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बुधवार, फ़रवरी 17, 2010

सहेजने का महत्व: विल्स कार्ड भाग ९

पहले की तरह ही, पिछले दिनों विल्स कार्ड भाग १ , भाग २ , भाग ३ ,भाग ४ , भाग ५ भाग भाग और भाग को सभी पाठकों का बहुत स्नेह मिला और बहुतों की फरमाईश पर यह श्रृंख्ला आगे बढ़ा रहा हूँ.

(जिन्होंने पिछले भाग न पढ़े हों उनके लिए: याद है मुझे सालों पहले, जब मैं बम्बई में रहा करता था, तब मैं विल्स नेवीकट सिगरेट पीता था. जब पैकेट खत्म होता तो उसे करीने से खोलकर उसके भीतर के सफेद हिस्से पर कुछ लिखना मुझे बहुत भाता था. उन्हें मैं विल्स कार्ड कह कर पुकारता......)

भाव कब किस वक्त किस रुप में आयेंगे, कोई नहीं जानता. बस, एक कवि या लेखक उन्हें शब्द रुप दे देता है और बाकी लोग उसे वैसे ही भूल जाते हैं, जैसे वो आते हैं.

कभी कोई घटना, कोई दृष्य, कोई मौसम, कुछ भी एक नये भाव को जन्म देता है. कभी उन्हें विल्स कार्ड पर उतार लिया करता था, फिर माँ के जाने के साथ सिगरेट छूटी तो किसी भी कागज के टुकड़े पर उतारने लगा. जब कभी भी चूका, वो विचार कभी लौट कर नहीं आता. उन्हें सहेजना होता है.

वैसे ही जैसे जीवन में रिश्तों को प्रगाढ़ करने के मौकों के महत्व को, सफलता के मौकों को, सहेजना होता है..बस, जरा चूके और वो फिर नहीं लौटते. बच रहता है एक खोया खोया अहसास और कुछ चूक जाने का अपराध बोध.

सोचता हूँ कितना साम्य है मन में उठते भावों और इनमें. जीवन में सहेजने का कितना महत्व है. शायद सफल जीवन की यही कुँजी है.

pen

जिन भावों को सहेजा, वो आज मेरी धरोहर हैं. खंगालता हूँ उन्हें और लौट पड़ता हूँ उस वक्त में. कभी एक मुस्कराहट उठती तो कभी आँसू. जो भी हो, एक सुखद अहसास देती हैं. बस, उन्हीं में कुछ:

-१-

कल रात

चाँद ने शरारत से

मुझे ताका...

और

मेरी उस लाल डायरी में

आ छिपा

बिल्कुल

तुम्हारी तरह...

फिर रात अँधेरी गुजरी.

-२-

रात काली

मावस की,

मुझे

कोई फर्क नहीं पड़ता...

तुम्हारे बाद

अब कोई

तलाश बाकी नहीं!!

-३-

पाई है किताबों से

तालीम

चलाने की नौकरी...

और

बाहर उसके

सीख रहा हूँ रोज

कुछ नया

हर कदम

एक नई तालीम

जीवन से

जीवन चलाने की...

आधा अधूरा

यह पाठ

कब पूरा होगा??

-४-

याद है तुमको

जब बरसों पहले

सार्दियों में तुम मुझको

चली गई थी छोड़ कर

उस बरस

गिर गया था

आँगन वाला

आम का पेड़

और

बच रहा था

एक ठूंठ!!

देखता हूँ

इतने बरसों बाद

अबकी

उसमें कुछ हरी हरी पत्तियाँ निकल आई हैं..

क्या तुम आने को हो?

-५-

पत्थर से पानी निकालने
की
जुगत में
उसने छैनी जमा
जैसे ही हथौड़ा चलाया
नौसिखाया था
पानी तो नहीं निकला..
अपने हाथ पर उसने
एक गहरा जख़्म पाया...

-६-

कड़े परिश्रम के बाद मिली
चिलचिलाती धूप में
माथे से बहती पसीने की धार..

कर्मों के प्रतिफल की आशा में
शुष्क कंठ के लिए
खारे पानी की बौछार...

