रविवार, जनवरी 05, 2014

आँटी पुलिस बुला लेगी- गंदी बात गंदी बात!!

कनाडा की शाम को आजतक पर “दिल्ली की आप सरकार की सबसे कम उम्र की महिला व बाल विकास मंत्री राखी बिड़ला” (बाकी मंत्रियों के लिए मात्र विभाग के साथ मंत्री लिए देने से भी चल जाता है) की कार पर हुए धातक हमले, जिसमें संयोग से वे पूरी तरह सुरक्षित रहीं, के चरम के बारे में पढ़ रहा था; हल्ले गुल्ले के बाद समाचार का निष्कर्ष अंतिम पैरा में:

क्या बच्चे की गेंद से टूटा गाड़ी का शीशा?

सूत्रों के हवाले से पता चला है कि कार का शीशा क्रिकेट खेल रहे एक बच्चे की गेंद से टूटा था. घटना के बाद हुई पुलिस पूछताछ से ये बात सामने आई है कि इलाके में एक घर की छत पर क्रिकेट खेल रहे बच्चे की गेंद से कार का शीशा क्रेक हुआ. बताया जा रहा है कि घटना के तुरंत बाद बच्चे के पिता ने सबके बीच माफी भी मांग ली थी. लेकिन इसके बावजूद मंत्री साहिबा थाने पहुंच गईं और बच्चे की घटना को छिपाते हुए शिकायत दर्ज करा दी. इसके अलावा राखी के पिता पर भी बच्चे के परिवार को अपशब्द कहने के आरोप लगाए जा रहे हैं.

अब ऐसे में हमारे जैसे जाबांज टिप्पणीकार, जिनका २५-५० जगह टिप्पणी करने के बाद ही खाना पचता हो वो चुप कैसे बैठा रहे भला तो फटाक से टिप्पणी लिखी:

आमजन के बीच जाने के फायदे:मंगोलपुरी में बच्चों को खेल के मैदान मुहैय्या कराये जायेगे ताकि वो छत पर क्रिकेट खेल कर कार के कांच न फोंडें.

और मंगोलपुरी के बच्चों और उनके अभिभावकों के लिए:

कांच फोड़ना- गंदी बात, गंदी बात!! आंटी पुलिस बुला लेगी, गंदी बात गंदी बात- तब भी न माने टिंकू जिया मेरा टिंकू जिया..

और हिट सब्मिट.

ओए, ये क्या? टिप्पणी ही नहीं गई और एरर मैसेज : Please remove inappropriate words: गंदी गंदी गंदी गंदी

gandibaat_Aaztak

अब बताओ भला? गाना लिख रहे हैं जो गली गली बज रहा है न्यू ईयर पर. इनने खुद न्यू ईयर की पार्टी कवरेज में न जाने कित्ती बार दिखाया होगा मगर बस, सही कहते हैं समरथ को न दोष गुसांई:

आप करें तो रासलीला और हम करें तो करेक्टर ढीला.

खैर, टिप्पणी न करें और भूल जाये तब तो नींद ही न पड़े हम जैसे टिप्पणी शुरवीरों को. आज भी याद है वो जमाना जब ब्लॉग पर टिप्पणी नहीं जा पाती थी तो ईमेल और फोन करके अगले को बताया करते थे कि चैक करो, क्यूँ तुम्हारे ब्लॉग पर टिप्पणी नहीं जा रही. और फिर वही टिप्पणी उसे ईमेल से भेजते थे कि मेरे नाम से छाप लो, तब जाकर चैन मिलता था.

अतः टिप्प्णी बदली और गंदी को Roman में लिखा Gandi, फिर से नहीं गया. जो एरर मैसेज आया वो आप वहाँ खुद Gandi बात टाईप करके सब्मिट करके देख लो, मुझसे न बताया जा पायेगा.

अंत में उसे बदला Bad बात Bad बात से..तो हमारे स्पैल चैकर, जो अबतक सुकबुकाये से बैठे थे, एकाएक होशियार हो चले और उसे ठीक करके कहने लगे Do You mean ’Bed N Bath’ –कनाडा की बड़ी भारी चेन शॉप है बैड़ एन्ड बाथ आईटम्स की.

खैर, जैसे तैसे कमेंट भेज भाज कर फुरसत हुए हैं तब से जब चाहे ई मेल खोलो तो, चाहे कोई भी साईट ब्राउज करो तो दनादन जो विज्ञापन गुगल महाराज की कृपा से आ रहे हैं, हमारी तो घिघ्घी ही बंध गई है और तुरंत न सही तो कुछ देर में पत्नी की निगाह उन पर पड़ेगी ही. बाहर -२५ डीग्री तापमान और बर्फ का तूफान आया है. आप मेरी स्थिति की कल्पना करें: विज्ञापन के नमूने:

Bed N Bath ke Discount offer – कोई बात नहीं- इससे पत्नी को क्या एतराज होगा.

Cheap and affordable Bed and Breakfast Motel in surrounding Area

और

Bed and Breakfast motel with in room Jacuzzi – कोई भी पत्नी पूछ सकती है कि क्या कहीं आऊटिंग के लिए ले चल रहे हो, जो ये खोज रहे हो.

फिर,

Lonely Aunties in your area

और

Aunties in your area- Privacy Assured- No Police Records

और

Bad Aunties in your area- looking for you – इसे देखने के बाद तो मोटल क्यूँ देख रहे थे, ये पूछने की भी जरुरत कहाँ?

आपसे सलाह ये चाहिये कि खुद ही सामान पैक कर के निकल लूँ कि इन्तजार करुँ निकाले जाने का? कम्प्यूटर फार्मेट करने पर भी गुगल तो मेरी आई डी नोट किये बैठे ही हैं.

इस बार बच गये तो ऐसी टिप्पणी करना ही नहीं है आगे से भले ही खाना पचे या न पचे. अपच ही बेहतर है इस -२५ डीग्री वाली तूफानी ठंडी रात में घर से निकाले जाने से.

वहाँ तो खैर आप पार्टी वाले बच कर निकल ही लेंगे कि हमने कहा ही नहीं कि हमला हुआ था.

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रविवार, नवंबर 17, 2013

नारे और भाषण लिखवा लो- नारे और भाषण की दुकान

हमारी एक नई घोषणा!!

आईए और जानिए हमारा एक नया व्यापार.....चुनाव के मौसम में एकदम ताजा.

हमारे यहाँ चुनाव के लिए नारे और भाषण लिखे जाते हैं.

हम एक निष्पक्ष, व्यवसायिक नारेबाजी संस्थान हैं. हमारे यहाँ कोई भेद-भाव, पक्षपात या किसी संप्रदाय विशेष का विरोघ या समर्थन नहीं किया जाता. कृपया नक्कालों से सावधान रहें- हमारी कोई ब्रान्च नहीं है.

हम वही लिखते हैं, जैसी ग्राहक की मांग होती है.

