बुधवार, मई 26, 2010

दाल, भात और भाटे पालक की भाजी!!!

”अम्मा, खाना लगा दे”
”क्या हुआ, आज जल्दी जायेगा क्या स्कूल?”
”हाँ अम्मा, वो क्लास के पहिले सुदेश की गणित किताब से कुछ प्रश्न उतारने है. उसके पास अंग्रेजी स्कूल की किताब भी है न.”

अम्मा जल्दी जल्दी भाप छोड़ते भात, अधपकी छितरी राहर की दाल और लगभग पक गई भाटे पालक की भाजी थाली में डाल कर दे देती है और उस पर से आधा चम्मच देशी घी. स्कूल जायेगा, दिन भर पढेगा तो घी से ताकत बनी रहेगी. अम्मा घर पर मलाई से बनाती है अनिल के लिए देशी घी.

अनिल जल्दी अल्दी फूँक फूँक कर खाने लगता है. पूरा खाना बिना खाये ही दिवाल घड़ी पर नजर पड़ती है और वो खाना छोड़ कर भागता है. अम्मा कहती है, अन्न का अपमान नहीं करते बेटा. खाना आराम से खाते हैं. मगर अनिल को तो स्कूल जाने की जल्दी है सो भागता है.

बरामदे से साईकिल निकाल कर, जब तक अम्मा बाहर आये, अनिल आवाज लगा कर निकल जाता है. गली से सड़क पर आकर कोने में ही शर्मा जी की कोठी है जिनकी फैक्टरी में अनिल के पिता जी काम करते हैं. शर्मा जी की कोठी के बाहर एक साथ तीन कारें खड़ी होती हैं. एक शर्मा जी की, एक उनकी पत्नी की और एक शुभि की सफेद वाली दो दरवाजे की. शुभि उसी से स्कूल जाती है.

अनिल के सरकारी स्कूल से पिछली सड़क पर शुभि का कान्वेन्ट स्कूल है तीन मंजिला लाल रंग का.

अनिल को जल्दी स्कूल पहुँचना है, वो तेजी से साईकिल के पैडल मारता है. आज जाने क्यूँ एड़ी में दर्द भी है.

अनिल कक्षा में बैठा है. मास्साब भौतिकी के चुम्बकत्व के सिद्धांत वाला अध्याय पढ़ा रहे हैं अनिल बैन्च पर बैठा अपने खपड़ैल की छत वाले क्लास रुम की खिड़की से बाहर पीछे के वाले स्कूल की ओर ताक रहा है. ढेरों लड़कियाँ उस स्कूल में पढ़ती है. नीला ट्यूनिक और सफेद कमीज पहने. परियों जैसी लगती सब अनिल को उजली उजली सी. सबके बैठने की अलग अलग कुर्सी. दूर से कुछ साफ तो दिखता नहीं, बस बैठा कल्पना करता रहता कि शुभि ही होगी जो खिड़की से दिखाई दे रही है.

एक बार शार्मा जी के दरबान के लड़के से पूछा था तो उसने बताया था कि शुभि भी उसी कक्षा में है जिसमें अनिल पढ़ता है.

दिन में लंच की छुट्टी में अनिल भी दोस्तों के साथ धूल में सतोलिया खेल रहा है. गेंद पीछे झाड़ियों में जाती है. अनिल दौड़कर गेंद उठाने जाता है. उस स्कूल का बड़ी ऊँची ऊँची जालियों का बाड़ा है. बाड़े के उस पार कुछ लड़कियाँ बेड मिंटन खेल रही हैं. कुछ हरी हरी दूब में गोला बना कर गप्प करती खाना खा रही हैं. अनिल ने झाड़ियों के बीच से छुप कर देखा, उसे शुभि दिखाई पड़ी अपनी सहेलियों के साथ बैठे खाना खाते. शुभि खाने में सैण्डविच खाती है.

अनिल लौटकर आ जाता है. अब उसका खेलनें का मन नहीं. क्लास रुम में आकर अपना खाने का डिब्बा निकाल लेता है. अम्मा ने चाव से दो रोटी के साथ आम का अचार रखा है. उसे जाने क्यूँ आज खाना खाने का मन नहीं है. डिब्बा बन्द करके बस्ते में रख देता है. उसे प्यास लगी है. पानी की टंकी तक जाता है. पीछे स्कूल पर फिर नजर जाती है. एक लड़की वाटर बोटल से पानी पी रही है. अनिल टंकी से हाथ धो कर लौट आता है.

शाम को साईकिल से घर लौट रहा है. शुभि की कार शर्मा जी के घर के बाहर खड़ी है जबकि उसका स्कूल अनिल के स्कूल के १५ मिनट बाद छूटता है लेकिन वो हमेशा घर पहले पहुँच जाती है चाहे अनिल कितनी भी तेज साईकिल चला कर लौटे.

रात होने लगी है. अम्मा ने आंगन में खटिया लगा दी है. अनिल खटिया पर जाकर लेट जाता है. अम्मा सर पर तेल मल रही है, और वो चाँद को देख रहा है. वही उसका खिलौना है जिससे वो बचपन से खेलता आया है.

अनिल इन्जिनियर बन गया है. बाबू जी तो उसकी इन्जिरिंग की पढ़ाई खत्म होते ही चल बसे थे और फिर छः महिने में अम्मा भी. अनिल को एक अच्छा ऑफर मिला और वो अमरीका आकर बस गया है. बीबी और दो बच्चों का परिवार है.

दरवाजे पर तीन गाड़ियाँ हैं. एक खुद की सफेद कार दो दरवाजे वाली, एक पत्नी की और एक वैन, जब परिवार के साथ कहीं लम्बा जाना होता है तब के लिए.

ऑफिस जाने को तैयार होता है.

पत्नी ने ब्रेकफास्ट के लिए सेण्डविच लगा दिये हैं और एक सैण्डविच और फ्रूट लंच के लिए पैक कर दिया है. साथ में मिनरल वाटर की ठंडी बोतल.

आज अनिल को सेण्डविच के बदले वो भाप छोड़ते भात, अधपकी राहर की दाल और लगभग पक गई भाटे पालक की भाजी थोड़ा सा घी डाल कर खाने का मन है.

वो पत्नी से कहता है. पत्नी हँस देती है. ”नो भात, नो घी. मोटा होना है क्या?”

कह रही है ”जल्दी निकलो और ये सैण्डविच भी साथ लेते जाओ, ड्राईव करते हुए खा लेना वरना ऑफिस को देर हो जायेगी.”

फिर छेड़ते हुए हंसती है ’ ”हर समय बस खाने में ही मन लगा रहता है मोटूराम का!!”

बेटा पूछ रहा है ”डैडी ये भाटे पालक क्या होता है?”

आज जाने क्यूँ अम्मा की याद आ रही है उसे.

उसकी आँखें नम हैं.

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-समीर लाल ’समीर’

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रविवार, मई 23, 2010

यशस्वी ब्लॉगर भवः !!

आज दिल्ली में ब्लॉगर मीट हो चुकी है. तरह तरह के विचार रखे गये. ऐसे वक्त में किसी भी और विचार से ज्यादा जरुरी यह विचार हो जा रहा है कि जब लोग इस बारे में कल अखबार में पढ़ेंगे तो ब्लॉग खोलना चाहेंगे.

इसी बात को मद्देनजर मैने यह बताता चलूँ कि आजकल जमाना बदल गया है और ब्लॉगिंग करने के लिए किन वस्तुओं की आवश्यक्ता है. अगर आप नीचे लिखी सामग्री एकत्रित कर लेते हैं तो बस फिर देर किस बात की.  आगाज किजिये सफल ब्लॉगिंग के सफर लिए और फिर हम तो बैठे ही हैं प्रथम स्वागत टिप्पणी आरती में कट पेस्ट कर सजाये. आईये तो सही:

monkey

ब्लॉगिंग के लिए अति आवश्यक सामग्री:

  • एक लैपटॉप/ डेस्कटॉप
  • एक कैमरा
  • इंटरनेट कनेक्शन
  • एक मुख्य ब्लॉग अपने नाम का
  • तीन ब्लॉग छ्द्म नामों से
  • ५ बेनामी रजिस्ट्रेशन टिप्पणी के लिए
  • एक हैलमेट
  • एक नेलकटर: वरना सर खुजाते खुद की खोपड़ी जख्मी हो सकती है.
  • एक किताब: २४ दिन में बेसिक भोजपुरी लिखना सीखें.
  • एक गुरु
  • चार चेला
  • गाली-कोश
  • भविष्य के लिए रिवाल्वर का लाईसेन्स: (तब तक अनऑफिसियली तमंचा रखे रहिये)
  • एक वकील
  • दो पत्रकार मित्र
  • कोर्ट से अग्रिम जमानत
  • एक बोतल स्कॉच: गाली पड़े तो गम मिटाने के लिए वरना कभी भी जश्न मनाने के लिए. जश्न मनाने के बहुत मौके आयेंगे जैसे ५० वीं पोस्ट, १०० वीं पोस्ट, १००० हिट्स, १०० फालोवर, एक साल पूरा होना और भी जाने क्या क्या.

अब तो कन्टेन्ट की समस्या से भी जूझने की जरुरत नहीं. किसी की भी कविता उठाओ और कर डालो पैरोडी. बहुत हिट चल रही है. एक मैने भी तो की है बतौर आपके लिए एक्जाम्पल:

पं. माखनलाल चतुर्वेदी से क्षमायाचना समेत:

ब्लॉगर की अभिलाषा

चाह नहीं मैं ब्लॉगर बन के
लेख ठेलता जाऊँ
चाह नहीं सम्मानित होकर
माला से लादा जाऊँ
चाह नहीं साहित्यजगत में
हे प्रभु, खूब सराहा जाऊँ
चाह नहीं मैं कविता लिखकर
कविवर श्रेष्ट कहलाऊँ
मुझे पढ़ लेना ओ साथी
देना तुम टिप्प्णी और पसंद एक
उँची बने पसंद ब्लॉगवाणी पे
जिसे देख आयें ब्लॉगर वीर अनेक.

-समीर लाल ’समीर’

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बुधवार, मई 19, 2010

बहता दरिया है शब्दों का!!

जबलपुर प्रवास में शायद ही कोई ऐसा सप्ताह गुजरता हो जब हमारी और बवाल की अकेले महफिल न जमें. फिर लगभग हर दूसरे तीसरे दिन कहीं न कहीं महफिल जमीं रहती, कभी लोक गीतों की, कभी गज़लो की तो कभी कव्वालियों की तो कभी कविताओं की, उसमें तो खैर बवाल और संजय तिवारी ’संजू’ साथ होते ही.

लाल-बवाल बैठक हो और कोई नई गज़ल, नया गीत न उपजे हमारी कलम से और उसमें बवाल का पुट और फिर गीतों को सुर ताल में ढालना न हो बवाल के द्वारा तो फिर कैसी महफिल.

इसीलिए जब भी भारत जाता हूँ और जबलपुर कितने भी दिन रह जाऊँ, कम ही लगता है. अगर कोई दीगर जरुरी काम न हो और रात घिरे तो यह मान ही लिजिये कि कहीं महफिल जमी है.

उन्हीं महफिलों के दौर में यह गीत उपजा था. बवाल ने इसे अपने स्वर में गाया भी बहुत जबरदस्त था लेकिन वो आलसी इतना कि आज तक रिकार्डिंग ही नहीं मुहैया करा पाया.

