शनिवार, मार्च 31, 2007

इसे कहते हैं ठीकरा फोड़ना

अब देखिये, विश्च कप से भारत शुरु में ही बाहर हो गया. पहले तो हमें लगा कि इस हार का ठीकरा हमारे सिर ही फूटेगा. लोग कहेंगे कि गलत गलत तथ्य दे देकर टोक लगा दी. वो तो भला हो सबका कि किसी नें हमारे उपर इल्जाम नहीं लगाया. हमारे बदले धरा गये ग्रेग चैपल और सारे सारे खिलाड़ी. हम तो किनारे बैठे देखते रहे उनकी भद्द उतरते.

कोई समझ ही नहीं पाया कि असल गलती किसकी है. यह ग्रेग चैपल और उनके खिलाड़ियों की किस्मत खराब थी जो धरा गये. असल हार का कारण तो किसी ने तह में जाकर देखा ही नहीं.

दरअसल, हार के जिम्मेदार जो दो लोग हैं, उनमें से एक तो वो जिनका आप कुछ बिगाड़ ही नहीं सकते. अगर बिगाड़ना है तो उपर जाना पड़ेगा. उनका नाम है स्व. श्रीमती इंदिरा गाँधी.




न वो बंगलादेश बनवाती, न उनकी कोई क्रिकेट टीम होती और न ही हम हारते.


और दूसरे वो जिनके आगे आप भारत की जीत के लिये माथा टिकाते नहीं थके. वो हैं राम भक्त हनुमान.





अगर वो लंका ठीक से जला कर आये होते, तो फिर न तो लंका होती, न लंका की टीम होती और न हम हारते.


काहे, ग्रेग चैपल और अपने खिलाड़ियों के पीछे पड़े हो भाई!! काहे हार का ठीकरा उनके सर फोड़ते हो. दोष उनका नहीं है!



ये कैसा शोर अब, फिज़ाओं में छाया है
बेवफा वो और मुझ पे इल्जाम आया है.


(आधार-एक अनजान ईमेल)

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सोमवार, मार्च 26, 2007

क्या भाई!! अकेला देख हड़काते हो?

बस क्या!!! मुक्तक महोत्सव ही रुके??

बहुते दुखी हूँ भाई!!

यह भी कोई बात हुई?

आदमी को अकेला देख हड़काते हो?

घटना इस तरह रही. एक शरीफ गीत लेखक(हांलाकि ऐसा कम ही देखने में आता है) अपने मन का, वो भी जनता की फरमाईश पर, एक छोटा सा मुक्तक-महोत्सव करता है. अब जैसा कि हर उत्सव में होता है, आम जनता को थोड़ी सी परेशानी तो होती ही है. नारद नामक सर्वजनिक स्थल पर सिर्फ गीतकार ही गीतकार नजर आने लगते हैं बाकि सब नेपथ्य में चले जाते हैं. जैसा कि हर उत्सव के दौरान होता है, चाहे वो उ.प्र. का चुनावी उत्सव ही क्यूँ न हो. भले बोर्ड की परीक्षा हो. बालक पढ़ ना पायें, मगर उत्सव तो होगा ही और खूब धूम धाम से होगा. जनता झेल पाती है कि नहीं यह तो नहीं मालूम मगर नारद पर उनका वर्चस्व जरुर नाकाबिले बर्दास्त हो जाता है. जब आदमी का बुरा वक्त आता है तो मौहल्ले का जमादार भी समझाईश का पुलिंदा थमा देता है, सो ही उड़न तश्तरी ने किया. तुरंता उड़ान भरी और टिक गई गीतकार के दरवाजे जा कर. लगे समझाने कि यह गलत है जो आप कर रह हो, सबको बराबर मौका मिलना चाहिये, ऐसा थोड़े चलेगा कि नारद पर आप ही आप हों.

जैसा कि हर उत्सव में होता है, आम जनता को थोड़ी सी परेशानी तो होती ही है. नारद नामक सर्वजनिक स्थल पर सिर्फ गीतकार ही गीतकार नजर आने लगते हैं बाकि सब नेपथ्य में चले जाते हैं. जैसा कि हर उत्सव के दौरान होता है, चाहे वो उ.प्र. का चुनावी उत्सव ही क्यूँ न हो. भले बोर्ड की परीक्षा हो. बालक पढ़ ना पायें, मगर उत्सव तो होगा ही और खूब धूम धाम से होगा.


वो तो गीतकार सज्जन व्यक्तित्व के धनी, गीतकार हो कर भी, कि मान गये और उत्सव रोक दिया. बड़ा चिंतन किये, सोचे-समझे और उत्सव रुक गया. अब लो उत्सव रुका नहीं कि ईमेल और टिप्पणियों के माध्यम से फिर लोगों ने उनसे फरमाईश रखी कि रुकना नहीं चाहिये. अब बताओ, किसकी सुनें वो. वो तो थक से गये और ऐसा थके कि चिट्ठा-चर्चा भी सस्ते में निपटा कर भाग खड़े हुऐ.

बड़ा खराब लग रहा है. इतने अच्छे गीतकार. और उससे भी ज्यादा, गीत लिखते हुऐ भी, एक अच्छे इंसान. यह सरासर नाइंसाफी है.

क्या गल्ती है उनकी. यही न, कि सिर्फ़ अपना लिखा छापते रहे. गीतकार जी, मैने आपको पहले भी कहा था कि अच्छा बुरा न परखो. चिट्ठा जगत से कुछ सिखो. अच्छा या बुरा, जैसा भी जो लिखता हो, उसे अपने बैनर के नीचे लाओ, हमें भी ले लो. अब जब गीतकार से महोत्सव मनाओगे तब एक आपकी, एक हमारी..एक एक कई बाकियों की....तो भले ही छपे गीतकार से लेकिन उसका बुरा नहीं लगाया जाता है यहाँ. यहाँ बुरा वो है जो अपने ही लिखे को दो तीन बार से ज्यादा एक दिन में प्रकाशित करे. वो अतिक्रमण कहलाया. मगर प्रकाशन करने वाला अगर गीतकार ही हो और लेखक अलग अलग हो तो फिर ठीक है फिर भले ही आप पूरा पन्ना ही घेर लो, चलता है कोई कुछ नहीं कहेगा..कभी इसकी पाती और कभी उसकी. फिर कभी इसकी कविता और कभी गद्य रुपी होते हुये भी उसकी कविता..बस, शर्त यह है कि बैनर एक होते हुये भी लेखक अलग होना चाहिये.

मगर प्रकाशन करने वाला अगर गीतकार ही हो और लेखक अलग अलग हो तो फिर ठीक है फिर भले ही आप पूरा पन्ना ही घेर लो, चलता है कोई कुछ नहीं कहेगा..कभी इसकी पाती और कभी उसकी. फिर कभी इसकी कविता और कभी गद्य रुपी होते हुये भी उसकी कविता..बस, शर्त यह है कि बैनर एक होते हुये भी लेखक अलग होना चाहिये.


फिर आजकल तो छ्द्म नामों का फैशन चला हुआ है, आप ही काहे नहीं पाँच नाम से लिखते हैं. पहले मुक्तक पर एक...बाकि चार की झूठमूठ चार टिप्पणियां जिन्हें देख दो चार और सच वाली भी आ ही जायेंगी..आपने तो देखा है, आती ही हैं. फिर अगला मुक्तक इसी बैनर में दूसरे नाम से...यह अलाउड है. शुरु करो न, गीतकार पर..मेरे मुक्तक साथी टाइप या हमारे साथी की पाती टाइप, हम भी हाथ बटायेंगे. जब हर कोई इसी तरह चल रहे हैं तो इतने खराब तो हम भी नहीं.

यही तो जमाना है भाई!! आप तो बुरा सा मान गये. इससे काम नहीं बनता. आजकल खुद की तारीफ में भी आत्म निर्भरता का सीजन है. बस यही रास्ता सुलभ और सर्व-स्विकार्य है.

अपना उत्सव जारी रखो. फर्मेट बदल दो. चिट्ठाजगत पर नजर दौडाओ..मेरी बात मानो कि फार्मेट बदल कर भी आप ही आप दिख सकते हो. लोग दिख ही रहे हैं. जब तक कि उस पर रोक नहीं लगती तब तक तो फायदा उठाओ. नैतिकता से काम नहीं बनता. नैतिकता का पालनकर्ता आज की नई दुनिया में पागल और बेवकूफ कहलाता है. जमाना बदला हुआ है, आप भी बदलो न, प्लीज!!

सुनाओ न कुछ मुक्तक!! Indli - Hindi News, Blogs, Links

“हैल्ल्लो!!! यह है तरकश हॉटलाईन!!!

“हैल्ल्लो!!! यह है तरकश हॉटलाईन!!! और मैं खुशी बोल रही हूँ..आपसे मेरा सवाल है…..” यह आवाज सुनते ही अच्छे अच्छे धुरंधर चिट्ठाकारों के माथे पर पसीने की बूँद छलक आती है और शुरु होती है-खुशी के प्रश्नों की बौछार. कभी व्यक्तिगत, फिर चटपटे और फिर रेपिड फायर राऊंड और फिर चिट्ठाकार के जीवन साथी से बातचीत. कितना कुछ घट जाता है उसी पाँच मिनट के अंतराल में और तब सभी चिट्ठाकार पॉडकास्ट के माध्यम से सुनते हैं अपने पसंदीदा चिट्ठाकार से खुशी की अंतरंग बातचीत.

बहुत मजेदार और अनोखा सिलसिला शुरु किया है तरकश टीम ने और उसकी बागडोर संभाली खुशी ने. हर नये पॉडकास्ट के साथ खुशी की आवाज में एक नया आत्मविश्वास आता जा रहा है, वहीं चिट्ठाकारों की हालत खराब होती जा रही है, वक्त पर जवाब ही नहीं बन पाता. :)

हर १५ दिन में एक नया चिट्ठाकार खड़ा होता है खुशी की अदालत में…और इस बार इसी क्रम में सुनिये अपने पसंदीदा, जिंदादिल नौजवान चिट्ठाकार साथी रवि रतलामी और उनकी पत्नी रेखा रतलामी जी को…तरकश हॉटलाईन पर-खुशी के साथ.

रवि रतलामी से बातचीत

तैयार रहिये-क्या पता, अगला नम्बर आपका हो!!

तरकश हॉटलाईन……खुशी के साथ….. Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, मार्च 22, 2007

विश्वकप-लगता तो भारत का है

आज एक ई-मेल के माध्यम से प्राप्त जानकारी से लगता तो है कि क्रिकेट विश्व कप २००७ भारत को ही मिलना चाहिये.

सारे तथ्य उसी ओर इशारा कर रहे हैं, अब इसे देखें (कल २३ तारीख के पहले देख लेना शायद उसके बाद देखने की जरुरत ही न पड़े :)) :

वर्ष १९८१:

१.प्रिंस चार्लस की शादी हुई
२.यूरोप फुटबाल चेम्पियनशिप में लिवरपुल चेम्पियन
३.आस्ट्रेलिया एशेज ट्राफी हारा
४.पोप की मृत्यु
५.१ वर्ष बाद इटली फुटबाल का विश्व विजेता
६.२ वर्ष बाद भारत विश्व क्रिकेट कप विजेता (वेस्ट इंडिज को हैट्रिक बनाने से रोका)


वर्ष २००५:

१.प्रिंस चार्लस की शादी हुई
२.यूरोप फुटबाल चेम्पियनशिप में लिवरपुल चेम्पियन
३.आस्ट्रेलिया एशेज ट्राफी हारा
४.पोप की मृत्यु
५.१ वर्ष बाद इटली फुटबाल का विश्व विजेता (२४ वर्षों बाद)
६.२ वर्ष बाद भारत विश्व क्रिकेट कप विजेता (आस्ट्रेलिया को हैट्रिक बनाने से रोका)??

बड़ा अच्छा लगा भाई पढ़कर.


सुना है मैने, इतिहास अपने को दोहराता है
तुम्हारी हालत देख, यकीं नहीं आ पाता है.
काश. कोई करिश्मा ऐसा हो जाये अब तो
दिखा दे कि विश्वास, नाहक ही डगमगाता है.


अनेकों शुभकामनायें......

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रविवार, मार्च 18, 2007

दो भाई, दोनों अलबेले

तब माँ जिंदा थी. हम भाई घर से दूर अपनी अपनी दुनियाँ में आजिविका के लिये जूझा करते थे. हमारे अपने परिवार थे. मगर हर होली और दिवाली को हम सबको घर पहुँचना होता था. पूरा परिवार इकठ्ठा होता. मामा मामी, चाचा चाची, मौसा मौसी, बुआ फूफा और उनके बच्चे. घर में एक जश्न सा माहौल होता. पकवान बनते, हँसी मजाक होता. ताश खेले जाते और न जाने क्या क्या. उन चार पाँच दिनों का हर वक्त इंतजार होता. माँ कभी एक भाई के पास रहती, कभी दूसरे के पास मगर अधिकतर वो अपने घर ही रहती. वो उसके सपनों का महल था. उसे उसने अपने पसंद से बनाया और संजोया था. वहाँ वो अपने आपको को रानी महसूस करती थी, उस सामराज्य की सत्ता उसके हाथों थी. उस तीन कमरे के मकान में उसका संसार था, उसका महल था वो, उसका आत्म सम्मान था. हम सब भी उसी महल के इर्द गिर्द अपनी जिंदगी तलाशते.

अधिकतर वो अपने घर ही रहती. वो उसके सपनों का महल था. उसे उसने अपने पसंद से बनाया और संजोया था. वहाँ वो अपने आपको को रानी महसूस करती थी, उस सामराज्य की सत्ता उसके हाथों थी. उस तीन कमरे के मकान में उसका संसार था, उसका महल था, उसका आत्म सम्मान था. हम सब भी उसी महल के इर्द गिर्द अपनी जिंदगी तलाशते.
सारे बचपन के साथी उसी महल की वजह से थे. न वो रहे- न साथी रहे. अजब खिंचाव था. फिर एक दिन खबर आती है कि माँ नहीं रही (इतना अंश मेरे अंतरंग मित्र रामेश्वर सहाय 'नितांत' की कहानी "माँ" से, जो मैने उसे लिखकर दिया था और उसने इसका आभार लिखा था नवभारत दैनिक में).....................अब इस कविता को देखें:

दो भाई:

दो भाई, दोनों अलबेले
एक ही आँगन में वो खेले
एक सा माँ ने उनको पाला
एक ही सांचे में था ढाला

साथ साथ बढ़ते जाते हैं
फिर जीवन में फंस जाते हैं
राह अलग सी हो लेती है
माँ याद करे-फिर रो लेती है.

दोनों की वो सुध लेती है
उनके सुख से सुख लेती है
फिर देखा संदेशा आता
दोनों को वो साथ रुलाता.

माँ इस जग को छोड़ चली है
दोनों से मुख मोड़ चली है
दोनों का दिल जोड़ रहा था
वो सेतु ही तोड़ चली है.

शांत हुई जो चिता जली थी
यादों की बस एक गली थी
पूजा पाठ औ' सब काम हो गये
अब जाने की बात चली थी.

दोनों फिर निकले-जाते हैं,
फिर जीवन में फंस जाते हैं.
रहा नहीं अब रोने वाला
देखो, कब फिर मिल पाते हैं.

--समीर लाल 'समीर' Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, मार्च 14, 2007

आमंत्रण अमेरिका से: एक सुनहरा मौका


बात सुर में चली है, चले आईए
महफिल अबकी जमीं है, चले आईए
झूमती है निशा, गीत की ताल पर
आपकी बस कमी है, चले आईए.


आईये, सुनिये और बात करिये:

भारत से पधारे जाने-माने कविगण:

डॉ. सोम ठाकुर
डॉ. कुँवर बैचेन
श्री सुरेन्द्र सुकुमार
डॉ.अनिता सोनी

हम अमेरिका (न्यूयार्क) के समय के अनुसार बुधवार दिनांक १४ मार्च, २००७ की रात के ८ बजे से याहू मैसेन्जर पर इन कवियों से बात करेंगे । उस समय भारत में गुरुवार को सुबह के ५:३० बजे होंगे । हम करीब ३ घंटे तक उपलब्ध रहेंगे । हम चारों कवियों से उन की कविताएं सुनेंगे और बात भी करेंगे । आप उन्हें सुन पायेंगे और देख भी पायेंगे । याहू मैसेन्जर (Yahoo Messenger) पर आप anoop_bhargava@yahoo.com को जोड़ लें । पूरा वायदा तो नहीं कर सकते कि कामयाब होंगे लेकिन एक सार्थक कोशिश ज़रूर होगी । अमेरिका और कनाड़ा से अगर आप फोन के माध्यम से कांन्फ्रेंस में जुड़ना चाहें तो आप उन्हें 605-990-0001 PIN 156678 पर भी सुन सकेंगे । तकनीकी सहायता के लिये 609-275-1113 पर बात करें या अनूप भार्गव जी को anoop_bhargava@yahoo.com पर लिखें ।

नोट:

१.बहुत अल्प सूचनावधि देने हेतु क्षमा चाहूँगा.