-७- (बरसों बाद किसी कागज के टुकड़े पर उतरा)

चंद सीढ़ियाँ नीचे उतर कर

मेरे घर के तहखाने में

एक पुराना

सितार रहता है..

गूंगा है,

कुछ बोलता नहीं.

माँ जिन्दा थी

तब बजाया करती थी...

अब घर में

कोई सुर नहीं सजते!!

-समीर लाल ’समीर’

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रविवार, दिसंबर 27, 2009

रुक जाना मौत है- विल्स कार्ड ८

पहले की तरह ही, पिछले दिनों विल्स कार्ड भाग १ , भाग २ , भाग ३ ,भाग ४ , भाग ५ भाग और भाग को सभी पाठकों का बहुत स्नेह मिला और बहुतों की फरमाईश पर यह श्रृंख्ला आगे बढ़ा रहा हूँ.


(जिन्होंने पिछले भाग न पढ़े हों उनके लिए: याद है मुझे सालों पहले, जब मैं बम्बई में रहा करता था, तब मैं विल्स नेवीकट सिगरेट पीता था. जब पैकेट खत्म होता तो उसे करीने से खोलकर उसके भीतर के सफेद हिस्से पर कुछ लिखना मुझे बहुत भाता था. उन्हें मैं विल्स कार्ड कह कर पुकारता......)

आज दराज तलाशी का दौर चला और कुछ और विल्स कार्ड हाथ में उठाये. गर्द उड़ाते याद आया कि साल बदलने को है. २००९ विदा लेने वाला है और २०१० आने को है.

गर्द उड़ती है तो एक चित्र खींचती है यादों का. गर्द शायद होती ही इसलिए है. यादें इसी तरह ही सिद्ध है वरना उनकी क्या महत्ता.

 

dust-storm

हम हर नये दिन, हर नये पल, हर नये साल से एक नई उम्मीद पाल लेते हैं. शायद यही जीने की वजह देता हो, मेरा ऐसा सोचना. मगर जब अपने कुछ दशकों पहले लिखे इन कार्डों पर नजर डालता हूँ तो ऐसा लगता है कि अभी भी वहीं खड़ा हूँ, कहीं कुछ नहीं बदला.

महसूस किया है मैने कि बदलता कुछ नहीं. बस बदलती रहती हैं हमारी आशायें, हमारी उम्मीदें और हमारे इर्द गिर्द का माहौल. शायद यही सफल जीवन का रहस्य हो, कौन जाने.

जिन्दगी रुकती नहीं. आगे बढ़ना जीवन है, रुक जाना मौत और पीछे लौटकर जीना, मूर्खता.

अक्सर ही हम बीते समय के लिए सोचते हैं कि वो समय बेहतर था..मगर याद करें तो उस समय भी हमें पीछे ही बेहतर महसूस होता था. आगे तो हमने देखा नहीं, महसूसा नहीं मगर वो आगे आने वाला समय ही फिर जब वर्तमान बनता है, तो जुझने की मशक्कत रास नहीं आती और जब वो भूतकाल बन जाता है तो याद आता है कि बेहतर था. यह विडंबना है, एक उलझन है, जो जीवन के साथ जुड़ी है और इसी का नाम जीवन है.

इन्हीं सब उहापोह के बीच, अब कुछ विल्स कार्ड जो हाथ आये आपकी नजर:

-१-

बरसात

उस रोज

मैं घर आया

बरसात में भीग

भाई ने डॉटा

’क्यूँ छतरी लेकर नहीं जाते?’

बहन ने फटकारा

’क्यूँ कुछ देर कहीं रुक नहीं जाते’

पिता जी गुस्साये

’बीमार पड़कर ही समझोगे’

माँ मेरे बाल सुखाते हुए

धीरे से बोली

’धत्त!! ये मुई बरसात’


-(एक अंग्रेजी वाक्यांश से प्रभावित)-

-२-

मेरे पास
बतलाने को
इतना कुछ है...

और

वो
एक प्रश्न लिए
जाने कहाँ
भटक रहा है!!!

-३-

गुलाब की चाह

और

कांटो से गुरेज...

