रविवार, जून 13, 2010

पुरस्कार!!

oldman

बहुत सुन्दर कालोनी है. करीब ८० मकान. अधिकतर लोग, जिन्होंने यह मकान बनवाये थे रिटायर हो गये हैं. कुछ के बेटे बहु साथ ही रहते हैं तो कुछ अकेले.

कौशलेश बाबू की बहु बहुत मिलनसार, मृदुभाषी एवं सामाजिक कार्यों में बहुत रुचि लेती है. कालोनी में रह रहे बुजुर्गों की निरस हो गई जिन्दगी को लेकर उसने एक योजना बना कर महिला मंडल की बैठक में रखी. सभी ने योजना की भूरी भूरी प्रशंसा की तथा उसी बैठक में संपन्न हुए चुनाव में वो महिला मंडल की निर्विरोध अध्यक्षा चुनी गई.

योजना के तहत बुजुर्गों को व्यस्त रखने के लिए एवं उनकी जिन्दगी में रस घोलने के लिए सभी बुजुर्गों से निवेदन किया गया कि वह अपने जिन्दगी के अनुभवों को एकत्रित कर आलेखबद्ध करें जिससे नई पीढ़ी को जहाँ एक ओर सीख मिले, वहीं दूसरी ओर बुजुर्ग भी लिखने और दूसरों के अनुभव पढ़ने में व्यस्त हो जायेंगे.

योजना के तहत एक मासिक पत्रिका निकाली जायेगी. पत्रिका के संपादन एवं प्रारुप निर्धारण के लिए भी उन्हीं बुजुर्गों में से एक संपादक मंडल का गठन किया गया. एक कमेटी का भी गठन हुआ जो उन आलेखों में से हर माह सर्वश्रेष्ट आलेख के लेखक को सम्मानित एवं पुरुस्कृत करेगी और हर नये अंक के साथ एक मासिक गोष्टी का आयोजन भी किया जायेगा.

प्रथम अंक के विमोचन हेतु नगर के सांसद को आमंत्रित कर एक भव्य समोरह का आयोजन किया गया.

ऐसी अभिनव योजना की परिकल्पना के लिए कौशलेश बाबू की बहु की हर तरफ प्रशंसा हुई, उनके बुजुर्गों के प्रति संवेदनशील हृदय एवं भावनाओं को साधुवाद दिया गया एवं सांसद महोदय नें भी उनके इस योगदान को अतुलनीय बताया. सांसद महोदय ने इस योजना के क्रियांवयन पर होने वाले खर्चे के लिए भी सांसद निधि से योगदान का आश्वासन दिया.

इसी आयोजन में प्रथम अंक के सर्वश्रेष्ट आलेख के लिए कौशलेश बाबू का चयन हुआ और उन्हें श्रीफल, शॉल और प्रशस्ति पत्र से सम्मानित किया गया. कौशलेश बाबू का आलेख जिसने भी पढ़ा, उसकी आँखें बरबस नम हो आईं. उन्होंने बुजुर्गों की घर में स्थिति एवं बच्चों से उनकी अपेक्षाओं का बहुत ही मार्मिक आलेख अपने अनुभवों के आधार पर लिखा था. हर बुजुर्ग ने उसमें अपनी कहानी पाई.

अगले दिन सुबह नगर के सभी प्रमुख अखबारों में इस योजना, कौशलेश बाबू की बहु की तारीफ और तस्वीरें और कौशलेश बाबू का आलेख और उन्हें पुरुस्कृत किए जाने के समाचार प्रमुखता से छपे थे.

पिछली रात कौशलेश बाबू उसी प्रशस्ति पत्र को निहारते आँखों में आसूं लिए भूखे ही सोये थे.

बहु और बेटा नाराज थे कि उन्हें ऐसा लिखने की क्या जरुरत थी?

