बुधवार, जून 24, 2009

कुछ विल्स कार्ड और...

दो रोज पहले हॉस्टल के मित्र, जो उस जमाने में मेरा रुम मेट हुआ करता था, का पत्र प्राप्त हुआ भारत से. बड़ा आश्चर्य का विषय था कि आज के जमाने में कोई पत्र लिखे. ईमेल से काम चला जा रहा है. लेकिन उसने मेरे ब्लॉग पर विल्स कार्ड पर उतरी बातें पढी और फिर यह पत्र भेजा.

(याद है मुझे सालों पहले, जब मैं बम्बई में रहा करता था, तब मैं विल्स नेवीकट सिगरेट पीता था. जब पैकेट खत्म होता तो उसे करीने से खोलकर उसके भीतर के सफेद हिस्से पर कुछ लिखना मुझे बहुत भाता था. उन्हें मैं विल्स कार्ड कह कर पुकारता......)

जाने कब और किस मूड में लिखे मेरे कुछ कार्ड उसके पास रखे हुए थे, वही उसने पत्र के माध्यम से भिजवाये. सोचता हूँ ऐसा कुछ खास था भी नहीं उसमें, फिर भी बस याददाश्त बतौर शायद रखे रहा होगा सहेज कर. इतने सालों से सहेजे इन चन्द कागज के टुकड़ों को अपने से अलग करते क्या अहसासा होगा उसने. एक टीस तो उठी होगी. मैं तो भूल भी चुका था फिर क्यूँ उसने वो मुझे वापस भेजा.बस सोच रहा हूँ. बरसों बीते उससे मुलाकात हुए भी. बहुत यादें जुड़ी हैं उस समय के साथ, उन प्यारे दोस्तों के साथ बम्बई की सड़के नापते, सारा समय अपना, अपनी मौज.

क्या भूलूँ क्या याद करुँ को चरितार्थ करता.

ज्यादा नहीं लिखता. भावुकता जकड़ने लगती है फिर उससे उबरने की जद्दोजहद, तो इतना ही लिख वो विल्स कार्ड नोट्स पेश कर देता हूँ.




-१-

कल मैं नहीं रहूँगा..

यह तय है..

रहोगे तो तुम भी नहीं..

फिर ये अकड़ कैसी ?



-२-

कब्र पर

खारे आंसूओं का सबब

कुछ अनकही बातें

और

अपूर्ण वादों का पाश्चाताप.



-३-

वो नहीं रहे...

अति दुखद..

रहोगे तो तुम भी नहीं..

ऐसा कुछ कर जाओ

कि कोई तो कहे..

अति दुखद!!


-४-

एक आम आदमी मर गया...

क्या आंसूं बहाना....

वो तो मरा ही पैदा हुआ था!!



-५-

वो मर गया

चलो,

आज उसका शरीर फूँक आयें...

आत्मा तो अपनी

उसने सालों पहले ही फूँक दी थी...

-नेता था हमारा!!


-६-

( बम्बई के छोटे से फ्लैट में रह रहे मेरे दोस्त के दादा जी मृत्यु पर मेरे दोस्त की माता जी के व्यक्तव के आधार पर-आज का भौतिकवाद)

बाबू जी नहीं रहे!!

हमारे परिवार की बगिया को

बिन माली कर गये....

बस, तसल्ली इतनी है कि

कमरा खाली कर गये!!


-७-

मेरी कलम से

निकलते

वो

नीले आँसूं

बरबस ही

खींच लाते हैं

तेरी आँखों से

वो

पनीले आँसूं

जो

लुढ़क कर

जब जा मिलते हैं

मेरी कलम के

उन नीले आँसूंओं से

तब छा जाता है

एक धुंधलका सा

अपने साथ लिए

सन्न सन्नाटा

और

गहरी उदास उदासी!!



-समीर लाल ’समीर’ Indli - Hindi News, Blogs, Links

91 टिप्‍पणियां:

Arvind Mishra ने कहा…

ओह गहरे चुभती है ये रचनाएं समीर जी -इतनी गहरी संवेदनाशीलता के बाद भी कोई कैसे जी सकता है ! इश्वर चिरायु करें आपको -जीवेम शरदः शतम -हाँ धरोहार की वापसी पर बधाई -मगर दोस्त की चिट्ठिया भी पढ़वा दिए होते !

