’यदि आपकी उम्र ५० से अधिक है और सुबह नींद खुलने पर आपके शरीर के किसी भी हिस्से में दर्द नहीं है तो शायद आप मर चुके हैं. जरा, चैक कर लिजिये.’
अब मर ही गये हैं तो क्या खाक चैक करें जी. मरे ही ठीक. डले रहेंगे. कोई न कोई मरघट तक पहुँचा ही देगा.
मुझे लगता है कि यह पंक्ति बदली जा सकती है:
’यदि आप ब्लॉगर हैं या कम्प्यूटर पर ३ घंटे से ज्यादा समय बिताते हैं तो आप ने उम्र पर विजय प्राप्त कर ली है. आपको ५० का होने की जरुरत नहीं. किसी भी उम्र में उपरोक्त वाक्य सिद्ध माना जा सकता है.’
मर जाने का उम्र से क्या लेना देना. आजकल तो २२-२३ साल के युवाओं को हार्ट अटैक आये जा रहे हैं.
ऐसे नहीं कि इन पर विजय नहीं प्राप्त की जा सकती. निश्चित ही अनुशासित जीवन, नियमित और पौष्टिक खुराक और सही व्यायाम के साथ इनको हराया जा सकता है.
(मेरी तस्वीर इतने आश्चर्य से क्या देख रहे हो? ज्ञान बाँटने के लिए ज्ञानी होना जरुरी थोड़े है और ज्ञान बाँटने वाला अगर सारी बातों पर अमल करे तो ये जितने बाबा हवाई जहाज से आकर मंच पर तुम्हें भाषण देकर ऐश कर रहे हैं, वो भीख मांग रहे होते और जंगल में रहते)
तो बात करें सही व्यायाम की. ५० के बाद वाले छोड़ो, उसे तो हम भी छोड़े ही हुए हैं. अभी तो बस वो कम्प्यूटर पर ३ घंटे से ज्यादा बिताने वालों की देखो. वो ज्यादा जरुरी हैं तुम्हारे लिए क्योंकि जब यह ब्लॉग पढ़ रहे हो तो कम्प्यूटर प्रेमी तो होगे ही वरना तो अंग्रेजी की कुछ वेब साईट देख कर खिसक लेते.
मैं एक ऐसे सज्जन को जानता हूँ जो रोज नियम से सुबह आधा घंटे नेट पर टाईम्स ऑफ इंडिया पढ़ते हैं और बस!! इसके सिवाय कम्प्यूटर से कुछ लेना देना नहीं. पान की दुकान में गर्व से सीना चौड़ा कर बताते हैं कि हम तो न्यूज कम्प्यूटर पर ही देखते हैं. भले आदमी, सिर्फ टाईम्स ऑफ इंडिया पढ़ने के लिए कम्प्यूटर और फिर नेट का कनेक्शन, कम्प्यूटर ढ़कने की चादर, टेबल, कुर्सी, एसी और जाने क्या क्या इन्वेस्टमेन्ट कर डाला. अब समझे मंदी का असल जिम्मेदार कौन. सारा का सारा डेड इन्वेस्टमेन्ट.
उनकी वो जाने आप तो व्यायाम देखो:

१. कभी २० मिनट से ज्यादा स्क्रीन पर लगातार मत देखो.
-हर २० मिनट बाद, आँख कम्प्यूटर स्क्रीन से हटाकर चार बार एक आँख जोर से मींचो और चार बार दूसरी और फिर चार बार दोनों एक साथ. फिर दोनों हथेलियों को आपस में ७ से ८ बार घिसो, घिसो और दोनों आँखों पर हथेली लगाओ. फिर घिसो, फिर लगाओ-ऐसा भी चार बार करो. अब फिर से काम करने को तैयार. समय खर्च हुआ ३० सेकेंड से कम और आँख रहे चकाचक.
सावधानी: अगर दफ्तर में या साईबर कैफे में हो, तो आँख मींचने के पहले देख लो कि मूँह किसी लड़की की ओर तो नहीं. वरना आँख तो सही हो जायेगी और जो मार पड़ेगी, उससे बाकी हड्डियाँ हिल सकती हैं.
२.कुर्सी पर बैठे बैठे काम करते करते पंजे के बल ऐड़ी उपर उठाओ, कुछ देर रुको और फिर ऐड़ी जमीन पर छुलाओ. ऐसा जब भी याद आये, कर लो. कोई समय सीमा नहीं, कोई निश्चित आवृति नहीं. पैरों का ब्लड सर्कूलेशन बना रहेगा. कई जो धुटने में दिमागधारी हैं, उनके लिए तो रामबाण.
सावधानी: सिर्फ ऐड़ी उठाना है, खुद को नहीं वरना अगर हमारी जैसी कायाधारी हो तो मोच आ सकती है और दूसरा पड़ोस के क्यूबिकल में बैठी सुकन्या को गलतफहमी हो सकती है कि तुम उचक उचक कर उसे ताक रहे हो. कहीं कम्पलेन्ट कर दी तो मंदी में तो दूसरी नौकरी भी मिलने से रही.
३. हर १ से १.३० घंटे में अपने दोनों हाथ सामने सीधे फैला लो. दोनों हथेली जमीन को देख रही हो. फिर हाथ को यथास्थिति में रखते हुए हथेली के उपर उठाओ ताकि वो सामने की दीवाल देखने लगे, जितना ज्यादा देख सके. फिर उसे नीचे झुकाओ ताकि अब वो उल्टा हो तुम्हें देखे और उँगलियों की पोर जमीन को. ऐसा दस बार करो. फिर हाथ सीधा रखते हुए १० बार मुट्ठी भींच कर बंद करो और पूरी हथेली फैला कर खोलो. फिर पांच बार बंद मुठ्ठी को कलाई से बाईं ओर घुमाओ और पांच बार दाईं ओर. फिर हाथ सामन्य स्थिति में ले आओ और काम पर लग जाओ.
सावधानी: समझदार तो हो ही. मुठ्ठी खोलते और बंद करते वक्त कंडिका १ वाली ही सावधानी बरतो, वरना कोई सिर फिरी हुई तो कंडिका १ वाली ही परेशानी हो सकती है. ये उपर वाले फोटो से कन्फ्यूज मत होना. इन्हें तो कहीं भी बिना सावधानी कुछ भी करना एलाउड है. इनका साथ देने हजार आ जायेंगे और तुमको पीटने भी हजार.
४. दिन में कम से कम दो से तीन बार दोनों हथेलियों को बैठे बैठे गरदन के पीछे ले जाओ और हथेलियों की आपस में उँगलियों से फंसा लो. फिर दोनों हथेलियों को गरदन से धक्का दो. सामान्य हो जाओ और फिर धक्का दो जब तक बरदाश्त हो. ऐसा कम से कम पाँच बार करो, फिर सामान्य स्थिति में आ जाओ.
सावधानी: इसमें क्या सावधानी?? आदत पड़ गई सावधानी पूछने की ३ ही बार में तो चलो बता देते हैं: ध्यान रखो कि बॉस आस पास न हो वरना इस मुद्रा में वो समझेगा कि तुम काम से बोर हो गये हो. फिर अन्जाम तो तुम जानते ही हो.
और भी अनेक व्यायाम है मगर अभी के लिए इतना करते रहो. ज्यादा समय तक कम्प्यूटर पर बैठ पाओगे और इसके लिए तैयार नहीं हो तो ब्लॉग डिलिट करो और चाय की दुकान पर जा कर पहले की तरह गपियाओ और पान खाकर चले आना. मुद्दे बहस के वहाँ भी खूब हैं, बोर नहीं होगे.
पान की दुकान पर सावधानी: यहाँ ब्लॉग पर फालतू बहस करने में लिख कर गाली पड़ती है और वहाँ चाय की दुकान पर फालतू बहस करने पर सीधे गरियाये जाओगे और लतियाये जाने का भी खतरा है.
सोमवार, मई 25, 2009
माँ
नही रही...
और
पिता जी..
उन्होंने कत्ल कर दिया..
अपने जीने की
चाहत का...
बतौर सजा,
कर लिया
कैद
खुद को
खुद के भीतर...
एक अँधेरी काल कोठरी में..
और
पाल ली एक नफरत
जिन्दगी से...
बना ली
एक दूरी
हर शख्स से...
किन्तु
मैं..?
मैं तो
जिन्दा हूँ अभी....
और
वो
होते हुए..
नहीं रहे!!
-मैं अनाथ हुआ!!
-समीर लाल ’समीर’
बुधवार, मई 20, 2009
लुटी जवानी तेरे दर पर!!
टिप्पणी के माध्यम से संदेश प्राप्त हुआ:
आदरणीय तश्तरी जी,
मान्यवर, अत्यन्त दुखद समाचार है.
सारी रात इसी सोच में गुजर गई कि किस तरह यह खबर आपको दूँ? कुछ समझ नहीं आता. मैं आपका अपराधी हूँ और आज नहीं तो कल, आपको पता लग ही जाना है तो क्यूँ न मैं ही सीधे आपको बता दूँ. फिर आप जो सजा तय करेंगे, वो मैं भुगतने को तैयार हूँ. यूँ तो जितना टूट कर आपने उसे प्यार दिया है, बचपन से आजतक कि मैं केवल नाममात्र का स्वामित्व लिए था बाकी तो सब आपकी हौसला अफजाई और स्नेह का ही नतीजा था.
दरअसल, परसों दफ्तर से दिन भर का थका हारा, भीषण गर्मी झेलता जब देर शाम घर पहुँचा तो कुछ भी लिखने पढ़ने का मन नहीं था. भरपूर स्नान के बाद कुछ तरावट आई और एक प्याली चाय ने हिम्मत बँधाई तो सोचा, कुछ लिखा जाये. आप इन्तजार कर रहे होंगे.
गरमी इतनी भीषण पड़ रही है कि थोड़ा सा काम करो और शरीर जबाब देने लगता है किन्तु फिर आपका ख्याल आया तो किसी तरह लिखता चला गया और रात एक बज गई. आपके स्नेह और प्रेम वर्षा के सामने मेरी थकन की कीमत दो कौड़ी की नहीं है.
किसी तरह पोस्ट शेड्यूल करके बस बिस्तर पर लुढ़क गया. फिर ख्याल आया कि कल सुबह कुछ साज सजावट भी कर दूँगा ताकि आप जैसे स्नेही स्वजनों को अच्छा लगे और आप अपने स्नेह आशीषों के पनपते परिणामों को देख खुश हों. यह मेरा दायित्व एवं कर्तव्य भी है आपके प्रति.
सुबह सुबह ६ बजे उठकर जल्दीबाजी में कुछ फॉण्ट, कुछ ले आऊट आदि में फेर बदल की और बस, उसी समय, शायद नींद पूरी न होने की वजह से, एक ऐसी घटना हुई कि मेरा तो मानो जीवन ही बदल गया.
सब कुछ लुट गया. मैं कंगाल हो गया. आपके स्नेहाशीष में बढ़ रहा वृक्ष बस फल देने ही वाला था कि मानो मुझ माली ने अपने ही हाथों उसे काट दिया. जाने कैसे कौन सा बटन दब गया और जल्दबाजी में मैने क्या कनफर्मेशन दबा दिया कि आपका पसंदीदा ब्लॉग अब नहीं रहा. पूरा कुछ डिलीट हो गया, भाई साहब. मैं हत्यारा हूँ, मैं तो आपको मूँह दिखाने के काबिल भी नहीं रहा.

आदरणीय तश्तरी जी,
मान्यवर, अत्यन्त दुखद समाचार है.
सारी रात इसी सोच में गुजर गई कि किस तरह यह खबर आपको दूँ? कुछ समझ नहीं आता. मैं आपका अपराधी हूँ और आज नहीं तो कल, आपको पता लग ही जाना है तो क्यूँ न मैं ही सीधे आपको बता दूँ. फिर आप जो सजा तय करेंगे, वो मैं भुगतने को तैयार हूँ. यूँ तो जितना टूट कर आपने उसे प्यार दिया है, बचपन से आजतक कि मैं केवल नाममात्र का स्वामित्व लिए था बाकी तो सब आपकी हौसला अफजाई और स्नेह का ही नतीजा था.
दरअसल, परसों दफ्तर से दिन भर का थका हारा, भीषण गर्मी झेलता जब देर शाम घर पहुँचा तो कुछ भी लिखने पढ़ने का मन नहीं था. भरपूर स्नान के बाद कुछ तरावट आई और एक प्याली चाय ने हिम्मत बँधाई तो सोचा, कुछ लिखा जाये. आप इन्तजार कर रहे होंगे.
गरमी इतनी भीषण पड़ रही है कि थोड़ा सा काम करो और शरीर जबाब देने लगता है किन्तु फिर आपका ख्याल आया तो किसी तरह लिखता चला गया और रात एक बज गई. आपके स्नेह और प्रेम वर्षा के सामने मेरी थकन की कीमत दो कौड़ी की नहीं है.
किसी तरह पोस्ट शेड्यूल करके बस बिस्तर पर लुढ़क गया. फिर ख्याल आया कि कल सुबह कुछ साज सजावट भी कर दूँगा ताकि आप जैसे स्नेही स्वजनों को अच्छा लगे और आप अपने स्नेह आशीषों के पनपते परिणामों को देख खुश हों. यह मेरा दायित्व एवं कर्तव्य भी है आपके प्रति.
सुबह सुबह ६ बजे उठकर जल्दीबाजी में कुछ फॉण्ट, कुछ ले आऊट आदि में फेर बदल की और बस, उसी समय, शायद नींद पूरी न होने की वजह से, एक ऐसी घटना हुई कि मेरा तो मानो जीवन ही बदल गया.
सब कुछ लुट गया. मैं कंगाल हो गया. आपके स्नेहाशीष में बढ़ रहा वृक्ष बस फल देने ही वाला था कि मानो मुझ माली ने अपने ही हाथों उसे काट दिया. जाने कैसे कौन सा बटन दब गया और जल्दबाजी में मैने क्या कनफर्मेशन दबा दिया कि आपका पसंदीदा ब्लॉग अब नहीं रहा. पूरा कुछ डिलीट हो गया, भाई साहब. मैं हत्यारा हूँ, मैं तो आपको मूँह दिखाने के काबिल भी नहीं रहा.

अपराध तो अपराध ही है किन्तु शायद यदि मैंने बैक-अप रखा होता तो कुछ हद तक क्षम्य होता. अब तो कोई चारा भी नहीं.
मैं अपना गुनाह बिना किसी साफ सफाई के कबूल करता हूँ और आपसे निवेदन करता हूँ कि आप जो भी सजा देना चाहें, दें. मैं उसे सहर्ष कबूल करुँगा.
आज मेरे हाथों इस साहित्य जगत में वो क्षति हुई है, जिसका पूरा किया जाना अब संभव नहीं. आप तो तकनीक के ज्ञाता भी हैं. यदि आप उचित समझें तो अपने प्रभाव से गुगल को लिख कर बात कर सकते हैं कि क्या ऐसी स्थितियों में कुछ किया जा सकता है.
अतयन्त दुखी मन से,
आपका अपराधी
मैं अभागा
संजय
अब जबसे यह टिप्पणी आई है, चमकने की बारी हमारी है.
अव्वल तो यह बालक है कौन?
दूसरा, आदरणीय तश्तरी जी- अभिवादन कर रहा है कि हमारी तस्वीर देखकर मजाक उड़ा रहा है?
भाई मेरे, हमारे ब्लॉग का नाम उड़न तश्तरी है और हमारा समीर लाल. कहीं क्न्फ्यूजन तो नहीं कि हमारा सरनेम तश्तरी और नाम उड़न है. और समीर लाल इनके चपरासीनुमा पॉयलट. ये अनुमान भी तस्वीर देख लगा लिया हो, तो कोई अतिश्योक्ति न होगी.
कहीं वो यह गलतफहमी तो नहीं पाल बैठा कि हम मात्र और एक मात्र ब्लॉग उसी का पढ़ते हैं. वैसे पाल भी ली हो तो आश्चर्य नहीं. जो हमारे नाम को लेकर गलतफहमी पाल सकता है, उसे हमारी टिप्पणी से इस तरह की गलतफहमी और फिर यह भी, साहित्यजगत में तुम्हारा योगदान अतुलनीय है, हो जाना बहुत सहज और स्वभाविक सी बात है.
माना भाई, मगर जरा ब्लॉग का नाम भी तो बता देते तो पता तो रहता कि किसकी याद में आँसूं बहाऊँ और किसे अश्रुपूरित श्रृद्धांजलि अर्पित करुँ.
इनके नाम पर क्लिक करो तो कहीं जाता ही नहीं. हो सकता है कि इतना दुखी हों कि हिल डुल भी न पा रहे हों और ब्लॉग तो डिलिट हो गया है तो उसके माध्यम से तो टिप्पणी कर न पाये होंगे. कम से कम मृत आत्मा का नाम तो बताना ही था.
दिमाग पर जोर डाल रहा हूँ कि कौन सा ऐसा ब्लॉग था जिसे मैने उसके जन्म से ही अपना स्नेह दिया और देता चला गया. वो बढ़ कर वृक्ष हो गया और वो फल भी देने वाला था. वो साहित्य में योगदान कर रहा था. वो लिखता बहुत सटीक था. मैं उसकी हौसला अफजाई किया करता था. उसे बेहतरीन कहता था. उसकी अगली पोस्ट का इन्तजार करता था. सर फटा जा रहा है बोरा भर नामों में से एक नाम छांटने में. संजय गुगल करो तो हजार ब्लॉग निकल आते हैं, उसमें से बीसों डिलिटेड होंगे तो वो राह लेना ही बेकार है.
अपने ब्लॉग की ग्यारह हजार टिप्पणियों में से सब संजय क्लिक करता घूम भी लूँ और एक दो डिलिटेड पर चले भी जायें, तो ढ़ाढ़स बँधाने कहाँ जाऊँगा जब तक ईमेल एड्रेस न हो और डिलिटेड ब्लॉग की प्रोफाईल तो दिखेगी भी नहीं कि ईमेल मिल जाये और मैं उनके दर्द में सहभागी बन पाऊँ.
और जहाँ तक रही उनके मूँह न दिखा पाने की बात तो जब हमें कुछ याद ही नहीं तो दिखाओ या न दिखाओ, क्या फरक पड़ेगा. सभी सूरमाओं को मैं जानता हूँ ऐसा भी नहीं.
डर लगता है कि इतना संवेदनशील और भावुक व्यक्ति, जो अपनी थकन भूल, सिर्फ इसलिये इतनी गर्मी में लिखने बैठ गया और लिखता चला गया जब तक निढाल होकर बिस्तर में न गिर पड़ा कि मैं उसके लिखे का इन्तजार कर रहा हूँगा, वो इतनी हृदय विदारक घटना पर, मेरे किसी भी जबाब को न पाकर कुछ ऐसा वैसा न कर बैठे. यूँ भी वो अपने आपको हत्यारा अपराधी माने बैठा है, कहीं बतौर-ए-सजा वो खुद को.................न..हीं........!! ऐसा नहीं होना चाहिये.
कोई तो राह सुझाओ, मित्रों कि करुँ क्या?
इस बीच मेरे परमप्रिय संजय जी, आपने कोई अपराध नहीं किया है. यह मानवजन्य भूलवश हुई क्रिया है जो किसी के साथ भी हो सकती है. अपराधबोध मन से निकाल दें. उपर पढ़कर आप समझ ही गये होंगे, आपका दिल भी टुकड़े टुकड़े हो गया होगा कि मैं आपको पहचान तक नहीं पा रहा हूँ, जबकि आज तक आपको यह मुगालता पलवाता रहा, अपरोक्ष रुप से ही सही, कि आप हैं तो ब्लॉगजगत है और जो कुछ है बस आप ही हैं.
तो मैं क्षमाप्रार्थी हूँ. आपकी तरह ही भूलवश मैने आपको इस मुगालते की सबसे उपर वाली मंजिल पर ला खड़ा किया. आगे से टिप्पणी करते वक्त ध्यान रखूँगा कि कोई और आपकी तरह ही परेशान हो अपराधबोध न पाल बैठे.
वैसे सत्य तो यह है कि आज की दुनिया में शिष्टाचार और किसी के स्नेहवर्षा को इतनी संवेदनशीलता और भावुकता से लेने वालों को बेवकूफ ही कहा जाता है और अंततः ऐसे लोग अपनी सजा खुद ही मुकर्रर करते हैं. सामने वाला तो क्या सजा देगा. सामने वाले पर चलोगे तो फिर तो इस देश में अफज़ल की फाँसी भी माफ है-इसका यह अर्थ तो कतई नहीं कि हत्या अपराध नहीं है.

