बुधवार, जून 30, 2010

सर, आपके घर चोर आये हैं!!!

एक बार कहीं का सुना किस्सा याद आ रहा है:

अमरीकी, जपानी और हिन्दुस्तानी पुलिस के मुखिया मिटिंग में थे. अमरीकी बोला कि हम तो चोरी के बीस मिनट के अन्दर चोर की पहचान कर लेते हैं. जपानी बोला कि हमारे यहाँ तो दस मिनट में पता कर लेते हैं कि किसने चोरी की. भारतीय पुलिस के मुखिया हँसने लगे. दोनों ने पूछा कि हँस क्यूँ रहे हैं. उसने कहा कि हमें तो चोरी के पहले से ही मालूम होता है कि कौन चोरी करेगा.

मगर उस पहले से मालूम वाले को पकड़वाने के लिए आपकी कितनी पहुँच होना चाहिये, ये सोचने का विषय है वरना भारत में कोई चोर भला बाद में कब पकड़ाया है सिवाय रसूकदारों के घर चोरी करने के इल्जाम में.

वैसे तो कनाडा में आम तौर पर घरों में चोरी के किस्से सुनाई नहीं देते. फिर किसी का घर में घुसना, तो दरवाजा ही पूरा काँच का है, जिसका जी चाहे, फोड़े और घूस आये. मगर ऐसा होता नहीं है. इसीलिए तो काँच का है. कितनी बार रात भर दरवाजा खुला रह जाता है, गैरेज खुला पड़ा रहता है, कभी कुछ मिसिंग तो दिखा नहीं मगर फिर भी, इन्तजामात करने में कोई चूक नहीं.

कुछ दिन पहले एक पोस्ट में फोटो छापी थी जिसमें एलार्म फोर्स का बोर्ड भी आ गया था. भारत से मित्र ने जिज्ञासा प्रकट की कि यह एलार्म फोर्स क्या है? सोचा कि इसी विषय पर लिख दूँ, उनकी जिज्ञासा भी दूर हो जाये और मित्रों को पता भी चल जाये.

एलार्म फोर्स हाऊस सिक्यूरीटी कम्पनी है जो हमारे घर की सिक्यूरिटी देखती हैं. उनके एलार्म हमारे दरवाजे और खिड़कियों पर लगे हैं. अगर एलार्म ऑन है और उसे बिना कोड डाले ऑफ किए बिना कोई खिड़की या दरवाजा खोलता है तो घर सिक्यूरिटी कम्पनी से कनेक्ट हो जाता है और एनाउन्समेन्ट होता है कि आप कौन हैं और सिक्यूरिटी कोड बताओ. अगर वो नहीं बता पाया तो सायरन बजने लगता है जिससे पड़ोसी सजग हो जाते हैं और पुलिस स्टेशन को सूचना हो जाती है.

तीन से चार मिनट में पुलिस आ जाती है. इस बीच एनाउन्समेन्ट होता रहता है घर भर में कि पुलिस चल चुकी है, आ रही है. यह सब फोन लाईन से जुड़ा है किन्तु यदि फोन लाईन कोई बाहर से काट दे तो भी वायरलेस से एनाउन्समेन्ट शुरु हो जाता है और पूरी प्रक्रिया की जाती है.

यह भी संभव नहीं कि कोई बंदूक की नोक पर हमसे कोड बुलवा दे और पुलिस न आये. अगर हमने गलत कोड बोल दिया तो फिर वो अनाउन्समेन्ट चुप हो जाता हैं मगर पुलिस आ जाती है. फिर आप लाख कहिये कि कुछ नहीं हुआ, वो आपके घर वालों को बाहर निकाल कर पूरा घर चैक करते हैं कि किसी को गन पाईन्ट पर रखकर तो ऐसा नहीं कहलवा रहे हैं.

अगर हम घर में हैं तो होम अलार्म लगाते हैं याने बिना एलार्म ऑफ किए कोई घर में नहीं घुस सकता या निकल सकता. अगर हम घर में नहीं हैं तो अवे का अलार्म लगाते हैं, तब न कोई घुस सकता है न घर में कोई चीज हिल सकती है याने मोशन डिटेक्टर भी लगा रहता है अर्थात अगर कोई पहले से घुस कर बैठा हो तो बाद में चोरी करके भागे, वो संभव नहीं. घर एयर पैक्ड रहते हैं अतः हवा से कुछ हिलने का सवाल नहीं.

अवे के अलार्म में हम जहाँ भी हों, अलार्म कम्पनी हमें मोबाईल पर घटना की सूचना भी तुरंत देती है एवं नामित पड़ोसी/ मित्र को फोन पर भी सूचना दी जाती है कि वो भी आ कर चैक कर लें पुलिस के साथ.

इसी के साथ एक पैनिक बटन भी या तो बाथरुम या बिस्तर के पास लगा देते हैं ताकि ऐसे किसी अंदेशे पर आप बाथरुम में छिप गये हो या बिस्तर पर हो तो उसे दबा दें, तब भी बिना एनाउन्समेन्ट के पुलिस भिजवा दी जाती है.

इस व्यवस्था के लिए महिना दर महिना एक निश्चित फीस ली जाती है एवं साल में दो बार बिना कोड डाले दरवाजा खोल देने की भूल को माफ करते हुए बाकी बार फाल्स एलार्म के लिए एक पेनाल्टी की रकम ली जाती है.

वैसे तो यहाँ चोरी होती नहीं (इंसान तो हैं ही, कम या न के बराबर होती है) मगर इस एलार्म से बहुत सुकून रहता है. खास कर जब हम ६-६ महिने भारत में पड़े रहते हैं. उसी के साथ स्मोक अलार्म भी है. घर के भीतर धुँआ या आग से फायर ब्रिगेड आ जाती है. अब हम ठहरे हिन्दुस्तानी, कभी अगरबत्ती जलाने या हवन करने लग जायें, तो उस समय का जुगाड़ बना लिया है और स्मोक सेन्सर पर टावेल लगा देते हैं ताकि एलार्म न बजे.

मित्र को यह बात जब ईमेल से बताई और आशा व्यक्त की कि ऐसा भारत में भी होने लग जाए तो कितना बढ़िया. उनकी जिज्ञासा और बढ़ गई और भारत के परिपेक्ष में इतने प्रश्न सामने आये कि क्या कहना:

  • जब चोर घूसे और बिजली गुल हुई हो तो क्या? एलार्म कैसे बजेगा और कम्पनी को कैसे पता लगेगा?
  • फोन लाईन अगर खराब चल रही हो कई दिन से, तब?
  • खिड़की तो खुली ही रहती है, हवा को कैसे रोकेंगे किसी वस्तु को हिलाने से?
  • स्मोक सेन्सर पर धूल जमने के बाद भी काम करेगा क्या?
  • क्या मोशन डिटेक्टर ऐसा नहीं बन सकता जो सिर्फ इन्सानों के मोशन पहचाने बाकि को जाने दे?
  • अगर एक ही लाईन में चार पांच घरों के एलार्म एक साथ बज उठे, तो पड़ोसी को किसके घर पहले जाना चाहिये?
  • अगर घर मालिक बाहर गया है तो क्या एलार्म कम्पनी मिस्ड काल दे सकती है? (सस्ता पड़ेगा)
  • पुलिस स्टेशन से आपके घर की दूरी साईकिल से तय करने में हवलदार को कितना समय लगेगा?
  • अगर छुट्टी के दिन चोर घुसा, तब?
  • अगर भारत बंद के दौरान चोर चला आये, जब?
  • अगर चोर की सेटिंग हो थाने में, और पुलिस आये ही न?
  • जब अलार्म बजे और सिक्यूरिटी कम्पनी वाला चाय पीने या पान खाने गया हुआ हो तो?
  • अगर फोन का बिल या बिजली का बिल भुगतान न होने के कारण लाईन काटी जाये, तब?

यक्ष प्रश्न:

  • क्या हिन्दी ब्लॉग में रचनाओं की चोरी रोकने के लिए इन कम्पनियों के पास कोई एलार्म सिस्टम है?

अगर...अगर..अगर...और जाने कितने प्रश्न...मगर इन्हें सुन कर मैने अपना स्टेटमेन्ट वापस ले लिया कि ऐसा भारत में भी होने लगए तो कितना बढ़िया.

लेकिन जैसे हम देशी वैसा ही हमारा मित्र भी, ठेठ भारत से भारत में रहने वाला. आखिर बात ऐसे ही खतम कैसे हो जाने दे.

अब आखिरी प्रश्न एक आँख दबा कर उछाला कि गुरु, इतनी सिक्यूरीटी लगाये हो मतलब मोटी रकम धरे होगे घर में. अब उनको क्या बतलायें कि भई, जब हमारे देश में जिनकी जान की कीमत कौड़ी की नहीं है, वो जेड सिक्यूरीटी लिए घूम रहे हैं तब हमारे पास मेहनत का कमाया गुजारे लायक तो है ही, फिर क्यूँ न लगायें सिक्यूरीटी.

लगता तो है कि शायद मेरे जबाब से आशवस्त हो गये होंगे क्यूँकि उनकी एक दबी आँख खुली दिखी बाद में.

बस, अब एक ही बात कहता हूँ कि मेरा भारत जैसा भी है, वैसा ही बढ़िया. कौन जरुरत है इन सब नौटंकियों की. सायरन तो कोई सड़क पर से निकलता हुआ ट्र्क भी बजा देगा मगर पड़ोसी, वो अब कहाँ निकलते हैं सायरन सुन कर. बल्कि वो तो यह सुनिश्चित करने में जुट जायेंगे कि उनका घर ठीक से बंद है कि नहीं...बाकी खिड़की से झांक कर मजा तो पूरा ले लेंगे आपको लुटता देखने का.

Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, जून 27, 2010

द आर्ट ऑफ डाईंग

artofdying

जन्म लेना और मरना हमारे हाथ में नहीं. मृत्यु एक अटल सत्य है किन्तु इन्सान उम्र के किसी भी पड़ाव पर हो, उसके जीने की लालसा खतम नहीं होती.

इन्सान पैसा कमा कमा कर अघा सकता है. कमाने के लिए उल्टे सीधे हथकंडे अपनाना छोड़ सकता है. हलवाई मिठाई के बीच बैठा बैठा मीठा खाने से उब सकता है. अपराधी जुर्म कर कर थक के जुर्म की दुनिया से मूँह मोड़ सकता है लेकिन जिन्दा रह रह कर भी जीने की लालसा खतम करना, कभी नहीं. यह इन्सानी स्वभाव नहीं है.बीमारी और शारीरिक व्याधियों से परेशान इन्सान लाख बोल ले कि हे भगवान!! अब नहीं जिया जाता, अब तो तू मुझे उठा ही ले मगर जब मौत करीब आती है, तो एकदम घबरा उठता है. मानो जाने को तैयार ही न हो.

लालच की पराकाष्टा राजनिती तक से सारी जिन्दगी उसी दलदल में फंसे लोग एक उम्र पर निकल सकते हैं. प्रधानमंत्री रह चुके लोग भी घर बैठे राजनिती से दूर कविता रच रहे हैं मगर जीने की लालच, तौबा!! इसे छोड़ने की बात मत करो. यह नहीं हो पायेगा.

जिस उम्र में आर्ट ऑफ डाईंग सीखना चाहिये, याने मरने की कला, उस उम्र में लोग भीड़ लगाये खड़े हैं आर्ट ऑफ लिविंग सीखने के लिए जैसे कोई छात्र इन्जिनियरिंग का कोर्स खत्म करके के. जी. में एडमिशन लेने के लिए डोनेशन लिए पहुँचे. अरे, जितनी लिविंग करनी थी, सो तो कर ही चुके, अब अंत से समय में कैसा आर्ट और कैसी साईंस. कोई क्या सिखा देगा. वैसे कितना भी सिखा देखा, बुढ़ा तोता बोलेगा तो राम राम ही और माना कि सीख भी गये, तो जब तक निपुण होने का मौका आयेगा, ज्यादा उम्मीद यही है कि निकल चुके होगे या कहीं मुहाने पर होगे. कोई लड्डू तो है नहीं कि गप्प से खाया और अह्हा!! मीठा मीठा करने लगो. अभ्यास की बात है.

