पैसा कमाने का लोभ त्यागा ताकि मैं लोभ मुक्त हो जाऊँ किन्तु वहीं यह लोभ पाल बैठा कि इससे मैं मुक्ति का मार्ग पा जाऊँ. शांत चित्त हो जाऊँ.
एक अंतर्द्वन्द उठता है.
मानव स्वभाव से बाध्य हूँ. चाहत की जो गठरियाँ अर्जित कर ली है, उसे फेंकने में दर्द सा कुछ उठता है किन्तु नई चाहत की नई गठरी तपाक से आकर जुट जाती है. प्रवचन सुन सुन कर ऐसी ही कितनी चाहतों की गठरियों का आना तो अनवरत जारी है लेकिन फैंकना, बहुत मद्धम गति से हो पाता है. अगर ऐसा ही चलता रहा और नई गठरियाँ इसी गति से जुड़ती रहीं तो वो दिन दूर नहीं, जब यह नाँव डगमगा जायेगी और सारा बोझ लिए इसी पाप की दरिया में डूब जायेगी. अब तो एक चाहत और जुड़ गई कि किसी तरह नैय्या डूबने से बची रहे.
स्वामी जी बोल रहे हैं सीडी प्लेयर में से और मैं अपने मन की बात सुनने में व्यस्त हूँ. मन भारी पड़ रहा है उन सिद्ध महात्मा जी की वाणी पर. खुद को कब नीचा दिखा सकते हैं खुद की नजरों में? वरना तो सो गये होते.
इस बीच स्वामी जी और भी न जाने क्या क्या बोल गये, मैं सुन नहीं पाया और एलार्म से नींद खुली तो सीडी प्लेयर से घूं घूं की आवाज आती थी. जाने कब स्वामी जी ने बोलना बंद कर दिया. रात बीत चुकी है और प्लेयर अब भी चालू है.
प्लेयर ऑफ कर फिर तैयार होता हूँ एक नया दिन शुरु करने को. नींद पूरी हो गई है तो फिर दिनचर्या में जुटने की तैयारी करता हूँ.
क्या पाप, क्या पुण्य, कैसा मुक्ति मार्ग? सब अब रात में सोचेंगे जब दिन भर की थकन के बाद भी मन कचोटेगा और नींद आने से मना करेगी.
सोचता हूँ कि जिस दिन सी डी प्लेयर घूं घूं बोलता रह जायेगा और हम कभी न उठने के लिए सो चुकेंगे, उस दिन हिसाब किताब होगा, तब खाता बही देखेंगे कि नांव में कितनी कौन सी वाली गठरियाँ बाकी रह गई हैं.
उस हिसाब का बैलेंस भला कौन जान पाया है.
१०० रुपये बेकार ही गये लगता है सी डी खरीदने के. इससे बेहतर तो नींद की गोली खरीदते, जरा सस्ती पड़ती तो अगले दिन के पाप कर्म भी कुछ कम ही होते पुनः उस दिन की रोटी जुगाड़ने की चाह में.
कुछ मुश्किलों को सुलझाने की खातिर
खुद को ही उलझाता चला जाता हूँ मैं
दर्पण में यूँ अजनबी नजर आता हूँ मैं...
-समीर लाल ’समीर’
रविवार, मार्च 07, 2010
यूँ बीत गया समय...
इधर मैं कुछ लिख नहीं रहा हूँ. बिल्कुल चुप!
मैं तब भी चुप था, जब उसकी शादी होना तय हुआ था.
उस रात चाँद खामोश था और मैं अपनी छत से कूद उसके छतरी वाले कमरे में उसका हाथ थामें बस उसे मौन देखता रहा था.
हमारे बीच एक घुप्प सन्नाटा पसरा था और उस छतरी वाले कमरे में रखा वह पुराना पियानो-सफेद कफन की मानिंद चादर ओढे जाने कौन सी मौन धुन छेड़ रहा था अपनी टूटी हुई बीट्स से.
वो मौन संगीत, मुझमें बसा है आज भी. हर धडकन के साथ कानं में गूँजता है. धड़कन रुके तो इस गूँजार से छुटकारा मिले.
वह शादी के बाद चली गई और मैं..वहीं रुका हूँ, उस छतरी वाले कमरे में, उस मौन पियानो के संगीत के साथ-सोचता हूँ शायद मेरा फैसला ही सही था जो उसकी अगली शाम मैने उससे उस कोने वाले पार्क में सुनाया था और फिर....कल उसको देखा.....
कल शाम
बरसों बाद
जब तुम्हें देखा
अपने साजन के साथ
खिलखिलाते...
तो
मुझे याद आये
न जाने कितने
तुम्हारे चेहरे
रोते....
एक वो
जब तुम मेरे काँधे पर सर रख
रोती रही थी घंटो
एक वो
जब मेरी पीठ से पीठ टिकाये
तुम्हारी सिसकियाँ नहीं थमती थी..
एक वो
जब तुम अपने ही धुटनों में
मूँह छिपाये
आँसू बहाती रही...
एक वो
जब तुम मुझे देखती रही
और
आँसू गिराती रही...
और
एक वो
जब तुमने आँसू बहाये थे
उस खत पर
जिस पर मैने लिखा था..
अलविदा....
मुझे वो चेहरे याद आये,
न जाने क्यूँ!!!
-समीर लाल 'समीर'
-उधेड़ बून बनी हुई है, वक्त उलझा है जाने किन व्यस्तताओं में और इस बीच कब मेरी जिन्दगी की डायरी, मेरे भावों का साक्षी, यह ब्लॉग अपनी चार साल की उम्र पूरी कर गया..गुजरे २ मार्च को, बता ही नहीं पाया. बहाव बना है तो आता रहेगा.
आपकी शुभकामनाओं और स्नेह का आकांक्षी बना रहूँगा.
रविवार, दिसंबर 20, 2009
हाय री ये दुनिया?

मौसम ठंडा है या गरम? नहीं पता. जहाँ हूँ वहाँ अच्छा लग रहा है.
अभी अभी आँख लगी थी या अभी अभी आँख खुली है, समझ नहीं पा रहा हूँ.
पूरा बदन दर्द से भरा है. दिल नहीं, बस बदन. ज्यादा काम की थकावट. १४ घंटे काम के दिन.
त्यौहारों के दिन आ रहे हैं. बड़ा दिन, नया साल. छुट्टियाँ ही छुट्टियाँ, आराम के दिन.
आराम के पहले थकान जरुरी है वरना आराम का क्या मजा?
आँख मिचमिचाता हूँ. बस, जागृत होने का प्रयास है सुप्तावस्था में.
कहाँ हूँ मैं?
है तो कोई हवाई अड्डा ही.
बिजिंग?? वेन्कूवर?? टोरंटो??
थकान सोच को बाधित कर रही है. इतना क्यूँ थकाते हैं हम खुद को? कितनी महत्वाकांक्षायें और उनके लिए यह कैसी दौड़?
आस पास देखता हूँ.
चायनीज़ खूब सारे दिख रहे हैं, शायद बिजिंग में ही हूँ मैं. आवाजें सुनता हूँ निढाल आँखे मीचें..बी डू ची..चायनीज़ में एक्सक्यूज मी. बिजिंग ही होगा और मैं अपने जहाज के इन्तजार में नींद के आगोश में चला गया होऊंगा.
