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रविवार, जून 07, 2015

परदे के उस पार!!

मंच प्रस्तुति-

नगर की एक नौटंकी मे...

चक्रवर्ती सम्राट अशोक!!

परदा गिरा और सम्राट अशोक भागा चेंज रुम की तरफ..

कपड़े बदले और लग गया लाईन में..

आज का मेहताना मिले तो खरीदे बीमार बीबी की दवा

और

बच्ची के लिए ..क्या?

सोचा और सर झटकार दिया..

न! उतना सारा पैसा थोड़ी न मिलेगा!

गुड़िया अगली बार!!

जब एक जंग और जीतेगा...

चक्रवर्ती सम्राट अशोक!!

और गिरेगा परदा...

तब!

-समीर लाल ’समीर’

 

उपरोक्त लघुकथा को ’गागर मे सागर’  लघु कथा ग्रुप के ’परदा’ विषय पर आयोजित प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ और विशेषज्ञों के आंकलन और अन्य जानकारी के लिए कृप्या नीचे दिये लिंक पर जायें:

 

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लिंक

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रविवार, मई 17, 2015

देश में विकास- यू आर माई रोल मॉडल पापा!!

पापा, ये अंकल तो देश का विकास करने वाले थे फिर बार बार विदेश क्यूँ चले जाते हैं?

बेटा, वो क्या है न, कहते हैं विदेश में संभावना बसती है, उसी को तलाशने जाते हैं.

अरे, संभावना तो फ्रेन्डस कॉलोनी में रहती है. मेरे साथ पढ़ती है मेरे स्कूल में. वो तो कभी विदेश गई भी नहीं तो फिर उसे तलाशने विदेश क्यूँ जाते हैं बार बार. मेरे स्कूल में ही आकर मिल लें.

बेटा, समझने की कोशिश करो. ये वो वाली संभावना नहीं है जो तुम समझ रहे हो. ये वो वाली संभावना है जिसे सिर्फ वो समझ रहे हैं और जिसके मिल जाने पर उनके हिसाब से इस देश का विकास होगा.

याने पापा, देश के विकास के लिए, देश में बसी संभावना जिसका पता मुझे तक मालूम है वो किसी काम की नहीं और उसकी दो कौड़ी की औकात नहीं और विदेश में बसी संभावना, जिसकी तलाश में नित प्रति माह विदेश विदेश भटक रहे हैं वो विकास की लहर ला देगी.. याने जैसे हमारा योग कसरत और चाईना का योग – योगा ताई ची..सेल्फी तो बनती है ताई ची के नाम...मगर ये बात कुछ समझ नहीं आई. पापा ठीक से समझाओ न!! प्लीज!

अच्छा इसे ऐसे समझो कि अगर जिस संभावना की तलाश विदेशी धरती पर करने नित यात्रायें की जा रही हैं. नये मित्र बनाये जा रहे हैं ..ओबामा ..बराक हो जा रहे हैं और जिन्पिंग ..झाई..इन लन्गोटिया मित्रों के गप्प सटाके के दौर में...अगर उस संभावना की एक झलक भी मिल गई तो बस हर तरफ देश में विकास ही विकास नजर आयेगा और तब ये और जोर शोर से नई नई संभावनायें तलाशते और ज्यादा विदेशों में नजर आयेंगे.

मगर पापा, पता कैसे चलेगा कि विकास आ गया?

बेटा, कुछ विकास तो तुम अपने मानसिक स्तर पर देख ही रहे हो..जिन देशों के नाम तुमने सुने भी न थे..इस अंकल की यात्राओं ने और टीवी वालों की मेहरबानी ने तुमको कंठस्थ करा दिये हैं..जैसे शैशल्स, मंगोलिया आदि आदि..अभी और बहुत सारे सीखोगे हर हफ्ते एक नये देश का नाम...

बाकी सही मायने में विकास को समझने के लिए..ऐसे समझो कि जब एक सुबह तुम जागो और सुनो कि तुम्हारा शहर अब तुम्हारा वाला शहर न होकर स्मार्ट शहर हो गया है याने कि इत्ता स्मार्ट कि आत्म हत्या करने के लिए अब न तो तुम्हें खेतिहर होने की जरुरत महसूस हो, न खेत की और न खराब मौसम का इन्तजार करना पड़े और हर जगह ये कर जाने के कारण स्मार्टली खड़े नजर आयें..तो समझ लेना कि विकास ने दस्तक दे दी है....

याने जब तुम्हारी ट्रेन एक्सप्रेस, पैसेंन्जर, सुपर फास्ट से स्मार्ट होकर बुलेट हो जाये मतलब कि वो ३०० किमी प्रति घंटा की रफ्तार से दौड़ तो सकती हैं मगर उसके दौड़ने के लिए जरुरी ट्रेक अभी स्मार्ट होने के इन्तजार में हैं और उसे स्मार्ट बनाने वाली संभावना अभी तलाशी जाना बाकी है... जब बड़ी बड़ी विदेशी संभावनाओं की उत्साहित संताने मेक इन इंडिया का नारा लगाते लगाते आधारभूत जरुरतों जैसे बिजली, पानी, सड़क आदि के स्मार्ट होने के इन्तजार में ब्यूरोक्रेसी से लड़ते हुए एक किसान की तरह अच्छे दिनों के इन्तजार में किसी पेड़ से लटक कर अपनी हर योजनाओं का गला घोंट स्मार्टली वापस लौट जायें - उन्हीं संभावनाओं के पास, जहाँ से वो आई थीं- खुद को संभावनाओं के साथ पुनः तलाशे जाने के लिए. तो समझ जाना विकास आ गया है.

जब आत्म हत्या और हत्या समकक्ष हो जाये और पोस्टमार्टम का इन्तजार न करे और स्मार्ट सिस्टम पहले से उनके हो सकने का कारण बता सके...और कारण भी ऐसा जिसकी वजह से केस में आगे किसी इन्वेस्टीगेशन की जरुरत को नकारा जा सके ...तब समझ लेना विकास आ गया.

जब गांव इतने स्मार्ट विलेज और ग्रमीण इतने स्मार्ट विलेजर हो जाये कि वो इस बात को समझने लगे कि लैण्ड का स्मार्ट इस्तेमाल एग्रीकल्चर के लिए उपलब्ध कराना न होकर एक्विजिशन के लिए उपलब्ध कराना होता है...तब समझ लेना कि संभावना की तलाश का बीज विकास का फल बन कर बाजार में बिकने को तैयार है.

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पापा, मुझे तो अभी भी कुछ समझ नहीं आ रहा..भला विदेश में संभावना तलाशने से देश में किसी का विकास कैसे हो सकता है. कोई उदाहरण देकर समझाईये न!!

ओके, चलो इसे ऐसे देखो- तुम्हारे चाचा संभावनाओं की तलाश में कुछ बरस पहले सपरिवार विदेश में जा बसे थे- है न!!

और मैं देश में नौकरी करता रहा. तुम्हारे दादा जी धीरे धीरे अशक्त और बुढ़े हो गये...और तुम्हारे चाचा विदेश में संभावनाओं की तलाश के साथ व्यस्त...