चलते चलते:
फोटू तो आप देख ही रहे हैं. २० दिन पहले की है. उम्र भी मुझे कम से कम अपनी तो सही ही मालूम है. अभी कोई खास तो है नहीं और बाल भी फैशनवश ही सफेदी झलका रहे हैं वरना तो कब का रंग लेते.
मगर इसी तरह के स्नेहियों ने नाम के साथ आदरणीय, परम श्रद्धेय, माननीय, अंकल जी, महोदय, पित्रतुल्य, पूज्यनीय आदि न जाने क्या क्या लगा लगा कर ऐसा बुढ़ापे का एहसास कराया है कि कई बार तो अपना डेट ऑफ बर्थ प्रमाणपत्र और केलकुलेटर लिए पूरा दिन गुजार देता हूँ, फिर भी हल नहीं ढ़ूंढ़ पाता.बस, कान बजते रहते हैं:
दिल में इक तूफां और आँखों में ये नमीं सी क्यूँ है......
कहीं यह मुझ युवा के खिलाफ कोई षणयंत्र तो नहीं?
ब्लॉगजगत में आकर मात्र यही एक घाटा लगा है कि हम अपना युवत्व असमय खोते नजर आ रहे हैं.
रविवार, मई 17, 2009
जिन्दगी की बैलेंस शीट पर ’प्रेमी’ से ’समीर’ के बदलते हस्ताक्षर
पिछली पोस्ट में जब मैने ’विल्स कार्ड’ वाली रचनाओं का जिक्र किया, आप सबके स्नेह ने मुझे अभिभूत कर दिया. मजबूर हो गया कि उस ’विल्स कार्ड’ के बंडल में से कुछ और कार्ड खिंचूँ, जो इस बार भारत से ढ़ूँढ़ कर लाया हूँ.
अभी पहला ही कार्ड पढ़ रहा था कि लगा: अरे, आज के मायने में इसका क्या अर्थ होगा?? वो पंक्तियाँ जो समीर लाल ’प्रेमी’ ने लिखीं थी, उसे समीर लाल ’समीर’ बढ़ाकर आज तक ले आये वजन आँकते हुए.
जब समीर लाल ’प्रेमी’ थे तो हॉस्टल के कमरे में दोस्तों को कविता झिलवाते थे:
अब, समीर लाल ’समीर’ हो कर रेडियो मिर्ची से झिलवाते हुए:
यकीं जानें, रचना का पहला हिस्सा जो समीर लाल ’प्रेमी’ ने ’विल्स कार्ड’ पर उकेरा था, वो जस का तस है और फिर आगे समीर लाल ’समीर’ नें सिर्फ एक आंकलन किया है.
यूँ तो पहले ख्याल आया कि फॉण्ट का रंग जुदा रखूँ ’प्रेमी’ और ’समीर’ में भेद करने को..मगर मैं खुद नहीं जानता कि कब वो अल्लहड़ ’प्रेमी’ इस संवेदनशील ’समीर’ में बदल गया और उनके बीच जिन्दगी ने रंग नहीं जुदा किये तो फिर मैं कौन होता हूँ उनके बीच भेद खड़ा करने वाला.
हालांकि मैने कोई भेद नहीं किया है फिर भी आप जान जायेंगे कि किस पंक्ति से समीर लाल ’समीर’ ने कलम थामी. ये मेरा दावा है.

अभी पहला ही कार्ड पढ़ रहा था कि लगा: अरे, आज के मायने में इसका क्या अर्थ होगा?? वो पंक्तियाँ जो समीर लाल ’प्रेमी’ ने लिखीं थी, उसे समीर लाल ’समीर’ बढ़ाकर आज तक ले आये वजन आँकते हुए.
जब समीर लाल ’प्रेमी’ थे तो हॉस्टल के कमरे में दोस्तों को कविता झिलवाते थे:
![]() |
अब, समीर लाल ’समीर’ हो कर रेडियो मिर्ची से झिलवाते हुए:
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यकीं जानें, रचना का पहला हिस्सा जो समीर लाल ’प्रेमी’ ने ’विल्स कार्ड’ पर उकेरा था, वो जस का तस है और फिर आगे समीर लाल ’समीर’ नें सिर्फ एक आंकलन किया है.
यूँ तो पहले ख्याल आया कि फॉण्ट का रंग जुदा रखूँ ’प्रेमी’ और ’समीर’ में भेद करने को..मगर मैं खुद नहीं जानता कि कब वो अल्लहड़ ’प्रेमी’ इस संवेदनशील ’समीर’ में बदल गया और उनके बीच जिन्दगी ने रंग नहीं जुदा किये तो फिर मैं कौन होता हूँ उनके बीच भेद खड़ा करने वाला.
हालांकि मैने कोई भेद नहीं किया है फिर भी आप जान जायेंगे कि किस पंक्ति से समीर लाल ’समीर’ ने कलम थामी. ये मेरा दावा है.

हॉस्टल की
चौथी मंजिल पर स्थित
अपने कमरे की खिड़की
से बाहर देखता हूँ..
मौसम आज कुछ गीला है
न जाने क्यूँ...
मैं तो आज रोया भी नहीं..
दूर नीले आसमान में
दिखाई देता है...
मेरी याद में रोता हुआ
वो चेहरा
माँ का..
घर की पीछे वाली बिल्डिंग की
छत पर इन्तजार में
खड़ी वो..
और
बेटे की सफलता
के लिए आशांवित, आँखें,
पिता की....
जला लेता हूँ सिगरेट, मैं..
खिंच जाता है
धुऐं का परदा सा,
बीच में,
मेरे और आसमान के..
और याद आता है
मुझे अपना कैरियर..
जिसे संवारने के लिए
आ गया हूँ
घर से दूर
बम्बई!!
लौट आती है सोच
धरातल पर ..
अगले हफ्ते ही तो इम्तिहान है
सी ए फाईनल का..
पहला परचा..
एकाउन्टिंग...
नफा हो या नुकसान
बैलेंस शीट के दोनों पाले
तो बराबर करने ही होंगे
इम्तिहान पास करने के लिए...
आज इतने बरसों बाद
अपनी जमीं से इतनी दूर..
जब जिन्दगी की
बैलेन्स शीट पर नजर डालता हूँ..
दोनों पाले बराबर दिखते हैं...
और
नया जमाना
भौतिक सम्पन्नता को
सफलता का पैमाने माने
चार्टर्ड एकाउन्टेन्ट बना
मेरी जिन्दगी की बैलेन्स शीट को
सत्यापित करता है..
शायद इसीलिए
मैं सबकी नजरों में
जिन्दगी के इम्तिहान में
सफल नजर आता रहा...
सिर्फ मैं जानता हूँ...
नहीं..
हर रोज की तरह..
आज झूठ नहीं कहूँगा..
सब विंडो ड्रेसिंग* है!!!
मैं भी नहीं जानता..
नफा हुआ
या
नुकसान!!
-समीर लाल ’प्रेमी’ से समीर लाल ’समीर’ तक
* विंडो ड्रेसिंग- बनावटी आधार पर कम्पनी की स्थितियाँ सुदृढ़ दिखाने और अनियमितताऐं छिपाने के लिए बैलेंस शीट में किये गये उपाय. (राजू वाली सत्यम- ताजा उदाहरण)
सोचता हूँ कि
-कुछ नहीं बदला है न ’प्रेमी’ और ’समीर’ हो जाने में. बदला है सिर्फ नज़रिया और उद्देश्य. तब सीए का इम्तिहान पास करने की मशक्कत थी और आज जिन्दगी का इम्तिहान.
-हम सभी की जिन्दगियों की बैलेन्स शीट तो विन्डो ड्रेस्ड हैं, काश!! हम इस विन्डो ड्रेसिंग से उबर पाते. उस पार तो विदाउट ड्रेस ही जाना है, फिर ये आडंबर क्यूँ. शायद, यही जीने का सलीका हो और वो मरने का!!! मैं तो कुछ भी नहीं जानता, कितना बेवकूफ हूँ मैं!!
बुधवार, मई 13, 2009
विल्स कार्ड पर उतरी बातें
याद है मुझे सालों पहले, जब मैं बम्बई में रहा करता था, तब मैं विल्स नेवीकट सिगरेट पीता था. जब पैकेट खत्म होता तो उसे करीने से खोलकर उसके भीतर के सफेद हिस्से पर कुछ लिखना मुझे बहुत भाता था. उन्हें मैं विल्स कार्ड कह कर पुकारता. न जाने कितने विल्स कार्ड मेरी पुरानी दराज़ों से निकल कर अटेचियों और बक्सों में इधर उधर बिखरे पड़े हैं. कभी टटोलता हूँ उन बक्सों को खाली समय में तो कुछ हाथ लगता है..जिसे मैं पहचानने की कोशिश करता हूँ कि
अरे, ये मैने कब लिखा?
हर पैकेट के खत्म होने पर एक अलग मूड होता था और वही मूड उस पर अंकित हो जाता शब्दों के माध्यम से. सिगरेट के धूँऐं सी अलग अलग आकार लेकर धीरे से विलुप्त होती बातें शब्दों का रुप ले लेती.
कोई कविता नहीं होती थी वो..बस, यूँ ही कुछ जुड़ते-उड़ते हुए विचारों का शब्दांकन.

अरे, ये मैने कब लिखा?
हर पैकेट के खत्म होने पर एक अलग मूड होता था और वही मूड उस पर अंकित हो जाता शब्दों के माध्यम से. सिगरेट के धूँऐं सी अलग अलग आकार लेकर धीरे से विलुप्त होती बातें शब्दों का रुप ले लेती.
कोई कविता नहीं होती थी वो..बस, यूँ ही कुछ जुड़ते-उड़ते हुए विचारों का शब्दांकन.

उसी में से इस भारत यात्रा के दौरान कुछ हाथ लगा था और आज कहीं किसी संदर्भ में बात चलने लगीं तो याद आया:
(१)
आँसू
अमृत की बूंदें
इन्हें मैं रोकता नहीं...
तुम भी मत रोकना.
सींचना इनसे
अपने दुखों की बगिया को..
जानती हो..
कांटों पर ही
खिलते हैं...
गुलाब !!
कितने सुन्दर होते हैं न...
गुलाब!!!
(२)
पत्थर!!
न हँसते हैं
न रोते हैं...
मौन
बस!!
मौन रहकर
सारी ठोकरें
और अपमान
सहते हैं...
इसीलिये शायद!!
सजाकर उन्हें
हम
भगवान
कहते हैं!!
(३)
मैरीन ड्राईव,
बम्बई...
समुन्द्र के किनारे
दीवार पर बैठे
उस लहर को
आते देखता हूँ..
आती है
टकराती है..
लौट जाती है...
हार नहीं मानती...
फिर से
एक नई उमंग,
एक नये उत्साह के साथ
आती है..
टकराती है..
लौट जाती है...
बरसों से यह
सिलसिला
अनवरत जारी है!!
-समीर लाल ’समीर’
बस यूँ ही:
१.कुछ विल्स कार्डों पर देखा: मैने अभिव्यक्ति के बाद अपना नाम समीर लाल ’प्रेमी’ लिखा था उस जमाने में. शायद जवानी की हिलोर रही होगी या फिर बम्बई का असर. नहीं पता... :)
२. बात कुछ जंचती नजर आ रही हो तो और ढ़ूंढ़े जायें विल्स कार्ड वरना तो समय के साथ बारिश और दीमक तो चमत्कार कर ही लेंगे अपना.
विल्स कार्ड पर उतरी बातें
यादों में बसती हैं यादें...
जो मोती बन न रुक पाई..
भिगो गई उनको बरसातें.
-काश!! आँसूओं की बारिश से बचने का कोई छाता होता.
रविवार, मई 10, 2009
हूँह्ह!! दीज़ ब्लॉगर्स!
अब तो कोई उपलब्धि गिनाते हुए शरम सी आ जाती है कि न जाने लोग यह न समझ बैठे कि रोज कुछ न कुछ उठाकर ले आते हैं और लगते हैं बधाई लेने. मगर क्या करें, आये दिन कुछ न कुछ ऐसा हो जाता है कि बताना पड़ता है.
अब आज की ही ले लो. पोस्ट करने जा रहे थे कुछ और नजर प़ड़ी तो देखा अरे, यह तो तीन सौवीं पोस्ट है. न बतायें तो भी गलत. जब १०० वीं बताई थी, फिर २०० वीं बताई थी तो ३०० वीं के साथ ही ज्यादती क्यूँ कि न बताई जाये.
वैसे उपलब्धियों की महत्ता ही अपनों के द्वारा मनाई गई खुशी और बधाईयों से है. वरना, तो जंगल में मोर नाचा, किसने देखा.
याद है, जब कॉलेज के बाद स्कूटर खरीदा था. बड़े शान से सब दोस्तों के घर जा जाकर दिखाया, खूब बधाई बटोरी, पार्टी की और सीना फुलाये दोस्तों को बैठाया घूमते रहे. ये होती है खुशी.
और एक अब है, यहाँ कनाडा में बैठे बड़ी भारी कार भी खरीद ली. खुद देखी. खुद खुश हुए. सो गये. भला बताओ, ये भी कोई खुशी हुई. इसीलिए तो मजा ही नहीं आता है जी यहाँ पर.
तो हम बताये दे रहे हैं कि तीन सौवीं पोस्ट है.
उम्मीद तो यह भी की थी कुछ माह पूर्व कि जब हम तीसरा सैकड़ा लगा रहे होंगे तो हमारे बिरादर बवाल, लाल एण्ड बवाल पर साथ ही सैकड़ा लगवायेंगे मगर वो जाने कहाँ कहाँ और जाने कौन कौन से गम लादे घूम रहे हैं कि न तो दिख रहे हैं और न ही याद कर रहे हैं. वहाँ आँकड़ा ९१ पर अटका पिछले एक माह से.
हमारी कितनी ही गज़लें और गीत उनकी आवाज का इन्तजार कर रही हैं. शायद, तीसरा सैकड़ा देखकर वो जागें, यही उम्मीद करता हूँ.
आगे समाचार यह है कि १५ अप्रेल की सुबह ७ बजे ब्रसल्स, बेल्जियम के एयरपोर्ट पर जेट के विमान से उतरा तो एक अलग सी उमंग थी. शायद कुछ घंटो में बेटे बहु के पास पहुँच जाने की, या यूरोपीय यूनियन की राजधानी ब्रसल्स पहुँच जाने की, या कुछ देर बाद विश्व विख्यात ट्रेन ’यूरोस्टार’ से लंदन तक की यात्रा करने की या फिर इस यात्रा के दौरान इन्गलिश चैनल को पार करने के लिए उसके नीचे बनी ’यूरो टनल’ जिसे ’चनल’ भी कहते हैं, उसमें से गुजरने के अहसास की. जाने क्या, पर एक उमंग थी.
वहीं ब्रसल्स एयरपोर्ट पर नाश्ता किया. यूरिनल जाने के ५० यूरो सेन्ट याने लगभग ३० रुपये की मांग देख कर खांटी हिन्दुस्तानी मन नें नेचर्स कॉल तक रोक ली कि ट्रेन में चले जायेंगे, इतनी जल्दी भी क्या है.. :)
कुछ देर में यूरो स्टार में बैठने का सपना साकार हुआ और शुरु हुई दो घंटे की ब्रसल्स से लंदन ’सेन्ट पेन्क्राज़’ स्टेशन की यात्रा.

अब आज की ही ले लो. पोस्ट करने जा रहे थे कुछ और नजर प़ड़ी तो देखा अरे, यह तो तीन सौवीं पोस्ट है. न बतायें तो भी गलत. जब १०० वीं बताई थी, फिर २०० वीं बताई थी तो ३०० वीं के साथ ही ज्यादती क्यूँ कि न बताई जाये.
वैसे उपलब्धियों की महत्ता ही अपनों के द्वारा मनाई गई खुशी और बधाईयों से है. वरना, तो जंगल में मोर नाचा, किसने देखा.
याद है, जब कॉलेज के बाद स्कूटर खरीदा था. बड़े शान से सब दोस्तों के घर जा जाकर दिखाया, खूब बधाई बटोरी, पार्टी की और सीना फुलाये दोस्तों को बैठाया घूमते रहे. ये होती है खुशी.
और एक अब है, यहाँ कनाडा में बैठे बड़ी भारी कार भी खरीद ली. खुद देखी. खुद खुश हुए. सो गये. भला बताओ, ये भी कोई खुशी हुई. इसीलिए तो मजा ही नहीं आता है जी यहाँ पर.
तो हम बताये दे रहे हैं कि तीन सौवीं पोस्ट है.
उम्मीद तो यह भी की थी कुछ माह पूर्व कि जब हम तीसरा सैकड़ा लगा रहे होंगे तो हमारे बिरादर बवाल, लाल एण्ड बवाल पर साथ ही सैकड़ा लगवायेंगे मगर वो जाने कहाँ कहाँ और जाने कौन कौन से गम लादे घूम रहे हैं कि न तो दिख रहे हैं और न ही याद कर रहे हैं. वहाँ आँकड़ा ९१ पर अटका पिछले एक माह से.
हमारी कितनी ही गज़लें और गीत उनकी आवाज का इन्तजार कर रही हैं. शायद, तीसरा सैकड़ा देखकर वो जागें, यही उम्मीद करता हूँ.
आगे समाचार यह है कि १५ अप्रेल की सुबह ७ बजे ब्रसल्स, बेल्जियम के एयरपोर्ट पर जेट के विमान से उतरा तो एक अलग सी उमंग थी. शायद कुछ घंटो में बेटे बहु के पास पहुँच जाने की, या यूरोपीय यूनियन की राजधानी ब्रसल्स पहुँच जाने की, या कुछ देर बाद विश्व विख्यात ट्रेन ’यूरोस्टार’ से लंदन तक की यात्रा करने की या फिर इस यात्रा के दौरान इन्गलिश चैनल को पार करने के लिए उसके नीचे बनी ’यूरो टनल’ जिसे ’चनल’ भी कहते हैं, उसमें से गुजरने के अहसास की. जाने क्या, पर एक उमंग थी.
वहीं ब्रसल्स एयरपोर्ट पर नाश्ता किया. यूरिनल जाने के ५० यूरो सेन्ट याने लगभग ३० रुपये की मांग देख कर खांटी हिन्दुस्तानी मन नें नेचर्स कॉल तक रोक ली कि ट्रेन में चले जायेंगे, इतनी जल्दी भी क्या है.. :)
कुछ देर में यूरो स्टार में बैठने का सपना साकार हुआ और शुरु हुई दो घंटे की ब्रसल्स से लंदन ’सेन्ट पेन्क्राज़’ स्टेशन की यात्रा.

लिलि यूरोप स्टेशन एक मात्र स्टॉपेज था और बस, उसके बाद ’यूरो टनल’ फिर लंदन ’सेन्ट पेन्क्राज़’ स्टेशन.
जैसे ही ’यूरो टनल’ शुरु हुई, मन में न जाने कैसी भावना घर कर गई. घड़ी देखते रहे. पूरे २५ मिनट लगे इन्गलिश चैनल के एवरेज लगभग २५ मीटर नीचे से गुजरते.

इस दौरान इन्गलिश चैनल के नाम पर मिहिर सेन याद आये. मिहिर सेन ने सन १९५८ में इसी इन्गलिश चैनल को १४ घंटे ४५ मिनट में तैर कर पार किया था. हमने उसी इन्गलिश चैनल को २५ मिनट में पार कर लिया.
ब्लॉगर मन सोचने लगा ’तो क्या हम मिहिर सेन से बेहतर कहलाये. क्या मिहिर सेन नें प्रासंगिगता खो दी.’

विचार उठा तो समझ आया कि उनका उद्देश्य इन्गलिश चैनल पार करना नहीं, वरन तैराकी का प्रदर्शन था. उसमें वो आज भी प्रासंगिग है मगर उद्देश्य सिर्फ ’इन्गलिश चैनल’ पार करना होता तो आज उनकी औकात दो कौड़ी की हो जाती.
सोचता हूँ उद्देश्य का किसी भी विचार के साथ जुड़ा होना कितना जरुरी है उसकी गहराई आँकने के लिए, चाहे वो साहित्यकारी ही क्यूँ न हो.
अगर बुद्दिमत्ता, रचना-धर्मिता आदि की बात हो तो दीगर तरह से विचार करना पड़ेगा मगर इन्गलिश चैनल पार करने भर की बात की तरह यदि साहित्य के प्रचार, प्रसार और विस्तार की बात हो तो आज के युग मे यूरोस्टार की तरह, मूँह मे चुरट दबाये ब्लॉग और नेट की प्रासंगिगता को हूँह!! दीज़ ब्लॉगर्स! कहना मूर्खता का परिचायक ही कहलाया.
मगर मूर्खता करने से कौन किसे कब किस युग में रोक पाया है जो हम आज रोक लेंगे. ये तो अपने आप अपनी गति मारी जाती रही है, अबकी बार भी मर जायेगी, चिन्ता की कोई बात नहीं.
एक समीक्षा: एक लाईना
फिल्म का नाम: विदेश (हेवन ऑन अर्थ)

भारत में बनी बड़ी भारी कोई नौटंकी फिल्म, कनाडा में बनी इस नौटंकी के सामने फीकी पड़ जाये. दिखाते हैं कि अगर सच बोला तो साँप नहीं काटेगा, वरना काट लेगा. साँप प्रिति जिन्टा का चरित्र निर्धारण कर रहा है और पूरा परिवार बैठा साँप के जजमेन्ट का इन्तजार करता है. गजब भई, ऐसा कनाडा है.
न सिर, न पैर
बेवजह प्रवासियों से बैर.
ऐसा कहीं होता है क्या यार..
कि सिर्फ विदेशी ग्रांट मिलने से प्यार
( कहो, दीपा जी-कुछ तो कहो!!! )
माना कि थोड़ा बहुत कुछ सही होगा
मगर फिल्म बनाने लायक नहीं होगा.
छोड़ो ये सब, एक उचित और सार्थक कार्य करो इस मौके पर केक मांगने के बदले:
”धरा बचाओ, पेड़ लगाओ’ अभियान शुरु कर रहा हूँ...दायें पैनल में इसके कोड है, अपने ब्लॉग पर लगा कर जरा इस अभियान में योगदान दो न इस मौके पर. बहुत साधुवाद होगा आपका और ३०० वीं पोस्ट लिखना सार्थक हो जायेगा:

बुधवार, मई 06, 2009
ओ परदेशी, अब बस कर...
कल ही प्रवासी साहित्य पर आधारित एक पत्रिका पलट रहा था. जड़ से बिछड़ जाने की वेदना मानो चहु ओर छितरी पड़ी हो. हर कलम रो रो कर बस एक ही धुन में गा रही थी-हाय!! मेरी जड़. जाने क्यूँ!!
कविमना प्रवासी हुआ और बस, बह निकला जड़ से बिछड़ जाने की वेदना लिए एक झर झर झरना. सब सेट फार्मेट से-वो बरगद के पेड़, गांव की माटी की सौंधी खुशबू, ताल तलैया, लछ्छो मौसी, बचपन का साथी बिसाहू और जाने क्या क्या.
इतनी वेदना कि जड़ तो जड़, धरती रो पड़े. हाय, यह क्यूँ छूटा? कैसे जोड़ लूँ फिर इसे.
सोचता हूँ पूछ कर देखूँ कि कभी सोचा है उनके बारे में जो वहीं जु़ड़े हुए हैं, जहाँ से तुम टूटे..कभी जाना उनका हाल? कभी रख कर देखा उनके जूते में अपना पैर?
बहुत जिगरा चाहिये जड़ से जुड़े रहने में. माना तुम भी कभी उसी जड़ से जुड़े बहुत खुशी से जी रहे थे. सो तो तुम एक जमाने में साइकिल से स्कूल भी जाया करते थे. अब कार से चलते हो..एक दिन फिर से साइकिल से दफ्तर जाने की बात सोच कर देखना. क्या हुआ? जाते तो थे न बचपन में वो दूर तक स्कूल में हँसते हँसते दोस्तों के साथ.
शायद इसी विचार श्रृंखला में उभरी है यह रचना या फिर शायद इतने दिन तक भारत में था, उससे कुछ निकला हो या फिर कहीं वैसी हालत तो नहीं, जब किसी अंग में दर्द बहुत बढ़ जाये तो इन्सान उस अंग को ही अलग कर डालने की कामना कर बैठता है.
नहीं मालूम, आप ही बतायें:

