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मंगलवार, फ़रवरी 27, 2018

आजकल का बच्चा तो मानो पैदा नहीं होता, डाऊनलोड होता है




त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव,
त्वमेव विद्या, द्रविणं त्वमेव, त्वमेव सर्वं ममः देवदेवा ||
तुम्ही हो माता, पिता तुम्ही हो, तुम्ही हो बंधू, सखा तुम्ही हो |
तुम्ही हो साथी, तुम्ही सहारे, कोई न अपना सिवा तुम्हारे.
तुम्ही हो नय्या, तुम्ही थे खिवैयाँ, तुम्ही हो बंधू, सखा तुम्ही हो |
उपरोक्त कालजयी पंक्तियाँ आज गुगल आरती के तौर पर इस्तेमाल हो रही है.
हमारे समय में जो ज्ञान लेने हम अपने माता पिता के पास जाते थे..बड़े भाई के पास जाते थे, आज उसी ज्ञान के लिए उन्ही माता पिता भाई बांधव द्वारा गुगल की तरफ रीडायरेक्ट कर दिये जा रहे हैं.
याद है बचपन में १३ गुणित ७ पूछने जब पिता जी के पास जाते थे तो वह जबाब देने की बजाय २ के पहाड़ा सुनाओ से शुरु होकर २० तक के पहाड़े में उलझा कर रख डालते थे. हम इसी बाबत मार खा रहे होते थे कि डेढ़ और सवईये का पहाडा तक नहीं जानते हो और पूछने आये हो १३ गुणित ७ ? ओरिजनल प्रश्न तो जाने कहाँ चला जाता खुद की जान की दुहाई मांगता और हमारा सारा दिन १ से २० तक के पहाड़े को समर्पित हो लेता. १३, १७, १९ जैसे खतरनाक पहाड़े अगर आते ही होते तो पिता जी पूछने जाते ही क्यूँ?
एक फायदा इसका हमको यूं हुआ कि हमने उनसे पूछना बंद कर दिया तो हमारा कुटना बंद हो गया कम से कम इस बाबत और उनको ये फायदा हुआ कि वह अपने अखबार और दफ्तर में जितना तल्लीन रहना चाहते थे, सो पूरा समय उनके खाते में आ गया. हम कभी कुछ दोस्तों से पूछ लेते, तो कभी कुछ मास्साब से..काम चल ही गया...अम्मा बताती थी कि पिता जी स्कूल में गणित में १०० मे १०० आते थे. बहुत बाद में जाकर ज्ञात हुआ कि सभी के पिता जी को उनकी अम्मा के बताये हिसाब गणित में १०० में से १०० आते थे भले ही पिता जी भये पटवारी..और रहे जमीन गलत नापते जीवन भर.. सौ रुप्प्या रिश्वत के बोझ तले.
आजकल का बच्चा तो मानो पैदा नहीं होता, डाऊनलोड होता है. पहला शब्द ही अम्मा के बदले पासवर्ड सीखता है. जो वक्त हमें झूले में डालकर झूला झुलाते हुए दूध की बोतल पिलाने में झुनझुना बजा कर माँ गुजारा करती थी, वो माँ के झुनझुना बजाने की भूमिका यूट्यूब ने आईपैड/ आईफोन पर संभाल ली है. बच्चे के झूले के उपर आईपैड होल्डर में झुनझुने के बदले बजते है बच्चों के गाने..फाईव लिटिल मंकी...जम्पिंग ऑन द बैड...बच्चा ४ माह का यह सब समझ कर हंस भी देता है और उस पूरे हंसने और देखने में लिप्त बच्चा दूध बोतल से पी भी जाता है. अम्मा प्रसन्न...सबको बताते नहीं थकती कि ये मुन्ने का आई पैड है..उसे इसके बिना खाना खाना पसंद नहीं है,.हालांकि सही वजह तो यह है कि माँ ने उसे आई पैड थमाया ही इसलिये है कि उसकी जहमत कम हो जाये बच्चे का ध्यान भटका कर दूध पिलाने की.
बस इतने से आराम के निमित्त उसने एक उस उम्र के बच्चे की न सिर्फ आँख से खिलवाड़ कर लिया बल्कि मानसिकता से भी जिसे न तो अभी रंगों की पहचान है और न ही वर्णों की. बाजार भी जानता है कि कौन सी रंग और नूर की बारात पेश करना है..और ये मांयें खरीददार तो हैं ही इन्तजार में..वो शायद कर्ण प्रिय बच्चों के गीत जिससे बच्चा अपने माँ की आवाज का कर्णपान किया करता था ..
चंदामामा दूर के, पुए पकाएं बूर के
आप खाएं थाली में, मुन्ने को दें प्याली में
प्याली गई टूट मुन्ना गया रूठ
लाएंगे नई प्यालियाँ बजा बजा के तालियाँ
मुन्ने को मनाएंगे हम दूध मलाई खाएंगे,
चंदामामा ...
उसे भूल गई हैं और ये भी कि बस, इस गीत को सुनते कितने ही बच्चे  अम्मा के हाथ से दूध मलाई खाते बजरंगी भाई जान हो जाया करते थे... न एसिड रिफल्क्स...न ही बर्प की समस्या..बस!! एक नेचुरल ऑग्रेनिक ग्रोथ...ऑरगेनिक की तरफ भागते हे युग प्रवर्तकों...बच्चों की ऑर्गेनिक ग्रोथ के क्यूँ दुश्मन बन बैठे हो तुम..उन्हें भी तो गुगल से बाहर की ऑग्रेनिक ग्रोथ प्रदान करो..