जरुर, कोई मनचला होगा!!

-४-

चाँद और तुम!!
----------------

कल रात

एकाएक

पूरे चाँद ने

मुझे

मेरे कमरे की खिड़की से

घूरा...

मैने डर कर

तुम्हारी तस्वीर

छिपा दी....

क्या जबाब देता उसे??

बताओ न!!

अब

तुम्हारी

तस्वीर नहीं मिल रही!!

क्या जबाब दूँगा तुम्हें??

चाँद भी कहीं

बादलों की ओट में

जा छुपा!!!

-५-

हम कहे

तो कुछ और...

और

वही बात

तुम कहो..

तो कुछ और!!!

ये कैसी विडंबना है???

-६-

सांप पालने का शौक है

तो

सांप पालने के

गुर भी जानता होगा!!

ये कोई शिगूफा तो नहीं!!!

-७-

अर्थ बदल जाते हैं

शब्दों के

वक्त के साथ..

फिर

इन्सान की क्या बिसात...

मासूम बालक

शीर्षक में

प्रथम आया

उस बच्चे का चित्र...

२५ साल बाद

सबसे खौफनाक आदमी

शीर्षक में भी

प्रथम.....

ये विडंबना नहीं,

कर्मों का परिणाम है...

दुनिया

इसी का नाम है!!!

-समीर लाल ’समीर’

 

नोट: नव वर्ष की बहुत बधाई एवं हार्दिक शुभकामनाएँ.

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रविवार, नवंबर 29, 2009

मैने क्या खास किया!!!-विल्स कार्ड भाग ७

 

पहले की तरह ही, पिछले दिनों विल्स कार्ड भाग १ , भाग २ , भाग ३ ,भाग ४ , भाग ५  और भाग को सभी पाठकों का बहुत स्नेह मिला और बहुतों की फरमाईश पर यह श्रृंख्ला आगे बढ़ा रहा हूँ.

(जिन्होंने पिछले भाग न पढ़े हों उनके लिए: याद है मुझे सालों पहले, जब मैं बम्बई में रहा करता था, तब मैं विल्स नेवीकट सिगरेट पीता था. जब पैकेट खत्म होता तो उसे करीने से खोलकर उसके भीतर के सफेद हिस्से पर कुछ लिखना मुझे बहुत भाता था. उन्हें मैं विल्स कार्ड कह कर पुकारता......)

आज फिर छुआ कुछ और विल्स कार्डों को...जाने कब कब और क्या क्या दर्ज किया था. क्या सोच रहा था उस वक्त. अब तो चित्र भी नहीं खींच पाता.

लेकिन मेरे जीवन में भी तो जाने कितनी घटनायें ऐसी हैं जिनका चित्र अगर कोशिश भी करुँ तो नहीं बना सकता. सोचते ही असहज हो जता हूँ.

कुछ ऐसे वाकिये जिन पर अब तक सहज विश्वास नहीं होता, गुजर गये और मैं देखता रहा चुपचाप. क्या कहता? विरोध करता? करता तो अपनों को ही बदनाम करता और सुनता कि आपके वो...ऐसा कर गये...जुड़ता तो मुझसे ही आकर. मौन सिद्ध रहा. बदनामी बची. पहले मेरी और फिर उनकी.

उन्होंने भी पहचाना. बस, स्वीकारा नहीं. उससे मुझे कोई फरक नहीं पड़ता. मुझे इतना काफी है कि पहचाना. मगर मेरे काफी को दुनिया नहीं समझती. वो उसे समझती है जो दिखता है. मेरे बस में नहीं ऐसा कुछ दिखाना...

तुम्हारे बस में है. गुजारिश है कि गर अपमानित न महसूस करो तो दिखा देना कुछ ऐसा करके जो सिद्ध करे वरना मैं तो यूँ भी जी लूँगा...सच में..संतुष्ट..जानता हूँ कि तुम इस बात को पहचानते हो!! है न!!

कोई अपराध बोध तुम पालो-यह मेरे लिए बर्दाश्त नहीं. प्लीज, ऐसा मत करना!!

