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सोमवार, मई 25, 2015

आखिर ये अच्छे दिन हैं क्या? : फील गुड फेक्टर

अच्छे दिन आने वाले है! अच्छे दिन आने वाले हैं!

वो रोज रोज सुनता तो था मगर दिन था कि वैसे ही निकलता जैसे पहले निकलता था. कई बार तो वो सुबह जल्दी जाग जाता कि कहीं अच्छे दिन आकर लौट न जायें और उसकी मुलाकात ही न हो पाये. मगर अच्छे दिन का कुछ अता पता न चला और देखते सुनते इन्तजार करते पूरा बरस निकल गया.

achchedin

थक कर उसने सोचा कि आज स्कूल में मास्साब से पूछेगा. क्या पता शायद अच्छे दिन आये हों और वो पहचान ही न पाया हो. अच्छा परखने का भी तो कोई न कोई गुर तो होता ही होगा.

मास्साब! ये अच्छा क्या होता है? ८ वीं कक्षा को वो नादान बालक अपने मास्साब से पूछ रहा है.

बेटा!! अच्छा वो होता है जो अच्छा होता है, समझे? मास्साब समझा रहे हैं.

लेकिन मास्साब, वही तो मैं भी पूछ रहा हूँ कि अच्छा होता क्या है?

मास्साब तो मास्साब!! जैसी कि मास्साब लोगों की आदत होती है वो तुरंत ही नाराज हो गये कि एक तो पढ़ाई लिखाई में तुम्हारा मन नहीं लगता उस पर से बहस करते हो. छोटी छोटी बात समझ नहीं आती. चलो, इसको ऐसे समझो कि अच्छा वो होता है जो बुरा नहीं होता है.

याने कि जो बुरा नहीं है वो अच्छा होता है. तो मास्साब, बुरा क्या होता है? बालक की बाल सुलभ जिज्ञासा तो मानो मँहगाई हो गई हो कि हर हाल में बढ़ती ही जा रही थी.

और मास्साब का गुस्सा अब और उबाल पर था मगर एक मर्यादा और एक कर्तव्य कि बच्चों की जिज्ञासा का निराकरण का जिम्मा उन पर है, उन्हें अपने असली रुप में आने से रोके हुए था. उन्हें किसी ज्ञानी का ब्रह्म वाक्य भी याद आ गया कि अगर आप किसी को कुछ समझा नहीं पा रहे हैं तो उसे कन्फ्यूज कर दिजिये. बस इसी ज्ञान के तिनके को थामे उन्होंने फिर ज्ञान वितरण के अथाह सागर में छलाँग मारी और लगे तैरने..

देखो बालक, इतनी सरल सी बात तुम्हें समझ में नहीं आ रही है..इसे ऐसे समझो कि अच्छा वो होता है जो बुरा नहीं होता और बुरा वो होता है जो अच्छा नहीं होता. समझे?

बालक मुँह बाये एक आम आदमी की मुद्रा में, बिना पलक झपकाये मास्साब को देख रहा था और मास्साब गुस्से के साथ साथ उसकी मन्द बुद्दि पर तरस खाते हुए आगे बोले..

वैसे एक बात तुमको बताऊँ कि अगर कुछ अच्छा है न..तो बताना नहीं पड़ता ..वो खुद ही समझ में आ जाता है और अगर बुरा है तो भी उसकी बुराई खुद ही उजागर हो जाती है... उदाहरण के लिए जैसे सोचो.. मिठाई...वो अच्छी होती है इसमें बताना कैसा और गोबर, वो बुरा होता है..खुद ही समझ में आ जाता है न!! अब तो तुमको पक्का समझ आ गया होगा..

मास्साब अपने समझाने की कला पर मुग्द्ध बिहारी की नायिका की आत्म मुग्द्धता के मोड में चले गये मुस्कराते हुए.

लेकिन बालक तो मानो डॉलर की कीमत हुआ हो..हाथ आने को तैयार ही नहीं..

मास्साब!! मेरे दादा जी को शुगर की बीमारी है और अम्मा कहती है कि उनके लिए मिठाई बुरी है और फिर गोबर से तो हमारा आंगन रोज लीपा जाता है..दादी कहती हैं इससे स्वच्छता का वास होता है और स्वास्थय के लिए बहुत लाभकारी होता है. हमारा परिवार तो इसे स्वच्छता अभियान का हिस्सा मानता है.

मास्साब की झुंझलाहट और गुस्से की लगाम अब लगभग छूटने की कागार पर थी मगर फिर भी..एक कोशिश और करते हुए वो बोले..देखो बच्चे, सब मौके मौके की बात है, कभी वो ही बात किसी के लिए अच्छी होती है तो वो ही बात किसी और के लिए बुरी हो जाती है..अगर तुम सब कुछ बुरा बुरा महसूस करने की ठान लो जैसा तुम दिल्ली प्रदेश की सरकार की तकरार में देख रहे हो..तो अच्छा भी बुरा ही लगेगा और इसके इतर अगर अच्छा अच्छा सा महसूस करने की आदत डाल लो तो बुराई में भी अच्छाई का वास महसूस करोगे..

बालक के मुँह में जुबान न जाने कैसे फिसल गई कि ’याने अच्छा बुरा अगर हमारे महसूस करने की कला का ही नाम है तो कोई सरकार क्या अच्छा लाने की बात करती है..और पहले के किस बुरे को बदलने की बात करती है? और...’

बालक अभी अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया था कि मास्साब के सब्र का बाँध टूट पड़ा और उसके साथ ही वो अपनी बेंत लिए टूट पड़े उस बालक पर...और कुटाई के साथ साथ एक ही प्रश्न बार बार...बोल, समझ आया कि नहीं कि और समझाऊँ?

बालक भौचक्का सा..पूर्णतः भ्रमित...बस कुटाई से बचने के लिए..कहता रहा कि मास्साब!! समझ आ गया!

तभी दूर कहीं कलेक्टरेट के मैदान से लाऊड स्पीकर पर किसी बहुत बड़े नेता की आवाज सुनाई दी:

’मितरों, एक बरस में अच्छे दिन आ गये हैं, है कि नहीं?’

समवेद स्वर गूँजे ..आ गये!!

मितरों!! बुरे दिन चले गये कि नहीं?

समवेद स्वर गूँजे ..चले गये!!

मितरों!! जो बुरा काम करते हैं मैने उनके लिए अच्छे दिन की गारंटी नहीं दी थी कभी!!

और इधर ये बालक अपनी बेंत से हुई कुटाई के दर्द को सहलाते हुए सोच रहा था कि शायद उसने मास्साब से पूछ कर बुरा काम कर दिया इसलिए उसकी अच्छे दिनों से मुलाकात नहीं हो पा रही है..

आगे से ध्यान रखेगा और अच्छा अच्छा महसूसस करेगा..

शायद उसमें ही फील गुड फेक्टर मिसिंग है!!

-समीर लाल ’समीर’

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बुधवार, जून 30, 2010

सर, आपके घर चोर आये हैं!!!

एक बार कहीं का सुना किस्सा याद आ रहा है:

अमरीकी, जपानी और हिन्दुस्तानी पुलिस के मुखिया मिटिंग में थे. अमरीकी बोला कि हम तो चोरी के बीस मिनट के अन्दर चोर की पहचान कर लेते हैं. जपानी बोला कि हमारे यहाँ तो दस मिनट में पता कर लेते हैं कि किसने चोरी की. भारतीय पुलिस के मुखिया हँसने लगे. दोनों ने पूछा कि हँस क्यूँ रहे हैं. उसने कहा कि हमें तो चोरी के पहले से ही मालूम होता है कि कौन चोरी करेगा.

मगर उस पहले से मालूम वाले को पकड़वाने के लिए आपकी कितनी पहुँच होना चाहिये, ये सोचने का विषय है वरना भारत में कोई चोर भला बाद में कब पकड़ाया है सिवाय रसूकदारों के घर चोरी करने के इल्जाम में.

वैसे तो कनाडा में आम तौर पर घरों में चोरी के किस्से सुनाई नहीं देते. फिर किसी का घर में घुसना, तो दरवाजा ही पूरा काँच का है, जिसका जी चाहे, फोड़े और घूस आये. मगर ऐसा होता नहीं है. इसीलिए तो काँच का है. कितनी बार रात भर दरवाजा खुला रह जाता है, गैरेज खुला पड़ा रहता है, कभी कुछ मिसिंग तो दिखा नहीं मगर फिर भी, इन्तजामात करने में कोई चूक नहीं.

कुछ दिन पहले एक पोस्ट में फोटो छापी थी जिसमें एलार्म फोर्स का बोर्ड भी आ गया था. भारत से मित्र ने जिज्ञासा प्रकट की कि यह एलार्म फोर्स क्या है? सोचा कि इसी विषय पर लिख दूँ, उनकी जिज्ञासा भी दूर हो जाये और मित्रों को पता भी चल जाये.

एलार्म फोर्स हाऊस सिक्यूरीटी कम्पनी है जो हमारे घर की सिक्यूरिटी देखती हैं. उनके एलार्म हमारे दरवाजे और खिड़कियों पर लगे हैं. अगर एलार्म ऑन है और उसे बिना कोड डाले ऑफ किए बिना कोई खिड़की या दरवाजा खोलता है तो घर सिक्यूरिटी कम्पनी से कनेक्ट हो जाता है और एनाउन्समेन्ट होता है कि आप कौन हैं और सिक्यूरिटी कोड बताओ. अगर वो नहीं बता पाया तो सायरन बजने लगता है जिससे पड़ोसी सजग हो जाते हैं और पुलिस स्टेशन को सूचना हो जाती है.

तीन से चार मिनट में पुलिस आ जाती है. इस बीच एनाउन्समेन्ट होता रहता है घर भर में कि पुलिस चल चुकी है, आ रही है. यह सब फोन लाईन से जुड़ा है किन्तु यदि फोन लाईन कोई बाहर से काट दे तो भी वायरलेस से एनाउन्समेन्ट शुरु हो जाता है और पूरी प्रक्रिया की जाती है.

यह भी संभव नहीं कि कोई बंदूक की नोक पर हमसे कोड बुलवा दे और पुलिस न आये. अगर हमने गलत कोड बोल दिया तो फिर वो अनाउन्समेन्ट चुप हो जाता हैं मगर पुलिस आ जाती है. फिर आप लाख कहिये कि कुछ नहीं हुआ, वो आपके घर वालों को बाहर निकाल कर पूरा घर चैक करते हैं कि किसी को गन पाईन्ट पर रखकर तो ऐसा नहीं कहलवा रहे हैं.

अगर हम घर में हैं तो होम अलार्म लगाते हैं याने बिना एलार्म ऑफ किए कोई घर में नहीं घुस सकता या निकल सकता. अगर हम घर में नहीं हैं तो अवे का अलार्म लगाते हैं, तब न कोई घुस सकता है न घर में कोई चीज हिल सकती है याने मोशन डिटेक्टर भी लगा रहता है अर्थात अगर कोई पहले से घुस कर बैठा हो तो बाद में चोरी करके भागे, वो संभव नहीं. घर एयर पैक्ड रहते हैं अतः हवा से कुछ हिलने का सवाल नहीं.

अवे के अलार्म में हम जहाँ भी हों, अलार्म कम्पनी हमें मोबाईल पर घटना की सूचना भी तुरंत देती है एवं नामित पड़ोसी/ मित्र को फोन पर भी सूचना दी जाती है कि वो भी आ कर चैक कर लें पुलिस के साथ.

इसी के साथ एक पैनिक बटन भी या तो बाथरुम या बिस्तर के पास लगा देते हैं ताकि ऐसे किसी अंदेशे पर आप बाथरुम में छिप गये हो या बिस्तर पर हो तो उसे दबा दें, तब भी बिना एनाउन्समेन्ट के पुलिस भिजवा दी जाती है.

इस व्यवस्था के लिए महिना दर महिना एक निश्चित फीस ली जाती है एवं साल में दो बार बिना कोड डाले दरवाजा खोल देने की भूल को माफ करते हुए बाकी बार फाल्स एलार्म के लिए एक पेनाल्टी की रकम ली जाती है.

वैसे तो यहाँ चोरी होती नहीं (इंसान तो हैं ही, कम या न के बराबर होती है) मगर इस एलार्म से बहुत सुकून रहता है. खास कर जब हम ६-६ महिने भारत में पड़े रहते हैं. उसी के साथ स्मोक अलार्म भी है. घर के भीतर धुँआ या आग से फायर ब्रिगेड आ जाती है. अब हम ठहरे हिन्दुस्तानी, कभी अगरबत्ती जलाने या हवन करने लग जायें, तो उस समय का जुगाड़ बना लिया है और स्मोक सेन्सर पर टावेल लगा देते हैं ताकि एलार्म न बजे.

मित्र को यह बात जब ईमेल से बताई और आशा व्यक्त की कि ऐसा भारत में भी होने लग जाए तो कितना बढ़िया. उनकी जिज्ञासा और बढ़ गई और भारत के परिपेक्ष में इतने प्रश्न सामने आये कि क्या कहना:

  • जब चोर घूसे और बिजली गुल हुई हो तो क्या? एलार्म कैसे बजेगा और कम्पनी को कैसे पता लगेगा?
  • फोन लाईन अगर खराब चल रही हो कई दिन से, तब?
  • खिड़की तो खुली ही रहती है, हवा को कैसे रोकेंगे किसी वस्तु को हिलाने से?
  • स्मोक सेन्सर पर धूल जमने के बाद भी काम करेगा क्या?
  • क्या मोशन डिटेक्टर ऐसा नहीं बन सकता जो सिर्फ इन्सानों के मोशन पहचाने बाकि को जाने दे?
  • अगर एक ही लाईन में चार पांच घरों के एलार्म एक साथ बज उठे, तो पड़ोसी को किसके घर पहले जाना चाहिये?
  • अगर घर मालिक बाहर गया है तो क्या एलार्म कम्पनी मिस्ड काल दे सकती है? (सस्ता पड़ेगा)
  • पुलिस स्टेशन से आपके घर की दूरी साईकिल से तय करने में हवलदार को कितना समय लगेगा?
  • अगर छुट्टी के दिन चोर घुसा, तब?
  • अगर भारत बंद के दौरान चोर चला आये, जब?
  • अगर चोर की सेटिंग हो थाने में, और पुलिस आये ही न?
  • जब अलार्म बजे और सिक्यूरिटी कम्पनी वाला चाय पीने या पान खाने गया हुआ हो तो?
  • अगर फोन का बिल या बिजली का बिल भुगतान न होने के कारण लाईन काटी जाये, तब?

यक्ष प्रश्न:

  • क्या हिन्दी ब्लॉग में रचनाओं की चोरी रोकने के लिए इन कम्पनियों के पास कोई एलार्म सिस्टम है?

अगर...अगर..अगर...और जाने कितने प्रश्न...मगर इन्हें सुन कर मैने अपना स्टेटमेन्ट वापस ले लिया कि ऐसा भारत में भी होने लगए तो कितना बढ़िया.

लेकिन जैसे हम देशी वैसा ही हमारा मित्र भी, ठेठ भारत से भारत में रहने वाला. आखिर बात ऐसे ही खतम कैसे हो जाने दे.

