यूँ भी एक न एक दिन तो नहीं ही रहना था-काल करे सो आज कर-की तर्ज पर आज ही नहीं रहे. सामने सामने प्यार से सब उन्हें बाबू जी कहते थे.
बहुत ही भले आदमी थे हर स्वर्गवासी की तरह. अंतर बस इतना था कि वो जब तक जिन्दा रहे, दूसरों की तकलीफों के प्रति अति संवेदनशील थे. मरने के बाद का पता नहीं मगर शायद मरते वक्त उन्हें आभास नहीं हो पाया होगा कि वो जा रहे हैं अन्यथा मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि किसी को कोई तकलीफ न हो इसलिये वो खुद ही पाँच मिनट पहले बस से शमशान चले जाते और चिता पर लेट कर ही अंतिम सांस लेते याने कि पर-तकलीफ के प्रति संवेदनशीलता की पराकाष्टा.
अन्य मित्रों की भाँति मैं भी शमशान गया था उनको अंतिम विदाई देने. बिल्कुल गमगीन चेहरा, आँख पर काला चश्मा और मूँह में पान मसाला कि भूले से भी कोई शब्द न फूटे. बस, मौन की आवाज, सामने जलती चिता, हवाओं की सरसराहट, पसीने की चिपचिप और शमशान का सन्नाटा. गम का इससे बेहतर सीन क्या हो सकता है?
पूरा माहौल सेट मगर कुछ नालायक किसम के लोग पास ही खड़े हँसी मजाक भी कर रहे थे और अनाप शनाप राजनिती से लेकर शहर की बिजली, पानी की कभी न हल हो सकने वाली शास्वत समस्या पर कभी न खत्म होने वाली शास्वत बातचीत. मुझे ऐसे लोग पसंद नहीं. अरे भाई, गम का माहौल है, कुछ देर मत हंसों, कुछ देर इन समस्याओं को दर किनार करो. गम में शामिल रहो. ऐसे नहीं चुप रह सकते तो पान दबा लो सुरती वाला मगर चुप रहो. खराब लगता है जिसके घर गमी हुई है उसे. उसकी मजबूरी है वो चाह कर भी हँस नहीं सकता और उसे तो मूँह उतारे खड़े ही रहना है और तुम हो कि मूँह बाये तो ऐसा कि बंद ही नहीं कर रहे हो.
वो तो खुद ही जल्दी में है, आधे घंटे भी उसे भारी लग रहे हैं. क्या तुम उतना भी साथ नहीं दे सकते? कैसे दोस्त हो यार? देखा नहीं, कितनी फटाफट धोती पहनी. चिता के दो चक्कर काट कर लगे पंडित की तरफ देखने और फिर उसके कहने पर दौड़ कर तीसरा चक्कर काटा. फट से दाग दी और जल्दी आग पकड़े इसलिये दनादन धौंख मरवाई. इधर से घी डालो, उधर से घी डालो-ये दूसरे भाई बोल रहे हैं जिन्होंने दाग नहीं दी. वो भी लगे हैं जल्दी आग पकड़े. पांच मिनट पहले से ही कपाल क्रिया के लिये लट्ठ उठाये खड़े पंडित जी की तरफ ताक रहे हैं कि कब वो कहें और ये सर फोड़े. चंदन फैंके और घर निकलें. गर्मी भी तो कितनी है? सर पर सीधे तपता सूरज और सामने चिता का ताप. बाप रे बाप!!
बाबू जी तो निकल लिये और सुना है उपर तो बढ़िया ठंडक रहती है. हवाई जहाज में बाहर का तापमान बताता है एकदम ठंडा हर समय, तब ये तो उससे भी उपर निकले हैं. न धूल, न धक्कड़-पोल्यूशन फ्री-कूल कूल. अब तक तो वो डेस्टीनेशन पर टच कर रहे होंगे-कोई भारतीय रेल से तो गये नहीं हैं कि चले जा रहे हैं-गंतव्य आ ही नहीं रहा या फिर नोयडा से कनॉट प्लेस जा रहे हों कि ट्रेफिक में फंसे के फंसे ही रह गये और सुबह से शाम हो ली.
फिर सब लोग वहीं पेड़ के नीचे जमा हुए. भाषण अधिभार हमारा क्षेत्र था सो चबूतरे पर मित्र हमारे बाजू में सर झुकाये खड़े हो लिये और बोले हम, भारी भर्राई आवाज में:
" बाबू जी नहीं रहे. वे व्यक्ति नहीं, एक युग थे. आज एक युग समाप्त हुआ आदि आदि जरुरी व्यवहारिक फैशनारुप नियमित अंतिम क्रिया के बाद की बातें. आदतन बीच में एक पुराना शेर भी ठेल दिया:
जिन्दगी मानिंद बुलबुल शाख की,
दो पल बैठी, चहचहाई और उड़ चली"
कवियों के साथ ये बीमारी है. मंच दिखा, श्रोता दिखे और मन मचल उठता है. सो, मैं बीमार, लोभ संवरण न कर पाया. फिर कब अस्थि संकलन है आदि के बाद दो मिनट के नाम पर ३० सेकेंड का मौन रख फुर्ती से विदाई.