२. यह क्षमा-वमा बाद में करते रहना, अभी तो इतने बड़े बड़े कवियों को सुन लो, ऐसे मौके बार बार नहीं आते. :)

लौट कर:

इस पोस्ट पर राकेश खंडेलवाल जी की टिप्पणी के द्वारा कवि परिचय:

डॉ.अनिता सोनी

सोहनी की कहानी को इतिहास गाता रहा
आज इतिहास यहां गाने लगी सोहिनी
वाणी में विहाग लिये और अनुराग लिये
स्वर को सजाने लगी आज मनमोहिनी
आपके समक्ष आके मंच से जो काव्य पढ़े
गीत में करे है आज गज़लों की बोहनी
सोनी है कवित्री बड़ी लोग कहें अनिता है
पर आप मानिये , ये कविता है सोहिनी


डॉ. सोम ठाकुर

चन्दन की शाखों से गा कर नाग पाश के बंध हटाये
भैया को रसभरी खीर, भाभी को खट्टी अमिया लाये
शपथ दिला कर याद प्रीत को न्यौता सुबह शाम भिजवाये
शत शत नमन करूँ भारत को, पल पल सोम मंच से गाये

श्री सुरेन्द्र सुकुमार

ज़िन्दगी है चार दिन की जानते हैं सभी हम
इसीलिये ज़िन्दगी में प्यार होना चाहिये
बात जो भी कोई कहे साफ़ साफ़ कही जाये
नौ नकद,तेरह न उधार होना चाहिये
स्वर्ण के आभूषणोंकी कामना हो आपको तो
गढ़ने को एक फिर सुनार्होनाचाहिये
शिष्ट हास्य सुनना जो चाहें अगर आप सब
मंच पर कवि सुकुमात होना चाहिये

डॉ. कुँवर बैचेन

एडीसन जायें आप इडली खायें,डोसा खायें
साथ साथ भेलपूरी खायें ये जरूरी है
आपकी पसन्द वाला गीत कोई गुनगुनाये
साथ साथ आप उसके गायें ये जरूरी है
जर्सी में जायें आप कविता के नाम पर तो
भार्गवजी चाय भी पिलायें ये जरूरी है
और जब बेचैन कुँअर जी गीत गायें
आप झूमें तालियां बजायें ये जरूरी है. Indli - Hindi News, Blogs, Links

रविवार, मार्च 11, 2007

कबीरा चला साइलेंटली

कबीरा चला साइलेंटली, मौज में करता सैर
राह बीच दंगल घिरे, नहीं किसी की खैर...
नहीं किसी की खैर, महौल तो रहा बिगड़ता
गाली पे गाली चली, आपस में गुत्थम गुत्था.
कहे समीर कवि कि हमें न तुक है बनता
लोग लगे हैं पूछने कि काहे को चुप हैं संता.


--अब जब कबीरा साइलेंट है तो हमारी क्या औकात कि हम कुछ बोलें. वैसे तो मेरा मानना है कि प्रश्न को किस अर्थ में किया गया और उसे किस अर्थ में लिया गया, वह ही ब्रह्म है.

हर चीज हर जगह एक ही तरह से सहज नहीं कहलाती. जैसे इसे देखें कि आम के पेड़ से आम तोड़ने के लिये पत्थर मार कर तोड़ोगे तो इस सहज घटना में आपको आम की प्राप्ति हो सकती है..मगर क्या यूँ ही कमल भी तोड़ोगे. सिवाय छपके कींचड़ के छिंटों के कुछ नहीं मिलेगा. अगर कमल पर निशाना सध भी गया और वो टूट भी गया, तो तुम्हारे हिस्से तो कींचड़ ही आयेगा..कमल उसी कींचड़ मे कहाँ खो जायेगा, पता भी नहीं चलेगा. फिर दोष देते रहना उन अग्रजों को जिन्होंने निशाना साधना सिखाया था.


ह्द करते हो यार, जब कबीरा सिखाता है कि कींचड़ में पत्त्थर मारोगे तो कींचड़ ही तुम्हारे ऊपर आयेगा..तब तो नजर अंदाज कर देते हो...
और जब कींचड कपड़े खराब कर देता है तो कबीरा पर दोष देते हो कि उसने कींचड़ को रोकने में हमारा साथ नहीं दिया. कबीरा तो बहुत पहले समझा गया था मगर अभी तो बस इतना ही हुआ कि ....कबीरा चला साइलेंटली...अब इसमें भी दोष दिखे तो कबीरा क्या करे....नट डांस दिखाये.

ह्द करते हो यार, जब कबीरा सिखाता है कि कींचड़ में पत्त्थर मारोगे तो कींचड़ ही तुम्हारे ऊपर आयेगा..तब तो नजर अंदाज कर देते हो...और जब कींचड कपड़े खराब कर देता है तो कबीरा पर दोष देते हो कि उसने कींचड़ को रोकने में हमारा साथ नहीं दिया. कबीरा तो बहुत पहले समझा गया था मगर अभी तो बस इतना ही हुआ कि ....कबीरा चला साइलेंटली...अब इसमें भी दोष दिखे तो कबीरा क्या करे....नट डांस दिखाये.


मेरी बात अभी भी मान लो, फालतू के दंगों मे शहादत देने की जरुरत नहीं, आज तक कोई शहीद नहीं कहलाया इसमें. यह उन्माद भी ठीक नहीं. कोई भी वीर नहीं कहलाया है इस तरह.

अच्छा चलो एक ही प्रश्न दो जगह अलग माहौल मे पूछा जाये तो क्या होता है उसे देखो..सच घटना बताता हूँ:

आदमी बच्चा गोद में उठाये है और पार्टी में चार-पाँच महिलाये बैठी है.. और आदमी पूछता है कि यह किसका बच्चा है..माँ बहुत गर्व से कहती है कि मेरा है...वाह...और उसे गोद ले वो चूमने लगती है.!!


अब दूसरा सीन देखें.. चार -पाँच महिलाये बैठीं हैं और उनमें से एक सात माह की गर्भवती है..और एक पुरूष उसके सामने आकर पूछता है, उसके पेट की तरफ ईशारा कर...यह किसका बच्चा है...कितना मतलब बदल गया..पूछने वाला कितना पिटा...या उसकी क्या दुर्दशा हुई.... बस यही बताना चाह रहा हूँ कि माहौल समझो यार....हर बात का शाब्दिक अर्थ न निकालो.

चलो मैं ग्लानी से भर गया कि तुम्हे गलत कहा गया और मैं चुप रहा और तुम मुझे भाई साः कहते नहीं थके. अब क्या करें...वो भी बता दो... वो वाली हवा बन जायें जो आग को बढ़ावा देती है या वो वाली जो उसे बुझा देती है या वो वाली जो आती ही नहीं और सब समय के साथ अपने आप सामान्य हो जाता है, उसे किसी खास हवा की जरुरत ही नहीं....यह मेरी पसंदीदा है और मैं नहीं आऊंगा ऐसे महौल में, यही मेरी निती है. तुम मुझे गलत समझते हो तो समझो..

मैनें दूनिया देखी है..तुम्हारी उम्र की मजबूरी है कि तुमने कम देखी है मुझसे...शायद भविष्य तुम्हें समझाये या आज मेरी लेखनी..मैने सुना है युवा मुझसे ज्यादा समझता है...शायद तुम इसको सत्यापित कर सको!!!


मैनें दूनिया देखी है..तुम्हारी उम्र की मजबूरी है कि तुमने कम देखी है मुझसे...शायद भविष्य तुम्हें समझाये या आज मेरी लेखनी..मैने सुना है युवा मुझसे ज्यादा समझता है...शायद तुम इसको सत्यापित कर सको!!!


यह मेरी अंतर्भावना है और मुझे लगता है कि अधिकतर ऐसा सोचते होंगे...और मैं गलत न ठहराया जाऊँगा..और बोनस में, कम से कम संजय और पंकज बैगाणी के द्वारा.

चलो, जो भी हो, हम चलते हैं...अच्छा सोचो यही उम्मीद है.........................शुभकामनायें...

अभी भी हमारी सोच को जिंदा रखने वाले लोग हैं... वही झूमेंगे हमारे साथ............कुछ दिन में तो हम आदि हो ही जायेंगे..मगर जब तक चल रहा है आदर सहित चलता रहे......

और बाकि सब तो जय हो जय हो.. हरि ऊँ..............जय हो समिरानन्द की...और जय हो...........कबीरा की...............जो खड़ा है बेचारा साइलेंटली...

फिर तुम तो मेरे साथ ही हो...हो न!! Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, मार्च 08, 2007

जोश की जोशिली शुरुवात

सुबह आराम से बैठे धूप सेंक रहे थे कि फोन की घंटी घनघना उठी.

"हेलो,पंकज बैंगाणी बोल रहा हूँ, तुरंत ऑफिस आ जाओ."

अभी हमने पूछा ही था कि "क्या हुआ, सब ठीक ठाक तो है.कुछ काम है क्या?"

कि पंकज बाबू झल्ला गये, "क्या कोई नाच की पार्टी तो रखी जायेगी नहीं. काम ही होगा, तभी बुलाया जा रहा है. बिना बुलाये तो झांकने की फुरसत आप लोगों को है नहीं."

और उन्होंने फोन ही काट दिया.

हम भी तैयार हुये और टैक्सी करके निकल पड़े तरकश के दफ्तर की तरफ.

मन में कई विचार आ रहे थे और सोच रहा था कि आखिर पंकज "आप लोगों" कैसे बोले. हमारे सिवाय कोई भी और निष्क्रिय दिमाग में आ ही नहीं रहा था. ऐसा नहीं कि हम पूरी तरह निष्क्रिय हों. कभी कभी ईमेल से संपर्क करते रहते हैं. मगर वह उतना काफी नहीं है कि सक्रिय कहा जायें.

हमारे सिवाय और भी कोई निष्क्रिय दिमाग में आ ही नहीं रहा था. ऐसा नहीं कि हम पूरी तरह निष्क्रिय हों. कभी कभी ईमेल से संपर्क करते रहते हैं. मगर वह उतना काफी नहीं है कि सक्रिय कहा जायें.


दफ्तर पहूँचे तो काफी गहमा गहमी लग रही थी. मगर संजय भाई अपने कमरे में चुपचाप चिर परिचित मुस्कान चेहरे पर लिये बैठे थे. हमने भी सोचा कि पहले इनसे मिल लिया जाये.

बहुत गरम जोशी से मिले. कहने लगे, पहले कॉफी पी लिजिये, फिर चलते हैं मिटिंग में. हम भी सुबह से चाय नहीं पिये थे सो मान गये.

संजय भाई ने मुन्ना चपरासी को आवाज लगाई, " मुन्ना, है क्या तू". वाह, इतनी पतली और सुरीली आवाज..हमें लगने लगा कि मुन्ना न हो और ये आवाज लगाते रहें और हमें लता जी टाइप संगीत का आनन्द मिलता रहे."


"मुन्ना है तू, मेरा राजा है तू...
तू मेरी आँखों का तारा है तू...."


जो लोग संजय भाई से नहीं मिले हैं या आज तक बात करने से वंचित रहे हैं, उनकी जानकारी को बता दूँ कि इनकी कलम जितनी तीखी और पैनी है, आवाज उतनी ही मधुर और सुरीली.

खैर, कुछ देर बाद मुन्ना आये. मगर सुनने नहीं, सुनाने. आ कर बता गये कि "फालतू काम के लिये समय नहीं है, पंकज साहब का जरुरी काम कर रहा हूँ."

संजय भाई शर्मिंदा होते, इसके पहले ही हमने उनसे कहा कि चलिये नीचे चल कर पी आते हैं. वो भी तुरंत तैयार हो गये जैसे हमने उनके मन की बात कर दी हो.

जब तक हम लोग कॉफी पीकर लौटे, तरकश मिटिंग शुरु हो गई थी और मुन्ना बाहर ही मिल गया कि पंकज साहब आप दोनों को कब से बुलवा रहे हैं.

संजय भाई तेज तेज चले और हम पीछे पीछे. मिटिंग रुम में पहूँचे. चार पाँच २० से २७ साल के युवाओं को पंकज साहब कुछ बड़े जोशिले अंदाज में समझा रहे थे. हम दोनों को देखकर मूँह बनाया और बोले, "अब खड़े ही रहेंगे कि बैठेंगे भी"

सारी कुर्सियों पर तो यह युवा बैठे थे. हम लोग कहाँ बैठेते. पंकज साहब की घूमने वाली कुर्सी के बाजू में एक बैंच पड़ी थी, उसी ओर पंकज जी इशारा कर के फिर बातों में मशगुल हो गये.

हम और संजय भाई उसी बैंच पर बैठ गये. ३/४ पर हम और १/४ पर संजय भाई और तीन लोगों वाली पूरी बैंच हम दो से भर गई.

सचिव ने घोषणा की कि अब सभापति जी का भाषाण होगा.

हम बस उठने वाले ही थे कि पंकज साहब मुस्कराकर खड़े हो गये माईक के सामने. हम आधे उठे से फिर बैठ गये.

भाषाण शुरु भी हो गया:


"मेरे युवा साथियों,

मुझे नाज है आप लोगों के जोश पर. आपके जोश के चलते आज से हम तरकश पर नया कॉलम शुरु कर रहे हैं "जोश".

अनुभवी लोगों का कमाल हम सब देख चुके हैं. अगर हम अब भी अनुभवी लोगों की तरफ ही ताकते रहे, तो तरकश भी कुछ दिनों में भारतीय संसद हो जायेगा.

आज जरुरत है युवाओं को आगे आने की. अपना जोश दिखाने की. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप अंग्रेजी में अपने विचार लिखें या रोमन में या फिर देवनागरी में. फरक पड़ता है तो लिखने से.

इन दोनों महारथियों को देखिये, हिन्दी हिन्दी चिल्लाते रहते हैं और लिखते कुछ नहीं. पिछले कितने समय का तरकश उठा कर देख लें कि इन दोनों ने कितना लिखा है. बहुत हुई इनकी रहनुमाई. यह जरुर है कि बाजार में इनकी अलग साख है तो बस वही वजह भी है कि हम इन्हें तरकश में सजा कर रखे हैं मगर भरोसा आप युवाओं पर है.

आप हमारे साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलें. जोश में अपना पूरा जोश उडेल दें. फिर देखिये, हम तरकश को किन ऊँचाईयों पर ले जाते हैं."


आज जरुरत है युवाओं को आगे आने की. अपना जोश दिखाने की. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप अंग्रेजी में अपने विचार लिखें या रोमन में या फिर देवनागरी में. फरक पड़ता है तो लिखने से. इन दोनों महारथियों को देखिये, हिन्दी हिन्दी चिल्लाते रहते हैं और लिखते कुछ नहीं. पिछले कितने समय का तरकश उठा कर देख लें कि इन दोनों ने कितना लिखा है.


मिटिंग रुम युवाओं की जोशिली तालियों की गूँज से गूँजायमान हो उठा. ताली हमने और संजय भाई ने भी हल्के से बजायी. मगर सर झुकाये झुकाये ही.

सभापति महोदय का भाषाण खत्म हुआ. सब चले गये. हम और संजय भाई वहीं बैंच पर बैठे रहे जबकि सारी कुर्सियाँ अब खाली हो गई थी.

हम और संजय भाई ने एक दूसरे को इस तरह देखा, मानो कह रहे हों कि " अभी भी होश में आ जाओ, तरकश के लिये फिर से सक्रियता से लिखना शुरु करो. वरना तो तरकश अपनी रफ्तार पकड़ ही लेगी इन युवाओं के साथ. हम दोनों छूट जायेंगे और अभी तो बैंच मिल भी गई. अगली मिटिंग में जमीन पर बैठना पडेगा और आगे शायद मिटिंग रुम में ही न घुस पायें."

आप भी देखे जोश की जोशिली शुरुवात और उत्साह बढ़ायें युवाओं का. आगे से हम और संजय भाई भी मेहनत करेंगे, यह मौन रहते हुये भी व्रत लिया है.