मुझे तकलीफ होगी. तुम कहोगे नहीं मगर इससे तुम्हें भी तकलीफ होगी..मैं जानता हूँ.. रिश्ते टूटते है तो बिखरे किरचें दिखते नहीं मगर होते हैं जो कांच से गहरे चुभते हैं.

काँच मे अच्छाई है, टूटता है तो आवाज करता है और टूटन सी उपजी किरचें हैं वो दिख जाती हैं तो निकाली जा सकती हैं और वक्त घाव भर देता है..

रिश्तों की टूटन तो आवाज भी नहीं करती और इसकी किरचें तो बस सालती हैं जीवन भर....कोई तरीका नहीं इन्हें निकालने का सिवाय झेल कर इनके साथ जीने की आदत बना लेने के.

नासूर लिए भी तो लोग जीवन जी ही लेते हैं..मैने क्या खास किया!!!

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-१-

रिश्तों पर जमीं गर्द को
खुरच कर नहीं उधाड़ा करते..
खुरचने से जख्म छूट जाता है

और बस

एक आहत रिश्ता
सामने आ जाता है..

उन्हें आँसूओं की नमी से
भीगो कर
फुलाओ
और फिर
स्नेह रुपी मलमल से
साफ कर उबारो...

जो बिगड़ा था उसे भूल
सिर्फ भविष्य को सुधारो.

 

-२-

प्रेम
जैसे
पिंजड़े के भीतर कैद
पंछियों की आजादी..

कोई बेडियाँ नहीं...

बस, सामाजिक मर्यादाओं
के
दायरे हैं...
और उनके भीतर रहते
एक उन्मुक्त उड़ान का अहसास!!

 

-३-

सफेद गुलाब
मुझे लुभाते हैं..
और
लाल गुलाब
न जाने क्यूँ
विचलित कर जाते हैं...

देखी थी एक रोज मैने
लाल सूर्ख खून से लथपथ
उस बच्ची की लाश
टीवी पर..
जिसे बलात्कार कर
मार दिया गया....

 

-४-

आजाद सोच की

ये कैसी गिरफ्त है...

जो

आजाद ही नहीं होने देती ...

इतना आसान तो नहीं

इस जिन्दगी को

जी जाना!!

 

-५-

वो आया था
दिन भर की मशक्कत के बाद
पसीने में लथपथ

कुछ देर ठहरा
फिर चला गया!!

उसके पसीने की बू
अब भी ठहरी है
अपनी ललकार लिए!!

सफलता यूँ ही तो
हासिल नहीं होती!!

 

-६-

ओह!!

कितना विस्तार

है इस सागर का...

सौम्य और शान्त

जाने कितना गहरा होगा...

उतरूँ

तो जानूँ...

 

-समीर लाल ’समीर’

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बुधवार, अक्टूबर 21, 2009

वो झिलमिलाती यादें: विल्स कार्ड भाग ६

पहले की तरह ही, पिछले दिनों विल्स कार्ड भाग १ , भाग २ , भाग ३ ,भाग ४ और भाग ५ को सभी पाठकों का बहुत स्नेह मिला और बहुतों की फरमाईश पर यह श्रृंख्ला आगे बढ़ा रहा हूँ.

(जिन्होंने पिछले भाग न पढ़े हों उनके लिए: याद है मुझे सालों पहले, जब मैं बम्बई में रहा करता था, तब मैं विल्स नेवीकट सिगरेट पीता था. जब पैकेट खत्म होता तो उसे करीने से खोलकर उसके भीतर के सफेद हिस्से पर कुछ लिखना मुझे बहुत भाता था. उन्हें मैं विल्स कार्ड कह कर पुकारता......)

कल शाम खिड़की के बाहर नजर पड़ी तो देखा कि आसमान एकदम पास तक उतर आया है. हाथ बढ़ा कर जितना मन चाहे तारे तोड़ लूँ और अपने पास रख लूँ.

