रविवार, मई 17, 2009

जिन्दगी की बैलेंस शीट पर ’प्रेमी’ से ’समीर’ के बदलते हस्ताक्षर

पिछली पोस्ट में जब मैने ’विल्स कार्ड’ वाली रचनाओं का जिक्र किया, आप सबके स्नेह ने मुझे अभिभूत कर दिया. मजबूर हो गया कि उस ’विल्स कार्ड’ के बंडल में से कुछ और कार्ड खिंचूँ, जो इस बार भारत से ढ़ूँढ़ कर लाया हूँ.

अभी पहला ही कार्ड पढ़ रहा था कि लगा: अरे, आज के मायने में इसका क्या अर्थ होगा?? वो पंक्तियाँ जो समीर लाल ’प्रेमी’ ने लिखीं थी, उसे समीर लाल ’समीर’ बढ़ाकर आज तक ले आये वजन आँकते हुए.

जब समीर लाल ’प्रेमी’ थे तो हॉस्टल के कमरे में दोस्तों को कविता झिलवाते थे:



अब, समीर लाल ’समीर’ हो कर रेडियो मिर्ची से झिलवाते हुए:




यकीं जानें, रचना का पहला हिस्सा जो समीर लाल ’प्रेमी’ ने ’विल्स कार्ड’ पर उकेरा था, वो जस का तस है और फिर आगे समीर लाल ’समीर’ नें सिर्फ एक आंकलन किया है.

यूँ तो पहले ख्याल आया कि फॉण्ट का रंग जुदा रखूँ ’प्रेमी’ और ’समीर’ में भेद करने को..मगर मैं खुद नहीं जानता कि कब वो अल्लहड़ ’प्रेमी’ इस संवेदनशील ’समीर’ में बदल गया और उनके बीच जिन्दगी ने रंग नहीं जुदा किये तो फिर मैं कौन होता हूँ उनके बीच भेद खड़ा करने वाला.

हालांकि मैने कोई भेद नहीं किया है फिर भी आप जान जायेंगे कि किस पंक्ति से समीर लाल ’समीर’ ने कलम थामी. ये मेरा दावा है.





हॉस्टल की
चौथी मंजिल पर स्थित
अपने कमरे की खिड़की
से बाहर देखता हूँ..

मौसम आज कुछ गीला है
न जाने क्यूँ...
मैं तो आज रोया भी नहीं..

दूर नीले आसमान में
दिखाई देता है...
मेरी याद में रोता हुआ
वो चेहरा
माँ का..

घर की पीछे वाली बिल्डिंग की
छत पर इन्तजार में
खड़ी वो..

और

बेटे की सफलता
के लिए आशांवित, आँखें,
पिता की....

जला लेता हूँ सिगरेट, मैं..

खिंच जाता है
धुऐं का परदा सा,
बीच में,
मेरे और आसमान के..

और याद आता है
मुझे अपना कैरियर..
जिसे संवारने के लिए
आ गया हूँ
घर से दूर
बम्बई!!

लौट आती है सोच
धरातल पर ..

अगले हफ्ते ही तो इम्तिहान है
सी ए फाईनल का..
पहला परचा..
एकाउन्टिंग...

नफा हो या नुकसान
बैलेंस शीट के दोनों पाले
तो बराबर करने ही होंगे
इम्तिहान पास करने के लिए...

आज इतने बरसों बाद
अपनी जमीं से इतनी दूर..
जब जिन्दगी की
बैलेन्स शीट पर नजर डालता हूँ..
दोनों पाले बराबर दिखते हैं...
और
नया जमाना
भौतिक सम्पन्नता को
सफलता का पैमाने माने
चार्टर्ड एकाउन्टेन्ट बना
मेरी जिन्दगी की बैलेन्स शीट को
सत्यापित करता है..

शायद इसीलिए
मैं सबकी नजरों में
जिन्दगी के इम्तिहान में
सफल नजर आता रहा...

सिर्फ मैं जानता हूँ...
नहीं..
हर रोज की तरह..
आज झूठ नहीं कहूँगा..

सब विंडो ड्रेसिंग* है!!!

मैं भी नहीं जानता..

नफा हुआ
या
नुकसान!!

