रविवार, जनवरी 31, 2010

ज्ञानदत्त जी की पगली पोस्ट से पगलिया तक

मैने पाया है कि श्री ज्ञानदत्त पाण्डे जी की मानसिक हलचल उनके लिए मानस में चाहे जो भी हलचल मचाती हो मगर उसका एक रुप दूसरे के मन में हलचल मचाने का हमेशा रहता ही है.

कभी मुझे लगता है कि अगर वो ब्लॉग और रेल नौकरी की बजाय राजनीति में हाथ आजमाते तो आज लालू उनके सामने पानी भर रहे होते. वो गेंद दूसरे के पाले में फेंक कर मुस्कराते हुए सामने वाले से शुद्ध हिन्दी में कहते हैं कि अब गेंद आपके पाले में है, नाऊ इट इज़ योर चांस. इज़ में ज के नीचे नुक्ता लगाना भी कभी नहीं भूलते. :)

देवनागरी में उर्दु का सम्मिश्रण कर अंग्रजी शब्दों से नये हिन्द का निर्माण का यह प्रारुप, हिन्दी के सशक्तिकरण का बोझा उठाये उनके कांधे के बोझ को गद्दीदार बना भाषाविद लोगों की लाठी सहने की क्षमता प्रदान करता होगा और वो सुगमता से रीडर्स डाईजेस्ट के हिन्दी संस्करण सर्वोत्तम के बंद होने का दोष हिन्द समाज को दे निकल जाते हैं बिना व्यवसायिक कारण का आंकलन किए, आखिर राजनित में कब किसने अपनी शुचिता और सुभिता के बाहर और उपर देख कुछ भी बोला है वरना क्या मजाल कि एक मंत्री कह जाये कि वह भविष्यवक्ता नहीं शक्कर के भाव बताने को और दूसरा कि मेरे पास जादू की छड़ी नहीं कि घुमाऊँ और मंहगाई खत्म?, बस वैसे ही इतना ही कि गेंद इज़ इन कोर्ट अगेन, खेलो!!

फिर क्या है, कोई मुद्दा पकड़ने गेंद के पीछे भाग रहा होता है तो कोई ज़ में नुक्ता देख ही मुदित हुआ बैठा होता है. मैं तो खैर संपूर्ण प्रक्रिया पर मोहित हूँ ही.

ऐसी ही एक गैंद उन्होंने टिप्पणी द्वार बंद कर ’पगली’ पोस्ट पर उछाली कि अगर आप कुछ सोचते हैं तो अपने ब्लॉग से कहें. वो कहते हैं कि:

’शायद यह पोस्ट मात्र देखने-पढ़ने की चीज है। यह पोस्ट आपकी सोच को प्रोवोक कर आपके ब्लॉग पर कुछ लिखवा सके तो उसकी सार्थकता होगी। अन्यथा पगली तो अपने रास्ते जायेगी। वह रास्ता क्या होगा, किसे मालूम!’

उस पगली की हालात देख कुछ मन में न घुमड़े, ऐसा कैसे हो सकता है लेकिन वहाँ तो टिप्पणी बंद है तो यहाँ से एक पूरी कथा. देखें और बतायें, यहाँ तो टिप्पणी चालू है.


पगलिया!!
pag

रेल्वे पटरी के पार उस बजबजाते नाले के किनारे कचरे के ढेर के पीछे पड़ी रहती है वह. वही उसका घर है. धरती बिछौना है तो आसमान छत. उम्र यही कोई २८ या २९ बरस की होगी. पन्नियाँ बिन कर एक छतरी सी तान ली है उसने बारिश से बचने के लिए. बस्स!

जोर जोर की आवाज में बहुत लय में गाना गाती है;

परदेशवा न जहिहा पिया, सावन में...
सावन में पिया, सावन में...

बादल गरजे हाय, बिजूरी चमके
पिया बिन जिया मोरा धक धक धड़के
धूँधटा न खोलूं पिया....
सावन में...

परदेशवा न जहिहा पिया, सावन में...
सावन में पिया, सावन में...

जाने कितने दर्द उतार देती है वह अपनी आवाज में इसे गाते. आँखें बहती रहती हैं और कंठ गाते रहते हैं..जैसे वो एक दूसरे से परिचित ही न हों!!

पता नहीं कौन सा दर्द समेटे है. जाने कैसे और किस आधात से पागल और विक्षिप्त हो भटकती यहाँ चली आई है. कोई नहीं समझ पाता है उसकी पीड़ा..बस, सब उसे पगलिया कहते हैं और हँसते हैं.

किसी भी इन्सान को नाले के पास आता देखती है, तो अजब अजब तरह की आवाजें निकालती, चिल्लाती और पत्थर फैकती है. दिन में एक दो बार स्टेशन के पास तक आती है. स्टेशन के करीब के ठेले वाले उसे जानने लगे हैं. लोगों का छोड़ा खाना उसे उठाने देते हैं. कुछ भी बचा खुचा फैंका हुआ खाकर वह फिर उसी नाले के किनारे चली जाती है और अपनी गंदी कुचेली जगह जगह से फटी साड़ी में लिपटी पड़ी रहती है. बिखरे बाल, मैल से भरा शरीर और चेहरा, पीले दांत. लोग बताते हैं कि पगली है.

आस पास खेलते छोटे बच्चों का झुंड जब उसे पगलिया पगलिया कह कर चिढ़ाता है तो वो उन पर ढेला फैकती है. सारे बच्चे हो हो कर हँस कर भागते हैं. उन बच्चों के लिए यह भी एक खेल ही है. बच्चों को समझ ही क्या?

कोई नहीं जानता है कि वो कौन है, कहाँ से आई है और कहाँ की रहने वाली है. गाने की भाषा से बस अंदाज ही लगता है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश में कहीं की रहने वाली है.

रोज ही देखता हूँ उसे स्टेशन के आस पास. कभी गाना गाते, कभी बच्चों को ढेला लेकर दौड़ाते, कभी खाना बीनते. मन में अनायास ही ख्याल आता है कि जाने कौन है? शायद वो भी मुझे रोज रोज देख पहचानने लगी है.

आज शाम जब स्टेशन के पास से गुजर रहा था तब वह हाथ में एक दोना लिए नाली की तरफ जाते जाते एकाएक मेरे स्कूटर से टकराते बची. मैने जोरों से ब्रेक मारा और अनायास ही वह बोल उठी, ’माफ करियेगा’.

मैं आवाक उस मैली कुचैली काया को देखता रह गया और वो दौड़ कर नाले के किनारे चली गई और जोर जोर से जाने क्या क्या बड़बड़ाने लगी.

घर लौटा मगर उसकी वह आवाज मेरा पीछा करती रही, ’माफ करियेगा’.

मन यह मानने को तैयार ही नहीं है कि वह कोई पगलिया है. रात बड़ी देर तक सोने की कोशिश करता रहा लेकिन नींद जाने कोसो दूर चली गई.

बार बार मन में एक ही ख्याल कौंधता रहा कि आखिर वो कौन है और क्या है उसकी मजबूरी?

खिड़की से देखता हूँ आकाश में सूरज निकलने की तैयारी में है और रात सूरज के तेज में तार तार हो अपना अस्तित्व खोती जा रही है.

ख्याल उठता है उस पगलिया का. कहीं इस वहशी दुनिया से अपने अस्तित्व और आबरु की रक्षा के लिए तो यह रुप नहीं धर लिया उस वक्त की मारी ने?

पागलों की दुनिया की पागल नजरों से बिध कर पागल हो जाने से बेहतर पागल बने रहना ही पगलिया को बेहतर विकल्प नजर आया होगा, इसे पागलपन की बजाय समझदारी कहना भी कहाँ तक गलत होगा.

कौन जाने!!

इस वहशी दुनिया की, नजरों से बचने को
कितनी मजबूर है वो, ऐसे स्वांग रचने को

-लोग उस अबला को, पगलिया कहते हैं?

-समीर लाल ’समीर’

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बुधवार, जनवरी 27, 2010

कहते हैं मेरी माँ की ५वीं पुण्य तिथि है आज!!

आज माँ को गये पूरे ५ बरस हो गये. लगता है कल ही बात हुई थी.

जाने के एक दिन पूर्व ही फोन से बात हो रही थी. तब सोचा भी नहीं था कि यह बात आखिरी बार हो रही है. भोपाल जा रहीं थी. तय पाया था कि परसों लौट कर फिर बात होगी. वो परसों कभी नहीं आया. भोपाल में ही हार्ट अटैक आया और वो नहीं रही.

भारत में रह रहे मेरे भाई, बहन, पिता जी और सारे परिवार के सदस्यों के साथ वो २८ जनवरी तक रही और मैं परिवार का छोटा, इसमें भी घाटे में रहा, मेरे लिए वो २७ को ही चली गई. हाँ, उस समय कनाडा में २७ तारीख थी और भारत में २८ का सबेरा. सब उसके साथ १२ घंटे ज्यादा रहे और मैं, उसे बाकी सबसे १२ घंटे पहले ही खो बैठा.

फोन आया था दोस्त का. तुरंत पिता जी को फोन लगाया. भोपाल में अस्पताल में थे माँ के पार्थिव शरीर के साथ, बस एक शब्द-हाँ. बाकी मौन सिर्फ अहसास की भाषा अगले ४ मिनट तक!!

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माँ-श्रीमति सुषमा लाल (२८ जनवरी, २००५)

लगता है कि कल ही उससे बात करता था. ये ५ साल, एक खालीपन, कब निकल गये मैं नहीं समझ पाया. अभी भी वो रोज मिलती है मुझे ख्वाबों में. कोई रात याद नहीं जब वो न आई हो. जाने क्या क्या समझाती है. मैं झगड़ता भी हूँ वैसे ही जैसे जब वो सामने थी... फिर नींद खुलने पर रोता भी हूँ मगर वो रहती आस पास ही है. तन से नहीं...मन से तो वो गई ही नहीं. चुप करा देती है. कोई जान ही नहीं पाता उसके रहते कि मैं रोया भी.

मैं उसके नाम के साथ स्वर्गीय लगाने को हर्गिज तैयार नहीं आज ५ साल बाद भी. वो है मेरे लिए आज भी वैसी ही जैसी तब थी जब मैं उसे देख पाता था. तुम न देख पाओ तो तुम जानो.

माँ कभी मरती है क्या...वो एक अहसास है, वो एक आशीष है, वो मेरी सांस है...उससे ही तो मैं हूँ..वो मेरी हर धड़कन में है..वो कोई एक तन नहीं जो मर जाये और हम उसे भूल जायें पिण्ड दान कर पुरखों में मिला कर.

