मंगलवार, जनवरी 27, 2009

मुझसे पहली सी मुहब्बत..

सर्दी की सुबह-कुनकुनी धूप और छत पर निमाड़ की पलंग पर हाथ से तकिया बनाकर लेटा मैं, आकाश ताक रहा हूँ. यकीन जानिये जनाब, यह एक लक्ज़री है जो सबके नसीब में कहाँ. कभी निमाड़ की पलंग पर लेटना मजबूरी रही होगी जैसे कि बिना डाईनिंग टेबल के जमीन पर पीढे पर बैठ कर खाना. आज उसी पीढे पर बैठ कर लालटेन की रोशनी में खाना खाने के लिए ताज ग्रुप के ढाबे पर हजारों के बिल चुकाता व्यक्ति अपने रईस होने का अहसास करता है. कभी लगता है कि हम तो इस बारे में जानते भी हैं. आने वाली पीढ़ी तो निमाड़ और मूंच की खटिया सिर्फ म्यूजियम और (शायद) प्रेमचन्द्र की किताबों में ही देखेगी.

उन्हीं अहसासों के बीच मुझे कहीं दूर बाजार से उठता लाउड स्पीकरीय संगीत का स्वर सुनाई पड़ता है- संप्रदायिक सदभाव की मिसाल सा. पहले हिन्दी भजन- ओम जय जगदीश..फिर कोई पंजाबी गाना और फिर कुछ देर बाद उर्दू-मुझसे पहली सी मुहब्बत, मेरे महबूब न मांग...ओफ्फ!! इसमें कैसी संप्रदायिकता..ऐसा किसने कह दिया कि हिन्दी गाना हिन्दुओं का और उर्दू गाना मुसलमानों का. ये तो भाषाऐं हैं, इनका क्या मजहब? मजहब तो हम इन्सानों का होता है भाषा में तो बस अपनी मिठास होती है. खैर, ठीक है..कोई संप्रदायिकता की बात नहीं. बस, गीत बज रहे थे, हिन्दी, पंजाबी, उर्दू...अब ठीक है. बीच में सड़क से गुजरती मोटर साईकिल, ट्रक, टैम्पो की आवाज. गली से निकलते सब्जीवाले की कर्णभेदी गुहार-आलू ले लो, टमाटर ले लो..हरी बूटट्ट्ट!!!! ताजा है. पीछे पीछे मरियल सी आवाज-रद्दी पेपर वाल्ल्ला!! फिर वही संगीत..मुझसे पहली सी मुहब्बत...

सोचता हूँ किसने लिखा होगा यह गीत..नज़्म. खैर, जिसने भी लिखा हो वह मेरे लिए उतना महत्वपूर्ण और विचारणीय नहीं जितना कि क्यूँ लिखा होगा? क्या लफड़ा फंसा होगा जो उसे इतनी शिद्दत और साहस से कहना पड़ा होगा कि मुझसे पहली सी मुहब्बत... मेरे महबूब न मांग...

अपनी सोचता हूँ..पत्नी का चेहरा याद करता हूँ. दूर नहीं है, नीचे ही गृह कार्य में व्यस्त है. संगीत की आवाज से कहीं ज्यादा नजदीक से बीच बीच में नौकरों को हिदायत देती उसकी आवाज आ जाती है. चेहरा याद आता है तो कल्पना करता हूँ कि यदि मैं ऐसा कह दूँ कि मुझसे पहली सी मुहब्बत...मेरे महबूब न मांग... तब?? उसकी जबाबी भाव भंगिमा की कल्पना मात्र से सिहर उठता हूँ. वो तो प्राण ही निकाल ले पूछ पूछ के कि काहे न मांग. ऐसा क्या हो गया कि न मांगे. तुम तो रोज दर रोज वैसा ही खाना मांगते नहीं अघाते. बल्कि रोज नया ही आईटम जुड़ा मिलता है लिस्ट में..अगर मैं कह दूँ कि मुझसे पहले सा खाना न मांग तो भूखे मरोगे. इस उम्र में कोई पूछेगा भी नहीं. बड़े आये हैं कहने वाले कि मुझसे पहली सी मुहब्बत..मेरे महबूब न मांग...चुप्पे बैठे रहो वरना पानी के भी लाले पड़ जायेंगे. एक गिलास तक तो खुद से पानी लेकर पी नहीं सकते और बड़ी बड़ी बात करने निकले हो..महबूब न मांग....

मुझसे पहली सी मुहब्बत..

मेरा मन करता है कि इस गीत के साहसी रचयीता के बारे में मनन करुँ कि आखिर कैसे और किन परिस्थियों में यह शौर्यपूर्ण कदम उठाया होगा. यह तो तय है कि जिसने भी लिखा हो, वो निश्चित ही अपने जीवन में सावन दर्शन का अर्द्ध शातक तो कम से कम बना ही चुका होगा. वरना, उसके पहले तो कितना भी वीर खिलाड़ी हो, इतना बोल्ड शॉट नहीं लगा सकता.

निश्चित ही उसके पास या तो कुछ स्पष्टीकरण के मुद्दे रहे होंगे कि जब पत्नी ’काहे न मांग’ पूछेगी तो कह सके. मसलन, कि देखो महबूब, आजकल न तो पेड़ के आसपास पहले जैसे मटक कर नाचने के लिए कमर रह गई है और तुम तो देख ही रही हो कि खांसी भी ऐसी आन बैठी है कि मानो अब तन के साथ ही जावेगी तो घूम घूम कर तुम्हारे साथ प्रेम गीत भी फिल्मी स्टाईल में नहीं गा सकते, अतः हे महबूब, मुझसे पहली सी मुहब्बत..मेरे महबूब न मांग...बल्कि हो सके तो कमर में जरा मूव मल दो, कल से बड़ा दर्द है.

या फिर शादी के पहले का वाकया याद दिलाता, जब उसकी गली के मोड़ पर उसके भाईयों ने अपने दोस्तों के साथ मिल कर घेर लिया था और वो साईकिल छोड़ कर सरपट दौड़ता हुआ एक किलोमीटर दूर अपने मौहल्ले में आकर ही रुका था तब जाकर हाथ पैर सलामत रह पाये थे. आज न तो दौड़ने का वो रियाज रहा और न ही दौड़ने लायक घुटने और तिस पर से सामने झूलता पेट-कैसे दौड़ पायेगा. हाथ पैर टूटें मारा पीटी में उससे बेहतर है कि ओ मेरे महबूब.. मुझसे पहली सी मुहब्बत..मेरे महबूब न मांग...तुमसे क्या छिपा है.

या उस शाम की बात याद दिलाये जब शादी के पहले उसके कमरे में घुसा था और सीढ़ी पर से आते उसके पिताजी की कदमों की आहट से उसने ही सहम कर उसे पलंग के नीचे छिपा दिया था. अब आजकल वैसे पलंग कहाँ..आजकल तो पलंगे के नीचे झाडू भर जाने की जगह रहती है. और न ही शरीर का विस्तार अलमारी में छिपने की इजाजत देता है तो पिता जी के हाथों पकड़ा जाना तो तय ही मानो..बचना अब संभव नहीं. अतः ऐ महबूब.. मुझसे पहली सी मुहब्बत..मेरे महबूब न मांग...कुछ तो रहम खाओ.

और न जाने कितने ही कारण इक्कठे किए होंगे ताकि सनद रहें और वक्त पर काम आयें और तब जाकर ऐसा साहसिक गीत लिखा होगा- मुझसे पहली सी मुहब्बत..मेरे महबूब न मांग...

हममें वो साहस नहीं. हमें इस गीत से कोई शिक्षा नहीं चाहिये. हम तो ऐसा न लिख पायेंगे. अरे, लिखना तो दूर, गुनगुना भी न पायेंगे. हमें हमारे हाल पर छोड़ दो. अरे, ये क्या, लाउड स्पीकर भी यही कहने लगा...मुझे तुमसे कुछ भी न चाहिये..मुझे मेरे हाल पे छोड़ दो...मुझे मेरे हाल...!!

जाने कब नींद लग गई. टेबल पर खाना लगा है...आ जाओ..क्या दिन भर सोते ही रहोगे. पत्नी की आवाज सुनाई दे रही है. Indli - Hindi News, Blogs, Links

सोमवार, जनवरी 19, 2009

पीले पन्नों पर दर्ज हरे हर्फ : एक बुजुर्ग की डायरी

तब समय ही नहीं होता था या मैं समय निकालता नहीं था.

मैं अपने पद प्रतिष्ठा के नशे में चूर, अपने मातहतों से तारीफ सुनता और अपने अधिकारियों से तारीफ पाने की लालसा में १० से १२ घंटे दफ्तर में गुजार लेने के बाद भी फाईलों से लदा घर पहुँचता और रात देर गये तक उनमें खोया रहता. याद है मुझे कि जब मैं सोने की तैयारी करता, तब तक घर में तो क्या शायद पूरे मोहल्ले में ही सब लोग सो चुके होते.

देर सुबह जब नींद खुलती तो बच्चे स्कूल जा चुके होते. पत्नी घरेलु कार्यों में और मेरे ऑफिस जाने के लिए तैयारियों में जुटी होती. मैं उठते ही चाय की प्याली के साथ अखबार में खो जाता और फिर फटाफट नहा धोकर नाश्ता करके दफ्तर के लिए रवाना. लंच भी चपरासी भेज कर दफ्तर ही में ही मंगवा लेता. न कभी रविवार देखा, न कोई छुट्टी. बस, काम काम काम और आगे बढ़ते जाने का अरमान.

मैं अपनी इस मुहिम में काफी हद तक सफल भी रहा और एक सम्मानीय ओहदे तक आकर रिटायर हुआ.

पता ही नहीं चला या बेहतर यह कहना होगा ध्यान ही नहीं दिया कि बच्चे कैसे पढ लिख गये और कब देखते देखते स्कूल पास कर कॉलेज मे पहुँच गये. कभी कभार बात चीत हो जाती. साधारणतः ऐसे मुद्दे कि इन्जिनियरिंग करना है कि डॉक्टरी. मगर बहुत सूक्ष्म चर्चा. सब यंत्रवत होता गया मेरी नजरों में. मगर इसके पीछे पत्नी का क्या योगदान रहा, क्या त्याग रहा, कितनी मेहनत रही-वह न तो मैने उस वक्त देखी और न जानने का प्रयास किया. मेरे लिए मेरा केरियर और मेरा दफ्तर. मेरी पूछ परख, मेरा जयकारा-बस, यही मानो मेरी दुनिया थी.

चिन्तन: बेबसी

ऐसा नहीं कि बच्चों और पत्नी को बिल्कुल भी समय नहीं दिया किन्तु जो दिया वह आपेक्षित से बहुत थोड़ा था. पढ़ाई की किसी भी समस्या के लिए उन्हें ट्य़ूटर के पास भेजने से लेकर अन्य जरुरतों के लिए ड्राइवर और पत्नी के साथ भेज अपने कर्तव्यों की इतिश्री मान ली. बच्चे अपने पिता से समय चाहते थे और पत्नी अपने पति से. वो बैठकर गप्प करना चाहते थे. मेरे किस्से सुनना चाहते थे जो वो दूसरों से मेरी तारीफों में सुना करते थे और मेरे पास समय न था.

अपनी उपलब्धियों के तहत एक घर बनवा दिया था. जितने रहने वाले घर में, उससे भी एक अधिक कमरा मेहमानों के वास्ते. कुछ उपर और कुछ नीचे. तब सोचता था कि एक कमरा और बनवा लूँ जिसमें मेरा स्टडी रुम हो. बस मैं, मेरी फाईलें, किताबें और अखबार. कोई व्यवधान न आये.

सरकारी गाड़ी के अलावा एक कार खुद की भी. कुछ बैंक में पैसा और यह सब जमा करते करते एक दिन पाया कि सारे कमरे अब खाली रहते हैं. बच्चे अपनी अपनी दिशा में चले गये हैं नौकरियों पर. बिटिया अपने पति संग और उस बड़े घर के एक कमरे में रिटायर्ड मैं और मेरे साथ मेरी पत्नी.

अभी रिटायर्ड हुए ज्यादा दिन न बीते थे. आदतें वही पुरानी मगर अब कोई काम न था तो सारा सारा दिन अखबार, टीवी और किताबें और शाम को मित्रों और रिश्तेदारों के यहाँ मेल मुलाकात. यह मेल मुलाकात पत्नी के साथ ज्यादा समय बीतने का बहाना भी बन गया वरना तो उसके लिए मेरे पास अब भी सीमित वक्त ही था.

हमारा अपना कमरा छोड़ कर अब सारे कमरे मेहमानों के हो गये और आने वाला कोई नहीं. बच्चे यदा कदा अपनी सहूलियत और छुट्टियों में मय परिवार आते. कुछ दिन मेहमानों से रहते और निकल जाते. एक अघोषित सा कमरों का आवंटन भी था कि ये बड़े का, ये छोटे का और उसी अनुरुप इनके सामान भी उसमें रहते.

कभी कभी बच्चों के पास जाना भी होता किन्तु पहला दिन छोड़ ये पत्नी के साथ अधिक समय बिताना ही साबित होता. बच्चे अपनी दिनचर्या में व्यस्त होते.

जल्द ही हम अपने घरौंदे में वापस आ जाते और मैं अखबार किताबों में एवं पत्नी घर काज अड़ोस पड़ोस रिश्ते नातों में डूब जाती.

एक दिन पत्नी न आँखें मींच ली कभी न खोलने को. वो नहीं रही. पहली बार उसका साथ पाने की प्रबल अभिलाषा जागी. सब इक्कठे हुए थे और देखते देखते वापस हो लिए. उस पूरे घर में बच रहा तो अकेला मैं. बच्चे साथ ले जाना चाहते थे मगर मैं ही कुछ समय खुद के लिए चाहता था सो न गया.

खाली घर. ढ़ेरों कमरे. माँ न रही तो उनका सामान कौन देखेगा, ये सोच बच्चे अपने अपने कमरों में ताला लगा गये थे. हालांकि चाबी मेरे पास ही थी पर न जाने क्यूँ कभी हिम्मत न जुटा पाया कि खोल कर देखूँ क्या है उन कमरों में. क्या पत्नी मेरा आत्म विश्वास, मेरे मुखिया होने का अहसास, मेरी ताकत, मेरा सम्मान सब अपने साथ ले गई थी या कि वो ही मेरी यह सब थी. आज तक इस प्रश्न का उत्तर मैं नहीं पा पाता.

मैं अब भी कभी बच्चों के पास जाता हूँ, पहले से ज्यादा ख्याल रखते हैं पर मुझे वहाँ बस एक मेहमान होने का अहसास होता है. न जाने क्यूँ, मैं कभी भी उनके घर को, उनके सामानों को उस अधिकार से नहीं देख पाया जिस तरह से उन्हों ने मेरे घर को या मेरे सामानों को देखा था या इस्तेमाल किया था. क्या यह एक दिशाई धारा है? क्या उन्हें भी भविष्य में अपने बच्चों के साथ यही अहसास होगा या पहले मेरे गई पुश्तों ने भी यह अहसासा होगा.