शुरु से साथ रहा, छोटा है तो मूँह लगा होना तो स्वभाविक है, इसलिए कुछ कह भी नहीं पाते सिवाय आलस्य त्यागने के लिए लताड़ने के सिवाय. जब लताड़ो, उनका क्या: हँस दिये और कहने लगे, जय हो, महाराज!!

आज सोचा कि अब कब तक गायन का इन्तजार किया जाये, जब आयेगा तब फिर से. रीठेल पर कोई रोक तो है नहीं, फिर लगा देंगे. रोक तो किसी बात पर नहीं है, अभी कोई उठ खड़ा हो और इसकी पैरोडी गाने लगे, तब भी कैसी रोक.

आज टहलते हुए राह में..

बहता दरिया है शब्दों का,
तुम छंदों की कश्ती ले लो!
जब गीत कमल खिल जाएँ तब,
तुम भँवरों की मस्ती ले लो!!

टूटे-फूटे थे शब्द वहाँ,
फिर भी वो गीत रचा लाया!
कोई बहरों वाली बात न थी,
फिर भी वो ग़ज़ल सजा लाया!!

परिहासों की उस बस्ती का,
संजीदा हुक्म बजा लाया!!!
उसने सीखा खाकर ठोकर,
तुम सीख यहाँ यूँही ले लो
बहता दरिया है शब्दों का
तुम छंदों की कश्ती ले लो!

ये मज़हब-वज़हब की बातें,
आपस के रिश्ते तोड़ रहीं!
और सहन-शक्तियाँ भी अब तो,
दुनिया भर से मुँह मोड़ रहीं!!

धर्मों के झूठे गुरुओं की,
तक़रीरें हृदय झंझोड़ रहीं!!!
या दाम चुका कर लो नफ़रत,
या दिल की प्रीत युँही ले लो
बहता दरिया है शब्दों का
तुम छंदों की कश्ती ले लो!
आदर्शों और बलिदानों की,
उसको तो रस्म निभानी है!
हाँ मातृ-मूमि पर न्यौछावर,
होने की वही जवानी है!!

हृदयों को जिसने है जीता,
उसकी ही कोकिल बानी हैं !!!
दिन रोकर काटो या हँसकर,
जो चाहो रीत, यहीं ले लो
बहता दरिया है शब्दों का
तुम छंदों की कश्ती ले लो!


(इस गीत को जब मैने लिखा था, तभी चार जगह तो बवाल नें कैची चला ही दी थी गाते गाते..अब जब सच में गा कर रिकार्ड करेगा तो जाने क्या निकल कर आये. :))

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रविवार, मई 16, 2010

मैं कृष्ण होना चाहता हूँ!!

कोशिश करता हूँ कि जब बारिश होने लगे तब घर के बाहर न निकलूँ. छाते पर बहुत भरोसा बचपन से नहीं रहा, खास तौर पर जब बारिश के साथ तेज हवाएँ भी चलती हों. शायद कोई अनुभव ही रहा होगा जो घर कर बैठा है.

भीगने से तो उतना डर नहीं लगता जितना कीचड़ की छ्प छ्प में पतलून गंदी होने से.

सर भीगा, बदन भीगा तो सूख जायेगा कुछ देर में मगर पतलून पर लगा कीचट तो सूख कर भी दाग छोड़ जाता है.

हमेशा मन चाहा हो नहीं पाता. एक मन की चाहत ही तो है कि सफेद पतलून से लगाव है और कोई रंग भाता नहीं.

इतने जतन पर भी जाने कब, कौन, क्या सोचकर छेद कर गया और इस बारिश में मेरी छत चूने लगी. लगा कि जैसे छत है ही नहीं. सीधे बरसता आसमान और नीचे भीगता मैं.

पूरे घर में पानी पानी और लोगों के पैर में लग लग कर आया कीचड़. हर तरफ बस कीचड़ ही कीचड़. भीगा भी और लाख न चाहते हुए चलना भी पड़ा, ऐसे में पतलून गंदी होना ही थी, कितना बचाता सो हुई.

बारिश थम गई. घर सूखा, बदन सूखा.

सीलन तो जाते जाते ही जायेगी, बदबू बाकी है और पतलून पर लगे कीचड़ के दाग, मुए छूटते ही नहीं.

सफेद पतलून जब तक संभल जाये, तब ही तक वरना गंदगी सबसे पहले उसी पर दिखती भी है और अपने निशान हमेशा के लिए छोड़ जाती है.

और सफेद पतलून पहनने की ऐसी ललक – क्या कहें कि जाती नहीं.

krishna

मैं कृष्ण होना चाहता हूँ!!!

जो दिखा वो मैं नहीं हूँ
बस पाप धोना चाहता हूँ
है मुझे बस आस इतनी
कुछ और होना चाहता हूँ.

जिन्दगी चलती रही है
ख्वाब सी पलती रही है
सब मिला मुझको यहाँ पर
कुछ कमी खलती रही है.

थक गया हूँ ए जिन्दगी
कुछ देर सोना चाहता हूँ.
बस पाप धोना चाहता हूँ
कुछ और होना चाहता हूँ.

आराम कर लूँ दो पहर
मैं चल पड़ूँ फिर उस डगर
मंजिल मुझे दिलवाये जो
करवा सके पूरा सफर..

राह में बन छांव चल दे
वो वृक्ष होना चाहता हूँ
बस पाप धोना चाहता हूँ
कुछ और होना चाहता हूँ.

न बने जब बात प्यारे
टूट कर बिखरे नजारे
मैं चलूँगा हमसफर बन
छोड़ दे जब साथ सारे

जो प्रीत का अहसास दे
वो हाथ होना चाहता हूँ
बस पाप धोना चाहता हूँ
कुछ और होना चाहता हूँ.

कब किसी का साथ दूँगा
सत्य बातों में, गलत में
मांगने की छूट उसको
जो दिखे पहली झलक में

जब युद्ध हो कुरुक्षेत्र का
मैं कृष्ण होना चाहता हूँ
बस पाप धोना चाहता हूँ
कुछ और होना चाहता हूँ.

आत्मशुद्धि के लिए अब
कुछ देर रोना चाहता हूँ
बस पाप धोना चाहता हूँ
कुछ और होना चाहता हूँ.

-समीर लाल ’समीर’

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गुरुवार, मई 13, 2010

मेरा लेखन कचरा है!!

slcar

दो दिन हो गये सारा घटनाक्रम देखते. ढ़ेर प्रशंसक/ चहेते/मित्र सामने आये माननीय ज्ञानदत्त जी की पोस्ट  पर मेरे विषय में टिप्पणी देखकर. जान पाया सबका प्यार. अभिभूत हुआ, लोगों को इस पर नाराजगी भी हुई कि मैं क्यूँ असभ्यता से किये गये विरोध के बावजूद भी अभिभूत हुआ. अनूप जी ने खुल कर पोस्ट के माध्यम से जाहिर किया और किसी ने उस पर टिप्पणी के माध्यम से.

प्रशंसकों का प्यार, भद्र और अभद्र दोनों, अभिभूत करता ही है, भले ही आप अभद्र और असभ्य तरीके से जाहिर समर्थन को उचित न करार दें. मैं भी इसे उचित नहीं मानता किन्तु स्नेह ही तो है जो वो भड़क उठे. मेरी नजर में ,अब भी, ऐसी बात उठाना ही औचित्यहीन है, जो लोगों को भड़काये. क्या जरुरत है?

जिस तरह से असभ्य भाषा में किया गया विरोध या समर्थन गलत है, उसी तरह से ऐसा औचित्यहीन प्रश्न जो इस बात को भड़काये. बात दोनों ओर से ही दूसरे तरीके से कही जा सकती थी. गुस्से में इंसान आपा खो देता है, यह जग जाहिर है.

आज तक मैने, जब भी ब्लॉग जगत की बात आई या मेरे लेखन पर बात आई, हमेशा ही खुल कर कहा है कि अनूप जी ही मुझे गद्य लेखन में लाये. उनसे मैने सीखा, उनका मैं प्रशंसक हूँ और सीख रहा हूँ, फिर तुलना कैसी.

अनूप जी लाख तारीफ करें, मैं हमेशा ही उनके लेखन से सीखने का तत्पर रहा और यह बात वो भी अच्छी तरह जानते हैं. शायद मानते भी हैं.

उनकी मुझसे मौज लेने की प्रवृति भी हमेशा से रही. मुझे कभी नहीं खला. मैने भी उनसे खूब मौज ली. जब बुरा लगा कि जो बात व्यक्तिगत तौर पर उनसे की, उन्होंने जग जाहिर की, उनको बताया और उन्होंने उसे वापस लिया. अपने आलेख को सुधारा.

आज भी उन्होंने अपने आलेख में जाहिर किया कि मैने अपने कमेन्टस में कहा है मैं कठिन समय से गुजर रहा हूँ.जबकि ऐसा मैने कहीं नहीं कहा. मैने बस अपने चाहने वालो से इतना कहा कि जैसा आपने समझा, वैसा आपने लिखा. आपने मुझे संबल दिया, मैं अभिभूत हुआ इस स्नेह के लिए और फिर मैने विवाद से दूर रहते हुए हिन्दी की सेवा की अपील की. एक शाब्द बदल देने मात्र से बात बदल जाती है, इसका ज्ञान तो अनूप जी को है ही, इसमें मैं क्या कहूँ.

उद्देश्य मात्र इतना था कि बात जो बढ़ चुकी है वो शांत हो जाये और लोग पुनः पूर्ववत पहले की तरह सक्रियता से हिन्दी के प्रचार प्रसार में जुट जायें.

मैं कभी अभद्र और असभ्य भाषा का न समर्थक रहा हूँ और न ही इस्तेमाल करता हूँ. समर्थकों के गुस्से में आये बयानों में भी आशा ही कर सकता हूँ कि भाषा की मर्यादा का पालन हो, निवेदन कर सकता हूँ, उससे उपर मेरे वश में क्या है.

मेरे ज्ञान जी से भी मधुर संबंध हैं, मैं उनका सम्मान करता हूँ और मुझे कोई शिकायत नहीं. उन्होंने मेरे लेखन के विषय में जैसा समझा, वैसा लिखा.  सबको सब का लेखन पसंद आये, यह जरुरी नहीं. उन्हें मेरा लेखन नहीं पसंद, वो स्वतंत्र हैं यह कहने के लिए कि मेरा लेखन कचरा है. मैं उन्हें भी नहीं रोक सकता और न ही रोकने की कोई वजह है.

बस, अफसोस इतना है कि नित ईमेल पर बात होने के बावजूद भी और उनकी प्रशंसा की टिप्पणी लगभग हर आलेख पर प्राप्त करते हुए भी इतना बड़ा सत्य वो दिल में छिपाये बैठे रहे और मुझे न जाहिर कर, इसे खुले मंच पर जाहिर किया. सोचता हूँ, क्या सच मानूँ-उनकी प्रशंसा में प्राप्त नित नई टिप्पणी या एक बार जग जाहिर नापसंद का आलेख.

मेरा वश मेरे व्यवहार, मेरे लेखन और मेरे विवेक पर है. कोशिश होती है उसमें भूल न हो.

मित्रों और शुभचिन्तकों ने रोका कि आपकी टिप्पणी विवाद पर ठीक नहीं लग रही. मैने बिना एक क्षण गंवाये रोक दी. इससे ज्यादा मुझसे क्या आशा है, मुझे बताये मैं करने को तैयार हूँ.

निवेदन बस इतना है कि मैं नहीं जानता कि आप कोई भड़काऊ बयान जारी करे अनजाने में भी, तो उसकी प्रतिक्रिया कैसी और किस भाषा में आयेगी.  किन्तु जहाँ भी मुझे लगेगा कि भले ही अभद्र भाषा में, मुझे स्नेह जाहिर किया है, मैं आभार तो व्यक्त करुँगा, भले ही मैं उसकी भाषा का समर्थन न करुँ.

