गुरुवार, मार्च 31, 2011

ओ साकी! व्यर्थ न हाला जाए!!

पिछली भारत यात्रा के दौरान सायंकालीन महफिलों में लाल और बवाल की संगत नित का नियम सा थीं. उसी माहौल में एक शाम यह रचना लिखी गई और फिर बाद में बवाल ने इसे गा कर जब सुनाया तो सभी झूम उठे. रिकार्डिंग तो उस वक्त नहीं हो पाई मगर बवाल का वादा था कि आप कनाडा पहुँचो और बस, रिकार्डिंग आपके ईमेल में होगी.

तब से ईमेल में आँख गड़ाये बैठे हैं. चलिये, कोई बात नहीं.

वाकिफ तो हूँ उनकी आदत से, मुकर जाने की,
न जाने क्यूँ फिर भी इन्तजार किये जाता हूँ मैं..

रिकार्डिंग फिर कभी आ जायेगी और तब सुना दी जायेगी. अभी तो आप पढ़्कर इस रचना का आनन्द लें.

drink

ओ साथी! क्यूँ मधुशाला जाए, ओ साकी! व्यर्थ न हाला जाए!!

तौल रहा है लिए तराजू, किन बातों में कितना दम है...
जा बैठा मधुशाला में वो, सोच रहा ये कितने गम हैं...
भूल गया था शायद वो यह, इस गम का कारण भी हम हैं...

अपने ही कर्मों के फल का
ये अभिशाप न टाला जाए!!

ओ साथी! क्यूँ मधुशाला जाए, ओ साकी! व्यर्थ न हाला जाए!!

क्यूँ उसका दिवानापन है, भला किसी की वो अपनी है..
जग जाहिर सी यह बात रही कि वो तो बस एक ठगनी है...
होश लूट कर ले जायेगी, इतनी ही उसकी करनी है....

मदहोशी की राह दिखा कर
कब वो गुम हो बाला जाए!!

ओ साथी! क्यूँ मधुशाला जाए, ओ साकी! व्यर्थ न हाला जाए!!

जाने कितने गम के मारे, इसकी धुन पर नाच रहे हैं
जैसे ही मदहोशी टूटी, फिर अपना गम बांच रहे हैं..
अब तक किसका गम हर पाई, क्यूँ न इसको जांच रहे हैं...

दर्देगम जो और बढ़ा दे
वो मर्ज ही न पाला जाए!!

ओ साथी! क्यूँ मधुशाला जाए, ओ साकी! व्यर्थ न हाला जाए!!

फूलों की जो गंध चुरा ले, और भौरों सा झूम रहा हो..
गम से जिसका न (कु)कोई नाता, खुशियाँ देने घूम रहा हो..
देखी जो गैरों की खुशियाँ, अपनी किस्मत चूम रहा हो..

उसी प्याले में पैमाना
भर भर करके ढाला जाए!

ओ साथी! वो मधुशाला आए, ओ साकी! व्यर्थ न हाला जाए!!

-समीर लाल ’समीर’

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रविवार, मार्च 27, 2011

ब्लॉग बेहतर या किताब...परिवर्तन की बयार- भाग २

नोट: राजस्थान पत्रिका के १३ मार्च के अंक में कुछ काट-छांट के बाद प्रकाशित मेरा आलेख. यह आलेख सूचनार्थ ’अपनी माटी वेब पत्रिका’ द्वारा भी छापा गया.

आलेख

नित बहस जारी है साहित्य/ किताब/ पत्रिकायें/चिट्ठा/ अन्तर्जाल. जाने क्या सिद्ध किये जाने की पुरजोर कोशिश. कौन बेहतर, कौन आगे और कौन बाजी जीतेगा.

अभी बहुत समय नहीं बीता है जब आदरणीय श्रीलाल शुक्ल जी की कालजयी पुस्तक ’राग दरबारी’ को नेट पर एक ब्लॉग के माध्यम से लाये जाने का प्रयास किया गया था. इस हेतु आदरणीय़ श्रीलाल शुक्ल जी ने मौखिक स्वीकृति भी दे दी थी. निश्चित ही यह स्वीकृति देते वक्त उनके मन में एक चिट्ठाकार कहलाने का लोभ तो नहीं ही रहा होगा. अगर कोई मंशा होगी तो मात्र इतनी कि इस कालजयी रचना को और अधिक लोग पढ़ें. यूँ भी बिना नेट पर आये उसे पढ़ने वालो की कोई कमी नहीं है फिर भी. उस दौर में मैने भी राग दरबारी को नेट पर लाने के इस अभियान में इसके टंकण में सहयोग कर यथा संभव योगदान किया था और भाई अनूप शुक्ल जी, जो कि इस अभियान के सूत्रधार थे, ने अपनी बात कहते हुए स्पष्ट किया था कि ’किताब नेट पर पूरी उपलब्ध होने पर भी खरीदने वाले इसे खरीदकर पढ़ेंगे ही। इसके नेट पर उपलब्ध होने पर इसकी बिक्री में इजाफ़ा ही होगा, कमी नहीं आयेगी।’

उस दौर में जब हिन्दी के प्रचार एवं प्रसार का ज़ज्बा लिए मात्र मुट्ठीभर १२५ चिट्ठाकार सक्रिय थे और आज भी, जब यह संख्या ३०००० पार कर चुकी है, एक कोशिश हमेशा होती है कि जो साहित्य किताबों में उपलब्ध है या बंद है, उसे अन्तर्जाल पर लाया जाये और एक ऐसे माध्यम पर दर्ज कर दिया जाये जो सर्व सुलभ है और दीर्घजीवी है. विभिन्न आयोजनों के दौरान चाहे फिर वो इलाहाबाद या वर्धा का हिन्दी विश्वविद्यालय का ब्लॉग सम्मेलन रहा हो या अन्य कोई, सभी में प्रख्यात साहित्यकारों को अन्तर्जाल से जोड़ने के प्रयास हुए हैं और यह प्रयास सर्वविदित भी हैं और सर्वमान्य भी. मैने स्वयं भी कितने ही सेमिनारों ,गोष्ठियों और सम्मेलनो के माध्यम से जाने कितने ख्याति लब्ध साहित्यकरों से अन्तर्जाल पर आने का निवेदन किया है और यहाँ तक पेशकश की है कि अगर उम्र के इस पड़ाव में वो नई तकनीक सीखने में असहज महसुस करते हों तो हमें अनुमति दें ताकि हम उनकी रचनायें अन्तर्जाल के माध्यम से सुलभ करायें. 

कुछ स्वभाविक उम्रजनित, अक्षमताओं जनित एवं अहमजनित विरोध भी अन्तर्जाल की ओर आने की दिशा में रहा है मगर वह तो हर परिवर्तन का स्वभाव है और वो पीढ़ी विशेष के प्रस्थान के साथ ही प्रस्थित होगा. उसका कोई विशेष प्रभाव भी नहीं होता मात्र चर्चा के अलावा. चर्चा अवश्य आवश्यक एवं आकर्षक होती है क्यूँकि उसमें विशिष्ट व्यक्ति की स्टेटस की विशिष्टता होती है न कि विचारों की.

परिवर्तन सृष्टि का नियम है और यह निरन्तर जारी रहता है. जिन्दगी में अगर आगे बढ़ना है तो परिवर्तन के साथ कदमताल मिला कर इसे आत्मसात करना होगा.जो अपनी झूठी मान प्रतिष्ठा के चलते उपजे अहंकारवश या उम्रजनित अक्षमताओं की दुहाई देते हुए मजबूरीवश ऐसा नहीं कर पाते, उन्हें अपने पीछे छूट जाने का एवं अस्तित्व को बचाये रखने का भय घेर लेता है. अक्सर जीवन के उस पड़ाव में समय भी कम बचा होने का अहसास होता है अतः नई चीज सीखकर उसे आत्मसात करने की रुचि और उत्साह भी नहीं बच रहता. यही पीढ़ा और खीज असहय हो कुंठा का रुप धारण कर विरोध के रुप में चिंघाड़ती है जिसकी बुनियाद खोखली होती है अतः स्वर तीव्र.

किन्तु ऐसे में भी बहुतेरे आत्म संतोषी विरोध का स्वर न उठा अपने आपको अतीत की यादों में कैद कर जीवन गुजार देते हैं. यूँ भी अतीत की यादें स्वभावतः रुमानियत का एक मखमली लिहाफ ओढ़े सुकून देती हैं और निरुद्देश्य जीवन को खुश होने का एक मौका हाथ लग जाता है भले ही और कुछ हासिल हो न हो. ऐसे लोग ही गाहे बगाहे कहते पाये जाते हैं कि हमारा समय गोल्डन समय था, अब तो जमाना को न जाने क्या हो गया है और भविष्य गर्त में जाता नजर आता है. ऐसे स्वभाव के हर कल ने सदियों से भविष्य को गर्त में ही जाते देखा है. उम्र के इस पड़ाव में यह पीढ़ियाँ भूल चुकी होती हैं कि कभी वह भी ऐसे ही किसी परिवर्तन के वाहक थे जिसे उनके पूर्वज गर्त में जाना कहते कह्ते इस धरा से सिधार गये.

इस तरह से अपने अस्तित्व को परिवर्तन की आँधी से बचाने के लिए अतीत रुपी खम्भे को पकड़े रहना या विरोध में चिल्ला उठना मात्र उन्हें आत्म संतुष्टी देता है किन्तु परिवर्तन होकर रहता है. न कभी समय रुका है और न कभी परिवर्तन की बयार- युग बदलते हैं. विरोध पीढ़ियों की विदाई के साथ रुखसत होता जाता है और जन्म लेता रहता है एक नया विरोध, एक नई पीढ़ी का, एक नये परिवर्तन के लिए, जिसका स्वागत कर रही होती है एक नई पीढ़ी, बहुत उम्मीदों के साथ.

परिवर्तन को रोकने का विचार मात्र नदी के प्रवाह को रोकने जैसा है जो कभी किसी प्रयास से ठहरा हुआ प्रतीत हो तो सकता है किन्तु सही मायने में वो प्रवाह और परिवर्तन ठहरता नहीं. वह उस रुकन को नेस्तनाबूत करने की तैयारी कर रहा होता है, जिसे हम ठहराव मान भ्रमित होते है. यह भ्रम भी क्षणिक ही होता है और देखते देखते ढह जाता है वह रुकन का कारण और प्रयास, वह खो देता है अपना अस्तित्व और बह निकलता है नदिया का प्रवाह अपनी मंजिल की ओर किसी सागर मे मिल उसका हिस्सा बन जाने के लिए या नये प्रवाह/ परिवर्तन को एक स्पेस प्रदान करने के लिए.

आज अभिव्यक्ति के माध्यमों में होते परिवर्तनों और प्रिन्ट/ अन्तर्जाल के बीच छिड़ी जंग देख बस यूँ ही इन विचारों ने शब्द रुप लिया और आपके विचार हेतु प्रस्तुत हो गये.

अन्तर्जाल पर कविता कोष, अभिव्यक्ति, अनुभूति, साहित्य शिल्पी, हिन्दी विकीपिडियागद्यकोष  आदि सभी साहित्य को अन्तर्जाल पर सर्व सुलभ कराने के अभियान के उदाहरण है, जो अपने चरम पर हैं. यहाँ तक कि हमारे ब्लॉग बंधुओं के साझा भागीरथी प्रयासों से राम चरित मानस ब्लॉग स्वरुप में ऑन लाईन किया गया और भरसक मुस्कराते हुए वाह वाही भी ली गई. यह साधुवादी प्रयास था भी इस योग्य.

यदि इस पर गहन विचार किया जाये तो यह तय है कि यह सब जो कार्य किया जा रहा है वो एक उज्जवल भविष्य के निर्माण को दृष्टिगत रख कर किया जा रहा है. इसका तात्कालिक लाभ तो मात्र एक छोटा सा वर्ग उठा रहा है.

आंकड़ों पर नजर डालें तो आज विश्व की मात्र १५% आबादी अन्तर्जाल का प्रयोग कर रही है और इन उपयोगकर्ताओं में भारत ७वें स्थान पर है, जहाँ इसका उपयोग करने वालों की संख्या पूरी आबादी का मात्र २.५०% ही है याने ९७.५०% आबादी का हिस्सा अभी भी अन्तर्जाल से कोई सारोकार नहीं रखता. अगर विकास की दर बहुत त्वरित भी रही तो भी आने वाले २० सालों में यह प्रतिशत बहुत बढ़ा तो चार गुना हो जायेगा याने तब भी ९०% आबादी अन्तर्जाल का उपयोग नहीं कर रही होगी. हालांकि प्रतिशत के बदले यदि संख्या के आधार पर आंका जाये तो यही १०% आबादी की संख्या, कई बड़े देशों की आबादी से अधिक ही होगी, जो की एक बहुत संतोष का विषय है और अन्तर्जाल पर हिन्दी को समृद्ध करने के लिए जूझते लोगों के लिए उत्साहित करने वाला तथ्य है. आने वाले समय में यही संख्या अन्तर्जाल पर हिन्दी से संबंधित पृष्ठों से व्यवसायिक लाभ दिलवाने का भी काम करेगी. हिन्दी किताबों का व्यवसायिक पक्ष तो खैर किसी से क्या छिपा है. वैसे यह १०% का आंकड़ा मैं एकदम आशावादी दृष्टिकोण अपना कर कह रहा हूँ.

ऐसे में एक बहुत बड़ा वर्ग निश्चित रुप से ऐसा बच रह जाता है, जिसे साहित्य एवं पठन पाठन में तो रुचि है किन्तु अन्तर्जाल से कोई संबंध नहीं है. इस वर्ग की जरुरतें पूरी करने हेतु किताबें, पत्रिकाएँ, अखबार आदि ही मुख्य भूमिका निभाते रहेंगे, यह भी तय है.

मेरी पुस्तक ’देख लूँ तो चलूँ’ का विमोचन करते हुए प्रख्यात साहित्यकार श्री ज्ञानरंजन नें अपने उदबोधन में कहा भी था कि ’समीर लाल, एक बड़े और निर्माता ब्लॉगर के रुप में जाने जाते हैं. मेरा इस दुनिया से परिचय कम है. रुचि भी कम है. मैं इस नई दुनिया को हूबहू और जस का तस स्वीकार नहीं करता. अगर विचारधारा के अंत को स्वीकार भी कर लें, तो भी विचार कल्पना, अन्वेषण, कविता, सौंदर्य, इतिहास की दुनिया की एक डिज़ाइन हमारे पास है. यह हमारा मानक है, हमारी स्लेट भरी हुई है.
मेरे लिए काबुल के खंडहरों के बीच एक छोटी सी बची हुई किताब की दुकान आज भी रोमांचकारी है. मेरे लिए यह भी एक रोमांचकारी खबर है कि अपना नया काम करने के लिए विख्यात लेखक मारक्वेज़ ने अपना पुराना टाइपराईटर निकाल लिया है. कहना यह है कि समीर लाल ने जब यह उपन्यास लिखा, या अपनी कविताएं तो उन्हें एक ऐसे संसार में आना पड़ा जो न तो समाप्त हुआ है, न खस्ताहाल है, न उसकी विदाई हो रही है. इस किताब का, जो नावलेट की शक्ल में लिखा गया है, इसके शब्दों का, इसकी लिपि के छापे का संसार में कोई विकल्प नहीं है. यहां बतायें कि ब्लॉग और पुस्तक के बीच कोई टकराहट नहीं है. दोनों भिन्न मार्ग हैं, दोनों एक दूसरे को निगल नहीं सकते."