बच्चे घर पर आते भी हैं. कुछ देर बातें भी होती हैं. फिर वो अपने पुराने दोस्तों में मशगूल या अपने कमरे में बंद, कुछ फुसफुसाते हुए से अपनी पत्नियों के साथ. खाने के टेबल या शाम को साथ बैठ भी जाते हैं. मगर बहुत सीमित समय के लिए. उनके प्रवास के दौरान, खाना क्या बनना है आदि उनकी पसंद पर ही होता है और न जाने क्यूँ, कभी मुझे इन्तजार भी लग जाता है कि ये जायें तो मैं अपनी पसंद से कुछ बनवाऊँ.

मैं उनसे बात करना चाहता हूँ. अब मेरे पास समय ही समय है. मेरे पास ढ़ेरों किस्से हैं. कितने अनुभवों से मैं गुजरा हूँ. मैने क्या गलत किया और क्या सही-सब जान चुका हूँ मगर अब उनके पास सुनने को समय नहीं. मेरे किस्से उन्हें बोर करते हैं. हैं भी आऊट ऑफ डेट तो रोचक कैसे लगें. बस, मजबूरीवश अगर कुछ सुन लें तो बहुत हुआ वो भी बिना चेहरे पर कोई भाव लाए ताकि मैं अपना किस्सा जल्दी बन्द करुँ और वो अपने दोस्तों, पत्नी और बच्चों के बीच समय बितायें. अनुभव तो है इसलिए मैं समझ जाता हूँ. कई बार भूल जाने का बहाना कर बड़ा किस्सा बीच में बंद किया है मैने उनके चेहरे के भाव को समझते हुए.

आज खाली कमरे हैं. चाहूँ जहाँ स्टडी बना लूँ, कोई व्यवधान डालने वाला भी नहीं पर न जाने क्यूँ, अब पढ़ने लिखने से भी जी उचाट हो गया है. आखिरी नॉवेल दो साल पहले पढ़ी थी. इधर तो अखबार भी जैसा आता है, वैसा ही लिपटा दो तीन महिने में रद्दी में बिक जाता है. सोचता हूँ क्या करुँगा जानकर कि बाहर की दुनिया के क्या रंग हैं जब मेरी खुद की दुनिया बेरंग है.

आज भी इस कथा को यहीं रोक देता हूँ-आभास हो रहा है कि आपके चेहरे पर इसे पढ़ते वो ही भाव हैं जो मेरे बच्चों के चेहरे पर अपने किस्से सुनाते हुए मैं देखता हूँ.

बाकी पन्ने फिर कभी...या अभी के लिए ये मान लें कि मैं उन्हें भूल गया हूँ.

बस इतना जानता हूँ कि भले ही वक्त के थपेड़े खाकर मेरी डायरी के ये पन्ने पीले पड़ जायेंगे लेकिन इसमे दर्ज एक एक हर्फ हरदम हरा रहेगा- शायद किसी और बुजुर्ग की व्यथा कथा कहता. Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, जनवरी 14, 2009

एक जिज्ञासा का निराकरण!!

एक किस्सा याद आता है जब त्रिलोकी से उसके बाप ने कहा कि बेटा जा, पंसारी के यहाँ से मेरे लिए सौदा ला दे. त्रिलोकी घर से निकल ही रहा था कि सामने से चाचा आता दिख गया. त्रिलोकी को बाजार जाता देख कर चाचा बोले कि बेटा, पहली गली से मत जाना, बहुत गोबर पड़ा है. देख मेरे पूरे जूते खराब हो गये. आगे वाली गली से चला जा.

त्रिलोकी हामी भर के चल पड़ा. मगर बड़ों की बात माने तब न.

वो पहली गली से ही गया. जैसे ही गली में घुसा, सामने ही गोबर जैसा कुछ नजर आ गया. वो उससे बच कर आगे निकल गया. जरा दूर पर उसे ख्याल आया कि क्या पता जिसे चाचा ने गोबर समझा वो गोबर था भी कि नहीं. वो लौट कर उसके पास बैठ कर नजदीक से देखने लगा कि हाँ, है तो गोबर ही. फिर उठ कर चल पड़ा. मगर मन नहीं माना, क्या पता देखने में जो गोबर लग रहा है शायद गोबर न हो. वो फिर लौटा और उसे छूकर देखा. उसे लगभग भरोसा हो गया कि गोबर ही है तो वह चल पड़ा.

मगर हाय रे मन, फिर वही संशय अतः लौट कर उसने उसे हाथ में थोड़ा सा उठाया और महक कर देखा. अब तो उसे विश्वास सा हो गया कि गोबर ही है. फिर चला बाजार मगर क्या कहें. एक बार फिर फाइनली वापस, उठाया और चख कर देखा फिर गंदा सा मूँह बनाते हुए खुद से ही कहा कि चाचा ठीक कह रहे थे. अच्छा हुआ मैं बच कर निकला वरना जूते खामखां खराब हो जाते. इसी सोच में खुद को शाबाशी देते हुए वो खुशी खुशी आगे बढ़ा और मारे अपनी होशियारी पर प्रफुल्लित होते हुए अगले गोबर के ढेर पर नजर न डाल पाया और जूते उसमें सन कर खराब हो गये.

कौन मानता है बड़े बुजुर्गों की सलाह. उनके अनुभव का लाभ उठाना तो दूर, सुनना तक सदियों से कोई पसंद नहीं करता. सब अपने आप में होशियार फन्ने खां हैं जब तक अपना जूता सान नहीं लेंगे मानेंगे थोड़े ही न बिना चखे!!

कोई आसान काम नहीं होता जब आप अपने लिए संकट को खुद तलाशें. विपदा का खुद बुलायें. (पत्नी से सुरक्षा कवच: ये हम नहीं कह रहे, बल्कि इतिहास में लिखा है. हमारा अनुभव इससे इतर है) :) अपनी आजादी को दांव पर लगा दें. हँसते मुस्कराते नाचते गाते जिन्दगी का रुप बदल देने वाले क्षण का आत्मियता के साथ स्वागत करें. ठीक वैसी ही बात हुई कि कोई जानकार बता रहा हो कि भागो, सुनामी की लहर उठ रही है और आप हैं कि समुन्दर की दिशा में ही मुस्कराते और नाचते चल पड़े. फिर तो आप वीर ही कहलाये और आपका ईश्वर ही मालिक है.

जिस मौज मस्ती से अपने मन के मालिक हुए फिरते थे, उसे एक पल में तिलांजलि दे दें. फक्कड़ी का मस्त जीवन त्याग दायित्वों की गंभीरता का लबादा ओढ़ लें.

तिस पर से इस बात पर लोगों को निमंत्रित करें, भोज का आयोजन करें और खुशी खुशी अपने मैं को तुम ही तुम हो में बदल दें.

मित्र, इसीलिए हर शादी में बैण्ड पर यह घुन बजायी जाती है कि

’ये देश है वीर जवानों का
अलबेलों का, मस्तानों का...

इस देश के यारों क्या कहनें...

ऊं ऊं ऊं ऊं...टैं ए ए टैं ए ए....

हो हो....

इस देश का.........

यारों क्या कहना.....’


सारे बुजुर्ग नाचते हैं कि चलो, हमारे समझाये तो नहीं समझे. अब मजा चखो, हमारी बात न मानने का. अब समझ में आयेगी बच्चू कि बुजुर्गों के अनुभव को दो कौड़ी का समझने का अंजाम क्या होता है.

जवान नव शादी शुदा भी नाचते है कि हम फंस ही चुके हैं लो तुम भी अटको.

गैर शादी शुदा इसलिए नाचते हैं कि उन्हें लगता है यह उत्सव का विषय है (गैर अनुभवी होते हैं न!!)

बिना वीर हुए और साथ ही जवान हुए (ऐसी बेवकूफी करने के लिए ) क्या ये संभव है कि ऐसा करे? मगर फिर भी यह हमेशा होता रहा है..एक सतत प्रक्रिया है. जवान शहीद होते जाते हैं और बैण्ड वाले बजाते रहते हैं:

’ये देश है वीर जवानों का
अलबेलों का, मस्तानों का...

इस देश के यारों क्या कहनें...

ऊं ऊं ऊं ऊं...टैं ए ए टैं ए ए....


आशा है आपकी जिज्ञासा कि ’हर शादी में यह विशेष धुन क्यूँ बजाई जाती है” का निराकरण हो गया होगा. ( यह जिज्ञासा अभिषेक ओझा जी ने फुरसतिया जी की पोस्ट पर व्यक्त की थी और फुरसतिया जी को विवरण लिखता व्यस्त देख हम बीड़ा उठाय लिये सुलझाने का)

चलते चलते:

सूक्ति:

शादी वो लड्डू है जो खाये वो पछताये, जो न खाये वो पछताये.... (पुनः किसी और ने कही है, हम नहीं कह रहे)

अतः अविवाहित वीरों, हमारे समझाने से अपना शहीदाना तेवर न छोड़ना और बैण्ड वालों, तुम जारी रहो...

’ये देश है वीर जवानों का
अलबेलों का, मस्तानों का...

इस देश के यारों क्या कहनें...

ऊं ऊं ऊं ऊं...टैं ए ए टैं ए ए....

हम नाच रहे हैं.


ये देखो व्यथा: (खूँटे से टाईप)

एक रात ३ बजे पति के रोने की आवाज सुनकर पत्नी की नींद खुली तो देखा, पति ड्राइंगरुम में बैठा रो रहा है. पत्नी ने कारण पूछा तो कहने लगा कि तुम्हें याद है आज से २० साल पहले, जब हमारी शादी नहीं हुई थी, तुम्हारे पिता ने हमें प्यार करते पकड़ लिया था और कहा था कि या तो मेरी लड़की से विवाह करो या मैं अपने आपको गोली मार लूँगा और हत्या का इल्जाम तुम पर आयेगा. तुमको आजीवन कारावास होगा. तो मैने तुमसे शादी कर ली थी. पत्नी ने कहाः हाँ याद है मगर इसमें रोने की क्या बात है? पति बोला: सोच रहा हूँ, आज मैं छूट गया होता जेल से. Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, जनवरी 11, 2009

फिर सजी एक और महफिल..

जब कभी कोई कदम उठाने जा रहे हो तो बस एक बार, हाँ हाँ सिर्फ एक बार उसका तुम्हारे भविष्य पर अंजाम सोच लो-बस, तुम देखना कि तुम अपने आचरण में कितना बड़ा बदलाव पाओगे. ऐसा गुरु जी कह गये थे. कल एक जेबकतरा मेरी जेब काट रहा था. मैने उसे पकड़ लिया और उसे मारने के लिए हाथ उठाया ही था कि यह सूत्र याद हो आया. विचार आया कि कहीं ये जेबकतरा कल को मंत्री हो गया तब? जेबकतरों का स्वभाविक रुपांतरण वाया चोर, गुण्डा होकर मंत्री ही तो है. बस, हाथ नीचे आ गया. कितना बड़ा परिवर्तन पाया मैने अपने आचरण में वरना तो मेरा हाथ देश के इस भावी कर्णधार पर उठ ही गया था.

खैर, जाने दो. इन सब बातों में क्या रखा है?

मूड दुरुस्त करने बैठक जमीं फिर बवाल के साथ. खूब सुनी और खूब सुनाई गई. देर रात महफिल सजती रही और फिर बैठे हम और बवाल कुछ शेरो शायरी के दौर पर और जो गज़ल निकल कर आई, वो ही पेश कर देते हैं. जरा गहरा उतरियेगा तो मजा आयेगा.

लाल संग बवाल की तस्वीर:




गर दुआ उनकी है, तो असर देखिए
रह गई हो कहीं कुछ, कसर देखिए

इसमें उसमें सभी में नज़र आएँगे
आप अपनी यहाँ पर बसर देखिए

भूल सा ही गया है, वो इस गाँव को
देगा कैसी सज़ा, अब शहर देखिए

आबे-ज़म-ज़म* को पीकर मेरे सामने
मुझपे उगला है, कितना ज़हर देखिए

काटे कटती नहीं थी कभी रात वो
हो रही है उधर, इक सहर देखिए

ये तमाशा सही, फिर भी रखने को दिल,
मेरे दर पे ज़रा सा, ठहर देखिए

कह गया हूँ ग़ज़ल, मैं ज़रा झौंक में
गिरती-पड़ती, सँभलती बहर देखिए

--लाल एण्ड बवाल

* आबे-ज़म-ज़म=मक्का के पवित्र कुँऐं का जल Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, जनवरी 08, 2009

हमारा स-सुर होना फ्रॉम बेसुर

भाई विष्णु बैरागी ने एक अति स्वभाविक प्रश्न उछाला:

आपने सूचित किया कि अब आप 'स-सुर' बन गए। अब तक क्‍या थे?

विचारणीय बात है कि इतना बड़ा वाकिया हो गया और कोई स्पष्टीकरण नहीं. विगत २५ दिसम्बर को मेरे ज्येष्ट पुत्र चि. अनुपम का विवाह सौ. प्रगति के साथ जबलपुर में परिजनों एवं देश विदेश से आये ईष्टमित्रों की उपस्थिति में सानन्द सम्पन्न हुआ.

हम स-सुर हो लिए. वैसे इसके पूर्व भी काफी सुर में तो थे ही याने कि बेसुरे तो कभी न थे ( चाहो तो अरविन्द जी से पूछ लो जिनके कान मेरे गाये गीत सुनने को बेताब रहते हैं :) और फुरसतिया जी की बात पर तो बिल्कुल कान मत दिजिये कि वो हम से ज्यादा सुर में हैं, ये उनका गुमान भर है अन्य बातों के समान :)) और असुर भी कभी नहीं रहे. इस जगत में अब तक तो कोई ऐसी हरकत तो पकड़ में आई नहीं है (मय साक्ष्य) जिससे की असुर घोषित किया जा सके तो स-सुर ही कहलाये. अत: यह कह पाना बड़ा मुश्किल है कि अब तक क्या थे मगर अब ससुर का ऑफिशियल दर्जा प्राप्त हो गया है, अतः घोषित किया गया.

ये हैं समधि समधन-बहु बेटा

इस शुभ अवसर पर ब्लॉगजगत से अनूप शुक्ला जी ’फुरसतिया’ और रचना बजाज जी (सपरिवार दीपक जी और बिटिया निशि के साथ) ने कानपुर एवं नासिक से पधार कर अनुग्रहित किया. अरुण अरोरा, मैथली जी , पंकज बैगाणी , संजय बैंगाणी , पल्लवी त्रिवेदी , अजित वडनेकर , गुरु पंकज सुबीर जी भी लगभग आ ही से गये थे मगर अंतिम समय में प्रोग्राम अलग अलग विविध कारणों से केन्सिल हो गया. उनके इन्तजार में और उनके आने के समाचार ने ही काफी उत्साह और उर्जा दी पूरे कार्यक्रम में. दीगर बात है कि वो आ न पाये. वैसे तो मित्रों से प्राप्त न आ पाने के कारण इतने सॉलिड और अकाट्य थे कि कई बार लगा कि मैं ही किसी तरह उन तक चला जाऊँ बेचारे कितनी मुसीबत में हैं. :) न आ पाने के ५१ सॉलिड कारणों पर फुरसतिया जी से विस्तार में चर्चा हुई और इन कारणों का एक संग्रह बनाकर जनहित में प्रकाशित करने का निर्णय लिया जा चुका है. शीघ्र ही फुरसतिया जी के संग मेरा यह संयुक्त प्रयास आपके सामने लाया जायेगा.