अजय कुमार झा ने कहा…

इतने दिनों में आज पहले बार पता चला की सिगरेट पीने का एक साईड, इफ्फेक्ट, वो भे अच्छे ...कमाल के हैं विल्स कार्ड ..मैं तो पिछले वाले भी पढ़ गया...वैसे बाबूजी वाला और एक आध और को छोड़ कर अन्य सभी आपकी उस शोक शभा (जिसका इन्वीटेशन नहीं मिला ) में भी चल जाता...क्या वाह वाह होती..., मगर दिवंगत शरीर भी उठ कर खादी हो सकती थी..आपको ...अरे नहीं आपके रूम मेट को धन्यवाद..थोडा विल्स कंपनी को भी.अब समझा ..बीडी जलायीले...की महान रचना जरूर गुलज़ार साहब ने बीडी की पुडिया पर ही रची होगी..लगे रहिये...

Bhuwan ने कहा…

समीर जी..

विल्स कार्ड्स पर लिखे आपके ये नोट्स काफी शानदार हैं. भला हो आपके मित्र का...की इन्हें इतने सालों तक सहेज के रखा. वैसे जीवन में कुछ लोग ऐसे जुड़ जाते है जिनके बिछड़ने के बाद भी उन्हें खुद में समेटे रखना अच्छा लगता है. शायद आप और आपके मित्र के बीच कुछ ऐसा ही जुडाव रहा होगा. आपकी दोस्ती सलामत रहे.

भुवन वेणु
लूज़ शंटिंग

Vivek Rastogi ने कहा…

बहुत ही जानदार बात मिल गई है विल्सकार्ड से "अतिदुखद"!!

गिरिजेश राव ने कहा…

अंतिम कार्ड के प्रभाव से अभी तक मुक्त नहीं हुआ हूँ।
अपनी असफल प्रेम कहानी याद आ गई।
अधिक नहीं लिख पाऊँगा अभी. .

mahashakti ने कहा…

हम तो इन कार्डो से दूर है, पक्तिंयाँ वकाई जानदार है।

अनूप शुक्ल ने कहा…

आगे और विल्स कार्ड का इंतजार है। ....कमरा खाली कर गये। अच्छा है!

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` ने कहा…

सुँदर लिखा था आपने समीर भाई !

चिठिया हो तो हर कोई बाँचे,
भाग , सहे हर कोई,
मितवा, भिजवा दे चिठ्ठी ~

-- लावण्या

सतीश पंचम ने कहा…

कभी कभी कुछ पुरानी नॉस्टाल्जियक बातें यूँ ही सालती रहती हैं। रह रह कर टीस देना भी शायद नॉस्टॉल्जिक यादों की एक फितरत है।

ओम आर्य ने कहा…

मन भरा बादल हो आया!

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

भावुक कर गयी यह पंक्तियाँ

तब छा जाता है

एक धुंधलका सा

अपने साथ लिए

सन्न सन्नाटा

और

गहरी उदास उदासी!!

नारदमुनि ने कहा…

i will come back,plz wait. narayan narayan

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi ने कहा…

कमरा खाली कर गये!!

बैस्‍ट पीस लगा।

संगीता पुरी ने कहा…

इतने छोटे विल्‍स कार्ड में लिखे छोटे नोट्सों में इतने गहरे भाव .. और आपके दोस्‍त का भी जवाब नहीं .. जिन्‍होने इसे इतने दिनो तक संभाले रखा .. जो हमें पढने को मिल गयी .. पोस्‍ट हमेशा की तरह ही बहुत अच्‍छी लगी।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

इन रचनाओं में बहुत संवेदनशीलता है। सीधे दिल पर प्रहार करती हैं।

प्रदीप मानोरिया ने कहा…

समीर लाल जी आपके विल्स कार्ड बहुत अच्छे लगे सहज बाते जो की आपकी खासियत है
धन्यवाद

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

ये विल्स कार्ड की रचनाएं एक गहरा प्रभाव छोडती हैं. आशा है अभी और कार्ड भी निकलने बाकी होंगे. इनका ईंतजार रहेगा. इनको संलित कर एक पुस्तक का स्वरुफ देने चाहिये.की कोशीश की जानी.