हर पार्टी के लिए,पार्टी के स्तर को देखते हुए- राष्ट्रीय स्तर ,प्रदेश स्तर और नगर के चुनाव क्षेत्र पर आधारित क्षेत्रानुसार नारे लिखे जाते हैं ।

प्रत्याशी स्तर के नारे लिखने में हमें विशेष दक्षता प्राप्त है. एक से बढ़कर एक बाहुबलियों की हमने नारों के माध्यम से संत स्वरुपा छबि स्थापित की है.

संपूर्ण भाषण लिखने के लिए, अति निम्न इतिहास के संदर्भों की गल्ति की गारंटी के साथ, अलग से ठेके लिए जाते हैं.

हमारे भाषण सरल ,सस्ते, सुन्दर और नारे संपूर्ण बहर में होते हैं.

गीत के रुप में नारे एवं पार्टी मुखिया की स्तुति लिखने के अलग से प्रबंध किए जाते हैं, गेयता की गारंटी और विशेष अनुरोध पर कम्पोजर, गायक गायिका का प्रबंध किया जाता है एवं उनके भाव अलग से देय होंगे. रिकार्डिंग स्टूडियों के मात्र रिफरेंस दिये जायेगे. उनका प्रबंध और डील कि जिम्मेदारी आपकी है. हम सिर्फ मदद कर सकते हैं.

हमारे संपर्क में शादियों में सेहरा गाने वाले भूतपूर्व सेहरा गायक भी हैं. आजकल शादी ब्याहों में उनकी जरुरत खत्म हो जाने से आपके स्तुति गान की मंच प्रस्तुति हेतु हम आपका उनसे संपर्क करवा सकते हैं, भाव ताव आपको करना होगा. ((यह काम हम मात्र दलाली के अर्थशास्त्र का पालन करते हुये कमीशन के लिए करते हैं)

हम आपके और आपकी पार्टी के फेवर से लेकर सामने वाले प्रत्याशी एवं पार्टी के विरोध में नारे लिखते हैं.

हमारी संस्थान का ध्येय: ’जैसा दाम, वैसा काम’

चुनाव जिताने की हमारी गारंटी नहीं है. हम सिर्फ असरदार नारे और भाषण लिखते हैं.

नीचे मात्र उदाहरण हेतु कुछ नारे दिये जा रहे हैं. जो बहर में न लगे, उन्हें मुक्त नव कविता की श्रेणी में रख कर पढ़ा जाये.

जैसे की बिल्डर के मॉडल होम पर बिल्डर का अधिकार होता है किन्तु आप चाहें तो उन्हें ऊँचे दाम पर सजा सजाया खरीद सकते हैं वैसे ही निम्न मॉडल नारे भी खरीदे जा सकते हैं.

जब तक आप इन्हें न खरीद लें, कृपया इनका इस्तेमाल न करें. यह कॉपीराईट कानून के उलंघन की श्रेणी में माना जायेगा. चोरी करके बच निकलने की गुजांईश कृपया यहाँ न अजमायें, अपनी यह कला चुनाव जीतने के बाद के लिए बचा कर रखें.

अगर आप नीचे दिये गये नारे खरीदना या नये नारे लिखवाना चाहते हैं तो कृप्या कमेंट कर अपना ईमेल एवं फोन पता प्रदान करें, हम नारेबाज आपसे संपर्क कर मोलभाव कर डील सेटल कर लेंगे.

हमारे संपर्क में चुनाव जीतने के पूजा पाठ एवं हवन, मंत्र बाजी आदि करने वाले धार्मिक महानुभाव भी जेल के भीतर और बाहर दोनों जगह हैं, उसके प्रबंध के लिए अलग से संपर्क करें. जेल के भीतर से भी असरदार अनुष्ठान की गारंटी संत शिरोमणि जी की रहेगी.

विशेष नोट -- संपर्कों का प्रबंध करने का यह काम हम मात्र दलाली के अर्थशास्त्र का पालन करते हुये कमीशन के लिए करते हैं...

कृप्या चुनावी सभा एवं रैलियों के लिए भीड़ जुटाने हेतु हमसे संपर्क न करें. यह कार्य हमारी संस्था ने पिछ्ले चुनाव में मीडिया के द्वारा प्रायोजित सेम भीड़ दोनों पार्टियों की रैली में भेजने के स्ट्रिंग ऑपरेशन में पकड़ाये जाने के बाद से बंद कर दिया है.

कृप्या हमसे एगजिट पोल करवाने की मांग न करें. इससे हमारे सभी प्रत्याशियों के प्रति समदृष्टा होने के मिशन स्टेटमेन्ट को चोट पहुँचने की संभावना बनती है.

कृपया दूसरी पार्टियों और प्रत्याशियों ने हमसे क्या लिखवाया है, उसकी हमसे मांग न करें. हमारा संस्थान राजनैतिक पार्टियों के समान ही आर टी आई के प्रावधानों से मुक्त है. हम इस तरह की जानकारियाँ गोपनीय रखते है किन्तु हमारे लेखन में इस जानकारी का हमारे पास होना आपको लाभ पहुँचायेगा ही.

नोट: गैर चुनावी मौसम में हम अन्य आयोजनों के लिए भी नारे लिखते हैं- जैसे सचिन का अंतिम मैच, फिल्म अवार्ड, कॉर्पोरेट स्लोगन आदि आदि.

 

election

मॉडल नारे (उदाहरण हेतु)- कॉपिराईट समीर लाल ’समीर’ उड़न तश्तरी वाले) 

बच्चा बोला गोदी में

मुझे भरोसा मोदी मे...

 

रामराज इस देश में

राम राहुल के भेष में

 

राहुल वही सितारा है

जनता को जो प्यारा है..

 

भ्रष्ट गये सब खाई में

जब ’झाडू’ लगी सफाई में...

 

संघर्ष अभी भी जारी है

अबकी ’आप’ की बारी है.

 

इतिहास पुनः दोहरायेगा

‘पंजा’ फिर से आयेगा...

 

नोट: तस्वीर साभार गुगल. किसी को वाजिब कॉपीराईट जैसी आपत्ति हो बता देना- शर्माना नहीं- हटा देंगे.

-समीर लाल ’समीर’

संपर्क साधें: udantashtari@gmail.com

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बुधवार, अक्टूबर 02, 2013

कुछ वाँ की.. तो कुछ याँ की...

एक नये तरह का प्रयोग किया है...देखें जरा...कैसी गज़ल निकली है:

BORDER

कब परिंदो को पता था, आंगनों में भेद का

एक दाना वाँ चुगा था, एक दाना याँ चुगा...

सरहदों से जा के पूछो, कौन किसका खून है

एक कतरा वाँ गिरा था, एक कतरा याँ गिरा..