विश्व की हर माँ सिर्फ माँ होती है और बस माँ होती है..भगवान की भी कहाँ इतनी बड़ी बिसात कि माँ बन पाये..भगवान होना अलग बात है!!! वो इससे बहुत उपर है.

आज २८ जनवरी है. भारत के हिसाब से उसकी पाँचवीं पुण्य तिथि. मेरे हिसाब से कल थी. खैर!! मैने इस घाटे से समझौता करना सीख लिया है.

माँ २८ को गई तो साधना के पिता उसके ठीक एक दिन बाद २९ जनवरी को. जब माँ गई तब साधना भारत से कनाडा आने के लिए जहाज में थी और जब यहाँ कनाडा में उतरी, तो उसके पिता जी ने दम तोड़ दिया ऐसी खबर आई.

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साधना के पापा-स्व.श्री के.एन. सिन्हा (२९ जनवरी, २००५)

हम दो दिन बाद भारत पहुँचे. न मुझे माँ के अंतिम दर्शन हुए और न उसे उसके पिता जी के.

बस, कभी हिसाब करने का मन करता है कि यहाँ आकर क्या खोया, क्या पाया!!

बिखरे मोती का विमोचन हुए बहुत समय नहीं बीता है. आज किसी को वही किताब भेंट करता था. माँ को समर्पित यह पुस्तक अनायास ही माँ की याद सामने ले आई, बस, कुछ पंक्तियाँ बह निकली..अनगढ़ सी...बिना सुधार मय आंसू पेश करता हूँ.

आज फिर रोज की तरह

माँ याद आई!!

माँ

सिर्फ मेरी माँ नहीं थी

माँ

मेरे भाई की भी

मॉ थी

और भाई की बिटिया की

बूढ़ी  दादी..

और

मेरी बहन की

सिर्फ माँ नहीं

एक सहेली भी

एक हमराज...

और फिर उसकी बेटियों की

प्यारी नानी भी वो ही...

उनसे बच्चों सा खेलती नानी...

वो सिर्फ मेरी माँ नहीं

गन्सु काका की

माँ स्वरुप भाभी भी

और राधे ताऊ की

बेटी जैसी बहु भी...

दादा की

मूँह लगी बहू

दादी की आदेशों की पालनकर्ता

उनकी परिपाटी की मूक शिष्या..

उन्हें आगे ले जाने को तत्पर...

और नानी की

प्यारी बिटिया

वो थी

अपनी छोटी बहिन और भाईयों की दीदी

और अपनी दीदी की नटखट छुटकी..

नाना का अरमान

वो राधा की सहेली ही नहीं

माँ सिर्फ मेरी  ही नहीं..

उसकी बेटी की भी

माँ थी...

माँ

कितना कुछ थी..

बस और बस,

माँ सिर्फ माँ थी..

हर रुप में..

हर स्वरुप में..

मगर फिर भी

सिर्फ मेरी ही नहीं...

माँ हर बार

सिर्फ माँ थी.

अब

माँ नहीं है

इस दुनिया में...

वो मेरे पिता की

पत्‍नी, बल्कि सिर्फ पत्‍नी ही नहीं

हर दुख सुख की सहभागी

उनकी जीवन गाड़ी का

दूसरा पहिया...

अब

पिता छड़ी का सहारा लेते हैं..

और फिर भी

लचक कर चलते हैं...

माँ!!

जाने क्या क्या थी

माँ थी

मेरा घर

वो गई

मैं बेघर हुआ!

--समीर लाल ’समीर’

माँ, क्या सचमुच तुझे गये ५ साल हो गये??

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रविवार, जनवरी 24, 2010

विकलांगता

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लँगड़ी है दादा जी की छड़ी

दीवार का सहारा लिए खड़ी है

गूँगा है माँ का सितार

तहखाने के कोने में उदास पड़ा है

अँधी है बाबू जी की ऐनक

धूल खाती पुस्तकों की आलमारी में..

 

ढो रहा हूँ इनका अस्तित्व

मैं एकमात्र जीवित उत्तराधिकारी

टूटने को तत्पर

अपने झुकते काँधों पर..

 

मेरी अगली पुश्तें मुक्त होंगी

इस पुश्तैनी विकलांगता को

ढोने के अभिशाप से..

 

इसलिये कि वे जड़ों से बहुत दूर

बहुत दूर जा बसी हैं

एक ऐसी दुनिया में जिससे

मैं जुड़ नहीं पाया कभी

जिसका मुझे कोई अनुभव नहीं..

 

फिर भी मुझे विश्वास है

पूर्णता देने वाले इन स्मृतिचिन्हों के साथ

मैं रहूंगा अपनी विकलांगता में खुश

अपने टूटे सपनों अधूरी इच्छाओं

और उखड़ी जड़ों के साथ!!

 


-समीर लाल ’समीर’

(नोट: इस रचना को अपनी पारखी नजरों से गुजारने और सुझावों के लिए मित्र शरद कोकस जी का आभार)

* गणतंत्र दिवस पर आपका हार्दिक अभिनन्दन एवं शुभकामनाएँ *

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बुधवार, जनवरी 20, 2010

कैसे सच का सामना??

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रचनाकार पर अगस्त में व्यंग्य लेखन पुरुस्कार के लिए व्यंग्य आमंत्रित किये गये. मन ललचाया तो एक प्रविष्टी मैने भी भेज दी. परिणाम दिसम्बर में आने थे याने लगभग ४ माह बाद, तो भेज कर भूल गये. इस बीच चुपके से दिसम्बर गुजर गया और कल पुरुस्कारों की घोषणा हुई. कुल ५१ शुभ प्रविष्टियों में १३ व्यंग्य लेखक पुरुस्कृत किये गये और उस लिस्ट में अपना नाम देखना सुखद रहा. वही व्यंग्य यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ आपके आशीर्वाद के लिए.

 

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एक नामी चैनल पर कल शाम ’सच का सामना’ देख रहा था.

कार्यक्रम के स्तर और उसमें पूछे जा रहे सवालों पर तो संसद, जहाँ सिर्फ झूठ बोलने वालों का बोलबाला है, में तक बवाल हो चुका है. इतने सारे आलेख इस विवादित कार्यक्रम पर लिख दिये गये कि अब तक जितना ’सच का सामना’ की स्क्रिप्ट लिखने में कागज स्याही खर्च हुआ होगा, उससे कहीं ज्यादा उसकी विवेचना में खर्च हो गया होगा.

खैर, वो तो ऐसा ही रिवाज है. नेता चुनते एक बार हैं और कोसते उन्हें पाँच साल तक हर रोज हैं. अरे, चुना एक बार है तो कोसो भी एक बार. इससे ज्यादा की तो लॉजिकली नहीं बनती है.

बात ’सच का सामना’ कार्यक्रम की चल रही थी.

इतना नामी चैनल कि अगर वादा किया है तो वादा किया है. नेता वाला नहीं, असली वाला. अगर रात १० बजे दिखाना है रोज, तो दिखाना है.

अब मान लीजिये, रोज के रोज शूटिंग हो रही है रोज के रोज दिखाने को और पॉलीग्राफ मशीन खराब हो जाये शूटिंग में. मशीन है तो मौके पर खराब हो जाना स्वभाविक भी है वो भी तब, जब वो भारत में लगी हो. हमेशा की तरह मौके पर मेकेनिक मिल नहीं रहा. रक्षा बंधन की छुट्टी में गाँव चला गया है, अपनी बहिन से मिलने वरना वहाँ ’सच का सामना’ करे कि भईया, अब तुम मुझे पहले जैसा रक्षित नहीं करते. याने एक धागा न बँधे, तो रक्षा करने की भावना मर जाये. धागा न हुआ, ए के ४७ हो गई.

ऐसे में शूटिंग रोकी तो जा नहीं सकती. अतः, यह तय किया गया कि सच तो उगलवाना ही है तो पुलिस वालों को बुलवा लो. इस काम में उनसे बेहतर कौन हो सकता है? वो तो जैसा चाहें वैसा उगलवा लें फिर यहाँ तो सच उगलवाने का मामला है.

प्रोग्राम हमारा है, यह स्टेटमेन्ट चैनल की तरफ से, याने अगर हमने कह दिया कि ’यह सच नहीं है’ तो प्रूव करने की जिम्मेदारी प्रतिभागी की. हमने तो जो मन आया, कह दिया. पैसा कोई लुटाने थोड़े बैठे हैं. जो हमारे हिसाब से सच बोलेगा, उसे ही देंगे.

पहले ६ प्रश्न तो लाईसेन्स, पासपोर्ट और राशन कार्ड आदि से प्रूव हो गये मसलन आपका नाम, पत्नी का नाम, कितने बच्चे, कहाँ रहते हो, क्या उम्र है आदि. लो जीत लो १०००००. खुश. बहल गया दिल.

आगे खेलोगे..नहीं..ठीक है मत खेलो. हम शूटिंग डिलीट कर देते हैं और चौकीदार को बुलाकर तुम्हें धक्के मार कर निकलवा देते है, फिर जो मन आये करना!! मीडिया की ताकत का अभी तुम्हें अंदाजा नहीं है. हमारे खिलाफ कोई नहीं कुछ बोल सकता.

तो आगे खेलो और तब तक खेलो, जब तक हार न जाओ.

प्रश्न ५ लाख के लिए :’ क्या आप किसी गैर महिला के साथ उसकी इच्छा से अनैतिक संबंध बनाने का मौका होने पर भी नाराज होकर वहाँ से चले जायेंगे.’

जबाब, ’हाँ’

एक मिनट- क्या आपको मालूम है कि आज पॉलीग्राफ मशीन के खराब होने के कारण यहाँ उसके बदले दो पुलिस वाले हैं. एक हैं गेंगस्टरर्स के बीच खौफ का पर्याय बन चुके पांडू हवलदार और दूसरे है मिस्टर गंगटोक, एन्काऊन्टर स्पेश्लिस्ट- एक कसूरवार के साथ तीन बेकसूरवार टपकाते हैं. बाई वन गेट थ्री फ्री की तर्ज पर.

जबाब-अच्छा, मुझे मालूम नहीं था जी. मैने समझा था कि पॉलीग्राफ मशीन लगी है. मैं अपना जबाब बदलना चाहता हूँ.

नहीं, अब नहीं बदल सकते, अब तो ये ही पुलिस के लोग पता करके बतायेंगे कि आपने सच बोला था कि नहीं.

पांडू हवलदार, इनको जरा बाजू के कमरे में ले जाकर पता करो.

सटाक, सटाक की आवाजें और फिर कुछ देर खुसुर पुसुर. फिर शमशान शांति और सीन पर वापसी.

