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रविवार, मार्च 20, 2016

ये जिन्दगी के ढर्रे!!

किसी का मर जाना उतना कष्टकारी नहीं होता जितना की उस मर जाने वाले के पीछे उसी घर में छूट जाना.
जितने मूँह, उतने प्रश्न, उतने जबाब और उतनी मानसिक प्रताड़ना.
सुबह सुबह देखा कि बाबू जी, जो हमेशा ६ बजे उठ कर टहलने निकल लेते है, आज ८ बज गये और अभी तक उठे ही नहीं. नौकरानी चाय बना कर उनके कमरे में देने गई तो पाया कि बाबू जी शान्त हो गये हैं. इससे आप यह मत समझने लगियेगा कि पहले बड़े अशान्त थे और भयंकर हल्ला मचाया करते थे. यह मात्र तुरंत मृत्यु को प्राप्त लोगों का सम्मानपूर्ण संबोधन है कि बाबू जी शांत हो गये और अधिक सम्मान करने का मन हो तो कह लिजिये कि बाबू जी ठंड़े हो गये.
बाबू जी मर गये, गुजर गये, नहीं रहे, मृत्यु को प्राप्त हुये, स्वर्ग सिधार गये, वैकुण्ठ लोक को प्रस्थान कर गये आदि जरा ठहर कर और संभल जाने के बाद के संबोधन हैं.

बाबू जी शांत हो गये और अब आप बचे हैं तो आप बोलिये. रिश्तेदारों को फोन कर कर के. आप बताओगे तो वो प्रश्न भी करेंगे. जिज्ञासु भारतीय हैं अतः सुन कर मात्र शोक प्रकट करने से तो रहे.
जैसे ही आप बताओगे वैसे ही वो पूछेंगे- अरे!! कब गुजरे? कैसे? अभी पिछले हफ्ते ही तो बात हुई थी... तबीयत खराब थी क्या?
तब आप खुलासा करोगे कि नहीं, तबीयत तो ठीक ही थी. कल रात सबके साथ खाना खाया. टी वी देखा. हाँ, थोड़ा गैस की शिकायत थी इधर कुछ दिनों से तो सोने के पहले अजवाईन फांक लेते थे, बस!! और आज सुबह देखा तो बस...(सुबुक सुबुक..)!!
वो पूछेंगे- डॉक्टर को नहीं दिखाया था क्या?
अब आप सोचोगे कि क्या दिखाते कि गैस की समस्या है? वो भी तब जब कि एक फक्की अजवाईन खाकर इत्मिनान से बंदा सोता आ रहा है महिनों से.
आप को चुप देख वो आगे बोलेंगे कि तुम लोगों को बुजुर्गों के प्रति लापरवाही नहीं बरतना चाहिये. उन्होंने कह दिया कि गैस है और तुमने मान लिया? हद है!! हार्ट अटैक के हर पेशेंट को यहीं लगता है कि गैस है. तुम से ऐसी नासमझी की उम्मीद न थी. बताओ, बाबूजी असमय गुजर गये बस तुम्हारी एक लापरवाही से. खैर, अभी टिकिट बुक कराते है और कल तक पहुँचेंगे. इन्तजार करना.
ये लो- ये तो एक प्रकार से उनकी मौत की जिम्मेदारी आप पर मढ दी गई और आप सोच रहे हो कि  असमय मौत- बाबू जी की- ९२ वर्ष की अवस्था में? तो समय पर कब होती- आपके जाने के बाद?
अब खास रिश्तेदारों का इन्तजार अतः अंतिम संस्कार कल. आज ड्राईंगरुम का सारा सामान बाहर और बीच ड्राईंगरुम में बड़े से टीन के डब्बे में बरफ के उपर लेटा सफेद चादर में लिपटा बाबू जी का पार्थिव शरीर और उनके सर के पास जलती ढेर सारी अगरबत्ती और बड़ा सा दीपक जिसके बाजू में रखी घी की शीशी- जिससे समय समय पर दीपक में घी की नियमित स्पलाई ताकि वो बुझे न!! दीपक का बुझ जाना बुरा शगुन माना जाता था भले ही बाबू जी बुझ गये हों. अब और कौन सा बुरा शगुन!!
अब आप एक किनारे जमीन पर बैठने की बिना प्रेक्टिस के बैठे हुए- आसन बदलते, घुटना दबाते, मूँह उतारे कभी फोन पर- तो कभी आने जाने वाले मित्रों, मौहल्ला वासियों और रिश्तेदारों के प्रश्न सुनते जबाब देने में लगे रहते हैं, जैसे आप आप नहीं कोई पूछताछ काउन्टर हो!!
वे आये -बाजू में बैठे और पूछने लगे एकदम आश्चर्य से- ये क्या सुन रहे हैं? मैने तो अभी अभी सुना कि बाबू जी नहीं रहे? विश्वास ही सा नहीं हो रहा.
आप सोच रहे हो कि इसमें सुनना या सुनाना क्या? वो सामने तो लेटे हैं बरफ पर. कोई गरमी से परेशान होकर तो सफेद चादर ओढ़कर बरफ पर तो लेट नहीं गये होंगे. ठीक ही सुना है तुमने कि बाबू जी नहीं रहे और जहाँ तक विश्वास न होने की बात है तो हम क्या कहें? सामने ही हैं- हिला डुला कर तसल्ली कर लो कि सच में गुजर गये हैं कि नहीं तो विश्वास स्वतः चला आयेगा.
दूसरे आये और लगे कि अरे!! क्या बात कर रहे हो – कल शाम को ही तो नमस्ते बंदगी हुई थी... यहीं बरामदे में बैठे थे...
अरे भई, मरे तो किसी समय कल रात में हैं, कल शाम को थोड़े... और मरने के पहले बरामदे में बैठना मना है क्या?
फिर अगले- भईया, कितना बड़ा संकट आन पड़ा है आप पर!! अब आप धीरज से काम लो..आप टूट जाओगे तो परिवार को कौन संभालेगा. उनका कच्चा परिवार है..सब्र से काम लो भईया...हम आपके साथ हैं.
हद है..कच्चा परिवार? बाबू जी का? हम थोड़े न गुजर गये हैं भई..कच्चा तो अब हमारा भी न कहलायेगा..फिर बाबू जी का परिवार कच्चा???..अरे, पक कर पिलपिला सा हो गया है महाराज और तुमको अभी कच्चा ही नजर आ रहा है.
यूँ ही जुमलों का सिलसिला चलता जाता है समाज में.
कल अंतिम संस्कार में भी वैसा ही कुछ भाषणों में होगा कि बाबू जी बरगद का साया थे. बाबू जी के जाने से एक युग की समाप्ति हुई. बाबू जी का जाना हमारे समाज के लिए एक अपूरणीय क्षति है आदि आदि.
और फिर परसों से वही ढर्रा जिन्दगी का......एक नये बाबू जी होंगे जो गुजरेंगे..बातें और जुमले ये ही..
यह सब सामाजिक वार्तालाप है और हम सब आदी हैं इसके.
इस देश के पालनहार भी हमारी आदतों से वाकिफ हैं. वो भी जानते हैं कि काम आते हैं वही जुमले, वही वादे और फिर उन्हीं वादों से मुकर जाना- किसी को कोई अन्तर नहीं पड़ता. हर बार बदलते हैं बस गुजरे हुए बाबू जी!!
बाकी सब वैसा का वैसा...एक नये बाबू जी के गुजर जाने के इन्तजार में..
जिन्दगी जिस ढर्रे पर चलती थी, वैसे ही चल रही है और आगे भी चलती रहेगी.
बाकी तो जब तक ये समाज है तब तक यह सब चलता रहेगा...हम तो सिर्फ बता रहे थे...
-समीर लाल ’समीर’
टोरंटो, कनाडा