अभी सोच ही रहा हूँ कि बाजू से एक ब्रिटिश एकसेन्ट में बात करता युगल निकल गया और उसके पीछे अमरीकन आवाज.
मगर यही सारी आवाजें तो वेन्कूवर और टोरंटो हवाई अड्डे पर भी सुनाई देती हैं.
कहाँ हूँ मैं?
यह क्या? पूछ रहा है कि कितने बजे फ्लाईट है अपने दोस्त से हिन्दी में!! जाने कौन है हिन्दुस्तानी या पाकिस्तानी.
यही दृष्य आये दिन वेन्कूवर और टोरंटो में भी देखता हूँ हवाई अड्डे पर.
आसपास नजर दौड़ाता हूँ. कुछ ड्रेगन आकाश से रस्सी के सहारे झूल हैं. फिर कुछ क्रिसमस ट्री सजे हैं. झालर रोशनी का सामराज्य है हर तरफ. कोई संता बने घूम रहा है.
इससे तो कतई नहीं जान सकते कि यह बिजिंग है या वेन्कूवर या टोरंटो...
कुछ आसपास सजी दुकानों पर नजर डालता हूँ..वही चायनीज़ फूड, फिर पिज्जा पिज्जा, फिर मेकडोनल्ड फिर फिर..सब एक सी ही दुकानें हर जगह..भीड़ भी एक सीमित दायरे में कुछ वैसी ही...
आखिर दिमाग पर जोर डालता हूँ..जेब में हाथ जाता है.. मेरी टिकिट और पासपोर्ट हैं.
टिकिट पर लिखा है बिजिंग से टोरंटो, फ्लाईट एयर कनाडा १०१ दोपहर १२.४७ बजे तारीख १२ दिसम्बर, २००९.
दीवार घड़ी पर नजर जाती है सुबह का १० बजा है तारीख १२ दिसम्बर, २००९.
हाथ घड़ी देखता हूँ रात का ९ बजे का समय तारीख ११ दिसम्बर, २००९.
तब मैं बिजिंग से दोपहर १२.४७ तारीख १२ दिसम्बर पर टोरंटो के लिए उड़ने वाला हूँ और १२ घंटे १० मिनट का सफर कर १२ तरीख की सुबह ही ११.५७ पर टोरंटो पहुँच जाऊंगा.
कैसी अजब दुनिया है. देख कर कुछ अंतर नहीं दिखता!!
ऐसी दुनिया किसने रची..हमने, आपने या उसने?
पूरा विश्व एक गांव हुआ जा रहा है..पहचान नहीं पाते कि यहाँ हैं कि वहाँ. सब वैश्वीकरण के इस दौर में एक दूसरे में इतना घुल मिल गये है. सबकी अपनी योग्यता है, सभी का स्वागत सभी जगहों पर हैं.
और हम हैं कभी मराठियों का जय महाराष्ट्रा तो फिर कभी तैलंगाना और विदर्भ बनाने की जुगत में लगे हैं..
हद है, जाने क्या पा लेंगे!!
वो
जिसे इस कृषि-प्रधान देश की
मासूम जनता ने
अपना रहनुमा जाना था..
सुना है
दीवारों की फसल उगाता है!!!
-समीर लाल 'समीर'
नोट:
बहुतेरी पोस्ट तक पहुँच नहीं पा रहा हूँ. लेपटॉप वायरस से पूरी तरह सत्यानाश हो गया. न जाने कितने आलेख गुम हो गये. नया खरीदना पड़ेगा. बहुत परेशान हूँ कि शायद कुछ डाटा मिल जाये..१५ दिन पहले तक का बेक अप है.
रविवार, नवंबर 01, 2009
महान होने का अरमां..हाय!!!
हर व्यक्ति की इच्छा होती है कि वो महान कहलाये, अभी न भी सही, तो कम से कम मरणोपरांत.
हमारे एक मित्र तो इसी चक्कर में माला पहन कर अगरबत्ती समाने रखकर तस्वीर खिंचवा लिये कि घर में टंगी रहेगी. कोई माला पहनाये न पहनाये, अगरबत्ती जलाये न जलाये, तस्वीर महानता बरकरार रखेगी. साथ ही कुछ कार्ड छपवा कर फोटो के सामने रख दिये हैं..स्व. कुंदन लाल गुप्ता...क्या पता बाद में कोई स्वर्गीय कहे न कहे. जमाना तेजी से बदल रहा है.
एक मित्र नगर निगम को १५ लाख डोनेशन देकर मरे कि मरने के बाद चौराहा उनके नाम कर दे या एक सड़क का नाम, गलीनुमा ही सही, उनके नाम हो जाये. हुआ नहीं, सब खा पी गये, यह अलग बात है. उनकी दूरदृष्टि का दोष, कि ऐसे निकम्मे्पन को भाँप न पाये. हम और आप ही कहाँ भाँप पा रहे रहे हैं, हर बार हाय करके रह जाते हैं.
लोग वसीयत तक का फॉरमेट इस तरह बदल डाल रहे हैं कि उनकी महानता स्थापित हो पाये. गोया..मेरी जायजाद का आधा हिस्सा मेरे बेटे को उसी हालत में दिया जाये जबकि वो मेरी बाकी आधी जायदाद को इस्तेमाल कर मेरी स्मृति एक वृद्धाश्रम खोले.
क्या क्या नहीं करता इंसान अपना नाम कायम किए रहने के लिए और खुद को महान घोषित करवाने के लिए.
लोग जब मर जाते हैं तो लोग उनके कहे में से सुभाषित ढ़ूंढ़ते हैं. महात्मा गाँधी ने ये कहा, लूथर किंग ने ये कहा, हिटलर ऐसा कह गये. वो सिर्फ इतना कह कर मर नहीं गये. उन्होंने इससे लाख गुना कहा मगर उसमें से इतना भर सुनने लायक है जो उन्हें महान बनाता है.
वो तो रोज सुबह शाम ही कुछ न कुछ कहते ही रहते थे. उसमें से इतना ही है एक लाईना...सुनने लायक. उनका काम ही कहना था...आप बस इतना सुनो..और उनकी महानता का जयकारा लगाओ. सारा सुन कुछ फायदा नहीं, वितृष्णा ही मिलेगी. खामखाँ मन खट्टा होगा, स्वास्थय बिगड़ेगा.
कौन जाने हमारे कहे में से ऐसे सुभाषित कोई खोजे न खोजे.. एक लईना में? कौन जाने कहीं कोट हो न हो. या फिर ऐसा भी हो सकता है कि कोई अपने नाम ही से हमारी कही महान बात न छाप जाये इस खराब जमाने में. किसे पता चलेगा कि इतनी बड़ी उड़नतश्तरी में ये कहाँ लिखा है. किसी का भरोसा तो रहा ही नहीं..
इसलिए हमने सोचा कि अभी तक लिखे में खुद ही छांट कर अलग कर दें इस टाईप के सुभाषित और फिर हर एक नियमित समयांतराल में करते चलेंगे. और कुछ ध्यान में न भी होंगे तो आप बता देना. इससे एक तो किसी और को मेहनत न करना पड़ेगी और महान बनने में सरलता रहेगी. बताईये, ठीक है क्या यह आईडिया?
- प्रशंसा और आलोचना में वही फर्क है जो सृजन और विंध्वस में.
- गिनती सीधी गिनो या उल्टी, अंक वही होते हैं. सिर्फ क्रम बदल जाते हैं.