अब आखिरी प्रश्न एक आँख दबा कर उछाला कि गुरु, इतनी सिक्यूरीटी लगाये हो मतलब मोटी रकम धरे होगे घर में. अब उनको क्या बतलायें कि भई, जब हमारे देश में जिनकी जान की कीमत कौड़ी की नहीं है, वो जेड सिक्यूरीटी लिए घूम रहे हैं तब हमारे पास मेहनत का कमाया गुजारे लायक तो है ही, फिर क्यूँ न लगायें सिक्यूरीटी.

लगता तो है कि शायद मेरे जबाब से आशवस्त हो गये होंगे क्यूँकि उनकी एक दबी आँख खुली दिखी बाद में.

बस, अब एक ही बात कहता हूँ कि मेरा भारत जैसा भी है, वैसा ही बढ़िया. कौन जरुरत है इन सब नौटंकियों की. सायरन तो कोई सड़क पर से निकलता हुआ ट्र्क भी बजा देगा मगर पड़ोसी, वो अब कहाँ निकलते हैं सायरन सुन कर. बल्कि वो तो यह सुनिश्चित करने में जुट जायेंगे कि उनका घर ठीक से बंद है कि नहीं...बाकी खिड़की से झांक कर मजा तो पूरा ले लेंगे आपको लुटता देखने का.

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बुधवार, जून 23, 2010

सजना है मुझे, सजना के लिए!!

कभी सीखा था कि ज्ञान बाँटने से बढ़ता है. कोशिश यही होती है कि जो कुछ भी जानें या सीखें, उसे मित्रों के साथ बाँटें. अक्सर लोगों को अपने आलेखों/कविताओं में नये नये तरीके इस्तेमाल करते देखता हूँ. इच्छा होती है कि काश!! मुझे भी आता होता तो मैं भी ऐसा ही करता.

उदाहरण के लिए, कहीं फोटो के लिए स्लाईड शो लगा देखा. अब अपने आलेख में स्लाईड शो कैसे लगायें, यह मालूम ही नहीं. इच्छा दबाने का प्रयास किया, नहीं दबी. तो खुद ही पड़ताल शुरु की. थोड़ी सी मेहनत से सीख भी गये, ऐसा लगता है. आज पहली बार लगायेंगे, अगर सही चला मतलब सीख ही गये हैं. अब यदि सीख ही गये हैं तो सिखा भी दें:

पिकासा एल्बम से स्लाईड शो को अपने चिट्ठे पर कैसे अंतःस्थापित (एम्बैड) करें:

१. पिकासा में उस एलबम पर जायें, जिसे अंतःस्थापित (एम्बैड) करना है.
२.दायें तरफ पढ़ें: Post On के नीचे Link to this album..उस पर क्लिक करें.
३.उसमें से जो विकल्प दिखेंगे..उसमें से Embedd Slideshow पर क्लिक करें.
४. उसमें साईज़ और केप्शन दिखाने का विकल्प चुनें.
५.Embedd Code कॉपी कर लें.
६. ब्लॉग पर जहाँ स्लाईड शो लगाना हो, वहाँ उसे पेस्ट कर दें.

बस, आपका स्लाईड शो तैयार. एकदम सरल मगर आपकी पोस्ट में चार चाँद लगा देगा.

स्लाईड शो, केप्शन के साथ फोटो, पैराग्राफ, ब्लॉककोट आदि सब आपके आलेख को खूबसूरती प्रदान करते हैं. एक अच्छा आलेख, जो लोगों को आकर्षित करे पढ़ने के लिए, उसके लिए इन सब बातों का ध्यान रखना बहुत जरुरी है. हो सकता है आप बहुत अच्छा लिख रहे हों मगर न पैराग्राफ का ध्यान है, न लाईन ब्रेक का, तो पाठक आयेंगे कैसे? और बिना पाठक आये कोई जानेगा कैसे कि आपने अच्छा लिखा है.

इसीलिए तो हम कहीं जाते हैं तो बहुत सज धज कर, अच्छे कपड़े पहन कर जाते हैं. भले ही आपका व्यवहार बहुत अच्छा हो मगर जब तक आपसे कोई बात नहीं करे, आप किसी को आकर्षित न करे, कोई आपका व्यवहार कैसे जानेगा.

वैसे भी आजकल शो/सजावट का जमाना है. कल ही पड़ोसी किसी बात का थैक्यू गिफ्ट दे गये-एडीबल डेकोरेशन. बात भी ऐसी कि जिसका हम शायद भारतीय होने के कारण थैक्यू भी न बोलते. अरे, वो कहीं बाहर गये थे तो कह गये थे कि तीन दिन उनके अखबार उठाकर रख लेना. हम तो यही सोच लेते कि इसी बहाने उसको हमारा अखबार पढ़ने मिल गया. इसमें थैंक्यू कैसा??

एडीबल डेकोरेशन-मुश्किल से तीन चार डॉलर के फल कटे हुए, जिसमें अंगूर, खरबूजा, अननास, स्ट्राबेरी और एक पॉट २ डॉलर का मगर वो उसे खरीद कर लाये ६५ डॉलर का. बिकती है सजावट, पैकिंग. आकर्षित करती है. वही फल काट कर प्लेट में धर कर गिफ्ट दे दो तो कहो लेने वाला मना कर दे कि जाने कब के कटे हों. :) मगर इस सजावट के साथ हम धन्यवाद करते नहीं थक रहे और उस पर से तस्वीर उतारने और एक दिन सजा रहने देने के बाद खाये.

दाम उस कम्पनी की वेबसाईट पर जाकर टीप लिया जिसका नाम डिब्बे पर था-बिना दाम पता किये हमें कहाँ चैन कि कितने का गिफ्ट दिया? :) ये तो बस किताबी बात है कि दान की बछिया के दाँत नहीं गिने जाते. वैसे ही जैसे ईमानदारी का फल मीठा होता है. अगर ये सही होता तो हमारे नेता सारे अब तक कड़वा खा खा कर मर न गये होते.

सीखो अमेरीका से मार्केटिंग जो अपनी ९/११ की त्रासदी, जिसमें ३००० से ४००० लोगों की मौत हुई, को भी सजाधजा कर ऐसे मार्केट करता है कि सारा विश्व टूट पड़ता है मदद करने को और हम भोपाल त्रासदी मे मरे लाखों लोगों की मौत के मातम को मनाते आज २५ साल बाद भी न्याय और मदद की राह तक रहे हैं और इन्टरनेशनल मिडिया चुप बैठा है.

उदाहरण दिखाने के लिए उसी एडीबल डेकोरेशन का स्लाईड शो बना दिया है.

है न सजावट और शो बाजी का कमाल.

तो आगे से ध्यान रखिये-जब भी लिखिये, सजावट का ध्यान रखिये. चाहे तस्वीरें हो या पैराग्राफ या लाईन ब्रेक या आप खुद, सजावट महत्वपूर्ण है लोगों को आकर्षित करने के लिए.

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बुधवार, मार्च 24, 2010

निंदिया न आये-जिया घबराए

 

awakening

देर रात गये सोने की कोशिश मे हूँ. नींद नहीं आती तो ख्याल आते हैं. अकेले में ख्याल डराते है और इंसान अध्यात्म की तरफ भागता है भयवश. यह इन्सानी प्रवृति है, मैं अजूबा नहीं.

आधुनिक हूँ तो आधुनिक तरीके अपनाता हूँ अध्यात्म के. बड़े महात्मा जी का आध्यात्मिक प्रवचन सीडी प्लेयर में लगा कर उससे मुक्ति के मार्ग के बदले नींद का मार्ग खोजने में लग जाता हूँ. नीरस बातें नींद में ढकेल देती हैं. नीरसता टंकलाईज़र (नींद की गोली) का काम करती है.

जो हमें अपनी पहुँच के बाहर दिखता है, जिससे हम भौतिक रुप से, रुपये पैसे से लाभांवित नहीं होते, वो हमें हमेशा ही नीरस लगता है. ज्ञान प्रप्ति के नाम पर कभी कैमिस्ट्री भी पढ़ी थी, तब मजबूरी थी परीक्षा पास करना. आज मजबूरी है, पाप कर्मों के बोझ से खुद को अकेले में उबारना, तो यही मार्ग, भले ही नीरस हो, बच रहता है.

कुछ देर मन लगा कर सुनता हूँ. महात्मा जी के कहे अनुसार, जीवन रुपी नैय्या से इच्छायें, चाह, लालच और वासना की गठरी उठा उठा कर फैंकता जाता हूँ पाप की बहती दरिया में. खुद को हल्का किये बगैर उपर नहीं उठा जा सकता, महत्मा जी मात्र १०० रुपये लेकर सीडी में समाये कह रहे हैं. मैं सुन रहा हूँ. कहते हैं चाहविहिन हो जाओ तो मुक्ति का मार्ग पा जाओगे और यह जीवन सफल हो जायेगा.

सोचता हूँ कि क्या मुक्ति का मार्ग पाना भी एक चाह नहीं? क्या चाहविहिन होने की चेष्टा भी एक चाह नहीं? क्या आमजन से उपर उठ अध्यात्मिक हो जाना भी एक चाह नहीं? जब एक चाह की गठरी को पाप की नदिया में फैंका सिर्फ इसीलिये कि दूसरी चाह की गठरी लाद लें, तो क्या यह व्यर्थ प्रयत्न और प्रयोजन नहीं?

एक तरफ मैनें पैसा कमाने का लोभ त्यागा ताकि मैं लोभ मुक्त हो जाऊँ किन्तु वहीं यह लोभ पाल बैठा कि इससे मैं मुक्ति का मार्ग पा जाऊँ. शांत चित्त हो जाऊँ.

एक अंतर्द्वन्द उठता है.

मानव स्वभाव से बाध्य हूँ. चाहत की जो गठरियाँ अर्जित कर ली है, उसे फेंकने में दर्द सा कुछ उठता है किन्तु नई चाहत की नई गठरी तपाक से आकर जुट जाती है. प्रवचन सुन सुन कर ऐसी ही कितनी चाहतों की गठरियों का आना तो अनवरत जारी है लेकिन फैंकना, बहुत मद्धम गति से हो पाता है. अगर ऐसा ही चलता रहा और नई गठरियाँ इसी गति से जुड़ती रहीं तो वो दिन दूर नहीं, जब यह नाँव डगमगा जायेगी और सारा बोझ लिए इसी पाप की दरिया में डूब जायेगी. अब तो एक चाहत और जुड़ गई कि किसी तरह नैय्या डूबने से बची रहे.

स्वामी जी बोल रहे हैं सीडी प्लेयर में से और मैं अपने मन की बात सुनने में व्यस्त हूँ. मन भारी पड़ रहा है उन सिद्ध महात्मा जी की वाणी पर. खुद को कब नीचा दिखा सकते हैं खुद की नजरों में? वरना तो सो गये होते.

इस बीच स्वामी जी और भी न जाने क्या क्या बोल गये, मैं सुन नहीं पाया और एलार्म से नींद खुली तो सीडी प्लेयर से घूं घूं की आवाज आती थी. जाने कब स्वामी जी ने बोलना बंद कर दिया. रात बीत चुकी है और प्लेयर अब भी चालू है.

प्लेयर ऑफ कर फिर तैयार होता हूँ एक नया दिन शुरु करने को. नींद पूरी हो गई है तो फिर दिनचर्या में जुटने की तैयारी करता हूँ.

क्या पाप, क्या पुण्य, कैसा मुक्ति मार्ग? सब अब रात में सोचेंगे जब दिन भर की थकन के बाद भी मन कचोटेगा और नींद आने से मना करेगी.

सोचता हूँ कि जिस दिन सी डी प्लेयर घूं घूं बोलता रह जायेगा और हम कभी न उठने के लिए सो चुकेंगे, उस दिन हिसाब किताब होगा, तब खाता बही देखेंगे कि नांव में कितनी कौन सी वाली गठरियाँ बाकी रह गई हैं.

उस हिसाब का बैलेंस भला कौन जान पाया है.

१०० रुपये बेकार ही गये लगता है सी डी खरीदने के. इससे बेहतर तो नींद की गोली खरीदते, जरा सस्ती पड़ती तो अगले दिन के पाप कर्म भी कुछ कम ही होते पुनः उस दिन की रोटी जुगाड़ने की चाह में.

 

कुछ मुश्किलों को सुलझाने की खातिर
खुद को ही उलझाता चला जाता हूँ मैं

दर्पण में यूँ अजनबी नजर आता हूँ मैं...

-समीर लाल ’समीर’

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रविवार, दिसंबर 13, 2009

पहेली का निष्कर्ष : स्त्री/पुरुष विमर्श

 

एक पहेली ख्याल आती है:

एक पैकेट में ७ बन(ब्रेड) हैं. मेरी पत्नी रोज आधा खाती है और मैं एक पूरा.

पहेली है कि ५ वें दिन कौन कितना खायेगा?

जबाब हो सकता है:

१. मैं पूरा खाऊँगा और पत्नी भूखी रहेगी.

२. पत्नी आधा खाती है, इसलिये आधा खाकर निकल लेगी (आई डोंट केयर बोलते हुए) और मुझे आधा ही खा कर गुजारा करना होगा.

३. दोनों खुशी खुशी आधा आधा बांट कर खायेंगे.

 

73091678

 

यदि आपको लगता है कि

जबाब १ सही है, तो इसका अर्थ है कि आप पत्नी को बराबरी का दर्जा नहीं देते. आप पुरुष प्रधान समाज के समर्थक हैं एवं समय के साथ साथ अपनी मानसिकता नहीं बदल रहे हैं और उसी दकियानूसी विचारों के बीच पल पुस रहे हैं जिसमें नारी को कोई महत्व नहीं दिया जाता था. ऐसे में आज के जमाने में आपकी गुजर मुश्किल ही है. गुजर अगर हो भी जाये तो कम से कम सुखमय तो नहीं होगी.

यदि आपको लगता है कि

जबाब २ सही है तो आप निश्चित ही पत्नी की समानता एवं समान अधिकारों की नहीं बल्कि नारी पुरुष से कहीं कम नहीं वाली रिसेन्ट मानसिकता के साथ कदम से कदम मिला कर चल रही/रहे हैं. आपका ध्येय नारी को बेहतर, ज्यादा ताकतवर एवं पुरुष को हर हाल में नीचा दिखाना है. आप नारी मुक्ति आंदोलन में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेने के लिए परफेक्ट पात्रता रखते हैं. सुखमय जीवन से ज्यादा आपके लिए अहम महत्व रखता है.

यदि आपको लगता है कि

जबाब ३ सही है तो आप पति और पत्नी एक ही गाड़ी के दो पहिये हैं एवं सामंजस्य से ही जीवन गाड़ी भली भांति दौड़ेगी वाले संस्कारों में विश्वास रखते/रखती हैं एवं दोनों के समान अधिकारों के प्रति सतर्क एवं सहमत हैं.

-वैसे तो जबाब २ और ३ का नेट परिणाम एक ही है मगर भाव अलग अलग हैं.

बस, जीवन को सुचारु रुप से सफलतापूर्वक जीने के लिए भाव महत्वपूर्ण है, परिणाम नहीं.

यही सुखद (वैवाहिक) जीवन का सूत्र है.