कविमना प्रवासी हुआ और बस, बह निकला जड़ से बिछड़ जाने की वेदना लिए एक झर झर झरना. सब सेट फार्मेट से-वो बरगद के पेड़, गांव की माटी की सौंधी खुशबू, ताल तलैया, लछ्छो मौसी, बचपन का साथी बिसाहू और जाने क्या क्या.
इतनी वेदना कि जड़ तो जड़, धरती रो पड़े. हाय, यह क्यूँ छूटा? कैसे जोड़ लूँ फिर इसे.
सोचता हूँ पूछ कर देखूँ कि कभी सोचा है उनके बारे में जो वहीं जु़ड़े हुए हैं, जहाँ से तुम टूटे..कभी जाना उनका हाल? कभी रख कर देखा उनके जूते में अपना पैर?
बहुत जिगरा चाहिये जड़ से जुड़े रहने में. माना तुम भी कभी उसी जड़ से जुड़े बहुत खुशी से जी रहे थे. सो तो तुम एक जमाने में साइकिल से स्कूल भी जाया करते थे. अब कार से चलते हो..एक दिन फिर से साइकिल से दफ्तर जाने की बात सोच कर देखना. क्या हुआ? जाते तो थे न बचपन में वो दूर तक स्कूल में हँसते हँसते दोस्तों के साथ.
शायद इसी विचार श्रृंखला में उभरी है यह रचना या फिर शायद इतने दिन तक भारत में था, उससे कुछ निकला हो या फिर कहीं वैसी हालत तो नहीं, जब किसी अंग में दर्द बहुत बढ़ जाये तो इन्सान उस अंग को ही अलग कर डालने की कामना कर बैठता है.
नहीं मालूम, आप ही बतायें:

देखता हूँ तुम्हारी हालत
पढ़ता हूँ कागज पर
उड़ेली हुई
तुम्हारी वेदना...
जड़ से छूट जाने की
जड़ से टूट जाने की...
थक गया हूँ
सुन सुन कर
तुम्हारा वो दर्द
बार बार..
कान से मवाद बन कर
बहने लगी है
तुम्हारी यह
कागजी चित्कार...
किस जड़ से टूटने की
बात करते हो तुम..
किस जड़ से वापस
जु़ड़ जाना चाहते हो तुम..
वो जड़
जिसे तुम्हारे ही अपनों ने
दीमक की तरह
चाट चाट कर
खोखला कर दिया है...
सच कहूँ दोस्त!!
तुम्हारी वेदना भी
कुछ वैसी ही है
जैसे..
कितना मनभावन लगता है
रेल के उस वातानकुलित
डिब्बे में बैठकर देखना...
गर्मी के तेज तपन के बीच
तलाब में कूद कर
नहाते बच्चे,
धूल में सने पैर लिए
आम के पेड़ के नीचे
सुस्ताते ग्रमीण
उपलों पर थापी रोटी को
प्याज के साथ खाते
लोग..
जिसे तुम कागज पर
लिखते हो
कविता बनाकर...
वो बच्चों की स्वछन्दता,
पेड़ों की ठंडी छाँव में
आराम करते
निश्चिंत ग्रमीण..
मुट्ठे से तोड़ कर प्याज
से साथ
उपलों पर सिकीं
रोटी का सौंधा स्वाद..
कितना अच्छा लगता है...
बस, लेकिन सिर्फ देखना
हाँ, सिर्फ देखना
वो भी उस वातानकुलित डिब्बे से..
आसमान में उड़ कर
तुम शहर का मानचित्र तो बना सकते हो..
मगर शहर की धड़कन तो
शहर में आकर ही सुनाई देगी..
मैं जानता हूँ
तुम उन धड़कनों की नाद
नहीं झेल पाओगे..
बहरे हो जाओगे तुम.
बुरा मत मानना,
मगर अब तुम इस
काबिल ही नहीं बचे
कि इन जड़ों से जु़ड़ सको...
सुविधायें बहुत जल्दी
अपना गुलाम बना लेती हैं और
सुविधा की गुलामी की जंजीरे
इतनी आसानी से नहीं टूटती..
क्या तुम जी सकोगे..
जब इस भीषण गर्मी में
बिना बिजली, पानी के
सारी रात बस
करवटें बदलोगे और
पसीने में भीगे
लगेगा मानो
सारे बदन को
सैकड़ों चीटियाँ
काट रही हैं...
सारी रात सुबह होने का इन्तजार
और सुबह से इस इन्तजार में कि
रात हो जाये
तो चैन आये..
भूल जाओगे
जड़ से टूटने
का गम...
जब खुद को खुद
साबित करने के लिए..
चक्कर लगाओगे
किसी सरकारी दफ्तर के..
हाथ में मतदाता परिचय पत्र लिए,
साथ में टेलिफोन या बिजली का बिल,
दो खुद के चित्र,
खुद के साथ होते हुए भी,
किसी और से सत्यापित करवाये हुए..
एक हलफनामा कि
मैं मैं ही हूँ..
और फिर भी न साबित कर पाओगे
उस बाबू को
कि तुम तुम ही हो..
जब तक बाबू की हथेली
न गरम कर दो...
कागज पर लिख देने
जितना आसान नहीं है..
दिल और दिमाग के बीच
पर्याप्त दूरी रखते हुए
करनी को अंजाम देना..
रोज जीने की जद्दो जहद में
रोज मरना...
मतदान करके इठलाना
अपने अधिकार के प्रयोग पर,
यह जानते हुए भी कि
एक बार फिर हमने
हमें ही लूटने के लिए
एक नया लुटेरा चुन लिया है...
कभी इत्मिनान से सोचना..
किसका दर्द वाकई दर्द है...
जो तुमने कागज पर
उड़ेल दिया है...
या फिर वो
जो किसी ने जड़ से जुड़े
आदतन झेल लिया है....
--समीर लाल ’समीर’
सोमवार, मई 04, 2009
कोई पोस्ट का शतक बना रहा है. कोई टिप्पणी का आंकड़ा बता रहा है. कोई कुछ और कोई कुछ. एक को तो कुछ न सुझा तो यही बता गये कि कल से नियमित लिखेंगे. लिखना भाई, हम भी कल से ही नियमित पढ़ेगे.
एक रोचक बात, अभी पिछले दिनों एक पोस्ट की थी..बेचारा सुअर उस पर टिप्पणियों का सिलसिला चला. उस पोस्ट में चार फोटो चैंपी गई थी. एक सुअर की, एक हमारी, एक पत्नी की और एक पाकिस्तान के पत्रकार की. अब उस पर एक मित्र की टिप्पणी मिली:
प्रियवर समीर लाल जी!
आपकी पूरी यात्रा बड़े मनोयोग से पढ़ी। सूअर के सुन्दर चित्र भी देखे। बाथरूम का काँच भी देखा। बाथरूम के सामने एक सुन्दर छवि के भी दर्शन का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ। शायद वो अपकी जीवन-संगिनी होंगी। उनको मेरा अभिवादन पहुँचाने की कृपा करें।
-जीवन संगिनी वाली बात समझ आई कि वो हमारी पत्नी के लिए है और उसके लिए हमारा आभार एवं साधुवाद. धन्यवाद तो उसकी तरफ से भी है.
अब बच गया दूसरा स्टेटमेन्ट:
सूअर के सुन्दर चित्र भी देखे।
-एक तो यह बहुवचन में है और उस पर से इसके सिवा और कोई और स्टेटमेन्ट भी नहीं है याने सुअर और वो पाकिस्तानी पत्रकार (यहाँ तक सही है) और उस पर से मैं..सारे चित्र इसी तरह याने सब सुअर पसंद आये...गज़ब किया भाई..हमें तो बक्श देते. खैर, आपकी जैसी इच्छा. :)
अब नमस्ते!
आपके मनोयोग को साधुवाद!!!
आज ही कनाडा पहुँचा हूँ सही मायने में और अपने आपको इस माहौल में ढालने के प्रयास में लगा हूँ. सरल है स्मूथ माहौल में ढालना जहाँ परेशानियों से साबका न पड़े. तो ढल ही जाऊँगा...मगर तब तक यह पोस्ट जरुरी थी. इसलिये कर दी. अगली बार ऐसी पोस्ट करुँगा कि हिल जाओगे. यह उम्मीद मैं हर बार करता हूँ..पिछली बार भी की थी. :)
अब नमस्ते!!
जरा बधाई तो दे दो!! १ लाख की आवा जाही पूरी होने पर..
गुरुवार, अप्रैल 30, 2009
९९ का फेरा: हिन्दी ब्लॉगिंग को घेरा
कल से हिन्दी ब्लॉगजगत में अमित भाई एक खेला शुरु किए हैं और लोग टप टपा टप खेलते जा रहे हैं. खेल ऐसा चला कि एक तो एकदमे सोए जीतू जागकर उठ बैठे और लगे खेलने और दूसरे उनींदे से पंकज बैगाणी, वो भी चले आये.
खेला, अमित ने किसी अमरीकी ब्लॉगर के ब्लॉग से लिया है जिसमें ९९ आईटम की लिस्ट है और आपको उसमें से जो काम आप कर चुके हो, उसे अपने ब्लॉग पर लिस्ट में बोल्ड करके दिखाना है.
जब हमने देखा तो लगा ऐसी लिस्ट हिन्दी ब्लॉगर्स के लिए, जो कि अधिकतर भारत में है और न जाने कितने ही कभी भारत के बाहर भी न निकले हों, उचित नहीं प्रतीत होती. मात्र एक प्रश्न, क्या आप कभी भारत के बाहर गये हैं? बोल्ड न कर पाओ तो २५ से ज्यादा प्रश्न तो आपके लिए बने ही नहीं हैं.
वैसे ही-
क्या आप पेरिस गये हैं? नहीं.
क्या आपने पैरिस में ऐफिल टॉवर के शीर्ष से नज़ारा किया ? अरे, जब पेरिस ही नहीं गये तो यह कैसा प्रश्न?
ये तो वैसा ही नहीं हो गया-
क्या आपकी शादी हो गई? नहीं.
आपके कितने बच्चे हैं? ये लो...खैर, आजकल दूसरे प्रश्न का उत्तर आ भी सकता है पहले का न होते हुए भी. समाज काफी विकास कर गया है.
वैसा ही शायद तकनिकी विकास भविष्य में ऐसा हो जाये कि बिना गये यह सब बातें संभव हो जायें किन्तु अभी तो संभव नहीं है. अमित टेक्नालॉजी के महारथी हैं, शायद भविष्य के नजरिये से पूछा हो. वैसे, इस तरह के खेल आज के हिन्दी ब्लॉगजगत में सिर्फ अमित ही ला सकते हैं, यह भी तय है. जागरुक बंदा है और हमारे लिए तो खैर उसका ब्लॉग पसंदीदा जगह है ही.

खेला, अमित ने किसी अमरीकी ब्लॉगर के ब्लॉग से लिया है जिसमें ९९ आईटम की लिस्ट है और आपको उसमें से जो काम आप कर चुके हो, उसे अपने ब्लॉग पर लिस्ट में बोल्ड करके दिखाना है.
जब हमने देखा तो लगा ऐसी लिस्ट हिन्दी ब्लॉगर्स के लिए, जो कि अधिकतर भारत में है और न जाने कितने ही कभी भारत के बाहर भी न निकले हों, उचित नहीं प्रतीत होती. मात्र एक प्रश्न, क्या आप कभी भारत के बाहर गये हैं? बोल्ड न कर पाओ तो २५ से ज्यादा प्रश्न तो आपके लिए बने ही नहीं हैं.
वैसे ही-
क्या आप पेरिस गये हैं? नहीं.
क्या आपने पैरिस में ऐफिल टॉवर के शीर्ष से नज़ारा किया ? अरे, जब पेरिस ही नहीं गये तो यह कैसा प्रश्न?
ये तो वैसा ही नहीं हो गया-
क्या आपकी शादी हो गई? नहीं.
आपके कितने बच्चे हैं? ये लो...खैर, आजकल दूसरे प्रश्न का उत्तर आ भी सकता है पहले का न होते हुए भी. समाज काफी विकास कर गया है.
वैसा ही शायद तकनिकी विकास भविष्य में ऐसा हो जाये कि बिना गये यह सब बातें संभव हो जायें किन्तु अभी तो संभव नहीं है. अमित टेक्नालॉजी के महारथी हैं, शायद भविष्य के नजरिये से पूछा हो. वैसे, इस तरह के खेल आज के हिन्दी ब्लॉगजगत में सिर्फ अमित ही ला सकते हैं, यह भी तय है. जागरुक बंदा है और हमारे लिए तो खैर उसका ब्लॉग पसंदीदा जगह है ही.

इसी विचार से हिन्दी चिट्ठाजगत को मद्दे नजर रख दूसरे ९९ आईटम, जिससे आप जुड़ा महसूस कर अधिक से अधिक बोल्ड कर पायेंगे. नियम वही, अमित के शब्दों में:
’करना कुछ अधिक नहीं है, बस यह लिस्ट कॉपी कर अपने ब्लॉग पर चेप लें और इनमें से जितने तीर-तोप चला चुके हैं उनको बोल्ड कर दें और बाकी को सामान्य रखें और पोस्ट छाप दें। यानि कि मामला एकदम आसान है!!’
अमित की लिस्ट का पहला प्रश्न ’अपना ब्लॉग आरंभ किया ’ इसलिए नहीं ले रहा हूँ कि नहीं खोला होगा तो फिर लिस्ट चैपेगा कहाँ इस प्रश्न को बोल्ड करने के लिए. :)
तो लिजिये लिस्ट:
१.छद्म नाम से ब्लॉग खोला.
२.बेनामी जाकर टिपियाये.
३.किसी विवाद के सेन्टर पाईंट बने.
४.फुरसतिया जी की पोस्ट एक सिटिंग पूरी में पढ़ी.
५.शास्त्री जी ने आपके बारे में लिखा.
६.अजदक की कोई पोस्ट समझ में आई.
७.टंकी पर चढ़े.
८.लोग टंकी से उतारने आये.
९.टंकी से खुद उतर आये.
१०.खुद की आवाज में गाकर पॉडकास्ट किया.
११.किसी ने अगली बार से न गाने की सलाह दी.
१२.अगली बार से न गाने की सलाह मानी.
१३.किसी ने आपका कार्टून बनाया.
१४.किसी की पोस्ट चोरी करके अपने ब्लॉग पर अपने नाम से छापी.
१५. चोरी की पोस्ट छापने के बाद पकड़े गये.
१६. चोरी की पोस्ट छापकर पकड़े जाने के बाद भी बेशर्मों की तरह सीना जोरी करते रहे.
१७. साहित्यकार होने का भ्रम पाला.
१८. लिखने के साथ यह भी बताना पड़ा कि यह गज़ल है और यह व्यंग्य.
१९. अपनी पोस्ट पढ़ने के लिए ईमेल से निमंत्रित किया.
२०. ईमेल निमंत्रण के जबाब में कोई फटकार खाई कि आगे से ऐसी मेल न भेंजे.
२१. फटकार के बावजूद ईमेल भेजते रहे.
२२.दो ब्लॉगर के बीच झगड़ा करवाया.
२३. दो ब्लॉगर के बीच झग़ड़ा करवाकर शांत कराने पहुँचे.
२४. किसी सामूहिक ब्लॉग के सदस्य बने.
२५. किसी सामूहिक ब्लॉग की सदस्यता त्यागी.
२६. किसी सामूहिक ब्लॉग से निकाले गये.
२७. बाथरुम में बैठकर ब्लॉग पोस्ट की.
२८. ट्रेन से कोई पोस्ट लिखी.
२९. ताऊ की पहेली बूझी.
३०. पोस्ट लिखने और पोस्ट करने के बाद डिलिट की.
३१. ब्लॉगवाणी में आज की पसंद पर पहले नम्बर आये.
३२. चिट्ठाजगत की धड़ाधड़ में १ नम्बर पर आये.
३३. किसी के ब्लॉग पर झूठी तारीफ की.
३४. किसी फिल्म की समीक्षा पोस्ट की.
३५. ब्लॉग पोस्ट के माध्यम से दूसरे ब्लॉगर से तू तू मैं मैं की.
३६. कोई ऐसी पोस्ट की जिसे किसी ने पढ़ा ही नहीं.
३७. तरकश चुनाव लड़े उदीयमान ब्लॉगर ऑफ द ईयर वाला.
३८. किसी की पोस्ट पढ़कर लगा कि काश! मैं भी ऐसा लिख पाता.
३९. किसी की पोस्ट पढ़कर ऐसा लगा कि हे भगवान!! कभी गल्ति से भी मैं ऐसा न लिख दूँ.
४०. बिना उस स्थल पर गये वहाँ का यात्रा संस्मरण लिखा.
४१. कभी अपनी कविता किसी विदेशी कवि के नाम से चैंपी.
४२. कभी आपकी किसी हास्य प्रधान पोस्ट को किसी ने टिप्पणी में अति मार्मिक बताया.
४३. बिना पोस्ट पढ़े टिप्पणी की.
४४. कभी अपने ही लिखे पर शरम आई.
४५. कभी काफी दिनों तक न लिख पाने की माफी मांगी, इस भ्रम में कि लोग इन्तजार कर रहे होंगे.
४६. जब दिन भर टिप्पणी नहीं आई तो खुद से टिप्पणी करके चैक किया कि टिप्पणी बॉक्स काम कर रहा है कि नहीं.
४७. कहीं टिप्पणी लम्बी हो जाती इसलिए उसे पोस्ट बना कर पोस्ट किया.
४८. कभी अपनी बात उल्टी पड़ जाने पर बचने के लिए ऐसा कहा कि ’हम तो मौज ले रहे थे.’
४९. कभी अखबार में आपके ब्लॉग का जिक्र हुआ.
५०. अखबार में आपके ब्लॉग के जिक्र को स्कैन करा के ब्लॉग पोस्ट बना कर छापा.
५१. अखबार की स्कैन कॉपी मित्रों और रिश्तेदारों को ईमेल से भेजी.
५२. ’आज कुछ लिखने का मन नहीं है’ कह कर २५ लाईन से ज्यादा की पोस्ट लिखी.
५३. एक ही पोस्ट को अपने ही पाँच ब्लॉगों से छापा.
५४. अपनी पोस्ट बिना टिप्पणी के एग्रीगेटर के दूसरे पन्ने पर चले जाने से उसे डिलिट कर फिर से छापा ताकि वो फिर से उपर आ जाये.
५५. गुस्से में अपने ब्लॉगरोल से किसी का ब्लॉग अलग किया.
५६. एक दिन मे २५ से ज्यादा ब्लॉग पर टिपियाया.
५७. किसी और की पोस्ट पढ़ने के लिए अपने ब्लॉग पर सिर्फ उसका लिंक देकर एक पोस्ट बनाई.
५८. कभी कोई ब्लॉगर मीट अटेंड की.
५७. कभी ब्लॉगर मीट अटेंड करके उसकी रिपोर्ट लिखी.
५८. कभी किसी शोक समाचार पर भूल से बधाई दी.
५९. कभी किसी से पोस्ट पर मजाक किया और सामने वाले ने बुरा मान लिया.
६०. कभी आपकी खिलाफत करती किसी ने ब्लॉग पोस्ट लिखी.
६१. क्या ’साधुवाद’ टाईप किसी जुमले से आपकी अलग पहचान बनी.
६२. क्या ब्लॉग पोस्ट पर आपका कोई तकिया कलाम है.
६३. कभी छत पर बैठ कर कोई ब्लॉग पोस्ट लिखी.
६४. कभी कुछ लिखना चाहा किन्तु किसी को बुरा न लग जाये इसलिए नहीं लिखा.
६५. कभी पूरी पोस्ट तैयार हो जाने के बाद भूल से डिलिट हो गई.
६६. क्या इस भूल से डिलिट हुई पोस्ट के लिए एक पोस्ट की कि पोस्ट डिलिट हो गई और अब फिर से लिख पाना संभव नहीं.
६७. क्या यह बताने के लिए कि ’अब अगले पाँच दिन नहीं लिख पाऊँगा’ पोस्ट लगाई जबकि यूँ भी आप एक महिने से नहीं लिख रहे थे.
६८.कभी आपका ब्लॉग एग्रीगेटर से अलग किया गया.
६९. क्या कभी तकनिकी कारणों से पोस्ट एग्रीगेटर पर न दिखने पर आपने एग्रीगेटर की तानाशाही पर पूरा ब्लॉगजगत सर पर उठा लिया.
७०. कभी किसी को अपने ब्लॉग का सदस्य बनाने निमंत्रण भेजा.
७१. कभी किसी से उसके ब्लॉग का सदस्य बनने का निमंत्रण मिला.
७२. कभी किसी को अपने ब्लॉग का सदस्य बनाने निमंत्रण भेजा और उसने ठुकरा दिया.
७३. कभी किसी से उसके ब्लॉग का सदस्य बनने का निमंत्रण मिला और आपने ठुकरा दिया.
७४. आपकी गज़ल के बेबहर होने पर किसी ने टोका.
७५. क्या आपने माईक्रो गद्य लिखा और लोगों ने उसे कविता समझ कर बधाई दी.
७६. इंक ब्लॉगिंग की.
७७.अपनी टिप्पणी में अपना यू आर एल लिख छोड़ा ताकि लोग क्लिक करके आयें.
७८. टिप्पणी में वर्तनी दोष सुधारने के लिए फिर से टिप्पणी की.
७९. आपके नाम से कोई और टिप्पणी कर गया.
८०. आपके नाम से कोई और टिप्पणी कर गया और आप इस पर पोस्ट लिखने की बजाय हर तरफ स्पष्टीकरण देते घूमे.
८१. अपनी प्रोफाईल में अपनी जगह दूसरे की तस्वीर चैंप दी.
८२. अपनी हर पोस्ट के शीर्षक के साथ डेश लगाकर अपना नाम लिखा.
८३. अपनी पोस्ट में अपना ही मजाक उड़ाया.
८४. ’तू मेरी पीठ खुजा, मैं तेरी’ को ब्रह्म वाक्य मान कर ब्लॉगिंग की.
८५. एड सेन्स लगाकर हिन्दी ब्लॉग पर कमा लेने का भ्रम पाला.
८६. आये दिन एड सेन्स खाता चैक किया कि कितने पैसे जमा हो गये.
८७. एड सेन्स खाते का बैलेन्स जीरो होने के बावजूद भी एड सेन्स के हिन्दी में बन्द होने पर उदास हुए.
८८. नम्बर ८७ के उदासी के आलम में पोस्ट लिखी.
८९. ब्लॉग पर स्टेट काऊन्टर लगाया.
९०. दिन में तीन बार स्टेट काऊन्टर पर आवा जाही चेक की.
९२. शतकीय पोस्ट की सूचना पोस्ट लिखी.
९३. स्टेट काऊन्टर के १०००० या २०००० पार करने की सूचना पोस्ट लिखी.
९४. स्टेट काऊन्टर को मेन्यूलि बढ़ा कर लगाया.
९५. अपने ब्लॉग पर आवाजाही का ग्राफ बना कर पोस्ट कर गौरवान्वित महसूस किया.
९६. पत्नि का ब्लॉग बनवाया.
९७. पत्नि के नाम से खुद ही पोस्ट लिख कर डाल दी.
९८. अपनी हर पोस्ट पर पत्नि का और उसकी हर पोस्ट पर अपना कमेंट डाला.
९९. अपना ब्लॉग डिलिट किया.
नोट: हमारे तो लगभग सभी बोल्ड टाईप ही हैं, कुछ को छोड़ कर. :) आप तो अपनी बताओ.
मंगलवार, अप्रैल 28, 2009
बेचारा सुअर....
कल देर रात लंदन की यात्रा से लौटे. यहाँ से याने यॉर्क से लंदन की ३.३० घंटे की ड्राईव थी और लौटते वक्त नॉरिच शहर वाया केम्ब्रीज लौटे. नॉरिच में एक मित्र परिवार के साथ लंच था तो वापास आते पूरे ७ घंटे की ड्राईव हो गई.
यहाँ हालाँकि भारत की तरह ही लेफ्ट में गाड़ी चलाते हैं और हैं भी मेन्यूल गियर मगर फिर भी स्पीड कनाडा से ज्यादा थी. लगभग पूरा सफर १३० किमी की रफ्तार से गाड़ी चलाने में आनन्द आ गया. रास्ता भी बहुत हरियाली से भरा हुआ और मौसम भी उतना ही सुहाना. बीच बीच में वो सरसों के खेत भी मिले जिनमें कभी काजोल दौड़ी थी फिल्म ’दिल वाले दुल्हनिया ले जायेंगे’ के लिए.
इस बीच मेनचेस्टर भी हो आये हैं. बहुत कुछ है बताने को इन शहरों के बारे में, इनकी तस्वीरें और यहाँ आने के लिए बेल्जियम से यहाँ तक यूरोस्टार रेल से यादगार यात्रा. लगता है ३ तारीख को कनाडा पहुँच कर ही तस्सली से लिखना होगा.
हाँ, कनाडा जाने के नाम पर एकाएक आज अरविन्द मिश्रा जी की पोस्ट पर नजर पड़ी. टीवी पर तो खैर देख ही रहे थे कि कनाडा-अमरीका में स्वाइन-फ्लू का प्रकोप हुआ है और इसके महामारी बन जाने का खतरा विश्व स्तर पर मंडरा रहा है.अखबार और टीवी देखता हूँ तो हर अमरीकी और कनैडियन परेशान और हैरान. साबुन से बीस बार हाथ धोये जा रहे हैं. हर बार डिसइन्फेक्टेन्ट लगा रहे हैं जैसे बर्ड फ्लू के समय एतिहात बरते जा रहे थे. लग रहा है मानो इससे बच गये तो अमर हो जायेंगे. फिर कभी नहीं मरेंगे.
एक पतले से धागे का फासला है जिन्दगी और मौत के बीच. धागा टूटा नहीं कि आप उस पार. फिर भी जीजीविषा की मोटी रस्सी आपको उस धागे से पार जाने से रोके रखने का अंतिम क्षणों तक प्रयास करती रहती है. न जाने क्यूँ?
खैर, मिश्र जी को पढ़ा, टीवी देखा, अखबार पढ़ा-जाना और समझा. जाना तो वहीं है. तसल्ली ये लग गई कि यह महामारी सूअर के माध्यम से फैल रही है. बहुत राहत लगी कि हम तो सूअर खाते नहीं. ये तो गोरे जाने, उनकी परेशानी है.
मन ही मन बड़े खुश और लगे सोफे पर लेटकर मूवी देखने ’रब ने बना दी जोड़ी’. प्रिन्ट शायद थो़ड़ा खराब था तो मन भटका. विचार फिर मन में कौंधे कि आखिर मैं कितना सेफ हूँ सिर्फ इसलिए कि सूअर नहीं खाता. अवलोकन करते ही चौंक पड़ा-अरे, काहे का सेफ!!! सूअर भी तो सूअर कहाँ खाते हैं? फिर भी मेन रोल में वो ही हीरो हैं इस एपिसोड के. फिर अपने काहे के सेफ?