तरकश टीम को जोश की शुरुवात पर बहुत बहुत बधाई और शुभकामनायें. Indli - Hindi News, Blogs, Links

सोमवार, मार्च 05, 2007

होरियाये टुन्नू भेटें चिट्ठा चिट्ठा

आज होली के मौके पर हम और टुन्नू भाई बैठ कर सुबह से ही भांग छान रहे थे कि तभी उपर से आती पत्नी की आवाज सुनाई पड़ी. होली के माहौल मे गाना गाते उतर रहीं थीं, मदर इंडिया वाला, टून्नू तो सेंटी है, आँख से दो बूँद आँसूं बहा बैठा. खैर, हम भी रंग लेकर आंगन के दरवाजे के पीछे छिप गये, गीत नजदीक होता जा रहा था:


होली आई रे कन्हाई, होली आई रे....
...बरसे गुलाल रंग मोरे अंगनवा
अपने ही रंग में रंग दे मोहे सजनवा....



जैसे ही वो दरवाजे के पास आईं, हमने गैरेज पेंट होने आया नेरोलेक का काले पेंट का पूरा डब्बा उन पर उडेल दिया. मैडम का पारा सांतवे आसमान पर और आवाज डोल्बी साऊंड ट्रेक पर. 'ये क्या तरीका है, होली खेलने का!! उम्र बढ़ गई है और दिमाग वहीं का वहीं. '

हमने कहा, 'अरी भागवान, हम तो अबीर-गुलाल ही लगाने वाले थे, मगर उसमे तो काला रंग था नहीं, और तुम्हीं तो गा गा कर डिमांड कर रही थी " अपने ही रंग में रंग दे मोहे सजनवा...." तो क्या करते, तुम्हीं बताओ. होली के शुभ दिन पर भी तुम्हारी बात न रखें.

खैर, हम सफाई देते और करते रहे. टुन्नू टुन्नी में ही घबरा कर भाग गया, चिल्लाते हुये: बुरा न मानो, होली है. सब चिट्ठाकारों से होली भेंटने. उनके दरवाजे पहूँचा तो सबकी नेमप्लेट (चिट्ठों की टैग लाईन) देखकर उसके मन में अजब अजब विचार आये. आप भी देखें कि क्या सोचता है टुन्नू भांग के नशे में:





गीत कलश , राकेश खंडेलवाल

काव्य का व्याकरण मैने जाना नहीं छंद आकर स्वयं ही संवरते गये

टुन्नू-अगर स्वयं ही संवरते हैं तो हम क्या पाप किये हैं, हमारे काहे नहीं संवरते??

उन्मुक्त

भारत के एक कसबे से, एक आम भारतीय।

टुन्नू-बाकि सब क्या खास भारतीय हैं??

ई-पंडित, श्रीश शर्मा

ई-पंडित की ई-पोथी

टुन्नू-अच्छा बता दिये कि ई-पोथी है, नहीं तो हम तो कागजी समझते!!! वैसे जो लोग किताबें निकालते हैं, वो क्यूँ नहीं कहते, कागज की किताब. :)

गिरिराज जोशी "कविराज"

एक खण्डहर जो अब साहित्यिक ईंटो से पूर्ननिर्मित हो रहा है...

टुन्नू-पूर्ननिर्मित?? काहे फिर से मेहनत कर रहे हो, इसे पुरात्तव विभाग को दे देते हैं...वहीं ठीक रहेगा!! क्या सोचते हो??

पूनम मिश्रा

कुछ खट्टी ,क़ुछ मीठी ,कुछ आम सी दिनच्रर्या,क़भी कुछ खास पल ...इन सबका नाम है ज़िन्दगी .और उसी का निचोड है यह फलसफा .

टुन्नू-खट्टा मीठा तो ठीक है..मगर निचोड से फलसफा निकले तो रस कहाँ गया??

प्रत्यक्षा

कई बार कल्पनायें पँख पसारती हैं.....शब्द जो टँगे हैं हवाओं में, आ जाते हैं गिरफ्त में....कोई आकार, कोई रंग ले लेते हैं खुद बखुद.... और ..कोई रेशमी सपना फिसल जाता है आँखों के भीतर....अचानक , ऐसे ही

टुन्नू-हवा में टंगे शब्द को पकड़ने का हुनर हमऊ के सिखाये दो, ठकुराईन!!

अनूप शुक्ला

उम्र: २५० साल
(चाहो तो यहाँ क्लिक करके प्रोफाईल पर देख लो)

टुन्नू-हम पहिले ही समझ गये थे कि यह वैदिक कालिन हैं, २५० साल पुराने!! वरना इतनी कम उम्र में लेखन की इतनी ऊँचाईयां...वाह वाह!!

फुरसतिया

हम तो जबरिया लिखबे यार हमार कोई का करिहै

टुन्नू-जब तक जबरिया ना पढ़वाओ तब तक कोई कछू न करिहे!! काहे परेशान हो??

जोगलिखी

संजय बेंगाणी द्वारा कम शब्दों में खरी-खरी बात

टुन्नू- शब्द थोड़े ज्यादा भी हों तो भी चलेगा मगर खरी खरी बात न सुनाओ, दिल दहल जाता है, भाई!!! (भाई, बम्बई वाले), थोड़ा लाग लपेट कर सुनाओगे क्या?

मंतव्य

पंकज बेंगानी का हिन्दी चिट्ठा बेबाक सोच : बेबाक लेखन : बेबाक मंतव्य

टुन्नू-अच्छा किया बता दिया कि पंकज बेंगानी का हिन्दी चिट्ठा --वरना हम तो सोचते ही रह जाते कि कौन सी भाषा में लिखा है???

शुऐब

हिन्दी हैं हम .....................

टुन्नू-हिन्दी हैं हम...!! और संस्कृत, अंग्रेजी और उर्दू नहीं हो??

Divyabh Aryan

The Only Thing I Know About Myself Is That I Know Nothing... :

टुन्नू-ऐसा लगता तो नहीं, आपको पढ़कर?? अंग्रेजी भी लिख लेते हो. :)

मेरा पन्ना

चौकस निगाह,पैनी कलम और हास्य व्यंग के साथ भारत के राजनीतिक माहौल,देश की समस्याओ और राष्ट्रीय विषयो पर मेरी बेबाक राय ……… जगह नयी….पर.कलम वही

टुन्नू-चौकस निगाह......कहाँ कहाँ लगी हैं यह निगाह......हमें भी तो बताओ!! चौधरी जी महराज!! और यह जगह नयी कब तक रहेगी??

मनीषा

अच्छी चीजों का हिन्दी ब्लाग

टुन्नू-नहीं बतातीं तो हम समझते कि खराब चीजों का अंग्रेजी ब्लाग!!! :)

निठल्ला चिंतन

थोड़ी मस्ती थोड़ा चिंतन

टुन्नू- यार भाई, हर पोस्ट पर लिख दिया करो टैग के साथ कि कौन सी वाली मस्ती है और कौन सी चिंतन-बड़ा मुश्किल होता है छांटने बीनने में!!!

दस्तक, सागर चन्द नाहर

गिरते हैं शहसवार ही मैदाने जंग में वो तिफ़्ल क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं

टुन्नू-आप तो सबसे बड़े शहसवार हैं, कितनी बार गिरे??

इन्द्रधनुष, नितिन बागला

जिन्दगी के अनगिनत रंगों का संकलन; हँसी-मजाक, सुख-दुःख, यारी-दोस्ती,भूली बिसरी यादें, आस-पास के विभिन्न मुद्दों पर मेरे विचार...और भी ना जाने क्या-क्या.....

टुन्नू-और भी ना जाने क्या-क्या.....थोड़ा तो खुलासा करो, मेरे भाई...क्या सब कुछ यहीं लिख डालोगे!!! हूम्म्म्म!!

रचनाकार

इंटरनेट पर हिन्दी साहित्य के दस्तावेज़ीकरण का एक सार्थक प्रयास...

टुन्नू- सार्थक प्रयास,,,न आप बताते, न हम समझ पाते!! :)

की-बोर्ड का रिटायर्ड सिपाही, नीरज दीवान

ख़बरों की लत ऐसी कि शायद छुटाए नहीं छूटेगी.

टुन्नू- और बाकि की लतें, वो छूट गईं?? :)

आलोक, नौ दो ग्यारह

दिल तो है दिल, दिल का ऐतबार क्या कीजे आ गया जो किसी पे प्यार क्या कीजे

टुन्नू- जिस हिसाब लिखना स्थगित है, उससे लग ही रहा है..कि आ गया जो किसी पे प्यार क्या कीजे!! थोड़ा प्यार चिट्ठे पर भी आये तो बात बनें.

सृजन शिल्पी

अपनी मुक्ति के लिए प्रयत्नशील प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक मित्र, दार्शनिक और मार्गदर्शक के रूप में निरंतर उपलब्ध।

टुन्नू- जब भी मुक्ति के लिये प्रयत्नशील होंगे, आपसे संपर्क साधा जायेगा. तब तक ऐसे ही ठीक है!!

एक शाम मेरे नाम, मनीष

जिन्दगी यादों का कारवाँ है.खट्टी मीठी भूली बिसरी यादें.क्यूँ ना उन्हें जिन्दा करें अपने प्रिय गीतों ,गजलों और कविताओं के माध्यम से! अपनी एक शाम उधार देंगे ना उन यादगार पलों को बाँटने के लिये ..

टुन्नू- यार, उधार प्रेम की कैंची है, ऐसा पान वाले ने बताया है. आप ऐसे ही ले जाओ एक शाम!!

दुनिया मेरी नज़र से!!

ये ब्लॉग एक प्रयोग है जहाँ मैं हिन्दी में लिखूँगा। यदि आपको हिन्दी नहीं आती तो मैं माफ़ी चाहूँगा, या तो आप हिन्दी सीखिए अथवा केवल देख कर ही खुश हो ली जिए।

टुन्नू- यह नोटिस बोर्ड उसके लिये जिसे हिन्दी आती ही नहीं!! उन्हीं के लिये तो लगाया है, न??

अभय तिवारी, निर्मल-आनन्द

कानपुर की पैदाइश, इलाहाबाद और दिल्ली में शिक्षा के नाम पर टाइमपास करने के बाद कई बरसों से मुम्बई में टेलेविज़न की दुनिया में मजूरी कर के जीवनयापन।

टुन्नू- शिक्षा के नाम पर टाइमपास-पढ़ कर तो नहीं लगता ऐसा!!

दिल का दर्पण-परावर्तन, मोहिन्दर सिंग

एक सामान्य परन्तु संवेदनशील व्यक्ति हूं

टुन्नू- दोनों एक साथ- सामान्य और संवेदनशील- वाह, यह तो कमाल हो गया!!

पाण्डेय जी के मधुर वचन

बनारस वाले अभिषेक पाण्डेय जी के मधुर वचन - ब्लॉग के रूप मे

टुन्नू- स्व-सम्मान में आत्मनिर्भरता का अनुपम उदाहरण, अपने नाम के साथ जी?? आपका साधुवाद!!

दिल के दरमियाँ, भावना कँवर

मुझे साहित्य से बहुत प्यार है। साहित्य की वादियों में ही भटकते रहने को मन करता है। ज्यादा जानती नहीं हूँ.........

टुन्नू- भटकते रहने को मन करता है और ज्यादा जानती भी नहीं हैं- कहीं गुम ही न जायें, बड़ी चिंता सी लग गई है??

ई-स्वामी

यहां पर "कुछ" लिखा है!

टुन्नू- देखा, हाँ!! कुछ तो लिखा है.

बिहारी बाबू कहिन

फिलहाल जिंदगी से सीखते हुए आगे बढ़ने की कोशिश जारी है...

टुन्नू- फिलहाल?? आगे क्या बिल्कुल बंद कर दोगे सीखना??

क्या करूँ मुझे लिखना नहीं आता..., गुरनाम सिंह सोढी

ये blog मैने अपनो मित्रों की सलाह पर प्रारंभ किया है। इसमे मेरी कुछ रचनाएँ प्रस्तुत हैं। आशा है कि आपको ये पसंद आएँगी। पिछलो दस मास की मेहनत के उपरांत ये संभव हुआ है। यदि कोई त्रुटि हो जाए तो क्षमा किजीएगा। आपकी किसी भी प्रकार की टिप्पणी का हार्दिक स्वागत है। धन्यवाद

टुन्नू- दस माह की मेहनत-बहुत भयंकर मेहनत की यार ब्लाग प्रारंभ करने में. क्या करते रहे, जरा स्टेप बाई स्टेप समझाना!!

अंतर्मन

देश से बाहर रहने वाला एक भारतीय युवक। अंतरजाल का प्रेमी। हिन्दी लेखन-पाठन में रुचि ।

टुन्नू- हिन्दी लेखन-पाठन में रुचि -अच्छा, लगा लिख दिया वरना लगता कि कोई कार्य बिना रुचि का मजबूरीवश कर रहे हो!!

इधर उधर की

कुछ इधर की, कुछ उधर की, कहीं की ईंट कहीं का रोड़‌ा। या यूँ कहें, विचारों का बेलगाम प्रवाह…

टुन्नू- कुछ इधर की, कुछ उधर की-यह तो नाम से भी समझ आ गया था- इधर उधर की !!

उडन तश्तरी, समीर लाल

--ख्यालों की बेलगाम उडान...कभी लेख, कभी विचार, कभी वार्तालाप और कभी कविता के माध्यम से......

टुन्नू- अरे भई!! कुछ तो लगाम दो, ज्यादा ही बेलगाम है, यह अच्छी बात नहीं!!

मुझे भी कुछ कहना है..., रचना बजाज

आप खुद तय कर लीजियेगा कि ये लेख, निबन्ध है या कि कोई कविता है, मेरे लिये तो ये मेरे विचारों की अभिव्यक्ति और शब्दों की सरिता है!!

टुन्नू- अरे, लिखें आप तो आपको तो मालूम ही होगा बस थोड़ा सा लेबल लगा दें कि लेख, निबन्ध या कविता है - सब को आराम हो जायेगा!!

खाली पीली, आशीष श्रीवास्तव

कभी कभार कवितायें लिख लेता हुं. लोगो को अपनी बातो मे बांधे रखने मे मेरा जवाब नही है, बिना किसी विषय के घंटो बोल सकता हुं.

टुन्नू- अच्छा है, पॉडकास्ट वाला ब्लाग नहीं है वरना तो घंटो बोलते रहते!!!

भावनाऐं, रीतेश गुप्ता

इस ब्लाँग के माध्यम से मैं अपनी भावनाओं को व्यक्त कर रहा हूँ ।

टुन्नू- चाहो तो डायरी में भी व्यक्त कर सकते हो या दोस्तों को फोन करके!! सारी नाराजगी क्या ब्लागरों से ही है??

आवारा बंजारा, संजीत त्रिपाठी

कुछ अपनी, कुछ अपने आसपास की, युं कहें कि मैं और मेरी आवारगी

टुन्नू- कुछ अपने आसपास की-वाह भई, वाकई!! मेरी आवारगी!! बहुत सच सच कहते हो!

कुछ विचार, मृणाल कांत

हिन्दी ब्लागि॑ग का एक प्रयत्न - विभिन्न विषयो॑ पर मेरे विचार, आदि। आपकी टिप्पणिया॑ आमन्त्रित है॑।

टुन्नू-
टिप्पणियाँ तो सभी के यहाँ आमंत्रित हैं वरना ब्लाग काहे खोलते?


प्रतिभास, अनुनाद सिंग

अकस्मात , स्वछन्द एवम उन्मुक्त विचारों को मूर्त रूप देना तथा उन्हे सही दिशा व गति प्रदान करना - अपनी भाषा हिन्दी में ।

टुन्नू- उद्देश्य तो जबरदस्त हैं- कब दोगे मूर्त रुप और सही दिशा व गति ?


मेरी कठपूतलियाँ, बेजी

POEMS IN HINDI moments....thoughts....emotions....analysis..... descriptions...reflections....expressions....impressions.....my words....my feelings

टुन्नू-बिल्कुल, आपकी ही अनुभूति और आपके ही शब्द. बाकि सारे ब्लागों में दूसरों के शब्द??


॥शत् शत् नमन॥, गिरिराज

दिल मे है कुछ तो गुनगुनाकर देखो … ग़ज़ल अपनी भी कहाँ “ग़ालिब” से कम है …

टुन्नू- देखा गुनगुना कर, गालिब टाइप ही लग रही है. कैसे लिख लेते हो ऐसा??

आईना, जगदीश भाटिया

??

टुन्नू- उद्देश्यविहिन यात्रा-कहाँ जा रहे हैं?

आओ कि कोई ख्वाब बुनें.., अनूप भार्गव

न तो साहित्य का बड़ा ज्ञाता हूँ, न ही कविता की भाषा को जानता हूँ, लेकिन फ़िर भी मैं कवि हूँ, क्यों कि ज़िन्दगी के चन्द भोगे हुए तथ्यों और सुखद अनुभूतियों को, बिना तोड़े मरोड़े, ज्यों कि त्यों कह देना भर जानता हूं ।

टुन्नू- बिना तोड़े मरोड़े, ज्यों कि त्यों कह देना भर जानता हूं - कभी इस कला के बारे लिख कर हम सबको भी सिखाईये न!! प्लीज़!!