-समीर लाल ’प्रेमी’ से समीर लाल ’समीर’ तक

* विंडो ड्रेसिंग- बनावटी आधार पर कम्पनी की स्थितियाँ सुदृढ़ दिखाने और अनियमितताऐं छिपाने के लिए बैलेंस शीट में किये गये उपाय. (राजू वाली सत्यम- ताजा उदाहरण)

सोचता हूँ कि

-कुछ नहीं बदला है न ’प्रेमी’ और ’समीर’ हो जाने में. बदला है सिर्फ नज़रिया और उद्देश्य. तब सीए का इम्तिहान पास करने की मशक्कत थी और आज जिन्दगी का इम्तिहान.

-हम सभी की जिन्दगियों की बैलेन्स शीट तो विन्डो ड्रेस्ड हैं, काश!! हम इस विन्डो ड्रेसिंग से उबर पाते. उस पार तो विदाउट ड्रेस ही जाना है, फिर ये आडंबर क्यूँ. शायद, यही जीने का सलीका हो और वो मरने का!!! मैं तो कुछ भी नहीं जानता, कितना बेवकूफ हूँ मैं!! Indli - Hindi News, Blogs, Links

70 टिप्‍पणियां:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

यह कविता तो आत्म कथ्य है।

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

...और ज़िन्दगी के इम्तिहान कभी ख़त्म होते भी नहीं हैं.

Prem Farrukhabadi ने कहा…

मौसम आज कुछ गीला है
न जाने क्यूँ...
मैं तो आज रोया भी नहीं..

डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल ने कहा…

बहुत सशक्त अभिव्यक्ति. बधाई.

Gagan Sharma, Kuchh Alag sa ने कहा…

सफलता पाने के लिये कितना कुछ खोना पड़ता है। कौन समझ पाता है खोने वाले या खो देने वालों के सिवा।

गिरीन्द्र नाथ झा ने कहा…

समीर लाल प्रेमी ही रहे त अच्छा है। फोटू सब अच्छा है खासकर होस्टल में कविता झेलवाते हुए। वक्त बदलने के साथ आपका आकार भी बदलता गया.....

योगेन्द्र मौदगिल ने कहा…

मुझे अपना एक शेर याद आ गया
आपको समर्पित करता हूं कि-

'यादें जंगल जैसी क्यों हैं
उलझा-उलझा सोच रहा हूं'

खैर...
आपकी मनःस्थिती महसूस रहा हूं..

संगीता पुरी ने कहा…

ओह .. इसी रचना से आप समीर लाल ’प्रेमी’ से समीर लाल ’समीर’ तक पहुंचे .. जीवनभर सोंच के साथ साथ मनुष्‍य की पहचान भी बदलती रहती है।

Sudhir (सुधीर) ने कहा…

साधू। सशक्त एवं संवेदनशील अभिव्यक्ति... विशेष रूप से यह पंक्तियाँ बहुत कुछ कह गई

"...उस पार तो विदाउट ड्रेस ही जाना है, फिर ये आडंबर क्यूँ. शायद, यही जीने का सलीका हो और वो मरने का!!"

"मुकुल:प्रस्तोता:बावरे फकीरा " ने कहा…

बिल्डींग में तब्दीली मांगती है पोस्ट यूं "बिल्डिंग"
शेष चकाचक

"मुकुल:प्रस्तोता:बावरे फकीरा " ने कहा…

आपकी पोस्ट जोरदार है. इतिवृत्त आलेखन का तरीका /शैली मोहक है.
हॉस्टल की
चौथी मंजिल पर स्थित
अपने कमरे की खिड़की
से बाहर देखता हूँ..

मौसम आज कुछ गीला है
न जाने क्यूँ...
मैं तो आज रोया भी नहीं..
मन को छू गई

Anil Pusadkar ने कहा…

हां यही सच है हर कोई भिड़ा हुआ है विंडो ड्रेसिंग मे!हम भी लगे हुए है मगर चाह कर भी इससे मुक्त नही हो पा रहे।

woyaadein ने कहा…

आलेख सुन्दर, कविता अति सुन्दर. बहुत खूब कहा है आपने- "कुछ नहीं बदला है न ’प्रेमी’ और ’समीर’ हो जाने में. बदला है सिर्फ नज़रिया और उद्देश्य." जीवन की यही वास्तविकता है. समय के साथ साथ हमारी सोच, प्राथमिकताएं, सफलता के पैमाने सब कुछ बदलते जाते हैं. इसीलिए "परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत सत्य है" ऐसा कहा जाता है. और यह होना भी चाहिए क्योंकि "बहता हुआ जल सदैव ताजा एवं स्वच्छ बना रहता है जबकि रुका हुआ पानी सड़ांध मारने लगता है".साभार
हमसफ़र यादों का.......

