सोमवार, सितंबर 21, 2015
सम्मानित साहित्यकार्स!!
सोमवार, सितंबर 01, 2014
डॉ कुमार विश्वास: हिन्दी कविता के मंच का कोहिनूर
पिछले महिने जुलाई २०१४ में जिस दिन डॉ कुमार विश्वास अमेरीका पहुँचे, उसी सुबह उनसे फोन पर बात हुई. पता चला कि अमेरीका और कनाडा के १४ अलग अलग शहरों में हो रहे कार्यक्रमों में टोरंटो में कार्यक्रम भी शामिल है. पिछले साल भी २०१३ में डॉक्टर कुमार विश्वास कनाडा आये थे और एक शानदार शाम तालियों की गड़गाड़हट के बीच हास्य व्यंग्य की फुहार के साथ बीती थी. उसी शाम कनाडा के इमीग्रेशन मिनिस्टर जेसन कैनी भी कार्यक्रम में आये थे और हिन्दी के चेहतों की भीड़ जो डॉ विश्वास को सुनने के लिए उमड़ी थी को देख और डॉ कुमार विश्वास की खास मांग पर उन्होंने कार्यक्रम में ही ऑटारियो के स्कूलों में हिन्दी को एक वैक्लपिक विषय में शामिल करने की घोषणा कर दी थी. वो खुद भी तब से डॉक्टर कुमार विश्वास के फैन हो गये थे. आश्चर्य लगा कि ऐसे कवि का २० दिन बाद कार्यक्रम है और कहीं कोई चर्चा नहीं और न ही विज्ञापन आदि.
यह पहली बार देखने में आ रहा था कि मुझे पता करना पड़े कि डॉक्टर कुमार विश्वास का कार्यक्रम कहाँ होना है अन्यथा तो हिन्दी का कोई भी कवि भारत से आये तो कम से ३ महिने पहले से १०-१२ बार ईमेल तो आ ही जाती हैं कि आपको आना है और इतने प्रयासों और विज्ञापनों के बाद भी अच्छा कार्यक्रम कविता का उसे मान लिया जाता है जिसमें २५० से ३०० लोग आ जायें. लगभग ५० आमंत्रित और २०० लोग २० ऑलर की टिकिट खरीद कर.
खैर, पता करके आयोजकों को फोन किया तो पता चला कि कार्यक्रम ब्राम्पटन नामक क्षेत्र में रखा गया है और पूरा बिक (सोल्ड आऊट) है इसलिए विज्ञापन आदि नहीं कर रहे हैं. मैने जानना चाहा कि आखिर कितने की टिकिट थी जो इतनी तेजी से सारी बिक गई. पता चला कि हॉल की क्षमता सीमित है और सिर्फ ६०० टिकिट बेचना था १०० डॉलर प्रति टिकिट के हिसाब से. डॉ कुमार विश्वास का नाम सुनते ही बिना विज्ञापन कें एक मूँह की बात से दूसरे मूँह की बात जुड़ते ही ६०० टिकिट बिक गये और अब तो सबको मना करना पड़ रहा है.
मैं आश्चर्य में था कि एक हिन्दी का कवि अकेले कविता पढ़ेगा और यहॉ आ बसे हिन्दी समझने वाले लोग जो बॉलीवुड के धुनों पर शाहरुख या मीका, हनी सिंह, बब्बू मान आदि के नाच गाने पर झूमने का आदी है वो हिन्दी कविता सुनने के लिए १०० डॉलर का टिकिट देकर आ रहे हैं.
कानों को विश्वास तो न हुआ क्यूंकि अभी पिछले हफ्ते ही यानी जैसे वादक के अन्तर्राष्ट्रीय कनसर्ट को ६० डॉलर की टिकिट देकर सुनकर आया था. मैने मित्रो को बताया तो वो सब भी जिद करने लगे कि हमें भी चलना है डॉ विश्वास को सुनने और १०० डॉलर की टिकिट जरुर ले लेंगे. मैने आयोजकों से निवेदन किया कि भई हमारे कुछ परिवार और मित्र भी उनके दीवाने हैं और फिर डॉ कुमार विश्वास का रोज तो आना होता नहीं है अतः कैसे भी प्रबंध कर सीटें बढ़वाईये. यह भी तय था कि कार्यक्रम के एक दिन पूर्व जब टीवी और रेडियो वाले डॉक्टर कुमार विश्वास का इन्टरव्यू लेंगे तब एकाएक न जाने कितने लोगों को और मालूम चल जायेगा और किस किस को मना कर दिल तोड़ते जायेंगे बहुत निवेदन के बाद वो लोग माने और १०० कुर्सियाँ अलग से बढ़वाई गईं. हाल में चलने फिरने की जगह भी बच न रही.
हालांकि आयोजक उनका होटल बुक करा कर उन्हें एयरपोर्ट पर स्वागत हेतु हाजिर थे मगर पहले एक दिन डॉक्टर कुमार विश्वास हमारे परिवारिक संबंधों के चलते हमारे घर पर ही ठहरे. होटल का रुम उनके आगमन का इन्तजार में रुका रहा. अगले दिन रात को वह अपने होटल में शिफ्ट हो गये क्यूँकि उसके अगले दिन उनका कार्यक्रम होना था.
कार्यक्रम ठीक ८.३० बजे शाम शुरु हुआ. डॉक्टर कुमार विश्वास तालियों की गड़गाहट के बीच सिक्यूरीटी के घेरे में मंच पर पहुँचे वरना तो उनके चहेतों के बीच से गुजर मंच तक पहुँच पाना ही मुमकिन न हो पाता २ घंटे तक और फिर अपनी बातों और कविताओं का ऐसा जादू छेड़ा कि न सिर्फ भारत के विभिन्न प्रांतों से यहाँ आ बसे श्रोता बल्कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान, श्रीलंका, बंगलादेश, नेपाल आदि देशों से कनाडा में आ बसे हिन्दी समझने वाले बॉलीवुड के नाच गानों पर थिरकने वाले लोग डॉक्टर कुमार विश्वास को मगन होकर सुनते रहे. श्रोताओं की भीड़ प्रांजल हिन्दी के शुद्ध गीत:
हो काल-गति से परे चिरंतन , अभी वहाँ थे अभी यहीं हो.. ,
कभी धरा पर, कभी गगन में, कभी कहीं थे, कभी कहीं हो.. ,
तुम्हारी राधा को भान है तुम सकल चराचर में हो उपस्थित,
बस एक मेरा है भाग्य मोहन !कि जिस में हो कर भी तुम नहीं हो..
जैसी रचना मंत्रमुग्ध होकर न सिर्फ सुनती रही बल्कि
मांग की सिन्दुर रेखा...बाँ
सुरी चली आओ…. जैसे गीतों की मांग कर उन्हें जी भर कर तालियों के माध्यम से सराहती रही. एक के बाद एक नायाब मुक्तक, गीत, गज़ल और वाकिये सुनाते तालियों और हँसी ठहाकों के बीच जब डॉक्टर साहब ने अपने चिर परिचित अंदाज में डॉ बशीर बद्र साहब का यह शेर कहा:
मुसाफिर है हम भी, मुसाफिर हो तुम भी,
किसी मोड़ पर फिर मुलाकात होगी।
तब घड़ी पर नजर गई. अरे, १०:३० बज गये. २:३० घंटे तक अकेले ऐसी समा बाँधे रहे कि पता ही नहीं चला और कार्यक्रम खत्म भी हो गया.
डॉक्टर कुमार विश्वास होटल लौट गये और हम वहाँ आयोजकों को बधाई देते चर्चारत हो लिए. हालांकि हॉल, साऊन्ड, डॆकोरेशन आदि यहाँ काफी मँहगे होते हैं मगर फिर भी लग रहा था कि आयोजकों ने अच्छा कमाया होगा. जिज्ञासु हिन्दुस्तानी स्वभाव कैसे चुपचाप चले आते. आयोजकों की कमाई का मोटा मोटा अंदाजा तो लगाना ही था अतः बात बढ़ाते हुए अपनी तरफ से ही पूछ लिए कि सुना है डॉ साहब तो काफी पैसा लेते हैं २,००० डॉलर से कम तो क्या लिए होंगे. आयोजकों की हँसी से लगा कि मैने कोई बहुत बड़ी बेवकूफी के बात कर दी. कहने लगे २,००० की जगह ३,००० में भी बुलवा दिजिये तो आपको उन्हें बुलवाने भर के ३,००० हम अपनी तरफ से दे देंगे. तब भी अभी जितना दे रहे हैं उसमें आप से ज्यादा हम बचा लेंगे. तब पता लगा कि ये हिन्दी का कवि अब १०,००० डॉलर में दो घंटे लिए मंच पर आकर कविता पढ़ता है. साथ में पाँच सितारा होटल में रुकना और बिजनेस क्लास का टिकिट. आजतक सुनते आये थे कि बहुत बड़े कविता के हस्ताक्षर भी यहाँ ५०० से १००० डॉलर की रेन्ज में आ जाते हैं तब इनके विषय में ये जानकर एक तरफ तो विस्मय की स्थिति और दूसरी तरफ अपार खुशी कि कुछ तो अलग है इनमें जो आज इन ऊँचाईयों पर आ कर खड़े हैं.