महाशक्ति, प्रमेन्द्र प्रताप सिंह

जो हमसे टकरायेगा चूर-चूर हो जायेगा

टुन्नू- धमकी दे रहे हो कि सूचना??

होम्योपैथी-नई सोच/नई दिशायें , डॉ.प्रभात टंडन

‘डा प्रभात टन्डन की कलम से’

टुन्नू- भईये, जब ब्लाग आपका है, तो कलम तो आपकी ही रहेगी, हम तो आकर लिखेंगे नहीं??

मानसी

कुछ दिल से...

टुन्नू- बस, दिल से-दिमाग से नहीं ? काहे??


मेरी कवितायें, शैलेश भारतवासी

हर बार समय से यही सवाल करता हूँ "मैं कौन हूँ,मुझे बनाने की जरूरत क्या थी?"

टुन्नू- क्या इसी जवाब की तलाश में ब्लागजगत में भटक रहे हैं? गौतम बुद्ध तो इसी तलाश में जंगल गये थे.


नुक्ताचीनी, देबाशीष

तकनीकी मसलों पर बिना लाग-लपेट बेबाक नुक्ता चीनी, और इसके अलावा भी बहुत कुछ!

टुन्नू- इसके अलावा भी बहुत कुछ ?? थोड़ा खुलासा तो करें कभी!!


निलिमा

बहते बदलते समय में......

टुन्नू-बहते बदलते समय में...... क्या कुछ नया होने वाला है??





---चलो, अब बुरामानो, होली है!! अगर किसी को बुरा लगा हो तो टुन्नू को पकड़ना. अभी तो सोया है, इतने चिट्ठे घूम कर आया है कि थक गया और उपर से ये भांग!!

सबको होली की शुभकामनायें!!!!
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गुरुवार, मार्च 01, 2007

बाई वन गेट वन फ्री के साथ एक साल पूरे!!

ये लो साहब, अब कर लो बात! बाई वन गेट वन फ्री की तर्ज पर अभी बाल गिरने की समस्या के झटके से उबरे नहीं थे कि कल डॉक्टर साहब बोले कि आपको हाई ब्लड प्रेशर( उच्च रक्तचाप) है और सतर्कता की आवश्यकता है. हमारे तो पाँव तले धरती ही सरक गई. हमने कहा, "डॉक्टर साहब, एक बार और टेस्ट करके देखो, कहीं गलत रिडिंग आ गई होगी या वो चुनाव का प्रेशर था उसके कारण बढ़ा होगा, एक दो दिन में ठीक हो जायेगा". अब डॉक्टर साहब तो डॉक्टर साहब, पहला सुझाव तो जैसे सुना ही नहीं और खुले आम निरस्त कर दिया. दूसरे के लिये पूछा गया कि कब था चुनाव और कैसा चुनाव. हमने भी छाती फूला कर कहा, " वो क्या है कि हमें इंडीब्लागिज का बेस्ट हिन्दी ब्लागर २००६ चुना गया है, उसी का टेंशन था, अब नहीं है."

उनके हावभाव देखकर लगा कि उन्हें अव्वल तो कुछ समझ में नहीं आया कि यह क्या बला है और उस पर से पत्नी साथ थी वो कह उठीं कि अरे, उसका परिणाम आये तो चार दिन गुजर गये. हमारा उत्साह ठंडा और डॉक्टर साहब का दो गुना. बस उन्होंने अपनी प्रवचन माला शुरु कर दी कि वजन कम करो, चिंता मत पालो, नमक नहीं, तला भुना नहीं और तो और बोतल-शोतल तो सोचो भी मत. हर सलाह के साथ हमारा मूँह उतरता जा रहा था और पत्नी को तो जैसे ब्रह्म आशीष प्राप्त हो रहे हों, अति प्रसन्न. बोतल की बात तो डॉक्टर साहब भूल भी जाते मगर यह भूलने दे, तब न!! ऐसा भोला मूँह बना के पूछा जैसे हमारा फेवर कर रही हों-"डॉक्टर साहब, यह हल्की फुल्की ड्रिंक लेते हैं, वो तो चल जायेगी न!!". कौन डॉक्टर दूनिया का कहेगा कि हाँ. यह वो भी जानती थी और हम भी. तो लो साहब, वो भी नमस्ते.

अब डॉक्टर साहब को तो जो पाबंदी लगानी थी वो तो हम यूँ भी मान्य कर लेते. मगर हमारी पत्नी ने उनकी पाबंदियों की मूल तत्व का बोध प्राप्त है. वो एक बोलें यह दस समझें.

घर लौट आये. हमें कंबल ढ़ांक कर लिटा दिया गया. हम सदमें में थे.

इनकी सारी सहेलियों से हमारा हाल फोन पर बताया गया. शाम को सारी सहेलियाँ और उनके पति, जो हमारे मित्र हैं, सब एकत्रित हुये. वैसे यहाँ का नियम बता दूँ कि यहाँ हमारे मित्र वही होते हैं जो इनकी सहेलियों के पति होते हैं. इनकी सबसे पक्की सहेली का पति हमारा सबसे पक्का मित्र. अगर किसी की पत्नी से इनकी मित्रता नहीं हो पाई, तो वो हमारे मित्र होने की पात्रता नहीं रखता. यह रिवर्स फिलासफी कनाड़ा में आने के बात शुरु हुई, उसके पहले हम पहले ठीक ठाक आदमी थे.


वैसे यहाँ का नियम बता दूँ कि यहाँ हमारे मित्र वही होते हैं जो इनकी सहेलियों के पति होते हैं. इनकी सबसे पक्की सहेली का पति हमारा सबसे पक्का मित्र. अगर किसी की पत्नी से इनकी मित्रता नहीं हो पाई, तो वो हमारे मित्र होने की पात्रता नहीं रखता. यह रिवर्स फिलासफी कनाड़ा में आने के बात शुरु हुई, उसके पहले हम पहले ठीक ठाक आदमी थे.

अब जब सब एकत्रित हुये तो जो हमारे सबसे खास मित्र थे, यानि हमारी पत्नी की पक्की सहेली के पति ने अपने खास होने का फायदा उठाते हुये कहा:' वाह समीर भाई, आप तो अब उच्च श्रेणी के कहलाये. यह बिमारी तो बड़े लोगों की निशानी है. हमें भूल न जाना बड़े लोगों की जमात में जाकर".

हमने भी सोचा कि हम चाहें भी तो नहीं भूल सकते. आखिर आप हमारी पत्नी के पक्की सहेली के पति हैं. बोले,"इस प्रमोशन के मौके पर पार्टी हो जाये, बोतल शोतल खुले" मैं उनके चेहरे पर तैरती कुटिलता देख रहा था मगर मजबूर था.

मैने भी कहा, "हाँ हाँ हो जाये. आखिर कल जब तक नहीं पता था,पी ही रहे थे, आज और सही. चलो भाई सब लोग, जश्न मनाया जाये. ऐसा मान लेंगे कि डॉक्टर साहब ने कल देखा है".

मगर हमारे मानने से क्या होता है, एकाएक पत्नी के तमतमाये चेहरे पर नज़र पड़ी, कहने लगीं, "भाई साहब, आप लोग लिजिये, इनको तो डॉक्टर साहब ने कहा है कि एक बूँद भी जहर साबित होगी." यह लो, पता नहीं कब यह हमारे डॉक्टर ने इनको एस एम एस कर दिया. हमारे सामने तो नहीं कहा था और यह हमारे साथ लौट भी आईं थीं. यह जरुर वार्तालाप का मूल होगा. खैर, सब अपना अपना गिलास बना लाये हमारी बार में हमारी बोतल से और हमारे लिये, इनकी खास सहेली, जो हमारे परिवार की शुभचिंतक मानी जाती हैं, की सलाह पर लौकी का जूस. हम उदास से सोफे के कोने में बैठे लौकी का जूस पीने लगे, बाकि सब चियर्स. हम भी लौकी जूस लिये ही कंबल ओढे चियर्स किये.

जूसर में से पत्नी लौकी का निचुड़ा गुदा फैंकने लगी तो दूसरी शुभचिंतिका सलाह लिये हाजिर हो गईं,'अरे दीदी, आप इसे फैंकने जा रहीं हैं. अरे, इसको सफोला तेल आधा चम्मच में जीरे से बघार कर भाई साहब को खिलाऐं, बहुत फायदा करेगा.' तो अब उसे नहीं फैंका गया, कचरे की पेटी में जाने की बजाये उसे हमारी पेटी में भेजने के लिये तैयारी की जाने लगी, हाय री किस्मत!!

'अरे दीदी, आप इसे फैंकने जा रहीं हैं. अरे, इसको सफोला तेल आधा चम्मच में जीरे से बघार कर भाई साहब को खिलाऐं, बहुत फायदा करेगा तो अब उसे नहीं फैंका गया, कचरे की पेटी में जाने की बजाये उसे हमारी पेटी में भेजने के लिये तैयारी की जाने लगी, हाय री किस्मत!!

इस बीच हम तथाकथित मित्रों के बीच असाहय से बैठे गपिया रहे थे. ये सभी मित्र हमें मजबूरीवश समय बेसमय पढ़ते भी रहते हैं. हम ईमेल करके उन्हें बताते हैं कि आज यह लिखा है. वो नारद नहीं देखते और न हीं हिन्दी में ब्लागिंग करते हैं.

दूसरे बोले, 'यार, तुम तो सबका भविष्य बांचते हो, कि तुम्हारे चिट्ठे के साथ ऐसा होगा, वैसा होगा. संत बने प्रवचन बांटते हो. ज्ञान की बाते बताते हो. अपना भविष्य नहीं समझ पाये क्या जो अब मूँह उतार कर बैठे हो. वो स्माईली का फैशन चलवाये थे, वो काहे नहीं अपने मूँह पर लगाते हो!!" उसकी बात पर सब ठहाकों के साथ हँसे और हम बगलें झाँकते रहे.

तब तक अन्य कूद पड़े, "यह आपको पाप लगा है, सब की खूब मौज लेते थे न!! खूब हँसी छूटती थी सबकी परेशानी पर . कभी एक दो तीन करके माधुरी वाले ठूमके लगाते थे और किसी का भी, कभी भी माखौल उड़ाते थे, और उड़ाओ. लो लग गया न, श्राप!! इस बार नहीं समझ पाये कि डॉक्टर तीर्थंकर है और पीठाधीश भी-अब झेलो!!"

एक बोले, "तुम तो सब इलाज जानते हो, बाल गिर रहे थे तब बाल आरती बना कर गाते थे. अब गाओ न कोई रक्तचाप आरती."

ये हैं दोस्त, जिनके रहते मुझे आज तक दुश्मनों की कमी ही नहीं महसूस हूई.

जिससे जितना बन पाया, साहनभूति की आड़ में कोस गया. सबने फिर खाने के नाम पर मुर्गी से लेकर बिरयानी और पालक पनीर की दावत उड़ाई और हमारे हिस्से आई- दो बिना घी की रोटियाँ, दाल का बिना नमक वाला पानी, और वो बचे गुदे की लौकी की सब्जी. पहले कौर में तो आँख से दो आँसूं गिर पड़े लौकी की सब्जी में. उसी आँसूं के क्षार से अगला कौर कुछ नमकीन हो गया, तो खा पाये वरना बिना नमक का खाना!! हे प्रभू, अब से किसी का मजाक नहीं उडाऊँगा. बुरी बात है!!"


जिससे जितना बन पाया, साहनभूति की आड़ में कोस गया. सबने फिर खाने के नाम पर मुर्गी से लेकर बिरयानी और पालक पनीर की दावत उड़ाई और हमारे हिस्से आई- दो बिना घी की रोटियाँ, दाल का बिना नमक वाला पानी, और वो बचे गुदे की लौकी की सब्जी. पहले कौर में तो आँख से दो आँसूं गिर पड़े लौकी की सब्जी में. उसी आँसूं के क्षार से अगला कौर कुछ नमकीन हो गया, तो खा पाये वरना बिना नमक का खाना!! हे प्रभू, अब से किसी का मजाक नहीं उडाऊँगा. बुरी बात है!!"

खैर, हम डरे जरुर हैं मगर हारे नहीं हैं. हम अब भी लिखेंगे और रक्तचाप पर ही लिखेंगे. किसी रक्तचाप की क्या मजाल कि हमें लिखने से रोके., जब कि बाल नहीं रोक पाये. वो तो सबको दिखते हैं, रक्तचाप तो किसिको दिखता भी नहीं.

'हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती'

तो सुनिये, रक्तचाप पुराण:

रक्तचाप

सुबह सबेरे उठते ही मैं, इक गोली छोटी खाता हूँ.
रक्तचाप के बढ़ते पग में, अंकुश जरा लगाता हूँ.
रक्तचाप यदि उच्च हुआ तो, हृदय गति थम जायेगी.
इस अनिष्ट से घबरा कर मैं, रोज टहलने जाता हूँ.

शक्कर वज़न बढ़ाती है, लगी नमक पाबंदी है.
पेट मेरे में अच्छे खासे, बाज़ारों सी मंदी है.
वज़न घटाने को अपना मैं, केवल फल सब्जी ही खाता हूँ.
स्वपन लोक मे ही अब मिलते, मुर्ग मुस्सलम हंडी है.

बंद हुई अब दूध जलेबी, फुलकी के दिन बिसूर गये
साथ कचौड़ी खाने वाले, संगी साथी बिछूड गये.
सुना रहा हूँ दर्द मैं फिर भी,चेहरे पर मुस्कान लिये
बिन सिगरेट का सुट्टा मारे, सर्दी में हम ठिठूर गये.

सूखी रोटी हाथ हमारे, घी का डब्बा दूर हुआ.
नहीं पता है उस ढ़ाबे का, जो अभी यहाँ मशहूर हुआ.
सजे मेज पर जाम सुराही,मैं तक तक कर रह जाता हूँ.
स्वादहीन से इस जीवन पर, कविता को मजबूर हुआ.

अपना लिखा पढ़ाना सबको, यह तो मेरी आदत है
रक्तचाप बस बना बहाना, भेजी इसको लानत है.
नहीं नीरस यह जीवन होगा, जब तक सबका साथ मिले
भेज रहा हूँ नेह निमंत्रण, प्यार की सबको दावत है.

--समीर लाल ‘समीर’




इसी के साथ आज हमारी चिट्ठाकारी के एक साल पूरे हुये और होली भी आ गयी. हुरर्रे....सब होली के रंग में रंग जायें, खूब खुशी से होली के रंगो की बरसात हो, इन्हीं शुभकामनाओं के साथ अपने चिट्ठाकारी की पहली वर्षगांठ मनाता हूँ!!!
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रविवार, फ़रवरी 25, 2007

एक, दो, तीन........

एक, दो, तीन........चार, पाँच, छः...यह सब हम पर की गई प्रश्नों की बौछारे थीं, रचना और जीतू की. एक, दो, तीन........चार, पाँच, छः... सुन हम भी अपने आसान से उठे और माधुरी-तेजाब वाली को याद करते हुये एक दो ऐसे ठुमके लगाये और कमरा बैठ गई. बस क्या बतायें, ऐसी बैठी कि रचना जी और जीतू भाई के जबाब देना तो दूर, चुनाव जीते, उसकी शोभा यात्रा में भी नहीं नाच पाये. वैसे इसमें न तो एक, दो, तीन की गल्ती है और न ही माधुरी की. गल्ती हमारी ही कहलाई, शरीर देखा नहीं और लगे नाचने. यह फरक आया चिट्ठाकारी करने से अपने व्यक्तित्व में. जिस विषय से कुछ लेना देना नहीं, न समस्या समझ में आयी और न ही उस विषय का विशेष ज्ञान है, मगर लिखेंगे जरुर. एक विवाद तो भर हो जाने दो, सब ज्ञानी हो जाते हैं, लगे टिपा टिप्पणी करने, पोस्ट लिखने. अरे भाई, हर विवाद में हाजिरी लगाना तो जरुरी नहीं. मगर नहीं साहब, एक दो तीन पर माधुरी ने नाचा है तो हम क्यूँ न नाचें. फिर चाहे कमर टूटे या कमरा.