हाथ बढ़ा कर कुछ तोड़े भी, मगर हाथ कुछ नहीं आया. बस वो आसमान के संग ही चमकते हैं. समेटो तो कुछ हाथ नहीं लगता. उन्हें देखना, अहसासना, उनकी सुन्दरता का लुत्फ उठाना-बस इतना ही है हमारे लिए. वो जहाँ हैं वहीं के लिए हैं. वहीं से अच्छे हैं-एक खुशनुमा अहसास देते. पास लाने की और समेट लेने की कोशिश में अहसास भी जाता रहेगा. बस फिर एक अंधेरा बच रहेगा.

कितना स्वाभाव एक सा है इन सितारों का और मेरी पुरानी गठरी में टंके उन यादों के सलमों का. जब जब समेटने की कोशिश करता हूँ, पास बुलाता हूँ. हाथ कुछ नहीं लगता. हाँ, एक खालीपन का नया अहसास और पा लेता हूँ.किस काम का है ऐसा खालीपन-वैसे ही जैसा बिना सितारों वाला घुप्प काला आसमान.

उन्हीं यादों में वो यादें भी शामिल हैं जो चन्द विल्स सिगरेट की खाली डिब्बियों से बने कार्डों पर शब्द रुप में अंकित हैं. जिन्हें मैं प्यार से विल्स कार्ड बुलाता हूँ. किन्तु अंकन तो बस एक दस्तावेज है बिल्कुल वैसा ही जैसे यह सब यादें मानस पटल पर दर्ज हैं झिलमिल झिलमिल सी.

दस्तावेज पलटता हूँ..मानस पटल पर टटोल कर देखता हूँ, एक सुखद अहसास होता है. मुस्कराता हूँ और फिर लौट आता हूँ अपने उस आज में जो कल फिर खुशनुमा यादों का हिस्सा बनेगा. शायद यही तरीका भी है जिन्दगी जीने का और उन खुशनुमा अहसासों को खुशनुमा रखने का.

आज फिर ऐसे ही कुछ दस्तावेज..ऐसे ही कुछ पलों की यादें, जब इन्हें न जाने क्या सोचते और न जाने किन स्थितियों में बम्बई की मायानगरी के उस हॉस्टल के रुम मेटों की भीड़ से भरे वीरान कमरे के किसी कोने में बैठ दर्ज किया था. तब से अब तक के जिन्दगी के एक लम्बे सफर के बाद भी ये यादें वहीं खड़ी हैं और अक्सर अपने नजदीक होने का अहसास, हाँ सुखद एहसास दिलाती हुई झिलमिलाती हैं.

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~१~

जब घर में
भीड़ भाड़ थी
हर तरफ कोलाहल
मैं खोजता था
एक कोना...
जहाँ सन्नाटा हो..
कोई आवाज नहीं..
बस मैं और मेरी सोच..

कुछ कोशिश के बाद
मिल भी जाता था
मुझे एक कोना ऐसा..

आज जब घर में
सिर्फ सन्नाटा है
और मैं खोज रहा हूँ
कोलाहल...
कुछ भीड़ भाड़..

बहुत कोशिश कर
हार जाता हूँ मैं
नहीं मिलता
मुझे कोई कोना ऐसा...

कैसी विडंबना है यह!!

क्या यही जीवन है??

~२~

सब को खुश रखने की
ख्वाहिश मे..

न जाने कितने
दुख पाये हैं मैने..

न जाने कितने
आंसू बहाये हैं मैने...

~३~

पहाड़ सी ऊँचाई से
नीचे देख

डर जाता हूँ मैं...

वहीं से आया
हूँ मैं..

कैसे भूल जाता हूँ मैं!!

~४~

एक छूअन का

अहसास

तेरी...

हर वक्त

साथ लिए

फिरता रहा हूँ मैं...

उठ उठ कर

न जाने क्यूँ

गिरता रहा हूँ मैं...

~५~

मुड़ कर देखता हूँ

जब भी..

तू ही नजर आती है...

सुना था

किसी से...

जिन्दगी

यूँ ही कहर ढाती है...

~६~

एक

अहसास

तेरे पास होने का...

झूठ ही सही..

अपने खास होने का...