 

लिखना तो आज राम त्यागी जी से मिलन की कथा था लेकिन कुछ समयाभाव के चलते अभी एक लघु कथा पढ़ें.
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94 टिप्‍पणियां:

राम त्यागी ने कहा…

मार्मिक चित्रण घर घर की असली कहानी का ....
शायद हम अनजाने में अपनी सहूलियत और वाहवाही के लिए अपने माता पिता को बहुत कष्ट दे जाते है ..आपने अहसास कराया आज ...धन्यवाद !!

दिनेशराय द्विवेदी ने कहा…

बहुत मार्मिक!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

आपका संस्मरण बहुत ही बढ़िया रहा!
--
परन्तु मुझे यह एक लघुकथा का आनन्द दे गया!
--
हमने भी खटीमा में सीनियर सिटीजन वैलफेयर सोसायटी का गठन किया है! पिछले माह इसका पंजीकरण भी करवा लिया है!

पी.सी.गोदियाल "परचेत" ने कहा…

पता नहीं इन वृद्ध लोगो को अपने घर की पोल खोलने में मजा क्या आता है ! :)

Gyan Darpan ने कहा…

लगता है कौशलेश बाबू के घर में भी दिया तले अँधेरा वाली कहावत चरितार्थ हो रही थी |

आईये हिंदी चिट्ठों पर पाठक बढ़ाएं

Gyan Darpan ने कहा…

लगता है कौशलेश बाबू के घर में भी " दिया तले अँधेरा "वाली कहावत चरितार्थ हो रही थी |

अजय कुमार ने कहा…

कौशलेश बाबू उसी प्रशस्ति पत्र को निहारते आँखों में आसूं लिए भूखे ही सोये थे.

बहु और बेटा नाराज थे कि उन्हें ऐसा लिखने की क्या जरुरत थी?

विडम्बना है और एक सामाजिक प्रश्न भी ।

अजित गुप्ता का कोना ने कहा…

शब्‍द ही नहीं मिल रहे लिखने के लिए। कुछ लोग ऐसी ही सेवा करते हैं। बहुत ही बढिया।

AKHRAN DA VANZARA ने कहा…

वाह ... बहुत खूब ...

बज़ुर्गो की दशा का मार्मिक उल्लेख ...

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

लघु होते हुए भी

महान कथा।

दिलीप ने कहा…

daudte samaaj me khudgarji rishton se kab aage nikal jaati hai pata hi nahi chalta...daudo magar rishton ka hath tham kar...tab hi jeet milegi

दीपक 'मशाल' ने कहा…

...................................... सुना है कि खामोशी से ज्यादा कोई नहीं बोल सकता... क्या मेरी खामोशी आप तक पहुँच रही है???

vedvyathit ने कहा…

ati sundr
rchna ka viprit mod atyadhik rochk hai
badhai

वाणी गीत ने कहा…

यही है दोहरी मानसिकता ...बहुत से घरों की कहानी है यह
बनावटी पारिवारिकता पर अच्छा कटाक्ष किया है लघु कथा ने ...!!

कडुवासच ने कहा…

...बेहद प्रसंशनीय लेखन, लघुकथा की थीम बेहद सार्थकता लिये हुये है, बधाई समीर भाई!!!

Satish Saxena ने कहा…

यह हम सब की कहानी है समीर भाई , हो सकता है मज़बूत होने के कारण कुछ समय हमें आपको यह न झेलना पड़े मगर समय के साथ शक्तिहीन होते जाना हमारी नियति है और अगर आप सत्यप्रेमी हैं तो बच्चे आपकी आपबीती के कारण, कहीं न कहीं समस्याओं में में आये तो यह दिन और बुढापे में अपने ही घर में रोना पद सकता है ! अफ़सोस कि अधिकतर मामलों में बच्चों के पास माँ-बाप के बारे में सोचने का समय ही नहीं होता !
आपके लिए और अपने लिए अग्रिम शुभकामनायें !