रामराम.

Mahesh Sinha ने कहा…

जीवन एक यादों का समंदर ही तो है जिसमे उतराते तैरते एक दिन डूब जाना है . समीर जी थोडा फॉण्ट साइज़ बाधाएं या बोल्ड करें पढने में आसानी होगी

Anil Pusadkar ने कहा…

ऐसा लग रहा है कि श्मशान से किसी को फ़ूंक कर निकल रहा हूं।अज़ीब सा वैराग्य्।

Prem Farrukhabadi ने कहा…

कल मैं नहीं रहूँगा..

यह तय है..

रहोगे तो तुम भी नहीं..

फिर ये अकड़ कैसी ?
Sameer Bhai,
ye panktiyan aadmi kii aukaat baatati hain. yah baat sabko yaad rahe to jeene ka maza hi kuchh aur ho.aap sachmuch bahut kuchh kah jate hain saral shabdon mein aur padhne vaala soch mein doob jaata hai. dil se badhaai.

रंजन ने कहा…

बहुत गहरी बातें बहुत कम शब्दों में..

अद्भुत..

Vaibhav ने कहा…

Cigarette ke (Back) Side effects.......achchha likha hai,

mamta ने कहा…

पढ़कर सोच रहे है कि क्या कहे । आपके मित्र का शुक्रिया जो उन्होंने इन्हे संभाल कर रक्खा ।

anil ने कहा…

"सोचता हूँ ऐसा कुछ खास था भी नहीं उसमें,"
कैसे कुछ खास नही है इन कार्ड में ? जीवन का कटु यथार्थ छुपा हुआ है इन पंक्तीयों में शायद इसीलीये अब तक संभाल कर रखा होगा उसने ।

seema gupta ने कहा…

कल मैं नहीं रहूँगा..

यह तय है..

रहोगे तो तुम भी नहीं..

फिर ये अकड़ कैसी ?
"जीवन का ये सच कितनी सहजता से कार्ड्स पर दर्ज हो गया........अद्भुत है न.."

regards

संजय बेंगाणी ने कहा…

आपने तो मृत्यु और सत्य को आमने सामने कर दिया.

मीत ने कहा…

एक आम आदमी मर गया...

क्या आंसूं बहाना....

वो तो मरा ही पैदा हुआ था!!

काश ये विल्स पेपर मुझे मिल जाते...
तो एकसाथ पढ़ डालता...
इतने गहरे उतारते हैं की बस क्या कहूं...
मीत

कंचन सिंह चौहान ने कहा…

कब्र पर

खारे आंसूओं का सबब

कुछ अनकही बातें

और

अपूर्ण वादों का पाश्चाताप.

.............................................!

नारदमुनि ने कहा…

fursat me read karne se jo sukun mila,wah tab nahin milta. realy,realy akad nahin jati hamari. nange-punge aaye nange punge chale jate hain,fir bhee pata nahin ham sab kis baat par itrate hain.narayan narayan

डॉ .अनुराग ने कहा…

कमरा खाली कर गया मुझे भी अच्छा लगा .............आप भी बीच बीच में सेंटी होने लगे आजकल........वैसे हमने अपना पहला प्रेम पात्र ऐसे ही एक होटल की डायनिंग टेबल पे नेपकिन पेपर पे लिख था....

Atmaram Sharma ने कहा…

मार्मिक पोस्ट. साधुवाद.

आकांक्षा~Akanksha ने कहा…

आप लिख ही नहीं रहें हैं, सशक्त लिख रहे हैं. आपकी हर पोस्ट नए जज्बे के साथ पाठकों का स्वागत कर रही है...यही क्रम बनायें रखें...बधाई !!
___________________________________
"शब्द-शिखर" पर देखें- "सावन के बहाने कजरी के बोल"...और आपकी अमूल्य प्रतिक्रियाएं !!