गौर तलब है कि उनका मानना है कि "ब्लॉग और पुस्तक के बीच कोई टकराहट नहीं है. दोनों भिन्न मार्ग हैं, दोनों एक दूसरे को निगल नहीं सकते." मैं इससे भी आगे की बात कहता हूँ कि दोनों ही वर्तमान में एक दूसरे के पूरक हैं.

आज अन्तर्जाल पर हो रहे प्रयासों को आमजन तक पहुँचाने के लिए प्रिन्ट माध्यमों की जरुरत है, वहीं किताबों, पत्रिकाओं, अखबारों आदि को अपनी पहुँच बढ़ाने के लिए अन्तर्जाल की जरुरत है. जो लोग प्रिन्ट माध्यमों में ब्लॉग की खबर छपने पर खुश हो रहे ब्लॉगरों की खुशी देख उनकी खिल्ली उड़ाने में मगन रहते हैं वो यह भूलवश एवं खुद न छप पाने की आत्म कुंठा से उबरने हेतु ही ऐसा कर रहे हैं, ऐसा मेरा मानना है.

निश्चित ही अन्तर्जाल एक त्वरित, तेज, और व्यापक माध्यम है तो इसके प्रारुप का आधार भी वैसा ही है फिलहाल तो. अन्तर्जाल पर छोटी छोटी प्रस्तुतियाँ जो कम समय में त्वरित रुप से पढ़ी जा सकें, ज्यादा लोकप्रियता हासिल कर लेती हैं. लोगों को लुभाती भी हैं और सुहाती भी हैं. बोझिल और लम्बें आलेख हेतु फिलहाल शायद विषय वस्तु विशेष से संबंधित विशिष्ट उत्सुक्ता रखने वाले वर्ग (इन्टरेस्टेड ग्रुप) को छोड़ किसी के पास समय नहीं है. अतः सीमित शब्दों और पैराग्राफों में बँधे छोटे छोटे आलेख लोकप्रियता का मुकाम हासिल कर लेते हैं हालाँकि यह कोई मानक नहीं है किन्तु फिर भी कम से कम आज तो ऐसा ही होता है .

ठीक इसके विपरीत किताबों की दुनिया में, पाठक समय निकाल कर विस्तार ढ़ूँढ़ता है चाहे वो दृष्यांकन का विस्तार हो या कथानक का.

ब्लॉग का पाठक टिप्पणी या प्रतिक्रिया यह जानते हुए और लिखने के लिए लिखता है कि वो पढ़ी जायेगी, न सिर्फ लेखक के द्वारा बल्कि अन्य पाठकों के द्वारा भी, जो उस टिप्पणी के आधार पर ही टिप्पणीकर्ता का व्यक्तित्व आंकलन करेंगे, यह विशिष्टता शायद इस वजह से भी हो कि वर्तमान में चिट्ठे के पाठक खासतौर पर टिप्पणीकर्ता स्वयं भी अधिकतर चिट्ठाकार ही हैं और उन्हें भी अपनी रचनायें एवं कृतियाँ इन्हीं पाठकों को पढ़वाना होता है.

इससे इतर किताब और पत्रिकाओं का पाठक टिप्पणी लिखता नहीं, पठन के साथ मन ही मन बुनता चलता है और फिर पठन समाप्ति पर अपनी इस बुनावट को काल्पनिक तौर पर निहार कर लेखक एवं उसके लेखन के विषय में एक धारणा स्थापित कर भूल जाता है. उसी लेखक की अगली कृति पर जब उसकी नज़र पड़ती हैं और तो वो उस लेखक के प्रति अपनी अतीत में स्थापित अवधारणाओं को खंगालता है.

यह एक बहुत बड़ा अंतर है अन्तर्जाल पर चिट्ठा अवलोकन और वास्तविक जगत के पुस्तकावलोकन में, जिसे निश्चित ही विचार में लिया जाना चाहिये.

इस आधार पर देखें तो एक दूसरे की पूरक होते हुए भी दोनों फिलहाल अलग अलग दुनिया हैं और निश्चित ही उनमें कोई टकराहट नहीं होना चाहिये और अगर अभियानित धारा के विपरीत धारा में कोई प्रयास होता है, जो कि समय की मांग है, जैसे अन्तर्जाल पर उपलब्ध सामग्री का किताबीकरण, तो ऐसे में इस विचारधारा और आधार को ध्यान में लेना ही होगा. साथ ही ऐसी विपरीत धारा का स्वागत भी होना चाहिये.

अतः ब्लॉग पर प्रकाशित पोस्टों को, जो भले ही ब्लॉग के दृष्टिकोण से अपने आप में पूरी तरह मुक्कमल भी नजर आयें, उन्हें अगर अन्तर्जाल से बाहर रह रहे वर्ग तक पहुँचाने का प्रयास हो तो इस विचार को मद्दे नजर रखते हुए उसी प्रारुप में निकालना ज्यादा श्रेयकर होगा जिस रुप में वो किताब पाठक को अधिक आकर्षित करे. ब्लॉग में अलग अलग समय पर प्रकाशित हुई रचनायें आपस में जोड़ जुड़ाव करके एक ही स्थान पर पढ़ी जा सकती हैं, रिफरेन्स दिये जा सकते हैं मगर किताबों की दुनिया के लिए यह उपयुक्त तरीका नहीं कहलायेगा. किताबों में दृष्टांत दिये जाते हैं और अन्तर्जाल पर लिंक.

अंत में तो लेखक, प्रस्तुतकर्ता और साहित्यकार का निर्णय ही अंतिम और सर्वमान्य होगा, सही या गलत, अच्छे या बुरे का निर्णय भी पाठक ही करेगा,  इस पर टीका टिप्पणी कैसी?

यह तो सिर्फ एक विचार है जो विमर्श मांगता है.

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मंगलवार, मार्च 22, 2011

बेवकूफियों का पुलिंदा

पिछले दिनों वन्दना जी का ईमेल आया कि देर से इत्तला करने की माफी और जल्दी से जल्दी अपनी कोई ऐसी बेवकूफी का प्रसंग भज दें, जो यादगार बन गई हो, होली पर छापना है.

एक बार विचारा तो चारों तरफ अपनी बेवकूफियों का भंडार ही भंडार छितरा नजर आया. शायद नॉन बेवकूफी यादगार पूछी होती तो भेजने में समय लगता. तुरंत भेज दी. छप भी गई. अगर वहाँ न देखी हो तो यहाँ देख लें:

***************************

एक दिन दफ्तर जाने के लिए सुबह सुबह ट्रेन पकड़ी. भीड़ तो काफी थी किन्तु बैठने के लिए सीट मिल गई. अब तक ट्रेन पूरी भर चुकी थी, शायद अगले स्टेशन से पकड़ते तो खड़े खड़े ही जाना पड़ता एक घंटे ऑफिस तक.

अगले स्टेशन पर ट्रेन रुकी तो बहुत से लोग और चढ़े. अब ट्रेन में भी कुच्च्मकुच्चा हो गई. ऐसे में शिष्टाचारवश लोग किसी बुजुर्ग या गर्भवति महिला या छोटे बच्चों के साथ आई महिला के लिए जगह खाली कर देते हैं और खुद खड़े हो जाते हैं. मेरे बाजू में भी एक महिला आ कर खड़ी हुई. देखा तो गर्भवति महिला थी अतः मैं अपनी सीट से खड़ा होकर उनसे आग्रह करने लगा कि आप बैठ जाईये.

उस महिला ने मुझसे कहा कि नहीं, मैं ठीक हूँ. आप बैठिये.

मैने पुनः निवेदन किया कि आप गर्भवति हैं, आपको इतनी दूर खड़े खड़े यात्रा नहीं करना चाहिये, आप बैठ जाईये. देर तक खड़े रहना स्वास्थय और आने वाले बेबी के लिए ठीक नहीं है.

उसने चौंकते हुए मुझे देखा और बोली- मैं..गर्भवति...यू मस्ट बी किडिंग (आप जरुर मजाक कर रहे होंगे) और वो मुँह बनाकर डिब्बे के दूसरी तरफ चली गई.

मैं झेंपा सा अपने आस पड़ोस वालों को देखने लगा. सभी मुस्करा रहे थे. मैने तो बस उसका पेट देख अंदाजा लगाया था. काश, मैं मोटी महिला और गर्भवति महिला का स्पष्ट भेद जानता होता.

मगर अब हो भी क्या सकता था-बेवकूफी तो कर ही बैठे थे. सो अपना सा मुँह लिए वापस बैठ गए सर झुकाये और राम-राम करते रहे, कि जल्दी से जल्दी मेरा स्टेशन आये और मैं उतर कर गुम हो जाऊँ भीड़ में.

आज भी जब यह वाकिया याद आता है तो अपनी बेवकूफी पर एक बार फिर शरम आ जाती है.

fat and pregnant

चलते चलते:

कभी न रहा शर्मिंदा मैं, नमालूम वाणियों की सूफियों से
मगर मैं बच नहीं पाया, गुजर कर अपनी बेवकूफियों से...

और फिर:

खाली बैठा

आज

रोजानामचा (ट्रायल बैलेन्स) बनाता रहा

अपनी समझदारी

और

बेवकूफियों का...

बेवकूफियों का पलड़ा

भारी निकला...

और

अपने हल्केपन को भूल

समझदारियाँ

भरती रहीं

अपनी समझ की

दंभ भरी

उड़ान......

-कितने कमजर्फ होते हैं यह गुब्बारे
जो चंद साँसों में फूल जाते हैं....
थोड़ा ऊपर उठ जायें तो
औकात भूल जाते हैं... (शायर नामालूम)

-संस्मरण द्वारा समीर लाल ’समीर’

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सोमवार, मार्च 14, 2011

अखबार क्या सिर्फ पढ़ा जाता है, जो नेट से काम चल जाये?

रमेश बाबू के साथ आज हम चाय की दुकान पर बैठे थे, रमेश बाबू बातूनी आदमी और हम चुप रहने वाले, हमने अखबार उठा लिया और पढ़ने लगे.मगर रमेश बाबू ... वो कहाँ किसीको चुप रहने दें......कहने लगे कि--- का समीर बाबू... टीवी,मोबाईल, नेट के जमाने मे भी ई ..आर्ट फ़िलम की तरह अखबारे में घुसे रहते हैं ...कभी मौर्डनियाईयेगा कि नहीं? अख़बारों का अब भी कोई मतलब है?

बस, उनके ऐसे ही प्रस्न हमें बर्दाश्त नहीं होते तो हम कहे कि रमेश बाबू, मतलब काहे नहीं है जी अखबार का? यात्रा करना बिल्कुले छोड़ दिये का ? चप्पल काहे में लपेट के धरियेगा.. कपड़ों के बीच वी आई पी सूटकेस में?? बताईये बताईये..और जानिये कि अगर रेल( जैसा कि होइबे करता है ), विलम्ब से चल रही हो और पूरा स्टेशन यात्रियों से खचाखच भरा हो , तब बैठियेगा काहे पर?... कि खड़े खड़े ही आठ घंटा गुजार देंगे?... भीड़ एसन ही तो लग नहीं गई होगी?. आये दिन की पार्टी रैली में से एक यह भी है. सब दिल्ली जायेंगे. अब गई आपकी रिज़र्व सीट भी. उनसे झगड़ियेगा? गुंडा लोगों से..अरे नहीं नहीं, नेता लोगों से? वैसे तो एक ही बात है. तब काहे पर बैठ कर सफर करेंगे? यही अखबार न काम आयेगा…बोलिए....बोलिए ...

चलिए, नहीं जाईये कहीं घूमने फिरने..घर में ही गतियाये किताबें पढ़ते रहिये तो आले में बिना अखबार बिछाये किताबें सजाईयेगा? बताईये-इका.. कौनो आल्टरनेट है?.. और फिर उ... किताब पर तो जिल्द भी इसी से न चढ़ाते हैं कि भूरा पन्ना खरीद के लाते हैं??

गरमी का हालत नहीं देखे हैं का , रमेश बाबू? अभी करंट चला जाएगा तब पढ़ते रहियेगा किताब. बता दे रहे हैं.... कि तब ई अखबार ही काम आयेगा पंखा झलने के.

हमरे गांव की नुक्कड़ पर उ गुमटी वाला तो इसी की पूँगी बना कर चना/चबेना बेचता है सदियों से. काहे गरीब के पेट का ख्याल नहीं आया आपको?..चलिए, न आया होगा इतना संवेदनशील हृदय नहीं होगा. मरने दिजिये उसको भी भूखा. जब चना उगाने वालों को मरने दिये सब लोग, किसी के कान में जूं तक नहीं रेंगी तो इन बेचने वालों की क्या बिसात. इसी अखबार में न छपा था?-- कि कितने किसान आत्महत्या कर लिए थे? बताईये जरा कितने थे? टीवी न्यूज तो रिवाईंड नहीं न कर पायेंगे मगर पुराना अखबार तो बता ही देगा, जरा खोजिये तो.

जाने दिजिये, कहाँ मन खट्टा करियेगा मगर वो छुटकु तो घर में है न..जरा उसकी अम्मा से पूछियेगा...कितने काम आता है अखबार..केतन डायपर घर में खराब करियेगा केतन डायपर घर में खराब करियेगा जी गवैंठी शहरी लेखक...लिख लिख के और कविता गा कर टाटा बिड़ला तो नहिये हो जायेंगे. फिर कैसे अफोर्ड करियेगा? दो जून की रोटी आ रही है लिख लिख कर, इतना ही तरक्की लेखक के लिए एतिहासिक मानिये, कम से कम हिन्दी में और तनि ये भी पूछिएगा कि सिगड़ी काहे से जलाएगी?...और उ महंगावाला सारी...रेसमी के बीच में का धरती है?.....कभी देखे हैं? अउर कभी ड्रायक्लीन/प्रेस को कपड़ा दिए है का? उ धोबी का रखता है कपड़ा का बीच में? अउर जो कभी पिकनिक-विकनिक गए हो तो ई तो जानते ही होंगे कि काहे में खाए थे पूड़ी-सब्जी अउर जो पानी नहीं था तो हाथ भी तो साफ़ करे ही होंगे न....अब कहिए त..अखबारों का कोई मतलब है कि नहीं? ......

अच्छा ये बताईये रमेश बबू, उस रोज जब आप राधेश्याम जी के पिता जी की अर्थी के संग मुँह लटकाये गमगीन मरघटाई चले जा रहे थे, तो कहाँ से जाने थे?-- कि उनके पिता जी गुजर गये. अखबार से ही न... कि कोई लाऊड स्पीकर पर घोषणा हुई थी? या जी टी वी वाला दिखाया था?. जानते तो हैं आप कि जाना कितना जरुरी है, आप नहीं जायेंगे तो ऐसा हादसा सब के साथ होना है, कभी आप के साथ भी होगा तो क्या अकेले ढोकर ले जाईयेगा खुद को?या चलकर जाइयेगा ?.. . बिना अखबार पढ़े तो न जान पाईयेगा कि शहर में कब कौन पहचान का बैकुंठ के राजमार्ग पर चल पड़ा. कभी पुण्य तिथि मिस करियेगा तो कभी तेहरवीं. अकबका कर बस मुँह-बाये हाय हाय करते रहियेगा- कि हम तो जानबे नई करे ....