Kajal Kumar's Cartoons काजल कुमार के कार्टून ने कहा…

खाने के दांतों व दिखाने के दांतों का अंतर कभी तो समझा जाना चाहिये. socialization यही सिखाता है पर कुछ लोग anti-social निकलते हैं... क्या किया जा सकता है

MLA ने कहा…

Aankho me aansu aa gae yeh laghu katha padh kar. kya kahe shabd hi nahi hai.

डॉ टी एस दराल ने कहा…

दोहरे मापदंड को उजागर करती एक सार्थक रचना ।
आजकल समाज सेवा भी कुछ ऐसी ही हो गई है ।
इंसान का रूप अन्दर कुछ और , बाहर कुछ और ।

श्यामल सुमन ने कहा…

पुस्कार - शब्द भाव वित्रण का एक निराला अंदाज समीर भाई।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

अक्सर सच्चाई लिखने और बोलने की सज़ा मिल जाती है जब आदमी अपनों के बारें में बोल देता है..लोग अक्सर अपने घर को नज़रअंदाज कर देते है....बहुत बढ़िया लघुकथा..धन्यवाद.

Anamikaghatak ने कहा…

aise vyakti ko mera bhi naman

seema gupta ने कहा…

उन्होंने बुजुर्गों की घर में स्थिति एवं बच्चों से उनकी अपेक्षाओं का बहुत ही मार्मिक आलेख अपने अनुभवों के आधार पर लिखा था. हर बुजुर्ग ने उसमें अपनी कहानी पाई.

" बहु बेटा को बाराज तो होना ही था....सच हमेशा ही कडवा होता है न..."
regards

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

समीर जी ,मन को स्पर्श करती है आप की ये लघुकथा ,संवेदनहीनता का उदाहरण देती हुई इस कथा में सहजता भी है और सरलता भी

निर्मला कपिला ने कहा…

बहुत मार्मिक लेकिन आज के समाज का सच है । कथा के माध्यम से समाज पर अच्छा कटाक्ष है शुभकामनायें

Madhu chaurasia, journalist ने कहा…

सर मॉडर्न परिवारों में ऐसा ही होता है...आधुनिक दौर की बहुए अपने बुजुर्गों के योदगान को भूल जाती हैं...आपने सही लिखा है पब्लिसिटी स्टंट के लिए कुछ लोग आगे भी आते हैं तो उसके पीछे उनका अपना स्वार्थ छिपा होता है

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

आज के समाज के कटु सत्य को उजागर करती मर्मस्पर्शी लघुकथा

Khushdeep Sehgal ने कहा…

पर उपदेश कुशल बहुतेरे...

घर-घर का सच...

जय हिंद...

sanu shukla ने कहा…

बेहद मार्मिक.....भाईसाहब ..यही तो अपने समाज की रीति है..की व्यक्ति सामाजिक तो ईमानदार बना रहना चाहता है और व्यक्तिगत बेईमान

रंजन ने कहा…

ओफ्फ...

भूल जाते है.. बुढापा सब को आता है..

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

मार्मिक चित्रण है यथार्थ का । लोगों के मन में पता नहीं क्या चलता रहता है ।

P.N. Subramanian ने कहा…

आनंद आ गया. घर घर की कहानी. .

kshama ने कहा…

Shayad har ghar me aisi kahani banti hogi...afsos!

M VERMA ने कहा…

कथनी और करनी
सच कहना और सच का सामना करना
कुछ तो फर्क होगा ही

माधव( Madhav) ने कहा…

बहुत मार्मिक, बज़ुर्गो की दशा का मार्मिक उल्लेख

संपादक ने कहा…

bahut badiya bhai ji.....

Bhavesh (भावेश ) ने कहा…

आज के समाज का एक मार्मिक कटु सत्य

आभा ने कहा…

मार्मिक ....