यूट्यूब ने जितना नये बच्चों को बहलाया है..ओ मेकडोन्ल्ड....स्विस स्विस स्विस..सुना सुना कर..और जरा सा समझदार हो जाने पर रायन के खेल.. सुबह से शाम तक...उतना ही नई माँओं को बहकाया भी है हर बात का ज्ञान बांट कर. ऑर्गेनिक से लेकर वेगन तक...
आज की नई माँ या नया बाप अपने मां बाप को बताने और समझाने पर उतारु है कि बच्चे को गोद में कैसे उठायें, कैसे बर्प दिलायें..कैसे उनको तेज आवाज में न बोलें, उनके सात बजे सोने के साथ कैसे टीवी बन्द करके खुद भी सो जायें ताकि उनकी नींद न डिस्टर्ब हो, कैसे नहलायें, कैसे मालिश करें, कैसे थपथपाये..कैसे खुद के हाथ धोकर एवं सेनेटाईज़र का इस्तेमाल कर के खुद को हाईजिनिक रखें ताकि बच्चा इन्फेक्टेड न हो जाये...कैसे बच्चे को खिलायें, कैसे उसे न रुलायें....बच्चा बच्चा बच्चा...गुगल गुगल गुगल...डॉक्टर ने क्या बताया उसे भी गुगल पर पढकर चैलेंज करने की एक होड़ कि डॉक्टर बेवकूफ है..भारत से आये माँ बाप बेवकूफ हैं...एक ज्ञानी बचा तो वो है गुगल,,,और दूसरी उसकी शिष्या..नवागत की माँ..और शिष्य नवागत का बाप जो मजबूर है अपनी बेबी के सामने..बेबी फिर वही..नवागत की माँ..
विदेश में आ बसे ..फायदा ये कि सास ससुर से दूर अपने मन के मालिक...बच्चा पैदा होने में मदद के लिए माँ बाप को भारत से बुलाया तो मगर माँ बाप को ही गुगल से पढकर सिखाने में पूरी ताकत लगाये हुए यह बच्चे भूल जाते हैं कि आज गुगल में सर्च करने की जो काबीलियत तुममे हैं वो इन्हीं माँ बाप द्वारा प्रद्दत पालन पोषण का नतीजा है..जब तुम पल रहे थे न तब वो गुगल का जमाना नहीं था. वो दादी नानी के तुजुर्बे का जमाना था. वो जमाना था कि जब पड़ोस के आंगन से आती बच्चे की रोने की आवाज पर दादी उठकर पड़ोस के घर जाती थी और बच्चे की नाभी पर हींग और पानी का गोला बना कर बच्चे को पाँच मिनट में सुला कर चली आती थी. दादी फरक जानती थी आवाज सुनकर कि यह भूख की आवाज है या पेट दर्द की. आज वही दादी मूँह बाये ताकती रह जाती है.. जब नई नई बनी माँ उसे बताती है कि यह एसिड रिफलक्स के कारण रो रहा है, इसे इस तरह गोद में सीधा उठाकर आधे घंटे ऊं ऊं करो तो ठीक हो जायेगा.
गुगल खुद से कुछ नहीं लिखता है, न ही खुद से कुछ सिखाता है..यह हम कैसे भूल जा रहे हैं?
जो दादी नानी मूँह जुबानी बताती थीं, वही तो आज की नई पीढ़ी जो कल की नानी दादी होंगी..अपने अनुभव के आधार पर गुगल में लिख रही हैं. हो सकता है किसी का अनुभव आपको जम जाये और किसी का आपको नुकसान पहुँचा जाये...मगर वो माँ बाप जो आपके अपने सामने खड़े हैं....भारत से भागते दौड़ते चले आये हैं..उन्हें कम से कम आपको पालने का अनुभव तो है ही... उनकी तो सुन लो..उनको तो न बच्चा उठाने का और उसे गोद लेने का शऊर सिखाओ..
अगर उनका तरीका तुमको लगता है कि बच्चे को पूर्ण विकसित होने देने में बाधक है..उनका तरीका बच्चे का दिमाग असंतुलित कर देगा..तो सोच कर देखना..इसी तरह उन्होंने तुमको पाला और बड़ा किया है..याने तुम खुद असंतुलित हो..यह तय है तो अब तुम किसी को क्या सिखाओगे?
एक छोटी सी बात...चलो मान लो कि गुगल भगवान है..मगर फिर गुगल सर्च करके देखना....कभी सिखाया जाता था कि भगवान से बड़े माँ बाप..उसके बाद फिर गुरु..तब फिर भगवान...
गुगल वो महान व्यक्तित्व है जो हम और तुम बनाते हैं...तुम अपने अनुभव लिखना.. मैं अपना लिखूँगा फिर कौन सा एल्गारिथम गुगल का तुमको दिखाये और कौन सा मुझे..वो कम्प्यूटर पर इन्टरनेट तय करेगा..
शायद इसी तरह कोई आशाराम का भक्त हुआ होगा..तो कोई राम रहीम का..तो कोई और किसी बाबा का...तो किसी को कोई भी भक्ति न रास आई होगी और कोइ यूँ ही आज के जाहिर भक्तों की तरह भक्त कहला गया होगा.
सब वक्त वक्त की बात है.
-समीर लाल ’समीर’