माईक पर एनाउन्समेण्ट: "बंदा सच बोल रहा है."

बधाई, आप ५००००० जीत गये. क्या आप आगे खेलना चाहेंगे?

नहीं..

उसे जाने दिया जाता है. जब प्रशासन (पुलिस वाले) उसके साथ है तो कोई क्या बिगाड़ लेगा. जैसा वो चाहेगा, वैसा ही होगा.

स्टूडियो के बाहर पांडू एवं गंगटोक और प्रतिभागी के बीच २५०००० और २५०००० का ईमानदारी से आपस में बंटवारा हो जाता है और सब खुशी खुशी अपने अपने घर को प्रस्थान करते हैं.

सीख: प्रशासन का हाथ जिस पर हो और जो प्रशासन से सांठ गांठ करने की कला जानता हो, वो ऐसे ही तरक्की करता है. माना कि मीडिया बहुत ताकतवर है लेकिन देखा न!! कहीं न कहीं उन्हें भी दबना ही पड़ता है.

यही है सत्य और यही है 'सच का सामना'!!!!

-समीर लाल 'समीर'

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बुधवार, जनवरी 13, 2010

दूर हुए मुझसे वो मेरे अपने थे..

कल तक जो मेरे अपने थे, साथ साथ थे, कब किनारा कर बैठे, पता ही नहीं लगा. नये नये साथी जुड़ते गये और भीड़ में खोया मैं उन पुराने साथियों के लिए बस एक भ्रम पाले जीता रहा कि वो अब भी मेरे अपने हैं, मेरे साथ में हैं..

क्यूँ मैं भीड़ में रुक कर नहीं देखता कि जिनके साथ मैने सफर शुरु किया था, जो मेरे साथ मेरी जिन्दगी के कारवां से जुड़े थे, वो कहाँ हैं, किस हाल में हैं, क्या सोचते हैं. मेरे लिए, मेरे साथ भीड़ कितनी है जितना ही महत्वपूर्ण भीड़ किनकी है, जानना भी होना चाहिये.

मैं साथ निभाता रहा मगर जाने क्यूँ, बात जब एक तरफा हो जाती है, तो कुछ समय में समझ आ ही जाती है. एक तरफा झुकाव झुका हुआ दिखने ही लगता है स्वतः.. कब तक कोई नजर अंदाज कर सकता है आखिर इस यथार्थ को.

वैसे तो कौन जाने कि जिसे मैं कहता हूँ कि मैं साथ निभाता रहा, वो मात्र मेरा भ्रम हो और मैं मात्र इतना करता रहा कि मैं उन्हें सप्रयास नजर अंदाज नहीं कर रहा था मगर उनकी अनुपस्थिति संज्ञान में न लेना भी तो गलत ही है.

मैं रुकता हूँ. भीड़ के बीच अकेला महसूस करने लगता हूँ. समझने की कोशिश करता हूँ. कहीं मेरा ही कोई कदम गलत हुआ होगा. कहीं मुझसे ही कोई भूल हुई होगी. वो कुछ भूल करता तो मुझे दिखता. मुझे तो कुछ दिखा ही नहीं. मैं तो पूर्ववत साथ निभाता रहा. मैं तो पूर्ववत उसे साथ समझता रहा.

बात साफ है, उसका तो कोई दोष न होगा. दोष तो दिख ही जाते हैं. न भी दिखें तो महसूस हो जाते हैं. लाख दुर्गुणों के बावजूद दोष में यही सदगुण है कि वो अपने होने का अहसास किसी न किसी तरह करा ही देते हैं.

मैं यह तो जानता हूँ कि कहीं न कहीं, किसी न किसी जगह मेरे ही कदम गलत रहे होंगे. कहीं न कहीं मेरी ही कुछ बातें नाकाबिले बर्दाश्त गुजरी होंगी. पर नहीं जानता कौन सी. जानता होता तो ऐसा करता ही क्यूँ? शायद कर भी गुजरता किसी उन्माद में, तो उसे सुधारता और अपने किये की क्षमा मांगता, प्रयाश्चित करता.

वो मेरा अपना था जो आज किनारे हो दूर बैठा है. वो रुठा है. वो मुझसे नाराज है. मैं भी उसके लगातार बहुत बार मुझे अनदेखा कर देने के बाद यह बात जान पाया. मैं अनदेखा नहीं कर रहा था उसे और न ही उसके चेहरे पर ऐसे भाव थे, इसलिए जानने में भी वक्त लगा.

इतने समय का साथ था. उम्मीद बस यह थी कि जैसे अच्छे कार्यों में सराहना करता था खुले दिल से, वैसे ही गलत कदम पर भी टोकेगा, बतायेगा, साथ निभायेगा. मेरे तर्क सुनेगा. मुझे समझाने की कोशिश के साथ खुद भी मुझे समझने की कोशिश करेगा.

मैने यदि कोई कदम उठाया है तो मेरी नजरों में सही ही होगा, तभी तो उठाया है. उसे गलत लगा तो बताना उसका फर्ज था. फिर मैं अपने तर्क रखता. मानना और मानना उसका अधिकार क्षेत्र था. साथ बनाये रखना तो कतई बाध्यता न था किन्तु इस तरह बिना बताये दूरी बना लेना भी तो उचित नहीं.

ss

नाराज हो मुझसे?

लड़ो

मुझे कोसो

डाँटो

झगड़ो मुझसे

मगर

यूँ चुप रहकर...

मुझे

मौत से बदत्तर

जिन्दगी न दो!!

तुम तो मेरे अपने थे..

इतना उपकार करो मुझ पर!!!

-समीर लाल ’समीर’

(नोट-इस आलेख को पढ़कर कहीं भी आपको यह अहसास तो नहीं हुआ कि इस आलेख में मैं ब्लॉगजगत से संबंधित मित्रों की बात कर रहा हूँ? यदि नहीं, तो लेखन सफल रहा. मेरा पूरा श्रम इसी मुद्दे पर था कि सीधे सीधे कुछ न कहूँ.. :) वैसे तो किस्सा वही है-कभी उस जगत में..कभी ब्लॉगजगत में. क्या अंतर है?)

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रविवार, जनवरी 10, 2010

हिन्दी ब्लॉगिंग- कौवा महन्ती!!!!

 

बूंद बूंद पानी को तरसते ऐसे इन्सान को भी मैने देखा है जो समुन्द्र की यात्रा पर निकला तो ’सी सिकनेस’ का मरीज हो गया. पानी ही पानी देख उसे उबकाई आने लगी, जी मचलता था. भाग कर वापस जमीन पर चले जाने का मन करता था. शुद्ध मायने में शायद यह अतिशयता का परिणाम था और शुद्ध भाषा में शायद इसी को अघाना कहते होंगे.

याद है मुझे, कुछ बरस पहले डायरी के पन्ने दर पन्ने काले करना. न कोई पढ़ने वाला और न कोई सुनने वाला. बहुत खोजने पर अगर कोई सुनने वाला मिल भी जाये तो यकीन जानिये कि वो बेवजह नहीं सुन रहा होगा. निश्चित ही या तो उसे आपसे कुछ काम होगा या वो भी अपने खीसे में डायरी दबाये सुनाने का लोभ पाले सुन रहा होगा.

नियमित लिखना, टाईप करना और फिर उसे सहेज कर लिफाफे में बंद कर संपादक को सविनय नम्र निवेदन के साथ भेजना. कुछ संपादक संस्कारी और अच्छे होते थे जो सखेद रचना वापस भेज देते थे वरना तो पता ही नहीं चलता था कि रचना कहाँ गई.

कभी किस्मत बहुत अच्छी निकली और किसी पहचान के माध्यम से यदि निःशुल्क छप भी गई तो संपादक की कैंची से गुजरने के बाद खुद की रचना को खुद पहचानना मुश्किल हो जाता था. शब्द ही नहीं, भाव भी बदले नजर आते थे.

समय परिवर्नशील है.

इन्टरनेट प्रचलन में आ गया, ब्लॉग खुल गये. अब आप ही लेखक और आप ही संपादक. जो जी में आये, छापो. ब्लॉग, छ्पास कब्जियत का रामबाण इसबगोल. औकात आपकी-मरजी आपकी, चाहो तो दूध से फांक लो या पानी से. कब्जियत निवारण की गारण्टी. आज सुनाने के लिए लोगों को खोजना नहीं होता, ये दीगर बात है कि हिन्दी ब्लॉगिंग में अभी भी सुनने वाले उसी टाइप के हैं जैसे पहले थे याने अपने खीसे में अपनी डायरी दबाये सुनाने का लोभ पाले सुनने वाले. थोड़े ही हैं जो इससे अलग हैं कि शौकिया सुनने चले आये.

इस प्रक्रिया में चूँकि सभी सुनाने वाले ही आपको पढ़ रहे हैं तो स्वभाविक तौर पर आप उनको, कम से कम, लेखन से जानने लगते हैं. तब अगर उन्हें आपका लिखा पसंद न आये या वो आपसे आपके लेखन को लेकर नाराज हो जाये तो कैसे बताये?

सीधे सीधे कह देने में आपके भी नाराज होकर बदला लेने का खतरा है या वो अपने नाम से इतनी हिम्मत नहीं जुटा पाता कि वो सीधे आपसे कह दें कि क्या बकवास लिखा है. तब वह सुरक्षा बाबत या आत्मविश्वास बूस्टर हेतु बेनामी का कवच धारण कर आप पर वार करते हैं. आप चाहें तो उसका किया वार सबको दिखा दें और न चाहें तो उसके वार को डिलिट कर मिटा दें. इसमें साहस कैसा और कायरता एवं अकायरता कैसी?

जंगल के वासी हो तो फिर क्या शेर, क्या सियार और क्या चूहा? सब मिलेंगे और सबसे डील करना होगा अपने अपने तरीके से.शहर जा नहीं सकते, वहाँ लोग ढेला मारते हैं.

सब आपके हाथ में ही तो है, फिर इससे घबराना कैसा? इससे किसलिये नाराज होना? यहाँ ब्लॉगजगत के यही कायदे हैं-इन्हीं के साथ जीना होगा...याद करो सम्पादक का मौन या खेद सहित रचना की वापसी भी मौन धरे ऐसा ही कुछ कहती थी. तब तो आप कुछ नहीं कह पाये फिर अब? तब भी आपकी इच्छा थी कि चाहें तो दोस्तों को बतायें कि रचना वापस लौट आई है या चुप्पी मार जायें. अधिकतर तो चुप्पी ही मार जाया करते थे, क्यूँ?

कहीं छपास पीड़ा के निवारण की इतनी सारी स्पेस देख और इतने सारे सुनने वाले एक जगह इक्कठा देख अघा तो नहीं गये?  वही ’सी सिकनेस’??