अतः, कोशिश कर अपना सही जबाब ३ को बनाये यदि आपने अपना जबाब इसके सिवाय १ या २ चुना है तो!!

चलते चलते: (मेरी एक रचना का हिस्सा)

जो प्यार तुमने मुझको दिया था
वो प्यार किस्तों में लौटा रहा हूँ..

मोहब्बत इबादत में ऐसा रहा है
दर्द हो किसी का, किसी ने सहा है
ये बात तुझको पता ही कहाँ थी
कि किसने किससे कब क्यूँ कहा है.

उदासी मिटाना,
और सबको हँसाना
निवेदन मैं सबसे किये जा रहा हूँ...

-समीर लाल ’समीर’

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बुधवार, अगस्त 26, 2009

कैसा ये कहर!

१९ अगस्त को ह्यूस्टन से वापस आये और २० अगस्त को टोरंटो मे टरनाडो (Tornado) ने भीषण तबाही मचाई. मानो हमारे आने का इन्तजार कर रहा हो.

थोड़ा सा भला ये रहा कि शायद जान गया होगा कि इनका सामान वगैरह गुम गया है, घाटा लग चुका है और परेशान है तो हमारा मोहल्ला छोड़ दूसरे मोहल्ले में तूफान मचाया. मौसम विभाग के अनुसार १८० से २४० किमी की रफ्तार से लेवल २ का तूफान आया. वूडब्रिज एरिया में कितने ही घरों की छत उड़ गई. कारें पलट गई. बारबेक्यू हवा में उड़ गये. पेड़ धाराशाही हो गये.

मगर जब वो दूसरे मोहल्ले में भरपूर तूफान मचा रहा था तब हालात के हल्ले में हमारा मोहल्ला भी थर्राया. खिड़कियाँ काँपी. बिजली कड़की. पानी बरसा. जो मौसम कहीं तबाही मचा रहा था वो ही हमारे यहाँ दर्शनीय बना हुआ था.

उस मोहल्ले में सैकड़ों घर तबाह हो गये. परखच्चे उड़ गये. देखिये तबाही के कुछ दृष्य:

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गनीमत यह रही कि कोई मरा नहीं. मौसम विभाग चेता चुका था. सरकार ने बिजली तीन घंटे के लिए बंद कर दी ताकि किसी को करेंट न लगे या कहीं शार्ट सर्किट से आग न लग जाये.

ऐसे मौके कितनी बार आते हैं यहाँ, जब बिजली न हो. मेरी याद में पिछले १० सालों में यह दूसरा मौका था. पिछली बार जब २००३ में बिजली गई थी, तब अमरीका के राष्ट्रपति ने टीवी पर जनता से माफी माँगी थी. तब मैं सोचा करता था कि अगर भारत का राष्ट्रपति बिजली जाने के लिए टीवी पर माफी माँगने लगे तो वो तो २४/७ टी वी पर ही नजर आये. आखिर खाना कब खायेगा. :) खैर, इस बार फिर बिजली गई सो रोशनी की खातिर मोमबत्ती जला ली गई.

शायद आपको लाला लोगों की मौका परस्ति का अंदाजा न हो. लालाओं के स्वभाव के ज्ञानियों का कहना है कि अगर कोई लाला कभी कुऐं में गिर जाये तो पहले वो स्नान करेगा और फिर मदद के लिए चिल्लाना शुरु करेगा.

तो आदतन जब मोमबत्ती जली तो हमने भी फायदा उठाया और झट अपनी ही केंडल लाईट फोटो खींच लिए. काम आयेगी शायरी/गज़ल के साथ चिपकाने में. :)

 

दिख रहा हूँ?
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मजेदार यह रहा कि जब बरामदे में खड़े मौसम का नजारा ले रहे थे तो तेज चलती हवाओं में पत्नी हमारा हाथ थामें थी निश्चिंतता के लिए. ऐसा नहीं कि हमारी चिंता में बल्कि इसलिए कि वे इस बात को सुनिश्चित थीं कि इनको तो उड़ा पायेगा नहीं वजन के चलते तो वो भी उड़ने से बच जायेंगी. :)

अब टरनाडो की बात चली है तो थोड़ी सी बात टरनाडो के विषय में भी कर ही ली जाये:

शब्द ’Tornado' या "अंधड़" लैटिन शब्द tonare से आता है, जिसका मतलब ’तेज गरजते आँधी तूफान वाले बादल’ होता है. स्पेनिश में इस शब्द को tornear से जाना गया जिसका अर्थ होता है घुमावदार या मुड़ा हुआ. Tornadoes, जो घूर्णन या हवा में घुमाव द्वारा गठित होते हैं, इसी कारण से इन्हें twisters या चक्रवात भी कहा जाता है.

यह बवंडर (’Tornado' ) कम वायुमंडलीय दबाव के एक केंद्र के आसपास घुमावदार हवाओं के एक ताकतवर स्तम्भ है. यह काले बड़े तूफान, बादल से नीचे लटके कुप्पी (Funnel) की तरह दिखते है. संकीर्ण अंत पृथ्वी को छूता हुआ आगे बढ़ता रहता है.

इस बवंडर के भीतर हवा का तेज बहाव सर्पिल गति से नीचे से उपर होता है और जब यह किसी वस्तु से छूता हुआ चलता है तो उसके टुकड़े टुकड़े कर देने में इसका वेग सक्षम होता है. टूटे हुई वस्तुएं और यहाँ तक की गाय भैंसे और छोटे मोटे समान इसकी पूँछनुमा धरती को स्पर्श करती आकृति में खींच कर कई मीटर उपर चले जाते हैं और बहुत मीलों दूर जा गिरते हैं.

इसकी हवा का वेग 500 मील प्रति घंटे तक की गति में घूम (स्पिन कर) सकता है. आमतौर पर यह लगभग 300 मील प्रति घंटे की रफ्तार से यात्रा करता है. यह बवंडर मानव जाति को ज्ञात सबसे खतरनाक तूफान होता है.

हालांकि कोई भी अमेरिकी राज्य tornadoes से पूरी तरह मुक्त नहीं है, किन्तु वे रॉकी और Appalachian पर्वत के बीच मैदानी इलाकों में सबसे अधिक पाये जाते हैं. हालांकि आंकड़े बताते हैं कि tornados संयुक्त राज्य के पूरे मध्यपश्चिम को प्रभावित करता रहते हैं, किन्तु ’ओकलाहोमा’ नामक प्रान्त सबसे ज्यादा प्रभावित है. जब अमेरीका मे आने वाले सब tornadoes को खाते में लिया जाता है, तो फ्लोरिडा में बवंडर घटना का देश में सबसे ज्यादा घनत्व है. लेकिन फ्लोरिडा के tornadoes कमज़ोर एवं अल्पजीवी रहते हैं और ओकलाहोमा जैसे "क्लासिक" supercellular tornadoes की तरह नुकसान नहीं पहुँचाते. इसके विपरीत, पूर्वोत्तर और पश्चिम संयुक्त राज्य अमेरिका में सबसे कम बवंडर आते हैं.

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नोट: आज पहली बार विंडोज़ लाईव राइटर पर लिख कर पोस्ट करने की ट्राई कर रहे हैं. भूल चूक लेनी देनी.

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बुधवार, मई 27, 2009

सावधानी हटी और दुर्घटना घटी

कल कहीं एक बहुत बेहतरीन चेतावनी पढ़ रहा था:

’यदि आपकी उम्र ५० से अधिक है और सुबह नींद खुलने पर आपके शरीर के किसी भी हिस्से में दर्द नहीं है तो शायद आप मर चुके हैं. जरा, चैक कर लिजिये.’

अब मर ही गये हैं तो क्या खाक चैक करें जी. मरे ही ठीक. डले रहेंगे. कोई न कोई मरघट तक पहुँचा ही देगा.

मुझे लगता है कि यह पंक्ति बदली जा सकती है:

’यदि आप ब्लॉगर हैं या कम्प्यूटर पर ३ घंटे से ज्यादा समय बिताते हैं तो आप ने उम्र पर विजय प्राप्त कर ली है. आपको ५० का होने की जरुरत नहीं. किसी भी उम्र में उपरोक्त वाक्य सिद्ध माना जा सकता है.’

मर जाने का उम्र से क्या लेना देना. आजकल तो २२-२३ साल के युवाओं को हार्ट अटैक आये जा रहे हैं.

ऐसे नहीं कि इन पर विजय नहीं प्राप्त की जा सकती. निश्चित ही अनुशासित जीवन, नियमित और पौष्टिक खुराक और सही व्यायाम के साथ इनको हराया जा सकता है.
(मेरी तस्वीर इतने आश्चर्य से क्या देख रहे हो? ज्ञान बाँटने के लिए ज्ञानी होना जरुरी थोड़े है और ज्ञान बाँटने वाला अगर सारी बातों पर अमल करे तो ये जितने बाबा हवाई जहाज से आकर मंच पर तुम्हें भाषण देकर ऐश कर रहे हैं, वो भीख मांग रहे होते और जंगल में रहते)

तो बात करें सही व्यायाम की. ५० के बाद वाले छोड़ो, उसे तो हम भी छोड़े ही हुए हैं. अभी तो बस वो कम्प्यूटर पर ३ घंटे से ज्यादा बिताने वालों की देखो. वो ज्यादा जरुरी हैं तुम्हारे लिए क्योंकि जब यह ब्लॉग पढ़ रहे हो तो कम्प्यूटर प्रेमी तो होगे ही वरना तो अंग्रेजी की कुछ वेब साईट देख कर खिसक लेते.

मैं एक ऐसे सज्जन को जानता हूँ जो रोज नियम से सुबह आधा घंटे नेट पर टाईम्स ऑफ इंडिया पढ़ते हैं और बस!! इसके सिवाय कम्प्यूटर से कुछ लेना देना नहीं. पान की दुकान में गर्व से सीना चौड़ा कर बताते हैं कि हम तो न्यूज कम्प्यूटर पर ही देखते हैं. भले आदमी, सिर्फ टाईम्स ऑफ इंडिया पढ़ने के लिए कम्प्यूटर और फिर नेट का कनेक्शन, कम्प्यूटर ढ़कने की चादर, टेबल, कुर्सी, एसी और जाने क्या क्या इन्वेस्टमेन्ट कर डाला. अब समझे मंदी का असल जिम्मेदार कौन. सारा का सारा डेड इन्वेस्टमेन्ट.

उनकी वो जाने आप तो व्यायाम देखो:

व्यायाम

१. कभी २० मिनट से ज्यादा स्क्रीन पर लगातार मत देखो.

-हर २० मिनट बाद, आँख कम्प्यूटर स्क्रीन से हटाकर चार बार एक आँख जोर से मींचो और चार बार दूसरी और फिर चार बार दोनों एक साथ. फिर दोनों हथेलियों को आपस में ७ से ८ बार घिसो, घिसो और दोनों आँखों पर हथेली लगाओ. फिर घिसो, फिर लगाओ-ऐसा भी चार बार करो. अब फिर से काम करने को तैयार. समय खर्च हुआ ३० सेकेंड से कम और आँख रहे चकाचक.

सावधानी: अगर दफ्तर में या साईबर कैफे में हो, तो आँख मींचने के पहले देख लो कि मूँह किसी लड़की की ओर तो नहीं. वरना आँख तो सही हो जायेगी और जो मार पड़ेगी, उससे बाकी हड्डियाँ हिल सकती हैं.

२.कुर्सी पर बैठे बैठे काम करते करते पंजे के बल ऐड़ी उपर उठाओ, कुछ देर रुको और फिर ऐड़ी जमीन पर छुलाओ. ऐसा जब भी याद आये, कर लो. कोई समय सीमा नहीं, कोई निश्चित आवृति नहीं. पैरों का ब्लड सर्कूलेशन बना रहेगा. कई जो धुटने में दिमागधारी हैं, उनके लिए तो रामबाण.

सावधानी: सिर्फ ऐड़ी उठाना है, खुद को नहीं वरना अगर हमारी जैसी कायाधारी हो तो मोच आ सकती है और दूसरा पड़ोस के क्यूबिकल में बैठी सुकन्या को गलतफहमी हो सकती है कि तुम उचक उचक कर उसे ताक रहे हो. कहीं कम्पलेन्ट कर दी तो मंदी में तो दूसरी नौकरी भी मिलने से रही.

३. हर १ से १.३० घंटे में अपने दोनों हाथ सामने सीधे फैला लो. दोनों हथेली जमीन को देख रही हो. फिर हाथ को यथास्थिति में रखते हुए हथेली के उपर उठाओ ताकि वो सामने की दीवाल देखने लगे, जितना ज्यादा देख सके. फिर उसे नीचे झुकाओ ताकि अब वो उल्टा हो तुम्हें देखे और उँगलियों की पोर जमीन को. ऐसा दस बार करो. फिर हाथ सीधा रखते हुए १० बार मुट्ठी भींच कर बंद करो और पूरी हथेली फैला कर खोलो. फिर पांच बार बंद मुठ्ठी को कलाई से बाईं ओर घुमाओ और पांच बार दाईं ओर. फिर हाथ सामन्य स्थिति में ले आओ और काम पर लग जाओ.

सावधानी: समझदार तो हो ही. मुठ्ठी खोलते और बंद करते वक्त कंडिका १ वाली ही सावधानी बरतो, वरना कोई सिर फिरी हुई तो कंडिका १ वाली ही परेशानी हो सकती है. ये उपर वाले फोटो से कन्फ्यूज मत होना. इन्हें तो कहीं भी बिना सावधानी कुछ भी करना एलाउड है. इनका साथ देने हजार आ जायेंगे और तुमको पीटने भी हजार.

४. दिन में कम से कम दो से तीन बार दोनों हथेलियों को बैठे बैठे गरदन के पीछे ले जाओ और हथेलियों की आपस में उँगलियों से फंसा लो. फिर दोनों हथेलियों को गरदन से धक्का दो. सामान्य हो जाओ और फिर धक्का दो जब तक बरदाश्त हो. ऐसा कम से कम पाँच बार करो, फिर सामान्य स्थिति में आ जाओ.

सावधानी: इसमें क्या सावधानी?? आदत पड़ गई सावधानी पूछने की ३ ही बार में तो चलो बता देते हैं: ध्यान रखो कि बॉस आस पास न हो वरना इस मुद्रा में वो समझेगा कि तुम काम से बोर हो गये हो. फिर अन्जाम तो तुम जानते ही हो.


और भी अनेक व्यायाम है मगर अभी के लिए इतना करते रहो. ज्यादा समय तक कम्प्यूटर पर बैठ पाओगे और इसके लिए तैयार नहीं हो तो ब्लॉग डिलिट करो और चाय की दुकान पर जा कर पहले की तरह गपियाओ और पान खाकर चले आना. मुद्दे बहस के वहाँ भी खूब हैं, बोर नहीं होगे.

पान की दुकान पर सावधानी: यहाँ ब्लॉग पर फालतू बहस करने में लिख कर गाली पड़ती है और वहाँ चाय की दुकान पर फालतू बहस करने पर सीधे गरियाये जाओगे और लतियाये जाने का भी खतरा है. Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, फ़रवरी 21, 2008

द चोकिंग गेम-चिट्ठाजगत में...