चित्र साभार: गुगल


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रविवार, अगस्त 30, 2015

शहर के मुँह में भी जुबान होती है....

सुन कर अजीब सा लग सकता है मगर हर शहर के मुँह में एक जुबान होती है और उस जुबान की अपनी एक अलग ही जुबान होती है.

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आपका शहर दरअसल वो शहर होता है जो आपके बचपन से जवानी तक के सफर का और अक्सर उसके बाद तक का भी, चश्मदीद गवाह होता है या यूँ कहें कि वो शहर जिस शहर में, आपके व्यक्तित्व की मौजूदा आलीशान इमारत जिन मुख्य स्तंभों पर आधारित है, वो स्थापित हो.

भले ही वहाँ आपने जन्म न लिया हो, भले ही वहाँ आपके माता पिता सदा किराये के मकान में रहते आये हो और आप भी किराये के मकान में रहते रह गये हों..मगर बचपन से खेलते पढ़ते घूमते ब़ड़े होते होते न जाने कब वो शहर आपमें समा जाता है. उसकी सड़के, गलियाँ, बाग बगीचे सब आपके मानस पर रच बस जाते हैं.

मुझ जैसा जबलपुर शहर का प्राणी जो आज बरसों से कनाडा में आ बसा है मगर फिर भी जब कभी कनाडा के विश्व विख्यात नियाग्रा फाल्स के सामने खड़ा होता है तो उसे उसमें जबलपुर का नर्मदा नदी का धुँआधार जलप्रपात नजर आता है और मेरी पत्नी जो मिर्जापुर की है, उसे उसी नियाग्रा फाल्स में विन्ढम का झरना. एक ही वक्त में एक ही चीज दो अलग अलग प्राणियों की आँखों को दो अलग अलग आलम दे – ये सिर्फ जहन में बसे एक शहर की औकात है.