नीरज गोस्वामी ने कहा…

जीवन के कितने की रंग समेटे हैं आपने विल्स के इन खाली डब्बों पर...ये काम जिनिअस ही कर सकता है...और वो आप हैं ही...विल्स वालों को चाहिए की इस श्रृंखला को वो छापें और लोगों को बताएं की विल्स सिगरेट पीने के बाद कैसे कोई कवि बन जाता है...
नीरज

राज भाटिय़ा ने कहा…

समीर जी,
बहुत अच्छा लगा आप के दोस्त के बारे पढ कर, फ़िर यादे !!
लेकिन एक शॆर पढ कर आगे पढ्ने की हिम्मत नही हुयी.....

बाबू जी नहीं रहे!!

हमारे परिवार की बगिया को

बिन माली कर गये....>

बस, तसल्ली इतनी है कि

कमरा खाली कर गये!!
यह शेर पढ कर बहुत कुछ याद आ गया,

विनीता यशस्वी ने कहा…

जो

लुढ़क कर

जब जा मिलते हैं

मेरी कलम के

उन नीले आँसूंओं से

तब छा जाता है

एक धुंधलका सा

अपने साथ लिए

सन्न सन्नाटा

और

गहरी उदास उदासी!!

dil chhu jane wali post...

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

बहुत भावुक पोस्ट है, लेकिन तब भी मेरा शरारती दिमाग बार-बार जानना चाह रहा है, कि वे विल्स कार्ड भेजे तो रूममेट ने थे, लेकिन सहेजे.....?

दिगम्बर नासवा ने कहा…

स्तब्ध.............. गहरी उदासी गहरी संवेदनाशीलता है इन रचनाओं में समीर भाई............ विल्स के पैकट पर लिखी उदासी भी कया खूब अंदाज़ से लिखी है ............

अभिषेक ओझा ने कहा…

६ नंबर का यथार्थ दिल को छू गया.

महामंत्री - तस्लीम ने कहा…

बहुत शानदार क्षणिकाएं हैं। पहली वाली कविता तो सीधे दिल में उतर गयी। बधाई।

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

Abhishek Prasad ने कहा…

बाबू जी नहीं रहे!!
हमारे परिवार की बगिया को
बिन माली कर गये....
बस, तसल्ली इतनी है कि
कमरा खाली कर गये!!

kam shabdo mein satik kavita... bahut pasand aaya... khaas kar "babuji nahi rahe" aaj ko proof karti hai...

Jitendra Chaudhary ने कहा…

वाह! बहुत गहरे भाव है, भाई और छापो। बिना सिगरेट के ही नशा हुआ जा रहा है।
एक महत्वपूर्ण एडवाइस:
विल्स कार्ड तो सहेजने की चीज है।उस दोस्त से जरुर मिलना, जाने क्या सोचकर उसने कार्ड आपको वापस भेजे है। हो सके तो अभी फोन कर लो।

Pyaasa Sajal ने कहा…

samajh sakta hoon aapke liye ek behad jazbaati post raha hoga ye...ek ajeeb sa ehsaas hotaa hai ye...notalgia cheez hi aisi hai...ek udasi jo dard bhi deti hai..khushi bhi

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

कालेज के दिनों को यही छोटी-छोटी चीजें याद करवातीं हैं जो अब हमें बहुत बड़ी लगतीं हैं।
ऐसा हमारे पास भी है बहुत कुछ और इसी के सहारे दोस्तों को ढूँड़ते फिर रहे हैं।
आपका दोस्त मिला बधाई। रही बात पत्र की तो पत्र हम आज भी लिखते हैं। उसका जो आनन्द है वह ई-मेल में कहाँ।

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

बहुत सुंदर. काश कार्ड बड़े होते, और पढ़ने को मिलता.

