| पहले की तरह ही, पिछले दिनों विल्स कार्ड भाग १ , भाग २ , भाग ३ ,भाग ४ , भाग ५ भाग ६ भाग ७ और भाग ८ को सभी पाठकों का बहुत स्नेह मिला और बहुतों की फरमाईश पर यह श्रृंख्ला आगे बढ़ा रहा हूँ. (जिन्होंने पिछले भाग न पढ़े हों उनके लिए: याद है मुझे सालों पहले, जब मैं बम्बई में रहा करता था, तब मैं विल्स नेवीकट सिगरेट पीता था. जब पैकेट खत्म होता तो उसे करीने से खोलकर उसके भीतर के सफेद हिस्से पर कुछ लिखना मुझे बहुत भाता था. उन्हें मैं विल्स कार्ड कह कर पुकारता......) |
भाव कब किस वक्त किस रुप में आयेंगे, कोई नहीं जानता. बस, एक कवि या लेखक उन्हें शब्द रुप दे देता है और बाकी लोग उसे वैसे ही भूल जाते हैं, जैसे वो आते हैं.
कभी कोई घटना, कोई दृष्य, कोई मौसम, कुछ भी एक नये भाव को जन्म देता है. कभी उन्हें विल्स कार्ड पर उतार लिया करता था, फिर माँ के जाने के साथ सिगरेट छूटी तो किसी भी कागज के टुकड़े पर उतारने लगा. जब कभी भी चूका, वो विचार कभी लौट कर नहीं आता. उन्हें सहेजना होता है.
वैसे ही जैसे जीवन में रिश्तों को प्रगाढ़ करने के मौकों के महत्व को, सफलता के मौकों को, सहेजना होता है..बस, जरा चूके और वो फिर नहीं लौटते. बच रहता है एक खोया खोया अहसास और कुछ चूक जाने का अपराध बोध.
सोचता हूँ कितना साम्य है मन में उठते भावों और इनमें. जीवन में सहेजने का कितना महत्व है. शायद सफल जीवन की यही कुँजी है.
जिन भावों को सहेजा, वो आज मेरी धरोहर हैं. खंगालता हूँ उन्हें और लौट पड़ता हूँ उस वक्त में. कभी एक मुस्कराहट उठती तो कभी आँसू. जो भी हो, एक सुखद अहसास देती हैं. बस, उन्हीं में कुछ:
-१-
कल रात
चाँद ने शरारत से
मुझे ताका...
और
मेरी उस लाल डायरी में
आ छिपा
बिल्कुल
तुम्हारी तरह...
फिर रात अँधेरी गुजरी.
-२-
रात काली
मावस की,
मुझे
कोई फर्क नहीं पड़ता...
तुम्हारे बाद
अब कोई
तलाश बाकी नहीं!!
-३-
पाई है किताबों से
तालीम
चलाने की नौकरी...
और
बाहर उसके
सीख रहा हूँ रोज
कुछ नया
हर कदम
एक नई तालीम
जीवन से
जीवन चलाने की...
आधा अधूरा
यह पाठ
कब पूरा होगा??
-४-
याद है तुमको
जब बरसों पहले
सार्दियों में तुम मुझको
चली गई थी छोड़ कर
उस बरस
गिर गया था
आँगन वाला
आम का पेड़
और
बच रहा था
एक ठूंठ!!
देखता हूँ
इतने बरसों बाद
अबकी
उसमें कुछ हरी हरी पत्तियाँ निकल आई हैं..
क्या तुम आने को हो?
-५-
पत्थर से पानी निकालने
की
जुगत में
उसने छैनी जमा
जैसे ही हथौड़ा चलाया
नौसिखाया था
पानी तो नहीं निकला..
अपने हाथ पर उसने
एक गहरा जख़्म पाया...
-६-
कड़े परिश्रम के बाद मिली
चिलचिलाती धूप में
माथे से बहती पसीने की धार..
कर्मों के प्रतिफल की आशा में
शुष्क कंठ के लिए
खारे पानी की बौछार...
-७- (बरसों बाद किसी कागज के टुकड़े पर उतरा)
चंद सीढ़ियाँ नीचे उतर कर
मेरे घर के तहखाने में
एक पुराना
सितार रहता है..
गूंगा है,
कुछ बोलता नहीं.
माँ जिन्दा थी
तब बजाया करती थी...
अब घर में
कोई सुर नहीं सजते!!
-समीर लाल ’समीर’
















