सोमवार, अगस्त 04, 2008

कुछ तो बदलना चाहिये!!

मित्र के पिता जी नहीं रहे.

यूँ भी एक न एक दिन तो नहीं ही रहना था-काल करे सो आज कर-की तर्ज पर आज ही नहीं रहे. सामने सामने प्यार से सब उन्हें बाबू जी कहते थे.

बहुत ही भले आदमी थे हर स्वर्गवासी की तरह. अंतर बस इतना था कि वो जब तक जिन्दा रहे, दूसरों की तकलीफों के प्रति अति संवेदनशील थे. मरने के बाद का पता नहीं मगर शायद मरते वक्त उन्हें आभास नहीं हो पाया होगा कि वो जा रहे हैं अन्यथा मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि किसी को कोई तकलीफ न हो इसलिये वो खुद ही पाँच मिनट पहले बस से शमशान चले जाते और चिता पर लेट कर ही अंतिम सांस लेते याने कि पर-तकलीफ के प्रति संवेदनशीलता की पराकाष्टा.

अन्य मित्रों की भाँति मैं भी शमशान गया था उनको अंतिम विदाई देने. बिल्कुल गमगीन चेहरा, आँख पर काला चश्मा और मूँह में पान मसाला कि भूले से भी कोई शब्द न फूटे. बस, मौन की आवाज, सामने जलती चिता, हवाओं की सरसराहट, पसीने की चिपचिप और शमशान का सन्नाटा. गम का इससे बेहतर सीन क्या हो सकता है?

पूरा माहौल सेट मगर कुछ नालायक किसम के लोग पास ही खड़े हँसी मजाक भी कर रहे थे और अनाप शनाप राजनिती से लेकर शहर की बिजली, पानी की कभी न हल हो सकने वाली शास्वत समस्या पर कभी न खत्म होने वाली शास्वत बातचीत. मुझे ऐसे लोग पसंद नहीं. अरे भाई, गम का माहौल है, कुछ देर मत हंसों, कुछ देर इन समस्याओं को दर किनार करो. गम में शामिल रहो. ऐसे नहीं चुप रह सकते तो पान दबा लो सुरती वाला मगर चुप रहो. खराब लगता है जिसके घर गमी हुई है उसे. उसकी मजबूरी है वो चाह कर भी हँस नहीं सकता और उसे तो मूँह उतारे खड़े ही रहना है और तुम हो कि मूँह बाये तो ऐसा कि बंद ही नहीं कर रहे हो.

वो तो खुद ही जल्दी में है, आधे घंटे भी उसे भारी लग रहे हैं. क्या तुम उतना भी साथ नहीं दे सकते? कैसे दोस्त हो यार? देखा नहीं, कितनी फटाफट धोती पहनी. चिता के दो चक्कर काट कर लगे पंडित की तरफ देखने और फिर उसके कहने पर दौड़ कर तीसरा चक्कर काटा. फट से दाग दी और जल्दी आग पकड़े इसलिये दनादन धौंख मरवाई. इधर से घी डालो, उधर से घी डालो-ये दूसरे भाई बोल रहे हैं जिन्होंने दाग नहीं दी. वो भी लगे हैं जल्दी आग पकड़े. पांच मिनट पहले से ही कपाल क्रिया के लिये लट्ठ उठाये खड़े पंडित जी की तरफ ताक रहे हैं कि कब वो कहें और ये सर फोड़े. चंदन फैंके और घर निकलें. गर्मी भी तो कितनी है? सर पर सीधे तपता सूरज और सामने चिता का ताप. बाप रे बाप!!

बाबू जी तो निकल लिये और सुना है उपर तो बढ़िया ठंडक रहती है. हवाई जहाज में बाहर का तापमान बताता है एकदम ठंडा हर समय, तब ये तो उससे भी उपर निकले हैं. न धूल, न धक्कड़-पोल्यूशन फ्री-कूल कूल. अब तक तो वो डेस्टीनेशन पर टच कर रहे होंगे-कोई भारतीय रेल से तो गये नहीं हैं कि चले जा रहे हैं-गंतव्य आ ही नहीं रहा या फिर नोयडा से कनॉट प्लेस जा रहे हों कि ट्रेफिक में फंसे के फंसे ही रह गये और सुबह से शाम हो ली.

फिर सब लोग वहीं पेड़ के नीचे जमा हुए. भाषण अधिभार हमारा क्षेत्र था सो चबूतरे पर मित्र हमारे बाजू में सर झुकाये खड़े हो लिये और बोले हम, भारी भर्राई आवाज में:

" बाबू जी नहीं रहे. वे व्यक्ति नहीं, एक युग थे. आज एक युग समाप्त हुआ आदि आदि जरुरी व्यवहारिक फैशनारुप नियमित अंतिम क्रिया के बाद की बातें. आदतन बीच में एक पुराना शेर भी ठेल दिया:

जिन्दगी मानिंद बुलबुल शाख की,
दो पल बैठी, चहचहाई और उड़ चली"


कवियों के साथ ये बीमारी है. मंच दिखा, श्रोता दिखे और मन मचल उठता है. सो, मैं बीमार, लोभ संवरण न कर पाया. फिर कब अस्थि संकलन है आदि के बाद दो मिनट के नाम पर ३० सेकेंड का मौन रख फुर्ती से विदाई.

खैर, बाबू जी चले गये ठंडे में और पीछे रह गये उनके पुत्र याने हमारे मित्र गर्मी में-एकदम खड़ी धूप. यही होता है जब गर्मी में सर से साया हट जाये. शायद किसी के बुजुर्ग ऐसी ही गरमी में निकल लिये होंगे और शमशान चिंतन तो जग प्रसिद्ध है, तब उसी चिंतन के क्षणों में उसने यह कहावत रची होगी:

"बुजुर्ग एक वट वृक्ष से साये की तरह होते हैं."

इस बीच एक दो बार और भी उनके घर जाना हुआ. सब रिश्तेदारों का जमावड़ा. कहीं नाश्ता चाय. कहीं मामा गाना अच्छा गाते हैं, तो उनको घेरे रिश्तेदार लोग गाना सुन रहे हैं. कहीं बड़े दिनों बाद मिल रहे कजिन्स ताश जमाये बैठे हैं. कोई अनजान हो, तो समझे घर में शादी है.

brahmin

बात यूँ निकल पड़ी कि आज उनकी तेहरवीं थी. मित्र ने सर मुंडवा रखा था. बकौल कई दोस्त, उस पर यह स्टाईल बहुत सूट कर रही थी. एकदम कूल ड्यूड. बड़े बेहतरीन बेहतरीन व्यंजन मनुहार कर कर के खिलाये जा रहे थे. हमारे मित्र प्रसन्न मुद्रा में सभी आंगतुकों का स्वागत कर रहे थे. चेहरे पर वही पुरानी मुस्कान. हँसी ठ्ट्ठे की फुहार हर तरफ.

हमने भी लुत्फ उठाया स्वादिष्ट व्यंजनों का. बकौल हमारे मित्र याने दिवंगत के पुत्र, शहर के सबसे बेहतरीन केटरर ने जो बनाया था, फिर लज़ीज तो होना ही था. वाह!! निकल पड़ा हमारे मूँह से अनायास ही. पता चला चमचम बनारस से बुलवाये हैं. कहिन कि बाबू जी को बहुत पसंद थे. पता नहीं कब पसंद थे, हमारे होश में तो हमने उन्हें मुहल्ले की हलवाई की दुकान पर जाते तक कभी नहीं देखा, फिर बनारस के चमचम पसंद, वो भी ठेठ जबलपुरिया को-जो कभी जबलपुर के बाहर गया ही नहीं. सारे रिश्ते-नातेदार यहीं. उनकी लीला वो जाने, हमें तो चमचम बहुत पसंद आये. दो खा लिये.

चलते चलते वे हमसे पूछ बैठे-"और कब तक हो इंडिया में?"

हमने बताया कि अभी तो अप्रेल के आखिर तक हैं तो बड़े खुश हो लिये और कहने लगे कि चलो, अब आज सब झंझट से फुरसत हुए जा रहा हूँ. तुम तो जानेते ही हो कि कब से यह सब लफड़े लगे थे..पहले तो पिता जी बहुत दिन बीमार रहे फिर ......खैर, बस एकाध दिन में सब रिश्तेदार निकल लें तो बैठते हैं तुम्हारे साथ फिर महफिल जमें. वो जो बोतल कनाडा से लाये हो, वो तो रखी होगी न कि साफ हो गई.

मैं उस दुखी मित्र (अरे भाई, उसके पिता को गुजरे अभी मात्र १३ दिन ही तो हुए हैं) को यह बता कर और दुखी नहीं करना चाहता था कि ४ महिने हो गये हैं हमें आये. अगर न भी साफ करते तो अल्कोहल तो अब तक हवा में ही उड़ लेती, और बोतल मिलती ऐसी ही खाली. इसलिये, हाँ में हाँ मिला कर चल दिया.

सोचता हूँ कि हम सब भी एक न एक दिन किसी न किसी के लिये ऐसे ही लफड़े साबित होंगे और वो भी फुरसत होकर महफिल जमाने की फिराक में लगेंगे. बस, यह शेर याद आ लिया:

देखो भाईया, सब कुछ पारी पारी है...
आज तेरी है तो कल मेरी बारी है....

शायद वक्त आ गया है कि पुरातन परंम्पराओं को कुछ आसान किया जाये इसके पहले कि हमारी खुद की फजीहत हो.

पुनश्चः : किसी की भावनाओं को आघात पहुँचाना इस आलेख का उद्देश्य कतई नहीं है. बस जैसा देखा और जैसा मन में आया कि बदलना चाहिये, उस हिसाब से लिख दिया. Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, जुलाई 30, 2008

ये सॉलिड तरीका हाथ लगा!!!

किसी ने कहा है कि अगर ससम्मान जीवन जीना है तो वक्त के साथ कदमताल कर के चलो अर्थात जो प्रचलन में है, उसे अपनाओ वरना पिछड़ जाओगे. अब पार्ट टाईम कवि हैं, तो उसी क्षेत्र में छिद्रान्वेषण प्रारंभ किया. ज्ञात हुआ कि वर्तमान प्रचलन के अनुसार, बड़ा साहित्यकार बनना है तो दूर दराज के विदेशी कवियों की रचनाऐं ठेलो.

पोलिश कवियत्री, रुमानिया का कवि, उजबेकिस्तान का शायर, फ्रेन्च रचनाकार, और साथ में इटेलियन चित्रकार की चित्रकारी ससाभार उसी चित्रकार के, जैसे कि उसे व्यक्तिगत जानते हों. वैसे, बात जितनी सरल लग रही है, उतनी है नहीं. मन में कई संशय उठते हैं. अतः मैने अपने मित्र को किसी के द्वारा प्रेषित एक बड़े साहित्यकार द्वारा छापी एक विदेशी कवि की रचना मय चित्र भेज कर उसके विचार जानने चाहे. त्वरित टिप्पणी में उसे हमसे भी ज्यादा महारथ हासिल है. तुरंत जबाब आ गया. कहते हैं कि कविता तो खैर जैसी भी हो, विदेशी होते हुए भी हिन्दी पर पकड़ सराहनीय है.

मैं माथा पकड़ कर बैठ गया. लेकिन फिर सोचता हूँ कि इसमें उसकी क्या गल्ती है. अव्वल तो ऐसी कविताओं के साथ लिखा ही नहीं होता कि यह अनुवाद है या भावानुवाद या किसने किया है और अगर गल्ती से लिख भी दें तो कहीं कोने कचरे में हल्के से और कवि का नाम और उनका देश बोल्ड में.

मगर फैशन है तो है. सब लगे हैं तो हम क्यूँ पीछे रहें. शायद इसी रास्ते कुछ मुकाम हासिल हो.

मूल चिन्ता यह नहीं की कैसे करें? मूल चिन्ता है कि किसकी कविता का अनुवाद करें? वो बेहतरीन रचना मिले कहाँ से, जो हिन्दी में भी बेहतरीनीयत कायम रख सके? घोर चिन्तन और संकट की इस बेला में हमें याद आया हमारा पुराना संकट मोचन मित्र. उसकी दखल हर क्षेत्र में विशेषज्ञ वाली है और इसी के चलते कालेज के जमाने में उसे संकट मोचन की उपाधि से अलंकृत किया गया था हम मित्रों के द्वारा. संकट कैसा भी हो, उन्हें पता लगने की देर है और वो उसे मोचने चले आयेंगे. अतः हमने खबर कि संकट की घड़ी है, चले आओ और वो हाजिर.

विषय वस्तु समझने, सुनने और अनेकों उदाहरण जो मैने प्रस्तुत किये, देखने के बाद पूरी अथॉरटी से बोले: ’यार, तुम भी तो कविता लिखते हो? एकाध गद्यात्मक कविता निकालो अपनी डायरी से.’ हमने धीरे से अपनी एक कविता बढ़ा दी. एक नजर देखकर बोले, हाँ, यह चल जायेगी क्यूँकि कुछ खास समझ नहीं आ रही कि तुम कहना क्या चाह रहे हो!!’

फिर उन्होंने इन्टरनेट का रुख किया और गुगल सर्च मारी: ’स्विडन के फेमस लोग’. सर्च के जबाब में ओलिन सरनेम चार पाँच बार दिखा, नोट कर लिया. दूसरा सरनेम दो बार दिखा तो वहाँ से फर्स्ट नेम ’पीटर’ निकाल लाये और शीर्षक तैयार ’स्विडन के प्रख्यात जनकवि पीटर ओलिन की कविता’. मेरा तो नहीं मगर इस संकट मोचनवा का दावा है कि बहुतेरे लोग इसी तरह चिपका रहे हैं अपनी रचनाऐं विदेशी नाम से और चल निकले हैं.

आगे के लिए भी सलाह दी है कि अगर कविता तैयार न हो तो किसी भी जगह से ८-१० लाईन का अच्छा गद्य उठा कर कौमा फुलस्टाप की जगह बदलो. शब्दों की प्लेसिंग बदलो, थोड़ा कविता टाईप शेप देकर ठेल दो, तुम तो कवि हो, इतना तो समझते ही हो. एक विदेशी नाम मय देश के चेपों और बस, चल निकलोगे गुरु.

संकट मोचन तो हमारा संकट मोच चले गये, कहीं और मोचने और हम चेंप रहे हैं:

’स्विडन के प्रख्यात जनकवि पीटर ओलिन की कविता’

घुटन

gutana


सुबह सुबह
स्वच्छ, साफ सुथरा
वातावरण
शीतल शुद्ध
मंद बयार
पर झूमती हुई
पक्षियों की चहचहाहट
हरे भरे वृक्ष
मेरा मन
मोहित कर लेते हैं
जब मैं
टहलने निकलता हूँ ...

प्रफुल्ल मना
वहीं पार्क की
कोने वाली बेन्च पर-
सुस्ताने की खातिर
बैठ कर
खोलता हूँ
अखबार का पन्ना
और
मन घुटन से भर जाता है!

भावानुवाद: समीर लाल ’समीर’
(चित्र साभार: इटालियन चित्रकार एन्टोनी डी पॉम्पा, उनका बहुत आभार)


नोट: महज हास्य विनोद वश पोस्ट है. कोई आहत न हो और अपनी आदतानुसार जारी रहें. इस रचना का उद्देश्य उन्हें रोकना नहीं, वरना उसी अखाड़े में अपना हाथ आजमाना है. Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, जुलाई 27, 2008

एक टिप्पणी १२१ पोस्ट

जिस दिन लोकसभा में विश्वास मत के सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन हुआ, और सारे सांसदों के कारनामे खुले आम जनता के सामने आये, मैने एक टिप्पणी, इस विषय में पहली पोस्ट पर लिखी:

दुर्भाग्यपूर्ण, अफसोसजनक एवं निन्दनीय!!!

फिर इसे नोट पैड में सुरक्षित भी कर लिया.

आज तक की सबसे ज्यादा चलने वाली टिप्पणी- बहुत खूब!! साधुवाद!! आम जनता की तरह अपने मूँह की खाई किनारे पड़ी रही और ये बिन सिर पैंदी की टिप्पणी अपनी विजय यात्रा पर निकली. हर जगह-जिस पोस्ट पर देखो..संसद, सांसद, उनका चरित्र, सोमनाथ दा का पार्टी निकाला, उन्होंने सही किया, उन्होंने गलत किया. सांसदों को ऐसे नोट नहीं चमकाने थे, सारे २५ करोड़ चमकाने थे आदि आदि...सब पर यह टिप्पणी कट पेस्ट से चमकने लगी: दुर्भाग्यपूर्ण, अफसोसजनक एवं निन्दनीय!!! सौजन्य-उड़न तश्तरी-समीर लाल...

हमने सोचा कि एक दो दिन में मामला शांत हो जायेगा तो यह टिप्पणी वाली फाईल डिलिट कर देंगे मगर फिर बैंगलोर में धमाके: दुर्भाग्यपूर्ण, अफसोसजनक एवं निन्दनीय!!!

कल अहमदाबाद में धमाके: दुर्भाग्यपूर्ण, अफसोसजनक एवं निन्दनीय!!!