- मैं और तू सामने वाले पास भी वही विकल्प प्रदान करते हैं मैं और तू वाले.
- साहयता से गुरेज मात्र आत्म विश्वास का दिखावा है. हर व्यक्ति साहयता चाहता है.
- एसी की आहर्ता रखने वाले को आप एसी का किराया देकर सिर्फ बुला सकते हैं जबकि तृतीय श्रेणी की आहर्ता रखने वाले को एसी का किराया देकर बुलाने पर आप उसे कुछ भी सुना सकते हैं.
- शराब सोडे मे मिलाओ या सोडा शराब में. नशा शराब का ही होता है.
- कलम की छांव में पलते शब्द आलसी हो जाते हैं. किसी काम के नहीं रहते. उन्हें ताप की जरुरत है.
- कुनबा एकरस लोगों का हो, यह जरुरी न्हीं. सबकी अपनी राय और सबकी अपनी महत्ता होती है.
- हर लिखा पठनीय हो, यह आवश्यक नहीं किन्तु हर पठनीय लिखा हो, यह जरुरी है और ब्लॉग यह सुविधा प्रदान करता है.
- चिल्लर की तलाश में रुपये गँवाने वालों को सलाह है कि वो सरकारी नौकरी प्राप्त करने की कोशिश करें.
-समीर लाल 'समीर'
बताईयेगा, आपके क्या विचार हैं?
बुधवार, अगस्त 26, 2009
कैसा ये कहर!
१९ अगस्त को ह्यूस्टन से वापस आये और २० अगस्त को टोरंटो मे टरनाडो (Tornado) ने भीषण तबाही मचाई. मानो हमारे आने का इन्तजार कर रहा हो.
थोड़ा सा भला ये रहा कि शायद जान गया होगा कि इनका सामान वगैरह गुम गया है, घाटा लग चुका है और परेशान है तो हमारा मोहल्ला छोड़ दूसरे मोहल्ले में तूफान मचाया. मौसम विभाग के अनुसार १८० से २४० किमी की रफ्तार से लेवल २ का तूफान आया. वूडब्रिज एरिया में कितने ही घरों की छत उड़ गई. कारें पलट गई. बारबेक्यू हवा में उड़ गये. पेड़ धाराशाही हो गये.
मगर जब वो दूसरे मोहल्ले में भरपूर तूफान मचा रहा था तब हालात के हल्ले में हमारा मोहल्ला भी थर्राया. खिड़कियाँ काँपी. बिजली कड़की. पानी बरसा. जो मौसम कहीं तबाही मचा रहा था वो ही हमारे यहाँ दर्शनीय बना हुआ था.
उस मोहल्ले में सैकड़ों घर तबाह हो गये. परखच्चे उड़ गये. देखिये तबाही के कुछ दृष्य:
गनीमत यह रही कि कोई मरा नहीं. मौसम विभाग चेता चुका था. सरकार ने बिजली तीन घंटे के लिए बंद कर दी ताकि किसी को करेंट न लगे या कहीं शार्ट सर्किट से आग न लग जाये.
ऐसे मौके कितनी बार आते हैं यहाँ, जब बिजली न हो. मेरी याद में पिछले १० सालों में यह दूसरा मौका था. पिछली बार जब २००३ में बिजली गई थी, तब अमरीका के राष्ट्रपति ने टीवी पर जनता से माफी माँगी थी. तब मैं सोचा करता था कि अगर भारत का राष्ट्रपति बिजली जाने के लिए टीवी पर माफी माँगने लगे तो वो तो २४/७ टी वी पर ही नजर आये. आखिर खाना कब खायेगा. :) खैर, इस बार फिर बिजली गई सो रोशनी की खातिर मोमबत्ती जला ली गई.
शायद आपको लाला लोगों की मौका परस्ति का अंदाजा न हो. लालाओं के स्वभाव के ज्ञानियों का कहना है कि अगर कोई लाला कभी कुऐं में गिर जाये तो पहले वो स्नान करेगा और फिर मदद के लिए चिल्लाना शुरु करेगा.
तो आदतन जब मोमबत्ती जली तो हमने भी फायदा उठाया और झट अपनी ही केंडल लाईट फोटो खींच लिए. काम आयेगी शायरी/गज़ल के साथ चिपकाने में. :)
| दिख रहा हूँ? |
मजेदार यह रहा कि जब बरामदे में खड़े मौसम का नजारा ले रहे थे तो तेज चलती हवाओं में पत्नी हमारा हाथ थामें थी निश्चिंतता के लिए. ऐसा नहीं कि हमारी चिंता में बल्कि इसलिए कि वे इस बात को सुनिश्चित थीं कि इनको तो उड़ा पायेगा नहीं वजन के चलते तो वो भी उड़ने से बच जायेंगी. :)
अब टरनाडो की बात चली है तो थोड़ी सी बात टरनाडो के विषय में भी कर ही ली जाये:
शब्द ’Tornado' या "अंधड़" लैटिन शब्द tonare से आता है, जिसका मतलब ’तेज गरजते आँधी तूफान वाले बादल’ होता है. स्पेनिश में इस शब्द को tornear से जाना गया जिसका अर्थ होता है घुमावदार या मुड़ा हुआ. Tornadoes, जो घूर्णन या हवा में घुमाव द्वारा गठित होते हैं, इसी कारण से इन्हें twisters या चक्रवात भी कहा जाता है.
यह बवंडर (’Tornado' ) कम वायुमंडलीय दबाव के एक केंद्र के आसपास घुमावदार हवाओं के एक ताकतवर स्तम्भ है. यह काले बड़े तूफान, बादल से नीचे लटके कुप्पी (Funnel) की तरह दिखते है. संकीर्ण अंत पृथ्वी को छूता हुआ आगे बढ़ता रहता है.
इस बवंडर के भीतर हवा का तेज बहाव सर्पिल गति से नीचे से उपर होता है और जब यह किसी वस्तु से छूता हुआ चलता है तो उसके टुकड़े टुकड़े कर देने में इसका वेग सक्षम होता है. टूटे हुई वस्तुएं और यहाँ तक की गाय भैंसे और छोटे मोटे समान इसकी पूँछनुमा धरती को स्पर्श करती आकृति में खींच कर कई मीटर उपर चले जाते हैं और बहुत मीलों दूर जा गिरते हैं.
इसकी हवा का वेग 500 मील प्रति घंटे तक की गति में घूम (स्पिन कर) सकता है. आमतौर पर यह लगभग 300 मील प्रति घंटे की रफ्तार से यात्रा करता है. यह बवंडर मानव जाति को ज्ञात सबसे खतरनाक तूफान होता है.
हालांकि कोई भी अमेरिकी राज्य tornadoes से पूरी तरह मुक्त नहीं है, किन्तु वे रॉकी और Appalachian पर्वत के बीच मैदानी इलाकों में सबसे अधिक पाये जाते हैं. हालांकि आंकड़े बताते हैं कि tornados संयुक्त राज्य के पूरे मध्यपश्चिम को प्रभावित करता रहते हैं, किन्तु ’ओकलाहोमा’ नामक प्रान्त सबसे ज्यादा प्रभावित है. जब अमेरीका मे आने वाले सब tornadoes को खाते में लिया जाता है, तो फ्लोरिडा में बवंडर घटना का देश में सबसे ज्यादा घनत्व है. लेकिन फ्लोरिडा के tornadoes कमज़ोर एवं अल्पजीवी रहते हैं और ओकलाहोमा जैसे "क्लासिक" supercellular tornadoes की तरह नुकसान नहीं पहुँचाते. इसके विपरीत, पूर्वोत्तर और पश्चिम संयुक्त राज्य अमेरिका में सबसे कम बवंडर आते हैं.
