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रविवार, मई 17, 2015

देश में विकास- यू आर माई रोल मॉडल पापा!!

पापा, ये अंकल तो देश का विकास करने वाले थे फिर बार बार विदेश क्यूँ चले जाते हैं?

बेटा, वो क्या है न, कहते हैं विदेश में संभावना बसती है, उसी को तलाशने जाते हैं.

अरे, संभावना तो फ्रेन्डस कॉलोनी में रहती है. मेरे साथ पढ़ती है मेरे स्कूल में. वो तो कभी विदेश गई भी नहीं तो फिर उसे तलाशने विदेश क्यूँ जाते हैं बार बार. मेरे स्कूल में ही आकर मिल लें.

बेटा, समझने की कोशिश करो. ये वो वाली संभावना नहीं है जो तुम समझ रहे हो. ये वो वाली संभावना है जिसे सिर्फ वो समझ रहे हैं और जिसके मिल जाने पर उनके हिसाब से इस देश का विकास होगा.

याने पापा, देश के विकास के लिए, देश में बसी संभावना जिसका पता मुझे तक मालूम है वो किसी काम की नहीं और उसकी दो कौड़ी की औकात नहीं और विदेश में बसी संभावना, जिसकी तलाश में नित प्रति माह विदेश विदेश भटक रहे हैं वो विकास की लहर ला देगी.. याने जैसे हमारा योग कसरत और चाईना का योग – योगा ताई ची..सेल्फी तो बनती है ताई ची के नाम...मगर ये बात कुछ समझ नहीं आई. पापा ठीक से समझाओ न!! प्लीज!

अच्छा इसे ऐसे समझो कि अगर जिस संभावना की तलाश विदेशी धरती पर करने नित यात्रायें की जा रही हैं. नये मित्र बनाये जा रहे हैं ..ओबामा ..बराक हो जा रहे हैं और जिन्पिंग ..झाई..इन लन्गोटिया मित्रों के गप्प सटाके के दौर में...अगर उस संभावना की एक झलक भी मिल गई तो बस हर तरफ देश में विकास ही विकास नजर आयेगा और तब ये और जोर शोर से नई नई संभावनायें तलाशते और ज्यादा विदेशों में नजर आयेंगे.

मगर पापा, पता कैसे चलेगा कि विकास आ गया?

बेटा, कुछ विकास तो तुम अपने मानसिक स्तर पर देख ही रहे हो..जिन देशों के नाम तुमने सुने भी न थे..इस अंकल की यात्राओं ने और टीवी वालों की मेहरबानी ने तुमको कंठस्थ करा दिये हैं..जैसे शैशल्स, मंगोलिया आदि आदि..अभी और बहुत सारे सीखोगे हर हफ्ते एक नये देश का नाम...

बाकी सही मायने में विकास को समझने के लिए..ऐसे समझो कि जब एक सुबह तुम जागो और सुनो कि तुम्हारा शहर अब तुम्हारा वाला शहर न होकर स्मार्ट शहर हो गया है याने कि इत्ता स्मार्ट कि आत्म हत्या करने के लिए अब न तो तुम्हें खेतिहर होने की जरुरत महसूस हो, न खेत की और न खराब मौसम का इन्तजार करना पड़े और हर जगह ये कर जाने के कारण स्मार्टली खड़े नजर आयें..तो समझ लेना कि विकास ने दस्तक दे दी है....

याने जब तुम्हारी ट्रेन एक्सप्रेस, पैसेंन्जर, सुपर फास्ट से स्मार्ट होकर बुलेट हो जाये मतलब कि वो ३०० किमी प्रति घंटा की रफ्तार से दौड़ तो सकती हैं मगर उसके दौड़ने के लिए जरुरी ट्रेक अभी स्मार्ट होने के इन्तजार में हैं और उसे स्मार्ट बनाने वाली संभावना अभी तलाशी जाना बाकी है... जब बड़ी बड़ी विदेशी संभावनाओं की उत्साहित संताने मेक इन इंडिया का नारा लगाते लगाते आधारभूत जरुरतों जैसे बिजली, पानी, सड़क आदि के स्मार्ट होने के इन्तजार में ब्यूरोक्रेसी से लड़ते हुए एक किसान की तरह अच्छे दिनों के इन्तजार में किसी पेड़ से लटक कर अपनी हर योजनाओं का गला घोंट स्मार्टली वापस लौट जायें - उन्हीं संभावनाओं के पास, जहाँ से वो आई थीं- खुद को संभावनाओं के साथ पुनः तलाशे जाने के लिए. तो समझ जाना विकास आ गया है.

जब आत्म हत्या और हत्या समकक्ष हो जाये और पोस्टमार्टम का इन्तजार न करे और स्मार्ट सिस्टम पहले से उनके हो सकने का कारण बता सके...और कारण भी ऐसा जिसकी वजह से केस में आगे किसी इन्वेस्टीगेशन की जरुरत को नकारा जा सके ...तब समझ लेना विकास आ गया.

जब गांव इतने स्मार्ट विलेज और ग्रमीण इतने स्मार्ट विलेजर हो जाये कि वो इस बात को समझने लगे कि लैण्ड का स्मार्ट इस्तेमाल एग्रीकल्चर के लिए उपलब्ध कराना न होकर एक्विजिशन के लिए उपलब्ध कराना होता है...तब समझ लेना कि संभावना की तलाश का बीज विकास का फल बन कर बाजार में बिकने को तैयार है.

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पापा, मुझे तो अभी भी कुछ समझ नहीं आ रहा..भला विदेश में संभावना तलाशने से देश में किसी का विकास कैसे हो सकता है. कोई उदाहरण देकर समझाईये न!!

ओके, चलो इसे ऐसे देखो- तुम्हारे चाचा संभावनाओं की तलाश में कुछ बरस पहले सपरिवार विदेश में जा बसे थे- है न!!

और मैं देश में नौकरी करता रहा. तुम्हारे दादा जी धीरे धीरे अशक्त और बुढ़े हो गये...और तुम्हारे चाचा विदेश में संभावनाओं की तलाश के साथ व्यस्त...

बस!! मौका देखकर और तुम्हारे दादा के अशक्तता का फायदा उठाते हुये, तुम्हारे दादा की जिस जायदाद का आधा हिस्सा मुझे मिलना था वो पूरा मैने अपने नाम करा और बेच बाच कर सब अपना कर लिया...स्मार्टली! ये कहलाता है स्मार्ट विकास!!

देखा न कैसे तुम्हारे चाचा की विदेश में संभावनाओं की तलाश ने मुझे देश में ही रहते हुए दुगना विकास करा दिया..अब आया समझ में तुमको?

जी पापा, अब बिल्कुल समझ में आ गया....भईया भी कह रहा था कि बड़ा होकर वो कम्प्यूटर इंजीनियर बनेगा और विदेश जायेगा... तब तक तो आप भी बुढ़े हो जाओगे और मै भी भईया के विदेश में संभावना तलाशने की वजह से, आपके बुढ़ापे का फायदा उठाकर, आपकी जायदाद का मालिक बन कर दुगना विकसित हो जाऊँगा...

इतना ज्यादा विकसित और स्मार्ट कि आपको बिल्कुल तकलीफ न हो इसलिए नर्सिंग वाली सुविधायुक्त रिटायरमेन्ट होम में आपको स्पेशल कमरा दिलवाऊँगा ...क्यूँकि आप मेरे स्वीट और स्मार्ट पापा हो!!

लव यू पापा!!

यूँ आर माई रोल मॉडल पापा!!

-समीर लाल ’समीर’

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गुरुवार, अप्रैल 30, 2015

त्रासद मानसिकता

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अभी लम्हा पहले, जैसे ही अपने थके शरीर को कुछ आराम देने की एक ख्वाहिश लिए उसने पलंग पर लेट आँख मूँदी ही थी कि उसे लगा कि मानो कई सारी रेलगाड़ियाँ धड़धड़ाती हुई उसके मकान के नीचे से गुजरी हों...आँख खोली तो देखा पूरा मकान और उसकी हर दीवार उस धड़धड़ाहट से जैसे काँप उठी हो...न कभी सोचा होगा और न कभी अहसासा होगा इस धड़धड़ाहट को तो दहल कर काँप जाना ऐसे में एकदम लाज़मी सा है.

उसने महसूस किया अपने सीने पर आ गिरी छत की उस बीम का वजन कि इंच भर मौत से दूर...सांसे दफन होने की कगार पर..और खिड़की से आती कोहराम की आवाजें..हृदय विदारक क्रंदन के बीच...पदचापों की भागती चित्कार...जाने कौन कहाँ कैसे दफन होगा..कौन से अरमान...कौन से सपने...क्या कोई सोचता होगा इस मंजर के बीच...एक जिन्दगी की भीख मांगती मौत से फरियाद करती जुबां...चुप चुप सी घुँटी हुई आवाज...

चलते चलते एक विचार...कि इस जीवन से..जाने क्या किसने पाया होगा और जाने क्या किसने खोया होगा, कौन किस अपराध बोध तले क्या महसूस करता होगा की सोच से आगे ...आज सोच मजबूर हुई होगी...इस जीवन से...मात्र जी लेने की एक ऐसी तमन्ना लिए..और आती एक साँस...

और वो भी एक और इन्तजार में कि कैसे ले लूँ एक सांस और....

त्रासदी से गुजरती मानसिकता कभी सुकूं नहीं तलाशती...

उसकी सोच के परे की बात है सुकूँ और शांति जैसी शब्दावलि....

उसे तलाश होती है तो बस इतनी कि त्रासदी का असर कुछ कम हो जाये...

दुर्गति की गति को थोड़ा विराम मिल जाये..और वो जी सके एक और पल..चाहे जैसा भी पल..

एक अगला पल..जिसका उसे न अंदाज है और न ही कोई अरमान कि कैसा गुजरेगा वो पल..

मगर वो पल आये बस इतनी सी चाह...चाह कहें कि एक मात्र बचा विकल्प..

सुकूँ और शांति से भरे बेहतर पलों को जीने की चाह सिर्फ बेहतर पलों में जीते लोगों का शगल है ..

वरना तो किसी तरह जी पायें..बस इतना सा है सारा आसमान..कहने को मुठ्ठी भर आसमान...

मगर सोचें तो चिड़िया की चोंच में सिमटा सारा जहां..न जाने कितनों का..

उस जहां में जहाँ अब इन्सानों के नाम बदले है नम्बरों में..मृतक क्रमांक ७७८... मृतक क्रमांक ९७१ ..मजहब ..न मालूम..और सरकारी इन्तजाम...सब एक साथ जले और राख हो गये!!

सड़कों पर सबके लिए एक सा कैंडिल लाईट विज़ल..एक से फूल..एक से आँसूं..और एक सी राजनीति..

कुछ गहरे उतर कर सोचो तो...

एक दौड़ क्यूँ..

अगर ठौर ये..

फिर कहर क्यूँ?

-रुको, सोचो...

कुछ पल को जी लो जरा!!

-समीर लाल ’समीर’

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रविवार, मार्च 01, 2015

अदृश्य दृश्य

दफ्तर आते जाते अक्सर ही ट्रेन की उपरी मंजिल में बैठ जाता हूं. घोषित ’शांत क्षेत्र’ है अर्थात आपसी बातचीत, फोन आदि की अनुमति नहीं है. अक्सर मरघट की सी शांति की बात याद आती है इस जगह. मगर जब आप किसी से बात नहीं कर रहे होते तो मन के भीतर ही भीतर कितनी सारी बातचीत कर रहे होते हैं यह देखने वाले जान ही नहीं सकते. ऐसी बातें जो यूँ तो शायद ही कर पायें कभी मगर दोनों पात्र खुद ही के भीतर आपस में प्रश्न उत्तर करते, झगड़ते, विवाद करते, जबाब माँगते, उलझन सुलझाते, हँसते और जाने क्या क्या और एकाएक आप खुद को डपट देते हैं कि ये क्या पागलपन है, खुद ही उलझे हो अपने भीतर ही भीतर बातचीत में खुद को भ्रमित करते उसी स्वनिर्मित भ्रम की दुनिया में जो तुमने खुद ही गढ़ ली है बिना कुछ देखे, बिना कुछ जाने.

खुद की झिड़की सुन सकपकाया सा देखने लगता हूँ खिड़की से बाहर. भागती इमारतें, पेड़, सड़के और ठहरा हुआ मैं. भागती ट्रेन के भीतर बैठे यही अहसास कि सब कुछ भाग रहा है और थिर हूँ मैं और थमा हुआ है वक्त मेरा कि एकाएक नजरों की सामने से भागती इमारतें, पेड़ सब बदल जाते हैं कुछ चेहरों में, कुछ ऐसे स्थानों में जो यादों में कहीं दफन हैं और फिर बातचीत का सिलसिला शुरु- वही प्रश्न उत्तर, वही झगड़े, वही विवाद, वही उलझाव सुलझाव, हँसी ठहाके, क्रुदन, खुशबू का अहसास, साथ गुजारे पल और फिर वही खुद को खुद की झिड़की. चेहरे के बदलते भाव और फिर वही खिड़की के बाहर दिखते बदलते अदृश्य दृश्य.

कोई भीड़ में तन्हा और कोई अकेला ही भीड़..समय वही..वक्त का तकाजा जुदा जुदा..

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डंडी से ढोल पीटता बाप

और दो बाँसों के बीच

बँधी रस्सी पर

संभल संभल पर खुद को संभालती

डगमग डगमग करतब दिखाती

परिवार के पेट की खातिर

मैली कुचैली फ्राक में छोटी नटनी गुड़िया..

तालियाँ बजाते तमाशबीन...

याद करता हूँ नजारा

और

उतर पड़ता हूँ मन के भीतर

यादों की डोर पर

संभल संभल कर कदम जमाते

कुछ दूर चलने की नाकाम कोशिश

सुनाई देती है खुद की झिड़क

और लौट आता हूँ फिर अपनी

आज की दुनिया में..

कल फिर इन्हीं राहों से गुजरने के लिए...