यहाँ हालाँकि भारत की तरह ही लेफ्ट में गाड़ी चलाते हैं और हैं भी मेन्यूल गियर मगर फिर भी स्पीड कनाडा से ज्यादा थी. लगभग पूरा सफर १३० किमी की रफ्तार से गाड़ी चलाने में आनन्द आ गया. रास्ता भी बहुत हरियाली से भरा हुआ और मौसम भी उतना ही सुहाना. बीच बीच में वो सरसों के खेत भी मिले जिनमें कभी काजोल दौड़ी थी फिल्म ’दिल वाले दुल्हनिया ले जायेंगे’ के लिए.
इस बीच मेनचेस्टर भी हो आये हैं. बहुत कुछ है बताने को इन शहरों के बारे में, इनकी तस्वीरें और यहाँ आने के लिए बेल्जियम से यहाँ तक यूरोस्टार रेल से यादगार यात्रा. लगता है ३ तारीख को कनाडा पहुँच कर ही तस्सली से लिखना होगा.
हाँ, कनाडा जाने के नाम पर एकाएक आज अरविन्द मिश्रा जी की पोस्ट पर नजर पड़ी. टीवी पर तो खैर देख ही रहे थे कि कनाडा-अमरीका में स्वाइन-फ्लू का प्रकोप हुआ है और इसके महामारी बन जाने का खतरा विश्व स्तर पर मंडरा रहा है.अखबार और टीवी देखता हूँ तो हर अमरीकी और कनैडियन परेशान और हैरान. साबुन से बीस बार हाथ धोये जा रहे हैं. हर बार डिसइन्फेक्टेन्ट लगा रहे हैं जैसे बर्ड फ्लू के समय एतिहात बरते जा रहे थे. लग रहा है मानो इससे बच गये तो अमर हो जायेंगे. फिर कभी नहीं मरेंगे.
एक पतले से धागे का फासला है जिन्दगी और मौत के बीच. धागा टूटा नहीं कि आप उस पार. फिर भी जीजीविषा की मोटी रस्सी आपको उस धागे से पार जाने से रोके रखने का अंतिम क्षणों तक प्रयास करती रहती है. न जाने क्यूँ?
खैर, मिश्र जी को पढ़ा, टीवी देखा, अखबार पढ़ा-जाना और समझा. जाना तो वहीं है. तसल्ली ये लग गई कि यह महामारी सूअर के माध्यम से फैल रही है. बहुत राहत लगी कि हम तो सूअर खाते नहीं. ये तो गोरे जाने, उनकी परेशानी है.
मन ही मन बड़े खुश और लगे सोफे पर लेटकर मूवी देखने ’रब ने बना दी जोड़ी’. प्रिन्ट शायद थो़ड़ा खराब था तो मन भटका. विचार फिर मन में कौंधे कि आखिर मैं कितना सेफ हूँ सिर्फ इसलिए कि सूअर नहीं खाता. अवलोकन करते ही चौंक पड़ा-अरे, काहे का सेफ!!! सूअर भी तो सूअर कहाँ खाते हैं? फिर भी मेन रोल में वो ही हीरो हैं इस एपिसोड के. फिर अपने काहे के सेफ?

चलो, देखी जायेगी. जाना तो है ही है. कनाडा भी और उपर भी. जब जो जो बदा होगा, तब वो वो झेलेंगे.
एक मजेदार बात तो भारत से निकलते वक्त ऐसी हुई कि क्या कहें.
अक्सर ही कनाडा आते समय जबलपुर से दिल्ली फ्लाईट के दो दिन पूर्व आ जाता हूँ ताकि मन भी शांत हो ले और इत्मिनान से निकलें. पीछे छूटे परिवार के सदस्य और साथी भी इस सेटलमेंट टाइम में सेटल हो जाते हैं कि अभी तो भारत में ही है. सब सोच का खेल है. हर बार ग्रेटर नोएडा में चाचा के घर ही रुकना होता है. इस बार चलते वक्त बेटे का फोन आ गया कि हयात होटल के पाइंट पड़े हैं, आप इस्तेमाल कर लिजिये. हमने भी सोचा, चलो हयात में रुक लेते हैं और भीका जी कामा प्लेस वाले हयात में कमरा बुक करा लिया.
बार बार रुकते रुकते बेटा उनके डायमंड कल्ब का मेम्बर हो लिया है तो होटल वाले जरा एकस्ट्रा सजग थे और हमसे पूछा कि सर, आप और मैडम आ रहे हैं तो रुम अपग्रेड कर दें. हमें भी क्या, हमने कह दिया-कर दो.
होटल पहुँचे तो बेहतरीन रुम इन्तजार कर रहा था. पहुँचते ही नहाने चले गये और जब निकल कर आये तो पत्नी हा हा करके हँसते मिली. माजरा कुछ समझ नहीं आया. जब उसकी हँसी रुकी तो जो उसने बताया कि हम तो मानो इस उम्र में आकर शर्म से लाल टाईप हो गये.
दरअसल, अपग्रेड में हयात नें हमें हनीमून वाला कमरा दे दिया जिसके बाथरुम की दीवाल पूरे काँच की थी. कमरे में चूँकि रोशनी एकदम मद्धम थी तो हमें तो बाथरुम से कमरा ज्यादा नहीं दिखा और न ही उस ओर ध्यान गया किन्तु कमरे से पूर्ण रोशन बाथरुम का एक एक नल नजर आ रहा था. बताईये, यह भी कोई बात हुई. भले ही कोई हनीमून पर भी आया हो, नहाते हुए क्या देखना भाई!! हमारी तो खैर समझ के बाहर है.
यूँ तो पारदर्शिता बहुत अच्छी बात है किन्तु हर जगह नहीं. सारी भैंसे एक ही लाठी से नहीं हाँकी जाती.
शाम को कुछ गेस्ट भी आमंत्रित थे कमरे में. हम सोचने लगे कि अगर उन्हें बाथरुम जाना हुआ तो? और वैसे भी पता लगने के बाद तो हम खुद ही न इस्तेमाल कर पाते. तुरंत फ़्रंट डेस्क को फोन किये. अपना कमरा दूसरा करवाये..नार्मल बाथरुम वाला, तब जा कर चैन में चैन आया.

हाँ, अगली रात एक मित्र परिवार के साथ जामा मस्ज़िद के पास वाले करीम पर जाकर खाना खाया-जबदस्त और अद्भुत अनुभव. बहुत पुरानी तमन्ना थी वहाँ जाकर खाना खाने की, सो चलते चलते पूरी हुई. जितनी ख्वाईशें ऐसे ही पूरी होती चलें, बस काफी है वरना तो:
हजारों ख्वाईशें ऐसी की हर ख्वाइश पर दम निकले

अब यूँ ही एक विडियो जो यू ट्युब पर मिला:
सोमवार, अप्रैल 20, 2009
मैं अभागा!! जड़ से टूटा!!
जब कनाडा आने को जबलपुर से दिल्ली आने को स्टेशन आते समय घर से कार निकलती है, तो उसमें बैठ कर सिर्फ मैं नहीं निकलता..न जाने क्या क्या निकल जाता है. पूरा बचपन निकल जाता है..रुक जाने को मचलता है. जवानी चित्कार करती है कि क्यूँ जाते हो..अब तक का सारा बीता समय उस घर में..उस शहर में..न रुकता देख धिक्कारने लगता है..कि ये क्या कर रहा है तू मूरख. पछतायेगा एक दिन!!
ट्रेन पकड़ता हूँ..शहर छूटता है..फिर दिल्ली एयरपोर्ट पर..कस्टम क्लिरेंस के बाद...बस बस, लगता है कि देश ही छूट गया..मैं खुद खुद से छूट गया..अब वापसी का कोई उपाय नहीं अगली बार तक.
हवाई जहाज हवाई पट्टी पर दौड़ता है..मन जाने कितने पीछे तक लौटता है और यह हवाई पट्टी छूटी...उपर उठे जमीन से...मन से खुद की नजर में नीचे गिरे.पाताल से भी गहरे...देश छूटा और मैं अहसासता हूँ कि मैं जड़ से टूटा...सूखा पत्ता...जिसे हवा बहाये ले जा रही है..यह हवायें जो मेरी मजबूरियाँ है..उनका रुख भी तो मेरे ही हाथ ही है बदलना-फिर क्यूँ नहीं..नहीं जानता..या नहीं जानना चाहता...!
सारे दोस्त यार, बचपन की गलियाँ, आज तक के नाते रिश्ते...सूखी आँख में गीले इन्तजार की ललक लिए बुजुर्ग..न जाने किस उम्मीद को पाले..और किस उम्मीद पर जीते..हम जैसे खुदगर्ज बेवतनों से आस लगाये...और उनके हाथ है सहारा देने को हमारे बदले एक काठी की लाठी...
हर बार भारत छो़ड़ता हूँ..तो कुछ दिन पूर्व से कुछ दिन बाद तक असहज ही रहता हूँ...मानव हूँ फिर अपनी दुनिया में रम जाता हूँ..
इसी ट्रांजिशन के दौर में उपजी मनोव्यथा उजागर करती रचना:
नोट: अभी यॉर्क, यू.के. याने लन्दन से नार्थ में दो घंटे पर हूँ. ३ मई को कनाडा वापसी है. कई मित्रों को लगा कि मैं न्यूयार्क आ गया हूँ, उनसे क्षमाप्रार्थी-मेरे लिखने में कुछ कमी रह गई होगी. मुझे स्पष्ट लिखना चाहिये था.

ट्रेन पकड़ता हूँ..शहर छूटता है..फिर दिल्ली एयरपोर्ट पर..कस्टम क्लिरेंस के बाद...बस बस, लगता है कि देश ही छूट गया..मैं खुद खुद से छूट गया..अब वापसी का कोई उपाय नहीं अगली बार तक.
हवाई जहाज हवाई पट्टी पर दौड़ता है..मन जाने कितने पीछे तक लौटता है और यह हवाई पट्टी छूटी...उपर उठे जमीन से...मन से खुद की नजर में नीचे गिरे.पाताल से भी गहरे...देश छूटा और मैं अहसासता हूँ कि मैं जड़ से टूटा...सूखा पत्ता...जिसे हवा बहाये ले जा रही है..यह हवायें जो मेरी मजबूरियाँ है..उनका रुख भी तो मेरे ही हाथ ही है बदलना-फिर क्यूँ नहीं..नहीं जानता..या नहीं जानना चाहता...!
सारे दोस्त यार, बचपन की गलियाँ, आज तक के नाते रिश्ते...सूखी आँख में गीले इन्तजार की ललक लिए बुजुर्ग..न जाने किस उम्मीद को पाले..और किस उम्मीद पर जीते..हम जैसे खुदगर्ज बेवतनों से आस लगाये...और उनके हाथ है सहारा देने को हमारे बदले एक काठी की लाठी...
हर बार भारत छो़ड़ता हूँ..तो कुछ दिन पूर्व से कुछ दिन बाद तक असहज ही रहता हूँ...मानव हूँ फिर अपनी दुनिया में रम जाता हूँ..
इसी ट्रांजिशन के दौर में उपजी मनोव्यथा उजागर करती रचना:
नोट: अभी यॉर्क, यू.के. याने लन्दन से नार्थ में दो घंटे पर हूँ. ३ मई को कनाडा वापसी है. कई मित्रों को लगा कि मैं न्यूयार्क आ गया हूँ, उनसे क्षमाप्रार्थी-मेरे लिखने में कुछ कमी रह गई होगी. मुझे स्पष्ट लिखना चाहिये था.
इक
लाठी
वो
काठी
वाली....
सरदी, गरमी और बरसातें
सुख और दुख की
वे सौगातें....
हरदम ही
वो
साथ रही थी...
और
मुझे भी देख जरा लो
..
इक
मैं था
कितना अलबेला...
छोड़ के जड़ को
दूर हुआ,
था निपट अकेला...
कुछ तो थी पाने की आशा
बदलूँ
जीवन की परिभाषा...
जिससे
उनको
आस रही थी....
वो लाठी भी
कुछ कहती थी...
सब कुछ
हंसते ही सहती थी...
वो भाषा
अब समझ रहा हूँ...
जब मैं आज
उसी लाठी की..
राहों पर से
गुजर रहा हूँ....
सचमुच!!
बहुत देर तक सोया...
कुछ पाने की आशा लेकर
कितना कुछ है
मैने खोया !!!!!!
सोच रहा हूँ
समझ रहा हूँ..
मेरे ही पागलपन से तो,
वह इक नाता
छूट
गया था...
वो
डाली
एक पेड़ से टूटी..
मैं
जड़ से ही
टूट गया था....
-समीर लाल ’समीर’
( यह रचना समर्पित है हर उस बुजुर्ग को जिनके सहारे (बेटे या बेटियाँ) उनके साथ नहीं है चाहे किसी भी मजबूरी के तहत-कुछ भी कारण उस दूरी को जस्टिफाई न कर पायेगा-सब बहाने ही होंगे एक मायने में)
सोमवार, अप्रैल 13, 2009
यूँ बन गई गज़ल
सूरज डूब चुका है. रोशनी अब भी बाकी है. छत पर अकेले चाय के साथ बैठना सुकुन दे रहा है. न जाने कौन है वो जो सामने के मोहल्ले में हर वक्त गाना बजाता रहता है. शायद कोई पान की दुकान पर बजता है ऐसा रामदीन बताता था. एक से एक चुनिंदा पुराने गानों की पसंद है उसकी. बजाता है:
देख तेरे संसार की हालत, क्या हो गई भगवान,
कितना बदल गया इन्सान!!
वाकई कितना बदल गया है इन्सान. चुनाव का मौसम है. दोपहर ही एक नेता हाथ जोड़ कर वादा करते हुए मिल कर गये हैं. न पुराने वादों को पूरा न करने अपराध बोध और न ही अभी किए जा रहे वादों की नींव में झूट की बुनियाद से कोई हिचकिचाहट-बस चेहरे पर घाघी मुस्कराहट.
विचारों के सागर में डूबने लगता हूँ.
कितनी बदल चुकी है दुनिया. दो पड़ोसी, भाई भाई की तरह खुशी खुशी जिन्दगी बसर कर रहे हैं. कभी मन में भी नहीं आया कि ईद मुसलमान की और दीवाली हिन्दु की. मगर क्या करें इन सियासतदारों का. इन्होंने ने इसी सियासी खेल में अपना उल्लू सीधा करने के लिए कैसी फूट डाल दी. सरहदें बाँट दीं और दिलों में नफरत भर दी. आज पूरे फक्र से उन्हीं बिछड़ों पर राज करते हैं न जाने किस मूँह से:
बाँट डाला है दिलों को, सरहदों के नाम पर
शर्म भी आती नहीं है उनको अपने काम पर.
ऐसा गंदा खेल हो चुकी है यह सियासत कि अब आदमी दूसरों का तो क्या कहें, खुद का खुद पर भरोसा खो चुका है. बस, एक भ्रम में सियासी खेल खेले चले जा रहा है. न कोई अंकुश और न कोई मर्यादा :
नाक तक डूबा हुआ है, वो सियासी खेल में,
किस तरह करता भरोसा, खुद के ही इमान पर.
क्या सही क्या गलत जैसे कोई सरोकार ही नहीं बचा इन सब बातों से. वादा खिलाफी तो फिर भी काबिले-बर्दाश्त है, इतने बरसों से आदत सी हो गई है इनकी वादा खिलाफी को झेलना. मगर अब तो उनकी नजरों में सब सही है और मानो कानून नाम से तो कोई डर ही नहीं रहा इन कानून बनाने वालों को. खुद बनाते हैं जैसे तोड़ने के लिए ही. किसी भी हद तक गिर जाते हैं और किस किस तरह के केसों में इनके नाम निकल कर आते हैं:
करके वादा तोड़ देना, ये तो फितरत में रहा,
किस तरह हंसता रहा वो, हर लगे इल्जाम पर.
हर सीख बेकार जा रही है. कभी कहते थे जल्दबाजी में किया हर काम किसी भी अंजाम तक नहीं पहुँचाता. एक शास्वत नियम सा है कि एक एक कदम साधकर चलो अगर मंजिल पाना है और उस पर अपना परचम लहराना है. कितनी ही कहानियाँ सुनाई गई इस पाठ को सिखाने के लिए. याद है वो खरगोश और कछुए की दौड़ मगर देखो आज के नेताओं को, आज संपर्क में आये, कल जीते और परसों करोड़पति और साथ में तमगे के बतौर हजारों विचाराधीन मुकदमें. इसी कुछ तर्ज पर आज के युवा भी जाने क्या पाने की आस लिए भागे चले जा रहे हैं, हालांकि नेताओं और इन युवाओं की मंजिलों में फरक है और इन नेताओं का तो कुछ नहीं बिगड़ता मगर आज का युवा-कौन मान रहा है ये सीख:
दौड़ कर के सीढ़ियाँ, लाँध कर जो चढ़ गया
हाँफ कर वो गिर गया, पहुँचा जब मुकाम पर.
वाकई, कितना बदल गया है इन्सान और कितना बदल गया है यह जमाना. अब तो बदले जमाने के हिसाब से जीना सीखना होगा. वरना तो बसर ही मुमकिन नहीं. जिन्दा लाशों के बीच रहने वाले मौत का मातम नहीं मनाते बल्कि वो तो मुक्ति का और खुशी का मौका बन चुका है:
ये जमाना वो नहीं है, जिससे सीखा था ’समीर’
मत बहा तू अश्क अपने, आज कत्ले-आम पर.
और इसी तरह की सोच में डूबे शेर दर शेर बन कर निकलती है एक गज़ल. हम्म, पर चाय ठंडी हो गई. नई बनवा कर मंगवाता हूँ. तब तक आप गज़ल पढ़ो:
बाँट डाला है दिलों को, सरहदों के नाम पर
शर्म भी आती नहीं है उनको अपने काम पर.
नाक तक डूबा हुआ है, वो सियासी खेल में,
किस तरह करता भरोसा, खुद के ही इमान पर.
करके वादा तोड़ देना, ये तो फितरत में रहा,
किस तरह हंसता रहा वो, हर लगे इल्जाम पर.
दौड़ कर जो सीढ़ियाँ, लाँध कर के चढ़ गया
हाँफ कर वो गिर गया, पहुँचा जब मुकाम पर.
ये जमाना वो नहीं है, जिससे सीखा था ’समीर’
मत बहा तू अश्क अपने, आज कत्ले-आम पर.
-समीर लाल ’समीर’