अपना शहर और अपने शहर का जहां मे बसना समझना हो तो हालात तो यूँ हैं कि श्रीवास्तव जी जो सन १९६५ में लखनऊ से कनाडा में आ बसे थे सपरिवार और फकत चार पाँच साल में भारत जाना आना होता रहा था जिनका मात्र दो या तीन हफ्तों के लिए, वो अभी जब पिछले माह एक लम्बी बीमारी के बाद गुजरे तो उनके अंतिम संस्कार के दौरान लोगों को कहते सुना कि भाई साहब का बहुत मन था कि अंतिम सांस वो लखनऊ में ही लेते मगर मन का मांगा कब पूरा होता है. तब लगा कि ये होता है अपना शहर जो मरने के बाद भी आपके नाम के साथ गुथा रहता है.

आपके शहर के मुँह में जो जुबान होती है वो जरा सा फिसली और समझो कि हुआ आपका बंटाधार. फिर भले आप शहर में हों या उसे छोड़ कर कहीं और जा बसे हों मगर वो शहर आपको छोड़ने को तैयार नहीं..वो तो आपके भीतर रच बस चुका होता है और साथ साथ चलता रहता है और फिर जो आपको उस शहर से होने की पहचान देती है, वो होती है उस शहर के मुँह में बसी जुबान की अपनी एक अलग जुबान. कुछ ज्ञानी उसे उस शहर की भाषा या महाज्ञानी उसे उस शहर की बोली भी कहते हैं.

चाहे आप अपना शहर छोड़ कर दिल्ली, बम्बई या बैंगलोर आ बसें या सात समुन्दर पार अमेरीका, कनाडा आ बसें तो भी. जब कभी बात निकलेगी तो पूछने वालों का पहला प्रश्न ही यह होगा कि आप कहाँ से हैं?

तब आप जैसे ही बताते हो कि आप जबलपुर से हैं और वो पूछने वाला भी अगर आपके शहर का ही हुआ तो अति प्रसन्न भाव से बतायेगा कि ’गजब हो गओ महाराज!! हम भी जबलईपुर से हैं’. ये जबलपुर का जबलपुर वाले का जबलपुर वाले के सामने जबलईपुर निकल जाना एकदम स्वभाविक प्रक्रिया है, इसके लिए सामने वाले को न तो कुछ सोचना होता है और न ही कोई प्रयास करना होता है. यह एकदम सहज हो जाने वाली घटना है और आप जान जाते हो कि ये तो अपने शहर का सर्टिफाईड बंदा है. ये होती है उस शहर के मुँह में होने वाली जुबान की अपनी एक अलग जुबान. उस शहर की बोली.

तब बात आगे बढ़ती है और वो पूछता है कि काये, जबलपुर में कहाँ से? और आप जैसे ही उसे अपना मोहल्ला बताते हो, हालांकि अब उस मोहल्ले में आपका कुछ भी नहीं मगर वो मोहल्ला फिर भी हमेशा आपका ही रहता है, तुरंत वो कहता है कि अरे!! वहीं तो वो शर्मा जी रहते थे स्टेट बैंक वाले जिनकी लड़की का ड्राईवर के साथ चक्कर था. ये जो एकाएक बेवजह शर्मा जी और उनकी लड़की की भद्द उतार दी गई.. वो होती है उस शहर के मुँह में रहने वाली जुबान.

ये इसी शहर के मुँह में रहने वाली जुबान की मेहरबानी है कि अच्छा अच्छा बोले तो आप अच्छे और पोल खोल दे तो आप बुरे.

वैसे सच जानो तो दर्ज तो आपके शहर की मुँह की जुबान पर आपके बारे सब कुछ है ही..इतना कुछ कि जो करम आपने उस शहर में न कर, सेफ रहने के लिहाज से किसी और शहर में किये हों उसे तक वो अपने सीने से लगाये बैठी रहती है और न जाने कब, एकाएक लपलपा के बोल दे और फिर आप देखिये कि क्या तमाशा खड़ा होता है..

कभी अपने शहर के मुँह की जुबान से, अपनी पैदाईश से लेकर घटना दर घटना मय सबूत के पूरी जन्म कुण्डली, जिसे शायद आपको खुद भी याद करने के लिए दिमाग पर जोर डालना पड़े, सुनना हो तो एक काम करियेगा..बस!! एक बार एक बड़ा चुनाव लड़ लिजियेगा किसी जानी मानी पार्टी की टिकट पर..फिर सुनियेगा..मन लगा कर कि क्या क्या गुल खिलाये थे आपने मियाँ..अपने ही शहर की मुँह की जुबान से...उसी की जुबान में..

और तब आप भी मान जायेंगे..कि

’हर शहर के मुँह में एक जुबान होती है’

बस!! डर इतना सा है कि इस बदलती दुनिया में कहीं स्मार्ट सिटी का कल्चर शहर को बेजुबान न बना दे!! मुंबई बहुत नहीं तो थोड़ा स्ट्रीट स्मार्ट तो है ही और वो इसका काफी हद तक प्रमाण भी देता रहा है अन्य शहरों की तुलना में.

चित्र साभार: गुगल

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रविवार, जून 07, 2015

परदे के उस पार!!

मंच प्रस्तुति-

नगर की एक नौटंकी मे...

चक्रवर्ती सम्राट अशोक!!

परदा गिरा और सम्राट अशोक भागा चेंज रुम की तरफ..