अब तक १२१ से ज्यादा पोस्ट हो चुकी है, जिस पर मैं यह चिपकाते आ रहा हूँ. हे मानवता!! जागो!! मुझे मौका दो कि मैं यह टिप्पणी मिटाने दो...मैं अब और इसे करना नहीं चाहता. एक डर और है कि कहीं किसी कविता आदि पर न चिपक जाये जल्द बाजी में. मित्रों, इसे भूल चूक लेनी देने में डाल देना-माहौल के चलते हो गई होगी. :)

खैर!! इसी मसले पर मेरे गुरु गीत सम्राट राकेश खंडेलवाल जी से बातचीत हो रही थी, तो दोनों की बातचीत कुछ कवित्तमय हो ली संसद कांड को लेकर. आप भी देखें:

उठा पटक के इस नाटक में,
किसको क्या क्या याद रहा...
दुर्योधन ने लाज बचाई,
कृष्ण बेचारे भूल गये...!!

बारिश की बूँदों ने रोका.
सूरज की किरणों ने टोका..
रुपयों की बारिश देखी तो,
झोली फ़ैलाना भूल गये!!

कुटिल हुईं कौटिल्य नीतियां
करें राज अब विषकन्या
जिसने पाला पोसा, वे ही
मंतर सारे भूल गये!!

गांधारों के शकुनि आज सब
दिल्ली में आकर बैठे
इन्द्रप्रस्थ का सपना क्या था
हम बेचारे भूल गये!!

सत्ता की रावणी प्यास ने
कैसा खुल कर नॄत्य किया
शर्म- चूनरी शेहरावत की
लाज के मारे भूल गये!!

फिर न जाने क्यूँ मेरे मन में इस कविता ने जन्म लिया, जो आपका आशिर्वाद चाहती है:


नई महाभारत

मदारी का खेल
मसखरों का जमावड़ा
कुछ कुश्ती, कुछ दंगल,
एक सांस्कृतिक मंचन
मंच का नाम 'संसद'!!

लोकतांत्रिक तरीके से
लोकतंत्र का चीरहरण करते
युग पुरुष
लाज बचाना
भूल गये हैं कृष्ण
हँसते हैं
और उनके साथ
ताली बजाते पांडव,

मंद मंद मुस्कराते
भीष्म पितामह,
कलयुग में
क्या नहीं होता
सब हैं
एक नई महाभारत
नित रचने के लिए!!

जनता
अपने ही चमत्कार से
रोज चमत्कृत होती
अपने ही चयन को
मूँह बाये
आश्चर्य से देखती
कुंठा
और खीज
की गठरी
सर पर लादे...

सावनी अमावस्या से भी काली
घुप्प अंधेरी सुरंग मे,
मौन के सम्वेत स्वर के
कर्णभेदी
भयावह अट्टाहस
के बीच
चंद खुली सांसों की
एक ख्वाहिश लिए...

दिशाहीन
अप्राप्य रोशनी
के एक सपने
का पीछा करते
भटकती चली जा रही है..

उफ़!!!

कितनी जटिल है यह चाह
विकासशील
से विकसित होने की!!

--समीर लाल 'समीर'


---कल और आज कोई टिप्पणी नहीं की. दो दिन बाद अभी अमेरीका से लौटा हूँ याने कल सुबह से...फिर शुरु!! :) Indli - Hindi News, Blogs, Links

सोमवार, जुलाई 21, 2008

हाय रे, ये जी का जंजाल!!

मुन्नू याने पिछले ढाई दशक से भी ज्यादा समय से मेरे जी का जंजाल.

मेरे मित्र शर्मा जी का बेटा है. पारिवारिक मित्र हैं तो सामन्यतः न पसंदगी को भी पसंदगी बता कर झेलना पड़ता है. शायद शर्मा जी का भी यही हाल हो मगर उससे हमें क्या?

मुन्नू क्या पैदा हुए, शर्मा शर्माइन सारी शरम छोड़ कर उसी के इर्द गिर्द अपनी दुनिया सजा बैठे. फिर क्या, मुन्नू ने आज माँ कहा, मुन्नू आज गुलाटी खाना सीख गये, मुन्नू चलने लगे. मुन्नू सलाम करना सीख गये और जाने क्या क्या. हर बात की रिपोर्टिंग बदस्तूर फोन के माध्यम और आ आकर या बुला बुलाकर मय प्रदर्शन के जारी रही.

बेटा, समीर अंकल को सलाम करो..बीस बार बोलने पर मुन्नू भी टुन टान करके एक बार सलाम किये..फिर क्या, सब लगे उसे चूमने..खूब खुश होकर अतः हम भी खुशी से हँसे. वाह, वेरी गुड करते हमारा मूँह दुख गया मगर शर्मा दंपत्ति न थके. नित नये किस्से.

देखते देखते मुन्नू चार साल के हो गये. दीवार से लेकर फ्रिज तक पर पेन्टिंग ड्राईंग में महारत हासिल कर ली. मूंछ वाली रेलगाड़ी, कुत्ते से बदत्तर सेहत वाला पंखधारी शेर, गमले में उगता आधा कटा पपीते के आकार का सेब, नीला केला..सब बनाना सीख गया. शर्मा दंपत्ति का सीना गर्व से फूला न समाता और हम एक चाय की एवज में वाह वाह करते रह जाते.

वाह वाही से बालक मुन्नू इतना उत्साहित हुए कि एक दिन हमारे ड्राईंग रुम की दीवार पर उड़ती हुई मछली के सर पर गुलाब का फूल उगा गये. अब हमें काटो तो खून नहीं, मगर क्या करते. खुद ही तो वाह वाह करके उत्साहित किये थे. मिटा भी नहीं सकते, शर्माइन के बुरा मान जाने का खतरा. वो तो इस चक्कर में साल भर बाद एक पैच मिटाने के लिए पूरे घर को पेन्ट करवा कर बहाना बनाया कि पेन्ट छूटने लगा था, तब बच पाये.

आप भी देखें मुन्नू की कला का एक नमूना:

kid draw

अब तक मुन्नू स्कूल जाने लगे. हमारे लिए नई जहमत रोज साथ लाने लगे. अब जब भी वो लोग बुलायें या हमारे यहाँ आयें तो कभी गिनती, कभी ए बी सी, कभी पहाड़ा और कभी कविता. दोनों हाथ एक के उपर एक चिपका कर दोनों अंगूठे उड़ा उड़ा कर नचाते हुए..

मछली जल की रानी है..(पीछे पीछे शर्माइन बैकअप में..हाथ लगाओ...!!!)
हाथ लगाओ, डर जाती है (शर्माइन की देखादेखी डरने का अभिनय करते हुए और फिर दोनों हाथ समेट कर बाजू में उस पर गाल टिकाते हुए)
बाहर निकालो...(आँख बंद करके मरने का अभिनय) मर जाती है....

शर्मा शर्माइन की तालियाँ..मैं सोचने लगा कि कितनी खुश किस्मत है यह मछली जो मर गई, मुन्नू की जमाने से सुनी जा रही घिसी पिटी कविता से निजात पा गई और हम अटके हैं जब मुन्नू पुनः मनुहार पर जैक एण्ड जिल सुनाने की ऐंठते हुए तैयारी कर रहे हैं. दिखाने के लिए हम भी ताली बजाते रहे और मुन्नू सुनाना शुरु हुए...


जैक एण्ड जिल....और अंतिम पंक्ति में...

जिल केम टंम्बलिंग आफ्टर...

और मुन्नू जी पूरी तन्मन्यता से धड़धड़ा कर गिरे. सबने ताली बजाई, मुन्नू हँसे, हम दिल दिल में रोये.चेहरे पर मुस्कान चिपकाये ताली बजाने लगे., समझिये कि भयंकर झेले. सर पकड़ लिया. घर पर सेरीडॉन की सर दर्द गोली का पत्ता हफ्तावारी लिस्ट में शामिल हो गया. लगने लगा जैसे सेरीडॉन ने शर्मा जी को अपना ब्रॉण्ड एम्बेसडर बना दिया हो. उन्हें देखते ही इसकी याद आ जाये.

अच्छा या बुरा, कहते हैं कैसा भी वक्त हो, गुजर ही जाता है. सो यह भी गुजरा. झेलते झिलाते मुन्नू २६ साल के हो लिये. दो महिने पहले उनका भारत में ब्याह भी कर दिया गया. तब से आज तक बुल्लवे पर उनके घर चार बार हम जा चुके है और वो हमारे घर प्रेशर क्रियेट कर बुल्लवे पर तीन बार आ चुके हैं. हर बार शादी के चार फोटो एलबम, जिसमें हल्दी, मेंहदी, शादी, रिसेप्शन और फिर हनीमून की तस्वीरें हैं और इन्हीं विभिन्न समारोहों का विडियो देख देख कर पक चुके हैं. ये बुआ जी, ये चाची, ये दादी, ये साला, ये दूर की साली-इन्फोसिस में, ये गुलाबी साड़ी में नौकरानी छल्लो, ये भूरा ड्राईवर..ये ये...वो वो...हाय, मेरे कान क्यूँ न फट गये, आँख क्यूँ न फूट गई. कहो उनकी बहू जिन रिश्तेदारों को न पहचाने, उन्हें हम बिना मिले अंधेरे में पहचान जायें, बिना किसी गफलत के. एक बार फिर घर में सेरीडॉन चल निकली है.

कल रात आये थे..इस बार शादी का विडियो बर्न करके दे गये हैं क्यूँकि हमें बहुत पसंद आया था. :) अगली बार लेड़ीज संगीत वाला भी बना कर दे जायेंगे, यह बात उन्होंने समय की कमी के कारण क्षमा मांगते हुए बता दी है. अब तो जब उस विडियो पर नजर जाती है, बस मन से एक ही उदगार निकलता है-

धन्य हो तुम..मेरे मुन्नू.

हम आगे के लिए भी तैयार हैं, जब अगले बरस तुमको बच्चा होगा. हमें तो मानो परम पिता परमेश्वर ने किसी पुराने जन्म का बदला लेकर सिर्फ झेलने को रचा है.

शायद, पिछले जनम में कवि रहा होऊँगा और लोगों को खूब झिलवाया होगा.


डिस्क्लेमर:
जिनके बच्चे छोटे हों या अभी अभी शादी हुई हो, वो कृप्या इस पोस्ट को दिल से न लें. बदस्तूर जारी रहें. ऐसे ही दुनिया चल रही है. जब हमने झेला है तो हम किसी और को क्यूँ बचवायें.

सूचना:

मेरी पिछली पोस्ट उड़ी उड़ी रे पतंग देखो उड़ी रे ने मुझे आजतक एक पोस्ट पर प्राप्त अधिकतम टिप्पणियों का रिकार्ड ८४ को ब्रेक करते हुए नया मुकाम हासिल किया है, आप सबके स्नेह का बहुत आभारी हूँ. ऐसा ही स्नेह और आशीष बनाये रखें, संबल मिलता है. Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, जुलाई 17, 2008

उड़ी उड़ी रे पतंग देखो उड़ी रे!!!

सबको सुबह की चाय देने से आंगन लीपने तक सब काम निपटा कर वह अब नहा कर बाल सुखाने छत पर चली आई थी. पूरा आसमान रंग बिरंगी पतंगों से पटा पड़ा था और एकदम रंगीन हो उठा था. उसने एक नजर आसमान पर डाली और अटक गई उस दूर उड़ती आधे पीले और आधे नीले रंग वाली पतंग में.

patang

मानो वो उसके सपने हों जिसे वो बचपन से देखती आई थी. कुछ नीले, कुछ पीले और कुछ नीले पीले मिले हुए धानी सपने.

नीले सपने, हाँ एकदम नीले! देखती थी बचपन से. देखती कि वो भईया हो गई. स्वच्छंद गली के लड़कों के साथ सारा सारा दिन खेल पा रही है, न कोई रोक न कोई टोक. बस, भईया होते ही वो साईकिल लेकर दोस्तों के साथ पूरे गांव में घूम रही है. घर का कोई साथ नहीं. न कोई पूछने वाला कि कहाँ जा रही हो और कब लौट कर आओगी. बड़े होने तक वो नीले सपने देखती चली गई. भईया बन पास के गांव में ८ वीं से आगे पढ़ने जा रही है. पिता जी के साथ दुकान में हाथ बटा रही है और न जाने क्या क्या!! बस, एक स्वच्छंद एवं बेरोक टोक जीवन जीने की चाह.

कभी पीले सपने देखने लग जाती. किताबों में विदेश की तस्वीरें देखती थी. सपने में वहीं पहुँच जाती. गोरे गोरे उजले साफ सुथरे लोग. रुई के फुओं से, बादलों की तरह बिखरे बरफ के मैदान और उनमें गिर गिर के बल खाती, इठलाती, खेलती वो. बड़ा सा गोला बना कर अपने सपनों के राजकुमार पर उछाल कर खिलखिलाती वो. फिर पीले नीले मिले जुले धानी सपने. वो भईया की तरह पतलूम कमीज पहने अपने सपनों के राजकुमार पति की बाहों में झूलती रोशन विदेशी संसार में खोती जाती, डूबती जाती. पाश्चात संगीत की स्वर लहरी पर झूमती वो. अपने सपनों में सपनों को सच होता देखती वो.

बस उलझी रही एकटक उस पीली नीली पतंग में. दूर बहुत दूर, ऊँचे आसमान में खूब उपर. इतनी ऊँचाई कि धुंधली होती दिखती पतंग. बड़ी लेकिन एकदम छोटी सी दिखती पतंग. सोचने लगी, शायद, उतनी उपर से पतंग को उस पार विदेश भी दिखता होगा. एक मुस्कराहट सी तैर गई उसके चेहरे पर.

एकाएक काली पतंग ने आकर उस पीले नीले रंग वाली पतंग को काट दिया और वो पीली नीली पतंग अपने अस्तित्व को नाकारती हवाओं के थपेड़ों संग बह चली, जहाँ तक हवा उसे उड़ा कर ले गई और फिर कटीली झाड़ियों में उलझ कर हो गई छिन्न भिन्न. जैसे उसके सपनों का ढहता महल.

आँसू बस गिरने को ही थे कि एकाएक राजू उसकी साड़ी का पल्लू पकड़ कर बोला "माँ" मानो उसको यथार्थ की दुनिया में वापस ले आया हो.

वो उसके साथ नीचे उतर आई. माँ की पूजा भी खतम होने को है. वो सर पर पल्लू रख लेती है. पति, जो कि स्कूल में बाबू हैं, उनके खाने पर आने का वक्त भी हो चला है.

जल्दी से वो खाना बनाने में जुट जाती है. खिचड़ी, चोखा और तिल के लड्डू.

उसे याद है, आज मकर संक्राति है. Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, जुलाई 13, 2008

हाय!! ये बदलता नज़रिया

यह रचना आज की सामाजिक परिस्थितियों पर मेरे खराब स्वास्थय के दौरान कुनैन की गोलियों की कड़वाहट मूँह में लिए, बदलते नज़रिये पर लिखी गई है. निवेदन है कि कृप्या उन्हीं स्थितियों का आभास करते हुए पढ़ें, शायद ज्यादा मजा आये.

हाय!! ये बदलता नज़रिया

Change

मैं
मलेरिया ग्रसित हूँ!!
सिगार के धुऐं से भी कड़वी
कुनैन की कड़वाहट
स्वाद ग्रन्थियों पर अपना कब्जा जमाये
पूरे मानस पटल पर आच्छादित
हो चुकी है..

अतीत की कड़वी स्मृतियाँ
हर खाँसी के संग उठते
पसलियों के दर्द के साथ
ताजी हो उठती हैं..
मैं
वेदना से कराहता
पूरे वातावरण में
कड़वाहट ही कड़वाहट
महसूस कर रहा हूँ!

कल तक
जो मुझे लुभाते थे
मुस्कराते फूल
गीत सुनाती चिड़िया
बेहतर मानवियता का परिचय देते
मुस्कराते खुश लोग..
आज न जाने क्यूँ
मेरा परिहास करते
नज़र आते हैं..

यों तो कुछ नहीं बदला
जानता हूँ मैं
वे सब
बिल्कुल वैसे ही हैं, जस के तस..
बदला हूँ मैं..बस मैं.

मैं--जो
मलेरिया ग्रसित हूँ!!
सिगार के धुऐं से भी कड़वी
कुनैन की कड़वाहट
स्वाद ग्रन्थियों पर अपना कब्जा किये
पूरे मानस पटल पर आच्छादित
हो चुकी है..

हाँ
इतनी कड़वाहट के बावजूद भी
दिल से बस यही
भाव उठते हैं..
आस लिये
शायद
कल जब मैं
मलेरिया के
प्रकोप से मुक्त हो जाऊँ
और दुनिया की उस खुशनुमा असलियत में लौटूँ.
मुझे जो दुनिया पसंद है…..

लेकिन
पता नहीं क्यों
हावी होने लगी है
यही कड़वाहट
सिगार के धुँये से भी कड़वी
मेरी आंखों पर
और दिखता है मुझे
पूरे का पूरा
मलेरिया ग्रस्त
समाज....
दुनिया....
लोग.....
और फिर
न जाने क्यों
और भी कड़वाहट
घुल जाती है
मेरे मुँह में.....