"अपना-अँगना" द्वारा प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका "आखर-मुक्ता"  के द्वितीय अंक में प्रकाशित


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रविवार, जनवरी 24, 2016

प्रभु जी सुन लो अरज हमारी


प्रभु अपने भक्तों का उद्धार करने भारत भूमि पर अपनी नाम पताका लहरा रहे हैं. लगता है अच्छे दिन आने वाले हैं. प्रभु का इस तरह अवतरित होना कोई संप्रदायिकता वाली बात  नहीं है और न ही इसे हिंदुत्व से जोड़कर देखना चाहिये.
हर बात जिसमें अच्छे दिन नजर आयें, वो संप्रदायिक ही हो, ऐसा जरुरी तो नहीं.
नए नए युग पुरुषों के शंखनाद से सारा वातावरण गुंजायमान है. एक नए युग की घोषणा हो चुकी है.
इस प्रभु में आस्था रखना, इस  प्रभु से संपर्क स्थापित करना, इस  प्रभु से कुछ मदद मांगना, यह हर एक प्राणी का अधिकार है, अब यह मात्र हिन्दुओं का अधिकार नहीं रहा. आप मुसलमान हों, इसाई हों, यहूदी हों, इससे कोई फर्क नहीं पडता. इस प्रभु से आशीष माँगने के लिए और अपनी समस्या का समाधान कराने के लिए ना तो अब आपको मंदिर जाने की ज़रूरत है, ना कोई यज्ञ या अनुष्ठान कराने की. ना कहीं तपस्या करने जाना है, ना व्रत उपवास, ना पंडितों की चिरोरि, ना कोई तीरथ धाम.
प्रभु से अपनी मनोकामना पूरी कराने के लिए बस आपको भारतीय रेल से यात्रा करना है. फिर  किसी भी प्रकार की समस्या जैसे बच्चे के लिए दूध और बिस्कुट, बीमार के लिए दवाई, गुंड़े या शराबियों से प्रतारणा निवारण, असहाय को सहायता, प्रसव पीड़ा या अन्य कोई पीड़ा हो तो तुरंत प्रभु को ट्विटर पर याद करिये और चन्द मिनटों में आपकी समस्या का मात्र समाधान ही नहीं हो जायेगा वरन आप अगले दिन के समाचार पत्र की सुख्रियों में भी नजर आयेंगे कि कैसे प्रभु ने चुटकियों में आपकी मनोकामना पूर्ण की.
आपको अहसास भी न होगा कि जिस समस्या को आप इतनी बड़ी मान रहे थे वो प्रभु की शरण में जाते ही कैसे चुटकियों में हल हो गई. प्रभु रेल मंत्री से ज़्यादा भगवान नज़र आने लगे हैं. ट्विटर रेल मंत्रालय से परे प्रभु से सीधा सूत्र स्थापित कराता है और प्रभु सब काम छोड़कर अपने भक्तों याने रेल यात्रियों की समस्याओं का त्वरित निवारण करने में लगे है. न रेल प्रसाशन का जिक्र और न मंत्रालय से कुछ लेना देना. बस भक्त की समस्या ओर प्रभु का वरदान. सीधा सीधा डायरेक्ट कनेक्शन.
पुराने ज़माने में लोग घर द्वार छोड़ कर भूखे प्यासे जंगलो में वर्षों तपस्या करके भगवान से जो वरदान पाते थे वो अब भारतीय रेल से मात्र प्रभु को ट्वीट भेज कर प्राप्त हो जाता है. वैसे भी भारतीय रेल में यात्रा करना किसी तपस्या से कम तो नहीं फिर प्रभु क्यूँ न करें मनोकामना पूर्ण.
यूँ देखा जाये तो कार्य अति उत्तम है बस प्रभु भगवान का रुप धारण किये इतना याद किये रहें कि वो सच्ची मुच्ची वाले भगवान नहीं हैं जैसे लक्ष्मी मैया सदा धन का डिपार्टमेन्ट देखती रहेंगी शास्वत सत्य की तरह. कल को ये प्रभु शायद रेल मंत्री न रहें या उनकी सरकार सत्ता से बाहर हो जाये तो भी यात्री जब प्रभु को ट्वीट करे तो उसे यूँ ही वरदान मिलता रहे. कहीं बेचारे भक्त को रिकार्डिंग न मिलने लगे कि प्रभु अब रेलवे के भक्तों के बदले एच आर डी के भक्तों की सेवा में लगे पुस्तकें और मिड डे मील पहुँचा रहे हैं. आप कृप्या रेलवे वाले नये प्रभु को ट्वीट करिये और वरदान पाईये या अब प्रभु विपक्ष में बैठे हैं और आपके ट्वीट को मुद्दा बना कर सरकार को हालाकान करेंगे.  आपका आभार मुद्दा भेजने के लिए- मस्त मुद्दा भेजे हो.
वैसे सोचा जाये तो अब भला इससे ज़्यादा अच्छे दिन और क्या आ सकते है.
बोलो जयकारा !!
ऐसौ बल प्रभाव प्रभु तोरा।
कस न हरहु दुःख संकट मोरा।।
-समीर लाल 'समीर '

फोटो: गुगल साभार
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सोमवार, सितंबर 21, 2015

सम्मानित साहित्यकार्स!!