हिन्दी कविता के इतिहास में कब किसने सोचा होगा कि यह विधा भी कभी इस तरह धन वर्षा करवा सकती है इसके साधक पर. तय है कि यह अकेली हिन्दी कविता तो हो नहीं सकती. इसके साथ न जाने और क्या क्या जैसे ब्रेन्डींग, मार्केटिंग, बोलने और पढ़ने की विशिष्ट शैली, अथक परिश्रम और उन सबके आगे माँ शारदा का वरद हस्त- तब जाकर एक डॉक्टर कुमार विश्वास बनता है.
वाह!! डॉक्टर कुमार विश्वास!! हिन्दी कविता के मंच को ऐसा आयाम देने के लिए और इस मुकाम पर पहुँचाने के लिए साधुवाद, अनेक बधाई एवं हार्दिक शुभकामनायें.
अगले साल फिर इन्तजार रहेगा आपका इस टोरंटो शहर को.
-समीर लाल ’समीर’
सोमवार, जुलाई 29, 2013
जन्मदिन पर गुरुदेव का आशीष!!
उफ़ क्यों याद दिलाता कोई
उम्र ढल रही धीरे धीरे
गाकर गीत जनम दिन वाले
और बजा कर ढोल मजीरे
लेकिन जग की रीत यही है
औपचारिकी होना ही है
घिसा हुआ वह हैपी हैपी
रोना सबको रोना ही है
लेकिन कुछ ऐसे भी तो हैं
सदा लीक से हट कर चलते
दोपहरी का दीपक बन कर
नौका एक रात की खेते
उनसे ही ले नाधुर प्रेरणा
मुझको केवल यह कहना है
हर दिन, उगते सूरज जैसे
दीप्तिमान तुमको रहना है
आंधी,बरसातें,झंझाएं
कोई बाधा बन ना पाए
दिवस आज का बरस पूर्ण यह
गीत आपके ही दोहराये.
सादर
शुभकामनाओं सहित
राकेश खंडेलवाल
http://geetkalash.blogspot.ca/
रविवार, सितंबर 30, 2012
गुरुदेव को बधाई एवं मेरी एक गज़ल
आज गुरुदेव राकेश खण्डेलवाल जी की ५००वीं ब्लॉग पोस्ट दर्ज हुई. मन प्रसन्न हो गया. एक लम्बा सफर-५०० एक से बढ़कर एक अद्भुत गीत. जो उनका एक बार रसास्वादन कर ले तो हमेशा के लिए मुरीद हो जाये उनका. मुझ पर तो राकेश जी का वरद हस्त शुरु से ही है. सोचा, क्यूँ न आप भी गीत कलश पर जाकर उनके गीतों का आनन्द लें और उन्हें बधाई एवं शुभकामनाएँ दें.
इसी मौके पर उन्हीं का आशीर्वाद प्राप्त मेरी एक गज़ल:
तेरी मेरी दास्तां अब, हम कभी लिखते नहीं..
गीत जिनमें सादगी हो, अब यहाँ बिकते नहीं....
सांस छोड़ी थी जो अबके, वो अगर वापस न हो
उसके आगे जिन्दगी के दांव कोई टिकते नहीं...
हो इरादे नेक कितने, और हौसले भी हों बुलंद..
खोट का है दौर, ये सिक्के यहाँ चलते नहीं...
है ये वादा साथ चल तू, सब बदल डालूँगा मैं,
चल पुराने रास्तों पर, कुछ भी नया रचते नहीं...
मुश्किलें मूँह मोड़ने से, खत्म हो जाती अगर
लोग सीधे मूँह हों जिनके, इस डगर दिखते नहीं...
मैं वो दरिया जो कभी, सागर तलक पहुँचा नहीं,
सियासती इस खेल में हम, जिक्रे गुमां रखते नहीं...
-समीर लाल ’समीर’
शुक्रवार, मार्च 02, 2012
६ साल पूरे हुए और हम जहाँ के तहाँ: मैं मोती होना नहीं चाहता!!!
जब ३ मार्च २००६ को अपना ब्लॉग शुरु किया था तो बताया गया था कि बस एक साल की मेहनत और फिर इससे कमाई शुरु हो जायेगी. बड़े मन से जुटे. फिर साल दर साल बीतते गये. हर साल यही उम्मीद कहीं न कहीं बँधाई गई कि अगले साल से ...कमाई शुरु.
आज ६ साल बीत गये. मगर लोगों की बात सुन आज भी आशांवित हूँ कि बस, अगले साल से कमाई शुरु होने वाली है और फिर नौकरी छोड़ो और बस, दिन भर ब्लॉगिंग...जितना करोगे, उतना मजा...उतनी कमाई...क्या बात है!!
आज हो गये हैं ६ साल पूरे इस ब्लॉग का नशा लगे. समय के पंख दिखते नहीं मगर इस तरह अहसास तो करा ही देते है. फोटो वही पुराना लगाया हुआ है ६ साल पहले का. यही विडंबना है अधेड़ावस्था की कि जवानी का जाना मानो स्वीकार ही न हो...कई बार सोचता हूँ कि इससे बेहतर तो राजनिति मे उतर जाऊँ...वहाँ स्वीकार्य है चिर युवा रहना....आडवानी जी जैसे युवा अब भी प्रधान मंत्री बनने का स्वपन पाले लगे ही हैं रथ यात्रा निकालने में तो हमारी स्थिति तो थोड़ी बेहतर ही कहलायेगी.
खैर यह सब छोड़ें..६ साल के ब्लॉगर की कविता पढ़े...बधाई दें, मुस्करायें या जो मन आये सो करें मगर शुभकामनाएँ तो दे ही जायें:
कभी मन में था कि साहित्यकार कहलाऊँ ब्लॉग लिख लिख कर...हा हा...ब्लॉग और साहित्य...कितने न मुस्करा देंगे..अनभिज्ञ एवं बेवकूफ...मगर मैं चुप रहूँगा...क्यूँ कुछ कह कर अपने संबंध खराब करुँ....अब मन नहीं हैं साहित्यकार कहलाने का...मगर मन पर तो लोभ ने कब्जा जमाया हुआ है..उसका क्या करुँ...इस कविता में दृष्य देखें तो शायद आपका मन भी बदले:
मैं मोती होना नहीं चाहता!!!
बूँद एक चली
छोड़ बादल को
प्रसन्न मन
मिलेगी नीचे धरा पर
एक तत्काल बनी नाली में
जहाँ तेरती होंगी
नन्ही नन्ही किश्तियाँ
कागज़ की
वहीं
बनायेगी साथी बून्दों को
दोस्त अपना...
खेलेगी, गुनगुनायेगी
उमंगों में डूब
उन के साथ
गली में अक्स्मात बनी
एक नाली खुश हुई
आकर मिलेंगीं और बून्दें
तो वह मिल सकेगी
शहर भर की नालियों के संग..
पूछेगी हाल सारे शहर का...
गपियायेगी..खिलखिलायेगी और
मिलेंगी
इक नदिया में जाकर
नदी खुश थी
उमड़ती हुई धाराओं से मिल
जा सकेगी वह
उस गहरे सागर तक
जहाँ आती हैं सब नदियाँ उसकी तरह
बाँटेगी उनकी खुशियाँ..
हँस लेगी उनके साथ..
रहेगी खुश...
और सागर...
समाहित कर सबको अपने भीतर
शांत और गंभीर.....
फिर एक दिन एक हिस्सा
बन जाता वाष्प...
सूर्य की उष्मा से...
और उठ जा मिलती
उष्मा से बनी वाष्पकिरणें...बूँदें...
पुनः उन्हीं बादलोंमें...
जीवन के
अनवरत गतिक्रम सी
एकाएक एक बूँद रो उठती है
इस बार विदा होते...
कहीं मैं नाली की जगह
सीप में न समा जाऊँ...
मैं मोती बनना नहीं चाहती...
माना मोती कीमती होता है पर
मुझे...हाँ.....मुझे
फिर वापस आना है
अपनों से मिलने
और बनाये रखनी है
अपने होने की अस्मिता
आज फिर एक बार
आँख नम है मेरी...
मुझे वापस आना है...
अपनों में मिल जाना है!!!!
-मैं मोती होना नहीं चाहता!!!