-समीर लाल 'समीर'

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रविवार, अगस्त 16, 2009

जिन्दगी एक पज़ल: विल्स कार्ड भाग ५

पहले की तरह ही, पिछले दिनों विल्स कार्ड भाग १ , भाग २ , भाग ३ और भाग ४ को सभी पाठकों का बहुत स्नेह मिला और बहुतों की फरमाईश पर यह श्रृंख्ला आगे बढ़ा रहा हूँ.

(जिन्होंने पिछले भाग न पढ़े हों उनके लिए: याद है मुझे सालों पहले, जब मैं बम्बई में रहा करता था, तब मैं विल्स नेवीकट सिगरेट पीता था. जब पैकेट खत्म होता तो उसे करीने से खोलकर उसके भीतर के सफेद हिस्से पर कुछ लिखना मुझे बहुत भाता था. उन्हें मैं विल्स कार्ड कह कर पुकारता......)


विल्स कार्ड का एक और बंडल खींचता हूँ दराज मे से.

सोचने लगता हूँ उन्हें पढ़कर. जाने कैसे कैसे टुकड़ों को जोड़ जोड़ कर बनी है अब तक की यह जिन्दगी. बिल्कुल पज़ल के टुकड़ों सी. जो जहाँ लगना है वहीं लगेगा वरना पज़ल अधूरा ही रहेगा.

कब सोचा था कि ये जो मैं विल्स कार्ड के पीछे दर्ज कर रहा हूँ, आज किस वक्त की याद दिलायेगा. ये कार्ड ही तो मेरी जिन्दगी के पज़ल के टुकड़े हैं. वक्त की मार ने सब तितर बितर कर दिया. और फिर हर रोज कुछ नये जुड़ते भी तो जा रहे हैं. बस, जब कभी खुद से मिलने का मौका मिलता है, लगता हूँ सहेजने, बड़े जतन से, इन टुकड़ों को. कोशिश करता हूँ और थक हार कर सब फिर से आपस में मिलाकर वापस वक्त के झोले में भर कर रख देता हूँ सहेज कर दराज में. सोचता हूँ फिर कभी सही, कभी तो हल कर ही लूँगा.

जिन्दगी की पज़ल

मुझे लगता है कि जैसे भी हो, चाहे मशक्कत कर या यूँ ही सहज भाव से, नियमित जिन्दगी की घटनाओं को शब्द रुप दे सहेज लेना चाहिये. शायद आज, जब हम उसे दर्ज कर रहे हों, वो यूँ ही बेतरतीब सी बिखरी बातें लगें मगर वक्त के सांचे में ढल, जिन्दगी की कड़ी धूप में तप, एक दिन वो कंचन हो उभरेंगी और तब मेरी ही तरह सब लिख रहे होंगे-विल्स कार्ड पर उतरी बातें....

और हल करेंगे अपनी जिन्दगी की पज़ल. बिना किसी क्लू के. बस, एक धुँधलकी यादों के सहारे.

कुछ भी दफन नहीं होता. साथ साथ चलता है. बस, आज की चमक में दमित. मगर चमक कब तक? जब उतरेगी तो यही यादें और यही बातें, एकाकी मन का सहारा बनेंगी. विश्वास जानो!!!

तो आज वैसे ही किसी दौर में दर्ज कुछ विल्स कार्ड. लगता है दिल टूटने का मौसम रहा होगा, जब ये दर्ज हुए होंगे.

सभी के जीवन में तो ऐसे मौके आते हैं. कोई दर्ज कर लेता है और कोई सर झटक कर किनारा कर लेता है.

मैने दर्ज किये हैं तो पढ़वाने में कैसा गुरेज..


क्या सोचूँ, क्या याद रखूँ!!


*१*

काँच का गिलास गिरा

और

छन्न!! से टूट गया...

ये रिश्ते भी कितने नाजुक होते हैं!!



*२*


वो तेरी गर्म सांसों का अहसास

उन नाजुक लम्हों की याद....

आँसूंओं की बारिश थमती नहीं....

क्या बादलों ने कभी इश्क नहीं किया!!



*३*


मेरे सूने कमरे की

खिड़की से उतर आती है उसकी याद

हर रात

बैठ जाती है मेरे सिराहने

और

नींद आ जाती है मुझे

उन थपकियों के अहसास से...