कभी घुटन सी महसूस होने लगती है. सोचने को मजबूर होना पड़ता है कि ये कहाँ आ गये हम. क्या हासिल है? महज एक घुटन का अहसास. एक अंधेरापन. एक दूसरे पर कीचड़ उछालना. एक विवाद समाप्त नहीं होता, दूसरा शुरु, बेवजह. नाम दिया जाता है कि एक स्वस्थ बहस चल रही है.

मुझे तो लगने लगा है कि कुछ ऐसे लोग हैं जो बिना बहस जिन्दा रहना ही नहीं जानते, चार दिन शांति छाई रहे तो खाना हजम होना बन्द हो जाता है. किसी को पुरुस्कार मिले तो विवाद, किसी ने कुछ कहा तो विवाद और तो और कोई चुप रहा तो विवाद.

बात शुरु होती है कहाँ से और चल पड़ती है किस ओर. बहुत कोशिश करनी पड़ती है इससे बच कर निकलने के लिये. इससे किनारा बनाये रखने के लिये.
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मगर जब उसी गली के निवासी हैं तो कब तक बचते रहेंगे. माना कि हम नहीं भी खेलें कीचड़-कीचड़ तब भी कुछ छीटें तो आयेंगे ही. न भी आये तो दुर्गंध को कौन रोक पाया है आजतक. कहीं यही दुर्गंध नये आते लोगों का मन ही न बदल दे. फिर तो रह जायेंगे जो रह रहे हैं और छोड़ कर न जा पाना मजबूरी हो गया है या फिर वो, जिन्हें यह खेल पसंद है और इस खेल में मजा आता है. आबादी में विस्तार के मार्ग स्वतः ही अवरुद्ध हो जायेंगे.

अजीब लगता है मगर ये उन लोगों में से है जो खुद का गला घोंटकर उस पार की दुनिया का क्षणिक आभास और आनन्द लेने में अपने आप को एडवन्चर्स का दर्जा देते हैं. क्या ये बीमार नहीं? क्या इन्हें इलाज की जरुरत है?

आज ही ’द चोकिंग गेम’ के बारे में एक खबर पढ़ता था जिसने मुझे यह सोचने को मजबूर किया.

शायद यह उसी प्रजाती के हैं जिन बच्चों को लेकर आज अमरीका/कनाडा चिन्तित हैं. यह बच्चे इसी तरह के चोकिंग गेम में आनन्द का अनुभव करते हैं. ये बच्चे या तो अपने दोस्त के माध्यम से या कम्प्यूटर के तार या टेलिफोन के केबल से खुद ही अपना गला उस स्तर तक घोंटते हैं जब तक की लगभग होश न रह जाये. इन्हें इसमें मजा आता है. यह कहते हैं इन्होंने ब्लैक टनल देख ली जिससे होकर व्यक्ति मौत के बाद गुजरता है. यह मौत के साथ अपने साक्षात्कार का अनुभव करना चाहते है. क्यूँ? कोई नहीं जानता. ये बच्चे खुद नहीं जानते. बस, महज एक मानसिक विक्षप्तता- जिसका कोई जबाब नहीं. जिसे यह बच्चे एडवेन्चर कहते हैं.

तकलीफ तब हो जाती है, जब आसपास कोई नहीं होता या तुरन्त चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं हो पाती और यह बच्चे अपनी नादानी से जान गँवा बैठते हैं.

खुद तो चले जाते हैं मगर पीछे छोड़ जाते हैं एक बिलखता बिखरा परिवार और दे जाते हैं अपनी तरह के अन्य नादानों को इसे अजमाने का उकसाहट-चलो देखें तो उसने कैसा अनुभव किया होगा?

इन बच्चों को रोकने के लिये कनाडा में एक वेब साईट शुरु की गई है और न जाने कितने फोरम इस दिशा में कार्यरत हैं.

बस, साथियों से यही कहना चाहूँगा कि इस खेल का अन्त अच्छा नहीं है. कहीं चिट्ठाजगत के लिये भी ऐसी ही वेबसाईट न शुरु करना पड़े. खुद ही समझ जाओ न!!

नोट: १.मूलतः इस पोस्ट की वजह ’द चोकिंग गेम’ की जानकारी देना था बाकि तो साथ में बह निकला. :)

२. आज से ४ दिन के लिये बाहर जा रहा हूँ. यह पोस्ट स्केड्यूल की है कल सुबह के लिये, जब मैं कहीं और से अपना ब्लॉग चेक करने वाला हूँ. Indli - Hindi News, Blogs, Links

सोमवार, अक्टूबर 29, 2007

१.३० घंटे मे ५० चिट्ठे मय टिप्पणी निपटायें

बचपन में परीक्षा की तैयारी करते थे. मास्साब सफलता का पाठ पढ़ाते थे ट्यूशन में. गुर दिया गया कि जैसे ही परचा हाथ में आये, सबसे पहले एक नजर पूरा परचा देख लो. फिर एक एक दो दो नम्बर वाले प्रश्न, जिसमें सिर्फ हाँ नहीं, छोटे छोटे जबाब देने हैं, उन्हे फटाफट कर डालो. फिर वो प्रश्न उठाओ, जिसका उत्तर तुम बखूबी से जानते हो. उन्हें फटाफट हल कर दो. अब बाकि के धीरे धीरे सोच समझ के जबाब देते जाओ. अगर किसी में फंस रहे हो, हल नहीं निकल रहा, तो जहाँ तक किया है वहीं छोड़ कर आगे अगले प्रश्न पर चले जाओ. बाद में समय बचे तो आकर फिर कोशिश करना. ध्यान रहे, जितने ज्यादा हल करोगे, उतना अच्छा परिणाम आयेगा. छूटे प्रश्न पर अंक भी शून्य मिला करते हैं. कुछ भी कोशिश की होगी तो शायद कुछ हिस्सा सही निकल जाये और परीक्षक उतने हिस्से के अंक दे दे.

उनका कहना था कि परीक्षा भी मेनेज्मेंट की बात है. टाईम मेनेज्मेंट, एक्साईटमेन्ट मेनेज्मेंट, कन्टेन्ट मेनेज्मेंट सभी लागू होते हैं. कहीं भी चूके और गये. उनके गुर हर परीक्षा में काम आये.

ऊँचे दर्जे के साथ जब कोर्स की किताबें मोटी होने लग गई तो समय तो वही २४ घंटे रहा उल्टे कॉलेज में ज्यादा समय लगने लगा. दोस्त बढ़ गये. घूमने फिरने का दायरा बढ़ गया. दीगर शौकों में समय जाने लगा. तब एक दिन उन्होंने हमें समस्या से जूझते देख एक नया गुर सिखाया-स्पीड रिडिंग-शीघ्र पठन जो रियाज के साथ साथ अतिशीघ्र पठन यानि रेपिड रिडिंग को प्राप्त हुआ. वही ध्यान तेज लेखन याने फास्ट राईटिंग की तरफ भी दिलवाया गया.

उनके शीघ्र पठन वाले गुर का भरपूर फायदा हमने उस समय नावेल पढ़ने में उठाया. वो सिखाते थे कि अगर मटेरियल सिर्फ जानकारी और मनोरंजन के लिये पढ़ा जा रहा और याद रखने की महती आवश्यक्ता नहीं है तो उसे पढ़ते वक्त शब्द शब्द नहीं, लाईन लाईन पढ़ो. पैराग्राफ नजर से स्कैन करो और आगे बढ़ो. किस विषय में है वो प्रस्तावना थोड़ा अधिक ध्यान से, व्याख्या स्कैनिंग मोड में और फिर निष्कर्ष पुनः थोड़ा ध्यान से. बस. इस तरह आप पूरा जान भी लेंगे और शब्द शब्द पढ़ने की अपेक्षाकृत १० प्रतिशत समय में आपका काम हो जायेगा. कभी कोई चीज विशेष पसंद आ जाये तो जितना चाहे लुत्फ लेकर पढ़ो. समय तुम्हारा है कौन रोक सकता है.ऐसे ही कुछ पठन, उसकी प्रस्तावना, शीर्षक और विषय देखकर भी छोड़ सकते हो कि वो आपके पसंद का नहीं हो सकता. समय बचता है. कितनी नावेल बस प्रस्तावना पढ़कर आगे नहीं पढ़ीं. कई उपन्यासकारों की शैली देखकर आपको रुचिकर नहीं लगता तो आप फिर उसका नाम देखकर दूसरी किताब पर चले जायें. ९५% आपका निर्णय सही ही होगा.

इस परीक्षा देने के, अतिशीघ्र पठन और तेज लेखन के गुरों की गठरी बना कर मैने इसका ब्लॉगजगत में पिछले एक वर्ष से खूब इस्तेमाल किया.

आज की स्थितियों में मान लिजिये, दिन की ५० पोस्ट आ रही हैं. मुझे इन ५० पोस्टों को पढ़ने और टिप्पणी करने में मात्र १ से १.३० घंटे का समय देना होता है बस!! क्या आप विश्वास करेंगे? इतना समय तो सभी चिट्ठाकार बिताते होंगे नेट पर बल्कि ज्यादा ही.
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मेरा नियम होता है कि पहले मैं छोटी छोटी पोस्ट, कविता आदि निपटाऊँ. फिर समाचार, फोटो आदि और फिर बड़े गद्य. उन बड़े गद्यों में अधिकतर स्कैन मोड़ में. कुछ जो पसंद आये, उन्हें अपना समय है के अंदाज में. मगर जो भी पढ़ूँ, देखूँ या सरियायूँ (स्कैन रिडिंग का हिन्दीकरण), उस पर शीघ्र लेखन (टाईपिंग और अब तो कट पेस्ट की सुविधा हमेशा हाजिर रहती है, कुछ वाक्य वर्ड पैड में लिखकर रख लें न, क्या बार टाईप करना जब दो की स्ट्रोक में १० की स्ट्रोक निपट सकते हैं) का फायदा उठाते हुए टिप्पणी अवश्य दर्ज करुँ ताकि अगला जान सके कि उसकी मेहनत पर हमारी नजर गई है. वो आगे भी मेहनत करने का उत्साह प्राप्त करेगा और आप जब मेहनत करेंगे, तब वह भी आपको उत्साहित करने आयेगा.

२० मिनट में फ्रस्ट फेज (छोटी छोटी पोस्ट, कविता) १५ मिनट में सेकेन्ड फेज (समाचार, फोटो आदि ), १५ मिनट में बाकी स्कैनिंग (बड़े गद्यों में अधिकतर स्कैन मोड़) बाकि का समय अपना पसंदीदा इस स्कैनिंग मोड से उपलब्ध लेखन. अब यदि आप १.३० घंटा दे रहे हैं तो पसंदीदा देखने के लिये आपके पास ४० मिनट बच रहे याने कम से कम १२० लाईन...अधिकतर गद्य २० से ४० लाईन के भीतर ही होते हैं ब्लॉग पर.(अपवाद माननीय फुरसतिया जी, उस दिन अलग से समय देना होता है खुशी खुशी) तो कम से कम ४ से ५ आराम से. चलो, कम भी करो तो ३. बहुत है गहराई से एक दिन में पढने के लिये. (कुछ इस श्रेणी में भी निकल जाते हैं - कुछ पठन की प्रस्तावना, शीर्षक और विषय देखकर भी आप उसे छोड़ सकते हैं कि वो आपके पसंद का नहीं हो सकता.)

अब यदि आपके मन में प्रश्न है कि १ मिनट में दो लाईन कैसे पढ़ पायेंगे (इस स्पीड में तो लाईन याद हो जायेगी, मेरे भाई)- तो भाई मेरे, आप इस लाईन में ही गलत आ गये हो. यहाँ से तो नमस्ते कर लो और राजनीति में किस्मत आजमाओ, सफलता आपके कदम चूमेगी, यह मैं विश्वास के साथ कह सकता हूँ और मेरी शुभकामनायें तो हैं ही.

अंत में निष्कर्ष कि जितना अपने लेखन को समय दो उससे चार गुना समय पठन को दो. कोई आवश्यक नहीं कि रोज लिखें. नये लोगों को नाम देख देख कर अहसास होने लगता है कि मैं खूब लिखता हूँ मगर विश्वास जानिये मेरी एक माह में मात्र १० से ११ पोस्ट होती हैं अर्थात हफ्ते में दो से तीन का औसत. अक्सर दो ही. मगर समय वही रोज १.३० से २ घंटे औसत. किया जा सकता है इतना शौक के लिये, हिन्दी की सेवा के लिये, खुद के मन की शांति के लिये और नाम कमाने के लिये. क्या पता कल को यह भी जुड़ जाये कि कुछ कमाई के लिये.

(आशा है शास्त्री जी, ज्ञान जी और अनूप शुक्ल जी को मेरे इतना समय चिट्ठाकारी को देने का रहस्य उजागर कर मैं संतुष्ट कर पाया और यह नये लोगों के लिये भी उपयोगी सिद्ध होगा)

तो शुरु करें अपनी टिप्पणी यात्रा इसी पोस्ट से. Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, अक्टूबर 24, 2007

हद करती हैं ये लड़कियाँ भी...

(यह संस्मरणात्मक आलेख मेरे पिछले आलेख ’दो जूतों की सुरक्षित दूरी’ वाले आलेख पर आये कई जिज्ञासु पाठकों की उस जिज्ञासा निवारण के लिये लिखा जा रहा है जिसमें पूछा गया है कि हे गुरुवर, सुकन्या के पीछे चलते वक्त दो जूते की सुरक्षित दूरी का ज्ञान तो आपने दे दिया किन्तु उनके बाजू में चलने/बैठने के विषय में भी हमारा कुछ ज्ञानवर्धन करें. )

आज दफ्तर जाते समय थोड़ा सजने (यहाँ की भाषा में-ड्रेस अप) का मन हो लिया. होता है कभी कभी. युवा मन है, मचल उठता है. मैं भी बुरा नहीं मानता, मेरा ही तो है.

टॉमी की सफेद कमीज, कालर से झांकती लाल पट्टी वाली, जिसे मैं खास मौकों पर पहनता हूँ. लोगों ने बताया है कि इसमें मैं बहुत स्मार्ट नजर आता हूँ.

साथ में काली फुल पेन्ट, काले मोजे, सॉलिड पॉलिश किये लगभग नये से पिछले साल कानपुर से खरीदे जूते. थोड़ा पाउडर भी लगा लिया चेहरे पर और फिर फाईनल टच-अज़ारो का परफ्यूम-वाह. कभी उसका विज्ञापन देखना. उसमे बताया है कि महक ऐसी कि रुप खिंचा खिंचा चला आये. जब भी लगाता हूँ लोग पूछते हैं कि आज कौन सा परफ्यूम लगाया है. बड़े इम्प्रेस होते हैं. मुझे तो मालूम नहीं था, विज्ञापन में देखा था और लोगों ने बताया है.
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निकलते निकलते वो काला चश्मा, वाह!! कितने ही लोग कह चुके हैं कि बहुत फबता है मेरे उपर. तभी तो अपना फोटो उसी चश्में को पहन कर खिंचाई है.