From फुरसतिया, दीपक बजाज, समीर लाल ’उड़न तश्तरी


अनेकों अनेक ब्लॉग मित्रों के ईमेल संदेशे, टिप्पणी, फोन, एस एम एस भी शुभकामनाओं के साथ प्राप्त हुए. मित्र ताऊ हरियाणवी ने मेरी ब्लॉगजगत में अनुपस्थिति को स्पष्ट करते हुए पोस्ट लिखी( शायद मैं स्वयं ही स्वयं की अनुपस्थिति के बारे में लिख गया-बशक मित्र विवेक सिंह ) और उस पर भी ढ़ेरों शुभकामनाऐं प्राप्त हुई.

जबलपुर ब्लॉग परिवार से भाई महेन्द्र मिश्रा प्रारंभ से ही मेरी भागादौड़ी में भागीदार बने. निमंत्रण पत्र बाँटने से लेकर हर कार्य में सतत योगदान के लिए लगातार उनकी भागीदारी ने मुझे अभिभूत किया. उनके इस योगदान के लिए बारंबार नमन.

फिर जबलपुर ब्लॉग परिवार से ही मेरे भाई बवाल , मेरे जबलपुर पहुँचने के साथ साथ आज दिन तक हर वक्त साथ बनाये हुए हैं. विवाह समारोह की पूर्व संध्या पर उन्होंने मेरे सभी आमंत्रितों के लिए आयोजित कार्यक्रम में कव्वाली का ऐसा समा बाँधा कि हर व्यक्ति झूम उठा. उसी कार्यक्रम के दौरान रचना बजाज जी ने भी अपनी रचनाओं से सब को मंत्रमुग्ध कर लिया. हालात ये हो गये कि इन दो को सुनते लोगों को हम अपनी सुनाई ही नहीं पाये और कार्यक्रम खतम हो गया. रिश्तेदारों से खचाखच भरे घर में चार दिन से बाथरुम में बंद हो होकर रियाज किये थे, सब धरा रह गया. खैर बदला फिर कभी लिया जायेगा, अभी नोट करके रख लिया है.

जबलपुर ब्लॉग परिवार से भाई डॉ विजय तिवारी ’किसलय’ , विवेक रंजन श्रीवास्तव जी , पंकज स्वामी ’गुलुश’ जी भी पधारे. भाई गिरीश बिल्लोरे , भाई राजेश कुमार दुबे ’डुबे जी’ और आशीष पाठक जी किंचित कारणों से पहुँच नहीं पाये.

अंत करने से पहले यह कहना चाहूँगा कि एक फौजी ही इस देश का हित समझता है और जब देश का समझेगा, तभी न देशवासियों को समझेगा सो हमारा समझ गया, कितनी सुन्दर बात कही है प्रियश्रेष्ट गौतम राजरिशी ने:

"पुत्रवधु तो कितनी खुशनसीब हैं कि ससुर के साथ एक कवि मुफ़्त मिला है"

वाह!!! और पुत्रवधु की तरफ से आपको आह्ह!!! :)

आज आप सभी की शुभकामनाओं और बधाई संदेशों के लिए आभार प्रकट करता हूँ. ऐसा ही स्नेह हमेशा मिलता रहे, यही ईश्वर से प्रार्थना है.

इस पावन मौके पर मेरे प्रिय गीत सम्राट श्री राकेश खण्डेलवाल जी ने नीचे पेश मंगल-गीत रच कर भेजा, जिसे परिजनों और मित्रों ने बहुत सराहा:


पुष्प सुगन्धित मलय समीरं महकाये घर द्वारा
प्रगति और अनुपम हो मंगल, पावन प्रणय तुम्हारा

लगा गूँजने पुण्य साधना के मंत्रों का मृदु स्वर
सुषमा करे कन्हैया की पथ को प्रशस्त मह मह कर
शिखा दीप की ललक ललक कर, फिर फिर शगुन बताये
महिमा आज तुम्हारी राहों को आकर महकाये

शहनाई का उठा गूँजकर स्वर ये आज पुकारा
प्रगति पंथ पर रहे अग्रसर, अनुपम प्रणय तुम्हारा

मधुपूरित सपने सुशील मन, अनुभव नया बातायें
नभ पर आ राजेन्द्र मुदित मन सुरभित सुमन लुटायें
लिये सुनीति, विभा बिखराते हैं राकेश गगन पर
महामहिम के स्वप्न हो रहे शिल्पित आज निरन्तर

वीणा के सितार के संग में गाता है इकतारा
पावन मंगलमय हो अनुपम, परिणय प्रगति तुम्हारा

जो समवेत उठे स्वर वह हो गीता जैसा पावन
मुट्ठी में सिमटे आकर के मल्हारें ले सावन
सहराही जीवन के सारे सपने शिल्पित कर दे
और ईश तुमको बिन मांगे, वांछित हर इक वर दे

दिशा दिशा से दिक्पालों ने आज यही उच्चारा
प्रगति और अनुपम मंगल हो पावन प्रणय तुम्हारा Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, जनवरी 04, 2009

डूबती आँखों के चमकते सपने-बांधवगढ़ यात्रा

दो इनोवा वैनों में भरकर पूरा परिवार बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान के लिए रवाना हुआ. दोनों गाड़ी, पूरी पैक, शीशे बंद, मनपसंद का संगीत बजाते, हल्का एसी चालू, परिवारिक गप्प सटाकों और हंसी हल्ले में दौड़ रहीं थीं मंजिल की ओर. न कोई धूल, बेहतर सड़क बन जाने से न कोई उछलन. मात्र ३.३० घंटे से कम समय में हम २०० किमी का फासला तय कर बांधवगढ़ पहुँच गये.

पहले से बुक एक अति सुन्दर रिसोर्ट हमारा इन्तजार कर रहा था. चारों तरफ हरियाली, सुन्दरता से सजे हुये दूर दूर कॉटेज, करीने से लगाया गया बगीचा और बीचों बीच शाम को बॉन फायर करने के लिये बड़ा सा सीमेन्टेड पंडाल.

कमरे के भीतर की साज सजावट और सफाई काफी मनभावन थी. कमरा बंद करने के बाद मैं सोचने लगा कि बंद कमरे में क्या भारत और क्या अमेरीका? पिछले कुछ माह पहले जब लास वेगस में था, तब भी कमरे के भीतर तो यही अहसास थे. बल्कि यहीं ज्यादा आराम और लक्ज़री है कि घंटी बजाओ और बंदा चाय नाश्ता लिए हाजिर. वहाँ तो कॉफी/चाय की मशीन कमरे में लगी थी, खुद बनाओ और तब पिओ.

कुछ देर आराम, फिर सब अपने अपने कमरे से बाहर खुले हरे मैदान में. फुटबाल खेली गई. बच्चे, बड़े सभी बराबरी से अपने उम्दा प्रदर्शन की फिराक में. थक कर सब तैयार हुए और हम चल दिये नजदीक में ही बने बांधवगढ़ म्यूजियम को देखने. छोटा सा म्यूजियम-अब म्यूजियम तो क्या-फोटो और पार्क एवं किले के मिनियेचर मॉडल की प्रदर्शनी ही कहें तो बेहतर कि कल क्या देखेंगे. अच्छा लगा एक घंटा वहाँ गुजारना. पुराने राजे महाराजाओं ने कितने टाईगर मार गिराये, उनका लेखाजोखा भी प्रिंट करके टांगा गया था सो उनको समय की मांग के अनुरुप कोस भी लिया कि हाय, कैसे थे ये? इत्ते निर्दयी. उस कमरे में ऐसा कोसना, एक प्रकार से बोर्ड पढ़ लेने की पावती छोड़ने जैसा लगा. जो पढ़ता था वो कुछ ऐसे ही पावती छोड़ रहा था.

बहरहाल, वहाँ से वापस लौट बॉन फायर के आसपास सारा इन्तजाम पाया गया. फायर को घेरे कुर्सियाँ, कायदे से लगी टेबल.
देर तक महफिल जमीं. जाम छलके, सुर उछले. मौका था तो जी भर के परिवार वालों को अपनी रचनाऐं झिलवाईं. उनकी मजबूरी थी तो जितना बन पड़ा, उन्होंनें वाहवाही का मंजीरा बजाया और नई आई पुत्र वधु ने भी वहाँ जान लिया कि ओह!! तो ऐसे होते हैं कवि और वो भी उसके ससुर. सोचती होगी..ये कहाँ आ गये हम? :) मगर क्या करे, झेलना तो पड़ा ही.

ये रहे टाईगर माहराज

खैर, तय पाया गया कि अगले दिन सुबह ६.१५ बजे सब तैयार मिलेंगे और ६.३० बजे जंगल सफारी की जीपें हमें वन भ्रमण पर ले जायेंगी.

सुबह की कड़कड़ाती ठंड, खुली जीपें, रिसोर्ट वालों द्वारा प्रायोजित कंबल भी मानो सरसराती हवा में पिघले जा रहे हों. कंबल से शरीर गरम हो या शरीर की गरमी से कंबल-समझ पाना मुश्किल था. जंगल के भीतर की सुन्दर मनोहारी यात्रा. पतले पहाड़ी रास्ते. २० किमी की स्पीड़ पर चलती जीप.

पंछियों की चहचहाट, कुछ चीतल, हिरण, मोर आदि दिखे. आनन्द आ गया. इन्तजार था कि कहीं टाइगर दिखे. कहते हैं इस १०५ वर्ग किमी में फैले राष्ट्रीय उद्यान में लगभग २५ टाइगर हैं. जीप धीरे धीरे बिना आवाज के चलती रही और हम चुपचाप आजू बाजू नजर दौड़ाते रहे कि शायद कहीं टाइगर दिखे. एक दो बार बंदर और अन्य जानवारों की आवाज से गाईड ने टाईगर के आसपास होने का अनुमान भी लगाया और जीप रोककर इन्तजार भी किया. उसके पंजे के ताजे निशान भी दिखे मगर महाराज को नहीं दिखना था तो नहीं दिखे. दो घंटे बाद हम पहुँचे सेन्टर पाईंट याने कि भ्रमण के उस स्थल पर, जहाँ से वापसी का ट्रेक शुरु होना था किन्तु रास्ता दूसरा याने अभी भी टाईगर के दर्शन के ५०% चान्सेस बाकी.

सेन्टर पाईंट पर चाय नाश्ते चिप्स केडबरी कुरकुरे की दुकानें, काफी चहल पहल के बीच चिप्स केडबरी की दुकानों से कुछ दूर मेरी मुलाकात हुई गले में टोकनी लटकाये उबले चने को पत्तल में बाँध प्याज मसाला डालकर बेचते बालक मोनू से. चिप्स कुरकुरे की सभ्यता के बीच शायद सुबह से उसे कोई खरीददार नहीं मिल पाया था अतः कुछ उदास सा था उस चहकती अभिजात्य भीड़ के बीच अनसुनी आवाज लगाता-चने ले लो, बाबू जी.

मन नहीं माना तो मैं उससे बात करने लगा. पता लगा वहीं एक नजदीकी गांव में रहता है. रोज २० रुपये के चने खरीद कर लाता है और ३५ से ४० रुपये के बीच बेच कर १० रुपये बना लेता है. बाकी पैसा शायद वहाँ बेच पाने की परमिशन के लिए विभागीय कर्मचारियों के हिस्से जाता हो. कुछ ठीक ठीक उसने नहीं कहा. कम बात करने वाला शर्मीला लड़का था.सैकड़ों की तादाद में आये भ्रमणकारियों में से वो मात्र ७-८ ग्राहक चाहता है अपना पूरा माल खपाने के लिए. फिर १० बजे से गांव के स्कूल में पढ़ने जाता है. स्कूल के कारण शाम का फेरा लगाना संभव नहीं हो पाता. साथ में उसका दोस्त भी था भद्र सिंह. वो साथ सिर्फ खेलने आता है. शायद बेहतर आर्थिक स्थिती वाले परिवार का हो मगर दोस्त के साथ फिर भी घूमने चला आता है.

मोनू एक दिन पढ़ लिखकर वन विभाग में नौकरी करना चाहता है. शायद वही जंगल की दुनिया उसने देखी है तो सपने भी वहीं तक सीमित होकर रह गये हों, बहुत स्वभाविक है. अपनी कमाई का हिस्सा बांटते हुए निश्चित ही उसके मन में आता होगा कि कल जब मैं इसकी जगह हूँगा तो किसी मोनू को कोई तकलीफ नहीं दूँगा और अगली पीढ़ी के मोनू की पूरी की पूरी कमाई उसी मोनू की होगी.

मोनू की आज बोहनी भी नहीं हुई थी.उसकी डूबती आँखों में तैरते सुनहरे सपनों की छटा देखने की किसी को फुरसत नहीं. बच्चे हों या बड़े, सब बस एक कुतहल लिए फिर रहें है कि टाईगर कहाँ दिखेगा? जिसे जो दिशा बता दी जाती है, वह जीप उस ओर मुड़ कर ओझल हो जाती है. और मोनू खड़ा अगली खेप की बाट जोहता है कि शायद कोई उससे उसके उबले चने खरीद ले. उसे किसी टाईगर का इन्तजार नहीं. उसका वन विभाग में नौकरी पाने का सपना ही उसका टाईगर है और वो उसी का पीछा कर रहा है अपने मासूम बचपन को व्यापार की इन चालों के तले रौंदते जिसमें उसे इन १० रुपयों को कमाने के लिए विभाग के लोगों से हिस्सा बांट करते अपने अस्तित्व को बचाये रखने के लिए क्या क्या पाठ नहीं सीखने होते.

ये है मासूम मोनू अपने दोस्त भद्र सिंह के साथ

मैं उसका फोटो खींचना चाहता हूँ तो वो अपने साथी भद्र सिंह को साथ खड़ा कर लेता है फोटो खिंचवाने. फोटो खींचकर मैं उसकी ओर ५ रुपये बढ़ा देता हूँ. आत्म सम्मानी मोनू यूँ ही पैसे नहीं लेता-वो भी एक दोना चने मेरी तरफ बढ़ाता है. मैं चने हाथ में लिए जीप में आकर बैठ जाता हूँ उस भीड़ का हिस्सा बन, जिसे तलाश है टाईगर दर्शन की.
टाईगर नहीं दिखा-टाईगर हर रोज नहीं दिखते. टाईगर का पीछा करना इतना आसान नहीं.
हम वापस रिसोर्ट में आकर अपना सामान उठाते हैं और लंच के बाद शुरु होता है मद्धम संगीत के बीच वापसी का सफर.
थकान से मैं आँखे बंद कर लेता हूँ और मेरी आँखों के आगे मोनू का भोला चेहरा आ जाता है-साहब, आज बोहनी नहीं हुई है!!