देखबे करता हूँ कि आप सिनेमा भी बड़े शौक से देखते हैं- आँख मिचका मिचका कर. आखिर तीन घंटे का समय बिना किसी से मूंह छिपाये गुजर भी जाता है, बिना ग्लानि के. तब बताईये कि कहाँ देखियेगा कि कौन सिनेमा कहाँ खेला जा रहा है. टॉकिज टॉकिज तो नहिये घूमियेगा अपनी खटारा स्कूटर लेकर बीबी को बैठाये.

किसी को हम तो खैर नहीं बतायेंगे आपके बारे में मगर आप तो हमें बता ही दिजिये कि सब कर लेंगे मगर सट्टे का नम्बर कहाँ से मिलायेंगे?. हम तो सुने हैं कि पिछले ३० दिन के नम्बर से आप चार्ट बना कर अगले दिन का बड़ा सिद्ध नम्बर निकालते हैं, उसका क्या?

वैसे आपको बता देते है कि ऐसा किसी प्रिंट मिडिया के पत्रकार से मत कह दिजियेगा. उनको बड़ी ठेस पहुँचेगी. आप क्या समझते हैं कि कहीं और वो क्लर्की कर लेंगे. पगार तो बराबर की पा ही जायेंगे मगर वो जो पुलिस और सरकारी अधिकारियों को चमका कर गठरी पाते थे वो क्या आप देंगे? अरे, खुद का तो ठिकाना नहीं, उनको क्या दिजियेगा? उत्ती मोटी गठरी देने लायक जो आप होते तो एसन बात करते भला? और जो देते भी त गठरी को कपड़ा में लपेटते का?

एक बात और बतायें रमेश बाबू, कभी किसी मध्यम वर्गीय भले मानस से पूछियेगा. वो भले ही १५० रुपया अखबार खरीदने में खर्च कर देता हो महिने भर में मगर तीन महिने बाद जब उसे रद्दी वाले को झीक झीक कर के बेच कर ६० रुपये पाता है, उस वक्त उसको जिस आलोकिक सुख की अनुभूति होती है?... वो अद्वितीय है. अह्हा!! आनन्दम आनन्दम!! क्या उसका यह जरा सा सुख भी छीन कर ही मानियेगा?

चौराहा सूना करवाईयेगा क्या? आधा लोग तो चाय-पान की दुकान पर सुबह इक्कठा ही इसलिए होता है कि फ्री का अखबार पढ़ लिया जायेगा. एक पन्ना तू, एक मैं और फिर बदल कर. फिर उस पर चर्चा. कितना अच्छा लगता है चहल पहल देखे है? चौराहे पर. मगर आप कहाँ बर्दाश्त कर पा रहे हैं. न खुदे रौनक पैदा करते है, न कौनो रौनक बच रहने देना चाहते हैं.

कभी सोचे है कि बड़े सरकारी अधिकारी दफ्तर जा कर क्या करेंगे अगर अखबार नहीं आयेगा? मख्खी मारेंगे क्या? मख्खी मारने की तनख्वाह मिलती है भला?और जो उनको नाक-कान में सरसराहट हुई तो बैठे-बैठे .... कितना जरुरी है उनके लिए अखबार.

और फिर जरा ऊँचा दिखने की आपकी ख्वाहिश तो जाने कबकी मर गई है. मरी क्या, थी ही नहीं मगर जिनमें है, उनको तो अंग्रजी का फायनेनशियल टाईम पढ़ते पढ़ते पब्लिक पलेस में जगह जगह अंडरलाईन करने दिजिये. उनकी अभिजात्यता से भी कौनो दुश्मनी है क्या? उ क्या बिगाड़े हैं आपका?

क्या क्या बताया जाये आपको रमेश बाबू, सारे नेता लोगों की रैली में चार ठो लोग इक्कठा हो जायें बिना अखबार के तो बहुत बड़ी बात मानियेगा. कहिये तो लिख कर दे दें.

अच्छा रमेश बाबू, जरा गंभीरता से सोचियेगा कभी कि जवान बिटिया के लिए लड़का तलाशते असफल थका हारा मजबूर बाप अपनी माँ और बीबी के ताने या फिर बेटे की स्कूल की बड़ी फीस चुकाने के बाद खाली जेब लिए अपने बेटे से नये फैशन को वाहियात बताते नई जिन्स के लिए नकारता खीजा हुआ मध्यमवर्गीय बाप, इसी अखबार में तो मुँह छिपा कर अपनी हताशा और खीज को ढांक अपने मुखिया होने की रक्षा करता है.

ये वो ही अखबार है जो हर भिनसारे दुनिया भर के बड़े बड़े दुखों को मुख्य पृष्ट पर छाप कर लोगों को अहसास दिलाता है कि तुम्हारा दुख कितना छोटा है और उन्हें हौसला देता है अपने दुखों को भूल एक और दिन हिम्मत से जीने का.

कितनी बड़ी सामाजिक जिम्मेदारी निभाता है हमारा यह अखबार.

यह भला कभी भी अपनी प्रासंगिगता खो सकता है?

आप नहीं न समझ पायेंगे!!! रमेश बाबू!! आप तो चाय पिजिये!


Akhbaar


वो

रोज मुझे पढ़ती है

कभी मेरे दुख

कभी खुशियाँ

कभी रंगीनियाँ

तो कभी

काले हर्फों में दर्ज

मेरे अवसाद

और

फिर

सर झटक कर

मगन हो जाती है

अपनी किसी और दुनिया में...

अखबारों की भला उम्र ही कितनी होती है!!!

-समीर लाल ’समीर’

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बुधवार, मार्च 09, 2011

आशंकित मन: एक बुजुर्ग की डायरी-३

जब से पत्नी गुजरी, हर सुबह एक अलग तरह से जागती है, आज वो खिड़की से आते एक सर्द झोकें के साथ दालान में बैठे बेटे बहु की फुसफुसाहट की आवाज के साथ जागी.

आज देर तक सो गया अन्यथा बेटे बहु के जागने के पहले ही मैं दालान में पहुँच जाता हूँ और फिर जब वो जाग कर बाहर आते हैं, तब तक मैं अखबार का पहला पन्ना लगभग पढ़ चुका होता हूँ. बेटे के आते ही मैं न जाने किस अनजान भयवश अखबार उसके आगे उसके पढ़ने के लिए कर देता हूँ. वह अखबार हाथ से लेते हुए कहता भी है कि नहीं, आप पहले पढ़ लीजिये मगर मेरे एक आग्रह पर वो पढ़ने लगता है. हालांकि अखबार मेरे शहर का है, जहाँ मुझे रोज रहना है और उसे कल को चले जाना है मगर फिर भी. कहीं टोक न दे कि आपके पास तो सारा दिन है पढ़ने को. लगभग रोज सुबह की चाय इस तरह साथ होती है. बस, सिर्फ यही एक ऐसा समय होता है जब सिर्फ हम साथ बैठे होते हैं.

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बेटा बहु कुछ दिनों की छुट्टियाँ बिताने घर आये हैं. कहते तो हैं कि मेरे साथ समय बिताने आये हैं लेकिन अक्सर ही दोनों अपने कमरे में बंद टीवी देखते रहते हैं या फिर कहीं अपने दोस्तों के साथ बाहर सिनेमा देखने या होटल गये होते हैं. हर बार मुझे समझा देते हैं कि मुझे साथ इसलिए नहीं लेकर जाते कि मैं थक जाऊँगा या मुझे तकलीफ होगी या बाहर ठंड बहुत है.

फुसफुसाहट से नींद खुलते ही न जाने क्यूँ मुझे लगा कि जैसे वो मेरे बारे में ही बात कर रहे होंगे. मैं उठकर खिड़की से सटकर खड़ा हो गया और उनकी बातें सुनने लगा. अपने किसी दोस्त के परिवार की चर्चा कर रहे थे और उन बातों पर हँस रहे थे. एकाएक नौकर चाय लेकर पहुँचा तो बहु ने उससे पूछा कि बाबू जी जागे नहीं क्या? कमरा बंद करके सोता हूँ तो नौकर को पता ही न था कि मैं जाग गया हूँ. उसने कह दिया कि अभी सोये हैं.

मैं आशान्वित था कि अब मेरा जिक्र आ गया है तो नौकर के हटते ही मेरी बात होगी. न जाने क्यूँ मुझे हमेशा लगता है कि पीठ पीछे ये मेरे बारे में बात करते हैं. मैं १५ मिनट तक जड़ खड़ा रहा और खिड़की के पीछे.से एक एक बात सुनता रहा किन्तु मेरा जिक्र न आया और फिर दोनों किसी बात पर हँसते हुए उठे और अपने कमरे में चले गये.

तब मैं कमरे के बाहर आया और दालान में आकर कुर्सी खींच कर बैठ गया और अखबार पढ़ने लगा. नौकर चाय ले आया.

रोज जिस चाय की उष्मा से मुझे उर्जा मिलती थी, स्फूर्ति मिलती थी और मैं तरोताजा हो जाया करता था, आज वही उष्मा मेरे भीतर अंगार सी उतर रही थी और न जाने कैसी अजब सी कमजोरी का अहसास करा रही थी.

गुलाबी ठंडक वाली सुबह की शीतल बयार मेरे शरीर को जला रही थी और मैं पसीने में भीगा यह सोच रहा था कि अब कल सुबह ही बेटे बहु के साथ बैठना हो पायेगा.

किसी ने सही ही कहा है कि अक्षमतायें और असुरक्षा की भावना अपने साथ कितनी ही आशंकायें लेकर आती हैं

न जाने कहाँ से छा गये ये कुहांसे
खुशी हो किसी की, हुए हम रुआँसे
सुबह आ के धीरे से कहती है हमसे
चलो जाग जाओ, कि बाकी हैं सांसे...

-समीर लाल ’समीर’

पिछले अंक:

पीले पन्नों पर दर्ज हरे हर्फ : एक बुजुर्ग की डायरी-१

चितरंजन अस्पताल का कमरा नं. ४११: एक बुजुर्ग की डायरी-२ 

नोट: संभवतः यह नोस्ट्स कल को किसी उपन्यास का हिस्सा बनें…..

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रविवार, मार्च 06, 2011

कॉफी हाऊस में शाम…

तनेजा जी मित्र हैं अतः ये बात जोर देकर साधिकार कहते हैं, ’अमां, तुम समझते नहीं. हम जहाँ हैं, वहाँ शहर की चारों दिशाओं से आकर सड़कें खत्म हो जाती है.’

दरअसल, हम कुछ मित्र रोज ही शाम को शहर के चौक बाज़ार के कॉफी हाऊस में बैठ कर कॉफी पीते-समय गुजारा करते थे. मेरा मानना होता कि इस चौराहे पर आकर सड़कें खत्म नहीं होती बल्कि इस चौराहे पर आप कहीं से भी आयें, आपको चार विकल्प मिलते हैं कि अगर चाहो तो जिस राह आये हो उसी राह वापस लौट जाओ या फिर अन्य तीन में से कोई सी चुन कर नई मंजिल की ओर बढ़ जाओ. जीवन में भी न जाने कितने ही ऐसे चौराहे मिलते हैं. कुछ उसे राह का ख्त्म हो जाना मान मंजिल मान लेते हैं तो कुछ नई मंजिल तक पहुँचने के लिए उपस्थित विकल्प. स्थितियाँ सभी के लिए एक सी उपस्थित होती हैं बस यह आपकी सोच पर आधारित है कि आप उसे किस रुप में लेते हैं, मै हमेशा तीन में से विकल्प तलाश कर नई मंजिल की ओर बढ़ चलता हूँ।.

मित्र मंडली में सभी को पता रहता था कि शाम की महफिल कॉफी हाऊस में जमेगी. जैसे जैसे जिसे दिन भर के काम से निवृत हो कर समय मिलता जाता, आकर वहाँ जम जाता. वो कोने वाली १२ कुर्सियों से घिरी टेबल नित हमारा इन्तजार करती. सफेद कोट और पैन्ट में हरी बेल्ट और फुनगी वाली टोपी लगाया वेटर ’श्रीनि’ भी लगभग तय था और वो जानता था कि कौन कैसी कॉफी पीता है. उसे यह भी पता था कि तिवारी जी कॉफी के साथ दो ब्रेड बटर स्लाईस भी लेते हैं और अग्रवाल जी ८.३० बजे के आसपास डोसा खाकर घर लौटते हैं क्यूँकि वो घर पर अकेले ही रहते हैं और खाना बनाने के लिए उनके पास न तो व्यवस्था है और न हुनर. अग्रवाल जी अक्सर दुखी मन से कहते सुने जाते थे कि काश!! रसोई भी देश की सरकार के समान होती तो झंझट ही खत्म हो जाता, बिना व्यवस्था और हुनर के भी चल ही जाती.

मैं सोचा करता था कि श्रीनि का पूरा नाम शायद कभी माँ बाप ने बड़े जतन से श्रीनिवास रखा होगा लेकिन फिर खुद ही प्यारवश और सुविधा के लिए घर में श्रीनि पुकारने लगे होंगे. पूछने पर उसने बताया कि नहीं, उसका पूरा नाम वैंकटैय्या श्रीनिवासन है और ’श्रीनि’ श्रीनिवासन से निकला है. मुझे अचरज हुआ कि श्रीनि ही क्यूँ, वैंकी क्यूँ नहीं? अव्वल तो नाम उसका, मुझे अचरज करने की क्या वजह? किन्तु कॉफी हाऊस में खाली बैठे हिन्दुस्तानी, उनसे और आशा भी क्या की जा सकती है जबकि व्यस्त हिन्दुस्तानी तक उन्हीं बातों में व्यस्त हैं, जिनसे उनका कुछ लेना देना नहीं. फिर भी श्रीनि ने ही निराकरण भी किया कि उसके बड़े भाई का नाम वैंकटैय्या राधाकृष्णन है और ’पहले आओ, पहले पाओ’ की स्कीम में उसने वैंकी पर अधिकार जमाया हुआ है.

तब उस शाम मित्रों के बीच चर्चा का विषय यही बना कि आखिर भारत में हम अधिकतर हर व्यक्ति के दो नाम रखने में क्यूँ विश्वास रखते हैं. एक घर का, एक बाहर का. माना कि घर में उस व्यक्ति को ज्यादा बार बुलाने में/पुकारने में मेहनत कम करना पड़े तो नाम छोटा करके या प्यार वाला नाम पुकार कर काम चला सकते हैं तो फिर बाहर वालों से ऐसी क्या दुश्मनी कि उनसे ज्यादा मेहनत करवाने की ठान बैठे. उनके लिए भी वही प्यारा वाला नाम रख छोड़ते?

किन्हीं मित्र का कहना था कि वो तो छोटे नाम से हम स्नेहवश एवं अपनेपन के कारण पुकारते हैं. मैं समझ नहीं पाता कि फिर बाहर वालों से आप बाई डिफाल्ट ऐसा ही क्यूँ मान कर चल रहे हैं कि वो स्नेहवश न पुकारेगा या अपनेपन से पेश न आयेगा. यह तो कुछ कुछ पूर्वाग्रह पाल लेने जैसा हुआ.

पूरी शाम गुजरी वैसी ही और जैसी कि उस कॉफी हाउस में अधिकतर शामें गुजरती थीं, कोई निष्कर्ष न निकला दो नामों के औचित्य पर और बस मान लिया गया कि ऐसा ही होता है तो होता है. इसमें बहस कैसी?

सभी मुस्कराते हुए घर लौट लिए, मानों संसद से लौटते सांसद हों. निष्कर्ष निकले या न निकले, कोई फर्क नहीं पड़ता-दिन निकल जाना चाहिये, बस!!