अपने चाहने वालों से और समर्थकों से बस एक निवेदन है कि अब बहुत हुआ. अव्वल तो भाषा का संयम बनाये रखें और दूसरा, किसी के कहने या समझने से अपनी सोच मत बदलें. आप सब समझदार है, संयम से काम लें.

कृपया इस विवाद को विराम दें और आगे हिन्दी की सेवा में तत्पर रहें.

कुछ रात के अंधेरों से अक्रांत
भयभीत
दुबक कर सो जाते हैं

और

कुछ उसी रात के
सितारों की रोशनी में
जीवन की राह खोज लेते हैं.

-यह दुनिया भी कितनी अजीब है.

-अनेक शुभकामनाएँ एवं साधुवाद!!

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बुधवार, मई 12, 2010

अंधड़....

storm
 

जब भी सोचता हूँ मैं
कुछ पल पा जाऊँ
चैन के
और सो सकूँ एक रात
बिना किसी विचार के
बिना किसी इन्तजार के...
अपने में सिमटा मैं...


तब   जाने कैसे
हवा का एक झोंका
जान लेता है
मेरे इरादों को
और आ जाता है
बन कर
अंधड़
मेरी सोच के घोंसले को
उजाड़ने के लिये
और
बिखर कर रह जाता हूँ मैं.

मेरे हमसफ़र
मेरे सहयात्री
करते हैं कोशिशें
ओट देकर मुझे..
हवा की चाल को
कर सकें नाकामयाब

पर
शातिर हवा
फिर नये अण्दाज़ में
आ जाती है
अपने अंधड़ पर
मुखौटा लगाये
पुरबाई का


और तब
वे जो मेरा साथ देने को हुए थे
तत्पर
गंवाने लगते हैं
अपने अपने घोंसले
ताकते हैं मेरी ओर
मैं उठ कर लड़ूँ
हवा से..


नहीं
नहीं
मेरा काम है घोंसला बनाना
और
हवा का उजाड़ना

और फिर हम
अपने अपने काम में जुट जाते हैं
नई लगन के साथ!!!

-समीर लाल ’समीर’

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रविवार, मई 09, 2010

बुक्का फूटा..बुक्क!!!

हमारे पास आँखे हैं तो देखने की सुविधा है. मगर हम बस दूसरों को देख सकते हैं.

काश!! अपनी आँखों से हर वक्त खुद को भी देख पाते.

दर्पण इज़ाद कर लिया है लेकिन दर्पण कब हमेशा साथ रहता है?

दिन में एक या दो बार दर्पण देखते हैं वो भी मात्र खुद को निहारते ही हैं.

खुद के भीतर झांकने का तो खैर समय ही नहीं लेकिन कब दर्पण में देख कर भी अपने को पहचानने की कोशिश की?

शायद यही तरीका होगा जिन्दा रहने का वरना खुद की सही पहचान के बाद तो खुद के साथ रहना भी मुश्किल हो जाये.

infla

वो सामने बैठा

आकाश में ताकता

मूँह में हवा भरता

फिर गाल पर हाथों से

दोनों तरफ एक साथ

तमाचा मारता

और हवा निकलती

आवाज आती....

बुक्क!!

मैं उसे देखता रहता

सोचता

वो क्या कर रहा है?

बेवकूफ!!

वो हर

बुक्क!!!

के बाद मुझे देखता, मुस्कराता

मैं मुस्कराता जबाब में

वो सोचता

ये क्या देख

मुस्करा रहा है?

बेवकूफ!!!

और फिर

आकाश ताकते

मूँह में हवा भरता.....

तमाचा मारता

और

आवाज आती

बुक्क!!

-समीर लाल ’समीर’

 

नोट: कल दिन में एकाएक कुछ वजहों से मॉट्रियल जाना पड़ा. १२ बजे दिन में निकले और ५१० किमी की यात्रा तय कर ४.३० बजे पहुँचे. जरा थकान की वजह से रात कहीं जाना नहीं हुआ और आज सुबह काम खत्म कर ३ बजे वापसी पर रवाना हुए तो ८ बजे रात घर आकर लगे. यही वजह हुई कि न तो कोई ब्लॉग पढ़ना हुआ और न कमेंट करना. अब इत्मिनान से बैठे हैं तो कुछ पोस्ट किया जाये और फिर दो दिन का बचा ब्लॉग पठन शुरु किया जाये.

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बुधवार, मई 05, 2010

४०० वीं पोस्ट और एक गज़ल

आज सुबह किसी कार्यवश ओकविल (मेरे घर से करीब १०० किमी) जाना हुआ. जिस दफ्तर में काम था, उसके समने ही मेन रोड थी, जिस पर साईड वाक बनने का कार्य जोर शोर से चल रहा था. पूरी मिट्टी के जो ढेर लगाये गये थे, उन्हें  बड़ी बड़ी मशीनों से लेवल किया जा रहा था.

दफ्तर से जब काम पूरा करके निकला, तो उस दफ्तर का मालिक भी साथ था. यूँ ही चर्चा में मैने जानना चाहा कि जब यह वाक वे पूरा बन रहा है, तो यह पहाड़ जैसी मिट्टी बीच में क्यूँ छोड़कर दोनों तरफ का काम चालू है, एक लाईन से क्यूँ नहीं करते यह लोग. बेवजह बीच में काम छोड़ कर, गाड़ी दूसरी तरफ ले जाते हैं बार बार, और आगे काम जारी रखते हैं.

तब उसने मुझे थोड़ा पास ले जाकर वो मिट्टी का ढेर दिखाया, जो बीच में लगभग १०० मीटर की जगह घेरा हुआ था. उस पर एक "गूस" महारानी बड़े ठसके से विराजमान थी. बताया गया कि एक रात उसने वहाँ अंड़े दे दिये हैं तो अब जब तक बच्चे नहीं हो जाते, सरकार उतना हिस्सा नहीं छुएगी और बच्चा हो जाने के बाद जब वो चली जायेगी, तब ही उस हिस्से को बनाया जायेगा.

अभी मेन रोड़ की तरफ एक प्लास्टिक की जाली भी लगा दी गई है कि भूल से वो सड़क पर न चली जाये और किसी तेज रफ्तार गाड़ी की चपेट में आ जाये. निर्माण कर्मचारी भी उसे रोज खाने के लिए पॉपकार्न और चिप्स डाल देते हैं ताकि भोजन की तलाश में उसे भटकना न पड़े.

क्या हम कभी ऐसी कल्पना सरकार की तरफ से अपने देश में कर पायेंगे या फिर सिर्फ कागज पर गिनती लगाते रहेंगे कि अब १४११ बाघ बचें हैं?

नीचे चित्र में ये दो गीस (goose (plural: geese)) कल मेरे घर के सामने घास में टहलने आये. पड़ोस में एक छोटा सा तालाब हैं, वहीं रहते हैं. सोचा, आपसे भी मिलवा दूँ.

goose

खैर, यह है मेरी ४०० वीं पोस्ट. बहुत रोचक और दिलचस्प सफर रहा इन ४०० पोस्टों का. टिप्पणी के माध्यम से अब तक लगभग ३५०० लोगों का, अवागमन में लगभग १६४००० लोगों ने और फीडस स्बासक्राईब करने में लगभग ५७० लोगों नें अपना स्नेह और प्रोत्साहन दर्ज किया.

उम्मीद करता हूँ कि आप सबका स्नेह यूँ ही मिलता रहेगा और यह सफर यूँ ही खुशनुमा बना रहेगा.

पिछली बार जो गज़ल साधना की आवाज में आपको सुनवाई थी, उसमें जैसा मैने कहा था तीन शेर किसी और के थे और तीन मेरे. अब फिर से वही गज़ल मगर इस बार इसमें सारे शेर मेरे ही हैं और आवाज साधना की. इस चौथे शतक के मौके पर लुत्फ उठाईये.

11

जाने क्या बात है जो तुमसे बदल जाती है
जिन्दगी मौत के साये से निकल जाती है

नब्ज को छू के वो खुशहाल हुए जाते है
सांस तो रेत है हाथों से फिसल जाती है

देख तो आज के मौसम का नजारा क्या है
ये तबियत भी हमारी तो मचल जाती है

मुझको तो चाँद दिखे या कि तुम्हारी सूरत
दिल की हस्ती मेरी दोनों से बहल जाती है

कैसे जीना है किसी को ये सिखाना कैसा
वक्त के साथ में हर सोच बदल जाती है.

जब भी होता है दीदार तेरा साहिल पर
डूबी कश्ति मेरी किस्मत की संभल जाती है.

बात करने का सलीका जो सिखाया हमको
बात ही बात में नई बात निकल जाती है.

दास्तां प्यार की तुमको ही सुनाई है ’समीर’
दर्द के देश में यह बन के गज़ल जाती है.

-समीर लाल ’समीर’

 

यहाँ क्लिक करके सुनिये:

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रविवार, मई 02, 2010

मजदूर दिवस के मजबूर

मजदूर दिवस पर भाषण देने दिल्ली से नेता जी गांव आये.
मजदूरों के वर्तमान हालात और उसके सुधार एवं मजदूरों के उत्थान के लिए सरकार की भावी योजनाओं पर खुल कर बोले और वापस चले गये.
नन्दु और उसके दो भाई, जिन्होंने तीन दिन रात लग कर सभा स्थल पर मंच का निर्माण किया था, अपनी पेमेन्ट के लिए न जाने कब से भटक रहे हैं.

 

Moon

१.

चाँद
को
देखकर

कवि
को
याद आती है
अपनी महबूबा

और

मजदूर
को
रोटी!!!

hammer

२.

थकान से चूर बदन
कांपते हुए हाथ
माथे से बहती पसीने की धार
और उसने फिर से किया
भारी भरकम हथोड़े से
छैनी पर प्रहार....
बार बार

छन्न्न्न्न्न्न!
छान्न्न्नन्न
छंन्न्न्न

एक पल के लिए
जैसे ही यह लय टूटी

उसे सुनाई दी
घर में इन्तजार करते
बेटे की आवाज

बापू!! रोटी!!!!!!!!

भूल कर अपनी थकान
वो फिर तैयार हुआ
अगला प्रहार
करने के लिए
क्यूँकि
असमर्थ था वह
इस आवाहन को
नकारने में …

-समीर लाल ’समीर’-     

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बुधवार, अप्रैल 28, 2010

साहित्य के ध्रुव

एक गांव में सरपंच जी ने बैठक बुलवाकर घोषणा की कि अब अगले माह तक हमारे गांव में बिजली आ जायेगी.

पूरे गांव में खुशी की लहर दौड़ पड़ी. उत्सव का सा माहौल हो गया. हर गांववासी प्रसन्न होकर नाच रहा था.

देखने में आया कि गांव के कुत्ते भी खुशी से झूम झूम कर नाच रहे थे. यह आश्चर्य का विषय था.

लोगों ने कुत्तों से जानना चाहा कि भई, तुम लोग क्यूँ नाच रहे हो?

कुत्तों ने बड़ी सहजता से जबाब दिया कि जब बिजली आयेगी तो इतने सारे खम्भे भी तो लगेंगे.

मुझे मेरे मित्र ने जब यह किस्सा सुनाया तो प्रथम दृष्टा तो यह चुटकुला ही लगा मात्र हास्य बोध देता किन्तु गहराई से सोचा जाये तो हम इन्सानों में यह आदत क्यूँ नहीं? क्यूँ हम किसी और की खुशी में अपनी खुश होने की वजह खोजने के बदले इर्ष्यावश दुखी होकर बैठ जाते हैं?