समयचक्र ने कहा…

बिंदास पोस्ट....कथा मार्मिक लगी ...आभार -

Pratik Maheshwari ने कहा…

अगर बहु-बेटे को बुरा लगा तो लाज़मी है अगर वाकई में उन्हें बुरा लगा हो तो..
और अगर उन्होंने तो कुछ ऐसा लिखा है तो ज़रूरी नहीं है कि वो उनके घर की भी कहानी है.. लेखक तो जो आस पास देखता है उसी के बारे में लिखता है..

वैसे एक अच्छी पहल है.. शुभकामनाएं..

रश्मि प्रभा... ने कहा…

mann ko chhu gaya

shikha varshney ने कहा…

बहुत मार्मिक चित्रण.

Amit Sharma ने कहा…

बहुत मार्मिक लेकिन आज के समाज का सच है । कथा के माध्यम से समाज पर अच्छा कटाक्ष है

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

सच्चाई यही है...

संगीता पुरी ने कहा…

बहुत मार्मिक .. समाज का सच!!

nilesh mathur ने कहा…

बहुत सुन्दर लिखा है भैया लेकिन बुरा मत मानियेगा कही कुछ कमी लग रही है!

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

मार्मिक लघु कथा. लोगों ने सच्चे अनुभव लिखे तो योजना फेल हो जायेगी.

शिवम् मिश्रा ने कहा…

बहुत बढ़िया, समीर भाई !

Vinay ने कहा…

संवेदनशील

शोभना चौरे ने कहा…

मन को छूती हुई मार्मिक लघु कथा |हर पीढ़ी में विद्यमान है ऐसी दोहरी मानसिकता |गाँवो में लड़ते झगड़ते है घर के,खेत के बांटे हिस्से हो जाते है और मुसीबत में फिर एक दूसरे का साथ दे देते है कितु पढ़े लिखे तथाकथित संस्कारित लोग मन को ही चुभन देते है |

दिनेश शर्मा ने कहा…

भावपूर्ण एवं सार्थक रचना।

स्वप्निल तिवारी ने कहा…

doglepan ki patti kholti....ek achhi kahani ..mann bujh gaya..

टंगडीमार ने कहा…

बहुत मार्मिक, टंगडीमार सलाम, टंगडीमार भेजे में। गोदियाल जी की बात पर ध्यान दिया जाना चाहिये।

कमलेश वर्मा 'कमलेश'🌹 ने कहा…

wah dadda ji ..aankhen nm ho gayi ..aakhri panktiyon ka nichod padh kar...bahut badhiya..

पूनम श्रीवास्तव ने कहा…

सच में हमें अपने बुजुर्गों को जो सम्मान,सेवा देनी चाहिये--शायद आज हम उन्हें नहीं दे पा रहे हैं तभी तो कौशलेश बाबू को अपने मन की बातें पत्रिका में लिखनी पड़ीं---मर्मस्पर्शी और विचारणीय----।

Dev K Jha ने कहा…

मार्मिक... मगर एक सच्चाई...

Pt. D.K. Sharma "Vatsa" ने कहा…

आज के समाज का बेहद मार्मिक चित्रण..एक कडवी सच्चाई!!

डॉ. महफूज़ अली (Dr. Mahfooz Ali) ने कहा…

आदरणीय समीर जी.....

बहुत मार्मिक और हृदयस्पर्शी .... पोस्ट....

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

अरे!!!! अन्त इतना मार्मिक होगा, सोचा ही नहीं था....लेकिन सच्चाई यही है.