ऐसे में एक ही रास्ता है मित्र कि जहाज किनारे लगा लो, उतर जाओ जमीन पर. मगर ध्यान रहे- यह वही जमीन है जहाँ से भाग निकले थे बूँद बूँद पानी की तरसन लिए.

चैन तो कहीं नहीं..

punch

 

ब्लॉग

मुझे

सुविधा देता है..

मैं मन में उठते भाव

जस का तस

लिख देता हूँ..

फिर

पाठकों की अदालत में

पेश कर

सो जाता हूँ..

रात गये

अंधेरे में

विचारता हूँ..

ये क्या लिख दिया मैने..

अपनी ऊँगलियाँ तोड़ देना चाहता हूँ..

तोड़ देना चाहता हूँ..

उस की-बोर्ड को

जिन पर इन ऊँगलियों की मदद से

टंकित किया था...

सुबह उठता हूँ..

देखता हूँ

पाठक कह रहे हैं

वाह!! वाह!!

बहुत सुंदर..!!!.

और

मैं मुस्कराते हुए

अपनी उजबक सोच

को सर झटक कर

अलग कर देता हूँ

और

मार देता हूँ

उस अकेले बेनामी पाठक की सोच को

जिसकी सोच अक्षरशः

मेरी सोच से मिलती थी..

’कौवा महन्ती’ के

अपने कायदे हैं!!

-समीर लाल ’समीर’

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बुधवार, जनवरी 06, 2010

सर मेरा झुक ही जाता है...

अक्सर जब तक कोई विशेष मजबूरी नहीं होती, मैं उस गली से गुजरने से रोकता हूँ खुद को. जानता हूँ, उस गली को छोड़ कर दूसरा रास्ता लेने में मुझे लगभग दोगुनी दूरी तय करनी पड़ती है फिर भी.

कुछ विशेष वजह भी नहीं. कुछ सड़क छाप आवारा कुत्ते हैं, वो दिन भर उस गली को छेके रहते हैं. हर आने जाने वाले पर भौंका करते हैं. पीछे पीछे आते हैं. छतरी दिखाओ तो डर कर दुम दबा कर भाग जाते हैं मगर भौंकते हैं. एक बार तिवारी जी को दौड़ाया भी था मगर काटा नहीं. तिवारी जी ने ही बताया था.

dogs

तमाशबीन बने गली में रहने वाले न जाने क्यूँ इस बात पर मुस्कराते हैं मानो चिढ़ा रहे हों. क्या मालूम मुस्कराते भी है या उनका मूँह ही वैसा है. मैने हमेशा, जब कभी मजबूरी में उस गली से गुजरना पड़ा, उनका मूँह वैसा ही देखा है मानो मुस्करा रहे हों.

वो भी तो निकलते होंगे उसी गली में. उनकी तो मजबूरी है है कि वो रहते ही उस गली में है. कुत्तों का क्या है वो तो आवारा हैं, वो तब भी भौंकते होगे. बाकी रहवासी भी शायद तब भी चिढ़ाने को मुस्कराते हों. उनका तो मूँह ही वैसा है. क्या पता!

मेरे घर से दक्षिण में कुछ मकान छोड़ कर एक बरगद का पेड़ है. रात अंधेरे उस तरफ देखो तो बड़ा अजीब सा दिखता है, भयावह. जाने कौन शाम को उसके चबूतरे पर दिया जला कर रख जाता है. टिमटिमाता दिया देर रात तक जलता रहता है. दूर से देखने पर जान पड़ता है को कोई जानवर बैठा है और उसकी आँख टिमटिमा रही है. जानवर भी कैसा-एक आँख वाला. कोशिश तो करता हूँ कि रात गये उस तरफ न जाऊँ मगर कभी मजबूरी में जाना भी पड़ा तो मेरी नजर उस पेड़ को बचा कर निकलती है हमेशा.

जैसे जैसे पेड़ पास आता जाता है, मेरी धड़कने असहज होने लगती हैं. पेड़ भौंकता तो नहीं मगर कभी अजीब सी आवाजें करता है तो कभी डरावना सन्नाटा खींच लेता है. मुझे दोनों हालतों में उसके पास से गुजरने में परेशानी होती है. अक्सर देर रात लौटने में उस गली को छोड़ता, दक्षिण की बजाय और थोड़ा ज्यादा लम्बा रास्ता लेकर उत्तर की तरफ से घूम कर घर जाता हूँ.

आज तक वैसे न तो उन कुत्तों ने काटा और न ही पेड़ ने परेशान किया मगर वो शायद इसलिए कि मैं उनसे बच कर निकलता हूँ या फिर शायद यह सब मेरे भीतर का एक वहम बस हो लेकिन है तो.

ऐसे ही कितने वहम, कितने पूर्वाग्रह और कितने डर पाले मैने अपनी मंजिल को कितना दूर और अपने रास्ते को कितना लम्बा बना लिया है. थकान होने लग जाती है कभी कभी.

एक इच्छा है कि कभी सहज और सरल जीवन जी पाऊँ मगर लगता तो नहीं.

ये डर, ये पूर्वाग्रह और ये वहम-जाने किसने, कब और किन बातों से मेरे भीतर तक उतार दिये हैं. ठीक वैसे ही जैसे की मेरे संस्कार.

शायद कभी न बदलें.

चलते चलते:

मंदिर, मस्जिद या गुरुद्वारा
सर मेरा झुक ही जाता है.

माँ ने ये सिखाया था मुझे.

-समीर लाल 'समीर'

माँ बाप की बचपन की समझाईश ऐसे ही तो संस्कार बन जाती है, किसी के भी व्यक्तित्व का हिस्सा.

कहने को बस यूँ ही: माँ बाप बच्चों को शैतानी से रोकने की लिए अक्सर कह देते हैं कि साधु बाबा ले जायेगा, या पुलिस पकड़ लेगी या वहाँ भूत रहता है. आपको क्षणिक आराम मिल सकता है मगर प्लीज, एक डरा हुआ मैं और न बनायें. जरा सोचे. और भी तो तरीके हैं बच्चों की शैतानियाँ रोकने के. उन्हें अपनाईये!!

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रविवार, जनवरी 03, 2010

देखा कैसे चल दिया, बिना कहे यह साल

आज महावीर जी  के ब्लॉग पर नव वर्ष का कवि सम्मेलन आयोजित किया गया है. बेहतरीन और नामी गिरामी कवियों के बीच मुझ अदना से कवि को भी स्थान दिया गया है, बहुत आभार आयोजक मंडल का.

मेरे इस गीत को स्वरबद्ध कर अनुग्रहित किया है काव्य मंजूषा ब्लॉग की  स्वप्न मंजूषा शैल 'अदा' जी ने. सुनने के लिए नीचे प्लेयर पर जायें.

 

देखा कैसे चल दिया, बिना कहे यह साल
बरसों बीते देखते, इसका ऐसा हाल...

अबकी उसके साथ था, मन्दी का इक दौर
लोग राह तकते रहे, मिल जाये कहीं ठौर
जाने कितनों को किया, उसने है बेहाल...
देखा कैसे चल दिया, बिना कहे यह साल....

सूखे ने दिखला दिया,महंगाई का नाच
पण्डित बैठा झूठ ही, रहा किस्मतें बांच
कहीं बाढ़ आती रही, खाने का आकाल
देखा कैसे चल दिया, बिना कहे यह साल....

मेहनत से हम न डरें, खुद पर हो विश्वास
विपदा से हम लड़ सकें, हिम्मत रखना पास
गुजर गया है जान लो, संकट का ये काल
देखा कैसे चल दिया, बिना कहे यह साल....

इक आशा हैं पालते, नये बरस के साथ
दे जाये हमको नई, खुशियों की सौगात
हाथों में लेकर खड़े, आरत का यह थाल
देखो वो है आ रहा, नया नवेला साल...

देखा कैसे चल दिया, बिना कहे यह साल
बरसों बीते देखते, इसका ऐसा हाल...

-समीर लाल ’समीर’

उपरोक्त गीत को सुनिये ऑटवा, कनाड़ा की ब्लॉगर सुश्री स्वपन मंजुषा शैल ’अदा’ जी की मधुर आवाज में:

 

swapna

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बुधवार, दिसंबर 30, 2009

कहाँ गया पुराना साल?

 

BOOK

वो कहतें हैं

पुराना वर्ष चला गया...

मैं कहता हूँ

वर्ष कहीं जाता नहीं...

यह सिर्फ भ्रम है

ये दर्ज हो जाता है

इतिहास के सफ्हों में

एक और सफ्हा बन कर

जैसे कि

हमारे कर्म!!!

-समीर लाल ’समीर’

 

निवेदन:

वर्ष २०१० मे हर माह एक नया हिंदी चिट्ठा किसी नए व्यक्ति से भी शुरू करवाएँ और हिंदी चिट्ठों की संख्या बढ़ाने और विविधता प्रदान करने में योगदान करें।

 

नववर्ष की बहुत बधाई एवं अनेक शुभकामनाएँ!

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रविवार, दिसंबर 27, 2009

रुक जाना मौत है- विल्स कार्ड ८

पहले की तरह ही, पिछले दिनों विल्स कार्ड भाग १ , भाग २ , भाग ३ ,भाग ४ , भाग ५ भाग और भाग को सभी पाठकों का बहुत स्नेह मिला और बहुतों की फरमाईश पर यह श्रृंख्ला आगे बढ़ा रहा हूँ.


(जिन्होंने पिछले भाग न पढ़े हों उनके लिए: याद है मुझे सालों पहले, जब मैं बम्बई में रहा करता था, तब मैं विल्स नेवीकट सिगरेट पीता था. जब पैकेट खत्म होता तो उसे करीने से खोलकर उसके भीतर के सफेद हिस्से पर कुछ लिखना मुझे बहुत भाता था. उन्हें मैं विल्स कार्ड कह कर पुकारता......)

आज दराज तलाशी का दौर चला और कुछ और विल्स कार्ड हाथ में उठाये. गर्द उड़ाते याद आया कि साल बदलने को है. २००९ विदा लेने वाला है और २०१० आने को है.

गर्द उड़ती है तो एक चित्र खींचती है यादों का. गर्द शायद होती ही इसलिए है. यादें इसी तरह ही सिद्ध है वरना उनकी क्या महत्ता.

 

dust-storm

हम हर नये दिन, हर नये पल, हर नये साल से एक नई उम्मीद पाल लेते हैं. शायद यही जीने की वजह देता हो, मेरा ऐसा सोचना. मगर जब अपने कुछ दशकों पहले लिखे इन कार्डों पर नजर डालता हूँ तो ऐसा लगता है कि अभी भी वहीं खड़ा हूँ, कहीं कुछ नहीं बदला.