आकर ट्रेन में खिड़की के पास वाली सीट पर बैठ गया हूँ. बाजू की सीट खाली है. बैग से परसाई जी की किताब ‘माटी कहे कुम्हार से’ निकाल कर पढ़ने लगता हूँ.

अगले ही स्टेशन मेरे बाजू वाली सीट एक सुपात्र को प्राप्त हुई. एक सुन्दर युवती, उम्र तो जरुर रही होगी गुजरते योवन वाली ३७-३८ वर्ष, मगर वह उसे ३० पार न होने देने के लिये सफलतापूर्वक संघर्षरत थी. उसके जज्बे और सफलता को देखकर मैं बहुत प्रसन्न हुआ. यह सजगता और यह संघर्ष का जज्बा हर स्त्री पुरुष में रहना चाहिये, ऐसा मेरा मानना है.

उसने अपने आप को व्यवस्थित किया. मैने कनखियों से देखा था. मैं किताब पढ़ता रहा.

तब तक एकाएक बोली-’हैलो, कैसे हैं आप?"

आह्हा!! परफ्यूम का कमाल- रुप खिंचा खिंचा चला आये. मगर वह पूछते समय भी अपनी नजर सामने अखबार में गड़ाई रही. मैं समझ गया, संस्कारी कन्या है, नहीं चाहती कि किसी और को पता चले कि मुझसे बात कर रही है.

मैने भी किताब में ही झूठमूठ मन लगाये सकुचाते हुये कहा, "जी, मैं ठीक हूँ और आप?"

वो कहने लगी, "कब से सोच रही थी मगर आज बात हो पाई."

ह्म्म!! जरुर सफेद शर्ट लाल पट्टी के साथ कमाल दिखा रही है. लोग सही ही कह रहे थे. मैने धीरे से फुसफुसाते लहजे में ही कहा, "जी, चलिये कम से कम आज सिलसिला तो शुरु हुआ." मैं भी संस्कारी हूँ इसलिये फुसफुसा कर कहा.

वो हंसी. मैं मुस्कराया.

उसने कहा, "लंच पर मिलोगे?"

मैने कहा, ’जरुर, कहाँ मिलना है?" मुझे लगा कि जरुर चश्मे ने भी गजब ढ़हाया होगा. बाकी तो लंच पर मिलने पर उसका क्या हाल होगा जब मैं बताऊँगा कि मैं चिट्ठाकार हूँ और सन २००६-०७ का तरकश स्वर्ण कमल और इंडी ब्लॉगीज पुरुस्कार से नवाजा गया हूँ. यू ट्यूब के कवि सम्मेलन के विडियो लिंक जो दूँगा तो फूली न समायेगी कि किस सेलेब्रेटी से मुलाकात हो ली है.

वो बोली, "ठीक है, वहीं मिलते हैं जहाँ पिछली बार मिले थे. ठीक दो बजे."
womenbluetoothअब मुझे लगा कि कुछ क्न्फ्यूजन है. मैं कब मिला इन मोहतरमा से. मैने उनकी तरफ पहली बार मूँह फिराया तो देखा वो कान में फंसाने वाले मोबाईल (अरे, ब्लू टूथ) पर किसी से बात करती हुई हंस रही थी. हद हो गई और मैं समझता रहा कि मुझसे बात चल रही है. एकाएक उसने मेरी तरफ मुखातिब होकर पूछा-"आपने कुछ कहा?"

मैने कहा,"नहीं तो."

अरे, मैं क्यूँ कुछ कहूँगा किसी अजनबी औरत से-अच्छा खासा शादीशुदा दो जवान बेटों का बाप-ऐसा सालिड एक्सक्यूज होते हुए भी. बस, समझो. किसी तरह बच निकले.वो तो लफड़ा मचा नहीं वरना तो सुरक्षाकवच ऐसे ऐसे थे कि जबाब न देते बनता उनसे. मैं तो तैयार ही था कहने को कि हम भारतीय है. हमारी संस्कृति में विवाहित महिलाये ऐसी नहीं होती कि पूछती फिरें –आपने कुछ कहा? अरे, हमारे यहाँ तो सही में भी अपरिचित महिला से कुछ पूछ लो तो कट के सर झुका के लज्जावश निकल लेती है. लज्जा को नारी के गहने का दर्जा दिया गया है. उस संस्कृति से आते हैं हम. तुम क्या जानो.

हद है भाई!! अफसोस होता है.

मैं तो खुश नहीं हूँ इन छोटे छोटे मोबाईल फोनों के आने से. ससूरे, साफ साफ दिखते भी नहीं हैं और कन्फ्यूजन क्रियेट करते हैं. आग लगे ऐसे छोटे मोबाईल के फैशन में.

सीख (ध्यान से पढ़ें): यदि कोई अजनबी सुन्दर कन्या, जो जन्म से अंधी नहीं है, आपकी काया, रंगरुप और उम्र की गवाही देते खिचड़ी बालों की प्रदर्शनी को देखते हुये भी, खुद से बढ़कर, आपसे अनायास अकारण आकर्षित होते हुये बात प्रारंभ करे (इस बात के होने की संभावना से कहीं ज्यादा प्रबल संभावना इस बात की है कि आप पर आकाश से बिजली गिर गई और आप सदगति को प्राप्त हुए (इस तरह की सदगति की संभावना करोंड़ों में एक आंकी गई है ज्ञानियों के द्वारा)), तब आप कम से कम दो बार उसे देखें और न हो तो बिना शरमाये पूछ लें कि क्या वो आप से मुखातिब हैं? कोई बुराई नहीं है पहले पूछ लेने में बनिस्पत कि बात में बेवकूफ बन इधर उधर बगलें ताकने के)


(प्रिय जिज्ञासु पाठक, यही ज्ञान आगे आगे चलने में भी काम आयेगा. जब आपको लगे कि पीछे से उसने आपको आवाज लगाई है. :))

पुनश्चः: मेरी व्यक्तिगत सुरक्षा की दृष्टी से इस कथा को काल्पनिक ही माना जाये. Indli - Hindi News, Blogs, Links

मंगलवार, अक्टूबर 09, 2007

ताज्जुब न करो!!

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गाँधी जयन्ती पर पढ़ता था गाँधी जी का खत, जो उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के अपने अभिन्न मित्र कालेनबाख को लिखा. उस खत में उन्होंने हवा में आ रही सनसनाहट और पेड़ों का जिक्र किया. कम ही बात की है गाँधी जी ने पर्यावरण पर अपने जीवन काल में. शायद समय न मिल पाया हो या प्रासंगिक न रहा हो, उस वक्त.

हमारे एक मित्र अनायास ही कह उठे उनका खत पढ़ कर:

पौधे लगाने होंगे ताकि पेडों की सनसनाहट सुन सकें। नहीं तो कंकरीट के जंगल ही देखने को मिलेंगे। ऐसा जारी रहा तो जीवन जीवन नहीं रहेगा।

मैं हतप्रभ सा विचार में डूब गया. उड़ चला मन पखेरु मुम्बई प्रवास के दौर में. गिरगाम रोड, मुम्बई के उस कमरे में, जहाँ मैं रहा करता था. कहाँ लगाऊँ पेड़ इस महानगर में? काश, मैं भी हवा में तैरती पेड़ों की सनसनाहट भरी संगीत लहरी सुन पाता.

सा रे गा मा..गा गा पम ..ध नी..सां...सां!!!
building
बिल्डिंग से सटी बिल्डिंगें. ७ वीं मंजिल से जिधर नजर दौड़ाओ, बिल्डिंगें ही बिल्डिंगें. एक सघन कांक्रीट का विशालकाय जंगल. आवाजें तो उठती हैं. कहीं से किसी के बच्चे के चिल्लाने की, रसोई मे आपस में टकराते-गिरते बर्तनों की, टीवी पर चीख चीख कर पढ़े जाते समाचारों की, कहीं पर बेढ़ब तरीके से बजते री-मिक्स की तेज कर्कश धुन और भी न जाने कितने प्रकार की अजीब अजीब आवाजें. सुप्त संवेदनाओं की तलहटी से उठती ऊँची ऊँची आवाजें, शायद चित्कार ज्यादा बेहतर शब्दावली हो इसे जाहिर करने के लिये. शहरी रिवाज़ को उजागर करती आवाजें. एक दूसरे से सटे छोटे छोटे फ्लैटों में सिवाय आवाजों के और है ही क्या?

नीचे झांकता हूँ तो लोगों की भीड़ से पटी पड़ी पतली पतली सड़कें. सड़को के दोनों ओर अतिक्रमण किये सब्जी वालों के ठेले, टेक्सी वालों की भीड़. हैरत होती है जब सड़क नजर नहीं आती. किस स्तर पर यह सब तैर रहे हैं.

न कोई पेड़, न हरियाली. कहाँ से आये हवा में पेड़ों की सनसनाहट. वो संगीत लहरी..

सा रे गा मा..गा गा पम ..ध नी..सां...सां!!!

फ्लेट के बरामदे के गमले में बोनसाई लगा लिया है. कोई सनसनाहट नहीं बस, एक पेड़ होने का अहसास मात्र. पेड़ होकर भी पेड़ नहीं. ठीक वैसे ही, जैसे संवेदनाहीन मानव..जो आज हर जगह मिल जाते हैं..मानव होकर भी मानव नहीं. संवेदना शुन्य..आत्मलिप्त..लिजलिजे मानव आकृत.crowd

और बड़ी बड़ी हाईवे के किनारे हरे पेड़ लगा दिये गये हैं. शायद उनसे उठती होगी सनसनाहट...कोई संगीत लहरी..

सा रे गा मा..गा गा पम ..ध नी..सां...सां!!!

मगर तेज रफ्तार भागती कारें, ट्रकों की धों धों में उसकी क्या बिसात. कब उठी, कब लुप्त हो गई, कोई जान ही नहीं सका. कौन जान सका है सुप्त संवेदनाओं की करवट बदलने की प्रक्रिया को...क्षणिक..अनजान..अनकही..अहसास विहीन.

अब तो हवा में बसती पेड़ों की सनसनाहट की स्वर लहरियों को सुनने पहाड़ों पर छुट्टियों में जाना पड़ेगा, एक कोशिश करके. तभी सुनाई देगा जीवन का असली संगीत...पेड़ों से उठती..हवा में समाहित स्वर लहरी..

सा रे गा मा..गा गा पम ..ध नी..सां...सां!!!

ठीक वैसे ही जैसे हर तरफ छाये रीमिक्स संगीत के कान फोडू संगीत से हट कर कभी किसी पाँच सितारा हॉल में जाकर शास्त्रीय संगीत का आनन्द लेना. वो भी तो अब यूँ ही सहज सुनाई नहीं पड़ता.

क्यूँ ऐसा सोचते हो कि फिर जीवन जीवन नहीं रहेगा, मित्र!! जरुर रहेगा-अंतर बस स्वर्ग और नरक के जीवन का होगा और फिर दोनों ही तो जीवन हैं.

जीना तो पड़ेगा-चाहे वो कितना भी अभिशप्त क्यूँ न हो. सब जी ही रहे हैं न!!

बस भूल जाओ, हवा में बसती पेड़ों की सनसनाहट की स्वर लहरियाँ...

सा रे गा मा..गा गा पम ..ध नी..सां...सां!!!

लगा लो मन रीमिक्स में!! उसके अपने सुर हैं. जैसे ट्रक और कारों की धों धों!

ताज्जुब न करो!!

(नोट: अभी भी वक्त है कि जितना बच सके उतना पर्यावरण और पहाड़ बचा लिये जायें. पाँच सितारा ही सही, कभी जा तो पायेंगे. :) वरना तो गुलाम अली को सुनते ही रह जायेंगे:

-दिल में इक लहर सी उठी है अभी,
कोई ताजा हवा चली है अभी.)
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मंगलवार, सितंबर 18, 2007

हाय टिप्पणी!! काहे टिप्पणी!!

अगर मैं कहूँ कि ९८ प्रतिशत भारत की आबादी को, जिसमें मैं भी शामिल हूँ, को न तो धन्यवाद देना आता है और न ही स्वीकारना आता है और न ही किसी का अभिनन्दन या प्रशंसा करना या फिर अपना अभिनन्दन या प्रशंसा स्वीकार करना, तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. हाँ, इस बात को सुनकर अनेकों भृकुटियाँ जरुर टेढी हो जायेंगी. यह तो हम सबको आता है.

जरा बताईयेगा:

क्या आप अपने नौकर को पानी या चाय देने के लिये धन्यवाद देते हैं?

क्या आप अपने ड्राइवर को दफ्तर पर उतरते समय या घर पर उतरते समय, सुरक्षापूर्वक पहुँचाने का धन्यवाद देते हैं?

क्या आप पेट्रोल पंप पर पेट्रोल भरने वाले बालक को पेट्रोल भरने का धन्यवाद देते हैं?

क्या आप अपने मित्र का फोन आने पर फोन रखते समय उसे फोन करके याद करने का आभार करते हैं?

क्या आप से जब कोई आपका हाल पूछता है तो उसे अपना हाल 'ठीक हूँ' के साथ हाल पूछने के लिये धन्यवाद करते हैं?

क्या आप दुकानदार को पैसा देने के बाद बचे पैसे वापस लेते हुये उसकी सेवाओं के लिये धन्यवाद कहते हैं?

क्या आप स्टेशन पर कुली को या रिक्शे वाले को पैसे के सिवाय धन्यवाद भी देते हैं?

उपरोक्त सूची में अभी कम से कम १०० और वाकये रख सकने में सक्षम हूँ जिसमें ९८% लोगों का जबाब नकारात्मक होगा.लोग सोचते हैं कि किस बात का धन्यवाद दें इनको. यह तो इनका काम है. पैसे देते हैं इसको. इसकी औकात ही क्या है हमारे सामने ? और भी न जाने क्या क्या कारण.

(अमरीका/ कनाडा में इन्हीं के जबाब ९८% लोगों के सकारात्मक होंगे और इसका जबाब देते हुये भी अधिकतर इन प्रश्नों को उनसे पूछने का धन्यवाद दे रहे होंगे.)

चलिये, यह तो देने की बात हो गई. अगर कोई दे दे तो लेना नहीं आता. धन्यवाद का सीधा जबाब अंग्रेजी में ' यू आर वेलकम' या 'मेन्शन नॉट' से दे सकते हैं या फिर हिन्दी में इसे ही 'आपका बहुत आभार', लिखित में 'साधुवाद' आदि से दिया जा सकता है. मगर मैने देखा है कि आधे से तो कोई भी जबाब देने की बजाय या तो उसे अनसुना कर देंगे या चुपचाप निकल लेंगे या फिर 'हें हें हें, कैसी बात कर रहे हैं?' या 'अरे, धन्यवाद कैसा?' या फिर 'आप भी न!! हद करते हो, भाई साहब' या 'अरे, यह तो हमारा फर्ज है, इसमें धन्यवाद कैसा.'

वही हालत अभिनन्दन और प्रशंसा की है. किसी से कह देजिये कि भाई, तुम्हारी शर्ट गजब की है. जबाब में धन्यवाद की जगह 'क्या भाई, सुबह से कोई मिला नहीं क्या?' या 'अरे कहाँ, बस ऐसी ही है.' या फिर 'अरे भाई साहब, बस काम चल जा रहा है.' या 'आप ले लो.' हद है, यार. एक धन्यवाद देने की बजाय ये सब क्या है?