कपड़े बदले और लग गया लाईन में..

आज का मेहताना मिले तो खरीदे बीमार बीबी की दवा

और

बच्ची के लिए ..क्या?

सोचा और सर झटकार दिया..

न! उतना सारा पैसा थोड़ी न मिलेगा!

गुड़िया अगली बार!!

जब एक जंग और जीतेगा...

चक्रवर्ती सम्राट अशोक!!

और गिरेगा परदा...

तब!

-समीर लाल ’समीर’

 

उपरोक्त लघुकथा को ’गागर मे सागर’  लघु कथा ग्रुप के ’परदा’ विषय पर आयोजित प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ और विशेषज्ञों के आंकलन और अन्य जानकारी के लिए कृप्या नीचे दिये लिंक पर जायें:

 

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लिंक

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मंगलवार, जून 02, 2015

हम भारतीयों का डी एन ए!!

नजर की पहचान थी उससे यही कोई तीन चार बरसों की. सिर्फ दफ्तर आते जाते हुए ट्रेन में पड़ोस के डिब्बे में उसे चढ़ते उतरते देखता था और नजर मिल जाती थी. लबों के हाथ कभी इतने नहीं बढ़े कि कोई मुस्कराहट उस तक पहुँचा दें और उसके लबों के तो मानो हाथ थे ही नहीं. भाव विहीन चेहरा.

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हाँ, एक बार झुंझलाहट देखी थी उसके चेहरे पर..मगर वो भी मुझे लेकर नहीं..ट्रेन के देर से आने की वजह से. कनाडा में ट्रेन का लेट होना यदा कदा ही होता है अतः सभी चेहरे झुंझलाये से थे उस दिन तो उसका चेहरा फिर भीड़ के चेहरे सा ही दिखा. मेरा चेहरा सामान्य था बिना झुंझलाये. मैने उस दिन भी उसकी नजरों से वैसे ही नजर मिलाई थी जैसे हर रोज. उसे पक्का आश्चर्य हुआ होगा मेरा चेहरा देखकर कि मानो ट्रेन के देर से आने का मुझ पर कोई असर हुआ ही न हो.

उसे क्या पता कि ट्रेन का इस तरह, न जाने कितने दिनों बाद, ४५ मिनट देर से आना मुझे मेरे देश की यादों में वापस ले गया था..मुझे लगा कि मैं अपने शहर के स्टेशन पर खड़ा उस ट्रेन का इन्तजार कर रहा हूँ जो लेट है अनिश्चित काल के लिए. लेट आने वाली ट्रेन का इन्तजार खुशी खुशी करना और किसी भी तरह की समस्या के वक्त के साथ गुजर जाने पर विश्वास कर स्थितियों से समझौता कर लेना मेरे भारतीय होने की वजह से मेरे डी एन ए में है.

यही डी एन ए तो है जो आज तीन चार बरस बीत जाने बाद भी मुझे अपने लबों के हाथो के कद बढ़ जाने की उम्मीद हर रोज सुबह शाम रहती है..जो शायद उसके लबों पर एक मुस्कान ला दें कभी और वो मुझसे पूछे ..कैसे हो आप? और मैं उससे कह सकूँ..कि तुमने पूछा तो अब बेहतर महसूस कर रहा हूँ मैं!

ये इन्तजार अनिश्चित कालिन भी हो तो क्या और सतत बना भी रह जाये तो क्या..इन्तजार और वक्त के साथ समझौता कर लेना तो हम भारतीयों के डी एन ए में है...कर ही रहे हैं अच्छे दिनों के आने का इन्तजार!!

कुछ हर्फ मेरे उतरे ही नहीं, जीवन के कोरे पन्नों पर.

ये दुनिया वाले अजब से हैं, उसको भी गज़ल बुलाते हैं..

-समीर लाल ’समीर’

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सोमवार, मई 25, 2015

आखिर ये अच्छे दिन हैं क्या? : फील गुड फेक्टर

अच्छे दिन आने वाले है! अच्छे दिन आने वाले हैं!

वो रोज रोज सुनता तो था मगर दिन था कि वैसे ही निकलता जैसे पहले निकलता था. कई बार तो वो सुबह जल्दी जाग जाता कि कहीं अच्छे दिन आकर लौट न जायें और उसकी मुलाकात ही न हो पाये. मगर अच्छे दिन का कुछ अता पता न चला और देखते सुनते इन्तजार करते पूरा बरस निकल गया.

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थक कर उसने सोचा कि आज स्कूल में मास्साब से पूछेगा. क्या पता शायद अच्छे दिन आये हों और वो पहचान ही न पाया हो. अच्छा परखने का भी तो कोई न कोई गुर तो होता ही होगा.

मास्साब! ये अच्छा क्या होता है? ८ वीं कक्षा को वो नादान बालक अपने मास्साब से पूछ रहा है.

बेटा!! अच्छा वो होता है जो अच्छा होता है, समझे? मास्साब समझा रहे हैं.

लेकिन मास्साब, वही तो मैं भी पूछ रहा हूँ कि अच्छा होता क्या है?