देख तेरे संसार की हालत, क्या हो गई भगवान,
कितना बदल गया इन्सान!!
वाकई कितना बदल गया है इन्सान. चुनाव का मौसम है. दोपहर ही एक नेता हाथ जोड़ कर वादा करते हुए मिल कर गये हैं. न पुराने वादों को पूरा न करने अपराध बोध और न ही अभी किए जा रहे वादों की नींव में झूट की बुनियाद से कोई हिचकिचाहट-बस चेहरे पर घाघी मुस्कराहट.
विचारों के सागर में डूबने लगता हूँ.
कितनी बदल चुकी है दुनिया. दो पड़ोसी, भाई भाई की तरह खुशी खुशी जिन्दगी बसर कर रहे हैं. कभी मन में भी नहीं आया कि ईद मुसलमान की और दीवाली हिन्दु की. मगर क्या करें इन सियासतदारों का. इन्होंने ने इसी सियासी खेल में अपना उल्लू सीधा करने के लिए कैसी फूट डाल दी. सरहदें बाँट दीं और दिलों में नफरत भर दी. आज पूरे फक्र से उन्हीं बिछड़ों पर राज करते हैं न जाने किस मूँह से:
बाँट डाला है दिलों को, सरहदों के नाम पर
शर्म भी आती नहीं है उनको अपने काम पर.
ऐसा गंदा खेल हो चुकी है यह सियासत कि अब आदमी दूसरों का तो क्या कहें, खुद का खुद पर भरोसा खो चुका है. बस, एक भ्रम में सियासी खेल खेले चले जा रहा है. न कोई अंकुश और न कोई मर्यादा :
नाक तक डूबा हुआ है, वो सियासी खेल में,
किस तरह करता भरोसा, खुद के ही इमान पर.
क्या सही क्या गलत जैसे कोई सरोकार ही नहीं बचा इन सब बातों से. वादा खिलाफी तो फिर भी काबिले-बर्दाश्त है, इतने बरसों से आदत सी हो गई है इनकी वादा खिलाफी को झेलना. मगर अब तो उनकी नजरों में सब सही है और मानो कानून नाम से तो कोई डर ही नहीं रहा इन कानून बनाने वालों को. खुद बनाते हैं जैसे तोड़ने के लिए ही. किसी भी हद तक गिर जाते हैं और किस किस तरह के केसों में इनके नाम निकल कर आते हैं:
करके वादा तोड़ देना, ये तो फितरत में रहा,
किस तरह हंसता रहा वो, हर लगे इल्जाम पर.
हर सीख बेकार जा रही है. कभी कहते थे जल्दबाजी में किया हर काम किसी भी अंजाम तक नहीं पहुँचाता. एक शास्वत नियम सा है कि एक एक कदम साधकर चलो अगर मंजिल पाना है और उस पर अपना परचम लहराना है. कितनी ही कहानियाँ सुनाई गई इस पाठ को सिखाने के लिए. याद है वो खरगोश और कछुए की दौड़ मगर देखो आज के नेताओं को, आज संपर्क में आये, कल जीते और परसों करोड़पति और साथ में तमगे के बतौर हजारों विचाराधीन मुकदमें. इसी कुछ तर्ज पर आज के युवा भी जाने क्या पाने की आस लिए भागे चले जा रहे हैं, हालांकि नेताओं और इन युवाओं की मंजिलों में फरक है और इन नेताओं का तो कुछ नहीं बिगड़ता मगर आज का युवा-कौन मान रहा है ये सीख:
दौड़ कर के सीढ़ियाँ, लाँध कर जो चढ़ गया
हाँफ कर वो गिर गया, पहुँचा जब मुकाम पर.
वाकई, कितना बदल गया है इन्सान और कितना बदल गया है यह जमाना. अब तो बदले जमाने के हिसाब से जीना सीखना होगा. वरना तो बसर ही मुमकिन नहीं. जिन्दा लाशों के बीच रहने वाले मौत का मातम नहीं मनाते बल्कि वो तो मुक्ति का और खुशी का मौका बन चुका है:
ये जमाना वो नहीं है, जिससे सीखा था ’समीर’
मत बहा तू अश्क अपने, आज कत्ले-आम पर.
और इसी तरह की सोच में डूबे शेर दर शेर बन कर निकलती है एक गज़ल. हम्म, पर चाय ठंडी हो गई. नई बनवा कर मंगवाता हूँ. तब तक आप गज़ल पढ़ो:
बाँट डाला है दिलों को, सरहदों के नाम पर
शर्म भी आती नहीं है उनको अपने काम पर.
नाक तक डूबा हुआ है, वो सियासी खेल में,
किस तरह करता भरोसा, खुद के ही इमान पर.
करके वादा तोड़ देना, ये तो फितरत में रहा,
किस तरह हंसता रहा वो, हर लगे इल्जाम पर.
दौड़ कर जो सीढ़ियाँ, लाँध कर के चढ़ गया
हाँफ कर वो गिर गया, पहुँचा जब मुकाम पर.
ये जमाना वो नहीं है, जिससे सीखा था ’समीर’
मत बहा तू अश्क अपने, आज कत्ले-आम पर.
-समीर लाल ’समीर’
नोट:
१. बस, एक अलग तरह का प्रयोग करने की कोशिश मात्र है. बताईयेगा, कैसा रहा यह प्रयास?
२. यह आलेख तैयार जबलपुर में हो गया था मगर पोस्ट दिल्ली से किया जा रहा है. जब आप इसे पढ़ रहे होंगे, मैं वापसी की तैयारी में हूँगा. देर रात ब्रसल्स के लिए फ्लाईट है और वहाँ से दिन में लंदन और फिर यॉर्क, बेटे, बहु के पास. कुछ दिन उनके साथ रहकर फिर कनाडा वापसी. अब नेट पर १५/१६ अप्रेल को ही आना होगा, ऐसा लगता है.
३. वापसी की तैयारी में ही पिछले कुछ दिनों से व्यस्तता बनी हुई है और वही नेट से दूर रखे है-न कोई पठन, न लेखन और न ही टिप्पणी. जल्द पूरे जोर शोर से वापस आते हैं.
मंगलवार, अप्रैल 07, 2009
मेरी माँ लुटेरी थी-याद आया बिखरे मोती के अंतरिम विमोचन में
बिखरे मोती के अंतरिम विमोचन की रिपोर्ट यहाँ पढ़िये और उस वक्त जो याद आया वो यहाँ नीचे:
मेरी माँ लुटेरी थी...
माँ!!
तेरा
सब कुछ तो दे दिया था तुझे
विदा करते वक्त
तेरा
शादी का जोड़ा
तेरे सब जेवर
कुंकुम,मेंहदी,सिन्दूर
ओढ़नी
नई
दुल्हन की तरह
साजो
सामान के साथ
बिदा
किया था...
और हाँ
तेरी छड़ी
तेरी एनक,
तेरे नकली दांत
पिता
जी ने
सब कुछ ही तो
रख दिये थे
अपने हाथों...
तेरी
चिता में
लेकिन
फिर भी
जब से लौटा हूँ घर
बिठा कर तुझे
अग्नि रथ पर
तेरी छाप क्यों नजर आती है?
वह धागा
जिसे तूने मंत्र फूंक
कर दिया था जादुई
और बांध दिया था
घर
मोहल्ला,
बस्ती
सभी को एक सूत्र में
आज
अचानक लगने लगा है
जैसे टूट गया वह धागा
सब कुछ
वही तो है
घर
मोहल्ला
बस्ती
और वही लोग
पर घर की छत
मोहल्ले का जुड़ाव
और
बस्ती का सम्बन्ध
कुछ ही तो नहीं
सब कुछ लुट गया है न!!
हाँ माँ!
सब कुछ
और ये सब कुछ
तू ही तो ले गई है लूट कर
मुझे पता है
जानता हूं न बचपन से
तेरा लुटेरा पन.
तू ही तो लूटा करती थी
मेरी पीड़ा
मेरे दुख
मेरे सर की धूप
और छोड़ जाती थी
अपनी लूट की निशानी
एक मुस्कान
एक रस भीगा स्पर्श
और स्नेह की फुहार
अब सब कुछ लुट गया है!!
स्तम्भित हैं
पिताजी तो
यह भी नहीं बताते
आखिर
कहां लिखवाऊँ
रपट अपने लुटने की
घर के लुटने की
बस्ती और मोहल्ले के लुटने की
और सबसे अधिक
अपने समय के लुट जाने की....
-समीर लाल ’समीर’

मेरी माँ लुटेरी थी...
माँ!!
तेरा
सब कुछ तो दे दिया था तुझे
विदा करते वक्त
तेरा
शादी का जोड़ा
तेरे सब जेवर
कुंकुम,मेंहदी,सिन्दूर
ओढ़नी
नई
दुल्हन की तरह
साजो
सामान के साथ
बिदा
किया था...
और हाँ
तेरी छड़ी
तेरी एनक,
तेरे नकली दांत
पिता
जी ने
सब कुछ ही तो
रख दिये थे
अपने हाथों...
तेरी
चिता में
लेकिन
फिर भी
जब से लौटा हूँ घर
बिठा कर तुझे
अग्नि रथ पर
तेरी छाप क्यों नजर आती है?
वह धागा
जिसे तूने मंत्र फूंक
कर दिया था जादुई
और बांध दिया था
घर
मोहल्ला,
बस्ती
सभी को एक सूत्र में
आज
अचानक लगने लगा है
जैसे टूट गया वह धागा
सब कुछ
वही तो है
घर
मोहल्ला
बस्ती
और वही लोग
पर घर की छत
मोहल्ले का जुड़ाव
और
बस्ती का सम्बन्ध
कुछ ही तो नहीं
सब कुछ लुट गया है न!!
हाँ माँ!
सब कुछ
और ये सब कुछ
तू ही तो ले गई है लूट कर
मुझे पता है
जानता हूं न बचपन से
तेरा लुटेरा पन.
तू ही तो लूटा करती थी
मेरी पीड़ा
मेरे दुख
मेरे सर की धूप
और छोड़ जाती थी
अपनी लूट की निशानी
एक मुस्कान
एक रस भीगा स्पर्श
और स्नेह की फुहार
अब सब कुछ लुट गया है!!
स्तम्भित हैं
पिताजी तो
यह भी नहीं बताते
आखिर
कहां लिखवाऊँ
रपट अपने लुटने की
घर के लुटने की
बस्ती और मोहल्ले के लुटने की
और सबसे अधिक
अपने समय के लुट जाने की....
-समीर लाल ’समीर’
रविवार, अप्रैल 05, 2009
किसकी संगत कर ली, यार!!
आपकी पहचान यह नहीं होती कि आप क्या हैं या कौन हैं-समाज आपको आप किनके साथ उठते बैठते हैं, उससे आंकता है.
आप जिनके साथ उठते बैठते हैं, ज्यादा समय बिताते हैं वो निश्चित ही आपके व्यक्तित्व को प्रभावित करते हैं. (इसके कुछ अपवाद आपको अपने ब्लॉगजगत में भी मिलेंगे जो सुधरने का नाम नहीं लेते मगर बड़े बड़ों के संरक्षण में पले जा रहे हैं-खैर, उनसे क्या करना, उन्हें तो इग्नोर करते रहूँ, उसी में मेरी भलाई है और उनका अंत).
शायद इसीलिए कहा गया होगा ’संगत कीजे साधु की’
कुछ सालों पहले जब ब्लॉगिंग शुरु की तो एकाएक वाह वाह कहने की आदत सी पड़ गई. पत्नी घर पर खाना परोसे और हम कह उठें-वाह वाह, बहुत खूब!! इस चक्कर में वैसी ही तरोई और लौकी की सब्जी तीन तीन दिन तक खाना पड़ी मगर आदत के चलते मजबूर.
दो साल पहले पूरे मसिजीवी परिवार को हमसे साधुवाद की ऐसी छूत लगी थी कि पहाड़ों पर घूमते वो परिवार बादल से लेकर जल तक का साधुवाद करता रहा और कहता रहा आकाश से कि क्या चित्र उकेरा है, बहुत खूब!!
आज जब ब्लॉगजगत का विचरण करता हूँ तो पाता हूँ कि कितने ही एक दूसरे से प्रभावित हैं. जिसे देखो वो कहता है कि बहुत उम्दा...बेहतरीन अभिव्यक्ति...अति भावपूर्ण. और भी जाने क्या क्या.
एक नया सा चलन आजकल देखने में आ रहा है-जो भी दस दिन से ज्यादा अंतराल के बाद लिख रहा है वो पहले अपनी अनुपस्थिति की क्षमा मांगता है कि माफ करियेगा इतने दिन आपके बीच नहीं आ पाया. वैसे सच सच कहें तो अगर वो बताते नहीं तो हमें पता तक न चलता कि वो इतने दिन से आये नहीं. किसे इन्तजार था भाई.
ये तो वो जगह है दोस्तों, जहाँ आ गये तो वाह वाह-न आये तो वाह वाह!! टंकी पर चढ़ जाओ तो वाह वाह!! उतर आओ तो वाह वाह!! वहीं रह जाओ तो भी वाह वाह!! हो चुका है ऐसा और लोग अपनी मूँह की खाये उतरते भी दिखे हैं. अगर दस दिन से ज्यादा का अन्तराल क्षमा मांगने का तय हो जाये तो जाने कितने ब्लॉगर ’क्षमा देहि’ का कटोरा लिए घूमते नजर आयें. जीतू (अरे वो नारद वाले) तो खुद ही कटोरा बन जायें ऐसा अन्तराल रहता है उनका.
कई बार सोचता हूँ कि काश, यह ’व्यवहार बदलाव’ ’प्लेटफॉर्म इन्डिपेन्डेन्ट’ (मंच उदासीन-ज्ञान जी से एफेक्टेड) (उन्मुक्त जी सुन रहे हो) होता तो कितना बढ़िया होता. ब्लॉगर से साहित्यकार प्रभावित होते और साहित्यकारों से ब्लॉगर. दूसरा हिस्सा जरुर दुखदायी और कष्टप्रद रहता मगर पहले हिस्से के लाभों को देखते हुए उसे हम सह जाते. जैसे कई बार पूरे शरीर में जहर न फैल जाये इस लिहाज से पैर काट कर अलग कर देना इन्सान झेल जाता है अन्य लाभ देखते हुए.
आम जन से नेता प्रभावित होते और नेता से आम जन. पुनः, दूसरा हिस्सा जरुर दुखदायी और कष्टप्रद रहता मगर पहले हिस्से के लाभों को देखते हुए उसे हम सह जाते. शायद कोई नेता इस प्रभाव में कह उठता कि आम जन तकलीफ में है, नेताओं को कुछ करना चाहिये. कुछ तो भला हो ही जाता.
कुछ समय पहले ब्लॉगजगत का प्रभाव कुछ यूँ होना शुरु हुआ कि मैं तो घबरा ही गया.
एकाएक एक मित्र से दूसरे मित्र के बारे में पूछा और साथ में कहा कि यार, वो कुछ स्वभाव से ठीक नहीं लगता.
आम आदमी के स्वभाव की तरह उस मित्र ने भी हाँ मे हाँ मिला दी और हमने जाकर दूसरे मित्र को बता दिया कि यार, तुम्हारा स्वभाव उस मित्र को पसंद नहीं.
बस, बात का बतंगड़ बन गया. कुछ मित्रों ने बैठ कर मसला हल कराया तो बात खुल कर सामने आई और हम फंसने लगे. अब क्या रास्ता था. बस दांत चियारे हम कह उठे कि अरे भई, हम तो यूँ ही मौज ले रहे थे और आप सब इतने छुईमुई कब से हो गये कि बुरा मान गये.
बात आई गई तो हो गई मगर हमने इस कुप्रभाव को तुरंत झटक कर अपने से अलग किया. तुरंत समझ गये कि इस तरह की बातें ठीक नहीं. इसमे ध्यान देने योग्य है कि हम समझ गये वरना कौन समझ पा रहा है. :)
इधर कुछ दिनों से मेरी आदत और भी कुछ ज्यादा ही प्रभावित हुई है.
कल पत्नी मोहित हुई और कहने लगी कि क्या तुम भी मुझे उतना ही चाहते हो, जितना की मैं?
अब बताओ, क्या जबाब है इसका और वो भी इस उम्र में? बहु, बच्चों के घर में ऐसी बातें, क्या शोभा देती हैं?
ब्लॉग प्रभावित हम कह उठे: ’बूझो तो जानें?"
आजकल जिस ब्लॉग पर देखो, यही तो है. यहाँ तक की रचना जी भी इसी काँटे में अटक गई हैं, इससे तो उनका खौफ लोगों पर से जाता रहेगा, मगर उन्हें समझाये कौन? :) (स्माईली प्रोटेक्शन के लिए, हालांकि उनसे ठिठोली करना मेरा हक है और मुझे स्माईली की जरुरत नहीं, कम से कम रचना जी के सामने)
अब पत्नी का पारा तो सातवें आसमान पर कि इसमें वो क्या बूझे. किसी तरह मनाया और उसने बुझे मन से पूछा, ’खाने में क्या खाओगे आज?’
हम तो प्रभावित वातावरण के जीव, पूछ बैठे कि ;"क्या खिलाओगी, कुछ क्लू तो दो, रामप्यारी "
अब ये रामप्यारी कौन है, इस पर बखेड़ा मचा है और हम ताऊ रामपुरिया का फोन ट्राई कर रहे हैं जो कह रहा है कि ’आप कतार में हैं, कृप्या प्रतिक्षा करें.”
न जाने और कौन कौन क्या लफ़ड़ा कर बैठा है और ताऊ से बात कर रहा है.
अब आजकल की आदत के अनुसार:
मै कौन: बूझो तो जरा!! (क्लू नीचे देखो)