-समीर लाल ’समीर’

स्वास्थय अपडेट: बुखार अब बिल्कुल नहीं है. बदन दर्द से भी लगभग निजात मिल गई है. खाँसी जारी है अपनी पूरी ताकत से. जल्द राहत की उम्मीद है. टिप्पणियाँ देना और ब्लॉग पढ़ना काफी कम है मगर जल्द लौटने की उम्मीद है. इस बीच आप सबका साथ सराहनीय है. आज राजस्थान पत्रिका में छपे आलेख का जिक्र भी जरुरी है. जरुर देखें: यहाँ क्लिक करें. Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, जुलाई 10, 2008

एक सूचना, फिर हाले दिल और फिर लघु कथा

सूचना

'महावीर' ब्लॉग पर मुशायरा (कवि-सम्मेलन)

वरिष्ठ लेखक, समीक्षक, ग़ज़लकार श्री प्राण शर्मा जी की प्रेरणा से जुलाई १५, २००८ एवं जुलाई २२,२००८ को 'महावीर' ब्लॉग पर मुशायरे का आयोजन किया जा रहा है।

इस ब्लाग पर मुशायरे में शिरकत के लिए कवियों और कवियों की बड़ी तादाद होने की वजह से मुशायरे को दो भागों में दिया जा रहा है। पहला भाग १५ जुलाई और दूसरा भाग २२ जुलाई २००८ को दिया जायेगा।
देश-वदेश से शायरों और कवियों में प्राण शर्मा, लावण्या शाह, तेजेन्द्र शर्मा, देवमणि पांडेय, राकेश खण्डेलवाल, सुरेश चन्द्र "शौक़",कवि कुलवंत सिंह, समीर लाल "समीर",नीरज गोस्वामी, चाँद शुक्ला "हदियाबादी",देवी नागरानी, रंजना भाटिया, डॉ. मंजुलता, कंचन चौहान,डॉ. महक, रज़िया अकबरमिर्ज़ा, हेमज्योत्सना "दीप" आदि पधार रहे हैं।
आप से निवेदन है कि उनकी रचनाओं का रसास्वादन करते हुए ज़ोरदार तालियों (टिप्पणियों) से मुशायरे की शान बढ़ाएं।

महावीर शर्मा
प्राण शर्मा

पत्र-व्यवहार इस ईमेल पर कीजिए :
mahavirpsharma@yahoo.co.uk
'महावीर' - http://mahavir.wordpress.com

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आगे,

हाले दिल

तबियत अभी भी गले की खराश और शरीर की टूटन की वजह से खराब ही की केटेगरी में है. इतना बड़ा इन्जन, दुरुस्त होने में समय तो लगता ही है बस यही तस्सली है. हमसे आधे से भी कम साईज वाले ऑफिस में एक महिने में पूरी तरह ठीक हो पाये हैं तो हमारे तो अब क्या बतायें? बस, एक टिमटिमता सा दिया उम्मीद रोशन किये है. :)

ऐसे में नया क्या लिखें, फिर एक पुरानी कहानी, जो ब्लॉग पर नहीं है मगर तरकश और साहित्य कुंज पर प्रकाशित हो चुकी है, वो ही सुनाते हैं.
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लघु कथा

अपराध बोध



अगस्त की उमस भरी शाम। पीछे रेलवे क्वार्टर की सिगड़ियों से उठते कोयले के धुएँ की खुशबू पूरे माहौल मे भरी हुई थी। ये महक मुझे शुरू से बहुत भाती है।

हवा खाने के लिये मैं अपने दूसरी मंजिल के फ्लैट की पीछे वाली बालकनी में निकल आता हूँ। सिगरेट जलाते ही मेरी नज़र उन दो आँखों से टकरा जाती है, जो पिछवाड़े के क्वार्टर के आँगन से मुझे ही ताक रहीं थी। मैं चाह कर भी उसकी नज़रों से अपनी नजरें नही हटा पाया और एकटक उसे देखने लगा।

कितनी गहरी और बोलती हुई आँखें हैं। माथे पर अल्हड़ता से बिखरी जुल्फ़ें और पसीने से बेतरतीब हो गई वो सिंदुरी बिंदिया। एक पुरानी सी धानी रंग की सूती साड़ी मे लिपटी वो बला की खुबसूरत लग रही थी।

ऐसा नहीं कि मैंने पहले कभी उसे नहीं देखा मगर आज पहिली बार नज़रें चार हुईं थी। उसकी आँखों मे एक अजब सा प्रश्न चिन्ह और चेहरे पर आंतरिक वेदना की एक परत।

वो शायद सिगड़ी उठाने ही बाहर निकली थी। नज़रों के मिलते ही वो जड़वत जहाँ की तहाँ खड़ी रह गई। काँपते होंठ जैसे कुछ कह देने को आतुर और आँखें अपने भीतर छिपी असंख्य वेदनाओं का इज़हार करने को बेकरार।

एकाएक उँगलियों के बीच जलन से बिना पिये सिगरेट खत्म होने की तरफ जैसे ही ध्यान गया, हाथ जोर से झटक कर सिगरेट फेंकी। मेरी हालात देख वो बस धीरे से मुस्कराई। हमारी नज़रें फिर भी एक दूसरे को ही देखती रहीं। कब शाम ढल गई और अंधियारा घिर आया, पता ही नही लगा।

एकाएक उसके घर के दरवाजे पर उसके पति की दस्तक सुनते ही घबड़ा कर वो अंदर भाग गई। मै वहीं बालकनी मे कुर्सी खींच कर बैठ गया। मन अभी भी उसके आँगन में ही विचर रहा था।

उसके घर से चिल्लाने की आवाज आ रही थी। शायद उसका पति पीकर नशे मे घर लौटा था।
वो चिल्ला रहा था.. स्स्साआली, दिन भर पड़ी पड़ी आराम करती रहती है और अब कह रही है अभी खाना बनने में समय लगेगा... वो बुरी बुरी गालियाँ बकता जाये और उसे बुरी कदर मारता जाये। उसके रोने की आवाज़ भी मेरे कानों को भेद रही थी।

न जाने वो कब तक उसे मारता और चिल्लाता रहा। मुझसे सहा ना गया। मैं उठकर भीतर चला आया, एक आत्मग्लानि का एहसास लिये कि मेरी वजह से बेचारी की क्या हालत हो रही है। न मैं बालकनी में निकलता, न उससे नज़रें टकराती और न ही खाना बनाने में उसे देर होती... मैं अपराधबोध से घिरता चला गया।

इस वाकये को दो हफ़्ते बीत गये हैं। आज फिर बहुत उमस है। शाम हो रही है, अभी अभी दफ़्तर से लौटा हूँ। कुछ ताजी हवा खाने का मन है लेकिन आज मैं घर की सामने वाली बालकनी मे आकर बैठ जाता हूँ।

उस रोज का सिगरेट से जलने का घाव तो भर गया है, मगर उसकी जलन और अपराधबोध, दोनों अब तक ताज़े हैं।
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रविवार, जुलाई 06, 2008

मैं गाँधी से मिला हूँ!!

उस रात कुछ मित्र परिवारों के साथ जुआघर गया. सभी मित्र हिन्दुस्तानी थे. दरवाजे पर पहुँचते ही हम ठिठक गये. मेरे मित्र के मुँह से अनायास ही निकल पड़ा-वो देखो गाँधी जी! एकाएक धक्का लगा-कहाँ ये जुआघर और यहाँ कहाँ गाँधी जी!






फिर भी हम पलटे तो देखा लॉबी के दाँयी ओर एक मंचनुमा पत्थर पर मेनीकुइन - आदमी जो पुतला बना खड़ा रहता है, गाँधी जी के रुप में खड़ा था. कभी ज्ञानप्रकाश विवेक की कहानी तमाशा में गाँधी के मेनीकुइन के बारे में पढ़ा था आज साक्षात देख रहा हूँ वैसा ही माज़रा. गाँधी-जुआघर में. गाँधी-लोगों को जुआघर में आने का निमंत्रण देता, गाँधी-एक जिंदा पुतला, न हिलता न डुलता, बस तटस्थ भाव से सबको ताकता गाँधी.

जिन अंग्रेजों को कभी अपनी चुप्पी से डरा देने वाला गाँधी- आज उनके मनोरंजन का साधन बना बेबस खड़ा गाँधी. मेरे इन्हीं कानों ने सुना पास से गुजरती उस अंग्रेज महिला की फुसफुसाहट को-लुक, हाऊ क्यूट इज दिस गाँधी!! कोई कहता-पुअर गाँधी, लुकिंग सो स्वीट!! वेरी सेक्सी! इन बातों को सुनकर भी बिना हिले डुले खड़ा लाचार गाँधी-सेक्सी गाँधी-क्यूट गाँधी. मैने यह नायाब नजारा देखा. जिस गाँधी की पाँच सौ रुपये के नोट पर तस्वीर अंकित है. लगभग उतने रुपये घंटा अर्जित करने के लिये खड़ा मजबूर गाँधी.

लॉबी मे हालांकि हीटींग रहती है मगर फिर भी दरवाजा बार बार खुलते बंद होते रहते के कारण काफी ठंडा रहता है वहाँ का माहौल. उस माहौल मे जैकेट और कनटोपों से ढके लोगों को लुभाता सिर्फ एक धोती पहने अर्धनग्न खड़ा गाँधी. पेट की भूख मिटाने के लिये हर कष्ट सहता गाँधी-बेचारा गाँधी.

शराबियों और जुआरियों का आकर्षण का केन्द्र बना गाँधी शायद सबसे पापुलर आदम पुतला है. ऐसा मैने सुना वहाँ पर. मोस्ट सेलेबल एंड इन डिमांड गाँधी. लोग उसे देख कर हँसते हैं, चुटकुला बना गाँधी. लोग आते जाते थे, थोड़ी देर खड़े होकर गाँधी जी को निहारते थे और उनके कँधे पर टंगे झोले में कुछ लोग चंद रुपये भी डाल जाते थे. चार घंटे की ड्यूटी के बाद खुशी खुशी उन पैसों को गिनता गाँधी. छद्म मगर बिल्कुल असली सा दिखता गाँधी वरना मेरा दोस्त कैसे पहचान जाता. बनावटी, पुतला मगर सांस लेता पुतला और अपनी पलकें झपकाता पुतला-बिना हिले डुले खड़ा- अविचलित गाँधी. न कोई नेम प्लेट, न ही वो कुछ बोलता फिर भी सब जान जाते हैं वो गाँधी है-मौन खड़ा गाँधी. गाँधी की नुमाईश लगता गाँधी.

मैने पहले भी देखा है नव-धनाढ्यों को पार्टियों में आर्केस्ट्रा की धुन पर थिरकती नर्तकियों पर पाँच सौ के नोट पर सजे गाँधी को लूटता. गाँधी हवा में उड़ाया जाता है, फिर जमीन पर गिरता है और फिर उठकर उन नर्तकियों के ब्लाउज में कहीं खो जाता है. मैने यह भी देखा है कि हर बड़ी दो नम्बर डील में गाँधी ही प्रचलन में है, छोटे नोट किसी को गिनने और संजोने का समय नहीं. उन छोटे नोटों पर गाँधी भी नहीं है, वो इस प्रचलन से बाहर हैं.उन्हें गाँधी का आशिर्वाद नहीं है. मैने लिफाफों पर थूक से गाँधी को चिपकते देखा है, भारतीय डाक विभाग की टिकटों के माध्यम से. उसी गाँधी को जो बापू के नाम से जाना जाता है. उसी गाँधी की तस्वीर के नीचे बैठकर नेताओं को देश का सौदा करते देखा है.

किंतु आज यह जिंदा गाँधी. विदेश में नौकरी करता गाँधी-बिना हिले-डुले-एकदम सीधे खड़ा लोगों के आकर्षण का केन्द्र बना-पुरातन गाँधी सबको जुआधर में खेलने को लुभाता गाँधी.

मैं दोस्तों के साथ जुआ खेलने जुआघर के भीतर चला जाता हूँ और यह पुतला गाँधी- मेरे मानस पटल से होता हुआ मेरे भीतर समा जाता है. मैं अपने लिये स्कॉच का एक गिलास आर्डर करता हूँ. सिगरेट के धुऐं का छल्ला बना कर उस गाँधी की याद को उड़ा देने की असफल कोशिश करता हूँ. सिगरेट के धुऐं के छल्ले में गाँधी. मगर यह गाँधी मुझ पर छाया है. कुछ असहज सा महसूस कर रहा हूँ. घुटन से बचने को मैं वापस बाहर लॉबी में आ जाता हूँ. गाँधी की तरफ निगाह जाती है. उसकी ड्यूटी खत्म हो गई है.

वो मंच से उतर रहा है, उसकी जगह अब सद्दाम हुसैन खड़ा है. उसके पहले उसी मंच पर चार्ली चेपलीन खड़ा था. चार्ली चेपलीन से लिया मंच सद्दाम हुसैन को सौंप कर गाँधी मंच से उतर जाता है.

लोग ताली बजा रहे हैं और गाँधी मुस्करा रहा है. फिर नम्बर आता है उन लोगों का जो गाँधी के साथ फोटो खिंचवा रहे हैं. हर फोटो के लिये चंद रुपये जेब में ठूंसता गाँधी. महिलाओं के साथ चिपक कर फोटो खिंचाता गाँधी, बेबस मगर मुस्कराता गाँधी. दस मिनट फोटो सेशन के बाद गाँधी पीछे एक कमरे में चला गया. पाँच मिनट बाद निकला. अब वो जींस टीशर्ट पहने था-एक नये रुप में गाँधी. जींस टीशर्ट पहने गाँधी.

मैं उसके नजदीक जाता हूँ और उससे उसका नाम पूछता हूँ. वो कहता है, जावेद खान! गुजरात, भारत. और पूछता है कि क्या आप भी भारत से हैं. मैं हामी में सर हिला देता हूँ और उसके साथ साथ बाहर आ जाता हूँ. वो जेब से सिगरेट निकाल कर जला लेता है. पाँच मिनट पहले का गाँधी अब सिगरेट पी रहा है. मैं उसे गौर से देखता हूँ. मुझमे कोतुहल है. मैं उससे पूछता हूँ कि यार, यह सब क्यूँ करते हो, बड़े मेहनत का काम है और तिस पर से गाँधी. वो बोला कि भईया, पेट का सवाल है, क्या करुँ.

पाँच साल पहले आया था. कोई काम नहीं मिला. एक दोस्त ने यह नौकरी लगवा दी. पहले नेहरु बना, नहीं चला. लोगों को मैं पसंद नहीं आया. फिर सुभाष, उसमें भी फेल हो गया, कोई पहचान ही नहीं पाता था. तब जाकर गाँधी बना और भाई, मैं हिट हो गया. यहाँ गाँधी बिकता है, सब उसे जानते हैं. खूब पैसा मिल जाता है. परिवार भारत में है. उनको पैसा भेजना होता है हर महिने. अगर गाँधी न बनूँ तो मैं भी भूखा मरुँ और भारत में परिवार भी. ऐसा गाँधी जो चार घंटे बिना हिला डुले खड़े रह कर फिरंगियों और सैलानियों का मनोरंजन करके पैसे कमाता है ताकि एक मुसलमान जावेद का पेट भर सके और भारत में उसका परिवार जी सके.

वो गाँधी, जो जावेद को पाल रहा है, जावेद से गाँधी और फिर गाँधी से जावेद...और फिर घर जाने के लिये बस का इंतजार करता जावेद जो तीन दोस्तों के साथ कमरा शेयर करता है. जिस दिन जावेद थक जाता है या बीमार होता है, उस दिन गाँधी नहीं बन पाता और भूखा सोना पड़ता है. गाँधी को आराम नहीं. वो फिरंगियों की नौकरी करता है. नहीं करेगा तो यह मुसलमान जावेद विदेश में भूखा मर जायेगा और परिवार भारत में.

मैं इस गाँधी से मिला हूँ!!

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मेरी यह कहानी तरकश में मार्च, २००७ में प्रकाशित हो चुकी है. तबियत की खराबी की वजह से कुछ नया लिखा नहीं जा रहा है, अतः आज मौका था कि आपको इसे यहाँ पढ़वा दिया जाये.

क्षमा चाहता हूँ कि वायरल फीवर की वजह से ब्लॉग से कटा हुआ हूँ, न पढ़ना, न टिप्पणी करना. सब बंद है. शायद कल से कुछ बेहतर हो जायें हालात. Indli - Hindi News, Blogs, Links

सोमवार, जून 30, 2008

टालम टूली में कुछ बात

पिछले दो दिन से तबीयत खराब है. आँख में किसी की नज़र लग गई है, दोनों आँख सूजी है और लाल हैं. ऑफिस भी नहीं जा पा रहा हूँ सो मन मसोसे सोता रहता हुँ. आखिर, कब तक पोस्ट करना टालूँ. सो, आज टाईम पास:

पहले एक मुक्तक आज के हिसाब से:

इंसानों को इंसानों से, मैं मिलवाने आया हूँ
प्यार जिसे सब याद रखें, वो बतलाने आया हूँ
तुमने अब तक लड़ते लड़ाते, कितना कुछ है खो दिया
उनकी गिनती गीतों में ले, मैं गिनवाने आया हूँ.