 

coffeehouse

यूँ ही कुछ और:

बड़ी बेशऊर होती है वो खिड़कियाँ
जो भीतर का नज़ारा दिखलायें......
कभी खुद को जिताने की खातिर
वो अपनों को ही हारा दिखलायें...

-समीर लाल ’समीर’

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बुधवार, मार्च 02, 2011

युगपुरुष

उस रात किसी बड़ी किताब का भव्य विमोचन समारोह था. यूँ भी हिन्दी में किताबों के बड़े या छोटे होने का आंकलन उसके लेखक के बड़े या छोटे होने से होता है और लेखक के बड़े या छोटे होने का आंकलन उसके संपर्कों के आधार पर.

बड़े लेखक की बड़ी किताब का विमोचन हो तो विमोचनकर्ता का बड़ा होना भी जाहिर सी बात है. अतः इस समारोह के विमोचनकर्ता भी बहुत बड़े और नामी साहित्यकार थे. वह इतना अच्छा लिखते हैं कि वर्षों से इसी चक्कर में कुछ लिखा ही नहीं (शायद भीतर ही भीतर यह भय सताता हो कि कहीं कमतर न आंक लिए जाये) मगर फिर भी, नाम तो चल ही रहा है.

अधिकतर अच्छा लिखने वालों के साथ यही विडंबना है कि वो इतना उत्कृष्ट लिखते हैं, इतना अच्छा लिखते हैं कि कुछ लिख ही नहीं पाते. बरसों बरस बीत जाते हैं उनका अच्छा लिखा पढ़ने को. बस, उनसे दूसरों के बारे में सुनने और पढ़ने के लिए यही मिलता चला जाता है कि फलाने ने अच्छा लिखा और ढिकाने ने खराब. सलाह भी उन्हीं की ओर से लगातार बरसती है कि अच्छा लिखने की कोशिश होना चाहिये साहित्य को धनी बनाने के लिए. वे बिना अपना योगदान देखे, हर वक्त दुखी नजर आते हैं कि आजकल अच्छा नहीं लिखा जा रहा है और यह चिन्ता का विषय है.

मंचासीन श्रृद्धास्पद विभूतियों में एक तो लेखक स्वयं, फिर मुख्य अतिथी की आसंदी को सुशोभित करते ’सुकलम सम्मान’, २००८ से सम्मानित वरिष्ठ साहित्यकार, कविमना, उपन्यासकार, आलोचक माननीय श्रद्धेय आचार्य श्री चंडिका दत्त शास्त्री, किताब के प्रकाशक एवं कार्यक्रम के संचालक स्थानीय साहित्यकार एवं कवि श्री विराट स्तंभी जी.

सस्वर सरस्वती पूजन, माल्यार्पण आदि के बाद संचालक महोदय ने माईक संभाला और मुख्य अतिथि का परिचय प्रदान करते हुए स्तुति गान में ऐसा रमे कि यह कह कर मुस्कराने लगे कि माननीय मुख्य अतिथी श्रद्धेय आचार्य श्री चंडिका दत्त शास्त्री पुरुष नहीं हैं.

इतना कह वह मौन हो गये और मुस्कराते हुए मंच से लोगों के हावभाव देखते रहे. पूरे हॉल में इस सनसनीखेज खुलासे की वजह से सन्नाटा छा गया. सब छिपी आँख एक दूसरे को देखने लगे. संपूर्ण मंच भी असहज सा नजर आने लगा तब श्री विराट स्तंभी जी आगे बोले कि माननीय मुख्य अतिथी श्रद्धेय आचार्य श्री चंडिका दत्त शास्त्री जी पुरुष नहीं, महापुरुष हैं. तब जाकर सभागृह में जान लौटी. श्री विराट स्तंभी जी के इस बयान से उनके सहज हास्य बोध का परिचय मिला जबकि कर्म एवं नाम से वह वीर रस हेतु प्रख्यात हैं. पूरे सभागृह में करतल ध्वनि की गुंजार उठ खड़ी हुई.

विचार आया कि यदि दो वाक्यों के बीच मौन के दौरान बिजली महारानी की कोप दृष्टि पड़ जाती, तब क्या होता?

अपनी बात आगे बढ़ाते हुए श्री विराट स्तंभी जी नें अन्य बातों के अलावा यह भी बताया कि माननीय मुख्य अतिथी श्रद्धेय आचार्य श्री चंडिका दत्त शास्त्री  एक व्यक्ति नहीं, अपने आप में संपूर्ण संस्था हैं.

संस्था का नाम सुनते ही मेरी रीढ़ की हड्ड़ी में न जाने क्यूँ एक अरसे से एक सुरसुरी सी दौड़ जाती है. एक चित्र खींच आता है मानस पटल पर किसी संस्था का, जिसे अपने पापों, घोटालों को अंजाम देने के लिए सबसे मुफीद और पावन उपाय मान व्यक्ति, व्यक्ति न रह संस्था में बदल जाता है. फिर गोपनीय वार्षिक बैठक, बेनामी पदाधिकरी और स्वयंभू अध्यक्ष की आसंदी पर विराजमान स्वयं वह.

देश में आजतक जितना संस्थाओं के नाम पर घोटालों को अंजाम दिया गया है, उतना शायद ही कहीं और हुआ हो किन्तु फिर भी यह प्रचलन हर जगह और खास तौर पर ऐसे समारोहों में मुख्य अतिथि के लिए लगातार देखने मिलता रहता है कि वह व्यक्ति नहीं, एक संस्था हो गये हैं.

शायद संस्था ही वह वजह हो जिससे उनका स्टेटस बिना बरसों तक लिखे भी बहुत ऊँचा लिखने वाले का बरकरार रहा आया हो, कौन जाने? संस्था के भीतर की बात जानना तो सरकारी ऑडीटर के लिए भी टेढ़ी खीर ही रहा है अतः भीतर जाने की बजाय वो बाहर के बाहर पैसे लेकर निपटारा करना सदा से सरल उपाय मानता रहा है. यह पुराणों में भी संस्था और ऑडीटर दोनों के लिए ही सहूलियत का मार्ग माना गया है. 

खैर, समारोह बहुत भव्य रहा. उतना ही भव्य मुख्य अतिथि का उदबोधन जिसमें उन्होंने पुनः साहित्य और लेखन के गिरते स्तर पर गहरी चिन्ता जतलाई और इस पुस्तक को इस दिशा में सुधार लाने का एक ऐतिहासिक कदम निरुपित किया.

इस कार्यक्रम के बाद एक और वरिष्ट साहित्यकार की श्रद्धांजलि सभा में जाना था. वहाँ भी श्रद्धांजलियों के दौर में अनेक संदेशों में मृतात्मा को एक व्यक्ति नहीं, युग बताया गया और उनके अवसान को एक युग का पटाक्षेप.

एक युग के भीतर समाप्त होते अनेक युग, हर वरिष्ठ, हर गरिष्ठ के प्रस्थान के साथ एक युग का पटाक्षेप, और एक ऐसे रिक्त का निर्माण, जिसकी भरपाई कभी संभव नहीं. शुरु से आजतक ऐसे रिक्त स्थानों की जिनकी भरपाई संभव न थी, एक एक बिन्दी के आकार का भी गिन लें तो शीघ्र ही, या कौन जाने पूर्व में ही, शायद ही कोई स्थान बचे जो रिक्त न हो.

 

literature

कैसी ये
भीषण त्रासदि
न गरीब बचे,
न अमीर

भाषा
संवेदनशीलता
इन्सानियत
सब जाते रहे....

एक उम्मीद थी जिनसे
लिखेंगे शोकगीत इनपर
उनका भी यूँ गुजर जाना

एक युग की समाप्ति नहीं
तो और क्या है?

-समीर लाल ’समीर’

<< आज उड़न तश्तरी के ५ साल पूरे हुए. इस बीच आपसे प्राप्त स्नेह और उत्साहवर्धन के लिए हृदय से आभारी. कृपया अपना स्नेह बनाये रखें>>

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रविवार, फ़रवरी 27, 2011

फिर एक नाकामी हाथ लगी!!!

टेबल लेम्प की फीकी रोशनी. सामने टेबल पर एक काँच का गिलास और उसमें बची दो घूँट स्कॉच. उसी टेबल पर छितराये कुछ कोरे कागज, एक पेन्सिल और बगैर जिल्द वाली कोई पुरानी शेरो शायरी की किताब.

मुझे बाँसुरी बजाना नहीं आता..वरना बहुत पहले तुम्हें सम्मोहित करने को धुन छेड़ चुका होता. मलाल बहुत से हैं मेरे जीवन में, उनमें से एक यह भी है.

हाथ मसलता हूँ आपस में और फिर...

पैंसिल उठाकर उसको मानिंद बाँसुरी लगा लेता हूँ अपने ओठों से और जाने क्यूँ, कुछ धुन छेड़ देने को जी चाहता है.

फिर मन हार, कागज पर कुछ लकीरें खींच, आड़ी तिरछी- उसमें तुम्हें खोजता हूँ.

पानी लेने रसोई तक जाना होगा. उदासी आलस बन गई.

ऐसे ही नीट स्कॉच गले से उतार लेता हूँ और अहसासता हूँ उतरते उस आग के गोले को- हलक से पेट की गहराई तक.

आँख में जलन उतर आती है एक चमकीली लाल डोरी के साथ. एक छोटी सी बूँद बह निकली आंसू की-मानो तुम्हारी याद जिसे वो चमकीली डोरी बाँध के न रख पाई.

ओंठों को गोल कर-एक भरपूर कोशिश- सीटी बजा कोई दिली धुन निकालने की.

बस, एक फुसफुसाहट-कोरी हवा की.

आज फिर एक नाकामी हाथ लगी!!!

यूँ ही तमाम होगी एक दिन- ये याद, ये इन्तजार की घड़ी और मेरी जिन्दगी!!!

















जब भी उठती है
कहीं दूर वादियों में
बाँसुरी की धुन....

जाने क्यूँ...
बहुत याद आती हो
तुम!!!

-समीर लाल ’समीर’

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बुधवार, फ़रवरी 23, 2011

साहित्य और अन्तर्जाल...परिवर्तन की बयार- भाग १

परिवर्तन सृष्टि का नियम है और यह निरन्तर जारी रहता है. जिन्दगी में अगर आगे बढ़ना है तो परिवर्तन के साथ कदमताल मिला कर इसे आत्मसात करना होगा.जो अपनी झूठी मान प्रतिष्ठा के चलते उपजे अहंकारवश या उम्रजनित अक्षमताओं की दुहाई देते हुए मजबूरीवश ऐसा नहीं कर पाते, उन्हें अपने पीछे छूट जाने का एवं अस्तित्व को बचाये रखने का भय घेर लेता है. अक्सर जीवन के उस पड़ाव में समय भी कम बचा होने का अहसास होता है अतः नई चीज सीखकर उसे आत्मसात करने की रुचि और उत्साह भी नहीं बचा रहता. यही पीड़ा और खीज असह्य हो कुंठा का रुप धारण कर विरोध के रुप में चिंघाड़ती है जिसकी बुनियाद खोखली होती है और स्वर तीव्र.

किन्तु ऐसे में भी बहुतेरे आत्म संतोषी विरोध का स्वर न उठा अपने आपको अतीत की यादों में कैद कर जीवन गुजार देते हैं. यूँ भी अतीत की यादें स्वभावतः रुमानियत का एक मखमली लिहाफ ओढ़े सुकून का अहसास देती हैं और निरुद्देश्य जीवन को खुश होने का एक मौका हाथ लग जाता है भले ही और कुछ हासिल हो न हो. ऐसे लोग ही गाहे बगाहे कहते पाये जाते हैं कि हमारा समय गोल्डन समय था, अब तो जमाने को न जाने क्या हो गया है और भविष्य गर्त में जाता नजर आता है. ऐसे स्वभाव के हर कल ने सदियों से भविष्य को गर्त में ही जाते देखा है. उम्र के इस पड़ाव में यह पीढ़ियाँ भूल चुकी होती हैं कि कभी वह भी ऐसे ही किसी परिवर्तन के वाहक थे जिसे उनके पूर्वज गर्त में जाना कहते कहते इस धरा से सिधार गये.

इस तरह से अपने अस्तित्व को परिवर्तन की आँधी से बचाने के लिए अतीत रुपी खम्भे को पकड़े रहना या विरोध में चिल्ला उठना मात्र उन्हें आत्म संतुष्टी देता है किन्तु परिवर्तन होकर रहता है. न कभी समय रुका है और न कभी परिवर्तन की बयार- युग बदलते हैं. विरोध पीढ़ियों की विदाई के साथ रुखसत होता जाता है और जन्म लेता रहता है एक नया विरोध, एक नई पीढ़ी का, एक नये परिवर्तन के लिए, जिसका स्वागत कर रही होती है एक नई पीढ़ी, बहुत उम्मीदों के साथ.

परिवर्तन को रोकने का विचार मात्र नदी के प्रवाह को रोकने जैसा है जो कभी किसी प्रयास से ठहरा हुआ प्रतीत तो हो सकता है किन्तु सही मायने में वो प्रवाह और परिवर्तन ठहरता नहीं. वह उस रुकन को नेस्तनाबूत करने की तैयारी कर रहा होता है, जिसे हम ठहराव मान भ्रमित होते है. यह भ्रम भी क्षणिक ही होता है और देखते देखते ढह जाता है वह रुकन का कारण और प्रयास, वह खो देता है अपना अस्तित्व और फिर बह निकलता है नदिया का प्रवाह अपनी मंजिल की ओर किसी सागर मे मिल उसका हिस्सा बन जाने के लिए या नये प्रवाह/ परिवर्तन को एक स्पेस/यथोचित प्रदान करने के लिए.

आज अभिव्यक्ति के माध्यमों में होते परिवर्तनों और प्रिन्ट/ अन्तर्जाल के बीच छिड़ी जंग देख बस यूँ ही इन विचारों ने शब्द रुप लिया. आज किताबों में उपलब्ध हिन्दी साहित्य को अन्तर्जाल पर लाने का एक भागीरथी प्रयास अपना आगाज़ कर चुका है.नया अन्तर्जाल और किताबों में समानान्तर दर्ज होता चल रहा है.

कुछ स्वभाविक उम्रजनित, अक्षमताओं जनित एवं अहमजनित विरोध भी अन्तर्जाल की ओर आने की दिशा में रहा है मगर जैसा कि पहले कह चुका हूँ कि वही तो हर परिवर्तन का स्वभाव है और वो पीढ़ी विशेष के प्रस्थान के साथ ही प्रस्थित होगा. उसका कोई विशेष प्रभाव भी नहीं होना है मात्र चर्चा के अलावा. चर्चा अवश्य आवश्यक एवं आकर्षक होती है क्यूँकि उसमें विशिष्ट व्यक्ति की स्टेटस की विशिष्टता होती है न कि विचारों की.

मुझे न जाने क्यूँ ऐसा लगता है कि मेरा यह विचार कुछ विमर्श मांगता है.

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मैं

अतीत के गलीचों पर

नृत्य करता

अपने में मगन

न जाने कहाँ खो गया....

जमाना बदला....

और

आज खुद को तलाशता हूँ

मैं!!!