-समीर लाल ’समीर’

 

चित्र साभार मित्र प्रशांत के ब्लॉग से

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रविवार, मार्च 09, 2014

आज क्या हुआ होगा...मेरे देश में

Montreal Weather 20130319

आज सुबह रोज की तरह ही ६ बजे से कुछ सैकेंड पहले ही नींद खुली. हमेशा सुबह ६ बजे का अलार्म लगा होता है मगर एक आदत ऐसी बन गई है कि मैं उसके चन्द सैकेन्ड पहले उठकर अलार्म को बजने ही नहीं देता...साल में एकाध बार ही बजा होगा. जब यह लिख रहा हूँ तो मुझे लगता है कि बीच बीच यूँ ही चैक कर लेना चाहिये कि अलार्म काम कर भी रहा है या नहीं वरना किसी पर बहुत ज्यादा भरोसे में रहने से कभी धोखा ही न हो जाये.

कमरा तो हीटिंग से गरम था मगर बन्द खिड़की से झांक कर देखा तो हल्की हल्की बरफ गिर रही थी जो रात भर से गिरते गिरते पैर धंसा देने लायक तो इक्कठा हो ही गई थी. कुछ रोज पहले आईस स्ट्राम आया था, उसकी बरफ अब तक पूरी तरह से गली भी न थी और उसकी फिसलन जगह जगह बरकार थी. डर था आज की इस बरफ के फुओं के नीचे वो आईस की टुकड़े तो दिखेंगे भी नहीं और उस पर पैर पड़ा नहीं कि आप फिसले. और अगर आप फिसले तो हड्डी का टूटना लगभग तय है. बहुत संभलना होगा. बरफ का जूता ..थोड़ी मदद जरुर मिल जायेगी उससे मगर कितनी देर थामेगा वो भी भला... कदम तो अपने खुद ही संभालना होगा...जूते पर सीमित भरोसा ही किया जा सकता है!

यूँ तो घर से बस स्टॉप की दूरी मात्र पाँच मिनट पैदल की है मगर जब तापमान हो -२० और हवा के बहाव के संग विंड चिल को गिनते हुए -३५ तब ऐसे हालातों में बरफ के भारी भारी जूते पहने, सूट के उपर से लम्बा चौड़ा भारी भरकम जैकेट लादे,दस्ताने, टोपी, गले से नाक तक सब कुछ ढ़कता मफलर, चश्मा और चुल्लु भर पानी सोखकर मर जाने वाले मुहावरे वाली निकली चुटकी भर नाक कि सांस आती जाती भर रहे किसी तरह, ऐसे में इन सबके साथ सामनजस्य बैठाते धीरे धीरे कदम रखते १५ से २० मिनट तो लग ही जाते हैं स्टॉप तक पहुँचने में. तब तक नाक की चोंच जो खुली हुई थी वो बरफ हो चुकी होती है जिसे स्टॉप में घुस कर जब तक कुछ देर गरम न कर लो, पोंछना मना रहता है वरना स्नो बाईट से नाक ही कट कर अलग हो जायेगी. त्वचा के छिद्रों में भरा पानी बरफ बन जाता है तो और क्या आशा की जा सकती है, नाक का कटना हमारे यहाँ वैसे भी पूरे खानदान को एफेक्ट करता है और इसे शास्त्रों में बहुत बुरा माना गया है अतः मैं तो पौंछता ही नहीं जब तक दफ्तर पहुँच कर १० मिनट हीटिंग में न बैठ लूँ. किस किस को समझाऊँगा देश में कि यह नाक कर्मों से नहीं सर्दी से कटी है बस पौंछ देने के चक्कर में.

बस में चढ़कर, हालांकि हीटिंग होती है मगर बार बार रुकने और दरवाजा खुलने से जीत ठंड की ही होती है, दुबके सहमें से एक कोना थामे स्टेशन पहुँचते हैं तो फिर वही तीन मिनट और मौसम की बदौलत १० मिनट का खुले में पैदल सफर...स्टेशन भी कुछ दूर तक गरम और ढका होता है फिर वही खुला खुला सा...ढका हिस्सा भीड़ घेर चुकी होती है और आप -३५ में खुले में राम नाम जपते हुए ट्रेन के आने के इन्तजार में लग जाते हैं..कई बार आस पास खड़े इन गोरों को देखकर सोचता हूँ कि राम नाम न सही, ऐसी स्थितियों में ये भी तो कुछ न कुछ जपते ही होंगे..कौन जाने और करना क्या है,,,मगर वही जिज्ञासु स्वभाव ..हम हिन्दुस्तानियों का.

चार पांच मिनट बाद ट्रेन का आना ऐसा लगता है कि जैसे कोई जीवनरक्षक आ गया हो एकाएक.. ट्रेन में बैठते ही हीटिंग में एक एक करके टोपी, दस्ताने और जैकेट उतरना शुरु..वरना तो लू लग जाये उस हीटिंग में. ट्रेन के भीतर की गरमी से बाहर बरफ को गिरते देखना बहुत मनमोहक लगता है बिल्कुल बचपन से देखते आये कलेंन्डर में बनी बर्फ और मकानों की तस्वीर सा. मगर भीतर जिस चेहरे पर नजर पड़ जाये उसे ही देखकर लगे कि अभी अभी मौत के मूँह से निकल कर आया है और अब चैन मिला है उसे. ट्रेन की दो मंजिल, यूँ तो सभी ओर इतने सारे लोगों के बावजूद एकदम सन्नाटा होता हैं मगर ऊपर वाली मंजिल ऑफिसियली क्वाईट जोन होती है याने नो फोन, नो बातचीत...एकदम शांत..कई बार लगता है कि किसी की मय्यत में आये हैं. यही सोचकर आँसू गिरने को होते हैं कि तब तक ख्याल आ जाता है कि दफ्तर जा रहे हैं तो बस मुस्करा कर रह जाते हैं. वैसे तो देश में अब लोग मय्यत तक में भी ठठा कर हँसने से गुरेज नहीं करते मगर हम साथ वो पुराने वाले संस्कार जो लाये थे वो वैसे ही बरकरार है, बदल पाने का मौका ही नहीं लगा वक्त के साथ.

मैं अक्सर इस शांत समय और माहौल का उपयोग अपने आई-पैड पर कहानियाँ, पत्रिकायें आदि पढ़ने में करता हूँ. बीच बीच में थोड़ा इधर उधर भी नजर पड़ ही जाती है और पाता हूँ कि कुछ महिलायें और नवयुवतियाँ, जो कि मेरे समान ही आई पैड और आई फोन धारक हैं अक्सर कैमरे को फ्रंट मोड मे कर के उसमें देख देख कर मेक अप कर रही है. माना कि सुबह सुबह घर में सजने धजने का समय नहीं मिल पाता होगा मगर, जो काम दो रुपये का आईना कर दे उसके लिए ७०० डॉलर का आई पैड और आई फोन. लेकिन फैशन परस्ति के इस युग में मैं कौन होता हूँ उन्हें रोकने वाला. कई बार तो खीज कर मैने भी अपने आई पैड में देखकर कंघी कर डाली कि कोई मुझे कम न समझे हालांकि बाद में याद आया कि कंघी करने जितने तो बाल ही नहीं बचे सर पर...शायद इसीलिए वो पड़ोस की सीट पर बैठी लड़की हंसी होगी.

आज दफ्तर जाना टाल पाता तो टाल देता..एक तो १०२ बुखार..उस पर से जुकाम. ऑफिस जाना जरुरी था तो चल दिये. लेकिन दफ्तर में कुछ जरुरी मीटिंग वगैरह निपटा कर एक सरकारी कर्मचारी की तर्ज पर पहला मौका लगते ही घर की लिए निकल पड़ा. निकलने की जल्दी बाजी में, जो दफ्तर पहुँच कर बरफ का जूता उतार कर नार्मल वाला जूता पहन लेते हैं, वो ही नार्मल जूता पहने निकल पड़े. बिल्डींग के अन्दर चलते चलते जब स्टेशन पहुँचे तो ख्याल आया – अरे, जूता तो बदला ही नहीं. अब जूता बदलने वापस दफ्तर जाओ तो ट्रेन छूटे और फिर एक घंटे बाद की ट्रेन मिले या ऐसे ही निकल लो संभल संभल कर...तो समय पर घर पहुँच कर आराम किया जाये..सो निकल लिए संभल संभल कर,..कई बार गिरते गिरते बचे..कभी किसी को गिराते गिराते बचे मगर आ ही गये अपने घर वाले स्टेशन पर ट्रेन में सवार होकर,,आई पैड पर भटकते..कहानियों की दुनिया में खोये..कनखियों से अड़ोस पड़ोस का नजारा देखते..

घर वाले स्टेशन पर उतरे तो हवा जबरदस्त चल रही थी..घर ले जाने वाली बस अभी तक आई नहीं थी. पहली बार अहसासा कि लोग ठंड में कैसे मर जाते होंगे. वो तो समय रहते बस आ गई वरना जैकेट, टोपी, दस्ताने के बावजूद पैन्ट को भेदती ठंड ने तो लगभग प्राण ले ही लिए थे...बस...बच ही गये...आगे से थर्मल पहना करुँगा..आज तय ही कर लिया...उम्र के बदलते पढ़ाव को पहचानना भी तो जरुरी है.

बस ने घर के पास वहीं बस स्टॉप पर उतारा जहाँ रोज उतारती है मगर आज बस स्टॉप से घर आने में शरीर कुल्फी हो गया...क्यूँकि अबकी तो बरफ के जूते भी नहीं पहने थे. बस, चुनाव २०१४ पर चल रही नित नई खबरों को चल कर टीवी पर मोदी का भाषण तो केजरीवाल का नया आरोप आदि देख लेने की चाहत संबल बनी रही...तो घर तक खुद को घसीटते चले आये और किसी तरह एक हाथ से दूसरा हाथ पकड़ घंटी बजा दी.

घर में घुसे तो शरीर और आवाज दोनों लगभग जम चुके थी. पत्नी समझ गई तो हमें पिघलाने के लिए फायर प्लेस के सामने बैठाया गया, बैठाया तो क्या गया लगभग रखा ही गया ताकि हम होश में आ जायें तो वो अपनी बात कह पायें वरना तो कुल्फी बनो कि आइस क्रीम, किसी को क्या लेना देना...समय के साथ खुद ही पिघल लोगे.

आह!! प्यार मोहब्बत में वो इस तरह कहर ढाते हैं...

आज बदले बदले हुए से मेरे सरकार नजर आते हैं..

हमें फायर प्लेस के सामने पिघलवा कर पूछा गया कि ठीक तो हो? हम मंशा समझ ही न पाये और कह बैठे कि हाँ, ठीक हैं!!

बस, फिर क्या- घर के सामने की बरफ हटाने से लेकर अदरक वाली चाय बनाने तक का जिम्मा हम पर आ टिका क्यूँकि बाकी सबकी तबीयत खराब है. सब मौसमी बुखार और जुकाम से पीड़ित. हमसे किसी ने पूछा ही नहीं कि तुम्हारी तबीयत कैसी है और जल्दी क्यूँ आये?

बताया गया कि शाम का खाना पूरा बना रखा है, उसकी चिन्ता मत करना..बस, करेले वाली अपनी स्टाईल की सब्जी और बना लो. थोड़ा सा कुंदरु छौंक देना...चावल चढ़ा दो और दाल तो फट से बना ही लेते हो..उसे प्याज लहसून से बघार देना. रोटी तो वैसे भी इस मौसम में कौन खायेगा मगर आपको खाना हो तो बाजार की नान रखी है वो गरम कर लेना...मैं सोचता ही रह गया कि जब ये सब करना बाकी है तो फिर खाना कौन सा बना रखा है? जिसका जिक्र करके बात की शुरुवात की गई थी.

खैर, ये सब कुछ जीवनचर्या का हिस्सा है, इसमें बहस कैसी? बहस तो जब दिल्ली में नहीं होती इनसे उनसे समर्थन लेते तो हमने तो इनकी कभी खुले आम इत्ती बुराई भी नहीं की है कि बहस न करने में शरम आये!!

समय बलवान है,,,वक्त महान है..कल और ज्यादा ठंड की भविष्यवाणी है मगर परसों से सब सामान्य है!! सामान्य याने – १० वगैरह. -३० से -१० में आने पर वैसी ही राहत लगती है जैसे पैट्रोल का दाम ५ रुपये बढ़ा कर २ रुपये कम कर देने में.

वैसे इन सबके बीच एक बात सोचने वाली है कि न तो मुझे दिल्ली से कुछ लेना देना, न केजरीवाल से, न कांग्रेस से...न मोदी से...न लोकसभा २०१४ के चुनाव से- टोरंटो में रहता हूँ...कनाडा का नागरिक हूँ मगर मन है कि भारत भागता है हर पल...वहाँ क्या हो रहा है..किसकी सरकार बन रही है,,,किसकी सरकार गिर रही है,,,.किसी ने सही ही कहा है...कि आप एक भारतीय को तो भारत से बाहर निकाल सकते हो मगर भारत को उस भारतीय के बाहर कभी नहीं निकाल सकते!!

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शुक्रवार, जुलाई 20, 2012

वो वाली गज़ल..

पिछले आलेख के साथ वादा था कि गज़ल पूरी सुनाऊंगा तो पढ़िये पूरी…और हाँ. मेरी आवाज में सुनना हो तो कमेंट करो..अगली पोस्ट में गा कर सुनायेंगे एक अलग अंदाज में..मगर कहो तो::

 

2012-07-13 19.48.21

 

दर्द सबका हर सके वो मुस्कान होना चाहिये...

इंसान के भीतर भी इक इंसान होना चाहिये.

 

भूल जाते हम सदा ही दुश्मनों के वार को

हर गली में अब यहाँ, शमशान होना चाहिये..

 

रोज मरते हैं हजारों, मंहगाई की इस मार से

भूख उनको ना लगे, वरदान होना चाहिये..

 

दूर कर दे भाई को, माँ बाप के प्रस्थान पर

अब नहीं ऐसा कहीं, स्थान होना चाहिये...

 

जिसकी शिरकत देख के, अब जा छुपा है ’समीर’

कह रहा है वो मेरा, सम्मान होना चाहिये..

 

-समीर लाल ’समीर’

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शुक्रवार, जून 08, 2012

कोहरे के आगोश में...

मैं उससे कहता कि यह सड़क मेरे घर जाती है- फिर सोचता कि भला सड़क भी कहीं जाती है. जाते तो हम आप हैं. एक जोरदार ठहाका लगाता और अपनी ही बेवकूफी को उस ठहाके की आवाज से बुनी चादर के नीचे छिपा देता.