लेकिन फिर भी ऐसी लत पड़ी है कुछ न कुछ लिखते रहने की कि कितना भी दूर रहने का प्रयास करुँ भाग भाग कर वापस. लिखना, फिर पढ़वाना और फिर अगले के पढ़ने की पावती का इंतजार और वो ही दूसरे अखाड़े में पढ़ना और पावती पहुँचाना, यह सब दैनिक आदतों में शुमार हो गया है. चिट्ठाकारी का मायने शौक और खाली समय के उपयोग की बजाय जरुरत सा बन गया है. बिना इसके कुछ खालीपन सा लगने लगता है.अब मुझे नशाखोरों से कोई शिकायत नहीं है जिनकी बिना शराब मिले हालात बिगड़ने लगती है, जबकि मालूम है पी कर और बिगड़ेगी. उनके लिये तो दवाईयां है, पुनरुद्धार केन्द्र भी हैं. हमारे लिये तो वो भी नहीं.

इतने प्यारे प्यारे दोस्त बन गये हैं, सब कुछ एक बड़े परिवार के अहम हिस्से. सभी का इंतजार रहता है. कोई बातूनी है, तो कोई फुरसत में बैठा है. कोई तुनक मिजाजी, बात बात में बुरा मान जाता है, तो कोई ऐसा मसखरा कि हर समय मजाक. कुछ कह लो, बुरा ही नहीं मानता. कई बार तो उसके बुरा न मानने का बुरा लगने लगता है. कोई गाता है, कोई कविता सुनाता है, कोई प्रवचन पर प्रवचन, तो कोई अपना तकनिकी ज्ञान हासिल से ज्यादा बांटे दे रहा है और कोई संपूर्ण व्यवसायी . कोई धर्म की बात करता है तो कोई अंतरीक्ष के नीचे की बात करना ही नहीं चाहता. हर मजहब के एक छत के नीचे, यहाँ कांग्रेसी हैं, भाजापाई हैं, एक दो तो इतना ज्यादा वामपंथी विचारधारा के हो गये हैं कि चाहे कुछ हो, कुछ कह लो, कुछ कर लो, मगर वो विरोध करेंगे ही, यह तय है. ऐसा ही तो होता है एक भरा पूरा परिवार. सभी प्यारे होते हैं, हर एक की कमी खलती है. सबका अपना स्थान है-कोई चंचल तो कोई बचपन में ही बड़ा हो गया है, मगर परिवार है, हर तरह के सदस्य होते हैं. अरे, भारतीय हैं भाई हम लोग. हमारे यहाँ तो घर में रहने वाला जानवर भी परिवार का सदस्य होता है, उसी का इंतजार है परिवार पूरा करने को, उनकी कमी बहुत अखरती है.

परिवार के बीच घूमते घूमते भी कभी कभी एकांत की आवश्यता भी महसूस होती है, जो सबको ही होती है और स्वभाविक भी है. तब भरे पूरे परिवार की मनभावन हाहाकार के बीच ही किताब लेकर आंतरिक एकांत में खो जाता हूँ और बहुत कुछ पढ़ता हूँ-मगर जिन दो पुस्तकों की तरफ सबसे पहले हाथ बढ़ता है और बार बार बढ़ता है, वो है हरिशंकर परसाई के व्यंग्य संकलन और फिर अंग्रेजी में रिच डैड पूअर डैड. व्यंग्य तो मुझे शुरु से ही बहुत पसंद हैं और उस पर से जब व्यंग्य, व्यंग्य शिरोमणी हरि शंकर परसाई का तो क्या कहना. उनको पढ़ना मुझे बार बार मेरे शहर ले जाता है. वही जबलपुर जो मेरे मानस पटल पर इस तरह छाया रहता है कि नियाग्रा फाल्स जैसा विहंगम प्रपात भी मुझे धुंआधार, भेड़ाघाट जबलपुर के जल प्रपात की ही याद दिलाता है. मुझे ऐसा लगता है जिन्दगी के किसी भी राजपथ पर आप चलें, बचपन की पगडंडियाँ उन पर हमेशा काबिज ही रहती हैं और उनका महत्व आपके जीवन में हर राजपथ से ज्यादा होता है. फिर रिच डैड पूअर डैड मुझे एक तरह की जीवन शैली लगती है और अपने कैरियर शुरु कर रहे हर युवा को मैं इस पुस्तक को पढ़ने की सिफारिश करता हूँ. (Rich Dad, Poor Dad by Robert T. Kiyosaki). वैसे एक दिन जरुर आप लोगों को इस पुस्तक की कमेंट्रि पेश करुँगा, ऐसी मेरी हार्दिक इच्छा है. मेरी कई और हार्दिक इच्छायें थीं जो वक्त की मौत मारी गयीं मगर इसे मैं न मरने देने की कसम खा कर बैठा हूँ. फिर भी मर ही गई तो क्षमा मांग लूँगा कोई प्रापर्टी तो लिख नहीं दी है.

जब पुस्तक पढ़कर फुरसत पाऊँ तो फिर यही परिवार और कुछ अपने व्यक्तिगत दायित्यवों का निर्वहन, नौकरी, तकनीकि लेखन, तकनीकि और व्यवसायिक सलाहकारी, कविता, मित्रों से मेल मिलाप-बातचीत और फिर नये मित्रों से व्यक्तिगत मेल-मिलाप की इच्छा. चिट्ठाकारी में बहुत से नये मित्र बनें जिनसे मेरी व्यक्तिगत तौर पर मुलाकत भी हुई और अब तो लगता है, बरसों के मित्र हैं, सखा हैं, रिश्तेदार हैं. मैं जब भी मौका लगेगा, हर हिन्दी चिट्ठाकार से मिलना चाहूँगा, जब जब जैसे जैसे मौका आयेगा. बहुतों से फोन पर बात, चैट पर बात करते करते ही अब ऐसा लगता ही नहीं कि उनसे मैं कभी मिला ही नहीं हूँ. इतना सम्मान, उन सबके व्यक्तिगत परिवार में स्थान- सब इसी हिन्दी चिट्ठाकारी की देन है. बहुत कम समय में ऐसा विस्तार, ऐसी आत्मियता शायद और किसी भी तरह से संभव नहीं थी. बस सब ऐसे ही हँसते-खेलते, लड़ते-झगड़ते और फिर गले मिलते रहें, यही सफल और सुखी संयुक्त परिवार की निशानी है. ऐसा ज्ञान मुझे टी वी पर सिरियल देख देख कर प्राप्त हुआ है. साधुवाद!!

कोशिश हर वक्त रहती है कि शायद किसी को प्रेरित कर पाऊँ हिन्दी चिट्ठाकारी शुरु करने को, शायद कोई प्रेरित भी हुआ हो. मगर हमेशा आव्हान रहेगा कि आओ, लिखो, अच्छा लिखो और बहुत अच्छा लिखो. कौन पढ़ेगा, यह मत सोचो. मैं हूँ न!! पढ़ूँगा भी और शाबासी भी दूँगा. :) यह भी मेरी आदात का हिस्सा है. फिर भी नहीं लिखना तो यह तुम्हारी इच्छा है, तुम्हारी जगह लिखूँ भी मैं, यह नहीं हो पायेगा. भारत सरकार होता तो कर भी देता कि तुम कमरे में बैठो , सोचो और बाकि सारा ठीकरा अपने सर फुड़वाने के लिये मैं सरदार तो बैठा ही हूँ. आँ हा, यह यहाँ का नियम नहीं है.

मैं हर विषय पर लिखता हूँ. हल्के फुल्के माहौल में अपने दिल की बात कहता हूँ. कोशिश रहती है कि कोई मेरी लेखनी से आहत न हो और कोशिश करता हूँ कि कितनी भी संजीदा बात क्यूँ न हो, माहौल हल्का फुल्का बना रहे. बात बहते हुये कहूँ, लोग बहें और वैसे ही सुनें-बस, कोई डूबे न!! मैं हमेशा विवादित मुद्दों से बच कर चलना चाहता हूँ. न तो मैं ऐसे मुद्दों पर लिखता हूँ जिस पर मुझे ज्ञात है कि विवाद होगा और न ही ऐसे मुद्दों पर चल रही किसी बहस का हिस्सा बनना मुझे पसंद है. मैं इस तरह की पोस्टों पर टिप्पणी करना भी पसंद नहीं करता मगर आदतानुसार कभी एकाध बार कर ही देता हूँ, उसे सब लोग कृप्या मेरी भूल ही मानें. मेरा ज्ञान कम है, मैं ऐसे विषयों पर ज्ञान हाँसिल करने का आकांक्षी भी नहीं, तो आप को ही मुबारक!! बहुत बधाई!!

मेरे अधिक टिप्पणी, जिसके लिये में बदनाम हूँ, करने के पीछे भी यही उद्देश्य होता है कि लिखने वालों को प्रोत्साहन मिले. हर चिट्ठाकार अपनी नजर में अपना बेहतरीन ही परोसने की कोशिश करता है. जब वो इतनी मेहनत करता है तो उसकी लेखनी ही नहीं वरन प्रयास भी उसे तारीफ का हकदार बनाते हैं. बिना तारीफ के तो बड़ा से बड़ा शायर और साहित्यकार भी थक कर कट ले. मुझे लगता है कि तारीफ करके मैं जो प्रोत्साहन देता हूँ और जो औरों द्वारा की गई तारीफ से मुझे मिलता है, वही इस विकास की दर को बढ़ा रहा है, जिस दिशा में हम सब अग्रसर हैं. यही तो हम सबका उद्देश्य भी है. यहाँ की घूस यही है, तारीफ करो, तारीफ पाओ. वरना तो इमानदारी की ही बात करते रहोगे तो भारत का विकास ही रुक जायेगा.

हमेशा से और आज भी सबके सहयोग से और प्रोत्साहन से ही हम लिख रहे हैं और अन्य भी यही कर रहे हैं. सबका आभार व्यक्त करने को दिल करता है, वरना एक साल में तस्वीर मे इतना बदलाव और सदस्यों की संख्या में दो गुने से ज्यादा का इजाफा- यह सब यूँ ही संभव नहीं था. उम्मीद करता हूँ कि आगे भी सब यूँ ही समृद्ध होता रहे. नये लोग आयेंगे, कोई एम बी ए होगा, कोई पी एच डी...सबका सम्मान करना हमारा फ़र्ज है, न कि बराबरी करना कि उसकी कमीज हमारी कमीज से ज्यादा सफेद क्यूँ?

अपनी या किसी और की अच्छी खराब पोस्ट का तो क्या जिक्र करना. अच्छा खराब तो पढ़ने वाली नजरों का कमाल है, जैसे कि सुंदरता देखने वाले की आँखों मे होती है, वरना तो प्रयास हमारा और सबका अच्छे से अच्छा पेश करने का ही होता है. तकलीफ किसी की किसी बात से नहीं होती. बस थोड़ी कोफ्त होती है जब भाषा ज्ञानी कठीन शब्दों का इस्तेमाल कर नये आये कम भाषा ज्ञानियों पर अपनी सोच थोपने का प्रयास करते हैं और विवाद खड़े करते हैं. अरे समझो भाई उद्देश्य को, न कि आदर्श को. वो भी वहीं पहुँचने का प्रयास कर रहा है, जिस राह में तुम थोड़ा आगे हो. रास्ता दिखाओ- न कि आँख!!

मेरी नजर में अंतरजाल पर हिन्दी का विकास सामान्य बोलचाल की भाषा के इस्तेमाल से ही हो जायेगा, तो क्लिष्टता क्यूँ कर. यह महज विकास की राह में रोड़े का काम करेगा और आम लोगों को आने से रोकेगा. मुझे नहीं लगता कि अभी तीर्थंकरों और पीठाधीशों की आवश्यकता है. वह सब समृद्ध समाज में शोभित होते हैं तो पहले समृद्धता तो आ जाने दो. भूखे-नंगे को अध्यातम और योग सिखाओगे तो सिवाय फजियत के कुछ न मिलेगा. हाँ, अपना अनुभव बांटते रहो, भटको को राह दिखाओ, समाज को समृद्ध बनाने में योगदान करो, तो बात बनें. सिर्फ़ तुम्हारे मुगदर भाँजते रहने से पूरा मुहल्ला पहलवान नहीं हो जाता.

मुझे लगता है कि यह सब लिखते लिखते मैंने जाने आनजाने रचना जी और जीतू भाई के द्वारा उठाये गये सभी प्रश्नों के उत्तर अपनी तरह से दे दिये हैं, अब वो भी थोड़ी मेहनत करें और प्रश्न के जवाब उपर खोंजे, सभी मिल जायेंगे. प्रश्न दर प्रश्न जवाब देने में मुझे लगता है कि मैं किसी परीक्षा को दे रहा हूँ और उसमें तो अक्सर फेल हो जाता हूँ, सो नहीं दिया.

रही बात नये पाँच चिट्ठे, जिनसे मैं कुछ बताने को कहूँ तो बस परंपरा का निर्वहन कर रहा हूँ, वैसे तो लगभग सभी अटक चुके हैं, मगर मैं जीतू और रचना जी के प्रश्नों के कॉमन प्रश्न ही पूछ रहा हूँ:


१.आपके लिये चिट्ठाकारी के क्या मायने हैं?
२.क्या चिट्ठाकारी ने आपके जीवन/व्यक्तित्व को प्रभावित किया है?
३.आप किन विषयों पर लिखना पसन्द/झिझकते है?
४.यदि आप किसी साथी चिट्ठाकार से प्रत्यक्ष में मिलना चाहते हैं तो वो कौन है?
५.आप किन विषयों पर लिखना पसन्द/झिझकते है?

जगदीश भाई ने इस प्रश्न के दो बार पूछे जाने की ध्यान दिलवाया, आभार.
५.आपकी पसँद की कोई दो पुस्तकें जो आप बार बार पढते हैं.


और जिन्हें मैं इसमे फंसाना चाहता हूँ कि जवाब दें वो हैं:

आशीष श्रीवास्तव: अंतरीक्ष वाले

लक्ष्मी गुप्ता जी

रंजू जी

प्रमेन्द्र प्रताप सिंह

डॉ भावना कुँवर

अब चला जाये.

चलते चलते: आज कुछ नहीं, सिर्फ़ इंडी ब्लागिज में मेरा समर्थन करने के लिये पुनः आभार!! Indli - Hindi News, Blogs, Links

गुरुवार, फ़रवरी 22, 2007

इंडिकब्लागिज अवार्ड, २००६: बहुत आभार और धन्यवाद

अभी अभी इंडिकब्लागिज इंडियन वेबलॉग अवार्ड, २००६ के परिणाम देखे. आप सबका स्नेह, मात्र एक वर्ष से भी कम समय के साथ में, देख कर मन भावविभोर हो उठा. बस, शब्द नहीं हैं मेरे पास इस वक्त आप सबका धन्यवाद और आभार कहने के लिये.

आपके स्नेह का परिणाम है कि उड़न तश्तरी को बेस्ट इंडिकब्लाग (हिन्दी),२००६ के अवार्ड से नवाजा गया.





पुनः, हसरत जयपुरी जी की पंक्तियां दोहराता हूँ:



एहसान मेरे दिल पे तुम्हारा है दोस्तों
ये दिल तुम्हारे प्यार का मारा है दोस्तों
यारों ने मेरे वास्ते क्या कुछ नहीं किया
सौ बार शुक्रिया अरे सौ बार शुक्रिया.....



मन भाव विभोर है आप सबका स्नेह पाकर. कृप्या मुझे यूँ ही आशीष देते रहें.
आप सबका का आभार और हार्दिक अभिनन्दन. Indli - Hindi News, Blogs, Links

बुधवार, फ़रवरी 21, 2007

कवि-क्यूँ, कैसे और आप: प्रवचन माला २-३

एक ही प्रवचन माला में भाग २ और ३ एक ही साथ - ताकि लेख की लम्बाई सिद्ध कहलाये:

भाग-२

कवि कई प्रकार के होते हैं. इस लेख में मैं अपनी पहुँच को ध्यान में रखकर निम्नलिखीत श्रेणी के कवियों को नहीं कवर कर रहा हूँ:

ये वो कवि है जो अधिकतर कुर्ते पैजामें में पाये जाते हैं, अपनी बैठक से बारामदे के बीच तन से विचरण करते हुये. मगर मन से यह संपूर्ण ब्रह्मांड में विचरण करते हैं. इनके ५ से ६ दोस्त होते हैं और वो भी इसी श्रेणी के कवि होते हैं. सब शाम को किसी एक के घर में इक्कठे होकर गोष्ठी के रुप में एक दूसरे को अपनी कवितायें सुनाते हैं, चाय पीते हैं और बस वापस. कवि सम्मेलनों में भी नहीं जाते हैं या बहुत ही कम जाते हैं. ये अधिकतर या तो शिक्षा जगत से जुड़े पाये जाते हैं या पत्रकारिता से. इनका समाज में बहुत नाम रहता है और किताबें अक्सर कालजयी. कभी कभी तो शिक्षा पाठ्यक्रम का हिस्सा भी.

साथ ही इनको पढ़ने वाला वर्ग भी अलग है जो कमरे में बंद होकर चुपचाप इनको पढ़कर सो जाता है. न आह करना है, न वाह. समझ आ गया तो बढ़ियां और न आया तो भी बढ़ियां.