खैर, एक विचार उठा तो सुना दिया.

ऐसे ही कुछ समय पहले कुछ विचारों को, कुछ भावों को शब्दबद्ध कर कवि मित्र शरद कोकस जी से बात कर रहा था और उनके मार्गदर्शन में उसी रचना में कुछ सुधार कर यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ:

 

साहित्य के ध्रुव

writing

कीड़े मकोड़ों की तरह
एक दूसरे पर लदे-फदे
सरकते घिसटते कवि कथाकार

माचिस की
डिबियों में ज्यों
अपनी दुनिया बसाये

बिना किसी मकसद
रेंगते भटकते
कागज़ काले करते लोग..

वहीं बुद्धि के विमान में सवार
लोगों को भी
ऐसा ही दिखता है
दुनिया का हाल

अपनी गिद्ध-दृष्टि  से
वे देखते हैं दुनिया
और रचते हैं

एक आधी-अधूरी कविता
या एक निरर्थक कहानी...

जिसे अब साहित्य पुकारा जाता है!!

-समीर लाल ’समीर’

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रविवार, अप्रैल 25, 2010

दिखावे की दुनिया..

अर्थी उठी तो काँधे कम थे,
मिले न साथ निभाने लोग
बनी मज़ार, भीड़ को देखा,
आ गये फूल चढ़ाने लोग...

दुनिया दिखावे की हो चली है. कोई भी कार्य जिसमें नाम न मिले, लोग न जाने- कोई करना ही नहीं चाहता. दिखावा न हो तो बस फिर मैं!!

जिस भी कार्य में मेरा फायदा हो, वो ही मैं करुँगा. संवेदनशीलता मरी. साथ मरी सहनशीलता. अहम उठ खड़ा हुआ दस शीश लेकर. एक कटे और दस और खड़े हो जायें. कोई झुकना ही नहीं चाहता. कोई सहना ही नहीं चाहता.

छोटी छोटी बातें, जो मात्र चुप रह कर टाली जा सकती हैं, वो इसी अहम के चलते इतनी बड़ी हो जाती हैं कि फिर टाले नहीं टलती.

कब और कैसे सब बदला, नहीं जानता मगर बदला तो है.

कुछ दिन पहले किसी बहाव में एक रचना उगी थी:

tree1

 

दो समांतर रेखायें
साथ चल तो सकती हैं..
अनन्त तक..
लेकिन
मिल नहीं सकती...
मिलने के लिए उन्हें
झुकना ही होगा..

आओ!!
थोड़ा मैं झुकूँ
थोड़ा तुम झुको!!

यूँ तो
तुमसे मिलने की चाह में
मैं पूरा झुक जाऊँ
लेकिन
डर है कि
अधिक झुकने की
इस कोशिश में
टूट न जाऊँ मैं कहीं...

और
तुम्हें तो पता होगा!!
टूटे हुए वृक्ष सूख जाया करते हैं!!

-समीर लाल ’समीर’

-आज बस इतना ही!!

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बुधवार, अप्रैल 21, 2010

मजहबी विवाद, साम्प्रदायिकता और ब्लॉग जगत!!

वैसे तो ऐसे मुद्दों पर मैं कभी नहीं लिखता और न ही मुझे इन विषयों में कोई दिलचस्पी है.

मगर इधर काफी सारे आलेख पढ़े, हलचल देखी और जाना उन ब्लॉग्स के बारे में जो मजहब और साम्प्रदायिकता के नाम द्वेष फैला रहे हैं. मेरा कभी इन ब्लॉगस पर जाना नहीं होता, इसलिए ज्ञात नहीं है कि वो क्या लिख रहे हैं, जो अन्य लोगों की परेशानी का सबब बना है. मगर निश्चित ही कुछ न कुछ तो ऐसा लिख ही रहे होंगे जो इतने सारे अन्य लोगों की भावनाओं को भड़का रहा होगा.

वैसे तो लोगों का कहना है कि कुछ पोर्न साईटस भी हैं, जिनसे कम्प्यूटर में वायरस आ जाते हैं. मेरा उस तरफ भी जाना नहीं होता है, जान बूझ कर, अतः वो भी ज्ञात नहीं.

टाईटिल से ही समझ में आ जाता है कि जाना है कि नहीं. क्लिक करके जाना मेरा कर्म है जिसे करने हेतु मुझे अपने विवेक का इस्तेमाल करना होता है. गुगल सिर्फ बताता है. सो ही ब्लॉगवाणी और चिट्ठाजगत कर रहे हैं.

मुझे यह बात अब तक समझ नहीं आती कि आखिर क्या वजह है कि जब आप एक बार जान गये कि वो क्या लिख रहे हैं तो बार बार क्यूँ जाते हैं. क्यूँ उन्हें हिट्स मिलती हैं, क्यूँ उन्हें पढ़ा जाता है या क्यूँ उनके विषय में लिख उन्हें प्रचारित किया जाता है.

सड़क पर पड़े गोबर से तो आप बच कर निकल जाते हैं. दीगर बात है कि कभी भूले से पैर पड़ जाये. गाय को सड़क पर गोबर करने से रोका नहीं जा सकता. उसे उतनी अक्ल ही कहाँ मगर हम तो समझते हैं न और बच कर निकलते भी हैं. नगर निगम हर जानवर के पीछे तो घूम नहीं सकती कि कब गोबर करे और कब हटायें ताकि किसी का पैर न पड़े.

मुझे तो लगता है कि उनका लिखना जितना गलत है, हमारा उन्हें पढ़ना, उससे भड़क जाना और भड़क कर उन्हें प्रचारित करना और भी ज्यादा गलत है. अगर भूलवश आपने पढ़ भी लिया तो भड़क कर जब आप उनके बारे में एक आलेख लिख डालते हैं तो उन्हें इससे प्रचार ही मिलता है. जिसने नहीं पढ़ा, वो भी पढ़ने पहुँच जाता है. उनका उद्देश्य हल हो जाता है और मात खाते हैं आप. फिर क्यूँ नहीं नजर अंदाज करते उन्हें?? इसमें क्या परेशानी हैं?

क्यूँ गोबर हटाने के लिए नगर निगम का इन्तजार करना, बच कर निकलिये न!! वक्त आने पर नगर निगम अपना सफाई कार्य कर लेगी और ये लोग भी हतोत्साहित हो लिखना बंद कर देंगे. जब कोई पढ़ेगा ही नहीं तो यह लिखेंगे किसके लिए और कब तक?

 

माना कि आप डाईविंग में पारंगत हैं, मगर डाईव तो सही जगह लगाओ!!

cat

एक रचना

जोड़ पायें  वो तुरपनें चुनियें
वरना फिर आप उधड़ने चुनिये

दिल की आदत तो है धड़कने की
साथ धड़कें   वो धड़कनें चुनिये

कितनी खबरें लहू से रंग छपतीं
देख कर आप कतरनें चुनिये.

दिल ये   पागल कहाँ बहलता है
ख्वाब भी क्यूँ अनमनें चुनिये.

मजहबी चाल हम समझते हैं
अब  नये और  झुनझुने चुनिये.

-समीर लाल ’समीर’

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रविवार, अप्रैल 18, 2010

वैल्यू ऑफ न्यूसेन्स वैल्यू

शाम हो चली. मौसम तो खैर जैसा भी हो, माकूल ही होता है पीने वालों के लिए. सर्दी हो, गरमी हो या बरसात.

एक गिलास में मुश्किल से १०% स्कॉच, बाकी पूरा पानी और बर्फ (पानी ही तो है).

whiskey

पिओ और झूमो नशे में. सब कहते हैं शराब के नशे में है. डॉक्टर कहता है जितना हो सके, पानी पिओ. ९०% पानी ही है मगर कोई यह कहने को तैयार नहीं कि पानी पिआ है. असर भी पानी का नहीं, शराब का ही महसूस कर रहा हूँ.

मात्र एक छोटा सा हिस्सा. बस १०% मगर न्यू सेन्स वैल्यू ऐसी कि ९०% पानी को झूठला गया.

सही ही कहते होंगे लोग कि आज जो भी वैल्यू है वो न्यूसेन्स वैल्यू की ही है.

आस पास के जीवन में रोज देखता भी हूँ. एक मवाली पूरे मोहल्ले के लोगों को हालाकान किये रहता है.

अपने ब्लॉगजगत में ही देख लो, १०% से भी कम लोग हैं जो संप्रदायिकता और अन्य मसलों को लेकर लिख रहे हैं और झगड़ रहे हैं और बातें, हिन्दी ब्लॉगजगत में तो बस झगड़ा ही मचा रहता है. तू तू मैं मैं ही होती रहती है. बाकी के ९०% जो इससे दूर हैं, अपनी अपनी कलम लिए कथा, कहानी, गीत, कविता लिखे जा रहे हैं, उनकी तरफ किसी का ध्यान ही नहीं. वजह, वही मीडिया वाली. बात सनसनीखेज हो तो खबर बने.

जाने कब तक यह १०% हाबी रहेगा. जाने कब तक हम न्यूसेन्स वैल्यू को ही वैल्यू की तवज्जो देते रहेंगे. सब हमारे हाथ में है फिर भी. हम भी तो सनसनी के आदी हो गये हैं.

यही आदी हो जाना रोज शाम उस १०% स्कॉच की तरफ आकर्षित करता है वरना तो पानी सुबह से शाम तक में कितना पी गये, याद ही नहीं.

 

दो छोटी छोटी कवितायें:

 

गिद्ध

gidhdh

गिरा

आकाश से

पहुँचा नहीं

धरती पर

लूट कर

टुकड़ा टुकड़ा

खा गये

गिद्ध!!

-समीर लाल ’समीर’

 

माँ

india_village

जब भी मैं

पीछे मुड़कर सोचता हूँ..

अपना बचपन

अपना मकान

वो गलियाँ

वो मोहल्ला

अपना शहर

अपना देश..

या

फिर

खुद अपने आप को..

हर बार मुझे

माँ

याद आती है!!

-समीर लाल ’समीर’

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बुधवार, अप्रैल 14, 2010

शब्दों के अर्थ: करे अनर्थ

पड़ोस, याने दो घर छोड़ कर एक ग्रीक परिवार रहता है. मियां, बीबी एवं दो छोटी छोटी बेटियाँ. बड़ी बेटी ऐला शायद ४ साल की होगी और छोटी बेटी ऐबी ३ साल की.

अक्सर ही दोनों बच्चे खेलते हुए घर के सामने चले आते हैं और साधना (मेरी पत्नी) से काफी घुले मिले हैं. साधना बगीचे में काम कर रही होती है तो आस पास खेलते रहते हैं और यहाँ की सभ्यता के हिसाब से उसे साधना ही बुलाते हैं. आंटी या अंकल कहने का तो यहाँ रिवाज है नहीं. जब कभी मैं बाहर दिख जाता हूँ तो मेरे पास भी आ जाते हैं और गले लग कर हग कर लेते हैं.

इधर दो तीन दिनों से हल्का बुखार था और साथ ही बदन दर्द तो न दाढी बनाई जा रही थी और न ही बहुत तैयार होने का मन था इसलिए आज सुबह ऐसे ही घर के बाहर निकल पड़ा. सर दर्द के कारण माथे पर हल्की सी शिकन भी थी. आप कल्पना किजिये कि कैसा दिख रहा हूँगा.