-समीर लाल ’समीर’




अब आज के माहौल पर:

साहित्यकार

PenguinSlap

आलोचक

funny0130

हिन्दी ब्लॉगर

funny-dog-picture-biker

हैरान पाठक

Funny-MonkeyReaction-full


आज सुबह ही कॉफी विथ कुश पर इन्टरव्यू दिया. उन्होंने खुल कर बखिया उधेड़ी.. आशा है आपने देख ही लिया होगा. Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, जून 22, 2008

तुमको मैं अपनी जान कहूँ

घर से दफ्तर, दफ्तर से घर की रेल यात्राओं के दौरान, स्टेशन पर, स्टेशन की सीढ़ी पर चढ़ते-उतरते, ट्रेफिक में फंसे, गमझे में मूँह लपेटे इतनी महिलाओं के विषय में कथायें रच चुका हूँ कि मुझ जैसे निहायत शरीफ किस्म के दो जवान बेटों के बाप का इम्प्रेशन ही चौपट हो गया है.

कल शाम को ही एक मित्र का फोन आया. हम तो थे नहीं तो वो हमारी श्रीमती जी से ही पूछने लगे कि आजकल भाई साहब की नौकरी जाती रही क्या? पत्नी ने आश्चर्यपूर्वक उनको नाकारते हुए पूछा कि ऐसा क्यूँ पूछ रहे हैं? बोले कि बड़े दिन से ट्रेन में किसी महिला से मुलाकात की कथा नहीं छपी, इसलिये लगा.

अब बताईये लिखो तो बदनाम और न लिखो तो नौकरी ही छूट जाने का शक और उस पर से पत्नी को सारी कथाओं की खबर बोनस में दे गये. घर लौटने पर जो स्वागत हुआ, उसकी तो खैर छोड़िये. वैसे ही सबकी अपनी अपनी परेशानियां कम हैं क्या?

किसी तरह यह कह कर बचे कि सब काल्पनिक घटनाऐं है जो अपने संदेश को रोचक बनाने के लिए गढ़ी जाती हैं (लाई डिटेक्टर नहीं लगा था वरना लाल लाईट जल जाती). स्वागत गान में ऐसी भी पंक्ति सुनाई दी कि हम पर लिखने की फुर्सत तो है नहीं और दुनिया भर पर लिखते हो.

यह कविता, उसी इज्जत पर लगी खंरोच पर पैबंद मानिंद है. इसे जनहित में ही जारी किया मानें. कहीं भी मैने अपना नाम इसीलिये बीच कविता में इस्तेमाल नहीं किया है ताकि कोई भी पीड़ित पति इसका इस्तेमाल अपने नाम से कर सके. मल्टीकलर्ड पैबंद है, हर रंग में कहीं न कहीं मैच कर ही जायेगा.

rp

तुमको मैं अपनी जान कहूँ
या नील गगन का चाँद कहूँ

घनघोर उदासी छाती है
जब दूर जरा तुम होती हो
मदहोशी छाने लगती है
जब बाहों में तुम होती हो
ये कलम हो रही है डगमग
तब मधुशाला का जाम कहूँ

तुमको मैं अपनी जान कहूँ
या नील गगन का चाँद कहूँ..

कलियों के घूँघट खुल जाते
जब बागों में तुम जाती हो
घटा भी श्यामल हो जाये
जब जुल्फों को लहराती हो
शर्मसार सूरज को करती
क्या मैं सुरमई शाम कहूँ

तुमको मैं अपनी जान कहूँ
या नील गगन का चाँद कहूँ..

तेरे आने की आहट ही
जीने का कारण होती है
मेरे इस मन के मंदिर में
तू मूरत पावन होती है
पथ निर्वाणों के दे मुझको
तुमको मैं तीरथ धाम कहूँ

तुमको मैं अपनी जान कहूँ
या नील गगन का चाँद कहूँ..

--समीर लाल 'समीर'


नोट: उपर दर्शाया चित्र मेरी पत्नी का नहीं है, बस यही डर है.
चित्र साभार: रिपुदमन पचौरी
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बुधवार, जून 18, 2008

रोज बदलती दुनिया कैसी...

अभी बहुत पुरानी बात नहीं हुई है जब पूरे मोहल्ले में एकाध किसी के घर फोन होता था और सब उसका ही नम्बर देते थे. वो बेचारे कभी इसे बुला, कभी उसे, इसी में खुशी खुशी उलझे रहते थे.

तब एस टी डी नहीं होता था. कॉल बुक करना पड़ता था-ऑडनरी, अर्जेंट या लाईटनिंग. तब भारत से कनाडा या अमेरीका बात करनी हो तो जो आज कॉल बुक करो वो तीन दिन बाद लगता था. जबलपुर से इन्दौर. इन्दौर से बम्बई. बम्बई से कनाडा. उस पर भी आधी बात ऑपरेटर सुन कर बताता था. चिल्ला चिल्ला कर बात करनी पड़ती थी. पूरे मोहल्ले को मालूम चल जाता था कि कल रात कनाडा बात हुई है. कॉल बुक करने के बाद फोन के बाजू में ही सो, खाओ और कहीं मत जाओ, जब तक वो कॉल दो तीन दिन में लग न जाये.

अब देखिये कितनी तेजी से इस क्षेत्र में विकास हुआ है कि आपको मेरी बात अजूबा लग रही है या फिर आप मुझ जैसे जवान को कोई बूढ़ पूरान मनही बूझ रहे होंगे. मगर यकीन मानिये बहुत नजदीकी सालों की बात है.

अब तो गांव गांव गली गली फोन है. एस टी डी बूथ हैं. मोबाईल है और यहाँ तक कि इस बार तो महाराष्ट्र स्टेट ट्रांसपोर्ट की बसों तक में फोन लगा देखा है टाटा इन्डिकॉम का. कितनी तेजी से तकनीक फैलती है कि भरोसा ही नहीं होता.

सोचता हूँ एक-दो और तकनीक जिसका बहुत तेजी से बेवजह उपयोग हो रहा है फोन की तरह अगर उसका भी ऐसा ही विस्तार हो जाये तो क्या सीन बनेगा.

पति घर पर देर से लौटा. पत्नी ने पूछा, कहाँ थे? वो बोला कि दफ्तर में मिटिंग थी, उसी में फंसा था. पत्नी बोली कि लैब चलो. लाई डिटेक्टर टेस्ट करवाती हूँ तुम्हारा. झूठ पकड़ा गया. रात भूखे सोना पड़ा.

भिखारी दरवाजे पर भीख मांग रहा है-मेमसाब, तीन दिन से भूखा हूँ. पता चला, उसे रामू के साथ यह सोचकर कि लाई डिटेक्टर ब्रेक करने की तो रोज रोज प्रेक्टिस से आदत हो गई होगी उसकी, नुक्कड़ वाले ब्रेन मैपिंग बूथ पर भिजवा दिया. बूथ से पाँच रुपये में रामू, भिखारी को लेकर ब्रेन मैप बनवा लाया. भिखारी का झूठ पकड़ा गया. वो सिर्फ दो दिन से भूखा था. मेमसाहब ने उसे झूठा कह कर भगा दिया. भले टेस्ट करवाने में पाँच रुपये खर्च हो गये मगर भिखारी को एक रुपये न दिये गये.

स्कूल में टीचर जी बबलू को डांट रही है कि तुमने चुन्नू को चांटा मारा, उपर से झूठ बोलते हो. बबलू कह रहा है कि नहीं मैडम, मैने नहीं मारा. चाहे तो उसके गाल पर से मेरा फिंगर प्रिंट मिलवा लो.

प्रेमी प्रेमिका से कह रहा है-मेरा विश्वास करो. मैं तुमसे शादी करके तुम्हें बहुत खुश रखूँगा और तुम्हीं मेरा पहला और अंतिम प्यार हो.

प्रेमिका उसे सिद्ध करवाने के लिये नार्को टेस्ट की मांग करती है.

क्या प्रश्न पूछने है जो वो डॉक्टर को देगी, इसके लिये बाजार से नार्को टेस्ट के अनसॉल्वड प्रश्नों की लव विषय की किताब लाती है ४०० सेम्पल क्योचनस वाली. उधर प्रेमी भी नार्को टेस्ट की लव विषय पर अमर ज्योति सीरीज की गाईड से पिछले दस टेस्टों में पूछे गये प्रश्न एवं उनके उपयुक्त जबाब घोंट रहा है. गारंटीड सक्सेस इन नार्को टेस्ट की कोचिंग क्लास भी ज्वाईन कर ली. अगर पास नहीं हुये तो अगले बैच में फ्री एडमिशन का ऑफर. प्रेक्टिल की अलग से व्यवस्था.

फिर भी कहीं फेल न हो जायें, इस हिसाब से दलाल से भी व्यवस्था कर ली है. दलाल की कम्पाऊन्डर से सीधे सेटिंग है. ऐन टाईम पर ट्रूथ सीरम के बदले ग्लोकोज लगा देगा. बस, फिर क्या करना है. सोने का नाटक और डॉक्टर साहब को खों खों घों घों करके (जैसे शराब पिये हों-प्रेक्टिकल क्लास में जैसा सिखाया है वैसे ही) मन मर्जी के जबाब. गारंटीड सक्सेस.

narco

नेता मंच की बजाये लाई डिटेक्टर पर खड़े होकर चुनावी वादे करेंगे. मशीन की सेटिंग पहले से सेट कर दी जायेगी पलट कर. याने जब सच बोलें तो लाल लाईट और झूठ बोलें तो हरी बत्ती. बस फिर क्या, पूरे भाषण में हरी बत्ती जलती रहेगी और जनता समझेगी कि नेता का सच बोलना तो साईटिफिकली भी साबित हो रहा है. पक्का सच वादे कर रहा है और वो जीत जायेगा.

आप कहेंगे कि जनता इतनी आसानी से बेवकूफ बन जायेगी क्या? लल्लू समझ रखा है?

तो अभी तक तो बिना मशीन के भी और क्या बनती आई है, तब तो कम से कम लाई डिटेक्टर मशीन के कारण होगा.

बस, यही सब सोच सोच के मन में खलबली मची है. सोचा, आप लोगों को भी खलबलाऊँ. Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, जून 15, 2008

किस नजर से देखूँ दुनिया तुझे...

पिछले सात दिन से न कोई नई पोस्ट और पिछले दो दिनों से न तो कोई टिप्पणी. यह भी नहीं पता कि कब से सिलसिला फिर शुरु होगा. शायद कल से ही या कुछ रुक कर. कितनी अनिश्चितता है. खुद को खुद का पता नहीं. अभी जरा सा समय मिला, तब सोचा कि सूचित तो कर ही दूँ वरना आप लोग क्या का क्या सोच बैठो. सोचने पर क्या लगाम है? :)

अरे हाँ, एक जरुरी बात तो बताना भूल ही गया. ३-४ दिन पहले किसी हुश हुश नागराज जी का हमारी चिट्ठाकार स्पेशल पोस्ट पर कमेंट आया:

बहुत बढ़िया डमरु बजा लेते हो, गुरु. खूब मजमा लगा रखा है. xxx, ब्लॉगिंग छोड़ कर मदारी का काम पकड़ लो, कुछ कमाई भी हो जायेगी और लोगों का मनोरंजन भी. भीड़ जमा करने की कला वहीं दिखाओ और यहाँ लिखने वालों के लिए जगह खाली करो, समझे की नहीं. वरना xxxxx

(इसके बाद वो अपनी औकात पर उतर आये-हम आई पी से पहचान तो गये मगर उनसे मुझे इससे ज्यादा उम्मीद भी न थी)

उनका कमेंट मैं जरुर अप्रूव करता मगर जिस जगह से वो अपनी पहचान पर उतरे उस जगह से आगे संपादित कर कमेंट प्रकाशित करने की सुविधा ब्लॉग स्पॉट नहीं देता और उस भाषा को बिना कांट छांटा के छापने की इजाजत मेरा विवेक नहीं देता. तो मजबूरीवश पूरा कमेंट ही रिजेक्ट करना पड़ा. मगर हुश हुश नागराज जी ने तबियत से पीकर मन की उतारी और हमें खूब महिमा मंडित किया. :)
न तो उनके ब्लॉग का पता है और न ही ईमेल का. अतः मजबूरीवश यहाँ लाना पड़ा वरना ईमेल से जबाब दे लेते.


प्रिय हुश हुश नागराज जी:

हमारी भी हुश हुश!!

अच्छा लगा अपने विषय में जानकर. मेरी मदारी कला से आप प्रभावित हुए, यह मेरे लिए सम्मान का विषय है रिटायरमेन्ट के बाद क्या करुँगा-इस चिन्तन को आपने एक नया आयाम दिया है. काफी बोझ उतरा सा लग रहा है. किस तरह आपको साधुवाद पहुँचाऊँ और आभार प्रदर्शन करुँ, समझ नहीं पा रहा हूँ. कम से कम ईमेल ही दे देते.

आपने जिस धारा प्रवाह में गाली-उवाच किया है, वो भी काबिले तारीफ है. सबके बस में नहीं, इतने तुकबंदी के साथ गाली बकना. काश, बेहतर शब्द इस्तेमाल करते तो शायद आपका कथ्य अमर काव्य बन जाने की काबिलियत रखता. कभी विचार करियेगा.

चलते चलते एक बात और बताता चलूँ कि बजाता तो मैं बीन भी बहुत अच्छी हूँ. कभी नाचने का मन हो तो बताईयेगा, आपके लिए जरुर बजाऊँगा. जो भी पैसा और दूध इक्कट्ठा होगा, सब आपका. कोशिश करुँगा नागपंचमी पर आपका शो रखा जाये, ज्यादा दूर है भी नहीं. आना जरुर. इन्तजार रहेगा.

सादर

उड़न तश्तरी

snakecharme

आज इरफ़ान झांस्वी शेर याद आता है, जो फुरसतिया जी ने सुनाया था:

संपेरे बांबियों में बीन लिये बैठे हैं,
सांप चालाक हैं दूरबीन लिये बैठे हैं।


यह बताने की एक वजह और थी कि इसे बताने के बहाने विन्डोज लाईव राईटर टेस्ट भी हो जायेगा और इसी बहाने एक कागज की चिन्दी पर कभी उतारे चंद शब्द भी सधा लेंगे.


ये रंग कैसे कैसे:

दुनिया!!!

वो कहता है-नीली है
मैं कहता हूँ-हरी है
उसकी नजरों में सुनहरी है..

दुनिया कैसी है?
दुनिया क्या है?

दुनिया वो है
जो तुम हो
जो हम हैं...

बाकी सब
हमारे चश्मों के रंग हैं..
सबके देखने के
अपने अपने ढंग हैं.

-समीर लाल ’समीर’ Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, जून 08, 2008

असहज विचारों की सहज बानगी..

अकसर
दफ्तर आते जाते
ट्रेन में बैठे
फ्री बंटे उस अखबार के
इश्तहारों से पटे पन्नों पर
कोई खाली कोना तलाश
अपने असहज भावों को
सहजता से उतार देता हूँ
अपनी कलम की
काली स्याही से...

और

लोग उसे कविता कहते हैं....
न जाने, क्यूँ!!!



और कुछ अखबार के कागजों पर अपने मनोभावों का अंकन आज बटोरा और ले आया. न जाने, आप क्या कहेंगे मगर बस भाव हैं..कभी कुछ तो कभी कुछ..ज्यूँ का त्यूँ परोस रहा हूँ..बिखरे शब्दों को बिना समेटे. आप ही बतायेंगे कि कितने बिखरे हैं या सिमटे हैं!!!


dep

-१-

साहिल पर बैठा
वो जो डूबने से बचने की
सलाह देता है.....
उसे तैरना नहीं आता

वरना

बचा लेता.

-२-

कुछ तो बात है
वरना
मौसम यूँ ही
नाहक

खराब नहीं होता.

-३-

वो अपनी
किस्मत का रोना रोते हैं..

बदकिस्मती क्या होती है
जिन्हें इसका
गुमान भी नहीं.

-४-

मँहगाई ने दिखाया
यह कैसा नजारा.
हर इंसान तो परेशान है
दो जून की रोटी के
इंतजाम में..
उसे क्या देता...

गली का कुत्ता था
मर गया बेचारा!!


-५-

वो हँस कर
बस यह
अहसास दिलाता है

वो जिन्दा है अभी!!


samd

-६-

आकाश में उड़ते
उन्मुक्त पंछियों को देख
खुद अपनी गिरफ्त से
आजाद होने को
छटपटाता हूँ
मैं!
तड़प जाता हूँ
मैं!!



-७-

अँधेरे कमरे की
चाँदनी में नहाई
उस उदास खिड़की से
आसमान में
चमकीले तारों को देख
दूर देश की यादों में
न जाने कब
खो जाता है वो!

न जाने कब
सो जाता है वो!

--------------------------------


असहज विचारों की सहज बानगी..ये हमारी स्टाईल है जी.