काश!! तुम तुम नहीं, तुम्हारी याद होती!!


*४*


जिस दिन तुम गैर हुई....

मेरे कान उस दिन से

अब तक बहते हैं..

न जाने क्यूँ लोग-

शहनाई को सुरीला कहते हैं...


*५*


दिल की

तराजू में

तौल कर देखा है..

सबसे दुखद है

उसे चाहना

जिसने कभी तुम्हें चाहा था...


*६*


वक्त बेवक्त

खुद को खुद से

मिलवाता हूँ मैं...

डर जाता हूँ मैं..


*७*


इसे रोकूँ

उसे टोकूँ...

अक्सर पी कर

बहक जाता हूँ मैं...

आजकल बहुत

थक जाता हूँ मैं...

-सुना है, हालात बदलेंगे!!


*~*~*~*~*~**~*~*~*~*~*

--समीर लाल ’समीर’ Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, जुलाई 08, 2009

बाज़ार से गुजरा था, खरीदार नहीं था -विल्स कार्ड भाग ४

पिछले दिनों विल्स कार्ड भाग १ , भाग २ और भाग ३ को सभी पाठकों का बहुत स्नेह मिला और बहुतों की फरमाईश पर यह श्रृंख्ला आगे बढ़ा रहा हूँ.

(जिन्होंने पिछले भाग न पढ़े हों उनके लिए: याद है मुझे सालों पहले, जब मैं बम्बई में रहा करता था, तब मैं विल्स नेवीकट सिगरेट पीता था. जब पैकेट खत्म होता तो उसे करीने से खोलकर उसके भीतर के सफेद हिस्से पर कुछ लिखना मुझे बहुत भाता था. उन्हें मैं विल्स कार्ड कह कर पुकारता......)

आज उन्हीं विल्स कार्डों में से कुछ और, एक साथ एक पुराने रबर बैण्ड से बँधे निकाले. शायद एक ही मूड के होंगे इसलिये एक साथ बाँध दिया होगा.

हमारी यादों की दराज भी तो ऐसी ही होती है, एक मूड की यादें एक बस्ते में बंद एक दराज के अंदर.

मैं मुम्बई में गिरगांव रोड, ओपेरा हाऊस के सामने चर्नी रोड पर रहा करता था एक हॉस्टल में. दक्षिण मुम्बई का व्यापारिक इलाका, मुख्य चौपाटी से लगा हुआ. जो लोग बम्बई के भूगोल से वाकिफ हैं वो समझ जायेंगे कि मैं किस इलाके में रहता था और कुछ ही दूर पर बम्बई का नजारा क्या हैं. फॉकलैण्ड रोड, पीला हाऊस, कांग्रेस हाऊस का मुज़रा, ग्राण्ट रोड़, नाज़ सिनेमा के पास लेमिंग्टन रोड का बदनाम इलाका..सब मानो मेरे हॉस्टल को घेरे ले रहे हो. टहलने निकलो तो गाड़ियों की चिल्ल पौं के बीच तबलों की थाप और घुंघरुओं की छनक.

एकदम नजदीक से देखा है -द कांग्रेस हाऊस-कैनेडी ब्रिज से लगे कोठे और उस ब्रिज पर पर घूमते दलाल, आपको आपकी हैसियत से उपर का अहसास दिलाते- क्या साहब!! एन्जॉय करना मांगता क्या? ए क्लास गर्ल!! एक अजब सा अहसास होता...गिजगिजा सा..गर्ल-ए क्लास..ये कैसी डेफिनिशन..ईश्वर ने तो ऐसे नहीं गढ़ा था.हम मानव अपनी सुविधा से कैसा वर्गीकरण कर देते हैं और सब समझने भी लगते हैं..

अब जब सब आस पास है तो कैसे न सामना हो..कभी कुछ और कभी कुछ वजह मगर काफी करीब से जाना. एक पूरा अलग सा फलसफा है इस तरह की जिन्दगी का, गर समझो तो.