मेरा लेख इनकी बात नहीं कर रहा है. मैं अन्य श्रेणियों के कवियों की बात कर रहा हूँ. मगर जिनकी मैं बात कर रहा हूँ, उनमें भी भरपूर अपवाद हैं. जिनको कोई भी बात ऐसी लगे कि यह गलत है, वो ततक्षण अपने को अपवाद मान लेने को स्वतंत्र हैं.

एक दिन रवि भाई का लतीफा सुन रहा था:


कवि सम्मेलन के मंच से उतर रहे कवि से श्रोता ने कहा - मैं जब भी आपकी कविताएँ
सुनता हूँ, बहुत ही आश्चर्य करता हूँ।
कवि ने गदगद होकर कहा - आपका मतलब है, मैं इन्हें कैसे लिखता हूँ।
श्रोता - जी नहीं, मेरा मतलब है, आप इन्हें क्यों लिखते हैं?


तो यही सवाल मैने किया कुछ नार्मल और कुछ ब्लागर कवियों से: आप आखिर कविता लिखते क्यूँ हैं? इसके जो जवाब आये, वो इस तरह हैं;

-क्योंकि हमें कविता लिखना आती है.
-क्योंकि हमें लगता है कि जो भी भाव हमने कागज पर उतारे हैं, वो कविता हैं.
-क्योंकि हम गाते अच्छा हैं मगर उतना अच्छा भी नहीं कि गाना गा दें तो कविता गाते हैं और इसीलिये लिखते हैं.
-क्योंकि हमें इससे मंच से बोलने का मौका हाथ लगता है.
-क्योंकि हमें लेख लिखना नहीं आता.
-क्योंकि लेख लंबे होते हैं, और उतना टंकण हमारे बस का नहीं.
-क्योंकि मित्र और सखा बताते हैं कि हम अच्छी कविता कर लेते हैं.
-क्योंकि हमारे हाथ एक किताब लग गई है, जिसमें हिन्दी के कठिन कठिन शब्द बड़े आसान भाषा में समझाये गये हैं.
-(मेरी पसंद) क्योंकि जब हमने पहली चिट्ठा प्रविष्टी की तो नये होने के कारण कॉमा-फुल स्टाप आदि उपयोग नहीं कर पाये और पंक्तियाँ भी इधर उधर हो गईं. हाँलाकि छोटा सा आगमन संदेश गद्य में लिखा था, मगर सबने उसे मुक्तक समझ कर खुब तारीफी कशीदे पढ़े और हमें मुक्तक बहादुर की पदवी दे डाली, तब से मुक्तक लिखते आ रहे हैं. हमने यह लिखा था:


महफिल में तेरी देखिये, अब हम भी आ गये
नारद को कर सलाम, नाम अंकित करा गये
कल से उडेंगी रोज यहाँ भावों की तितलियाँ
जो भी लिखा था आज, वही सबको पढ़ा गये.


खैर, और भी कई कारण होंगे, जो लोग कविता लिखते/सुनाते हैं. मगर जो भी वजह हो, सुनना और पढ़ना तो दूसरों को पड़ता है, जैसा कि मैने अपनी प्रथम प्रवचन माला में समझाया था. अब आपको बतायें कि सुनने और पढ़ने वालों का क्या कहना है कि लोग कविता सुनते और पढ़ते क्यूँ हैं:

-क्योंकि हमें कविता समझ में आती है.
-क्योंकि उन्हें सुनना/पढ़ना हमारी मजबूरी है, आखिर सुनाने / लिखने वाले हमारे खास मित्र हैं.
-क्योंकि इससे हम साहित्यिक टाइप के नजर आते हैं और समाज में इज्जत बढ़ती है.
-क्योंकि जिस कंपनी में हम नौकरी करते हैं, वहाँ के बॉस को कवि सम्मेलन करवाना अच्छा लगता है, जैसे सहारा. तो नौकरी की खातिर सुनते हैं.
-क्योंकि वहाँ सुनने आये अन्य बड़े लोगों से मुलाकत हो जाती है.
-क्योंकि हम घोर आशावादी हैं और हमें हर बार लगता है कि शायद इस बार कोई कायदे की कविता लिखी होगी.
-क्योंकि एक लेख पढ़ने में लगने वाले समय में पाँच कविता पढ़ी और टिपियायी जा सकती है.
-क्योंकि वो भी हमारे लिखे लेख बड़े चाव से पढ़ते हैं तो हम उनकी कवितायें.

इन साहब से हमने पूछा कि आपको कैसे पता कि वो आपके लेख चाव से पढ़ते हैं. तब वो कहने लगे कि उनकी टिप्पणी देख कर. हमने कहा कि टिप्पणी तो दूसरों की टिप्पणी के आधार पर भी कर गये हों बजाय आपके ऊबाऊ लेख पढ़ने के, इस बात की क्या गारंटी है. तब वो हँस दिये बोले हम ही कौन उनकी कविता पढ़कर करते हैं, हम भी टिप्पणियों से माहौल समझ कर लिख आते हैं.

अब सुनने वाले तो फिर भी सरलता से निपट जाते है, मौके के हिसाब से सामुहिक ताली वाली बजा ली, बीच बीच में आह वाह कर ली. बहुत ध्यान आकर्षित करना है तो बीच में चिल्ला कर बोल दिये, बहुत अच्छे आदि. ज्यादा है तो चुपचाप बैठे रहे.

अब सुनने वाले तो फिर भी सरलता से निपट जाते है, मौके के हिसाब से सामुहिक ताली वाली बजा ली, बीच बीच में आह वाह कर ली. बहुत ध्यान आकर्षित करना है तो बीच में चिल्ला कर बोल दिये, बहुत अच्छे आदि. ज्यादा है तो चुपचाप बैठे रहे.


भाग-३

मगर ब्लाग पर पढ़ने वालों की सोचो, अब पढ़ तो लिया ही, तो यह बताना भी एक काम ही है कि हमने पढ़ लिया. वरना कवि को सपना तो आयेगा नहीं कि आपने पढ़ लिया. इस पावती को चिट्ठे की साहित्यिक भाषा में टिप्पणी कहा जाता है और चलती फिरती भाषा में लोग इसे दाद कहते हैं. कवि कवि होता है, सब समझता है कि आपने पढ़ कर टिप्पणी की है कि बस करने को की है, जैसे:

-बढ़िया है या क्या खुब या फिर वाह भई वाह, मजा आ गया.

यह अभी तक चल जा रहा था, अब नहीं चलेगा. अब खुब कवि आ गये हैं मैदान में. दाद पर तक दाद मिल रही है.कविता तो छोड़ो, कविता की टिप्पणी कविता से बढ़ चढ़ कर हैं. तारीफों के उपवन खिले हैं, तरह तरह के फूल लगे है, एक से एक महक वाले. इसमें अब आपके ये गंधरहित कागजी फूल नहीं चल पायेंगे. बात मानिये, पुराने लोगों को वक्त के साथ साथ बदलना होगा. नये जमाने का नया मिजाज अपनाना होगा. नये पैंतरे अजमाने होंगे, टिप्पणी देने और पाने में सामंजस्य बनाये रखने के लिये.

बढ़िया है या क्या खुब या वाह भई वाह, मजा आ गया :यह बार बार लिखते रहोगे तो वो कवि समझ जाता है कि महज टिप्पणी पाने के लिये की गई झटकेबाजी है और टिप्पणी कर्ता अपनी साख खो देता है. अब अगर परिवार के भीतर ही साख खो जाये तो बाहर क्या हाल होगा, तब तो आप गये काम से और वो भी हमारे रहते हुये, यह हमसे नहीं देखा जायेगा. इससे बचने के कुछ सुगम उपाय आपको बताये जा रहे हैं. समय बदल रहा है. नये नये शोध हो रहे हैं. यहाँ उपलब्ध सभी उपाय आसपास के वातावरण से बहुत गहरे शोध के बाद लाये गये हैं और अभी एकदम ताजे हैं, शायद कल थोड़ी प्रासंगिगता खो दें, मगर उसमें काफी वक्त लगेगा. हम तो हैं ही, तब फिर नया शोधपत्र जारी कर देंगे मगर आपकी साख पर आँच नहीं आने देंगे. आखिर इस हेतु हम अपने मात्र ८ माह पुराने शोधपत्र को निरस्त करते हुये यह नया शोधपत्र लाये ही हैं, फिर ले आयेंगे.

इन उपायों में फेर बदल करना है या यूँ ही कट-पेस्ट कर देना है, यह पूर्णतः आपके सोये स्व-विवेक, काव्यत्मक नासमझी और फोकटिया समय की उपलब्धता पर निर्भर करता है.


इन उपायों में फेर बदल करना है या यूँ ही कट-पेस्ट कर देना है, यह पूर्णतः आपके सोये स्व-विवेक, काव्यत्मक नासमझी और फोकटिया समय की उपलब्धता पर निर्भर करता है.


तो सुनो, अगर छोटी सी क्षणिका है या हाईकु या फिर मुक्तक टाईप की रचना है, तो टिप्पणी भी छोटी करना ही जायज होता है, ऐसा चिट्ठा कवित्त के विद्वानों का मानना है. वरना कई बार देखा गया है पोस्ट से बड़ी टिप्पणी हो जाती है और भटकाव की स्थिती उत्पन्न हो जाती है. कम से कम इस भटकाव के आप निमित्त न बनें. बस इअनमें से कोई भी एक छोटी सी सुंदर सी टिप्पणी करें, इसी ब्लाग पर अपनी पिछली टिप्पणी से अलग:

-मनमोहक ; मनभावनी पंक्तियां; सुनहरे भाव; शीतल बयार; हृदय स्पर्शी;
अनुपम अहसास;एक खुबसूरत अभिव्यक्ति;मार्मिक चित्रण; या
अनोखा शब्दचित्र ....


और लोगों की टिप्पणियों पर भी ध्यान दें. कोई नया शब्द या छोटा सा वाक्य मिल जाये, तो कट पेस्ट कर भविष्य के लिये अपने कम्प्यूटर पर सुरक्षित रख लें और मौका देखकर इस्तेमाल चालू.

अब यदि कविता चार छः लाईनों से बड़ी है तो बस आपको यह देखना होगा कि किस बाबत है, जैसे कि राजनीति पर, किसी विभिषिका पर, कोई ज्वलंत मुद्दे पर, प्रेम पर या किसी त्यौहार पर. इसके लिये कतई आवश्यक नहीं कि आप कविता पढ़ें. अन्य ढ़ेरों लोग उपलब्ध हैं इस झुझारु कार्य को करने के लिये, जो मन लगाकर पढ़ेगे. आप काहे जहमत लेते हैं. थोड़ा ठहर कर जायें, कुछ टिप्पणियां आ जाने दें, उन्हें पढ़कर आप आसानी से अंदाजा लगा लेंगे कि किस बाबत लिखा गया है. टिप्पणी की साईज मायने नहीं रखती वो फार्मूला आप यहाँ इस्तेमाल कर सकते हैं.

कुछ सेंपल टिप्पणियां तो कविता के मूड के हिसाब से यहाँ दे रहा हूँ. माहौल समझकर और उसके हिसाब से टिप्पणी यहाँ से उठाकर सीधे चेप दें बिना किसी फेर बदल के:

१.प्रेम के भाव जगाती एक अच्छी कविता।आप अनुपम गीतकार हैं| बधाई आपको इस सुन्दर रचना के लिये|
जो पंक्तियाँ मैनें सर्वाधिक पसंद की वे हैं:
xxxxxxxxxxxxxxxxxx
(यहाँ x की जगह कविता की कोई सी भी चार पंक्तियाँ बिना पढ़े, पढ़ोगे तो एक तो कन्फ्यूज हो जाओगे और दूसरे, यह उपाय अपनी सार्थकता खो देगा)

२.मार्मिक चित्रण ....आँखें भीग गईं,उद्वेलित कर गयी यह कविता तो.
कितनी वेदना है इस कविता में,जो आक्रोशित भी करती है, अत्यन्त अद्भुत एवं उत्कृष्ट, बहुत धन्यवाद आपको
सजल श्रद्धा इस कविता को.
(दूसरी बार उसी ब्लाग पर जब यह टिप्पणी फिर करने का मौका आये, तो लाईनों को उपर नीचे कर दें, सब लाईनें अपने आप में पूर्ण है, प्रवाह में कोई अंतर नहीं पड़ेगा, तीसरी बार में कुछ लाईन अलग कर दें और फिर जैसा मर्जी आये, बहुत काम्बिनेशन बनेंगे)

३.रचना बहुत अच्छी व मार्मिक है । सत्याता को दरशाती हुई, और, और भी बहुत से प्रश्न पूछती हुई ( सरलता से)।यहाँ पर बधाई देना कुछ विचित्र सा लग रहा है । भावनाओं का बहुत सटीक व हृदयविदारक वर्णन किया है आपने । हम सबकी आत्मा को जगाने के लिए धन्यवाद । आपकी प्रतिभा को मैं नमन करता हूँ।
(इसे भी टुकड़े किये जा सकते हैं और पंक्तियों का क्रम भी बेहिचक बदल लें)

४.यह कविता एक साथ कई रसों का अद्भुत मिश्रण है।मैं व्यक्तिगत रूप से यह मानता हूँ कि यह कविता नहीं है अपितु एक आंदोलन है.कविता मन के हर तंतु छूती है| सोई इंसानियत के कान पर आपने नगाड़ा डालने का काम किया है। बहुत हीं सराहनीय प्रयास है यह।
बधाई स्वीकारें।

५.आपकी काव्य-प्रतिभा कविता को और भी मार्मिक बना देती है। संस्कृतनिष्ठ भाषा कतिपय लोगों को मुश्किल लग सकती है पर उसका भी अपना महत्व तथा माधुर्य है। कुल मिलाकर एक ह्रदयस्पर्शी रचना है, प्रत्येक कवि का काव्य रचने का अपना अंदाज होता है और उसी के अनुरूप उनका शब्द चयन। आपका शब्द्कोश निश्चित ही अत्यन्त समृद्ध है, बधाई आपको.
(इसे वहाँ दें जहाँ ज्यादा टिप्पणी न दिखें और पढ़ने के बाद भी, आधे शब्द का अर्थ न समझ आये और कविता पूरी ही समझ न आ पाये)

६. टिप्पणी ५ की ही तर्ज पर इसे भी इस्तेमाल करें खुले आम:
जिस भाषा में आपने इतना मार्मिक विषय उठाया है वह सुग्राह्य नहीं है| बड़ी ही पीड़ा दीखती है, आपकी इस कविता में। ताजे हालातों पर करारा प्रहार !
एक नंगे सच को आपने सामने रखा है |यह विद्वानों के लिये लिखी गयी कविता है|आपकी हिन्दी पर इतनी अच्छी पकड के लिये बधाई..

७.समाजिक दशा पर प्रहार करती हुई कविता ,कड़वे सच जीवान के दिखाती हुई .कविता एक तमाचा है व्यवस्था के मुख पर..कविता इसके अधिक और कुछ नहीं कह सकती।
मैं कविता पढते हुए महसूस कर रहा था कि भीतर कोई पिघला शीशा प्रवेश कर रहा है..
xxxxxxxxxxxxx
आपको कोटिश्: बधाई..
(x स्थान पर कविता की कोई सी भी चार पंक्तियाँ.)

८.मैं आपकी किसी भी पंक्ति को उल्लेखित नहीं कर सकता क्योंकि पूरी कि पूरी रचना उल्लेखित हो जाएगी। भाव के हिसाब से इसका कोई तोड़ नहीं है।गीत पढ़ते पढ़ते मन गुनगुनाने लगा.
आपने इतनी आसानी से मनोभावों को प्रेम-गीत में बदल दिया है. कहीं-कहीं तुकबंदी से बाहर गई है, फिर भी गज़ल का मूल बरकरार है। आपके विचार प्रभावित करते हैं|विरह का भी सटीक वर्णन है।कविता की छटपटाहट भीतर तक बेधती है| बधाई स्वीकार करें।

बाकी समय समय पर विद्वानों वाली टिप्पणियाँ छुट्टी वाले दिन कट पेस्ट करके रख लें, हफ्ते भर काम आती रहेगी. कुछ करने की जरुरत नहीं है. जरुरत है तो सजगता की, कट पेस्ट करने की कर्मठता की.

आठ दस तुलसी दास जी की चौपाईयाँ और संस्कृत के श्लोक भी अपने पास रखे रहें और किसी भी टिप्पणी के बीच में इस्तेमाल कर लें, यह कहते हुये कि कविता पढ़कर यह याद आया: xxxxxxxxxxxxx और फिर x के स्थान पर आपका श्लोक या चौपाई. ३ आपकी सेवा में हम दे देते हैं बाकि अपने विवेक से इंटरनेट पर खोज लें.