--समीर लाल ’समीर’ Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, जून 04, 2008

हिन्दी चिट्ठाकारी स्पेशल

आज की यह पोस्ट हिन्दी चिट्ठाकारी स्पेशल है यानि स्पेशली फार हिन्दी ब्लॉगर्स. (अंग्रेजी मे बॉलीवुड चलन के अनुरुप लिखना पड़ा)

आज हम नहीं, बस ये पोस्ट खुद ही बोलेगी. हम तो चुपचाप बैठे हैं.

बशीर बद्र निदा फाज़ली साहब शेर है:

घर से मस्जिद है बहुत दूर है चलो यूँ कर लें,
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाये.

बशीर बद्र निदा फाज़ली साहब से क्षमा मांगते हुए:

घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो, यूँ कर लें,
किसी रोते हुए ब्लॉगर को हँसाया जाये.

लगता है किसी ने टिप्पणी नहीं की!

HeadBang

एक नजर इधर भी, बदलते परिवेश के साथ:

कोई नेता जी लगते हैं? जेड सिक्यूरिटि मिली है.
अरे नहीं, यह हिन्दी ब्लॉगर हैं.

zee security

आज का समाचार:

दिल्ली में आज शाम ४ बजे से रामलीला मैदान में हिन्दी ब्लॉगर मीट का आयोजन किया गया है. सुरक्षा की दृष्टि से, कानून एवं व्यवस्था बनाये रखे रहने के लिए, दिल्ली एवं आसपास के राज्यों में धारा १४४ लगा दी गई है.


आगरा पागलखाने का नोटिस बोर्ड

पागलों का समाज में खुले आम घूमना हानिकारक साबित हो सकता है.

पागल पकड़वाईये- ४०० रुपये नगद पाईये.
हिन्दी ब्लॉगर पकड़वाईये- १००० रुपये नगद पाईये और साथ में एक शानदार गिफ्ट हैम्पर (हिन्दी साहित्य सभा की ओर से).


मानो या न मानो:

५ हिन्दी ब्लॉगरर्स का मिलन समारोह बिना किसी विवाद एवं लड़ाई झगड़े के शांतिपूर्वक सौहार्दपूर्ण वातावरण में सम्पन्न.

ब्रेकिंग न्यूज:

१.बड़के न्यायालय ने मंत्रालय को फटकारा. अपने फैसले में कहा कि हिन्दी ब्लॉगर होना रिवाल्वर लाईसेन्स प्राप्त करने का वैद्य एवं समुचित कारण.

२.पब्लिक मार रही है. हिन्दी ब्लॉगर है और अपने आपको साहित्यकार बताता है.

Beating

.सरकारी रत्नों में एक और रत्न जुड़ा : हिन्दी ब्लॉग रत्न.
(सिर्फ सिफारिश और जुगाड़ से उपलब्ध- हिन्दी ब्लॉग का न होना सम्मान प्राप्ति में बाधक नहीं, जैसा कि बाकी सम्मानों के साथ होता है)

blogratn

हिन्दी ब्लॉग रत्न का चयन लोकतांत्रिक तरीके से करने के लिए वोटिंग करवाई जायेगी, जिन्हें बिना गिने समिति के अध्यक्ष विजेता घोषित करेंगे. उनका निर्णय ही अंतिम एवं मान्य होगा, जो कि पूर्णतः जुगाड़ा्धारित रहेगा. इस विषय में किसी भी विवाद पर कोई भी सुनवाई का प्रावधान नहीं है. अगर आप नतीजों से संतुष्ट नहीं हैं, तो कृप्या घर बैठें. इस तरह आप इस लोकतांत्रिक प्रणाली का सहयोग करेंगे, जैसा कि आप हर लोकतांत्रिक व्यवस्था के साथ सहयोग करते आये हैं. मात्र इस सम्मान के लिए आपको अपनी आदत बदलने की आवश्यक्ता नहीं है-बस घर बैठिये और कुढ़िये.)

चित्र बोलते हैं:


बोल टिप्पणी करेगा या नहीं!

beatingsome


ये कोई गैंगस्टर नहीं है. सामूहिक ब्लॉग का मॉडरेटर है, बाकी सारे उस ब्लॉग पर लिखने वाले.

mode1

बेनामी ब्लॉगर

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shantilaka


(नोट: यह मात्र मनोरंजन के लिए है. कृप्या कोई भी आहत न हों) Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, जून 01, 2008

कड़वी निंबोली

nimboli

माँ की धुँधली सी तस्वीर उसके मानस पटल पर अंकित है. साफ साफ तो नहीं याद, जब माँ गुजरी तब वो बहुत छोटा था. रात माँ के बाजू में ही दुबक के सोया था. उसे अंधेरे से डर लगता था तो माँ से चिपक कर सो रहता, कोई डर पास ना आता.

सुबह उठा तो रोज की तरह माँ बाजू में नहीं थी. कमरे के बाहर निकल कर आया तो माँ को सफेद चादर में लिपटा हुआ जमीन पर लेटा पाया. मोहल्ले की सारी स्त्रियाँ उनके इर्द गिर्द इकट्ठा होकर रो रहीं थीं. सबको रोता देख वो भी रोने लगा. उसे तो यह भी पता नहीं था कि मौत क्या होती है. बाद में रद्दो मौसी ने उसे बताया था.

रद्दो मौसी, उसकी प्यारी मौसी, एक दिन बाद आई थी पास के गांव से. तब तक न उससे किसी ने खाना पूछा था और न ही दूध. जब जब उसे भूख लगती वो माँ को याद करता.

माँ को कँधे पर उठाकर बाबूजी और मोहल्ले वाले ले गये थे. पड़ोस की बिमला चाची कह रहीं थी कि अब वो भगवान के पास गईं और अब कभी नहीं आयेगी. मगर उसे उनकी बात पर यकीन ही नहीं आ रहा था, भला उसकी माँ उसे छोड़ कर कैसे जा सकती है कहीं हमेशा के लिये.

शाम को बाबूजी वहीं बैठक में बैठे रहे और लोग आते जाते रहे उनसे मिलने. कुछ रिश्तेदार भी आ गये थे. किसी को भी उसका ध्यान नहीं था. सब बाबूजी से मिलते और उसके सर पर हाथ फिरा कर चले जाते.

रात होते वो कमरे में आ गया. बाबूजी बैठक में ही बैठे थे. कुछ बोल ही नहीं रहे थे. वैसे भी वो चुप ही रहते थे और बैठक में ही रहते, खाते और सोते थे. वो तो बस अपनी माँ से ही बात करता था. अब भूख के साथ साथ उसे नींद भी आ रही थी. वो वहीं माँ के बिस्तर पर लेट गया. उसे पूरा यकीन था कि माँ मौसी के यहाँ गई होगी, रात गये आ जायेगी. तब वो उससे खाना खाने को कहेगी, तो वो रुठ कर मना कर देगा. जब बहुत दुलरायेगी और अपने हाथ से पुचकार कर खिलायेगी, तब खा लेगा.

यही सोचते सोचते आँखों में आंसू लिये कब आँख लग गई, पता ही नहीं चला. सुबह सुबह जब रद्दो मौसी ने प्यार से उसके सर पर हाथ फेरा, तो उसकी नींद खुली. उसे ऐसा लगा जैसे माँ वापस आ गई है. उसे मौसी के आंचल से माँ की खुशबू आती थी. मौसी ने उसे बहुत पुचकारा, नहलाया और अपने हाथ से खाना खिलाया. बाबूजी तो आज भी दिन भर बैठक वाले कमरे में ही बैठे थे, सब मिलने जुलने वाले दिन भर आते रहे.

आज वो मौसी के साथ माँ के बिस्तर पर सो गया. मौसी उसके सर पर माँ की तरह ही हाथ फिराती रही. माँ की खुशबू आ रही थी उसके पास से. उसने मौसी से माँ के बारे में पूछा. मौसी ने उसे बताया कि मौत क्या होती है और यह भी, माँ अब मर चुकी है और अब कभी वापस नहीं आयेगी. पता नहीं क्यूँ अपनी सबसे प्यारी मौसी से यह सुन कर उसका मन बैठ गया. आज मौसी उसे अच्छी नहीं लग रही थी और उसके पास से आती माँ की खुशबू भी न जाने कहाँ खो गई थी. वो करवट बदल कर नम आँख लिए सो गया.

सब क्रिया करम हो जाने के बाद मौसी उसे अपने साथ ले जाना चाहती थी. बाबूजी ने हाँ भी कर दी थी मगर वो रो रो कर जाने को तैयार ही नहीं हुआ. बाबूजी ने डाँटा भी, मगर वो नहीं गया. रद्दो मौसी लौट गई.

बाबू जी सुबह से काम पर निकल जाते और घर पर रह जाता वो और सुबह से आई छुट्ट्न की माई. वो ही अब खाना बनाती थी, उसे नहलाती, खाना खिलाती और देर रात वापस घर चली जाती. पास ही रहती थी. अक्सर छुट्ट्न भी साथ आ जाता. वो दिन भर छुट्ट्न के साथ खेलता.

समय निकलता गया. बाबू जी शाम से ही पीने लगते. अब वो सोचता है तो लगता है कि शायद इस तरह माँ के न रहने का दुख भुलाते होंगे.

फिर नई अम्मा भी आ गई. मगर बाबू जी का दुख कम नहीं हुआ और उनका शाम से ही पीना जारी रहा. दर्द तो नई अम्मा के आने से उसका भी कम नहीं हुआ बल्कि कुछ बढ़ ही गया. छुट्टन की माई का आना भी बंद करा दिया गया सो छुट्टन का आना भी बंद हो गया.

अब वो खुद से नहाना और खाना निकाल कर खाना भी सीख गया था. मोहल्ले के और बच्चों को अपनी माँ से दुलरवाते देखता तो माँ की याद में उसकी आँखें भर आती. वो अपने ही अहाते में लगे नीम के पेड़ के नीचे आकर बैठा माँ को याद करता रहता. कोई कौआ नीम पर बैठा निंबोली गिरा देता. बिल्कुल कड़वी निंबोली- उसे उसकी बदकिस्मती की अहसास कराती निंबोली.

दर्जा १२ के बाद उसे आगे पढ़ने शहर भेज दिया गया. उसे बिल्कुल बुरा नहीं लगा. वहाँ भी अकेला ही तो था और यहाँ भी. वो छुट्टियों में भी गाँव न जाता. पढ़ाई खत्म करके वहीं शहर में एक अखबार में नौकरी पर लग गया.

एक रात खबर आई कि बाबू जी की तबीयत खराब है, तुरंत चले आओ. जब वो पहुँचा तो बाबूजी अंतिम सांसे गिन रहे थे. शायद उसका ही इन्तजार कर रहे थे. उसे देखकर उनकी आँखों से दो बूँद आँसूं गिर पड़े. हमेशा की तरह आज भी बोले कुछ भी नहीं. बस, तकिये के नीचे से एक लिफाफा निकाल कर दिया और इस दुनिया से विदा हो गये.

दाह संस्कार करके घर लौटा तो वहीं नीम के नीचे आ बैठा और लिफाफा खोल कर देखने लगा. उसमें एक फोटो थी. माँ की शादी के पहले की. पिता जी ने एक कागज पर लिख दिया था कि माँ की बस यही एक फोटो उनके पास थी. किसी मेले में खींची गई. नाना, नानी और माँ. बिल्कुल मौसी की तरह. शादी के पहले वाली मौसी. उसे अपनी स्मृति वाली माँ की धुँधली सी तस्वीर याद आई. बिल्कुल इस तस्वीर से जुदा.

न जाने क्या सोच कर उसने वो तस्वीर फाड़ दी. आखिर आज तक वो अपनी स्मृति वाली माँ की धुँधली सी तस्वीर के सहारे ही तो जीता आया था. वो उसे विस्मृत नहीं करना चाहता था. तभी कोई कौआ नीम पर आ बैठा और कौवे ने एक निंबोली गिरा दी. बिल्कुल कड़वी निंबोली- उसे उसकी बदकिस्मती की अहसास कराती निंबोली.

अगले दिन ही वो शहर चला आया और उसके साथ शहर लौटी उसकी अपनी स्मृति वाली माँ की धुँधली सी तस्वीर. वो फिर कभी गाँव नहीं गया लेकिन शहर में अपने घर के अहाते में उसने आम का पेड़ लगाया है, मीठे आम का पेड़. Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, मई 29, 2008

आँधी तो आँधी होती है

बस कुछ यूँ ही उमड़ते घुमड़ते ख्याल:

Storm_Cloud

चाहे नाम धरम का रख लो
या कि दिल में नफरत भर लो
देखो, इक दिन पछताओगे
अभी स्वयं को वश में कर लो.

आँधी तेज हवाओं वाली
आँधी धूल गुबारों वाली
आँधी नफरत की वो काली
आँधी हठ उन्मादों वाली.

सागर तट से उठती आँधी
मज़हब से जो भड़की आँधी
बस्ती बस्ती घूम घूम कर
नॄत्य मौत का करती आँधी.

आँधी तो आँधी होती है
गुस्से में आपा खोती है
इसको तुम मत राह दिखाओ
बेकाबू यह हो जायेगी

कितने नीड़ बिखर जायेंगे
तुम करनी पर पछताओगे
आँधी को क्या फ़र्क पड़ेगा
आदत से न बाज आयेगी

मासूमों को ग्रास बना कर
अँगड़ाई ले सो जायेगी
लेकिन क्या तुम सो पाओगे
क्या तुमको नींद कभी आयेगी.

--समीर लाल ’समीर’ Indli - Hindi News, Blogs, Links

मंगलवार, मई 27, 2008

सही तस्वीर मानो कि आईना!

कुछ लोगों को चुपचाप खड़े लोगों से ही परेशानी रहती है. कैसे विघ्नसंतोषी हैं यह? बस, कोशिश करो कि उनकी हरकतों से विचलित न हो. याद रखो, तुम्हारी जिन्दगी तुम्हारी है और उसको तुम्हें मजे से जीना है, चाहे दुनिया कैसा भी व्यवहार करे.

बंदर हर भेष में हर जगह हैं. हेव फन. :)


bunder

पहचाना क्या? श्श्श्शः, नाम मत लेना. सबने पहचान लिया है. :)

सुभाषित:
  • सफल जिन्दगी जीने के सिर्फ दो तरीके है: एक यह कि कुछ भी अजूबा नहीं है और दूसरा यह कि सब कुछ अजूबा है. (आन्सटीन)

  • सार्थक प्रश्न सार्थक जिन्दगी देता है. सफल व्यक्ति बेहतर प्रश्न पूछता है इसलिये बेहतर जबाब पाता है.(एन्थोनी रॉबिन्स)

  • किसी से बदला लेने की यात्रा पर जब भी निकलो, दो कर कब्र खोद कर जाना. एक उसके लिए और एक तुम्हारे किए. (कन्फ्यूसियस)

  • मैं बहुत धीमे चलता हूँ मगर कभी भी पीछे की ओर नहीं. (अब्राहम लिंकन)
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सोमवार, मई 26, 2008

किस की नजर लगी तुझे मेरे ब्लॉगजगत!

ब्लॉगजगत में जो चल रहा है, जो वातावरण बना है, सभी एक घुटन का अहसास कर रहे हैं. बस, चन्द मुट्ठी भर लोग, सारा माहौल खराब कर हैं. उनका होना या न होना, चिट्ठाकारों की गिनती पर कोई असर नहीं डालता मगर आगमन का मार्ग अवरुद्ध करता है.

आज ज्ञान दत्त जी की पोस्ट और कल शिव भाई की पोस्ट ने मुझे मजबूर किया कुछ सोचने को. मैं खुद इन हालातों से परेशान हूँ. स्वभाव के विपरीत बार बार कुछ कह देने को मन करता है, बस, रोक रखा है खुद को, संस्कारों की भारी भरकम जंजीरों से जकड़ कर. बहुत मजबूत है इनकी पकड़. इतनी आसानी से नहीं छूटने वाली.

फिर भी कुछ हल्का महसूस करुँ शायद, यह लिख कर, सो लिख रहा हूँ. कृप्या उदगारों को उदगार ही मानें आहत मन के और अन्यथा न लें.

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किस की नजर लगी तुझे मेरे ब्लॉगजगत!

नहीं जानता
क्यूँ एक कसैलेपन का
अहसास है
मेरे
भीतर भी
और
बाहर भी

नहीं जानता कि
यह क्या है?
जो उमड़ रहा है
अन्तस में भी और
बाह्य वातावरण में भी

मगर कुछ तो है...

नहीं जानता !

मन भटकता है
उन गलियों में
जा बसने को
जहाँ कुछ
बस, जरा सी कुछ
मिठास हो
झूठा ही सही-
अपनेपन का
अहसास हो.

कोई मुझे
राह दिखा दो,
उस गली का
पता बता दो!

मरने से पहले
दो घड़ी
सुकून से
जीना चाहता हूँ.

जहर पी कर तो
सभी जी रहे हैं यहाँ..
मैं मरने के वास्ते
अमृत
पीना चाहता हूँ.

नहीं जानता
क्यूँ!

-समीर लाल 'समीर'
(जैसा मन में आया-कहा, बिना किसी एडिट के और दूसरी बार पढ़े) Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, मई 25, 2008

इक तेरी नजर का

eyes

कब से उधार बाकी है, इक तेरी नजर का
अब तक खुमार बाकी है, इक तेरी नजर का.