बाजार समझता है कि क्या बिकेगा. लोगों को क्या खरीदना है. किस बात पर वो ललचा कर रुक नहीं पायेंगे और बस!! वही एक बढ़िया व्यापारी शानदार पैकिंग बना कर बेचने निकल पड़ता है और खरीददारों की जमघट लग जाती है. व्यापारी गुरु कहलाता है और खरीददार चेले.

सारी जिन्दगी दो नम्बर की कमाई काटी, मातहतों को परेशान किया, नौकरों को फटकारा, झूट बोला, व्यापार में लोगों को चूना लगाया, टैक्स हजम कर गये और फिर जब चलने का समय आया तो मीठी वाणी के लाभ, ईमानदारी और पर पीड़ा समझने की पाठशाला में जाकर मूँह उठाये आँख मींचे बैठे हैं और वही पैसा न्यौछावर कर रहे हैं जो इन्हीं बातों से कमाया. गुरु जी भी धन का लोभ त्यागने का प्रवचन पिला पिला कर धन समेटने में व्यस्त हैं. धन्य हैं वो लोग. मैं उन्हें नमन करता हूँ.

उम्र दराज हो चुके बुजुर्गों के लिए जो ज्यादा जरुरी और करीबी है वो क्लास लगा कर देखो ’आर्ट ऑफ डाईंग’. उसमें सिखाओ कि कैसे तैयार हो अन्तिम यात्रा के लिए. कोई पूड़ी सब्जी कपड़े तो बाँध कर ले नहीं जाना है कि परेशानी हो. बस सिखाओ कि कैसे सब बातों से निवृत हो कर चैन से तैयार रहना है. कल के लिए कुछ पैन्डिग नहीं रखना है. जब सोने जाओ तो यह सोच कर कि अब उठ नहीं पायेंगे. सारे रुपये पैसे, वसीयत नामा वगैरह पूरा कर लो. प्रियजनों से मेल मुलाकात करते रहो. प्रेम से रहो. लड़ो झगड़ो मत. किसी का दिल न दुखाओ. इच्छाऐं जहाँ तक संभव हो, पूरी कर लो आदि आदि. इतना सा तो सिलेबस है इस कोर्स का.

बस, फिर क्या है. जब भी घड़ी आ जाये, मुस्कराते हुए चल दो. आखिर लोग घर छोड़ कर दूसरे देश में जा ही बसते हैं. क्या पता कब लौटें. सब कुछ निपटा कर ही निकलते हैं न!! फिर? अन्तिम यात्रा की तैयारी में शरमाना कैसा और घबराना कैसा? विदेश प्रवास तो फिर भी कैंसिल हो सकता है मगर यह तो तय है. बस, तारीख नहीं मालूम होती. लास्ट मिनट फ्लाईट जब सस्ती मिल जाती है तो खुशी खुशी निकलते हो कि नहीं कि पैसे बच गये तब फिर यहाँ-इसमें कैसा दुखी होना?

लेकिन तुम देखोगे कि इस ’आर्ट ऑफ डाईंग’ की क्लास के लिए एक भी इन्सान न मिलेगा. खाली हॉल में अकेले तुम होगे सिखाने के लिए इन्तजार करते भूख से डाईंग की ओर अग्रसर, डाईंग का साईंस अहसासते हुए. जो भी ऐसी क्लास लगायेगा वो एक दिन खुद ही आर्ट ऑफ लिविंग की क्लास में नजर आयेगा भीड़ के साथ लेट एडमिशन लेते.

जिस तरह जन्म लेकर जीना जरुरी है, उसी तरह जीने लेने के बाद मरना भी जरुरी है. फिर क्यूँ न इस कला में भी पारंगत हुआ जाये कि जब मौत आये तो मुस्कराते हुए खुशी खुशी गले लगायें कि आओ मित्र, अब मैं जी चुका और तुम्हारा स्वागत है. चलो, चलें.

वैसे तो सही है कि जब तक जिओ, स्वस्थ, खुश रहते हुए खुशियाँ बांटते हुए जिओ. इस कला में निपुण रहो. लेकिन होता विपरीत है. जब तक सक्षमता रहती है तब तक मनमानी कर अपने हिसाब से जी गये. रोज देर रात तक पार्टियाँ चली. सारी दुनिया की लतें जैसे इनके लिए ही बनी हैं तो सिगरेट से लेकर शराब और शबाब तक किसी से कोई परहेज नहीं. और जब अंत समय नजदीक आया, किसी काम के नहीं बचे, शरीर ने साथ देना बंद कर दिया तो आर्ट ऑफ लिविंग सीखने निकल पड़े. बेहतर होता इस समय आर्ट ऑफ डाईंग सीख लेते, वो भी अटल सत्य है.

ये तो वैसा ही हुआ कि जब तक मौका लगा, खूब दबा कर दो नम्बर की कमाई की और जब लाईन अटैच हो गये तो लगे ईमानदारी पर भाषण देने. ऐसा होते हमेशा ही दिखता है. इसीलिए शायद किसी ज्ञानी ने कहा होगा कि असली ईमानदार वो नहीं, जो ईमानदारी से जीवन यापन करता है. असली ईमानदार वो है जो भ्रष्टाचार का मौका होने पर भी ईमानदारी से जीवन यापन करते हैं.

पूरा सार बस इतना कि जब इन सब बातों को जीवन की नींव में डाला जाना था, तब ध्यान नहीं दिया और जब भवन धाराशाही होने का समय आया तो नींव निर्माण की प्रक्रिया सीखने निकल पड़े.

रेत की नींव पर,
मिट्टी का मकान
और उस पर
संगमरमरी कंगूरा
ये है आज का
ताजमहल!!

आज चमत्कार और झूट बिकता है, सच्चाई आज की दुनिया में मार खाती है. दर्पण देखने के अब हम आदी नहीं, तस्वीरें दिखाओ. वो हमें भाती हैं और वो ही हमें लुभाती हैं. दर्पण आऊट ऑफ फैशन हो चला है. हमें सपने दिखाओ, हम खरीदेंगे. सच्चाई के लिए क्या मोल देना, वो तो होना ही है, अपने आप दिख जायेगी.

यह मत सोचना कि हर घर में तो दर्पण हैं, सब देखते हैं. भूल में हो, पूछ कर देखना एक लड़की जब दर्पण के सामने खड़ी होती है तो दर्पण में उसे एश्वर्या दिखती है और एक लड़का, उसमें सलमान देखता है. खुद को जो देख लें, तो घर से निकलने का आत्म विश्वास ही खो दे?

Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, जून 23, 2010

सजना है मुझे, सजना के लिए!!

कभी सीखा था कि ज्ञान बाँटने से बढ़ता है. कोशिश यही होती है कि जो कुछ भी जानें या सीखें, उसे मित्रों के साथ बाँटें. अक्सर लोगों को अपने आलेखों/कविताओं में नये नये तरीके इस्तेमाल करते देखता हूँ. इच्छा होती है कि काश!! मुझे भी आता होता तो मैं भी ऐसा ही करता.

उदाहरण के लिए, कहीं फोटो के लिए स्लाईड शो लगा देखा. अब अपने आलेख में स्लाईड शो कैसे लगायें, यह मालूम ही नहीं. इच्छा दबाने का प्रयास किया, नहीं दबी. तो खुद ही पड़ताल शुरु की. थोड़ी सी मेहनत से सीख भी गये, ऐसा लगता है. आज पहली बार लगायेंगे, अगर सही चला मतलब सीख ही गये हैं. अब यदि सीख ही गये हैं तो सिखा भी दें:

पिकासा एल्बम से स्लाईड शो को अपने चिट्ठे पर कैसे अंतःस्थापित (एम्बैड) करें:

१. पिकासा में उस एलबम पर जायें, जिसे अंतःस्थापित (एम्बैड) करना है.
२.दायें तरफ पढ़ें: Post On के नीचे Link to this album..उस पर क्लिक करें.
३.उसमें से जो विकल्प दिखेंगे..उसमें से Embedd Slideshow पर क्लिक करें.
४. उसमें साईज़ और केप्शन दिखाने का विकल्प चुनें.
५.Embedd Code कॉपी कर लें.
६. ब्लॉग पर जहाँ स्लाईड शो लगाना हो, वहाँ उसे पेस्ट कर दें.

बस, आपका स्लाईड शो तैयार. एकदम सरल मगर आपकी पोस्ट में चार चाँद लगा देगा.

स्लाईड शो, केप्शन के साथ फोटो, पैराग्राफ, ब्लॉककोट आदि सब आपके आलेख को खूबसूरती प्रदान करते हैं. एक अच्छा आलेख, जो लोगों को आकर्षित करे पढ़ने के लिए, उसके लिए इन सब बातों का ध्यान रखना बहुत जरुरी है. हो सकता है आप बहुत अच्छा लिख रहे हों मगर न पैराग्राफ का ध्यान है, न लाईन ब्रेक का, तो पाठक आयेंगे कैसे? और बिना पाठक आये कोई जानेगा कैसे कि आपने अच्छा लिखा है.

इसीलिए तो हम कहीं जाते हैं तो बहुत सज धज कर, अच्छे कपड़े पहन कर जाते हैं. भले ही आपका व्यवहार बहुत अच्छा हो मगर जब तक आपसे कोई बात नहीं करे, आप किसी को आकर्षित न करे, कोई आपका व्यवहार कैसे जानेगा.

वैसे भी आजकल शो/सजावट का जमाना है. कल ही पड़ोसी किसी बात का थैक्यू गिफ्ट दे गये-एडीबल डेकोरेशन. बात भी ऐसी कि जिसका हम शायद भारतीय होने के कारण थैक्यू भी न बोलते. अरे, वो कहीं बाहर गये थे तो कह गये थे कि तीन दिन उनके अखबार उठाकर रख लेना. हम तो यही सोच लेते कि इसी बहाने उसको हमारा अखबार पढ़ने मिल गया. इसमें थैंक्यू कैसा??

एडीबल डेकोरेशन-मुश्किल से तीन चार डॉलर के फल कटे हुए, जिसमें अंगूर, खरबूजा, अननास, स्ट्राबेरी और एक पॉट २ डॉलर का मगर वो उसे खरीद कर लाये ६५ डॉलर का. बिकती है सजावट, पैकिंग. आकर्षित करती है. वही फल काट कर प्लेट में धर कर गिफ्ट दे दो तो कहो लेने वाला मना कर दे कि जाने कब के कटे हों. :) मगर इस सजावट के साथ हम धन्यवाद करते नहीं थक रहे और उस पर से तस्वीर उतारने और एक दिन सजा रहने देने के बाद खाये.

दाम उस कम्पनी की वेबसाईट पर जाकर टीप लिया जिसका नाम डिब्बे पर था-बिना दाम पता किये हमें कहाँ चैन कि कितने का गिफ्ट दिया? :) ये तो बस किताबी बात है कि दान की बछिया के दाँत नहीं गिने जाते. वैसे ही जैसे ईमानदारी का फल मीठा होता है. अगर ये सही होता तो हमारे नेता सारे अब तक कड़वा खा खा कर मर न गये होते.

सीखो अमेरीका से मार्केटिंग जो अपनी ९/११ की त्रासदी, जिसमें ३००० से ४००० लोगों की मौत हुई, को भी सजाधजा कर ऐसे मार्केट करता है कि सारा विश्व टूट पड़ता है मदद करने को और हम भोपाल त्रासदी मे मरे लाखों लोगों की मौत के मातम को मनाते आज २५ साल बाद भी न्याय और मदद की राह तक रहे हैं और इन्टरनेशनल मिडिया चुप बैठा है.