नोट: आज पहली बार विंडोज़ लाईव राइटर पर लिख कर पोस्ट करने की ट्राई कर रहे हैं. भूल चूक लेनी देनी.
बुधवार, अगस्त 05, 2009
हाय रे, ये विचार-रुकते क्यूँ नहीं!!
अब रक्तचाप ऐसी बीमारी भी नहीं कि तकलीफ दे या बुखार आ रहा हो. बस, हल्की सी कमजोरी रहती है और क्या.

एक तो यहाँ के मेडीकल रिवाज मुझे पसंद नहीं आते. डॉक्टर बिना टेस्ट, जैसा भारत की तरह मौसम देख बीमारी जान जायें, सिम्पटमबेस कुछ दवाई ही नहीं देते. फिर टेस्ट कराने का एपॉइंटमेन्ट कब का मिलेगा. स्पेश्लिस्ट से कब का समय मिल पायेगा, कोई भरोसा नहीं.
एक मित्र हैं, उनके स्पेश्लिस्ट का समय उन्हें ६ माह बाद का मिला है, तब तक शायद वो ही बच रहें या उनकी बीमारी. वैसे हमारे मित्र हैं, भारतीय हैं तो भरोसा है कुछ न कुछ नया सा ही होगा. कहो वो स्पेश्लिस्ट ही न निपट जाये. अनुभव अर्जित करने में इतना व्यस्त होते होते काफी उम्र गुजार ही चुका है.
एक बार याद आता है कि मुझे बड़ी तेज एसीडिटी का अटैक हुआ. लगा कि हार्ट अटैक ही होगा. तुरंत पत्नी और एक मित्र के साथ भागे अस्पताल. पहला डॉक्टर तुरंत मिलता है और हालत का अंदाजा लेकर आपको क्यू में डाल देता केसानुसार. हम भी क्यू में लगा दिये गये स्ट्रेचर पर लेटे.
कई बार झूट मूट मूँह लटका कर नर्स से कहा कि छाती में बाईं तरफ दर्द उठ रहा है जिससे वो उसे हार्ट की समस्या समझ डॉक्टर को बता दे और वो तुरंत अटैंड कर ले. मगर आप एक शातिर तो वो दो. सब समझते हैं और हम टंगे रहे वेटिंग में. पहली जो दवा उसने दी थी माईल्ड सी, वो खा कर. ५ घंटे बाद जब हमारा भरती होने का नम्बर आया, तब तक एसिडिटी अपने आप ही बिदा हो ली थी. उसके रुकने की भी एक सीमा रेखा है.
बीबी और महबूबा में यही तो अंतर है. बीबी दिल की धड़कन, अंतिम दम तक साथ बनाये रहती है और महबूबा, आई, मिली और बाय बाय, चली. दोनों की ही अपनी अपनी अच्छाईयाँ हैं मगर यहाँ वो विषय वस्तु नहीं है इस आलेख की, तो प्रकाश नहीं डाला जा रहा है.
जब नम्बर आया तो डॉक्टर ने कहा कि हाँ, अब आप अपनी समस्या बतायें. क्या हुआ है?
हमने कहा कि इतनी देर बाद तो अब आप ये पूछो कि क्या हुआ था. अभी तो सब बेहतरीन है. आप तो क्षमा ही करें और अब हमें जाने दें. मगर वो काहे आये मेहमान को जाने दे. पचास तरह के टेस्ट करा डाले. मेहबूबा एसीडिटी तो निकल ही ली थी, वो तो पकड़ाई नहीं बल्कि टेस्ट वेस्ट के चक्कर में उसकी सहेली जो उसे लेकर आई थी, पथरी पकड़ गई, जिससे कुछ लेना देना न था. अरे, चार छः बीयर पीते, खुद ही बह निकलती मगर तब वो डॉक्टर अपनी लेज़र तलवार कहाँ चलाता. बोफोर्स तोप टाईप शो पीस तो है नहीं, काम करती है, यह उसने साबित कर दिया तब माना. दो दिन अस्पताल में भरती रहे थे.
तब ब्लॉगिंग नहीं किया करते थे वरना तो खूब चटखारे लेकर अस्पताल के किस्से सुनाते. डॉक्टर से लेकर ऑपरेशन रुम से नर्स तक के. खैर, नहीं सुना पाये तो अब नहीं ही सुनायेंगे जब तक आप जिद्द न करने लगो.
वैसे, अब जाकर समझ में आया कि यहाँ के डॉक्टर विश्व भर में काहे नाम कमाये हुए हैं. जब तक मरीज को देखने का नम्बर आता है, ७०% तो अपने आप ठीक हो जाते है. २० % इनकी दवा से और १०% मर भी जायें, तो उनकी आवाज ९०% के जयकारे के आगे सुनेगा कौन?
ये डॉक्टर तो इस आधार पर कनाडा की ३.५ करोड़ आबादी को चला लिए जा रहे हैं. हमारे पुरनिया प्रधान मंत्री नरसिंहा राव तो १०० करोड़ से उपर की आबादी को आँख बंद किये, मूड़ हिलाते इसी लॉजिक पर चला ले गये.
किस्से और सोच की कडियाँ तो चलती ही रहेंगी. पिछले हफ्ते सब ब्लड टेस्ट, इसीजी, यूरीन और जाने क्या क्या टेस्ट हुए. इस पर भी ऐसा है कि ’नो न्यूज इज गुड न्यूज’. अगर डॉक्टर को कुछ सलाह देने लायक लगेगा तो ही फोन आयेगा समय बुक करने के लिए अन्यथा मस्त रहिये. आपकी रिपोर्ट आपके डॉक्टर की फाईल में जाकर लग जायेगी.
एक तरह से अच्छा ही है मगर जब ऐसे टेस्ट के बाद डॉक्टर के ऑफिस से फोन आता है कि समय बुक करिये, डॉक्टर आपसे मिलना चाहते हैं आपकी रिपोर्ट पर बात करने को, तो उस समय से लेकर मिलने तक घिघ्घी बंधी ही सी रहती है, कि जाने क्या हो.
लगा कि अब बच क्या रहा है, एक डायबटीज़ ही बाकी है जो आज नहीं तो कल, चला ही आयेगा उम्र के इस पड़ाव में. उससे भेटें बगैर तो निकल न पायेंगे तो जब डॉक्टर का कल फोन आया कि मिलना चाहता है तो बस, न जाने क्या क्या ख्याल दिल में आने लगे. खराब खराब से. एक ई सी जी लिया था. प्री मील और पोस्ट मील ब्लड और यूरीन. तब या तो ई सी जी गड़बड़ाया है या फिर ब्लड शुगर. राम राम भजते रहे.
रात में दो ठो मिठाई भी दबा लिए कि कहीं डायबटीज निकली तब तो इससे दूरी हो ही जाना है. मिठाई से मिलते एकदम वो ही फीलिंग रही जैसे कॉलेज के बाद गर्ल फ्रेण्ड की शादी और कहीं तय हो जाये और हम आखिरी बार मिल रहे हों. इससे आपको समझने में सहूलियत होगी, इसलिये यह उदाहरण दिया और कोई खास वजह नहीं है.