-समीर लाल ’समीर’
बुधवार, नवंबर 03, 2010
मन में जो उजियारा कर दे
|
| कुछ रोज पहले किशोर दिवसे जी का एक आलेख पढ़ रहा था जिसका शीर्षक देख लगा कि इस पर तो पूरी गज़ल की बनती है, तो बस प्रस्तुत है एकदम ताजी गज़ल दीपावली पर खास आपके लिए: |
| लाखों रावण गली गली हैं, चीर हरण जो रोक सकेगा बापू सा जो पूजा जाये श्रद्धा से खुद शीश नवा दूँ जो सच कहने से बन जाये जीवन की कड़वाहट हर ले दिल मेरा खुश होकर गाये मन में जो उजियारा कर दे -समीर लाल ’समीर’ |
रविवार, अगस्त 15, 2010
मुद्दतों बाद….
स्वतंत्रता दिवस के मौके पर आप एवं आपके परिवार का हार्दिक अभिनन्दन एवं शुभकामनाएँ.
आज एक गज़ल, जो चंद रोज पहले महावीर ब्लॉग पर छपी थी. महवीर ब्लॉग से अपनी गज़ल का छपना एक गौरव की अनुभूति देता है, बहुत आभार महावीर जी एवं प्राण जी का इस इस स्नेह के लिए. देखें इस गज़ल को, एक अलग तरह का प्रयोग है हर शेर के शुरुवात में मुद्दतों बाद के इस्तेमाल का:
मुद्दतों बाद उसे दूर से जाते देखा
धूप को आज यूँ ही नज़रें चुराते देखा
मुद्दतों बाद हुई आज ये कैसी हालत
आँख को बेवज़ह आंसू भी बहाते देखा
मुद्दतों बाद दिखे हैं वो जनाबे आली
वोट के वास्ते सर उनको झुकाते देखा
मुद्दतों बाद खुली नींद तो पाया हमने
खुद को सोने का बड़ा दाम चुकाते देखा
मुद्दतों बाद जो लौटा हूँ मैं घर को अपने
अपने ही भाई को दीवार उठाते देखा
मुद्दतों बाद कोई आने लगा अपने सा
रात भर ख्वाब में मैंने उसे आते देखा
मुद्दतों बाद किसीने यूँ पुकारा है "समीर"
खुद ही खुद से पहचान कराते देखा
-समीर लाल ’समीर’
सोमवार, जुलाई 05, 2010
आज एक खास दिन!
आज मेरी माँ का जन्म दिन है. ५ साल पहले २८ जनवरी, २००५ को वो मुझसे दूर चली गई लेकिन एक वो दिन था और एक आज का, तब से रोज रात में वो मेरे सपने में मेरे पास आती है और मुझे लगता ही नहीं कि वो मुझसे दूर चली गई है.
एक खास बात, मेरी नानी का जन्म दिन भी ६ जुलाई, मेरी माँ का भी और मेरी भतीजी का भी याने मेरी भतीजी के लिए उसकी परदादी, दादी और उसका जन्म दिन एक ही दिन!!
आज इस मौके पर माँ की बहुत याद आ रही है.
जब भी मैं
पीछे मुड़कर सोचता हूँ..
अपना बचपन
अपना मकान
वो गलियाँ
वो मोहल्ला
अपना शहर
अपना देश..
या
फिर
खुद अपने आप को..
हर बार मुझे
माँ
याद आती है!!
-समीर लाल ’समीर’
जन्म दिन मुबारक, मम्मी!! आज जब रात में सपने में आओगी तब केक काटेंगे, पक्का!! आओगी न!!
रविवार, मार्च 07, 2010
यूँ बीत गया समय...
इधर मैं कुछ लिख नहीं रहा हूँ. बिल्कुल चुप!
मैं तब भी चुप था, जब उसकी शादी होना तय हुआ था.
उस रात चाँद खामोश था और मैं अपनी छत से कूद उसके छतरी वाले कमरे में उसका हाथ थामें बस उसे मौन देखता रहा था.
हमारे बीच एक घुप्प सन्नाटा पसरा था और उस छतरी वाले कमरे में रखा वह पुराना पियानो-सफेद कफन की मानिंद चादर ओढे जाने कौन सी मौन धुन छेड़ रहा था अपनी टूटी हुई बीट्स से.
वो मौन संगीत, मुझमें बसा है आज भी. हर धडकन के साथ कानं में गूँजता है. धड़कन रुके तो इस गूँजार से छुटकारा मिले.
वह शादी के बाद चली गई और मैं..वहीं रुका हूँ, उस छतरी वाले कमरे में, उस मौन पियानो के संगीत के साथ-सोचता हूँ शायद मेरा फैसला ही सही था जो उसकी अगली शाम मैने उससे उस कोने वाले पार्क में सुनाया था और फिर....कल उसको देखा.....
कल शाम
बरसों बाद
जब तुम्हें देखा
अपने साजन के साथ
खिलखिलाते...
तो
मुझे याद आये
न जाने कितने
तुम्हारे चेहरे
रोते....
एक वो
जब तुम मेरे काँधे पर सर रख
रोती रही थी घंटो
एक वो
जब मेरी पीठ से पीठ टिकाये
तुम्हारी सिसकियाँ नहीं थमती थी..
एक वो
जब तुम अपने ही धुटनों में
मूँह छिपाये
आँसू बहाती रही...
एक वो
जब तुम मुझे देखती रही
और
आँसू गिराती रही...
और
एक वो
जब तुमने आँसू बहाये थे
उस खत पर
जिस पर मैने लिखा था..
अलविदा....
मुझे वो चेहरे याद आये,
न जाने क्यूँ!!!
-समीर लाल 'समीर'
-उधेड़ बून बनी हुई है, वक्त उलझा है जाने किन व्यस्तताओं में और इस बीच कब मेरी जिन्दगी की डायरी, मेरे भावों का साक्षी, यह ब्लॉग अपनी चार साल की उम्र पूरी कर गया..गुजरे २ मार्च को, बता ही नहीं पाया. बहाव बना है तो आता रहेगा.
आपकी शुभकामनाओं और स्नेह का आकांक्षी बना रहूँगा.
बुधवार, दिसंबर 30, 2009
कहाँ गया पुराना साल?
| वो कहतें हैं पुराना वर्ष चला गया... मैं कहता हूँ वर्ष कहीं जाता नहीं... यह सिर्फ भ्रम है ये दर्ज हो जाता है इतिहास के सफ्हों में एक और सफ्हा बन कर जैसे कि हमारे कर्म!!! -समीर लाल ’समीर’ |
निवेदन:
वर्ष २०१० मे हर माह एक नया हिंदी चिट्ठा किसी नए व्यक्ति से भी शुरू करवाएँ और हिंदी चिट्ठों की संख्या बढ़ाने और विविधता प्रदान करने में योगदान करें।
नववर्ष की बहुत बधाई एवं अनेक शुभकामनाएँ!
शुक्रवार, अक्टूबर 02, 2009
ताऊ कौन है आखिर??
गुरु गुड़ रह गया और चेला शक्कर हो गया.
हमें देखो, तीन साल छः महिने हो गये कलम घिसते घिसते, तब कहीं जाकर कुछ ३४२ पोस्टें और एक रिकार्ड १५००० टिप्पणियाँ हासिल कर पाये और हमारे चेले ’ताऊ’ को देखो: १ साल से जरा ही उपर और ४०४ पोस्ट और शामिल हो गये आज गुरुजी के १५००० कल्ब में. हिन्दी ब्लॉग जगत में दूसरा बंदा, गुरु जी की राह पर चुपचाप चलता.
आज अनूप शुक्ला जी ने १५००० वीं, आशीष खण्डेलवाल जी ने १५००१ वीं टिप्पणी की ताऊ की प्रेमलता पाण्डे जी के परिचयनामा वाली ४०४ वीं पोस्ट पर.
चेला है कि काम्पटिटर!! हर जगह अड़ी दे रहा है और कुछ कहो तो कहता है कि गुरु जी, सब आपका सिखाया है. क्या कहें..सिवाय इसके कि भईये ताऊ, बहुत बधाई ले ले और अब तो तू ही आगे आगे चल. हम न तो तेरी स्पीड से दौड़ पायेंगे और न ही तेरी पार पा पायेंगे.
बचपन में मैं तिवारी सर जैसा बनना चाहता था. आठवीं में हमें गणित पढ़ाते थे. देखते देखते हम सी ए हो गये और तिवारी सर तब भी आठवीं में ही गणित पढ़ाते थे. मिलने गये तो इस तरक्की को देख उनका सीना फूला नहीं समाता था. यही होता है जब चेला तरक्की कर जाये. आज वही हालत अपनी पाता हूँ जब ताऊ का गुणगान सुनता हूँ, उसे आगे बढ़्ते देखना प्रसन्नता देता है.