आठ दस तुलसी दास जी की चौपाईयाँ और संस्कृत के श्लोक भी अपने पास रखे रहें और किसी भी टिप्पणी के बीच में इस्तेमाल कर लें, यह कहते हुये कि कविता पढ़कर यह याद आया: xxxxxxxxxxxxx और फिर x के स्थान पर आपका श्लोक या चौपाई. ३ आपकी सेवा में हम दे देते हैं बाकि अपने विवेक से इंटरनेट पर खोज लें.


१. श्रवनामॄत जेहि काव्य सुनाई
सन्मुख प्रगट होति किन भाई

२.कवितां शेषां पहंसि,तुष्टा रुष्टा सु कामान सकलान भीष्टान
त्वामाश्रितानां न विपन्न राणां, काव्यात्मिनां ह्याश्रितां प्रयान्ति

३.गिरा अनयन, नयन बिनु बानी
प्रतिभा जावे नाहिं बखानी

कोई नहीं पूछता कि इसका यहाँ क्या अर्थ है या इसका क्या औचित्य. अव्वल तो आधे लोगों को समझ ही नहीं आयेगा और अगर आ भी गया, तो कोई इस डर से पूछेगा नहीं कि शायद फिट हो रहा हो और उसे ही न बाद में मूर्ख बनना पड़े. कवि तो आपके टिप्पणी के अहसान तले यूँ ही दबा है तो उसके पलटवार का तो सवाल ही नहीं, उससे आप निश्चित रहें और जब कर्ता और प्राप्तकर्ता को कोई आपत्ती नहीं कोई काहे बेगानी शादी में अबदुल्ला दीवाना बनेगा. कई बार तो लोग आपका ज्ञान देख आपको सम्मान की दृष्टी से देखने लगेंगे और आपके नाम के साथ जी लगाकर बात करने लगते हैं.

हमारा काम था समझाना तो समझा दिया. आगे आप सबका विवेक जो कहता हो, वैसा करें. आज तक तो कर ही रहे थे, कौन सा पहाड़ टूट पड़ा.

चलते-चलते:

इस व्याख्यान माला में जो टिप्पणियों के नमूने जनहित में दिये गये हैं ,वो यहीं विभिन्न कविताओं के ब्लाग से बटोर कर थोड़ा बहुत संपादन के साथ परोसा गया है, इसमें जिन ब्लागों का साभार मुझे करना चाहिये वो हैं, हिन्द युग्म , डिवाइन इंडिया, मान्या , बेजी इत्यादि. कृप्या कोई इन्हें अन्यथा न ले, सब तो जग जाहिर है यूँ भी. :) :) Indli - Hindi News, Blogs, Links

मंगलवार, फ़रवरी 20, 2007

वाह रे, यह चैनल

आज सबेरे जब कम्प्यूटर खोला तो देखा हमारे न्यूज चैनेल वाले भाई साहब के गुगल चैट पर नोटिस बोर्ड टंगा है, फ्लैशिंग न्यूज टाइप:

ब्लागर्स में मार-पीट, चुनावी हिंसा

हम भागे कि क्या कहाँ हो गया. हमें डाऊट तो अपनी पोस्ट पर भी आया, मगर नारद पर सब शांति थी. सब मजे में थे. नवागंतुक ऐसा आये, ऐसा लाये कि बाकि सब गायब पहले पन्ने से, नौ दस पोस्ट लेकर. खैर, हमें मालूम है, यही विजेता की पहचान और लक्षण हैं कि हर तरफ वही वही. तो हमारे भाई आलोक शंकर जी और बड़े विजेता हैं, हिन्दी युग्म के पिछले माह के न सिर्फ़ लिखने के बल्कि पढ़ने के भी, दोनों . तो बनती भी है कि हम सब पीछे चले जायें. न जायेंगे तो भगा दिये जायेंगे इसलिये बेहतर है गति को पहचानें और सटक लें.

सही है, हम तो अगले पन्ने से ही थोड़ा थोड़ा झांकते रहें तो भी काफी. आप नवागंतुक हैं , आपका अधिकार बनता है, हमें पीछे ठेलने का. बहुत बधाई और शुभकामना. यही आज का प्रचलन भी है, वरना राहूल गाँधी को अटल बिहारी के सामने कौन पूछे.

यह स्थान आपके लिये ही है कि तर्ज पर हम हट गये और चले उस दरवाजे, जहाँ फ्लैशिंग न्यूज का बोर्ड टंगा था. हमने द्वार खटखटकाया और पूछा कि भई, कहाँ मारपीट हो गई, हमें तो दिखी नहीं कहीं चुनावी हिंसा.

तब भाई जी बोले: "चुनावी बयार है.. कहीं तो हुई होगी.. मैं तो बिना सोचे समझे ब्रेकिंग न्यूज़ चला देता हूं.. टीआरपी के लिए .यही तेज चैनलों का तरीका है. शाम तक नहीं हुआ तो करवा देंगे.". तब हम समझे कि कैसे चलते हैं यह सारे चैनल ब्रेकिंग न्यूज के साथ. वाह यार, हम यह भी नहीं जानते थे, हम तो पाषाण युगीन कहलाये.

हमें लगने लगा कि हम कितना पिछड़े हैं और दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गई है. हम बस सोच रहे हैं और वो सोच भी रहे हैं और जो सोच लिया उसे क्रियांवित भी कर रहे हैं. क्या बात है, उनको साधुवाद और हमें धिक्कार, अब भी जागो, समय है.

लगता है, यही सच है:


"सचमुच बहुत देर तक सोये,
लोगों नें सींची फुलवारी,
हमने अब तक बीज न बोये.
सचमुच बहुत देर तक सोये, "


वाकई, इस सब विस्तार को विस्तार से विश्लेषित करता हूँ तो लगता है कि क्या कुछ नहीं बदल गया. सब कुछ पुराने जैसा है मगर है नया. पुराने रवाजों का अब कोई मुल्य नहीं. आपकी औकात क्या है यह आपकी योग्यता नहीं ,आपकी पब्लिसिटी इंडेक्स बताती है जो दूसरे तय करते हैं, इस पर हमारा कोई जोर नहीं. (यह शेर पता नहीं किसका है):


इस भीड़ में जिस शक्स का कद सबसे बड़ा है
वो शक्स किसी और के कंधे पे खड़ा है


हमें तो कोई ऐसा कंधा भी नहीं मिल रहा तो बस चलते हैं. आप ढ़ूढ़िये कोई कंधा.

और हाँ, चलते चलते: तरकश पर हमें भी थोडी कवरेज मिली है (किसी और के कंधे पर ), खुशी नया पॉड कास्ट लेकर आई है हिन्दी ब्लागर हाट लाईन. एकदम नया प्रयास है और बड़ा गजब का. धीरे धीरे इसके माध्यम से सब चिट्ठाकार कितने करीब हो जायेंगे एक दूसरे को जानकर. वाह खुशी, बहुत खुब. तुम्हें और तरकश परिवार को अनेकों बधाई. Indli - Hindi News, Blogs, Links

वो सुनाते रहे हैं दास्तां

कल पिछली पोस्ट पर लोगों के विचार सुनें, जबकि हम कह चुके थे कि पुनी पुनी बोले (शायद ऐसे लिखते तो ठीक रहता-बार बार बोले) मगर फिर भी हमने अपने आप से पूछा कि यह क्या है बार बार टिप्पणी टिप्पणी पर लिखते हो, मगर क्या करें. ब्लाग जगत है ही ऐसा. सब एक दूसरे की देखा देखी लिखते हैं, तो हम भी सोचे सब ही तो एक एक विषय पकड़ कर लिख रहे हैं तो हम भी अपना विषय बना लें, चिट्ठाकार, चिट्ठाकारी, चिट्ठाकारी के तरीके, टिप्पणियों और दाद का महत्व इत्यादि. हर टोक टिप्पणी को देख एक लतीफा याद आ गया:


एक बार एक कवि को तेज मोटर साईकिल चलाने के जुर्म में पुलिस ने रोक लिया और चालान बनाने लगा.

कवि बोला, हमें क्यूँ पकड़ रहे हो, उसको पकड़ो जो आगे भागा है.

पुलिस ने पूछा, उसको क्यूँ पकड़ें?

तब कवि बोला कि हमें अपनी कविता सुना कर भाग गया और अब हमारी नहीं सुन रहा.

पुलिस वाले ने उसे जाने दिया और चालान नहीं किया.

मगर यह दर्द सब थोड़े ही समझते हैं.


हमने तुरंत अपनी सारी पोस्टों का पुनः आंकलन किया. पाया कि हाँ हम टिप्पणियों की गाथा पर चार से ज्यादा बार लिख चुके हैं और सिरियल के तौर पर पहली बार लिख रहे हैं जिसके मात्र और मात्र दो भाग है और पुराने भी जोड़ लें तो ज्यादा से ज्यादा पाँच लगभग किसी बड़े चल रहे सिरियलस, जैसे वो २५ गीत की पायदानों वाला अपने मनीष भाई का, का २०%., बहुत ज्यादा नहीं. मगर शायद यह भी ज्यादा ही कहलाया.

हमने मन को झटकाया कि भाई, सब अपने प्रेमी बंधु है, अपनी बात कह रहे हैं, इसे वो राजकुमार के डायलाग वाला शीशे के घरों पर मारा पत्थर न समझो और फिर इसमें लतीफा काहे याद कर रहे हो. मन सीधा साधा है, मान गया. फिर लतीफा नहीं याद किया बस एक बहुत बड़े शायर राकेश खंडेलवाल जी के शेर याद करने लगा:




वो सुनाते रहे हैं दास्तां महीनों की
हमने लम्हे की सुनाई तो बुरा मान गये

थोपते आये हैं हम पर वो पसंदें अपनी
अपनी हमने जो बताई तो बुरा मान गये

एहतियातन लगाये हमने लबों पर ताले
आज ताली जो उठाई तो बुरा मान गये





हमने फिर मन को समझाया कि भाई, सब अपने सखा हैं ऐसा मत सोचो. फिर मान गया. मगर एक प्रश्न कर बैठा. कहने लगा, भाई साहब, यह बताईये कि जनवरी फरवरी में जब भी लोग कनाड़ा में मिलते हैं तो सिर्फ़ ठंड की बात क्यूँ करते हैं कि आज ज्यादा है, कल कम थी और कल और कम होगी. हमने कहा कि भाई, यह ठंड का देश है तो यहाँ ऐसी ही तो बात होगी. कोई गीत गजलों की महफिल में जाकर प्रेमचंद की बात तो करेगा नहीं या माईक्रो सॉफ्ट के दफ्तर में तो तकनिकी पर ही तो बात होगी, कोई बड़ापाव बनाने के तरीके पर तो बात चलेगी नहीं. मय्यत मे जाओ, तो जीवन मृत्यु की बात ही करनी पड़ती है, न कि शादी ब्याह या किसी के अलंकरण समारोह की.

हमने कहा कि भाई, यह ठंड का देश है तो यहाँ ऐसी ही तो बात होगी. कोई गीत गजलों की महफिल में जाकर प्रेमचंद की बात तो करेगा नहीं या माईक्रो सॉफ्ट के दफ्तर में तो तकनिकी पर ही तो बात होगी, कोई बड़ापाव बनाने के तरीके पर तो बात चलेगी नहीं. मय्यत मे जाओ, तो जीवन मृत्यु की बात ही करनी पड़ती है, न कि शादी ब्याह या किसी के अलंकरण समारोह की.


जहाँ हो, जिस वातावरण में हो, वहाँ बस वैसा ही व्यवहार करो. अब गये हो कवि सम्मेलन में और कहोगे कि यार, आप कविता अच्छी कर रहे हो मगर क्या आपको नहीं लगता कि कविता की बात ज्यादा हो गई. कुछ योग सिखाओ. अरे, यह भी कोई बात हुई. तब तो हरिद्वार ही जाओ, वहाँ भी तो तुम्हारा मन नहीं लगेगा कि बस हर समय योग योग, कुछ कविता सुनाओ. यह सब आपकी नहीं, मानव मन की खोट है. जिस वातावरण मे रहता है, उससे उस पार का वातावरण विचारता है. पंक्तियाँ याद आती हैं बच्चन जी की :

इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा.

इसे ही मन का विचलन कहते हैं. अरे भाई, जब तक इस पार हो, इस पार की देखो, मधु पिओ, उसके सानिध्य का आनन्द लो. जब उस पार जाओगे, तब तो वहाँ का हाल मालूम चल ही जायेगा.

दक्षिण भारत में रह कर सिर्फ़ गर्मी की बात की जाती है, बर्फ की करोगे तो लोग पागल कहते हैं और उससे कोई राहत भी नहीं मिलती. कभी यूगांडा में पकवान और व्यंजन की बात मत कर देना. सुना है, वो बहुत बुरा मानते हैं इस बात का. आकाल पड़ा हो, भुखमरी हो तो उससे उबरने के उपाय तलाशने होते हैं.

बच्चों को रोज रोज एक ही बात समझानी पड़ती है तब जा कर वो संस्कार सीखते हैं, न कि माँ डाक्टरेट हासिल करके बैठ जाती है कि अब बहुत सीखा चुकी. अब आने वाली संतानें उसका पुराना शोध पत्र पढ़कर ज्ञानी हो जायेगी. हर नये बच्चे के साथ बदलते समय के अनुरुप बदलाव कर वही कहानी दोहरानी होती है. यही अभिभावक का फर्ज है. जो इससे चुका, वो अपने कर्तव्यों का सही निर्वहन नहीं कर पाया, ऐसा मेरा मानना है.

वैसे कवि सम्मेलन में दाद कितनी भी मिलती रहे, जैसे जैसे सम्मेलन चढ़ता जाता है, दाद बढ़ती जाती है मगर कभी भी ऐसा नहीं माना जाया कि अब ज्यादा हो रही है.मेरा एक अंग्रेजी ब्लाग है, वहाँ तो बहुत ही ज्यादा हो रहा है, हर बार मैं एम एस एक्सल पर ही लिखता हूँ. :)

अब जैसे कनाड़ा में ठंड की बात न हो, यह संभव नहीं. भाजापाई और कांग्रेसी मिलें और मंदिर मज्जिद की बात न चलें, यह संभव नहीं. ठीक वैसे ही, जब हम चिट्ठाकरी की बात करें और टिप्पणी की बात न चले, वर्ड प्रेस की बात न चले, ब्लाग स्पाट की बात न चले, चिट्ठों के व्यवसायिकरण की बात न चले और बार बार न चले, वो संभव नहीं. सब मौज मजे की बातें हैं, मन बहलाते हैं सब हाल फिलहाल तो. रोज नये लोग जुड़ रहे हैं, वो कुछ पुराना उठा कर कम ही पढ़्ते है बल्कि रोज परोसा गया ही इतना होने लगा है कि वो ही पूरा पढ़ लें तो उनका साधुवाद. ऐसे में अगर किसी पुरानी बातों को जो आज भी उतना ही मायने रखती हैं, को नये अंदाज में पुनः अवलोकनार्थ पेश किया जाये तो मैं इसमें कोई बुराई नहीं समझता. मैं तो जब पहली बार इस बात को लाया था, तभी वो कई बार लोगों के द्वारा लिखी जा चुकी थी, मगर बदला हुआ अंदाज लोगों को भाया, ऐसा मुझे लगा. :)

मैं इसे ठीक उसी अंदाज में लेता हूँ कि जैसे किसी को तकनिकी पर लिखना पसंद है, किसी को राजनीति पर, किसी को फिल्मी गीतों पर, किसी को व्यवसायिकरण पर, किसी को यात्राओं पर और किसी को धार्मिकता पर, वैसे ही मुझे चिट्ठाकार, चिट्ठाकारी, चिट्ठाकरी के तरीके, टिप्पणियों और दाद का महत्व इत्यादि पर लिखने की उत्सुकता रहती है, यही मेरी पसंद है. इसका शायद विशेष कारण यह भी हो कि किसी को पसंद आये, न आये, इसके विवाद का कारण बनने की गुंजाईश थोड़ा कम ही रहती है और विवादित बातों से मैं थोड़ा किनारे होकर ही चलना पसंद करता हूँ.

मैं इसे ठीक उसी अंदाज में लेता हूँ कि जैसे किसी को तकनिकी पर लिखना पसंद है, किसी को राजनीति पर, किसी को फिल्मी गीतों पर, किसी को व्यवसायिकरण पर, किसी को यात्राओं पर और किसी को धार्मिकता पर, वैसे ही मुझे चिट्ठाकार, चिट्ठाकारी, चिट्ठाकरी के तरीके, टिप्पणियों और दाद का महत्व इत्यादि पर लिखने की उत्सुकता रहती है, यही मेरी पसंद है. इसका शायद विशेष कारण यह भी हो कि किसी को पसंद आये, न आये, इसके विवाद का कारण बनने की गुंजाईश थोड़ा कम ही रहती है और विवादित बातों से मैं थोड़ा किनारे होकर ही चलना पसंद करता हूँ.