आज भले ही उसकी बोहनी न हुई हो लेकिन उसके उदास चेहरे पर झलकते आत्मविश्वास से मैं पूर्णतः आशान्वित हूँ कि एक दिन उसे उसका टाईगर जरुर मिलेगा.

मन ही मन मैं बुदबुदा उठता हूँ , अलविदा मोनू!! मेरी शुभकामनाऐं तुम्हारे साथ हैं. एक दिन फिर मिलेंगे शायद इसी मोड पर-तब तुम वन विभाग में होगे. तुम तो शायद मुझे पहचान भी न पाओगे मगर ये वादा रहा, मैं तुम्हारी आँखों से तुम्हे पहचान लूँगा.

निदा फाज़ली साहेब का एक शेर बरबस ही याद आता है न जाने क्यूँ:

कभी कभी यूं भी हमने अपने जी को बहलाया है
जिन बातों को ख़ुद नहीं समझे औरों को समझाया है


---------------------------------------------------------
सूचना:
(अधिक जानकारी के लिए नीचे क्लिक करें)



जबलपुर के साहित्य समाज ने दिवंगत डॉ श्री राम ठाकुर दादा को श्रद्धांजलि अर्पित की

Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, दिसंबर 17, 2008

ऐसे बनी गज़ल कि मेरे होश उड़ गये!!!

बात थी आतंकवाद की. देश सन्न था. विचारसुन्नता की वो परम स्थिति जिस तक पहुँचने की कोशिश में हजारों विचार आ घेरते हैं न जाने कहाँ कहाँ से. जिन्हें भी मेडीटेशन का तनिक भी अनुभव है वो जानेंगे कि जब विचार शुन्यता की कोशिश करो तो अनायास ही कितने विचार आ घेरते हैं.

हजारों विचार. सीमित शब्दकोष फिर भी भरपूर उबाल. तो शुरु हुई रचना प्रक्रिया लेखन की. ढली एक गज़लनुमा कविता. अगर पूरी बहर में निकले तो गज़ल वरना गीत तो है ही. आदतानुसार मँहगे शब्दों से भयवश दूरी अतः हल्के फुल्के शब्द, गहरे भाव. .

From समीर अपनी बात कहते


वो देखो कौन बैठा, किस्मतों को बांचता है
उसे कैसे बतायें, उसका घर भी कांच का है.

नहीं यूँ देखकर मचलो, चमक ये चांद तारों सी
जरा सा तुम संभलना, शोला इक ये आंच का है.

वो मेरा रहनुमा था, उसको मैने अपना जाना था,
बचा दी शह तो बेशक, शक मगर अब मात का है.

पता है ऐब कितने हैं, हमारी ही सियासत में
मगर कब कौन अपना ही गिरेबां झांकता है.

यूँ सहमा सा खड़ा था, कौन डरके सामने मेरे
जरा सा गौर से देखा, तो चेहरा आपका है.

चलो कुछ फैसला लेलें, अमन की फिर बहाली का
वो मेरे साथ न आये, जो डर से कांपता है.

थमाई डोर जिसको थी, अमन की और हिफाजत की
उसी को देखिये, वो देश को यूँ बांटता है.

दिखे है आसमां इक सा, इधर से उस किनारे तक
न जाने किस तरह वो अपनी सरहद नापता है.

कफ़न है आसुओं का और शहीदों की मज़ारें है
बचे है फूल कितने अब, बागबां ये आंकता है.

-समीर लाल ’समीर’


जब यह सब टाइप करने बैठे तो साथ ही पीछे से अपने मित्र बवाल लगे अपनी आदतानुसार ताका झांकी करने. हमने पूछा भी कि भई ,क्या बात है, कुछ बात जंची भी या नहीं. जाने किस किस मूड में तो रहता है वो भी. लगता है उस समय अमीर खुसरो या मीर तकी ’मीर’ मोड में रहा होगा और उर्दु का जानकार तो है ही एक बेहतरीन गायक और गज़लकार होने के साथ साथ. कैसे पचा ले इतनी सरलता से. इसीलिये मैं उन महिलाओं से हमेशा कहता हूँ जिनके पतियों को खाना बनाना नहीं आता कि तनिक भी दुखी न हो बल्कि तुम तो बड़ी सुखी हो. कम से कम पतिदेव ये तो नहीं कहते कि फलाना मसाला कम है या ठीक से भूना नहीं. जो परोस दो वो ही बेहतरीन.

बस, बवाल ने भी निकाली अपनी उर्दु की तरकश, गज़ल ज्ञान का तलवार और लगे गाते हुए नये नये अंदाज में पैंतरें आजमाने और जुट गये विकास कार्य में. तब जो गज़ल निकल कर आई और उन्होंने गाई, भाई वाह. आप भी पढ़ें और बतायें कि क्या विचार बनता है इस पर:

From बवाल की बात



वो जो बेदार बैठा, क़िस्मतों को बाँचता हैगा
उसे टुक ये बता दे, उसका घर भी काँच का हैगा

मचलना मत, चमक ये देखकर के, चाँद तारों की
सम्भलना पर, सम्भलना शो'ला ठंडी आँच का हैगा

फ़ित्नापरवर हैं सब रहबर, हमारी इस सियासत के
मगर अब कौन ख़ुद का भी गरेबाँ, झाँकता हैगा

वो मेरा रहनुमा था, उसको मैंने अपना जाना था
बचा दी शह तो बेशक, शक मगर अब मात का हैगा

थमाई डोर जिसको थी अमन की, और हिफ़ाज़त की
उसी को देखिये, वो मुल्क को यूँ काटता हैगा

दीखे है आसमाँ यकसा, इधर से उस किनारे तक
न जाने किस तरह वो मेरी सरहद, नापता हैगा

वो दरकारे-जनाज़ा थी, जो चिलमन आपकी सरकी
वगरना आपका हमसे ही कितना, वास्ता हैगा ?

कफ़न हैं आँसुओं के और मज़ारें, हैं शहीदों की
बचेंगे फूल कितने बाग़बाँ ये, भाँपता हैगा

जो गै़रत की वजह से, चश्मे-पुरनम सामने आया
ज़रा सा गौ़र फ़रमाया तो चेहरा, आपका हैगा

हाँ डटकर फैसला करलें अमन की, ख़ुश बहाली का
वो मेरे साथ न आए जो डर से, काँपता हैगा

बवाल इस बात पर है के ये क़ीमत, 'लाल' की कम है
तो तय करके बता दें, वो हमें क्या, आँकता हैगा


शब्दार्थ :-

बेदार= सचेत, हैगा= है, फ़ित्नापरवर= षड्यंत्रकारी,
दरकारे-जनाज़ा = शवयात्रा में शामिल हो जाने की चाह
चिलमन = परदा, गै़रत = स्वाभिमान
लाल = रत्न Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, दिसंबर 10, 2008

पल-छिन वो सुहाने वाले !!


अब न वो ताज रहा, औ न उसके चाहने वाले !
सहम के आते हैं, इस मुल्क में, वो जो हैं, आने वाले !!

हमें तो याद हैं अब भी, इसके दिन जो पुराने वाले !
लो बुला लाते हैं फिर से, पल-छिन वो सुहाने वाले !!


जी हाँ, मैं उसी ताज की बात कर रहा हूँ जो मेरी प्रथम पाँच सितारा होटल की यात्रा का साक्षी रहा. अभी हालात जो भी हों..पाँच सितारा होटल में कदम रखने का अभियान यहीं से शुरु हुआ था. आज उसी को याद करते हुए यह संस्मरण:


Picture Taj Hotel, Mumbai



पहली बार किसी फाईव स्टार होटल में घुसने का मौका था एक दोस्त के साथ.

तय हुआ था कि एक एक कॉफी पी जायेगी. एक कोई वहाँ बिल और १०% टिप देगा. बाहर आकर आधा आधा कर लेंगे. इसी बहाने फाईव स्टार घूम लेंगे,

छात्र जीवन था. बम्बई में पढ़ रहे थे. एक जिज्ञासा थी कि अंदर से कैसा रहता होगा फाईव स्टार. छोटे शहर के मध्यम वर्गीय परिवार से आये हर बालक के दिल में उस जमाने में ऐसी जिज्ञासायें कुलबुलाया करती थीं.

बम्बई से जब घर जाया करते थे तो वहाँ रह रहे मित्रों के सामने अमिताभ बच्चन वगैरह के नामों को इग्नोर करना बड़ा संतुष्टी देता था जैसे उनसे बम्बई में रोज मिलते हों और उनका कोई आकर्षण हममें शेष नहीं बचा है. यथार्थ ये था कि एक बार दर्शन तक नहीं हो पाये थे तब तक.

खैर बात फाईव स्टार की हो रही थी. होटल तय हुआ ताज. दोपहर से ही दो बार दाढ़ी खींची. सच कहता हूँ डबल शेव या तो उस दिन किया या अपनी शादी के दिन.. बस!!! सोचिये, दिलो दिमाग के लिए कितना बड़ा दिन रहा होगा.

अपनी सबसे बेहतरीन वाली सिल्क की गहरी नीली कमीज, जो अमिताभ नें मिस्टर नटवर लाल में पहनी थी, वो प्रेस करवाई. साथ में सफेद बेलबॉटम ३४ बॉटम वाला. जवानी का यही बहुत बड़ा पंगा है कि आदमी यह नहीं सोचता कि उस पर क्या फबता है. खुद का रंग रुप कैसा है. वो यह देखता है कि फैशन में क्या है. जब तक यह अच्छा बुरा समझने की समझ आती है, तब तक इसका असर होने की उमर जा चुकी होती है. दोनों तरफ लूजर.

४५ साल तक सिगरेट पीते रहे और फिर छोड़ कर ज्ञान बांटने लगे कि सिगरेट पीना अच्छा नहीं. मगर उससे होना क्या है, जितनी बैण्ड लंग्स की बजनी थी, बज चुकी. अब तो दुर्गति की गति को विराम देने वाली ही बात शेष है.

खैर, शाम हुई. हाई हील के चकाचक पॉलिश किये हुए जूते पहनें हम चले फाईव स्टार-द ताज!!!

चर्चगेट तक लोकल में गये और फिर वहाँ से टेक्सी में. ४-५ मिनट में पहूँच गये. दरबान नें दरवाजा खोला. ऐसा उतरे मानो घंटा भर के बैठे टेक्सी में चले आ रहे हैं. दरबान के सलाम को कोई जबाब नहीं. बड़े लोगों की यही स्टाईल होती है, हमें मालूम था.

सीधे हाथ हिलाते फुल कान्फिडेन्स दिखाने के चक्कर में संपूर्ण मूर्ख नजर आते (आज समझ आता है) लॉबी में. और सोफे पर बैठ लिए. मन में एक आशा भी थी कि शायद कोई फिल्म स्टार दिख जायें. नजर दौड़ाई चारों तरफ. लगा मानो सब हमें ही घूर रहे हैं. यह हमारे भीतर की हीन भावना देख रही थी शायद. मित्र नें वहीं से बैठे बैठे रेस्टॉरेन्ट का बोर्ड भांपा और हम दोनों चल दिये रेस्टॉरेन्ट की तरफ.

अन्दर मद्धम रोशनी, हल्का मधुर इन्सट्रूमेन्टल संगीत और हम दोनों एक टेबल छेक कर बैठ गये. मैने सोचा यहाँ तक आ ही गये हैं तो बाथरुम भी हो ही लें. बोर्ड भी दिख गया था, दोस्त को बोल कर चला गया.

अंदर जाते ही एक भद्र पुरुष सूटेड बूटेड मिल गये. नमस्ते हुई और हम आग्रही स्वभाव के, कह बैठे पहले आप हो लिजिये. वो कहने लगे नहीं सर, आप!! बाद में समझ आया कि वो तो वहाँ अटेडेन्ट था हमारी सेवा के लिए. हम खामखाँ ही फारमेल्टी में पड़ लिए. बाद में वो कितना हँसा होगा, सोचता हूँ तो आज भी शर्म से लाल टाईप स्थितियों में आ जाता हूँ.

वापस रेस्टॉरेन्ट में आये, तब तक हमारे मित्र, जरा स्मार्ट टाईप थे उस जमाने में, कॉफी का आर्डर दे चुके थे.

कॉफी आई तो आम ठेलों की तरह हमारा हाथ स्वतः ही वेटर की तरफ बढ़ गया आदतानुसार कप लेने के लिए और वो उसके लिए शायद तैयार न रहा होगा तो कॉफी का कप गिर गया हमारे सफेद बेलबॉटम पर. वो बेचारा घबरा गया. सॉरी सॉरी करने लगा. जल्दी से गीला टॉवेल ला कर पौंछा और दूसरी कॉफी ले आया. हम तो घबरा ही गये कि एक तो पैर जल गया, बेलबॉटम अलग नाश गया और उस पर से दो कॉफी के पैसे. मन ही मन जोड़ लिए. सोचे कि टिप नहीं देंगे और पैदल ही चर्चगेट चले जायेंगे तो हिसाब बराबर हो जायेगा. अबकी बारी उसे टेबल पर कप रख लेने दिये, तब उसे उठाये.

बाद में उसने फिर सॉरी कहा और बताया कि कॉफी इज ऑन द हाऊस. यानि बिल जीरो. आह!! मन में उस वेटर के प्रति श्रृद्धाभाव उमड़ पड़े. कोई और जगह होती तो पैर छू लेते मगर फाईव स्टार. टिप देने का सवाल नहीं था क्यूँकि नुकसान हुआ था सो अलग मगर जीरो का १०% भी तो जीरो ही हुआ. तब क्या दें?

चले आये रुम पर गुड नाईट करके उसे, दरबान को और टैक्सी वाले को. कॉफी का दाग तो खैर वाशिंग पाउडर निरमा के आगे क्या टिकता. ५० पैसे के पैकेट में बैलबॉटम फिर झकाझक सफेद.

फिर तो कईयों को फाईव स्टार घुमवाये. एक्सपिरियंस्ड होने के कारण हॉस्टल में हमारे जैसे शहरों और परिवेष से आये लोग अपना अनुभव बटोरने के लिए हमारा बिल पे करते चले गये.

अनुभव की बहुत कीमत होती है, हमने तभी जान लिया था. Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, दिसंबर 07, 2008

आओ तुम्हें सट्टा खिलवायें!!

भाई जी, आपका ठिया तो सबसे बड़े बाजार में है. पता चला है, होल सेल में डील करते हो. कुछ हमें भी बताओ भाई, सुना है दिवाली सेल लगी है आपके बाजार में.

हमने कहा कि दिवाली कहो या दिवाला. सेल तो लगी है ६०% से ७०% की भारी छूट चल रही है. एस एम एस से विज्ञापन भी किया जा रहा है. स्लोगन भेजा जा रहा है, आपको भी मिल गया लगता है..आपके जमाने में बाप के जमाने के भाव. और जाने क्या क्या विज्ञापन किये गये हैं.