महसूस किया है मैने कि बदलता कुछ नहीं. बस बदलती रहती हैं हमारी आशायें, हमारी उम्मीदें और हमारे इर्द गिर्द का माहौल. शायद यही सफल जीवन का रहस्य हो, कौन जाने.

जिन्दगी रुकती नहीं. आगे बढ़ना जीवन है, रुक जाना मौत और पीछे लौटकर जीना, मूर्खता.

अक्सर ही हम बीते समय के लिए सोचते हैं कि वो समय बेहतर था..मगर याद करें तो उस समय भी हमें पीछे ही बेहतर महसूस होता था. आगे तो हमने देखा नहीं, महसूसा नहीं मगर वो आगे आने वाला समय ही फिर जब वर्तमान बनता है, तो जुझने की मशक्कत रास नहीं आती और जब वो भूतकाल बन जाता है तो याद आता है कि बेहतर था. यह विडंबना है, एक उलझन है, जो जीवन के साथ जुड़ी है और इसी का नाम जीवन है.

इन्हीं सब उहापोह के बीच, अब कुछ विल्स कार्ड जो हाथ आये आपकी नजर:

-१-

बरसात

उस रोज

मैं घर आया

बरसात में भीग

भाई ने डॉटा

’क्यूँ छतरी लेकर नहीं जाते?’

बहन ने फटकारा

’क्यूँ कुछ देर कहीं रुक नहीं जाते’

पिता जी गुस्साये

’बीमार पड़कर ही समझोगे’

माँ मेरे बाल सुखाते हुए

धीरे से बोली

’धत्त!! ये मुई बरसात’


-(एक अंग्रेजी वाक्यांश से प्रभावित)-

-२-

मेरे पास
बतलाने को
इतना कुछ है...

और

वो
एक प्रश्न लिए
जाने कहाँ
भटक रहा है!!!

-३-

गुलाब की चाह

और

कांटो से गुरेज...

जरुर, कोई मनचला होगा!!

-४-

चाँद और तुम!!
----------------

कल रात

एकाएक

पूरे चाँद ने

मुझे

मेरे कमरे की खिड़की से

घूरा...

मैने डर कर

तुम्हारी तस्वीर

छिपा दी....

क्या जबाब देता उसे??

बताओ न!!

अब

तुम्हारी

तस्वीर नहीं मिल रही!!

क्या जबाब दूँगा तुम्हें??

चाँद भी कहीं

बादलों की ओट में

जा छुपा!!!

-५-

हम कहे

तो कुछ और...

और

वही बात

तुम कहो..

तो कुछ और!!!

ये कैसी विडंबना है???

-६-

सांप पालने का शौक है

तो

सांप पालने के

गुर भी जानता होगा!!

ये कोई शिगूफा तो नहीं!!!

-७-

अर्थ बदल जाते हैं

शब्दों के

वक्त के साथ..

फिर

इन्सान की क्या बिसात...

मासूम बालक

शीर्षक में

प्रथम आया

उस बच्चे का चित्र...

२५ साल बाद

सबसे खौफनाक आदमी

शीर्षक में भी

प्रथम.....

ये विडंबना नहीं,

कर्मों का परिणाम है...

दुनिया

इसी का नाम है!!!

-समीर लाल ’समीर’

 

नोट: नव वर्ष की बहुत बधाई एवं हार्दिक शुभकामनाएँ.

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बुधवार, दिसंबर 23, 2009

अपने प्रिय, जिसने मेरी गोद में दम तोड़ा: एक श्रृद्धांजलि!!

कल रात ही तुम्हारी हालत और हिचकियाँ देख कर मैं समझ गया था कि अब मेरा तुम्हारा साथ अंतिम पड़ाव पर है लेकिन एक उम्मीद, एक आशा और उस तीसरी शक्ति पर भरोसा. कैसी खराश की आवाज आ रही थी तुम्हारे गले से.

मैं रात भर तुम्हें गोदी मे लिए हर संभव इलाज करता रहा. जो जहाँ से पता चला वो दवा की मगर होनी के कौन टाल सकता है. सुबह सुबह तुमने एक लम्बी सिसकी ली और मेरी गोद में ही दम तोड़ दिया. सूरज बस उगने को था.

मैं आवाक देखता रह गया. नियति के आगे भला किसका जोर चला है.

इतने साल तुम्हारा साथ रहा. मेरे हर अच्छे बुरे समय और कर्मों में तुमने मेरा साथ निभाया. जाने कितने ही काम मैने तुम्हारी आड़ में जाने अनजाने में ऐसे किये जो शायद सार्वजनिक रुप से खुल कर करता तो हर तरफ मात्र धिक्कार ही मिलती. मगर तुमने एक सच्चे साथी का धर्म निभाते मेरे हर अच्छे बुरे को अपनी ममतामयी आत्मीय ओट में छिपा लिया. कभी भी, कहीं भी कोई राज नहीं उगला.

मैने जब चाहा, तब तुमने मेरा साथ दिया. दिन का कोई पहर हो या आधी रात. कभी तुम्हारे चेहरे पर शिकन न आई. जब मैं उदास होता तो कोई मन को लुभाने वाला गीत तुम सुनाते, कैसे कैसे किस्से लेकर आते कि उदासी कोसों दूर भाग जाती.

हम भी कितने अजीब होते हैं. सोचा ही नहीं कि कभी न कभी बिछड़ना भी होगा. ऐसा नहीं कि इस बीच तुम कभी बीमार नहीं पड़े मगर हल्की फुल्की बीमारी, बस चलते फिरते इलाज से दूर होती गई और हम एक दूजे को अजर अमर मान बैठे.

मैंने अपना सर्वस्व तुम्हें सौंप निश्चिंतता की चादर ओढ़ ली थी. कब क्या करना है, कहाँ जाना है, क्या कहना है-सब तो तुम बताते थे. किससे कैसे संपर्क होगा किस पते पर, आज फलाने का जन्म दिन, आज उसकी शादी की सालगिरह, बैंक में इतना पैसा, फलाने के घर का पता-मेरी जिन्दगी की तुम धूरी थे. तुम्हारे बिना रहना पड़ेगा, यह कभी सपने में भी नहीं सोचा था.

मैं जहाँ भी जाता-चाहे शहर में या शहर और देश के बाहर, सब कुछ भूल सकता था मगर तुम्हें नहीं. तुम हमेशा मेरे साथ रहे मेरे रहनुमा बन कर.

हालांकि मेरी भरसक कोशिश होती थी कि तुम बीमार न पड़ो. तुम्हें जरुरी टॉनिक और बीमारी के कीटाणुओं से बचाने का टीका इत्यादि का प्रबंध मैं हमेशा करवाता रहा. लेकिन एड्स, स्वाईन फ्लू, आतंकवाद आदि जैसी मारक बीमारियों कब किसे चपेट में ले लें कौन जानता है. इनके तो वैक्सीन इनके आ जाने के बाद ही बनते हैं और तब तक तो यह कितनों की जिन्दगियों को लील चुके होते हैं.

शायद मेरा तुम्हारा साथ यहीं तक था. आज तुम चले गये और साथ ले गये न जाने मेरी कितनी यादे. न जाने कितने विचार, सोच, कथन, कुछ कहे और कुछ अनकहे, कुछ उपजते और कुछ लहलाते..सब कुछ...मेरी जिन्दगी के कितने ही राज तुम्हारे साथ ही विदा हो गये.

उम्र तो तुम्हारी हो रही थी, एक न एक दिन सबको जाना ही होता है लेकिन इस तरह-अपनों के जाने का गम तो हमेशा सालता है वो भी जब आप उस पर इस कदर आश्रित हों.

सूनी हो गई मेरी दुनिया. शमशान वैराग्य में गोते लगा रहा हूँ. साथी तो फिर कोई मिल जायेगा मगर जो कुछ तुमसे जुड़ा था और जो तुम्हारे साथ गया वो...वो शायद कभी वापस न आये..

आज ओबेद उल्लाह अलीम के शेर याद आते है, जो तुम सुनवाया करते थे...

जैसे तुम्हें हमने चाहा था, कौन भला फिर चाहेगा...
माना और बहुत आयेंगे, तुमसे प्यार जताने लोग!!

तेरे प्यार में रुसवा हो कर, जायें कहाँ दीवाने लोग
जाने क्या क्या पूछा रहे हैं, ये जाने पहचाने लोग!!

(नोट: आज सुबह मेरा लेपटॉप एक अनजान वायरस की चपेट में आकर मेरी गोद में दम तोड़ बैठा. साथ गये कई फोटो, विडिओ और एक माह पूर्व लिए बेकअप के बाद के आलेख, कविता, गीत, कुछ पूरे, कुछ अधूरे. उसी लेपटॉप को समर्पित यह श्रृद्धांजलि पोस्ट दो बूँद आंसू के साथ.)

 

laptopdead

 

निवेदन: कृप्या टिप्पणी के माध्यम से अपनी श्रृद्धांजलि अर्पित करें तो मुझे आपका पता वापस मिले वरना तो वो सब साथ ले ही गया है.

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रविवार, दिसंबर 20, 2009

हाय री ये दुनिया?


















मौसम ठंडा है या गरम?
नहीं पता. जहाँ हूँ वहाँ अच्छा लग रहा है.

अभी अभी आँख लगी थी या अभी अभी आँख खुली है, समझ नहीं पा रहा हूँ.

पूरा बदन दर्द से भरा है. दिल नहीं, बस बदन. ज्यादा काम की थकावट. १४ घंटे काम के दिन.

त्यौहारों के दिन आ रहे हैं. बड़ा दिन, नया साल. छुट्टियाँ ही छुट्टियाँ, आराम के दिन.

आराम के पहले थकान जरुरी है वरना आराम का क्या मजा?

आँख मिचमिचाता हूँ. बस, जागृत होने का प्रयास है सुप्तावस्था में.

कहाँ हूँ मैं?

है तो कोई हवाई अड्डा ही.

बिजिंग?? वेन्कूवर?? टोरंटो??

थकान सोच को बाधित कर रही है. इतना क्यूँ थकाते हैं हम खुद को? कितनी महत्वाकांक्षायें और उनके लिए यह कैसी दौड़?

आस पास देखता हूँ.

चायनीज़ खूब सारे दिख रहे हैं, शायद बिजिंग में ही हूँ मैं. आवाजें सुनता हूँ निढाल आँखे मीचें..बी डू ची..चायनीज़ में एक्सक्यूज मी. बिजिंग ही होगा और मैं अपने जहाज के इन्तजार में नींद के आगोश में चला गया होऊंगा.