मास्साब तो मास्साब!! जैसी कि मास्साब लोगों की आदत होती है वो तुरंत ही नाराज हो गये कि एक तो पढ़ाई लिखाई में तुम्हारा मन नहीं लगता उस पर से बहस करते हो. छोटी छोटी बात समझ नहीं आती. चलो, इसको ऐसे समझो कि अच्छा वो होता है जो बुरा नहीं होता है.

याने कि जो बुरा नहीं है वो अच्छा होता है. तो मास्साब, बुरा क्या होता है? बालक की बाल सुलभ जिज्ञासा तो मानो मँहगाई हो गई हो कि हर हाल में बढ़ती ही जा रही थी.

और मास्साब का गुस्सा अब और उबाल पर था मगर एक मर्यादा और एक कर्तव्य कि बच्चों की जिज्ञासा का निराकरण का जिम्मा उन पर है, उन्हें अपने असली रुप में आने से रोके हुए था. उन्हें किसी ज्ञानी का ब्रह्म वाक्य भी याद आ गया कि अगर आप किसी को कुछ समझा नहीं पा रहे हैं तो उसे कन्फ्यूज कर दिजिये. बस इसी ज्ञान के तिनके को थामे उन्होंने फिर ज्ञान वितरण के अथाह सागर में छलाँग मारी और लगे तैरने..

देखो बालक, इतनी सरल सी बात तुम्हें समझ में नहीं आ रही है..इसे ऐसे समझो कि अच्छा वो होता है जो बुरा नहीं होता और बुरा वो होता है जो अच्छा नहीं होता. समझे?

बालक मुँह बाये एक आम आदमी की मुद्रा में, बिना पलक झपकाये मास्साब को देख रहा था और मास्साब गुस्से के साथ साथ उसकी मन्द बुद्दि पर तरस खाते हुए आगे बोले..

वैसे एक बात तुमको बताऊँ कि अगर कुछ अच्छा है न..तो बताना नहीं पड़ता ..वो खुद ही समझ में आ जाता है और अगर बुरा है तो भी उसकी बुराई खुद ही उजागर हो जाती है... उदाहरण के लिए जैसे सोचो.. मिठाई...वो अच्छी होती है इसमें बताना कैसा और गोबर, वो बुरा होता है..खुद ही समझ में आ जाता है न!! अब तो तुमको पक्का समझ आ गया होगा..

मास्साब अपने समझाने की कला पर मुग्द्ध बिहारी की नायिका की आत्म मुग्द्धता के मोड में चले गये मुस्कराते हुए.

लेकिन बालक तो मानो डॉलर की कीमत हुआ हो..हाथ आने को तैयार ही नहीं..

मास्साब!! मेरे दादा जी को शुगर की बीमारी है और अम्मा कहती है कि उनके लिए मिठाई बुरी है और फिर गोबर से तो हमारा आंगन रोज लीपा जाता है..दादी कहती हैं इससे स्वच्छता का वास होता है और स्वास्थय के लिए बहुत लाभकारी होता है. हमारा परिवार तो इसे स्वच्छता अभियान का हिस्सा मानता है.

मास्साब की झुंझलाहट और गुस्से की लगाम अब लगभग छूटने की कागार पर थी मगर फिर भी..एक कोशिश और करते हुए वो बोले..देखो बच्चे, सब मौके मौके की बात है, कभी वो ही बात किसी के लिए अच्छी होती है तो वो ही बात किसी और के लिए बुरी हो जाती है..अगर तुम सब कुछ बुरा बुरा महसूस करने की ठान लो जैसा तुम दिल्ली प्रदेश की सरकार की तकरार में देख रहे हो..तो अच्छा भी बुरा ही लगेगा और इसके इतर अगर अच्छा अच्छा सा महसूस करने की आदत डाल लो तो बुराई में भी अच्छाई का वास महसूस करोगे..

बालक के मुँह में जुबान न जाने कैसे फिसल गई कि ’याने अच्छा बुरा अगर हमारे महसूस करने की कला का ही नाम है तो कोई सरकार क्या अच्छा लाने की बात करती है..और पहले के किस बुरे को बदलने की बात करती है? और...’

बालक अभी अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया था कि मास्साब के सब्र का बाँध टूट पड़ा और उसके साथ ही वो अपनी बेंत लिए टूट पड़े उस बालक पर...और कुटाई के साथ साथ एक ही प्रश्न बार बार...बोल, समझ आया कि नहीं कि और समझाऊँ?

बालक भौचक्का सा..पूर्णतः भ्रमित...बस कुटाई से बचने के लिए..कहता रहा कि मास्साब!! समझ आ गया!

तभी दूर कहीं कलेक्टरेट के मैदान से लाऊड स्पीकर पर किसी बहुत बड़े नेता की आवाज सुनाई दी:

’मितरों, एक बरस में अच्छे दिन आ गये हैं, है कि नहीं?’

समवेद स्वर गूँजे ..आ गये!!

मितरों!! बुरे दिन चले गये कि नहीं?