एकाएक सन २००५ के आस पास हिन्दी में ब्लॉग लिखने वाले अवतरित हुए.. और फिर तो सिलसिला चल पड़ा..रचनाओं के रचित होने का...लोगों को प्रोत्साहित करने का लिखने के लिए..आप भी लिखो. बोल लेते हो तो लिख भी लोगे. जैसे फिल्म देख कर घर लौटने पर फिल्म की कहानी सुनाते हो न..वैसे ही लिख कर सुनाओ. बस इतना सा निवेदन किया था और लोग उसे बड़ी गंभीरता से ले गये और टूट पड़े लिखने लिखाने में.
और इन रचनाओं को पढ़ने वाले भी वो ही होते थे जो लिखने वाले होते थे. पढ़ना मात्र मजबूरी होती थी कि पढ़ कर कुछ कमेंट कर दें तारीफ में तो बंदा भी हमें आकर पढ़ेगा और कमेंट करेगा. इस प्रक्रिया को उस वक्त कहा जाता था कि तू मेरी पीठ खुजा, मैं तेरी पीठ खुजाऊँ.
अब इस लिखने पढ़ने की होड़ में, हम दूसरे लिखने वाले से बेहतर कैसे दिखें? कैसे साबित करें कि हम तुमसे बेहतर रच रहे हैं. तब लोगों ने अपने ब्लॉग पर छपी कहानियों और कविताओं के अखबार में प्रकाशित हो जाने की खबरों को जोर शोर से उछालना शुरु किया.
अखबार वालों की भी पौ बारह हो निकली. हींग लगे न फिटकरी और रंग भी चोखा आये. न पैसा देना और न पूछना..जो पसंद आया..कट पेस्ट किया और अखबार में छाप दिया. मेहताना मांगना तो दूर..छपा ब्लॉगर उस अखबार की तस्वीर छाप छाप कर फूला न समाता कि हम तो बड़े साहित्यकार हो लिए..अखबार वाले छापने लगे.
ऐसे में जो अखबार में नहीं छप पाते वो ऐसी सूचनाओं की पोस्टों के कमेंट में आकर आपत्ति उठाते कि अखबार वाले चोर हैं ..बिना पूछे छाप देते हैं. आप उन पर मुकदमा करिये और अपना मेहताना माँगिये. छ्पा बंदा भी जानता था कि ये अगला मात्र खीज उतार रहा है, अतः इतना सा बस जबाब देता कि आप ठीक कह रहे हैं. देखते हैं.
धीरे धीरे समय के साथ साथ जब ब्लॉगरों का यह गुमान उन्हें भ्रमित कर यह विश्वास दिलाने लगा कि वो साहित्यकार हो गये हैं और आने वाले युग के वो ही प्रेमचन्द हैं और वो ही निराला. तब तो मानो जलजला सा ही आ गया. अब की बार खुद को बेहतर साहित्यकार प्रूव करने के लिए पुरुस्कारों और सम्मानों का दौर चला..और ऐसा चला कि अब तक चला आ रहा है.
जितने साहित्यकारों को ब्लॉग जन्म देता गया, उससे कई गुना ज्यादा सम्मान और पुरुस्कार जगह जगह जन्म लेते चले गये. नये नये पुरुस्कारों के नाम पता चलने लगे. नये नये शहरों के नाम पता चले जहाँ ये सम्मान समारोह आयोजित होते रहे. कमाल ये था कि अधिकतर सम्मान ऐसे थे जो पहली बार सुने गये और फिर कभी आगे सुनाई भी नहीं दिये मानों जैसे सिर्फ इन्हीं के लिए ऊगे थे और इन्हीं का सम्मान करके डूब गये.
samman
यूँ भी अगर ध्यान से सोचिये तो सम्मानित होने की प्रक्रिया में दो लोगों का ही तो काम है – एक वो जो सम्मान दे रहा हो और दूसरा वो जो सम्मान ले रहा हो. इसके बाद जितने भी लोग हों सब बोनस ही तो है. लेकिन जब ये सम्मानित साहित्यकार सम्मान पत्र हाथ में पकड़े अपनी सेल्फी फेसबुक पर चढ़ाते हैं यो कभी कभी चंचल मन शक में पड़ जाता है कि कहीं इस बार सम्मानित करने वाला और सम्मानित होने वाला बंदा एक ही तो नहीं. इसलिए निवेदन बस इतना सा है कि जब कभी सम्मानित हों तो कम से सम्मान देने वाले और लेने वाले का सम्मान आदान प्रदान करते समय का फोटो लगायें. यूँ भी वो है कौन- कौन चैक करने आ रहा है?
इस बीच फेसबुक ने दस्तक दी और ब्लॉगजगत के तथाकथित साहित्यकार अपने कहानी किस्से और कविताओं का बस्ता बॉधे फेसबुक पर चले आये. हालात वही कि नित नये सम्मान..नित नये ईनाम..
अगर कायदे से गिना जाये तो उन्होंने जितने पन्नों के आलेख और कविता न लिखे होंगे ..उससे कहीं ज्यादा पन्नें सम्मान और पुरुस्कारों की सूचना देने और बखान करने में लिख डाले. रोज एक नया स्टेटस.एक नया ईमेल..मसौदा कुछ यूँ..
मित्रों, आपको बताते हुए बहुत खुशी हो रही है कि मुझे फलाना संस्था ने इस वर्ष का ’साहित्य मणि’ मेरी रचना ’मुस्करा भी दो’ के लिए देना तय किया है. इस हेतु चिरई डौंगरी में महा आयोजन १८ दिसम्बर को शाम ७ बजे किया जायेगा..आप सादर आमंत्रित हैं’ अपना आशीर्वाद दें..याने बधाई देने वाला कमेंट करो मेरी स्टेटस पर.
सोचो तो इस आमंत्रण के आधार पर आयें कहाँ..न तो ये पता है कि चिरई डौंगरी कहाँ है..न ये पता कि अगर किसी तरह चिरई डौंगरी ढ़ूँढ कर पहुँच भी गये तो किस जगह आना है?
ये पुरुस्कार और सम्मान मिलने की सूचना ईमेल, गुगल प्लस, ट्विटर, व्हाटस अप, एस एम एस, फेस बुक, ब्लॉग, कमेंट..हर संभव रुट से भेजी जाती है. उनका बस चले तो वो आपके घर आकर बता जाये. जैसे बता रहे हों कि भाई साहब, नार्वे आईये. आपके आशीर्वाद से मुझे नोबल पुरुस्कार से सम्मानित किया जा रहा है...
अब तो ऐसी ईमेल या स्टेटस देखो जिसमें शुरुआत में लिखा हो कि आपको बताते हुए... देख कर ही घबराहट हो जाती है कि बंदे का फिर कहीं सम्मान हो गया या होने वाला है...लेकिन हद तो तब हो जाती है जब कर्जा उतार कमेंट में उसे बधाई दे डालते हैं कि ऐसा शुभ दिन बार बार आये..बिना ये सोचे कि आपको बताते हुए में..अपने पिता की मृत्यु की समाचार भी तो दे रहा हो सकता है..
समीर लाल ’समीर’ Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, अगस्त 30, 2015