साधना बाहर ही गार्डन में थी और तभी दोनों बच्चे भागते चले आये. छोटी ऐबी हाथ में एक फूल लिए आई, जो उसने वहीं गार्डन से तोड़ा होगा और बड़े प्यार से मुझे दिया. बच्चे का मोह देख कर बड़ी प्रसन्नता हुई और हाल चाल पूछ कर और प्यार करके भीतर चला आया. वो दोनों साधना के साथ खेलने लग गई.

थोड़ी देर बाद बाहर से हा हा की आवाज सुनकर मैं उपर से उतर कर आया कि देखा जाये आखिर माजरा क्या है?

बाहर साधना बच्चों को चाकलेट( गोल्ड पॉट केडबरी) खिला रही थी और उन बच्चों की मम्मी शेनन के साथ जोरदार ठहाके चल रहे थे. मैं आश्चर्यचकित कि ये क्या हुआ? वरना साधना और उसे चाकलेट खिला रही हो जिसने उसके गार्डन से फूल तोड़ा हो. वो कुछ कह भले न पाये मगर चाकलेट, सवाल ही नहीं उठता. मैं तोड़ लूँ तब तो समझो, खाना न मिले.

मेरे बाहर निकलते ही साधना ने मुझसे हिन्दी में कहा कि इतने दिन से कह रही हूँ कि बाल रंगा करो और दाढी वगैरह बना कर बाहर निकला करो, ये देखो प्यारी ऐबी क्या कह रही है?

दरअसल ऐबी ने अपना फूल तो मुझे दे दिया था और ऐला ने अपना फूल जब साधना को दिया तो ऐबी ने उससे कहा कि मैने तो फूल साधना के डैड को दे दिया. बस, साधना जी ऐसा खुश कि क्या कहा जाये. बड़े प्यार से बच्चे को बैठाला गया. घर में से चाकलेट ले जाकर खिलाई गई. कहने लगी कि बच्चों का दिल एकदम साफ होता है, उसमें ईश्वर वास करते हैं, कोई छल कपट तो होता नहीं, जैसा देखते हैं, जैसा उनको लगता है, बोल देते हैं.

खैर, भला हो उसकी मम्मी शेनन का, जिसने उसे समझाया कि बेटा ये साधना के डैड नहीं, हसबैण्ड हैं. मैं भी दिखावे का हा हा हू हू करके लौट आया. और तो रास्ता भी क्या था?

जाने क्यूँ सर का दर्द अचानक बढ़ गया. उपर जाकर बिस्तर पर लेट गया. जरा अमृतांजन भी मल लिया. लेटे लेटे विचार करने लगा तो एकाएक दो बरस पहले का वाकिया याद आया.

तब ऐसे ही पड़ोस में एक कनेडियन परिवार रहता था. पति, पत्नी और एक बच्ची. ढाई तीन साल की छोटी सी, प्यारी सी. एक बार मैं और साधना इसी तरह बाहर बरामदे में थे और मैं उस बच्ची से हैलो हाय में व्यस्त था तो उस बच्ची ने मुझे डैडी कह दिया. मैने उसकी मम्मी की तरफ देखा तो वो भी मुस्करा दी. बच्ची तो बच्ची है, उस नादान को क्या समझ?  साधना ने भी देखा और बस!! शायद वो आखिरी दिन था जब उसने उस महिला से बात की होगी. मिलना जुलना बंद हो गया जनाब!! मूँह फूल कर वापस नार्मल होने में पूरा दिन लगा. अब बताओ, तब बच्चे के दिल में ईश्वर नहीं बैठे थे क्या? क्या कोई छल कपट नें घेर डाला था उस बच्चे को?

शब्द वही, ’डैडी’ या डैड, सामने छोटी सी बच्ची, सुनने वाली साधना वही. मायने कितना बदल गया.

सोचता हूँ शब्द की क्या ताकत-बल्कि ताकत तो संदर्भ की है जिसमें वो इस्तेमाल किया गया और जिस ओर वो इंगित किया गया, वरना तो क्या वो अपने सही के डैडी को डैडी कहती और उसकी पत्नी मुस्करा देती तो साधना का भला मूँह फूलता?

बड़ा अटपटा है यह शब्दों का संसार, इनसे वाक्यों का विन्यास और इनका इस्तेमाल. बड़ा संभलना होता है, बहुत सतर्कता और सजगता मांगता है. जरा चूके और देखो-क्या से क्या हो गया. :) कभी वही शब्द मिठाई दिला जाता है तो कभी वही शब्द-मन मुटाव करा जाता है. 

लेखकों से: चलो, वो तो बच्चे थे, हो गई गल्ती मगर आप तो समझदार हो. शब्द चुनने के साथ साथ कहने, लिखने के बाद एक बार पढ़ कर भी देख लिया करो कि कहीं अर्थ का अनर्थ तो नहीं होने जा रहा है.

 

इसी में से फूल तोड़ा होगा

flower

अपनी एक पुरानी कविता पुनः

शब्द
जब निकल जाते हैं
मेरे
मेरे होठों के बाहर
तो बदल लेते हैं
अपने मानी
सुविधानुसार
समय के
और परिस्थित के साथ

शब्दों के अर्थ
फिर बदलते हैं
पढ़ने वाले की
सोच के साथ
उसकी
इच्छानुसार
उफ़..........
मेरे शब्द
शब्द नहीं
आदमी बन गए हैं

-समीर लाल ’समीर’

 

-एक दोहा-बुखार को समर्पित-

मौसम की इस मार से, ऐसा चढ़ा बुखार..
छोटा बच्चा चीख कर, बाबा रहा पुकार.
-समीर लाल ’समीर’

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रविवार, अप्रैल 11, 2010

एक स्पॉसर्ड आलेख और बिकाऊ कविता

सर्दी की सुबह. घूप सेकने आराम से बरामदे में बैठा हुआ अखबार पलट रहा था गरमागरम चाय की चुस्कियों के साथ.

भाई साहब, जरा अपने स्वास्थय का ध्यान रखिये. इतने मोटे होते जा रहे हैं.ऐसे में किसी दिन अनहोनी न घट जाये, आप मर भी सकते हैं. ये बात हमसे तिवारी जी कह रहे हैं.

भला कैसे बर्दाश्त करें इस बात को. हमने भी पलट वार किया कि भई तिवारी जी, आप दुबले पतले हैं तो क्या अमर हो लिये, कभी मरियेगा नहीं. खबरदार जो इस तरह की उल्टी सीधी बात हमसे की तो और वो भी सुबह सुबह.

मैने उन्हें समझाया कि जब मिलो तो पहले नमस्ते बंदगी किया करो. हाल चाल पूछो, यह क्या नई आदत पाल ली कि मिलते ही मरने की बात कहने लगते हो.

तिवारी जी इतने ढीट कि जरा भी विचलित नहीं हुए. बस मुस्कराते रहे और कुर्सी खींच कर बैठ गये और कहने लगे कि चाय तो पिलवाईये.

खैर, पत्नी उनके लिए चाय लेकर आई. नमस्कार चमत्कार हुआ और पत्नी भी वहीं बैठ गई.

अब तिवारी जी उनसे बातचीत करने लगे कि भाभी जी, आप कोई नौकरी करती हैं क्या?

पत्नी से ना में जबाब पाकर उनकी मुद्रा एकदम चिन्तित बुजुर्ग सी हो गई और वह कह उठे कि भाभी जी, कहना तो नहीं चाहिये मगर यदि कल को भाई साहब को कुछ हो जाये तो आपका क्या होगा? कैसे गुजर बसर होगी?

मेरा तो गुस्सा मानो सातवें आसमान पर कि सुबह सुबह यह क्या मनहूसियत फैला कर बैठ गये तिवारी जी. मगर घर आये मेहमान को कितना कुछ कह सकता है भला कोई और यदि गहराई में उतर कर सोचा जाये तो ऐसा हो भी सकता है किसी के भी साथ, कभी भी.

मौत के नाम पर वैसे भी दार्शनिक विचार मन में आने लगते हैं इसलिए मैने संयत स्वर में कहा कि जो उपर वाले की मरजी होगी सो होगा. उसकी छत्र छाया में दुनिया पल रही है तो इनका क्या है. आपकी पत्नी भी तो नौकरी नहीं करती, कल को आपको ही कुछ हो जाये तो उनका क्या होगा? इस प्रश्न से मैने अपनी कुटिल सोच का परिचय दिया.

तिवारी जी तो मानो इसी बात को सुनना चाह रहे हों. बस एक चमक आ गई उनके चेहरे पर. कहने लगे भाई साहब, हमने पूरा बंदोबस्त कर रखा है. मान लिजिये यदि कल को हमें कुछ हो जाता है तो जिस आर्थिक स्थिति में हमारी पत्नी आज है, उससे बेहतर स्थिति में हो जायेगी. इतनी बेहतरीन बीमा पॉलिसी ली है कि मेरे मरते ही २५ लाख रुपये पत्नी के हाथ में होंगे.

बस, इतना सुनते ही अब तिवारी जी को बोलने की जरुरत न रही और हमारी पत्नी हमारे पीछे पड़ गईं कि आप भी बीमा कराईये अपना और मानो तिवारी जी तो आये ही उसी लिये थे. तुरंत झोले से फार्म निकाल कर भरने लग गये. दोनों की तत्परता और अधीरता देख जरा घबराहट भी होने लगी कि कहीं शाम तक निपट ही न जाने वाले हों और इन दोनों को मालूम चल गया हो इसलिए हड़बड़ी मचाये हैं.

सारी कार्यवाही पूरी करके चैक आदि लेकर जब चलने को हुए तो तिवारी जी ने पहली बार कायदे की बात की कि ईश्वर आपको लम्बी उम्र दे. काश, ऐसी नौबत न आये कि भाभी जी को बीमा का भुगतान लेना पड़े.

सोचता हूँ धंधा जो न करवाये सो कम. बीमा एजेन्ट अगर मौत का डर न दिखाये तो भला फिर खाये क्या?

एक रचना, उन्हीं के नाम समर्पित: (एक बीमा कम्पनी के लिए लिखी थी मगर पैसे नहीं मिले :)- किसी और बीमा कम्पनी को चाहिये, तो कृपया संपर्क करें, कविता बिकाऊ है- स्पेशल ऑफर-कविता के साथ मुण्डली फ्री :))

insurance 

बीमा महात्म!!

सुख की नींद सुलाता बीमा
घर घर राहत लाता बीमा.

कच्चा घर जब टूट चला हो
बनता गजब सहारा बीमा.

बीच भंवर जब नैया डूबे
बनकर नाविक आता बीमा.

खुदा करे सब ठीक रहे तो,
वापस किश्त दिलाता बीमा.

घबराने की बात नहीं है,
किश्तों में हो जाता बीमा.

-समीर लाल ’समीर’

एक मुण्डली:

बीमा का एजेन्ट है कि तोते का अवतार
प्रतिपल वो तो रट रहा, बीमा बीमा यार.
बीमा बीमा यार कि किश्तों मे ये भरता है
बुरे वक्त मे बहुत मदद, ये ही तो करता है.
कहे समीर कविराय, खुशी से हो जो जीना
आप आज ही करवा लो, अपना भी बीमा.

-समीर लाल ’समीर’

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बुधवार, अप्रैल 07, 2010

ये लिजिये विडियो और गिलहरी

रोज सुबह जागकर जब खिड़की के पास आकर बैठता हूँ तो छम्म से एक गिलहरी आकर खिड़की के पास बैठ जाती है. आंगन में खेलती है और थकती है तो फिर खिड़की के पास आकर सुस्ता लेती है. पहले जैसे ही उसकी तरफ देखता था, भाग जाती थी और खेलने लगती थी. फिर थोड़ी देर में आ जाती थी.