राज इतना जान लो, तब हर अँधेरा दूर हो

एक दीपक वाँ जला था, एक दीपक याँ जला

आसमां को कब पता था, कौन मांगे है दुआ

एक तारा वाँ गिरा था, एक तारा याँ गिरा

है जमाना लाख बदला, पर न बदला है ’समीर’

दिल तुम्हारा वाँ छुआ था, दिल तुम्हारा याँ छुआ..

 

-समीर लाल ’समीर’

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रविवार, सितंबर 08, 2013

फासला - कोई एक हाथ भर का!!

जब रात आसमान उतरा था

झील के उस पार

अपनी थाली में

सजाये अनगिनित तारे

तब ये ख्वाहिश लिए

कि कुछ झिलमिल तारों को ला

टांक दूँ उन्हें

बदन पर तुम्हारे

तैरा किया था रात भर

उस गहरी नीले पानी की झील में

पहुँच जाने को आसमान के पास

तोड़ लेने को चंद तारे

बच रह गया था फासला

कोई एक हाथ भर का

कि दूर उठी आहट

सूरज के पदचाप की

और फैल गई रक्तिम लाली

पूरे आसमान में

खो गये तारे सभी

कि जैसे खून हुआ हो चौराहे पर

मेरी ख्वाहिशों का अभी

और बंद हो गये हो कपाट

जो झांकते थे चौराहे को कभी...

टूट गया फिर इक सपना..

कहते हैं

हर सपने का आधार होती हैं

कुछ जिन्दा घटनाएँ

कुछ जिन्दा अभिलाषायें..

बीनते हुए टूटे सपने के टुकड़े

जोड़ने की कोशिश उन्हें

उनके आधार से..

कि झील सी गहरी तेरी नीली आँखे

और उसमें तैरते मेरे अरमान

चमकते सितारे मेरी ख्वाहिशों के

माथे पर तुम्हारे पसरी सिन्दूरी लालिमाclip_image001

और वही तुम्हारे मेरे बीच

कभी न पूरा हो सकने वाला फासला

कोई एक हाथ भर का!!

सोचता हूँ .............

फिर कोई हाथ किसी हाथ से छूटा है कहीं

फिर कोई ख्वाब किसी ख्वाब में टूटा है कहीं..

क्या यही है-आसमान की थाली में, झिलमिलाते तारों का सबब!!

-समीर लाल ’समीर’

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रविवार, अगस्त 18, 2013

पूर्ण विराम: एक कहानी

सुनिये मेरी कहानी- मेरी आवाज़!!

मेरी कहानी: मेरी आवाज़!!

मुझे नहीं, वो मेरी लेखनी पसंद करती है.

मुझसे तो वो कभी मिली भी नहीं और न ही कोई वजह है कभी मिलने की? मगर एक अजब सा रिश्ता कायम हो गया है आसमानी सा.

जानता हूँ, कुछ रिश्ते उस ओस की बूँद से होते हैं जो हकीकत की तपती धरती को छूते ही अपना वज़ूद खो देते हैं. बस, मैं इन अहसासों के रिश्ते को जिन्दा रखना है तो उन्हें आसमानी ही रहना होगा.

जितना भी मुझे वो जानती है, वो मेरे लेखन से.

हाँ, कुछ पत्रों के माध्यम से हुई बातचीत भी जरिया बनी -एक दूसरे के बारे में कुछ और जान लेने का.

मगर जाने क्यूँ- उसे लगता है कि वो मुझे जानती है सदियों से. एक अधिकार से अपनी बात कहती है.

मेरी लेखनी से गुजर कर पूछती कि तुम कौन से स्कूल से पढ़े हो, जहाँ पूर्ण विराम लगाना नहीं सिखाया जाता? तुम्हारे किसी भी वाक्य का अंत पूर्ण विराम से क्यूँ नहीं होता ’।’ ..

हमेशा कुछ बिन्दियों की लड़ी लगा कर वाक्य समाप्त करते हो. वाक्य पूरा जाने के बावजूद भी इन्हीं बिन्दियों की वजह से लगता है कि जैसे अभी बहुत कुछ... और भी कहना चाहते थे मगर कह नहीं पाये.. बिल्कुल उन अनेकों जिन्दगियों की तरह जो अपने आप में पूरी होकर भी.. न जाने क्यूँ अधूरी अधूरी सी लगती हैं.

खैर, यह बात तो उसने... शायद मेरी गलती की तरफ... मेरा ध्यान आकर्षित करने के लिए कही होगी.

मगर ऐसा नहीं है कि मैं पूर्ण विराम लगाना जानता नहीं, लेकिन न जाने क्यूँ ...मुझे पूर्ण विराम लगाना पसंद नहीं. न तो अपनी जिन्दगी की किसी बात में और न ही अपनी जिन्दगी के प्रतिबिम्ब - अपने लेखन के किसी वाक्य में.

मुझे लगता है- सब कुछ निरंतर जारी है. पूर्ण विराम अभी आया नहीं है और शायद मेरी जैसी सोच वालों के लिए.. पूर्ण विराम कभी आता भी नहीं..कम से कम खुद से लगाने के लिए तो नहीं. जब लगेगा तब मैं कहाँ रहूँगा उसे जानने के लिए.

कहाँ कुछ रुकता है? कहाँ कुछ खत्म होता है?

जब हमें लगता है कि सब कुछ खत्म हो गया, तब भी कुछ तो बाकी रहता ही है.

कोई न कोई एक रास्ता..बस, जरुरत होती है उसको खोज निकालने के लिए..एक सच्ची चाहत की, एक जिन्दा उम्मीद की... और एक इमानदार कोशिश की.

कभी कहा था मैने:

इन्हीं राहों से गुज़रे हैं मगर हर बार लगता है

अभी कुछ और,अभी कुछ और ,अभी कुछ और बाक़ी है

अजब इन्सान का चेहरा है हमेशा यूँ ही दिखता है

अभी कुछ और,अभी कुछ और,अभी कुछ और बाक़ी है

मैं उसे बताता अपनी सोच और फिर मजाक करता कि अंग्रेजी माध्यम से पढ़ा हूँ, इसलिए पूर्ण विराम के लिए खड़ी पाई की जगह बिन्दी लगा देता हूँ..बिन्दी ही क्यूँ...बिन्दियों की लड़ी .....लगता कि वो खिलखिला कर हँस पड़ होगी मेरी बात सुन कर. उसे तो मैं पहले ही बता चुका था कि हिन्दी स्कूल से पढ़ा हूँ.

वो खोजती मेरी वर्तनी की त्रुटियाँ, वाक्य विन्यास की गलतियाँ और लाल रंग से उन्हें सुधार कर भेजा करती.

मैं उसे मास्टरनी बुलाता ...तब वो सहम कर पूछती कि क्या लाल रंग से सुधारना अच्छा नहीं लगता आपको?

मैं मुस्करा कर चुप रह जाता...

बातों ही बातों में अहसासता कि वो जिन्दगी को बहुत थाम कर जीती है, बिना किसी हलचल के और मैं नदी की रफ्तार सा बहता...