इसको इस ढंग से भी देखें कि अगर चाय पिलाने का इन्तजाम करना धन्यवाद प्राप्ति की पात्रता रखता है तो चाय पिलाने का वादा करना, चाय पिलाने के लिये बुलवाना, चाय पिलवाना, हर बार चाय पिलवाना भी हर बार धन्यवाद प्राप्ति की पात्रता रखता है. अगर चाय अच्छी नहीं बनी है, तो या तो आपका प्रोत्साहन पाकर वह स्वयं बना बना कर सीख जायेगा या फिर आप उसे मार्गदर्शन दें कि कैसे बेहतर बनती है. परिणाम दोनों के ही अंत में एक अच्छी चाय बन जाने के ही होने की संभावना है.

किन्तु यदि आप चाय पीने ही न जायें या जायें भी, तो पी कर बिना कुछ कहे ही लौट जायें तो वो भी आखिर कब तक आपके आगे बीन बजाता रहेगा. हताश होकर चाय बनाना ही छोड़ देगा. कोई उधार तो ले नहीं रखी. फ्री में चाय पिला रहा है और आप है कि धन्यवाद तक नहीं कहते मगर चले हर बार आते हैं क्योंकि अभी शहर में बहुत सारी इस तरह की चाय स्थलियों की आवश्यकता है. रोज आवाज लगाते हैं कि अभी चाय पिलाने वाले कम हैं और आओ, और आओ.

कहते हैं न कि

'करत करत अभ्यास ते, जड़मत होत सुजान'

किन्तु बिन प्रोत्साहन के तो अभ्यास हो नहीं सकता. जल्द ही हौसला चुक जायेगा.

मुझे खुद गर तीन दिन तक पत्नी न कहे कि कुछ दुबले दिखने लगे हैं तो ट्रेड मिल पर जाने की इच्छा खत्म होने लगती है जबकि वजन तौलने वाली मशीन चिंघाड़ चिघांड़ कर कह रही होती है कि आपकी बीबी झूठ बोल कर सिर्फ आपको कसरत जारी रखने के प्रोत्साहित कर रही है. सालों में इकट्ठा किया वजन निकलने में भी कुछ समय दोगे कि हर तीसरे दिन दुबले होते जाओगे. मगर उसका प्रोत्साहन ही तो है जो मुझे बार बार ट्रेड मिल पर बनाये रखता है. भले ही कम न हो रहा हो मगर कम से कम बढ़ तो नहीं रहा. यह ही गनीमत है वरना अभी तक क्या हाल हो गया होता.

किसी ने मेहनत की है. भले ही आपके लिये न की हो, खुद के लिये ही की हो मगर उसकी मेहनत का जो फल आया, वो एक अच्छाई के लिये है, आप भी उसका आनन्द उठाते हैं तो दो शब्द धन्यवाद के देना क्या आपका फर्ज नहीं बनता?

बनता है न!! इसी धन्यवाद को, इसी प्रोत्साहन को, इसी अभिनन्दन को चिट्ठाकारी में 'टिप्पणी' कहते हैं और इस धन्यवाद के बदले जो 'यू आर वेलकम' बोलने का शिष्टाचार है, उसे टिप्पणी देने वाले के चिट्ठे पर जाकर 'टिप्पणी' करना बोलते हैं.

फिर शिष्टाचार निभाने में अकड़ कैसी और शर्माना कैसा?

कहीं उन ९८% की तरह आप भी तो इस बात से नहीं डर रहे कि इससे आपकी औकात कमतर आँक ली जायेगी?

बात मानो इससे आपका बड़प्पन ही साबित होगा और औकात में इजाफा. बाकी तो आप खुद ही समझदार हैं.


programmer

चलते चलते:

इस आलेख की वजह बनी अभी अभी ताजा चली टिप्पणी महत्ता पर वेचारिक आँधी. अगर बहुत गहरा उतरने की चाह हो तो यह सारे लिंक एक जगह उपलब्द्ध करा रहा हूँ. कुछ राजीव जी के ब्लॉग से टीपे हैं बिना अनुमति :) :



राजीव टंडन के अंतरिम पर

ज्ञान दत्त जी मानसिक हलचल पर

शास्त्री जे सी फिलिप जी के सारथी पर

टिप्पणीकार पर

संजय तिवारी जी के विस्फोट पर


कुछ पुराने जमाने की बातें:


उड़न तश्तरी पर : अपना ब्लॉग बेचो रे भाई

फुरसतिया पर: सुभाषित वचन-ब्लाग, ब्लागर, ब्लागिंग

जीतू भाई: ब्लाग पर टिप्पणी का महत्व

उड़न तश्तरी पर: पुनि पुनि बोले संत समीरा

सागर चन्द नहार जी: अपने ब्लाग की टी आर पी कैसे बढ़ायें

नोटपैड पर: तू मेरी पीठ खुजा मैं तेरी पीठ खुजाऊँ


और भी अनेकों बार इस विषय पर लिखा जा चुका है, जिनके लिंक फिर कभी. मसीजिवी और निलिमा जी भी इस विषय पर अपनी तरह से विचार रख चुके हैं.


सूचना:

यह आलेख स्वांत: सुखाय लेखन वालों के लिये सफेद पन्ना है. वे इसे न देखें. वैसे भी वो सब कुछ पनी डायरी में लिख सकते हैं या टिप्पणी वाला टैब बंद कर सकते हैं तो फिर बताना भी नहीं पड़ेगा कि स्वांत: सुखाय लिख रहे हैं. सब समझ जायेंगे.

उनके काम यह आलेख तभी आयेगा अगर वो हमारे मोहल्ले में रहने वाले शर्मा जी की तरह स्टेटमेंट दे रहे हों तो!! शर्मा जी निम्न मध्यम वर्ग से आते हैं. रोज मिलते हैं और कहते हैं कि मैं बहुत खुश हूँ. क्या करना है इतना पैसा कि चैन खो जाये? खाना वो दो रोटी ही है चाहे कितना भी पैसा आ जाये. हम तो बस अपने में खुश हैं. जितना है दो टाईम की रोटी आ जाती है, इससे ज्यादा की हा हा क्या मचाना. और मुझे तिवारी जी बता रहे थे कि वो कोई साईड बिजनेस की तलाश में हैं ताकि कुछ अलग से कमाई हो जाये.


वैसे अगर संतोष है तो संतोष में बहुत शक्ति है:

गोधन, गजधन, वाजिधन, और रतन धन खान।
जब आवे संतोष धन, सब धन धूरि समान॥ Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, जुलाई 01, 2007

हे स्वयंभू चिट्ठा साहित्यकार!!



गुगल चैट पर लाल बत्ती जला कर बैठे हैं. कुछ जरुरी काम निपटाना है साथ ही किसी से कुछ जरुरी बात करनी है तो इन्तजार भी है उनके गुगल चैट पर आने का. इसी लिये व्यस्त का बोर्ड टांग दिया है.


एकाएक सामने से मैसेज आता है, 'क्या भाई साहब, बिजी हैं?' .


अब क्या कहें? जब लाल बत्ती और उसके नीचे लिखा 'व्यस्त' कुछ नहीं कह पाया तो हमारी क्या औकात. कैसे मना करते?

कहना पड़ा, 'नहीं, कोई खास नहीं, बतायें.'

अभी लिख कर एन्टर मारा ही था, तो वहाँ तो मैसेज पहले से ही तैयार था, 'इसे देखा.' और साथ में अपनी नई ब्लॉग पोस्ट का लिंक. अभी कुछ सोचे समझें, एक स्माईली :).

कह दिये, 'अभी देखते हैं'

३ मिनट भी नहीं बीते, अभी लिंक खुलने की तैयारी में है. एक और मैसेज, 'कैसा लगा?'.

अब क्या बतायें कि कैसा लगा? पहले दिखे तो. खैर, पोस्ट खुल खुला गई. बी एस एन एल की महा कृपा का परिणाम. (खैर खुलना तो था ही जैसा की नाम से उजागर है कि बी एस एन एल-बहुत समय नहीं लगेगा-उसने अपना वादा निभा दिया) अब इतने दिन से आँख फोड़ फोड़ कर और ब्लॉगिंग में टिपियाते इतना तो अनुभव प्राप्त हो ही गया कि सरसरिया के पहचान जायें कि कविता है कि कहानी. व्यंग्य है कि यात्रा संस्मरण. विवाद होगा या नहीं. अरे, यही अनुभव तो है जो फट से टिप्पणी कर लेते हैं. और बता दूँ, यह ज्ञान बांटना संभव भी नहीं. बस, इतना बताये दे रहे हैं कि करत करत अभ्यास ते वाली कहावत याद रखो और यह भी कि कड़ी मेहनत का कोई विकल्प नहीं. आपको भी यह ज्ञान अनुभव से प्राप्त हो जायेगा. यह ठीक वैसा ही है जैसे कि अपने नेता घाघपंती सिखा नहीं सकते बस अनुभव की बात है, जिसका जितना लंबा अनुभव वो उतना बड़ा घाघ.

खैर, जल्दी से सरसरिया दिये. देखा कविता है और वो भी प्रेम गीत टाईप, कह दिये कि 'बड़ी अनूठी कविता कही है. शब्द चित्र बहुत पसंद आया. दिल की गहराई से भाव उकेरे हैं, खास कर यह लाईन और चार लाईन उसी में से कट पेस्ट कर दी' .

वे बोले, 'यह वहीं टिप्पणी में कहिये.'.

लो, कर लो बात, तुम कह रहे हो चैट में. सामने बैठे टाईप में ही हो. सामने के सामने तारीफ कर रहे हैं. तारीफ और दाद चाहिये कि टिप्पणियों की संख्या? समझ नहीं आ पाया.

अब वो तो टिप्पणी का कह कर गायब हो गये. कहीं और कटिया फंसा रहे होंगे. एक जन से उनका काम थोड़ी चलेगा और हम लगे हैं, उनके ब्लॉग पर टिप्पणी करने में. टाईप करो. वो रंग बिरंगे टेढ़े मेढ़े अक्षर भरो वेरिफिकेशन वाले. अपना नाम, पासवर्ड और झुंझलाहट में अक्षर गलत भरा गये तो फिर भरो. खैर, एक लोभ सा रहता है कि कल को हम भी कुछ लिखेंगे तो बंदा अहसान चुकायेगा. बस शायद इसी लिये बुजुर्ग कह गये हैं कि लालच अच्छी बात नहीं. मगर समझ आये जब न!! वो तो बुढ़ापे में हम भी अपने नाती पोतों को समझायेंगे, ब्लॉगिंग अच्छी बात नहीं-कौन मानेगा. हम ही कहाँ मान रहे हैं.

सब फुरसत पाकर ईमेल चेक करने बैठे तो उन्हीं का ईमेल चैट के पहले का आया हुआ था. यहाँ देखिये मेरी नई रचना और लिंक एवं अंत में स्माईली. नाश हो इन स्माईली बनाने वालों का. कोई सी भी हरकत कर लो और स्माईली के पैकिंग रैपर में लपेट कर थमा दो. अरे, पैकेजिंग का जमाना है. अब जो बुरा माने वो बेवकूफ, उसे अन्तर्जाल के तरीके नहीं मालूम. तब यह बेवकूफी कैसे जाहिर होने दें तो स्माईली लगी बात का बुरा नहीं मानते.

यहाँ से छूटे तो नारद पर पहुँचे, वहाँ भी सबसे उपर वो ही चमक रहे हैं उसी पोस्ट के साथ. भईये, नारद का काम ही यही है. थोड़ा तो धीरज धरो. हम तो खुद ही बिना नारद की पूजा अर्चना के खाना नहीं खाते, नहाते नहीं, सोते नहीं, जागते नहीं...देख ही लेंगे. बस कुछ मिनटों का फरक पड़ सकता है. हम नारद के थ्रू आयेंगे, तब भी टिपियायेंगे और शायद वाकई पढ़कर बेहतरीन टिप्पणी कर जायें कभी कभी पढ़कर भी तो करते हैं टिप्पणी :)) न विश्वास हो तो मसीजिवी से पूछ लो, उन्होंने अभी रिसेन्टली देखा था एक जगह. :)

नारद पर नहीं भी आते हो तो हिन्दी ब्लॉग भी देखते हैं, चिट्ठा चर्चा भी पढ़ते हैं और अब तो चिट्ठाजगत डॉट इन भी. बहुत अच्छा या बहुत बूरा लिखोगे तो सारथी पर भी दिख सकते हो.कहीं न कहीं तो तुम दिख ही जाओगे और तुम्हारे जैसा मुखर व्यक्तित्व नहीं दिखेगा तो फिर कौन दिखेगा??

तो हे स्वयंभू चिट्ठा साहित्यकार, तुम्हारी पोस्ट का अस्तित्व कोई लोकशाही में उपस्थित ईमानदारी सा तो है नहीं, जो लाख ढूंढने पर भी न मिले. वो तो बेईमानी की तरह सर्वव्यापी एवं स्व-उजागर है, जिसे चाह कर भी अनदेखा नहीं किया जा सकता और उससे हाथ मिलाये बिना इस जगत में तो गुजारा संभव भी नहीं. हमें भी गुजारा करना है, जरुर हाथ मिलायेंगे.जरुर टिपियायेंगे फिर काहे अधीर हुये जा रहे हो. तनिक ठहरो, हम चाहें भी तो बचकर नहीं जा सकते. बस निवेदन और विनती है कि भईया, जरा सा धैर्य रख लो. कुछ हमारी भी जरुरते हैं-खाना खाते हैं, नहाते हैं, सोते हैं-थोड़ा तो स्पेस दे दो फिर नौकरी भी करनी है. वैसे, फिर भी चाहो, तो दरवाजा तो हमेशा खुला है, खटखटा देना भले ही व्यस्त का बोर्ड लगा हो, लाल बत्ती जल रही हो: हम तो हाजिर हैं ही, लालची जो हैं. लाल बत्ती, बोर्ड आदि तुम्हारे लिये नहीं हैं वो आम जन के लिये हैं और तुम आम तो हो नहीं, तुम तो हो-स्वयंभू चिट्ठा साहित्यकार. नमन करता हूँ तुम्हें!!! स्विकारो.

धीरे धीरे बस समझा रहे, धीरज धर लो भाई
खुद अपने को आजतक, बात समझ न आई
ललचाये से टिपिया रहे, हम तो हैं दिन रात
टिप्पणी की बस चाह में,आह निकल न पाई.

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गुरुवार, जून 21, 2007

कहत समीरानन्द स्वामी जी...

आज स्वामी समीरानन्द द्वारा जनहित में २३ दोहे जारी किये जा रहे हैं एक सुक्ति गान के रुप में प्रस्तुत किये जा रहे हैं. नीचे प्लेयर पर क्लिक करके आप हमारी पत्नी साधना जी की आवाज में कुछ दोहे सुन भी सकते हैं. बहुत मशक्कत के बाद उनकी आवाज मिल पाई. फुरसतिया जी और राकेश भाई के निवेदन से लेकर हमारे जुड़े हाथ उनको किसी तरह तैयार कर पाये. अब तारीफ वारिफ हो जाये तो आगे और कोशिश की जयेगी.