अब देखता हूँ तो डरती नहीं, भागती नहीं. इन्तजार करती है कि कब मैं उठूँ, दरवाजा खोलूँ और उसे मूंगफली खिलाऊँ. महिनों से सिलसिला जारी है. किसी दिन जानबूझ कर खिड़की की तरफ न देखूँ तो पंजों से कांच पर खटखटाने लगती है मानो पूछ रही हो: नाराज हो क्या? मूँगफली नहीं खिलाओगे?

कभी कोई दोस्त नाराज होता है तो मुझे भी यही आदत है कि खटखटा कर पूछ लेता हूँ कि नाराज हो क्या? अक्सर तो लोग जबाब दे देते हैं मगर जब कोई मेरे पूछने पर भी जबाब नहीं देता तो तकलीफ होती है. शायद वो मित्र इसे पढ़े तो समझें. जिदगी तो एक ही है. जितनी भी मिल जाये, छोटी सी कहलायेगी. इसमें क्या किसी से नाराजगी पालना और वो भी बिना वजह बताये.

खैर, इसी गिलहरी को मैने नाम दिया चिन्नी..अब तो शायद अपना नाम समझने लगी है क्यूँकि जैसे ही आवाज लगाता हूँ, जहाँ भी होती है, भागी चली आती है. मिलेंगे उससे:

चिन्नी खाना खाते:

g1

डोन्ट डिस्टर्ब:

g2

मूँगफली तो दो:

g3

तो अदा जी और ताऊ ने मिलकर इसी गिलहरी का खुलासा किया था. अब उस दिन की संगीत संध्या से कुछ छोटे हिस्से. हमारे और साधना के. अदा जी और संतोष जी का विडियो जल्द ही अदा जी प्रस्तुत करेंगी.

समीर: बस एक स्टेन्जा- एक कवि से राग भैरवी गाने की उम्मीद न पालें कृप्या जैसा कि अदा जी ने सोचा था, :)

 

अच्छा, ये सुन लिजिये, दूसरा वाला पूरा

 

अब मूड जरा ठीक करने के लिए, साधना के द्वारा प्रस्तुत गज़ल, जिसमें कुछ शेर हमारे लिखे हैं. दरअसल शाम को साधना ने बताया कि बस तीन शेर ही याद आ रहे हैं - अब?? हम भी ठाने बैठे थे तो लिख मारे तीन ठो शेर और तुरंत और बस, थमा दिये. बहाना कुछ बचा नहीं तो सुना गया कि साधना का गला खराब है, ऐसा उसी का कहना है.

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रविवार, अप्रैल 04, 2010

ब्लॉगर मीट- परिवारिक मीट-संगीत संध्या

कल याने ३ अप्रेल को स्वप्न मंजुषा शैल याने अदा जी का अपने पतिदेव संतोष शैल जी और बिटिया प्रज्ञा के साथ आना हुआ. मात्र ४०० किमी की दूरी तय करने में निर्धारित कार्यक्रम से बस २ घंटे देरी से (रेल्वे के हिसाब से तो राईट टाईम ही कहलाया) आप लोग आये. :)

तय था कि लंच साथ में करेंगे लेकिन इन्तजार करते जब फोन पर पता चला कि दोपहर ३.३० बजे तक आना होगा तो थोड़ा सा शरम त्यागते हुए मैने और साधना ने खाना खा लिया. सोचा था कि इनके आने पर थोड़ा थोड़ा फिर से खा लेंगे और बतायेंगे ही नहीं इ खा चुके हैं. ऐसा हो नहीं पाया और फिर तीनों मेहमानों को अकेले ही खाना पड़ा.

खाना खाकर तमाम तरह की बातचीत का सिलसिला चल पड़ा और फिर शाम ७ बजे से हमने अपने ४/५ मित्रों को सपरिवार डिनर पर इन्वाईट कर लिया था ताकि संतोष जी और अदा जी के गीत भरी शाम का लुत्फ हमारे मित्र भी उठा लें.

देखते देखते शाम भी हो गई. बेसमेंट हॉल में ही महफिल जमी और यह महफिल एक यादगार शाम में तब्दील हो गई. एक से एक बेहतरीन गाने संतोष जी और अदा जी ने गाये.

हमने मौका तड़ कर अदा जी को याद दिलाया कि वो कवयित्री भी है तो कुछ कवितायें सुनायें. इच्छा यह थी कि रिस्पॉन्स में वो भी कहेंगी कि आप भी सुनाईये और ऐसा ही हुआ. :) मौके की नजाकत और आतिफ असलम से रीसेन्टली मिली प्रेरणा के मद्देनजर हमने अपना गीत गाकर सुनाया और वो भी एक नहीं, दो दो!! फिर हमारी लिखी गज़ल का साधना जी ने गायन किया. आपको ज्यादा अंदाजा लगाने की जरुरत नहीं, यह सब उपस्थित लोगों द्वारा काफी सराहा गया. अदा जी की कवितायें (भी) श्रोताओं नें बहुत पसंद की.

महफिल रात २ बजे जाकर डिनर के साथ समाप्त हुई. सुबह उठकर संतोष जी, अदा जी और बिटिया प्रज्ञा नाश्ता करके ऑटवा निकल गये. लगा ही नहीं कि पहली बार मिले हैं. अब तो फोन भी आ गया कि टोरंटो का बाजार घूमने के बाद वे ऑटवा अपने घर पहुँच चुके हैं.

एकाएक बने कार्यक्रम से उपजी यह मुलाकात और यादगार गीतों भरी शाम वाकई आनन्ददायी रही. विडियों जल्द ही पेश करते हैं अभी दो चार फोटो देखकर काम चलायें.

साधना एवं अदा जी
adsadh
रिहर्सल
adsantosh
घर के सामने
group
मित्रगण
mitra
कार्यक्रम शुरु होने के पहले: माईक टेस्टिंग!!
rehars
समीर, संतोष जी और अदा जी
samsantadaji
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गुरुवार, अप्रैल 01, 2010

समेटना बिखरे भावों का- भाग २

अभी १० दिन पहले ही इसका भाग १ प्रस्तुत किया था. देखता हूँ तो पाता हूँ कि अपने भावों को इतना बिखेर चुका हूँ यहाँ वहाँ कि समेटने में भी समय लगेगा. कुछ और समेट लाये बिखरे भावों को और प्रस्तुत है आपके लिए.

चुप रहना भी कोई, मेरी मजबूरी तो नहीं,
हर बात जुबां से बोलूँ, कोई जरुरी तो नहीं.

*


जिन्दगी यूँ ही तो, भटक नहीं जाती..
उसकी गली को हर सड़क नहीं जाती..

*


अपने जख्मों पर कुछ यूँ भी मुस्कराता हूँ मैं..
याद वो आ जाये तो खुद को भूल जाता हूँ मैं..

-मुस्कराने की खातिर, एक जख्म कुरेदा है अभी.

*


वो अपनी हरकतों से बाज नहीं आयेगा
बिना खिलाफत राम राज नहीं आयेगा.
नाकामियों से अपनी निराश मत होना,
बिना कोशिशों के ये ताज नहीं आयेगा.

*


petals

जानता हूँ ये जिन्दगी आगे है,
पीछे छूटी वो सिर्फ कहानी है...

न जाने क्यूँ फिर भी,
मुड़ मुड़ के देखता हूँ मैं!!

*


मेरे पीने से परेशाँ लोगों,
तुमसे एक गुजारिश है
परेशाँ होने का गर ऐसा शौक है
तो मेरे पीन की वजह खोजो!

जिसे तलाशता हूँ मैं!!

*


इस दुनियाँ की चमक में,
मैं बहक न जाऊँ कहीं..

-चश्मा शायद रंग बदले!!

*


ओह!! कितना विस्तार
है इस सागर का...
सौम्य और शान्त

जाने कितना गहरा होगा
उतरुँ
तो जानूँ...

*


गुलाब की चाह
और
कांटो से गुरेज..

जरुर, कोई मनचला होगा!!

*


सांप पालने का शौक है
तो
सांप पालने के
गुर भी जानता हूँगा!!

ये कोई शिगूफा तो नहीं!!

*


तलाशता हूँ
कुछ रंग
अपने चेहरे के लिए
-दुनिया की भीड़ में
गुम हो जाना चाहता हूँ...

*


खुश होने की ख्वाहिश लिए
मन फिर से उदास है बहुत...

-कहीं कोई ख्वाब टूटा है अभी

*

बाकी फिर कभी!!

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सोमवार, मार्च 29, 2010

प्रेरणा कैसी कैसी!!

 

कभी किसी को देख सुन कर वो आपको इतना अधिक प्रभावित करता है कि आपका प्रेरणा स्त्रोत बन जाता है. आप उसके जैसा हो जाना चाहते हैं. ठीक ठीक उसके जैसा न भी हो पाये तो आपको आगे बढ़ने और अभ्यास करने हेतु वो प्रेरणा तो होता ही है.

कितने ही गायको के प्रेरणा स्त्रोत और आदर्श मुकेश, लता मंगेशकर, रफी होंगे. जाने कितने खिलाड़ी क्रिकेट में तेंदुलकर को अपना आदर्श बना कर खेलते हैं.

इस तरह के प्रेरणा स्त्रोत आपको बेहतर और बेहतर करने की ताकत देते हैं. आपको प्रभावित करते हैं. लेखन में भी तो ऐसा होता है.

लेकिन इससे इतर भी स्थितियाँ बनती हैं, जब आप किसी को कुछ करता देखते हैं तो उसे देख आपमें एक आत्मविश्वास आ जाता है कि अरे, जब ये कर ले रहा है तो हम क्यूँ नहीं? इससे बेहतर तो हम ही कर लेंगे.

मुझे याद है, जब हम सी ए कर रहे थे. एक मित्र जो हमारे रुम मेट हुआ करते थे, हमसे ६ महीने सीनियर थे मगर अक्सर सवाल समझने या डिस्कस करने हमारी डेस्क पर चले आते. उनके पास हो जाने ने हमें जबरदस्त आत्मविश्वास दिया कि जब ये पास हो सकते हैं तो हम क्यूँ नहीं. बस, उन्हीं का चेहरा याद कर कर देखते देखते हम पास हो गये.

कल टोरंटो में श्रेया घोषाल और आतिफ असलम का शो था. सच्चे भारतीय होने का धर्म निभाते हुए हमने अपने और अपनी पत्नी के लिए वी वी आई पी का पास जुगाड़ लिया. एकदम स्टेज के नजदीक बैठे.

कार्यक्रम की शुरुवात जबरदस्त रही और प्रथम आधा भाग श्रेया घोषाल ने संभाला. दिल थाम कर सुना गया. जबरदस्त!! आनन्द आ गया.

द्वितीय भाग में उतरे आतिफ असलम.

आतिफ!! आतिफ!! आतिफ!! की आवाजों से हॉल गुँज गया.

आतिफ आये. १.३० घंटे तक मंच पर संपूर्ण नशे की सी हालत में बने रहे, शायद ज्यादा पी ली होगी और उसे देख देख, सुन सुन मुझ जैसे व्यक्ति में जबरदस्त आत्मविश्वास का संचार हुआ.

हाय!! क्यूँ मैं लोगों की बातों में आकर अपनी कविता और गीत पढ़कर सुनाता रहा. मैं तो बड़े आराम से गा कर सुना सकता था और पब्लिक चिल्लाती: समीर!! समीर!! समीर!!