बस!! मौका देखकर और तुम्हारे दादा के अशक्तता का फायदा उठाते हुये, तुम्हारे दादा की जिस जायदाद का आधा हिस्सा मुझे मिलना था वो पूरा मैने अपने नाम करा और बेच बाच कर सब अपना कर लिया...स्मार्टली! ये कहलाता है स्मार्ट विकास!!

देखा न कैसे तुम्हारे चाचा की विदेश में संभावनाओं की तलाश ने मुझे देश में ही रहते हुए दुगना विकास करा दिया..अब आया समझ में तुमको?

जी पापा, अब बिल्कुल समझ में आ गया....भईया भी कह रहा था कि बड़ा होकर वो कम्प्यूटर इंजीनियर बनेगा और विदेश जायेगा... तब तक तो आप भी बुढ़े हो जाओगे और मै भी भईया के विदेश में संभावना तलाशने की वजह से, आपके बुढ़ापे का फायदा उठाकर, आपकी जायदाद का मालिक बन कर दुगना विकसित हो जाऊँगा...

इतना ज्यादा विकसित और स्मार्ट कि आपको बिल्कुल तकलीफ न हो इसलिए नर्सिंग वाली सुविधायुक्त रिटायरमेन्ट होम में आपको स्पेशल कमरा दिलवाऊँगा ...क्यूँकि आप मेरे स्वीट और स्मार्ट पापा हो!!

लव यू पापा!!

यूँ आर माई रोल मॉडल पापा!!

-समीर लाल ’समीर’

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रविवार, मार्च 01, 2015

अदृश्य दृश्य

दफ्तर आते जाते अक्सर ही ट्रेन की उपरी मंजिल में बैठ जाता हूं. घोषित ’शांत क्षेत्र’ है अर्थात आपसी बातचीत, फोन आदि की अनुमति नहीं है. अक्सर मरघट की सी शांति की बात याद आती है इस जगह. मगर जब आप किसी से बात नहीं कर रहे होते तो मन के भीतर ही भीतर कितनी सारी बातचीत कर रहे होते हैं यह देखने वाले जान ही नहीं सकते. ऐसी बातें जो यूँ तो शायद ही कर पायें कभी मगर दोनों पात्र खुद ही के भीतर आपस में प्रश्न उत्तर करते, झगड़ते, विवाद करते, जबाब माँगते, उलझन सुलझाते, हँसते और जाने क्या क्या और एकाएक आप खुद को डपट देते हैं कि ये क्या पागलपन है, खुद ही उलझे हो अपने भीतर ही भीतर बातचीत में खुद को भ्रमित करते उसी स्वनिर्मित भ्रम की दुनिया में जो तुमने खुद ही गढ़ ली है बिना कुछ देखे, बिना कुछ जाने.

खुद की झिड़की सुन सकपकाया सा देखने लगता हूँ खिड़की से बाहर. भागती इमारतें, पेड़, सड़के और ठहरा हुआ मैं. भागती ट्रेन के भीतर बैठे यही अहसास कि सब कुछ भाग रहा है और थिर हूँ मैं और थमा हुआ है वक्त मेरा कि एकाएक नजरों की सामने से भागती इमारतें, पेड़ सब बदल जाते हैं कुछ चेहरों में, कुछ ऐसे स्थानों में जो यादों में कहीं दफन हैं और फिर बातचीत का सिलसिला शुरु- वही प्रश्न उत्तर, वही झगड़े, वही विवाद, वही उलझाव सुलझाव, हँसी ठहाके, क्रुदन, खुशबू का अहसास, साथ गुजारे पल और फिर वही खुद को खुद की झिड़की. चेहरे के बदलते भाव और फिर वही खिड़की के बाहर दिखते बदलते अदृश्य दृश्य.

कोई भीड़ में तन्हा और कोई अकेला ही भीड़..समय वही..वक्त का तकाजा जुदा जुदा..

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डंडी से ढोल पीटता बाप

और दो बाँसों के बीच

बँधी रस्सी पर

संभल संभल पर खुद को संभालती

डगमग डगमग करतब दिखाती

परिवार के पेट की खातिर

मैली कुचैली फ्राक में छोटी नटनी गुड़िया..

तालियाँ बजाते तमाशबीन...

याद करता हूँ नजारा

और

उतर पड़ता हूँ मन के भीतर

यादों की डोर पर

संभल संभल कर कदम जमाते

कुछ दूर चलने की नाकाम कोशिश

सुनाई देती है खुद की झिड़क

और लौट आता हूँ फिर अपनी

आज की दुनिया में..

कल फिर इन्हीं राहों से गुजरने के लिए...

-समीर लाल ’समीर’

 

चित्र साभार मित्र प्रशांत के ब्लॉग से

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रविवार, अगस्त 18, 2013

पूर्ण विराम: एक कहानी

सुनिये मेरी कहानी- मेरी आवाज़!!

मेरी कहानी: मेरी आवाज़!!

मुझे नहीं, वो मेरी लेखनी पसंद करती है.

मुझसे तो वो कभी मिली भी नहीं और न ही कोई वजह है कभी मिलने की? मगर एक अजब सा रिश्ता कायम हो गया है आसमानी सा.

जानता हूँ, कुछ रिश्ते उस ओस की बूँद से होते हैं जो हकीकत की तपती धरती को छूते ही अपना वज़ूद खो देते हैं. बस, मैं इन अहसासों के रिश्ते को जिन्दा रखना है तो उन्हें आसमानी ही रहना होगा.

जितना भी मुझे वो जानती है, वो मेरे लेखन से.

हाँ, कुछ पत्रों के माध्यम से हुई बातचीत भी जरिया बनी -एक दूसरे के बारे में कुछ और जान लेने का.

मगर जाने क्यूँ- उसे लगता है कि वो मुझे जानती है सदियों से. एक अधिकार से अपनी बात कहती है.

मेरी लेखनी से गुजर कर पूछती कि तुम कौन से स्कूल से पढ़े हो, जहाँ पूर्ण विराम लगाना नहीं सिखाया जाता? तुम्हारे किसी भी वाक्य का अंत पूर्ण विराम से क्यूँ नहीं होता ’।’ ..

हमेशा कुछ बिन्दियों की लड़ी लगा कर वाक्य समाप्त करते हो. वाक्य पूरा जाने के बावजूद भी इन्हीं बिन्दियों की वजह से लगता है कि जैसे अभी बहुत कुछ... और भी कहना चाहते थे मगर कह नहीं पाये.. बिल्कुल उन अनेकों जिन्दगियों की तरह जो अपने आप में पूरी होकर भी.. न जाने क्यूँ अधूरी अधूरी सी लगती हैं.

खैर, यह बात तो उसने... शायद मेरी गलती की तरफ... मेरा ध्यान आकर्षित करने के लिए कही होगी.

मगर ऐसा नहीं है कि मैं पूर्ण विराम लगाना जानता नहीं, लेकिन न जाने क्यूँ ...मुझे पूर्ण विराम लगाना पसंद नहीं. न तो अपनी जिन्दगी की किसी बात में और न ही अपनी जिन्दगी के प्रतिबिम्ब - अपने लेखन के किसी वाक्य में.