परमजीत बाली ने कहा…

सुन्दर शब्द
तराशे हुए हैं....
भाव कहीं बहुत गहरे से निकले हैं....
जैसे बादल से गिरती बूँदों को
किसी ने अपनी हथेलियों में लेकर
सामने रख दिया।

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

धन्य हो आपका मित्र जिसने आपके विल्स कार्डो को इतने दिनों तक सहेज कर रखा और आपको प्रेषित किये . विल्स श्रंखला तो रोचक लग रही है . रचना भी भावपूर्ण है .

"अर्श" ने कहा…

छठी कविता के बारे में जीतनी तारीफ करूँ वो कम है आपके गंभीर विषय पे लिखे सारे ही लेख ,कवितायेँ और गज़लें मुझे बेहद प्रभावित और आश्चर्य कर देती है .... सारे के सारे कविता जिन्दगी के सारे रंग को अपने में समेटे हुए है.... बहोत बहोत बधाई विल्स्कार्द के लिए...


अर्श

सुशील कुमार छौक्कर ने कहा…

वो नहीं रहे.
अति दुखद..
रहोगे तो तुम भी नहीं..
ऐसा कुछ कर जाओ
कि कोई तो कहे..
अति दुखद!

ये कार्ड ज्यादा अच्छा लगा।

SWAPN ने कहा…

sameer ji, sabhi wills card anokhapan liye, anoothi rachnaayen. badhai sweekaren.

Archana ने कहा…

काश!!!!मेरे हिस्से भी कुछ सिगरेट के टुकडे होते
तो मेरे पनीले आंसू जमीं पर न यूँ बिखरे होते
विल्स कार्ड पर ही सहेज लेती उनको
तो शायद मेरे पनीले आंसू भी नीले होते
------
वो तो नहीं रहे
अति दुखद
और रहूंगी मैं भी नहीं
मगर कुछ ऐसा जरूर कर जाउंगी
कि हर कोई होगा
अति सुखद!!!!

Priya ने कहा…

post padi....kafi gahri baatein kah gaye aap...aur han dost & dosti ke jajbe ko salaam

कुश ने कहा…

लोग समय के साथ साथ परिपक्व होते जाते है..आपके केस में तो उलटा लग रहा है.. जितना शानदार आप अभी लिखते है उतना ही दमदार आप पहले लिखा करते थे...

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey ने कहा…

क्या कहें? न हन्यते हन्यमाने शरीरे!

dhiru singh {धीरू सिंह} ने कहा…

विल्स कार्ड एक हकीकत है सभी छोटी कविताएं जिन्दगी की हकीकत ही तो ब्यान कर रही है .

डॉ. मनोज मिश्र ने कहा…

सभी रचनाएँ बेमिसाल ,सलामत रहे दोस्ताना हमारा .

venus kesari ने कहा…

तम्बाकू स्वास्थ के लिए हानिकारक है
वीनस केसरी

Shefali Pande ने कहा…

बाबू जी नहीं रहे!!

हमारे परिवार की बगिया को

बिन माली कर गये....

बस, तसल्ली इतनी है कि

कमरा खाली कर गये!!
sach hai ye aaj ka ...behtareen rachnaaen

Mansoor Ali ने कहा…

अति सुखद!

खोई चीज़ो का मिल जाना,
बिसरी बातो का याद आना।

अति सुखद!

आँसु का बह कर गिर जना
सूखी स्याही तर कर जाना।

नही दुखद?

कमरे का खाली कर जाना,
अपनो की ख़ातिर पर (लोक) जाना।

अति रोचक!

अनकही को क़ब्रो पे जाकर,
सूखी मिट्टी नम कर आना।

बहुत खूब समीर भाई ! Wills [कार्ड] पर तो जैसे will लिख दी हो।

-मन्सुर अली हाश्मी।

cartoonist anurag ने कहा…

adbhut rachna......

Sanjeet Tripathi ने कहा…

bahut gehra yatharth uker diya hai aaone in shabdo me

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

वाह,एक बार फिर भावनाओं का सागर प्रस्तुत किया आपने,

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

छोटे से कार्ड पर आपने
कितनी बड़ी बड़ी कहानी लिख डाली,

बहुत ही अच्छा,

‘नज़र’ ने कहा…

सुन्दर रचनाएं

---
डायनासोर भी तोते की जैसे अखरोट खाते थे

Renu Sharma ने कहा…

smeer ji ,
namaskar
behad bhavuk cards padhe , kuchh purani baten hamen bhi yaad aa gain .
jab hum log class work copy ke peechhe shayari likha karte the .
bahut achchha laga .
aapaka dost pakka dost nikala .
renu sharma ...