मुझे सेठ दीनानाथ की आढत याद आ गई. दिन भर मंडी के बीचों बीच अपनी दुकान पर तख्त पर बिछे सफेद गद्दे पर आधे लेटे रहते थे. बंडा और प्रदर्शनकारी धोती पहने. भई, जब प्रदर्शनकारी नेता हो सकता है तो धोती क्यूँ नहीं. जो भी प्रदर्शन करे, वो प्रदर्शनकारी, ऐसी मेरी मान्यता है. मेरी नजर में तो मल्लिका शेहरावत और राखी सावंत के डिज़ानर परिधान को भी प्रदर्शनकारी श्रेणी में ही रखता हूँ. खैर, सेठ के मूँह में हर समय पान. सामने मुनीम अपने हिसाब किताब में व्यस्त. बस, होलसेल का व्यापार था उनका भी, इसीलिए याद हो आई.

उनके ठीक विपरीत हम. न्यूयार्क स्टॉक एक्सचेंज, टोरंटो स्टॉक एक्सचेंज, नेसडेक और शिकागो कमॉडेटी एक्सचेंज पर डील तो करते हैं मगर कुर्सी पर सीधे बैठे सामने कम्प्यूटर लगाये. न आसपास घूमते बजारिया सांड और न ही पास बैठा मुनीम. मुनीम, चपरासी से लेकर सब कुछ खुद. माल की खरीदी बिक्री सब कम्प्यूटर पर. अगर अपने आप को ट्रेडर न बतायें तो कोई कम्प्यूटर ऑपरेटर ही समझे.


Picture Stock Trader


मित्र कहने लगे कि हाँ, विज्ञापन तो मिला. इसीलिये फोन किये हैं. भाई, बहुत घाटा लग गया. आप तो वो माल बताओ जिसको १०० टका ऊपर ही जाना हो, बस, वो ही लेंगे और एक बार लॉस पूरे हुए तो जीवन में स्टॉक एक्सचेंज की दिशा में सर रख कर सोयेंगे तक नहीं. खेलने की तो छोड़ो.

हमने उनको पहले भी समझाया था और फिर समझाया कि भाई, हम तो बस आप जो बोलो, वो खरीद देंगे और जो बोलो, वो बेच देंगे. हमारे लिए तो हर माल बराबर, हमें तो दोनों हालात में कमीशन बस लेना है. चाहे बेचो तब और खरीदो तो. जिस दिन हमें या इन बाजार एनालिस्टों को ये मालूम चलने लग जाये कि ये वाला तो पक्का ऊपर ही जायेगा तो क्या पागल कुत्ता काटे है जो सुबह से शाम तक कम्प्यूटर लिये लोगों के लिए खरीदी बेची कर रहे हैं. घर द्वार बेच कर सब लगा दें और एक ही बार में वारा न्यारा करके हरिद्वार में आश्रम खोलकर साधु न बन जाये और जीवन भर एय्याशी करें. ये सब बाजार एनालिस्ट मूँह देखी बात करते हैं आज जो दिखा वो कह दिया, कल जो दिखा तो बदल गये.

हम में और नारियल बेचने वाले किराना व्यापारी में बस यही फरक है. दोनों को माल बेचने से मतलब है मगर हर आने वाले को वो नारियल देते वक्त एक को हिलाकर कान में न जाने क्या सुनता है. फिर उसे किनारे रख दूसरा उठाकर बजाता है और कहता है कि हाँ, ये ठीक है. इसे ले जाईये और आप टांगे चले आते हैं जबकि ऐसे ही हिला हिला कर शाम तक वो सारे नारियल बेच लेता है और आप भी खुश, वो भी खुश. हमारे यहाँ ऐसा हिलाने का सिस्टम नहीं हैं. निवेशक को बाजार खुद हिला लेता है इसलिये हमें हिलाने की जरुरत नहीं.

जिस दिन आप इस दिशा में सर रख कर सोना बंद कर दोगे, उस दिन से हम क्या घास छिलेंगे. ऐसा अशुभ न कहो एन धंधे के समय भाई.

अजी, आप तो अंतिम दमड़ी तक खेलो. जब पूरा बर्बाद हो जाओ, तब मजबूरी में बंद हो ही जायेगा, इसमें प्रण कैसा करना. हमें भी तब तक १० दूसरे मूर्ख मिल जायेंगे जो रातों रात लखपति बनना चाहते, हम उनसे अपना काम चला लेंगे. कसम खाते हैं आपको याद भी न करेंगे.

तो बोलो, क्या आर्डर लिखूँ...सब माल चोखे हैं.
ऐसा मौका कहाँ बार बार आता है जब ६०% से ७०% तक छूट चले और आपके जमाने में बाप के जमाने के भाव पर माल मिलें.

जल्दी..फटाफट आर्डर बोलो. टाईम न खोटी करो.

नोट: यूँ भी अगर हम तुम्हें अपना खास मान कर बाजार से दूर रहने की सलाह दें तो तुम मानोगे थोड़ी न बल्कि किसी और ट्रेडर के यहाँ जाकर खेलोगे. फिर हम ही अपनी कमाई क्यूँ छोड़ें. ये बाजार ही अजीब है कि जब तक खुद न हार लो सब जीते हुए ही नजर आते हैं. Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, नवंबर 30, 2008

बदमाशी राहू की, शक खामखां उन पर!!

जबलपुर में विधान सभा का चुनाव था २७ को. सक्सेना जी को पहले से ज्ञात था कि २७ को छुट्टी है. २८ को भी छुट्टी ले ली थी. शनिवार इतवार यूँ भी दफ्तर बंद रहता है अतः लगातार ४ दिन मिल गये सो पचमढ़ी मय परिवार पिकनिक मनाने चल पड़े.

उधर मुम्बई में बम धमाके हो चले. लोग मर रहे थे, सुरक्षाकर्मी मुस्तैदी के साथ जुटे थे. मंत्रीगण बयानबाजी में व्यस्त थे. गृहमंत्री, हमला रुके तो बयान दें, इस हेतु नया सूट पहन कर कंघी करते चले जा रहे थे मगर हमला था कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था.

मुख्य मुम्बई के समस्त दफ्तर बंद कर दिये गये थे अतः छुट्टी थी और शर्मा जी इसलिये मय परिवार पिकनिक मनाने खंडाला चले गये.

मौसम गुलाबी है और अखबार लाल!!

आपसी मित्र सक्सेना जी ने शर्मा जी को फोन लगाया. मुम्बई धमाकों पर अपना क्रोध, घुटन और सरकार की अक्षमता की लानत मलानत की. विमर्श चला कि कौन लोग हो सकते हैं इस हमले के पीछे. पड़ोसी देश का नाम भी उठा मगर फिर आज के अखबार की खबर को देखते हुए उस पर इल्जाम लगाना ठीक सा नहीं प्रतीत हुआ. खामखां क्यूँ शक करना? अरे, हमें तो जब पक्का मालूम होता है तो शक की बिनाह पर फाँसी माफ कर लेते हैं तो अभी तो बस शक ही है.

अखबार कहता है कि यह देश पर राहू की वक्र दृष्टि की वजह से है जो कि चन्द्र पर पड़ रही है अतः ये तो होना ही था. तब किसे दोष दें. चन्द्रयान तक भेज दिया मगर राहू की हिम्मत देखो कि फिर भी वक्र दृष्टि डालता है. सरकार तो मगर फिर भी गलत कहलाई क्योंकि ज्योतिष और भविष्यवक्ता तो उनके पास भी हैं. पास तो क्या, सभी तो वो सारे भविष्यवक्ता ही हैं. वर्तमान और भूतकाल की कहाँ बात करते हैं? फिर कैसे नहीं जान पाये ये प्रकांड भविष्यवक्ता सारे..

फोटो: कुंडली



सक्सेना जी ने अपने पिकनिक पर चले आने के प्रयोजन को सार्थक बताते हुए कहा कि ऐसी ही सरकारें उन्हें पसंद नहीं आती इसलिए वो कभी भी वोट नहीं देते.

शर्मा जी ने भी सरकार और उसके सूचना तंत्र को निष्क्रिय और विफल बताते हुए आगे से कभी वोट न देने की लगभग कसम खाते हुए मारे जा रहे लोगों के प्रति अपनी गहरी संवेदनाऐं व्यक्त की और इस बात पर हर्ष भी उनमें से उनकी पहचान वाला कोई नहीं था.

दोनों दोस्तों ने फिर इस सदमे से उबरने के लिए फोन पर ही चियर्स किया और अपने अपने कमरे में सुरापान करते हुए सारे गम गलत किए.परिवार के साथ समय बीता.

अब दोनों अपने अपने शहर में फ्रेश हैं नये सिरे से काम पर लौटने के लिए.

सरकार भी चेहरे बदलने और लोगों का ध्यान बंटाने में मगन हो गई है.

रिमोट वही है .. जनता भी वही है.

निष्क्रिय कौन-बस यही समझना बाकी है-वोट न देने वाला या वोट पाकर चुन लिए जाने वाला?


नोट:
आज सुशान्त दुबे ’बवाल’ यह शेर याद आता है:

बवाल मच रहा है, भड़की हैं सब दिशाएँ !
मुक्काबला है इस पे, के कितना लहू बहाएं ?
Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, नवंबर 27, 2008

कहते हो तो रो लेते हैं!!!




----------------






हम हिन्दु हैं,हमहिन्दुस्तानी कायर हैं
हल्ला करने को शायर हैं..
तुम खेल सियासी चालों का
हम इक टुकड़ा हैं खालों का...

मारो कि हम हैं सहने को
अब बचा नहीं कुछ कहने को...
क्या शोक जताना काफी है
क्यूँ अब भी जगना बाकी है...



-समझ नहीं पा रहा हूँ कि इस वक्त
मैं शोक व्यक्त करुँ या
शहीदों को सलाम करुँ या
खुद पर ही इल्जाम धरुँ....


-शोक व्यक्त करने के रस्म अदायगी करने को जी नहीं चाहता. गुस्सा व्यक्त करने का अधिकार खोया सा लगता है जब आप अपने सपोर्ट सिस्टम को अक्षम पाते हैं. शायद इसीलिये घुटन नामक चीज बनाई गई होगी जिसमें कितने ही बुजुर्ग अपना जीवन सामान्यतः गुजारते हैं..बच्चों के सपोर्ट सिस्टम को अक्षम पा कर. फिर हम उस दौर से अब गुजरें तो क्या फरक पड़ता है..शायद भविष्य के लिए रियाज ही कहलायेगा.

----------क्या यही ????????????????? बाकी तो कुछ भी जोड़ लो....वाक्य सार्थक ही बनेगा.


आज खुद अपनी परछाई से
घबरा गया हूँ.......

लगे है कि तेरे
दामन में आ गया हूँ....................



-----------विशेष टीप:


आज क्षुब्द मन ने किसी भी ब्लॉग पर टीप करना उचित न समझा...अतः उम्मीद है आप समझेंगे. Indli - Hindi News, Blogs, Links

सोमवार, नवंबर 24, 2008

तुम तो बस नारे लगाओ!!

वाशिंग्टन से वापस टोरंटो आना था. सुबह नाश्ता किया, जरा हेवी सा हो गया तो लंच गायब कर दिया. सोचा, एयरपोर्ट पर कुछ बर्गर वगैरह खा लूँगा फिर रात घर पहूँच कर तो खाना ही है.

४ बजे जहाज..घर से १५ मिनट की दूरी पर एयरपोर्ट. एक घंटे पहले चेक इन. अतः घर से २.३० बजे घर से निकल लिए. रास्ते में ट्रेफिक. एयरपोर्ट पहूँचते ३.२० हो गया. भागते भागते बोर्डिंग गेट पर पहूँचे. बोर्डिंग एनाउन्समेन्ट चल रह था. जल्दी से चेक ईन किया और घुस लिए जहाज में. वाशिंग्टन से ऑटवा. १ घंटे ४५ मिनट की फ्लाईट. फिर वहाँ २ घंटे रुक कर १ घंटे की टोरंटो की.

हवाई जहाज ऐसा कि मानो दवा वाली केपसूल. बीच में गली और दोनों तरफ दो दो सीटें. कुल मिला कर ३६-४० सीटें और बैठने वाले २५-२६ लोग. हमें लास्ट के कोने में सीट मिली बाथरुम के सामने. छोटा हवाई जहाज तो छोटी छोटी सीटें. हम बैठ गये तो जिसे हमारे बाजू में सीट मिली थी, वो आया और हमें देख और बची जगह का अनुमान लगा लगभग घूरता सा दूसरी खाली सीट पर जा बैठा. हम भी पूरा पसर लिये और खींच तान कर सीट पेटी बाँध ली. फैजाबाद से गौंडा तो जा नहीं रहे कोई जीप में बैठकर कि आधा बाहर टंग कर बैठ लें.


Picture Air Canada Jazz



बहुत ही खराब मूँह बनाया था उसने दो छोटी छोटी सीटों में हमें एडजस्ट होता देख कर, मानो उसका दिया खा रहे हों. मन तो किया कि उठ के दो चमाट रसीद कर दें कि एक तो तेरे पास खाने को कुछ है नहीं. मरसिड्डा सा धरा है और हमारी सेहत पर नजर लगाता है. अरे खुद कमाते हैं और खाते हैं, तुझे क्या.

बचपन से हमारी अम्मा से सब हमारी तारीफ करते थे कि कितना तंदरुस्त बच्चा है. अम्मा फूली न समाती और तू नजर लगाता है. अम्मा हमें ठिठोना लगा देती थी काजल का कि किसी की नजर न लग जाये.

बस, अम्मा कि याद हो आई. न जाने कहाँ होगी, कौन दुनिया में. याद भी करती होगी कि नहीं. क्या पता? बस, उसी याद में मन किया और जेब से काली स्याही वाला डॉट पेन निकाल कर कान के पास एक ठो ठिठोना बैठा लिए खुद ही से. बुरी नजर से बचे रहें.

अब भगवान का दिया ऐसा रंग कि कोई जान ही न पाये कि ठिठोना लगाये बैठे हैं और काम भी बन गया कि बुरी नजर से बचे. ईश्वर का बड़ा धन्यवाद किए. ऐसे भाग सबके कहाँ?

ठिठोने ने रक्षा की, तबीयत खराब होने से बच गये. उस मूरख का वो खुद जाने हमें क्या. हम तो हवाई जहाज उड़ने के इन्तजार में लग गये.

हवाई जहाज रन वे पर आकर लाईन में लग लिया. देखते देखते घंटा गुजर गया मगर हवाई जहाज लाईन में ही लगा रहा. बहुत मुश्किल से जहाज उड़ा और चल पड़ा ऑटवा की तरफ मूँह उठाये, अमरीका की राजधानी से कनाडा की राजधानी के लिए.