अभी सोच ही रहा हूँ कि बाजू से एक ब्रिटिश एकसेन्ट में बात करता युगल निकल गया और उसके पीछे अमरीकन आवाज.

मगर यही सारी आवाजें तो वेन्कूवर और टोरंटो हवाई अड्डे पर भी सुनाई देती हैं.

कहाँ हूँ मैं?

यह क्या? पूछ रहा है कि कितने बजे फ्लाईट है अपने दोस्त से हिन्दी में!! जाने कौन है हिन्दुस्तानी या पाकिस्तानी.

यही दृष्य आये दिन वेन्कूवर और टोरंटो में भी देखता हूँ हवाई अड्डे पर.

आसपास नजर दौड़ाता हूँ. कुछ ड्रेगन आकाश से रस्सी के सहारे झूल हैं. फिर कुछ क्रिसमस ट्री सजे हैं. झालर रोशनी का सामराज्य है हर तरफ. कोई संता बने घूम रहा है.

इससे तो कतई नहीं जान सकते कि यह बिजिंग है या वेन्कूवर या टोरंटो...

कुछ आसपास सजी दुकानों पर नजर डालता हूँ..वही चायनीज़ फूड, फिर पिज्जा पिज्जा, फिर मेकडोनल्ड फिर फिर..सब एक सी ही दुकानें हर जगह..भीड़ भी एक सीमित दायरे में कुछ वैसी ही...

आखिर दिमाग पर जोर डालता हूँ..जेब में हाथ जाता है.. मेरी टिकिट और पासपोर्ट हैं.

टिकिट पर लिखा है बिजिंग से टोरंटो, फ्लाईट एयर कनाडा १०१ दोपहर १२.४७ बजे तारीख १२ दिसम्बर, २००९.

दीवार घड़ी पर नजर जाती है सुबह का १० बजा है तारीख १२ दिसम्बर, २००९.

हाथ घड़ी देखता हूँ रात का ९ बजे का समय तारीख ११ दिसम्बर, २००९.

तब मैं बिजिंग से दोपहर १२.४७ तारीख १२ दिसम्बर पर टोरंटो के लिए उड़ने वाला हूँ और १२ घंटे १० मिनट का सफर कर १२ तरीख की सुबह ही ११.५७ पर टोरंटो पहुँच जाऊंगा.

कैसी अजब दुनिया है. देख कर कुछ अंतर नहीं दिखता!!

ऐसी दुनिया किसने रची..हमने, आपने या उसने?

पूरा विश्व एक गांव हुआ जा रहा है..पहचान नहीं पाते कि यहाँ हैं कि वहाँ. सब वैश्वीकरण के इस दौर में एक दूसरे में इतना घुल मिल गये है. सबकी अपनी योग्यता है, सभी का स्वागत सभी जगहों पर हैं.

और हम हैं कभी मराठियों का जय महाराष्ट्रा तो फिर कभी तैलंगाना और विदर्भ बनाने की जुगत में लगे हैं..

हद है, जाने क्या पा लेंगे!!




वो

जिसे इस कृषि-प्रधान देश की

मासूम जनता ने

अपना रहनुमा जाना था..


सुना है

दीवारों की फसल उगाता है!!!


-समीर लाल 'समीर'


नोट:
बहुतेरी पोस्ट तक पहुँच नहीं पा रहा हूँ. लेपटॉप वायरस से पूरी तरह सत्यानाश हो गया. न जाने कितने आलेख गुम हो गये. नया खरीदना पड़ेगा. बहुत परेशान हूँ कि शायद कुछ डाटा मिल जाये..१५ दिन पहले तक का बेक अप है. Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, दिसंबर 13, 2009

पहेली का निष्कर्ष : स्त्री/पुरुष विमर्श

 

एक पहेली ख्याल आती है:

एक पैकेट में ७ बन(ब्रेड) हैं. मेरी पत्नी रोज आधा खाती है और मैं एक पूरा.

पहेली है कि ५ वें दिन कौन कितना खायेगा?

जबाब हो सकता है:

१. मैं पूरा खाऊँगा और पत्नी भूखी रहेगी.

२. पत्नी आधा खाती है, इसलिये आधा खाकर निकल लेगी (आई डोंट केयर बोलते हुए) और मुझे आधा ही खा कर गुजारा करना होगा.

३. दोनों खुशी खुशी आधा आधा बांट कर खायेंगे.

 

73091678

 

यदि आपको लगता है कि

जबाब १ सही है, तो इसका अर्थ है कि आप पत्नी को बराबरी का दर्जा नहीं देते. आप पुरुष प्रधान समाज के समर्थक हैं एवं समय के साथ साथ अपनी मानसिकता नहीं बदल रहे हैं और उसी दकियानूसी विचारों के बीच पल पुस रहे हैं जिसमें नारी को कोई महत्व नहीं दिया जाता था. ऐसे में आज के जमाने में आपकी गुजर मुश्किल ही है. गुजर अगर हो भी जाये तो कम से कम सुखमय तो नहीं होगी.

यदि आपको लगता है कि

जबाब २ सही है तो आप निश्चित ही पत्नी की समानता एवं समान अधिकारों की नहीं बल्कि नारी पुरुष से कहीं कम नहीं वाली रिसेन्ट मानसिकता के साथ कदम से कदम मिला कर चल रही/रहे हैं. आपका ध्येय नारी को बेहतर, ज्यादा ताकतवर एवं पुरुष को हर हाल में नीचा दिखाना है. आप नारी मुक्ति आंदोलन में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेने के लिए परफेक्ट पात्रता रखते हैं. सुखमय जीवन से ज्यादा आपके लिए अहम महत्व रखता है.

यदि आपको लगता है कि

जबाब ३ सही है तो आप पति और पत्नी एक ही गाड़ी के दो पहिये हैं एवं सामंजस्य से ही जीवन गाड़ी भली भांति दौड़ेगी वाले संस्कारों में विश्वास रखते/रखती हैं एवं दोनों के समान अधिकारों के प्रति सतर्क एवं सहमत हैं.

-वैसे तो जबाब २ और ३ का नेट परिणाम एक ही है मगर भाव अलग अलग हैं.

बस, जीवन को सुचारु रुप से सफलतापूर्वक जीने के लिए भाव महत्वपूर्ण है, परिणाम नहीं.

यही सुखद (वैवाहिक) जीवन का सूत्र है.

अतः, कोशिश कर अपना सही जबाब ३ को बनाये यदि आपने अपना जबाब इसके सिवाय १ या २ चुना है तो!!

चलते चलते: (मेरी एक रचना का हिस्सा)

जो प्यार तुमने मुझको दिया था
वो प्यार किस्तों में लौटा रहा हूँ..

मोहब्बत इबादत में ऐसा रहा है
दर्द हो किसी का, किसी ने सहा है
ये बात तुझको पता ही कहाँ थी
कि किसने किससे कब क्यूँ कहा है.

उदासी मिटाना,
और सबको हँसाना
निवेदन मैं सबसे किये जा रहा हूँ...

-समीर लाल ’समीर’

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बुधवार, दिसंबर 09, 2009

डर: एक माईक्रो कथा

 

सारा गांव उनसे डरता था.

एक मात्र राजू भईया के पास लाईसेन्सी रिवाल्वर था.

क्या पता गुस्से में मार ही न दें.

मैं भी राजू भईया से डरता था.

इसलिये नहीं कि गुस्से में मुझे न मार दें.

मेरा डर अलग था.

आज खबर आई है

-राजू भईया ने खुद को गोली मार कर आत्महत्या कर ली.

मेरा डर सच निकला.

गांव का डर जाता रहा.

*

चलते चलते:

 

टोरंटो आज सबेरे:

toronto

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रविवार, दिसंबर 06, 2009

पहले पढ़ा, अब देखिये..

बिखरे मोती के विमोचन की खबर आपको १२ अक्टूबर, २००९ की पोस्ट से दी थी.

तब से ही उस कार्यक्रम के विडियो की डिमांड लगातार आती रही. आज उसी के विडिओ प्रस्तुत कर रहा हूँ.

’बिखरे मोती’ का दीर्घ प्रतिक्षित विमोचन विगत ४ अक्टूबर, २००९ को गुरुदेव श्री राकेश खण्डेलवाल, वाशिंगटन, यू. एस.ए. के कर कमलों द्वारा गया चौहान बैन्केट हॉल, टोरंटो में समपन्न हुआ. इस अवसर पर श्री अनूप भार्गव एवं रजनी भार्गव जी, न्यू जर्सी, यू एस ए, मानोषी चटर्जी जी, शैलजा सक्सेना जी ने शिरकत की. श्रोताओं से खचाखच भरे हॉल में कार्यक्रम की शुरुवात मानोषी चटर्जी ने की. कार्यक्रम की अध्यक्षता अनूप भार्गव जी एवं संचालन श्री राकेश खण्डेलवाल जी ने किया.

रजनी भार्गव जी, न्यू जर्सी, यू एस ए. का काव्य पाठ:

 

शैलजा सक्सेना जी का काव्य पाठ:

 

मानोषी चटर्जी जी का काव्य पाठ:

 

मानोषी चटर्जी जी का गज़ल गायन:

 

अनूप भार्गव जी न्यू जर्सी, यू एस ए. का काव्य पाठ:

 

श्री राकेश खण्डेलवाल, वाशिंगटन, यू. एस.ए. का काव्य पाठ:

 

समीर लाल ’उड़न तश्तरी’ का काव्य पाठ ::)

 

बिखरे मोती का विमोचन एवं समीर लाल का सम्मान:

 

आशा है विडियों पसंद आया होगा.

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बुधवार, दिसंबर 02, 2009

जूता विमर्श के बहाने : पुरुष चिन्तन

कल ही नीलिमा जी को पढ़ता था कि कामकाजी महिलाओं के लिए आरामदायक चप्पल मिलना कितना मुश्किल है. जल्दी मिलती ही नहीं, हर समय तलाश रहती है.

आज बरसों गुजर गये. हजारों बार पत्नी के साथ चप्पलों की दुकान पर सिर्फ इसलिए गया हूँ कि उसे एक कमफर्टेबल चप्पल चाहिये रोजमर्रा के काम पर जाने के लिए और हर बार चप्पल खरीदी भी गई किन्तु उसे याने कमफर्टेबल वाली को छोड़ बाकी कोई सी और क्यूँकि वह कमफर्टेबल वाली मिली ही नहीं.