मुझे एक कंकड़ फेंक उस थमे तलाब में हलचल पैदा करने का क्या हक, जबकि वो कभी मेरा बहाव नहीं रोकती.

अकसर जेब में सहेज कर रखी कुछ पुरानी यादों की ढेरी से... एक कंकड़ हाथ में ले लेता..उसे उसी तालाब में फेंकने को... फिर जाने क्या सोच कर रुक जाता फेंकने से..और रम जाता..मैं अपने बहाव में.

सब को हक है अपनी तरह से जीने का...

लेकिन पूर्ण विराम...वो मुझे पसंद नहीं फिर भी...

थमे ताल के पानी में

एक कंकड़ उछाल

हलचल देख

मुस्कराता हूँ मैं...

ठहरे पानी में

यह भला कहाँ मुमकिन...

फिर भी

बहा जाता हूँ मैं!!

-समीर लाल ’समीर’

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सोमवार, अगस्त 05, 2013

तुमको सलाम लिखता हूँ.....

याद करो वो रात..

वो आखिरी मुलाकात..

जब थामते हुए मेरा हाथ

हाथों में अपने

कहा था तुमने...

लिख देती हूँ

मैं अपना नाम

हथेली पर तुम्हारी

सांसों से अपनी ...

फिर ...

कर दी थी तुमने..

अपनी हथेली सामने मेरे ..

कि लिख दूँ मैं भी

अपना नाम उस पर

सांसों से अपनी.....

कहा था तुमने...

सांसों से लिखी इबारत..

कभी मिटती नहीं..

कभी धुलती नहीं..

चाहें आसूँओं का सैलाब भी

उतर आये उन पर..

वो दर्ज रहती हैं

खुशबू बनी हरदम.. हर लम्हा...

साथ में हमारे.....

आज बरसों बाद जब...

बांचने को कल अपना...

खोल दी है मैने.... मुट्ठी अपनी.....

तब...हथेली से उठी...

उसी खुशबू के आगोश में...

ए जिन्दगी!!..

एक बार फिर .....अपने बहुत करीब....

अहसासा है तुम्हें!!....

“मैं ज़िन्दगी की किताब में, यूँ अपना पसंदीदा कलाम लिखता हूँ..

लिख देता हूँ तुम्हारा नाम, और फिर तुमको सलाम लिखता हूँ......”

-समीर लाल ’समीर’

 

सुनें इसे मेरी आवाज़ में:

 

तुमको सलाम लिखता हूँ……
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सोमवार, जुलाई 29, 2013

जन्मदिन पर गुरुदेव का आशीष!!

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उफ़ क्यों याद दिलाता कोई

उम्र ढल रही धीरे धीरे

गाकर गीत जनम दिन वाले

और बजा कर ढोल मजीरे

लेकिन जग की रीत यही है

औपचारिकी होना ही है

घिसा हुआ वह हैपी हैपी

रोना सबको रोना ही है

लेकिन कुछ ऐसे भी तो हैं

सदा लीक से हट कर चलते

दोपहरी का दीपक बन कर

नौका एक रात की खेते

उनसे ही ले  नाधुर प्रेरणा

मुझको केवल यह कहना है

हर दिन, उगते सूरज जैसे

दीप्तिमान तुमको रहना है

आंधी,बरसातें,झंझाएं

कोई बाधा बन ना पाए

दिवस आज का बरस पूर्ण यह

गीत आपके ही दोहराये.

सादर

शुभकामनाओं सहित

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राकेश खंडेलवाल

http://geetkalash.blogspot.ca/

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सोमवार, जुलाई 01, 2013

पहाड़ के उस पार….इस बार मेरी आवाज़ में

सुनिये:

समीर लाल ’समीर’ की आवाज में उनकी एक कविता

 

मेरे कमरे की खिड़की से दिखता

वो ऊँचा पहाड़

बचपन गुजरा सोचते कि

पहाड़ के उस पार होगा

कैसा एक नया संसार...

होंगे जाने कैसे लोग...

क्या तुमसे होंगे?

क्या मुझसे होंगे?

आज इतने बरसों बाद

पहाड़ के इस पार बैठा

सोचता हूँ उस पार को

जिस पार गुज़रा था मेरा बचपन...

कुछ धुँधली धुँधली सी स्मृति लिए

याद करने की कोशिश में कि

कैसे था वहाँ का संसार..

कैसे थे वो लोग...

क्या तुमसे थे?

क्या मुझसे थे?

इसी द्वन्द में उलझा

उग आता है

एक नया ख्याल

जहन में मेरे

दूर

क्षितिज को छूते आसमान को देख...

कि आसमान के उस पार

जहाँ जाना है हमें एक रोज

कैसा होगा वो नया संसार...

होंगे जाने कैसे वहाँ के लोग...

क्या तुमसे होंगे?

क्या मुझसे होंगे?

पहुँचुंगा जब वहाँ...

कौन जाने कह पाऊँगा

तब वहाँ की बातें..

कुछ ऐसे ही या कि

बनी रहेगी वो तिलस्मि

यूँ ही अनन्त तक

अनन्त को चाह लिए!!

बच रहेंगे अधूरे सपने इस जिन्दगी के

जाने कब तक...जाने कहाँ तक...

तब कहता हूँ..

“कैसे जीना है किसी को ये सिखाना कैसा

वक्त के साथ में हर सोच बदल जाती है”

-समीर लाल ’समीर’

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मंगलवार, जून 18, 2013

हरे सपने...एक कहानी..मेरी आवाज़ में..

उसे भी सपने आते थे. वो भी देखती थी सपने जबकि उसे मनाही थी सपने देखने की.

माँ के पेट के भीतर ही थी तब वो खूब लात चलाती, यह सोचकर कि माँ को लगेगा लड़का है. लेकिन माँ न जाने कैसे जान गई थी कि लड़की ही है. माँ ने उसे तभी हिदायत दे दी थी कि उसे सपने देखने की इजाजत नहीं है. अगर गलती से दिख भी जाये तो उनका जिक्र करने या उन्हें साकार करने की कोशिशों की तो कतई भी इजाजत नहीं. ऐसा सोचना भी एक पाप होगा.

जन्म के साथ साथ यही हिदायतें माँ लगातार दोहराती रही,  लेकिन सपनों पर आजतक किसका जोर चला है जो अब उसका चल जाता… वो देखा करती थी सपने. मगर न जाने क्यों उसके सपनों का रंग होता हमेशा हरा, गहरा हरा....सपने....हाँ..वो देखा करती... हरे सपने. जितना वो सपनों में उतरती वो उतने ही ज्यादा और ज्यादा हरे होते जाते.