बन्दे में आत्मविश्वास कहो या नशे की गिरफ्त. पूरे १.३० घंटे झिलवाता रहा और पब्लिक टिकिट का पैसा देकर झेलती रही. नये जमाने की लड़कियाँ तो झूम कर नाचीं भी. हम तो फ्री के पास पर थे तो अंतिम गाना खत्म होने के पहले ही निकल लिये.

आतिफ की फोटो भी खींच ली है. अपनी डेस्क पर फ्रेम करा कर रखूँगा कमप्यूटर के बाजू में ताकि सनद रहे और आत्म-विश्वास बना रहे.

इन्तजार है जब हॉल में हल्ला गुँजेगा: समीर!! समीर!! समीर!! ..शायद लड़कियाँ नाचें भी, कौन जाने!!

क्या आपके साथ भी ऐसा होता इस तरह का आत्मविश्वास वर्धन!

shreyaatif

चलते चलते:

मैं भी उसे चाहता हूँ,वो भी मुझे चाहती है 
प्यार का सबूत है ये, और कैसा चाहिये
शादी ब्याह बात कुछ, प्यार से अलग है जी
बाबू जी की हाँ के लिए, थोड़ा पैसा चाहिये.
शादी हुई बाद में ये, घर भी उसी का है जी
मोटर जो दे दोगे तो उसमें ही घुमाऊँगा
उसकी तो बात छोड़ो, वो तो मेरी बीबी होगी.
मैं तो इतना सीधा हूँ, साली को भी चाहूँगा.

-समीर लाल ’समीर’

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बुधवार, मार्च 24, 2010

निंदिया न आये-जिया घबराए

 

awakening

देर रात गये सोने की कोशिश मे हूँ. नींद नहीं आती तो ख्याल आते हैं. अकेले में ख्याल डराते है और इंसान अध्यात्म की तरफ भागता है भयवश. यह इन्सानी प्रवृति है, मैं अजूबा नहीं.

आधुनिक हूँ तो आधुनिक तरीके अपनाता हूँ अध्यात्म के. बड़े महात्मा जी का आध्यात्मिक प्रवचन सीडी प्लेयर में लगा कर उससे मुक्ति के मार्ग के बदले नींद का मार्ग खोजने में लग जाता हूँ. नीरस बातें नींद में ढकेल देती हैं. नीरसता टंकलाईज़र (नींद की गोली) का काम करती है.

जो हमें अपनी पहुँच के बाहर दिखता है, जिससे हम भौतिक रुप से, रुपये पैसे से लाभांवित नहीं होते, वो हमें हमेशा ही नीरस लगता है. ज्ञान प्रप्ति के नाम पर कभी कैमिस्ट्री भी पढ़ी थी, तब मजबूरी थी परीक्षा पास करना. आज मजबूरी है, पाप कर्मों के बोझ से खुद को अकेले में उबारना, तो यही मार्ग, भले ही नीरस हो, बच रहता है.

कुछ देर मन लगा कर सुनता हूँ. महात्मा जी के कहे अनुसार, जीवन रुपी नैय्या से इच्छायें, चाह, लालच और वासना की गठरी उठा उठा कर फैंकता जाता हूँ पाप की बहती दरिया में. खुद को हल्का किये बगैर उपर नहीं उठा जा सकता, महत्मा जी मात्र १०० रुपये लेकर सीडी में समाये कह रहे हैं. मैं सुन रहा हूँ. कहते हैं चाहविहिन हो जाओ तो मुक्ति का मार्ग पा जाओगे और यह जीवन सफल हो जायेगा.

सोचता हूँ कि क्या मुक्ति का मार्ग पाना भी एक चाह नहीं? क्या चाहविहिन होने की चेष्टा भी एक चाह नहीं? क्या आमजन से उपर उठ अध्यात्मिक हो जाना भी एक चाह नहीं? जब एक चाह की गठरी को पाप की नदिया में फैंका सिर्फ इसीलिये कि दूसरी चाह की गठरी लाद लें, तो क्या यह व्यर्थ प्रयत्न और प्रयोजन नहीं?

एक तरफ मैनें पैसा कमाने का लोभ त्यागा ताकि मैं लोभ मुक्त हो जाऊँ किन्तु वहीं यह लोभ पाल बैठा कि इससे मैं मुक्ति का मार्ग पा जाऊँ. शांत चित्त हो जाऊँ.

एक अंतर्द्वन्द उठता है.

मानव स्वभाव से बाध्य हूँ. चाहत की जो गठरियाँ अर्जित कर ली है, उसे फेंकने में दर्द सा कुछ उठता है किन्तु नई चाहत की नई गठरी तपाक से आकर जुट जाती है. प्रवचन सुन सुन कर ऐसी ही कितनी चाहतों की गठरियों का आना तो अनवरत जारी है लेकिन फैंकना, बहुत मद्धम गति से हो पाता है. अगर ऐसा ही चलता रहा और नई गठरियाँ इसी गति से जुड़ती रहीं तो वो दिन दूर नहीं, जब यह नाँव डगमगा जायेगी और सारा बोझ लिए इसी पाप की दरिया में डूब जायेगी. अब तो एक चाहत और जुड़ गई कि किसी तरह नैय्या डूबने से बची रहे.

स्वामी जी बोल रहे हैं सीडी प्लेयर में से और मैं अपने मन की बात सुनने में व्यस्त हूँ. मन भारी पड़ रहा है उन सिद्ध महात्मा जी की वाणी पर. खुद को कब नीचा दिखा सकते हैं खुद की नजरों में? वरना तो सो गये होते.

इस बीच स्वामी जी और भी न जाने क्या क्या बोल गये, मैं सुन नहीं पाया और एलार्म से नींद खुली तो सीडी प्लेयर से घूं घूं की आवाज आती थी. जाने कब स्वामी जी ने बोलना बंद कर दिया. रात बीत चुकी है और प्लेयर अब भी चालू है.

प्लेयर ऑफ कर फिर तैयार होता हूँ एक नया दिन शुरु करने को. नींद पूरी हो गई है तो फिर दिनचर्या में जुटने की तैयारी करता हूँ.

क्या पाप, क्या पुण्य, कैसा मुक्ति मार्ग? सब अब रात में सोचेंगे जब दिन भर की थकन के बाद भी मन कचोटेगा और नींद आने से मना करेगी.

सोचता हूँ कि जिस दिन सी डी प्लेयर घूं घूं बोलता रह जायेगा और हम कभी न उठने के लिए सो चुकेंगे, उस दिन हिसाब किताब होगा, तब खाता बही देखेंगे कि नांव में कितनी कौन सी वाली गठरियाँ बाकी रह गई हैं.

उस हिसाब का बैलेंस भला कौन जान पाया है.

१०० रुपये बेकार ही गये लगता है सी डी खरीदने के. इससे बेहतर तो नींद की गोली खरीदते, जरा सस्ती पड़ती तो अगले दिन के पाप कर्म भी कुछ कम ही होते पुनः उस दिन की रोटी जुगाड़ने की चाह में.

 

कुछ मुश्किलों को सुलझाने की खातिर
खुद को ही उलझाता चला जाता हूँ मैं

दर्पण में यूँ अजनबी नजर आता हूँ मैं...

-समीर लाल ’समीर’

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रविवार, मार्च 21, 2010

समेटना बिखरे भावों का- भाग १

भावों और विचारों का क्या है? वक्त बेवक्त किसी भी रुप में चले आते हैं. कभी दर्ज कर लिया, कभी छूट गये.

दर्ज कर लिया तो एक दस्तावेज के रुप में सहेजने का दिल हो आता है. कुछ छोटी छोटी पंक्तियाँ अपनी ही तस्वीरों पर दर्ज कर के कभी ऑर्कुट पर, कभी फेस बुक पर मित्रों की मंडली में सांझा करता रहा हूँ. कुछ इस ब्लॉग पर भी.

कल दिल हो आया कि जब सब कुछ लेखनी का दर्ज करके इस ब्लॉग पर रखा हुआ है, तो फिर वो भाव यहाँ वहाँ क्यूँ बिखरे पड़े रहें.

बस, उसी प्रयास में, यहाँ वहाँ बिखरी पंक्तियाँ. इत्मिनान से पढ़िये, शायद पसंद आयें:

 

कभी मौसम, कभी झील में डूबे चाँद
और फिर तुमको, चुपके से देखता हूँ..

-शायद कोई कविता रच रहा है कहीं.

एक तारों भरा आकाश है..
मुझे रोशनी की तलाश है.


जहाँ से कुछ इस तरह गुजर जाना
धुँआ सा बन फिज़ा पर बिखर जाना
लहर बन कर समा मस्त लहरों में
फ़लक पर बन सितारा उतर जाना.

डूबती शाम,
खुद को खुद से
मिलवाता हूँ मैं..
डर जाता हूँ मैं..

वो डायरी मे गज़ल लिखते हैं,
पन्ना पन्ना गुलाब न हो जाये.


यूँ तन्हा, गुमसुम बैठा सोचता हूँ मैं..
कि क्यूँ कुछ सोचता नहीं...

यह धूप मुझे कभी नहीं भाती है..
बड़ी अजीब सी परछाई बनाती है..


रात भर चाँद छत पर, कराहता रहा..
जाने क्यूँ, तू मुझे याद आता रहा..

बगिया बगिया घूम के देखा
फूल तोड़ना सख्त मना है..
कांटो की रक्षा की खातिर
कभी न कोई नियम बना है.

भूगोल की बात जबसे, इतिहास हो गई
रिश्तों के बीच मानिये, मिठास खो गई
वादा निभाने को वो न लौटे समीर
हर शाम जिंदगी बस उदास हो गई.

हालात मेरे देख कर
गांव में कोई कहता था-
नशे में हवा का बे?
बुद्ध बनबा का?

-कितना सच कहता था
वो अज्ञानी!!

किसी से कोई शिकायत नहीं
और किसी से कोई गिला नहीं,
मेरी हस्ति को जो मिटा सके,
ऐसा अब तक कोई मिला नहीं.

pearls

उस मकां से ग्रामोफोन की आवाज़ आती है
कहते हैं वो लोग कुछ पुराने ख़्यालात के हैं..
रात भर चाँदनी सिसकती रही, छत पर उनकी
वो समझते हैं कि दिन अब भी बरसात के हैं.

 

जिन्दगी से इतने करीब से मिला हूँ मैं
कि अब किसी भी बात पर चौंकता नहीं.



तुम्हारे प्यार ने दुनिया मेरी बदल डाली
रात के चाँद में दिखती है सुबह की लाली.



बाकी, फिर कभी भाग २ में. आज के लिए इतना ही.

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बुधवार, मार्च 17, 2010

शब्दचित्र कलाकृति हैं..

कहते हैं शब्दचित्र कलाकृति हैं, हृदय में उठते भावों के रंग से कलम की कूचि से कागज पर चित्रित.

कवि, शब्दों को चुनता है, सजाता है, संवारता है और उन्हें एक अनुशासन देता है कि शब्द अपने वही मायने संप्रषित करें जिनकी उनसे अपेक्षा है.

हर शब्द नपा तुला, रचना को संतुलित रखता और अन्य शब्दों के साथ मिल कर, अपनी गरिमा को बरकरार रखते हुए, पूरी रचना को एक आकृति प्रदान करता.