उदाहरण दिखाने के लिए उसी एडीबल डेकोरेशन का स्लाईड शो बना दिया है.

है न सजावट और शो बाजी का कमाल.

तो आगे से ध्यान रखिये-जब भी लिखिये, सजावट का ध्यान रखिये. चाहे तस्वीरें हो या पैराग्राफ या लाईन ब्रेक या आप खुद, सजावट महत्वपूर्ण है लोगों को आकर्षित करने के लिए.

Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, जून 20, 2010

जरा सा बखान, कुछ तस्वीरें और एक लघु कथा

पारिवारिक व्यस्तताओं के बीच नेट पर आना न के बराबर चल रहा है और इस बीच देख रहा हूँ कि ब्लॉगवाणी भी किन्हीं तकनिकी समस्यायों के तहत नई पोस्ट नहीं दिखा रहा है.

आज हालांकि एक नई पोस्ट लगाने का मन था किन्तु चूँकि इस बीच किसी को पढ़ा नहीं तो मैं अपने आपको नया कुछ लिखने या पढ़वाने का अधिकारी नहीं पाता. पहले कुछ पढ़ लूँ मित्रों को, फिर लिखूँगा भी और पढ़वाऊँगा भी. मेरी यह आदत नहीं कि किसी को पढ़ूँ न या किसी को बताऊँ न कि तुमको पढ़ लिया है और बस, अपनी अपनी पढ़वाता चलूँ और आशा लगा कर बैठ जाऊँ कि वो मुझे बतायेंगे कि आपको पढ़ा. कम से कम मुझे असहज लगता है. अपनी अपनी आदत है.

होती है कईयों की आदत कि खुद तो किसी को नमस्ते नहीं करना मगर सामने वाला नमस्ते न करे तो उसे बदतमीज करार देना और बुरा मान जाना. सही है कि जब तक तुम पावर में हो शायद लोग तुम्हारे बिना नमस्ते किये भी नमस्ते करते चलें. मगर पावर का क्या है, आज है और कल नहीं रहेगा. ये व्यवहार ही है जो जीवन भर साथ निभाता है.

तब तक आपको अपनी एक लघुकथा जो कुछ दिनों पूर्व महावीर जी के ब्लॉग मंथन पर प्रकाशित हुई थी, वो पढ़वाता हूँ. साथ ही बगीचे में नये फूल आ गये हैं, चेरी और सेब भी बस पकने की तैयारी में हैं. मौसम गरमी का सुहाना हो गया है. बैकयार्ड में पार्टियों का दौर चालू है, कुछ तस्वीरें बैक यार्ड की:

 

 

लघु कथा:

 

कर्ज चुकता हुआ??

इकलौता बेटा है.

हाल ही बी ई पूरी कर ली. मास्टर माँ बाप की आँख का तारा, उनका सपना. एक शिक्षक को और क्या चाहिये, बेटा पढ़ लिख कर इन्जिनियर बन गया.

विदेश जाकर आगे पढ़ने की इच्छा है.

शिक्षक का काम ही शिक्षा का प्रसार है, वो भला कब शिक्षा की राह में रोड़ा बन सकता है वो भी तब, जब उसका इकलौता बेटा उनका नाम रोशन करने और उनके सपने पूरे करने के लिए माँ बाप से बिछोह का गम झेलते हुए अकेला अपनी मातृ भूमि से दूर अनजान देश में जा संघर्ष करने को तैयार हो.

बैंक से एक मात्र जमा पूँजी, अपना मकान गिरवी रख, लोन लेकर मास्साब ने बेटे को आशीषों के साथ विदेश रवाना किया.

दो बरस में बेटा कमाने लायक होकर, मुश्किल से साल भर में कर्ज अदा कर देगा फिर मास्साब की और उनकी पत्नी की जिन्दगी ठाट से कटेगी. फिर वो ट्यूशन नहीं पढ़ायेंगे. बस, मन पसंद की किताबें पढ़ेंगे और साहित्य सृजन करेंगे.

अब चौथा बरस है. बेटे ने एक गोरी से वहीं विदेश में शादी कर ली है. उससे एक बेटा भी है. भारत की बेकवर्डनेस बहु और पोते दोनों के आने के लिए उचित नहीं . इसके चलते बेटा भारत आ नहीं सकता और वहाँ विदेश में घर में माँ बाप के लिए जगह नहीं और न ही कोई देखने वाला.

नई फैमली है, खर्चे बहुत लगे हैं. फोन पर भी बात करना मंहगा लगता है अतः लोन वापस करने की अभी स्थितियाँ नहीं है और न ही निकट भविष्य में कोई संभावना है. बेटे और उसकी पत्नी को बार बार का तकादा पसंद नहीं अन्यथा भी अनेक टेंशन है, जो भारतीय माँ बाप समझते नहीं,  अतः इस बारे में बात न करने का तकादा वो माँ को फोन पर दे चुका है वरना उसे मजबूर होकर फोन पर बात करना बंद करना होगा. माँ ने पिता जी को समझा दिया है और पिता ने समझ भी लिया है.

आज रिटायर्ड मास्साब ने अपने ट्यूशन वाले बच्चों को नये घर का पता दिया. कल वो उस किराये के घर में शिफ्ट हो जायेंगे.

जाने कौन सा और किसका कर्ज चुकता हुआ. कम से कम बैंक का तो हो ही गया.

साहित्य सृजन की आशा इतिहास के पन्ने चमका रही है.

इतिहास भी तो साहित्य का ही हिस्सा है!!

उसकी चमक बरकरार रखने का श्रेय तो मिलना ही चाहिये!!

-समीर लाल ’समीर’

Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, जून 16, 2010

राम मिलन: इन्टरनेशनल ब्लॉगर मीट

राम त्यागी शिकागो से क्या आये और ऐसी इन्टरनेशनल ब्लॉगर मीट कर गये कि तबसे अब तक समय का ही आकाल पड़ गया है.

व्यस्तता की हद ऐसी कि अपना प्रिय टिप्पणी दर्ज करने का भी शौक पूरा नहीं कर पा रहा हूँ तो मिलन कथा क्या लिखूँ. वैसे मिलन का पूरा वृतांत तो राम लिख ही चुके हैं मय तस्वीर के तो फिर से क्या बखाने सिवाय इसके कि राम का आना एक यादगार शाम दे गया. उनको घेरा मूलतः इसलिए था कि मुलाकात के बहाने हिन्दी ब्लॉगर से मिलन में कविता सुनाने का मौका हाथ लग जाता है.

राम हालांकि जरा देर से पहुँचे किन्तु मौका तलाशते उन्हें हम अपने घर की बार में ले गये. सोच रहे थे कि एक दो पैग हो जायें तो शुरु करें. बंदा हल्के सुरुर में मना भी नहीं कर पायेगा और पूरा ठीक से समझ भी नहीं पायेगा तो वाह वाह के सिवाय क्या करेगा. कवि सम्मेलनों में भी जब कठिन कविता समझ नहीं आती तो भी लोग खुद को बुद्धिजीवियों की कटेगरी में लाने के प्रयास में वाह वाह करने लगते हैं.

मगर पासा थोड़ा उल्टा पड़ा. हम सुनाना शुरु करते उसके पहले ही, पहले पैग के बाद ही भाई जी शुरु हो गये. कहने लगे समीर भाई, आपके लिए एक कविता लिखी है और जब तक हम कुछ कहते, सुनाने भी लगे. हमारी तो अटकी ही थी कि अभी हमें भी सुनाना है, इसलिए वाह वाह करना ही था मगर वाकई की वाह वाह वाली कविता ही उन्होंने सुनाई.

बस, एक कविता के बाद मंच हमने खींच लिया अपनी तरफ और शुरु हुए चाँद वाली मार्मिक रचनाओं के साथ माहौल बनाने के जुगाड़ में. उद्देश्य यह भी था कि दो दिन बाद किसी कार्यक्रम में कुछ मुक्तक पढ़ना था तो उसकी टेस्टिंग भी हो जाये तो वो भी सुनाये. राम का चेहरा भाँपते रहे, मोहित हो कर सुन रहे थे और वाकई वाली वाह वाह कर रहे थे. इसलिए फिर खाना भी मन लगा कर खिलाया और फिर गाड़ी से स्टेशन भी छोड़ा. इस बीच मौका छान बीन कर राम ने पुनः एक रचना सुनाई.

शाम बड़ी मजेदार गुजरी. वादा रहा है कि आगे राम आते रहेंगे और परिवार के साथ भी पधारेंगे. हम तो खैर शिकागो जायेंगे ही.

कुछ तस्वीरें:

 

राम के उदगार और कविता (हम अकेले क्यूँ झेलें, आप भी झेलिए)

 

हमारे मुक्तक:विवाहोत्सव के लिए


एक वर की तरफ से


जब से तेरा साथ मिला है, मन कहता कि अंबर छू
दिल की हर धड़कन को कैसे, गीत बना देती है तू
सप्त पदी के वचन लिए थे, इक दिन हमने तुमने जो
उन को ताजा कर जाती है, सांसो की तेरी खूशबू.


एक वधु की तरफ से


बाबू से मैने सीखा था, कैसे दुख को पीना है
अम्मा से मैने सीखा था, कैसे रिश्ते सीना है
जबसे तेरा साथ मिला है, मैने ये भी सीख लिया
वक्त भला कैसा भी आये, हमको हँस कर जीना है.


एक हमारी तरफ से :)


मैं जब भी गीत रचता हूँ, ये आँखें भीग जाती हैं
तुझे जब याद करता हूँ, ये आँखें भीग जाती हैं
मैं हँसता हूँ तुझे ही भूलने की कोशिशों में, पर
ठहाकों में भी देखा है, ये आँखें भीग जाती हैं.

 

-समीर लाल ’समीर’

अब सुन भी लें उस दिन की रिकार्डिंग में हमारे मुक्तक:

 

बाकी उम्मीद कर रहा हूँ कि जल्द ही काम से फुरसत मिले, तो ब्लॉग पर नियमित हुआ जाये.

Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, जून 13, 2010

पुरस्कार!!

oldman

बहुत सुन्दर कालोनी है. करीब ८० मकान. अधिकतर लोग, जिन्होंने यह मकान बनवाये थे रिटायर हो गये हैं. कुछ के बेटे बहु साथ ही रहते हैं तो कुछ अकेले.

कौशलेश बाबू की बहु बहुत मिलनसार, मृदुभाषी एवं सामाजिक कार्यों में बहुत रुचि लेती है. कालोनी में रह रहे बुजुर्गों की निरस हो गई जिन्दगी को लेकर उसने एक योजना बना कर महिला मंडल की बैठक में रखी. सभी ने योजना की भूरी भूरी प्रशंसा की तथा उसी बैठक में संपन्न हुए चुनाव में वो महिला मंडल की निर्विरोध अध्यक्षा चुनी गई.

योजना के तहत बुजुर्गों को व्यस्त रखने के लिए एवं उनकी जिन्दगी में रस घोलने के लिए सभी बुजुर्गों से निवेदन किया गया कि वह अपने जिन्दगी के अनुभवों को एकत्रित कर आलेखबद्ध करें जिससे नई पीढ़ी को जहाँ एक ओर सीख मिले, वहीं दूसरी ओर बुजुर्ग भी लिखने और दूसरों के अनुभव पढ़ने में व्यस्त हो जायेंगे.