अब दुकान तक गये थे और दूसरी फेशानेबल वाली दिख गई नीली साड़ी के साथ मैच वाली तो कैसे छोड़ दें? कितना ढ़ूँढा था इसे और आज जाकर दिखी तो छोड़ने का तो सवाल ही नहीं उठता.

हर बार कोई ऐसी चप्पल उसे जरुर मिल जाती है जिसे उसने कितना ढूंढा था लेकिन अब जाकर मिली.

सब मिली लेकिन एक आरामदायक चप्पल की शाश्वत खोज जारी है. उसे न मिलना था और न मिली. सोचता हूँ अगर उसे कभी वो चप्पल मिल जाये तो एक दर्जन दिलवा दूँगा. जिन्दगी भर का झंझट हटे.

उसकी इसी आदत के चलते चप्पल की दुकान दिखते ही मेरी हृदय की गति बढ़ जाती है. कोशिश करता हूँ कि उसे किसी और बात में फांसे दुकान से आगे निकल जायें और उसे वो दिखाई न दे. लेकिन चप्पल की दुकान तो चप्पल की दुकान न हुई, हलवाई की दुकान हो गई कि तलते पकवान अपने आप आपको मंत्रमुग्ध सा खींच लेते हैं. कितना भी बात में लगाये रहो मगर चप्पल की दुकान मिस नहीं होती.

ऐसी ही किसी चप्पल दुकान यात्रा के दौरान, जब वो कम्फर्टेबल चप्पल की तलाश में थीं, तो एकाएक उनकी नजर कांच जड़ित ऊँची एड़ी, एड़ी तो क्या कहें- डंडी कहना ही उचित होगा, पर पड़ गई.

अरे, यही तो मैं खोज रही थी. वो सफेद सूट के लिए इतने दिनों से खोज रही थी, आज जाकर मिली.

मैने अपनी भरसक समझ से इनको समझाने की कोशिश की कि यह चप्पल पहन कर तो चार कदम भी न चल पाओगी.

बस, कहना काफी था और ऐसी झटकार मिली कि हम तब से चुप ही हैं आज तक.

’आप तो कुछ समझते ही नहीं. यह चप्पल चलने वाली नहीं हैं. यह पार्टी में पहनने के लिए हैं उस सफेद सूट के साथ. एकदम मैचिंग.

पहली बार जाना कि चलने वाली चप्पल के अलावा भी पार्टी में पहनने वाली चप्पल अलग से आती है.

pencil hill

हमारे पास तो टोटल दो जोड़ी जूते हैं. एक पुराना वाला रोज पहनने का और एक थोड़ा नया, पार्टी में पहनने का. जब पुराना फट जायेगा तो ये थोड़ा नया वाला उसकी जगह ले लेगा और पार्टी के लिए फिर नया आयेगा. बस, इतनी सी जूताई दुनिया से परिचय है.

यही हालात उनके पर्सों के साथ है. सामान रखने वाला अलग और पार्टी वाले मैचिंग के अलग. उसमें सामान नहीं रखा जाता, बस हाथ में पकड़ा जाता है मैचिंग बैठा कर.

सामान वाले दो पर्स और पार्टी में जाने के लिए मैचिंग वाले बीस.

मैं आज तक नहीं समझ पाया कि इनको क्या पहले खरीदना चाहिये-पार्टी ड्रेस फिर मैचिंग चप्पल और फिर पर्स या चप्पल, फिर मैचिंग ड्रेस फिर पर्स या या...लेकिन आजतक एक चप्पल को दो ड्रेस के साथ मैच होते नहीं देखा और नही पर्स को.

गनीमत है कि फैशन अभी वो नहीं आया है जब पार्टी के लिए मैचिंग वाला हसबैण्ड अलग से हो.

तब तो हम घर में बरतन मांजते ही नजर आते.

घर वाला एक आरामदायक हसबैण्ड और पार्टी वाले मैचिंग के बीस.

गम भरे प्यालों में,
दिखती है उसी की बन्दगी,

मौत ऐसी मिल सके
जैसी कि उसकी जिन्दगी.

-समीर लाल ’समीर’

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रविवार, नवंबर 29, 2009

मैने क्या खास किया!!!-विल्स कार्ड भाग ७

 

पहले की तरह ही, पिछले दिनों विल्स कार्ड भाग १ , भाग २ , भाग ३ ,भाग ४ , भाग ५  और भाग को सभी पाठकों का बहुत स्नेह मिला और बहुतों की फरमाईश पर यह श्रृंख्ला आगे बढ़ा रहा हूँ.

(जिन्होंने पिछले भाग न पढ़े हों उनके लिए: याद है मुझे सालों पहले, जब मैं बम्बई में रहा करता था, तब मैं विल्स नेवीकट सिगरेट पीता था. जब पैकेट खत्म होता तो उसे करीने से खोलकर उसके भीतर के सफेद हिस्से पर कुछ लिखना मुझे बहुत भाता था. उन्हें मैं विल्स कार्ड कह कर पुकारता......)

आज फिर छुआ कुछ और विल्स कार्डों को...जाने कब कब और क्या क्या दर्ज किया था. क्या सोच रहा था उस वक्त. अब तो चित्र भी नहीं खींच पाता.

लेकिन मेरे जीवन में भी तो जाने कितनी घटनायें ऐसी हैं जिनका चित्र अगर कोशिश भी करुँ तो नहीं बना सकता. सोचते ही असहज हो जता हूँ.

कुछ ऐसे वाकिये जिन पर अब तक सहज विश्वास नहीं होता, गुजर गये और मैं देखता रहा चुपचाप. क्या कहता? विरोध करता? करता तो अपनों को ही बदनाम करता और सुनता कि आपके वो...ऐसा कर गये...जुड़ता तो मुझसे ही आकर. मौन सिद्ध रहा. बदनामी बची. पहले मेरी और फिर उनकी.

उन्होंने भी पहचाना. बस, स्वीकारा नहीं. उससे मुझे कोई फरक नहीं पड़ता. मुझे इतना काफी है कि पहचाना. मगर मेरे काफी को दुनिया नहीं समझती. वो उसे समझती है जो दिखता है. मेरे बस में नहीं ऐसा कुछ दिखाना...

तुम्हारे बस में है. गुजारिश है कि गर अपमानित न महसूस करो तो दिखा देना कुछ ऐसा करके जो सिद्ध करे वरना मैं तो यूँ भी जी लूँगा...सच में..संतुष्ट..जानता हूँ कि तुम इस बात को पहचानते हो!! है न!!

कोई अपराध बोध तुम पालो-यह मेरे लिए बर्दाश्त नहीं. प्लीज, ऐसा मत करना!!

मुझे तकलीफ होगी. तुम कहोगे नहीं मगर इससे तुम्हें भी तकलीफ होगी..मैं जानता हूँ.. रिश्ते टूटते है तो बिखरे किरचें दिखते नहीं मगर होते हैं जो कांच से गहरे चुभते हैं.

काँच मे अच्छाई है, टूटता है तो आवाज करता है और टूटन सी उपजी किरचें हैं वो दिख जाती हैं तो निकाली जा सकती हैं और वक्त घाव भर देता है..

रिश्तों की टूटन तो आवाज भी नहीं करती और इसकी किरचें तो बस सालती हैं जीवन भर....कोई तरीका नहीं इन्हें निकालने का सिवाय झेल कर इनके साथ जीने की आदत बना लेने के.

नासूर लिए भी तो लोग जीवन जी ही लेते हैं..मैने क्या खास किया!!!

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-१-

रिश्तों पर जमीं गर्द को
खुरच कर नहीं उधाड़ा करते..
खुरचने से जख्म छूट जाता है

और बस

एक आहत रिश्ता
सामने आ जाता है..

उन्हें आँसूओं की नमी से
भीगो कर
फुलाओ
और फिर
स्नेह रुपी मलमल से
साफ कर उबारो...

जो बिगड़ा था उसे भूल
सिर्फ भविष्य को सुधारो.

 

-२-

प्रेम
जैसे
पिंजड़े के भीतर कैद
पंछियों की आजादी..

कोई बेडियाँ नहीं...

बस, सामाजिक मर्यादाओं
के
दायरे हैं...
और उनके भीतर रहते
एक उन्मुक्त उड़ान का अहसास!!

 

-३-

सफेद गुलाब
मुझे लुभाते हैं..
और
लाल गुलाब
न जाने क्यूँ
विचलित कर जाते हैं...

देखी थी एक रोज मैने
लाल सूर्ख खून से लथपथ
उस बच्ची की लाश
टीवी पर..
जिसे बलात्कार कर
मार दिया गया....

 

-४-

आजाद सोच की

ये कैसी गिरफ्त है...

जो

आजाद ही नहीं होने देती ...

इतना आसान तो नहीं

इस जिन्दगी को

जी जाना!!

 

-५-

वो आया था
दिन भर की मशक्कत के बाद
पसीने में लथपथ

कुछ देर ठहरा
फिर चला गया!!

उसके पसीने की बू
अब भी ठहरी है
अपनी ललकार लिए!!

सफलता यूँ ही तो
हासिल नहीं होती!!

 

-६-

ओह!!

कितना विस्तार

है इस सागर का...

सौम्य और शान्त

जाने कितना गहरा होगा...

उतरूँ

तो जानूँ...

 

-समीर लाल ’समीर’

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गुरुवार, नवंबर 26, 2009

हे नेता!! तेरी बहुत याद आती है!

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देश है तो जनता है
जनता है तो नेता हैं

नेता है तो गाड़ी है
गाड़ी है तो सड़कें हैं
सड़के हैं तो गढ्ढे हैं
गढ्ढे हैं तो उनको भरने के वादे हैं
वादे करके उनकी सुधि कौन लेता है
वादा खिलाफी है तो नेता हैं.

सड़कें हैं तो भीड़ है
भीड़ है ट्रेफिक जाम है
ट्रेफिक जाम है तो धुँआ है
धुँआ है तो बीमारी है
बीमारी है तो अस्पताल है
अस्पताल है तो डॉक्टर हैं
डॉक्टर हैं तो नर्सें हैं
नर्सें हैं यानि कि लड़कियां हैं
लड़कियाँ हैं तो छेड़खानी है
साथ में चलती मनमानी है
मनमानी जो करते हैं नेता के लड़के हैं
नेता के लड़के हैं तो दबदबा है
दबदबा है तो नेता हैं.

मनमानी है तो बलात्कार है
बलात्कार है तो पुलिस है
पुलिस हैं तो चोर हैं
चोर हैं तो पैसा है
पैसा है तो बिल्डिंगें हैं
बिल्डिंगे हैं तो बिल्डर हैं
बिल्डर हैं तो जमीन के सौदे हैं
जमीन के सौदे हैं तो घोटाले हैं
घोटाले हैं तो नेता हैं.