हॉस्टल के करीब जो कोठा था, उसकी मालकिन से तो उस राह से आते जाते एक पहचान सी हो गई..एक अपनापन सा..उसकी ढ्योरी चढ़ने की हम हॉस्टल में रहने वालों को इजाजत न थी. वो हम हॉस्टल के लड़कों को अपना बेटा मानती. इन्सान ही तो थी, दिल रखती थी एक अलग सा..धंधे से जुदा. जाने क्यूँ और कब सब अड़ोसियों पड़ोसियों की तरह उसे मौसी बुलाने भी लगा-गंगा मौसी. मेरी नजर में तो वो बस मौसी थी और बस मौसी..एक आदरणीया..जो प्यार देना जानती थी अपने बच्चों को!!

आज भी याद करता हूँ अक्सर उस गंगा मौसी को..जाने कहाँ होगी वो. उस बाजार में अस्तित्व की उम्र बहुत थोड़ी होती है.

उसी दौरान बहुत कुछ अहसासा-कभी यूँ ही गुजरते, कभी यूँ ही सोचते और अहसास शब्द बन उतरे विल्स कार्ड पर जबकि मौसी तो हमेशा रोकती थी सिगरेट पीने को. मगर वो यादें उन्हीं विल्स कार्डों पर सहेजी गईं, शायद मौसी भी ये न जानती थी वरना कभी मना न करती.

उसी माहौल और वातावरण को मद्दे नजर रख उस दौरान लिखे गये कुछ कार्ड, चौंकियेगा मत इस अँधेरे को देख कर!! अक्सर ही उजाले में खड़े हो लोग इस अँधेरे की तरफ देखने से कतराते हैं.

अहसास करिये पाक आत्मा की भावनाओं की उसी तह को जिनसे ये उभरी हैं:

आत्मा तो हमेशा पाक होती है..
ये मुए कर्म हैं
जो परिभाषित होते हैं -
सतकर्म और दुष्कर्म में.


खिड़कियों से झांकती आँखें

और

एक जिन्दगी यह भी

*१*

कारों के चलने की आवाज
बसों की घरघराहट
उनके भोपूंओं का चिल्लाना
समुन्दर की लहरों की हुंकार
और उनके बीच
गुम होती
उस लड़की की चीख...
इस शहर में एक अजब
दम घोटूं
सन्नाटा है!!


*२*

वो
कातर निगाहें
जाने किस आशा से
खिड़की पर खड़ी
मुझे देखती रहीं ..
और
मैं
पूर्ण स्वस्थ
युवा
एकाएक
कर पाया
अपनी नपुंसकता का अहसास!!

*३*

कुछ सपने
वहाँ भी दिखते होंगे
कुछ अरमान
वहाँ भी जगते होंगे
जो दम तोड़ते होंगे
उस ६ बाई ६ के कमरे में
हर नये ग्राहक के
बोझ तले दब कर!!

हाय! कितनी छोटी उम्र है...

उन सपनों की
उन अरमानों की
बिल्कुल
उस ६ बाई ६ के
कमरे की तरह!!


*४*

वो
तबलों
और
हारमोनियम के साथ
थिरकते घुंघरुओं की आवाज..

वो फूलों की महक
और
इत्र की तीखी खुशबू..

वो खामोश उदासी..

वो मजबूरी की सड़ांध...

-बाज़ार से गुजरा हूँ आज!!


*५*

मजबूरियों की बेडियाँ

लोहे की बेडियों से

मजबूत देखी है मैने..

खिड़कियों से झांकती

कितनी ही आँखें

मजबूर देखी हैं मैने..

*६*

सोचती है

कहीं कुछ

रियाज़ में कमी होगी..

वरना

उसकी अदाओं से रीझे

सब चले आते हैं..

नहीं आती तो बस

मुई!! मौत नहीं आती...

रियाज़ कुछ बढ़ाना होगा!!


*७*


वो नाम बताती है

शमा!!

दूसरी वाली

शन्नो!!

तीसरी

लाजो!!

ये वो बाज़ार है

जहाँ तन बिकता है...

नाम में क्या रखा है?

शेक्सपीअर याद आते हैं!!

*

चित्र साभार: गुगल Indli - Hindi News, Blogs, Links