योजना के तहत एक मासिक पत्रिका निकाली जायेगी. पत्रिका के संपादन एवं प्रारुप निर्धारण के लिए भी उन्हीं बुजुर्गों में से एक संपादक मंडल का गठन किया गया. एक कमेटी का भी गठन हुआ जो उन आलेखों में से हर माह सर्वश्रेष्ट आलेख के लेखक को सम्मानित एवं पुरुस्कृत करेगी और हर नये अंक के साथ एक मासिक गोष्टी का आयोजन भी किया जायेगा.

प्रथम अंक के विमोचन हेतु नगर के सांसद को आमंत्रित कर एक भव्य समोरह का आयोजन किया गया.

ऐसी अभिनव योजना की परिकल्पना के लिए कौशलेश बाबू की बहु की हर तरफ प्रशंसा हुई, उनके बुजुर्गों के प्रति संवेदनशील हृदय एवं भावनाओं को साधुवाद दिया गया एवं सांसद महोदय नें भी उनके इस योगदान को अतुलनीय बताया. सांसद महोदय ने इस योजना के क्रियांवयन पर होने वाले खर्चे के लिए भी सांसद निधि से योगदान का आश्वासन दिया.

इसी आयोजन में प्रथम अंक के सर्वश्रेष्ट आलेख के लिए कौशलेश बाबू का चयन हुआ और उन्हें श्रीफल, शॉल और प्रशस्ति पत्र से सम्मानित किया गया. कौशलेश बाबू का आलेख जिसने भी पढ़ा, उसकी आँखें बरबस नम हो आईं. उन्होंने बुजुर्गों की घर में स्थिति एवं बच्चों से उनकी अपेक्षाओं का बहुत ही मार्मिक आलेख अपने अनुभवों के आधार पर लिखा था. हर बुजुर्ग ने उसमें अपनी कहानी पाई.

अगले दिन सुबह नगर के सभी प्रमुख अखबारों में इस योजना, कौशलेश बाबू की बहु की तारीफ और तस्वीरें और कौशलेश बाबू का आलेख और उन्हें पुरुस्कृत किए जाने के समाचार प्रमुखता से छपे थे.

पिछली रात कौशलेश बाबू उसी प्रशस्ति पत्र को निहारते आँखों में आसूं लिए भूखे ही सोये थे.

बहु और बेटा नाराज थे कि उन्हें ऐसा लिखने की क्या जरुरत थी?

 

लिखना तो आज राम त्यागी जी से मिलन की कथा था लेकिन कुछ समयाभाव के चलते अभी एक लघु कथा पढ़ें.
Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, जून 09, 2010

चाँद: वो बचपन वाला!!

बचपन में गर्मियों में छत पर सोया करते थे. देर रात तक चाँद देखते. उसमें दिखती कभी बुढ़िया की तस्वीर, कभी रुई के फाहे, कभी बर्फ के पहाड़, कभी छोटा होता चाँद और न जाने क्या क्या? एक कल्पना की उड़ान ही तो होती थी बालमन की. मेरे लिए एक खिलौना ही तो था बचपन का जिससे खेलते खेलते न जाने कब आँख लग जाती पता ही नहीं चलता.

समय के साथ साथ जमाने की हवा बदली, हम बदले और छत पर सोना बंद हुआ. फिर भी कभी मौके बेमौके, कभी खुले में बैठ आकाश को निहारना अच्छा लगता रहा. जब भी चाँद को देखता, बचपन याद आता और मन चाँद से फिर खेलने लगता. ढूंढता वही धुँधली हो चुकी तस्वीरें बचपन की जो वक्त की गर्द में न जाने कहाँ और कब दब गईं.

एक अरसा बीता, न चाँद को चैन से निहारना हुआ, न उसके साथ खेलना. कवितायें और कहानियाँ लिखने का शौक हुआ तो चाँद में महबूबा नजर आने लगी. वो खिलौना गुम ही सा हो गया जिससे कभी घंटों खेला करता था.

कल रात न जाने क्या सोच, बरामदे में कुर्सी लगाये फिर चाँद को निहारने लगा, और लौट चला उस बचपन मे. कुछ देर आनन्द लेता रहा बचपने की छत का उस खिलौने के साथ और न जाने कब मन के भीतर का कवि, उठ खड़ा हुआ और खेल बिगाड़ दिया.

बस, भाव बदले. मन बदला और जिन्दगी की कशमकश से आ जुड़ा चाँद. जो देखते हैं आस पास, वो हाबी हुआ दूर बीते बचपने पर:

कुछ पंक्तियाँ उभरी आज के हालातों पर:

 

full-moon

चाँद

 

वो दुखियारी
रात मजदूरी से लौट
बेटे को थाली में
एक रोटी खिलाती
दूजी रोटी
आसमान के
चँदा को बतलाती
बेटा खुश हो जाता
हँसते हँसते सो जाता...

आज एक रोटी खाकर
बेटा
रोते रोते
भूखा ही सो गया..
मावस की रात थी
चाँद
न जाने कहाँ
खो गया!!

-समीर लाल ’समीर’

 

खिलौना

सोचता हूँ

इन्सान

जब चाँद पर बस जायेगा...

गरीब बच्चे का

एक अकेला खिलौना भी

छिन जायेगा!!

-समीर लाल ’समीर’

 

यू ट्यूब पर देखें:

 

 

जो विडियो नहीं देख पा रहे हैं और मेरे यू ए ई के मित्रों के लिए:

Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, जून 06, 2010

बेवजह की शोध: फिजूल खर्ची!!

एक समाचार पढ़ता था...अब आ गई सिगरेट छुड़ाने वाली मशीन

दिल्ली के दो सरकारी अस्पतालों और इनके तंबाकू से निजात दिलाने वाली क्लिनिकों में कंपनयुक्त एक्यूप्रेशर तकनीकी की जल्द ही शुरुआत हो सकती है। जर्मन निर्मित बायो-रेसोरेंस [कंपन चिकित्सा] उपकरण, शरीर के अंदर के विद्युतीय तरंगों के साथ मिल कर आपमें निकोटीन लेने की इच्छा को कम करता है।

राज्य सरकार द्वारा संचालित इंस्टिट्यूट ऑफ ह्यूमन बिहैवियर एंड अलाइड साइंस के निदेशक डाक्टर नीमेश देसाई ने बताया कि बायो रेसोरेंस यंत्र पहली सिगरेट पीने के बाद आपमें अगली सिगरेट पीने की इच्छा को समाप्त कर देता है। सिगरेट छुड़ाने का यह उपचार न तो नुकसानदायक है और न ही पीड़ादायक है। इस चिकित्सा पद्धति में किसी प्रकार की कोई दवा भी नहीं लेनी पड़ती।

जर्मन निर्मित!! हम्म!! न जाने कितने की खरीदी होगी. न जाने कितने रिसर्च किए होंगे इसको बनाने वालों ने. बरसों के अथक परिश्रम और न जाने कितने पैसे खर्च के बाद आखिरकार सफलता पा ही ली. ८०% सफलता का तो दावा होगा ही कि तम्बाखू पीने की इच्छा जड़ से समाप्त हो जायेगी. इसके पहले भी न जाने कितनी शोध की गई और न जाने क्या क्या प्रोडक्ट बाजार में लाये गये मसलन निकोटीन पैच, च्यूईन्गम, प्लास्टिक पाइप आदि. सभी के सफलता के रेट ५० से ८०% तक आंके गये.

फिर इनके साईड अफेक्ट?? कहते हैं इस मशीन के कोई साईड अफेक्ट नहीं है. लेकिन यह मशीन बस सिगरेट पीना छुड़ाती है और एक बार आपकी सिगरेट पीना छूट गई, तो यह मशीन आपके लिए किसी काम की नहीं. और फिर सिगरेट के अलावा बाकी की लतों के लिए क्या अलग अलग मशीन खरीदनी पड़ेगी?

एक कहानी गुरुदेव ने सुनाई थी कि एक कवि के पास उनके मित्र आये और बोले कि क्या दिन भर बैठे कविता करते रहते हो, कुछ काम क्यूँ नहीं करते? कविवर ने पूछा कि काम करने से क्या होगा? मित्र ने कहा कि उससे पैसा आयेगा. कवि जी ने कहा फिर? मित्र बोले कि फिर और काम करोगे, तो और पैसा..धीरे धीरे कुछ सालों में पैसा ही पैसा हो जायेगा. कवि बोले, फिर? मित्र ने कहा, फिर क्या, फिर रिटायर होकर आराम से बैठना और कविता करना. कवि मुस्कराने लगे कि सो तो मैं अभी ही आराम से बैठा कविता कर रहा हूँ फिर इसके लिए इतनी मशक्कत क्यूँ??

हमारे साथ यही समस्या है जो चीज हमारे पास फ्री में ईश्वरीय देन के रुप में उपलब्ध है, उसे छोड़ कर हम शोध में जुट जाते हैं और घूम फिर कर ऐसे परिणाम निकाल कर मुग्ध हो बैठ जाते हैं, जो बिना शोध के यूँ भी दीगर व्यवस्थाओं से उपलब्ध थे.

अब देखिये, हमें न तो यह मशीन खरीदना पड़ी और न सिगरेट छूट जाने के बाद मशीन बेकार हुई. मिर्जापुर से लाये थे बकायदा शादी करके. मशीन ऐसी कि न जाने कितने ऐब छुड़ा दे, सिगरेट तो बड़ी मामूली चीज है. दारु से लेकर ताश खेलने तक सब एक झटके में छुड़ाने की काबिलियत. बना सकता है कोई ऐसी मशीन लाख शोध करके भी जो आपकी बरसों की आवारागर्दी की आदत एक दिन में छुड़ा दे??

और ऐसा भी नहीं कि आदत छुड़ाई और मशीन बेकार. आजीवन साथ रहती है. खाना खिलाने से लेकर कायदे का जीवन जीने के लिए सदैव उपयोगी. मार्फत उसके ही आप पापा बनकर इठलाते हैं.

कम्पलीट मल्टी परपज पैकेज डील है फ्री में और जिन जगहों पर दहेज का प्रचलन हो, वहाँ तो समझो पौ बारह-मानो सरकारी सोलर कुकर इस्तेमाल कर रहे हो कि सोलर कुकर भी ले आओ और सरकार से इसे लाने के प्रोत्साहन स्वरुप अनुदान राशि भी प्राप्त करो. (वैसे तो दहेज रुपी अनुदान राशि घूस के भेष में जर्मन मशीनों की खरीद में भी प्रचलन के अनुरुप आई ही होगी, ऐसा माना जा सकता है). आजकल तो अधिकतर पत्नियाँ नौकरी पेशा हैं तो मन्थली रिकरिंग स्बसीडी की व्यवस्था ही जानो. (इसे चाहें तो मशीनों के एनुअल मेन्टेनेन्स कांट्रेक्ट में से मिलने वाले कट के समकक्ष रखना आपकी सोच पर निर्भर करता है, मैं क्या कहूँ)

हाँ, साईड अफेक्ट तो हैं मगर उनका जिक्र करना गैर जरुरी है क्यूँकि ये हर व्यक्ति के लिए अलग अलग टाईप के हैं जिसे शुद्ध हिन्दी की फिल्मी भाषा में केमिकल लोचा कहा गया है और जो बात ही लोचा हो उस पर किसने सोचा तो खामखां मैं ही क्यूँ सोचूँ.

वैसे सक्सेस रेट इधर भी ७०-८०% ही है. कई पुरुष बहुत अख्खड़ होते हैं जिन पर यह मशीन भी काम नहीं करती. मगर ये ठीक वैसा ही मामला ही कि स्क्रूड्राईवर का काम है स्क्रू को घुमाना किन्तु यदि स्क्रू की मुंडी ही सपाट हो जाये या वो जंग खाकर टेढ़िया जाये, तो स्क्रूड्राईवर की क्या गलती और वो क्या कर लेगा. ये सब अपवाद ही कहलाये.

और फिर अपवादों को गिनने लग गये तब तो हो चुके शोध और चल चुकी दुनिया.

Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, जून 02, 2010

कविता का मौसम

कविता का मौसम बस मुहाने पर ही है. गरमी तो वैसे भी कविता का पौधा सूख जाता है और बारिश के साथ लहलहा उठता है. सावन, बारिश, बरखा, मोर, मोरनी, झूला, छतरी, बदरी का आज भी, याने ए सी के जमाने में भी, बोलबाला बरकरार है.

यहाँ तो खैर शाम से ही बारिश हो रही है, तब ऐसे में एक कविता हमारी तरफ से. आज यू ट्यूब भी ट्राई कर लिया और पॉडकास्ट भी. अरविन्द मिश्र जी की भावनाओं का सम्मान करते हुए बिना गाये बस पढ़ दी है. :)

11

बारिशों के मौसम में, मेघ बन के छा जाओ
रात के अँधेरे में, चाँद बन के आ जाओ
भीड़ तो बहुत है पर, मन में इक उदासी है
याद बन के यादों में, याद ही बुलाती है
प्रिय! तुम चले आओ, प्रेयसी बुलाती है.

सावनी बयारों संग ये, सांस कसमसाती है
प्रीत इक बदरिया बन ,नित नभ पे छाती है
इस बरस तो बरखा का ,तुमहि से तकाजा है
मीत तुम चले आओ ,ज़िन्दगी बुलाती है
प्रिय! तुम चले आओ, प्रेयसी बुलाती है

खिल उठे हैं फूल फूल, भ्रमर गुनगुनाते हैं
रिम झिमी फुहारों की, सरगमें सुनाते हैं
उमड़ घुमड़ के घटा, भी तो यही कहती है
साज बन के आ जाओ, रागिनि बुलाती है.
प्रिय! तुम चले आओ, प्रेयसी बुलाती है

झूमती है ये धरा ,ओढ़ हरी ओढ़नी
किन्तु है पिपासित बस ,एक यही मोरनी
इससे पहले दामिनी ,नभ से दे उलाहने
प्रीत बन चले आओ, प्रियतमा बुलाती है
प्रिय! तुम चले आओ, प्रेयसी बुलाती है

--समीर लाल 'समीर'

यू ट्यूब:

 

 

जो यू ट्यूब न देख पायें (मेरे यू ए ई के साथी):

Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, मई 30, 2010

हे प्रभु!! ये कैसी दुनिया तेरी!

कमर का दर्द, वैसे तो अब काहे की कमर, कमरा ही कहो, हाय!! बैठने नहीं देता और ये छपास पीड़ा, लिखूँ और छापूँ, लेटने नहीं देती. कैसी मोह माया है ये प्रभु!! मैं गरीब इन दो दर्दों की द्वन्द के बीच जूझता अधलेटा सा - दोनों के साथ थोड़ा थोड़ा न्याय और थोड़ा थोड़ा अन्याय करने में व्यस्त. वैसे तो थोड़ा थोड़ा न्याय और थोड़ा थोड़ा अन्याय करते रहना ही सफल जीवन का सूत्र है मगर दर्द!!!

छपास पीड़ा पत्नी के समान लगातार साथ बनी रहती है और यह कमर का दर्द, मानो महबूबा की याद, लौट लौट आती है, लौट लौट जाती है. महबूबा तो महबूबा होती है, समय समय पर बदल भी जाती है.

पिछले बरस इसी सीजन में महबूबा थी एसीडीटी और अब की बार है यह कमर दर्द. उसी महबूबा की याद के समान कमर दर्द किसी को दिखता भी नहीं. चोट लगी हो, प्लास्टर बँधा हो, आँख सूज आई हो तो लोगों को दिखता है, साहनुभूति मिलती है. मगर कमर दर्द, पत्नी सोचे कि काम न करना पड़े इसलिए डले हैं और ऑफिस वाले सोंचे कि ऑफिस न आना पड़े, इसलिए डले हैं, और मित्र तो खैर आलसी मान कर ही चलते हैं.

छपास पीड़ा के चलते लिखने बैठ जाओ तो पत्नी की सोच और मजबूत हो. देखो, कम्प्यूटर के लिए उठने बैठने में कोई दर्द नहीं और वैसे पड़े हैं करहाते हुए. मुआ कम्प्यूटर न हुआ, दवा हो गई कि सामने बैठ जाओ और दर्द गायब. क्या जबाब दिया जाये इसका? कोई जबाब हो भी नहीं सकता सिवाय इसके कि नजर बचा कर कम्पयूटर का इस्तेमाल किया जाये. अभी भी बाजार के निकली है तो मौका निकाल कर बैठे हैं. हालांकि कमर में दर्द है मगर कहते हैं न कि बड़ा दर्द छोटे दर्द को भुलवा देता है सो लिख रहे हैं.

आप सोच सकते हैं कि मैं कमर दर्द से परेशान हूँ तो पत्नी बाजार कैसे निकल गई? सोचने पर कैसी रोक? पत्नी मेरी है, मैं नहीं सोच रहा मगर आप नाहक सोच सोच कर परेशान हैं मगर क्या करें, हम भारतीय. यही तो हमारी पहचान है. लेकिन ये कमर दर्द तो अब इतनी इतनी सी बात पर हो उठता है कि अगर इसके पीछे वो बाजार जाना छोड़ दे तो कहो, बाजार का रास्ता ही भूल जाये और छपास पीड़ा, इसके लिए रुके तो यह तो वैसा ही हो गया कि साहब को बीपी रहता है, इसलिए बाजार नहीं जा रहे. यह तो इन बिल्ट बीमारी है, इसमें रुकना कैसा?

वैसे तो बाजार वो आदतन भी चली जाती है बिना किसी काम के भी जैसे हमारा कमर दर्द चला आता है लेकिन आज खास प्रयोजन से निकली है इसलिए निश्चिंत हूँ कि दो घंटे के पहले तो आने वाली नहीं, तब तक लिख लिखा कर छाप डालूँगा और मूँह ढक कर सो जाऊँगा. बीमारी में बीमार न लगे, तो क्या खाक लगे गालिब!!

बाजार जाने का खास प्रयोजन ऐसे बना कि आज सुबह मुझे कमर दर्द में जरा आराम था तो नीचे चला आया टहलने. पत्नी पीछे बैक यार्ड में कुछ क्यारियाँ सजाने में जुटी थी. हम भी पीछे निकल गये. कल ही नई पत्थर वाली सीढ़ी बनाई थी.

उसी से उतरते पैर संभाल नहीं पाये और भदभदा कर घास में गिर पड़े. दो कुलाटी खाई. कल्पना कर के मुस्करा रहे हैं न आप? शरीर तो ऐसा हो गया है कि अगर समतल सड़क पर भी बैलेन्स जमा कर न चलें तो गिर पड़ें फिर वो तो सीढ़ी थी. गिरे, पैर मुड़ा सो अलग और कमर दर्द को तो मानो ब्याह का सुस्वागतम का बोर्ड दिख गया हो, नाचते गाते बैण्ड लिए फिर चला आया. किसी तरह उठ कर वापस चले आये बिस्तर पर.

लेटे ही थे कि पत्नी तैयार होती नजर आई. जिज्ञासावश जानना चाहा कि कहाँ चली? कहने लगी, अच्छा हुआ आप गिर पड़े कम से कम चैक हो गया. मुझे पहले ही संदेह था कि सीढी में पत्थर छोटे लग गये हैं. अब जाकर बड़े ले आती हूँ वरना कोई गेस्ट न गिर जाये पार्टी वगैरह में.

अब बताईये, हम तो हम न हुए, टेस्टर हो गये और उपर से सुनने मिला कि अच्छा हुआ गिर पड़े, कम से कम चैक हो गया? पत्नी न हुई वो वाली गुजराती हो गई जो गलती से कुऎँ में गिर जाये तो निकलने का इन्तजाम बाद में देखेगी, पहले स्नान कर लेगी कि अब गिर तो गये ही हैं, पहले स्नान कर लें.

अब यह लिख कर जब सोऊँगा तो हीटिंग पैड रख लूँगा शायद सोते में दर्द न बढ़े!! दर्द बताया न महबूबा की याद सा है, सोते में ज्यादा बढ़ जाता है.

अस्पताल जाने का मन नहीं है, वहाँ पिछली बार धोखा लग गया था. इसी दर्द के चलते गये थे अस्पताल. डॉक्टर ने कहा कि दो दिन भरती रहना पड़ेगा. रुम अलॉट हो गया. डॉक्टर देख दाख कर दवाई दे कर चला गया. कह गया कि अब नर्स के हवाले. पत्नी को भी घर भेज दिये कि अब नर्स देख लेगी.

थोड़ी देर में एक काला (आम इन्सानों की तरह ही अपनी खोट मुझे भी नजर नहीं आती-मगर सामने वाली की खोट पर फट से नजर चली जाती है) बड़ा ऊँचा पूरा आदमी सामने आकर दाँत चियारे खड़ा हो गया. मैने पूछा, कहो भाई, कैसे आना हुआ? कहने लगा मैं आपकी नर्स हूँ.

बताओ, बीमार आदमी के साथ ऐसी चीटिंग और चुहल!! भला अच्छा लगता है क्या? हमारे भारत में तो नर्स लड़कियाँ होती हैं. नर्स का नाम सुनते ही जो आकृति मानस पर छा जाती है, उसमें पुरुष का कैसा स्थान? ये कैसी नर्स? पूरी परिभाषा ही बदल कर रख दी. एन फॉर नर्स पढ़ाते थे स्कूल में जब तो कितनी बेहतरीन सफेद स्कर्ट में फोटो रहती थी और एक ये हैं मानो एन फॉर नालायक!! बीमार आदमी को हैप्पी की बजाय सैड कर दिया. उसी को पाप लगेगा, हमें क्या!!

खैर, जमाना बदला है, पहले पत्नी के नाम पर भी कहाँ पुरुष सुने थे, अब तो जहाँ देखो वहीं सरकारी मान्यता प्राप्त पति पत्नी-दोनों पुरुष या दोनों महिलाएँ. ये कैसा बदलाव आया है तेरी दुनिया में प्रभु!!! वो दिन दूर नहीं जब आप अपनी पत्नी के रुप में किसी सुन्दर कन्या का स्वप्न सजाये बैठे होंगे और माँ बाप आपकी शादी किसी लड़के से सेम सेक्स मेरिज अधिनियम के तहत तय कर आयें.

लोग ’गे कपल’ से मिलें तो पूछें कि भाई साहब आपकी अरेंजड मेरिज थी या लव? आप सोच रहे होंगे कि ’ऐसा भी भला कभी हो सकता है.’ ठीक सोचा, हमारे जमाने में, बहुत पुरानी बात नहीं है फोटो देख लो हमारी, कोई हमसे कहता कि एक लड़का एक लड़के से शादी करेगा तो हम भी यही कहते कि ’ऐसा भी भला कभी हो सकता है.’ लेकिन होने लगा न!!

पूरा मूड सत्यनाश हो गया अस्पताल में भरती होने का. कमर दर्द भी खुद ही ऊड़न छू हो गया और हम अगले दिन ही घर चले आये.

अब ऐसी धोखाधड़ी की जगह कौन खुद से चल कर जाना चाहेगा, इसलिए इस बार घर पर ही आराम करते हैं. 

Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, मई 26, 2010

दाल, भात और भाटे पालक की भाजी!!!

”अम्मा, खाना लगा दे”
”क्या हुआ, आज जल्दी जायेगा क्या स्कूल?”
”हाँ अम्मा, वो क्लास के पहिले सुदेश की गणित किताब से कुछ प्रश्न उतारने है. उसके पास अंग्रेजी स्कूल की किताब भी है न.”