-समीर लाल ’समीर’ Indli - Hindi News, Blogs, Links

सोमवार, फ़रवरी 21, 2011

समीर जी अपनी बात कहीं से भी शुरू  करें, बखूबी अपना संदेश पाठकों तक पहुँचाने में सक्षम हैं: विजय तिवारी ' किसलय '

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भाई समीर लाल ’समीर’ की पुस्तक ’देख लूँ तो चलूँ’ पर बात करने के पूर्व उनके बारे में बताना भी आवश्यक है क्योंकि कृति और कृतिकार एक तरह से संतान और जनक जैसे होते हैं. जनक का प्रभाव अपनी संतान पर स्पष्ट रूप से देखा जाता है. अड़तालीस वर्षीय भाई समीर जी पैदा तो हुए थे रतलाम में, परन्तु अध्ययन एवं संस्कार उन्होंने संस्कारधानी में प्राप्त किये. आप म.प्र. विद्युत मंडल के पूर्व कार्यपालक निदेशक इंजी पी.के.लाल जी के सुपुत्र हैं. चार्टर्ड एकाउंटेंसी भारत में एवं मेनेजमेंट एकाउंटेंसी अमेरीका से की. सन १९९९ के बाद आप कनाडा के ओंटारियो में निवास करने लगे. कनाडा के एक प्रतिष्ठित बैंक में तकनीकी सलाहकार होने के साथ साथ आप टेक्नोलाजी पर नियमित लेखन करते हैं.

आपका एक लघुकथा संग्रह ’मोहे बेटवा न कीजो’ के साथ ही वर्ष २००९ में चर्चित एवं लोकप्रिय काव्य संग्रह ’बिखरे मोती’ भी हिन्दी साहित्य धरोहर में शामिल हो चुके है. इसमें गीत, छंदमुक्त कविताएँ, गज़लें, मुक्तक एवं क्षणिकाएँ समाहित हैं. एक ही पुस्तक में पाँच विधाओं की ये अनूठी पुस्तक भाई समीर के चिन्तन का प्रमाणिक दस्तावेज की तरह है.

हिन्दी और हिन्दुस्तान से दूर समन्दर पार कनाडा में अपनों की कमी का अहसास आज भी समीर जी को कचोटता है. इसी कसक ने समीर जी को पहले ई-कविता के याहू ग्रुप से जोड़ा और बाद में ब्लाग्स के आने पर आप अपने हिन्दी ब्लॉग ’उड़न तश्तरी’ के माध्यम से संपूर्ण विश्व के चहेते बने हुए हैं. ब्लागरों के बादशाह समीर भाई के ब्लॉग को विश्व का सर्वश्रेष्ठ हिन्दी ब्लॉग सम्मान भी प्राप्त हो चुका है. आप विश्व के शीर्षस्थ ब्लागर हैं. ब्लॉग पर आपकी जादुई कलम की पूरी दुनिया कायल है. इसके साथ ही टोरंटो कनाडा एवं अमेरीका से निकलने वाली पत्रिका ’हिन्दी चेतना’ के आप नियमित व्यंग्यकार हैं. आप कनाडा में हिन्दी रायटर्स गिल्ड एवं अन्य संस्थाओं के शताधिक सदस्यों के साथ

मासिक कथा एवं काव्य गोष्ठियों सहित अन्य कार्यक्रमों में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं.

अब हम बात करते हैं ’देख लूँ तो चलूँ’ कृति की. वरिष्ठ साहित्यकार एवं ब्लागर श्री पंकज सुबीर जी के शिवना प्रकाशन सीहोर, मध्य प्रदेश, भारत से प्रकाशित यह कृति ’देख लूँ तो चलूँ’ चौदह उपखण्डों में लिखी संस्मरणात्मक, वैचारिक, तात्कालिक अन्तर्द्वन्द्व की अभिव्यक्तियों का संग्रह है. लेखक ने विवरणात्मक शैली को अपनाकर सामाजिक सरोकार, विषमताएँ, सामाजिक, धार्मिक, व्यक्तिगत, प्रशासनिक कठनाईयों का चित्रण करते हुए पाठकों के साथ तादात्म्य बैठाने में सफलता प्राप्त की है.

मित्र के गृह-प्रवेश की पूजा में अपने घर से ११० किलोमीटर दूर कनाडा की ओंटारियो झील के किनारे बसे गाँव ब्राईटन तक कार ड्राईव करते वक्त हाईवे पर घटित घटनाओं, कल्पनाओं एवं चिन्तन श्रृंखला ही ’देख लूँ तो चलूँ’ है. यह महज यात्रा वृतांत न होकर समीर जी के अन्दर की उथल-पुथल, समाज के प्रति एक साहित्यकार के उत्तरदायित्व का भी सबूत है. अवमूल्यित समाज के प्रति चिन्ता भाव हैं. हम यह भी कह सकते हैं कि इस किताब के माध्यम से मानव मानव से, पाठक पाठक से सीधा वैचारिक सेतु बनाने की कोशिश है क्योंकि कहीं न कहीं कोशिशें कामयाब होती ही हैं.

कृति का पहला उपखण्ड मांट्रियल की पूर्वयात्रा से प्रारम्भ होता है जिसमें उनकी सहधर्मिणी साथ होती हैं परन्तु यह यात्रा उन्हें अकेले ही करना पड़ रही है. बस यहीं से उनकी विचार यात्रा भी शुरु होती है. यात्रा के दौरान आये विचारों को श्रृंखलाबद्ध कर समीर जी ने पाठकों के साथ सीधा सम्बन्ध बनाया है. कहीं वे सिगरेट पीती महिला को सिगरेट पीने से रोकना चाहते हैं तो कहीं कनाडा में बसे पुरोहित के तौर तरीके बताते हैं. गाँव का चित्रण, फर्राटे भरती गाडियाँ अथवा ट्रेफिक नियमों की बातें जो भी सामने आया, उसको पाठकों के समक्ष चिन्तन हेतु रखा गया है. अप्रवासी भारतीयों के एकत्र होते ही बस भारत की बातें करना और जड़ से जुड़े रहने की लालसा प्रमुख मुद्दा होता है. परन्तु समीर जी इसे घड़ियाली आँसू करार देते हुए कहते हैं कि इसके लिए बहुत बड़ा जिगरा चाहिये.

अगले क्रम में लेखक की बाल सुलभ संवेदनायें जागृत होती हैं और हाई-वे पर बच्चों द्वारा कॉफी सर्व करने पर भारत और कनाडा में बेतुका फर्क पाठकों के सामने प्रस्तुत करते हैं. भारतीय बच्चों का काम करना बालशोषण और कनेडियन बच्चों का काम करना पर्सनालिटी डेवेलपमेंट कहा जाता है. उनका मानना है कि बच्चों से उनका बचपन छीन लेने की बात भला कैसे पर्सनालिटी डेवेलपमेंट हो सकती है. आगे आप महिलाओं के तथाकथित फिगर कान्सियसनेस को महत्व नहीं देते तो कहीं वे अमेरीका को देश के बजाय कन्सल्टेंट कहना ज्यादा उपयुक्त मानते हैं क्योंकि वह अपनी छोड़ दूसरों को सलाह देता है. इसके पश्चात ’देख लूँ तो चलूँ’ का ऐसा उपखण्ड आता है जिसमें समीर जी पर हरिशंकर परसाई जी की छाप प्रतीत होती है क्योंकि उन्हीं ने कहीं बताया है कि बचपन में अध्ययन के दौरान उनके हाथों पुरस्कार ग्रहण किया था और उनका स्पर्श आज भी वे महसूस करते हैं.

भारत से कनाडा की यात्रा के वक्त फ्रेंकफर्ट, जर्मनी में एक दिन सपत्नीक रुकने पर भाषाई अनभिज्ञता के चलते अन्तरराष्ट्रीय समलैंगिक महोत्सव में शामिल होने का व्यंग्यात्मक वृतांत बड़ा रोचक बन पड़ा है. आपका ध्यान साधू संतो के ढोंग पर भी जाता है. धन की जीवन में कोई महत्ता न बतलाने वाले यही साधु इसी सलाह या प्रवचन के लाखों रुपये स्वयं बतौर फीस ले लेते हैं. आगे अप्रवासी भारतीयों के माँ बाप की भौतिक एवं मानसिक परिस्थितियों का मार्मिक चित्रण है जो माँ-बाप अपने बेटों को अपना पेट काट कर विदेश भेजते हैं उन बेटों की मानसिकता किस कदर गिर जाती है. ऐसा अक्सर देखने मिलता है.

’देख लूँ तो चलूँ’ का दसवाँ उपखण्ड तो आध्यात्मिक चिन्तन जैसा है जिसमें आर्ट ऑफ लिविंग के स्थान पर आर्ट ऑफ डायिंग की सिफारिश की गई है क्योंकि अधेड़ावस्था के पश्चात जीने की कला अधिकांश लोग सीख ही लेते हैं. यह उम्र तो आर्ट ऑफ डायिंग सीखने की होती है कि हम अपनी जवाबदारियों को पूरा करते हुए खुशी खुशी किस तरह इस दुनिया से कूच करें. महात्माओं द्वारा मुक्ति के लिए ’चाहविहीन’ होने की बात भी समीर जी की समझ के परे है क्योंकि मुक्ति का मार्ग पाना भी तो चाह ही है फिर कोई चाह विहीन कैसे हो सकता है? आगे फिर दिल को छू जाने वाला मार्मिक प्रसंग है, जब घर के पेड़ पर टाँगे गए ’बर्ड फीडर’ से पक्षियों को दाने खिलाकर समीर जी आत्म संतुष्टि को प्राप्त करते हैं परन्तु जब एक दिन बिल्ली द्वारा एक पक्षी को अपना शिकार बना लेने वाली मनहूस घड़ी आती है तो इसके लिए लेखक कहीं न कहीं स्वयं को दोषी मानता है और अपराध बोध से ग्रसित जाता है. ड्रायविंग में हार जीत को लेखक महत्व नहीं देता क्योंकि यदि एक जीतता है तो दूसरा उसके भी आगे होता है या पीछे वाले के पीछे भी कोई होता है. स्तरहीन राजनीति और नेताओं की तुलना कुत्तों से करने पर भी समीर जी नहीं चूकते. तेरहवें खंड में लेखक के अनुसार मित्र के घर पर गृहप्रवेश की पूजा के दौरान अंग्रेजी अनुवाद और अंग्रेज परिवारों की उपस्थिति, पुरोहित और यजमान के लिए किसी उपलब्धि से कम नहीं होती. लंच के दौरान अंग्रेज परिवारों को भारतीय रेसिपी बनाने का तरीका बताना प्रवासी अपनी प्रतिष्ठा मानते हैं. अंग्रेज के माथे पर तिलक लगाना या उनके द्वारा नमस्ते कहना हमें फक्र महसूस कराता है परन्तु क्या हमने कभी सोचा कि क्या वे भी ऐसा ही सोचते हैं? समीर जी के ऐसे कई तर्क दिल के अंतिम छोर तक उद्द्वेलित करते हैं.

अंत में लेखक अपने साहित्य लेखन की वर्तनी की त्रुटियाँ खोजने वाली, वाक्य विन्यास की गल्तियों को सुधार कर ईमेल करने वाली किसी मित्र के बारे में बताते हैं कि वह मुझे नहीं, मेरी लेखनी को पसंद करती है. वह मुझसे कभी रू-ब-रू मिल नहीं सकी किन्तु मुझे आज भी याद आई.

इस तरह हम देखते हैं कि समीर जी अपनी बात कहीं से भी शुरू करें, बखूबी अपना संदेश पाठकों तक पहुँचाने में सक्षम हैं. ‘देख लूँ तो चलूँ’ उनके बहुआयामी लेखन का नमूना कहा जा सकता है. दस्तावेजों की उनसे सदा अपेक्षा रहेगी. इन्सानियत, प्रेम, भाईचारा, संवेदनशीलता के साथ-साथ एक विराट दायरे वाली सख्शियत का प्रतिनिधित्व करते हुए भाई समीर अपने लेखन से स्वयं आकाशीय नक्षत्रों जैसे शीर्षस्थ एवं प्रकाशवान बनें.

आप संस्कारधानी जबलपुर का नाम भी दुनिया में रौशन करेंगे, इसी आशा एवं विश्वास के साथ ...

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पुस्तक विवरण:

नाम: देख लूं तो चलूं
मूल्य: रुपये १००/-
लेखक: समीरलाल
लेखक संपर्क: smeerl.lal@gmail.com
प्रकाशक:शिवना प्रकाशन
पीसी लैब , सम्राट काम्प्लैक्स बेसमेंट
बस स्टैंड सीहोर -466 001
प्रकाशक संपर्क: shivna.prakashan@gmail.com
प्रकाशक फोन नं: +91- 9977855399, +91-7562-405545

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बुधवार, फ़रवरी 16, 2011

मेरी कहानी....

बहुत कुछ दर्ज किया है इस अन्तर्जाल (इंटरनेट) पर इन बीते वर्षों में और अभी भी करता ही चला जा रहा हूँ. मैं रहूँ, न रहूँ -यह उपस्थित रहेगा सदियों तक. किसी न किसी रुप में. शायद फिर मिटा भी दिया जायें, कौन जानता है.

कभी मनचाहे तो कभी अनचाहे, उभर ही आयेंगे मेरे दर्ज विचार किसी न किसी स्क्रीन पर. तब भी देख सकोगी तुम इसे और वो भी मुझे देख सकेंगे जो मुझे देख खुश होंगे. अनजान और न चाहने वाले नजर अंदाज कर निकल जाने वालों की संख्या तब भी ज्यादा होगी मगर जब आज इस बात की परवाह नहीं की तो तब के लिए क्या करना. मतलब तो अपनों से है, तुम से है.

बस, यही सोचता हूँ अन्तर्जाल पर देख तो लोगी, पढ़ भी लोगी मगर वो अपनेपन का अहसास, वो महक, वो भार और भावुक हो मेरे लिखे को अपने सीने से चिपका मेरे होने को अहसासना और फिर नम आँखों धीरे से मुस्कराना और फिर छाती पर उसे रखे रखे ही सो जाना-जैसा मैं अक्सर करता हूँ अपने दादा जी की किताब को सलीके से सहलाते हुए, वो शायद न कर पाओ!!

इसी उधेड़बून में अन्तर्जाल से अपनी ही कृतियाँ लेकर किताबें छपवा ली हैं कुछ जस की तस तो कुछ एक अलग अंदाज में और कुछ प्रतियाँ रख छोड़ी हैं उस हल्की नीली लोहे की अलमारी में बंद करके ताकि वक्त की दीमक उन्हें चाट न जाये.

तुम्हारी अल्मारी की चाबी जतन से रखने की आदत मुझे तसल्ली देती है!!!!!!!

मेरी
कहानी लिखती नहीं,
ऊग आती है
खुद ब खुद,
एक जंगली झाड़ी सी.
न खाद की दरकार
और
न पानी की जरुरत.
वो
बढ़ चलती है अनगढ़ सी,
दिशा विहिन हवा के साथ,
हवा के रंग में
और
कहानी का नायक,
नायक नहीं महा नायक,
स्वयं एक कहानी
जैसे उसके पात्र,
सब अपने अपने आप में
पूरी एक कहानी.

मेरी
कहानी-
बढ़ती है हवा के साथ,
झूमती है,
लहलहाती है
और

फिर...
चढ़ना शुरु कर
अमरबेल की तरह
न जाने कैसे
एकाएक खत्म हो जाती है
अहसास कराती कि
कोई अमर नहीं होता.
कहानी भी नहीं.