बेनामी ने कहा…

बढ़िया समीर जी।

SELECTION - COLLECTION SELECTION & COLLECTION ने कहा…

"कौशलेश बाबू उसी प्रशस्ति पत्र को निहारते आँखों में आसूं लिए भूखे ही सोये थे. "
समीर अंकल! आप जब मार्मिक आलेख लिखते हो तब मुझे दर्द होता है ! अंकल! ये बड़े लोग दोहरी मानसिकता क्यों रखते है ! हम बच्चो की तरह दादा दीदी से प्यार क्यू नही करती ! सैम....सैम ......
संपत

Indli ने कहा…

आपका बलोग पढकर अच्चा लगा । आपके चिट्ठों को इंडलि में शामिल करने से अन्य कयी चिट्ठाकारों के सम्पर्क में आने की सम्भावना ज़्यादा हैं । एक बार इंडलि देखने से आपको भी यकीन हो जायेगा ।

परमजीत सिहँ बाली ने कहा…

समाज के असली चेहरे को दिखाती एक मार्मिक रचना है।समीर जी बहुत बहुत धन्यवाद।

स्वप्न मञ्जूषा ने कहा…

बहुत ही मार्मिक...आज के समाज को आईना दिखा दिया आपने....अब आपकी लेखनी की तारीफ़ करते-करते मुँह दुखा गया है...
लगता है जैसे ....
बागबान की कहानी सुना रहे हैं का...
हमरे बाबूजी जब देखो.... तब बागबान का स्टोरी लिए बैठ जाते हैं....का करें उनका तो बड़ा मन है कि उ अमिताभ बच्चन बने और मेरी माँ हेमा मालिनी....लेकिन हमलोग भी हर समय सलमान खान बन जाते हैं फट से.....हाँ नहीं तो..!!

एक बेहद साधारण पाठक ने कहा…

अदा जी से सहमत ....

Dr.Bhawna Kunwar ने कहा…

ye eak kadva sach hai har jagha yahi to hota ha ...acha lekh ha..

Manish ने कहा…

आप तो बुढ़ापे वाली मेरी छवि दिखा दी, जब अभी यह हाल हैं तो कल क्या होगा??
राम राम
हनुमान जी बुढ़ापे से बचाए अगर इससे नहीं बचा सके तो ऐसे बाल बच्चों से

ओम आर्य ने कहा…

इतने-सीधे-सच्चे प्रवाह में लिखी गयी है ये रचना...कि रचना नहीं लगती...कोई वृत्तांत लगता है...वो तो अंत में पता चला कि ये हथौड़े मार रहा है रचनाकार...

साधवी ने कहा…

यह रचना न जाने कितनों की सच्चाई होगी.

sumit ने कहा…

beta aur bahu ki narajgi sahi bhi to hai

mehhekk ने कहा…

alag alag vicharon ka chitra,ya shayad isko hi generation gap kahe,choti magar marmik katha,cil ko chu gayi.

Sulabh Jaiswal "सुलभ" ने कहा…

!!!

Aruna Kapoor ने कहा…

असलियत लिख कर कौशलेश बाबू ने अच्छा ही किया... अब इसमें बहू--बेटे की असलियत भी सामने आ गई तो उसे सहन करने शक्ति भी उनमें होनी चाहिए!...उनका नाराज होना कतई जायज नहीं है!... एक प्रेरक लेख का आपने साक्षात्कार कराया है, धन्यवाद!

नीरज गोस्वामी ने कहा…

शशक्त कथा है...आज के तल्ख़ हालात को व्यक्त करती हुई...
नीरज

दिगम्बर नासवा ने कहा…

मार्मिक ... समीर भाई कहीं अपना भी वो हाल न हो जब वापस देश जाने का सोचें ....
बाहू बेटे की नाराज़गी अपने आप से है .. अपना सोचेंगें तो नही होगी ....

rakhshanda ने कहा…

Namaste sameer ji, how are you? missed you.

मुकेश कुमार सिन्हा ने कहा…

ek marmik kahani......:)

वीथिका ने कहा…

SAMAYIK SANDARBHO ME YEH RACHANA WAKAYEE SHRESHTH BAN PADI HAI. SADHUVAD

वीथिका ने कहा…

SAMAYIK SANDARBHO ME YEH RACHANA WAKAYEE SHRESHTH BAN PADI HAI. SADHUVADRAH

Mahendra Arya's Hindi Poetry ने कहा…

आइना देखने का साहस कहाँ है समाज में ! बहुत प्रभावशाली लघु कथा . बधाई ..............