मुझे लगता है- सब कुछ निरंतर जारी है. पूर्ण विराम अभी आया नहीं है और शायद मेरी जैसी सोच वालों के लिए.. पूर्ण विराम कभी आता भी नहीं..कम से कम खुद से लगाने के लिए तो नहीं. जब लगेगा तब मैं कहाँ रहूँगा उसे जानने के लिए.

कहाँ कुछ रुकता है? कहाँ कुछ खत्म होता है?

जब हमें लगता है कि सब कुछ खत्म हो गया, तब भी कुछ तो बाकी रहता ही है.

कोई न कोई एक रास्ता..बस, जरुरत होती है उसको खोज निकालने के लिए..एक सच्ची चाहत की, एक जिन्दा उम्मीद की... और एक इमानदार कोशिश की.

कभी कहा था मैने:

इन्हीं राहों से गुज़रे हैं मगर हर बार लगता है

अभी कुछ और,अभी कुछ और ,अभी कुछ और बाक़ी है

अजब इन्सान का चेहरा है हमेशा यूँ ही दिखता है

अभी कुछ और,अभी कुछ और,अभी कुछ और बाक़ी है

मैं उसे बताता अपनी सोच और फिर मजाक करता कि अंग्रेजी माध्यम से पढ़ा हूँ, इसलिए पूर्ण विराम के लिए खड़ी पाई की जगह बिन्दी लगा देता हूँ..बिन्दी ही क्यूँ...बिन्दियों की लड़ी .....लगता कि वो खिलखिला कर हँस पड़ होगी मेरी बात सुन कर. उसे तो मैं पहले ही बता चुका था कि हिन्दी स्कूल से पढ़ा हूँ.

वो खोजती मेरी वर्तनी की त्रुटियाँ, वाक्य विन्यास की गलतियाँ और लाल रंग से उन्हें सुधार कर भेजा करती.

मैं उसे मास्टरनी बुलाता ...तब वो सहम कर पूछती कि क्या लाल रंग से सुधारना अच्छा नहीं लगता आपको?

मैं मुस्करा कर चुप रह जाता...

बातों ही बातों में अहसासता कि वो जिन्दगी को बहुत थाम कर जीती है, बिना किसी हलचल के और मैं नदी की रफ्तार सा बहता...

मुझे एक कंकड़ फेंक उस थमे तलाब में हलचल पैदा करने का क्या हक, जबकि वो कभी मेरा बहाव नहीं रोकती.

अकसर जेब में सहेज कर रखी कुछ पुरानी यादों की ढेरी से... एक कंकड़ हाथ में ले लेता..उसे उसी तालाब में फेंकने को... फिर जाने क्या सोच कर रुक जाता फेंकने से..और रम जाता..मैं अपने बहाव में.

सब को हक है अपनी तरह से जीने का...

लेकिन पूर्ण विराम...वो मुझे पसंद नहीं फिर भी...

थमे ताल के पानी में

एक कंकड़ उछाल

हलचल देख

मुस्कराता हूँ मैं...

ठहरे पानी में

यह भला कहाँ मुमकिन...

फिर भी

बहा जाता हूँ मैं!!

-समीर लाल ’समीर’

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मंगलवार, जून 18, 2013

हरे सपने...एक कहानी..मेरी आवाज़ में..

उसे भी सपने आते थे. वो भी देखती थी सपने जबकि उसे मनाही थी सपने देखने की.

माँ के पेट के भीतर ही थी तब वो खूब लात चलाती, यह सोचकर कि माँ को लगेगा लड़का है. लेकिन माँ न जाने कैसे जान गई थी कि लड़की ही है. माँ ने उसे तभी हिदायत दे दी थी कि उसे सपने देखने की इजाजत नहीं है. अगर गलती से दिख भी जाये तो उनका जिक्र करने या उन्हें साकार करने की कोशिशों की तो कतई भी इजाजत नहीं. ऐसा सोचना भी एक पाप होगा.

जन्म के साथ साथ यही हिदायतें माँ लगातार दोहराती रही,  लेकिन सपनों पर आजतक किसका जोर चला है जो अब उसका चल जाता… वो देखा करती थी सपने. मगर न जाने क्यों उसके सपनों का रंग होता हमेशा हरा, गहरा हरा....सपने....हाँ..वो देखा करती... हरे सपने. जितना वो सपनों में उतरती वो उतने ही ज्यादा और ज्यादा हरे होते जाते.

समय बीतता रहा. सपने अधिक और अधिक हरे होते चले गये. स्कूल जाती तो सहेलियाँ अपने सपनों के बारे में बताती, गुलाबी और नीले सपनों की बात करतीं. मगर वो चुप ही रहती. बस, सुना करती और मन ही मन आश्चर्य करती कि उसके सपने हमेशा हरे क्यूँ होते हैं? उसे गुलाबी और नीले सपने क्यूँ नहीं आते? उसके सपने रंग बिरंगे क्यूँ नहीं होते...हमेशा..बस..हरे...एकदम गहरे हरे.... हरे सपने... सपनों के बारे में बात करने या बताने की तो उसे सख्त मनाही थी. आज से नहीं, बल्कि तब से जब वो माँ की कोख में थी.

चार बेटों वाले घर की अकेली लड़की, बहन होती तो शायद चुपके से कुछ सपने बाँट लेती उसके साथ, लेकिन वो भी नहीं. माँ से बांटने का तो प्रश्न ही न था. उसने ही तो.. सपने देखने को भी सख्ती से मना कर रखा था. क्या पता वो खुद भी कभी सपने देखती थी या नहीं..मगर बहैसयित माँ....नहीं, उसने यह इज़ाजत उसे कभी नहीं दी...कभी नहीं...तब भी नहीं..जब वो कोख में थी.

बहुत मन करता था उसका...उन हरे सपनों को जागते हुए बांटने का. उन्हें जीने का. उन्हें साकार होता देखने का. यह सब होता तो था मगर उन्हीं हरे सपनों के भीतर... एक हरे सपने के भीतर बंटता... एक और दूसरा हरा सपना. एक हरे सपने के बीच... सपने में ही सच होता.. दूसरा हरा सपना. हरे के भीतर हरा, उस हरे को और गाढ़ा कर जाता. उसे लगता कि वो एक हरे पानी की झील में डूब रही है. एकदम स्थिर झील. कोई हलचल नहीं. जिसकी सीमा रेखा तय है. साहिल तो है ....मगर उसका कोई सहारा नहीं...डूब जाना ही मानों तकदीर हो उसकी...उस हरे पानी की झील में..

कई बार कोशिश की सपनों में दूसरा रंग खोजने की. शायद कभी गुलाबी या फिर नीला रंग दिख जाये. हल्का सा ही सही. जितना खोजती, उतना ज्यादा गहराता जाता हरा रंग और तब हार कर उसने छोड़ दिया था किसी भी और रंग की अपनी तलाश को सपनों में. सपने हरे ही रहे, गहरे हरे. रंग बिरंगे सपनों के सपने उसके भीतर ही कैद रहे.... कभी जुबान तक आने की हिम्मत न जुटा पाये और न कभी वह सोच पाई उन्हें साकार होते देखने की बात को. माँ की हिदायत हमेशा याद रहती.