समवेद स्वर गूँजे ..चले गये!!

मितरों!! जो बुरा काम करते हैं मैने उनके लिए अच्छे दिन की गारंटी नहीं दी थी कभी!!

और इधर ये बालक अपनी बेंत से हुई कुटाई के दर्द को सहलाते हुए सोच रहा था कि शायद उसने मास्साब से पूछ कर बुरा काम कर दिया इसलिए उसकी अच्छे दिनों से मुलाकात नहीं हो पा रही है..

आगे से ध्यान रखेगा और अच्छा अच्छा महसूसस करेगा..

शायद उसमें ही फील गुड फेक्टर मिसिंग है!!

-समीर लाल ’समीर’

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रविवार, मई 17, 2015

देश में विकास- यू आर माई रोल मॉडल पापा!!

पापा, ये अंकल तो देश का विकास करने वाले थे फिर बार बार विदेश क्यूँ चले जाते हैं?

बेटा, वो क्या है न, कहते हैं विदेश में संभावना बसती है, उसी को तलाशने जाते हैं.

अरे, संभावना तो फ्रेन्डस कॉलोनी में रहती है. मेरे साथ पढ़ती है मेरे स्कूल में. वो तो कभी विदेश गई भी नहीं तो फिर उसे तलाशने विदेश क्यूँ जाते हैं बार बार. मेरे स्कूल में ही आकर मिल लें.

बेटा, समझने की कोशिश करो. ये वो वाली संभावना नहीं है जो तुम समझ रहे हो. ये वो वाली संभावना है जिसे सिर्फ वो समझ रहे हैं और जिसके मिल जाने पर उनके हिसाब से इस देश का विकास होगा.

याने पापा, देश के विकास के लिए, देश में बसी संभावना जिसका पता मुझे तक मालूम है वो किसी काम की नहीं और उसकी दो कौड़ी की औकात नहीं और विदेश में बसी संभावना, जिसकी तलाश में नित प्रति माह विदेश विदेश भटक रहे हैं वो विकास की लहर ला देगी.. याने जैसे हमारा योग कसरत और चाईना का योग – योगा ताई ची..सेल्फी तो बनती है ताई ची के नाम...मगर ये बात कुछ समझ नहीं आई. पापा ठीक से समझाओ न!! प्लीज!

अच्छा इसे ऐसे समझो कि अगर जिस संभावना की तलाश विदेशी धरती पर करने नित यात्रायें की जा रही हैं. नये मित्र बनाये जा रहे हैं ..ओबामा ..बराक हो जा रहे हैं और जिन्पिंग ..झाई..इन लन्गोटिया मित्रों के गप्प सटाके के दौर में...अगर उस संभावना की एक झलक भी मिल गई तो बस हर तरफ देश में विकास ही विकास नजर आयेगा और तब ये और जोर शोर से नई नई संभावनायें तलाशते और ज्यादा विदेशों में नजर आयेंगे.

मगर पापा, पता कैसे चलेगा कि विकास आ गया?

बेटा, कुछ विकास तो तुम अपने मानसिक स्तर पर देख ही रहे हो..जिन देशों के नाम तुमने सुने भी न थे..इस अंकल की यात्राओं ने और टीवी वालों की मेहरबानी ने तुमको कंठस्थ करा दिये हैं..जैसे शैशल्स, मंगोलिया आदि आदि..अभी और बहुत सारे सीखोगे हर हफ्ते एक नये देश का नाम...

बाकी सही मायने में विकास को समझने के लिए..ऐसे समझो कि जब एक सुबह तुम जागो और सुनो कि तुम्हारा शहर अब तुम्हारा वाला शहर न होकर स्मार्ट शहर हो गया है याने कि इत्ता स्मार्ट कि आत्म हत्या करने के लिए अब न तो तुम्हें खेतिहर होने की जरुरत महसूस हो, न खेत की और न खराब मौसम का इन्तजार करना पड़े और हर जगह ये कर जाने के कारण स्मार्टली खड़े नजर आयें..तो समझ लेना कि विकास ने दस्तक दे दी है....

याने जब तुम्हारी ट्रेन एक्सप्रेस, पैसेंन्जर, सुपर फास्ट से स्मार्ट होकर बुलेट हो जाये मतलब कि वो ३०० किमी प्रति घंटा की रफ्तार से दौड़ तो सकती हैं मगर उसके दौड़ने के लिए जरुरी ट्रेक अभी स्मार्ट होने के इन्तजार में हैं और उसे स्मार्ट बनाने वाली संभावना अभी तलाशी जाना बाकी है... जब बड़ी बड़ी विदेशी संभावनाओं की उत्साहित संताने मेक इन इंडिया का नारा लगाते लगाते आधारभूत जरुरतों जैसे बिजली, पानी, सड़क आदि के स्मार्ट होने के इन्तजार में ब्यूरोक्रेसी से लड़ते हुए एक किसान की तरह अच्छे दिनों के इन्तजार में किसी पेड़ से लटक कर अपनी हर योजनाओं का गला घोंट स्मार्टली वापस लौट जायें - उन्हीं संभावनाओं के पास, जहाँ से वो आई थीं- खुद को संभावनाओं के साथ पुनः तलाशे जाने के लिए. तो समझ जाना विकास आ गया है.