आज गये थे डॉक्टर के यहाँ. ईश्वर का लाख लाख शुक्र-न शुगर की शिकायत निकली और दिल तो ऐसा बेहतरीन आया कि डॉक्टर कहने लगा कि अगर अभी भी फेंक दो तो टूटेगा नहीं यह मेरा दावा है. हमने कहा कि दिल की गारंटी तो तुम ले ले रहे हो, हाथ पैर की कौन लेगा? बताओ? चुप हो गया बेचारा. बस, कहने लगा कि B12 की कमी जोरों पर हैं तो बूस्टर लगेंगे. हमें क्या गुरेज, लगाओ. हम तो है ही तुम्हारी छत्र छाया में.
रक्तचाप भी शनैः शनैः काबू में आ ही रहा है. कितना कौन उधम कर पाया है, सभी को आना ही होता है एक दिन काबू में तो यह तो बेचारा रक्तचाप है. और है भी तो अपना ही.
खैर, सुनते हैं भारत में गरमी अभी भी बेतरह सता रही है. हाय!! पानी क्यूँ नहीं बरसता. गरमी के लिए इतना मधुर गीत अभी कुछ दिन पहले ही नवगीत की पाठशाला के लिए लिखा था. शायद बहुतों की तरह गरमी नें भी वहाँ न पढ़ा होगा इसलिए बारिश ठीक से नहीं आई. इसलिए यहाँ फिर से कि शायद गरमी पढ़ ले:

द्वारचार कर जाती गरमी
सोचो, जानो और समझ लो,
कैसे है सह जाती धरनी.
रिमझिम बारिश के आने का,
द्वारचार कर जाती गरमी.
अक्सर शांत समुन्दर ने ही,
तूफां का आगाज किया है.
कठिन डगर चलने वाले को,
मंजिल ने सरताज किया है.
काम लगन से करने वालों,
मीठे फल है लाती करनी.
रिमझिम बारिश के आने का,
द्वारचार कर जाती गरमी.
उजियारा होने से पहले,
होती है अंधियारी रात.
दुख के पीछे सुख आयेगा,
लगती कितनी प्यारी बात
बुरे वक्त में अच्छा सोचो,
दिल में है आ जाती नरमी.
रिमझिम बारिश के आने का,
द्वारचार कर जाती गरमी.
जीवन जीना एक कला है,
उससे यूँ घबराना कैसा.
धूप छांव के बीच रहा है,
रिश्ता अजब पुराना जैसा
भावी खुशियों के खातिर ही,
पीड़ा है पड़ जाती सहनी.
रिमझिम बारिश के आने का,
द्वारचार कर जाती गरमी.
-समीर लाल ’समीर’
-चित्र साभार: गुगल
शुक्रवार, मई 29, 2009
क्या बूझूँ, क्या याद करुँ? : पहेलियों का माया जाल!!
वैसे भी सदाचार का भाषण देने के लिए सदाचारी होना कोई जरुरी थोड़े ही है वरना तो बाबा लोगों के मंचो पर आकाल पड़ जायेगा. ये दूसरी बात है कि मोटी चमड़ी वाले ये बाबा आकाल के बाद भी मासूम किसानों की तरह आत्म हत्या नहीं करने वाले. इनका क्या है, नेता हो लेंगे.
आजकल पूरा ब्लॉगजगत लाल बुझक्कड़ बना हुआ है.
लाल बुझक्कड बूझ गए,और ना बूझा कोय
पैर में चक्की बांध के हिरणा कूदा होय
जिसे देखो, एक ठो तस्वीर लिए चला आ रहा है कि ’पहचानों कौन?’ और हम जैसे दसियों पीर जुटे हैं अटकल लगाने में. जितनी देर लगती है एक पहेली का जबाब ढ़ूंढने में, उतनी देर में कम से कम दस ब्लॉग को जिन्दाबाद कर आये होते. भारत जैसा हाल है, जितने का गबन हुआ, उससे कई गुना ज्यादा जाँच समितियाँ निपटा गईं और हाथ आया सिफर.
मगर नाम का मोह छूटे जब न!! यहाँ भी हमारा नाम रहे, वहाँ भी और वहाँ भी. कई बार तो खुद से कहने लगता हूँ कि अरे महाराज, जितना गुगल पर दौड़ रहे हो जबाब ढूंढने, इतने का दस परसेन्ट भी अगर ब्लॉगजगत के बाहर दौड़ लगाई होती तो इतनी सॉलिड और छरहरी बॉडी बन जाती कि खुद का फोटू लगा कर पूछ सकते थे, ’पहचान कौन?’
लोग अटकलें लगाते कि पक्का अमिताभ है, कोई कहता सलमान है तो कोई कहता शाहरुख मगर कोई सच न बता पाता. फिर हम क्लू देते कि हैं उन्हीं टाईप, वेरी क्लोज मगर वो नहीं हैं. दाई ओर देख, बाईं ओर देख और जाने क्या क्या क्लू!!
अब आजकल तो हिट ही हो रही है. किसी भी ब्लॉगर का फोटू उठाया, फोटो शॉप खोली, स्मज टूल पकड़ा और लगे फोटू की बैण्ड बजाने और चिपका दिया-’पहचान कौन?’ क्या खाक पहचानें? जिसकी है वो तक तो पहचान नहीं पा रहा. यहाँ तक कि अगर पूछने वाले के पास से नाम गुम जाये तो पहेली का परिणाम घोषित करना भारी पड़ जाये.
फोटो पर कुछ कलाकारी करो कि जैसे आँख किसी की, मूँह पर आधा किसी का और आधा किसी का, फिर पूछो कि तीनों को पहचानों, तो फिर भी समझे. पूरा रगड़ मारो और फिर पूछो कि ’पहचान कौन?’ यह तो नाईन्साफी है. इतना भी पूछ लेते कि यह क्या है तो भी न बता पाते कि किसी ब्लॉगर की तस्वीर है. बस, आधे कहते कि फूल है, कोई कहता समुन्द्र तो कोई आसमान बताता. ऐसी हालत कर देते हो तुम फोटू की.
इनके लफड़े में पड़े तो अपनी आदत खराब हुई जा रही है. कहीं फोन करो अगला नेचुरली पूछता है कि कौन बोल रहे हैं और हम बिगड़ी आदत लिए, ’बूझो तो जाने?’. फिर वो कहता है कि ’नहीं पहचान पा रहे हैं’ हम इधर से पूछ रहे हैं कि ’क्लू दूँ क्या?’ दोस्त पागल सा समझने लगे हैं.
कहीं पत्ती मिल जाये, मरा जानवर मिल जाये, टूटा फल मिल जाये, कोई उल्टा टंगा दिख जाये-बस, लगे फोटो लेने. पत्नी पूछा रही है कि इस फोटू का क्या करोगे तो बस एक जबाब, ’पहेली पूछूँगा’.. मानो पहेली न हुई, किसी गरीब का हाल हो गया. जो नेता आ रहा है, पूछ कर चला जा रहा है. बूझने को कोई बूझ नहीं पा रहा है. अब, पत्नी ने भी ध्यान देना बंद कर दिया है. पागल के साथ जीना भी इन्सान सीख ही जाता है खास तौर पर अगर वो आपकी पत्नी हो.