स्कूल खत्म हुआ. कालेज जाने लगी लेकिन सपने पूर्ववत आते रहे वैसे ही हरे रंग के और दफन होते रहे उसके भीतर...क्योंकि उन्हें मनाही थी बाहर निकलने की, किसी से भी बताये जाने की... या कोई साकार रुप लेने की.

कालेज में एक नया माहौल मिला. नये दोस्त बने. सपनों के बाहर भी एक दुनिया बनी, जो हरी नहीं थी. वह रंग बिरंगी थी. वो उड़ चली उसमें. पहली बार जाना ...कि डूब कर कैसे उड़ा जाता है.. बिना पंखों के. वो भूल गई.. कि जिसे दरवाजा खोलने तक की इजाजत न हो ...उसे बाहर निकलने की अलग से मनाही की जरुरत कहाँ. वो तो स्वतः ही समझ लेने वाली बात है. किन्तु रंगों का आकर्षण ...उसे बहा ले गया.. अपने संग... उसे उड़ा ले गया अपने संग.

फिर वह दिन भी आया ...जब तह दर तह दमित सपनों का दबाव इतना बढ़ा.. कि वो एक ज्वालामुखी के विस्फोट की शक्ल में... लावा बनकर बाहर बह निकला.. सब कुछ जलाता और उस शाम वो अपने रंगों की दुनिया में समा गई ....और भाग निकली..... अपने सपनों से बाहर उग रहे.. एक ऐसे रंग के साथ, जो हरा नहीं था.

उस शाम बस्ती में कहर बरपा. दंगा घिर आया... सुबह के साथ ही दो लाशें बिछी मिली चौराहे पर. एक उसकी खुद की... और एक उसकी जिसके साथ वह भाग निकली थी. नहीं दिखा कहीं वो हरा रंग ....और न ही गुलाबी या नीला. बस दोनों रक्त की लालिमा में सने थे....

वो निकल पड़ी अपनी लाश को छोड़... उस दुनिया में जाने के लिए, जो रंग बिरंगी है. जहाँ सभी रंग सभी के लिए हैं. एक बार पलट कर उसने देखा था अपनी लाश की तरफ.... रक्त की लालिमा में लिपटा हरा रंग.... हरे सपनों की कब्रगाह...उसका खुद का बदन...अब वह जान चुकी थी अपने हरे सपनों का रहस्य.... उसका नाम था... शबाना ...

एक नजर उसने बगल में पड़ी लाश पर भी डाली. रोहित.. अपनी लाश के भीतर अब भी... जिन्दगी तलाश रहा था.

वह मुस्कराई उसकी नादानी पर ...और चल पड़ी अपनी नई दुनिया से अपना रिश्ता जोड़ने... उसे कोई मलाल न था.

आज बहुत खुश थी वो. ...अपने हरे सपनों को.. अपने ही बदन की कब्र में दफना कर...

 

सुनिये मेरी में:

समीर लाल की आवाज में उनकी लिखी कहानी- हरे सपने
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बुधवार, फ़रवरी 27, 2013

जीत: अब लौट भी तुम आओ

एक लघु कथा - जीत:
वह सफेद कार में था...
उसने रफ्तार बढ़ा दी...नीली कार पीछे छूटी..फिर पीली वाली...
एक धुन सी सवार हुई कि सबसे जीत जाना है.
वह रफ्तार बढ़ाता गया. जाने कितनी कारें पीछे छूटती चली गईं.
कुछ देर बाद एक मोड़ पर उसकी कार और उसका शरीर क्षत विक्षत पड़ा मिला.
मृत शरीर रह गया, वो सबसे आगे निकल गया- जाने कहाँ?
ये कैसी जीत?
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एक कविता- अब लौट भी तुम आओ:
मेरी बाँसुरी की सरगम
वो भी हो गई है मद्धम
कोई जाकर उसे बता दे
कि रुठा हुआ है मौसम....
अब लौट भी तुम आओ
कि ठहरा हुआ है सावन!!
-समीर लाल ’समीर’ Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, सितंबर 13, 2012

सूक्ष्म कथायें: कौव्वी की आधी चोंच

इधर फिर कुछ झैन कथायें पढ़ने का संयोग बना. तीन लाईन की कहानी, २५ लाईन के विचार देती. जो पढ़े, वो पढ़े कम, समझे ज्यादा और फिर अलग अलग मतलब लगाये अपनी बुद्धि के अनुरुप और खुश रहे. भीषण दर्शन. बस, मन किया कि फिर से कुछ उसी तरह की कोशिश की जाये.

 

पिछली दिल्ली यात्रा के दौरान एक सरकारी भवन की खिड़की से ली गई कौव्वों की तस्वीर

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भाग-१

नीम के पेड़ की डाली पर एक कौव्वा और एक कौव्वी- कई बरसों से बसेरा करते थे.

एक रोज सुहाने मौसम से वशीभूत दोनों चोंच चोंच खेल रहे थे.

कौव्वी की चोंच खेल खेल में टूट गई.

कौव्वे ने उसे देखकर मूँह बनाया और उड़ गया.

(इति)

भाग-२

उदास तन्हा कौव्वी यहाँ वहाँ फिरती और अकेलेपन के दुख में चिल्लाती. मिथिला के एक आंगन में एक चंदन के पेड़ पर चिल्लाती कौव्वी की आवाज़ सुनकर विरहिणी कहती है कि यदि आज पिया आ गए तो मैं तुम्हारी चोंच सोने से मढ़वा दूंगी. मंत्री पिया को आना ही था सो पटना एक्स्प्रेस से सुबह सुबह आ गये. साथ नई डील में बनाये कुछ खोके भी लाये. विरहणी नें बताया कि मोबाईल नेटवर्क बंद होने के दौरान इसी कौव्वी नें तुम्हारे आने की शुभ सूचना दी थी. चूँकि वादा मंत्री जी का नहीं बल्कि उनकी पत्नी का किया हुआ था अतः वादे के अनुरुप कौव्वी की आधी वाली चोंच सोने से मढ़वा दी गई. कौव्वे के पास जब उड़ते उड़ते यह खबर पहुँची तो कौव्वा उड़ कर वापस आ गया और कौव्वी के साथ पुनः रहने लगा.

(इति)

भाग -३

सोने से मढ़ी कौव्वी की चोंच देखते हुए एकाएक कौव्वे को अपनी चतुराई वाले स्वभाव की याद हो आई. कौव्वे ने अपनी योजना कौव्वी को कान में कह सुनाई. फिर कौव्वे ने खरोंच खरोंच कर कौव्वी की चोंच से सोना निकाल लिया और पेड़ की खोह में छिपाकर नई विरहणी की तलाश में दोनों निकल पड़े. खूब उड़े और खूब उड़े. पल पल जमाना बदला नज़र आता रहा. अब न तो कोई विरहणी मिलती और न किसी अंगना चंदन का पेड़.

नये जमाने के सक्षम औरत आदमी आज अपनी ही चोंच सोने से मढ़वाये घूम रहे हैं और कौव्वा कौव्वी अचरज से उन्हें देख रहे हैं.

(इति)

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रविवार, जून 12, 2011

झैन कथाओं की चपेट में....