Vijay Kumar Sappatti ने कहा…

sameer ji

main nishabd hoon aapki kavita padhkar .. aankhe kahin bahut bheeg gayi hai aur man udaas sa ho gaya hai .. ye to aatmkathan hai ...aapka aur hum jaise kai aur ka bhi

badhai kya doon .. aapko salaam karta hoon..

pls read my poems : http://poemsofvijay.blogspot.com

Regards,

Vijay

Rachna Singh ने कहा…

as always interesting all of us are prisioners of our own created images

P.N. Subramanian ने कहा…

आया. खोना और पाना, तस्वीर के दो पहलु ही तो हैं.

कुश ने कहा…

सब लोग लाईफ में विन्डो ड्रेसिंग ही तो करते है.. प्रेमी से समीर होते होते काफी वजन बढ़ गया.. मतलब की वजन बढ़ाना हो तो प्रेम कर लो :)

G M Rajesh ने कहा…

radio mirchi par the aur lagi kise mirchi pata chala kya?
apkaa lal hat gaya aur aap sameer rah gaye ? mere khyal me bachpan me hi yah naam ban jana tha ?

मीत ने कहा…

सच में समीर सर आपके द्वारा लिखी गई ये रचनाएँ अनमोल हैं...
इनका कोई मोल नहीं इससे ज्यादा तो में और कुछ नहीं कह सकता...
सच में दिल में एक हूक सी उठ रही है इन्हें पढ़ कर...
मीत

नीरज गोस्वामी ने कहा…

आप दोनों सूरतों में प्यारे हैं "प्रेमी" और "समीर" ...कोई फर्क नहीं पढता...अन्दर से इंसान वोही रहता है...वक्त हमें बाहर से बदल देता है बस...बहुत खूबसूरत पोस्ट...ज़िन्दगी की हकीकत के एक दम करीब...
नीरज

दिगम्बर नासवा ने कहा…

वाह समीर भाई...........अपनी ही नहीं बहुत सी जिंदगियों को उतार कर रख दिया है उड़न तश्तरी के कैनवास पर. बस थोडा थोडा मंच बदलता रहता है.

जला लेता हूँ सिगरेट, मैं..
खिंच जाता है
धुऐं का परदा सा,
बीच में,
मेरे और आसमान के..
जीवन मं ऐसे कई लम्हे आते हैं जब इन्सान खुद ही ये पर्दा खींच लेते है अपने आप से.........

आज इतने बरसों बाद
अपनी जमीं से इतनी दूर..
जब जिन्दगी की
बैलेन्स शीट पर नजर डालता हूँ..
दोनों पाले बराबर दिखते हैं...
चाहे सस्पेंस एंट्री डाल कर..........बैलेंस शीट तो मिलानी ही होती है समीर भाई.............अपने आप ही टेली बैलेंस शीट बनती रहे .ऐसा तो सब के साथ नहीं होता

सब विंडो ड्रेसिंग* है!!!
मैं भी नहीं जानता..
नफा हुआ
या
नुकसान!!
शायद जीवन यही है.........हर कोई कहीं न कहीं विंडो ड्रेसिंग करता ही है

पूरी की पूरी कविता दिल के करीब.......दिल को छूती हुयी जाती है .......... लाजवाब है..........प्रणाम गुरुदेव.............भाभी को भी हमारा प्रणाम

अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा…

अरे भाई साहब अद्भुत कविता।
ये उडन तश्तरी नाम बडा भ्रम पैदा करता है।

विनय ने कहा…

aha kyaa baat hai, wah recording waali tasweer se to chha gaye tusssiii...

नरेश सिह राठौङ ने कहा…

शरीर के साथ ही आपकी लेखनी मे भी भराव आया है ।

pallavi trivedi ने कहा…

आज इतने बरसों बाद
अपनी जमीं से इतनी दूर..
जब जिन्दगी की
बैलेन्स शीट पर नजर डालता हूँ..
दोनों पाले बराबर दिखते हैं...

मेरे ख्याल से इन पंक्तियों से " समीर" ने कलम थामी है!क्या मैं सही हूँ?