अम्मा जल्दी जल्दी भाप छोड़ते भात, अधपकी छितरी राहर की दाल और लगभग पक गई भाटे पालक की भाजी थाली में डाल कर दे देती है और उस पर से आधा चम्मच देशी घी. स्कूल जायेगा, दिन भर पढेगा तो घी से ताकत बनी रहेगी. अम्मा घर पर मलाई से बनाती है अनिल के लिए देशी घी.

अनिल जल्दी अल्दी फूँक फूँक कर खाने लगता है. पूरा खाना बिना खाये ही दिवाल घड़ी पर नजर पड़ती है और वो खाना छोड़ कर भागता है. अम्मा कहती है, अन्न का अपमान नहीं करते बेटा. खाना आराम से खाते हैं. मगर अनिल को तो स्कूल जाने की जल्दी है सो भागता है.

बरामदे से साईकिल निकाल कर, जब तक अम्मा बाहर आये, अनिल आवाज लगा कर निकल जाता है. गली से सड़क पर आकर कोने में ही शर्मा जी की कोठी है जिनकी फैक्टरी में अनिल के पिता जी काम करते हैं. शर्मा जी की कोठी के बाहर एक साथ तीन कारें खड़ी होती हैं. एक शर्मा जी की, एक उनकी पत्नी की और एक शुभि की सफेद वाली दो दरवाजे की. शुभि उसी से स्कूल जाती है.

अनिल के सरकारी स्कूल से पिछली सड़क पर शुभि का कान्वेन्ट स्कूल है तीन मंजिला लाल रंग का.

अनिल को जल्दी स्कूल पहुँचना है, वो तेजी से साईकिल के पैडल मारता है. आज जाने क्यूँ एड़ी में दर्द भी है.

अनिल कक्षा में बैठा है. मास्साब भौतिकी के चुम्बकत्व के सिद्धांत वाला अध्याय पढ़ा रहे हैं अनिल बैन्च पर बैठा अपने खपड़ैल की छत वाले क्लास रुम की खिड़की से बाहर पीछे के वाले स्कूल की ओर ताक रहा है. ढेरों लड़कियाँ उस स्कूल में पढ़ती है. नीला ट्यूनिक और सफेद कमीज पहने. परियों जैसी लगती सब अनिल को उजली उजली सी. सबके बैठने की अलग अलग कुर्सी. दूर से कुछ साफ तो दिखता नहीं, बस बैठा कल्पना करता रहता कि शुभि ही होगी जो खिड़की से दिखाई दे रही है.

एक बार शार्मा जी के दरबान के लड़के से पूछा था तो उसने बताया था कि शुभि भी उसी कक्षा में है जिसमें अनिल पढ़ता है.

दिन में लंच की छुट्टी में अनिल भी दोस्तों के साथ धूल में सतोलिया खेल रहा है. गेंद पीछे झाड़ियों में जाती है. अनिल दौड़कर गेंद उठाने जाता है. उस स्कूल का बड़ी ऊँची ऊँची जालियों का बाड़ा है. बाड़े के उस पार कुछ लड़कियाँ बेड मिंटन खेल रही हैं. कुछ हरी हरी दूब में गोला बना कर गप्प करती खाना खा रही हैं. अनिल ने झाड़ियों के बीच से छुप कर देखा, उसे शुभि दिखाई पड़ी अपनी सहेलियों के साथ बैठे खाना खाते. शुभि खाने में सैण्डविच खाती है.

अनिल लौटकर आ जाता है. अब उसका खेलनें का मन नहीं. क्लास रुम में आकर अपना खाने का डिब्बा निकाल लेता है. अम्मा ने चाव से दो रोटी के साथ आम का अचार रखा है. उसे जाने क्यूँ आज खाना खाने का मन नहीं है. डिब्बा बन्द करके बस्ते में रख देता है. उसे प्यास लगी है. पानी की टंकी तक जाता है. पीछे स्कूल पर फिर नजर जाती है. एक लड़की वाटर बोटल से पानी पी रही है. अनिल टंकी से हाथ धो कर लौट आता है.

शाम को साईकिल से घर लौट रहा है. शुभि की कार शर्मा जी के घर के बाहर खड़ी है जबकि उसका स्कूल अनिल के स्कूल के १५ मिनट बाद छूटता है लेकिन वो हमेशा घर पहले पहुँच जाती है चाहे अनिल कितनी भी तेज साईकिल चला कर लौटे.

रात होने लगी है. अम्मा ने आंगन में खटिया लगा दी है. अनिल खटिया पर जाकर लेट जाता है. अम्मा सर पर तेल मल रही है, और वो चाँद को देख रहा है. वही उसका खिलौना है जिससे वो बचपन से खेलता आया है.

अनिल इन्जिनियर बन गया है. बाबू जी तो उसकी इन्जिरिंग की पढ़ाई खत्म होते ही चल बसे थे और फिर छः महिने में अम्मा भी. अनिल को एक अच्छा ऑफर मिला और वो अमरीका आकर बस गया है. बीबी और दो बच्चों का परिवार है.

दरवाजे पर तीन गाड़ियाँ हैं. एक खुद की सफेद कार दो दरवाजे वाली, एक पत्नी की और एक वैन, जब परिवार के साथ कहीं लम्बा जाना होता है तब के लिए.

ऑफिस जाने को तैयार होता है.

पत्नी ने ब्रेकफास्ट के लिए सेण्डविच लगा दिये हैं और एक सैण्डविच और फ्रूट लंच के लिए पैक कर दिया है. साथ में मिनरल वाटर की ठंडी बोतल.

आज अनिल को सेण्डविच के बदले वो भाप छोड़ते भात, अधपकी राहर की दाल और लगभग पक गई भाटे पालक की भाजी थोड़ा सा घी डाल कर खाने का मन है.

वो पत्नी से कहता है. पत्नी हँस देती है. ”नो भात, नो घी. मोटा होना है क्या?”

कह रही है ”जल्दी निकलो और ये सैण्डविच भी साथ लेते जाओ, ड्राईव करते हुए खा लेना वरना ऑफिस को देर हो जायेगी.”

फिर छेड़ते हुए हंसती है ’ ”हर समय बस खाने में ही मन लगा रहता है मोटूराम का!!”

बेटा पूछ रहा है ”डैडी ये भाटे पालक क्या होता है?”

आज जाने क्यूँ अम्मा की याद आ रही है उसे.

उसकी आँखें नम हैं.

aadhasach1

-समीर लाल ’समीर’

Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, मई 23, 2010

यशस्वी ब्लॉगर भवः !!

आज दिल्ली में ब्लॉगर मीट हो चुकी है. तरह तरह के विचार रखे गये. ऐसे वक्त में किसी भी और विचार से ज्यादा जरुरी यह विचार हो जा रहा है कि जब लोग इस बारे में कल अखबार में पढ़ेंगे तो ब्लॉग खोलना चाहेंगे.

इसी बात को मद्देनजर मैने यह बताता चलूँ कि आजकल जमाना बदल गया है और ब्लॉगिंग करने के लिए किन वस्तुओं की आवश्यक्ता है. अगर आप नीचे लिखी सामग्री एकत्रित कर लेते हैं तो बस फिर देर किस बात की.  आगाज किजिये सफल ब्लॉगिंग के सफर लिए और फिर हम तो बैठे ही हैं प्रथम स्वागत टिप्पणी आरती में कट पेस्ट कर सजाये. आईये तो सही:

monkey

ब्लॉगिंग के लिए अति आवश्यक सामग्री:

  • एक लैपटॉप/ डेस्कटॉप
  • एक कैमरा
  • इंटरनेट कनेक्शन
  • एक मुख्य ब्लॉग अपने नाम का
  • तीन ब्लॉग छ्द्म नामों से
  • ५ बेनामी रजिस्ट्रेशन टिप्पणी के लिए
  • एक हैलमेट
  • एक नेलकटर: वरना सर खुजाते खुद की खोपड़ी जख्मी हो सकती है.
  • एक किताब: २४ दिन में बेसिक भोजपुरी लिखना सीखें.
  • एक गुरु
  • चार चेला
  • गाली-कोश
  • भविष्य के लिए रिवाल्वर का लाईसेन्स: (तब तक अनऑफिसियली तमंचा रखे रहिये)
  • एक वकील
  • दो पत्रकार मित्र
  • कोर्ट से अग्रिम जमानत
  • एक बोतल स्कॉच: गाली पड़े तो गम मिटाने के लिए वरना कभी भी जश्न मनाने के लिए. जश्न मनाने के बहुत मौके आयेंगे जैसे ५० वीं पोस्ट, १०० वीं पोस्ट, १००० हिट्स, १०० फालोवर, एक साल पूरा होना और भी जाने क्या क्या.

अब तो कन्टेन्ट की समस्या से भी जूझने की जरुरत नहीं. किसी की भी कविता उठाओ और कर डालो पैरोडी. बहुत हिट चल रही है. एक मैने भी तो की है बतौर आपके लिए एक्जाम्पल:

पं. माखनलाल चतुर्वेदी से क्षमायाचना समेत:

ब्लॉगर की अभिलाषा

चाह नहीं मैं ब्लॉगर बन के
लेख ठेलता जाऊँ
चाह नहीं सम्मानित होकर
माला से लादा जाऊँ
चाह नहीं साहित्यजगत में
हे प्रभु, खूब सराहा जाऊँ
चाह नहीं मैं कविता लिखकर
कविवर श्रेष्ट कहलाऊँ
मुझे पढ़ लेना ओ साथी
देना तुम टिप्प्णी और पसंद एक
उँची बने पसंद ब्लॉगवाणी पे
जिसे देख आयें ब्लॉगर वीर अनेक.

-समीर लाल ’समीर’

Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, मई 19, 2010

बहता दरिया है शब्दों का!!

जबलपुर प्रवास में शायद ही कोई ऐसा सप्ताह गुजरता हो जब हमारी और बवाल की अकेले महफिल न जमें. फिर लगभग हर दूसरे तीसरे दिन कहीं न कहीं महफिल जमीं रहती, कभी लोक गीतों की, कभी गज़लो की तो कभी कव्वालियों की तो कभी कविताओं की, उसमें तो खैर बवाल और संजय तिवारी ’संजू’ साथ होते ही.

लाल-बवाल बैठक हो और कोई नई गज़ल, नया गीत न उपजे हमारी कलम से और उसमें बवाल का पुट और फिर गीतों को सुर ताल में ढालना न हो बवाल के द्वारा तो फिर कैसी महफिल.

इसीलिए जब भी भारत जाता हूँ और जबलपुर कितने भी दिन रह जाऊँ, कम ही लगता है. अगर कोई दीगर जरुरी काम न हो और रात घिरे तो यह मान ही लिजिये कि कहीं महफिल जमी है.

उन्हीं महफिलों के दौर में यह गीत उपजा था. बवाल ने इसे अपने स्वर में गाया भी बहुत जबरदस्त था लेकिन वो आलसी इतना कि आज तक रिकार्डिंग ही नहीं मुहैया करा पाया.

शुरु से साथ रहा, छोटा है तो मूँह लगा होना तो स्वभाविक है, इसलिए कुछ कह भी नहीं पाते सिवाय आलस्य त्यागने के लिए लताड़ने के सिवाय. जब लताड़ो, उनका क्या: हँस दिये और कहने लगे, जय हो, महाराज!!

आज सोचा कि अब कब तक गायन का इन्तजार किया जाये, जब आयेगा तब फिर से. रीठेल पर कोई रोक तो है नहीं, फिर लगा देंगे. रोक तो किसी बात पर नहीं है, अभी कोई उठ खड़ा हो और इसकी पैरोडी गाने लगे, तब भी कैसी रोक.

आज टहलते हुए राह में..

बहता दरिया है शब्दों का,
तुम छंदों की कश्ती ले लो!
जब गीत कमल खिल जाएँ तब,
तुम भँवरों की मस्ती ले लो!!