इधर कुछ झैन कथायें पढ़ने का संयोग बना. तीन लाईन की कहानी, २५ लाईन के विचार देती. जो पढ़े, वो पढ़े कम, समझे ज्यादा और फिर अलग अलग मतलब लगाये अपनी बुद्धि के अनुरुप और खुश रहे. भीषण दर्शन. बस, मन किया कि कुछ उसी स्टाइल में कोशिश की जाये. देखें और अगर अपने हिसाब से व्याख्या करने का मन करे तो टिप्पणी में दर्ज करें. यदि आपको पसंद आयेगी, तो और कोशिश की जायेगी आगे:

अर्धरात्रि के बाद का उनिंदा हाईवे.
पीछे बायें बाजू की लेन में हाईवे पर अधिकतम गति सीमा १०० किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चलती एक और कार.
एक ही रफ्तार होने की वजह से सम दूरी बनी हुई है दोनों के बीच.
एकाएक कुछ आलस्य, कुछ मन का भटकाव, कुछ निद्रा का भाव. मेरी रफ्तार कुछ कम होती है...और
बाजू वाली कार पूर्ववत रफ्तार में मुझसे आगे निकल जाती है.
(इति)

 

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ये 
आलस/ भटकन/उदासीनता
ये
उमंग/ लगन/ अनुशासन
ये
हार/नाकामी/विफलता
ये
जीत/कामयाबी/सफलता

उफ्फ़ !!!
-ये जीवन!!

-समीर लाल ’समीर’

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रविवार, अप्रैल 24, 2011

हरे सपने...

उसे भी सपने आते थे. वो भी देखती थी सपने जबकि उसे मनाही थी सपने देखने की.

माँ के पेट के भीतर थी तब भी वो. खूब लात चलाती थी,यह सोचकर कि माँ को लगेगा लड़का है. लेकिन माँ न जाने कैसे जान गई थी कि लड़की ही है. माँ ने उसे तभी हिदायत दे दी थी कि उसे  सपने देखने की इजाजत नहीं है. अगर गलती से दिख भी जाये तो उनका जिक्र करने  या उन्हें साकार करने की कोशिशों की तो कतई भी इजाजत नहीं. ऐसा सोचना भी एक पाप होगा.

जन्म के साथ ही यही हिदायतें माँ लगातार दोहराती रही,  लेकिन सपनों पर किसका जोर.चला है जो अब चलता, वो देखा करती सपने. मगर न जाने क्यों उसके सपने होते हमेशा हरे, गाढ़े हरे. जितना वो सपनों में उतरती वो उतने ही ज्यादा और ज्यादा हरे होते जाते.

समय बीतता रहा. सपने अधिक और अधिक गाढ़े हरे होते चले गये. स्कूल जाती तो सहेलियाँ अपने सपनों के बारे में बताती, गुलाबी और नीले सपनों की बात करतीं. मगर वो चुप ही रहती. बस, सुना करती और मन ही मन आश्चर्य करती कि उसके सपने हरे क्यूँ होते हैं? उसे गुलाबी और नीले सपने क्यूँ नहीं आते?. सपनों के बारे में बात करने या बताने की तो उसे सख्त मनाही थी. आज से नहीं, बल्कि तब से जब वो माँ की कोख में ही थी.

चार बेटों वाले घर की अकेली लड़की, बहन होती तो शायद चुपके से कुछ सपने बाँट लेती उसके साथ, लेकिन वो भी नहीं. माँ से बांटने का प्रश्न ही न था. उसने तो सपने देखने को भी सख्ती से मना कर रखा था.

बहुत मन करता उन हरे सपनों को जागते हुए बांटने का. उन्हें जीने का. उन्हें साकार होता देखने का. यह सब होता तो था मगर उन्हीं हरे सपनों के भीतर... एक हरे सपने के भीतर बंटता एक और  दूसरा हरा सपना. एक हरे सपने के बीच सपने में ही सच होता दूसरा हरा सपना. हरे के भीतर हरा, उस हरे को और गाढ़ा कर जाता. उसे लगता कि वो एक हरे पानी की झील में डूब रही है. एकदम स्थिर झील. कोई हलचल नहीं. जिसकी सीमा रेखा तय है.

कई बार कोशिश की सपनों में दूसरा रंग खोजने की. शायद कभी गुलाबी या फिर नीला रंग दिख जाये. हल्का सा ही सही. जितना खोजती, उतना ज्यादा गहराता जाता हरा रंग. और तब हार कर उसने छोड़ दिया था किसी  और रंग की अपनी तलाश को सपनों में. सपने हरे ही रहे, गहरे सुर्ख हरे. उसके भीतर कैद. कभी जुबान तक आने की हिम्मत न जुटा पाये और न कभी वह सोच पाई उन्हें साकार होते देखने की बात को. माँ की हिदायत हमेशा याद रहती.

स्कूल खत्म हुआ. कालेज जाने लगी लेकिन सपने पूर्ववत आते रहे वैसे ही हरे रंग के और दफन होते रहे उसके भीतर, तह दर तह.क्योंकि उन्हें मनाही थी बाहर निकलने की, किसी से भी बताये जाने की या साकार रुप लेने की.

कालेज में एक नया माहौल मिला. नये दोस्त बने. सपनों के बाहर भी एक दुनिया बनी, जो हरी नहीं थी. वह रंग बिरंगी थी. वो उड़ चली उसमें. पहली बार जाना कि डूब कर कैसे उड़ा जाता है बिना पंखों के. वो भूल गई कि जिसे दरवाजा खोलने तक की इजाजत न हो उसे बाहर निकलने की अलग से मनाही की जरुरत ही नहीं है. वो तो स्वतः ही समझ लेने वाली बात है. किन्तु रंगों का आकर्षण उसे बहा ले गया. अपने संग उड़ा ले गया.

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फिर वह दिन भी आया जब तह दर तह दमित सपनों का दबाव इतना बड़ा कि वो एक विस्फोट की शक्ल में बाहर फट निकला और उस शाम वो अपने रंगों की दुनिया में समा गई और भाग निकली अपने सपनों से बाहर उग रहे एक ऐसे रंग के साथ, जो हरा नहीं था.

उस शाम बस्ती में कहर बरपा. दंगा घिर आया. सुबह के साथ ही दो लाशें बिछ गई. एक उसकी खुद की और एक उसकी जिसके साथ वह भाग निकली थी. अब न हरा रंग और न ही गुलाबी या नीला. दोनों रक्त की लालिमा में सने थे.

वो निकल पड़ी अपनी लाश को छोड़ उस दुनिया में जाने के लिए, जो रंग बिरंगी है. जहाँ सभी रंग सभी के लिए हैं. एक बार पलट कर उसने देखा था अपनी लाश की तरफ. रक्त की लालिमा में लिपटा हरा रंग. हरे सपनों की कब्रगाह.

अब वह जान चुकी थी अपने हरे सपनों का रहस्य. उसका नाम था शबाना ...

एक नजर उसने बगल में पड़ी लाश पर भी डाली. रोहित अपनी लाश के भीतर अब भी जिन्दगी तलाश रहा था.

वह मुस्कराई और चल पड़ी अपनी नई दुनिया से अपना रिश्ता जोड़ने. उसे कोई मलाल न था.

आज बहुत खुश थी वो. 

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रविवार, फ़रवरी 13, 2011

तीरथराम.......