फिर तो हर बेवकूफियाँ यूँ ही ठहाकों में छुपाने की मानो आदत सी हो गई. आदत भी ऐसी कि जैसे सांस लेते हों. बिना किसी प्रयास के, बस यूँ ही सहज भाव से. इधर बेवकूफी की नहीं कि उधर ठहाके लगा उठे और सोचते रहे कि इसकी आवाज में सब दब छुप गया- अब भला कौन जान पायेगा?

यूँ गर कोई समझ भी जाये तो हँस तो चुके ही है, कह लेंगे मजाक किया था.

उम्र का बहाव रुकता नहीं और तब जब आप बहते बहते दूर चले आये हों इस बहाव में तो एकाएक ख्याल आता है कि वाकई, एक मजाक ही तो किया था. अब ठहाका उठाने का मन नहीं करता. एक उदासी घेर लेती है ऐसी सोच पर. और उस उदासी की वजह सोचो- तो फिर वहीं ठहाका- बिना किसी प्रयस के- सहज ही.

कहाँ चलता है रास्ता? कहाँ जाती है सड़क? वो तो जहाँ है वहीं ठहरी होती है. हम जब चलते हैं तब भी ठहरे से. सुबह जहाँ से शुरु हों- शाम बीतते फिर उसी बिन्दु पर.

हासिल- एक दिन गुजरा हुआ. हाँ, दिन चलता है. चलते चलते गुजर जाता है- जैसे की हमारी सोच, हमारे अरमान, हमारी चाहतें. सब चलती हैं- गुजर जाती हैं. ठहर जाता हूँ मैं- जाने किस ख्याल में डूबा- उस रुके हुए रास्ते पर- सड़क कह रहा था न उसे. जो जाती थी मेरी घर तक.

वो कहता कि सड़क जाती है वहाँ जो जगह वो जानती है. अनजान मंजिलों पर तो हम उड़ कर जाते हैं सड़क के सहारे. एक अरमान थामें.

मगर सड़क जायेगी घर तक. तो मेरी सड़क क्यूँ नहीं जाती मेरे उस घर तक- जहाँ खेला था बचपन, जहाँ संजोये थे सपने- अपने खून वाले रिश्तों के साथ.

कहते हैं फिर कि वो जाती है उन जगहों पर जिसे वो जानती है.

बताते हैं कि सड़क के उस मुहाने पर जहाँ मेरा घर होता था, अब एक मकान रहता है. मकान नहीं पहचानती सड़क- घर रहा नहीं. कई बरस हुए उसे गुजरे.

तो खो गया फिर उस रुकी सड़क के उस मोड़ पर- जहाँ से सुबह चलता हूँ और शाम फिर वहीं नजर आता हूँ इस अजब शहर में- जो खोया रहता है बारहों महिने- छुपा हुआ कोहरे की चादर में. किसी बेवकूफी को ढापने का उसका यह तरीका तो नहीं?? एक ठहाका लगाता हूँ- ये मेरा तरीका पीछा नहीं छोड़ता और रास्ता है कि चलता नहीं.

तो कुछ कदमों पर समुन्दर है और पलटता हूँ तो पहाड़ी की ऊँचाई...जिसे छिल छिल कर बनाये छितराये चौखटे मकान...अलग अलग बेढब रंगों के...कहते हैं यह सुन्दरता है सेन फ्रान्सिसको की..हा हा!! मेरा ठहाका फिर उठता है और यह शहर- छिपा देता है उसे भी अपनी कोहरे की चादर की परत में...और मैं गुनगुनाता हूँ अपनी ताजी गज़ल.....

गज़ल जरा डूब कर सुनना तो सुनाई देगी इसी कोलाज़ की झंकार धड़कन धड़कन:

 

fogdaly

भले हों दूरियाँ कितनी कभी घर छोड़ मत देना

हैं जो ये खून के रिश्ते , उन्हें तुम तोड़ मत देना

 

उसी घर के ही आँगन में बसी है याद बचपन की

खज़ाना बंद गुल्लक का कभी तुम फोड़ मत देना

 

गमकती खुशबू कमरे में उतरती है झरोखे से

वो डाली मोंगरे वाली कभी तुम तोड़ मत देना

 

बरसती खुशियाँ तुम पर हों रहो हर हाल में हँसते

मिले कोई दुख का मारा तो नज़र को मोड़ मत देना

 

पड़ी है नीचे सीढ़ी के पिता की वो छड़ी अब भी

सहारा उनकी यादों का कहीं तुम तोड़ मत देना

-समीर लाल ’समीर’

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शुक्रवार, मार्च 02, 2012

६ साल पूरे हुए और हम जहाँ के तहाँ: मैं मोती होना नहीं चाहता!!!

जब ३ मार्च २००६ को अपना ब्लॉग शुरु किया था तो बताया गया था कि बस एक साल की मेहनत और फिर इससे कमाई शुरु हो जायेगी. बड़े मन से जुटे. फिर साल दर साल बीतते गये. हर साल यही उम्मीद कहीं न कहीं बँधाई गई कि अगले साल से ...कमाई शुरु.

आज ६ साल बीत गये. मगर लोगों की बात सुन आज भी आशांवित हूँ कि बस, अगले साल से कमाई शुरु होने वाली है और फिर नौकरी छोड़ो और बस, दिन भर ब्लॉगिंग...जितना करोगे, उतना मजा...उतनी कमाई...क्या बात है!!

आज हो गये हैं ६ साल पूरे इस ब्लॉग का नशा लगे. समय के पंख दिखते नहीं मगर इस तरह अहसास तो करा ही देते है. फोटो वही पुराना लगाया हुआ है ६ साल पहले का. यही विडंबना है अधेड़ावस्था की कि जवानी का जाना मानो स्वीकार ही न हो...कई बार सोचता हूँ कि इससे बेहतर तो राजनिति मे उतर जाऊँ...वहाँ स्वीकार्य है चिर युवा रहना....आडवानी जी जैसे युवा अब भी प्रधान मंत्री बनने का स्वपन पाले लगे ही हैं रथ यात्रा निकालने में तो हमारी स्थिति तो थोड़ी बेहतर ही कहलायेगी.

खैर यह सब छोड़ें..६ साल के ब्लॉगर की कविता पढ़े...बधाई दें, मुस्करायें या जो मन आये सो करें मगर शुभकामनाएँ तो दे ही जायें:

कभी मन में था कि साहित्यकार कहलाऊँ ब्लॉग लिख लिख कर...हा हा...ब्लॉग और साहित्य...कितने न मुस्करा देंगे..अनभिज्ञ एवं बेवकूफ...मगर मैं चुप रहूँगा...क्यूँ कुछ कह कर अपने संबंध खराब करुँ....अब मन नहीं हैं साहित्यकार कहलाने का...मगर मन पर तो लोभ ने कब्जा जमाया हुआ है..उसका क्या करुँ...इस कविता में दृष्य देखें तो शायद आपका मन भी बदले:

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मैं मोती होना नहीं चाहता!!!

बूँद एक चली

छोड़ बादल को

प्रसन्न मन

मिलेगी नीचे धरा पर

एक तत्काल बनी नाली में

जहाँ तेरती होंगी

नन्ही नन्ही किश्तियाँ

कागज़ की

वहीं

बनायेगी साथी बून्दों को

दोस्त अपना...

खेलेगी, गुनगुनायेगी

उमंगों में डूब

उन के साथ

गली में अक्स्मात बनी

एक नाली खुश हुई

आकर मिलेंगीं और बून्दें

तो वह मिल सकेगी

शहर भर की नालियों के संग..

पूछेगी हाल सारे शहर का...

गपियायेगी..खिलखिलायेगी और

मिलेंगी

इक नदिया में जाकर

नदी खुश थी

उमड़ती हुई धाराओं से मिल

जा सकेगी वह

उस गहरे सागर तक

जहाँ आती हैं सब नदियाँ उसकी तरह

बाँटेगी उनकी खुशियाँ..

हँस लेगी उनके साथ..

रहेगी खुश...

और सागर...

समाहित कर सबको अपने भीतर

शांत और गंभीर.....

फिर एक दिन एक हिस्सा

बन जाता वाष्प...

सूर्य की उष्मा से...

और उठ जा मिलती

उष्मा से बनी वाष्पकिरणें...बूँदें...

पुनः उन्हीं बादलोंमें...

जीवन के

अनवरत गतिक्रम सी

एकाएक एक बूँद रो उठती है

इस बार विदा होते...

कहीं मैं नाली की जगह

सीप में न समा जाऊँ...

मैं मोती बनना नहीं चाहती...

माना मोती कीमती होता है पर

मुझे...हाँ.....मुझे

फिर वापस आना है

अपनों से मिलने

और बनाये रखनी है

अपने होने की अस्मिता

आज फिर एक बार

आँख नम है मेरी...

मुझे वापस आना है...

अपनों में मिल जाना है!!!!

-मैं मोती होना नहीं चाहता!!!

-समीर लाल ’समीर’

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सोमवार, फ़रवरी 13, 2012

बुरा हाल है ये मेरी जिन्दगी का...

इधर कुछ दिनों से खाली समय में किताबों में डूबा हूँ. न लिख पाने के लिए एक बेहतरीन आड़ कि अभी पढ़ने में व्यस्त हूँ.

हाथ में आई पैड है और उस पर खुली है “शान्ताराम”. नाम से तो शुद्ध हिन्दी तो क्या, मराठी की किताब लगती है मगर है अंग्रेजी में. ईबुक के हिसाब से १७०० पन्नों की है और पढ़ते हुए अबतक लगभग २५० पन्नों के पार आ पाया हूँ मैं.

शायद २५० पन्ने शुरुआत ही है. अभी अभी नामकरण हुआ है न्यूजीलैण्ड के लिन का (जो मुंबई में आकर लिनबाबा हुआ), लिनबाबा से “शान्ताराम”. बहुत चाव से लिन अपने नये नाम शान्ताराम को महाराष्ट्र के एक गांव में आत्मसात कर रहा है जिसका अर्थ है शान्ति का प्रतीक और मैं अब जब शान्ताराम के मुंबई प्रवास और फिर रेल और राज्य परिवहन की बस में सुन्दर गांव की यात्रा को पढ़ रहा हूँ तो अपने मुंबई के ५ वर्षीय प्रवास और अनेक बस और रेल यात्राओं की याद में डूब पुस्तक से इतर न जाने किस दुनिया में खो जाता हूँ. पठन रुक रुक कर चलता है मगर रुकन में भी जीवंतता है. एकदम जिन्दा ठहराव...लहराता हुआ- बल खाता हुआ एक इठलाती नदी के प्रवाह सा- जिसके बहाव में भी नजरों का ठहराव है.

ऐसे लेखकों को पढ़कर लगता है कि कितना थमकर लिखते हैं हर मौके पर- हर दृष्य और वृतांत को इतना जिन्दा करते हुए कि अगर फूल का महकना लिखेंगे तो ऐसा कि आप तक उस फूल की महक आने लगती हैं. माहौल महक उठता है.

नित पढ़ते हुए कुछ गाना सुनते रहने की आदत भी लगी हुई है. अक्सर तो यह कमान फरीदा खानम, आबीदा परवीन, नूरजहां, मुन्नी बेगम, मेंहदी हसन, बड़े गुलाम अली खां साहब आदि संभाले रहते हैं- एक अपनेपन सा अहसासते हुए जी भर कर सुनाते हैं अपने कलाम..पिछले दिनों रेशमा नें भी खूब सुर साधे- जी भर कर जी बहलाया- शुक्रिया रेशमा.

आज मन था सुनने का तो सोचा कि औरों को मौका न देने से कहीं जालिम न कहलाया जाऊँ. तो आज इन पहुँचे हुए नामों को आराम देने की ठानी और मौका दिया सबा बलरामपुरी को. सबा ने भी उसी तरह अपनेपन से मुस्कराते हुए अपने दिलकश अन्दाज में सुनाया:

अजब हाल है मेरे दिल की खुशी का

हुआ है करम मुझ पे जब से किसी का

मुहब्बत मेरी ये दुआ मांगती है

कि तेरे साथ तय हो सफर जिन्दगी का...

सबा की आवाज की खनक, अजीब से एक बेचैनी, एक कसक और कसमसाहट के साथ ही उसकी लेखनी मुझे खींच कर ले गई उस अपनी जिन्दगी की खुशनुमा वादी में..जहाँ शायद भाव यूँ ही गुनगुनाये थे मगर शब्द कहाँ थे तब मेरे पास.न ही सबा की लेखनी की बेसाखियाँ हासिल थी उस वक्त....जिसकी मल्लिका सबा निकली. वो यादें तो मेरी थीं और हैं भी. उन पर सबा का कोई अधिकार नहीं तो उनमें डूबा मैं तैरता रहा मैं हरपल तुम्हें याद करता...गुनगुनाता:

मुहब्बत मेरी ये दुआ मांगती है

कि तेरे साथ तय हो सफर जिन्दगी का...

दुआएँ यूँ कहाँ सब की पूरी होती हैं. मेरी न हुई तो कोई अजूबा नहीं. अजूबा तो दुआओं के पूरा होने पर होता है अबकी दुनिया में. मानों खुशी के पल खुशनसीबी हो और दुख तो लाजिमी हैं.

मैं सोचता ही रहा और फिर डूब गया शान्ताराम की कहानी में जो भाग रहा था डर कर कि सुन्दर गांव में नदी का स्तर मानसून में एकाएक बढ़ रहा है और शायद गांव डूब ही न जाये. वो गांव के निवासियों को जब सचेत करता है तो सारे गांव वाले हँसते हैं उसकी सोच पर. सब निश्चिंत हैं कि आजतक वो नदी इतना बढ़ी ही नहीं कि गांव डूब जाये. उन्हें वो स्तर भी मालूम था कि जहाँ तक नदी ज्यादा से ज्यादा बढ़ सकती है.