कभी आंकलन करने की भी कोशिश करता हूँ कि इतने कम समय में इतनी लोकप्रियता.
कई बार तो उल्टा डर लगता है कि अगर उसने गुरु मानना बंद कर दिया तो अपने तो कौड़ी के भाव न रह जायें. प्रशंसक मूँह फेर लें तो आप कौन और मैं कौन!
सब चकित रहते हैं कि आखिर यह ताऊ है कौन? कैसा दिखता होगा? कहाँ रहता होगा और क्या करता होगा? सेलिब्रेटिज़ के लिए दिमाग में ऐसे प्रश्न आना बहुत स्वभाविक है.
ताऊ, मैं हो सकता हूँ, आप हो सकते हैं, कोई भी हो सकता है. जो भी आदर्शों का पालन करे, ज्ञान और भाषा के विकास में सार्थक योगदान करे, सबसे प्रेम करे, सबको यथोचित सम्मान दें, मानव से ही नहीं, पशुओं से भी और अन्य सभी प्राणियों से प्यार करे, वो ही ताऊ हो सकता है. सबका प्रिय, सबका चहेता और सबके दिलों में बसने वाला.
इतने कम समय में इतनी लम्बी लोकप्रियता की यात्रा करना, इतने लोगों को साथ जोड़ कर चलाना, कभी सबको जीवन की राह दिखाने वाला गंभीर मग्गा बाबा, कभी खिलंदड़ा प्यारा ताऊ, तो कभी चुलबुली रामप्यारी, कभी हीरामन, कभी सैम-इतने सारे लोकप्रिय किरदार निभाते निभाते अथक चलते रहना, यह कोई आसान कार्य नहीं.
एक बहुत बड़ा तबका ताऊ की ऐसी बढ़त देख खुश होता है तो एक तबका स्वभाविक ईर्ष्या भी पाल बैठता है. मगर अजब यह शक्शियत, कभी चेहरे पर कोई शिकन नहीं, कभी किसी से कोई मलाल नहीं.
ताऊ की खिलंदड़ी, ताऊ पहेली, ताऊ पत्रिका, राम प्यारी की पहेलियाँ और उसके चुलबुले क्लयू, ताऊ की शोले, परिचयनामा और जाने क्या क्या सबको लुभाते आये हैं.
इतना ज्ञान बांट देने के बाद भी ताऊ से जब मैने ताऊ की शोले की शूटिंग के दौरान पूछा कि इतना ज्ञान कहाँ से लाते हो, तो बड़ी सज्जनता से कहने लगा: हमारे यहाँ एक पान की दूकान पर तख्ती टंगी है , जिसे हम रोज देखते हैं. उस पर लिखा है: कृपया यहाँ ज्ञान ना बांटे , यहाँ सभी ज्ञानी हैं. बस इसे पढ़ कर हमें अपनी औकात याद आ जाती है और हम अपने पायजामे में ही रहते हैं एवं किसी को भी हमारा अमूल्य ज्ञान प्रदान नही करते हैं.
और फिर आगे ताऊ कहता हैं: वैसे जिंदगी को हल्के फुल्के अंदाज मे लेने वालों से अच्छी पटती है. गम तो यो ही बहुत हैं. हंसो और हंसाओं , यही अपना ध्येय वाक्य है.
और वाकई स्टूडियो ब्लॉगिस्तान में ताऊ के साथ ’ताऊ की शोले’ के सेट पर मेरे साथ और जितने भी कलाकार थे, सब ताऊ के साथ पूरी शूटिंग के दौरान खूब हँसे, हँसाये. काम का बोझ पता ही नहीं चला और भाग १ बन कर कम्पलिट भी हो गई.
ताऊ से जब यह पूछा गया कि कोई नया प्रोजेक्ट जहेन में हैं तो बड़ी ही गंभीरता से ताऊ बोला कि वैसे तो ढ़ेरों है. आप समय आने पर देखोगे लेकिन लगभग जो फाइनल हैं वो हैं: ’ताऊ की शोले भाग २’ और ’ताऊ रेडियो’.
मैं चौंका : ’ताऊ रेडियो’..तब पता चला कि इसमे रोज एक निश्चित समय पर ’ताऊ चिट्ठाजगत के गरमागरम समाचार पॉडकास्ट करके सुनायेगा कि किस ब्लॉग पर क्या चल रहा है. साथ ही वह न्यूज रेडियो समाचार पत्र की तर्ज पर लिखित में रहेगी ताकि लोग लिंक क्लिक कर सकें.’ संवाददाताओं की नियुक्ति जारी है. निश्चित ही भविष्य को लेकर ताऊ बहुत आशान्वित है.
कुछ लोगों को लग सकता है कि यह बात तो वैसी ही हो गई जैसे कि मैं तेरी पीठ खुजाऊँ और तू मेरी खुजा. जब ताऊ ने आपका १५ हजारा लिखा तो आप काहे नहीं लिखोगे, तो ऐसा ही मान लो और खिजियाते हुए बधाई दो. :)
आज इस विशिष्ट मौके पर आईये ताऊ का अभिनन्दन करें, उन्हें १५००० टिप्पणियाँ प्राप्त होने पर बधाई दे और इसी गति से आगे बढ़ते रहने के लिए शुभकामनाएँ दें.
ताऊ, बधाई हो!!!
नोट मे सूचना:
आज इसके अलावा भी मेरे जीवन की दो महत्वपूर्ण सूचनायें हैं:
तारीख ४ अक्टूबर, दिन रविवार को मेरी पुस्तक ’बिखरे मोती’ का विमोचन मेरे गुरुवर श्री राकेश खण्डेलवाल, वाशिंग्टन, अमेरीका द्वारा किया जाना है. इस अवसर पर सायं ५ से ७ बजे तक एक कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया है जिसमें माननीय श्री अमेरीका से ही कवि अनूप भार्गव, रजनी जी भी शिरकत कर रहे हैं. साथ ही कनाडा से मानोषी चटर्जी, शैलजा सक्सेना और सुमन धई जी (साहित्य कुंज पत्रिका वाले) होंगे. मैं तो खैर रहूँगा ही. :)
कवि सम्मेलन के उपरांत ७ बजे से पार्टी का आयोजन है बेटे और बहु के कनाडा प्रथमागमन पर.
यह घटनायें अद्भुत हैं मेरे लिए, आप सबका स्नेह आपेक्षित है.
रविवार, मई 31, 2009
कुछ निवेदन और पहेली का जबाब एवं विजेता
जमाने में बहुत कुछ नहीं बदला, उनमें से एक बात यह भी नहीं बदली कि तब भी टिकिट के ब्लैकिये तबीयत से पुलिस की मिलिभगत में कारोबार करते थे और आज भी. अमिताभ की किसी भी नई फिल्म के शुरुवाती हफ्ते उनके लिए धन्धे का व्यस्त समय होते थे.
अब का पता नहीं मगर तब अमिताभ का ऐसा क्रेज होता था कि कालेज के आधे से ज्यादा लड़के, जिसमें हम खुद भी शामिल थे, कान को ढके बाल के साथ उल्टा सेवन वाली कलम रखा करते थे. फिल्म खत्म होने पर यही वीर दोनों हाथ पाकेट में डाले सर झुकाये टहलते हुए निकलते थे मानो खुद ही अमिताभ हों. हर चेहरे पर उसी के समान गुस्सा और एक विद्रोह का भाव.
हमारे साथ पढ़ते थे नीरज शर्मा. एक मात्र योग्यता के आधार पर कि वह ६ फुट से कुछ ज्यादा थे, वो अपने आप को अमिताभ बच्चन समझते थे. वही स्टाईल बिल्कुल कॉपी. शायद शीशा देखने के आदी न रहे होंगे तो मुगालते में पलते रहे.
हम दोस्तों का सच्चा झूठा प्रोत्साहन तो साथ रहता ही था बाफर्ज, सब उसे अमित कह कर ही पुकारते थे और वह दिन भी आ गया, जब वो एक ऑर्केस्ट्रा के साथ अमिताभ बच्चन की नकल करते मंच पर नज़र आने लगे. मंच की चकाचौंध, स्टाईल ,चश्मा, बाल आदि में वो वाकई अमिताभ सा ही लगता था दर्शक दीर्घा से.
देखा, प्रोत्साहन का नतीजा!!
यह सूत्र जीवन हर क्षेत्र में लागू होता है. लेखक या कवि लिख रहा है, माना कि नया है और बहुत अच्छा न भी लिख रहा हो मगर एक मुगालते में तो है ही कि वो लेखक है या कवि है. ६ फुट से ज्यादा होने की तरह एकाध क्वालिटी तो है ही तभी तो कम्प्यूटर पर लिख पा रहा है ब्लॉग खोल कर. उसे भी लाइम लाईट में लाओ भाई.