-समीर लाल ’समीर’

 

यहाँ सुनिये:

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रविवार, फ़रवरी 13, 2011

तीरथराम.......

तीरथराम साईकिल रिक्शा चलाता और पत्नी किशोरी घर सम्भालती. दोनो दिन-रात काम करते.

घोर ईश्वर भक्त. ईश्वर भी उसकी निरन्तर भक्ति से प्रसन्न हो एक के बाद एक लगातार आठ बच्चे प्रसाद स्वरूप देता गया.

किशोरी को पूजा पाठ में कोई दिलचस्पी नहीं रही. वह इसे पाखंड मानती थी. पति की थोड़ी सी कमाई में किसी तरह घर सम्भाले कि पूजा पाठ पर खर्च करे.

और तीरथराम..?- कहता था कि ईश्वर तो इस बरस भी फिर प्रसन्न हुआ. सातवां चल रहा था, किशोरी को खून की उल्टी हुई और फिर न तो बच्चा बच सका और न किशोरी.

सारा दोष मूरख किशोरी का है-नास्तिक कहीं की!!!

किशोरी की भूल की माफी मांगने पहाड़ी वाले मंदिर जाना पड़ा था भरी बरसात में.

पैर फिसला. खाई में गिर कर चल बसा!!

अब... आठ अनाथ बच्चे!!

ईश्वर ही पालेगा उन्हें!!.....घोर ईश्वर भक्त जो था तीरथराम.......

(लगता तो है कि पल ही जायेंगे, जब पूरा देश बिना किसी नाथ के उसी के भरोसे पला जा रहा है!!)

worship

कल रात अँधेरे

टकरा कर

फट गया था

माथा उसकी बीबी का

और

उतर आया था

माँग के सिंदूर का निशान

जिस पत्थर पर....

आज गाँव में उसे

बड़ी श्रृद्धा से

पूजा जाते देखा!!!

-समीर लाल ’समीर’

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मंगलवार, फ़रवरी 08, 2011

एक रात कुछ यूँ गुजरे....वीरान कविता रचते

पूरे ८५ दिन याने लगभग तीन माह भारत में रह जब कनाडा वापस आने को ट्रेन में बैठा तो लगा कि क्या क्या सोच कर आया था और कितना कम पड़ गया समय. सोचा था कि १० दिनों को केरल भी घूम आयेंगे इस बार, वो भी रह गया. समय ऐसा पंख लगा कर उड़ा कि कुछ पता ही नहीं लगा.

लगता था जैसे कल ही आये हों और आज वापस चल दिये. कितने सारे मित्रों से कितनी सारी बातें करनी थी. कितने ही रिश्ते नातेदारों से मिलने का दिल था.कितने ही शहरों में पहुँचने की नाकाम कोशिश. बस, यूँ ही कुछ कारण बनते गये, दिन बीतते रहे और आज वापसी. सब आधा अधूरा सा, छूटा हुआ.

अब न जाने कब आना हो फिर से? यदि कुछ विशिष्ट कारण न हो जाये तो साल भर के पहले तो क्या आना होगा.

मन उदास होने लगता है. सोचता हूँ, अगली बार ज्यादा दिन के लिए आऊँगा और जरा ज्यादा व्यस्थित कार्यक्रम बना कर. केरल घूमने का कार्यक्रम तो निश्चित ही शामिल रहेगा.

भारी मन से एक नजर रेल की खिड़की के बाहर देखता हूँ. रेल भाग रही है और कितना कुछ पीछे छूटा जा रहा है.

सामने की सीट पर नजर पड़ती है. लगभग ३४/३५ वर्ष का एक दुबला पतला युवक, अपनी पत्नी के साथ बैठा है एकदम शांत. चेहरे पर कोई भाव नहीं. उसकी पत्नी की आँखों के नीचे पड़े काले गोले उसके परेशान होने की गवाही दे रहे हैं.

बात चलती है.

दोनों एक रोज पहले ही बम्बई से लौटे हैं. महैर में रुक माँ शारदा देवी के दर्शन करके अब अपने घर आगरा लौट रहे हैं. टाटा मेमोरियल में पति का ईलाज चल रहा था. केंसर अंतिम स्टेज में है. डॉक्टर कहता है कि ज्यादा से ज्यादा ३० दिन के मेहमान है. घर ले जाओ.

मैं एक गहरी सांस छोड़ता हूँ-बस, ३० दिन. क्या कुछ करने की सोचता होगा इन ३० दिनों में वो. कितने कुछ अरमान साथ लिये जायेगा और फिर उसे तो अगली बार की तसल्ली भी नहीं.....

एक बार फिर भारी मन से खिड़की के बाहर नजर गड़ा देता हूँ. हल्का अँधेरा घिर आया है. वीरान सा पड़ा रेलवे का ’एबेन्डन्ड सिग्नल केबिन’ सामने से गुजर जाता है और जागते है कुछ उजड़े से ख्यालात मेरे जेहन में, बस यूँ ही दम तोड़ देने को.

railwaycabin

रात आसमान में
अपनी उजली चादर
बिछाता चाँद...

झाड़ियों की झुरमुट में
अँधेरों को हराने की
नाकाम कोशिश में जुटे
जुगनुओं की जगमगाहट

कहीं दूर से आती
मालगाड़ी की सीटी का
कर्णभेदी हुँकार

नजदीक के खेत की
कच्ची झोपड़ी से उठती
एक बुढिया की
सूखी खाँसी की खंखार..

चूल्हे से
ओस में भीगी लकड़ियों के
जलने से उठते
धुँए की घुटन
और
उस पर
अलमुनियम की ढक्कन वाली केतली
में चढ़ी
काली कॉफी का
कड़वा घूँट भरते हुए

पटरी किनारे
उस निर्जन वीरान रेलवे के
’एबेन्डन्ड सिग्नल केबिन’ में
एक रात गुजारुँ

और

कुछ
अजब सी
बेवजह
वीरान
कविता रचूँ
मैं!!!

-समीर लाल ’समीर’

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रविवार, जनवरी 30, 2011

मिल लो भोलाराम से…

ये हैं हमारा जबलपुरिया तोताराम. बढ़िया सीटी बजाता है, मिट्ठू बोल लेता है, फोन की घंटी हू ब हू वैसे ही बजाता है जैसे सचमुच फोन आया हो. जब घर के लोग फोन उठाने भागते है तो बस तोताराम की खुशी देखते ही बनती है कि क्या बेवकूफ बनाया. मैंने जब इसका नाम भोलाराम रखा था तो पत्नी ने बताया कि यह तोता नहीं तोती है. उसकी बहन के यहाँ रहता है, उसकी बहन ने ही उसको बताया है.

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अब देखकर हम क्या पहचान पाते कि तोता है कि तोती जब आजकल लड़के लड़कियों में भेद कर पाना ही मुश्किल हो चला है. सुबह हो, दोपहर हो या शाम, लड़के हों या लड़कियाँ. चेहरा पूरा गमछे/स्कार्फ से ढँका, जींस, टी शर्ट और उपर से एप्रोन. स्पोर्टस शूज़ और दस्ताने. सर टोपी से ढका. सब मोटरसाईकिल भी चलाते हैं, स्कूटी भी..भला कोई कैसे पहचानें?

समझ नहीं आता ये सब क्यूँ आखिर? धूप भी नहीं तो भी गमछानुमा कपड़ा लपेटे हैं जैसे कि कॉलेज नहीं, डकैती डालने जा रहे हों कि कोई पहचान न ले.

मित्र की बिटिया से इस विषय में जानना चाहा तो कहती है कि डस्ट और पल्यूशन से स्किन खराब हो जाती है इसलिए ब्यूटी केयर का यह तरीका है.

ऐसी कैसे ब्यूटी की केयर जिसे कोई देख ही न पाये. एक जुमला है beauty lies in the eye of the beholder याने सुन्दरता आपमें नहीं होती देखने वाले की नजरों में होती है .अब जहाँ नज़र दौड़ाओ वहीं गमझा लपेटा चेहरा दिखे तो कैसी ब्यूटी और किसकी नज़र. अब निर्भर करता है कि गमछा कितना सुन्दर है. पैकिंग खुले और अंदर से क्या निकले, कोई गारंटी नहीं.

गारंटी का जमाना रहा नहीं तो भी जीना तो है इसी जमाने में अत: संतोष करने और कोसने को, दोनों के लिए ही पुरानी पीढ़ी अनेक उपाय दे गई है. संतोष करना हो और जिसकी बहु सुन्दर न निकले, तो कहता नज़र आयेगा कि सुन्दरता को चाटना है क्या? वो तो सूरज की रोशनी सी है, दो पल की मेहमान. सुबह आई, शाम चली. काम तो सीरत और संस्कार ही आने हैं. कोसना हो तो कहते नजर आयेगा कि न सूरत, न शक्ल और नखरे ऐसे कि गमछा लपेट कर स्कूटर में फुर्र इधर और फुर्र उधर. घर के काम धाम से तो दूर दूर तक कोई मतलब नहीं.

इसका ठीक उल्टा अगर सुन्दर आ जाये तो कोसने और संतोष करने का इसका ठीक विपरीत डायलॉग रेडीमेड तैयार है.

अब सुन्दरता अगर सूरज की रोशनी ही मान ली जाये तो भी जरा उनसे पूछ कर देखो तो उस ध्रुव के उस भाग में रहते हैं, जहाँ सूरज छः माह तक निकलता ही नहीं, एक किरण के लिए क्या तड़पन होती है, मैने जानता हूँ और उस पर से जब टीवी में दूसरे देश में सूरज निकलते तस्वीर दिखती है तो सांप लोट जाता है जिगर पर.

एक अनुपात में सब कुछ हो तो ही बेहतर.

ना अति बरखा ना अति धूप।
ना अति बकता ना अति चूप।।

जाने बात कहाँ की कहाँ चली गई. बात चली थी जबलपुरिया तोताराम से. एक वाकया याद आया कि मेरे मित्र के पिता जी को बहुत शौक था कि ऐसा तोता पालें जो बोलता हो. सलाहकारों के इस देश में आप विचार तो करके देखो, सलाह देने वाले हजार हाजिर हो जाते हैं. किसी ने बताया कि जिस मिट्ठू के गले में लाल रंग का छल्ला बना हो, उसे लालमन तोता कहते है, वो बोलता है. वही खरीदियेगा.

बस, फिर क्या था. हमारे मित्र के पिता जी एक दिन एक ठेले वाले सेखरीद लाये लाल रंग के छल्ले वाला लालमन तोता ३०० रुपये का और साथ में ८०० रुपये का पिंजरा और जाने क्या क्या.

फिर रोज उसको सिखाये-बेटा बोलो, राम राम!! वो बोलने को बिलकुल भी न तैयार. हफ्ते भर बाद उसे नहलाया गया तो लाल छल्ला गुम. वो ठेले वाला पेन्ट करके बेच गया था. ठगे से बेचारे लालमन की जगह साधारण तोता लिए बैठे रहे और मृत्युपर्यंत उनकी आँखें उस ठेले वाले को खोजती रहीं.

कई बार विचार आता है कि ऐसा ही कुछ स्नान अपने नेताओं को करवाने का इन्तजाम चुनाव के पहले होना चाहिये ताकि पता तो चले कि सच के लालमन हैं कि रंगे हुए.

फिर लगता है कि सब किस्मत की बात है. अब इसे ही देखो-ये मेरा भोलाराम न तो तोता है और न लालमन फिर भी बोल लेता है मगर खाने में शौक काजू बदाम का ही है नेताओं टाईप क्या किया जाये.

tota3

नोट:

यह शायद भारत से अंतिम पोस्ट इस बार के लिए. २ को जबलपुर से और ४ को भारत से प्रस्थान. अब कनाडा पहुँच कर फिर लिखते हैं भारत यात्रा के कुछ रोचक किस्से और भी बहुत कुछ जो पिछले दिनों देखा, अहसासा, जेहन में दर्ज किया मगर समयाभाव में लिखा नहीं.

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गुरुवार, जनवरी 27, 2011

ये चाँद कैसे कैसे!!!

दीनानाथ, हमारा ड्राईवर.

उसका बेटा चोरी के इल्जाम में,जेल में एक साल की सजा काट रहा है।  . दीनानाथ का मानना है कि झूठा फँसाया है पुलिस ने उसे.

पिछले ह्फ्ते दीनानाथ ने बताया कि उसकी बहु रात गये चुपचाप भाग गई. कुलच्छनी थी. दीनानाथ का कहना है कि उसे शुरु से ही उसके चाल चलन ठीक नहीं दिखते थे.

परसों वो लौट आई. पता लगा कि उसके पिता जी की तबीयत एकाएक खराब हो गई. दीनानाथ जाने न देता सो वो चुपचाप बिना बताये ही चली गई.

आज दीनानाथ की लड़की भाग गई. कहता है कि गऊ है. गली के नुक्कड़ वाला धोबी का लड़का फुसला कर भगा ले गया. दुष्ट नहीं तो!!!

 

रात वही,

बात वही

चाँद ये 

अलग सा ऊग आया

और

देखो,

बात ……..

कितनी बदल जाती है.....

 

-समीर लाल ’समीर’

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सोमवार, जनवरी 24, 2011

ऐसी कौन सी जगह है जहाँ समीर का अबाध प्रवाह नहीं है:आचार्य डॉ हरि शंकर दुबे

देख लूँ तो चलूँ’ के विमोचन समारोह में शिक्षविद मनीषी एवं सुप्रसिद्ध साहित्यकार आचार्य डॉ हरि शंकर दुबे का उदबोधन:

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भाई समीर लाल जी ’समीर’ के सद्य प्रकाशित ग्रंथ ’देख लूँ तो चलूँ’ के विमोचन समारोह में मुख्य अतिथि की आसंदी को सुशोभित कर रहे परम सम्मानीय श्रद्धास्पद प्रोफेसर ज्ञानरंजन जी, भाई समीर लाल जी की जो लाली है, उस लाली के केन्द्र बिन्दु वो लाली जहाँ से आती है फूल सब देखते हैं लेकिन फूल का मूल जिससे वो आभा चमक है उसके मूल परम सम्मानीय श्री पी.के.लाल साहब, आज के इस कार्यक्रम को संचालित कर रहे, यहाँ के युवाओं के चेतना केन्द्र हमारे परम प्रिय भाई गिरीश बिल्लोरे जी, आज के इस कार्यक्रम के एक और केन्द्र बिन्दु बिल्लोरे जी के सहयोगी भाई गिरीश जी के सहयोगी डॉ विजय तिवारी जी और लाल साहब की इस विचार यात्रा की जो साधना है उस साधना की केन्द्र बिन्दु माननीय साधना जी, माननीय अलिनि श्रीवास्तव जी, यहाँ पर विराजमान माननीय श्री श्रवण दीपावरे जी, श्री श्याम गुप्ता जी, श्री लाल साहब के बचपन के मित्र श्री कथूरिया जी, श्री द्वारका गुप्त जी, श्री गुलुश स्वामी जी, बवाल जी और माननीय मुख्य अतिथि जी के बोलने के बाद जो स्वयं अपने आप में आधुनिक हिन्दी साहित्य के इतने प्रामाणिक पुरुषार्थ के स्वयं प्रतीक हों, जो एक व्यक्ति के रुप में नहीं एक संस्था के रुप में विराजमान हों और जिनका मंगल आशीष मिल जाये, उनके कुछ कहने के बाद कुछ शेष नहीं रहता है. जहाँ उनकी उपस्थिति हो वहाँ निश्चित रुप से हम सबको गौरव होता है कि उनके साथ हमें कुछ क्षण बिताने का अवसर मिले. उनका साहचर्य प्रेरणादायी होता है वहाँ उनकी उपस्थिति में जिनके हम आशीर्वदा है जिनसे आशीष प्राप्त करते हैं उनके सामने कुछ कहना बहुत कठिन स्थिति है किन्तु भाई समीर लाल जी ने समय के सीने पर अपनी सोच से सत्य की जो सड़क बनाई है उसकी स्तुति के लिए मुझे उपस्थित होना ही था और यह मेरा धर्म भी है और कर्तव्य भी है इसलिए मैं उपस्थित हूँ.