न्यूजीलैण्ड में रहते भी शान्ताराम को ऐसे किसी विज्ञान का ज्ञान ही नहीं हो सका जो ऐतिहासिक आधार पर ऐसा कुछ निर्णय निकाल पाये. भारत की स्थापित न जाने कितनी मान्यताओं के आगे विज्ञान यूँ भी हमेशा बौना और पानी ही भरता नजर आया है और इस बार भी पानी उस स्तर के उपर न जा पाया. लिनबाबा उर्फ शान्ताराम नतमस्तक है उन भारतीय मान्यताओं के आगे. मैं तो खुद ही नतमस्तक था. उसी भूमि पर पैदा हुआ था तो मुझे कोई विशेष आश्चर्य नहीं हुआ...

सबा है कि छोटे छोटे मिसरे सरल शब्दों मे बहर में गाये जा रही है:

मेरा दिल न तोड़ो जरा इतना सोचो

मुनासिब नहीं तोड़ना दिल किसी का...

तुम्हें अब तरस मुझपे आया तो क्या है

भरोसा नहीं अब कोई जिन्दगी का..

छा गई सबा और उसकी आवाज दिलो दिमाग पर...याद आ गया बरसों बाद उस दिन तुम्हारा मुझको अपने फेस बुक की मित्रों की सूची में शामिल करना इस संदेश के साथ: “हे बड्डी, ग्रेट टू सी यू हियर..रीयली लाँग टाईम..काइन्ड ऑफ पॉज़.... वाह्टस अप- हाउज़ लाईफ ट्रीटिंग यू-होप आल ईज़ वेल”

हूँ ह...पॉज कि रीस्टार्ट आफ्टर ए फुल स्टॉप? नो आईडिया!!!

भूल ही चुका था मैं यूँ तो अपनी दैनिक साधारण सी बहती हुई जिन्दगी में..कभी ज्वार आये भी तो उससे उबर जाना सीख ही गया था स्वतः ही..जिन्दगी सब सिखा देती है..यही तो खूबी है जिन्दगी में...जिसके कारण दुनिया पूजती है इसे..कायल है इसकी. मन कर रहा है कि फेस बुक में तुम्हारी वाल पर जाकर सबा की ही पंक्तियाँ लिख दूँ और थैंक्यू कह दूँ सबा को मुझे रेस्क्यू करने के लिए...बचाने के लिए:

तुम्हें अब तरस मुझपे आया तो क्या है

भरोसा नहीं अब कोई जिन्दगी का..

जाने क्या सोच रुक जाता हूँ और बिना कोशिश हाथ आँख पोंछने बढ़ जाते हैं. आँख और हाथ का भी यह अजब रिश्ता आज भी समझ के बाहर है मगर है तो एक रिश्ता. ...अनजाना सा..अबूझा सा,,,हाथ आँखों को नम पाता है..शायद सबा को सुन रहा होगा वो भी मेरे साथ:

अभी आप वाकिफ नहीं दोस्ती से

न इजहार फरमाईये दोस्ती का...

शायद आप तो क्या, हम भी कभी अब वाकिफ न हो पायेंगे. वक्त जो गुजरना था...गुजर गया. बेहतर है मिट्टी डालें उस पर. मगर हमेशा बेहतर ही हो तो जिन्दगी सरल न हो जाये? जिन्दगी तो जूझने का नाम है ऐसा बुजुर्गवार कह गये हैं. गालिब भी कहते थे तो हम क्या और किस खेत की मूली हैं...

शान्ताराम जूझ रहा है..एक भगोड़ा..जिसकी तलाश है न्यूजीलैण्ड की पुलिस को. जमीन छूट जाने की कसक उसे भी है और मजबूरी यह है की कि कैद उसे मंजूर नहीं. कैद की यातना से भागा है..एक आजाद सांस लेने..वो किसे नसीब है भला जीते जी..जमीन की खुशबू से कौन मुक्त हुआ है भला...रिश्तों की गर्माहट को कैसे छोड़ सकता है कोई...बुलाते हैं वो रिश्ते और महक के थपेड़े....खींचते है वो...

सोचता हूँ हालात तो मेरे भी वो ही हैं...मुझे तो कैद का भी डर नहीं...फिर क्यूँ नहीं लौट पाता हूँ मैं..उस मिट्टी की सौंधी खुशबू के पास..अपने रिश्तों की गरमाहट के बीच...उस मधुवन में...क्या मजबूरी है...जाने क्या...सोच के परे रुका हूँ इस पार....एक अनसुलझ उधेड़बून में...अबूझ पहेली को सुलझाता....

सबा कह रही है:

बुरा हाल है ये तेरी जिन्दगी का...

-समीर लाल “समीर”

आप भी सुनें सबा बलरामपुरी को, शायद मुझ सा ही कुछ अहसास कर पायें:

 

सबा बलरामपुरी
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शुक्रवार, अक्टूबर 14, 2011

ऋतुपर्णा !! मैं बुद्ध हो जाना चाहता हूँ ..

जिस सुबह तुम मुझसे मिलने आने वाली  होगी, उस रात मैं साधु हो तपस्या करने त्रिवेणी पार्क के उसी पेड़ के नीचे बैठूँगा, जिसके नीचे बैठ हमने तुमने कितनी ही शामें गुजारी थी.

मैं सारी रात आँख मूँद कर जागूँगा. तुम ऋतुपर्णा बन कर आना. मैं आँख खोलूँगा, तुम सामने होगी. मैं बुद्ध हो जाऊँगा.

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तुम्हारे चेहरे पर एक अजीब  भाव होगा - तुम पूछोगी कि यह ऋतुपर्णा कौन है?

ऋतुपर्णा !! 

मेरी कहानी की नायिका- उस कहानी की जो कभी लिखी नहीं गई. एक समुद्र सी मेरे भीतर समाई है, जेहन की किसी गहराई तक 

मुझे नहीं लगता कि मैं कभी लिख पाऊँगा उस कहानी को. कुछ पानी के बुलबुले उकेर भी दूँ तो भी समुद्र तो उतना ही बाकी बच रहेगा. क्या फायदा कुछ छींटें उड़ेलने से भी.

ऋतुपर्णा !! 

देखा तो कभी नहीं उसे मगर उसके बालों की खुशबू- उसके बदन की मोहक गंध नथुनों में समाई रहती है हर वक्त. गुलाब की महक मैं नहीं जानता . बस एक गंध- उन बालों की, एक महक-उस बदन की. इतना ही है मेरे लिए खुशबू का संसार.

ऋतुपर्णा !!

देखा तो कभी नहीं उसे मगर पहचानता हूँ उसकी मुस्कराहट को, उसके चमकते चेहरे को. अहसास है मुझे उसके स्पर्श का. एक कोमल स्पर्श. 

ऋतुपर्णा !! 

सब कुछ वैसा ही जैसी की तुम. एक अंतर बस आवाज का. 

ऋतुपर्णा !! 

सुना तो कभी नहीं उसे - बस आवाज पहचानता हूँ. आवाज कुछ बैठी हुई सी.

याद है जब तुम अपनी सहेली की शादी में रात भर मंगलगान गाती रही थी और सुबह तुम्हारी आवाज बैठ गई थी- वही- हाँ बिल्कुल वैसी ही है ऋतुपर्णा की आवाज. मुझे बहुत भाती है. शायद मोहब्बत का तकाजा हो कि प्रेमिका के ऐब भी ऐब न होकर रिझाने लगते हैं.

तुम यूँ करना कि उस रात भी रात भर मंगलगान गाना, जब मैं तपस्या करने बैठूँगा. पावन मौके पर यूँ भी मंगलगान की प्रथा रही है.

जब सुबह तुम आओगी और मुझे पुकारोगी- तो वही आवाज होगी ऋतुपर्णा की...

मैं मुस्कराते हुए आँख खोलूँगा और बुद्ध हो जाऊँगा...

तुम उलझन में पूछोगी कि बुद्ध कैसे हो जाओगे? बुद्ध को तो बोध की प्राप्ति हुई थी.

मैं कहूँगा - बोध?

बोध का अर्थ जानती हो?

उस रोज मैने तुम्हें एक बौद्ध मठ से कुछ किताबों के साथ निकलते देखा. आवाज लगाना चाहता था मगर तब तक तुम ...शायद बहुत देर से वो वहीं कार में बैठा तुम्हारा इन्तजार कर रहा था....

तुम निकल गई अपने पति के साथ कार में बैठ कर तेजी से

मैं आँख मूँदें जाग रहा हूँ न जाने क्यूँ तब से.और मैं.....

मैं बुद्ध हो जाना चाहता हूँ .. 

एक मुद्दत हुई
कि
जागते हुए
सोया हूँ मैं...
जाने किन ख्यालों में
खोया हूँ मैं...

-कुछ बातें अहसास की- लिखी नहीं जाती.

-समीर लाल ’समीर’

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बुधवार, मार्च 02, 2011

युगपुरुष

उस रात किसी बड़ी किताब का भव्य विमोचन समारोह था. यूँ भी हिन्दी में किताबों के बड़े या छोटे होने का आंकलन उसके लेखक के बड़े या छोटे होने से होता है और लेखक के बड़े या छोटे होने का आंकलन उसके संपर्कों के आधार पर.

बड़े लेखक की बड़ी किताब का विमोचन हो तो विमोचनकर्ता का बड़ा होना भी जाहिर सी बात है. अतः इस समारोह के विमोचनकर्ता भी बहुत बड़े और नामी साहित्यकार थे. वह इतना अच्छा लिखते हैं कि वर्षों से इसी चक्कर में कुछ लिखा ही नहीं (शायद भीतर ही भीतर यह भय सताता हो कि कहीं कमतर न आंक लिए जाये) मगर फिर भी, नाम तो चल ही रहा है.

अधिकतर अच्छा लिखने वालों के साथ यही विडंबना है कि वो इतना उत्कृष्ट लिखते हैं, इतना अच्छा लिखते हैं कि कुछ लिख ही नहीं पाते. बरसों बरस बीत जाते हैं उनका अच्छा लिखा पढ़ने को. बस, उनसे दूसरों के बारे में सुनने और पढ़ने के लिए यही मिलता चला जाता है कि फलाने ने अच्छा लिखा और ढिकाने ने खराब. सलाह भी उन्हीं की ओर से लगातार बरसती है कि अच्छा लिखने की कोशिश होना चाहिये साहित्य को धनी बनाने के लिए. वे बिना अपना योगदान देखे, हर वक्त दुखी नजर आते हैं कि आजकल अच्छा नहीं लिखा जा रहा है और यह चिन्ता का विषय है.

मंचासीन श्रृद्धास्पद विभूतियों में एक तो लेखक स्वयं, फिर मुख्य अतिथी की आसंदी को सुशोभित करते ’सुकलम सम्मान’, २००८ से सम्मानित वरिष्ठ साहित्यकार, कविमना, उपन्यासकार, आलोचक माननीय श्रद्धेय आचार्य श्री चंडिका दत्त शास्त्री, किताब के प्रकाशक एवं कार्यक्रम के संचालक स्थानीय साहित्यकार एवं कवि श्री विराट स्तंभी जी.

सस्वर सरस्वती पूजन, माल्यार्पण आदि के बाद संचालक महोदय ने माईक संभाला और मुख्य अतिथि का परिचय प्रदान करते हुए स्तुति गान में ऐसा रमे कि यह कह कर मुस्कराने लगे कि माननीय मुख्य अतिथी श्रद्धेय आचार्य श्री चंडिका दत्त शास्त्री पुरुष नहीं हैं.

इतना कह वह मौन हो गये और मुस्कराते हुए मंच से लोगों के हावभाव देखते रहे. पूरे हॉल में इस सनसनीखेज खुलासे की वजह से सन्नाटा छा गया. सब छिपी आँख एक दूसरे को देखने लगे. संपूर्ण मंच भी असहज सा नजर आने लगा तब श्री विराट स्तंभी जी आगे बोले कि माननीय मुख्य अतिथी श्रद्धेय आचार्य श्री चंडिका दत्त शास्त्री जी पुरुष नहीं, महापुरुष हैं. तब जाकर सभागृह में जान लौटी. श्री विराट स्तंभी जी के इस बयान से उनके सहज हास्य बोध का परिचय मिला जबकि कर्म एवं नाम से वह वीर रस हेतु प्रख्यात हैं. पूरे सभागृह में करतल ध्वनि की गुंजार उठ खड़ी हुई.

विचार आया कि यदि दो वाक्यों के बीच मौन के दौरान बिजली महारानी की कोप दृष्टि पड़ जाती, तब क्या होता?

अपनी बात आगे बढ़ाते हुए श्री विराट स्तंभी जी नें अन्य बातों के अलावा यह भी बताया कि माननीय मुख्य अतिथी श्रद्धेय आचार्य श्री चंडिका दत्त शास्त्री  एक व्यक्ति नहीं, अपने आप में संपूर्ण संस्था हैं.

संस्था का नाम सुनते ही मेरी रीढ़ की हड्ड़ी में न जाने क्यूँ एक अरसे से एक सुरसुरी सी दौड़ जाती है. एक चित्र खींच आता है मानस पटल पर किसी संस्था का, जिसे अपने पापों, घोटालों को अंजाम देने के लिए सबसे मुफीद और पावन उपाय मान व्यक्ति, व्यक्ति न रह संस्था में बदल जाता है. फिर गोपनीय वार्षिक बैठक, बेनामी पदाधिकरी और स्वयंभू अध्यक्ष की आसंदी पर विराजमान स्वयं वह.

देश में आजतक जितना संस्थाओं के नाम पर घोटालों को अंजाम दिया गया है, उतना शायद ही कहीं और हुआ हो किन्तु फिर भी यह प्रचलन हर जगह और खास तौर पर ऐसे समारोहों में मुख्य अतिथि के लिए लगातार देखने मिलता रहता है कि वह व्यक्ति नहीं, एक संस्था हो गये हैं.

शायद संस्था ही वह वजह हो जिससे उनका स्टेटस बिना बरसों तक लिखे भी बहुत ऊँचा लिखने वाले का बरकरार रहा आया हो, कौन जाने? संस्था के भीतर की बात जानना तो सरकारी ऑडीटर के लिए भी टेढ़ी खीर ही रहा है अतः भीतर जाने की बजाय वो बाहर के बाहर पैसे लेकर निपटारा करना सदा से सरल उपाय मानता रहा है. यह पुराणों में भी संस्था और ऑडीटर दोनों के लिए ही सहूलियत का मार्ग माना गया है. 