जरुरत है बस तुम्हारे प्रोत्साहन की और तुम हो कि अपनी लेखनी पर फूले पिचके मूँह फुलाये बैठे हो. कुछ बोलते ही नहीं. कभी अपने शुरुवाती लेखन को भी देखना और फिर आज का. क्या शुरु से ही ऐसा ही लिख रहे हो. फिर?? वो भी नया आया है लेखन में जैसे कभी तुम आये थे. बस, दरकार है उसे तुम्हारे प्रोत्साहन की.
भय मत खाओ कि वो तुम्हें पीछे छोड़ कर आगे निकल जायेगा. सो तो अपने इस दंभ के तले यूँ भी छूट जाओगे. विश्वास करो प्रोत्साहन देने से तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ेगा मगर उसका बहुत कुछ बन जायेगा.
बस, आज इतना ही. किसी की ईमेल आई है जिसने ब्लॉग जगत में आई टिप्पणियों की मंदी और पुराने लिख्खाड़ों द्वारा नये लोगों के ब्लॉग पर टिप्पणी न देने पर चिन्ता और मायूसी जाहिर की गई है. बात उनकी सही लगी, तो निवेदन दर्ज कर दिया.
अब, पिछली पोस्ट पर पूछी गई पहेली:
पहली बात तो उस आलेख का उदगम स्थल था निशान्त मिश्र जी का ब्लॉग हिन्दी जेन पर २९ मई को पूछी गई पहेली पर आई बेनामी जी की टिप्पणी.
पहेली के चित्र:

का सही जबाब:
ऊपर: श्री ज्ञान दत्त पांडे
चश्मा: श्री अजीत वडनेकर
नीचे: डॉ अनुराग आर्या

विजेता रहे:
प्रथम: ताऊ रामपुरिया

द्वितीय: सैयद
तीसरे नम्बर पर: संजय तिवारी ’संजू’
चौथे: श्री ज्ञान दत्त पांडे जी
विजेताओं को बधाई.
सभी प्रतिभागियों का बहुत आभार और बधाई.
चलते चलते:
तीन चार पोस्ट पहले कविता पर एक टिप्पणी आई:
’सहनीय रचना’
हम चकित. सब इतनी तारीफ मचाये हैं और ये भाई जी कह रहे हैं ’सहनीय रचना’. रात भर जागे रहे कि ये क्या हुआ. फिर एकाएक सुबह के सूरज के साथ दिमाग खुला कि टंकण त्रुटि के चलते ’सराहनीय रचना’ की जगह ’सहनीय रचना’ लिख गया होगा. बस, पूरे उत्साह से टिप्पणीकर्ता को ईमेल लिखी गई और निवेदन किया गया कि शायद टंकण त्रुटि रह गई है और प्रोत्साहन की आदत के चलते जोड़ दिया कि अक्सर जल्दबाजी में ऐसा हो जाता है. जबाब आने में जरा भी समय नहीं लगा. लिखा कि ’भाई उड़न जी, आपसे सहमत हूँ कि जल्दबाजी में ऐसा हो जाना संभव है किन्तु यह टिप्पणी तो जल्दबाजी में नहीं लिखी है. दरअसल मैं वही कहना चाह रहा था जो आप पढ़ रहे हैं.
अब??
अब क्या-रिजेक्ट-मॉडरेशन का फायदा उठा लिया. इसीलिए कहता हूँ कि मॉडरेशन लगाओ. यह तो अच्छी सलाह थी जिसने मुझे अपनी रचनाओं पर पुनर्विचार का मौका दिया, बस जरा दंभ आड़े आ गया. इन्सान हूँ और गलत फैसले लेना इन्सानी स्वभाव, मैं कैसे अछूता रह सकता हूँ तो हो गया गलत फैसला रिजेक्ट करने का. मगर अक्सर लोग उट पटांग बातें लिख कर भाग जाते हैं, यहाँ तक की गाली गलोज भी. उसे तो आप कंट्रोल कर ही सकते हो मॉडरेशन से बात बढ़ाने की बजाये.
रविवार, मार्च 08, 2009
आओ, तुम्हें होली खिलवायें..
रंगों का त्यौहार है सो रंग लगाये जायेंगे. मस्ती का मौसम है तो मस्त हो जायेंगे. इस दिन तो ऐसा लगता है कि मानो पीने वालों को ओपन लायसेंस जारी हो गया हो कि भाई, खूब पिओ और जो दिल में आये, सो करो. पुलिस के डंडो की गिनती करना पाप है.
पुलिस मुस्तैद है, क़ानून की रक्षा कर रही है. एक बच्चे के जन्म दिन की पार्टी से लौट रहे थे. पी कर गाड़ी चलाने का इल्ज़ाम लगा दिया गया. होली के समय तो आप दूध पीकर भी गाड़ी चलाइए इल्ज़ाम सेम लगेगा. आप कहेंगे दूध है भाई वो कहेंगे पिया तो है ना, बस बात ख़त्म.
१०० रुपये ढीले गए तो पीना जायज़ ठहराया गया और यह भी बताया गया के शराब पीना तो सरकारी काम है भाई. क्या करें हम घर आये तो यह पोस्ट आटोमैटिक लिख गई भाई और जब लिख गई तो पोस्ट तो करै का पड़ी ना दादू.
१०० रुपये में तीन पैग ..पार्टी में तो फ़्री के थे, बुरे नहीं लगे. आगे से चार पिया करेंगे. सस्ता पड़ेगा. अर्थशास्त्र की तो यही सलाह है.

सब होली के रंग में डूबे ..क्या शिवजी और क्या फ़ुरसतिया..अरुण पंगेबाज भंग से टन्न है. सफ़ाई पेश करने में जुटे हैं. अब देखो क्या होता है, उन्हें यूँ भी होलिका दहन की आग में प्रहलाद उछालने में ज़्यादा मज़ा आता है रंग खेलने के बनिस्बत. जितना मैं उन्हें जान पाया हूँ, उस आधार पर मैथली जी तो मुझसे एग्री करेंगे ही.
होली पर हमारे शहर का माहौल हमेशा एक अलग रंग में रंगा होता था. लुक़्मान क़व्वाल ज़िंदा थे. शहर उमड़ पड़ता था मोदी बाड़े में होलिका दहन की रात उनकी क़व्वाली सुनने अपनी बोतलों और कबाबी चटखारों के साथ.
अब लुक़्मान तो रहे नहीं, मगर होली फिर भी हर साल आती है और उनकी याद को ज़िन्दा रखे हैं हमारे बवाल भाई, उनके शागिर्द और वसीयतदार. अब तो वही हमारे बीच होते हैं .............. और लुक़्मान चचा की याद ये गाकर दिलाते हैं कि----
कुछ ऐसी तसव्वुर की महफ़िल सजाएँ,
जहाँ हों वहीं से उन्हें खेंच लाएँ
...शायद दो तीन दिन में उनके साथ होली मिलन का कार्यक्रम रखूँ, जो अभी रुपरेखा ले रहा है और आप सब को पेश करुँ उनकी बेहतरीन क़व्वालियों की रिपोर्ट बाक़ायदा सुरा के साथ(मुझे ऐसा लिखने में कोई गुरेज़ नहीं, मुझे पसंद है तो है) जैसा पिछले साल सुनाया था. :) पूना से आज जबलपुर आते ही होंगे और आते ही हमसे ना मिलें तो इत्ते की बात.
खैर, जब सब लिख ही रहे हैं तो होली पर हम क्यूँ न लिखें. क़लम कमज़ोर ही सही, मगर अब है तो ग़लती से हमारे हाथ में. और ना हम बन्दर ना हमारी क़लम उस्तरा.
इसलिये सुनिये यह आल्हानुमा रचना और हो हो करें या हीं हीं..जो भी कीजिएगा, होली की मस्ती में काऊंट होगी, समझे कि नाही .