तीरथराम साईकिल रिक्शा चलाता और पत्नी किशोरी घर सम्भालती. दोनो दिन-रात काम करते.

घोर ईश्वर भक्त. ईश्वर भी उसकी निरन्तर भक्ति से प्रसन्न हो एक के बाद एक लगातार आठ बच्चे प्रसाद स्वरूप देता गया.

किशोरी को पूजा पाठ में कोई दिलचस्पी नहीं रही. वह इसे पाखंड मानती थी. पति की थोड़ी सी कमाई में किसी तरह घर सम्भाले कि पूजा पाठ पर खर्च करे.

और तीरथराम..?- कहता था कि ईश्वर तो इस बरस भी फिर प्रसन्न हुआ. सातवां चल रहा था, किशोरी को खून की उल्टी हुई और फिर न तो बच्चा बच सका और न किशोरी.

सारा दोष मूरख किशोरी का है-नास्तिक कहीं की!!!

किशोरी की भूल की माफी मांगने पहाड़ी वाले मंदिर जाना पड़ा था भरी बरसात में.

पैर फिसला. खाई में गिर कर चल बसा!!

अब... आठ अनाथ बच्चे!!

ईश्वर ही पालेगा उन्हें!!.....घोर ईश्वर भक्त जो था तीरथराम.......

(लगता तो है कि पल ही जायेंगे, जब पूरा देश बिना किसी नाथ के उसी के भरोसे पला जा रहा है!!)

worship

कल रात अँधेरे

टकरा कर

फट गया था

माथा उसकी बीबी का

और

उतर आया था

माँग के सिंदूर का निशान

जिस पत्थर पर....

आज गाँव में उसे

बड़ी श्रृद्धा से

पूजा जाते देखा!!!

-समीर लाल ’समीर’

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गुरुवार, जनवरी 27, 2011

ये चाँद कैसे कैसे!!!

दीनानाथ, हमारा ड्राईवर.

उसका बेटा चोरी के इल्जाम में,जेल में एक साल की सजा काट रहा है।  . दीनानाथ का मानना है कि झूठा फँसाया है पुलिस ने उसे.

पिछले ह्फ्ते दीनानाथ ने बताया कि उसकी बहु रात गये चुपचाप भाग गई. कुलच्छनी थी. दीनानाथ का कहना है कि उसे शुरु से ही उसके चाल चलन ठीक नहीं दिखते थे.

परसों वो लौट आई. पता लगा कि उसके पिता जी की तबीयत एकाएक खराब हो गई. दीनानाथ जाने न देता सो वो चुपचाप बिना बताये ही चली गई.

आज दीनानाथ की लड़की भाग गई. कहता है कि गऊ है. गली के नुक्कड़ वाला धोबी का लड़का फुसला कर भगा ले गया. दुष्ट नहीं तो!!!

 

रात वही,

बात वही

चाँद ये 

अलग सा ऊग आया

और

देखो,

बात ……..

कितनी बदल जाती है.....

 

-समीर लाल ’समीर’

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बुधवार, सितंबर 15, 2010

जिन्दा सूखा गुलाब...

हरि बाबू, टूटती काया, माथे पर चिन्ता की लकीरें, मोटे चश्में से ताकती बुझी हुई आँखें, शायद ८४ बरस की उम्र रही होगी. हर दोपहर अपने अहाते में कुर्सी पर धूप में बैठे दिखते मानो किसी का इन्तजार कर रहे हों.

दो बेटे हैं. शहर में रहते हैं और हरि बाबू यहाँ अकेले. निश्चित ही बेटों का इन्तजार तो नहीं है, क्योंकि हरि बाबू जानते हैं कि वो कभी नहीं आयेंगे. बहु और बच्चों के लिए हरि बाबू देहाती हैं, तो इनके वहाँ जाने का भी प्रश्न नहीं. फिर आखिर किसका इन्तजार करती हैं वो आँखें?

उम्र की मार के कारण हरि बाबू की स्मृति धोखा देती है, पर बेटों से थोड़ा कम. आसपास देखी घटनायें ४-६ दिन तक याद रह जाती हैं. कुछ पुरानी यादें भी और कुछ पुरानी बातें भी, कुछ टीसें-नश्तर सी चुभती. इतना सा संसार बना हुआ है उनका जिसमें वो जिये जा रहे हैं. यही आधार है उनका और उनकी सोच का.

अकेले आदमी की भला कितनी जरुरतें, खुद से थोप थाप कर एक दो रोटी, कभी गुड़ तो कभी सब्जी के साथ खा लेते हैं और अहाते में बैठे-बैठे दिन गुजार देते हैं. बोलते कुछ नहीं.

जब नहीं रहा गया तो एक दिन उनके पास चला गया. पूछ बैठा कि ’चाचा, किसका इन्तजार करते हो?’

हरि बाबू पहले तो चुप रहे और फिर धीरे से बोले,’देश आजाद हो जाता तो चैन से मर पाता.’

मैं हँसा. मैने कहा कि ’चाचा, देश तो आजाद हो गया…. देश को आजाद हुए तो ६३ बरस हो गये. सन ४७ में ही आजाद हो गया था.’

देश तो आजाद हो गया…. सुनते ही एकाएक हरि बाबू के होंठों पर एक मुस्कान फैली और चेहरा बिल्कुल शांत.

हरि बाबू नहीं रहे.

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चलते चलते:

देखता हूँ जब

उस अँधेरे कमरे की

खिड़की पर रखा

बुझी लौ लिए एक दीपक,

जिन्दा सूखे हुए गुलाब

फंसे हुए गुलदस्ते में

और उस कोने वाली

दीवार से

टिका

टूटे तारों वाला

सितार....

तब दिखती है

इक रोशनी

उठती हुई दिये से

सुनाई देती है एक धुन

तारों से झंकृत

और

महक उठता है

गुलाब की खुशबू से

मेरा तन-मन!!

-समीर लाल ’समीर’

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बुधवार, अगस्त 04, 2010

कैसी हत्या? – लघु(त्तम) कथा और कविता

डॉक्टर का कमरा.

महिला अपनी एक साल की बेटी को गोद में और सोनोग्राफी की रिपोर्ट हाथ में लिए होने वाली कन्या का गर्भापात कराना चाहती है.
तर्क है छोटी छोटी दो बेटियों को कैसे संभालेगी?

डॉक्टर ने सलाह दी कि लाओ, इस गोद में बैठी बेटी को मार देते हैं. फिर बस एक होने वाली रह जायेगी.

महिला स्त्ब्ध!!

यह तो पाप होगा.

आज उसके आँगन से दोनों बेटियों के चहकने के आवाज आती है.

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कोई
हत्या महज हत्या नहीं होती!!
परिस्थिति के अनुरूप
समय की गति में

नहीं होती हत्या
जो  होती हैं बहादुरी
आत्मरक्षा
और
कर्तव्य से प्रेरित

कुछ होती हैं कायरता
लाचारी
और
कमजोरी
जैसे की आत्महत्या

कुछ
मानसिक रुग्णता
यानी कि
विद्वेष, नफ़रत
और
बदले की भावना से जनित

किन्तु

कुछ होती हैं मानसिक विकृतता
भयानक रुप
निरीहता पर प्रहार
जो अक्षम्य है
जैसे की
भ्रूण हत्या!!!