खैर, समारोह बहुत भव्य रहा. उतना ही भव्य मुख्य अतिथि का उदबोधन जिसमें उन्होंने पुनः साहित्य और लेखन के गिरते स्तर पर गहरी चिन्ता जतलाई और इस पुस्तक को इस दिशा में सुधार लाने का एक ऐतिहासिक कदम निरुपित किया.

इस कार्यक्रम के बाद एक और वरिष्ट साहित्यकार की श्रद्धांजलि सभा में जाना था. वहाँ भी श्रद्धांजलियों के दौर में अनेक संदेशों में मृतात्मा को एक व्यक्ति नहीं, युग बताया गया और उनके अवसान को एक युग का पटाक्षेप.

एक युग के भीतर समाप्त होते अनेक युग, हर वरिष्ठ, हर गरिष्ठ के प्रस्थान के साथ एक युग का पटाक्षेप, और एक ऐसे रिक्त का निर्माण, जिसकी भरपाई कभी संभव नहीं. शुरु से आजतक ऐसे रिक्त स्थानों की जिनकी भरपाई संभव न थी, एक एक बिन्दी के आकार का भी गिन लें तो शीघ्र ही, या कौन जाने पूर्व में ही, शायद ही कोई स्थान बचे जो रिक्त न हो.

 

literature

कैसी ये
भीषण त्रासदि
न गरीब बचे,
न अमीर

भाषा
संवेदनशीलता
इन्सानियत
सब जाते रहे....

एक उम्मीद थी जिनसे
लिखेंगे शोकगीत इनपर
उनका भी यूँ गुजर जाना

एक युग की समाप्ति नहीं
तो और क्या है?

-समीर लाल ’समीर’

<< आज उड़न तश्तरी के ५ साल पूरे हुए. इस बीच आपसे प्राप्त स्नेह और उत्साहवर्धन के लिए हृदय से आभारी. कृपया अपना स्नेह बनाये रखें>>

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रविवार, जुलाई 25, 2010

एक विचार और फिर..

बहुत सारे ऐसे दिन गुजर जाते हैं जब हम लेखक, कवि, ब्लॉगर आदि होकर भी कुछ नहीं लिख पाते. कुछ इन हालातों में आत्म ग्लानि का बोध पाल लेते हैं तो कुछ अपराध बोध से ग्रसित हो जाते हैं.

हालांकि न लिख पाने की बहुतेरी वजह हो जाती हैं. कभी घरेलू जिम्मेदारियाँ तो कभी व्यवसायिक व्यस्तताएँ मगर कभी कभी तो कोई भी कारण नहीं होता. तब बस सब कुछ आलस्य मान कर संतोष कर लेते हैं.

अक्सर जब एक अंतराल के बाद, खासकर ब्लॉग लेखन में, ब्लॉगर लौटता है तो उसकी शुरुवात ही इस आत्म ग्लानि या अपराध बोध को जाहिर करते हुए क्षमायाचना के साथ होती है. उसे महसूस होता है कि सब उसके लिखे का इन्तजार कर रहे होंगे और उसने इतने दिन से कुछ लिखा नहीं. चलो, भ्रम ही सही लेकिन है तो सुखद अहसास. इस हेतु अगर क्षमायाचना के साथ भी पुनर्लेखन की शुरुवात करनी पड़े तो क्या बुराई है.

बस विचार यह आता है कि एक लेखक या कवि या ब्लॉगर होकर न लिख पाने का अहसास हमें हो जाता है और उसके लिए क्षमायाचना को भी तत्पर रहते हैं मगर एक लेखक या कवि या ब्लॉगर होने से भी पहले हम सब एक इन्सान हैं, एक संवेदनशील इन्सान और हममें से बहुतेरे इन्सानियत और संवेदनाओं से इतने समय से किनारा किए हुए भी अपराध बोध से ग्रसित क्यूँ नहीं होते, क्यूँ नहीं होती कोई आत्मग्लानि. क्यूँ नहीं हम इस हेतु क्षमायाचना को तत्पर नहीं होते. क्यूँ नहीं हम सोचते कि लोग एक बार फिर इन्सानियत और संवेदनाओं का इन्तजार कर रहे होंगे. अगर सभी ऐसा सोच लें तो शायद समाज का एक नया चेहरा सामने आये मगर काश!! ऐसा सोचें तो!!

मुझे ज्ञात है कि यह सब पढ़कर आपके मन में मिश्रित विचार तरंगे मार रहे होंगे किन्तु यहाँ जब मैं लेखन से अंतराल की बात कर रहा हूँ तब यह अर्थ नहीं है कि इस अन्तराल में आपने चिट्ठी पर पता या दूध का हिसाब या दफ्तर के नोटस भी नहीं लिखे बल्कि मैं उस लेखन अंतराल की बात कर रहा हूँ जिस सार्थक लेखन को आप सप्रयास समाज के हित में, चिन्तन में, विकास हेतु, अपने मन में उठ रहे विचारों को प्रकट करने, समस्याओं पर प्रकाश डालने एवं हल के सुझाव हेतु करते हैं और चाहते हैं कि समाज इसे समझे और लाभान्वित हो अतः इन्सानियत से अन्तराल की बात भी उसी परिपेक्ष में लिजियेगा.

humanity

खैर, बस ये तो यूँ ही कुछ आस पास की स्थितियाँ देख विचार उठ गये वरना तो आया था आज एक गज़ल लेकर, जिसे स्वर दिया इंदौर के बेहतरीन गायक, जो किसी परिचय के मोहताज नहीं, भाई दिलीप कवठेकर जी ने. सारे शेर तो नहीं गाये, वजह समय की पाबंदी. अतः पढ़ लें सारे और फिर सुनें उनमें से कुछ उनकी शानदार आवाज में:

 

जिनके छोटे मकान होते हैं
लोग वे भी महान होते हैं

वो ही बचते हैं फूल शाखों में
जिनके काटों में प्राण होते हैं....

जितने हम साथ-साथ चलते हैं
उतने रिश्ते जवान होते हैं

कितनी मोटी करोगे दीवारें
यारो, सबके ही कान होते हैं

कुछ तो पाने का अच्छा मौक़ा है
सुनते हैं, रोज़ दान होते हैं

बुढ़ी माँ को उठाये काँधे पर
कितने बेटे महान होते हैं

छूट जाते हैं ज़ख्म भर के भी
ऐसे भी कुछ निशान होते हैं

क्या बतायें कि दुनिया कैसी है
सबके अपने जहान होते हैं

लब तो चुप हैं "समीर" के लेकिन
आँख के भी बयान होते हैं.

-समीर लाल ’समीर’

यहाँ सुनिये:

 

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रविवार, मई 30, 2010

हे प्रभु!! ये कैसी दुनिया तेरी!

कमर का दर्द, वैसे तो अब काहे की कमर, कमरा ही कहो, हाय!! बैठने नहीं देता और ये छपास पीड़ा, लिखूँ और छापूँ, लेटने नहीं देती. कैसी मोह माया है ये प्रभु!! मैं गरीब इन दो दर्दों की द्वन्द के बीच जूझता अधलेटा सा - दोनों के साथ थोड़ा थोड़ा न्याय और थोड़ा थोड़ा अन्याय करने में व्यस्त. वैसे तो थोड़ा थोड़ा न्याय और थोड़ा थोड़ा अन्याय करते रहना ही सफल जीवन का सूत्र है मगर दर्द!!!

छपास पीड़ा पत्नी के समान लगातार साथ बनी रहती है और यह कमर का दर्द, मानो महबूबा की याद, लौट लौट आती है, लौट लौट जाती है. महबूबा तो महबूबा होती है, समय समय पर बदल भी जाती है.

पिछले बरस इसी सीजन में महबूबा थी एसीडीटी और अब की बार है यह कमर दर्द. उसी महबूबा की याद के समान कमर दर्द किसी को दिखता भी नहीं. चोट लगी हो, प्लास्टर बँधा हो, आँख सूज आई हो तो लोगों को दिखता है, साहनुभूति मिलती है. मगर कमर दर्द, पत्नी सोचे कि काम न करना पड़े इसलिए डले हैं और ऑफिस वाले सोंचे कि ऑफिस न आना पड़े, इसलिए डले हैं, और मित्र तो खैर आलसी मान कर ही चलते हैं.

छपास पीड़ा के चलते लिखने बैठ जाओ तो पत्नी की सोच और मजबूत हो. देखो, कम्प्यूटर के लिए उठने बैठने में कोई दर्द नहीं और वैसे पड़े हैं करहाते हुए. मुआ कम्प्यूटर न हुआ, दवा हो गई कि सामने बैठ जाओ और दर्द गायब. क्या जबाब दिया जाये इसका? कोई जबाब हो भी नहीं सकता सिवाय इसके कि नजर बचा कर कम्पयूटर का इस्तेमाल किया जाये. अभी भी बाजार के निकली है तो मौका निकाल कर बैठे हैं. हालांकि कमर में दर्द है मगर कहते हैं न कि बड़ा दर्द छोटे दर्द को भुलवा देता है सो लिख रहे हैं.

आप सोच सकते हैं कि मैं कमर दर्द से परेशान हूँ तो पत्नी बाजार कैसे निकल गई? सोचने पर कैसी रोक? पत्नी मेरी है, मैं नहीं सोच रहा मगर आप नाहक सोच सोच कर परेशान हैं मगर क्या करें, हम भारतीय. यही तो हमारी पहचान है. लेकिन ये कमर दर्द तो अब इतनी इतनी सी बात पर हो उठता है कि अगर इसके पीछे वो बाजार जाना छोड़ दे तो कहो, बाजार का रास्ता ही भूल जाये और छपास पीड़ा, इसके लिए रुके तो यह तो वैसा ही हो गया कि साहब को बीपी रहता है, इसलिए बाजार नहीं जा रहे. यह तो इन बिल्ट बीमारी है, इसमें रुकना कैसा?

वैसे तो बाजार वो आदतन भी चली जाती है बिना किसी काम के भी जैसे हमारा कमर दर्द चला आता है लेकिन आज खास प्रयोजन से निकली है इसलिए निश्चिंत हूँ कि दो घंटे के पहले तो आने वाली नहीं, तब तक लिख लिखा कर छाप डालूँगा और मूँह ढक कर सो जाऊँगा. बीमारी में बीमार न लगे, तो क्या खाक लगे गालिब!!

बाजार जाने का खास प्रयोजन ऐसे बना कि आज सुबह मुझे कमर दर्द में जरा आराम था तो नीचे चला आया टहलने. पत्नी पीछे बैक यार्ड में कुछ क्यारियाँ सजाने में जुटी थी. हम भी पीछे निकल गये. कल ही नई पत्थर वाली सीढ़ी बनाई थी.

उसी से उतरते पैर संभाल नहीं पाये और भदभदा कर घास में गिर पड़े. दो कुलाटी खाई. कल्पना कर के मुस्करा रहे हैं न आप? शरीर तो ऐसा हो गया है कि अगर समतल सड़क पर भी बैलेन्स जमा कर न चलें तो गिर पड़ें फिर वो तो सीढ़ी थी. गिरे, पैर मुड़ा सो अलग और कमर दर्द को तो मानो ब्याह का सुस्वागतम का बोर्ड दिख गया हो, नाचते गाते बैण्ड लिए फिर चला आया. किसी तरह उठ कर वापस चले आये बिस्तर पर.

लेटे ही थे कि पत्नी तैयार होती नजर आई. जिज्ञासावश जानना चाहा कि कहाँ चली? कहने लगी, अच्छा हुआ आप गिर पड़े कम से कम चैक हो गया. मुझे पहले ही संदेह था कि सीढी में पत्थर छोटे लग गये हैं. अब जाकर बड़े ले आती हूँ वरना कोई गेस्ट न गिर जाये पार्टी वगैरह में.

अब बताईये, हम तो हम न हुए, टेस्टर हो गये और उपर से सुनने मिला कि अच्छा हुआ गिर पड़े, कम से कम चैक हो गया? पत्नी न हुई वो वाली गुजराती हो गई जो गलती से कुऎँ में गिर जाये तो निकलने का इन्तजाम बाद में देखेगी, पहले स्नान कर लेगी कि अब गिर तो गये ही हैं, पहले स्नान कर लें.

अब यह लिख कर जब सोऊँगा तो हीटिंग पैड रख लूँगा शायद सोते में दर्द न बढ़े!! दर्द बताया न महबूबा की याद सा है, सोते में ज्यादा बढ़ जाता है.

अस्पताल जाने का मन नहीं है, वहाँ पिछली बार धोखा लग गया था. इसी दर्द के चलते गये थे अस्पताल. डॉक्टर ने कहा कि दो दिन भरती रहना पड़ेगा. रुम अलॉट हो गया. डॉक्टर देख दाख कर दवाई दे कर चला गया. कह गया कि अब नर्स के हवाले. पत्नी को भी घर भेज दिये कि अब नर्स देख लेगी.

थोड़ी देर में एक काला (आम इन्सानों की तरह ही अपनी खोट मुझे भी नजर नहीं आती-मगर सामने वाली की खोट पर फट से नजर चली जाती है) बड़ा ऊँचा पूरा आदमी सामने आकर दाँत चियारे खड़ा हो गया. मैने पूछा, कहो भाई, कैसे आना हुआ? कहने लगा मैं आपकी नर्स हूँ.

बताओ, बीमार आदमी के साथ ऐसी चीटिंग और चुहल!! भला अच्छा लगता है क्या? हमारे भारत में तो नर्स लड़कियाँ होती हैं. नर्स का नाम सुनते ही जो आकृति मानस पर छा जाती है, उसमें पुरुष का कैसा स्थान? ये कैसी नर्स? पूरी परिभाषा ही बदल कर रख दी. एन फॉर नर्स पढ़ाते थे स्कूल में जब तो कितनी बेहतरीन सफेद स्कर्ट में फोटो रहती थी और एक ये हैं मानो एन फॉर नालायक!! बीमार आदमी को हैप्पी की बजाय सैड कर दिया. उसी को पाप लगेगा, हमें क्या!!