जिंदा हूँ अब तलक मेरी सांसे भी चल रहीं,
उन्हें इन्तजार बाकी है, इक तेरी नजर का.

उम्दा कलाम मेरा सब शेर सज चुके हैं
केवल शुमार बाकी है, इक तेरी नजर का.

महफिल सजाऊँ किस तरह, अबकी बहार में,
पल खुशगवार बाकी है, इक तेरी नजर का.

दम अटका है जिगर का, कमबख्त नहीं निकले
तिरछा सा वार बाकी है, इक तेरी नजर का.

बिछड़े हैं हम सफर में, कुछ दूर साथ चल ले
दिल तलबगार बाकी है, इक तेरी नजर का.

अब के समीर कह गया बिन गाये ही गज़ल
साजों पे वार बाकी है, इक तेरी नजर का.

-समीर लाल 'समीर' Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, मई 21, 2008

पुलिसिया हेलीकाप्टर

कल दफ्तर से घर की तरफ चला तो हाईवे पर एकाएक मेरी कार के उपर उपर हेलीकाप्टर उड़ता नजर आने लगा. पुलिस वालों का था. आकस्मिक सहायता एवं कानून व्यवस्था बनाये रखने रखने के लिए अक्सर ही हाईवे पर उड़ता रहता है.

मैं भी अपने बचपन की आदत का गुलाम. कुछ आदतें बचपन की ऐसी होती हैं, जो आपके स्वभाव का हिस्सा बन जाती हैं. चाहे जितनी कोशिश करो, छूटती ही नहीं. उन्हीं में से मेरी एक आदत है कि जब भी हवाई जहाज या हेलीकाप्टर की आवाज सुनाई देती है मै बरबस ही आकाश में ताकने लगता हूँ और उसे उड़ता हुआ देखकर खुश होता हूँ. अब तो अक्सर बच्चे (बड़े हो गये हैं न!) और पत्नी कहते हैं कि ये क्या आदात है. कितनी शर्मिंदगी होती है सब के बीच में. इसे बदलो.

हमने बताया भी कि यह तो तुम लोग इम्प्रूव्ड वर्जन देख रहे हो हमारी आदत का वरना तो तुम लोग मूँह दिखाने के काबिल न रहते. पहले तो हर हवाई जहाज को देखकर हम टाटा भी किया करते थे. अब कम से कम टाटा नहीं करते, इतना ही गनीमत समझो. इससे ज्यादा हम नहीं बदल सकते. वो भी चुप हो जाते हैं कि कहीं ज्यादा बोला और ये पुरानी आदत पर वापस चले गये, तब तो गजब ही हो जायेगा.

helicopter

बस, हेलीकाप्टर का जिक्र आया और वो भी पुलिस वालों का तो आदतानुसार भारत का विचार हमेशा की तरह दिमाग में कौंधा कि अगर वहाँ हर शहर की पुलिस को एक एक हेलीकाप्टर दे दिया जाये तो क्या सीन बनेगा. दिया तो आकस्मिक सहायता के लिये ही जायेगा और जब आप एमरजेन्सी में फोन करेंगे तो देखिये कैसे कैसे जबाब आ सकते हैं:

-हाँ सर, हेलीकाप्टर तैयार है. आप आ जाईये. यहाँ पर मुनीम से फार्म लेकर भर कर जमा कर दिजिये. हम उसे साहब की स्वीकृति के लिए भेज देंगे. स्वीकृति मिलते ही हेलीकाप्टर रवाना हो जायेगा.

अब आप थाने पहुँचे तो पता लगा कि फार्म भर के साथ में दो फोटो, एक फोटो आई डी, एड्रेस प्रूफ और नोटराइज्ड शपथ पत्र कि यह हेलीकाप्टर मात्र आक्समिक दुर्घटना से निपटने के माँगा जा रहा है तथा इसका किसी भी प्रकार से व्यक्तिगत उपयोग नहीं होगा आदि लगाना होगा. आयकर का पेन नम्बर देना अनिवार्य है एवं एक मात्र पाँच हजार रुपये का ड्राफ्ट सिक्यूरिटी डिपाजिट.

फार्म इन सारे कागजों के साथ जमा करने के बाद इसकी फाईल बनाई जायेगी तथा एक इन्सपेक्टर दुर्घटना स्थल पर जाकर अपनी रिपोर्ट बनायेगा कि दुर्घटना में वाकई एमर्जेन्सी है तथा उससे बिना हेलीकाप्टर के मदद के नहीं निपटा जा सकता वरना देर हो सकती है. संभव हुआ तो दुर्घटना की तस्वीरें भी साथ लगाई जायेंगी और फिर इन्सपेक्टर के अनुमोदन के साथ फाईल साहब के समक्ष प्रस्तुत की जायेगी. उनका निर्णय ही अन्तिम और मान्य होगा.

जब तक सारे कागज तैयार होकर तीन चार दिन में साहब के समक्ष प्रस्तुत करने का समय आया, साहब हफ्ते भर की छुट्टी पर गाँव चले गये.

मगर एमर्जेन्सी को यूँ ही अनदेखा नहीं किया जायेगा. साहब के वापस आते ही सातों पेन्डिंग हेलीकाप्टर केस पहले निपटाये जायेंगे फिर अन्य कोई कार्य सबजेक्ट टू अगर मंत्री जी का दौरा न हो तो.

आखिर पुलिस आपकी मित्र है और आपकी साहयता के लिए है. वो नहीं ख्याल करेगी तो कौन करेगा.

और भी कई सीन ख्याल आ रहे हैं कि ऐसा भी जबाब मिल सकता है. उनको विस्तार न देते हुए सिर्फ बिन्दुवार देता हूँ. विस्तार करने में तो आप सब सक्षम हैं ही. खैर आपकी सक्षमताओं को तो क्या कहना, आप तो बिना बिन्दु के भी विस्तार दे जायें (एक सच्चे भारतीय होने का प्रमाण):

  • साहब लंच पर हेलीकाप्टर से गये हैं. लौट आयें तब भेजते हैं.
  • मंत्री जी को लेकर उनकी ससुराल गया है.
  • साहब के घर शादी है. वहीं ड्यूटी लगी है.
  • मैडम को लेकर बाजार गया है.
  • साहब के रिश्तेदार को अस्पताल लेकर गया है.
  • साहब के बच्चों को स्कूल पहुँचाने गया है.
  • साहब के बच्चों को घुमाने निकला है.
  • पायलट अभी चाय पीने गया है.
  • पायलट छूट्टी पर है.
  • स्टार्ट ही नहीं हो रहा है. मिस्त्री को बुलवाया है, ठीक होते ही बताते हैं.
  • मिस्त्री आज नहीं आया. विश्वकर्मा जयंती है. कल देखेंगे.
  • हेलीकाप्टर पार्टी की रैली पर फूल बरसाने गया है.
  • अभी अभी पायलट बिना बताये कहीं ले कर चला गया. राजाराम सिपाही साईकिल से खोजने निकला है.
  • कल से निकला है, अभी लौटा नहीं है.
  • पायलट हड़ताल पर है.


    ---आपको और कुछ सुझता हो, तो जोड़िये. इस पर नहीं जोड़ेंगे तो आखिर कहाँ जोड़ेंगे. :)
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सोमवार, मई 19, 2008

पी गये उधार में...

जिस किसी ने भी जीवन में कभी इश्क में चोट खाई हो या किसी को खाते हुए देखा,पढ़ा या सुना हो, उन सभी को आमंत्रण है. आईये, आईये-महफिल सजी है. गज़ल चल रही है, सुनिये. दाद दिजिये, हालात पर थोड़ा दुख जताईये और महफिल की शोभा बढ़ाईये. बाकी बचे भी आमंत्रित हैं. कुछ अनुभव ही बढ़ेगा. ऐसी द्विव्य बातें और महफिलें बार बार तो होती नहीं.

वैधानिक चेतावनी: थोड़ा मार्मिक टाईप है. आँख से अश्रुधार बह सकती है, रुमाल ले कर बैठें. वरना क्म्प्यूटर के कीबोर्ड में आँसू गिरने से शार्ट सर्किट हो सकता है. :)

तब अर्ज किया है:

सो गया मैं चैन से




रात भर दबा के पी, खुल्लम खुल्ला बार में
सारा दिन गुजार दिया बस उसी खुमार में

गम गलत हुआ जरा तो इश्क जागने लगा
रोज धोखे खा रहे हैं जबकि हम तो प्यार में.

कैश जितना जेब में था, वो तो देकर आ गये
बाकी जितनी पी गये, वो लिख गई उधार में.

यों चढ़ा नशा कि होश, होश को गंवा गया
और नींद पी गई उसे बची जो जार में.

वो दिखे तो साथ में लिये थे अपने भाई को
गुठलियाँ भी साथ आईं, आम के अचार में.

याद की गली से दूर, नींद आये रात भर
सो गया मैं चैन से चादर बिछा मजार में.

हुआ ज़फ़र के चार दिन की उम्र का हिसाब यूँ
कटा है एक इश्क में, कटेंगे तीन बार में.

होश की दवाओं में, बहक गये समीर भी
फूल की तलाश थी, अटक गये हैं खार में.

-समीर लाल ’समीर’


चित्र साभार: जोश डाट कॉम का. Indli - Hindi News, Blogs, Links

शनिवार, मई 17, 2008

गीत सम्राट श्री राकेश खंडेलवाल जी को बधाई

आज मई १८, २००८ चिट्ठाजगत के प्रिय गीत सम्राट श्री राकेश खंडेलवाल जी का जन्म दिन है. इस शुभ अवसर पर हमारी तरफ से अनेकों बधाई और शुभकामनाऐं.





आईये, आपको उनका एक गीत पढ़वायें:

गीत तेरे होंठ पर

गीत तेरे होंठ पर खुद ही मचलने लग पड़ें आ
इसलिये हर भाष्य को व्यवहार मैं देने लगा हूँ

देव पूजा की सलौनी छाँह के नग्मे सजाकर
काँपती खुशबू किसी के नर्म ख्यालों से चुराकर
मैं हूँ कॄत संकल्प छूने को नई संभावनायें
शब्द का श्रन्गार करता जा रहा हूँ गुनगुनाकर

अब नयन के अक्षरों में ढल सके भाषा हॄदय की
इसलिये स्वर को नया आकार मैं देने लगा हूँ

रूप हो जो आ नयन में खुद-ब-खुद ही झिलमिलाये
प्रीत हो, मन के समंदर ज्वार आ प्रतिपल उठाये
बात जो संप्रेषणा का कोई भी माध्यम न माँगे
और आशा रात को जो दीप बन कर जगमगाये

भावना के निर्झरों पर बाँध कोई लग न पाये
इसलिये हर भाव को इज़हार मैं देने लगा हूँ

मंदिरों की आरती को कंठ में अपने बसाकर
ज्योति के दीपक सरीखा मैं हॄदय अपना जला कर
मन्नतों की चादरों में आस्था अपनी लपेटे
घूमता हूँ ज़िन्दगी के बाग में कलियाँ खिलाकर

मंज़िलों की राह में भटके नहीं कोई मुसाफ़िर
इसलियी हर राह को विस्तार मैं देने लगा हूँ

-राकेश खंडेलवाल


राकेश जी की रचनाओं का आनन्द आप निम्न ब्लॉगों पर उठा सकते हैं:

गीत कलश

गीतकार की कलम Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, मई 15, 2008

अब भी संभलो

चीन में आये भूकंप के बाद मन में उठते कुछ भाव. आशा है आप सहमत होंगे:

chinaearthq

अब भी संभलो

यह धरती है
जिसे रौंदती
दुनिया बन के भीड़.

सब सहती है
चुप रहती है
मौन उदासी
सब कहती है

पेड़ कटे
आहत है छाती
किन्तु न कहती
कभी किसी से पीर

यह धरती है
जिसे रौंदती
दुनिया बन के भीड़.

नाम प्रगति का
धुँआं छाया
असमान भी दिख न पाया
सूरज, चाँद, सितारों सब पर
गहरा एक कुहासा छाया

खूब सताया
दिल तड़पाया
सिसक पड़ी जब
उस कंपन से
उजड़े कितने नीड़..

यह धरती है
जिसे रौंदती
दुनिया बन के भीड़.

दुनियावालों
संभल सको तो
अब भी संभलो
इसकी छाती
यूँ न मसलो
इस धरती का
कर्ज है तुम पर
कुछ उसकी ही
लज्जा रख लो.

धरती चीखे
बिन हरियाली
जैसे कोई प्यासा बच्चा
मांग रहा हो नीर…

यह धरती है
जिसे रौंदती
दुनिया बन के भीड़.


--समीर लाल 'समीर’ Indli - Hindi News, Blogs, Links

मंगलवार, मई 13, 2008

सहायता चाहिये पर सहायताओं से गुरेज

सहायता (ऐड) चाहिये पर सहायताओं (ऐड्स) से गुरेज, हद है!

बचपन में घर पर एक कहावत सुना करते थे-इतना ज्यादा मिठाई भी मत खा लो कि मीठा कड़वा लगने लगे.

अब देखिये न, एक जमाने में अमेरीका का खास आदमी. सहायता(Aid) पर सहायता(Aid) मांगे और जब यही बात बढ़ी तो ऐड्स -AIDS (सहायता का बहुवचन सहायताओं का अंग्रेजी) से डर गया. उस जमाने में तो जो मांगा सब मिला. डालर पर डालर. मिसाईल पर मिसाईल और WMD (वेपन ऑफ मास डिस्ट्रक्शन). खूब ईरान पर हमला किया. बड़े भईया जी अमरीका से सपोर्ट का टेका लगाये रहे. जो मर्जी आई, करते रहे. धाँये..धाँये खूब बम दागे, क्यूँ?

फिर बड़े भईया की नजर तेल के कुंए पर पड़ गई. अब लो, वो तेल तो उनको चाहिये. बस, नाराज हो लिए. कुवैत से दोस्ती गढ़ ली. वो बन गये नये पिट्ठू और तुम अपने मूँह मियाँ मिट्ठू. इसीलिए बुजुर्ग, पठानों और गुण्डों से उधार और मदद लेने से मना करते थे कि कब न बात उलट जाये. ये किसी के सगे नहीं होते. इन्हें तो बस अपना वर्चस्व फैलाना होता है, उसी ध्येय से मदद करते हैं और इसीलिए उधार भी देते हैं कि न लौटा पाओ और उनकी गुलामी करो. मगर सद्दाम ने कब बुजुर्गों की सलाह मानी. जो मन में आया-किया. लो, फिर भुगता न!! यही तो है, जब खुद बुजुर्ग हो लेते हो, तब बुजुर्गों की सलाह याद आती है. मगर, तब तक तो देर हो चुकी होती है. बस, पछतावा रह जाता है.

सब राज पाट छिन गया और चूहे के बिल से पकड़ाये. जेल और फिर फाँसी.

भारत होता तो हमारे राष्ट्रपति जी माफ भी कर देते तुम्हारी फाँसी. पूरी योग्यता तो थी-एक तो मुसलमान और उपर से डिक्लेयर्ड आतंकी. फिर कैसे न माफ होती? बस एक कमीं थी कि तुमने भारतियों को नहीं मारा फिर भी चलेगा. इतनी नन्हीं बात पर भारत ध्यान नहीं देता या यूँ कहें कि ध्यान नहीं जाता. और बड़े बड़े मुद्दे पड़े हैं सोचने को.

मगर बाबू, वो अमरीका है, यूँ ही नहीं माफी मिलती. समझे!!

Saddam

कल सद्दाम की डायरी के पन्ने पढ़ता था. मात्र ६ या ७ पन्ने रिलिज किये हैं अमरीका ने और हमने उसमें से मात्र ३ लाईनें पढ़ी.

सद्दाम कहते हैं कि मुझे जेल में इस बात का डर लगता है कि मुझे कहीं ऐड्स न हो जाये.

(हम्म!! क्यूँ भाई, ऐसा क्या इन्तजाम हो लिया जेल में कि ऐड्स का खतरा मंडराने लगा. बोलो, बोलो!! कहीं वो फाँसी को स्टेजड ड्रामा बताने वाली बात सच तो नहीं कि तुम्हारी फाँसी हुई न हो, किसी और को टांग दिया और तुम अमरीका की मेहमानी काट रहे हो अपने पुराने संबंधों के चलते और फिर अमरीकी मेहमानी वो भी शासकीय-ऐड्स का खतरा तो स्वाभाविक है और डर भी. मगर तुम किस बात से डरे?? ऐड्स से मरने से?? मरने से तुम डरो, यह मानने को दिल नहीं मानता. जो आदमी बिना मूँह ढ़कवाये खुली आँख फाँसी का फंदा गले में डलवा के झूल गया हो, वो मरने से डरे?? ह्म्म. कौन मानेगा?? फिर ऐड्स से कैसा डर? तुम्हें तो यूँ भी फाँसी घोषित हो ही चुकी थी. मरना तो है ही ऐसे भी और वैसे भी, फिर डर कैसा?? न न!! कोई और बात है..आगे पढ़ता हूँ.)

