सोमवार, मई 21, 2007

अश्वम जेलम गच्छन्ति

हफ्ते भर पहले समाचार सुनता था:

छ्त्तीसगढ़ के किसी शहर में एक न्यायाधिश महोदय को टहलते वक्त किसी आवारा घोड़े ने काट लिया. इससे नाराज माननीय न्यायाधिश महोदय ने शहर के सभी आवारा घोड़ों को पकड़ने का आदेश दे दिया. नगर निगम के कर्मचारी भाग भाग कर घोड़ों को पकड़ने लगे. आनन फानन में इनाम भी घोषित कर दिया गया: प्रति घोड़ा पकड़वाई: रुपये ३०० मात्र. ७ घोड़े पकड़े जा कर कांजी हाऊस (नगर निगम द्वारा संचालित आवारा पशुओं की जेल) में बंद हैं.




अब यहाँ तक तो समाचार हो गया, जो कि एक सत्य समाचार है. अब आगे उड़न तश्तरी की उड़ान:

इस घटना से मेरी घोड़ों का मात्र गधों के बड़ा स्वरुप होने की सोच को और अधिक बल मिला है.

अरे, काटने के पहले देख तो लो कि किसको काट रहे हो? कोई आम आदमी को काट लेते तो वो आदमी ही हँसी का पात्र बनता. सब कहते कि अब तक उसका दुलत्ती मारना या अगली दो टांगों से धौल जमाना तो सुना था, यह घोड़ा काटना तो पहली बार सुना. भई, कुत्ता काटते तो सुना है. जरुर तुमने ही कुछ शरारत की होगी उसके मुँह के पास जाकर और उसने काट लिया होगा. वरना आजतक किसी और को तो काटा नहीं. कोई कहता कि तुम्हारा बाल देखकर तुम्हें घास का मैदान समझ लिया होगा और बस चरने घुस गया होगा. इसीलिये कहते हैं कि टहलने निकलो तब भी बाल वाल संवार लो जैसे पार्टी वगैरह में जाते हो. टहलने तो सुबह सुबह ऐसे निकलते हो कि मानो अभी भी बिस्तर में ही डले हो. ऐसी बातें करते लोग.

अब दिमाग तो है नहीं, आखिर ठहरे तुम गधे का बड़ा स्वरुप. आव देखा न ताव और इतने बड़े आदमी को काट लिया. तो बंद तो होना ही था. गल्ती तुम्हारी और सारी कौम बदनाम हुई. सब बंद हो गये बेचारे वो भी ईनामी घोषित होकर. हल्का फुल्का अपराधी तो फिर भी चुपचाप जेल होकर लौट आता है, किसी को पता नहीं चलता और आकर फिर भीड़ में शामिल होकर आम सा नजर आने लगता है. मगर ईनामी-बाबा रे बाबा!! आओ अब निकल कर. देखना मिडिया कितना उछालता है. सबकी टीमें पहुँच गई है वहीं कांजी हाऊस के दरवाजे पर बैठी हैं. अब देना जबाब. एक से एक तुमसे भी बड़ी बड़ी बेवकूफी की बातें पूछेंगे. जबाब दे देकर तुम थक जाओगे घोड़ा होना के बावजूद भी, जनता सो जायेगी मगर वो पूछने से नहीं थकेंगे. सारे देश के घोड़े कुख्यात हो जायेंगे सिर्फ तुम्हारी एक बेवकूफी से. खैर, अब जो होगा सो झेलना. बस शुभकामना यही है कि सही सलामत लौट आओ. कहीं एन्काऊन्टर न हो जाये, बहुत फैशन में है. यही चिन्ता खाये जाती है.

वैसे, काश सभी रक्षक ऐसे होते तो दुनिया कितनी खुशनुमा जगह होती. एक गुंडा कुछ हरकत करता. आदेश आता कि सारे गुंडों को बंद कर दो. सब गुंडे एक दुसरे की गुंडागिरी रोकते नजर आते कि कहीं उसके चक्कर में वो भी न बंद हो जाये. वही हाल चोरों, हत्यारों का होता. और सबसे बढ़िया तो नेताओं का होता. सब एक ही जगह मिल भी जाते पकड़ने के लिये. एक को आजीवन होती, पूरी कौम अंदर, हमेशा के लिये. बड़ा आराम लगा सोच कर ही.