खैर, जमाना बदला है, पहले पत्नी के नाम पर भी कहाँ पुरुष सुने थे, अब तो जहाँ देखो वहीं सरकारी मान्यता प्राप्त पति पत्नी-दोनों पुरुष या दोनों महिलाएँ. ये कैसा बदलाव आया है तेरी दुनिया में प्रभु!!! वो दिन दूर नहीं जब आप अपनी पत्नी के रुप में किसी सुन्दर कन्या का स्वप्न सजाये बैठे होंगे और माँ बाप आपकी शादी किसी लड़के से सेम सेक्स मेरिज अधिनियम के तहत तय कर आयें.

लोग ’गे कपल’ से मिलें तो पूछें कि भाई साहब आपकी अरेंजड मेरिज थी या लव? आप सोच रहे होंगे कि ’ऐसा भी भला कभी हो सकता है.’ ठीक सोचा, हमारे जमाने में, बहुत पुरानी बात नहीं है फोटो देख लो हमारी, कोई हमसे कहता कि एक लड़का एक लड़के से शादी करेगा तो हम भी यही कहते कि ’ऐसा भी भला कभी हो सकता है.’ लेकिन होने लगा न!!

पूरा मूड सत्यनाश हो गया अस्पताल में भरती होने का. कमर दर्द भी खुद ही ऊड़न छू हो गया और हम अगले दिन ही घर चले आये.

अब ऐसी धोखाधड़ी की जगह कौन खुद से चल कर जाना चाहेगा, इसलिए इस बार घर पर ही आराम करते हैं. 

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गुरुवार, मई 13, 2010

मेरा लेखन कचरा है!!

slcar

दो दिन हो गये सारा घटनाक्रम देखते. ढ़ेर प्रशंसक/ चहेते/मित्र सामने आये माननीय ज्ञानदत्त जी की पोस्ट  पर मेरे विषय में टिप्पणी देखकर. जान पाया सबका प्यार. अभिभूत हुआ, लोगों को इस पर नाराजगी भी हुई कि मैं क्यूँ असभ्यता से किये गये विरोध के बावजूद भी अभिभूत हुआ. अनूप जी ने खुल कर पोस्ट के माध्यम से जाहिर किया और किसी ने उस पर टिप्पणी के माध्यम से.

प्रशंसकों का प्यार, भद्र और अभद्र दोनों, अभिभूत करता ही है, भले ही आप अभद्र और असभ्य तरीके से जाहिर समर्थन को उचित न करार दें. मैं भी इसे उचित नहीं मानता किन्तु स्नेह ही तो है जो वो भड़क उठे. मेरी नजर में ,अब भी, ऐसी बात उठाना ही औचित्यहीन है, जो लोगों को भड़काये. क्या जरुरत है?

जिस तरह से असभ्य भाषा में किया गया विरोध या समर्थन गलत है, उसी तरह से ऐसा औचित्यहीन प्रश्न जो इस बात को भड़काये. बात दोनों ओर से ही दूसरे तरीके से कही जा सकती थी. गुस्से में इंसान आपा खो देता है, यह जग जाहिर है.

आज तक मैने, जब भी ब्लॉग जगत की बात आई या मेरे लेखन पर बात आई, हमेशा ही खुल कर कहा है कि अनूप जी ही मुझे गद्य लेखन में लाये. उनसे मैने सीखा, उनका मैं प्रशंसक हूँ और सीख रहा हूँ, फिर तुलना कैसी.

अनूप जी लाख तारीफ करें, मैं हमेशा ही उनके लेखन से सीखने का तत्पर रहा और यह बात वो भी अच्छी तरह जानते हैं. शायद मानते भी हैं.

उनकी मुझसे मौज लेने की प्रवृति भी हमेशा से रही. मुझे कभी नहीं खला. मैने भी उनसे खूब मौज ली. जब बुरा लगा कि जो बात व्यक्तिगत तौर पर उनसे की, उन्होंने जग जाहिर की, उनको बताया और उन्होंने उसे वापस लिया. अपने आलेख को सुधारा.

आज भी उन्होंने अपने आलेख में जाहिर किया कि मैने अपने कमेन्टस में कहा है मैं कठिन समय से गुजर रहा हूँ.जबकि ऐसा मैने कहीं नहीं कहा. मैने बस अपने चाहने वालो से इतना कहा कि जैसा आपने समझा, वैसा आपने लिखा. आपने मुझे संबल दिया, मैं अभिभूत हुआ इस स्नेह के लिए और फिर मैने विवाद से दूर रहते हुए हिन्दी की सेवा की अपील की. एक शाब्द बदल देने मात्र से बात बदल जाती है, इसका ज्ञान तो अनूप जी को है ही, इसमें मैं क्या कहूँ.

उद्देश्य मात्र इतना था कि बात जो बढ़ चुकी है वो शांत हो जाये और लोग पुनः पूर्ववत पहले की तरह सक्रियता से हिन्दी के प्रचार प्रसार में जुट जायें.

मैं कभी अभद्र और असभ्य भाषा का न समर्थक रहा हूँ और न ही इस्तेमाल करता हूँ. समर्थकों के गुस्से में आये बयानों में भी आशा ही कर सकता हूँ कि भाषा की मर्यादा का पालन हो, निवेदन कर सकता हूँ, उससे उपर मेरे वश में क्या है.

मेरे ज्ञान जी से भी मधुर संबंध हैं, मैं उनका सम्मान करता हूँ और मुझे कोई शिकायत नहीं. उन्होंने मेरे लेखन के विषय में जैसा समझा, वैसा लिखा.  सबको सब का लेखन पसंद आये, यह जरुरी नहीं. उन्हें मेरा लेखन नहीं पसंद, वो स्वतंत्र हैं यह कहने के लिए कि मेरा लेखन कचरा है. मैं उन्हें भी नहीं रोक सकता और न ही रोकने की कोई वजह है.

बस, अफसोस इतना है कि नित ईमेल पर बात होने के बावजूद भी और उनकी प्रशंसा की टिप्पणी लगभग हर आलेख पर प्राप्त करते हुए भी इतना बड़ा सत्य वो दिल में छिपाये बैठे रहे और मुझे न जाहिर कर, इसे खुले मंच पर जाहिर किया. सोचता हूँ, क्या सच मानूँ-उनकी प्रशंसा में प्राप्त नित नई टिप्पणी या एक बार जग जाहिर नापसंद का आलेख.

मेरा वश मेरे व्यवहार, मेरे लेखन और मेरे विवेक पर है. कोशिश होती है उसमें भूल न हो.

मित्रों और शुभचिन्तकों ने रोका कि आपकी टिप्पणी विवाद पर ठीक नहीं लग रही. मैने बिना एक क्षण गंवाये रोक दी. इससे ज्यादा मुझसे क्या आशा है, मुझे बताये मैं करने को तैयार हूँ.

निवेदन बस इतना है कि मैं नहीं जानता कि आप कोई भड़काऊ बयान जारी करे अनजाने में भी, तो उसकी प्रतिक्रिया कैसी और किस भाषा में आयेगी.  किन्तु जहाँ भी मुझे लगेगा कि भले ही अभद्र भाषा में, मुझे स्नेह जाहिर किया है, मैं आभार तो व्यक्त करुँगा, भले ही मैं उसकी भाषा का समर्थन न करुँ.

अपने चाहने वालों से और समर्थकों से बस एक निवेदन है कि अब बहुत हुआ. अव्वल तो भाषा का संयम बनाये रखें और दूसरा, किसी के कहने या समझने से अपनी सोच मत बदलें. आप सब समझदार है, संयम से काम लें.

कृपया इस विवाद को विराम दें और आगे हिन्दी की सेवा में तत्पर रहें.

कुछ रात के अंधेरों से अक्रांत
भयभीत
दुबक कर सो जाते हैं

और

कुछ उसी रात के
सितारों की रोशनी में
जीवन की राह खोज लेते हैं.

-यह दुनिया भी कितनी अजीब है.

-अनेक शुभकामनाएँ एवं साधुवाद!!

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बुधवार, मई 05, 2010

४०० वीं पोस्ट और एक गज़ल

आज सुबह किसी कार्यवश ओकविल (मेरे घर से करीब १०० किमी) जाना हुआ. जिस दफ्तर में काम था, उसके समने ही मेन रोड थी, जिस पर साईड वाक बनने का कार्य जोर शोर से चल रहा था. पूरी मिट्टी के जो ढेर लगाये गये थे, उन्हें  बड़ी बड़ी मशीनों से लेवल किया जा रहा था.

दफ्तर से जब काम पूरा करके निकला, तो उस दफ्तर का मालिक भी साथ था. यूँ ही चर्चा में मैने जानना चाहा कि जब यह वाक वे पूरा बन रहा है, तो यह पहाड़ जैसी मिट्टी बीच में क्यूँ छोड़कर दोनों तरफ का काम चालू है, एक लाईन से क्यूँ नहीं करते यह लोग. बेवजह बीच में काम छोड़ कर, गाड़ी दूसरी तरफ ले जाते हैं बार बार, और आगे काम जारी रखते हैं.

तब उसने मुझे थोड़ा पास ले जाकर वो मिट्टी का ढेर दिखाया, जो बीच में लगभग १०० मीटर की जगह घेरा हुआ था. उस पर एक "गूस" महारानी बड़े ठसके से विराजमान थी. बताया गया कि एक रात उसने वहाँ अंड़े दे दिये हैं तो अब जब तक बच्चे नहीं हो जाते, सरकार उतना हिस्सा नहीं छुएगी और बच्चा हो जाने के बाद जब वो चली जायेगी, तब ही उस हिस्से को बनाया जायेगा.

अभी मेन रोड़ की तरफ एक प्लास्टिक की जाली भी लगा दी गई है कि भूल से वो सड़क पर न चली जाये और किसी तेज रफ्तार गाड़ी की चपेट में आ जाये. निर्माण कर्मचारी भी उसे रोज खाने के लिए पॉपकार्न और चिप्स डाल देते हैं ताकि भोजन की तलाश में उसे भटकना न पड़े.

क्या हम कभी ऐसी कल्पना सरकार की तरफ से अपने देश में कर पायेंगे या फिर सिर्फ कागज पर गिनती लगाते रहेंगे कि अब १४११ बाघ बचें हैं?

नीचे चित्र में ये दो गीस (goose (plural: geese)) कल मेरे घर के सामने घास में टहलने आये. पड़ोस में एक छोटा सा तालाब हैं, वहीं रहते हैं. सोचा, आपसे भी मिलवा दूँ.

goose

खैर, यह है मेरी ४०० वीं पोस्ट. बहुत रोचक और दिलचस्प सफर रहा इन ४०० पोस्टों का. टिप्पणी के माध्यम से अब तक लगभग ३५०० लोगों का, अवागमन में लगभग १६४००० लोगों ने और फीडस स्बासक्राईब करने में लगभग ५७० लोगों नें अपना स्नेह और प्रोत्साहन दर्ज किया.

उम्मीद करता हूँ कि आप सबका स्नेह यूँ ही मिलता रहेगा और यह सफर यूँ ही खुशनुमा बना रहेगा.

पिछली बार जो गज़ल साधना की आवाज में आपको सुनवाई थी, उसमें जैसा मैने कहा था तीन शेर किसी और के थे और तीन मेरे. अब फिर से वही गज़ल मगर इस बार इसमें सारे शेर मेरे ही हैं और आवाज साधना की. इस चौथे शतक के मौके पर लुत्फ उठाईये.

11

जाने क्या बात है जो तुमसे बदल जाती है
जिन्दगी मौत के साये से निकल जाती है

नब्ज को छू के वो खुशहाल हुए जाते है
सांस तो रेत है हाथों से फिसल जाती है

देख तो आज के मौसम का नजारा क्या है
ये तबियत भी हमारी तो मचल जाती है

मुझको तो चाँद दिखे या कि तुम्हारी सूरत
दिल की हस्ती मेरी दोनों से बहल जाती है

कैसे जीना है किसी को ये सिखाना कैसा
वक्त के साथ में हर सोच बदल जाती है.

जब भी होता है दीदार तेरा साहिल पर
डूबी कश्ति मेरी किस्मत की संभल जाती है.

बात करने का सलीका जो सिखाया हमको
बात ही बात में नई बात निकल जाती है.

दास्तां प्यार की तुमको ही सुनाई है ’समीर’
दर्द के देश में यह बन के गज़ल जाती है.

-समीर लाल ’समीर’

 

यहाँ क्लिक करके सुनिये:

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बुधवार, अप्रैल 28, 2010

साहित्य के ध्रुव

एक गांव में सरपंच जी ने बैठक बुलवाकर घोषणा की कि अब अगले माह तक हमारे गांव में बिजली आ जायेगी.

पूरे गांव में खुशी की लहर दौड़ पड़ी. उत्सव का सा माहौल हो गया. हर गांववासी प्रसन्न होकर नाच रहा था.

देखने में आया कि गांव के कुत्ते भी खुशी से झूम झूम कर नाच रहे थे. यह आश्चर्य का विषय था.

लोगों ने कुत्तों से जानना चाहा कि भई, तुम लोग क्यूँ नाच रहे हो?

कुत्तों ने बड़ी सहजता से जबाब दिया कि जब बिजली आयेगी तो इतने सारे खम्भे भी तो लगेंगे.

मुझे मेरे मित्र ने जब यह किस्सा सुनाया तो प्रथम दृष्टा तो यह चुटकुला ही लगा मात्र हास्य बोध देता किन्तु गहराई से सोचा जाये तो हम इन्सानों में यह आदत क्यूँ नहीं? क्यूँ हम किसी और की खुशी में अपनी खुश होने की वजह खोजने के बदले इर्ष्यावश दुखी होकर बैठ जाते हैं?

खैर, एक विचार उठा तो सुना दिया.

ऐसे ही कुछ समय पहले कुछ विचारों को, कुछ भावों को शब्दबद्ध कर कवि मित्र शरद कोकस जी से बात कर रहा था और उनके मार्गदर्शन में उसी रचना में कुछ सुधार कर यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ:

 

साहित्य के ध्रुव

writing

कीड़े मकोड़ों की तरह
एक दूसरे पर लदे-फदे
सरकते घिसटते कवि कथाकार

माचिस की
डिबियों में ज्यों
अपनी दुनिया बसाये

बिना किसी मकसद
रेंगते भटकते
कागज़ काले करते लोग..

वहीं बुद्धि के विमान में सवार
लोगों को भी
ऐसा ही दिखता है
दुनिया का हाल

अपनी गिद्ध-दृष्टि  से
वे देखते हैं दुनिया
और रचते हैं

एक आधी-अधूरी कविता
या एक निरर्थक कहानी...