समय बीतता रहा. सपने अधिक और अधिक हरे होते चले गये. स्कूल जाती तो सहेलियाँ अपने सपनों के बारे में बताती, गुलाबी और नीले सपनों की बात करतीं. मगर वो चुप ही रहती. बस, सुना करती और मन ही मन आश्चर्य करती कि उसके सपने हमेशा हरे क्यूँ होते हैं? उसे गुलाबी और नीले सपने क्यूँ नहीं आते? उसके सपने रंग बिरंगे क्यूँ नहीं होते...हमेशा..बस..हरे...एकदम गहरे हरे.... हरे सपने... सपनों के बारे में बात करने या बताने की तो उसे सख्त मनाही थी. आज से नहीं, बल्कि तब से जब वो माँ की कोख में थी.

चार बेटों वाले घर की अकेली लड़की, बहन होती तो शायद चुपके से कुछ सपने बाँट लेती उसके साथ, लेकिन वो भी नहीं. माँ से बांटने का तो प्रश्न ही न था. उसने ही तो.. सपने देखने को भी सख्ती से मना कर रखा था. क्या पता वो खुद भी कभी सपने देखती थी या नहीं..मगर बहैसयित माँ....नहीं, उसने यह इज़ाजत उसे कभी नहीं दी...कभी नहीं...तब भी नहीं..जब वो कोख में थी.

बहुत मन करता था उसका...उन हरे सपनों को जागते हुए बांटने का. उन्हें जीने का. उन्हें साकार होता देखने का. यह सब होता तो था मगर उन्हीं हरे सपनों के भीतर... एक हरे सपने के भीतर बंटता... एक और दूसरा हरा सपना. एक हरे सपने के बीच... सपने में ही सच होता.. दूसरा हरा सपना. हरे के भीतर हरा, उस हरे को और गाढ़ा कर जाता. उसे लगता कि वो एक हरे पानी की झील में डूब रही है. एकदम स्थिर झील. कोई हलचल नहीं. जिसकी सीमा रेखा तय है. साहिल तो है ....मगर उसका कोई सहारा नहीं...डूब जाना ही मानों तकदीर हो उसकी...उस हरे पानी की झील में..

कई बार कोशिश की सपनों में दूसरा रंग खोजने की. शायद कभी गुलाबी या फिर नीला रंग दिख जाये. हल्का सा ही सही. जितना खोजती, उतना ज्यादा गहराता जाता हरा रंग और तब हार कर उसने छोड़ दिया था किसी भी और रंग की अपनी तलाश को सपनों में. सपने हरे ही रहे, गहरे हरे. रंग बिरंगे सपनों के सपने उसके भीतर ही कैद रहे.... कभी जुबान तक आने की हिम्मत न जुटा पाये और न कभी वह सोच पाई उन्हें साकार होते देखने की बात को. माँ की हिदायत हमेशा याद रहती.

स्कूल खत्म हुआ. कालेज जाने लगी लेकिन सपने पूर्ववत आते रहे वैसे ही हरे रंग के और दफन होते रहे उसके भीतर...क्योंकि उन्हें मनाही थी बाहर निकलने की, किसी से भी बताये जाने की... या कोई साकार रुप लेने की.

कालेज में एक नया माहौल मिला. नये दोस्त बने. सपनों के बाहर भी एक दुनिया बनी, जो हरी नहीं थी. वह रंग बिरंगी थी. वो उड़ चली उसमें. पहली बार जाना ...कि डूब कर कैसे उड़ा जाता है.. बिना पंखों के. वो भूल गई.. कि जिसे दरवाजा खोलने तक की इजाजत न हो ...उसे बाहर निकलने की अलग से मनाही की जरुरत कहाँ. वो तो स्वतः ही समझ लेने वाली बात है. किन्तु रंगों का आकर्षण ...उसे बहा ले गया.. अपने संग... उसे उड़ा ले गया अपने संग.

फिर वह दिन भी आया ...जब तह दर तह दमित सपनों का दबाव इतना बढ़ा.. कि वो एक ज्वालामुखी के विस्फोट की शक्ल में... लावा बनकर बाहर बह निकला.. सब कुछ जलाता और उस शाम वो अपने रंगों की दुनिया में समा गई ....और भाग निकली..... अपने सपनों से बाहर उग रहे.. एक ऐसे रंग के साथ, जो हरा नहीं था.

उस शाम बस्ती में कहर बरपा. दंगा घिर आया... सुबह के साथ ही दो लाशें बिछी मिली चौराहे पर. एक उसकी खुद की... और एक उसकी जिसके साथ वह भाग निकली थी. नहीं दिखा कहीं वो हरा रंग ....और न ही गुलाबी या नीला. बस दोनों रक्त की लालिमा में सने थे....

वो निकल पड़ी अपनी लाश को छोड़... उस दुनिया में जाने के लिए, जो रंग बिरंगी है. जहाँ सभी रंग सभी के लिए हैं. एक बार पलट कर उसने देखा था अपनी लाश की तरफ.... रक्त की लालिमा में लिपटा हरा रंग.... हरे सपनों की कब्रगाह...उसका खुद का बदन...अब वह जान चुकी थी अपने हरे सपनों का रहस्य.... उसका नाम था... शबाना ...

एक नजर उसने बगल में पड़ी लाश पर भी डाली. रोहित.. अपनी लाश के भीतर अब भी... जिन्दगी तलाश रहा था.

वह मुस्कराई उसकी नादानी पर ...और चल पड़ी अपनी नई दुनिया से अपना रिश्ता जोड़ने... उसे कोई मलाल न था.

आज बहुत खुश थी वो. ...अपने हरे सपनों को.. अपने ही बदन की कब्र में दफना कर...

 

सुनिये मेरी में:

समीर लाल की आवाज में उनकी लिखी कहानी- हरे सपने
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रविवार, जून 02, 2013

देखता हूँ मुड़ कर

इसे पढ़िये और एक नया प्रयोग किया है तो सुनिये यू ट्यूब पर….

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देखता हूँ मुड़ कर

और

सोचता हूं उम्र की इस दहलीज़ तक

पहुँचने के लिए

सीढ़ी दर सीढ़ी का सफर

सीढ़ी कहूँ इन्हें या

कहूँ वक्त के साथ

नित बनते बिगड़ते रिश्तों की

कहानी की इक किताब के पन्ने

या कह दूँ इसे

कुछ पा लेने

और कुछ खो देने की

हिसाब की बही..

जी चाहता है

उन्हीं सीढ़ियों तक लौट

किसी सीढ़ी पर कुछ देर बैठूँ सुकूँ से

तनिक सुस्ताऊँ

कहीं कुछ याद कर मुस्कराऊँ और

कुछ सीढ़ियों को अनदेखा कर

बस यूँ ही लाँघ जाऊँ...

कितने पन्नों को सहेज

छिपा लूँ अपने दिल में

और कुछ पन्नों को

अलग कर दूँ किताब से..