सुनने के लिये यहाँ क्लिक करें.

कहे समीरानन्द जी, सुन लो चतुर सुजान
जो गाये यह स्तुति , हो उसका कल्याण.

गुरुवर हमको दीजिये, अब कुछ ऐसा ज्ञान
हिन्दु-मुस्लिम न बनें, बन जायें इन्सान.

वाणी ऐसी बोलिये, हर एक कर्ण सुहाये
मिलिये ऐसे प्रेम से, मन से मन मिल जाये.

मतभेदों की बात पर, बस उतना लड़िये आप
लाठी भी साबूत रहे, और मारा जाये साँप.

पीने जब भी बैठिये, बस इतना रखिये ध्यान
सब साथी हों होश में और न ही बिगड़े शाम.

नेता जी से पूछिये, जब भी हो कुछ बात
देश तुम्हारा भी यही, क्यूँ करते आघात.

पुस्तक ऐसी बाँचिये, जिससे मिलता ज्ञान
कितना भी हो पढ़ चुके, नया हमेशा जान.

लेखन लेखन सब करें, लिखे नहीं है कोय
जब लिखने की बात हो,गाली गुफ्ता होय.

उल्टी सीधी लेखनी, एक दिन का है नाम
बदनामी बस पाओगे, नहीं मिले सम्मान.

शंख बजाने जाईये, मन्दिर में श्रीमान
यह गीतों का मंच है, बंसी देती तान.

कविता में लिख डालिये, अपने मन के भाव
जो खुद को अच्छा लगे, जग के भर दे घाव.

समीरा इस संसार का, बड़ा ही अद्भूत ढंग
वैसी ही दुनिया दिखी, जैसा चश्में का रंग.

नदियों से कुछ सिखिये, इनकी राह अनेक
सागर में जब जा मिलें, हो जाती सब एक.

ऐसा कुत्ता पालिये, जो भौंके औ गुर्राये
न काटे मेहमान को, चोर न बचने पाये.

दान धरम के नाम पर, लाखों दिये लुटवाये
क्षमादान वो दान है, जो महादान कहलाये.

गल्ती से भी सीख लो, आखिर हो इन्सान
जो गल्ती को मान लें, उनका हो सम्मान.

कौन मिला है आपसे और कितना लेंगे जान
जो कुछ भी हो लिख रहे, उसी से है पहचान

सब साथी हैं आपके, कोई न तुमसे दूर
अपनापन दिखालाईये, प्यार मिले भरपूर.

जरा सा झुक कर देखिये, सुंदर सब संसार
तन करके जो चल रहे, मिलती ठोकर चार.

मौन कभी रख लिजिये, थोड़ा कम अभिमान
जितना ज्यादा सुन सको, उतना आता ज्ञान.

बुरा कभी मत सोचिये, न करिये ऐसा काम
दिल दुखता हो गैर का, किसी का हो अपमान.

साधु संत औ’ महात्मा, सब गाते हैं दिन रात
सुक्ति समीरानन्द की , जय हो उनकी नाथ.

जो स्वामी जी कह रहे, नहीं आज की बात
जीवन का यह सार है, हरदम रखना साथ.

--जोर से बोलो-जय स्वामी समीरानन्द की


यहाँ डाउनलोड करें.

कोई भक्त पॉड कास्टिंग में मदद कर दे, तो भगवान उसका भला करे. :) Indli - Hindi News, Blogs, Links

सोमवार, जून 18, 2007

सुनो नारद, अब हम बोल रहे हैं!!

अभी थोड़ी देर पहले ही कुछ चिट्ठे पढ़ रहा था. अधिकतर पर नारद विवाद वाली गहमा गहमी थी. कुछ मेरी ही तरह के लोग कहते मिल जायेंगे कि हम ऐसे चिट्ठों पर जाते ही नहीं, उन्हें पढ़ते ही नहीं. मैं उनके संयम को नमन करता हूँ और साफ शब्दों में कहना चाहता हूँ कि मैं एक आम इंसान हूँ, भारत में पला, बढ़ा-वो ही संस्कार हैं. झगड़ा देखकर आनन्द लुटने के लोभ को एक आम भारतीय की ही तरह संवरित नहीं कर पाता हूँ. बहुत मेहनती हूँ और इसीलिये अपने अथक प्रयासों से इसमें शामिल होने से अपने को रोक पाता हूँ. थक जाता हूँ अपने आपको रोकते रोकते और सो जाता हूँ और इसीलिये युद्धकाल में जरा कम ही पोस्ट ले आ पाता हूँ. इस हेतु क्षमा का प्राथी भी हूँ और इस गहन थकान के लिये दया का भी. मगर यह मेरा निजी मामला है, इसलिये चल जा रहा है.

जब चिट्ठे पढ़ें तो हमारे जैसे टिप्पणीपीर टिप्पणियाँ न पढ़ें, यह कैसे संभव है? टिप्पणियाँ पढ़ता हूँ तो पाता हूँ कि जैसे इन सदी के महानायकों ने अपना गृहकार्य पूरा नहीं किया, बस बोलना है इसलिये बोल गये और अपनी बात को वजन देने के लिये कोई पुराने का प्रकरण का उद्धरण दे गये जैसे मोदी विवाद, गुजरात विवाद, हिन्दु-मुस्लिम बहस, मुहल्ला विवाद, अमरीका-समरीका विवाद (जिसमें सागर पुनः टंकी पर चढ़े थे), बैंगाणी बंधु विवाद, नेपकीन प्रकरण आदि आदि.जब देखता हूँ तो लगता है कि अलग अलग लोगों ने, या उन्हीं लोगों ने अलग अलग जगह उसी विवाद को अलग अलग नाम से पुकारा जिससे मुझ जैसे अल्प ज्ञानियों (यह अज्ञानी को सुसंस्कृत भाषा में कहा जाता है-और भाषा का महत्व तो अब सबको ज्ञात है ही) को समझने में बड़ी असुविधा होती है. गल्ती लिखने वालों की भी नहीं है, अब जब कभी यहाँ हुये विवादों को कोई नाम ही नहीं दिया गया तो जिसके जो मन आया वो उसे उस नाम से पुकार गया. सब का भला हो जो अपनी समझ से कुछ तो बता ही जाते हैं वरना अगर कोई लिख देता कि वो उस विवाद में नारद और आप कहाँ थे जो अब चले आये? हम तो समझ ही न पाते कि वो उस क्या और अब क्या? उस का कोई रिफरेंस नहीं और अब जिस पोस्ट पर कहा उसका अभी के विवाद से कुछ लेना देना नहीं, वो तो नारद की तकनिकी समस्या को इंगीत करती पोस्ट है.

खैर, इस बात को मैने क्यूँ उठाया और यहाँ लाकर क्यूँ रोक दिया, इस पर एक बहुत ज्ञानवर्धक जानकारी देकर फिर शुरु होते हैं.

क्या आपने कभी गौर किया है कि अटलांटिक में और पेसेफिक में जो समुन्द्री तूफान आते हैं, उनके नाम जैसे रीता, कटरीना, बिल आदि कैसे रखे जाते हैं. कौन इनको नाम देता है और कैसे देता है. दरअसल, १९५३ के पहले तक इन्हें इनके लेटिट्यूड और लोन्गीटयूड से जाना जाता था, कोई नाम नहीं. मगर इससे एक आम आदमी को समझने और इस विषय में बात करने में असहूलियत होती थी. तब १९५३ में राष्ट्रीय मौसम विभाग के समुन्द्री मौसम वैज्ञानिकों ने इनके नामकरण की प्रथा शुरु की.शुरु में जैसा की पानी के जहाज को मादा श्रेणी में रखा गया है, इन तूफानों का नामकरण भी महिलाओं के नाम से ही हुआ. इसका और एक पुख्ता कारण रहा होगा कि इन तूफानों के मूड का कुछ पता नहीं- अभी चुप बैठे हैं, एकाएक भड़के तो ऐसा कि सब तहस नहस. क्या पता कब कौन सी बात और किसकी बुरी लग जाये.

अटलांटिक महासागर के तूफानों के लिये ६ लिस्टें बनाई गईं. हर साल के लिये एक-जैसे जैसे तूफान आते गये, नाम अलग होते गये. जैसे अगर रीता २००४ की लिस्ट में है और ७ वें नम्बर पर है तो २००४ में आया ७वां तूफान रीता कहलायेगा. उसके जाने के बाद अब रीता नाम का तूफान इसके सातवें साल में ही आ सकता है, क्यूँकि अगले ६ सालों की लिस्ट तैयार है. जो ६ साल बाद फिर से शुरु होती है. हर लिस्ट में २१ नाम है. ऐसा ही कुछ पैसेफिक में आये तूफानों के लिये भी इंतजाम है. अब मान लिजिये कि एक साल २१ से ज्यादा तूफान आ गये तब क्या होगा? आम धारणा के अनुरुप क्या अगले साल की लिस्ट इस्तेमाल कर लेंगे? नहीं!! इस साल की लिस्ट इस साल के लिये और अगली अगले साल के लिये. तब ऐसे में तय पाया गया कि इस दशा में नेशनल हेरिकेन सेन्टर ग्रीक गणनावली का इस्तेमाल करते हुये उन्हे अल्फा, बीटा, गामा आदि आदि नामों से पुकारेगा.

कुछ रोचक तथ्य इस विषय में और भी है जैसे १९७९ में नारी स्वतंत्रता टाईप आंदोलनकारियों के आगे धुटने टेकते हुये इसमें पुरुष नाम भी शामिल किये गये..एक महिला फिर एक पुरुष, फिर एक महिला फिर एक पुरुष. चलो, पुनः महिलाओं की जीत हुई बहुत नमन महिला शक्ति को.

दूसरा यह कि जब कोई तूफान अत्याधिक कोहराम मचा देता है और बहुत लोग मारे जाते हैं तो उसे रिटायर कर दिया जाता है यानि वो भविष्य में फिर कभी नहीं आयेगा. जैसे कि कटरीना जिसने न्यू ऑरलिन्स में ऐसा मंजर दिखाया कि उसके लिये ऐसा अप्रिय मगर जरुरी निर्णय लेना पड़ा और उसे सेवानिवृत कर दिया गया. इस बात पर कोई विवाद की सुनवाई नहीं होगी. आप इसे तानाशाही मानें तो या लोकतांत्रिक मानें तो. वो रिटायर हो गया और अब नहीं आ सकता, बस्स!! चाहे लाख हल्ला मचा कर देख लो!! :)

और इन तूफानों को नाम देने के पहले उन्हें उष्णकटिबंधीय दबाव के कारण उठे हुये तूफान होना जरुरी है, तभी उन्हें नाम दिया जा सकता है.

तब अपनी बात आगे बढ़ाता हूँ कि क्यूँ न हम भी अपने चिट्ठाजगत में उठे विवादों को एक स्तर पर पहुँच जाने के बाद नाम देना शुरु कर दें. सब को सुविधा हो जायेगी. लोग उस नाम का लेबल अपनी पोस्ट में लगा लेंगे. सर्च भी आसान हो जायेगी. टिप्पणी में रेफर करना भी सरल. अभी टाईप के विवाद को रिटायर भी कर देंगे...सब साफ सुथरा, निर्मल और सरल. गैर तानाशाही, लोकतांत्रिक.

मैं प्रस्तावित करता हूँ कि फिल्म हिरोईनों के नाम पर इनका नामकरण किया जाये. सुन रहे हो, नारद!!!

रेखा नाम दे दें क्या इस नये वाले को-रिटायर करने की सुभीता को देखते हुये. :)

आप सबके विचार आमंत्रित हैं. :) Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, मई 24, 2007

हॉट स्पॉट यानि....

हमेशा हास्य व्यंग्य वगैरह लिखते लिखते ईमेज बड़ी खराब होती जा रही है. सब समझते हैं कि हमें सिवाय ठिठोली के और कुछ आता ही नहीं. जो मिलता है बस मजाक. हमारी अपनी सोच से की गई गंभीर बातें भी मजाक में उड़ा दी जाती हैं. हमसे आधी उमर के लोग चैट पर हमसे कहते है कि और मामू, अभी भी टुन्न हो कि होश में..क्या चल रहा है? लालू की सी स्थिती हो गई है. अब रेल्वे कितना ही बढ़िया काम करे या कोई बेहतरीन योजना घोषित करे, सब एक बार को तो हंस ही देते हैं. इसीलिये आज हमने सोचा है कि बीच बीच में गंभीर चिंतन भी किया करेंगे. इसी के मद्दे नजर आज हम आपको पूरी क्लास लगा कर पढ़ायेंगे:

फुरसतिया जी आये हैं , ले कर कलम दवात
अखबारों मे वह छापते इंकब्लॉगिंग की बात.
इंक ब्लॉगिंग की बात, हस्त लेखन से होती
अरमानी के सूट पर, बाँध ली उन्होंने धोती *
कहत समीर कि सीखो इसमें लिंक लगाना
समझ तुम्हें आ जाये, तब करके दिखलाना.
-समीर लाल ‘समीर’
* अब कम्प्यूटर सामने रखा हो और आप यूनिकोड में टंकण में भी माहिर हों, फिर भी हाथ से लिखकर उसे कम्प्यूटर पर चढ़ाने में तुले हों, इसे अरमानी सूट पर धोती पहनना नहीं कहेंगे तो और तो कोई उपमा मुझे नहीं सूझती!!







उपरोक्त तस्वीर में अगर आप फुरसतिया जी के नाम पर जाकर चटका लगायेंगे तो वह आपको उनके चिट्ठे पर ले जायेगा, जहाँ उन्होने ऐरिहासिक अखबार निकाला है और यदि इंक ब्लागिंग पर चटका लगायें तो वो देबाशीष के चिट्ठे पर, जहाँ उन्होंने इंक ब्लॉगिंग से हम सबका परिचय कराया था. जब सब के पास ले जा रहा है यह चटका, तो हम कौन पाप किये हैं? हमारे नाम पर भी लगा कर देख लो. यह सब संभव होता है, हाईपर लिंक की ही तरह हॉट-स्पाट लिंक देकर. जिस तरह से आप टेकस्ट में हाईपर लिंक देते हैं, वैसे ही चित्र में अमुक स्थान पर हॉट-स्पाट लिंक. और इसे लगाने के औजार के रुप में मैं माईक्रो सॉफ्ट के फ्रंट-पेज (Microsoft Front Page) का इस्तेमाल करता हूँ, जो कि माईक्रो सॉफ्ट ऑफिस के साथ आमूमन स्थाफित रहता है. अगर आपके पास फ्रंट पेज नहीं है, तो आपका सफर यहीं खत्म कर लें. आपने यहाँ तक पढ़ा, आपका बहुत आभार और साधुवाद. अन्य औजारों से भी इसे लगाया जा सकता है, मगर हम यहाँ सिर्फ फ्रंट पेज धारकों को समझा रहे हैं, माईक्रो सॉफ्ट की चमचागिरी में कि शायद उनकी नजर पड़ जाये तो लेपटाप वगैरह कुछ ईनाम में दे दें.