जिसे अब साहित्य पुकारा जाता है!!

-समीर लाल ’समीर’

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बुधवार, अप्रैल 21, 2010

मजहबी विवाद, साम्प्रदायिकता और ब्लॉग जगत!!

वैसे तो ऐसे मुद्दों पर मैं कभी नहीं लिखता और न ही मुझे इन विषयों में कोई दिलचस्पी है.

मगर इधर काफी सारे आलेख पढ़े, हलचल देखी और जाना उन ब्लॉग्स के बारे में जो मजहब और साम्प्रदायिकता के नाम द्वेष फैला रहे हैं. मेरा कभी इन ब्लॉगस पर जाना नहीं होता, इसलिए ज्ञात नहीं है कि वो क्या लिख रहे हैं, जो अन्य लोगों की परेशानी का सबब बना है. मगर निश्चित ही कुछ न कुछ तो ऐसा लिख ही रहे होंगे जो इतने सारे अन्य लोगों की भावनाओं को भड़का रहा होगा.

वैसे तो लोगों का कहना है कि कुछ पोर्न साईटस भी हैं, जिनसे कम्प्यूटर में वायरस आ जाते हैं. मेरा उस तरफ भी जाना नहीं होता है, जान बूझ कर, अतः वो भी ज्ञात नहीं.

टाईटिल से ही समझ में आ जाता है कि जाना है कि नहीं. क्लिक करके जाना मेरा कर्म है जिसे करने हेतु मुझे अपने विवेक का इस्तेमाल करना होता है. गुगल सिर्फ बताता है. सो ही ब्लॉगवाणी और चिट्ठाजगत कर रहे हैं.

मुझे यह बात अब तक समझ नहीं आती कि आखिर क्या वजह है कि जब आप एक बार जान गये कि वो क्या लिख रहे हैं तो बार बार क्यूँ जाते हैं. क्यूँ उन्हें हिट्स मिलती हैं, क्यूँ उन्हें पढ़ा जाता है या क्यूँ उनके विषय में लिख उन्हें प्रचारित किया जाता है.

सड़क पर पड़े गोबर से तो आप बच कर निकल जाते हैं. दीगर बात है कि कभी भूले से पैर पड़ जाये. गाय को सड़क पर गोबर करने से रोका नहीं जा सकता. उसे उतनी अक्ल ही कहाँ मगर हम तो समझते हैं न और बच कर निकलते भी हैं. नगर निगम हर जानवर के पीछे तो घूम नहीं सकती कि कब गोबर करे और कब हटायें ताकि किसी का पैर न पड़े.

मुझे तो लगता है कि उनका लिखना जितना गलत है, हमारा उन्हें पढ़ना, उससे भड़क जाना और भड़क कर उन्हें प्रचारित करना और भी ज्यादा गलत है. अगर भूलवश आपने पढ़ भी लिया तो भड़क कर जब आप उनके बारे में एक आलेख लिख डालते हैं तो उन्हें इससे प्रचार ही मिलता है. जिसने नहीं पढ़ा, वो भी पढ़ने पहुँच जाता है. उनका उद्देश्य हल हो जाता है और मात खाते हैं आप. फिर क्यूँ नहीं नजर अंदाज करते उन्हें?? इसमें क्या परेशानी हैं?

क्यूँ गोबर हटाने के लिए नगर निगम का इन्तजार करना, बच कर निकलिये न!! वक्त आने पर नगर निगम अपना सफाई कार्य कर लेगी और ये लोग भी हतोत्साहित हो लिखना बंद कर देंगे. जब कोई पढ़ेगा ही नहीं तो यह लिखेंगे किसके लिए और कब तक?

 

माना कि आप डाईविंग में पारंगत हैं, मगर डाईव तो सही जगह लगाओ!!

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एक रचना

जोड़ पायें  वो तुरपनें चुनियें
वरना फिर आप उधड़ने चुनिये

दिल की आदत तो है धड़कने की
साथ धड़कें   वो धड़कनें चुनिये

कितनी खबरें लहू से रंग छपतीं
देख कर आप कतरनें चुनिये.

दिल ये   पागल कहाँ बहलता है
ख्वाब भी क्यूँ अनमनें चुनिये.

मजहबी चाल हम समझते हैं
अब  नये और  झुनझुने चुनिये.

-समीर लाल ’समीर’

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बुधवार, मार्च 24, 2010

निंदिया न आये-जिया घबराए

 

awakening

देर रात गये सोने की कोशिश मे हूँ. नींद नहीं आती तो ख्याल आते हैं. अकेले में ख्याल डराते है और इंसान अध्यात्म की तरफ भागता है भयवश. यह इन्सानी प्रवृति है, मैं अजूबा नहीं.

आधुनिक हूँ तो आधुनिक तरीके अपनाता हूँ अध्यात्म के. बड़े महात्मा जी का आध्यात्मिक प्रवचन सीडी प्लेयर में लगा कर उससे मुक्ति के मार्ग के बदले नींद का मार्ग खोजने में लग जाता हूँ. नीरस बातें नींद में ढकेल देती हैं. नीरसता टंकलाईज़र (नींद की गोली) का काम करती है.

जो हमें अपनी पहुँच के बाहर दिखता है, जिससे हम भौतिक रुप से, रुपये पैसे से लाभांवित नहीं होते, वो हमें हमेशा ही नीरस लगता है. ज्ञान प्रप्ति के नाम पर कभी कैमिस्ट्री भी पढ़ी थी, तब मजबूरी थी परीक्षा पास करना. आज मजबूरी है, पाप कर्मों के बोझ से खुद को अकेले में उबारना, तो यही मार्ग, भले ही नीरस हो, बच रहता है.

कुछ देर मन लगा कर सुनता हूँ. महात्मा जी के कहे अनुसार, जीवन रुपी नैय्या से इच्छायें, चाह, लालच और वासना की गठरी उठा उठा कर फैंकता जाता हूँ पाप की बहती दरिया में. खुद को हल्का किये बगैर उपर नहीं उठा जा सकता, महत्मा जी मात्र १०० रुपये लेकर सीडी में समाये कह रहे हैं. मैं सुन रहा हूँ. कहते हैं चाहविहिन हो जाओ तो मुक्ति का मार्ग पा जाओगे और यह जीवन सफल हो जायेगा.

सोचता हूँ कि क्या मुक्ति का मार्ग पाना भी एक चाह नहीं? क्या चाहविहिन होने की चेष्टा भी एक चाह नहीं? क्या आमजन से उपर उठ अध्यात्मिक हो जाना भी एक चाह नहीं? जब एक चाह की गठरी को पाप की नदिया में फैंका सिर्फ इसीलिये कि दूसरी चाह की गठरी लाद लें, तो क्या यह व्यर्थ प्रयत्न और प्रयोजन नहीं?

एक तरफ मैनें पैसा कमाने का लोभ त्यागा ताकि मैं लोभ मुक्त हो जाऊँ किन्तु वहीं यह लोभ पाल बैठा कि इससे मैं मुक्ति का मार्ग पा जाऊँ. शांत चित्त हो जाऊँ.

एक अंतर्द्वन्द उठता है.

मानव स्वभाव से बाध्य हूँ. चाहत की जो गठरियाँ अर्जित कर ली है, उसे फेंकने में दर्द सा कुछ उठता है किन्तु नई चाहत की नई गठरी तपाक से आकर जुट जाती है. प्रवचन सुन सुन कर ऐसी ही कितनी चाहतों की गठरियों का आना तो अनवरत जारी है लेकिन फैंकना, बहुत मद्धम गति से हो पाता है. अगर ऐसा ही चलता रहा और नई गठरियाँ इसी गति से जुड़ती रहीं तो वो दिन दूर नहीं, जब यह नाँव डगमगा जायेगी और सारा बोझ लिए इसी पाप की दरिया में डूब जायेगी. अब तो एक चाहत और जुड़ गई कि किसी तरह नैय्या डूबने से बची रहे.

स्वामी जी बोल रहे हैं सीडी प्लेयर में से और मैं अपने मन की बात सुनने में व्यस्त हूँ. मन भारी पड़ रहा है उन सिद्ध महात्मा जी की वाणी पर. खुद को कब नीचा दिखा सकते हैं खुद की नजरों में? वरना तो सो गये होते.

इस बीच स्वामी जी और भी न जाने क्या क्या बोल गये, मैं सुन नहीं पाया और एलार्म से नींद खुली तो सीडी प्लेयर से घूं घूं की आवाज आती थी. जाने कब स्वामी जी ने बोलना बंद कर दिया. रात बीत चुकी है और प्लेयर अब भी चालू है.

प्लेयर ऑफ कर फिर तैयार होता हूँ एक नया दिन शुरु करने को. नींद पूरी हो गई है तो फिर दिनचर्या में जुटने की तैयारी करता हूँ.

क्या पाप, क्या पुण्य, कैसा मुक्ति मार्ग? सब अब रात में सोचेंगे जब दिन भर की थकन के बाद भी मन कचोटेगा और नींद आने से मना करेगी.

सोचता हूँ कि जिस दिन सी डी प्लेयर घूं घूं बोलता रह जायेगा और हम कभी न उठने के लिए सो चुकेंगे, उस दिन हिसाब किताब होगा, तब खाता बही देखेंगे कि नांव में कितनी कौन सी वाली गठरियाँ बाकी रह गई हैं.

उस हिसाब का बैलेंस भला कौन जान पाया है.

१०० रुपये बेकार ही गये लगता है सी डी खरीदने के. इससे बेहतर तो नींद की गोली खरीदते, जरा सस्ती पड़ती तो अगले दिन के पाप कर्म भी कुछ कम ही होते पुनः उस दिन की रोटी जुगाड़ने की चाह में.

 

कुछ मुश्किलों को सुलझाने की खातिर
खुद को ही उलझाता चला जाता हूँ मैं

दर्पण में यूँ अजनबी नजर आता हूँ मैं...

-समीर लाल ’समीर’

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रविवार, जनवरी 31, 2010

ज्ञानदत्त जी की पगली पोस्ट से पगलिया तक

मैने पाया है कि श्री ज्ञानदत्त पाण्डे जी की मानसिक हलचल उनके लिए मानस में चाहे जो भी हलचल मचाती हो मगर उसका एक रुप दूसरे के मन में हलचल मचाने का हमेशा रहता ही है.

कभी मुझे लगता है कि अगर वो ब्लॉग और रेल नौकरी की बजाय राजनीति में हाथ आजमाते तो आज लालू उनके सामने पानी भर रहे होते. वो गेंद दूसरे के पाले में फेंक कर मुस्कराते हुए सामने वाले से शुद्ध हिन्दी में कहते हैं कि अब गेंद आपके पाले में है, नाऊ इट इज़ योर चांस. इज़ में ज के नीचे नुक्ता लगाना भी कभी नहीं भूलते. :)

देवनागरी में उर्दु का सम्मिश्रण कर अंग्रजी शब्दों से नये हिन्द का निर्माण का यह प्रारुप, हिन्दी के सशक्तिकरण का बोझा उठाये उनके कांधे के बोझ को गद्दीदार बना भाषाविद लोगों की लाठी सहने की क्षमता प्रदान करता होगा और वो सुगमता से रीडर्स डाईजेस्ट के हिन्दी संस्करण सर्वोत्तम के बंद होने का दोष हिन्द समाज को दे निकल जाते हैं बिना व्यवसायिक कारण का आंकलन किए, आखिर राजनित में कब किसने अपनी शुचिता और सुभिता के बाहर और उपर देख कुछ भी बोला है वरना क्या मजाल कि एक मंत्री कह जाये कि वह भविष्यवक्ता नहीं शक्कर के भाव बताने को और दूसरा कि मेरे पास जादू की छड़ी नहीं कि घुमाऊँ और मंहगाई खत्म?, बस वैसे ही इतना ही कि गेंद इज़ इन कोर्ट अगेन, खेलो!!

फिर क्या है, कोई मुद्दा पकड़ने गेंद के पीछे भाग रहा होता है तो कोई ज़ में नुक्ता देख ही मुदित हुआ बैठा होता है. मैं तो खैर संपूर्ण प्रक्रिया पर मोहित हूँ ही.

ऐसी ही एक गैंद उन्होंने टिप्पणी द्वार बंद कर ’पगली’ पोस्ट पर उछाली कि अगर आप कुछ सोचते हैं तो अपने ब्लॉग से कहें. वो कहते हैं कि:

’शायद यह पोस्ट मात्र देखने-पढ़ने की चीज है। यह पोस्ट आपकी सोच को प्रोवोक कर आपके ब्लॉग पर कुछ लिखवा सके तो उसकी सार्थकता होगी। अन्यथा पगली तो अपने रास्ते जायेगी। वह रास्ता क्या होगा, किसे मालूम!’

उस पगली की हालात देख कुछ मन में न घुमड़े, ऐसा कैसे हो सकता है लेकिन वहाँ तो टिप्पणी बंद है तो यहाँ से एक पूरी कथा. देखें और बतायें, यहाँ तो टिप्पणी चालू है.


पगलिया!!
pag

रेल्वे पटरी के पार उस बजबजाते नाले के किनारे कचरे के ढेर के पीछे पड़ी रहती है वह. वही उसका घर है. धरती बिछौना है तो आसमान छत. उम्र यही कोई २८ या २९ बरस की होगी. पन्नियाँ बिन कर एक छतरी सी तान ली है उसने बारिश से बचने के लिए. बस्स!

जोर जोर की आवाज में बहुत लय में गाना गाती है;

परदेशवा न जहिहा पिया, सावन में...
सावन में पिया, सावन में...

बादल गरजे हाय, बिजूरी चमके
पिया बिन जिया मोरा धक धक धड़के
धूँधटा न खोलूं पिया....
सावन में...

परदेशवा न जहिहा पिया, सावन में...
सावन में पिया, सावन में...

जाने कितने दर्द उतार देती है वह अपनी आवाज में इसे गाते. आँखें बहती रहती हैं और कंठ गाते रहते हैं..जैसे वो एक दूसरे से परिचित ही न हों!!