-समीर लाल ’समीर’

(कथा की प्रेरणा एक ईमेल से प्राप्त संदेश है एवं चित्र साभार गुगल)

सूचना:

कुछ दिन पूर्व तरुण जी ने निट्ठला चिंतन पर मेरी पुस्तक बिखरे मोती की शानदार समीक्षा की है, यदि नजर न गई हो तो यहाँ क्लिक करें.

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रविवार, जुलाई 18, 2010

कठपुतलियाँ: एक लघु कथा एवं एक कविता

वो सोचा करता था कि एक दिन जब जिन्दगी तो रोज रोज की भाग दौड़ से फुरसत पा लेगा, तब दिल्ली का अपना मकान बेच कर कहीं पहाड़ों में जा बसेगा. जहाँ घर के आसपास होंगे चीड़ देवदार के वृक्ष, चिड़ियों का चहचहाता संगीत, बरामदे में गरम चाय की प्याली लिए नीचे बहती नदी को निहारता वो. तब वह अपना उपन्यास लिखेगा. प्लॉट दिमाग में है बस लिखने का समय नहीं है.

कल ७७ वर्ष की अवस्था में अपोलो अस्पताल में उसने आखिरी सांस ली.

उपन्यास कभी शुरु नहीं हो पाया और प्लॉट बस प्लॉट ही रह गया. कौन जाने क्या प्लॉट था.

काश! वो जान पाता कि समय मिलता नहीं, निकालना पड़ता है.

काश! इन्तजार की बजाय उसने संतुलन के महत्व को समझा होता.

 

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कठपुतलियाँ

चंद धागों में बँधी

इशारों पर

नाचती है,

झुकती हैं,

सलाम करती हैं.

और

जब कोई दर्शक नहीं होता

तो निढाल हो

पड़ी रहती है एक कोने में...

कर्तव्यों,

दायित्वों

और

सामाजिक नियमों

के

धागे में बँधा

नाचता, झुकता और सलाम करता..

अँधेरी घुप्प इस काली रात में

अपनी कमरे की कुर्सी पर

अकेला निढाल पड़ा

सोचता हूँ मैं..

-समीर लाल ’समीर’

यू ट्यूब पर सुनें:

 

मेरे यू ए ई के मित्रों के लिए:

 

या यहाँ पर क्लिक करके सुनें.

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बुधवार, जुलाई 14, 2010

अंतिम फैसला: एक लघु कथा

सामने टीवी पर लॉफ्टर चैलेंज आ रहा है. वो सोफे पर बैठा है और नजरें एकटक टी वी को घूर रही हैं, लेकिन वो टीवी का प्रोग्राम देख नहीं रहा है.

उसके कान से दो हाथ दूर रेडियो पर गाना बज रहा है

’जिन्दगी कितनी खूबसूरत हैssssss!'

साथ में पत्नी गुनगुनाते हुए खाना बना रही है. उसके कान में न रेडियो का स्वर और न ही पत्नी की गुनगुनाहट, दोनों ही नहीं जा रही हैं.

एकाएक वो सोफे से उठता है और अपने कमरे में चला जाता है.

रेडियो पर अब समाचार आ रहे हैं: ’न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेन्ज ७०० पाईंट गिरा’

Suicide

कमरे से गोली चलने की आवाज आती है.

पत्नी कमरे की तरफ भागती है. उसका शरीर खून से लथपथ जमीन पर पड़ा है, उसने खुद को गोली मार ली.

रेडियो पर समाचार जारी हैं कि ७०० पाईंट की गिरावट मानवीय भूलवश हुई है अतः उस बीच हुई सभी ट्रेड रद्द की जाती है.

वो मर चुका है.

-समीर लाल ’समीर’

नोट:  कुछ दिनों पूर्व महावीर जी के ब्लॉग मंथन  पर प्रकाशित

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रविवार, जून 20, 2010

जरा सा बखान, कुछ तस्वीरें और एक लघु कथा

पारिवारिक व्यस्तताओं के बीच नेट पर आना न के बराबर चल रहा है और इस बीच देख रहा हूँ कि ब्लॉगवाणी भी किन्हीं तकनिकी समस्यायों के तहत नई पोस्ट नहीं दिखा रहा है.

आज हालांकि एक नई पोस्ट लगाने का मन था किन्तु चूँकि इस बीच किसी को पढ़ा नहीं तो मैं अपने आपको नया कुछ लिखने या पढ़वाने का अधिकारी नहीं पाता. पहले कुछ पढ़ लूँ मित्रों को, फिर लिखूँगा भी और पढ़वाऊँगा भी. मेरी यह आदत नहीं कि किसी को पढ़ूँ न या किसी को बताऊँ न कि तुमको पढ़ लिया है और बस, अपनी अपनी पढ़वाता चलूँ और आशा लगा कर बैठ जाऊँ कि वो मुझे बतायेंगे कि आपको पढ़ा. कम से कम मुझे असहज लगता है. अपनी अपनी आदत है.

होती है कईयों की आदत कि खुद तो किसी को नमस्ते नहीं करना मगर सामने वाला नमस्ते न करे तो उसे बदतमीज करार देना और बुरा मान जाना. सही है कि जब तक तुम पावर में हो शायद लोग तुम्हारे बिना नमस्ते किये भी नमस्ते करते चलें. मगर पावर का क्या है, आज है और कल नहीं रहेगा. ये व्यवहार ही है जो जीवन भर साथ निभाता है.

तब तक आपको अपनी एक लघुकथा जो कुछ दिनों पूर्व महावीर जी के ब्लॉग मंथन पर प्रकाशित हुई थी, वो पढ़वाता हूँ. साथ ही बगीचे में नये फूल आ गये हैं, चेरी और सेब भी बस पकने की तैयारी में हैं. मौसम गरमी का सुहाना हो गया है. बैकयार्ड में पार्टियों का दौर चालू है, कुछ तस्वीरें बैक यार्ड की:

 

 

लघु कथा:

 

कर्ज चुकता हुआ??

इकलौता बेटा है.

हाल ही बी ई पूरी कर ली. मास्टर माँ बाप की आँख का तारा, उनका सपना. एक शिक्षक को और क्या चाहिये, बेटा पढ़ लिख कर इन्जिनियर बन गया.

विदेश जाकर आगे पढ़ने की इच्छा है.

शिक्षक का काम ही शिक्षा का प्रसार है, वो भला कब शिक्षा की राह में रोड़ा बन सकता है वो भी तब, जब उसका इकलौता बेटा उनका नाम रोशन करने और उनके सपने पूरे करने के लिए माँ बाप से बिछोह का गम झेलते हुए अकेला अपनी मातृ भूमि से दूर अनजान देश में जा संघर्ष करने को तैयार हो.

बैंक से एक मात्र जमा पूँजी, अपना मकान गिरवी रख, लोन लेकर मास्साब ने बेटे को आशीषों के साथ विदेश रवाना किया.

दो बरस में बेटा कमाने लायक होकर, मुश्किल से साल भर में कर्ज अदा कर देगा फिर मास्साब की और उनकी पत्नी की जिन्दगी ठाट से कटेगी. फिर वो ट्यूशन नहीं पढ़ायेंगे. बस, मन पसंद की किताबें पढ़ेंगे और साहित्य सृजन करेंगे.