अब तुम पहेलीबाजों से क्या कहूँ कि एक तो ये बूझने, पूछने वाली नित नौटंकी फैलाये हो फिर उस पर से तुर्रा यह कि ’यह १०० वीं पोस्ट है’ बधाई दो..अरे, अगर यही पोस्ट है तो हफ्ते भर में १०० कर डालें. :) फिर देते रहना ’साप्ताहिक बधाई’.
पहेली वो पूछ मेरे आका जिससे कुछ ज्ञान बढ़े. वाकई कुछ जानकारी मिले. ब्लॉगर कायदे के पन्नों में जाकर स्मारकों को, ज्ञानियों को ढूंढे और उनके बारे में जाने. ताऊ को देखो, एक से एक स्मारक ला रहा है, ऐतिहासिक महत्व की और फिर उसके बारे में पूरी जानकारी. कितना ज्ञावर्धन होता है. कुछ तो सीखो.

सिर्फ खेल खेल करना है तो आओ, ताश वाला जुआ खेलें. अगर समय खोटी जाये तो कुछ कमाई धमाई का जुगाड़ भी बैठे.
वैसे तो जिसको जो खेल खिलाना हो, खिलाओ. हम तो बस मौज लेने निकले थे सो ले ली.
अब बुरा लगा हो तो इसका जबाब देना:

इस एक फोटो में तीन ब्लॉगर है. माथा और उपर-एक, चश्मा और आँख-दो और आधी नाक और उसके नीचे-तीन. तीन के तीनों नामी गिरामी धाकड़ ब्लॉगर.
पहचानो कौन??
वैसे, मैं इस फील्ड में नहीं आ रहा हूँ तो निश्चिंत रहो. आज पूछ इसलिए लिया कि तुम्हारे पास कहने को रहे कि तुम भी तो वही कर रहे हो. माईनोरटि में जाते डर लग रहा है न इसलिए.
अंत मे: कोई बुरा मत मान जाना भाई. आज कहीं एक बेनामी टिप्पणी पढ़ी, उसी का सार संक्षेप है. :)
जरुरी सूचना: कल ५ दिन के लिए केलिफोर्निया जा रहे हैं. ७ घंटे की लम्बी दूरी की हवाई यात्रा है. नेट से दूरी रहेगी मगर पहुँच कर जुड़ने का प्रयास रहेगा.
रविवार, जनवरी 04, 2009
डूबती आँखों के चमकते सपने-बांधवगढ़ यात्रा
पहले से बुक एक अति सुन्दर रिसोर्ट हमारा इन्तजार कर रहा था. चारों तरफ हरियाली, सुन्दरता से सजे हुये दूर दूर कॉटेज, करीने से लगाया गया बगीचा और बीचों बीच शाम को बॉन फायर करने के लिये बड़ा सा सीमेन्टेड पंडाल.
कमरे के भीतर की साज सजावट और सफाई काफी मनभावन थी. कमरा बंद करने के बाद मैं सोचने लगा कि बंद कमरे में क्या भारत और क्या अमेरीका? पिछले कुछ माह पहले जब लास वेगस में था, तब भी कमरे के भीतर तो यही अहसास थे. बल्कि यहीं ज्यादा आराम और लक्ज़री है कि घंटी बजाओ और बंदा चाय नाश्ता लिए हाजिर. वहाँ तो कॉफी/चाय की मशीन कमरे में लगी थी, खुद बनाओ और तब पिओ.
कुछ देर आराम, फिर सब अपने अपने कमरे से बाहर खुले हरे मैदान में. फुटबाल खेली गई. बच्चे, बड़े सभी बराबरी से अपने उम्दा प्रदर्शन की फिराक में. थक कर सब तैयार हुए और हम चल दिये नजदीक में ही बने बांधवगढ़ म्यूजियम को देखने. छोटा सा म्यूजियम-अब म्यूजियम तो क्या-फोटो और पार्क एवं किले के मिनियेचर मॉडल की प्रदर्शनी ही कहें तो बेहतर कि कल क्या देखेंगे. अच्छा लगा एक घंटा वहाँ गुजारना. पुराने राजे महाराजाओं ने कितने टाईगर मार गिराये, उनका लेखाजोखा भी प्रिंट करके टांगा गया था सो उनको समय की मांग के अनुरुप कोस भी लिया कि हाय, कैसे थे ये? इत्ते निर्दयी. उस कमरे में ऐसा कोसना, एक प्रकार से बोर्ड पढ़ लेने की पावती छोड़ने जैसा लगा. जो पढ़ता था वो कुछ ऐसे ही पावती छोड़ रहा था.
बहरहाल, वहाँ से वापस लौट बॉन फायर के आसपास सारा इन्तजाम पाया गया. फायर को घेरे कुर्सियाँ, कायदे से लगी टेबल.
देर तक महफिल जमीं. जाम छलके, सुर उछले. मौका था तो जी भर के परिवार वालों को अपनी रचनाऐं झिलवाईं. उनकी मजबूरी थी तो जितना बन पड़ा, उन्होंनें वाहवाही का मंजीरा बजाया और नई आई पुत्र वधु ने भी वहाँ जान लिया कि ओह!! तो ऐसे होते हैं कवि और वो भी उसके ससुर. सोचती होगी..ये कहाँ आ गये हम? :) मगर क्या करे, झेलना तो पड़ा ही.

खैर, तय पाया गया कि अगले दिन सुबह ६.१५ बजे सब तैयार मिलेंगे और ६.३० बजे जंगल सफारी की जीपें हमें वन भ्रमण पर ले जायेंगी.
सुबह की कड़कड़ाती ठंड, खुली जीपें, रिसोर्ट वालों द्वारा प्रायोजित कंबल भी मानो सरसराती हवा में पिघले जा रहे हों. कंबल से शरीर गरम हो या शरीर की गरमी से कंबल-समझ पाना मुश्किल था. जंगल के भीतर की सुन्दर मनोहारी यात्रा. पतले पहाड़ी रास्ते. २० किमी की स्पीड़ पर चलती जीप.
पंछियों की चहचहाट, कुछ चीतल, हिरण, मोर आदि दिखे. आनन्द आ गया. इन्तजार था कि कहीं टाइगर दिखे. कहते हैं इस १०५ वर्ग किमी में फैले राष्ट्रीय उद्यान में लगभग २५ टाइगर हैं. जीप धीरे धीरे बिना आवाज के चलती रही और हम चुपचाप आजू बाजू नजर दौड़ाते रहे कि शायद कहीं टाइगर दिखे. एक दो बार बंदर और अन्य जानवारों की आवाज से गाईड ने टाईगर के आसपास होने का अनुमान भी लगाया और जीप रोककर इन्तजार भी किया. उसके पंजे के ताजे निशान भी दिखे मगर महाराज को नहीं दिखना था तो नहीं दिखे. दो घंटे बाद हम पहुँचे सेन्टर पाईंट याने कि भ्रमण के उस स्थल पर, जहाँ से वापसी का ट्रेक शुरु होना था किन्तु रास्ता दूसरा याने अभी भी टाईगर के दर्शन के ५०% चान्सेस बाकी.
सेन्टर पाईंट पर चाय नाश्ते चिप्स केडबरी कुरकुरे की दुकानें, काफी चहल पहल के बीच चिप्स केडबरी की दुकानों से कुछ दूर मेरी मुलाकात हुई गले में टोकनी लटकाये उबले चने को पत्तल में बाँध प्याज मसाला डालकर बेचते बालक मोनू से. चिप्स कुरकुरे की सभ्यता के बीच शायद सुबह से उसे कोई खरीददार नहीं मिल पाया था अतः कुछ उदास सा था उस चहकती अभिजात्य भीड़ के बीच अनसुनी आवाज लगाता-चने ले लो, बाबू जी.