पता नहीं कौन सा दर्द समेटे है. जाने कैसे और किस आधात से पागल और विक्षिप्त हो भटकती यहाँ चली आई है. कोई नहीं समझ पाता है उसकी पीड़ा..बस, सब उसे पगलिया कहते हैं और हँसते हैं.

किसी भी इन्सान को नाले के पास आता देखती है, तो अजब अजब तरह की आवाजें निकालती, चिल्लाती और पत्थर फैकती है. दिन में एक दो बार स्टेशन के पास तक आती है. स्टेशन के करीब के ठेले वाले उसे जानने लगे हैं. लोगों का छोड़ा खाना उसे उठाने देते हैं. कुछ भी बचा खुचा फैंका हुआ खाकर वह फिर उसी नाले के किनारे चली जाती है और अपनी गंदी कुचेली जगह जगह से फटी साड़ी में लिपटी पड़ी रहती है. बिखरे बाल, मैल से भरा शरीर और चेहरा, पीले दांत. लोग बताते हैं कि पगली है.

आस पास खेलते छोटे बच्चों का झुंड जब उसे पगलिया पगलिया कह कर चिढ़ाता है तो वो उन पर ढेला फैकती है. सारे बच्चे हो हो कर हँस कर भागते हैं. उन बच्चों के लिए यह भी एक खेल ही है. बच्चों को समझ ही क्या?

कोई नहीं जानता है कि वो कौन है, कहाँ से आई है और कहाँ की रहने वाली है. गाने की भाषा से बस अंदाज ही लगता है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश में कहीं की रहने वाली है.

रोज ही देखता हूँ उसे स्टेशन के आस पास. कभी गाना गाते, कभी बच्चों को ढेला लेकर दौड़ाते, कभी खाना बीनते. मन में अनायास ही ख्याल आता है कि जाने कौन है? शायद वो भी मुझे रोज रोज देख पहचानने लगी है.

आज शाम जब स्टेशन के पास से गुजर रहा था तब वह हाथ में एक दोना लिए नाली की तरफ जाते जाते एकाएक मेरे स्कूटर से टकराते बची. मैने जोरों से ब्रेक मारा और अनायास ही वह बोल उठी, ’माफ करियेगा’.

मैं आवाक उस मैली कुचैली काया को देखता रह गया और वो दौड़ कर नाले के किनारे चली गई और जोर जोर से जाने क्या क्या बड़बड़ाने लगी.

घर लौटा मगर उसकी वह आवाज मेरा पीछा करती रही, ’माफ करियेगा’.

मन यह मानने को तैयार ही नहीं है कि वह कोई पगलिया है. रात बड़ी देर तक सोने की कोशिश करता रहा लेकिन नींद जाने कोसो दूर चली गई.

बार बार मन में एक ही ख्याल कौंधता रहा कि आखिर वो कौन है और क्या है उसकी मजबूरी?

खिड़की से देखता हूँ आकाश में सूरज निकलने की तैयारी में है और रात सूरज के तेज में तार तार हो अपना अस्तित्व खोती जा रही है.

ख्याल उठता है उस पगलिया का. कहीं इस वहशी दुनिया से अपने अस्तित्व और आबरु की रक्षा के लिए तो यह रुप नहीं धर लिया उस वक्त की मारी ने?

पागलों की दुनिया की पागल नजरों से बिध कर पागल हो जाने से बेहतर पागल बने रहना ही पगलिया को बेहतर विकल्प नजर आया होगा, इसे पागलपन की बजाय समझदारी कहना भी कहाँ तक गलत होगा.

कौन जाने!!

इस वहशी दुनिया की, नजरों से बचने को
कितनी मजबूर है वो, ऐसे स्वांग रचने को

-लोग उस अबला को, पगलिया कहते हैं?

-समीर लाल ’समीर’

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रविवार, जनवरी 10, 2010

हिन्दी ब्लॉगिंग- कौवा महन्ती!!!!

 

बूंद बूंद पानी को तरसते ऐसे इन्सान को भी मैने देखा है जो समुन्द्र की यात्रा पर निकला तो ’सी सिकनेस’ का मरीज हो गया. पानी ही पानी देख उसे उबकाई आने लगी, जी मचलता था. भाग कर वापस जमीन पर चले जाने का मन करता था. शुद्ध मायने में शायद यह अतिशयता का परिणाम था और शुद्ध भाषा में शायद इसी को अघाना कहते होंगे.

याद है मुझे, कुछ बरस पहले डायरी के पन्ने दर पन्ने काले करना. न कोई पढ़ने वाला और न कोई सुनने वाला. बहुत खोजने पर अगर कोई सुनने वाला मिल भी जाये तो यकीन जानिये कि वो बेवजह नहीं सुन रहा होगा. निश्चित ही या तो उसे आपसे कुछ काम होगा या वो भी अपने खीसे में डायरी दबाये सुनाने का लोभ पाले सुन रहा होगा.

नियमित लिखना, टाईप करना और फिर उसे सहेज कर लिफाफे में बंद कर संपादक को सविनय नम्र निवेदन के साथ भेजना. कुछ संपादक संस्कारी और अच्छे होते थे जो सखेद रचना वापस भेज देते थे वरना तो पता ही नहीं चलता था कि रचना कहाँ गई.

कभी किस्मत बहुत अच्छी निकली और किसी पहचान के माध्यम से यदि निःशुल्क छप भी गई तो संपादक की कैंची से गुजरने के बाद खुद की रचना को खुद पहचानना मुश्किल हो जाता था. शब्द ही नहीं, भाव भी बदले नजर आते थे.

समय परिवर्नशील है.

इन्टरनेट प्रचलन में आ गया, ब्लॉग खुल गये. अब आप ही लेखक और आप ही संपादक. जो जी में आये, छापो. ब्लॉग, छ्पास कब्जियत का रामबाण इसबगोल. औकात आपकी-मरजी आपकी, चाहो तो दूध से फांक लो या पानी से. कब्जियत निवारण की गारण्टी. आज सुनाने के लिए लोगों को खोजना नहीं होता, ये दीगर बात है कि हिन्दी ब्लॉगिंग में अभी भी सुनने वाले उसी टाइप के हैं जैसे पहले थे याने अपने खीसे में अपनी डायरी दबाये सुनाने का लोभ पाले सुनने वाले. थोड़े ही हैं जो इससे अलग हैं कि शौकिया सुनने चले आये.

इस प्रक्रिया में चूँकि सभी सुनाने वाले ही आपको पढ़ रहे हैं तो स्वभाविक तौर पर आप उनको, कम से कम, लेखन से जानने लगते हैं. तब अगर उन्हें आपका लिखा पसंद न आये या वो आपसे आपके लेखन को लेकर नाराज हो जाये तो कैसे बताये?

सीधे सीधे कह देने में आपके भी नाराज होकर बदला लेने का खतरा है या वो अपने नाम से इतनी हिम्मत नहीं जुटा पाता कि वो सीधे आपसे कह दें कि क्या बकवास लिखा है. तब वह सुरक्षा बाबत या आत्मविश्वास बूस्टर हेतु बेनामी का कवच धारण कर आप पर वार करते हैं. आप चाहें तो उसका किया वार सबको दिखा दें और न चाहें तो उसके वार को डिलिट कर मिटा दें. इसमें साहस कैसा और कायरता एवं अकायरता कैसी?

जंगल के वासी हो तो फिर क्या शेर, क्या सियार और क्या चूहा? सब मिलेंगे और सबसे डील करना होगा अपने अपने तरीके से.शहर जा नहीं सकते, वहाँ लोग ढेला मारते हैं.

सब आपके हाथ में ही तो है, फिर इससे घबराना कैसा? इससे किसलिये नाराज होना? यहाँ ब्लॉगजगत के यही कायदे हैं-इन्हीं के साथ जीना होगा...याद करो सम्पादक का मौन या खेद सहित रचना की वापसी भी मौन धरे ऐसा ही कुछ कहती थी. तब तो आप कुछ नहीं कह पाये फिर अब? तब भी आपकी इच्छा थी कि चाहें तो दोस्तों को बतायें कि रचना वापस लौट आई है या चुप्पी मार जायें. अधिकतर तो चुप्पी ही मार जाया करते थे, क्यूँ?

कहीं छपास पीड़ा के निवारण की इतनी सारी स्पेस देख और इतने सारे सुनने वाले एक जगह इक्कठा देख अघा तो नहीं गये?  वही ’सी सिकनेस’??

ऐसे में एक ही रास्ता है मित्र कि जहाज किनारे लगा लो, उतर जाओ जमीन पर. मगर ध्यान रहे- यह वही जमीन है जहाँ से भाग निकले थे बूँद बूँद पानी की तरसन लिए.

चैन तो कहीं नहीं..

punch

 

ब्लॉग

मुझे

सुविधा देता है..

मैं मन में उठते भाव

जस का तस

लिख देता हूँ..

फिर

पाठकों की अदालत में

पेश कर

सो जाता हूँ..

रात गये

अंधेरे में

विचारता हूँ..

ये क्या लिख दिया मैने..

अपनी ऊँगलियाँ तोड़ देना चाहता हूँ..

तोड़ देना चाहता हूँ..

उस की-बोर्ड को

जिन पर इन ऊँगलियों की मदद से

टंकित किया था...

सुबह उठता हूँ..

देखता हूँ

पाठक कह रहे हैं

वाह!! वाह!!

बहुत सुंदर..!!!.

और

मैं मुस्कराते हुए

अपनी उजबक सोच

को सर झटक कर

अलग कर देता हूँ

और

मार देता हूँ

उस अकेले बेनामी पाठक की सोच को

जिसकी सोच अक्षरशः

मेरी सोच से मिलती थी..

’कौवा महन्ती’ के

अपने कायदे हैं!!

-समीर लाल ’समीर’

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बुधवार, जनवरी 06, 2010

सर मेरा झुक ही जाता है...

अक्सर जब तक कोई विशेष मजबूरी नहीं होती, मैं उस गली से गुजरने से रोकता हूँ खुद को. जानता हूँ, उस गली को छोड़ कर दूसरा रास्ता लेने में मुझे लगभग दोगुनी दूरी तय करनी पड़ती है फिर भी.

कुछ विशेष वजह भी नहीं. कुछ सड़क छाप आवारा कुत्ते हैं, वो दिन भर उस गली को छेके रहते हैं. हर आने जाने वाले पर भौंका करते हैं. पीछे पीछे आते हैं. छतरी दिखाओ तो डर कर दुम दबा कर भाग जाते हैं मगर भौंकते हैं. एक बार तिवारी जी को दौड़ाया भी था मगर काटा नहीं. तिवारी जी ने ही बताया था.

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तमाशबीन बने गली में रहने वाले न जाने क्यूँ इस बात पर मुस्कराते हैं मानो चिढ़ा रहे हों. क्या मालूम मुस्कराते भी है या उनका मूँह ही वैसा है. मैने हमेशा, जब कभी मजबूरी में उस गली से गुजरना पड़ा, उनका मूँह वैसा ही देखा है मानो मुस्करा रहे हों.

वो भी तो निकलते होंगे उसी गली में. उनकी तो मजबूरी है है कि वो रहते ही उस गली में है. कुत्तों का क्या है वो तो आवारा हैं, वो तब भी भौंकते होगे. बाकी रहवासी भी शायद तब भी चिढ़ाने को मुस्कराते हों. उनका तो मूँह ही वैसा है. क्या पता!

मेरे घर से दक्षिण में कुछ मकान छोड़ कर एक बरगद का पेड़ है. रात अंधेरे उस तरफ देखो तो बड़ा अजीब सा दिखता है, भयावह. जाने कौन शाम को उसके चबूतरे पर दिया जला कर रख जाता है. टिमटिमाता दिया देर रात तक जलता रहता है. दूर से देखने पर जान पड़ता है को कोई जानवर बैठा है और उसकी आँख टिमटिमा रही है. जानवर भी कैसा-एक आँख वाला. कोशिश तो करता हूँ कि रात गये उस तरफ न जाऊँ मगर कभी मजबूरी में जाना भी पड़ा तो मेरी नजर उस पेड़ को बचा कर निकलती है हमेशा.

जैसे जैसे पेड़ पास आता जाता है, मेरी धड़कने असहज होने लगती हैं. पेड़ भौंकता तो नहीं मगर कभी अजीब सी आवाजें करता है तो कभी डरावना सन्नाटा खींच लेता है. मुझे दोनों हालतों में उसके पास से गुजरने में परेशानी होती है. अक्सर देर रात लौटने में उस गली को छोड़ता, दक्षिण की बजाय और थोड़ा ज्यादा लम्बा रास्ता लेकर उत्तर की तरफ से घूम कर घर जाता हूँ.

आज तक वैसे न तो उन कुत्तों ने काटा और न ही पेड़ ने परेशान किया मगर वो शायद इसलिए कि मैं उनसे बच कर निकलता हूँ या फिर शायद यह सब मेरे भीतर का एक वहम बस हो लेकिन है तो.

ऐसे ही कितने वहम, कितने पूर्वाग्रह और कितने डर पाले मैने अपनी मंजिल को कितना दूर और अपने रास्ते को कितना लम्बा बना लिया है. थकान होने लग जाती है कभी कभी.

एक इच्छा है कि कभी सहज और सरल जीवन जी पाऊँ मगर लगता तो नहीं.

ये डर, ये पूर्वाग्रह और ये वहम-जाने किसने, कब और किन बातों से मेरे भीतर तक उतार दिये हैं. ठीक वैसे ही जैसे की मेरे संस्कार.

शायद कभी न बदलें.

चलते चलते:

मंदिर, मस्जिद या गुरुद्वारा
सर मेरा झुक ही जाता है.

माँ ने ये सिखाया था मुझे.

-समीर लाल 'समीर'

माँ बाप की बचपन की समझाईश ऐसे ही तो संस्कार बन जाती है, किसी के भी व्यक्तित्व का हिस्सा.

कहने को बस यूँ ही: माँ बाप बच्चों को शैतानी से रोकने की लिए अक्सर कह देते हैं कि साधु बाबा ले जायेगा, या पुलिस पकड़ लेगी या वहाँ भूत रहता है. आपको क्षणिक आराम मिल सकता है मगर प्लीज, एक डरा हुआ मैं और न बनायें. जरा सोचे. और भी तो तरीके हैं बच्चों की शैतानियाँ रोकने के. उन्हें अपनाईये!!

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