Mahesh Sinha ने कहा…

कुछ खोया कुछ पाया अंत समय आया तो सब बराबर

अभिषेक ओझा ने कहा…

दोनों सम्रीर में तुलना करना बेमानी है. दोनों बेस्ट !

ये कविता कई बातें सोचवा दे रही है.

कुलवंत हैप्पी ने कहा…

समय के साथ साथ नामों में, ख्यालों और सोच में फर्क आता है.. कुलवंत राय शर्मा, तो कभी कुलवंत राय अत्री आखिर कुलवंत हैप्पी हो गया...समीर लाल 'प्रेमी' से समीर लाल समीर हो गया. कुछ तो उड़न तश्तरी वाला समीर भी कहते हैं...

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

...शायद इसी खोने और पाने के बीच में भी कहीं कुछ छिपा हुआ सा है........

विनीता यशस्वी ने कहा…

kavita bahut achhi hai...

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey ने कहा…

पता नहीं हम, हम बने रहने के लिये कितना बदलते हैं।
बाकी, "प्रेमी" भी पसन्द आये और "समीर" भी।

neeraj badhwar ने कहा…

बहुत खूब समीर जी।

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

बदला है सिर्फ नज़रिया और उद्देश्य. तब सीए का इम्तिहान पास करने की मशक्कत थी और आज जिन्दगी का इम्तिहान.

मुझे तो प्रेमी से समीर तक एक सह प्रवाह दिखाई दिया. शुभकामनाएं

रामराम.

पंकज सुबीर ने कहा…

ये पीछे की बिल्डिंग वाली लड़की क्‍या सबके ही जीवन में होती है । और ये समझ में नहीं आया कि ये लड़की घर की पीछे की बिल्डिंग, पीछे के मकान, पीछे के रास्‍ते पर ही क्‍यों होती है । क्‍योंकि पीछे वाली लड1की के साथ प्रेम करने में पिटने की संभावना कम होती है । आफत आये तो झट से अपने घर में घुस जाओ ।
खैर ये तो हुई मजाक की बात । कविता रंग समीर लिये हुए है । रंगे समीर । जिसको कि कहा जाता है भूरा और उदास रंग । रंग जो गर्मी की चटख दोपहर में आसमान का हो जाता है ।
फिर बधाई अपने ही ट्रेक पर एक और कविता के लिये ।

रंजना ने कहा…

क्या कहूँ....शब्द दूंढे नहीं मिल रहा...

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

दोनों समीर जी बेस्ट हैं जी बस थोडा सा वजन का फर्क है ..अब इतना तो बनता है :) कविता बहुत पसंद आई

SWAPN ने कहा…

sameer lal "premi" ki rachna pasand aai, badhai pahuncha den.

balance sheet to aapke man men chal rahi hai, assets and liabities, window dressing, sab kuchh aapke nazariye men qaid hai. sameer lal "sameer" ji lekh pasand aya.

अरविन्द चतुर्वेदी Arvind Chaturvedi ने कहा…

वाह! वाह!!
समीर भाई, बहुत गहरी सोच को प्रतिबिबित करती आपकी विल्ल्स कार्ड् की रचना किसी तारीफ की मोहताज़ नहीं है.
अद्भुत . में आपकी लेखनी का कायल हो गया.
क्या पता कब मुलाक़ात का अवसर आयेगा.

dhiru singh {धीरू सिंह} ने कहा…

आपकी बैलेंस शीट तो नेट प्रोफिट सहित है . आपने क्या खोया पता नहीं लेकिन हमने तो आपसे बहुत पाया है .

अनिल कान्त : ने कहा…

waah waah !!
'premi' se 'sameer' banne ka fark saaf jhalakta hai ...
yahi to hai zindgi

tab is tarah ki soch aur baatein kahan rehti hongi

Syed Akbar ने कहा…

आपको पढ़ते वक़्त ऐसा लग रहा है, मानो ज़िन्दगी आँखों के सामने एक श्वेत-श्याम चलचित्र की भांति चल रही है. जिसके हर फ्रेम में मैं और मेरी ज़िन्दगी है.

और याद आता है
मुझे अपना कैरियर..
जिसे संवारने के लिए
आ गया हूँ
घर से दूर
बम्बई!!

ये मेरी भी तो ज़िन्दगी है.....

Shefali Pande ने कहा…

मौसम आज कुछ गीला है
न जाने क्यूँ...
मैं तो आज रोया भी नहीं..
मन को छू गई....