Nirmla Kapila ने कहा…

कब्र पर

खारे आंसूओं का सबब

कुछ अनकही बातें

और

अपूर्ण वादों का पाश्चाताप.
समीर जी मन छू लिया इन शब्दों ने
आपकी पोस्ट सदा ही कुछ सोचने पर मज्बूर कर देती है गहरे भाव लिये सभी कवितयें सुन्दर है आभार्

dweepanter ने कहा…

बहुत गहरी बातें बहुत कम शब्दों में..

KK Yadav ने कहा…

आपका ब्लॉग नित नई पोस्ट/ रचनाओं से सुवासित हो रहा है ..बधाई !!
__________________________________
आयें मेरे "शब्द सृजन की ओर" भी और कुछ कहें भी....

Manish Kumar ने कहा…

marak lagi aapki ye kshanikayein

Harkirat Haqeer ने कहा…

समीर जी ,

हर क्षणिका लाजवाब.....किसकी तारीफ करूँ और किसकी नहीं ....??/

ये मेरी जात से कुछ मिलती जुलती है ....इसलिए मुझे लाजवाब लगी ....

नीले आँसूं

बरबस ही

खींच लाते हैं

तेरी आँखों से

वो

पनीले आँसूं

जो

लुढ़क कर

जब जा मिलते हैं

मेरी कलम के

उन नीले आँसूंओं से

तब छा जाता है

एक धुंधलका सा

अपने साथ लिए

सन्न सन्नाटा

और

गहरी उदास उदासी!!

Pakhi ने कहा…

Uncle Ji! Looking smart. U r from India.

Abhishek ने कहा…

मर्मस्पर्शी!

पन्चायती ने कहा…

उड़न तश्तरी मे सिगरेट पीना मना है, नही तो कुछ ताजे विल्स कार्ड भी पढने को मिल जाते.

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने कहा…

आपमें ऐसी संवेदना शुरू से ही थी और उसे शब्दों के माध्यम से कागज पर उतारने का हुनर भी तभी से था। हम तो आपको जानकर ही धन्य हो गये। प्रणाम प्रभु जी।

अनिल कान्त : ने कहा…

गहरे तक असर करती पोस्ट

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

खट्टी-मीठी यादें ही, जीवन जीवन्त बनाती है।
कभी-कभी ये बहुत रुलाती, और कभी सरसाती है।

दिनेश शर्मा ने कहा…

कल मैं नहीं रहूँगा..

यह तय है..

रहोगे तो तुम भी नहीं..

फिर ये अकड़ कैसी ?

कितना सही कहा है आपने ।

डा० अमर कुमार ने कहा…


पालने के पाँव इतने ही नाज़ुक हुआ करते हैं ।
हा विधाता, मेरी ऎसी स्लिपें तो ’ वो ’ ले गयी, जो अब कभी न आयेगी ।

K M Mishra ने कहा…

लाल जी नमस्कार, कभी-कभी कुछ यादें बहुत सताती हैं । दिल कहता है कि काश वो दिन फिर लौट आते, लेकिन लाल जी वो दिन चाहे कितने ही स्वर्णिम क्यों न हों मगर जब हम फिर उन्हीं परिस्थितियों से हो कर गुजरते है तो बडी बोरियत सी महसूस होती है । उसमें कुछ नया पन नहीं रहता । इसलिए जब यादों को लकर सेन्टी होने लगे तो यह सोचिए कि इसमें नया क्या है । ये तो बीती हुई बातें हैं ।

योगेन्द्र मौदगिल ने कहा…

समीर भाई, क्या कमरा खाली करवाया................ बस्स......... वाह....

अक्षय-मन ने कहा…

gehre jazbaton ko uker diya...in panno par.......jo khamosh pade the kab se...aapke shabdo ne unhe ek naya hi roop diya....
bahut hi gehra likha hai.......