याद आते हैं

कुछ अनायास दर्द देकर खो गये

और कुछ बेवजह निर्लज्ज मुझसे आ जुड़े पल

चलो!! मिटा दूँ इन्हें उस हिसाब की बही से

बस! अक्सर यूँ जी चाहता है मेरा...

मगर ये जिन्दगी!!

कुछ मिटता नहीं

कुछ भूलता नहीं

सब दर्ज रहता है

यहीं कहीं आस पास

उन्हीं सीढ़ियों में दफन

जिन्दा सांस लेता...

कि किताब के पन्ने

आँधी में फड़फड़ाते हों जैसे!!

-समीर लाल ’समीर’

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समीर लाल ’समीर’
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शुक्रवार, मई 17, 2013

मैच फिक्सिंग: सरकार इस्तिफा दे!

इतना बड़ा खुलासा. लाखों करोड़ों रुपयों का लेन देन और साथ में सेक्स स्कैंडल.

protests

श्री शांत के साथ साथ दो और खिलाड़ी. खिलाड़ियों समेत कई अन्यों पर शक की सुई. विपक्ष फिर भी चुप. आप की पार्टी तक चुप. ओए, क्या हो गया है इनको?? इतना चुप तो पहले कभी न थे ये...

हद हो गई आश्चर्य में डालने की. कलमाड़ी तो खुद से खेले भी नहीं थे कॉमन वेल्थ में, तो खेल की दिशा तो खैर क्या मोड़ते या बदलते, उस पर से इस मंहगाई के जमाने में उन्हें मात्र अपनी सूखी सेलरी के अलावा केवल कमीशन का आसरा जीवन बसर करने के लिए. सेलरी के सिवाय, न तो घूस घूस खेलने की हर क्रिकेट मैच की तरह फीस, न ही घूस के खेल में मैन ऑफ द मैच घोषित हो जाने के बावजूद क्रिकेट की तरह इनामों की बारिश, न ही माडलिंग के अलग से रोल और पैसे, न किसी प्रॉडक्ट के ब्राण्ड एम्बेस्डरी से कमाई. मगर उनके पैसे खा जाने पर इतना हल्ला. लोकपाल बिल, जेल और बस, मात्र एक डिमाण्ड- सरकार इस्तिफा दे.

टू जी, हैलीकाप्टर, बोफोर्स, गैंग रेप, बिजली के भाव, सरबजीत की मौत, शाराबी को शहीद का दर्जा, नल में पानी का आभाव, टूटी सड़क, पटवारी की सौ रुपये की घूस- हर बात में सरकार इस्तिफा दे. प्रधान मंत्री नैतिक जिम्मेदारी लें.

मगर आज इतने बड़े स्कैंडल में विपक्ष की भूमिका फिक्स सी सिखती है- जिसमें सारे चैनल जान दिये दे रहे हैं पिछले २४ घंटों से- हर पहले से ज्ञात सट्टेबाजी की जानकारी को सनसनीखेज खुलासा बताते हुए. ड्रामेबाजी में जाने किस किस अज्ञानी को पकड़े स्ट्रिंग ऑपरेशन की शूटिंग में व्यस्त- जहां सटोरीया और पंटर और बुकी की परिभाषा गलत बताई जा रही है. इतना बड़ा बुकी, इनको इन्टरव्यू देते हुए कोड लैग्वेज की जानकारी देते हुए- ५०० करोड़ को कोड में ५०० पेटी बताता है और सारी दुनिया जानती है कि इसे उस कोड भाषा (क्या वाकई में वो कोड है??) में ५०० खोखे कहते हैं – ५०० पेटी ५०० लाख को कहते हैं. मगर हड़बड़ी बताने की ऐसी कि कोई एडिट तो क्या करता इन सब खुलासों को. बस चला दी खबर. बुला ली पैनल और लगे सवाल पर सवाल करने. जैसे ही कोई पेनल का सदस्य कोई लॉजिकल बात करे जो इनके खुलासे को काटती हो या उसे गलत साबित करे तो उसे समय की कमी बता कर तुरंत छोटी सी ब्रेक और फिर ब्रेक से लौट कर आये तो वो बंदा ही गुम. गज़ब!! मानो श्रीशान्त की मकर का तौलिया- इस ओवर में है और देखते देखते अगले ओवर में गुम.

जिस दिल्ली के पुलिस मुखिया को कल तक यही चैनल नकारा घोषित कर विदा कुये जाने की तैयारी करवाये दे रहे थे वही आज इन्हीं के कारण इस खुलासे के बाद हीरो का स्टार दर्जा हासिल किये नये खुलासों के साथ आने की तैयारी में हैं. स्टारडम तो ऐसा ही होता है. आज है- कल नहीं -परसों फिर हासिल. अमिताभ होना आसान नहीं. बहुत कुछ फिक्स करना होता है.

अब तक शक हो रहा है कि विपक्ष भी शामिल है इस मामले में वरना ऐसा कौन सा मामला इस लेवल का रहा है जिसमें सरकार से इस्तिफा न मांगा गया हो.

आई पी एल फिक्स- अंडरवर्ल्ड शामिल- लड़कियों का इस्तेमाल. किसी का कहना कि आई पी एल बना ही सट्टेबाजी के लिए है. आई पी एल सट्टेबाजी की धूरी. एकाएक सट्टेबाजों की देश भर में धरपकड़- जैसे कल तक इस बारे में पुलिस को कुछ मालूम ही नहिम था. धन्यवाद मिडिया, आपने पुलिस को सूचना दे दी वरना उनको कौन बताता और वो कैसे जान पाते.

सिद्धु कहते हैं कि सांसदों के घोटालों के बाद भी अगर संसद पाक साफ है तो फिर आई पी एल अपवित्र कैसे? शायद—न न पक्का ही ये बी जे पी के सांसद हैं. वो ही बी जे पी- जिसे सरकार से इस्तिफा चाहिये क्यूँकि ...क्यूँकि क्या. बस चाहिये.

हालात कुछ ऐसे बन गये हैं कि अब अगर कोइ खिलाड़ी बैटिंग या बॉलिंग के पहले- ईश्वर को याद करने के लिए आँख बंद कर हाथ जोड़ ले..तो लोग अनुमान लगा लेंगे कि इसका मतलब इशारा कर दिया कि ये फिक्स वाली खेल है. सर खुजाये, टावेल हिलाये, रिस्ट बैंड घुमाये, जूते का फीता बांधे, पसीना पोंछे..हो गया इशारा..लग गया सट्टा.

ये तो वही हालात हो गये हैं कि जैसे रिश्तेदारों पर से विश्वास हट गया है बच्चियों को माँ बापों के- बार बार मीडिया पर सुन सुन कर कि ९७% बलात्कारों में घर के लोग शामिल रहते हैं.

जो मानसिक दहशत इन रेप केसों ने आम परिवारों में पैदा की है उससे आई पी एल देखते हुए, कुछ देर को ही सही, वो माँ बाप उस दहशत को भूल खुश हो लेते थे, वो भी अब उनके हिस्से से जाता रहा. क्या देखें जो पहले से फिक्स है- कैसा एक्साईटमेन्ट और कैसा खेल!! बाकी तो टी वी पर मनोरंजन के लिए कुछ आता नहीं....