समयचक्र - महेन्द्र मिश्र ने कहा…

वाह समीर जी
छोटी उम्र की बैलेस फोटो (कम भार) जिसमे आप अपनी रचनाये ठेल रहे है उसमे तो आप समीर जी तो कटाई नहीं लगते है . जो बड़े भार वाली फोटो दिखाई है और (इस) बड़ी उम्र की फोटो तो अब भी भार के साथ गजब ढा रही है और सभी चटकारे ले लेकर खूब पढ़ रहे है . रचना भी धाँसू लगी .

मीनाक्षी ने कहा…

जब तक ज़िन्दगी है तब तक इम्तिहान हैं...
प्रेमी और समीर के दोनो रूप अच्छे लगे...क्योंकि मन तो एक ही है उनमें..जिसके कारण एहसास सुन्दर भावपूर्ण शब्द चित्र पा लेते है.

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

मौसम आज कुछ गीला है
न जाने क्यूँ...
मैं तो आज रोया भी नहीं..
vaah.....kya kahoon in shbadon par!! salaam karti hoon.

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

हॉस्टल की
चौथी मंजिल पर स्थित
अपने कमरे की खिड़की
से बाहर देखता हूँ..
-----------
hamen bhi apne HOSTEL ki DOOSARI manjil yaad aai aur kai wo baaten jo ab GUDGUDAATI hain.

Manish Kumar ने कहा…

अच्छा लगा आपकी अपनी जिंदगी के इन पड़ावों को इन संवेदनशील नज़रों से देखना...

venus kesari ने कहा…

मौसम आज कुछ गीला है
न जाने क्यूँ...
मैं तो आज रोया भी नहीं..


वाह क्या बात है

वीनस केसरी

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` ने कहा…

प्रेमी से भावप्रवण कवि मेँ तब्दील हुए समीर लाल समीर जी के लेखन के हम फैन हैँ - जय हो !!
- लावण्या

डॉ .अनुराग ने कहा…

देरी से आने के लिए मुआफी .कल भी शाम को कुछ के ब्लॉग ही टिपिया पाया था......आपकी कविता मुझे आपकी श्रेष्ठ रचनाओ में से एक लगी .सचमुच......यही वो प्रेमी है .जो अभी तक साँस लेता है आपके भीतर .ओर यदा कदा ....बाहर आता है .....इसके आने जाने से रूटीन ओर रफ होता इंसान जैसे टाइम मशीन में घूम घूम कर कुछ अनमोल लम्हों को पकड़ पकड के रोज सफ्हो पे उडेलता है .......
यही वो समीर जी है जो मुझे बेहद पसंद है .असल......

संध्या आर्य ने कहा…

बहुत खुब ...........कमाल की रचना

Science Bloggers Association ने कहा…

Aapke jeevan ka safarnama prernaprad hai.

-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

miracle ने कहा…

aapne to mirch lga di.bus aapko salaam......

miracle ने कहा…

sir, aap maere blog par bhi dastak de.vaise aap ek bar aap maere blog par dastak de chuke hai jab mae nya ...nya tha.

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi ने कहा…

बस नाम ही बदला है उतने ही प्रेमी उतना ही समीर...

एकरूपता के लिए साधूवाद समीरभाई।


पता नहीं इतने बसंत देखने के बाद मैं कैसा बन जाउंगा।

कंचन सिंह चौहान ने कहा…

सिर्फ मैं जानता हूँ...
नहीं..
हर रोज की तरह..
आज झूठ नहीं कहूँगा..

सब विंडो ड्रेसिंग* है!!!

मैं भी नहीं जानता..

नफा हुआ
या
नुकसान!!

आपकी कविताओं की किताब पाने के बाद यूँ भी आपकी कविताओं की मुरीद हो चुकी हूँ...!

उसी क्रम में यह भी..! बहुत संवेदनशील

anika arora ने कहा…

sir ji prem ka arth pyar or sameer ka arth hawa se judta hai to meri nazar ap wo pyaar bhari hawa hai jo har kisi ke pass jati hai, bahut badiya geela geeela aasman hai par aj mein roya bhi nahi, sundar

श्रद्धा जैन ने कहा…

Sach kahte hain kuch nahi badalta
bus imtihaan ke roop badalte hain

गौतम राजरिशी ने कहा…

जाने कैसे ये दोनों अद्‍भुत पोस्ट मिस कर गया था मैं...
प्रेमी समीर का ये अनूठा रूप मन मोह गया

Friends ने कहा…

bahut dino ke baad aap ke blog per aaya hoo. iske liya sorry. article aacha laga. insperation milta hai aap se.