फिर सोचता हूँ कि अगर यह सरकारी ३०० रुपये प्रति घोड़ा पकड़वाई स्किम रामचन्द्र जी के जमाने में आ गयी होती तो लव कुश अश्वमेघ यज्ञ वाला घोड़ा पकड़वा कर एक टाईम तो कंद मूल से निजात पाकर पिज्जा वगैरह खा ही लेते. कितने खुश होते बेचारे बच्चे. लेकिन सरकारी स्किमों से कब किसी जरुरतमंद का लाभ हुआ है सो उनका भी नहीं हुआ. कोई आश्चर्य नहीं.

एक विचार और आता है कि अगर ये कांजी हाऊस नगर निगम की जगह पुलिस विभाग के तहत आता होता तो ७ की जगह कम से कम १०३ घोड़े पकड़ में आते. ७ तो यही वाले. ३ रज्जन मियाँ के टांगे वाले घोड़े, उन्हें भी यह उसके घर से धमका के ले आये होते. घर में बंधे थे बेचारे मगर यह उनको आवारा घूमता दर्शाते. वही हाल होता मश्ताक भाई की २ शादियों वाली घोड़ियों का. मश्ताक भाईजान जिद्द करते तो वो भी एक अलग केस में धारा १५१ के तहत बंद पाये जाते. बाकि के ९१ में ईंट भट्टे के ५४ और धोबी घाट के ३३ गधे और बेंदू किसान के ४ खच्चर. यह गधे और खच्चर भी डंडे की भाषा समझते हैं और वो भी पुलिसिया डंडे-बड़े आराम से कहते कि हम घोड़े है. आप भी कहाँ सोच में पड़ गये कि लोग पहचान लेंगे. कोई नहीं पहचान पायेगा. सब बंधकों के ३०० रुपये के हिसाब से बने ३०९००. इसका हिस्सा बांट लगेगा. क्या अब भी आप सोचते हो कि कोई पहचान पायेगा. हवलदार साहब का तो इसमें जो हिस्सा बनेगा सो तो है ही और उपर से बोनस में मश्ताक भाई को छोड़ने के २००० और. वाह भई वाह!!!




उपरोक्त आंकड़ों का प्रतिशत आप किसी भी कारागृह के कार्यालय से पुष्टीकरण करवाने के लिये स्वतंत्र हैं. बहुत अंतर नहीं मिलेगा. Indli - Hindi News, Blogs, Links

27 टिप्‍पणियां:

मैथिली ने कहा…

बहुत बहुत अच्छा लिख है समीर लाल जी;

राकेश खंडेलवाल ने कहा…

बहुत खूब. इससे ज्यादा कहने के लिये सोचना पड़ेगा और सोचने में तकलीफ़ होती है

अभिनव ने कहा…

वाह वाह, सही है।

बेनामी ने कहा…

Satik baat karna aapki kalaa hai...bahut sidhi baat..badgai.


-khalid

आलोक पुराणिक ने कहा…

आप क्यों चिंतित हैं, टेंशन घोड़ों को है। जज साहब कोई गदहों से नाराज थोड़े ही हुए हैं।
आलोक पुराणिक

mahashakti ने कहा…

मस्‍त लिखा है।

आज कल ब्‍लागिग मे पशु प्रेम कुछ ज्यादा ही चर्राया हुआ है।

परमजीत बाली ने कहा…

भाई,आप जब लिखते हैं तो बस कुछ अछुता ही लिखते है।लेकिन मेरे मन मे विचार आया है कि घोड़ो को क्या कोई वकील नही मिला। उन्हें केस लड़ना चाहिए था।

Mired Mirage ने कहा…

बहुत बढ़िया ! हमें तो इन घोड़ों व गधों से बहुत सहानुभूति है । मुझे लगता है इनकी मुक्ति के लिए एक आन्दोलन चलाना चाहिये ।
घुघूती बासूती

yogesh samdarshi ने कहा…

समीर जी विषय को बखूबी संभाला, बात बात में व्यंग्य किया. उत्तम लेखन के लिये बधाई स्वीकार करें

sunita (shanoo) ने कहा…

समीर लाल जी, मुझे लगता है कहिं कुछ गड़बड़ है घोड़ा तो शाकाहारी होता है,वो माँस नही खाता। कही एसा तो नही कि जिस घोड़ी ने काटा था वो जज साहेब की पूर्व प्रेमिका रही हो...आप मत घबराईये आपके गधो का कोई बाल भी बाँका नही करेगा...बस उक्त घोड़ी को जज साहेब के यहाँ भिजवा दिजिये...समस्या खतम समझिये...:)

सुनीता चोटिया(शानू)

ratna ने कहा…

I can not say anything else except-wah-wah-wah.

rachana ने कहा…

क्या बात है!!! गदहे और घोडे छाए हुए है‍..
:)

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey ने कहा…

रज्जन और मुश्ताक - बस-बस अब मुहल्ले वाले लिख डालेंगे अल्पसंख्यक पर पुलीस अत्याचार की ब्लॉग पोस्ट!