आज के इस सफर में

हाय! ये कैसी दिशा है,

हाय! ये कैसी हवा है,

जिस तरफ निकलता हूँ

किश्ती डूबती है मेरी ही!!

और वो हँसते हुए कहता है

नौसिखिया निकला ये नाविक भी!!

-समीर लाल ’समीर’

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रविवार, मई 05, 2013

हे नीलकंठ मेरे!!

neelkanth

एक अंगारा उठाया था कर्तव्यों का

जलती हुई जिन्दगी की आग से,

हथेली में रख फोड़ा उसे

फिर बिखेर दिया जमीन पर...

अपनी ही राह में, जिस पर चलना था मुझे

टुकड़े टुकड़े दहकती साँसों के साथ और

जल उठी पूरी धरा इन पैरों के तले...

चलता रहा मैं जुनूनी आवाज़ लगाता

या हुसैन या अली की!!!

ज्यूँ कि उठाया हो ताजिया मर्यादाओं का

पीटता मैं अपनी छाती मगर

तलवे अहसासते उस जलन में गुदगुदी

तेरी नियामतों की,

आँख मुस्कराने के लिए बहा देती

दो बूँद आँसूं..

ले लो तुम उन्हें

चरणामृत समझ

अँजुरी में अपनी

और उतार लो कंठ से

कह उठूँ मैं तुम्हें

हे नीलकंठ मेरे!!

-सोच है इस बार

कि अब ये प्रीत अमर हो जाये मेरी!!

-समीर लाल ’समीर’

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रविवार, अप्रैल 28, 2013

मेरी कविता- नई इबारत!!!

slnew

मेरी कविता

बदल दी है मैने

उन सब बातों के लिए

जो तुमको मान्य न थी...

मेरी कविता

बदल दी है मैने

उन सब बातों के लिए

जो सबको मान्य न थी...

मेरी कविता

बदल दी है मैने

उन सब बातों के लिए

जो समाज को मान्य न थी...

मेरी कविता

बदल दी है मैने

उन सब बातों के लिए

जो मजहब को मान्य न थी...

मेरी कविता

बदल दी है मैंने

उन सब बातों के लिए

जो आलोचकों को मान्य न थी..

मेरी कविता- इन सब मान्यताओं की

निबाह की इबारत बनी

अब मेरी कहाँ रही

वो बदल कर ढल गई है

एक ऐसे नये रुप में जो

काबिल है साहित्य के सर्वश्रेष्ठ प्रकाशन में

प्रकाशित किए जा सकने के लिए

मेरी कविता अब इस नये रुप में

काबिल है साहित्य के सर्वश्रेष्ठ सम्मान से

सम्मानित किए जा सकने के लिए..

-कर दो न प्लीज़, अब और कितना बदलूँ मैं!!

-समीर लाल ’समीर’

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मंगलवार, अप्रैल 23, 2013

मैं वही अँधेरों का आदमी…

ss

 

तुमने छुड़ा कर हाथ मेरा

जो पीछे छोड़ दिये थे अँधेरे

उनसे अभ्यस्त होती मेरी ये आँखे

आज जरा सी टिमटिमटाहट से

उस दीपक की, जो बुझने को है अभी

चौंधिया जाती है...

और मेरा बाँया हाथ....

जिस ओर बैठा कर थमवा दिया था हाथ

उस ब्राह्मण ने मेरा तुम्हारे हाथ में

ये कहते हुए कि हे वामहस्थिनी!!

जगमग होगा भविष्य तेरा

शायद कहा होगा चन्द रुपयों की चाहत में

दक्षिणा स्वरुप कि जी सके वो

और उसका परिवार उस रोज..

हाँ, वही बाँया हाथ आज बढ़ उठता है

बुझाने उस त्य़ँ भी बुझती लौ को दीपक की...

और बुझा करके उसे

खुद जल कर रोशन हो उठता हूँ मैं

जगमग जगमग बुझ जाने को

मगर खुद की रोशनी में अचकचाये

आँख मिचमिचाता मैं

उठा लेता हूँ एक पत्थर

उसी बाँये हाथ से...

फोड़ देने को दर्पण...जो सामने है मेरे

कि खुल सकें ये आँखें..

देखो....यही तो तुम कहती थी कि

कितना अजीब है

यह अँधेरों का जहान...

नहीं बर्दाश्त कर पाता

खुद का रोशन होना भी!!

-मैं फिर खो जाता हूँ अँधेरों में..

मैं हूँ ही अँधेरों का आदमी...

न बर्दाश्त कर पा सकने वाला, खुद के साये को भी!!

-समीर लाल ’समीर’

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मंगलवार, मार्च 05, 2013

चचा का यूँ गुजर जाना....हाय!!

चचा मेरे - नाम मिर्ज़ा असदुल्लाह बेग खान और लोग उन्हें प्यार से गालिब कहते थे- वो १८६९ में क्या निकले कि तड़प कर रह गये उनके चाहने वाले अच्छा पढ़ने को...आज मुझे लगा कि भतीजा हूँ भले ही नाम समीर लाल ’समीर’ है ऊउर लोग प्यार से समीर बुलाते हैं..तो भी दायित्व तो बनता है- कुछ तो फर्ज़ निभाना होगा भतीजा होने का.

बस, इसी बोझ तले-दबे दबे…करहाते..पेश है तीन ठो...पहला शेर तो खैर कालजयी होना ही है...दम साध के दाद उठाना....वरना प्रश्न पढ़ने वाले की समझ पर उठ जायेगा कि समझ नहीं पाया..और वो होगे आप- यह तय जानो!! J

नफरत की इन्तहां का, यह हाल देख ’समीर’

जब भी मिलते हैं, गले लग जाते हैं तपाक से..

 

अब अगला चचा को याद करते:

chachabhatija

वो पूछते हैं हमसे, क्या हाल-ए-दिल सनम

कुछ गमज़दां थे गालिब, कुछ गमज़दां हैं हम...

 

और फिर ...बस, यूँ ही...कुछ आज के समय पर कुछ कह आने को मन कर आया भतीजे का...चचा तो खैर त्रिवेणी (गुलज़ार साहेब की विधा) का शौक रखते नहीं थे..... मगर उससे भतीजे ने कब सीमा आंकी है… Smile

 

यारों कि इल्तज़ा है कि कुछ कहानियाँ अपनी आवाज़ में सुनाऊँ..

हाल पता हैं फिर लोग तड़पेंगे मिलने को, और मैं मिल न पाऊँ

-इतना भी अमिताभ हुआ जाना, अभी हाल तो मुझे मंजूर नहीं.