शहर के मुँह में भी जुबान होती है....

सुन कर अजीब सा लग सकता है मगर हर शहर के मुँह में एक जुबान होती है और उस जुबान की अपनी एक अलग ही जुबान होती है.

tounge

आपका शहर दरअसल वो शहर होता है जो आपके बचपन से जवानी तक के सफर का और अक्सर उसके बाद तक का भी, चश्मदीद गवाह होता है या यूँ कहें कि वो शहर जिस शहर में, आपके व्यक्तित्व की मौजूदा आलीशान इमारत जिन मुख्य स्तंभों पर आधारित है, वो स्थापित हो.

भले ही वहाँ आपने जन्म न लिया हो, भले ही वहाँ आपके माता पिता सदा किराये के मकान में रहते आये हो और आप भी किराये के मकान में रहते रह गये हों..मगर बचपन से खेलते पढ़ते घूमते ब़ड़े होते होते न जाने कब वो शहर आपमें समा जाता है. उसकी सड़के, गलियाँ, बाग बगीचे सब आपके मानस पर रच बस जाते हैं.

मुझ जैसा जबलपुर शहर का प्राणी जो आज बरसों से कनाडा में आ बसा है मगर फिर भी जब कभी कनाडा के विश्व विख्यात नियाग्रा फाल्स के सामने खड़ा होता है तो उसे उसमें जबलपुर का नर्मदा नदी का धुँआधार जलप्रपात नजर आता है और मेरी पत्नी जो मिर्जापुर की है, उसे उसी नियाग्रा फाल्स में विन्ढम का झरना. एक ही वक्त में एक ही चीज दो अलग अलग प्राणियों की आँखों को दो अलग अलग आलम दे – ये सिर्फ जहन में बसे एक शहर की औकात है.

अपना शहर और अपने शहर का जहां मे बसना समझना हो तो हालात तो यूँ हैं कि श्रीवास्तव जी जो सन १९६५ में लखनऊ से कनाडा में आ बसे थे सपरिवार और फकत चार पाँच साल में भारत जाना आना होता रहा था जिनका मात्र दो या तीन हफ्तों के लिए, वो अभी जब पिछले माह एक लम्बी बीमारी के बाद गुजरे तो उनके अंतिम संस्कार के दौरान लोगों को कहते सुना कि भाई साहब का बहुत मन था कि अंतिम सांस वो लखनऊ में ही लेते मगर मन का मांगा कब पूरा होता है. तब लगा कि ये होता है अपना शहर जो मरने के बाद भी आपके नाम के साथ गुथा रहता है.