अब चौथा बरस है. बेटे ने एक गोरी से वहीं विदेश में शादी कर ली है. उससे एक बेटा भी है. भारत की बेकवर्डनेस बहु और पोते दोनों के आने के लिए उचित नहीं . इसके चलते बेटा भारत आ नहीं सकता और वहाँ विदेश में घर में माँ बाप के लिए जगह नहीं और न ही कोई देखने वाला.

नई फैमली है, खर्चे बहुत लगे हैं. फोन पर भी बात करना मंहगा लगता है अतः लोन वापस करने की अभी स्थितियाँ नहीं है और न ही निकट भविष्य में कोई संभावना है. बेटे और उसकी पत्नी को बार बार का तकादा पसंद नहीं अन्यथा भी अनेक टेंशन है, जो भारतीय माँ बाप समझते नहीं,  अतः इस बारे में बात न करने का तकादा वो माँ को फोन पर दे चुका है वरना उसे मजबूर होकर फोन पर बात करना बंद करना होगा. माँ ने पिता जी को समझा दिया है और पिता ने समझ भी लिया है.

आज रिटायर्ड मास्साब ने अपने ट्यूशन वाले बच्चों को नये घर का पता दिया. कल वो उस किराये के घर में शिफ्ट हो जायेंगे.

जाने कौन सा और किसका कर्ज चुकता हुआ. कम से कम बैंक का तो हो ही गया.

साहित्य सृजन की आशा इतिहास के पन्ने चमका रही है.

इतिहास भी तो साहित्य का ही हिस्सा है!!

उसकी चमक बरकरार रखने का श्रेय तो मिलना ही चाहिये!!

-समीर लाल ’समीर’

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रविवार, जून 13, 2010

पुरस्कार!!

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बहुत सुन्दर कालोनी है. करीब ८० मकान. अधिकतर लोग, जिन्होंने यह मकान बनवाये थे रिटायर हो गये हैं. कुछ के बेटे बहु साथ ही रहते हैं तो कुछ अकेले.

कौशलेश बाबू की बहु बहुत मिलनसार, मृदुभाषी एवं सामाजिक कार्यों में बहुत रुचि लेती है. कालोनी में रह रहे बुजुर्गों की निरस हो गई जिन्दगी को लेकर उसने एक योजना बना कर महिला मंडल की बैठक में रखी. सभी ने योजना की भूरी भूरी प्रशंसा की तथा उसी बैठक में संपन्न हुए चुनाव में वो महिला मंडल की निर्विरोध अध्यक्षा चुनी गई.

योजना के तहत बुजुर्गों को व्यस्त रखने के लिए एवं उनकी जिन्दगी में रस घोलने के लिए सभी बुजुर्गों से निवेदन किया गया कि वह अपने जिन्दगी के अनुभवों को एकत्रित कर आलेखबद्ध करें जिससे नई पीढ़ी को जहाँ एक ओर सीख मिले, वहीं दूसरी ओर बुजुर्ग भी लिखने और दूसरों के अनुभव पढ़ने में व्यस्त हो जायेंगे.

योजना के तहत एक मासिक पत्रिका निकाली जायेगी. पत्रिका के संपादन एवं प्रारुप निर्धारण के लिए भी उन्हीं बुजुर्गों में से एक संपादक मंडल का गठन किया गया. एक कमेटी का भी गठन हुआ जो उन आलेखों में से हर माह सर्वश्रेष्ट आलेख के लेखक को सम्मानित एवं पुरुस्कृत करेगी और हर नये अंक के साथ एक मासिक गोष्टी का आयोजन भी किया जायेगा.

प्रथम अंक के विमोचन हेतु नगर के सांसद को आमंत्रित कर एक भव्य समोरह का आयोजन किया गया.

ऐसी अभिनव योजना की परिकल्पना के लिए कौशलेश बाबू की बहु की हर तरफ प्रशंसा हुई, उनके बुजुर्गों के प्रति संवेदनशील हृदय एवं भावनाओं को साधुवाद दिया गया एवं सांसद महोदय नें भी उनके इस योगदान को अतुलनीय बताया. सांसद महोदय ने इस योजना के क्रियांवयन पर होने वाले खर्चे के लिए भी सांसद निधि से योगदान का आश्वासन दिया.

इसी आयोजन में प्रथम अंक के सर्वश्रेष्ट आलेख के लिए कौशलेश बाबू का चयन हुआ और उन्हें श्रीफल, शॉल और प्रशस्ति पत्र से सम्मानित किया गया. कौशलेश बाबू का आलेख जिसने भी पढ़ा, उसकी आँखें बरबस नम हो आईं. उन्होंने बुजुर्गों की घर में स्थिति एवं बच्चों से उनकी अपेक्षाओं का बहुत ही मार्मिक आलेख अपने अनुभवों के आधार पर लिखा था. हर बुजुर्ग ने उसमें अपनी कहानी पाई.

अगले दिन सुबह नगर के सभी प्रमुख अखबारों में इस योजना, कौशलेश बाबू की बहु की तारीफ और तस्वीरें और कौशलेश बाबू का आलेख और उन्हें पुरुस्कृत किए जाने के समाचार प्रमुखता से छपे थे.

पिछली रात कौशलेश बाबू उसी प्रशस्ति पत्र को निहारते आँखों में आसूं लिए भूखे ही सोये थे.

बहु और बेटा नाराज थे कि उन्हें ऐसा लिखने की क्या जरुरत थी?

 

लिखना तो आज राम त्यागी जी से मिलन की कथा था लेकिन कुछ समयाभाव के चलते अभी एक लघु कथा पढ़ें.
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रविवार, मई 02, 2010

मजदूर दिवस के मजबूर

मजदूर दिवस पर भाषण देने दिल्ली से नेता जी गांव आये.
मजदूरों के वर्तमान हालात और उसके सुधार एवं मजदूरों के उत्थान के लिए सरकार की भावी योजनाओं पर खुल कर बोले और वापस चले गये.
नन्दु और उसके दो भाई, जिन्होंने तीन दिन रात लग कर सभा स्थल पर मंच का निर्माण किया था, अपनी पेमेन्ट के लिए न जाने कब से भटक रहे हैं.

 

Moon

१.

चाँद
को
देखकर

कवि
को
याद आती है
अपनी महबूबा

और

मजदूर
को
रोटी!!!

hammer

२.

थकान से चूर बदन
कांपते हुए हाथ
माथे से बहती पसीने की धार
और उसने फिर से किया
भारी भरकम हथोड़े से
छैनी पर प्रहार....
बार बार

छन्न्न्न्न्न्न!
छान्न्न्नन्न
छंन्न्न्न

एक पल के लिए
जैसे ही यह लय टूटी

उसे सुनाई दी
घर में इन्तजार करते
बेटे की आवाज

बापू!! रोटी!!!!!!!!

भूल कर अपनी थकान
वो फिर तैयार हुआ
अगला प्रहार
करने के लिए
क्यूँकि
असमर्थ था वह
इस आवाहन को
नकारने में …

-समीर लाल ’समीर’-     

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