बड़े सबेरे फ़ुरसतिया जी, हमरे घर पे आ धमकायें
क्यूँ तुम घर पर ही बैठे हो, चलो साथ होली खिलवायें
हम बचने की बात सोचते, वो अँखियन रह रह मिचकायें
और कहें कि भांग पिला कर, सब को जमकर रंग लगायें
ज्ञानदत्त उठ घर से भागे, कहते भंग पचा ना पायें
फ़ुरसतिया तब दौड़े पीछे, टंगड़ी मार दिये गिरवायें
देखें जो भईया को गिरते, शिव बाबू यह सह न पायें
छोड़ के गुझिया वाला ठेला, पिचकारी लै दौड़े आयें
फ़ुरसतिया जी जान बचा कर, छुप बैठें गलियन में जायें
देख तमाशा भीड़ भाड़ कुछ, ब्लॉगर टंकी पर चढ़ जायें
कुछ तो ढ़ूंढ़ रहे हैं उनको, कुश काफ़ी पीकर भरमायें
होली है भई बुरा ना मानें, दिनेशराय जी ये समझायें
सभी मान गये कुश की बतियां, शास्त्री स्नेह सहित मुस्कायें
नीरज बोलें ग़ज़ल सुना कर, मौसम को कुछ बदलें आयें
इन बातों पर कुछ तो बोलें और कुछ चुपै-चुप्पे जायें,
बाकी बचे खड़े सहमे से, सज्जनतावश हैं शरमायें
देख बदलते हवा के रुख़ को, लेडी ब्लॉगर बाहर आयें
स्लोली स्लोली रंग उड़ायें, मौजें ले लेकर मुस्कायें
अरुण अरोरा फिर गुस्से में, सीना ताने सामने आयें
हिम्मत है तो उनको रंग लें, सीधों को ना यहाँ सतायें
भांग पिला लें रंग लगा लें, जब हम अपनी पर आ जायें
नीले-पीले-लाल-गुलाबी, दुनिया भर को हम रंग जायें
कीचड़-गोबर-ग्रीस है संग में, मथुरा की होली खिलवायें
कुर्ता अपना फाड़ फाड़ कर, फ़ोटो हर एंगल खिंचवायें
अरविंद जी इतना सुनकर, कूद सामने मंच पे आयें
नर-नारी विज्ञान की फ़ोटो, सबको तुरत-फ़ुरत भिजवायें
नारी शक्ति जाग रही पर, ताऊ भैंस बने पगुरायें
राज भाटिया लाल बुझक्कड़, बूझ बूझ कर मगज फिरायें
सबको होली बहुत मुबारक, सब मिलकर के पर्व मनायें
प्राण साब हैं साथ में सबके, जो चाहें जी वो लिख जायें
अर्श पटापट ग़ज़लें लिख-कर, छोटी बड़ी बहर समझाएँ
पर्दा-पीछे खड़े सुबीरा, रंग भरी पट्टी पढ़वायें
संजय-पंकज नाच रहे हैं, आर्या जी मेकअप करवायें
क्या केने क्या केने भाया, झूम झूम आलोक भी गायें
अमर डाक्टर खटिया तोड़ें, मौदगिल दाढ़ी ख़ूब खुजायें
भूतनाथ भये आज तो सबरे, होली का मतलब समझायें
मीत-अजीत भी कहते कुछ कुछ, मगर किसी को सुन्नै नायें
मसिजीवी फिर भाँग मसक कर, नीलम नोट पैड संग आयें.
पूजा मैडम डिग्री टाँगे, साथ पल्लवी को ले आयें
रचना जी सब ताड़ रही हैं, नारी को कुछ कह न पायें
रंजू जी भी खड़ी मंच से, प्रीतम दी की कथा सुनायें
पारुल जी गाती मुस्का कर, मीत गीत गंभीर सुनायें
अनिल पुसदकर लोट रहे हैं, पानी पानी वो चिल्लायें,
तिलक की होली हम न खेंले, पाणी बेंगाणी ले आयें
पीडी टांग तुड़ा कर बैठे, सबको अपनी व्यथा बतायें,
आदि की जब बाजे ताली, देख देख सब मन हर्षाये
जज मनीष बैठे कुर्सी पर, गीतों की पयदान बतायें
जाट मुसाफिर के किस्से भी, ठिठक ठिठक सब सुनते जायें
रंग में डूबे ब्लॉगर सारे, क्या मालूम कब क्या कर जायें
इतने सारे लोग जमा हैं, डर है मंच टूट नै जायें
जिसको जो भाये सुन ले, कोई ढपली कोई शंख बजायें
ब्लॉगीवुड की कवरिज करने, टीवी संग अखबार भी आयें
राकेश गीतकार के संग-संग लगे दिगम्बर गाना गायें
भंग चढ़ा कर कविता करने, दुबई तलक भी पहुँचें जायें
चिट्ठाजगत-ब्लॉगवाणी और नारद को कैसे बिसरायें,
जिसमें दर्ज हजारों ब्लॉगर, सब होली के रंग रंगायें.
जितने ब्लॉगर जबलपूर में, उतने किसी सहर में नायें
सबको प्यारे दुनिया भर में, भारत का परचम लहरायें
मिश्रा-मुकुल, डुबे संग शैली, रंगों से आकाश सजायें
पंकज स्वामी ‘गुलुश’- गार्गी, भगवत कथा कहो पढ़ जायें
साज़-प्रेम फ़र्रुख़ाबादी, किसलय से भंगिया घुँट्वायें
विवेक रंजन बिजली का बिल, संजय के घर पर भिजवायें
कृष्णानंन्दं चलते चलते, बात हमारी सुनते जायें
होली में सब बैर भुला दें, प्रेम के रंग में रंग सब जायें
उड़नतश्तरी पर सब बैठें, सुनकर आल्हा घर को जायें
सीमा में जब हों बवाल तो, सब Regards वैसे ही पायें
सभी को होली महापर्व की बहुत बहुत बधाई एवं मुबारक़बाद !!! और हाँ !!! सबको जबरन साधूवाद भी. हा हा. :)
चलते चलते :-
ब्लॉगर बिग बच्चन के पूज्य पिताजी
डॉ. हरिवंशराय ‘बच्चन’ की अमरकृति मधुशाला से ---
एक बरस में एक बार ही, जगती होली की ज्वाला
एक बार ही लगती बाज़ी, जलती दीपों की माला
दुनिया वालों किन्तु किसी दिन, आ मदिरालय में देखो
दिन को होली रात दिवाली, रोज़ मनाती मधुशाला
(धुरेड़ी के दिन याने ११/३/२००९ को हमें बवाल के संग लाल एण्ड बवाल पर आप सब ज़रूर मिलिएगा, तब तक के लिए ...........जय रंग.......हुड़दंग)
रविवार, अक्टूबर 26, 2008
मैसेज बहुत बड़ा मगर पोस्ट माईक्रो..
तू तो कह देना कि समझाया नहीं था..
संभल जाओ कि वक्त बाकी है अभी
फिर न कहना पातियों का साया नहीं था.
(संभल जाओ वरना ऐसे होगी बड़ सावित्रि पूजा)
आपको एवं आपके परिवार को दीपावली की मंगलकामनाऐं.
मंगलवार, अक्टूबर 14, 2008
हो आये वाशिंग्टन-आप भी सुनो!!
यूँ तो गीत शब्द एक संज्ञा है. जब भी मन के भावों को एक विशेष छंदबद्ध तरीके से शब्दों में ढाला जाता है, तब हम उसे गीत कहते हैं. वो ही अगर बहुत उम्दा भाव, उम्दा शब्द चयन और उम्दा लय के संगम को दर्शाता हो, तो हम गीत रुपी इस संज्ञा में एक विशेषण जोड़ देते हैं, सुन्दर गीत. और यदि उस सुन्दर गीत में भावों को दर्शाने के लिए बिम्ब चयन भी विशिष्ट हो, तब एक और विशेषण लगा कर हम उसे अति सुन्दर गीत निरुपित करते हैं.
किन्तु राकेश भाई के गीतों के लिए ’अति सुन्दर गीत’ एक संज्ञा ही है. वो जब भी अपने दिल के भावों को छंदों मे उतारते हैं, वो स्वतः ही एक अति सुन्दर गीत का रुप ले लेता है और हम सुनने और गुनने वाले कह उठते हैं, ’वाह, अद्भुत’
इस मौके पर एक अन्तर्राष्ट्रीय कवि सम्मेलन का भी आयोजन था, जिसके मुख्य अथिति थे जाने माने साहित्यकार डॉ सत्यपाल आनन्द जी और कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे थे फिलाडेफिया से पधारे विख्यात कवि श्री घनश्याम गुप्ता जी.
राजधानी मंदिर, वर्जिनिया, अमरीका के प्रांगण में कवियों और श्रोताओं का जमावड़ा सा था.
कविश्रेष्ट श्री सुरेन्द्र तिवारी जी, न्यू जर्सी से अनूप भार्गव जी और उनकी कवियत्री पत्नी श्रीमति रजनी भार्गव जी, टोरंटो से मैं स्वयं याने समीर लाल उड़न तश्तरी वाले, वाशिंग्टन से श्रीमति बीना टोड़ी, विशाखा जी, जिन्होंने ने बखूबी कार्यक्रम का संचालन किया, श्रीमति मधु माहेश्वरी जी एवं वाशिंग्टन के ही अनेक कवियों ने अपनी रचनाओं को प्रस्तुत कर श्रोताओं को मंत्र मुग्ध कर दिया.
कार्यक्रम की शुरुवात स्थानीय कवियों के काव्य पाठ से हुई एवं उसके बाद डॉ सत्यपाल आनन्द जी ने किताब का विमोचन किया.