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

बहुत अच्छा,समीर जी

वाह क्या याद किया,
वो बीते दिन अनमोल,
जिसका हर पल,
एक एक बीता हुआ कल,
कितनी मासूमियत से ये सच्चाई बयाँ करता है,

की जिंदगी है,जिसे हम जी लेते है,
बड़े ही अलग अलग अनुभवों से है भरी,
कभी सुखद अनुभूति,
का अहसास करती है,
कभी बन जाती है,कमजोर लम्हो की कड़ी.

फिर भी,कभी कभी जब,
दिल के दरवाजे पर ऐसे पल आते है,
हम सोचते है,सोचकर उन्ही पल मे डूब जाते है,
यादों की सुनसान गलियों मे,
एक हलचल से होने लगती है,
और हम खोने पाने की जद्दोजहद मे,
खुद को टटोलने लगते है.

पर किसने कहा,
हम खुद को बदलते है,
नही,
बस थोड़ा थोड़ा,
नज़रिया बदलने लगते है.
क्योंकि जिंदगी तब तक कुछ सीखा देती है,
और हम जिंदगी के बताए ही,
रास्तों पर चलने लगते है.

Archana ने कहा…

"चलती जब जिन्दगी की घडी,
क्यो रह जाती है माँ फ़िर खडी,
मुडकर पीछे देख रहे क्यों ,
जो तुमने भोगा होगा ,
अपने मन की खिड्की से देखॊ ,
मौसम आज भी गीला होगा ,
दूर नीला आसमान ही ,
याद में आज भी भीगा होगा ,
क्यों खींचते हो धुएँ का परदा ,
सब कुछ तो दिख जाता है ,
या कुछ भी न छुप पाता है ,
अन्दर था जो परदा वो भी ,
अब कुछ न ढँक पाता है ,
चाहे कहीं भी चले जाओ ,
या पूरी दुनिया घूम के आओ ,
इम्तिहान कभी न खतम होगा ,
पाले भी उसके बराबर हॊंगे ,
जिसमें पूरा दम होगा ,
बने रहो चाहे पहले-से "प्रेमी" ,
या "समीर " अब के हो जाओ ,
अब भी सब कुछ यहाँ हजम होगा !!!!!

PRAN SHARMA ने कहा…

SAMEER JEE,
GADYA TO GADYA AAPKA PADYA
BHEE BHAATAA HAI.DONO PAR AAPKEE
LEKHNEE BADE PYAR SE CHALTEE HAI.
VYANGYA TO AAPKAA MOOLMANTRA HAI.

Dileepraaj Nagpal ने कहा…

Aapki Ek Baat Dil Ko Choo Jati Hai Ki Aap Sabhi K Blog Per Jaker Unka Hosla Badhate Hain. Maa Se Door Hun, Hostel Me Hun To Kavita Padhkar Aankhe Nam Hona To Lazimi Tha...Baher Jaker Dekha TO Mousam Bhi Nam Ho Gya...
Shukriya Aapka

PREETI BARTHWAL ने कहा…

बीते कल की पुरानी यादें सामने लाये हैं आप, बहुत खूबसूरत पल हैं।

रविकांत पाण्डेय ने कहा…

जिस तरह रोज की राशिफल देखने की बेचैनी होती है, अब आपके विल्सकार्ड की बेचैनी रहने लगी है। अगर रोजाना न हो सके तो कम से कम एक साप्ताहिक स्थायी स्तंभ तो बना ही दीजिये अपने ब्लाग पर इसके लिये।

रवीन्द्र रंजन ने कहा…

सरल शब्दों में काफी कुछ बयान करती हैं ये पंक्तियां। अच्छा लगा पढ़कर।

Friends ने कहा…

Aap se likhne ka insperiation milta hai. main abhi thoda aanari hoo. kosis kar raha hoo dekhte hai aage kya hota hai. hausla badhate rahein.

rohitler ने कहा…

खूबसूरत इंतख़ाब

राजीव तनेजा ने कहा…

वक्त के साथ ज़िन्दगी के मायने बदल जाते हैँ...


अच्छा लगा आपको पढ कर