जब आत्म हत्या और हत्या समकक्ष हो जाये और पोस्टमार्टम का इन्तजार न करे और स्मार्ट सिस्टम पहले से उनके हो सकने का कारण बता सके...और कारण भी ऐसा जिसकी वजह से केस में आगे किसी इन्वेस्टीगेशन की जरुरत को नकारा जा सके ...तब समझ लेना विकास आ गया.

जब गांव इतने स्मार्ट विलेज और ग्रमीण इतने स्मार्ट विलेजर हो जाये कि वो इस बात को समझने लगे कि लैण्ड का स्मार्ट इस्तेमाल एग्रीकल्चर के लिए उपलब्ध कराना न होकर एक्विजिशन के लिए उपलब्ध कराना होता है...तब समझ लेना कि संभावना की तलाश का बीज विकास का फल बन कर बाजार में बिकने को तैयार है.

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पापा, मुझे तो अभी भी कुछ समझ नहीं आ रहा..भला विदेश में संभावना तलाशने से देश में किसी का विकास कैसे हो सकता है. कोई उदाहरण देकर समझाईये न!!

ओके, चलो इसे ऐसे देखो- तुम्हारे चाचा संभावनाओं की तलाश में कुछ बरस पहले सपरिवार विदेश में जा बसे थे- है न!!

और मैं देश में नौकरी करता रहा. तुम्हारे दादा जी धीरे धीरे अशक्त और बुढ़े हो गये...और तुम्हारे चाचा विदेश में संभावनाओं की तलाश के साथ व्यस्त...

बस!! मौका देखकर और तुम्हारे दादा के अशक्तता का फायदा उठाते हुये, तुम्हारे दादा की जिस जायदाद का आधा हिस्सा मुझे मिलना था वो पूरा मैने अपने नाम करा और बेच बाच कर सब अपना कर लिया...स्मार्टली! ये कहलाता है स्मार्ट विकास!!

देखा न कैसे तुम्हारे चाचा की विदेश में संभावनाओं की तलाश ने मुझे देश में ही रहते हुए दुगना विकास करा दिया..अब आया समझ में तुमको?

जी पापा, अब बिल्कुल समझ में आ गया....भईया भी कह रहा था कि बड़ा होकर वो कम्प्यूटर इंजीनियर बनेगा और विदेश जायेगा... तब तक तो आप भी बुढ़े हो जाओगे और मै भी भईया के विदेश में संभावना तलाशने की वजह से, आपके बुढ़ापे का फायदा उठाकर, आपकी जायदाद का मालिक बन कर दुगना विकसित हो जाऊँगा...

इतना ज्यादा विकसित और स्मार्ट कि आपको बिल्कुल तकलीफ न हो इसलिए नर्सिंग वाली सुविधायुक्त रिटायरमेन्ट होम में आपको स्पेशल कमरा दिलवाऊँगा ...क्यूँकि आप मेरे स्वीट और स्मार्ट पापा हो!!

लव यू पापा!!

यूँ आर माई रोल मॉडल पापा!!

-समीर लाल ’समीर’

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गुरुवार, अप्रैल 30, 2015

त्रासद मानसिकता

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अभी लम्हा पहले, जैसे ही अपने थके शरीर को कुछ आराम देने की एक ख्वाहिश लिए उसने पलंग पर लेट आँख मूँदी ही थी कि उसे लगा कि मानो कई सारी रेलगाड़ियाँ धड़धड़ाती हुई उसके मकान के नीचे से गुजरी हों...आँख खोली तो देखा पूरा मकान और उसकी हर दीवार उस धड़धड़ाहट से जैसे काँप उठी हो...न कभी सोचा होगा और न कभी अहसासा होगा इस धड़धड़ाहट को तो दहल कर काँप जाना ऐसे में एकदम लाज़मी सा है.

उसने महसूस किया अपने सीने पर आ गिरी छत की उस बीम का वजन कि इंच भर मौत से दूर...सांसे दफन होने की कगार पर..और खिड़की से आती कोहराम की आवाजें..हृदय विदारक क्रंदन के बीच...पदचापों की भागती चित्कार...जाने कौन कहाँ कैसे दफन होगा..कौन से अरमान...कौन से सपने...क्या कोई सोचता होगा इस मंजर के बीच...एक जिन्दगी की भीख मांगती मौत से फरियाद करती जुबां...चुप चुप सी घुँटी हुई आवाज...

चलते चलते एक विचार...कि इस जीवन से..जाने क्या किसने पाया होगा और जाने क्या किसने खोया होगा, कौन किस अपराध बोध तले क्या महसूस करता होगा की सोच से आगे ...आज सोच मजबूर हुई होगी...इस जीवन से...मात्र जी लेने की एक ऐसी तमन्ना लिए..और आती एक साँस...