हम भूखाये परिचारिका के खाना लाने का इन्तजार करने लगे हालांकि खरीद कर खाना था मगर भूख से अंतडियां टेढ़ी हुई जा रही थी. हम आखिरी सीट पर. जब तक हम तक वो पहूँची उसके पास सिर्फ ३ बीफ सेंडविच बचे. हालांकि चढ़े ५ वेजेटेरियन, दो चिकिन और बाकी बीफ के थे. मगर कुछ ईश्वर कृपा से और कुछ इन भड़काऊ लोगों के बयानों से जो दिन रात चिल्लाते रहते है कि शाकाहारी खाओ, स्वर्ग पाओ. शाकाहार से वास्ता...स्वर्ग का रास्ता.७ शाकाहारी और चिकिन खाने वाले मिल गये न हमारे पहले ही २६ लोगों की मात्र जनसंख्या में. अब हम क्या खायें??

हम ठहरे शुद्ध हिन्दु-भूखे मर जायें मगर बीफ, जानते बूझते तो न ही खा पायेंगे, भले चिकन खा लें..खा क्या लें, खा ही लेते हैं मगर बीफ..न जी न!! ऐसा नहीं कि स्वाद बुरा होता है. एक बार चिकिन के झटके में खा लिया था. लगा तो बड़ा टेस्टी था, दूसरा लेने गये तब पता चला कि बीफ है. तो अब गंगाजल तो यहाँ मिलने से रहा. बीयर से मुखशुद्धि की और सकॉच से अँतड़ियाँ. तब जाकर बैचेन दिल को करार आया और फिर चिकन खाया तो पेट को कुछ बेहतर लगा था..

भूख ऐसी लगी थी मगर मना कर दिये कि मोहतमा, बीफ तो न खा पायेंगे. एक गिलास पानी ही दे दो, कुछ तो जाये पेट में.

इतना गुस्सा आ रहा था इन शाकाहारी जलूसियों के उपर..और नारे लगा लो. बनवा दिये न ५ ठो यहाँ पर भी. अब हम क्या खायें..बोलो. ला कर दो खाना हवा में. हल्ला बस मचवा लो तुमसे, इन्तजाम करने बोल दो तो कहाँ से आओगे हवा में..बताओ.

ये हाल तो हुआ तब, जब मात्र २६ लोग थे. अगर पूरी दुनिया तुम्हारे बहकावे में आ गई तो एक दिन सब मरेंगे ऐसे ही हमारी तरह भूखे. अरे भाई, ईकोलॉजिकल बैलेंस ठीक रखने के लिए जहाँ कुछ शाकाहारी आवश्यक है, वहीं मांसाहारी भी. ऐसे ही चलती है दुनिया, काहे हल्ला मचाते हो बिना सोचे समझे. वो तो हमारे जैसा ही शरीर है जो झेल गये वरना तो तुम्हारे चक्कर में वाकई स्वर्ग की प्राप्ति हो लेती आज तो.

उस पर से छोटा सा हवाई जहाज. हिचकोले लेते ऐसे चल रहा है जैसे बिना मध्य प्रदेश की रोड याद दिलाये आज मानेगा नहीं. एकाएक एनाउन्समेन्ट हुआ कि सब पेटी बाँध लें, सामने तूफान आ रहा है. ये लो, हम तो समझ रहे थे कि हिचकोले तूफान के कारण है मगर वो तो अभी आ रहा है, अब तो भगवान ही मालिक है.

आँख बंद करके लगे पूजा करने कि प्रभु, बचवा लियो आज. कहीं जहाज गिर विर पड़ा तो ये हवाई जहाज वाले तो कम से कम हमारे केस में मेडीकल रिपोर्ट से सिद्ध कर ही लेंगे कि भूख से मरा है, हावई जहाज गिरने से नहीं. अतः घर वालों को नो मुआवजा.

मुआवजे की तो छोड़ो, वजन की वजह से कहो मरणोपरांत आक्षेप लगा दें कि इनके वजन के कारण गिरा है जहाज, अतः घर वाले जुर्माना भरें. अमरीका है भई!! अपने फायदे के लिए जब सद्दाम को चूहे के बिल से पकड़ा दिखा सकता है तो हमारी क्या बिसात.

बस ऑटवा पहूँच ही गये जैसे तैसे. लेट हो गये तो ऑटवा में भी भागते ही अगला हवाई जहाज पकड़े. फ्लाईट कम समय की होने के कारण-नो फूड. जय हो!!

बस, किसी तरह भगवान से मनाते भूखे प्यासे सिंगल पीस घर पहूँचे तो आपसे मुखातिब हो पा रहे है वरना तो उड़न तश्तरी फुस्स्स्स्स्स्स होने में कोई कसर न थी. Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, नवंबर 16, 2008

एक पाती टोरंटो हवाई अड्डे से

लेसर बी पियरसन एयरपोर्ट. टोरंटो शहर के बीच बसा टोरंटो की शान यहाँ का अंतर्राष्ट्रिय हवाई अड्डा. मैं टोरंटो के पूर्व स्थित एक सबर्ब में रहता हूँ और वहाँ से यहाँ तक आने में लगभग ४०-४५ मिनट लग जाते हैं. लगभग ६० किमी की दूरी आधा शहर पार करते हुए.

काफी बदलाव, साज सजावट की गई है इस हवाई अड्डे की महत्ता बरकरार रखने के लिए और अभी भी काफी काम जारी है. तीन बड़े बड़े टरमिनल हैं और १ नम्बर से अंतर्राष्ट्रिय उड़ाने, २ और ३ से आंतरिक एवं अमरीका की उड़ाने. अमरीका तो लगभग आंतरिक ही कहलाया. पड़ोसी और उस पर लंगोटिया.

आजकल टर्मिनलस को आपस में जोड़ने मोनोरेल भी शुरु हो गई है जिसमें ४ डिब्बे है मगर कोई चालक नहीं. स्वचालित है. शुरु में टेस्टिंग फेज़ में एक ड्राईवरनुमा प्राणी बैठा रहता था, लगता था जैसे वो ही ट्रेन चला रहा हो. लोगों का यह मात्र भ्रम साबित हुआ. ज्ञानी जानते भी थे मगर दिगभ्रमित लोगों को देख उन्हें भी मजा आता था, अतः खुद भी चेहरे पर भ्रम का भाव लिए भीतर भीतर प्रसन्न होते रहते थे.टेस्टिंग पूरी. अब चालक नहीं होता. यह टेस्टिंग प्रक्रिया मात्र ३-४ माह में पूरी हो गई. अब सब जान गये हैं कि मोनोरेल अपने आप चलती है और वो चालक मात्र चलाने का भ्रम पैदा कर रहा था.

और एक हम हैं अब तक भ्रम पाले हैं. ६० साल बीत गये. अभी भी टेस्टिंग फेज़ चालू है. सब सोच रहे हैं कि ये मंत्री देश चला रहे हैं.बहुतेरी जनता तो भ्रमित है और जानकार लोग लोगों के इस भ्रम पर भीतर भीतर मुस्कराते, फायदा उठाते. कब तक परिक्षण चलता रहेगा और हम यूँ ही भ्रमित होते रहेंगे.

आधे घंटे पहले पहुँचा हूँ. काउन्टर पर भारतिय बंदा था. आदतानुसार काम का दिखा अतः मित्र बन गया. कहाँ का रहने वाला है. कब से यहाँ है आदि आदि का आदान प्रदान हुआ और आराम से लगेज चैक इन हो गया है.

सुरक्षा जांच के बाद भीतर चले आये है. भव्य इमारत के उस कोने में जहाँ से हमारी फ्लाईट का गेट है. पूरे १५ मिनल का पैदल रास्ता मगर बेल्ट पर खड़े खड़े. कदम नहीं चलाने पड़े. और क्या चाहिये हमें. हिलना डुलना भी न पड़े और काम बन जाये. इससे बेहतर तो कुछ हो ही नहीं सकता.

अभी फ्लाईट में १ घंटे से ज्यादा समय है. फिर शुरु होगी आगे की थकाऊ २० घंटे की हवाई यात्रा २ घंटे ब्रसल्स में रुकते हुए. पत्नि हमेशा की तरह ड्यूटी फ्री शॉपिंग में व्यस्त और मैं हमेशा की तरह अपना कम्प्य़ूटर खोले आपको हाल सुना रहा हूँ.

अभी यहीं तक. पोस्ट करके फिर फ्लाईट पकड़ता हूँ. आगे का हाल भारत पहुँच कर या ब्रसल्स से पोस्ट करने का मौका मिला तो वहाँ से. ब्रसल्स वाले चांसेस तो कम ही मानो मगर आश्वासन देने में क्या जाता हैं. आखिर चुनाव का माहौल चल रहा है कितने ही राज्यों में तो यह अतिश्योक्ति नहीं कहलायेगी. Indli - Hindi News, Blogs, Links

मंगलवार, नवंबर 11, 2008

कुछ न कुछ तो होता ही है.....

आज की बात:


सुसंस्कृत हैं अतः बेवकूफ को भोला कहते हैं. यही वक्त का तकाजा है.

ऐसे ही सुसंस्कृत प्राणी कल टकरा गये. मोटा कहना ठीक न लगा होगा तो कह उठे कि ’आपकी बॉडी में काफी स्वेलिंग (सूजन) सी लग रही है. तबीयत तो ठीक है न?’

सुसंस्कृत हम भी कम नहीं अतः जबाब में बस इतना ही कहा ’ भाई साहब, जरा एलर्जी है.’

वो पूछने लगे कि ’काहे से एलर्जी है भाई’

हमने भी थोड़ा लजाते हुए बता दिया कि ’एक्सर्साइज (व्यायाम) करने से एलर्जी है’


क्या चल रहा है:

भारत निकलने की तैयारी, पैकिंग, भाग दौड़-मानो मिनट भर का समय निकलना भी मुश्किल सा हो रहा है. न कोई ब्लॉग पढ़ पाया कल सारा दिन और न ही कहीं कमेंट. कल कोशिश करुँगा कि कुछ तो देख ही लूँ.


अभी की सोच:

सोचा है अब से अपने पाठकों से जो टिप्पणी करते हैं, उनसे हफ्ते में एक बार बात की जाये और उनके प्रश्नों का जबाब दिया जाये. इस हेतु, भारत पहुँच कर यह साप्ताहिक स्तंभ शुरु करने की योजना है जिसमें कुछ टिप्पणियों द्वारा व्यक्त शंका का समाधान किया जायेगा.


नया क्या है:

नई पोस्ट तो क्या लिखता. बस, दफ्तर आते जाते ट्रेन में चिन्दियों पर की गई कलम घसीटी में से कुछ को आज फिर समेटा और बस, पेश कर दिया. न जाने कब, कौन सा ख्याल आता जाता रहता है और कागजों पर उतर कर ऑफिस बैग के किसी कोने में फंसा रह जाता है. आपस में कोई तारतम्य नहीं, न कोई संपादन-जैसा उतरा वैसा की अनगढ़ सा पेश कर दिया..शायद कहीं कुछ कहता सा प्रतीत हो तो बताईयेगा.


-१-

आज का ताजा अखबार
और
आज की ताजा खबरें!!

मोटे मोटे काले हर्फों में
लाल लाल खून की
जिन्दा तस्वीरें!

ये
इंसानी खून भी
कितनी जल्दी सूख जाता है
लाल ताजा खून
काले हर्फों में बदलता है

और

कुछ पलों में
इंसान उन्हे भूल जाता है!!


-२-

अब आंख नहीं
बस
दिल रोता है

मगर

उसके आंसू
किसी क नहीं दिखते!!

आदमी,
इत्मिनान से
सोता है.


-३-

रात का तीसरा पहर
कागज, कलम , दवात
सब हैं मेरे साथ

जुगनू
ठिठक ठिठक कर
रोशनी देता गया...

और

मैं सिसक सिसक कर
दिल की बात कहता गया....


-४-

फोन की घंटी से
मेरी तंद्रा टूटती है

मैं उसकी
खुशनुमा यादों की
दुनिया से बाहर
आ जाता हूँ

फोन पर
झुंझलाया सा
अनमने ठंग से बात कर
फोन काट देता हूँ..

और फिर
कोशिश करता हूँ
उन्हीं यादों की दुनिया मे
वापस जाने की......

ख्याल झंकझोरता है....

ये फोन
तो
उसी का था!!!


-५-

सुनता हूँ....

घड़ी मेरी
सुबह कहती है..

देखता हूँ....

खिड़की के बाहर
उजाला भी है....

सोचता हूँ...

फिर
आखिर ये रात
जाती क्यूँ नहीं.

-६-




देखता था कभी
कुछ कांटों भरे तार
जो निर्धारित कर रहे थे...

तू पाकिस्तान है
और
मैं हिन्दुस्तान!!

वही कांटे
अब हमारे दिल में
उग आये हैं....

मैं हिन्दु हूँ
और
तू मुसलमान!!

सरहद बांटने वाले कांटे
तो फिर भी हटाये जा सकते हैं...
किन्तु
ये...............


--समीर लाल ’समीर’

बस, आज इतना ही. अब फिर से भारत जाने की तैयारी में जुटता हूँ. ४ दिन ही तो बचे हैं. Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, नवंबर 06, 2008

ये कैसा उत्सव रे भाई!!!

कुछ साल पहले, भारत से कनाडा आते वक्त फ्रेंकफर्ट, जर्मनी में एक दिन के लिए रुक गया. सोचा, जरा शहर समझा जाये और बस, इसी उद्देश्य से वहाँ की सबवे(मेट्रो) का डे-पास खरीद कर रवाना हुए. जो भी स्टेशन आये, मैं और मेरी पत्नी उतरें, आस पास घूमें. वहाँ म्यूजियम या दर्शनीय स्थल देखें और लोगों से बात चीत करें, ट्रेन पकड़ें और आगे. यह एक अलग ढंग से घूम रहे थे तो मजा बहुत आ रहा था. जर्मन न आने की वजह से बस कुछ तकलीफ हो रही थी, मगर काम चल जा रहा था.

इसी कड़ी में एक स्टेशन पर उतरे. बाहर निकलते ही मन प्रसन्न हो गया. एकदम उत्सव का सा माहौल. स्त्री, पुरुष सभी नाच रहे थे रंग बिरंगी पोशाक में.जोरों से मस्त संगीत बज रहा था. संगीत की तो भाषा होती नहीं वो तो अहसास करने वाले चीज है. इतना बेहतरीन संगीत कि खुद ब खुद आप थिरकने लगें.

खूब बीयर वगैरह पी जा रही थी. जगह जगह रंग बिरंगे गुब्बारे, झंडे और बैनर. क्या पता क्या लिखा था उन पर जर्मन में. शायद ’होली मुबारक’ टाईप उनके त्यौहार का नाम हो.

एक बात जिससे मैं बहुत प्रभावित हुआ कि महिलाऐं एक अलग समूह बना कर नाच रही थीं और पुरुष अलग. न रामलीला जैसे रस्से से बंधा अलग एरिया केवल महिलाओं के लिए और न कोई एनाऊन्समेन्ट कि माताओं, बहनों की अलग व्यवस्था बाईं ओर वाले हिस्से में है, कृप्या कोई पुरुष वहाँ न जाये और न कोई रोकने टोकने वाला. बस, सब स्वतः.