महफूज़ अली ने कहा…

poora sansmaran padh ke achcha laga......... bhaavnaon ka achcha chitran kiya hai...... aapne........ wills card ke baarey mei jaan ke achcha laga ........aisa bhi hota hai kya?

प्रकाश गोविन्द ने कहा…

भाई समीर जी बहुत ही ह्रदयस्पर्शी छणिकाएं हैं
शब्दों की जादूगरी आपको खूब आती है

कई पंक्तियों की तासीर बहुत गहरी है
"बस, तसल्ली इतनी है कि
कमरा खाली कर गये"


रचनाओं को पढ़कर दिल में इतना-कुछ उमड़-घुमड़ रहा था .... पर यहाँ तो पहले से ही हाउस फूल का बोर्ड लगने को है :

रास्ते भर रो-रोके पूछा, मेरे पाँव के छालों ने
बस्ती कितनी दूर बसा ली, दिल में बसने वालों ने
मेरे गम को कौन पढेगा, इन जख्मी दीवारों पे
अपना-अपना नाम लिखा है, सारे आने वालों ने


आज की आवाज

sandhyagupta ने कहा…

Aam to aam,
Guthliyon ke bhi dam.
Cigarette to piya hi packet ka bhi bakhubi istmal kiya.

Waise aapke wills card notes me to pura ka pura darshan samahit hai.

DAISY D GR8 ने कहा…

yeh wills card par likha gya inceed.bahut acha hein
bachpan mein huei ek kooshish ki yad dila gaya jab hum 10 sal kein thee to papa kein fenkey huen kagaj ko samet kar aapney khyal likhtey theey us wakt copy ya paper limit mein hi miltey theey


or aapki lekhni to utam hein hi

आदर्श राठौर ने कहा…

प्रकाश जी
उड़न तश्तरी तो उड़न तश्तरी हैं.

अल्पना वर्मा ने कहा…

बस, तसल्ली इतनी है कि

कमरा खाली कर गये!!
aap ne is ek pankti mein kitna kuchh kah diya!

no words to express!

aap ki lekhni bhi kamaal ki hai!

'Wills cards par likhee ye notes' sabhi gazab ke hain!

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

अब ये विल्स कार्ड्स न होते तो हमें कैसे पता लगता कि आप तो शुरू से ही प्रतिभा संपन्न थे.

Mumukshh Ki Rachanain ने कहा…

लगता है बहुत पहले से ही विल्स बहुत गहरे में उतर चुकी है जो बहुत गहरी अभिव्यक्ति तभी से चालू है की मिसाल दे रही है. खुदी ने कहा तो शायद लोगों को लगा होगा ये भी एक लेखक की रचना है पर दोस्त के पात्र और सबूतों ने सच्चाई सामने ला ही दी............ कहना ही पड़ेगा कि.......

विल्स दा दूजा नहीं, जियो हजारों साल
हर तेवर जहाँ अजूबे, वहां समीर लाल

चन्द्र मोहन गुप्त

जगदीश त्रिपाठी ने कहा…

गजब हो भइया तुम भी। अऱे इतने भावपूर्ण काव्यांशों को विल्स के पैकट पर लिख कर भूल गए थे। लानत है आप पर। आपके उस मित्र को धन्यवाद,जिसकी वजह से हमें ये लघु कविताएं पढ़ने को मिलीं।

सागर नाहर ने कहा…

उन विल्स कार्ड्स को स्कैन कर लगाया जाता तो बढ़िया लगता।
खैर..
बंबई वाली कविता की पंक्तियां आहत कर गई
बस, तसल्ली इतनी है कि
कमरा खाली कर गये!!

राजीव तनेजा ने कहा…

बाबू जी नहीं रहे!!

हमारे परिवार की बगिया को

बिन माली कर गये....

बस, तसल्ली इतनी है कि

कमरा खाली कर गये!

मुझे नहीं पता था कि विल्स नेवीकट पीने से लेखनी इतनी पैनी और धारदार हो जाती है वर्ना मैँ तो कभी का....