आगे लिखते हैं कि मैने कई बार इन अमरीकी जवानों को मना किया कि तुम अपने कपड़े उस डोरी पर मत सुखाया करो जहाँ मेरे कपड़े सूखते हैं. तुम जवान हो, तुम्हें जवानों वाली बीमारी होगी. तुम्हारे इस तरह सेम डोरी पर कपड़े सुखाने से मुझे भी ऐड्स हो सकती है, मगर मानते ही नहीं.

(हा हा!! वो क्या, कोई भी नहीं मानेगा कि डोरी से ऐड्स हो गया सद्दाम साहब को. मगर भाई, बहाना सालिड खोजा है. बहुत खूब. साधुवाद ऐसी सोच को. मान गये. धोबी या धोबन से ऐड्स लग गया तो समझ में आता है, है तो वो भी बदनामी की वजह, मगर कपड़े सुखाने वाली डोरी से ऐड्स-गजब भाई गजब!!! एक चीज तो सही सोची कि अमरीकी जवान सैनिकों पर बात सरका दो. वो सही है. एक तो अमरीकी, फिर जवान, फिर सेना मे और उन सब के उपर-ईराक में पोस्टेड- स्वाभाविक सी बात है-ऐसी बीमारी उन्हें पकड़ ले-मगर उनके कपड़े जिस डोरी पर सूखें उससे तुम्हें पकड़ ले ऐड्स तब तो गजब ही हो लिया. कौन मानेगा-हर जगह थू थू कि लो इस बुढ़ापे में न जाने क्या कर डाला कि ऐडस ने पकड़ लिया. हम तो खैर भारत से हैं जहाँ तुम्हारी उम्र के लोग तो अगर गलत नजर से लड़की को देख भर लें तो पूरा मोहल्ला थूके कि छी छी, कम से कम उम्र का तो ख्याल किया होता. ऐडस को तो कोई न टॉलरेट करे इस उम्र में.पूरे मोहल्ले में पिटते घूमते!!)

सही है गुरु, सही बहाना निकालने की कोशिश की है. नतमस्तक हैं तुम्हारी सोच पर. दिमाग के तो तेज हो, तभी तो इतने समय अड़े रहे. हमें तो डाऊट है कि तुम अमरीकी मेहमानी अब भी काट रहे हो और वो फाँसी पर तुम्हारा डुप्लीकेट लटक लिया है. डाऊट बस है, सच तो तुम, तुम्हारे बड़े भईया अमरीका वाले मौसेरे भाई और तुम्हारा खुदा जाने!!! यह भी हो सकता है कि अमरीका ने तुम्हें मारने से पहले, जैसे बकरे को हलाल करने के पहले खूब खिलाते पिलाते हैं, तुम्हारी मेहमान नवाजी तबीयत से की हो और तुम बाद में घबरा गये हो कि कहीं मरने से पहले ऐड्स वाली बदनामी न हो जाये तो यह सब डायरी में लिख गये हो.

क्या सच-क्या झूठ. हमें तो पता नहीं. हम तो सिर्फ सोच और लिख सकते हैं और मुशर्रफ जी को सलाह दे सकते हैं कि संभल जाओ या फिर एक डायरी खरीद कर लिखने की प्रेक्टिस करो ताकि उस वक्त बहाना सही बन पड़े.

अगर इत्ते बड़े गुंडों से सहायता (ऐड) ले रहे हो तो सहायताओं(ऐड्स) से गुरेज न करना!!! वैसे अमरीका में पैकेज डील का प्रचलन है-ऐड के साथ ऐड्स भी-पैकेज डील ही कहलाई.

बता दे रहे हैं ताकि बाद में न कहना कि बताया नहीं.


नोट: अगर कहीं सच में जिन्दा हुआ तो हमारा तो यह आखिरी आलेख ही समझो. छोड़ेगा थोड़ी गुगल ट्रांसलेटर से पढ़कर. क्या चीज बनाई है हिन्दी से अंग्रेजी या कितनी ही भाषाओं से कितनी ही भाषाओं में ट्रांसलेट कर पढ़ने के लिए. Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, मई 11, 2008

टेन्ट हाऊस वाले को नमन

आज तक आपने मंचों से कवियों को आयोजकों, श्रोताओं, विज्ञापनदाताओं यदि कोई मैग्जीन भी छपी हो तो और मंचासीन साथी कवियों का आभार करते ही सुना होगा. आज हमारा उनके लिए आभार सुनिये जो सही में बधाई के पात्र हैं वरना तो सब फेल हैं. मैं तो उनके प्रति नत मस्तक हूँ. वरना तो मूँह के बल जमीन पर गिरे पड़े मिलते. :) उनके योगदान पर अपना आभार पेश कर रहा हूँ:


टेन्ट हाऊस वाले को नमन


हमको जिसने मंच दिया है
उसके हम आभारी हैं....
देखो अब तक टिका हुआ है
जबकि कितने भारी हैं...


टेन्ट हाऊस को काम दिया है
आयोजक बतलाते हैं...
मोटे इतने कील लगाते कि
मंत्री भी चढ़ जाते हैं...
मंच सजाने में उनसे कोई
अब तक जीत नहीं पाया
जान गये थे फोटो से ही
कैसी अपनी है काया....

धन्यवाद मैं उन्हें सौंपता
असल वही अधिकारी हैं...
हमको जिसने मंच दिया है
उसके हम आभारी हैं....


हम गिर जायें उससे हमको
क्या कुछ होने वाला है
नीचे जो भी दब जायेगा
जीवन खोने वाला है...
ऊँचे दर्जे की कविता फिर
दफन यहीं हो जायेगी....
मिट्टी की बातें ये सारी
मिट्टी में खो जायेंगी...

बचा हुआ है मंच तभी तक
इनकी बातें जारी हैं..
हमको जिसने मंच दिया है
उसके हम आभारी हैं....

एक राज की बात बांटता
देश के रचनाकारों से..
कभी उऋण न हो पाओगे
टे्न्टीय इन उपकारों से...
मंच से लेकर माईक दरी तक
सब अहसान इन्हीं का है
अंतिम बैठा वो श्रोता भी
खादिम राम इन्हीं का है

माईक खोल कर ही जायेगा
सब उसकी जिम्मेदारी हैं....
हमको जिसने मंच दिया है
उसके हम आभारी हैं....


अब तक ये जो बात किसी की
नजर में न चढ़ पाई है
हम जैसे दृष्टा ने आकर
तुमको आज बताई है...
अब चलते चलते एक निवेदन
मेरा यह स्वीकार करो..
ताली दो इनके कामों को
मेरा भी उद्धार करो...


क्या क्या बात बतायें तुमको
बातें कितनी सारी हैं...
हमको जिसने मंच दिया है
उसके हम आभारी हैं....


-समीर लाल ’समीर’ Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, मई 08, 2008

मेरी कामना!!

Pipe copy

मेरा घर

उस बड़े से पाईप के अंदर

जो सामने ओवर ब्रिज के नीचे लगना था

आज उजड़ गया....

ब्रिज बन कर तैयार हो गया

शहर के विकास का जीता जागता प्रमाण

और मैं और मेरा परिवार

नये घर की तलाश में हूँ....

यह शहर विकसित होता रहे...

बस, कभी विकसित न हो..

नये पाईप गिरें..

मुझे नया घरोंदा मिले...

यही कामना है-


--समीर लाल ’समीर’

(विकासशील मानसिकता भी विकसित होने में बाधक है शायद?
देश/ शहर बस विकसित होता रहे-हमारे नेता भी तो यही चाहते हैं यह एक क्रिया ही बनी रहे, संज्ञा न बन पाये)
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मंगलवार, मई 06, 2008

गमछे की लपेट में

जिस दिन से कनाडा वापस आया हूँ, न जाने आँखे हर तरफ बस एक ही चीज खोज रही हैं-गमछा. बड़ा मिस कर रहा हूँ गमछे को.

गमछा मिस कर रहा हूँ इसलिये नहीं कि मैं पूरबिया भईया गमछा लपेटे नहाता होऊँगा या कंधे पर गमछा डाले खैनी दबाये गली गली डोलता होऊँगा बल्कि इसलिये कि इतने दिन भारत में रहे- जहाँ देखो वहीं गमछा. सफेद-और दूसरी वाली का उससे भी सफेद. क्योंकि शायद सर्फ से धुला होगा. अगर सर्फ का वो वाला विज्ञापन आज बने तो पंच लाईन होगी- भला उसका गमछा मेरे गमछे से ज्यादा सफेद कैसे.

जबलपुर में हर लड़की/ महिला जो भी सड़क पर दिख जाये वो ही चेहरे पर गमछा लपेटे, हाथों में कोहनी तक ढ़के दस्ताने पहने, सर पर टोपी, आँख पर काला चश्मा और एक डॉक्टरनुमा एप्रन पहने मिलेगी.

कल तो इतना मिस किया कि मैं गाने ही लगा-"हवा में उड़ता जाये, ये उजला गमछा मैडम का!!!

सुना था महिलाओं में एक दूसरे से ज्यादा खूबसूरत दिखने की एक इनबिल्ट होड़ की प्रवृति होती है. सुना ही क्या, महसूस भी किया है. मगर इस वेशभूषा में तो सभी एक सी दिखती हैं. रोड रोमियोज यानि सड़क छाप मनचलों की तो मानो दुकान ही बन्द हो गई. जेबकटी शाहर में एकाएक बढ़ गई. कारण पता किये तो मालूम चला कि छुट्ट्न भाई लोगों के पास कोई काम बचा नहीं तो जेबें काटा करतें हैं. बेचारों पर बड़ी दया सी आती है. कैसे छेड़ें, किसको छेड़े?

bhopal

पता चले कि किसी को छेड़ दिया तो गमछा हटने पर अन्दर से ५५ वर्षीय माता जी नुमा महिला अवतरीत हो गईं या खुद ही की कोई परिचिता निकल आईं. बीबी निकल आये तब तो राम नाम सत्य ही समझो. कौन रिस्क लेगा भला ऐसे में.

छेड़ो भी, पिटो भी और अन्दर से निकली खब्बड़ कल्लो. कितनी तो जग हँसाई हो जाये.

एक दिन तो गज़ब ही हो गया. बैंक के बाहर खड़ा था. एक सुडोल (इसके अलावा तो कुछ भी दृष्टीगत नहीं था) कन्या ने आकर स्कूटी रोकी तो हावभाव देख बरबस ही नजर ठहर गई. फिर उसने अपने गमछा उतारा तो अन्दर से लड़का निकला. अब सोचिये, अगर कोई उसे छेड़ लेता तो कितना पंगा खड़ा हो जाता.

आजकल तो अगर कोई छेड़ाछाड़ी कर्म में लिप्त मिले तो जान लिजिये पक्का जुआड़ी है और ब्लाईन्ड खेलने का शौकिन.

मैं अपने आपसे प्रश्न करता रहा कि आखिर ऐसा क्या है जो एकाएक सब महिला वर्ग इतना लैस होकर सड़क पर निकलने लगा है. सुना था कि अब तो शहर की स्थितियाँ पहले से बहुत बेहतर हैं. पुलिस मुस्तैद हो गई है और अपराध भी कम हो गये हैं. प्रश्न अनुत्तरित ही बना रहा तब हार कर मैने एक महिला मित्र की शरण ली. मैने उन्हें अपनी जिज्ञासा से अवगत कराया तो वह खूब हँसीं.

कहती हैं कि आजकल भारतीय महिलाऐं अपनी ब्यूटी के प्रति बहुत जागरुक हो गई हैं. स्किन डेमेज न हो और सॉफ्ट एण्ड ग्लोयी बनी रहे, इसलिये सब इसे ढंक कर निकलती हैं.

मैने कहा , "और ये कैप?"

"इससे बालों की चमक बनी रहती है!" उन्होंने मेरी जिज्ञासा शांत करते हुए बताया.

मैं उनको धन्यवाद कर चला तो आया मगर सोचता रहा कि लाख ग्लोयी तव्चा बनी रहे, बाल चमकते रहें-फायदा क्या?? जब कोई उन्हें देख ही नहीं रहा. घर वाले देखें भी तो क्या? घर वालों को तो घर वाले जैसे भी हों यूँ भी प्यारे रहते हैं. हम खुद अपने कई घर वालों के रोल मॉडल हैं. उनके लिये सुन्दरता के मापदण्ड आपकी स्किन की सॉफ्टनेस, ग्लो और बालों की चमक का कोई मायने नहीं. यह सब तो बाहर वालों के लिये हैं और उस समय आप नख से शिख तक पूरा नकाबमयी हो लेती हैं तो सब बेकार गया. फिर कहते हैं हम वेस्टनाईज हो रहे हैं.

इस वेस्टन वर्ड में तो मैने किसी को गमछा लपेटते नहीं देखा. बल्कि हमारे यहाँ से उल्टा-जैसे जैसे गरमी बढ़ती है, वैसे वैसे कपड़े छोटे और कम. सरदी का अंतिम पड़ाव में तो जिम लड़कियों से भर जाते हैं. सब गरमी की तैयारी में वापस शेप में आ जाती हैं. सरदी में तो मोटे मोटे कपड़े के अन्दर कौन मोटा कौन पतला-पता ही नहीं लगता.

२४-२५ डिग्री पर तो शार्टस/ स्लिवलेस बनियान में आने लगते हैं सड़को पर. कपड़ो की साईज और संख्या गरमी के तापमान के वक्रानुपाती.

जिसकी जैसी स्किन, ग्लो या नो ग्लो, जैसे बाल, जितनी सुन्दर, कम सुन्दर-सब सामने. कुछ भी गमछे में लिपटा नहीं.

कभी सोचता हूँ कि यहाँ सड़कें कैसी दिखेंगी अगर तापमान दिल्ली वाला पहुँच जाये यहाँ ४५ डिग्री. सड़कें समुद्री बीच बन जायेंगी शायद और हमारा घर बीच फेसिंग.

चलो, अभी तो शौकिया खुद की इच्छा से यह महिलायें पर्दा किये हैं मगर शायद यही अगर मजबूरी में करना होता तो कितनी ही आवाजें उठ खड़ी होती कि महिलाओं को प्रताड़ित किया जा रहा है. पर्दा प्रथा नहीं चलेगी और यह सब आवाजें आती भी महिला खेमे से ही. वैसे, अगर मजबूरी होती तो आना भी चाहिये. :)

खैर, अब स्किन और हेयर का तो जो हो सो हो मगर नव युवाओं को यह खुले आम सड़क के किनारे, थियेटर या रेस्टॉरेन्ट में मिलने जुलने के बहुत अवसर उपलब्ध करा रहा है. पहले एक डर रहा करता था कि कहीं कोई पहचान का न देख ले. अब गमछा अपने अन्दर वो डर भी समेट ले गया. लोग गमछा लपेटे खुले आम मिल रहे हैं. बेहूदी हरकतें सड़क के किनारे खुले आम दिखना एक आम सी बात हो गई है.

बड़ा विशाल है- कभी सुन्दरता अपने अन्दर लपेट लेता है तो कभी डर और कभी हया !!!

धन्य है गमछा महिमा!! Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, मई 04, 2008

कैसे कैसे पूर्वाग्रह!!

जनवरी माह की ठंड की रात के ११ तो बज ही गये होंगे. सड़क बिल्कुल सुनसान.

एक पार्टी से लौटते हुए घर के अंधेरे मोड़ पर गाड़ी मोड़ी तो देखा एक आदमी स्कूटर से गिरा पड़ा है. गाड़ी खड़ी करके नजदीक जाकर देखा तो लगा कि मर चुका है.

तुरंत वहीं से पुलिस को फोन किया.

४५ मिनट में ही तत्परता से पुलिस आ गई. जीप से उतरते ही इन्सपेक्टर ने पहले लुढ़की हुई स्कूटर और फिर उस व्यक्ति पर नजर दौड़ाई और फिर अपने सिपाही से बोला: इस गाड़ी वाले ने ही ठोका होगा. ले चलो साले को थाने. सब रात में दारु पी कर चलाते हैं और एक सीधे सादे स्कूटर चालक को मार दिया. ले चलो, अभी उतारते हैं इनकी रईसी!!

आवाज पहचानी हुई थी फिर भी एक बार को तो मैं घबराया कि यह कौन सी बला मोल ले ली. एक बार को आँख के सामने पुलिस के डंडे खाते का दृष्य भी घूम गया.

मैने ध्यान से देखा तो मेरा पूर्व से जानने वाला ही इन्सपेक्टर था.

मैने हिम्मत जुटा कर कहा- अरे तिवारी जी, आप??

वो भी पुलिसिया मिजाज के विपरीत झट से पहचान गये: अरे भाई साहब, आप यहाँ क्या कर रहे हैं?

मैने उन्हे स्थितियाँ बतलाई कि कैसे मैं दावत से लौट रहा था और यह यहाँ पडा मिला तो मैने पुलिस को फोन किया.

उसने तुरंत सिपाही से कहा: देख तो रे, ये मर गया कि जिंदा है?