सोचने लगा कि कितने सभ्य और सुसंस्कृत लोग हैं दुनिया के इस हिस्से में भी. महिलाओं के नाचने और उत्सव मनाने की अलग से व्यवस्था. इतनी बीयर चल रही है फिर भी मजाल कि कोई दूसरे पाले में चला जाये नाचते हुए. पत्नी महिलाओं की तरफ जा कर एक तरफ बैन्च पर बैठ गई और हमने बीयर का गिलास उठाया और लगे पुरुष भीड़ के साथ झूम झूम कर नाचने.

अम्मा बताती थी मैं बचपन में भी मोहल्ले की किसी भी बरात में जाकर नाच देता था. बड़े होकर नाचने का सिलसिला तो आज भी जारी है. वो ही शौक कुलांचे मार रहा होगा.

चारों तरफ नजर दौड़ाई नाचते नाचते तो देखा ढ़ेरों टीवी चैनल वाले, अखबार वाले अपना अपना बैनर कैमरा और संवाददाताओं के साथ इस उत्सव की कवरेज कर रहे थे. लगता है, जर्मनी के होली टाईप किसी उत्सव में आ गये हैं. टीवी वालों को देख उत्साह दुगना हो गया. कमर मटकाने की और झूमने की गति खुद ब खुद बढ गई. झनझना कर लगे नाचने.

दो एक गिलास बीयर और सटक गये. वहीं बीयर स्टॉल के पास एक झंडा भी मिल गया जो बहुत लोग लिए थे. हमने भी उसे उठा लिया..

फिर तो क्या था, झंडा लेकर नाचे. इतनी भीड़ में अकेला भारतीय. प्रेस वाले नजदीक चले आये. टीवी वालों ने पास से कवर किया. प्रेस वालों ने तो नाम भी पूछा और हमने भी असल बात दबा कर बता दिया कि इसी उत्सव के लिए भारत से चले आ रहे हैं और सभी को शुभकामनाऐं दीं.

खूब फोटो खिंची. मजा ही आ गया. खूब रंग बरसाये गये, कईयों ने हमारे गाल पर गुलाबी, हरा रंग भी लगाया, गुब्बरे उडाये गये, फुव्वारे छोड़े गये और हम भीग भीग कर नाचे. कुल मिला कर पूरी तल्लिनता से नाचे और उत्सव मनाये.





भीड़ बढ़ती जा रही थी मगर व्यवस्था में कोई गड़बड़ी नहीं. स्त्रियाँ अलग और पुरुष अलग. कभी गल्ती से नजर टकरा भी जाये तो तुरंत नीचे. कितने ऊँचे संस्कार हैं. मन श्रृद्धा से भर भर आये. पूरा सम्मान, स्त्री की नजर में पुरुष का और पुरुष की नजर में स्त्री का. एकदम धार्मिक माहौल. जैसे कोई धार्मिक उत्सव हो. शायद वही होगा.

थोड़ी ही देर में भीड़ अच्छी खासी हो गई. प्रेस, प्रशासन सब मुस्दैद. जबकि कोई जरुरत नहीं थी पुलिस की क्यूँकि लोग तो यूँ ही इतने संस्कारी हैं, मगर फिर भी.

अपने यहाँ तो छेड़े जाने की गारंटी रहती है, फिर भी पुलिस वाला ऐन मौके पर गुटका खाने निकल लेता है. मगर यहाँ एकदम मुस्तैद!!

धीरे धीरे भीड़ ने जलूस की शक्ल ले ली. मगर महिलाऐं अलग, पुरुष अलग. वाह!!! निकल पड़ा मूँह से और सब निकल पड़े. पता चला कि अब यह जलूस शहर के सारे मुख्य मार्गों पर घूमेगा. जगह जगह ड्रिंक्स और खाना सर्व होगा. मजा ही आ जायेगा. हम भी इसी बहाने नाचते गाते शहर घूम लेंगे. खाना पीना बोनस और प्रेस कवरेज के क्या कहने. पूरे विश्व में दिखाये जायेंगे.

कई नये लोग जुड़ गये. नये नये बैनर झंडे निकल आये. अबकी अंग्रेजी वाले भी लग लिए. हम भी एक वही पुराना वाला जर्मन झंडा उठाये थे तो सोचा किसी अंग्रेजी से बदल लें. इसलिए पहुँच लिए झंडा बंटने वाली जगह. अंग्रेजी झंडा मिल गया. लेकर लगे नाचने. फिर सोचा कि पढ लें तो कम से कम कोई प्रेस वाला पूछे तो बता तो पायेंगे.

पढ़ा!!!!!!!!!!!!!!

अब तो काटो तो खून नहीं. तुरंत मूँह छिपा कर भागे. पत्नी को साथ लिया और ट्रेन से वापस एअरपोर्ट. मगर अब क्या होना था टीवी और अखबार ने तो अंतर्राष्ट्रिय स्तर पर कवर कर ही लिया.

दरअसल, अंग्रजी के जो बैनर और झंडॆ पढे तो पता चला कि अंतर्राष्ट्रिय समलैंगिक महोत्सव मनाया जा रहा था जिसे वो रेनबो परेड कहते हैं और वो झंडा हमारे हाथ में था, कह रहा था कि मुझे समलैंगिक होने का गर्व है. क्या बताये, कैसा कैसा लगने लगा.

कनाडा के जहाज में बैठ कर बस ईश्वर से यही प्रार्थना करते रहे कि कोई पहचान वाला इस कवरेज को न देखे या पढ़े.

सोचिये, ऐसा भी होता है कि सी एन एन और बी बी सी टाईप चैनल आपको कवर करे और आप मनायें कि कोई पहचान वाला आपको देखे न.

जबकि जरा सा अखबार में नाम आ जाये या टीवी पर दर्शक दीर्घा में भी हों तो एक पोस्ट लिख कर, ईमेल करके, फोन पर सब पहचान वालों को लिंक, स्कैन कॉपी और प्रोग्राम टाईम बताते नहीं थकते.

सब मौके मौके की बात है. टीवी पर तो तुम बम धमाके करके भी आ सकते हो मगर चाहोगे क्या कि कोई अपना तुम्हें देखे.

वैसे अब सोचता हूँ तो लगता है कि इस परेड का अर्थ क्या है? जलूस निकालने और नाचने जैसी आखिर बात क्या है? किस बात की प्रदर्शनी कर रहे हो, क्या बताना चाहते हो?

एक साधारण स्त्री पुरुष तो झंडा उठा उठा कर नाच नाच कर यह नहीं बताते कि हम प्रकृति द्वारा निर्धारित आम प्रवृति के लोग हैं फिर तुम ही क्यूँ यह सब करते हो पूरे विश्व में??

कहीं कुछ कुंठा या हीन भावना तो नहीं?

बताओ न!!!


नोट: इस तरह के संबंधों के प्रति श्रृद्धा रखने वालों की यह कतई खिलाफत न समझी जाये. बस, अपने मन के भाव कहे हैं. अतः वह आहत न हों. Indli - Hindi News, Blogs, Links

सोमवार, नवंबर 03, 2008

बीबी साथ में है फिर कैसा!!!!!!!!

आज शाम भर सोचता रहा कि किस रस में रचना लिखूँ. विचार कई उठे और खारिज होते गये. अधिकतर क्या लगभग सभी का कारण था कि बीबी साथ में है.

देखिये, सोचा विरह गीत लिखूँ मगर कैसे-बीबी साथ में है फिर कैसा विरह और किसका विरह. अतः खारिज.

फिर विचार बना कि वीर रस-मगर फिर वही, बीबी साथ में है तो काहे के वीर. बीबी के सामने तो अच्छे अच्छे पीर तक वीर नहीं हो पाये तो हम क्या होंगे. अतः खारिज.

अब सोचा, प्रेम गीत-मगर बीबी साथ में है. मियां बीबी मे प्रेम तो एक अनुभुति है, एक दिव्य अहसास है, एक साझा है-प्रेम तो इसका एक अंग है और एक अंग पर क्या लिखना. लिखो तो संपूर्ण लिखो वरना खारिज. अतः खारिज.

फिर रहा श्रृंगार रस तो बीबी साथ में है और वो चमेली का तेल लगाती नहीं फिर कैसे होगा पूर्ण श्रृंगार. अपूर्ण पर क्या रचूँ. अतः यह भी खारिज.

बच रहा हास्य रस- तो बीबी साथ हो या न हो. मगर यहाँ ब्लॉग पर हंसना मना है. यह हा हा ठी ठी ठीक नहीं वो भी जब बीबी साथ में हो तो गंभीर रहने की सलाह है. अतः खारिज.

अब क्या करुँ. कई विचारों के बाद नये रस ’टेंशन रस’ की रचना बन पाई यानि किसी भी चीज से बेवजह परेशान. ऐसा होगा तो फिर क्या होगा. वैसा होगा तो फिर क्या होगा. इस तरह की फोकट टेंशन में जीने वाले बहुत से हैं. इस तरह जीना भी एक कला ही कहलाई और जो जिये, वो कलाकार. तो ऐसे सभी कलकारों को प्रणाम करते हुए सादर समर्पित:




चाँद गर रुसवा हो जाये तो फिर क्या होगा
रात थक कर सो जाये तो फिर क्या होगा.

यूँ मैं लबों पर, मुस्कान लिए फिरता हूँ
आँख ही मेरी रो जाये तो फिर क्या होगा.

यों तो मिल कर रहता हूँ सबके साथ में
नफरत अगर कोई बो जाये तो फिर क्या होगा.

कहने मैं निकला हूँ हाल ए दिल अपना
अल्फाज़ कहीं खो जाये तो फिर क्या होगा.

किस्मत की लकीरें हैं हाथों में जो अपने
आंसू उन्हें धो जाये तो फिर क्या होगा.

बहुत अरमां से बनाया था आशियां अपना
बंट टुकड़े में दो जाये तो फिर क्या होगा.

ये उड़ के चला तो है घर जाने को ’समीर;
हवा ये पश्चिम को जाये तो फिर क्या होगा.


-समीर लाल ’समीर’ Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, अक्टूबर 29, 2008

ये अत्याचारी लड़कियाँ..

नियमित प्रक्रिया के तहत सुबह सुबह ६.३० बजे ट्रेन पकड़ी दफ्तर जाने के लिए.

आज जरा जगह बदल गई. वजह, देर से पहुँचना. सामने की कुर्सी पर दो सहेलियाँ, सुकन्यायें. चलो, देर से पहुँचें मगर कोई गम नहीं और कोई नुकसान नहीं.

एक ने पहना था पीला टॉप, तो कान में पीले बूंदे और साथ ब्लैक जिन्स-टाईट फिट. गले में एक महिला कलर का स्कार्फ.

’महिला कलर’- अचरज न करें यह शब्द सुन कर. जैसे ’कहूँगी’ ’मरुँगी’ ’हट्ट’ ’आप बड़े वो हैं’ आदि स्त्रीलिंग हैं अर्थात सिर्फ वो ही बोलती और समझती हैं वैसे ही कई रंग भी होते हैं जो मेरी नजर में पुरुषों की समझ और पहचान से परे हैं. जैसे हम नहीं पहचान पाते कि मर्जेन्टा, बेज़, बरगंडी, धानी, मस्टर्ड आदि रंग कौन से होते हैं. हम इसे महिला वर्ग के लिए रिजर्व मान इस ओर मेहनत तक नहीं करते. उन्हीं में से किसी रंग का स्कार्फ था. पुरुष का काम पांच मुख्य रंगों में चल जाता है.

मुझे इन सब से क्या. वो तो नजर पड़ गई सो बता दिया. मुझे तो अपनी किताब पढ़ना है परसाई जी की ’माटी कहे कुम्हार से’ निकाली बैग से. अपना आई पॉड भी निकाल कर कान में फिट कर लिया मगर ऑन नहीं किया वरना दो सहेलियों की बात कैसे सुनता?? बताओ, कहलाया न होशियार. वो समझें कि हम गीत सुन रहे हैं और हम चुप्पे किताब में आँख गड़ाये उनकी बात सुन रहे हैं.

ईश्वर की विशिष्ट कृपा उस कन्या पर. सुन्दर काया..गोरा रंग और मानक अनुपात शरीर का. मानो ईश्वर के शो रुम का डिसप्ले आईटम हो. हर तरह से फिट और परफेक्ट.

सुना कि जल्दी में निकली तो ब्रेक फास्ट न कर पाई बेचारी. अतः साथ लाई है.

बैग खुला. पहले लिपिस्टिक निकली, वो लगी लगे पर. फिर मसखारा और फिर फेस फाऊन्डेशन, पाऊडर, रुज...मेकअप पूरा हुआ और उसने अपना ब्रेक फास्ट निकाला.

makeup

एक बिस्किट, फ्रूट्स में चार अंगूर, फ्रूट ज्यूस...एक ३० मिलि की बोतल. बिस्किट उसने बारह बार में चबा चबा कर खत्म किया..खाया तो क्या, कुतरा. हमारे तो एक कौर के बराबर था. चार अंगूर खाने में कांख गई. चार अंगूर जो हम एक मुट्ठी में फांक जायें. ज्यूस इतना सा कि मानो वाईन टेस्टिंग कर रहे हों.

उस पर से सब खत्म करके हल्की सी डकार भी ली...’एस्क्यूज मी’ न बोलती तो मालूम भी न पड़ता कि डकार ली, मौन की भी आवाज होती है सिद्ध करते हुए. अरे खाया ही क्या है जो डकार रही हो.

हमें तो गुस्सा सा आ गया. उस पर से वो ही गुस्सा सातवें आसमान पर पहूँच गया जब सुना कि इतने हेवी ब्रेक फास्ट के बाद लंच में सिर्फ सलाद खायेगी और उसका डिब्बा दिखाया सहेली को. मानो सिगरेट की साईज के डिब्बे में पूरा सलाद जो लंच में खाया जाना है. साथ में एक उतना बड़ा ही ज्यूस जो अभी खत्म किया है.

अरे, ऐसा भी क्या!!! क्या दुश्मनी है इतनी सुन्दर काया से. मन में तो आया कि गा गा कर अपनी वो जीरो साईज वाली कविता सुनाऊँ उसको. फिर सोचा, जाने दो-क्या बात का बतंगड़ बनाना.

मैं तो उसे अत्याचारी की कटेगरी में ही रखना पसंद करुँगा. नाजायज परेशान कर रही है अपने ही शरीर को.

शाम को डिनर के लिए भी योगर्ट (दही) और प्रोटीन बार रखा हुआ है.

हम सोचने लगे-अरे, हमें तो इसकी दस परसेंट भी रुप रंग और/ या काया मिलती तो आत्म मुग्ध हो रोज सुबह सुबह प्रसाद में खुद को ही एक किलो लड्डू प्रसाद में चढ़ा कर खाते हुए जाते दफ्तर वरना फायदा ही क्या ऐसी काया का कि भूखा मरना पड़े.

हद है फीगर कॉन्सेसनेस की.

स्वास्थय अपनी जगह है और फीगर के प्रति दीवानगी का पागलपन ...वो सिद्ध सा नहीं लगता, न जाने क्यूँ!!