ऐसी कौन सी जगह है जहाँ समीर का अबाध प्रवाह नहीं है, इस बात को प्रमाणित करती है यह कृति ’देख लूँ तो चलूँ’. कहा जाता है जह मन पवन न संचरइ रवि शशि नाह प्रवेश- ऐसी कोई सी जगह है जहाँ पवन का संचरण न हो, जहाँ समीर न हो अब समीर इसके बाद यहाँ से कनाडा तक और कनाडा से भारत तक अबाध रुप से प्रवाहित हो रही है और उस निर्वाध प्रवाह में निश्चित रुप से यह उपन्यासिका ’देख लूँ तो चलूँ’ आपके सामने है.


आपकी आज्ञा हो तो ज्वेल्स हैनरी का एक कथन मुझे स्मरण आ रहा है ’यदि समझना चाहते हो कि परिवर्तन क्या है, सामाजिक परिवर्तन क्या है, और अपना आत्मगत परिवर्तन क्या है, तो अपने समय और समाज के बारे में एक किताब लिखो’ ऐसा ज्वेल्स हैनरी ने कहा. ये पुस्तक इस बात का प्रमाण है कि कितनी सच्चाई के साथ और कितनी जीवंतता के साथ और कितनी आत्मीयता के साथ समीर लाल ने अपने समय को, अपने समाज को, अपनी जड़ों को, जिगरा के साथ देखने का साहस संजोया है.


ये कृति कनाडा से भारत को देख रही है या भारत की दृष्टि से कनाडा को देख रही है विशेषकर कनाडा में बसे प्रवासी भारतीयों को, ये दो बिन्दु हैं. कनाडा में रहकर भी वो अपने भारत को एक एक घटनाओं में देख रहे हैं चाहे वो ट्रेफिक पुलिस वाला हो, चाहे वो पुरोहित की बात हो, चाहे वो साधु संत की बात हो, और चाहे कुछ भी हो बहुत बेबाकी से और बहुत ईमानदारी के साथ जिसमें कल्पना भी है, जिसमें विचार भी है, और जैसा अभी संकेत किया माननीय ज्ञानरंजन जी ने कि ये केवल एक उपन्यासिका भर नहीं है, कभी कभी लेखक जो सोच कर लिखता है जैसा कि भाई गुलुश जी ने कहा था कि ५ घंटे साढ़े ५ घंटे में लेकिन ये साढ़े ५ घंटे नहीं हैं साढ़े ५ घंटे में जो मंथन हुआ है उसमें पूरा का पूरा उनके बाल्य काल से लेकर अब तक का और बल्कि कहें आगे वाले समय में भी, आने वाले समय को वर्तमान में अवस्थित होकर देखने की चेष्टा की है कि आने वाले समय में समाज का क्या रुप बन सकता है उसकी ओर भी उन्होंने संकेत दिया है तो वो समय की सीमा का अतिक्रमण भी है, और उसी तरीके से विधागत संक्रमण भी है, जिसमें आप देखते हैं कि वह संस्मरणीय है, वह उपन्यास भी है, वह कहीं यात्रा वृतांत भी है और कहीं रिपोर्ताज जैसा भी है कि रिपोर्टिंग वो कर रहे हैं एक एक घटना की तो ये सारी चीजें बिल्कुल वो दिखाई देती हैं और आरंभ में ही जब वो कहते हैं कि (प्रमोद तिवारी जी की पंक्तियाँ)
राहों में भी रिश्ते बन जाते हैं
ये रिश्ते भी मंजिल तक जाते हैं
आओ तुमको एक गीत सुनाते हैं


तो जब वो बात कहते हैं तो उनके पगों के द्वारा वो नाप लेते हैं जैसे कभी बामन ने तीन डग में नापा था ऐसा कभी लगता है कि एक डग इनका भारत में है, और एक चरण उनका कनाडा में है और तीसरा चरण जो विचार का चरण है उस तीसरे चरण .......इन तीन चरणों से वो नाप लेते हैं निश्चित रुप से जब वो बूढ़े बरगद की याद करते हैं जब वो मिट्टी के घरोंदों की याद करते हैं, जब वो जलते हुए चूल्हे की याद करते हैं और उन चूल्हों पर बनने वाले सौंधे महक से भरे हुए पराठों की याद करते हैं तो निश्चित रुप से लगता है कि उड़न तश्तरी जिसनें भी यह नाम दिया हो उन्होंने स्वयं चुना होगा तो निश्चित रुप से वो उड़न तश्तरी है जो इस लोक से जैसे कनाडा से इधर और इधर से उधर तक और तीसरी चीज जो दिखाई नहीं देती दृष्यमान नहीं है तीसरी बराबर यह है और प्रवासी भारतीयों की पीड़ा झलक उठती है जब वो, क्यूँकि मूलतः वो कवि भी हैं तो जब परदेश पर वो लिखते हैं दो लाईन पढ़ना चाहता हूँ
परदेस, देखता हूँ तुम्हारी हालत,
पढ़ता हूँ कागज पर,
उड़ेली हुई तुम्हारी वेदना,
जड़ से दूर जाने की...


तो जड़ से दूर हो जाने की जो वेदना है परदेश में जाकर बराबर वो देखते हैं और जितने भी सारी चीजें हैं चाहे वो वीक एण्ड का चोचला हो, जो उन्हें व्यथित करता है, वीक एण्ड आप लोग अपने घर में, अपने मित्रों के साथ क्यूँ नहीं मनाना चाहते, क्या थकान मिटाने के लिए अपनों से जाना दूर है, या बूढ़े माता पिता को लेकर के बड़े प्रसन्न होते हैं कि हमारे बेटे ने विदेश में हमें बुलाया है लेकिन बुलाया इसलिए है कि उसे वहाँ नौकरों का आभाव है और उसी लिए अपने बूढ़े माता पिता को वो नौकरों के स्थापन्न रुप में वो बुला रहे हैं तो कितनी मार्मिकता के साथ, जैसा अभी सम्मानीय ज्ञान जी ने कहा कि इसके अंदर केवल व्यंग्य भर नहीं है जो अन्तर्वेदना है और जो त्रासदी की बात उन्होंने की थी वो त्रासदी कम से कम आगे जाकर के वो प्रकट होना चाहिये- त्रासदी की बात वो बहुत बड़ी बात है.


निश्चित रुप से मैं एक बात उल्लेख करना चाहूँगा जो कृतिकार ने अंत में कही है कि मैं लिखता तो हूँ मगर मेरी कमजोरी है कि मैं पूर्ण विराम लगाना भूल जाता हूँ. मुझे लगता है कि यह उनकी सहजोरी है कमजोरी नहीं है कि पूर्ण विराम लगाना भूल जाते हैं यह कृति में पूर्ण विराम नहीं है. आप पूर्ण विराम लगाना ऐसे ही भूलते रहिये ताकि कम से कम वो वाक्य पूरा नहीं होगा क्य़ूँकि जो कथ्य है जो भाव है जो आप कहना चाहते हैं वो आगे भी गतिमान रहेगा, मैं समीर लाल जी अपनी हार्दिक शुभकामनाएँ और बधाई देता हूँ और इस उत्तम आयोजन के लिए, इस वैचारिक यात्रा के लिए आयोजकों को बधाई देता हूँ और मुझे इतना सम्मान दिया कि सम्मानीय ज्ञान जी, सम्मानीय श्री पी. के. लाल साहब के साथ बैठ कर उनके साहचर्य का मुझे सुख दिया है वो वर्णनातीत है आप सबके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए आप सबके श्रीचरणों में अपना नम्र प्रमाण निवेदित करता हूँ. धन्यवाद.

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गुरुवार, जनवरी 20, 2011

मुझे समीर लाल एक शैलीकार लगते हैं: श्री ज्ञानरंजन जी: ‘देख लूँ तो चलूँ’ के विमोचन पर

सुप्रसिद्ध साहित्यकार, अग्रणी कथाकार और पहल के यशस्वी संपादक श्री ज्ञानरंजन जी के मुख्य आथित्य एवं सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ हरि शंकर दुबे की अध्यक्षता में समीर लाल ’समीर’ के उपन्यास ’देख लूँ तो चलूँ’ का विमोचन हुआ. विमोचन समारोह की विस्तृत रपट एवं चित्र यहाँ क्लिक करके देखें.

आज आपके समक्ष इस अवसर पर श्री ज्ञान रंजन का अभिभाषण:

gyanji

भाई समीर लाल और उपस्थित मेरे मित्रों

मुझे खुशी है कि समीर लाल के परिचय और उनकी कृति के बहाने मुझे कुछ टूटी फूटी बातें कहने का अवसर मिला. हमारे पास समय नहीं था. यह आयोजन सपाटे से तय हुआ. आप सब समीर लाल के प्रति अपनी चमकीली आत्मीयता के कारण एकत्र हुए हैं. मैने भी जल्दबाजी में ये बातें इसलिए तैयार कर लीं कि कहीं यह गलत संदेश न जाये कि मैं उम्रदराज, सुस्त और लद्धड़ हूँ. मैं समीर लाल का स्वागत करता हूँ पर अपनी बातें भी उसमें कहूँगा.

मैने उपन्यास या नावलेट को शीघ्रता मे लगभग चलते चलते पढ़ा है. इसलिए कुछ चीजें छूटी होंगी-अगर गंभीर आंकलन न किया जा सके तो यह लेखक के प्रति किंचित अन्याय भी हो सकता है. मेरे पास कुछ थोड़ी सी बातें हैं जो आप सब लोगों की प्रतिक्रिया और टिप्पणियों को जोड़कर मूल्यवान धारणा बन सकती हैं. अन्ततः किसी भी कृति के बारे में समवेत स्वर ही स्वीकृत होता है. हमारी चर्चा एक प्रकार की शुरुआत है. इसलिए इसको मेरा क ख ग घ ही माना जाये.

छोटे उपन्यासों की एक जबरदस्त दुनिया है. द ओल्ड मैन एण्ड द सी, कैचर ऑन द राईड, सेटिंग सन, नो लांगर ह्यूमन, त्यागपत्र, निर्मला, सूरज का सातवां घोड़ा आदि. एक वृहत सूची भी संसार के छोटे उपन्यासों की बन सकती है. छोटे उपन्यासों की शुरुआत भी बड़ी दिलचस्प है. स्माल इज़ ब्यूटीफुल एक ऐसा मुहावरा या जुमला है. विश्व की छोटी वैज्ञानिक कारीगरियों और सृजन के छोटे आकारों को वाणी देता हुआ लेकिन समाज, सौंदर्य और इतिहास के विशाल दौरों में एक कारण यह भी था कि वार एण्ड पीस, यूलिसिस और बाकज़ाक के बड़े उपन्यासों ने जो धूम मचाई उसके आगे बड़े आकार के अनेक उपन्यास सर पटक पटक मरते रहे. ये स्थितियाँ छोटे उपन्यासों की उपज के लिए बहुत सहज थीं. हिन्दी में गोदान, कब तक पुकारुँ, शेखर एक जीवनी, बूँद और समुद्र, मुझे चाँद चाहिये के बाद पिछले एक दशक में ५० से अधिक असफल बड़े उपन्यास लिखे गये. और अब छोटे उपन्यासों की रचने की पृष्टभूमि बन गई है. छोटा हो या बड़ा, सच यह है कि वर्तमान दुनिया में उपन्यासों का वैभव लगातार बढ़ रहा है. यह एक अनिवार्य और जबरदस्त विधा बन गई है.पहले इसे महाकाव्य कहा जाता था. अब उपन्यास जातीय जीवन का एक गंभीर आख्यान बन चुका है. समीर लाल ने इसी उपन्यास का प्रथम स्पर्श किया है, उनकी यात्रा को देखना दिलचस्प होगा.

समीर लाल, एक बड़े और निर्माता ब्लॉगर के रुप में जाने जाते हैं. मेरा इस दुनिया से परिचय कम है. रुचि भी कम है. मैं इस नई दुनिया को हूबहू और जस का तस स्वीकार नहीं करता. अगर विचारधारा के अंत को स्वीकार भी कर लें, तो भी विचार कल्पना, अन्वेषण, कविता, सौंदर्य, इतिहास की दुनिया की एक डिज़ाइन हमारे पास है. यह हमारा मानक है, हमारी स्लेट भरी हुई है.

मेरे लिए काबुल के खंडहरों के बीच एक छोटी सी बची हुई किताब की दुकान आज भी रोमांचकारी है. मेरे लिए यह भी एक रोमांचकारी खबर है कि अपना नया काम करने के लिए विख्यात लेखक मारक्वेज़ ने अपना पुराना टाइपराईटर निकाल लिया है. कहना यह है कि समीर लाल ने जब यह उपन्यास लिखा, या अपनी कविताएं तो उन्हें एक ऐसे संसार में आना पड़ा जो न तो समाप्त हुआ है, न खस्ताहाल है, न उसकी विदाई हो रही है. इस किताब का, जो नावलेट की शक्ल में लिखा गया है, इसके शब्दों का, इसकी लिपि के छापे का संसार में कोई विकल्प नहीं है. यहां बतायें कि ब्लॉग और पुस्तक के बीच कोई टकराहट नहीं है. दोनों भिन्न मार्ग हैं, दोनों एक दूसरे को निगल नहीं सकते. मुझे लगता है कि ब्लॉग एक नया अखबार है जो अखबारों की पतनशील चुप्पी, उसकी विचारहीनता, उसकी स्थानीयता, सनसनी और बाजारु तालमेल के खिलाफ हमारी क्षतिपूर्ति करता है, या कर सकता है. ब्लॉग इसके अलावा तेज है, तत्पर है, नूतन है, सूचनापरक है, निजी तरफदारियों का परिचय देता है पर वह भी कंज्यूम होता है. उसमें लिपि का अंत है, उसको स्पर्श नहीं किया जा सकता. किताबों में एक भार है-मेरा च्वायस एक किताब है, इसलिए मैंने देख लूँ तो चलूँ को उम्मीदों से उठा लिया है. किताब में अमूर्तता नहीं है, उसका कागज बोलता है, फड़फड़ाता है, उसमें चित्रकार का आमुख है, उसमें मशीन है, स्याही है, लेखक का ऐसा श्रम है जो यांत्रिक नहीं है.