काव्य सृजन एक कला है और कवि एक कलाकार.

akshar

ऐसे में न जाने क्यूँ मेरे साथ अक्सर अनहोनी सी बात हो जाती है, तब सोचता हूँ कि जाने कैसे होते होंगे वो कलाकार:

शब्द
जब निकल जाते हैं
मेरे
मेरे होठों के बाहर
तो बदल लेते हैं
अपने मानी
सुविधानुसार
समय के
और परिस्थित के साथ

शब्दों के अर्थ
फिर बदलते हैं
पढ़ने वाले की
सोच के साथ
उसकी
इच्छानुसार
उफ़..........
मेरे शब्द
शब्द नहीं
आदमी बन गए हैं

-समीर लाल ’समीर’

कौन जाने सिर्फ मेरे साथ ही ऐसा होता है? मेरे साथ तो अनहोनी धटनाओं की फेहरिस्त है, आदत सी है मुझे इनके साथ जीने की:

ladys

आज अजनबी सी लग रही थी

अपनी परछाई..

बस, ऐसे में

न जाने क्यूँ..

तुम याद आई!!

-मौसम बदल रहा है...
देर शाम धूप नहीं रहती अब!!

-समीर लाल ’समीर’

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रविवार, मार्च 14, 2010

सो कॉल्ड एलीट ग्रुप

सो कॉल्ड एलीट ग्रुप- तथाकथित अभिजात्य वर्ग. आम लोगों की पहुँच से बाहर. आम जन के मानस पर हर वक्त यह छाया रहता है कि जाने कैसी दुनिया होगी उनकी.

एलीट वर्ग में कोई यूँ ही तो नहीं आ जाता-जरुर व्यस्त रहते होंगे. आम जन के बीच बैठ समय बिताने लगें तो फिर काहे के एलीट. बात समझ में आती है. लेकिन उनकी बात समझने में दिक्कत होती है जो आमजन से दूरी मात्र इस कारण कर बैठे हैं ताकि आमजन उन्हें एलीट समझे.

पर्याप्त दूरी बनाये रखने के लिए वो लबादा ओढ़े भले ही घर में दिन के उजाले में सोते रहेंगे और रात गये अँधेरे में यह पता करने धीरे से आकर झाँक जायेंगे कि आमजन ने मुझे एलीट समझना शुरु किया कि नहीं.

एक भय भी रहता होगा उनके मन में कि कहीं लोग पहचान न जायें कि मैं एलीट हूँ ही नहीं, बना एलीट हूँ. ये बात उन चार खास दोस्तों तक ही बनी रहे जो मेरे साथ खुद भी इस नाटक में शामिल हैं, तो ही ठीक. यह भी डर होता होगा कि कहीं उन चार में से एकाध एलीटता से उकता कर वापस अपने मूल खेमें में जाकर भंडा फोड़ न कर दें कि हम चारों रंगे सियार हैं.

ऐसे भयाक्रांत हो जीने से तो बेहतर है कि मूल खेमे में ही रहते हुए जीवन गुजारे भले ही कुछ कम सक्रियता रहे. सक्रियता तो यूँ भी एलीट दिखने के चक्कर में खत्म सी हो ही चुकी है.

हर समाज में तो हर तरह के लोग होते हैं कुछ अति सक्रिय, कुछ कम सक्रिय..फिर खेमा बदली का ढोंग क्यूँ? चाँदी की परत चढ़वा देने से कुछ समय तो चाँदी के होने का भ्रम पैदा कर सकते हैं मगर चाँदी हो तो नहीं सकते. अपने मूल स्वरुप में ही जीवन जीना हमेशा सरल और सहज होता है.

ढोंग में समय न नष्ट करो. उसे सृजनात्मक कार्यों में लगाओं. क्या पता तुम्हारे कार्य तुम्हें वाकई एक दिन एलीट वर्ग में ले जाकर खड़ा कर दें.

black_king

अब, एक लाल एण्ड बवाल की जुगलबंदी:

मौसम में घटा जब, सुहानी आ जाए
ठहरी हुई लहरों में, रवानी आ जाए

इस कदर भी न पत्थर, हुआ जाए के
ख़ुद में खु़दा की गुमानी आ जाए

बज़्म फिर रज़्म में, आज बदले नहीं
फिर न बातों में मज़हब-ज़बानी आ जाए

बुलंद हो जाए हौसला जो दिल में अगर
बूढ़ी-बूढ़ी रगों में, जवानी आ जाए

ज़िन्दगी में कुछ ऐसा भी, करते चलें
मौत पर अपनी छपकर, कहानी आ जाए

चाँद के कारवाँ के सितारों का नूर,
काश लेकर के उनकी, निशानी आ जाए

सख़्त नफ़रत में माहिर, ज़माने को भी
देखें शायद, यूँ उल्फ़त, निभानी आ जाए

***

बज़्म= सभा, महफ़िल
रज़्म= युद्ध

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बुधवार, मार्च 10, 2010

इकतारे की धुन...

टू ऊ ऊं ऊं ऊं..टू ऊ ऊं ऊं ऊं..

मन डोले मेरा तन डोले...

दिल का गया करार रे..

ये कौन बजाये बांसुरिया

ektara

इकतारे पर यह धुन बजाता जब वो घर के सामने से निकलता..तो वाकई मन डोल जाता.

मिट्टी के दिये का बना वो इकतारा...बचपन से उसकी घुन लुभाती आई. जब भी वो गुजरता, अम्मा से जिद्द कर एक इकतारा खरीद लेता और फिर घंटो उस धुन को निकालने की कोशिश करता लेकिन कभी भी वो धुन नहीं निकल पाई और हर बार कुछ कोशिशों के बाद दिया फूटने के साथ उस इकतारे का अंत होता. दिया फूटने से न सिर्फ इकतारा खत्म होता बल्कि मेरे भीतर पल रहा एक स्वपन भी टूटता कि काश, मैं भी कभी वो धुन निकाल पाऊँ.

सारी जिन्दगी दूर बजती अनेकों धुन आकर्षित करती रहीं और मैं भागता रहा उन साजों के पीछे. बस इक उम्मीद लिए कि मैं भी वैसी ही धुन बजा लूँगा. कभी यह एहसास ही नहीं हुआ कि हुनर साज का नहीं, साधक का है.

आज जब जिन्दगी के पन्ने पलटाता हूँ तो पाता हूँ कि जाने कितने इकतारे टूटे, जाने कितनी बाँसूरियाँ महज एक बांस का टुकड़ा बन कर रह गई और मैं भागता रहा उस धुन को बजाने जिसकी महारत हासिल करने लिए उस साधक नें कितनी लगन के साथ मेहनत की होगी.

अगर जान पाता उस मेहनत के एक अंश को भी तो शायद उस धुन को बजाने का लोभ ही न आता किन्तु हम सभी तो दूसरे के इकतारे की आवाज सुन भागे जा रहे हैं इस जीवन की अबूझ दौड़ मे और नित तोड़ते जा रहे हैं बेवजह ही न जाने कितने इकतारे, मिट्टी के दिये से बने.

बस, इक उम्मीद है कि इक दिन साज बज उठेगा:

टू ऊ ऊं ऊं ऊं..टू ऊ ऊं ऊं ऊं..

मन डोले मेरा तन डोले...

दिल का गया करार रे..

ये कौन बजाये बांसुरिया

अब इक उम्र गुजर जाने पर सब जानते हुए भी मन है कि डोलता रहता है और दिल का करार जाता रहता है.

काश!! कोई साज तो ऐसा होता जो बिना किसी साधना के बज उठता.

खुश होने की ख्वाहिश लिए
मन फिर से उदास है बहुत...

कहीं कोई ख्वाब टूटा है अभी...

-समीर लाल 'समीर'

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रविवार, मार्च 07, 2010

यूँ बीत गया समय...

इधर मैं कुछ लिख नहीं रहा हूँ. बिल्कुल चुप!

मैं तब भी चुप था, जब उसकी शादी होना तय हुआ था.

उस रात चाँद खामोश था और मैं अपनी छत से कूद उसके छतरी वाले कमरे में उसका हाथ थामें बस उसे मौन देखता रहा था.

हमारे बीच एक घुप्प सन्नाटा पसरा था और उस छतरी वाले कमरे में रखा वह पुराना पियानो-सफेद कफन की मानिंद चादर ओढे जाने कौन सी मौन धुन छेड़ रहा था अपनी टूटी हुई बीट्स से.

वो मौन संगीत, मुझमें बसा है आज भी. हर धडकन के साथ कानं में गूँजता है. धड़कन रुके तो इस गूँजार से छुटकारा मिले.

वह शादी के बाद चली गई और मैं..वहीं रुका हूँ, उस छतरी वाले कमरे में, उस मौन पियानो के संगीत के साथ-सोचता हूँ शायद मेरा फैसला ही सही था जो उसकी अगली शाम मैने उससे उस कोने वाले पार्क में सुनाया था और फिर....कल उसको देखा.....

woman_crying

कल शाम

बरसों बाद

जब तुम्हें देखा

अपने साजन के साथ

खिलखिलाते...

तो

मुझे याद आये

न जाने कितने

तुम्हारे चेहरे

रोते....

एक वो

जब तुम मेरे काँधे पर सर रख

रोती रही थी घंटो

एक वो

जब मेरी पीठ से पीठ टिकाये

तुम्हारी सिसकियाँ नहीं थमती थी..

एक वो

जब तुम अपने ही धुटनों में

मूँह छिपाये

आँसू बहाती रही...

एक वो

जब तुम मुझे देखती रही

और

आँसू गिराती रही...

और

एक वो

जब तुमने आँसू बहाये थे

उस खत पर

जिस पर मैने लिखा था..

अलविदा....

मुझे वो चेहरे याद आये,

न जाने क्यूँ!!!

-समीर लाल 'समीर'

-उधेड़ बून बनी हुई है, वक्त उलझा है जाने किन व्यस्तताओं में और इस बीच कब मेरी जिन्दगी की डायरी, मेरे भावों का साक्षी, यह ब्लॉग अपनी चार साल की उम्र पूरी कर गया..गुजरे २ मार्च को, बता ही नहीं पाया. बहाव बना है तो आता रहेगा.

आपकी शुभकामनाओं और स्नेह का आकांक्षी बना रहूँगा.

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सोमवार, मार्च 01, 2010

गीला रंग मोहे लगाई दो!!

पिछले साल होली पर यह गीत लिखा था किन्तु इस साल अदा जी की आवाज और संतोष जी की म्यूजिक नें इस गीत में चार चाँद लगा दिये. बिना किसी की भूमिका के आप आनन्द उठायें.

 

चढ़ गया रे फागुनी बुखार,
गीला रंग मोहे लगाई दो!!

रंग लगा दो,
गुलाल लगा दो,
गालों पे मेरे
लाल लगा दो..
भर भर पिचकारी से मार,
गीला रंग मोहे लगाई दो!!

चढ़ गया रे फागुनी बुखार,
गीला रंग मोहे लगाई दो!!

सासु लगावें
ससुर जी लगावें,
नन्दों के संग में
देवर जी लगावें..
साजन का करुँ इन्तजार,
गीला रंग मोहे लगाई दो!!

चढ़ गया रे फागुनी बुखार,
गीला रंग मोहे लगाई दो!!

गुझिया भी खाई
सलोनी भी खाई
चटनी लगा कर
पकोड़ी भी खाई..
भांग का छाया है खुमार..
गीला रंग मोहे लगाई दो!!

चढ़ गया रे फागुनी बुखार,
गीला रंग मोहे लगाई दो!!

हिन्दु लगावें
मुस्लमां लगावें,
मजहब सभी
इक रंग लगावें..
मुझको है इंसां से प्यार..
गीला रंग मोहे लगाई दो!!

चढ़ गया रे फागुनी बुखार,
गीला रंग मोहे लगाई दो!!


-समीर लाल ’समीर’

 

holimubaarak

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