मन नहीं माना तो मैं उससे बात करने लगा. पता लगा वहीं एक नजदीकी गांव में रहता है. रोज २० रुपये के चने खरीद कर लाता है और ३५ से ४० रुपये के बीच बेच कर १० रुपये बना लेता है. बाकी पैसा शायद वहाँ बेच पाने की परमिशन के लिए विभागीय कर्मचारियों के हिस्से जाता हो. कुछ ठीक ठीक उसने नहीं कहा. कम बात करने वाला शर्मीला लड़का था.सैकड़ों की तादाद में आये भ्रमणकारियों में से वो मात्र ७-८ ग्राहक चाहता है अपना पूरा माल खपाने के लिए. फिर १० बजे से गांव के स्कूल में पढ़ने जाता है. स्कूल के कारण शाम का फेरा लगाना संभव नहीं हो पाता. साथ में उसका दोस्त भी था भद्र सिंह. वो साथ सिर्फ खेलने आता है. शायद बेहतर आर्थिक स्थिती वाले परिवार का हो मगर दोस्त के साथ फिर भी घूमने चला आता है.
मोनू एक दिन पढ़ लिखकर वन विभाग में नौकरी करना चाहता है. शायद वही जंगल की दुनिया उसने देखी है तो सपने भी वहीं तक सीमित होकर रह गये हों, बहुत स्वभाविक है. अपनी कमाई का हिस्सा बांटते हुए निश्चित ही उसके मन में आता होगा कि कल जब मैं इसकी जगह हूँगा तो किसी मोनू को कोई तकलीफ नहीं दूँगा और अगली पीढ़ी के मोनू की पूरी की पूरी कमाई उसी मोनू की होगी.
मोनू की आज बोहनी भी नहीं हुई थी.उसकी डूबती आँखों में तैरते सुनहरे सपनों की छटा देखने की किसी को फुरसत नहीं. बच्चे हों या बड़े, सब बस एक कुतहल लिए फिर रहें है कि टाईगर कहाँ दिखेगा? जिसे जो दिशा बता दी जाती है, वह जीप उस ओर मुड़ कर ओझल हो जाती है. और मोनू खड़ा अगली खेप की बाट जोहता है कि शायद कोई उससे उसके उबले चने खरीद ले. उसे किसी टाईगर का इन्तजार नहीं. उसका वन विभाग में नौकरी पाने का सपना ही उसका टाईगर है और वो उसी का पीछा कर रहा है अपने मासूम बचपन को व्यापार की इन चालों के तले रौंदते जिसमें उसे इन १० रुपयों को कमाने के लिए विभाग के लोगों से हिस्सा बांट करते अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिए क्या क्या पाठ नहीं सीखने होते.

मैं उसका फोटो खींचना चाहता हूँ तो वो अपने साथी भद्र सिंह को साथ खड़ा कर लेता है फोटो खिंचवाने. फोटो खींचकर मैं उसकी ओर ५ रुपये बढ़ा देता हूँ. आत्म सम्मानी मोनू यूँ ही पैसे नहीं लेता-वो भी एक दोना चने मेरी तरफ बढ़ाता है. मैं चने हाथ में लिए जीप में आकर बैठ जाता हूँ उस भीड़ का हिस्सा बन, जिसे तलाश है टाईगर दर्शन की.
टाईगर नहीं दिखा-टाईगर हर रोज नहीं दिखते. टाईगर का पीछा करना इतना आसान नहीं.
हम वापस रिसोर्ट में आकर अपना सामान उठाते हैं और लंच के बाद शुरु होता है मद्धम संगीत के बीच वापसी का सफर.
थकान से मैं आँखे बंद कर लेता हूँ और मेरी आँखों के आगे मोनू का भोला चेहरा आ जाता है-साहब, आज बोहनी नहीं हुई है!!
आज भले ही उसकी बोहनी न हुई हो लेकिन उसके उदास चेहरे पर झलकते आत्मविश्वास से मैं पूर्णतः आशान्वित हूँ कि एक दिन उसे उसका टाईगर जरुर मिलेगा.
मन ही मन मैं बुदबुदा उठता हूँ , अलविदा मोनू!! मेरी शुभकामनाऐं तुम्हारे साथ हैं. एक दिन फिर मिलेंगे शायद इसी मोड पर-तब तुम वन विभाग में होगे. तुम तो शायद मुझे पहचान भी न पाओगे मगर ये वादा रहा, मैं तुम्हारी आँखों से तुम्हे पहचान लूँगा.
निदा फाज़ली साहेब का एक शेर बरबस ही याद आता है न जाने क्यूँ:
कभी कभी यूं भी हमने अपने जी को बहलाया है
जिन बातों को ख़ुद नहीं समझे औरों को समझाया है
---------------------------------------------------------
सूचना:
गुरुवार, नवंबर 06, 2008
ये कैसा उत्सव रे भाई!!!
इसी कड़ी में एक स्टेशन पर उतरे. बाहर निकलते ही मन प्रसन्न हो गया. एकदम उत्सव का सा माहौल. स्त्री, पुरुष सभी नाच रहे थे रंग बिरंगी पोशाक में.जोरों से मस्त संगीत बज रहा था. संगीत की तो भाषा होती नहीं वो तो अहसास करने वाले चीज है. इतना बेहतरीन संगीत कि खुद ब खुद आप थिरकने लगें.
खूब बीयर वगैरह पी जा रही थी. जगह जगह रंग बिरंगे गुब्बारे, झंडे और बैनर. क्या पता क्या लिखा था उन पर जर्मन में. शायद ’होली मुबारक’ टाईप उनके त्यौहार का नाम हो.
एक बात जिससे मैं बहुत प्रभावित हुआ कि महिलाऐं एक अलग समूह बना कर नाच रही थीं और पुरुष अलग. न रामलीला जैसे रस्से से बंधा अलग एरिया केवल महिलाओं के लिए और न कोई एनाऊन्समेन्ट कि माताओं, बहनों की अलग व्यवस्था बाईं ओर वाले हिस्से में है, कृप्या कोई पुरुष वहाँ न जाये और न कोई रोकने टोकने वाला. बस, सब स्वतः.
सोचने लगा कि कितने सभ्य और सुसंस्कृत लोग हैं दुनिया के इस हिस्से में भी. महिलाओं के नाचने और उत्सव मनाने की अलग से व्यवस्था. इतनी बीयर चल रही है फिर भी मजाल कि कोई दूसरे पाले में चला जाये नाचते हुए. पत्नी महिलाओं की तरफ जा कर एक तरफ बैन्च पर बैठ गई और हमने बीयर का गिलास उठाया और लगे पुरुष भीड़ के साथ झूम झूम कर नाचने.
अम्मा बताती थी मैं बचपन में भी मोहल्ले की किसी भी बरात में जाकर नाच देता था. बड़े होकर नाचने का सिलसिला तो आज भी जारी है. वो ही शौक कुलांचे मार रहा होगा.