पुस्तक का विमोचन: डॉ.सत्यपाल आनन्द जी द्वारा:
लिंक:
http://www.youtube.com/watch?v=3HxweVw5QoE
इसी दौरान, मैने इस पुस्तक के प्रकाशक शिवना प्रकाशन, सिहोर के संचालक श्री पंकज पुरोहित ’सुबीर’ जी का प्रतिनिधित्व करते हुए राकेश जी का सम्मान पत्र एवं शाल पहना कर अभिनन्दन किया.
इसके बाद फिर काव्य पाठ का सिलसिला शुरु हुआ जो देर रात जाकर थमा. बीच में राजधानी मंदिर के सौजन्य से विविध व्यंजनों का लुत्फ उठाया गया. आप भी सुनिये.
विडियो अनूप भार्गव जी के सौजन्य से यूट्यूब पर चढ़ाये गये है.
राकेश खण्डेलवाल जी का काव्य पाठ:
लिंक:
http://www.youtube.com/watch?v=WjwqUEq0GUA
समीर लाल: काव्य पाठ
लिंक:
http://www.youtube.com/watch?v=Qqlt0QZZmdI
अनूप भार्गव जी का काव्य पाठ
लिंक:
http://www.youtube.com/watch?v=TEB2lQv2Z-o
रजनी भार्गव जी का काव्य पाठ:
लिंक:
http://www.youtube.com/watch?v=6O5AcJqTyrw
रविवार, सितंबर 28, 2008
जीरो साईज़ ठानी बाबा!
शाम होने को आई मगर कुछ समझ ही नहीं आया. पत्नी बीमार है, समय भी ज्यादा नहीं मिल पा रहा कि ब्लॉगजगत में ही झांक लूँ और देखूँ, बाकियों ने क्या लिखा है. बस, फिर सोचा कि जो जमाने में देख रहा हूँ वो ही लिख देता हूँ:
जीरो साईज़ के लिए फेमस: करीना
कैसी चढ़ी जवानी बाबा
मस्ती भरी कहानी बाबा
भूखी रहकर डायट करती
फीगर की दीवानी बाबा
कमर घटायेगी वो कब तक
जीरो साईज़ ठानी बाबा
सिगरेटी काया को लेकर
सिगरेट खूब जलानी बाबा
डिस्को में वो थिरके झूमे
सबको नाच नचानी बाबा
सड़कों पर चलती है ऐसे
हिरणी हो मस्तानी बाबा
लड़के सारे आहें भरते
सबके दिल की रानी बाबा
गाड़ी लेकर सरसर घूमें
ईंधन है या पानी बाबा
बॉयफ्रेंड सब भाग लिये हैं
खर्चा बहुत करानी बाबा
शादी करके हुई विदा वो
छाई है मुर्दानी बाबा!!
-समीर लाल ’समीर’
बेटियों के इस विशेष दिवस पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाऐं.
मंगलवार, सितंबर 16, 2008
आलसी काया पर कुतर्कों की रजाई
उदाहरण -१
सड़क पर बिखरा
लाल रंग
-कहीं किसी नादान का
खूँ तो नहीं!!
अब इस पर क्या टिप्पणी करें सिवाय यह कहने कि-मार्मिक!!
क्या चाहते हो कि इस कविता पर ऐसी टिप्पणी लिखने लगें-
आपकी कविता पढ़ी. गीता पर हाथ रख कर कसम खाता हूँ कि पढ़ ली है, तब टिप्पणी करने निकला हूँ. उम्मीद है आपने जीवन में खून कई बार देखा होगा और सिन्दुर भी. फिर क्या वजह है कि आप पहचान नहीं पा रहे कि यह रंग जो बिखरा हुआ है, वह खून है कि नहीं. वैसे इसे और अद्भुत काव्य बनाने के लिए आप कह सकते थे कि
इसे किसी का खून न कहो,
यह तो किसी के माथे का
सिन्दुर बिखरा है.
बात गहरी हो जाती. यानि एक आदमी मरा और उसकी बीबी के माथे का सिन्दुर बिखर गया.
कोई खून खराबा हुआ होता तो हादसे की जगह के आसपास भीड़ दिखाई देती. देर से ही सही, पुलिस भी आती. साथ ही खूँ (खून लिखने का साहित्यिक तरीका) देखकर यह पता कर लेना कि यह किसी नादान का है या बदमाश का, माफ करियेगा मित्र-अभी विज्ञान ने इतनी तरक्की नहीं की है. मैं आपकी इस शब्द के इस्तेमाल पर भर्त्सना करता हूँ तथा अपना मतभेद दर्ज कराता हूँ.
साथ ही मुझे तो लगता है आपको दृष्टि दोष है. साथी ब्लॉगिया होने के नाते मैं इसे अपना फर्ज समझता हूँ कि आपको किसी अच्छे नेत्र चिकित्सक को दिखलाने की सलाह दूँ. एक बार दृष्टि पर काबू कर लें, फिर कलम काबू में लेने का पुनः प्रयास करें, सहायता मिलेगी. मेरी बातों को अन्यथा न लें, बस सलाह मात्र है.
आपका पाठक एवं टिप्पणीकर्ता: समीर लाल. साथ ही एक नोट: कृप्या ध्यान दें कि यह टिप्पणी मैने बिना पलट टिप्पणी पाने की चाह से की है. कृप्या इसके बदले में मुझे टिप्पणी न करें और न ही इसे मेरा विज्ञापन माने.
*******************
उदाहरण -२
या फिर किसी ने यू ट्यूब पर गीत पेश किया:
फिल्म परदेश का-जरा तस्वीर से तू, निकल कर सामने आ!!
हम क्या कह सकते हैं सिवाय इसके कि सुन्दर गीत या अच्छा लगा सुनकर!!
आपके कहे पर चलें तो कुछ यूँ शुरु हो जायें:
आपने यह गीत फिल्म परदेश का चुना है, उसे पहले भी मैं कई बार सुन चुका हूँ. तीन बार यह फिल्म देखी है. यह गीत मुझे बहुत पसंद है. हमारी आपकी पसंद कितनी मिलती है, सेम पिन्च!!
वैसे अगर आप गीत के साथ इसके संगीतकार, रचयिता और कोरियोग्राफर का नाम भी देती तो आनन्द दूना हो जाता, जानना तो मैं यह भी चाहता था कि तबला किसने बजाया है और ज्ञान में इजाफा भी होता जिसके लिए हम ब्लॉग पर आते हैं. अगर इसके नोट्स मिल जाते तो मैं की बोर्ड पर बजा कर देख लेता जैसे मैने कोशिश की है:
Notes:
s r2 g2 m1 p d1 n3 S
Kisi Roz Tumse Mulakat Hogi
p.s g r s r p.n.r s n.s
G.C D# D C D G.B.D C B.C
Meri Jaan Us Din Mere Saath Hogi
p.s g r s r p.n. r s n.s
G.C D# D C D G.B. D C B.C
आदि आदि. की बोर्ड सीखने के उत्साही ब्लॉगरों का भी भला हो जाता.
एक बात पर बहुत दुखी हूँ कि आपने संपूर्ण महिला समाज को नजर अंदाज करने वाले इस गीत का चुनाव किया-देखिये बीच गीत में एक जगह गुब्बारे उड़ाये जाते हैं मगर उसमें महिलाओं को प्रतिनिधित्व करता गुलाबी रंग का एक भी गुब्बारा नहीं है. नारियों को इस तरह नजर अंदाज करना कतई भी उचित नहीं है और मैं नारी संगठन की ओर से इसका पुरजोर विरोध करता हूँ एवं गाने में नायिका को घूंघट में दिखाया गया है जो कि इस नरवादी समाज द्वारा नारी की स्वतंत्रता पर सीधा वार है और नारी पर की जा रही पुरुष समाज की प्रतारणा का जीता जागता नमूना. आखिर शाहरुख खान का मूँह क्यूँ नहीं ढका गया सिर्फ इसलिये कि वो पुरुष है और महिमा चौधरी नारी. आपको जबाब देना होगा कि आखिर आपने यह गीत किस उद्देश्य से चुना.
साथ ही आपने हिन्दी का अपमान करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी है-गीत के बीचों बीच:
O Blood Dy Dy Dy
O Blood Da Da Da
O Blood Du Du Du
We Love You...
यह आपका विदेशी भाषा प्रेम नहीं तो क्या है. आज आपके इस चयन से हिन्दी अपमानित हुई है. हिन्दी सुबक रही है. हम चुप नहीं बैठेंगे. हम हिन्दी को उसका अधिकार दिलवा कर रहेंगे. आंदोलन करेंगे. मैं आज इस मंच से आपके सामने खुला प्रश्न रखता हूँ कि क्या आपको ऐसा कोई गीत नहीं मिला जो पूरा शुद्ध हिन्दी में हो??