और वो भी एक और इन्तजार में कि कैसे ले लूँ एक सांस और....

त्रासदी से गुजरती मानसिकता कभी सुकूं नहीं तलाशती...

उसकी सोच के परे की बात है सुकूँ और शांति जैसी शब्दावलि....

उसे तलाश होती है तो बस इतनी कि त्रासदी का असर कुछ कम हो जाये...

दुर्गति की गति को थोड़ा विराम मिल जाये..और वो जी सके एक और पल..चाहे जैसा भी पल..

एक अगला पल..जिसका उसे न अंदाज है और न ही कोई अरमान कि कैसा गुजरेगा वो पल..

मगर वो पल आये बस इतनी सी चाह...चाह कहें कि एक मात्र बचा विकल्प..

सुकूँ और शांति से भरे बेहतर पलों को जीने की चाह सिर्फ बेहतर पलों में जीते लोगों का शगल है ..

वरना तो किसी तरह जी पायें..बस इतना सा है सारा आसमान..कहने को मुठ्ठी भर आसमान...

मगर सोचें तो चिड़िया की चोंच में सिमटा सारा जहां..न जाने कितनों का..

उस जहां में जहाँ अब इन्सानों के नाम बदले है नम्बरों में..मृतक क्रमांक ७७८... मृतक क्रमांक ९७१ ..मजहब ..न मालूम..और सरकारी इन्तजाम...सब एक साथ जले और राख हो गये!!

सड़कों पर सबके लिए एक सा कैंडिल लाईट विज़ल..एक से फूल..एक से आँसूं..और एक सी राजनीति..

कुछ गहरे उतर कर सोचो तो...

एक दौड़ क्यूँ..

अगर ठौर ये..

फिर कहर क्यूँ?

-रुको, सोचो...

कुछ पल को जी लो जरा!!

-समीर लाल ’समीर’

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रविवार, मार्च 01, 2015

अदृश्य दृश्य

दफ्तर आते जाते अक्सर ही ट्रेन की उपरी मंजिल में बैठ जाता हूं. घोषित ’शांत क्षेत्र’ है अर्थात आपसी बातचीत, फोन आदि की अनुमति नहीं है. अक्सर मरघट की सी शांति की बात याद आती है इस जगह. मगर जब आप किसी से बात नहीं कर रहे होते तो मन के भीतर ही भीतर कितनी सारी बातचीत कर रहे होते हैं यह देखने वाले जान ही नहीं सकते. ऐसी बातें जो यूँ तो शायद ही कर पायें कभी मगर दोनों पात्र खुद ही के भीतर आपस में प्रश्न उत्तर करते, झगड़ते, विवाद करते, जबाब माँगते, उलझन सुलझाते, हँसते और जाने क्या क्या और एकाएक आप खुद को डपट देते हैं कि ये क्या पागलपन है, खुद ही उलझे हो अपने भीतर ही भीतर बातचीत में खुद को भ्रमित करते उसी स्वनिर्मित भ्रम की दुनिया में जो तुमने खुद ही गढ़ ली है बिना कुछ देखे, बिना कुछ जाने.

खुद की झिड़की सुन सकपकाया सा देखने लगता हूँ खिड़की से बाहर. भागती इमारतें, पेड़, सड़के और ठहरा हुआ मैं. भागती ट्रेन के भीतर बैठे यही अहसास कि सब कुछ भाग रहा है और थिर हूँ मैं और थमा हुआ है वक्त मेरा कि एकाएक नजरों की सामने से भागती इमारतें, पेड़ सब बदल जाते हैं कुछ चेहरों में, कुछ ऐसे स्थानों में जो यादों में कहीं दफन हैं और फिर बातचीत का सिलसिला शुरु- वही प्रश्न उत्तर, वही झगड़े, वही विवाद, वही उलझाव सुलझाव, हँसी ठहाके, क्रुदन, खुशबू का अहसास, साथ गुजारे पल और फिर वही खुद को खुद की झिड़की. चेहरे के बदलते भाव और फिर वही खिड़की के बाहर दिखते बदलते अदृश्य दृश्य.

कोई भीड़ में तन्हा और कोई अकेला ही भीड़..समय वही..वक्त का तकाजा जुदा जुदा..

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डंडी से ढोल पीटता बाप

और दो बाँसों के बीच

बँधी रस्सी पर

संभल संभल पर खुद को संभालती

डगमग डगमग करतब दिखाती

परिवार के पेट की खातिर

मैली कुचैली फ्राक में छोटी नटनी गुड़िया..

तालियाँ बजाते तमाशबीन...

याद करता हूँ नजारा

और

उतर पड़ता हूँ मन के भीतर

यादों की डोर पर

संभल संभल कर कदम जमाते

कुछ दूर चलने की नाकाम कोशिश

सुनाई देती है खुद की झिड़क

और लौट आता हूँ फिर अपनी

आज की दुनिया में..

कल फिर इन्हीं राहों से गुजरने के लिए...

-समीर लाल ’समीर’

 

चित्र साभार मित्र प्रशांत के ब्लॉग से

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