आईये यह देखते हैं कि सृजन के छोटे से दायरे में समीर लाल का उपन्यास-देख लूँ तो चलूँ किस तरह एक आधुनिक बिम्ब बनाता है. मुझे समीर लाल एक शैलीकार लगते हैं. यह उपन्यास मुझे उपन्यास और ट्रेवेलॉग का मिलाजुला रुप लगता है. एक तरह की यात्रा हाईवे पर इसमें होती है. छोटी छोटी मोटर यान से यात्रा. और इसी के मध्य उधेड़बुन, मानसिक टीकाएं, विचार और आलोचना, प्रतिक्रियाएं जो गंतव्य तक चलती रहती हैं. साथ साथ स्थानीय चित्र हैं, जीवन की झलकियाँ हैं. गंतव्य में एक लीक पर समाप्त होने वाला धार्मिक पाखंड कर्मकांड है, पारिवारिक भी है या मित्रवती. यह भारत देश में भी आम दृष्य है और परदेस में भी एक सिकुड़ा हुआ खानापूरी करने वाला प्रपंच. अब इसी के इर्द गिर्द यात्रा में उपजते विचार हैं, व्यंग्य हैं- यह एक सर्वसाधारण हिन्दु प्रवासी दृष्य है. प्रवासी भारतीय की, विशेष रुप से जो पश्चिमी संसार में हैं, उनकी यह राम कथा है. वह उथलपुथल होती निर्माण और संघार की नई संस्कृति, सागर में अपनी डोंगी न डालकर, मुख्यधाराओं में न शामिल होकर एक झूठे, समय बहलाऊ, चलताऊ जीवन की रामकथा में शामिल होता रहता है. एक विशाल वैज्ञानिक जगमगाते, स्पंदित फलक के बीच जिन्दगी की सारी ऊष्मा जर्जर वर्णाश्रम धर्म के कर्मकांड में डूब जाती है वर्णाश्रम का व्याकरण और भाषा की शुद्धता भी जहाँ फूहड़ बन गई है.

देख लूँ तो चलूँ में इसको लेकर नायक ऊबा हुआ है. हमारे आधुनिक कवि रघुबीर सहाय ने इसे मुहावरा दिया है, ऊबे हुए सुखी का. इस चलते चलते पन में आगे के भेद, जो बड़े सारे भेद हैं, खोजने का प्रयास होना है. धरती का आधा चन्द्रमा तो सुन्दर है, उसकी तरफ प्रवासी नहीं जाता. देख लूँ तो चलूँ का मतलब ही है चलते चलते. इस ट्रेवलॉग रुपी उपन्यासिका में हमें आधुनिक संसार की कदम कदम पर झलक मिलती है. ५० वर्ष पहले महान ब्रिटिश कवि और एनकाउन्टर के संपादक स्टीफन स्पेंडर ने कहा था कि आधुनिकता धाराशाही हो रही है- माडर्न मूवमेंट हैज़ फेल्ड. भारत में ही देखें, बंगाल, केरल, तामिलनाडु, कर्नाटक, उत्तरपूर्व, महाराष्ट्र और गुजरात में क्लैसिकल और आधुनिकता का एक धीर संतुलन है. जीवन में, कविता में, साहित्य में.यही दृष्य यूरोप में है. समीर लाल भी अपनी जड़ों से प्यार करते हैं पर ऐसा करते हुए लगता है कि जड़ें गांठ की तरह कड़ी और धूसरित हो रही हैं. हमारा देश भी वही हो रहा है धीरे धीरे जैसा प्रवासी का प्रवासी स्थलों पर लगता है. भूमंडल खौफनाक बदलाव से गुजर रहा हो. हममें धर्म, भाषा, शिल्प, विशेष पहचानें सब गर्क हो रही हैं. इसलिए राम कथा, सत्यनारायण कथा का एक व्यंग्यार्थ इस नावलेट में झलकता है.

समीर लाल ने अपनी यात्रा में एक जगह लिखा है- हमसफरों का रिश्ता! भारत में भी अब रिश्ता हमसफरों के रिश्ते में बदल रहा है. फर्क इतना ही है कि कोई आगे है कोई पीछे. मेरा अनुमान है कि प्रवासी भारतीय विदेश में जिन चीजों को बचाते हैं वो दकियानूस और सतही हैं. वो जो सीखते है वो मात्र मेनरिज़्म है,  बलात सीखी हुई दैनिक चीजें. वो संस्कृति प्यार का स्थायी तत्व नहीं है. हमारे देश को पैसा, रोजगार, समृद्धि तो चाहिये पर उससे कहीं ज्यादा दूसरी चीजें चाहिये. इस बात को समीर लाल अच्छी तरह जानते हैं इसलिए वे लिखते हैं हर बार भारत छोड़ने के बाद कुछ दिन असहज रहता हूँ पर फिर मानव हूँ अपनी दुनिया में रम जाता हूँ. इसमें एक ही शब्द पर मुझे आपत्ति है और वह है मानव. मानव को मजबूर मानना इसलिए उसी दुनिया में रम जाना, एक कमजोर घोषणा है और अधूरी भी. प्रवासी की ट्रेजड़ी यह है कि प्रवास को स्थायित्व में नहीं बदल पाता और इस प्रकार अपने देश में भी एक विश्रंख्ल प्राणी ही रह जाता है. इसका कारण यह है कि उसकी वृहत्तर सांसारिक या देशीय चिन्तायें नहीं है. उसकी चिन्ता तालमेल की है यह दो नावों का या कितनी ही नावों का तालमेल है जो अंततः असंभव है. उपन्यास में ऊब और निरर्थकता के पर्याप्त संकेत हैं.  निर्मल वर्मा जो स्वयं कभी काफी समय यूरोप में रहे कहते हैं कि प्रवासी कई बार लम्बा जीवन टूरिस्ट की तरह बिताते हैं. वे दो देशों, अपने और प्रवासित की मुख्यधारा के बीच जबरदस्त द्वंद में तो रहते हैं पर निर्णायक भूमिका अदा नहीं कर पाते. इसलिए अपनी अधेड़ा अवस्था तक आते आते अपने देश प्रेम, परिवार प्रेम और व्यस्क बच्चों के बीच उखड़े हुए लगते हैं. स्वयं उपन्यास में समीर लाल ने लिखा है कि बहुत जिगरा लगता है जड़ों से जुड़ने में. समीर लाल सत्य के साथ हैं, उन्होंने प्रवास में रहते हुए भी इस सत्य की खोज की है जबकि वहीं अनेक कवि प्रवासी दिवस पर फूहड़, निस्तेज, झूठी कविताएं सुनाते हैं मंच पर. ये दृश्य ही समीर लाल के मजबूत शब्द और वाक्य हैं, इनके आगे एक ऐसी राह है जिसमें अगला उपन्यास लिखा जा सकता है और जिसमें व्यंग्य कम होगा और त्रासदी ज्यादा. उपन्यास का उत्तरार्ध क्रमशः गमगीनी में बदलता है, उसमें शोक आता है, उस पर अभी मैं विचार नहीं कर पा रहा हूँ कभी आगे.

मेरे लिए अभी बहुत संक्षेप में, आग्रह यह है समीर लाल का स्वागत होना चाहिए. उन्होंने मुख्य बिंदु पकड़ लिया है. उनके नैरेशन में एक बेचैनी है जो कला की जरुरी शर्त है.

यह अच्छी बात है कि अनेक देशों में, प्रवासी भारतीय लिखने की तरफ मुड़ रहे हैं. अंग्रेजी के जबरदस्त वर्चस्व के बीच वे अपनी भाषा को बचा रहे हैं, उसे समृद्ध कर रहे हैं, ऐसे अनुभवों से जो सिर्फ प्रवासियों के पास ही है. यह हमारी भाषा के वर्तमान का एक नया पहलू है. प्रवासी शीत के पक्षियों की तरह लौट रहे हैं. उनमें पहचान की तड़प पैदा हुई है लेकिन गंभीर और शानदार वापसी तभी होगी जब वे डूबते हुए भारत के गणतंत्र और संस्कृतिक बहुलता की वृहत्तर चिंताएं करेंगे. रामकथा, वर्णाश्रम धर्म और सिकुड़ते हुए सुरक्षा कवच से उन्हें बाहर आना होगा.

समीर लाल का उपन्यास पठनीय है, उसमें गंभीर बिंदु हैं और वास्तविक बिंदु हैं. मैं उन्हें अच्छा शैलीकार मानता हूँ. यह शैली भविष्य में बड़ी रचना को जन्म देगी. उन्हें मेरी हार्दिक बधाई एवं शुभकामना.

अंत में मैं आपको एक सुखद उदाहरण भी देना चाहूँगा. पं. मदन मोहन मालवीय के पोते, मेरे सहपाठी और मित्र लक्ष्मीधर मालवीय ५० साल से जापान में हैं. वे बड़े निबंधकार, आलोचक, कथाकार और फोटोग्राफर हैं. वहां रहते हुए उन्होंने इलाहाबाद की गलियों, उसमें बोली जाने वाली बोली को कभी नहीं भुलाया. वे मुहावरे और बोलियों वाली भाषा का उपयोग करते हैं, लिखते हैं. बड़े लेखक हैं, उनकी किताबें दिल्ली के प्रकाशकों से आई हैं. वे रिसर्चर भी हैं. जापानी पत्नी को हिन्दी सिखाई, अपने बच्चों को हिन्दी सिखाई, और वे धारा प्रवाह बोलते हैं. जापानी, अंग्रेजी, संस्कृत में मर्मज्ञ होने के बावजूद हिन्दी स्वीकार की. आज भी हमारी टेलीफोन पर बातें अवधी में होती हैं. कहने का तात्पर्य यह है कि अपनी भाषा की रक्षा जीवन और संस्कृति की रक्षा होती है.

समीर लाल को दोबारा मैं कोट करना चाहूँगा कि ’बड़ा जिगरा चाहिए जड़ से जुड़े रहने में’.

 

इस अभिभाषण को यहाँ सुनिये:

 

 

या यहाँ

 

पुस्तक के प्रकाशक:

शिवना प्रकाशन
पी सी लैब, सम्राट काम्पलेक्स बेसमेंट
बस स्टैंड सीहोर --466001 (म प्र)

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सोमवार, दिसंबर 20, 2010

कैक्टस

सेठ बनारसी दास शहर के गणमान्य नागरिक एवं प्रतिष्ठित व्यापारी हैं. अगले विधान सभा चुनाव में सत्ताधारी पार्टी का टिकिट पाने के लिए तरह तरह के आयोजन कर बड़े बड़े नेताओं को आमंत्रित करते रहते हैं.

मुख्य मंत्री अपनी एक दिवसीय यात्रा पर शहर आने वाले हैं. बनारसी दास जानते हैं कि हल्के फुल्के आयोजन के लिए मुख्य मंत्री समय देंगे नहीं.

बहुत सोच विचार कर एक ऐसा प्रयोजन बनाना है कि मुख्य मंत्री घर आने से मना न कर सकें.

तुरंत याद आया पिताजी अभी-अभी गुजरे है .....बस, पिता जी की पुण्य तिथी का आयोजन कर डाला. मुख्य मंत्री आये, श्रृद्धांजलि दी. समाज में सेठ जी का रुतबा दुगना हो गया.

पिता जी को गांव में गुजरे वैसे भी ७ महिने तो बीत ही चुके थे.

 

अब एक कविता:

एक उन्माद

cactus

उम्र के उस पड़ाव मे

उगा लिया था

हथेली पर

एक कैक्टस

अब

उखाड़ना चाहता हूँ

मगर

कांटे डराते हैं मुझे!!

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बुधवार, दिसंबर 08, 2010

पहाड़ी ओहदे..

सरकारी घर मिला हुआ था पिता जी को, पहाड़ के उपर बनी कॉलोनी में- अधिकारियों की कॉलोनी थी- ओहदे की मर्यादा को चिन्हित करती, वरना कितने ही अधिकारी उसमें ऐसे थे कि कर्मों से झोपड़ी में रखने के काबिल भी नहीं, रहना तो दूर की बात होती. मजदूरों और मातहतों का खून चूसना उन्हें उर्जावान बनाता था.

वो अपने पद के नशे में यह भूल ही चुके थे कि कभी उन्हें सेवानिवृत भी होना है. खैर, सेवा के नाम पर तो वो यूँ भी कलंक ही थे तो निवृत भला क्या होते लेकिन एक परम्परा है, जब साथ सारे अधिकार भी पैकेज डील में जाते रहते हैं. खुद तो खैर औपचारिक रुप से सेवानिवृत होने के साथ ही शहर में कहीं आकर बस जाते मगर बहुत समय लगता उन्हें, जब वो वाकई उस पहाड़ वाली कॉलोनी से अपनी अधिकारिक मानसिकता उतार पाते. जिनका जीवन भर खून पी कर जिन्दा रहे, उन्हीं से रक्त दान की आशा करते. कुछ छोड़ा हो तो दान मिले. खाली खजाने से कोई क्या लुटाये.

उसी पहाड़ पर उन्हीं अधिकारियों के बच्चे, हम सब भरी दोपहरिया में निकल लकड़ियाँ और झाड़ियाँ बीन कर चट्टानों के बीच छोटी छोटी झोपड़ियाँ बनाते और उसी की छाया में बैठ घर घर खेलते. अपने घर से टिफिन में लाया खाना खाते मिल बाँट कर और उस झोपड़ी को अपना खुद का घर होने जैसा अहसासते. मालूम तो था कि शाम होने के पहले घर लौट जाना है या अगर ज्यादा गरमी लगी तो शाम से कोई वादा तो है नहीं कि तुम्हारे आने तक रुकेंगे ही, और होता भी तो वादा निभाता कौन है? फिर रात तो गर्मी में कूलर और सर्दी में हीटर में सोकर कटेगी (आखिर अधिकारी के बेटे जो ठहरे) तो झोपड़ी की गर्मी/सर्दी की तकलीफ का कोई अहसास ही नहीं होता. घर से बना बनाया खाना और बस लगता कि काश इसी में रह जायें.

वातानुकूलित ड्राईंगरुम में बैठकर गरीबी उन्मूलन पर भाषण देने और शोध करने जैसा आनन्द मिला करता था उन झोपड़ियों में बैठ कर.

पहाड़ों पर तफरीह के लिए घूमने जाना और पहाड़ों की दुश्वारियों को झेलते हुए पहाड़ों पर जीवन यापन करना दो अलग अलग बातें हैं, दो अलग अलग अहसास जिन्दगी के.

सुनते हैं आजकल युवराज ऐसे ही कुछ अहसास रहे हैं शासन की बागडोर संभालने के पहले.

काश!! दुश्वारियाँ, परेशानियाँ और दर्द बिना झेले अहसासी जा सकती.

भरी रसोई में ही उपवास भी धार्मिक कहलाता है वरना तो फक्कड़ हाली को कौन पूछता है. न कोई पुण्य मिलता है, न ही पुण्य प्राप्ति की आशा उन दो रोटियों की उम्मीद में.

भगवान भी कैसे भेदभाव करता है-शौकिया भूखा रहने वालों को पुण्य और मजबूरीवश भूखा रहने वालों को अगले दिन फिर भूख झेलने की सजा.

ahode

 

कहने को

बहुत कुछ है

मगर लंगड़े हालात ऐसे

कि

जुबान लड़खड़ा जाती है...

और

बैसाखी मुहैया कराने को

सक्षम हाथ

कहते हैं

मैं

नशे में हूँ!!

-समीर लाल ’समीर’

 

नोट: जब यह पोस्ट आयेगी, तब मैं देहरादून के रास्ते में रहूँगा. शायद देहरादून ९ तारीख की रात पहुँच कमेंट अप्रूव कर पाऊँ अगर कनेक्शन मिला तो..वरना तो भगवान भरोसे देश चल रहा है तो हम तो चल ही जायेंगे. :)

देहरादून और नजदीकी ब्लॉगर अगर मिलना और संपर्क करना चाहें तो नम्बर ०८८८ ९३७ ६९३७…

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