दीगर इन ऐतराजों के, मैं आपको साधुवाद कहने से भी गुरेज नहीं करुँगा कि आज जब हर तरफ संप्रदायिक्ता की आग भड़की हुई है, ऐसे वक्त में शाहरुख खान(मुसलमान) और महिमा चौधरी(हिन्दु) की प्रेम कहानी हिन्दु मुसलमान के परस्पर प्यार का सुन्दर संदेश देती है. उनका प्यार देख आँख नम हुई जाती है. यह गीत सचमुच संप्रदायिक सदभावना के लिए प्रेरित करता है.
और भी अन्य बातें हैं टिप्पणी में लिखने को, वो फिर कभी. न तो यह मेरा विज्ञापन है और न ही इसे पढ़कर आगे से आप मेरे ब्लॉग पर आने वाली हैं. अतः टिप्पणीधर्मिता पर यह टिप्पणी खरी उतरेगी.
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अब बताईये क्या करुँ-रोज सुन सुन कर कान पक गये-समीर जी टिप्पणी में बस इतना सा लिख कर निकल जाते हैं-अच्छा है!! बहुत खूब!! बधाई!! जारी रहें!! शाबास!! बेहतरीन!! सटीक!!
निकल जाते हैं तो ठीक हैं निकल जायें. कम से कम खबर तो दे जाते हैं कि आये थे. आपका तो पता ही नहीं चल पाता कि आये थे. कितना धीरे से निकलते हो यार!! क्या चाल पाई है कि तनिक भी आवाज नहीं!! वाह!! आशिकों के गली के वाशिंदे दिखते हो.
मैं तो ऐसे शिकायतपीरों को भी जानता हूँ-जिनके सामने से चुपचाप निकल जाओ तो कहते हैं बहुत घमंड है, नमस्ते तक नहीं करता. नमस्ते करो तो कहते हैं पैर नहीं छूता. पैर छू लो तो हाल नहीं पूछा. हाल पूछो तो घर वालों का हाल नहीं पूछा-हद है यार!! मन तो करता है कि वहीं खटिया डाल कर बैठ जाऊँ और तब तक बात करता रहूँ, जब तक अगला ही चट कर न चला जाये. फिर दूसरे को साधूं.
खुद कुछ करना नहीं, न हिलना न डुलना और न किसी के यहाँ जाना...दूसरा करे तो परेशानी कि पेड़ की डाली पर टंगे नजर आते हैं, फलानें के साथ गुटुरगूं करते हैं, आँख मींचे हैं, पढ़ते नहीं यूँ ही बिना नजर मिलाये नमस्ते कर गये, काव्य गोष्टी के संस्कार यहाँ ले आये..जबकि यह तो मंदिर है, भजन में वाह वाह थोड़े न होती है, चश्मा लगाये हैं, सफेद शर्ट पहन ली, फुल पेन्ट पहनें हैं-याने कि कुछ न कुछ समस्या निकल ही आयेगी हर बीस पोस्ट के बाद.
कई बार सोचा कि चलो जाने दो-बीमार होगा या किसी हीन भावना से ग्रसित होगा या कोई कुंठा की ग्रन्थि सटपटा रही होगी या नाराज होगा किसी बात पर या टिप्पणी न पा पाने पर उदास(जायज कारण है-इस पर हम आपके साथ हैं) या समयाभाव एवं आलस्यवश टिप्पणी न कर पाने की तिलिमिलाहट और अपने इस व्यस्त दिनचर्या एवं नाकारेपन को सिद्ध करने की कुतर्की कोशिश-कुछ भी हो सकता है, हमें क्या करना. मगर रोज रोज-कुछ ज्यादा ही हो गया.
जरा सोचो, समझो मेरे भाई कुछ भी लिखने पढ़ने के पहले.
न समझ आये तो न सही. मौन धर लो. शायद कोई ज्ञानी ही समझ लेने की गल्ती कर बैठे. बड़े बड़े लिख्खाड़ बैठे ही हैं मौन धरे और हम उन्हें ज्ञानी समझे मौन व्रत तुड़वाने के प्रयास में कलम घिसे जा रहें हैं.
आप भी मौन रख लो और हमें जो समझ आयेगा, लिख देंगे.
कितना मन लगा कर कल लिखा होगा कि पीठ खुजाओ पीठ खुजाओ-लिखने के पहले निवेदन तो ठीक से पढ़ लेते मेरे भाई. हम अपने लिए टिप्पणी नहीं मांग रहे हैं, हम दूसरों को प्रोत्साहित करने की बात कर रहे हैं.
कहना है हम तो खाना(टिप्पणी) मांगते नहीं, फिर काहे प्लेट(टिप्पणी बाक्स) लिए घूम रहे हो भाई कि शायद कोई खाना डाल जाये तो खा लेंगे? बिल्कुल सही, ऐसे ही शर्मीले लोगों के लिए हम निवेदन कर रहे हैं औरों से कि कहीं वो भूखे ही साफ सुथरी प्लेट लिए घूमते ही न रह जायें.
आप सुकून से सोईये अपने आलस्य और मजबूरियों को तर्कों की रजाई से ढककर, कहीं ब्लॉगजगत में बहती ठंडी हवा न लग जाये-जब कभी बीच में नींद टूटे तो एक पोस्ट ठेल देना कि फलाना गलत कर रहा है और साथ में एक कवितानुमा कुछ:
ब्लॉगर महाराज की जय
प्यारे समीर और शास्त्री जी की जय
ब्लॉगवाणी और चिठ्ठाजगत की जय
पूरे हिन्दी ब्लॉगिंग की जय
-फिर से अच्छी नींद आ जायेगी.
शुभ स्लीप!!
नोट: उपर वाली कविता (स्वरचित) एवं गाना, मात्र अपनी बात स्पष्ट करने को ली गई है. इसे ब्लॉग पर पेश करने वाले कृप्या आहत न हों. मैं तो नहीं हुआ. आशा करता हूँ आप भी नहीं होंगी. :)
शनिवार, मई 17, 2008
गीत सम्राट श्री राकेश खंडेलवाल जी को बधाई

आईये, आपको उनका एक गीत पढ़वायें:
गीत तेरे होंठ पर
गीत तेरे होंठ पर खुद ही मचलने लग पड़ें आ
इसलिये हर भाष्य को व्यवहार मैं देने लगा हूँ
देव पूजा की सलौनी छाँह के नग्मे सजाकर
काँपती खुशबू किसी के नर्म ख्यालों से चुराकर
मैं हूँ कॄत संकल्प छूने को नई संभावनायें
शब्द का श्रन्गार करता जा रहा हूँ गुनगुनाकर
अब नयन के अक्षरों में ढल सके भाषा हॄदय की
इसलिये स्वर को नया आकार मैं देने लगा हूँ
रूप हो जो आ नयन में खुद-ब-खुद ही झिलमिलाये
प्रीत हो, मन के समंदर ज्वार आ प्रतिपल उठाये
बात जो संप्रेषणा का कोई भी माध्यम न माँगे
और आशा रात को जो दीप बन कर जगमगाये
भावना के निर्झरों पर बाँध कोई लग न पाये
इसलिये हर भाव को इज़हार मैं देने लगा हूँ
मंदिरों की आरती को कंठ में अपने बसाकर
ज्योति के दीपक सरीखा मैं हॄदय अपना जला कर
मन्नतों की चादरों में आस्था अपनी लपेटे
घूमता हूँ ज़िन्दगी के बाग में कलियाँ खिलाकर
मंज़िलों की राह में भटके नहीं कोई मुसाफ़िर
इसलियी हर राह को विस्तार मैं देने लगा हूँ
-राकेश खंडेलवाल
राकेश जी की रचनाओं का आनन्द आप निम्न ब्लॉगों पर उठा सकते हैं:
गीत कलश
गीतकार की कलम
मेरे बारे में
- Udan Tashtari
- एजेक्स (Ajax), ओंटारियो (ontario), Canada
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दूसरों की गलतियों से सीखें। आप इतने दिन नहीं जी सकते कि आप खुद इतनी गलतियां कर सके।
-अमिताभ बच्चन के ब्लॉग से
और क्या इस से ज्यादा कोई नर्मी बरतूं
दिल के जख्मों को छुआ है तेरे गालों की तरह
-जाँ निसार अख्तर
अधूरे सच का बरगद हूँ, किसी को ज्ञान क्या दूँगा
मगर मुद्दत से इक गौतम मेरे साये में बैठा है
-शायर अज्ञात
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बिखरे मोती: एक नजर
"देख लूँ तो चलूँ"- एक नजर
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शुभकामनाऐं.
समीर लाल
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