फिर मेरी तरफ मुखातिब होते हुए कहने लगा: क्या बतायें भाई साहब, ये लोग भी न! बस, पी कर स्कूटर चलाते हैं. होश रहता नहीं, कहीं भी पत्थर/ खम्बे से टकराये और लगे मरने और परेशान होते हैं आप जैसे सीधे सादे लोग.

क्या बदलाव आया एक मिनट में पहचान के कारण.

सिपाही उस बेहोश आदमी के पेट में डंडा कोंच कर पूछ रहा है कि क्यूँ बे, जिन्दा है कि मर गया?

डंडे की कूचन से वो थोड़ा हिला डुला फिर क्या था! सिपाही ने उसे दो डंडे ही जड़ दिये-देख कर नहीं चलता क्या? पीकर गाड़ी चलाता है?

मैने बीच में पड़ते हुए कहा कि यार, वो मर जायेगा. इसे अस्पताल भिजवाओ.

इन्सपेक्टर ने बताया कि ये ऐसे नहीं मरते. अभी इसको थाने ले जायेंगे. एफ आई आर बनेगी. फिर अस्पताल भेजेंगे.
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खैर, जीप में उसे और उसके स्कूटर को लदवाया गया. तिवारी जी अगले दिन शाम को दावत पर मिलने का वादा लेकर विदा हो गये.

मैं भौचक्का सा सोचता रहा कि अगर आज तिवारी जी की जगह कोई और इन्सपेक्टर होता तो?? मैं तो अभी पिट रहा होता थाने में और जो दारुखोरी और बेहोशी का इल्जाम उस दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति पर लगा है वो मैं झेल रहा होता.

सोचता हूँ कि यह कैसा पूर्वाग्रह है कि बिना किसी पड़ताल के अपनी तरफ से ही पूरी कहानी बना ली. अब जैसे जैसे पड़ताल और पहचान (लेन-देन शिष्टाचार भी इसी का अंग है) आगे निगलेगी, वैसा दिशा निर्धारण होगा केस का.

खैर, अब मैं भी एक पूर्वाग्रह से ग्रसित सा लग रहा हूँ. आईंदा जब भी ऐसा मौका आयेगा, मैं भी अन्यों की तरह अनदेखा कर के निकल लूँ तो ही ठीक.

पता नहीं जब वक्त आयेगा तब यह पूर्वाग्रह हाबी हो पायेगा या नहीं मगर अभी तो मुझे ग्रसित किये हुए है.

वादे क मुताबिक अगले दिन तिवारी जी के साथ कुछ जाम शाम छलके. वो बता रहे थे कि सुबह अस्पताल से पट्टी वगैरह करा कर उसकी छुट्टी करा दी है. स्कूटर जब्त है. घटना की तफतीश चल रही है. शराब पीकर वाहन चलाने का आरोप है. कुछ तो रकम कटेगी.

नशे में कह रहे थे कि पता नहीं लोग क्यूँ पीते हैं और उस पर से गाड़ी चलाते हैं. बहुत गुस्सा आता है मुझे ऐसे लोगों पर.

हम सुनते रहे. हाँ में हाँ मिलाते रहे. रात ज्यादा होने लगी. तब तक तिवारी जी पी भी काफी चुके थे सो हम विदा हुए. तिवारी जी अपनी बुलेट पर झूमते हुए निकल गये अपने घर और हम आ गये अपने घर. Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, मई 01, 2008

विरह रो रहा है, मिलन गा रहा है

जबलपुर से निकले हफ्ता होने आया मगर वहाँ बिताये पल यादों में ऐसे रचे बसे हैं कि अब तक यहाँ सेट ही नहीं हो पा रहे है.

बहुत भारी मन से आज अपनी हाथ घड़ी में भारत का समय बदल कर कनाडा का किया तब लगा कि वाकई, फिर से बहुत दूर आ गये हैं. हालाँकि मौसम याद दिलाता है दिन भर और रात भर. आज सुबह भी ३ फिर दिन में ११ और शाम को ५ तापमान था.

आज जब शाम को टहलने निकला तो जैकेट पहनते बड़ा असहज महसूस हो रहा था. कहाँ सफेद झकाझक कलफी मगहर का सफेद खादी का कुर्ता पहनते ६ माह बीत गये और आज फिर अटक गये शर्ट पैण्ट और जैकेट, मफलर में.

आज से तो सोना/ जागना भी यहाँ के समयानुसार शुरु करना पड़ेगा तभी सोमवार से दफ्तर जाना संभव हो पायेगा.

खैर, यह तो होना ही था. करेंगे जब तक यहाँ है.

हाँ, इस बार होली मिलन पर जबलपुर में एक दावत रखी मित्रों के लिये. उसमें एक कव्वाली का कार्यक्रम भी रखा था. किन्हीं वजहों से उसकी रिकार्डिंग ठीक से नहीं हो पाई. जबलपुर के विख्यात कव्वाल लुकमान चाचा जिनके विषय में विस्तार से पंकज स्वामी ’गुलुश’ ने जबलपुर चौपाल पर लिखा था, के वारिस एवं मेरे परम मित्र श्री सुशांत दुबे ’बवाल’ ने पूरे चार घंटे समा बनाये रखा. १०० से अधिक उपस्थित लोग एकांगी बैठे उन्हें मन लगाये सुनते रहे, पीते रहे, झूमते रहे और फिर खा पी कर चले गये. वो शाम एक यादगार शाम बन गई. मौके का फायदा उठाया गया. बवाल को बीच कार्यक्रम में आराम देने के बहाने दो तीन कविताऐं ठेलने का असीम सुकून प्राप्त किया. मजबूरी में या खूशी से, सबने सुना. वाह वाह की. ताली बजाई. आखिर हमारे बाद बवाल को फिर से सुनना भी तो था. भागते कैसे?

उस दिन की कुछ तस्वीरें बाँट रहा हूँ.

bavaalstage

और

PDR_7626

और

PDR_7639

और

PDR_7647

फिर चलने के एक दिन पहले बवाल को घर पर दावत में बुलाया गया. अकेले समा बना लेने की महारत रखने वाले बवाल नें बिना किसी साज के फिर तीन घंटे सबको अपने गायन से बाधें रखा. बड़े आनन्ददायी क्षण रहे. दो छोटे क्लिपस भी उस बैठक के यहाँ बांटता हूँ. कान में अब तक आवाज गुँज रही है- विरह रो रहा है, मिलन गा रहा है-किसे याद रखूँ, किसे भूल जाऊँ. सच, किस पल को याद रखूँ और किस पल को भूल जाऊँ.




और इसे भी सुनें:



एकदम पहली प्रस्तुति नेट पर. वर्जिन आवाज. आनन्द उठाईये और बताईये ताकि पूरे पूरे आईटम पेश किये जा सकें भविष्य में.

बवाल से काफी चर्चा हुई. उन्होंने भी अपने ब्लॉग का शुभारंभ कर दिया है. अब बात आगे बढ़ेगी-नींव रख दी गई है. जल्द ही आपको उनका और विस्तृत परिचय देता हूँ. Indli - Hindi News, Blogs, Links

मंगलवार, अप्रैल 29, 2008

नेता टिक्का मसाला: यमी यमी यम यम!!

कभी कभी लगने लगता था कि मांसाहारी भोजन करके शायद मैं हिंसा कर रहा हूँ. कोई बहुत बड़ा पाप. आत्म ग्लानि होने लगती है और एक अपराध बोध सा घेर लेता है खासकर तब, जब कि मांसाहार के साथ कुछ जाम भी छलके हों. अपराध बोध भी सोचिये कितना सारा होगा जो हम जैसी काया तक को पूरा घेर लेता है. कहते हैं पी कर आदमी सेंटी हो जाता है. वही होता होगा इस मसले में.
Chicken
तीन चार दिन पहले टीवी पर एक अनोखा समाचार देखा. देखते ही मांसाहारी होने की पूरी ग्लानि और अपराध बोध जाता रहा. उस दिन से निश्चिंत हुआ. अब मुर्गे को कटते देख कोई हीन भावना नहीं आती बल्कि खुशी होती है. वो कौम, जिसकी जिस पर नजर पड़ जाये, उस पूरे गाँव, पूरे शहर, पूरे देश के निरपराध मानवों को मार कर खा गयी हो, उस पर कैसी दया और उस पर कैसा रहम. किस बात की आत्म ग्लानि? अच्छा ही हुआ-जब तुम्हारी कौम में हमको मारने की ताकत आई तो तुमने हमें अपना भोज बनाया और आज हममें ताकत है तो हम तुम्हें खा जायेंगे. खत्म कर देंगे.

टीवी ने बता दिया कि डायनासॉर के पूर्वज मुर्गे थे. टी वी दिन भर ढोल पीटता रहा कि मुर्गे डायनासॉर के बाप थे और उनके पूर्वज थे. टीवी वाले अंधो तक को दिखाकर माने और बहरों को सुना कर हर मसले की तरह.

मुझे तो पहले ही डाउट था कि जरुर कुछ न कुछ बड़ा पंगा किया होगा तभी तो मानव इन्हें खाने पर मजबूर हुआ. अभी बकरे की पोल खुलना बाकी है मगर जान लिजिये, उसकी पंगेबाजी भी जब खुलेगी तो ऐसा ही कुछ सामने आयेगा. पंगेबाजी का अंत तो ऐसा ही होता है चाहे किसी भी स्तर की पंगेबाजी हो. सिर्फ हिन्दी ब्लॉगजगत में पंगेबाजी जायज है और वो भी सिर्फ अरुण अरोरा ’पंगेबाज’ की.
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अब तो शाकाहारियों को देखकर लगता है कि देखो, हम तुम पर कितना अहसान कर रहे हैं. वो मुर्गे जो डायनासॉर बन सकते हैं और तुम्हें और तुम्हारे समाज को पूरी तरह नष्ट कर सकते थे, उन्हें कनवर्जन के पहले ही खत्म करके हम तुम्हें भी बचा रहे हैं. काश, धर्म परिवर्तन जो कि इतना ही खतरनाक कनवर्जन है, के पहले भी ऐसी ही कुछ व्यवस्था हो पाती.

कल ही एक मुर्गा मिल गया था. पूछने लगा कि ऐसी क्या बात है, जो आप जैसी उड़न तश्तरी हमसे इतना नाराज हो गई?

हमने उसे साफ साफ कह दिया कि तुम हमसे बात मत करो, आदमखोर कहिंके. तुम तो वो बने जिसकी जिस पर नजर पड़ जाये, उस पूरे गाँव, पूरे शहर, पूरे देश के निरपराध मानवों को मार कर खा लिया. बर्बाद कर दिया. कहीं का नहीं छोड़ा. तुम पर क्या रहम, तुम्हारा तो यह अंजाम होना ही था.

हमारा खून तो तब से खौला है कि यह डायनासॉर आये कहाँ से, जबसे हमने जोरासिक पार्क फिल्म देखी थी. बस, भरे बैठे थे. जब पता चला कि यह तुम्हारा कनवर्जन हैं, तब से तुमसे नफरत सी हो गई है. मैं तो चाहता हूँ कि तुम्हारा नामो निशान मिट जाये इस धरती से.

मुर्गा मुस्कराया और बोला, " आपका साधुवाद, आप मानव प्रजाति के लिये कितना चिन्तित हैं. मगर हम मुर्गे जैसी ही एक आदमखोर प्रजाति ही तुम्हारी ही शक्ल में तुम्हारे बीच बैठी यही काम कर रही है, उसका क्या करोगे, मिंया. वो भी तो यही कर रहे हैं मगर अपनों के साथ ही कि जिस पर नजर पड़ जाये, उस पूरे गाँव, पूरे शहर, पूरे देश के निरपराध मानवों को मार दें, बर्बाद कर दें. कहीं का नहीं छोड़ें. "

मैं चकराया और पूछने लगा, ’कौन हैं वो?"

मुर्गा हँस रहा है. हा हा हा!! कहता है "तुम्हारे नेता और कौन!!"

बात में दम थी अतः मैं सर झुका कर निकल गया. इस मुर्गे पर न जाने क्यूँ मुझे रहम आ गया. नेता टिक्का मेरे आँखों के सामने तैर जाता है कि अगर उनका भी मुर्गों सा हश्र करने लगे मानव तब??

नेता टिक्का मसाला
neta tikka

फिर पशोपेश मे हूँ कि मांसाहारी बने रहूँ या शाकाहारी हो जाऊँ? Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, अप्रैल 27, 2008

अजब-गजब है ये बात!!

आज वापस कनाडा पहूँच ही गये पूरे ६ माह भारत में फटाफट व्यतित करके. अभी दो घंटे ही हुए हैं आये.

मौसम बेहतरीन है. इस समय ६ डिग्री सेल्सियस हुआ है. दोपहर में १३ डिग्री था. भारत में ४३ डिग्री से आने के बाद आनन्द आना स्वभाविक है. यात्रा लम्बी थी तो थकान भी उतनी ही स्वभाविक और नींद- १० घंटे का टाईम डिफ्रेन्स जान लिये ले रहा है.

आँख नींद से लाल
शरीर थकान से अलाल,
मौसम के बेहतरीन हाल..
खुश हो रहे हैं समीर लाल

अब शायद कल से नेट पर ज्यादा बना रह सकूँ. तब तक भारत का ही एक किस्सा जो वहाँ से पोस्ट हो नहीं पाया था:

महेन्द्र मिश्रा जी http://mahendra-mishra1.blogspot.com/ आये थे रविवार को मिलने. हमसे मिले. जितनी गरमी थी उससे भी ज्यादा गरमजोशी से मिले. हमने पूछ ही लिया कि इतनी गरमी में कैसे निकले?

कम शब्दों में अपनी बात कहने वाले मिश्र जी कहने लगे," वो आज हनुमान जयंति है, तो निकले थे सोचा आपके दर्शन कर लें."

जल्द ही वो चले गये. शायद हनुमान मंदिर ही गये होंगे. बहुत अच्छे मेहमान हैं. न ज्यादा बैठते हैं, न चाय पीते हैं और न ही नाश्ता मिठाई खाते हैं. एक पलक पावड़े बिछा कर ब्रह्म स्वागत योग्य अतिथि.

उनके जाने के बाद शीशे में खुद को निहारता रहा. तरह तरह से मूँह बना कर देखा. फोटो खींची. पत्नी ने लगातार शीशे में निहारने का रहस्य पूछा तो हमने मिश्र जी की बात बताई कि कह रहे थे: "आज हनुमान जयंति है, तो निकले थे सोचा आपके दर्शन कर लें."

पत्नी कह रही हैं कि सही जगह तो आये थे. लगते तो वैसे ही हो.

hanumanji

हमने भी ठान ली है कनाडा जाकर कम खाऊँगा और खूब दौड़ लगाऊँगा और अगले साल मिश्र जी आप जन्माष्टमी पर आना.

राम नवमीं पर बुलाता मगर क्या करुँ-शरीर तो घटाना अपने हाथ में है, रंग का क्या करुँ? कृष्ण जन्माष्टमी ही ठीक रहेगी. आना जरुर दर्शन करने.

चलिये, घटनायें तो होती ही रहती हैं, उन्हीं पर आधारित एक रचना:



ढ़ोंगी!!!

दिखता खुश हूँ पर

भीतर से उदास हूँ!!

हजार कारण हैं...

मंहगाई बढ़ रही है!

रोजगार घट रहे हैं!

किसान मर रहे हैं!

सरकार अपनी कारस्तानियों में व्यस्त है!

एक के बाद एक जादू कर रही है सरकार

मगर फिर भी कहती है कि उनके पास कोई जादूई डंडी नहीं.

वामपंथी नाराज हैं??

बिहारी बम्बई में नहीं रह पा रहे हैं!

बिहारी बिहार में रह कर क्या करेंगे?

कल बात यूपी वालों पर भी आयेगी!

कभी तिब्बत तो कभी कश्मीर!!

गीत को सुर नहीं मिल रहा और गज़ल को काफिया!

हत्यारों को माफी मिल रही है वो भी जिसकी हत्या हुई है उसक घर वालों से!

बेटी अपने आशिक से मिलकर पूरे घर वालों की हत्या कर देती है!

ट्रेन में डकैतियाँ और बलात्कार!

चोरों के नये हथकंडे!

पुलिस डकैत हुई है

और डकैत सरकार!

सेन्सेक्स में गिरावट और गरमी में गले की तरावट का आभाव!

सोना उछलता है, कपास लुढ़कती है!

भ्रष्टाचार तरल से तरलतम हो फैलता जा रहा है

और मानवीय संवेदनायें- जमीं हुई एकदम कठोर!


बिजली गई और पानी आता नहीं!

बांये बांये दांये दांये......उपर नीचे...

हर तरफ कारण ही कारण कि दुखी हो लूँ, उदास हो जाऊँ!!!

खुश कैसे होऊँ??..एक भी कारण नहीं दिखता,,,इस बात से भी उदास हूँ!!

क्या तुम्हारे पास खुशी का कारण है या मेरी ही तरह तुम भी ढ़ोंगी हो!

दिखाने भर को खुश!!

-समीर लाल ’समीर’

( यह सब खबरें एक ही दिन के अखबार से हैं. तारीख क्या बताऊँ-किसी भी तारीख का अखबार उठा लो.) Indli - Hindi News, Blogs, Links