 

और अब चलते चलते अपने भी मन कुछ कह जाऊँ (एक का तो अधिकार बनता है भतीजा हूँ आखिर)  तो यह लिजिये:

 

मंहगाई के इस दौर में भी, वो ईमानदारी से कमाता है..

हर वक्त खुश रहता है, हँसता है और खिलखिलाता है...

-बुजुर्गों का कहना है, वो कोई सिरफिरा नज़र आता है.

-समीर लाल ’समीर’

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बुधवार, फ़रवरी 27, 2013

जीत: अब लौट भी तुम आओ

एक लघु कथा - जीत:
वह सफेद कार में था...
उसने रफ्तार बढ़ा दी...नीली कार पीछे छूटी..फिर पीली वाली...
एक धुन सी सवार हुई कि सबसे जीत जाना है.
वह रफ्तार बढ़ाता गया. जाने कितनी कारें पीछे छूटती चली गईं.
कुछ देर बाद एक मोड़ पर उसकी कार और उसका शरीर क्षत विक्षत पड़ा मिला.
मृत शरीर रह गया, वो सबसे आगे निकल गया- जाने कहाँ?
ये कैसी जीत?
win
एक कविता- अब लौट भी तुम आओ:
मेरी बाँसुरी की सरगम
वो भी हो गई है मद्धम
कोई जाकर उसे बता दे
कि रुठा हुआ है मौसम....
अब लौट भी तुम आओ
कि ठहरा हुआ है सावन!!
-समीर लाल ’समीर’ Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, फ़रवरी 20, 2013

मतवाली बेखौफ़ गज़ल

बस कोशिश थी कि कुछ कहें मगर जब बात बिगड़नी होती है तो यूँ बिगड़ती है कि साधे नहीं सधती....काफिया उखड़ा बार बार...कोई बात नही....माईने ही उखड़ गया कि जिसे शिद्दत से चाहा उसे ही कुर्बान कर देने को तैयार...खैर, यही तो है मतवाला पन- यही तो दीवानापन...पढ़ ही लिजिये...सुधार, व्याकरण आदि तो खैर चलता रहेगा...सुधार बता देंगे तो कोशिश होगी कि आगे महफिलों में सुधार कर पढ़ी जाये वरना तो आजकल की महफिलें...किस बात पर दाद मिलेगी ...ये तो आप पर निर्भर हैं...शेर पर नहीं.

जबकि लोग लिख रहे हैं कि फलाने गुरु का आशीर्वाद प्राप्त गज़ल...तब ऐसे में बेआशीष गज़ल का लुत्फ उठायें….और कुछ नहीं तो हिम्मत की दाद दे देना Smile

 

face

 

आज इस धूप पर हम भी, जरा अहसान कर देंगे

कि मेहनत का पसीना भी, इसी के नाम कर देंगे.

जरा पलकें झुका ली जो, मेरी महबूब ने थक कर

जहाँ जगने को थी सुबह, वहीं पर शाम कर देंगे

अजब सा हौसला मेरा, अजब सी हसरतें दिल में

जिसे चाहा था शिद्दत से, उसे कुर्बान कर देंगे.

अगर मज़हब बना रोड़ा, प्रेम की राह में अपने

इबारत लेके भजनों की, बुलंद अज़ान कर देंगे.

लिखे ’समीर’ ने अपने, प्यार के गीत में किस्से

ये सारे प्यार के दुश्मन, उसे बदनाम कर देंगे.

-समीर लाल ’समीर’

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रविवार, जनवरी 20, 2013

आहिस्ता आहिस्ता!!

past

सफ़हा दर सफ़हा

लम्हा दर लम्हा

बरस दर बरस

दर्ज होता रहा

किताब में मेरे दिल की

तुम्हारे मेरे साथ की

यादों का सफर

और मैं

अपने दायित्वों का निर्वहन करता

चलता रहा इस जीवन डगर पर

लादे उस किताब को अपनी पुश्त पर...

कि कभी फुरसत में

मुस्करा लूँगा फिर

पढ़ कर उन यादों को

किश्त दर किश्त

आहिस्ता आहिस्ता!!

-समीर लाल ’समीर’

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मंगलवार, दिसंबर 18, 2012

खुशियाँ मनाइये कि मेरा रेप नहीं हुआ!!!

rape

 

पापा,

आप खुशियाँ मनाइये

एक उत्सव सा माहौल सजा

कि आपने मुझे खत्म करवा दिया था

भ्रूण मे ही

मेरी माँ के

वरना शायद आज मैं भी

जूझ रही होती....

जीवन मृत्यु के संधर्ष में...

अपनी अस्मत लुटा

उन घिनौने पिशाचों के

पंजों की चपेट में आ..

रिस रिस बूँद बूँद

रुकती सांस को गिनती

ढूँढती... इक जबाब

जिसे यह देश खोजता है आज

असहाय सा!!!

कितना अज़ब सा प्रश्न चिन्ह है यह!!

कोई जबाब होगा क्या कभी!!

कि निरिह मैं..

छोड़ दूँगी अंतिम सांस अपनी

एक जबाब के तलाश में!!!

और तुम कहते

बेटी तेरा देश पराया

बाबुल को न करियो याद!!

 

-समीर लाल ’समीर’

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सोमवार, नवंबर 19, 2012

अधूरे सपने- अधूरी चाहतें!!

mountains

मेरे कमरे की खिड़की से दिखता

वो ऊँचा पहाड़

बचपन गुजरा सोचते कि

पहाड़ के उस पार होगा

कैसा एक नया संसार...

होंगे जाने कैसे लोग...

क्या तुमसे होंगे?

क्या मुझसे होंगे?

आज इतने बरसों बाद

पहाड़ के इस पार बैठा

सोचता हूँ उस पार को

जिस पार गुज़रा था मेरा बचपन...

कुछ धुँधले चेहरों की स्मृति लिए

याद करने की कोशिश में कि

कैसे थे वो लोग...

क्या तुमसे थे?

क्या मुझसे थे?

तो फिर आज नया ख्याल उग आता है

जहन में मेरे

दूर

क्षितिज को छूते आसमान को देख...

कि आसमान के उस पार

जहाँ जाना है हमें एक रोज

कैसा होगा वो नया संसार...

होंगे जाने कैसे वहाँ के लोग...

क्या तुमसे होंगे?

क्या मुझसे होंगे?

पहुँच जाऊँगा जब वहाँ...

कौन जाने बता पाऊँगा तब यहाँ..

कुछ ऐसे ही या कि

चलती जायेगी वो तिलस्मि

यूँ ही अनन्त तक

अनन्त को चाह लिए!!

बच रहेंगे अधूरे सपने इस जिन्दगी के

जाने कब तक...जाने कहाँ तक...

तभी अपनी एक गज़ल में

एक शेर कहा था मैने

“कैसे जीना है किसी को ये सिखाना कैसा

वक्त के साथ में हर सोच बदल जाती है”

-समीर लाल ’समीर’

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