”अम्मा, खाना लगा दे”
”क्या हुआ, आज जल्दी जायेगा क्या स्कूल?”
”हाँ अम्मा, वो क्लास के पहिले सुदेश की गणित किताब से कुछ प्रश्न उतारने है. उसके पास अंग्रेजी स्कूल की किताब भी है न.”
अम्मा जल्दी जल्दी भाप छोड़ते भात, अधपकी छितरी राहर की दाल और लगभग पक गई भाटे पालक की भाजी थाली में डाल कर दे देती है और उस पर से आधा चम्मच देशी घी. स्कूल जायेगा, दिन भर पढेगा तो घी से ताकत बनी रहेगी. अम्मा घर पर मलाई से बनाती है अनिल के लिए देशी घी.
अनिल जल्दी अल्दी फूँक फूँक कर खाने लगता है. पूरा खाना बिना खाये ही दिवाल घड़ी पर नजर पड़ती है और वो खाना छोड़ कर भागता है. अम्मा कहती है, अन्न का अपमान नहीं करते बेटा. खाना आराम से खाते हैं. मगर अनिल को तो स्कूल जाने की जल्दी है सो भागता है.
बरामदे से साईकिल निकाल कर, जब तक अम्मा बाहर आये, अनिल आवाज लगा कर निकल जाता है. गली से सड़क पर आकर कोने में ही शर्मा जी की कोठी है जिनकी फैक्टरी में अनिल के पिता जी काम करते हैं. शर्मा जी की कोठी के बाहर एक साथ तीन कारें खड़ी होती हैं. एक शर्मा जी की, एक उनकी पत्नी की और एक शुभि की सफेद वाली दो दरवाजे की. शुभि उसी से स्कूल जाती है.
अनिल के सरकारी स्कूल से पिछली सड़क पर शुभि का कान्वेन्ट स्कूल है तीन मंजिला लाल रंग का.
अनिल को जल्दी स्कूल पहुँचना है, वो तेजी से साईकिल के पैडल मारता है. आज जाने क्यूँ एड़ी में दर्द भी है.
अनिल कक्षा में बैठा है. मास्साब भौतिकी के चुम्बकत्व के सिद्धांत वाला अध्याय पढ़ा रहे हैं अनिल बैन्च पर बैठा अपने खपड़ैल की छत वाले क्लास रुम की खिड़की से बाहर पीछे के वाले स्कूल की ओर ताक रहा है. ढेरों लड़कियाँ उस स्कूल में पढ़ती है. नीला ट्यूनिक और सफेद कमीज पहने. परियों जैसी लगती सब अनिल को उजली उजली सी. सबके बैठने की अलग अलग कुर्सी. दूर से कुछ साफ तो दिखता नहीं, बस बैठा कल्पना करता रहता कि शुभि ही होगी जो खिड़की से दिखाई दे रही है.
एक बार शार्मा जी के दरबान के लड़के से पूछा था तो उसने बताया था कि शुभि भी उसी कक्षा में है जिसमें अनिल पढ़ता है.
दिन में लंच की छुट्टी में अनिल भी दोस्तों के साथ धूल में सतोलिया खेल रहा है. गेंद पीछे झाड़ियों में जाती है. अनिल दौड़कर गेंद उठाने जाता है. उस स्कूल का बड़ी ऊँची ऊँची जालियों का बाड़ा है. बाड़े के उस पार कुछ लड़कियाँ बेड मिंटन खेल रही हैं. कुछ हरी हरी दूब में गोला बना कर गप्प करती खाना खा रही हैं. अनिल ने झाड़ियों के बीच से छुप कर देखा, उसे शुभि दिखाई पड़ी अपनी सहेलियों के साथ बैठे खाना खाते. शुभि खाने में सैण्डविच खाती है.
अनिल लौटकर आ जाता है. अब उसका खेलनें का मन नहीं. क्लास रुम में आकर अपना खाने का डिब्बा निकाल लेता है. अम्मा ने चाव से दो रोटी के साथ आम का अचार रखा है. उसे जाने क्यूँ आज खाना खाने का मन नहीं है. डिब्बा बन्द करके बस्ते में रख देता है. उसे प्यास लगी है. पानी की टंकी तक जाता है. पीछे स्कूल पर फिर नजर जाती है. एक लड़की वाटर बोटल से पानी पी रही है. अनिल टंकी से हाथ धो कर लौट आता है.
शाम को साईकिल से घर लौट रहा है. शुभि की कार शर्मा जी के घर के बाहर खड़ी है जबकि उसका स्कूल अनिल के स्कूल के १५ मिनट बाद छूटता है लेकिन वो हमेशा घर पहले पहुँच जाती है चाहे अनिल कितनी भी तेज साईकिल चला कर लौटे.
रात होने लगी है. अम्मा ने आंगन में खटिया लगा दी है. अनिल खटिया पर जाकर लेट जाता है. अम्मा सर पर तेल मल रही है, और वो चाँद को देख रहा है. वही उसका खिलौना है जिससे वो बचपन से खेलता आया है.
अनिल इन्जिनियर बन गया है. बाबू जी तो उसकी इन्जिरिंग की पढ़ाई खत्म होते ही चल बसे थे और फिर छः महिने में अम्मा भी. अनिल को एक अच्छा ऑफर मिला और वो अमरीका आकर बस गया है. बीबी और दो बच्चों का परिवार है.
दरवाजे पर तीन गाड़ियाँ हैं. एक खुद की सफेद कार दो दरवाजे वाली, एक पत्नी की और एक वैन, जब परिवार के साथ कहीं लम्बा जाना होता है तब के लिए.
ऑफिस जाने को तैयार होता है.
पत्नी ने ब्रेकफास्ट के लिए सेण्डविच लगा दिये हैं और एक सैण्डविच और फ्रूट लंच के लिए पैक कर दिया है. साथ में मिनरल वाटर की ठंडी बोतल.
आज अनिल को सेण्डविच के बदले वो भाप छोड़ते भात, अधपकी राहर की दाल और लगभग पक गई भाटे पालक की भाजी थोड़ा सा घी डाल कर खाने का मन है.
वो पत्नी से कहता है. पत्नी हँस देती है. ”नो भात, नो घी. मोटा होना है क्या?”
कह रही है ”जल्दी निकलो और ये सैण्डविच भी साथ लेते जाओ, ड्राईव करते हुए खा लेना वरना ऑफिस को देर हो जायेगी.”
फिर छेड़ते हुए हंसती है ’ ”हर समय बस खाने में ही मन लगा रहता है मोटूराम का!!”
बेटा पूछ रहा है ”डैडी ये भाटे पालक क्या होता है?”
आज जाने क्यूँ अम्मा की याद आ रही है उसे.
उसकी आँखें नम हैं.
-समीर लाल ’समीर’















