आपके शहर के मुँह में जो जुबान होती है वो जरा सा फिसली और समझो कि हुआ आपका बंटाधार. फिर भले आप शहर में हों या उसे छोड़ कर कहीं और जा बसे हों मगर वो शहर आपको छोड़ने को तैयार नहीं..वो तो आपके भीतर रच बस चुका होता है और साथ साथ चलता रहता है और फिर जो आपको उस शहर से होने की पहचान देती है, वो होती है उस शहर के मुँह में बसी जुबान की अपनी एक अलग जुबान. कुछ ज्ञानी उसे उस शहर की भाषा या महाज्ञानी उसे उस शहर की बोली भी कहते हैं.

चाहे आप अपना शहर छोड़ कर दिल्ली, बम्बई या बैंगलोर आ बसें या सात समुन्दर पार अमेरीका, कनाडा आ बसें तो भी. जब कभी बात निकलेगी तो पूछने वालों का पहला प्रश्न ही यह होगा कि आप कहाँ से हैं?

तब आप जैसे ही बताते हो कि आप जबलपुर से हैं और वो पूछने वाला भी अगर आपके शहर का ही हुआ तो अति प्रसन्न भाव से बतायेगा कि ’गजब हो गओ महाराज!! हम भी जबलईपुर से हैं’. ये जबलपुर का जबलपुर वाले का जबलपुर वाले के सामने जबलईपुर निकल जाना एकदम स्वभाविक प्रक्रिया है, इसके लिए सामने वाले को न तो कुछ सोचना होता है और न ही कोई प्रयास करना होता है. यह एकदम सहज हो जाने वाली घटना है और आप जान जाते हो कि ये तो अपने शहर का सर्टिफाईड बंदा है. ये होती है उस शहर के मुँह में होने वाली जुबान की अपनी एक अलग जुबान. उस शहर की बोली.

तब बात आगे बढ़ती है और वो पूछता है कि काये, जबलपुर में कहाँ से? और आप जैसे ही उसे अपना मोहल्ला बताते हो, हालांकि अब उस मोहल्ले में आपका कुछ भी नहीं मगर वो मोहल्ला फिर भी हमेशा आपका ही रहता है, तुरंत वो कहता है कि अरे!! वहीं तो वो शर्मा जी रहते थे स्टेट बैंक वाले जिनकी लड़की का ड्राईवर के साथ चक्कर था. ये जो एकाएक बेवजह शर्मा जी और उनकी लड़की की भद्द उतार दी गई.. वो होती है उस शहर के मुँह में रहने वाली जुबान.

ये इसी शहर के मुँह में रहने वाली जुबान की मेहरबानी है कि अच्छा अच्छा बोले तो आप अच्छे और पोल खोल दे तो आप बुरे.

वैसे सच जानो तो दर्ज तो आपके शहर की मुँह की जुबान पर आपके बारे सब कुछ है ही..इतना कुछ कि जो करम आपने उस शहर में न कर, सेफ रहने के लिहाज से किसी और शहर में किये हों उसे तक वो अपने सीने से लगाये बैठी रहती है और न जाने कब, एकाएक लपलपा के बोल दे और फिर आप देखिये कि क्या तमाशा खड़ा होता है..

कभी अपने शहर के मुँह की जुबान से, अपनी पैदाईश से लेकर घटना दर घटना मय सबूत के पूरी जन्म कुण्डली, जिसे शायद आपको खुद भी याद करने के लिए दिमाग पर जोर डालना पड़े, सुनना हो तो एक काम करियेगा..बस!! एक बार एक बड़ा चुनाव लड़ लिजियेगा किसी जानी मानी पार्टी की टिकट पर..फिर सुनियेगा..मन लगा कर कि क्या क्या गुल खिलाये थे आपने मियाँ..अपने ही शहर की मुँह की जुबान से...उसी की जुबान में..

और तब आप भी मान जायेंगे..कि

’हर शहर के मुँह में एक जुबान होती है’

बस!! डर इतना सा है कि इस बदलती दुनिया में कहीं स्मार्ट सिटी का कल्चर शहर को बेजुबान न बना दे!! मुंबई बहुत नहीं तो थोड़ा स्ट्रीट स्मार्ट तो है ही और वो इसका काफी हद तक प्रमाण भी देता रहा है अन्य शहरों की तुलना में.

चित्र साभार: गुगल

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रविवार, जून 21, 2015

योगा दिवस: सब पूर्ण स्वस्थ हैं!!