क्रमवार दिशा निर्देश:

१.एक हस्त-लेख (छोटा सा-मात्र सलाह है. बाकि आपकी इच्छा, चाहो तो उपन्यास लिख लो) (ध्यान रहे उसमें उड़न तश्तरी का नाम आये, उसी का लिंक लगाना सिखाऊंगा, इस आलेख में :)) तैयार कर लो.
२.फिर उसकी तस्वीर ले लो (स्कैनर से या कैमरा से, ये आपकी इच्छा पर)
३.फिर उसे किसी फोटो वाली साईट पर चढ़ा लो (जैसे कि फ्लिकर- फ्री है न भाई) .साथ ही सरलता के लिये अपने कम्प्यूटर भी एक कॉपी सेव किये रहो. आगे काम आयेगी.
४.वहाँ से उसका लिंक नोट कर लो (और अपने पास धरे रहो, वो भी अभी आगे काम आयेगा-उस समय मांगूगा तो हे हे मत करने लगना. सम्भाल कर रखो.)
५. अब फ्रंट पेज खोल लें.
६. फिर File> New> Blank Page खोल लें.
७.इस पन्ने के Design View में Insert>Picture>From File क्लिक करके कंडिका ३ में जो कॉपी आपने अपने कम्प्यूटर में सेव की है, उसे खोल लें.
८. अब वह फोटो फ्रंट पेज में खुल जायेगी. (यह अपने आप हुआ, आपकी मेहनत कंडिका ८ का परिणाम, इस कंडिका के लिये आपका योगदान भारत के विकास में नेताओं के योगदान के सम-तुल्य माना जायेगा.)
९.अब फ्रंट पेज में View>Toolbars>Pictures पर क्लिक कर दें.
१०.इस नीचे तस्वीर की तरह की टूल बार आपको दिखने लगेगी.




११. इसमें दायें से पांचवा जो आयताकार चित्र दिख रहा है, उसे क्लिक करें.
१२. फिर माऊस को चित्र पर ले जाकर समीर (आपने शायद उड़न तश्तरी लिखा है, चलेगा, उसी को कवर कर लो) का नाम को इस आयत से कवर कर लो. जैसे ही आप माऊस रिलिज करेंगे, अपने आप हाईपर लिंक का बक्सा खुल जायेगा, वहाँ http://udantashtari.blogspot.com/2007/05/blog-post_22.html का लिंक दे दें.



१३. अब फ्रंट पेज के कोड वाले पन्ने पर जाकर फोटो का लिंक C:\\ या जो भी आपके कम्प्यूटर वाला है, को बदल कर कंडिका ४ वाला लिंक, जो हम कहे थे धरे रहो, आगे काम आयेगा, वो लगा लें.
१४. अब यहाँ से '<'Body'>' के बाद से '<'/Body'>' के पहले तक का कोड कॉपी कर लें.
१५. अब इसे ब्लॉग के पोस्ट वाले पन्ने पर पेस्ट कर दें. बस!! हो गया.
१६. अब अपनी पोस्ट पर जाकर लिंक पर क्लिक करें.

वाह, पहुँच गये उड़न तश्तरी पर. अब वहाँ कमेंट कर दें और फिर जो मर्जी सो करो. हमें क्या!!

आशा है समझ आ गया होगा. अगर नहीं आया तो पूछने में शरमाना मत. सबका बुद्धि पर समान अधिकार थोड़े ही न होता है. कोई जल्दी समझ जाता है, कोई देर से और कोई नहीं भी समझ पाता. यही सब देखकर ईश्वर के कहीं न कहीं होने की भावना बलवती हो जाती है. :) अगर कमेंट नहीं करोगे तो हम समझेंगे कि आपको समझ नहीं आ पाया और ट्रेफिक काउन्टर से हमें मालूम तो चल ही जायेगा कि आप आये थे...हा हा!!!


नोट: वैसे अब तक की हिन्दी इंक ब्लॉगिंग की सबसे बड़ी पहली पोस्ट कनाडा अमेरिका न जाओ... का सेहरा हमारे फुरसतिया जी के सिर पर जाता है. एक न एक दिन उन्हें इसके लिये पुरुस्कार से नवाजा जायेगा. वो तैयारी रखें. आज से वो ईनामी कहलाये.

अब आज की क्लास खत्म. अब चलो, थोड़े जाम-शाम हो जायें. ऐसे मास्साब फिर नहीं मिलेंगे, जो क्लास के बाद कॉकटेल पिलवायें. :) Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, जनवरी 03, 2007

संगत कीजे साधु की...

स्थान: तरकश चुनाव मैदान

शहर: अहमदाबाद

मौका: तीन सर्वश्रेष्ट उदयीमान चिट्ठाकारों का चुनाव २००६

प्रवचनकर्ता: स्वामी समीरानन्द उर्फ़ उडन तश्तरी उर्फ़ समीर लाल 'समीर' उर्फ़ समाजसेवी......

दृश्य: मैदान हिन्दी चिट्ठाकरों से खचाखच भरा हुआ है, पैर रखने तक की जगह नहीं. एक किनारे ११ स्टाल लगे हैं और सभी स्टालप्रभारी चिट्ठाकारों की आवाभगत में लगें हैं. चाय बांटीं जा रही है, समोसे खिलाये जा रहे हैं. पान और पान पराग की सामने ही व्यवस्था है तथा, स्टाल के पीछे शराब बांटी जा रही है और इनको इससे कोई मतलब नहीं कि गुजरात में शराबबंदी है, वैसे भी गुजरात में जब कोई बताये, तभी इसका एहसास होता है.

जगह जगह बैनर टंगे हैं. स्वामी जी की तस्वीर के साथ लिखा है "आप अपने मताधिकार का प्रयोग करें. उसका प्रयोग ही सही तीन सर्वश्रेष्ठ चुनने में मदद करेगा."

स्वामी समीरानन्द निर्धारित समय से मात्र ३ घंटे विलम्ब से एयरपोर्ट से सीधे, सर्किट हाउस ( वो मुन्ना भाई वाले सर्किट के घर से नहीं जो जगदीश भाई के सौजन्य से प्राप्त है, बल्कि डाक बंगले से) होते हुये अभी अभी मैदान में घुस रहे हैं, हर तरफ स्वामी जी का जयकारा लगाया जा रहा है. स्वामी जी के चेहरे पर मुस्कान और माथे पर चिंता की लकीरें और दिल मे भय व्याप्त है.

स्वामी जी ने मंच पर पुष्प सज्जित शैय्या नुमा कुर्सी पर अपनी आसनी धंसा दी है और लोग ताली बजा चुके हैं और स्वामी जी ताली के जवाब में अपना हाथ उठा कर आशिष प्रेषित कर चुके हैं. यहाँ तक का कार्यक्रम सम्पन्न हो चुका है. सभी निर्णायक मंडल के सदस्य अग्रिम पंक्ति में सोफे पर बैठे हैं और प्रायोजक संजय तरकश का साईन बोर्ड लिये मंच पर स्वामी जी आठ फुट की दूरी पर गद्दे पर अपने चेहरे पर चिर परिचीत मुस्कान चिपकाये और हाथ मे काफी का मग लिये बैठे हैं और तरकश के इंतजामअली पंकज व्यस्त दिखने के प्रयास में मैदान के चक्कर लगा रहे हैं. उनके सिर में दर्द है, इसलिये वह सफाई कर्मचारी को डांट रहे हैं.

चिट्ठाकार चुनाव को ले कर चितिंत नजर आ रहे हैं, समझ नहीं आ रहा कि बारह मे से किसे चुनें किसे छोडें. आपस में सब अपनी चिंता अंग्रेजी में व्यक्त कर रहे हैं कि वेरी कन्फ्युजिंग. स्वभाविक है, हिन्दी चिट्ठाकरों का सम्मेलन है तो अंग्रजी मे बात होना ही है.

प्रवचन शुरु होता है, स्वामी समीरानन्द बोलना शुरु करते हैं, और इस चुनाव की लंबावधी महत्ता पर भी प्रकाश डालते हुये एक घंटे का बखान करते हैं जिसमें गीता के भी काफी अंश हैं जो कि हर झगड़े झंझट मे होते हैं.

अंत में प्रश्नोत्तर काल शुरू होता है. सारे चिट्ठाकार हालाकान हैं कि इतनी लम्बी १२ लोगों की जमात, जिसमे सभी उदयीमान हैं और सभी श्रेष्ठ हैं, किसे वोट दें किसे ना दें. एकाध तो पहचान का है उसे देना ही है, बाकि?? बड़ी परेशानी है.

पहला, दुसरा, तीसरा और..अनेकों मे अंतिम मात्र एक ही प्रश्न कि किसे और कैसे चुनें?? पूरा मैदान बस एक ही कौतुहल से गुंजायमान है- किसे और कैसे?? और फिर स्वामी समीरानन्द जी की जय हो, स्वामी जी हमें ज्ञान दो!! के नारे सुनाई दे रहे हैं.

स्वामी जी ने आँख बंद कर ली है और गहन सोच में डूबे हैं और धीरे से मुस्कराते हुये आँख खोलते हैं- और पहला ब्रह्म वाक्य:

"भक्तों, आप सबका सवाल और कौतुहल जायज है. बहुत मुश्किल है इन सभी श्रेष्ठों में श्रेष्ठतम का चुनाव करना. मगर जब मानव जीवन पाया है तो यह तो करना ही होगा. इसके बिना कोई गुजारा नहीं."

सारा मैदान फिर नारों से गुँज रहा है-स्वामी समीरानन्द जी की जय हो.

शिष्य गिरिराज हाथ उठाकर सभी से चुप रहने का संकेत कर रहे हैं. स्वामी जी मंद मंद मुस्करा रहे हैं. अब मंच के पीछे परदे के उस पार का टेबल लैंप भी जल गया है जो कि स्वामी समीरानन्द के सर के चारों ओर आभामंडल का निर्माण कर रहा है.

पुनः स्वामी समीरानन्द जी ने बोलने के लिये मुद्रा बना ली है. मैदान मे सुई पटक सन्नाटा छा गया है.(हिन्दी चिट्ठाकरों के लिये-सुई पटक सन्नाटा मतलब पिन ड्राप सायलेन्स, यह वैसी ही बात है जैसे हिन्दी फिल्मों में नायक नायिकाओं को डायलॉग रोमन में लिख कर दिये जाते हैं और आपेक्षित भाव निर्देशक अंग्रेजी में समझाता है)

स्वामी समीरानन्द बोलने की मुद्रा को बदलते हुये, अपने काबिल शिष्य गिरिराज की तरफ मुड़े और इशारे में कुछ आदेश दिया. शिष्य गिरिराज ने सहमति में सिर हिलाया और स्वामी जी का आदेश का पालन अपने शिष्यों के हवाले कर दिया. अब जब तक आदेश का पालन चल रहा है, तब तक शिष्य गिरिराज स्वामी समीरानन्द जी की अन्य सभाओं का स्लाईड शो लेपटाप और प्रोजेक्टर के माध्यम से परदे पर दिखा रहे हैं. स्वामी जी आँख बंद किये धीमे धीमे मुस्करा रहे हैं.

आदेश का पालन हो चुका है. शिष्य गिरिराज ने भी स्लाईड शो बंद कर दिया है. स्वामी जी ने आँखे खोल दी हैं. मंद मंद मुस्कान के बीच बोलने की मुद्रा स्पष्ट झलक रही है. मैदान मे पुनः सुई पटक सन्नाटा छा गया है.

स्वामी जी बोले, "भक्त चिठ्ठाकारों, अब आपको जो ग्यारह परचियां अभी अभी बांटी गई हैं, उन्हें हमारा प्रसाद मानें. आपका चिंतन देख मैं खुद भी चिंतित हो गया था. अब उसी के हल स्वरुप यह पर्चियां बांटी गई हैं. इनमें ग्यारह चिट्ठाकरों की अलग अलग परची है, उन्हें पुडिया बना लें, फिर उसमें से एक खींचें, जो नाम आये, उसे कास्य कलम पर लगा दें. अब वो पुडिया फेंक दें. फिर एक और पुडिया खींचें, और उसे रजत कलम पर जड़ दे"

एकाएक भक्त चिट्ठाकरों में हलचल मच गई है. स्वामी समीरानन्द की जय हो से सारा महौल गुंजाय मान है. भक्त चिट्ठाकरों की आंखे इस दिव्य ज्ञान की प्राप्ति से नम हैं. गले रौंधे हुये हैं.

एकाएक माईक पर तरकशी आयोजक संजय अपनी मधुर आवाज में घोषणा कर रहे हैं. लगा कि कोई गीत गाया जा रहा है. मगर वो कह रहे हैं कि जरुरी सूचना है जो कि उन तक भक्त चिट्ठाकरों के हुजूम ने पहुँचाई है. संजय कॉफी का मग हाथ में लिये बोल रहे हैं, "मित्रों, अप लोगों का उत्साह देखकर मन भर आया है. अभी अभी कई भक्त चिट्ठाकरों ने मुझ तक यह सूचना पहुंचाई है कि कनाडा के चिट्ठाकार समीर लाल 'उडन तश्तरी' का नाम इन पर्चियों में नहीं है. मै स्वामी समीरानन्द जी आग्रह करता हूँ कि वो इस भूल सुधार का मार्ग सुझायें."

इतना कह संजय बैठ गये हैं. निर्णायक मंडल के सदस्य एक दूसरे का चेहरा देख रहे हैं. पंकज अभी भी मैदान का चक्कर लगा रहे हैं. उनके सर में अभी भी दर्द है इसलिये अब वो पर्ची बनाने वाले दल को डांट रहे हैं.

स्वामी समीरानन्द जी मंद मंद मुस्कराये और बोले," कोई भी गल्ती ऐसी नहीं कि उसे सुधारा न जा सके." भक्त चिट्ठाकरों के सर श्रृद्धा से झुक गये हैं, वो स्वामी समीरानन्द का जयकारा लगा रहे हैं. शिष्य गिरिराज सभी को सांकेतिक भाषा में शांत रहने को कह रहे हैं.

स्वामी समीरानन्द आगे बोले, " अब जो गल्ती हो गई, हो गई. आप रजत और कास्य कलम पर तो वोट लगा ही चुके. अब आप सारी परचियां फेंक दें, और समीर लाल को स्वर्ण कलम के लिये वोट लगा दें. यही सच्चा प्रयाश्चित होगा और आपकी जीवन नैया को चिट्ठाजगत से पार लगवायेगा."

भक्त चिट्ठाकरों के सर पुनः श्रृद्धा से झुक गये हैं, वो स्वामी समीरानन्द का पुनः जयकारा लगा रहे हैं. निर्णायक मंडल के चहेरे पर खुशी लौट आई है. वो सब एक दूसरे से हाथ मिला रहे हैं. संजय भी अति प्रसन्न मुद्रा में स्वामी जी की दिव्य वाणी से प्रभावित हो स्वामी जी की तरफ ताक रहे हैं. पंकज एक कुर्सी पर बैठ गये हैं. उनके सिर का दर्द खत्म हो गया है. शिष्य गिरिराज लेपटप और प्रोजेक्टर नारंगी चादर में लपेट कर चलने की तैयारी कर रहे हैं. सब तरफ हर्ष का महौल है.

स्वामी समीरानन्द मंद मंद मुस्करा रहे हैं. Indli - Hindi News, Blogs, Links