घोटाले हैं तो घोटाला करने वाले हैं
घोटाला करने वाले हैं तो धन्धे काले हैं
धन्धे काले हैं तो छानबीन वाले हैं
छानबीन यानि कि सरकारी मुलाजिम हैं
सरकारी मुलाजिम हैं तो भ्रष्टाचार है
भ्रष्टाचार है तो नेता हैं.

सरकारी मुलाजिम हैं तो काम चोरी है
कामचोरी है तो हड़ताल है
हड़ताल है तो धरना प्रदर्शन है
धरना प्रदर्शन है तो तोड़ फोड़ है
तोड़फोड़ है तो समाचार है
समाचार है तो मिडिया है
मिडिया है तो नेता हैं.

धरना प्रदर्शन है तो बाजार बंद है
बाजार बंद है तो लोग परेशान हैं
परेशान लोग जनता है
जनता है तो वोट हैं
वोट हैं तो चुनाव हैं
चुनाव है तो ताकत प्रदर्शन है
ताकत प्रदर्शन है तो बूथ केप्चरिंग है
बूथ केप्चरिंग है तो अपराध हैं
अपराध हैं तो नेता हैं.

तो जब कभी
वादा खिलाफी, दबदबे, घोटाले,
भ्रष्टाचार, मिडिया या अपराध
की बात आती है...
हे नेता,
हमको तेरी बहुत याद आती है
.

-समीर लाल ’समीर’

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सोमवार, नवंबर 23, 2009

मायूस होना अच्छा लगता है क्या?

अक्सर ही मैं खोजने लग जाता हूँ अपने भीतर अपने आप को. मैं वो नहीं जो इस जमाने में जीने की जद्दोजहद में वक्त के थपेड़े खाता आज सबके सामने आता हूँ. मैं कभी कुछ और ही था. शायद कल मैं फिर वो न रहूँ जो आज हूँ.

एक बच्चा कहाँ दिल में नफरत या चालबाजी के भाव रखता है? वो तो वक्त, समाज, संगी साथी, समय समय पर खाई चोटें, यह सब सिखला देती हैं.

शायद ऐसा मैं अकेला नहीं जो अपने आपको अक्सर खोजता हो कि अरे, वो वाला मैं कहाँ गया? मैं तो ऐसा नहीं था? सबके साथ ही ऐसा होता होगा.

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कहीं पढ़ता था कि उसे अब अपना पुराना शहर वो वाला नहीं दिखता..जिसमें वो रहा करता था. मैं भी अक्सर अपने शहर जाकर उसके अंदर अपना शहर खोजता हूँ. शहर के भीतर शहर..खीजता हूँ भीड़ भाड़ देखकर. सोचता हूँ भीड़ छटे तो ढूंढू. मगर ये भीड़ कब छटी है, यह तो बढ़ती ही जानी है. और उस भीड़ के बीच कहीं खोया मेरा अपना शहर, जाने इतने समय बाद मुझे पहचान भी पायेगा या नहीं.

सोचता हूँ कि अगर नहीं पहचाना तब? कितना बड़ा धक्का लगेगा मुझे. मैं उसे रोज याद करता हूँ और मुझे पहचान भी नहीं पा रहा है. उससे बेहतर तो है कि न मुझे इस भीड़ में खोया वो मेरा शहर मिले और न मुझे कोई धक्का लगे और मैं उन पुरानी यादों के सहारे ही जिन्दगी काट दूँ. खुद को भी गुमा दूँ ऐसी ही किसी बड़ी भीड़ में. अपने कर्तव्यों की भीड़, अपने दायित्वों की भीड़, अपने नाम को बनाये रखने की मशक्कतों की भीड़. भीड़ की भला कब कमी है.

उसी भीड़ में खोये मेरे अपने. उनकी अपनी भीड़ की गठरी है महत्वाकांक्षाओं की, अपने दायित्वों की, अपने और ज्यादा अपनों की परवरिश की. वैसे ही धक्का लगता है, जब मिलते हैं तो पहचान कर भी पहचान नहीं पाते. बस, मुलाकात होती है, बात होती है और उस दौरान हर पल तलाश होती है उस अपने की, जो ऐसा नहीं था जिससे मैं अभी बात कर रहा हूँ, अभी मुलाकात कर रहा हूँ.

ऐसा नहीं कि मैं अकेला ही बस बदला हूँ, वो भी तो उन सब दौरों से गुजरे हैं अपने तरीकों से, वो भी तो बदले हैं..फिर किस उम्मीद में मैं उनसे वो पुराने वो चाहता हूँ , किसको तलाशता हूँ जबकि मैं खुद वो पुराना मैं नहीं.

मुझे लगता है कि जब भी हम कुछ छोड़ते हैं जैसे कि अपना शहर. हम अपने साथ दिल के किसी कोने में उसी शहर की वो ही तस्वीर साथ लिये चले जाते हैं और जब कभी लौट पाते हैं तो उसी तस्वीर से मिलान करने कोशिश करते हैं और मायूस हो जाते हैं कि अब वो बात नहीं रही. वो बात तो खैर कभी भी नहीं रहती. जो आज बात है वो कल कहाँ थी और वो ही कल कहाँ से रहेगी.

न छोड़ा होता अपना शहर, तब भी शहर बदलता. हम भी बदलते मगर आँखों में बसी तस्वीर भी बदलती जाती हर बदलाव के साथ और हम अचंभित न होते. तब जो कुछ भी दिखता रहता, जैसे जैसे बदलता, वही स्वीकार्य होता.

ऐसा ही अपनों के बारे भी सोच लें तो शायद उनका व्यवहार, उनका बदला स्वरुप, उनके बदले तेवर हमें अचंभित न करें. हम अब वो जैसे हैं, वैसे ही स्वीकार करने को तैयार हो जायें तो शायद यह मायूसी न हो कि बहुत बदल गये हैं अब वो.

वो अकेले नहीं बदले, सारी दुनिया बदली है और मैं और आप भी तो उसी दुनिया का हिस्सा हैं. फिर मायूसी कैसी और अचंभा कैसा?

लेकिन दिल ही तो है कि मानता नहीं और खोजता है फिर वही..कुछ खोई खोई सी दास्तां.

शायद हमें ही मायूस होना अच्छा लगता है.

उदासी दफन कर दी है, उस जमीं के नीचे,
जहाँ आकर यादें रोज, खुशियाँ मनाती हैं....

कहते हैं इस बरस वहाँ फिर मेला भरेगा..

-समीर लाल ’समीर’

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गुरुवार, नवंबर 19, 2009

कोई मेरी मजबूरी भी तो समझो!!

कल अपनी एक फोटो ऑर्कुट और फेस बुक पर क्या चढ़ा दी कि हल्ला ही मच गया. दन दन कमेंट और ईमेल मय समझाईश कि इतना पीना ठीक नहीं.

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अब कैसे समझाऊँ कि भईये, पीना तो हम खुद ही नहीं पसंद करते जब तक की भीषण मजबूरी न हो.

वैसे कई लोगों ने कहा कि इतनी सारी अकेले पियेंगे क्या? अब पहले तो यह जान लें कि एक बंदा तो तस्वीर खींचने वाला है ही जो इसी में से पीने वाला है और तीन फोटो में दायें बायें कट गये हैं और फोटू में फंसे हम अकेले.

वैसे भी साईज के हिसाब से या तो वो तीन ही आ लेते फोटो में या कि हम. उन तीन की फोटो का तो हम क्या करते सो अपनी धरे थे वो ही चिपका दिये.

हाँ, तो हम कह रहे थे कि हमें पीना यूँ तो पसंद नहीं मगर जब मजबूरी आन सामने ही खड़ी हो जाये तो क्या करें??

इन्हीं मजबूरियों को दर्शाते हुए एक रचना लिखी थी ताकि किसी को कन्फ्यूजन न रह जाये, वही फिर से सुना देते हैं ताकि सनद रहे और वक्त पर काम आये:

जब चाँद गगन में होता है
या तारे नभ में छाते हैं
जब मौसम की घुमड़ाई से
बादल भी पसरे जाते हैं
जब मौसम ठंडा होता है
या मुझको गर्मी लगती है
जब बारिश की ठंडी बूंदें
कुछ गीली गीली लगती हैं
तब ऐसे में बेबस होकर
मैं किसी तरह जी लेता हूँ
वैसे तो मुझको पसंद नहीं
बस ऐसे में पी लेता हूँ.

जब मिलन कोई अनोखा हो
या प्यार में मुझको धोखा हो
जब सन्नाटे का राज यहाँ
और कुत्ता कोई भौंका हो
जब साथ सखा कुछ मिल जायें
या एकाकी मन घबराये
जब उत्सव कोई मनता हो
या मातम कहीं भी छा जाये
तब ऐसे में मैं द्रवित हुआ
रो रो कर सिसिकी लेता हूँ
वैसे तो मुझको पसंद नहीं
बस ऐसे में पी लेता हूँ.

जब शोर गुल से सर फटता
या काटे समय नहीं कटता
जब मेरी कविता को सुनकर
खूब दाद उठाता हो श्रोता
जब भाव निकल कर आते हैं
और गीतों में ढल जाते हैं
जब उनकी धुन में बजने से
ये साज सभी घबराते हैं
तब ऐसे में मैं शरमा कर
बस होठों को सी लेता हूँ
वैसे तो मुझको पसंद नहीं
बस ऐसे में पी लेता हूँ.

जब पंछी सारे सोते हैं
या उल्लू बाग में रोते हैं
जब फूलों की खूशबू वाले
ये हवा के झोंके होते हैं
जब बिजली गुल हो जाती है
और नींद नहीं आ पाती है
जब दूर देश की कुछ यादें
इस दिल में घर कर जाती हैं
तब ऐसे में मैं क्या करता
रख लम्बी चुप्पी लेता हूँ
वैसे तो मुझको पसंद नहीं
बस ऐसे में पी लेता हूँ.

चिट्ठाकारी विशेष:

जब ढेरों टिप्पणी मिलती हैं
या मुश्किल उनकी गिनती है
जब कोई कहे अब मत लिखना
बस आपसे इतनी विनती है
जब माहौल कहीं गरमाता हो
या कोई मिलने आता हो
जब ब्लॉगर मीट में कोई हमें
ईमेल भेज बुलवाता हो.
तब ऐसे में मैं खुश होकर
बस प्यार की झप्पी लेता हूँ
वैसे तो मुझको पसंद नहीं
बस ऐसे में पी लेता हूँ.

--समीर लाल 'समीर'

 

अब आप ही बताओ, कितना मजबूर हो जाता हूँ मैं!!

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