रंजना ने कहा…

आपकी यह कथा केवल पढने और वाह वाह करने योग्य नहीं बल्कि एक दिशा दिखाती हुई है... मुझे तो इससे बहुत प्रेरणा मिली है...इसने मुझे नया मार्ग दिखाया है...

अतिसार्थक कथा...साधुवाद आपका...

Sadhana Vaid ने कहा…

अत्यंत हृदयस्पर्शी कथा ! सत्योद्घाटन का दंश तो कौशलेश बाबू को झेलना ही था क्योंकि उनकी बहू की समाजसेवा और बुजुर्गों के प्रति संवेदनशीलता का मुखौटा जो उनके लेखन ने उतार दिया था ! अगर चुप रह जाते तो बेटे बहू की पोल तो ना खुलती ! भूखा सोना तो लाजिमी था ! समाज की कडवी सच्चाई को बयान करती मर्मस्पर्शी कहानी ! बधाई एवं आभार !

Shabad shabad ने कहा…

बहुत ही बढिया....
प्रसंशनीय लेखन....

शुभकामनायें !

Arshad Ali ने कहा…

man ko chhu gayi aapki rachna.

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

समीर जी
बहुत सुंदर और मार्मिक रचना... रुला देते हैं आप... झकझोर कर रख देतीं हैं आपकी रचना... बहुत सुंदर.. इसी विषय पर मेरी इक कविता 'घर में जगह' आपने शायद पढ़ी है... लिंक फिर भेज रहा हूँ ... http://aruncroy.blogspot.com/2010/06/blog-post_13.html सादर

आचार्य उदय ने कहा…

आईये जानें ..... मैं कौन हूं !

आचार्य जी

डॉ महेश सिन्हा ने कहा…

दुनिया गोल है

Abhishek Ojha ने कहा…

ओह ! एक और यथार्थ.

kumar zahid ने कहा…

अगले दिन सुबह नगर के सभी प्रमुख अखबारों में इस योजना, कौशलेश बाबू की बहु की तारीफ और तस्वीरें और कौशलेश बाबू का आलेख और उन्हें पुरुस्कृत किए जाने के समाचार प्रमुखता से छपे थे. पिछली रात कौशलेश बाबू उसी प्रशस्ति पत्र को निहारते आँखों में आसूं लिए भूखे ही सोये थे. बहु और बेटा नाराज थे कि उन्हें ऐसा लिखने की क्या जरुरत थी?

छत्तीसगढ़ पोस्ट ने कहा…

बेशक, बहुत अच्छी रचना है.....शुभकामनाएं..

पंकज मिश्रा ने कहा…

आप देख् ही रहे हैं। 89 टिप्पणियां हो चुकी हैं। सब कुछ कहा जा चुका है। मैं क्या कहूं।
http://udbhavna.blogspot.com/

मीनाक्षी ने कहा…

मर्मस्पर्शी ....

सुमन कुमार ने कहा…

मैं हार गया
और जीत हुई कविता की,
लम्बी लड़ाई के बाद.
उसके पक्ष में
खड़ी थी कवियों की
पूरी फ़ौज,
और मै था अकेला.
जीत तो .....
उसकी होना ही था.
फिर मै..
समर्पण कर दिया खुद को
उसके सामने.
और.. रंग गया,
उसकी रंगों में.
हमारी लड़ाई
द्वितीये विश्वयुद्ध
या.....
पानीपत की नहीं
हम वैचारिक लड़ाई
लड़ाई रहे थे.

Asha Lata Saxena ने कहा…

नया विचार और सुन्दर प्रस्तुति |रचना बहुत अच्छी लगी |बधाई|
आशा