आप जिनके साथ उठते बैठते हैं, ज्यादा समय बिताते हैं वो निश्चित ही आपके व्यक्तित्व को प्रभावित करते हैं. (इसके कुछ अपवाद आपको अपने ब्लॉगजगत में भी मिलेंगे जो सुधरने का नाम नहीं लेते मगर बड़े बड़ों के संरक्षण में पले जा रहे हैं-खैर, उनसे क्या करना, उन्हें तो इग्नोर करते रहूँ, उसी में मेरी भलाई है और उनका अंत).
शायद इसीलिए कहा गया होगा ’संगत कीजे साधु की’
कुछ सालों पहले जब ब्लॉगिंग शुरु की तो एकाएक वाह वाह कहने की आदत सी पड़ गई. पत्नी घर पर खाना परोसे और हम कह उठें-वाह वाह, बहुत खूब!! इस चक्कर में वैसी ही तरोई और लौकी की सब्जी तीन तीन दिन तक खाना पड़ी मगर आदत के चलते मजबूर.
दो साल पहले पूरे मसिजीवी परिवार को हमसे साधुवाद की ऐसी छूत लगी थी कि पहाड़ों पर घूमते वो परिवार बादल से लेकर जल तक का साधुवाद करता रहा और कहता रहा आकाश से कि क्या चित्र उकेरा है, बहुत खूब!!
आज जब ब्लॉगजगत का विचरण करता हूँ तो पाता हूँ कि कितने ही एक दूसरे से प्रभावित हैं. जिसे देखो वो कहता है कि बहुत उम्दा...बेहतरीन अभिव्यक्ति...अति भावपूर्ण. और भी जाने क्या क्या.
एक नया सा चलन आजकल देखने में आ रहा है-जो भी दस दिन से ज्यादा अंतराल के बाद लिख रहा है वो पहले अपनी अनुपस्थिति की क्षमा मांगता है कि माफ करियेगा इतने दिन आपके बीच नहीं आ पाया. वैसे सच सच कहें तो अगर वो बताते नहीं तो हमें पता तक न चलता कि वो इतने दिन से आये नहीं. किसे इन्तजार था भाई.
ये तो वो जगह है दोस्तों, जहाँ आ गये तो वाह वाह-न आये तो वाह वाह!! टंकी पर चढ़ जाओ तो वाह वाह!! उतर आओ तो वाह वाह!! वहीं रह जाओ तो भी वाह वाह!! हो चुका है ऐसा और लोग अपनी मूँह की खाये उतरते भी दिखे हैं. अगर दस दिन से ज्यादा का अन्तराल क्षमा मांगने का तय हो जाये तो जाने कितने ब्लॉगर ’क्षमा देहि’ का कटोरा लिए घूमते नजर आयें. जीतू (अरे वो नारद वाले) तो खुद ही कटोरा बन जायें ऐसा अन्तराल रहता है उनका.
कई बार सोचता हूँ कि काश, यह ’व्यवहार बदलाव’ ’प्लेटफॉर्म इन्डिपेन्डेन्ट’ (मंच उदासीन-ज्ञान जी से एफेक्टेड) (उन्मुक्त जी सुन रहे हो) होता तो कितना बढ़िया होता. ब्लॉगर से साहित्यकार प्रभावित होते और साहित्यकारों से ब्लॉगर. दूसरा हिस्सा जरुर दुखदायी और कष्टप्रद रहता मगर पहले हिस्से के लाभों को देखते हुए उसे हम सह जाते. जैसे कई बार पूरे शरीर में जहर न फैल जाये इस लिहाज से पैर काट कर अलग कर देना इन्सान झेल जाता है अन्य लाभ देखते हुए.
आम जन से नेता प्रभावित होते और नेता से आम जन. पुनः, दूसरा हिस्सा जरुर दुखदायी और कष्टप्रद रहता मगर पहले हिस्से के लाभों को देखते हुए उसे हम सह जाते. शायद कोई नेता इस प्रभाव में कह उठता कि आम जन तकलीफ में है, नेताओं को कुछ करना चाहिये. कुछ तो भला हो ही जाता.
कुछ समय पहले ब्लॉगजगत का प्रभाव कुछ यूँ होना शुरु हुआ कि मैं तो घबरा ही गया.
एकाएक एक मित्र से दूसरे मित्र के बारे में पूछा और साथ में कहा कि यार, वो कुछ स्वभाव से ठीक नहीं लगता.
आम आदमी के स्वभाव की तरह उस मित्र ने भी हाँ मे हाँ मिला दी और हमने जाकर दूसरे मित्र को बता दिया कि यार, तुम्हारा स्वभाव उस मित्र को पसंद नहीं.
बस, बात का बतंगड़ बन गया. कुछ मित्रों ने बैठ कर मसला हल कराया तो बात खुल कर सामने आई और हम फंसने लगे. अब क्या रास्ता था. बस दांत चियारे हम कह उठे कि अरे भई, हम तो यूँ ही मौज ले रहे थे और आप सब इतने छुईमुई कब से हो गये कि बुरा मान गये.
बात आई गई तो हो गई मगर हमने इस कुप्रभाव को तुरंत झटक कर अपने से अलग किया. तुरंत समझ गये कि इस तरह की बातें ठीक नहीं. इसमे ध्यान देने योग्य है कि हम समझ गये वरना कौन समझ पा रहा है. :)
इधर कुछ दिनों से मेरी आदत और भी कुछ ज्यादा ही प्रभावित हुई है.
कल पत्नी मोहित हुई और कहने लगी कि क्या तुम भी मुझे उतना ही चाहते हो, जितना की मैं?
अब बताओ, क्या जबाब है इसका और वो भी इस उम्र में? बहु, बच्चों के घर में ऐसी बातें, क्या शोभा देती हैं?
ब्लॉग प्रभावित हम कह उठे: ’बूझो तो जानें?"
आजकल जिस ब्लॉग पर देखो, यही तो है. यहाँ तक की रचना जी भी इसी काँटे में अटक गई हैं, इससे तो उनका खौफ लोगों पर से जाता रहेगा, मगर उन्हें समझाये कौन? :) (स्माईली प्रोटेक्शन के लिए, हालांकि उनसे ठिठोली करना मेरा हक है और मुझे स्माईली की जरुरत नहीं, कम से कम रचना जी के सामने)
अब पत्नी का पारा तो सातवें आसमान पर कि इसमें वो क्या बूझे. किसी तरह मनाया और उसने बुझे मन से पूछा, ’खाने में क्या खाओगे आज?’
हम तो प्रभावित वातावरण के जीव, पूछ बैठे कि ;"क्या खिलाओगी, कुछ क्लू तो दो, रामप्यारी "
अब ये रामप्यारी कौन है, इस पर बखेड़ा मचा है और हम ताऊ रामपुरिया का फोन ट्राई कर रहे हैं जो कह रहा है कि ’आप कतार में हैं, कृप्या प्रतिक्षा करें.”
न जाने और कौन कौन क्या लफ़ड़ा कर बैठा है और ताऊ से बात कर रहा है.
अब आजकल की आदत के अनुसार:
मै कौन: बूझो तो जरा!! (क्लू नीचे देखो)
रामप्यारी का क्लू:
गुरुवार, अप्रैल 02, 2009
जैसे दूर देश के टावर में-गुलाल
हमारे खास हितचिन्तकों का (विशेष तौर पर संजय बैंगाणी जी) कहना है कि मुझे फिल्म देखने देने पर बैन लग जाना चाहिये क्यूँकि मुझे कोई फिल्म पसंद ही नहीं आती. वैसे मैने खुद पर बैन लगा रखा है मगर पत्नी की जिद पर कोई बैन लगवा दे, तो आजीवन आभारी रहूँगा. वैसे आभारी तो मल्टी पलेक्स का हूँ ही जो रिकलाईनर के माध्यम से इतना बढ़िया सोने का इन्तजाम कर दिये हैं पिक्चर हॉल में.
उस दिन कलकत्ता में था. रात पत्नी और साली की जिद हुई कि मूवी देखने चलें तो टाल न पाया. अब देखो क्या हाल हुआ: IMOX का थियेटर और पेट भर भोजन के बाद गद्दीदार लेटने योग्य सीट के साथ फिल्म देखने की शुरुवात.
अच्छा, ऐसा मानो कि ब्लॉगर्स को लेकर फिल्म बनायें. चलो, फुरसतिया जी हीरो..थोड़ी देर काम करवाया-पसंद नहीं आये, हटाओ और अब डॉ अनुराग हीरो, अरे, वो भी नहीं जमे. चलो जाने दो, अब समीर लाल हीरो..वो भी फिस्स..फिर कोई और. फिर कोई और..हीरोईन जो भी बन जाओ. कोई नहीं जमा. सब एक दूसरे को गोली मार दो. सब मर जाओ. अब, हरी शंकर शर्मा हीरो और रुकमणी देवी हीरोईन. बाकी सब मर गये, क्या पूछ रहे हो यार?? कि ये हरी शंकर शर्मा हीरो और रुकमणी देवी हीरोईन-ये कौन लोग हैं. इनको तो कभी ब्लॉग पर देखा नहीं. सही है, हमारी तरह ही गुलाल देख कर भी आखिर में हीरो हीरोईन के बारे में यही कहोगे-उनको भी कभी देखा नहीं. आखिर में सबके मरने पर एकाएक भये प्रकट कृपाला टाईप आ गये. शायद कुछ लोग जानते हों तो वो तो हरी और रुक्मणी को भी जानते होंगे तो उससे क्या लेना देना.
यूँ भड़ास ब्लॉग से गुरेज कि गाली गलौज सब लिखी होती है. जो भी बात गले में अटक गई हो, उसे उगल दी जाती है और इस फिल्म पर वाह वाह!! सिर्फ इसलिये कि फिल्म है और अनुराग कश्यप की है. नाम की महिमा भी अपरंपार है. भड़ास की गालियों और भाषा की तो फिर भी वजह है कि भड़ासी लय में गाली बक कर हल्का हो लेता है और शायद उद्देश्य भी यही है मगर यहाँ तो बगैर वजह, निरुदेश्य और बिना सुर ताल के सब चालू रहे और लोग बैठे देखते रहे.
ऐसे देश में ,जहाँ हर नेता अपने कुकर्मों की कालिख अपने मूँह पर पोते घूम रहा हो और हम उसे फिर भी अलग से पहचान कर अनजान बने हुए हैं, सिर्फ इसलिए कि हमने इसे अपनी किस्मत मान हालातों से समझौता कर लिया है. ऐसे देश में जहाँ की एक बहुसंख्यक आबादी अपने आपका असतित्व बचाये रखने के लिए मुखौटा लगाये घूम रही हो. वहाँ चेहरे पर गुलाल पोत कर, भले ही सांकेतिक, एक रंग होना न जाने किस आशय और मकसद की पूर्ति कर रहा है, यह समझ पाना मुश्किल सा रहा. फिल्में देश और काल के मद्दे नज़र न बनें तो जादू देखना ज्यादा श्रेयकर होगा. संपूर्ण तिल्समि दुनिया. क्या आधा अधूरा देखना.
ऐसे देश में, जो खुद ही अभी विखंडित होने की मांग से आये दिन जूझता हो, कभी खालिस्तान, तो कभी गोरखालैण्ड तो कभी आजाद कश्मीर, इस तरह का एक और बीज बोना, आजाद राजपूताना, जिसकी अब तक सुगबुगाहट भी न हो, क्या संदेश देता है? क्या वजह आन पड़ी यह उकसाने की-समझ से परे ही रहा.
अक्सर फिल्म की कहानी को भटकते देखा है मगर इस फिल्म में तो कहानी भटकी, डायरेक्शन भटका, हीरो हीरोईन भटके और यहाँ तक कि दर्शक भी भटक गये. ऐसे भटके कि घर आने का रास्ता खोजना पड़ा.
गीतों के नाम पर कविताओं की पैरोडी और उन पर झमाझम नाचती, बल खाती बाला.पियूष मिश्रा के गीत पर-जैसे दूर देश के टावर में घुस गयो रे ऐरोप्लेन...नाचते देख तब्बू की हमशक्ल को लगा कि यही हीरोईन है मगर वो नहीं थी. दूसरी ही निकली जिसकी कतई उम्मीद न थी. अरे, वही, उपर फोटो वाली गुलाल पोते.
उस दिन कलकत्ता में था. रात पत्नी और साली की जिद हुई कि मूवी देखने चलें तो टाल न पाया. अब देखो क्या हाल हुआ: IMOX का थियेटर और पेट भर भोजन के बाद गद्दीदार लेटने योग्य सीट के साथ फिल्म देखने की शुरुवात.
अच्छा, ऐसा मानो कि ब्लॉगर्स को लेकर फिल्म बनायें. चलो, फुरसतिया जी हीरो..थोड़ी देर काम करवाया-पसंद नहीं आये, हटाओ और अब डॉ अनुराग हीरो, अरे, वो भी नहीं जमे. चलो जाने दो, अब समीर लाल हीरो..वो भी फिस्स..फिर कोई और. फिर कोई और..हीरोईन जो भी बन जाओ. कोई नहीं जमा. सब एक दूसरे को गोली मार दो. सब मर जाओ. अब, हरी शंकर शर्मा हीरो और रुकमणी देवी हीरोईन. बाकी सब मर गये, क्या पूछ रहे हो यार?? कि ये हरी शंकर शर्मा हीरो और रुकमणी देवी हीरोईन-ये कौन लोग हैं. इनको तो कभी ब्लॉग पर देखा नहीं. सही है, हमारी तरह ही गुलाल देख कर भी आखिर में हीरो हीरोईन के बारे में यही कहोगे-उनको भी कभी देखा नहीं. आखिर में सबके मरने पर एकाएक भये प्रकट कृपाला टाईप आ गये. शायद कुछ लोग जानते हों तो वो तो हरी और रुक्मणी को भी जानते होंगे तो उससे क्या लेना देना.

यूँ भड़ास ब्लॉग से गुरेज कि गाली गलौज सब लिखी होती है. जो भी बात गले में अटक गई हो, उसे उगल दी जाती है और इस फिल्म पर वाह वाह!! सिर्फ इसलिये कि फिल्म है और अनुराग कश्यप की है. नाम की महिमा भी अपरंपार है. भड़ास की गालियों और भाषा की तो फिर भी वजह है कि भड़ासी लय में गाली बक कर हल्का हो लेता है और शायद उद्देश्य भी यही है मगर यहाँ तो बगैर वजह, निरुदेश्य और बिना सुर ताल के सब चालू रहे और लोग बैठे देखते रहे.
ऐसे देश में ,जहाँ हर नेता अपने कुकर्मों की कालिख अपने मूँह पर पोते घूम रहा हो और हम उसे फिर भी अलग से पहचान कर अनजान बने हुए हैं, सिर्फ इसलिए कि हमने इसे अपनी किस्मत मान हालातों से समझौता कर लिया है. ऐसे देश में जहाँ की एक बहुसंख्यक आबादी अपने आपका असतित्व बचाये रखने के लिए मुखौटा लगाये घूम रही हो. वहाँ चेहरे पर गुलाल पोत कर, भले ही सांकेतिक, एक रंग होना न जाने किस आशय और मकसद की पूर्ति कर रहा है, यह समझ पाना मुश्किल सा रहा. फिल्में देश और काल के मद्दे नज़र न बनें तो जादू देखना ज्यादा श्रेयकर होगा. संपूर्ण तिल्समि दुनिया. क्या आधा अधूरा देखना.
ऐसे देश में, जो खुद ही अभी विखंडित होने की मांग से आये दिन जूझता हो, कभी खालिस्तान, तो कभी गोरखालैण्ड तो कभी आजाद कश्मीर, इस तरह का एक और बीज बोना, आजाद राजपूताना, जिसकी अब तक सुगबुगाहट भी न हो, क्या संदेश देता है? क्या वजह आन पड़ी यह उकसाने की-समझ से परे ही रहा.
अक्सर फिल्म की कहानी को भटकते देखा है मगर इस फिल्म में तो कहानी भटकी, डायरेक्शन भटका, हीरो हीरोईन भटके और यहाँ तक कि दर्शक भी भटक गये. ऐसे भटके कि घर आने का रास्ता खोजना पड़ा.
गीतों के नाम पर कविताओं की पैरोडी और उन पर झमाझम नाचती, बल खाती बाला.पियूष मिश्रा के गीत पर-जैसे दूर देश के टावर में घुस गयो रे ऐरोप्लेन...नाचते देख तब्बू की हमशक्ल को लगा कि यही हीरोईन है मगर वो नहीं थी. दूसरी ही निकली जिसकी कतई उम्मीद न थी. अरे, वही, उपर फोटो वाली गुलाल पोते.
बुधवार, अप्रैल 01, 2009
एक मुद्दत से तमन्ना थी...कलकत्ता देखने की.
गाना बज रहा है:
एक मुद्दत से तमन्ना थी, तुझे छूने की.....
सोचता हूँ वाकई, एक मुद्दत से तमन्ना थी..कलकत्ता नहीं देखा. देश के अनेक शहर देखे, विदेश के अनेक शहर देखे मगर नहीं देखा तो कलकत्ता!! बस, यही तमन्ना पूरी करने निकल पड़े २१ मार्च को कलकत्ता के सफर पर और एक नहीं अनेक तमन्नाऐं पूरी होती देखते रहे..शिव मिश्रा से मिलना, मीत भाई से मुलाकात, रंजना की फोन पर फटकार कि पहले काहे नहीं बताये कि आ रहे हो वरना हम भी आ जाते. छोटी है न!! रुठने मचलने का हक है तो फटकार सुनते रहे और मना भी लिए. वो भी मान गई, खुश हो गई कि अगली बार जरुर मिलेंगे.
क्रिकेट के शौकीन और नियमित खिलाड़ी शिव की फिटनेस प्रभावित करती रही. हमपेशा चार्टड एकाउन्टेन्ट हैं तो अनेकों मुद्दों पर व्यवसायिक सोच भी अति प्रभावशील रही.
कलकता स्टेशन पहुँचे ही थे कि सामने से आता एक नौजवान पहचाना सा लगा. आते ही चरण स्पर्श पहले हमारे फिर पत्नी के. पत्नी गदगद कि कितने संस्कारी मित्र हैं उनके पति के. जैसा शिव के बारे में सोचा था उससे भी ज्यादा संस्कारी और उर्जावान पाया.
बड़ी सी गाड़ी ले कर आये थे हमारे साईज का ख्याल करके मगर वो भी कम ही पड़ गई. दरअसल हमारी बिटिया जैसी साली का परिवार भी साथ था और उस पर से उसी समय ट्रेन मिला कर पत्नी की बड़ी बहन ने भी साथ कर लिया रुड़की से आकर. तब शिव ने तुरंत अपने दफ्तर से एक और बड़ी गाड़ी बुलवाई और हम सब रवाना हुए उस होटल के लिए जो शिव ने बुक कर रखी थी हमारे लिए पहले से. उम्दा व्यवस्था, उम्दा कमरा..वाह!! हमें छोड़ कर और शाम का प्रोग्राम बनाकर शिव ऑफिस वापस लौट गये.
शाम उनके बताये अनुरुप आसपास घूमें और अगले रोज सुबह शिव गाड़ी के साथ फिर हाजिर. गाड़ी दिन भर हमें कलकत्ता घुमाती रही उस दिन भी और अगले रोज भी जब हमें जलपाईगुड़ी के लिए निकलना था गंगटोक और दार्जलिंग जाने के लिए. घूमते फिरते कलकत्ता तो ऐसा समझ आया कि खूब खाओ, दवा लो और सो जाओ. जब नींद खुले तो फिर खाओ. हर तरफ खाने की दुकानें या फिर दवा की और दिन में बाकी सब दुकानें बंद मतलब की सोने चले गये.
अगले रोज शिव मीत को लेकर आये. मीत से हमारी बात पहले दिन ही हो गई थी मगर मुलाकात अगले दिन हुई. सारा परिवार बाजार में शिव की गाड़ी लिए घूम रहा था और हम, शिव और मीत कमरे में बैठे वार्तालाप में व्यस्त थे.

एक मुद्दत से तमन्ना थी, तुझे छूने की.....
सोचता हूँ वाकई, एक मुद्दत से तमन्ना थी..कलकत्ता नहीं देखा. देश के अनेक शहर देखे, विदेश के अनेक शहर देखे मगर नहीं देखा तो कलकत्ता!! बस, यही तमन्ना पूरी करने निकल पड़े २१ मार्च को कलकत्ता के सफर पर और एक नहीं अनेक तमन्नाऐं पूरी होती देखते रहे..शिव मिश्रा से मिलना, मीत भाई से मुलाकात, रंजना की फोन पर फटकार कि पहले काहे नहीं बताये कि आ रहे हो वरना हम भी आ जाते. छोटी है न!! रुठने मचलने का हक है तो फटकार सुनते रहे और मना भी लिए. वो भी मान गई, खुश हो गई कि अगली बार जरुर मिलेंगे.
क्रिकेट के शौकीन और नियमित खिलाड़ी शिव की फिटनेस प्रभावित करती रही. हमपेशा चार्टड एकाउन्टेन्ट हैं तो अनेकों मुद्दों पर व्यवसायिक सोच भी अति प्रभावशील रही.
कलकता स्टेशन पहुँचे ही थे कि सामने से आता एक नौजवान पहचाना सा लगा. आते ही चरण स्पर्श पहले हमारे फिर पत्नी के. पत्नी गदगद कि कितने संस्कारी मित्र हैं उनके पति के. जैसा शिव के बारे में सोचा था उससे भी ज्यादा संस्कारी और उर्जावान पाया.
बड़ी सी गाड़ी ले कर आये थे हमारे साईज का ख्याल करके मगर वो भी कम ही पड़ गई. दरअसल हमारी बिटिया जैसी साली का परिवार भी साथ था और उस पर से उसी समय ट्रेन मिला कर पत्नी की बड़ी बहन ने भी साथ कर लिया रुड़की से आकर. तब शिव ने तुरंत अपने दफ्तर से एक और बड़ी गाड़ी बुलवाई और हम सब रवाना हुए उस होटल के लिए जो शिव ने बुक कर रखी थी हमारे लिए पहले से. उम्दा व्यवस्था, उम्दा कमरा..वाह!! हमें छोड़ कर और शाम का प्रोग्राम बनाकर शिव ऑफिस वापस लौट गये.
शाम उनके बताये अनुरुप आसपास घूमें और अगले रोज सुबह शिव गाड़ी के साथ फिर हाजिर. गाड़ी दिन भर हमें कलकत्ता घुमाती रही उस दिन भी और अगले रोज भी जब हमें जलपाईगुड़ी के लिए निकलना था गंगटोक और दार्जलिंग जाने के लिए. घूमते फिरते कलकत्ता तो ऐसा समझ आया कि खूब खाओ, दवा लो और सो जाओ. जब नींद खुले तो फिर खाओ. हर तरफ खाने की दुकानें या फिर दवा की और दिन में बाकी सब दुकानें बंद मतलब की सोने चले गये.
अगले रोज शिव मीत को लेकर आये. मीत से हमारी बात पहले दिन ही हो गई थी मगर मुलाकात अगले दिन हुई. सारा परिवार बाजार में शिव की गाड़ी लिए घूम रहा था और हम, शिव और मीत कमरे में बैठे वार्तालाप में व्यस्त थे.