साहेब की थाली में दो सूखी रोटी और पालक का साग उनके स्वास्थय के प्रति सजगता दिखाती है. वो बड़े गौरव के साथ अपना ५६ इंची सीना ताने अपने रईस दोस्तों के बीच अपनी डाइट बताते है. अपना एक्सर्साईज रुटीन बधारते हैं. नित प्रति दिन ऐसी साइकिल (एक्सर्साईज बाईक) चलाने का दावा करते है जो जाती तो कहीं नहीं मगर मीटर में दिखाती है कि पूरे पाँच किमी चली है याने अगर १०० दिन की बात करें तो ५०० किमी चली- मानो साइकिल न हुई, सरकार हो गई हो. हुआ गया कुछ हो या न हो, १०० दिन में ५०० किमी का रिपोर्ट कार्ड लहराया जा रहा है हर तरफ. काश!! ५०० किमी की जगह, दिल्ली से ५० किमी दूर तक भी निकल लिए होते सही में साईकिल चलाते और कुछ जमीनी हकीकत का जायजा ले लेते तो शायद कुछ किसान आत्म हत्या करने से बच जाते. शायद महिनों से रुकी तनख्वाह की बाट जोते किसी नगर निगम के कर्मचारी के परिवार को कुछ आशा की किरण दिख जाती.

लेकिन हमारे नेताओं की आदत में है, आपदाओं और विपदाओं का हवाई निरक्षण करना और उसके आधार पर बने जमीनी विकास के रिपोर्ट कार्ड को हवा में लहरा लहरा कर जनता को बहलाना. आकाश से देखने का फायदा ये होता है कि कीचड़ में उगी घास भी हरियाली नजर आती है. मुश्किल तो उसकी है जिसे उस कीचड़ के दलदल से होकर गुजरना होता है. लेकिन उसकी किसे फिकर- कीचड़ में उसके कपड़े खराब हों या वो दलदल में फंस कर दम तोड़ दे- ये सब उसकी परेशानी है. हमारा रिपोर्ट कार्ड तो दिखा रहा है कि चहु ओर हरियाली ही हरियाली है. हरित क्रान्ति के इतिहास में पहली बार इतना हरा अध्याय.

खैर, बात चल रही थी एक्सर्साईज रुटीन की- तो यदि आप योग को योगा कह दें तो ये तुरंत वैसा ही स्टेटस सिंबल बन जाता है जैसे मानों आम आदमी की थाली से उचक कर दो सूखी रोटी और पालक का साग साहब की थाली में शोभायमान होने लगा हो और जब साहब की थाली में आया है तो बखाना भी जायेगा और जब बखाना जायेगा तो रिपोर्ट कार्ड में भी आयेगा.

गांवों में अस्पताल हो या न हो और अगर अस्पताल हो भी तो उसमें डॉक्टर का अता पता लापता हो मगर इससे क्या फरक पड़ता है. बेवजह हल्ला मचाते हो फालतू का मुद्दा उठा कर. चलो, तैयार हो जाओ इस समस्या के समाधान के लिए- २१ जून को अन्तर्राष्ट्रीय योगा दिवस के दिन सब साथ में योगा करो. योगा में अगर भगवान का नाम न लेना हो मत लेना, अल्लाह का ले लेना, ईशु का ले लेना - क्या फरक पड़ता है मोटापा कम होने में अगर पाव दो पाव का अंतर रह भी गया इस वजह से तो. जब सब सूर्य नमस्कार कर रहे हों तो तुम सूर्य ग्रहण की कल्पना करते हुए चाँद सलाम कर लेना, लिटिल स्टार मान कर ट्विंकल ट्विंकल हैलो कर लेना- आँख तो मूँदी ही रहना है.

जो मन करे सो करना- बस इतना ध्यान रखना कि अब आगे से बीमारी के लिए अस्पताल और डॉक्टर की मांग उठाना मना है क्यूँकि रिपोर्ट कार्ड दिखा रहा होगा कि भारत में सब योगा कर रहे हैं और सब पूर्ण स्वस्थ है!!

इससे अच्छे दिन की और क्या कल्पना कर सकते हो, बुड़बक!!

बात करते हो!!

jansandesh_photo

-समीर लाल ’समीर’

२१ जून २०१५ अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस पर दैनिक जनसंदेश में प्रकाशित

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शनिवार, जून 20, 2015

अन्तरराष्ट्रीय स्तर के होने की योग्यता

बहुत सूक्ष्म अध्ययन एवं शोध के बाद लेखक इस निष्कर्ष पर पहुँचा है कि यदि आपके नाम के अन्त में आ की मात्रा लगाने के बाद भी नाम आप ही का बोध कराये तो आप अन्तरराष्ट्रीय स्तर के हो सकते हैं.

जैसे उदाहरण के तौर पर लेखक का नाम समीर है. यदि आपको समीर नाम सुनाई या दिखाई पड़े तो आपकी नजरों के आगे मेरी तस्वीर उभरती है, शायद कविता पढ़ते हुए या आपकी रचनाओं पर दाद देते हुए मगर जैसे ही मेरे नाम के अंत में आ की मात्रा लगा दी जाती है याने समीरा तो आपकी आँखों के आगे फिल्मों वाली समीरा रेड्डी की तस्वीर उभर आती है बीच पर गीत गुनगुनाते. समीर और समीरा- एकदम दो विपरीत ध्रुव. अतः समीर नाम अन्तरराष्ट्रीय स्तर का होने की पात्रता नहीं रखता.