चारों तरफ नजर दौड़ाई नाचते नाचते तो देखा ढ़ेरों टीवी चैनल वाले, अखबार वाले अपना अपना बैनर कैमरा और संवाददाताओं के साथ इस उत्सव की कवरेज कर रहे थे. लगता है, जर्मनी के होली टाईप किसी उत्सव में आ गये हैं. टीवी वालों को देख उत्साह दुगना हो गया. कमर मटकाने की और झूमने की गति खुद ब खुद बढ गई. झनझना कर लगे नाचने.
दो एक गिलास बीयर और सटक गये. वहीं बीयर स्टॉल के पास एक झंडा भी मिल गया जो बहुत लोग लिए थे. हमने भी उसे उठा लिया..
फिर तो क्या था, झंडा लेकर नाचे. इतनी भीड़ में अकेला भारतीय. प्रेस वाले नजदीक चले आये. टीवी वालों ने पास से कवर किया. प्रेस वालों ने तो नाम भी पूछा और हमने भी असल बात दबा कर बता दिया कि इसी उत्सव के लिए भारत से चले आ रहे हैं और सभी को शुभकामनाऐं दीं.
खूब फोटो खिंची. मजा ही आ गया. खूब रंग बरसाये गये, कईयों ने हमारे गाल पर गुलाबी, हरा रंग भी लगाया, गुब्बरे उडाये गये, फुव्वारे छोड़े गये और हम भीग भीग कर नाचे. कुल मिला कर पूरी तल्लिनता से नाचे और उत्सव मनाये.
भीड़ बढ़ती जा रही थी मगर व्यवस्था में कोई गड़बड़ी नहीं. स्त्रियाँ अलग और पुरुष अलग. कभी गल्ती से नजर टकरा भी जाये तो तुरंत नीचे. कितने ऊँचे संस्कार हैं. मन श्रृद्धा से भर भर आये. पूरा सम्मान, स्त्री की नजर में पुरुष का और पुरुष की नजर में स्त्री का. एकदम धार्मिक माहौल. जैसे कोई धार्मिक उत्सव हो. शायद वही होगा.
थोड़ी ही देर में भीड़ अच्छी खासी हो गई. प्रेस, प्रशासन सब मुस्दैद. जबकि कोई जरुरत नहीं थी पुलिस की क्यूँकि लोग तो यूँ ही इतने संस्कारी हैं, मगर फिर भी.
अपने यहाँ तो छेड़े जाने की गारंटी रहती है, फिर भी पुलिस वाला ऐन मौके पर गुटका खाने निकल लेता है. मगर यहाँ एकदम मुस्तैद!!
धीरे धीरे भीड़ ने जलूस की शक्ल ले ली. मगर महिलाऐं अलग, पुरुष अलग. वाह!!! निकल पड़ा मूँह से और सब निकल पड़े. पता चला कि अब यह जलूस शहर के सारे मुख्य मार्गों पर घूमेगा. जगह जगह ड्रिंक्स और खाना सर्व होगा. मजा ही आ जायेगा. हम भी इसी बहाने नाचते गाते शहर घूम लेंगे. खाना पीना बोनस और प्रेस कवरेज के क्या कहने. पूरे विश्व में दिखाये जायेंगे.
कई नये लोग जुड़ गये. नये नये बैनर झंडे निकल आये. अबकी अंग्रेजी वाले भी लग लिए. हम भी एक वही पुराना वाला जर्मन झंडा उठाये थे तो सोचा किसी अंग्रेजी से बदल लें. इसलिए पहुँच लिए झंडा बंटने वाली जगह. अंग्रेजी झंडा मिल गया. लेकर लगे नाचने. फिर सोचा कि पढ लें तो कम से कम कोई प्रेस वाला पूछे तो बता तो पायेंगे.
पढ़ा!!!!!!!!!!!!!!
अब तो काटो तो खून नहीं. तुरंत मूँह छिपा कर भागे. पत्नी को साथ लिया और ट्रेन से वापस एअरपोर्ट. मगर अब क्या होना था टीवी और अखबार ने तो अंतर्राष्ट्रिय स्तर पर कवर कर ही लिया.
दरअसल, अंग्रजी के जो बैनर और झंडॆ पढे तो पता चला कि अंतर्राष्ट्रिय समलैंगिक महोत्सव मनाया जा रहा था जिसे वो रेनबो परेड कहते हैं और वो झंडा हमारे हाथ में था, कह रहा था कि मुझे समलैंगिक होने का गर्व है. क्या बताये, कैसा कैसा लगने लगा.
कनाडा के जहाज में बैठ कर बस ईश्वर से यही प्रार्थना करते रहे कि कोई पहचान वाला इस कवरेज को न देखे या पढ़े.
सोचिये, ऐसा भी होता है कि सी एन एन और बी बी सी टाईप चैनल आपको कवर करे और आप मनायें कि कोई पहचान वाला आपको देखे न.
जबकि जरा सा अखबार में नाम आ जाये या टीवी पर दर्शक दीर्घा में भी हों तो एक पोस्ट लिख कर, ईमेल करके, फोन पर सब पहचान वालों को लिंक, स्कैन कॉपी और प्रोग्राम टाईम बताते नहीं थकते.
सब मौके मौके की बात है. टीवी पर तो तुम बम धमाके करके भी आ सकते हो मगर चाहोगे क्या कि कोई अपना तुम्हें देखे.
वैसे अब सोचता हूँ तो लगता है कि इस परेड का अर्थ क्या है? जलूस निकालने और नाचने जैसी आखिर बात क्या है? किस बात की प्रदर्शनी कर रहे हो, क्या बताना चाहते हो?
एक साधारण स्त्री पुरुष तो झंडा उठा उठा कर नाच नाच कर यह नहीं बताते कि हम प्रकृति द्वारा निर्धारित आम प्रवृति के लोग हैं फिर तुम ही क्यूँ यह सब करते हो पूरे विश्व में??
कहीं कुछ कुंठा या हीन भावना तो नहीं?
बताओ न!!!
नोट: इस तरह के संबंधों के प्रति श्रृद्धा रखने वालों की यह कतई खिलाफत न समझी जाये. बस, अपने मन के भाव कहे हैं. अतः वह आहत न हों.
मेरे बारे में
- Udan Tashtari
- एजेक्स (Ajax), ओंटारियो (ontario), Canada
- समीर लाल की उड़न तश्तरी... जबलपुर से कनाडा तक...सरर्रर्रर्र...
कृप्या यहाँ देखें
फीड रीडर में सब्सक्राइब कर पढ़ें
कविता कोश
Blogs In Media » उड़न तश्तरी
Can't See Hindi?
UTF 8 , or
http://devanaagarii.net/
for HELP and detailed instructions to view
this page in Hindi
Read This Blog in Roman
दूसरों की गलतियों से सीखें। आप इतने दिन नहीं जी सकते कि आप खुद इतनी गलतियां कर सके।
-अमिताभ बच्चन के ब्लॉग से
और क्या इस से ज्यादा कोई नर्मी बरतूं
दिल के जख्मों को छुआ है तेरे गालों की तरह
-जाँ निसार अख्तर
अधूरे सच का बरगद हूँ, किसी को ज्ञान क्या दूँगा
मगर मुद्दत से इक गौतम मेरे साये में बैठा है
-शायर अज्ञात
Compelling content causes comments.
अभिलेखागार
कड़ियां
बिखरे मोती: एक नजर
"देख लूँ तो चलूँ"- एक नजर
अपील
शुभकामनाऐं.
समीर लाल
----------