मीत कम बोलते हैं मगर पुख्ता बोलते हैं. पुख्ता इसलिए कि हमारे लेखन की उन्होंने तारीफ की कम बोलने के बावजूद भी.
बहुतेरी बातें हुई. फुरसतिया जी का फोन भी उसी दौरान पहुँचा, तो उनके बारे में भी बात हुई. खराब बात और बुराई करने से तीनों को ही परहेज था तो फुरसतिया जी के विषय में बात शुरु हुई और तुरंत ही रुक गई. :)
शैलेष द्वारा आयोजित ब्लॉगर मीट पर भी विशेष चर्चा हुई. पाया गया कि इस तरह की ब्लॉगर मीट से कुछ ऐसा संदेश जाना चाहिये जो अन्य क्षेत्रों को प्रेरित करे इस तरह के आयोजनों के लिए.
करीब दो घंटे की चर्चा में बैंगाणी बंधु, डॉ अनुराग, कुश, पीडी, नीरज बाबू ताऊ, भाटिया जी, अरविंद मिश्रा, चौखेर बाली, पंगेबाज, ज्ञान जी, शास्त्री जी, राकेश खण्डॆलवाल, प्रमोद सिंग, प्रत्यक्षा जी, अनूप भार्गव, विश्वनाथ जी, जबलपुर ब्लॉगर आदि आदि अनेक लोग आये और सहजता के साथ निकल गये.
मिलन मजेदार रहा. लघुकथा पर विशेष चर्चा में इस ओर ध्यान देने की आवश्यक्ता पर जोर दिया गया. कलकत्ता के ब्लॉगर बालकिशन जी का आना भी तय था किन्तु किंचित व्यवसायिक व्यस्तताओं के चलते रह गया.
पूरी यात्रा में शिव की मेहमान नवाजी का क्या कहें. हम तो घर के ही कहलाये तो कैसे मेहमान. बाकी तो झेला शिव ने है, वो बेहतर बतायेंगे. :) हमारा तो सारा परिवार अब तक शिव स्तुति में लगा है जबकि लौटे हुए २४ से ज्यादा घंटे हो गये हैं.
उनके सौजन्य से मछली खाते जबलपुर लौट रहे थे तो रास्ते में इलाहाबाद में परमेन्द्र महाशक्ति मिलने आये. पिछली बार ट्रेन छुटने के बाद पहुँचे थे तो इस बार दस मिनट पहले से स्टेशन पर मौजूट फोन पर टिकटिका रहे थे. चरण स्पर्श की परंपरा से उन्होंने भी पत्नी को अभिभूत किया, बहुत मजा आया इस युवक से मिल कर भी. बड़े सपने हैं इसके पास और भविष्य की अनेक योजनाऐं. मुझे बेहद उम्मीदें हैं परमेन्द्र से. मिलने पर असीम आनन्द की प्राप्ति हुई. जल्द ही फिर मिलने का वादा है. इलाहाबाद में और किसी को सूचना भी नहीं दे पाये थे तो मुलाकात भी नहीं हुई.

हर मिलन में बस एक ही बात पूरी होती दिखी:
एक मुद्दत से तमन्ना थी.....
बाकी तो शिव, मीत और प्रमेन्द्र ही बतायेंगे अपनी कलम से.
गुरुवार, मार्च 19, 2009
चितरंजन अस्पताल का कमरा नं. ४११: एक बुजुर्ग की डायरी-२
(आज उसी बुजुर्ग की डायरी का एक और पन्ना, जिसे आपने पहले पढ़ा था: पीले पन्नों में दर्ज हरे हर्फ शीर्षक के तहत (अगर न भी वो पन्ना पढ़ा हो तो भी यह पूरा है मगर उसे पढ़ने के बाद इसे देखने में ज्यादा जुड़ा महसूस करेंगे, बस्स!! )
एक अंदाज बस है कि शायद रात के तीन बजे के आस पास का समय होगा. नींद एकाएक सामने की सड़क से जाते ट्रक के हॉर्न से टूटी है.
पलंग से लगी खिड़की से लेटे लेटे बाहर झांकता हूँ आकाश में. आज कुछ भूरा सा रंग लिए है न जाने क्यूँ. बाहर क्या पता कि कैसा मौसम होगा-शायद महिने के अनुसार गरम ही हो. मगर कमरे में ए सी चल रहा है बिना किसी आवाज के शीतल वातावरण निर्मित करता.
विज्ञान की प्रगति के साथ प्रकृति से साथ छूटा. आप अपना वातावरण खुद निर्मित करने में सक्षम हुए. गरमी में सर्द या सर्दी में गर्म. मानव को एक अहंकार का भाव मिला. कमरे में रुम फेशनर की खुशबू से फूलों सी महक भरी है जबकि अस्पताल के ठीक नीचे बहता नाला जाने कितना बजबजा रहा होगा किन्तु मुझे उससे क्या लेना देना. मैं आत्म मुग्ध, अपने निर्मित वातावरण में.
अक्सर ही पाया गया कि अपने अनुरुप गढ़ा गया वातावरण, कहीं न कहीं शायद अहंकार की वजह से, वो नैसर्गिक सुख देने से वंचित हो जाता है जो हम अपने समय में सुविधाओं के आभाव में प्रकृति से जुड़ कर पाते थे. अब न गर्मी में छत पर खुले में सोने वाले और पड़ोसियों से छत से गपियाने वाले दिन रहे और न ही सर्दी में अँगीठी की आँच सेकते कमरे में रजाई में गुमड़ियाने के दिन जब मटर की गर्मागरम घुघरी हरी मिर्च और लहसून की चटनी के साथ अपनी अमिट छाप छोड़ जाती थी.

चितरंजन अस्पतालकमरा नं.४११
मैं चितरंजन अस्पताल में भरती हूँ कमरा नम्बर ४११. सीने में तीन दिन पहले दर्द उठा था शायद गैस की वजह से. दिन भर दबाये रहा मगर जैसा कि इस दर्द की शक्शियत है, रात को असहनीय हो उठा और बेटे को आवाज देनी ही पड़ी. आज बाजू में केयर टेकर के बिस्तर पर इस प्राईवेट एक्ज्यूकिटिव सूट के शानदार कमरे में बड़ा बेटा सोया है मेरी केयर करने को. बड़ी कम्पनी में अधिकारी है तो उसके पिता इससे कम सुविधा वाले कमरे में कैसे भरती रह सकते हैं.
सुबह ८ बजे बड़ी बहू नौकर के साथ आ जायेगी मेरे लिए चाय और नाश्ता लेकर. तब बड़ा बेटा घर चला जायेगा और नहा धो कर दफ्तर जायेगा. इस बीच छोटा बेटा ९.३० बजे यहाँ चला आयेगा ताकि बड़ी बहू घर जा सके. वो ११ बजे तक यहीं रहेगा. सूप वगैरह वो ही लायेगा. फिर ११ बजे छोटी बहू आ जायेगी और मेरे पास ही रहेगी २ बजे तक, जब बड़ी बहू वापस आयेगी लंच लेकर ताकि छोटी बहू घर जाकर छोटी और बड़ी बहू के स्कूल से लौटते बच्चों की टेक केयर करे.
अब ६ बजे छोटा बेटा दफ्तर से आकर मेरे पास रहेगा, बड़ी बहू घर जायेगी. वो मुझसे बात करेगा. डॉक्टरर्स से बात करेगा. आते रिश्तेदारों से सिर्फ और सिर्फ मेरी ही बात होगी. सब मेरे ही आसपास केन्द्रित रहेंगे. फिर छोटी बहू आकर रात का खाना खिलायेगी, मेरे तो हाथ में आई वी लगा है, खुद से खा ही नहीं सकता. तब थोड़ी देर में बड़ा बेटा आ जायेगा और वो रात भर रहेगा. यही दिनचर्या है जबसे यहाँ भरती हुआ हूँ.
अपनों का और अपने बेटों का इतना सानिध्य और अपनपा-इतनी मेरे और सिर्फ मेरे विषय में बातचीत और सब कुछ मुझ पर ही केन्द्रित देखे तो ५ बरस बीत गये, जब पत्नि मरी थी. क्या पता मैं ही मर गया था शायद. दोनों बेटे, दोनों बहूऐं सब मेरे साथ ही एक ही घर में रहते हैं मगर यहाँ मेरे ही कमरे में-मुझसे बात करते और मेरे ही लिए. यही बस अलग सी बात है यहाँ जो मुझे इतनी खुशी दिए जा रही है अपनी बीमारी की.
आई वी से टपकती बूँद बूँद ग्लुकोज की मिठास में पूरे वातावरण में अहसास रहा हूँ. जुँबा पर कोई स्वाद नहीं, बस अहसास, ठीक ग्लुकोज की मिठास सा.
कितना ही अच्छा लग रहा है मुझे कि मैं बीमार हुआ. लेकिन जाहिर भी तो नहीं कर सकता यह बात.
मेरी अशक्त्ता नें मुझे डरपोक बना दिया है शायद. हर वक्त डर रहता है कि मेरी कोई बात से मेरा ही कोई बच्चा नाराज न हो जाये. सामने हैं, दिखते रहते हैं तो एक मानसिक संबल रहता है. भले ही उनके पास मेरे लिए समय न हो.
डॉक्टर का कहना है कि जल्दी ही डिस्चार्ज कर देंगे.
है भगवन, मैं ठीक होकर अपने ही बनाये उस घर लौटना नहीं चाहता- मैं उस भरे पूरे घर के अपने एकाकी जीवन में, जहाँ होने को ये सब हैं पर मेरे पास कोई नहीं, लौटना नहीं चाहता. बस, वहाँ मैं और मेरे ही घर में मेरे कमरे तक सीमित मैं. मुझे तो तू अपने साथ यहीं से ले चल.
मैं अपने साथ अपनों की वो मधुर स्मृतियाँ ले जाना चाहता हूँ जो पिछले तीन दिनों में मैने सहेजी हैं मानो कि पत्नि के जाने के बाद के ५ बरस मैनें इन तीन दिनों के इन्तजार में ही जिए हों.
मगर भगवन, तू जल्दी कर, मैं अब भी चाहता हूँ कि मेरे बच्चे, समाज में अपनी पोजिशन बनाये रखने के लिए, अपनी इस नियमित कठिन अस्पताल आने जाने की जिम्मेदारियों से जल्दी मुक्त हो अपनी उन्मुक्त जिंदगी बितायें.
हे प्रभु, तुम सुन रहे हो न!!! बड़ा बेटा अभी बाजू के बिस्तर में गहरी नींद में है. चल, मुझे चुपचाप ले चल!!!!
(नोट: पिछली बार कुछ लोगों को लगा कि मैं अपनी डायरी का पन्ना दे रहा हूँ. एक स्पष्टीकरण देना चाहूँगा कि यह मेरी डायरी नहीं बल्कि अपने आस पास महसूस कर मैं एक बुजुर्ग को जीने का प्रयास कर रहा हूँ इन पन्नो के माध्यम से ताकि उन्हें मैं और आप बेहतर समझ सकें और उन्हें यथोचित मान सम्मान और समय देने का प्रयास करें.)
-------------------
चलो, अब मामला भारी सा हो लिया है तो एक नई रचना सुनो और खुश हो लो. डायरी उनकी, दर्द उनका..हमें क्या, हम ऐसे ही तो जीने के आदी हैं. तो फिर रचना हमारी-मुस्कान आपकी -की दरकार के साथ.
चुनाव का माहौल है तो उससे प्रभावित पहले कुछ शेर फिर कुछ चुलबुले भी, मूड ठीक करने को:
झूट की बैसाखियों पे, जिन्दगी कट जायेगी
मूँग दलते छातियों पे, जिन्दगी कट जायेगी.
तू दगा करता उन्हीं से, जो भी तेरा साथ दे
वार करते साथियों पे, जिन्दगी कट जायेगी.
सज गया संपर्क से तू, कितने ही सम्मान से
कागजी इन हाथियों पे, जिन्दगी कट जायेगी.
यूँ जमीं कब्जे में करके, दे गया तू मशविरा,
घर बसा लो नालियों पे, जिन्दगी कट जायेगी.
है अगर बीबी खफा तो फिक्र की क्या बात है
कर भरोसा सालियों पे, जिन्दगी कट जायेगी.
कब गुजर संभव किसी की, इस कविता पाठ से,
मिल रही इन तालियों पे, जिन्दगी कट जायेगी.
गाड़ देना मुझको ताकि अबके मैं हीरा बनूँ,
सज के उनकी बालियों पे, जिन्दगी कट जायेगी.
-समीर लाल ’समीर’
-------------------
सूचना:
१. कल १० दिनों के कलकत्ता और सिक्किम के प्रवास पर जा रहा हूँ. कलकत्ता में शिव भाई दौड़ा भागी में लगे सब इन्तजाम कर रहे हैं और मीत भाई से भी मुलाकात तय है. वापसी ३१ मार्च की है.
२. १८ मार्च की संजय तिवारी ’संजू’ के संदेशा द्वारा प्रस्तुत श्री विजय शंकर चतुर्वेदी जी (आजाद लब) के सम्मान में आयोजित रात्रि भोज की रिपोर्ट में यह बात हमारे संजय साहब आराम से दबा गये कि मैने जबलपुर के सभी ब्लॉगर्स को न्यौता देने की जिम्मेदारी उन पर रख छोड़ी थी.
थोड़ी गल्ति मेरी थी कि सब कुछ तय शाम ५ बजे पाया गया और संजय तक सूचना पहुँचते ५.३० बज गया और सब ७.३० बजे एकत्रित हो लिए जिन को भी वो सूचित कर पाये. बहुतों तक इस सूचना के न पहुँच पाने का मुझे दुख है. आगे फिर किसी दिन जल्द ही कनाडा वापस लौटने के पहले. :)
एक अंदाज बस है कि शायद रात के तीन बजे के आस पास का समय होगा. नींद एकाएक सामने की सड़क से जाते ट्रक के हॉर्न से टूटी है.
पलंग से लगी खिड़की से लेटे लेटे बाहर झांकता हूँ आकाश में. आज कुछ भूरा सा रंग लिए है न जाने क्यूँ. बाहर क्या पता कि कैसा मौसम होगा-शायद महिने के अनुसार गरम ही हो. मगर कमरे में ए सी चल रहा है बिना किसी आवाज के शीतल वातावरण निर्मित करता.
विज्ञान की प्रगति के साथ प्रकृति से साथ छूटा. आप अपना वातावरण खुद निर्मित करने में सक्षम हुए. गरमी में सर्द या सर्दी में गर्म. मानव को एक अहंकार का भाव मिला. कमरे में रुम फेशनर की खुशबू से फूलों सी महक भरी है जबकि अस्पताल के ठीक नीचे बहता नाला जाने कितना बजबजा रहा होगा किन्तु मुझे उससे क्या लेना देना. मैं आत्म मुग्ध, अपने निर्मित वातावरण में.
अक्सर ही पाया गया कि अपने अनुरुप गढ़ा गया वातावरण, कहीं न कहीं शायद अहंकार की वजह से, वो नैसर्गिक सुख देने से वंचित हो जाता है जो हम अपने समय में सुविधाओं के आभाव में प्रकृति से जुड़ कर पाते थे. अब न गर्मी में छत पर खुले में सोने वाले और पड़ोसियों से छत से गपियाने वाले दिन रहे और न ही सर्दी में अँगीठी की आँच सेकते कमरे में रजाई में गुमड़ियाने के दिन जब मटर की गर्मागरम घुघरी हरी मिर्च और लहसून की चटनी के साथ अपनी अमिट छाप छोड़ जाती थी.

मैं चितरंजन अस्पताल में भरती हूँ कमरा नम्बर ४११. सीने में तीन दिन पहले दर्द उठा था शायद गैस की वजह से. दिन भर दबाये रहा मगर जैसा कि इस दर्द की शक्शियत है, रात को असहनीय हो उठा और बेटे को आवाज देनी ही पड़ी. आज बाजू में केयर टेकर के बिस्तर पर इस प्राईवेट एक्ज्यूकिटिव सूट के शानदार कमरे में बड़ा बेटा सोया है मेरी केयर करने को. बड़ी कम्पनी में अधिकारी है तो उसके पिता इससे कम सुविधा वाले कमरे में कैसे भरती रह सकते हैं.
सुबह ८ बजे बड़ी बहू नौकर के साथ आ जायेगी मेरे लिए चाय और नाश्ता लेकर. तब बड़ा बेटा घर चला जायेगा और नहा धो कर दफ्तर जायेगा. इस बीच छोटा बेटा ९.३० बजे यहाँ चला आयेगा ताकि बड़ी बहू घर जा सके. वो ११ बजे तक यहीं रहेगा. सूप वगैरह वो ही लायेगा. फिर ११ बजे छोटी बहू आ जायेगी और मेरे पास ही रहेगी २ बजे तक, जब बड़ी बहू वापस आयेगी लंच लेकर ताकि छोटी बहू घर जाकर छोटी और बड़ी बहू के स्कूल से लौटते बच्चों की टेक केयर करे.
अब ६ बजे छोटा बेटा दफ्तर से आकर मेरे पास रहेगा, बड़ी बहू घर जायेगी. वो मुझसे बात करेगा. डॉक्टरर्स से बात करेगा. आते रिश्तेदारों से सिर्फ और सिर्फ मेरी ही बात होगी. सब मेरे ही आसपास केन्द्रित रहेंगे. फिर छोटी बहू आकर रात का खाना खिलायेगी, मेरे तो हाथ में आई वी लगा है, खुद से खा ही नहीं सकता. तब थोड़ी देर में बड़ा बेटा आ जायेगा और वो रात भर रहेगा. यही दिनचर्या है जबसे यहाँ भरती हुआ हूँ.
अपनों का और अपने बेटों का इतना सानिध्य और अपनपा-इतनी मेरे और सिर्फ मेरे विषय में बातचीत और सब कुछ मुझ पर ही केन्द्रित देखे तो ५ बरस बीत गये, जब पत्नि मरी थी. क्या पता मैं ही मर गया था शायद. दोनों बेटे, दोनों बहूऐं सब मेरे साथ ही एक ही घर में रहते हैं मगर यहाँ मेरे ही कमरे में-मुझसे बात करते और मेरे ही लिए. यही बस अलग सी बात है यहाँ जो मुझे इतनी खुशी दिए जा रही है अपनी बीमारी की.
आई वी से टपकती बूँद बूँद ग्लुकोज की मिठास में पूरे वातावरण में अहसास रहा हूँ. जुँबा पर कोई स्वाद नहीं, बस अहसास, ठीक ग्लुकोज की मिठास सा.
कितना ही अच्छा लग रहा है मुझे कि मैं बीमार हुआ. लेकिन जाहिर भी तो नहीं कर सकता यह बात.
मेरी अशक्त्ता नें मुझे डरपोक बना दिया है शायद. हर वक्त डर रहता है कि मेरी कोई बात से मेरा ही कोई बच्चा नाराज न हो जाये. सामने हैं, दिखते रहते हैं तो एक मानसिक संबल रहता है. भले ही उनके पास मेरे लिए समय न हो.
डॉक्टर का कहना है कि जल्दी ही डिस्चार्ज कर देंगे.
है भगवन, मैं ठीक होकर अपने ही बनाये उस घर लौटना नहीं चाहता- मैं उस भरे पूरे घर के अपने एकाकी जीवन में, जहाँ होने को ये सब हैं पर मेरे पास कोई नहीं, लौटना नहीं चाहता. बस, वहाँ मैं और मेरे ही घर में मेरे कमरे तक सीमित मैं. मुझे तो तू अपने साथ यहीं से ले चल.
मैं अपने साथ अपनों की वो मधुर स्मृतियाँ ले जाना चाहता हूँ जो पिछले तीन दिनों में मैने सहेजी हैं मानो कि पत्नि के जाने के बाद के ५ बरस मैनें इन तीन दिनों के इन्तजार में ही जिए हों.
मगर भगवन, तू जल्दी कर, मैं अब भी चाहता हूँ कि मेरे बच्चे, समाज में अपनी पोजिशन बनाये रखने के लिए, अपनी इस नियमित कठिन अस्पताल आने जाने की जिम्मेदारियों से जल्दी मुक्त हो अपनी उन्मुक्त जिंदगी बितायें.
हे प्रभु, तुम सुन रहे हो न!!! बड़ा बेटा अभी बाजू के बिस्तर में गहरी नींद में है. चल, मुझे चुपचाप ले चल!!!!
(नोट: पिछली बार कुछ लोगों को लगा कि मैं अपनी डायरी का पन्ना दे रहा हूँ. एक स्पष्टीकरण देना चाहूँगा कि यह मेरी डायरी नहीं बल्कि अपने आस पास महसूस कर मैं एक बुजुर्ग को जीने का प्रयास कर रहा हूँ इन पन्नो के माध्यम से ताकि उन्हें मैं और आप बेहतर समझ सकें और उन्हें यथोचित मान सम्मान और समय देने का प्रयास करें.)
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चलो, अब मामला भारी सा हो लिया है तो एक नई रचना सुनो और खुश हो लो. डायरी उनकी, दर्द उनका..हमें क्या, हम ऐसे ही तो जीने के आदी हैं. तो फिर रचना हमारी-मुस्कान आपकी -की दरकार के साथ.
चुनाव का माहौल है तो उससे प्रभावित पहले कुछ शेर फिर कुछ चुलबुले भी, मूड ठीक करने को:
झूट की बैसाखियों पे, जिन्दगी कट जायेगी
मूँग दलते छातियों पे, जिन्दगी कट जायेगी.
तू दगा करता उन्हीं से, जो भी तेरा साथ दे
वार करते साथियों पे, जिन्दगी कट जायेगी.
सज गया संपर्क से तू, कितने ही सम्मान से
कागजी इन हाथियों पे, जिन्दगी कट जायेगी.
यूँ जमीं कब्जे में करके, दे गया तू मशविरा,
घर बसा लो नालियों पे, जिन्दगी कट जायेगी.
है अगर बीबी खफा तो फिक्र की क्या बात है
कर भरोसा सालियों पे, जिन्दगी कट जायेगी.
कब गुजर संभव किसी की, इस कविता पाठ से,
मिल रही इन तालियों पे, जिन्दगी कट जायेगी.
गाड़ देना मुझको ताकि अबके मैं हीरा बनूँ,
सज के उनकी बालियों पे, जिन्दगी कट जायेगी.
-समीर लाल ’समीर’
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सूचना:
१. कल १० दिनों के कलकत्ता और सिक्किम के प्रवास पर जा रहा हूँ. कलकत्ता में शिव भाई दौड़ा भागी में लगे सब इन्तजाम कर रहे हैं और मीत भाई से भी मुलाकात तय है. वापसी ३१ मार्च की है.
२. १८ मार्च की संजय तिवारी ’संजू’ के संदेशा द्वारा प्रस्तुत श्री विजय शंकर चतुर्वेदी जी (आजाद लब) के सम्मान में आयोजित रात्रि भोज की रिपोर्ट में यह बात हमारे संजय साहब आराम से दबा गये कि मैने जबलपुर के सभी ब्लॉगर्स को न्यौता देने की जिम्मेदारी उन पर रख छोड़ी थी.
थोड़ी गल्ति मेरी थी कि सब कुछ तय शाम ५ बजे पाया गया और संजय तक सूचना पहुँचते ५.३० बज गया और सब ७.३० बजे एकत्रित हो लिए जिन को भी वो सूचित कर पाये. बहुतों तक इस सूचना के न पहुँच पाने का मुझे दुख है. आगे फिर किसी दिन जल्द ही कनाडा वापस लौटने के पहले. :)
रविवार, मार्च 15, 2009
बिल्लु की जगह बिल्ली भी चलता..
हमारे मोहल्ले का गरीब नाई. पुरानी स्टाईल वाला. बस, एक टूटी कुरसी, पुराना आईना और टूटे फूटे औजार. क्या चलेगी उसकी दुकान ऐसे दिखावे के बाजार में जहाँ प्रोडक्ट से ज्यादा शो पानी बिकता है. तो नहीं चलती थी.
एकाएक हमारे गाँव में बॉलीवुड सुपर स्टार शूटिंग करने आ जाता है और लोगों में पता नहीं कहाँ से हवा फैल जाती है कि ये नाई उसका बचपन का दोस्त है.
लोग समझते नहीं हैं, हमारे गाँव में तो अमरीका से बुश भी आ जाये, तो उसके साथ के बचपन के पढ़े पाँच सात तो पान की दुकान पर गपियाते मिल जायेंगे. मूँह चलाने में कोई पैसे थोड़ी ही न लगते हैं.
बस, फिर क्या!! आज की दुनिया में लोग तो वक्त के दोस्त होते हैं आपके थोड़े न!! आपका वक्त अच्छा, तो आपके दोस्त वरना नहीं पहचानते. इसी हल्ले में उसकी दुकान चल निकलती है. नाई की पूछ परख बढ़ जाती है. सब उसे जरिया बना कर सुपर स्टार से मिलना चाहते हैं.
अरे, जो खुद ही नहीं सुप स्टार से मिल पा रहा वो क्या किसी को मिलायेगा. इत्ती सी बात बहुत समय निकल जाने के बाद लोगों को समझ आती है और फिर जैसा मैने कहा, लोग वक्त के दोस्त होते हैं. सब उसे दुत्कार देते हैं और वो फिर से पुराना वाला नऊआ.
गांव के एक स्कूल में शूटिंग के आखिरी दिन सुपर स्टार स्कूल के बच्चों के लिए रखे गये कार्यक्रम में किसी तरह समय निकाल कर पाँच मिनट के लिए आता है और फिर ऐसा रह जाता है जैसे जाना ही न हो. अपनी जीवनी सुनाता है और अपने बचपन के दोस्त नऊए का जिक्र कर बैठता है.
फिर क्या, सब उसे लेकर नऊए के यहाँ आ जाते हैं. सब घर के बाहर और सुपर स्टार अंदर. गला मिलन और एक मिनट में बचपन की याद, बात और फिर सुपर स्टार का उसे ऑफर कि तू पुराने गाँव में जाकर बस जा, तो कभी हम पुराने दिन फिर से जी लेंगे और सुपर स्टार रवाना वापस बम्बई.
अब बताओ, पुराने गाँव में धरा क्या है? कुछ होता तो क्या नाई यहाँ आता? न पैसा न कौड़ी, कुछ भी प्रामिस नहीं किया और कह गये, जाकर बस जाओ-कहाँ बस जाये? बस स्टैंड पर कि कुछ मकान दुकान खरीद के दोगे? कहानी खत्म!!
ये हम सोच सोच कर कहानी नहीं बनायें हैं. ये है बिल्लू बार्बर फिल्म की कहानी. नाम फिल्म का यह भी हो सकता था ’मैं किंग खान’ या ’शाहरुख’ या ’क्या देखने आये हो, कुछ काम नहीं है क्या’ या ’अगली फिल्म में मुझे ले ले, ठाकुर!!’ .......कुछ भी. सब इसी तरह फिट होते. फिल्म का नाम ’बिल्लू बार्बर’ मगर फोकस पूरे समय बस शाहरुख खान के प्रमोशन पर.
अगर शाहरुख कोई नया आया कलाकार होता और फिल्म में जरा सी काट छांट करके बिल्लू सिल्लू अलग कर दें, तो भी २ घंटे का शाहरुख प्रोमो बच रह जायेगा जिस सीडी को किसी भी प्रोड्यूसर के पास भेज अगली फिल्म में काम मिलने का इन्तजार किया जा सकता है.
मगर हम तो फिल्म प्रोड्यूस करते नहीं और आप भी कहाँ फिल्में बनाते हैं, अतः आपके और हमारे काम की नहीं.