विशेष ने कहा…

कहीं एन्काऊन्टर न हो जाये, बहुत फैशन में है.

तेज दौड़ने वाले घोड़ों का एनकाउंटर करिएगा, हम जैसे गदहों को बख्‍श दीजिएगा जनाब...

बेनामी ने कहा…

डा. रमा द्विवेदी said....


समीर जी,

घोड़े और गधे पर अत्यन्त रोचक एवं हास्यपूर्ण लेख.....बहुत अच्छा लिखा है आपने...हास्य लेखन में आपको महारत हासिल है...बहुत बहुत बधाई...

डा. रमा द्विवेदी

mamta ने कहा…

वाह भाई वाह ,बहुत ख़ूब

अरुण ने कहा…

भाइ हम यहा २५०/३०० गधे/खच्चरो के बीच हू कृपया कोई ऐसा पंगा न करे,के मै यही रहा जाउ इसलिये इस मैटर पर कोई टिपियाना नही :)

उन्मुक्त ने कहा…

:-) :-)

ज़ाकिर ने कहा…

आपकी उडान काबिले तारीफ है। इसी बहने घोडों गधों के दिन बहुरे।अगर कभी उनकी सरकार बनी, तो आपके लिये पशुपालन विभाग तय है।

Dr.Bhawna ने कहा…

आज़ तो गधे और घोड़े भी भी जय जयकार कर रहे होंगे उस घोड़े की जिसकी वज़ह से आज़ इतने बड़े साहित्यकार की लेखनी का विषय वो सब गधे और घोड़े परिवार बने।
मन ही मन शाबासी दे रहे होंगे कि उसने काटा तो अच्छा ही किया। आखिरकार एक साहित्यकार ने ही उनकी पीड़ा को समझा।
व्यंग्य लिखने में आप बहुत माहिर हैं।समीर जी.
बहुत-बहुत बधाई - सुन्दर व्यंग्य के लिये।

Shrish ने कहा…

बेचारे घोडे़, काकेश भाई और अरुण जी कहाँ हैं जरा इनके पक्ष में आवाज बुलंद की जाए।

Pankaj Bengani ने कहा…

गधे खुद को घोडा समझकर भागने लगेंगे तो यही हाल होगा ना! बैठे बिठाए हैप्पी बड्डॆ हो जाएगा, फोगट मे.


इसलिए लालाजी अपने तो मानते है कि भाई जितनी औकात हो उतना ही पैर पसारो, ज्यादा पसारने लगे तो नसे खींच जाएगे और ऐसी ऐंठन आएगी कि फिर फायनल इलाज करना पडेगा.


घोडा भी देखो ना कुत्ता बनने चला था, लग गई ना!!

अरे भाई जिसका काम उसी को सोहे.. बदला भांजना है तो गधे बने होते या कुत्ते ही बन जाते. :)

AJAY ने कहा…

HA
AAJ KAL KOI KAHAA KISI PASU KO DEKTHA HAI ACCHA HOWA JO GODH NE KATA WARNA KOI KAHANI KYU LIKHTA

BHUTOH KUUB

अनूप शुक्ला ने कहा…

सही है। आप भी बाड़मेर पुलिस की तरह रोज पकड़े जाने वाले घोड़ों -गधों का विवरण देना शुरू कर दें। देखिये आपकी फोटो का घोड़ा कितना होमली फ़ील कर रहा है।:)

Yatish Jain ने कहा…

accha kutharaghat hai vyavastha par, hasya par par aapka bahut accha camand hai

नीरज ने कहा…

इट हैपन्स ओनली इन छत्तीसगढ़,
शानदार पोस्ट समीर जी, विशेषकर आंकडों को पढ़कर तो हंसी के मारे बुरा हाल हो गया । वाकई जबरदस्त है ....

काकेश ने कहा…

हम आये तो पहले भी थे पर शायद टिपियाए नहीं या आपके मन का नहीं टिपियाऎ... हम आलोक पुराणिक जी से सहमत हैं...

" आप क्यों चिंतित हैं, टेंशन घोड़ों को है। जज साहब कोई गदहों से नाराज थोड़े ही हुए हैं।"