अब दूसरा उदाहरण लें. नरेन्द्र- सुनते ही आँखो के सामने ५६ इंच का सीना तन गया न और कान में गूँजा- मितरों......!!! अब अगर आप इस नाम के अन्त में आ की मात्रा लगा दें याने कि नरेन्द्रा – तब भी आँख के आगे वही ५६ इंच की सीना और कान में..मितरों..!!!!! याने की इनमें अन्तरराष्ट्रीय हो जाने की योग्यता है और हो ही रहे हैं. राष्ट्र में तो होते ही कब हैं? अधिकतर अन्तर्राष्ट्र में ही बने रहते हैं. मित्र भी अन्तरराष्ट्रीय- जैसे बराक!! वरना तो किस की हिम्मत कि ओबामा साहब को बराक पुकारे. इसके लिए तो ५६ इंच के सीने के साथ साथ अन्तरराष्ट्रीय होना भी जरुरी है. अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर जहाँ जाते हैं वहीं नाम का डंका बज रहा होता है.

इनसे जब अरविन्द, राहुल टक्कर लेते हैं तो ये क्यूँ नहीं सोचते कि उनके नाम में अन्तरराष्ट्रीय होने की योग्यता नहीं है तो वो क्या होंगे. बेवजह टकराते हैं. अरविन्दा और राहुला- न जाने कोई होगा भी या नहीं कहीं पर इस नाम का तो तस्वीर क्या खाक उभरेगी भला?

एकदम ताजा ताजा- योग और योगा. योग कहो तो बाबा रामदेव गुलाटी खाते नजर आयें और कान में आवाज गूँजे- करत की विद्या है. करने से होता है- करो करो. और आ की मात्रा लगा कर योगा कह दो तो भी बाबा राम देव ही नजर आयें गुलाटी लगाते और कान में वही- करत की विद्या है. करने से होता है- करो करो.

और फिर ये तो संपूर्ण योग्यता वाले हैं- योग और योगा, राम और रामा और देव और देवा. ’समरथ को नहीं दोष गोसाईं’

Yoga

अब तो मान जाओ इनका लोहा.

मितरों!! चलो करो- आज अन्तरराष्ट्रीय योग (योगा) दिवस है. करो करो- करने से होता है.

-समीर लाल ’समीर’

चित्र साभार: इन्टरनेट

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मंगलवार, जून 02, 2015

हम भारतीयों का डी एन ए!!

नजर की पहचान थी उससे यही कोई तीन चार बरसों की. सिर्फ दफ्तर आते जाते हुए ट्रेन में पड़ोस के डिब्बे में उसे चढ़ते उतरते देखता था और नजर मिल जाती थी. लबों के हाथ कभी इतने नहीं बढ़े कि कोई मुस्कराहट उस तक पहुँचा दें और उसके लबों के तो मानो हाथ थे ही नहीं. भाव विहीन चेहरा.

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हाँ, एक बार झुंझलाहट देखी थी उसके चेहरे पर..मगर वो भी मुझे लेकर नहीं..ट्रेन के देर से आने की वजह से. कनाडा में ट्रेन का लेट होना यदा कदा ही होता है अतः सभी चेहरे झुंझलाये से थे उस दिन तो उसका चेहरा फिर भीड़ के चेहरे सा ही दिखा. मेरा चेहरा सामान्य था बिना झुंझलाये. मैने उस दिन भी उसकी नजरों से वैसे ही नजर मिलाई थी जैसे हर रोज. उसे पक्का आश्चर्य हुआ होगा मेरा चेहरा देखकर कि मानो ट्रेन के देर से आने का मुझ पर कोई असर हुआ ही न हो.

उसे क्या पता कि ट्रेन का इस तरह, न जाने कितने दिनों बाद, ४५ मिनट देर से आना मुझे मेरे देश की यादों में वापस ले गया था..मुझे लगा कि मैं अपने शहर के स्टेशन पर खड़ा उस ट्रेन का इन्तजार कर रहा हूँ जो लेट है अनिश्चित काल के लिए. लेट आने वाली ट्रेन का इन्तजार खुशी खुशी करना और किसी भी तरह की समस्या के वक्त के साथ गुजर जाने पर विश्वास कर स्थितियों से समझौता कर लेना मेरे भारतीय होने की वजह से मेरे डी एन ए में है.

यही डी एन ए तो है जो आज तीन चार बरस बीत जाने बाद भी मुझे अपने लबों के हाथो के कद बढ़ जाने की उम्मीद हर रोज सुबह शाम रहती है..जो शायद उसके लबों पर एक मुस्कान ला दें कभी और वो मुझसे पूछे ..कैसे हो आप? और मैं उससे कह सकूँ..कि तुमने पूछा तो अब बेहतर महसूस कर रहा हूँ मैं!

ये इन्तजार अनिश्चित कालिन भी हो तो क्या और सतत बना भी रह जाये तो क्या..इन्तजार और वक्त के साथ समझौता कर लेना तो हम भारतीयों के डी एन ए में है...कर ही रहे हैं अच्छे दिनों के आने का इन्तजार!!

कुछ हर्फ मेरे उतरे ही नहीं, जीवन के कोरे पन्नों पर.

ये दुनिया वाले अजब से हैं, उसको भी गज़ल बुलाते हैं..

-समीर लाल ’समीर’

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