खैर, बाबू जी चले गये ठंडे में और पीछे रह गये उनके पुत्र याने हमारे मित्र गर्मी में-एकदम खड़ी धूप. यही होता है जब गर्मी में सर से साया हट जाये. शायद किसी के बुजुर्ग ऐसी ही गरमी में निकल लिये होंगे और शमशान चिंतन तो जग प्रसिद्ध है, तब उसी चिंतन के क्षणों में उसने यह कहावत रची होगी:
"बुजुर्ग एक वट वृक्ष से साये की तरह होते हैं."
इस बीच एक दो बार और भी उनके घर जाना हुआ. सब रिश्तेदारों का जमावड़ा. कहीं नाश्ता चाय. कहीं मामा गाना अच्छा गाते हैं, तो उनको घेरे रिश्तेदार लोग गाना सुन रहे हैं. कहीं बड़े दिनों बाद मिल रहे कजिन्स ताश जमाये बैठे हैं. कोई अनजान हो, तो समझे घर में शादी है.
बात यूँ निकल पड़ी कि आज उनकी तेहरवीं थी. मित्र ने सर मुंडवा रखा था. बकौल कई दोस्त, उस पर यह स्टाईल बहुत सूट कर रही थी. एकदम कूल ड्यूड. बड़े बेहतरीन बेहतरीन व्यंजन मनुहार कर कर के खिलाये जा रहे थे. हमारे मित्र प्रसन्न मुद्रा में सभी आंगतुकों का स्वागत कर रहे थे. चेहरे पर वही पुरानी मुस्कान. हँसी ठ्ट्ठे की फुहार हर तरफ.
हमने भी लुत्फ उठाया स्वादिष्ट व्यंजनों का. बकौल हमारे मित्र याने दिवंगत के पुत्र, शहर के सबसे बेहतरीन केटरर ने जो बनाया था, फिर लज़ीज तो होना ही था. वाह!! निकल पड़ा हमारे मूँह से अनायास ही. पता चला चमचम बनारस से बुलवाये हैं. कहिन कि बाबू जी को बहुत पसंद थे. पता नहीं कब पसंद थे, हमारे होश में तो हमने उन्हें मुहल्ले की हलवाई की दुकान पर जाते तक कभी नहीं देखा, फिर बनारस के चमचम पसंद, वो भी ठेठ जबलपुरिया को-जो कभी जबलपुर के बाहर गया ही नहीं. सारे रिश्ते-नातेदार यहीं. उनकी लीला वो जाने, हमें तो चमचम बहुत पसंद आये. दो खा लिये.
चलते चलते वे हमसे पूछ बैठे-"और कब तक हो इंडिया में?"
हमने बताया कि अभी तो अप्रेल के आखिर तक हैं तो बड़े खुश हो लिये और कहने लगे कि चलो, अब आज सब झंझट से फुरसत हुए जा रहा हूँ. तुम तो जानेते ही हो कि कब से यह सब लफड़े लगे थे..पहले तो पिता जी बहुत दिन बीमार रहे फिर ......खैर, बस एकाध दिन में सब रिश्तेदार निकल लें तो बैठते हैं तुम्हारे साथ फिर महफिल जमें. वो जो बोतल कनाडा से लाये हो, वो तो रखी होगी न कि साफ हो गई.
मैं उस दुखी मित्र (अरे भाई, उसके पिता को गुजरे अभी मात्र १३ दिन ही तो हुए हैं) को यह बता कर और दुखी नहीं करना चाहता था कि ४ महिने हो गये हैं हमें आये. अगर न भी साफ करते तो अल्कोहल तो अब तक हवा में ही उड़ लेती, और बोतल मिलती ऐसी ही खाली. इसलिये, हाँ में हाँ मिला कर चल दिया.
सोचता हूँ कि हम सब भी एक न एक दिन किसी न किसी के लिये ऐसे ही लफड़े साबित होंगे और वो भी फुरसत होकर महफिल जमाने की फिराक में लगेंगे. बस, यह शेर याद आ लिया:
देखो भाईया, सब कुछ पारी पारी है...
आज तेरी है तो कल मेरी बारी है....
शायद वक्त आ गया है कि पुरातन परंम्पराओं को कुछ आसान किया जाये इसके पहले कि हमारी खुद की फजीहत हो.
पुनश्चः : किसी की भावनाओं को आघात पहुँचाना इस आलेख का उद्देश्य कतई नहीं है. बस जैसा देखा और जैसा मन में आया कि बदलना चाहिये, उस हिसाब से लिख दिया.