बिल्लु के बदले: बिल्ली
शाहरुख का होम प्रोड्क्शन है. वो क्लेम कर सकते हैं कि यह फिल्म मेरे प्रमोशन के लिए नहीं बल्कि मित्रता की मिसाल, बाल सखाओं का प्यार, त्याग और बलिदान जैसी बातें बताने के लिए बनाई है तो आप पायेंगे कि पूरे तीन घंटे की फिल्म में ये मित्र आमने सामने मात्र दो मिनट के लिए हैं एक सिंगल प्रेम में. अगर फिल्म की जस्ट समाप्ति पूर्व वो फ्रेम न होता और इन्हें आपस में बताया न जाता तो कहो, ये दोनों जान भी न पाते कि फिल्म में किसके साथ काम किये हैं.
हैप्पी एंडिंग हुई-ऐसा पत्नी ने मुस्करा कर थियेटर के बाहर निकलते हुए बताया. जबरदस्ती दिल्ली की ट्रिप में दिल्ली ६ जैसी फिल्म दिखाने के बावजूद भी (नेक इन्सान एक गल्ति करके संभल जाता है मगर वो!!) दूसरी फिल्म दिखाने ले आई थी तो भला उसके पास चारा भी क्या था सिवाय मुस्कराने के.
हम भारतियों की यही विशेषता है कि जब कुछ समझ न आये, कोई गल्ति हो जाये, बेवकूफ बन जाओ या कोई रास्ता समझ न आये तो बिना लॉजिक दाँत चियार के मुस्कराने लगो. मामला अपने आप सलट जाता है.
खैर, पूरी फिल्म में एक करेक्टर थे जो याद रह गये- कविराज माननीय राजपाल यादव जी. ये छुटकू महाराज हमें यूँ भी पसंद हैं और इसमें तो कवि बने हैं.
मोहल्ले में बताया कि फिल्म तो ऐं वें टाईप थी, बस कवि चूँकि हमारे हम शौक निकले इसलिये ठीक लगे तो बात लोगों को ठनक गई.
सब पीछे लग लिए कि मोहल्ले में 'मोहल्ला स्थापना रजत जयंति समारोह' के कार्यक्रम में फागुन गीत भी गाया जायेगा, आप जरा फड़कता हुआ गीत लिख दिजिये- जरा लोकगीत की तर्ज पर रहे, यह ध्यान रखियेगा. मोहल्ले में तो ईमेज से ही इन्सान की पहचान होती है फड़कता लिखें तो फड़कती ईमेज बने, सो उसे मेन्टन करने के चक्कर में हम लिखे और दे दिये. अब इसकी धुन बनेगी और कोई महिला मंडल की सदस्या ’मोहल्ला स्थापना रजत जयंति समारोह” में इसे गायेंगी मगर तब तक आप पढ़ लो. राज पाल यादव के गीत ’बिल्लू भयंकर’ से बेहतर ही सा लग रहा है:
चढ़ गया रे फागुनी बुखार,
गीला रंग मोहे लगाई दो!!
रंग लगा दो,
गुलाल लगा दो,
गालों पे मेरे
लाल लगा दो..
भर भर पिचकारी से मार,
गीला रंग मोहे लगाई दो!!
चढ़ गया रे फागुनी बुखार,
गीला रंग मोहे लगाई दो!!
सासु लगावें
ससुर जी लगावें,
नन्दों के संग में
देवर जी लगावें..
साजन का करुँ इन्तजार,
गीला रंग मोहे लगाई दो!!
चढ़ गया रे फागुनी बुखार,
गीला रंग मोहे लगाई दो!!
गुझिया भी खाई
सलोनी भी खाई
चटनी लगा कर
कचौड़ी भी खाई..
भांग का छाया है खुमार..
गीला रंग मोहे लगाई दो!!
चढ़ गया रे फागुनी बुखार,
गीला रंग मोहे लगाई दो!!
हिन्दु लगावें
मुस्लमां लगावें,
मजहब सभी
इक रंग लगावें..
मुझको है इंसां से प्यार..
गीला रंग मोहे लगाई दो!!
चढ़ गया रे फागुनी बुखार,
गीला रंग मोहे लगाई दो!!
-समीर लाल ’समीर’
एकाएक हमारे गाँव में बॉलीवुड सुपर स्टार शूटिंग करने आ जाता है और लोगों में पता नहीं कहाँ से हवा फैल जाती है कि ये नाई उसका बचपन का दोस्त है.
लोग समझते नहीं हैं, हमारे गाँव में तो अमरीका से बुश भी आ जाये, तो उसके साथ के बचपन के पढ़े पाँच सात तो पान की दुकान पर गपियाते मिल जायेंगे. मूँह चलाने में कोई पैसे थोड़ी ही न लगते हैं.
बस, फिर क्या!! आज की दुनिया में लोग तो वक्त के दोस्त होते हैं आपके थोड़े न!! आपका वक्त अच्छा, तो आपके दोस्त वरना नहीं पहचानते. इसी हल्ले में उसकी दुकान चल निकलती है. नाई की पूछ परख बढ़ जाती है. सब उसे जरिया बना कर सुपर स्टार से मिलना चाहते हैं.
अरे, जो खुद ही नहीं सुप स्टार से मिल पा रहा वो क्या किसी को मिलायेगा. इत्ती सी बात बहुत समय निकल जाने के बाद लोगों को समझ आती है और फिर जैसा मैने कहा, लोग वक्त के दोस्त होते हैं. सब उसे दुत्कार देते हैं और वो फिर से पुराना वाला नऊआ.
गांव के एक स्कूल में शूटिंग के आखिरी दिन सुपर स्टार स्कूल के बच्चों के लिए रखे गये कार्यक्रम में किसी तरह समय निकाल कर पाँच मिनट के लिए आता है और फिर ऐसा रह जाता है जैसे जाना ही न हो. अपनी जीवनी सुनाता है और अपने बचपन के दोस्त नऊए का जिक्र कर बैठता है.
फिर क्या, सब उसे लेकर नऊए के यहाँ आ जाते हैं. सब घर के बाहर और सुपर स्टार अंदर. गला मिलन और एक मिनट में बचपन की याद, बात और फिर सुपर स्टार का उसे ऑफर कि तू पुराने गाँव में जाकर बस जा, तो कभी हम पुराने दिन फिर से जी लेंगे और सुपर स्टार रवाना वापस बम्बई.
अब बताओ, पुराने गाँव में धरा क्या है? कुछ होता तो क्या नाई यहाँ आता? न पैसा न कौड़ी, कुछ भी प्रामिस नहीं किया और कह गये, जाकर बस जाओ-कहाँ बस जाये? बस स्टैंड पर कि कुछ मकान दुकान खरीद के दोगे? कहानी खत्म!!
ये हम सोच सोच कर कहानी नहीं बनायें हैं. ये है बिल्लू बार्बर फिल्म की कहानी. नाम फिल्म का यह भी हो सकता था ’मैं किंग खान’ या ’शाहरुख’ या ’क्या देखने आये हो, कुछ काम नहीं है क्या’ या ’अगली फिल्म में मुझे ले ले, ठाकुर!!’ .......कुछ भी. सब इसी तरह फिट होते. फिल्म का नाम ’बिल्लू बार्बर’ मगर फोकस पूरे समय बस शाहरुख खान के प्रमोशन पर.
अगर शाहरुख कोई नया आया कलाकार होता और फिल्म में जरा सी काट छांट करके बिल्लू सिल्लू अलग कर दें, तो भी २ घंटे का शाहरुख प्रोमो बच रह जायेगा जिस सीडी को किसी भी प्रोड्यूसर के पास भेज अगली फिल्म में काम मिलने का इन्तजार किया जा सकता है.
मगर हम तो फिल्म प्रोड्यूस करते नहीं और आप भी कहाँ फिल्में बनाते हैं, अतः आपके और हमारे काम की नहीं.

शाहरुख का होम प्रोड्क्शन है. वो क्लेम कर सकते हैं कि यह फिल्म मेरे प्रमोशन के लिए नहीं बल्कि मित्रता की मिसाल, बाल सखाओं का प्यार, त्याग और बलिदान जैसी बातें बताने के लिए बनाई है तो आप पायेंगे कि पूरे तीन घंटे की फिल्म में ये मित्र आमने सामने मात्र दो मिनट के लिए हैं एक सिंगल प्रेम में. अगर फिल्म की जस्ट समाप्ति पूर्व वो फ्रेम न होता और इन्हें आपस में बताया न जाता तो कहो, ये दोनों जान भी न पाते कि फिल्म में किसके साथ काम किये हैं.
हैप्पी एंडिंग हुई-ऐसा पत्नी ने मुस्करा कर थियेटर के बाहर निकलते हुए बताया. जबरदस्ती दिल्ली की ट्रिप में दिल्ली ६ जैसी फिल्म दिखाने के बावजूद भी (नेक इन्सान एक गल्ति करके संभल जाता है मगर वो!!) दूसरी फिल्म दिखाने ले आई थी तो भला उसके पास चारा भी क्या था सिवाय मुस्कराने के.
हम भारतियों की यही विशेषता है कि जब कुछ समझ न आये, कोई गल्ति हो जाये, बेवकूफ बन जाओ या कोई रास्ता समझ न आये तो बिना लॉजिक दाँत चियार के मुस्कराने लगो. मामला अपने आप सलट जाता है.
खैर, पूरी फिल्म में एक करेक्टर थे जो याद रह गये- कविराज माननीय राजपाल यादव जी. ये छुटकू महाराज हमें यूँ भी पसंद हैं और इसमें तो कवि बने हैं.
मोहल्ले में बताया कि फिल्म तो ऐं वें टाईप थी, बस कवि चूँकि हमारे हम शौक निकले इसलिये ठीक लगे तो बात लोगों को ठनक गई.
सब पीछे लग लिए कि मोहल्ले में 'मोहल्ला स्थापना रजत जयंति समारोह' के कार्यक्रम में फागुन गीत भी गाया जायेगा, आप जरा फड़कता हुआ गीत लिख दिजिये- जरा लोकगीत की तर्ज पर रहे, यह ध्यान रखियेगा. मोहल्ले में तो ईमेज से ही इन्सान की पहचान होती है फड़कता लिखें तो फड़कती ईमेज बने, सो उसे मेन्टन करने के चक्कर में हम लिखे और दे दिये. अब इसकी धुन बनेगी और कोई महिला मंडल की सदस्या ’मोहल्ला स्थापना रजत जयंति समारोह” में इसे गायेंगी मगर तब तक आप पढ़ लो. राज पाल यादव के गीत ’बिल्लू भयंकर’ से बेहतर ही सा लग रहा है:
चढ़ गया रे फागुनी बुखार,
गीला रंग मोहे लगाई दो!!
रंग लगा दो,
गुलाल लगा दो,
गालों पे मेरे
लाल लगा दो..
भर भर पिचकारी से मार,
गीला रंग मोहे लगाई दो!!
चढ़ गया रे फागुनी बुखार,
गीला रंग मोहे लगाई दो!!
सासु लगावें
ससुर जी लगावें,
नन्दों के संग में
देवर जी लगावें..
साजन का करुँ इन्तजार,
गीला रंग मोहे लगाई दो!!
चढ़ गया रे फागुनी बुखार,
गीला रंग मोहे लगाई दो!!
गुझिया भी खाई
सलोनी भी खाई
चटनी लगा कर
कचौड़ी भी खाई..
भांग का छाया है खुमार..
गीला रंग मोहे लगाई दो!!
चढ़ गया रे फागुनी बुखार,
गीला रंग मोहे लगाई दो!!
हिन्दु लगावें
मुस्लमां लगावें,
मजहब सभी
इक रंग लगावें..
मुझको है इंसां से प्यार..
गीला रंग मोहे लगाई दो!!
चढ़ गया रे फागुनी बुखार,
गीला रंग मोहे लगाई दो!!
-समीर लाल ’समीर’
गुरुवार, मार्च 12, 2009
होली पर यह हालत हो ली!!!
देखिये, क्या क्या न बनें हम भी सनम, आपकी खातिर: हा हा!!! जिसका जैसे मन आया, होली पर रंगता चला गया और हम रंगाते चले गये. मजा बहुत इस ब्लॉगरी होली में इस साल.
ताऊ के दर पर:

ताऊ: जय हो!
साहित्य शिल्पी पर योगेश समदर्शी की नजर:

योगेश भाई: वाह!!
मित्र द्वारा ईमेल पर भी लटका दिये गये:

अब तो: ब्लॉग बना लो!
मास्साब पंकज सुबीर के मुशायरे में:

मास्साब: क्या खूब सजाया!!
मास्साब के मुशायरे में नाम मिला समीरा लल्ली कनाडा वाली उड़ने वाली तश्तरी और फिर हमने जो गज़ल पढ़ी, जिसका मिसरा दिया गया था: तुम्हारे शहर के गंदे, वो नाले याद आते हैं - वो तो सुनते जाईये (हालांकि आप में से बहुत से लोगों ने तो मुशायरे में ही सुन ली होगी.)
तुम्हारे शहर के गंदे, वो नाले याद आते हैं
नहाते नंगे बच्चों के रिसाले याद आते हैं
था ऐसा ही तो इक नाला, तुम्हारे घर के आगे भी
हमें उसके ही किस्से अब, वो वाले याद आते हैं
तुम्हें छेड़ा था हमने बस ज़रा सा ही तो, नाले पर
पिटे फिर जिनके हाथों से वो साले याद आते हैं
तुम्हारा घर था बाज़ू से, नज़र दीवार से आता
हमें उस पर लगे, मकड़ी के जाले याद आते हैं.
हाँ छिप कर पेड़ के पीछे, नज़र रखते थे हम तुम पर
तुम्हारे गाल गुलगुल्ले, गुलाले याद आते हैं.
नशा नज़रों का तुम्हारा, उतारा बाप ने सारा
हमें रम का मज़ा देते, दो प्याले याद आते हैं
मिटा दी हर रुकावट हमने, अपने बीच की सारी
लगाये बाप ने तुम पर जो ताले, याद आते हैं
अँगूठी तुमको पीतल की, टिका कर उसने भरमाया
जो तुमने हमको लौटाए, वो बाले याद आते हैं
चली क्या चाल तुमने भी, जो कर ली गै़र संग शादी
हमें गुज़रे ज़माने के, घोटाले याद आते हैं.
जिगर को लाल करने को, गुलाल दिल पे था डाला
चलाए नज़रों से तुमने, वो भाले याद आते हैं
अँधेरी रात थी वो घुप्प और बिजली नदारत थी
’समीर’ भागे थे जिन रस्तों से, काले याद आते हैं
--समीर लाल ’समीर’
ताऊ के दर पर:

साहित्य शिल्पी पर योगेश समदर्शी की नजर:

मित्र द्वारा ईमेल पर भी लटका दिये गये:

मास्साब पंकज सुबीर के मुशायरे में:

मास्साब के मुशायरे में नाम मिला समीरा लल्ली कनाडा वाली उड़ने वाली तश्तरी और फिर हमने जो गज़ल पढ़ी, जिसका मिसरा दिया गया था: तुम्हारे शहर के गंदे, वो नाले याद आते हैं - वो तो सुनते जाईये (हालांकि आप में से बहुत से लोगों ने तो मुशायरे में ही सुन ली होगी.)
तुम्हारे शहर के गंदे, वो नाले याद आते हैं
नहाते नंगे बच्चों के रिसाले याद आते हैं
था ऐसा ही तो इक नाला, तुम्हारे घर के आगे भी
हमें उसके ही किस्से अब, वो वाले याद आते हैं
तुम्हें छेड़ा था हमने बस ज़रा सा ही तो, नाले पर
पिटे फिर जिनके हाथों से वो साले याद आते हैं
तुम्हारा घर था बाज़ू से, नज़र दीवार से आता
हमें उस पर लगे, मकड़ी के जाले याद आते हैं.
हाँ छिप कर पेड़ के पीछे, नज़र रखते थे हम तुम पर
तुम्हारे गाल गुलगुल्ले, गुलाले याद आते हैं.
नशा नज़रों का तुम्हारा, उतारा बाप ने सारा
हमें रम का मज़ा देते, दो प्याले याद आते हैं
मिटा दी हर रुकावट हमने, अपने बीच की सारी
लगाये बाप ने तुम पर जो ताले, याद आते हैं
अँगूठी तुमको पीतल की, टिका कर उसने भरमाया
जो तुमने हमको लौटाए, वो बाले याद आते हैं
चली क्या चाल तुमने भी, जो कर ली गै़र संग शादी
हमें गुज़रे ज़माने के, घोटाले याद आते हैं.
जिगर को लाल करने को, गुलाल दिल पे था डाला
चलाए नज़रों से तुमने, वो भाले याद आते हैं
अँधेरी रात थी वो घुप्प और बिजली नदारत थी
’समीर’ भागे थे जिन रस्तों से, काले याद आते हैं
--समीर लाल ’समीर’
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