वो अपना मेकअप फिर से कर रही है. समझ नहीं आता कि नाश्ते ने मेकअप का क्या बिगाड़ डाला. और अगर बिगाड़ा भी होता, तो नाश्ते के पहले काहे मेकअप किया था.

हम तो एक बार की क्रीम लगाये अगले नहान के बाद ही लगाते हैं, तब पर भी चेहरा चमकता रहता है. सरासर वेस्टेज करती हैं यह लड़कियाँ भी. कितना मंहगा तो आता है इनका मेकअप का सामान. कुछ तो कद्र करो.

चलो, जो देखा है सो बताया है. अब हम तो अपनी माटी क्या कह रही कुम्हार से, वो पढ़ते हैं. Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, अक्टूबर 26, 2008

मैसेज बहुत बड़ा मगर पोस्ट माईक्रो..

ऐसा तो नहीं कि हमने बताया नहीं था
तू तो कह देना कि समझाया नहीं था..
संभल जाओ कि वक्त बाकी है अभी
फिर न कहना पातियों का साया नहीं था.


(संभल जाओ वरना ऐसे होगी बड़ सावित्रि पूजा)




आपको एवं आपके परिवार को दीपावली की मंगलकामनाऐं. Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, अक्टूबर 23, 2008

ये लो भई-टीवी पर भी आ लिए

याद आता है जब पहली बार सीए की ट्रेनिंग करते हुए ऑफिस टूर पर हवाई जहाज से जाना था. पहला मौका था जब हवाई जहाज में चढ़ता. खुशी का तो मानो कोई ठिकाना ही नहीं. अति उत्साहित. जब ऑफिस से बताया गया, उस दिन मंगलवार था और रविवार की रात उड़ान थी बम्बई से मद्रास.

उसी दिन शाम को दफ्तर से निकले तो बस एक धुन. कैसे लोगों से बताऊँ कि हवाई जहाज से जाने वाला हूँ. हॉस्टल के पास सीधे अपनी सिगरेट वाले की दुकान पर पहूँचे. पैकेट लिया और उससे कहा कि यार, शानिवार को तीन-चार पैकेट रख लेना (जबकि उसकी दुकान में मेरी ब्राण्ड की १०-१५ पैकेट तो सामने ही सजी रहती थी हर वक्त.) मद्रास जाना है मुझे. वैसे तो घंटे-१.३० घंटे में ही पहूँच जाऊँगा हवाई जहाज से मगर क्या पता वहाँ रात गये मिले न मिले. मन को बड़ी तसल्ली लगी कि चलो, इसी बहाने इसको बता लिया.

फिर, अपने चाय वाले के यहाँ. यार, जल्दी चाय लगवा दे, निकलना है टिकिट उठाने जाना है. शनिवार को निकल रहा हूँ जरा जरुरी काम से मद्रास हवाई जहाज से. उसी की टिकिट उठानी है, तब तक चाय सर्व भी हो गई. वो तो पहले से ही गरम होती रहती थी.

धोबी, नाई, मेहतर, कमरे में झाडू लगाने वाले से लेकर हर संभव दोस्त को व्यक्तिगत या फोन द्वारा बता ही दिया कि हवाई जहाज से जा रहे हैं किसी न किसी बहाने. रात मैस में खाना खाते खानसामा से लेकर सर्व करने वाले नौकर तक को कोई न कोई बहाने से बताते चले गये.

ये दीगर बात है कि शुक्रवार आते तक ऑडिट कैंसल और हम रह गये पुनः बिना हवाई यात्रा के. दो दिन को यूँ ही नासिक घूम आये और सबको बताया मद्रास वो भी हवाई जहाज से.

झूठ ही सही, एक माहौल सा बन गया. ऐसा मुझे लगा. इस लगने में ही तो हम हर माहौल में खुश दिख लेते हैं, अन्यथा तो दुखों की क्या कमीं चारों तरफ.

अभी चार दिन पहले फोन आया. एशिया टेलीविजन नेटवर्क (ATN) जो कि यहाँ सारे भारतीय टीवी चैनेल पूरे कनाडा के लिए संचालित करता है, उस पर एक काव्य संध्या का आयोजन है और दो दिन बाद स्टूडियो बुलाया गया है. बड़े खुश कि अब टीवी के माध्यम से घर घर पहूँच जायेंगे. सारे हिन्दी भाषी कनाडा में लोग हमें सुनेंगे. तीन चार कविता बिल्कुल कंठस्थ कर डाली.

लोगों को बताने का सिलसिला भी फिर चल निकला. ऑफिस से नाई के यहाँ जाकर कटे कटाये बाल फिर से कटवाये कि टीवी पर शो है. संभाल कर काटना. काटे क्या, कुछ हों तो काटे. मगर जान गया कि टीवी पर जा रहे हैं. अपना काम हो गया.

बॉस को बता दिया कि बुधवार को नहीं आयेंगे टीवी पर शो है. एक महिने बाद की डेड लाईन वाले प्रोजेक्ट की मिटिंग में जबरदस्ती फुदक लिए कि शायद प्रोजेक्ट एकाध दिन डिले हो जाये क्यूँकि कल नहीं आ पा रहा हूँ टीवी पर शो है. वो प्रोजेक्ट तो यूँ भी १० दिन से ज्यादा, पुरानी हरकतों की वजह से, डिले होने वाला है, उसका कोई जिक्र नहीं.

जिस दोस्त का फोन आये, उसे बताये जा रहे हैं कि कल ऑफिस नहीं जा पा रहा हूँ. जाहिर सी बात है कि पूछेगा कि क्या हुआ? और बस, अरे यार, वो टीवी वालों ने रिकाडिंग के लिए बुलवाया है. याने जितने कान, उसमें उतनी अलग अलग मंत्रों से एक ही बात-कल टीवी पर रिकार्डिंग है. कुछ को तो ईमेल पर भी कह दिया कि कल जबाब नहीं दे पाऊँगा, जरा टीवी रिकार्डिंग पर जाना है. जाना दो घंटे के लिए, व्यस्तता ऐसी मानो १५ दिन नहीं दिखेंगे.

खैर, जो व्यस्त नहीं होते वो ही सबसे व्यस्त होते हैं दिखने में-यह मुहावरा भी कोई तो सच करे.

तब बुधवार याने २२ अक्टूबर को रिकार्डिंग हो गई. ४ कवियत्रियाँ और २ कवि उपस्थित थे. सुश्री भुवनेश्वरी पाण्डे, श्री पराशर गौड, सुश्री लता पाण्डे, सुश्री सविता अग्रवाल, सुश्री किरण, एवं हम याने समीर लाल. कार्यक्रम संचालित किया सुश्री कान्ता अरोरा जी ने जो एटीएन की हिन्दी प्रभाग की संचालिका हैं एवं समाजसेवी भी.

सबने अपनी २-२ रचनाऐं पढ़ी और कनाडा में बसे हिन्दी भाषियों को अपना संदेशा दिया. हमने भी लोगों से हिन्दी से जुड़ने के लिए ब्लॉग जगत में आने की अपील की और ब्लॉग खोलने और हिन्दी में टंकण के लिए किसी भी मदद के लिए हमसे संपर्क साधने की अपील की. उम्मीद है जल्द ही ब्रॉडकास्ट होगा.

इस मौके पर एक मजेदार बात यह रही कि जब हम सब कविगण ग्रीन रुम में बैठ कर रिकार्डिंग के लिए स्टूडियो सेट-अप का इन्तजार कर रहे थे तो एटीएन के सौजन्य से चाय और भुवनेश्वरी जी के सौजन्य से बेहतरीन कचौरी और मिठाई का लुत्फ उठाते हुए एक काव्य गोष्टी का आयोजन हो लिया. यह भी बड़ा ही आनन्ददायी रहा. सबने अपनी रचनाऐं सुनाई.

फिर शुरु हुई स्टूडियो में रिकार्डिंग. जगह की कमी के कारण तीन लोग ही एक बैठक में शामिल हो सकते थे. अतः सेट बना दो कवियत्रियाँ और एक कवि का.

हम पहले सेट में थे भुवनेश्वरी जी और लता जी के साथ. दूसरे में पराशर जी, सुश्री सविता अग्रवाल जी, सुश्री किरण जी. दोनों हिस्सों का संचालन सुश्री कान्ता अरोरा जी ने ही किया.

उसी वक्त की कुछ तस्वीरें:


बायें से दायें: भुवनेश्वरी जी, समीर लाल, लता पाण्डे जी और कान्ता अरोरा जी:
2


सुश्री किरण जी, श्री पराशर गौड जी, सविता अग्रवाल जी एवं कान्ता अरोरा जी:
7


श्री पाराशर जी, लता जी, कान्ता अरोरा जी, किरण जी, सविता जी, भुवनेश्वेरी जी, समीर लाला ग्रीन रुम में:
6


आपके अपने समीर लाल:
4

आगे एक पोस्ट में किसने क्या सुनाया, वो बताऊँगा. अभी इतने से संतोष कर लिजिये. Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, अक्टूबर 19, 2008

चलो, एक बार फिर हम तुम!!!

आज तो आनन्द ही आ गया, जब चिट्ठाजगत में आज जुड़े चिट्ठों के बारे में पता चला. पिछले २४ घंटो में ११७ नये चिट्ठे. अगर इसी तरह यह आंकड़ा चलता रहा तो १०००० चिट्ठों का दिन बहुत दूर नहीं. रोज पोस्टें सैकड़ा पार कर रही हैं. वक्त की अपनी बंदिशें हैं. सभी जगह पहुँच पाना कठिन होता जा रहा है. फिर भी कोशिश यही होती है कि जितना अधिक देख सकें.

एक सलाह सी है, कुछ लोग एक ही दिन में अभी भी चार चार पांच पांच या उससे भी ज्यादा पोस्ट कर रहे हैं. आपको दिनभर लिखना है, दिन भर लिखिये मगर कोशिश करके सबको अगर एक पोस्ट बना कर पोस्ट कर दें तो बेहतर हो जाये.

राजू श्रीवास्तव का लॉफ्टर होता तो वो जरुर कह उठते:

हम तो भरे बैठे हैं. हमारा मूँह न खुलवाओ. उनकी एक पोस्ट पर टिप्पणी लिख ही रहे हैं. सबमिट की कि उन्हीं की दूसरी पोस्ट हाजिर. वो टिपियाये, सबमिट की तो अगली हाजिर. पोस्ट लिख रहे हो कि हमको चिढ़ा रहे हो कि लगे रहो मुन्ना भाई टिपियाने में..हम भी न दौड़ाये तो कहना!!

महाराज!! कुछ तो रहम खाओ, इस काया पर. और साथ ही दूसरों की पोस्ट को भी कुछ देर रह लेने दो पहले पन्ने पर. बस, निवेदन ही बाकि तो जैसा जी में आये और जो उचित लगे, सो करिये.

एक तो लोगों को यूँ ही चैन नहीं. बार बार वही बात कि ये आदमी इतनी टिप्पणी कैसे करता है, क्यूँ करता है, कट पेस्ट करता है, रेडीमेड टिप्पणी चिपकाता है, नेटवर्क बनाता है, टिप्पणी पाने के लिए करता है..

मानो ये सब करके मुझे खजाना मिलने वाला है कि वाह, उड़न तश्तरी-इस साल तुमने सबसे ज्यादा टिप्पणियाँ पाईं तो तुमको नोबल पुरुस्कार दिया जाता है या फिर कोई खद्दरधारी चले आयेंगे कि भाई, बहुत बेहतरीन जनाधार है. आओ मैडम ने बुलाया है, तुमको सरदार बनायेंगे. आज से तुम भारत के प्रधान मंत्री. हम कहेंगे कि मैडम, हम तो चुनाव तक नहीं लड़े हैं और वो कहेंगी कि पहले प्रधान मंत्री बन लो, बाकि सब सेट हो जायेगा. ऐसे जनाधार वाले लोगों को हम नहीं छोड़ते.

हिन्दी चिट्ठाकारी की टिप्पणी साईकिल: वर्तमान परिपेक्ष में:




भई, अपना अपना काम शांति से करो न. कुछ मदद चाहिये तो बताओ. ये क्या है कि वो ये क्यूँ करते हैं. हम तो ऐसा नहीं करेंगे चाहे कोई हमारे द्वारे आये या न आये. अगर इतने ही निर्मोहि हो तो इसमें बताना क्या?

क्या फरक पड़ता है कि शास्त्री जी ने क्या कहा या उन्होंने १० चिट्ठों पर टिप्पणी करने की सलाह दी. अरे, हमसे पूछोगे तो हम १०० पर करने की देंगे और एक दो को जानता हूँ, उनसे पूछोगे तो वो कहेंगे कि एक ही जगह इक्कठे होकर गाली बको. सबकी अपनी सोच है, जो जिसे प्रभावित कर जाये.

सलाहकारों के देश में एक भारतीय मौलिक अधिकार के तहत सलाह ही दी जा रही है अपनी समझ से निवेदन के माध्यम से. मानना है मानो वरना कोई कानून तो पारित किया नहीं है उन्होंने. फिर कैसी परेशानी?

सब सोच की बात है-मान लो तो नये लोगों को जोड़ कर परिवार सुदृढ किया या मान लो नये लोगों को लाकर भीड़ की भभ्भड़ मचवाई दिहिन. जैसा दिल चाहे मानो.

कुछ पंक्तियाँ जेहन में आईं:

वो
दूर खड़ा

चाँद को
कोसता रहा..


रोशन जहाँ
उसे
रास नहीं आता!!!


खैर, लिखो-और कुछ हो न हो पोस्ट की संख्या तो बढ़ती चलेगी. थोड़ा सनसनी भी मची रहेगी. चहल पहल बाजार की पहचान है शायद कल को व्यापार और सौदे होने लगे तो कुछ फायदा भी हो जाये. इन्तजार तो है ही ऐसे शुभ दिवस का.

अनेकों शुभकामनाऐं.

***********************************************************


आज एक नया हाथ आजमाने का मन किया है.

बहर-ए-रमल २१२२,२१२२,२१२२,२१२ में एक गज़ल लिखने का प्रयास किया है.

मास्साब पंकज सुबीर से डांट खा खा कर कुछ सुधार तो आ ही गया होगा.


भूल बैठे हैं उसे, जीते थे जिसके नाम से
दूरियां कुछ हो गई हैं, आज उनकी राम से.

मत लगा नारे यहाँ पर, धर्म के ईमान के,
सो रहे हैं मौलवी जी, तान कर आराम से.

अब न जागे तो समझ लो, हाथ आयेगा सिफर
खेलते हैं रोज कितने, देश की आवाम से.

कल मरे थे लोग कितने, रो रही थी ये जमीं
महफिलें सजने लगेंगीं, देख लेना शाम से.

कौन कैसे मर रहा है, कौन पूछेगा यहाँ
बेच आये ये जमीरां, कौड़ियों के दाम से.

नाम जिसका है खुदा, भगवान भी तो है वही
भेद करते हो भला क्यूँ, इस जरा से नाम से.

-समीर लाल 'समीर' Indli - Hindi News, Blogs, Links