टूटे-फूटे थे शब्द वहाँ,
फिर भी वो गीत रचा लाया!
कोई बहरों वाली बात न थी,
फिर भी वो ग़ज़ल सजा लाया!!

परिहासों की उस बस्ती का,
संजीदा हुक्म बजा लाया!!!
उसने सीखा खाकर ठोकर,
तुम सीख यहाँ यूँही ले लो
बहता दरिया है शब्दों का
तुम छंदों की कश्ती ले लो!

ये मज़हब-वज़हब की बातें,
आपस के रिश्ते तोड़ रहीं!
और सहन-शक्तियाँ भी अब तो,
दुनिया भर से मुँह मोड़ रहीं!!

धर्मों के झूठे गुरुओं की,
तक़रीरें हृदय झंझोड़ रहीं!!!
या दाम चुका कर लो नफ़रत,
या दिल की प्रीत युँही ले लो
बहता दरिया है शब्दों का
तुम छंदों की कश्ती ले लो!
आदर्शों और बलिदानों की,
उसको तो रस्म निभानी है!
हाँ मातृ-मूमि पर न्यौछावर,
होने की वही जवानी है!!

हृदयों को जिसने है जीता,
उसकी ही कोकिल बानी हैं !!!
दिन रोकर काटो या हँसकर,
जो चाहो रीत, यहीं ले लो
बहता दरिया है शब्दों का
तुम छंदों की कश्ती ले लो!


(इस गीत को जब मैने लिखा था, तभी चार जगह तो बवाल नें कैची चला ही दी थी गाते गाते..अब जब सच में गा कर रिकार्ड करेगा तो जाने क्या निकल कर आये. :))

Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, मई 16, 2010

मैं कृष्ण होना चाहता हूँ!!

कोशिश करता हूँ कि जब बारिश होने लगे तब घर के बाहर न निकलूँ. छाते पर बहुत भरोसा बचपन से नहीं रहा, खास तौर पर जब बारिश के साथ तेज हवाएँ भी चलती हों. शायद कोई अनुभव ही रहा होगा जो घर कर बैठा है.

भीगने से तो उतना डर नहीं लगता जितना कीचड़ की छ्प छ्प में पतलून गंदी होने से.

सर भीगा, बदन भीगा तो सूख जायेगा कुछ देर में मगर पतलून पर लगा कीचट तो सूख कर भी दाग छोड़ जाता है.

हमेशा मन चाहा हो नहीं पाता. एक मन की चाहत ही तो है कि सफेद पतलून से लगाव है और कोई रंग भाता नहीं.

इतने जतन पर भी जाने कब, कौन, क्या सोचकर छेद कर गया और इस बारिश में मेरी छत चूने लगी. लगा कि जैसे छत है ही नहीं. सीधे बरसता आसमान और नीचे भीगता मैं.

पूरे घर में पानी पानी और लोगों के पैर में लग लग कर आया कीचड़. हर तरफ बस कीचड़ ही कीचड़. भीगा भी और लाख न चाहते हुए चलना भी पड़ा, ऐसे में पतलून गंदी होना ही थी, कितना बचाता सो हुई.

बारिश थम गई. घर सूखा, बदन सूखा.

सीलन तो जाते जाते ही जायेगी, बदबू बाकी है और पतलून पर लगे कीचड़ के दाग, मुए छूटते ही नहीं.

सफेद पतलून जब तक संभल जाये, तब ही तक वरना गंदगी सबसे पहले उसी पर दिखती भी है और अपने निशान हमेशा के लिए छोड़ जाती है.

और सफेद पतलून पहनने की ऐसी ललक – क्या कहें कि जाती नहीं.

krishna

मैं कृष्ण होना चाहता हूँ!!!

जो दिखा वो मैं नहीं हूँ
बस पाप धोना चाहता हूँ
है मुझे बस आस इतनी
कुछ और होना चाहता हूँ.

जिन्दगी चलती रही है
ख्वाब सी पलती रही है
सब मिला मुझको यहाँ पर
कुछ कमी खलती रही है.

थक गया हूँ ए जिन्दगी
कुछ देर सोना चाहता हूँ.
बस पाप धोना चाहता हूँ
कुछ और होना चाहता हूँ.

आराम कर लूँ दो पहर
मैं चल पड़ूँ फिर उस डगर
मंजिल मुझे दिलवाये जो
करवा सके पूरा सफर..

राह में बन छांव चल दे
वो वृक्ष होना चाहता हूँ
बस पाप धोना चाहता हूँ
कुछ और होना चाहता हूँ.

न बने जब बात प्यारे
टूट कर बिखरे नजारे
मैं चलूँगा हमसफर बन
छोड़ दे जब साथ सारे

जो प्रीत का अहसास दे
वो हाथ होना चाहता हूँ
बस पाप धोना चाहता हूँ
कुछ और होना चाहता हूँ.

कब किसी का साथ दूँगा
सत्य बातों में, गलत में
मांगने की छूट उसको
जो दिखे पहली झलक में

जब युद्ध हो कुरुक्षेत्र का
मैं कृष्ण होना चाहता हूँ
बस पाप धोना चाहता हूँ
कुछ और होना चाहता हूँ.

आत्मशुद्धि के लिए अब
कुछ देर रोना चाहता हूँ
बस पाप धोना चाहता हूँ
कुछ और होना चाहता हूँ.

-समीर लाल ’समीर’

Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, मई 13, 2010

मेरा लेखन कचरा है!!

slcar

दो दिन हो गये सारा घटनाक्रम देखते. ढ़ेर प्रशंसक/ चहेते/मित्र सामने आये माननीय ज्ञानदत्त जी की पोस्ट  पर मेरे विषय में टिप्पणी देखकर. जान पाया सबका प्यार. अभिभूत हुआ, लोगों को इस पर नाराजगी भी हुई कि मैं क्यूँ असभ्यता से किये गये विरोध के बावजूद भी अभिभूत हुआ. अनूप जी ने खुल कर पोस्ट के माध्यम से जाहिर किया और किसी ने उस पर टिप्पणी के माध्यम से.

प्रशंसकों का प्यार, भद्र और अभद्र दोनों, अभिभूत करता ही है, भले ही आप अभद्र और असभ्य तरीके से जाहिर समर्थन को उचित न करार दें. मैं भी इसे उचित नहीं मानता किन्तु स्नेह ही तो है जो वो भड़क उठे. मेरी नजर में ,अब भी, ऐसी बात उठाना ही औचित्यहीन है, जो लोगों को भड़काये. क्या जरुरत है?

जिस तरह से असभ्य भाषा में किया गया विरोध या समर्थन गलत है, उसी तरह से ऐसा औचित्यहीन प्रश्न जो इस बात को भड़काये. बात दोनों ओर से ही दूसरे तरीके से कही जा सकती थी. गुस्से में इंसान आपा खो देता है, यह जग जाहिर है.

आज तक मैने, जब भी ब्लॉग जगत की बात आई या मेरे लेखन पर बात आई, हमेशा ही खुल कर कहा है कि अनूप जी ही मुझे गद्य लेखन में लाये. उनसे मैने सीखा, उनका मैं प्रशंसक हूँ और सीख रहा हूँ, फिर तुलना कैसी.

अनूप जी लाख तारीफ करें, मैं हमेशा ही उनके लेखन से सीखने का तत्पर रहा और यह बात वो भी अच्छी तरह जानते हैं. शायद मानते भी हैं.

उनकी मुझसे मौज लेने की प्रवृति भी हमेशा से रही. मुझे कभी नहीं खला. मैने भी उनसे खूब मौज ली. जब बुरा लगा कि जो बात व्यक्तिगत तौर पर उनसे की, उन्होंने जग जाहिर की, उनको बताया और उन्होंने उसे वापस लिया. अपने आलेख को सुधारा.

आज भी उन्होंने अपने आलेख में जाहिर किया कि मैने अपने कमेन्टस में कहा है मैं कठिन समय से गुजर रहा हूँ.जबकि ऐसा मैने कहीं नहीं कहा. मैने बस अपने चाहने वालो से इतना कहा कि जैसा आपने समझा, वैसा आपने लिखा. आपने मुझे संबल दिया, मैं अभिभूत हुआ इस स्नेह के लिए और फिर मैने विवाद से दूर रहते हुए हिन्दी की सेवा की अपील की. एक शाब्द बदल देने मात्र से बात बदल जाती है, इसका ज्ञान तो अनूप जी को है ही, इसमें मैं क्या कहूँ.

उद्देश्य मात्र इतना था कि बात जो बढ़ चुकी है वो शांत हो जाये और लोग पुनः पूर्ववत पहले की तरह सक्रियता से हिन्दी के प्रचार प्रसार में जुट जायें.

मैं कभी अभद्र और असभ्य भाषा का न समर्थक रहा हूँ और न ही इस्तेमाल करता हूँ. समर्थकों के गुस्से में आये बयानों में भी आशा ही कर सकता हूँ कि भाषा की मर्यादा का पालन हो, निवेदन कर सकता हूँ, उससे उपर मेरे वश में क्या है.

मेरे ज्ञान जी से भी मधुर संबंध हैं, मैं उनका सम्मान करता हूँ और मुझे कोई शिकायत नहीं. उन्होंने मेरे लेखन के विषय में जैसा समझा, वैसा लिखा.  सबको सब का लेखन पसंद आये, यह जरुरी नहीं. उन्हें मेरा लेखन नहीं पसंद, वो स्वतंत्र हैं यह कहने के लिए कि मेरा लेखन कचरा है. मैं उन्हें भी नहीं रोक सकता और न ही रोकने की कोई वजह है.

बस, अफसोस इतना है कि नित ईमेल पर बात होने के बावजूद भी और उनकी प्रशंसा की टिप्पणी लगभग हर आलेख पर प्राप्त करते हुए भी इतना बड़ा सत्य वो दिल में छिपाये बैठे रहे और मुझे न जाहिर कर, इसे खुले मंच पर जाहिर किया. सोचता हूँ, क्या सच मानूँ-उनकी प्रशंसा में प्राप्त नित नई टिप्पणी या एक बार जग जाहिर नापसंद का आलेख.

मेरा वश मेरे व्यवहार, मेरे लेखन और मेरे विवेक पर है. कोशिश होती है उसमें भूल न हो.

मित्रों और शुभचिन्तकों ने रोका कि आपकी टिप्पणी विवाद पर ठीक नहीं लग रही. मैने बिना एक क्षण गंवाये रोक दी. इससे ज्यादा मुझसे क्या आशा है, मुझे बताये मैं करने को तैयार हूँ.

निवेदन बस इतना है कि मैं नहीं जानता कि आप कोई भड़काऊ बयान जारी करे अनजाने में भी, तो उसकी प्रतिक्रिया कैसी और किस भाषा में आयेगी.  किन्तु जहाँ भी मुझे लगेगा कि भले ही अभद्र भाषा में, मुझे स्नेह जाहिर किया है, मैं आभार तो व्यक्त करुँगा, भले ही मैं उसकी भाषा का समर्थन न करुँ.

अपने चाहने वालों से और समर्थकों से बस एक निवेदन है कि अब बहुत हुआ. अव्वल तो भाषा का संयम बनाये रखें और दूसरा, किसी के कहने या समझने से अपनी सोच मत बदलें. आप सब समझदार है, संयम से काम लें.

कृपया इस विवाद को विराम दें और आगे हिन्दी की सेवा में तत्पर रहें.

कुछ रात के अंधेरों से अक्रांत
भयभीत
दुबक कर सो जाते हैं

और

कुछ उसी रात के
सितारों की रोशनी में
जीवन की राह खोज लेते हैं.

-यह दुनिया भी कितनी अजीब है.

-अनेक शुभकामनाएँ एवं साधुवाद!!

Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, मई 12, 2010

अंधड़....

storm
 

जब भी सोचता हूँ मैं
कुछ पल पा जाऊँ
चैन के
और सो सकूँ एक रात
बिना किसी विचार के
बिना किसी इन्तजार के...
अपने में सिमटा मैं...


तब   जाने कैसे
हवा का एक झोंका
जान लेता है
मेरे इरादों को
और आ जाता है
बन कर
अंधड़
मेरी सोच के घोंसले को
उजाड़ने के लिये
और
बिखर कर रह जाता हूँ मैं.

मेरे हमसफ़र
मेरे सहयात्री
करते हैं कोशिशें
ओट देकर मुझे..
हवा की चाल को
कर सकें नाकामयाब

पर
शातिर हवा
फिर नये अण्दाज़ में
आ जाती है
अपने अंधड़ पर
मुखौटा लगाये
पुरबाई का


और तब
वे जो मेरा साथ देने को हुए थे
तत्पर
गंवाने लगते हैं
अपने अपने घोंसले
ताकते हैं मेरी ओर
मैं उठ कर लड़ूँ
हवा से..


नहीं
नहीं
मेरा काम है घोंसला बनाना
और
हवा का उजाड़ना

और फिर हम
अपने अपने काम में जुट जाते हैं
नई लगन के साथ!!!

-समीर लाल ’समीर’

Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, मई 09, 2010

बुक्का फूटा..बुक्क!!!

हमारे पास आँखे हैं तो देखने की सुविधा है. मगर हम बस दूसरों को देख सकते हैं.

काश!! अपनी आँखों से हर वक्त खुद को भी देख पाते.

दर्पण इज़ाद कर लिया है लेकिन दर्पण कब हमेशा साथ रहता है?

दिन में एक या दो बार दर्पण देखते हैं वो भी मात्र खुद को निहारते ही हैं.

खुद के भीतर झांकने का तो खैर समय ही नहीं लेकिन कब दर्पण में देख कर भी अपने को पहचानने की कोशिश की?

शायद यही तरीका होगा जिन्दा रहने का वरना खुद की सही पहचान के बाद तो खुद के साथ रहना भी मुश्किल हो जाये.

infla

वो सामने बैठा

आकाश में ताकता

मूँह में हवा भरता

फिर गाल पर हाथों से

दोनों तरफ एक साथ

तमाचा मारता

और हवा निकलती

आवाज आती....

बुक्क!!

मैं उसे देखता रहता

सोचता

वो क्या कर रहा है?

बेवकूफ!!

वो हर

बुक्क!!!

के बाद मुझे देखता, मुस्कराता

मैं मुस्कराता जबाब में

वो सोचता

ये क्या देख

मुस्करा रहा है?

बेवकूफ!!!

और फिर

आकाश ताकते

मूँह में हवा भरता.....

तमाचा मारता

और

आवाज आती

बुक्क!!

-समीर लाल ’समीर’

 

नोट: कल दिन में एकाएक कुछ वजहों से मॉट्रियल जाना पड़ा. १२ बजे दिन में निकले और ५१० किमी की यात्रा तय कर ४.३० बजे पहुँचे. जरा थकान की वजह से रात कहीं जाना नहीं हुआ और आज सुबह काम खत्म कर ३ बजे वापसी पर रवाना हुए तो ८ बजे रात घर आकर लगे. यही वजह हुई कि न तो कोई ब्लॉग पढ़ना हुआ और न कमेंट करना. अब इत्मिनान से बैठे हैं तो कुछ पोस्ट किया जाये और फिर दो दिन का बचा ब्लॉग पठन शुरु किया जाये.

Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, मई 05, 2010

४०० वीं पोस्ट और एक गज़ल

आज सुबह किसी कार्यवश ओकविल (मेरे घर से करीब १०० किमी) जाना हुआ. जिस दफ्तर में काम था, उसके समने ही मेन रोड थी, जिस पर साईड वाक बनने का कार्य जोर शोर से चल रहा था. पूरी मिट्टी के जो ढेर लगाये गये थे, उन्हें  बड़ी बड़ी मशीनों से लेवल किया जा रहा था.

दफ्तर से जब काम पूरा करके निकला, तो उस दफ्तर का मालिक भी साथ था. यूँ ही चर्चा में मैने जानना चाहा कि जब यह वाक वे पूरा बन रहा है, तो यह पहाड़ जैसी मिट्टी बीच में क्यूँ छोड़कर दोनों तरफ का काम चालू है, एक लाईन से क्यूँ नहीं करते यह लोग. बेवजह बीच में काम छोड़ कर, गाड़ी दूसरी तरफ ले जाते हैं बार बार, और आगे काम जारी रखते हैं.

तब उसने मुझे थोड़ा पास ले जाकर वो मिट्टी का ढेर दिखाया, जो बीच में लगभग १०० मीटर की जगह घेरा हुआ था. उस पर एक "गूस" महारानी बड़े ठसके से विराजमान थी. बताया गया कि एक रात उसने वहाँ अंड़े दे दिये हैं तो अब जब तक बच्चे नहीं हो जाते, सरकार उतना हिस्सा नहीं छुएगी और बच्चा हो जाने के बाद जब वो चली जायेगी, तब ही उस हिस्से को बनाया जायेगा.

अभी मेन रोड़ की तरफ एक प्लास्टिक की जाली भी लगा दी गई है कि भूल से वो सड़क पर न चली जाये और किसी तेज रफ्तार गाड़ी की चपेट में आ जाये. निर्माण कर्मचारी भी उसे रोज खाने के लिए पॉपकार्न और चिप्स डाल देते हैं ताकि भोजन की तलाश में उसे भटकना न पड़े.

क्या हम कभी ऐसी कल्पना सरकार की तरफ से अपने देश में कर पायेंगे या फिर सिर्फ कागज पर गिनती लगाते रहेंगे कि अब १४११ बाघ बचें हैं?

नीचे चित्र में ये दो गीस (goose (plural: geese)) कल मेरे घर के सामने घास में टहलने आये. पड़ोस में एक छोटा सा तालाब हैं, वहीं रहते हैं. सोचा, आपसे भी मिलवा दूँ.

goose

खैर, यह है मेरी ४०० वीं पोस्ट. बहुत रोचक और दिलचस्प सफर रहा इन ४०० पोस्टों का. टिप्पणी के माध्यम से अब तक लगभग ३५०० लोगों का, अवागमन में लगभग १६४००० लोगों ने और फीडस स्बासक्राईब करने में लगभग ५७० लोगों नें अपना स्नेह और प्रोत्साहन दर्ज किया.

उम्मीद करता हूँ कि आप सबका स्नेह यूँ ही मिलता रहेगा और यह सफर यूँ ही खुशनुमा बना रहेगा.

पिछली बार जो गज़ल साधना की आवाज में आपको सुनवाई थी, उसमें जैसा मैने कहा था तीन शेर किसी और के थे और तीन मेरे. अब फिर से वही गज़ल मगर इस बार इसमें सारे शेर मेरे ही हैं और आवाज साधना की. इस चौथे शतक के मौके पर लुत्फ उठाईये.

11

जाने क्या बात है जो तुमसे बदल जाती है
जिन्दगी मौत के साये से निकल जाती है

नब्ज को छू के वो खुशहाल हुए जाते है
सांस तो रेत है हाथों से फिसल जाती है

देख तो आज के मौसम का नजारा क्या है
ये तबियत भी हमारी तो मचल जाती है

मुझको तो चाँद दिखे या कि तुम्हारी सूरत
दिल की हस्ती मेरी दोनों से बहल जाती है

कैसे जीना है किसी को ये सिखाना कैसा
वक्त के साथ में हर सोच बदल जाती है.

जब भी होता है दीदार तेरा साहिल पर
डूबी कश्ति मेरी किस्मत की संभल जाती है.

बात करने का सलीका जो सिखाया हमको
बात ही बात में नई बात निकल जाती है.

दास्तां प्यार की तुमको ही सुनाई है ’समीर’
दर्द के देश में यह बन के गज़ल जाती है.

-समीर लाल ’समीर’

 

यहाँ क्लिक करके सुनिये:

Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, मई 02, 2010

मजदूर दिवस के मजबूर

मजदूर दिवस पर भाषण देने दिल्ली से नेता जी गांव आये.
मजदूरों के वर्तमान हालात और उसके सुधार एवं मजदूरों के उत्थान के लिए सरकार की भावी योजनाओं पर खुल कर बोले और वापस चले गये.
नन्दु और उसके दो भाई, जिन्होंने तीन दिन रात लग कर सभा स्थल पर मंच का निर्माण किया था, अपनी पेमेन्ट के लिए न जाने कब से भटक रहे हैं.

 

Moon

१.

चाँद
को
देखकर

कवि
को
याद आती है
अपनी महबूबा

और

मजदूर
को
रोटी!!!

hammer

२.

थकान से चूर बदन
कांपते हुए हाथ
माथे से बहती पसीने की धार
और उसने फिर से किया
भारी भरकम हथोड़े से
छैनी पर प्रहार....
बार बार

छन्न्न्न्न्न्न!
छान्न्न्नन्न
छंन्न्न्न

एक पल के लिए
जैसे ही यह लय टूटी

उसे सुनाई दी
घर में इन्तजार करते
बेटे की आवाज

बापू!! रोटी!!!!!!!!

भूल कर अपनी थकान
वो फिर तैयार हुआ
अगला प्रहार
करने के लिए
क्यूँकि
असमर्थ था वह
इस आवाहन को
नकारने में …

-समीर लाल ’समीर’-     

Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, अप्रैल 28, 2010

साहित्य के ध्रुव

एक गांव में सरपंच जी ने बैठक बुलवाकर घोषणा की कि अब अगले माह तक हमारे गांव में बिजली आ जायेगी.

पूरे गांव में खुशी की लहर दौड़ पड़ी. उत्सव का सा माहौल हो गया. हर गांववासी प्रसन्न होकर नाच रहा था.

देखने में आया कि गांव के कुत्ते भी खुशी से झूम झूम कर नाच रहे थे. यह आश्चर्य का विषय था.

लोगों ने कुत्तों से जानना चाहा कि भई, तुम लोग क्यूँ नाच रहे हो?

कुत्तों ने बड़ी सहजता से जबाब दिया कि जब बिजली आयेगी तो इतने सारे खम्भे भी तो लगेंगे.

मुझे मेरे मित्र ने जब यह किस्सा सुनाया तो प्रथम दृष्टा तो यह चुटकुला ही लगा मात्र हास्य बोध देता किन्तु गहराई से सोचा जाये तो हम इन्सानों में यह आदत क्यूँ नहीं? क्यूँ हम किसी और की खुशी में अपनी खुश होने की वजह खोजने के बदले इर्ष्यावश दुखी होकर बैठ जाते हैं?

खैर, एक विचार उठा तो सुना दिया.

ऐसे ही कुछ समय पहले कुछ विचारों को, कुछ भावों को शब्दबद्ध कर कवि मित्र शरद कोकस जी से बात कर रहा था और उनके मार्गदर्शन में उसी रचना में कुछ सुधार कर यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ:

 

साहित्य के ध्रुव

writing

कीड़े मकोड़ों की तरह
एक दूसरे पर लदे-फदे
सरकते घिसटते कवि कथाकार

माचिस की
डिबियों में ज्यों
अपनी दुनिया बसाये

बिना किसी मकसद
रेंगते भटकते
कागज़ काले करते लोग..

वहीं बुद्धि के विमान में सवार
लोगों को भी
ऐसा ही दिखता है
दुनिया का हाल

अपनी गिद्ध-दृष्टि  से
वे देखते हैं दुनिया
और रचते हैं

एक आधी-अधूरी कविता
या एक निरर्थक कहानी...

जिसे अब साहित्य पुकारा जाता है!!

-समीर लाल ’समीर’

Indli - Hindi News, Blogs, Links