यहाँ हम किसी महाकाव्य की रचना को संकल्पित होकर तो आये नहीं है. महाकाव्य तो क्या, खंड काव्य तक नहीं. न ही हम इस गुमान में हैं कि हम साहित्य की सेवा को तत्पर हैं. बस हिन्दी में लिखते हैं कि मौज मजा चलता रहे, भाषा के प्रसार पर जागरुकता बढ़े और सही मायने में बढ़ भी रही है. हर रोज नये चिट्ठाकार जुड़ रहे हैं, हिन्दी चिट्ठाकारी को नये आयाम मिल रहे हैं. शायद यही तो उद्देश्य भी है हम सबका. वो पूरा हो रहा है वरना तो गीत इत्यादि की म्यूजिक इंडिया जैसी अनेकों वेब साईटें हैं, वहीं जाकर सुन सकते हैं या मुशायरा डॉट ओ आर जी पर पहुँच शायरों की शेर एवं गजलें. क्यूँ चिट्ठे की जहमत पालें. क्या जरुरत है अगले पोस्ट की इंतजार करने की. बस यही न कि चलो आप क्या सोच रखते हैं यह देखा जाये. आप सब परिवार के अभिन्न अंग हैं, आपकी सोच ही परिवार को दिशा देती है और पहचान भी. यही सुगठित परिवार की पहचान भी है. मैने अपनी सोच से कुछ नहीं सोचा, ऐसा ही वेदों और पुराणों में लिखा है.


वैसे इन सारी बातों से एक बहुत पुराने विचार पर विराम लगा. मैं सोचा करता था कि क्यूँ डॉ. खुराना भारत छोड़ कर भाग आये और अमेरीका आकर अपना शोध किया और नोबल पुरुस्कार से सम्मानित भी हुये. शायद किसी ने कह दिया होगा कि डॉक्टरेट दे देते हैं मगर क्या ये जीन्स जीन्स ज्यादा नहीं हो रहा है, पापे??


मगर मन के संशय ने मुझे आज अपनी प्रवचन माला के भाग २ को लाने से रोक दिया. इसीलिये यह प्रविष्टी करनी पड़ी. प्रवचन माला २ मन का संशय के दूर हो जाने पर ही लाऊँगा, यह वादा रहा. आप तो मेरा स्वभाव जानते हैं. न
मैं किसी बात का बुरा मानता हूँ और न ही सामने वाले से आशा करता हूँ कि वो अन्यथा ले.किसी का दिल दुखे और मैं अपने मन की लिखता रहूँ, मैं उस स्वभाव का नहीं. इससे बेहतर मैं न लिखने को मानूँगा. इस हेतु जितने स्माईली लगाना हो, लगा देता हूँ. बस कोई दिल से न लगाना भाई कोई बात, जैसे हमने नहीं लगाई. एक उम्दा शायर हर्ष भाई की पंक्तियाँ याद आती हैं:



मंदिर मे रख दो रब को
मस्जिद मे राम ले लो।
चाहो तो माफ कर दो
या इंतकाम ले लो।


और



हम दर्द चाहते है हम जख्म मांगते है
इस दिल पे वार हो तो ताजा गजल सुनाये।
जो तीर तुमने छोड़ा अटका हुआ है थोड़ा
ये दिल के पार हो तो ताजा गजल सुनाये।


यह पोस्ट मेरे मन की न सही और न ही मेरी किसी भी पोस्ट से मेल खाती, मगर फिर भी छाप ही दें.

चलते-चलते: यह पोस्ट सिर्फ मौज मजे के लिये है, इस पर बहुत गहराई से शोध न किया जाये, यही निवेदन है. Indli - Hindi News, Blogs, Links

शुक्रवार, फ़रवरी 16, 2007

पुनि पुनि बोले संत समीरा- प्रवचन माला भाग १

५ मई सन २००६ तदानुसार विक्रम संवत २०६२ ...आगे लिखना सीख रहा हूँ शुक्ल पक्ष ८..या जो भी...

शैलेष भारतवासी भाई, जरा बताना!! आभारी रहूँगा.

यह वह ऐतिहासिक दिन था जब हमें हिन्दी चिट्ठाजगत का असीम प्रेम टिप्पणियों के माध्यम से हमारी पोस्ट "अपना ब्लाग बेचो, भाई..." पर मिला. इसी पोस्ट ने मुझे सही मायने में चिट्ठाजगत में पहले पहल पहचान दी. तब से अब तक चिटठा परिवार के सदस्यों की संख्या में बहुत इजाफा हुआ और खास तौर पर कविता के चिट्ठों में तो अति. एक से एक कवितायें रची जा रहीं हैं. जोर शोर से दादों और आह-वाह का दौर चल रहा है. अब जैसा की होता है, हर परिवार में हर तरह के लोग रहते हैं और सभी प्यारे होते हैं. तब जो कविता प्रेमी नहीं है या जो यहाँ तक कहने में नहीं चुकते कि हमें तो कविता समझ ही नहीं आती, क्या पढ़ें. मगर अपनी पोस्टों पर टिप्पणी की दरकार तो उनको भी रहती ही होगी, कुछ अपवादों को छोड़कर. वैसे उनको मैं परिवार का ऐसा सदस्य मानता हूँ जो चरसी निकल जाता है. अपनी ही दुनिया में मगन. घर में खुशी हो या गम, वो चरस के नशे में तटस्थ. मगर परिवार को वो भी प्यारे होते हैं और गैर नशे की हालत में कभी कभी उनको भी परिवार से प्रेम उभरता है. जैसा कि आम तौर पर होता है कि परिवार बढ़ जाता है तब हालांकि सदस्यों का परस्पर प्रेम तो बना रहता है मगर एक जैसे गुणधर्मी सदस्यों के बीच घनिष्ठता बढ़ती जाती है, जो कि गुट ना होते हुये भी गुट की तरह ही नजर आते हैं. वही हाल बुजुर्ग, जवान और बच्चों का होता है, सब अपनी अपनी के उम्र का गुट की तरह जमवाड़ा सा कुछ बना लेते हैं. बड़ों को लगता है, ब्च्चों के बीच क्या चल रहा है और बच्चों में यही जिज्ञासा- बड़ों को लेकर रहती है.

खैर कहाँ की बात कहाँ चली जा रही है. बात चली थी हमारी पुरानी पोस्ट 'अपना ब्लाग बेचो, भाई' और कविताओं के चिट्ठों में आये इजाफे की. मैं देख रहा हूँ कि जो लोग कविता में बहुत दखल नहीं रखते, वो भी संबंधों के चलते और साथ ही रिटर्न गिफ्ट की आशा में, जो कि चिट्ठाजगत का नियम है: 'टिप्पणी दो, टिप्पणी पाओ', थोड़ा इधर उधर देखदाख कर टिप्पणी कर ही आते हैं. मगर वहाँ कविता के तथाकथित समझदारों की टिप्पणियों के बीच, इनकी टिप्पणी की गौणता और इसको करने की असहजता साफ झिलमिलाती है. तभी तो किसी ने कहा है कि मजबुरी क्या नहीं करवाती.

इस विषय मे नये चिठ्ठा साथियों की जानकारी के लिये बता दूँ कि हम ही अनोखे नहीं हैं जिन्होंने टिप्पणी विधा पर शोध किया है और लगातार जुटे हैं. विख्यात चिट्ठाकार फुरसतिया जी जिन्हें पितामह का दर्जा प्राप्त है ( यह हम नहीं कह रहे हैं क्योंकि वो इसका बुरा मनते हैं अंदर ही अंदर) और जनप्रिय नारद स्वरुप जीतू ने भी लिखा है. फुरसतिया जी को यहाँ पढ़ें और आपके प्रिय जीतू को यहाँ .

यूँ शायद न समझ आये, तो नये आये चिट्ठाकार इस जगत को कुछ इस तरह समझें: मान लिजिये आप जहाँ खड़े हैं, उसके चारों तरफ ऊँचें ऊँचे पहाड़ ही पहाड़ हैं. अब यह आप की सोच पर निर्भर है कि आप अपने आपको गढ्ढे में फँसा मानते हैं या हसीन वादियों में. इससे कोई अंतर नहीं पड़ता. अंतर पड़ता है कि आप क्या कहते हैं और क्या करते हैं. आप चिल्ला चिल्ला कर कहें आप बहुत अच्छे हैं, प्रतिध्वनी में आपको एक चिल्लाहट की पाँच वापस मिलेंगी कि आप बहुत अच्छे हैं. आप चुप बैठ जायें, पूरा वातावरण साँय साँय करेगा. कोई कुछ नहीं बोलेगा. और आजमाना हो तो जोरों से गाली बकिये. बदले में न सिर्फ़ पाँच पाँच गालियाँ आयेंगी बल्कि अनेकों नयी पोस्टे भी आपकी खातिर में पेश की जायेंगी. यहाँ तो यही प्रचलन है, अंगूर बो, और अंगूर खाओ. एक दो बार तो कोई यूँ ही आदत डलवाने के लिये खिलवा देगा, जैसे कि आपके स्वागत में और एकाध पोस्ट तक. स्वागत में तो हमारे यहाँ बिछ बिछ कर फरशी सलाम करने की परंपरा है. फिर तो सब निर्भर करेगा कि आपने क्या बोया है, वही कटेगा. बहुत अच्छा लिखना, कम अच्छा लिखना, घटिया लिखना-यह सब तो बाद की बातें हैं, इसे तो जब मरजी आये तब देखते रहना. उससे कोई विशेष अंतर नहीं पड़ता यह अजमाई हुई बात है.

अब जो कहते हैं इस जगत में हम आये हैं स्वान्तः सुखाय के लेखन के लिये, वो टिप्पणी के आभाव में खंभा नोच रहे हैं ऐसा मेरा मानना है. अगर तारीफ नहीं चाहिये और किसी को पढ़ाना नही है, तो यहाँ क्या कर रहे हो. आपके लिये हरिद्वार में हरकी पौड़ी के उपर एक घाट खुलवाया जा रहा है, जहाँ घाट पर ही सोफा टाईप के मंच बनाये गये हैं. वहाँ बैठ कर स्वान्तः सुखाय लिखो फिर जिस कागज पर लिखो उसकी नाव बना कर बहा दो (नाव कैसे बनाना है, इसके लिये हमारे तकनिकी ज्ञानी मास्साब श्रीश क्लास लगायेंगे, वहाँ सीख लेना) और सुखी रहो. खुलवा तो घाट हम बनारस में देते मगर वहाँ जगह पहले से आरक्षित है सचमुच वाले स्वान्तः सुखाय साहित्यकों के लिये और वो काफी दिनों से बहा रहे हैं. इस घाट पर बैठने के लिये अलग काबिलियत की जरुरत है और ये लोग ब्लाग नहीं लिखते, ऐसी खबर लगी है.

अब जब सब समझ रहे हो तो यह भी समझ लो, यह सब कवि जो ब्लाग पर हैं (कुछ अपवादों को छोड़ दें) यह मंच के लायक नहीं हैं. मंचीय कवि वो होता है जो टोटल नौ कविता लिखता है अपने मंच काव्य जीवन काल में. तीन एक मंच से, तीन दूसरे से, टीन तीसरे से, फिर पहले वाले पर पुरानी दो, और एक दूसरे मंच की. यही घाल मेल कर वो जीवन काट देता है. एक कविता हर जगह सुनाता है जो एकदम हिट होती है, जैसे हमारी ताली पुराण, बाकि रिमिक्स चलता रहता है. ब्लाग की तरह हर सोम सोम, मंगल मंगल लिखोगे तो चल चुके. ऐसा नहीं होता है मंच पर कि हर बार नया लिये खड़े हैं. इसके लिये या तो हरिद्वार के पहले वाला घाट है या ब्लाग है.

एक बात और बताता हूँ कि गीता का भाव अब आदिकालिन हो गया है: “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। ”..कर्म किये जाओ, फल की इच्छा मत करो. अरे, ये कोई बात हुई. आजकल तो ऐसा नहीं होता. कर्म करें ना करें, फल तो हमें चाहिये ही!! यही हमारा नियम है, अब जिसको जो सोचना है सोचे. हम तो यही मानते हैं. वरना क्या हम बेवकूफ हैं कि सुबह से शाम तक इस चिट्ठे से उस चिट्ठे तक घुम रहे हैं, टिप्पणी कर रहे हैं, सब कुछ क्या यूँ ही. बिना किसी चाहत के, क्या पागल वागल समझ रखा है.

खैर, आज के लिये इतना ही..अगले अंक में हम आपको बतायेंगे कि कविता का ब्लाग कैसे और क्यूँ पढ़ें और वहाँ सफल टिप्पणियां कैसे करें. यह सब जनहित में होगा, स्वामी समीरानन्द जी की अगली प्रवचन माला में. Indli - Hindi News, Blogs, Links

मंगलवार, फ़रवरी 13, 2007

दाता से सुम भला...

परसों सुबह जल्दी नींद खुल गई. इंडीब्लागिज पर नामांकित चिट्ठों की घोषणा होनी थी. समय रहते हो गई. ७ दिग्गजों के साथ ८ वां नाम उड़न तश्तरी, ८वें स्थान पर. हम समझ गये कि बाकि लोग भले ही घोषणा को धता बताकर चुनाव में अपना स्थान वोटों के माध्यम से बदल लें, हम तटस्थ रहेंगे. घोषित जैसे हुये हैं, वैसे ही. हम नियम तोड़ना अपने आप में एक जुर्म समझते हैं. हम नहीं तोड़ेंगे भले ही दूसरे कुछ भी करें. अगर सब एक से हो गये तब तो देश चल चुका. आज आपको एक राज की बात बताता चलूँ: भारत में सब बहुत व्यस्त नजर आते हैं, ऐसा लगता है पूरा देश इनकी चहल कदमी की वजह से चल रहा है, जो कि ९०% आबादी हैं. बाकि के १०% तो नजर ही नहीं आते. मगर हकीकत यह है कि वो ही १०% हैं जिनकी वजह से देश चल रहा है. मगर जो चहल कदमी करेगा, दिखेगा वो ही. लोग उसे ही समझेंगे. उसे ही सराहेगे, तो सराहें. बाकि के १०% के बिना भी तो गुजारा नहीं है. हम उसी १०% में ठीक. कुल जमा ८ लोग नामांकित हुये हैं, ९०% के हिसाब से ७ तो चहल कदमी करेंगे, तो कर लो भईया. सब इनको ही पूजो. गिर पड़ो इनके पैरों में, यही समय की मांग है. हम कर्तव्यनिष्ठ हैं, पूर्ण निष्ठा से अपने कर्तव्यों का पालन करेंगे और तटस्थ रहेंगे. ८ वें घोषित हुये हैं भले ही वर्णमाला के अक्षरों के हिसाब से, मगर हम हिलेंगे तक नहीं.

आज से मतदान भी शुरु हो गया. हमें क्या, होये या बंद हो जाये. हमें तो इससे कुछ लेना देना नहीं है. सुबह की चाय पी. अब नामांकन हो ही गया है तो किसी की बेईज्जती तो करनी नहीं है, सोचा एक दो मित्रों को बता दूँ कि भईया, भले ही ८वें नम्बर पर तटस्थ रहें मगर कुछ एक वोट तो पड़ ही जायें ताकि चुनाव प्रक्रिया सुचारु भी दिखे और हमारा ८वें नम्बर पर बने रहने का प्रण भी न टूटे. खादी का सफेद झकाझक कुर्ता पैजामा पहना, जो तरकश चुनाव के समय सिलवाये थे और फिर कलफ करवा कर धर दिये थे. जैसे ही मित्र का दरवाजा खटखटाये, उन्होंने तुरंत दरवाजा खोलते ही गले से लगा लिया. ढ़ेरों बधाईयां दी. हम समझे नामांकन की खबर लग गई दिखता है, फिर भी अनभिज्ञ बनते हुये पूछ बैठे कि भाई, आप बधाई काहे की दे रहे हैं. वो बोले, तरकश चुनाव जीतने की. हमने भी बहुत धन्यवाद किया और मारे शरम के कह ही न पाये कि यार, उसको तो महिना बीत गया, अब तो नया चुनाव आ गया है. बस बधाई लेकर निकल दिये. फिर दूसरे दोस्त के दरवाजे. उससे चुनाव के बाद दूसरी बार मिल रहा था तो पहले मित्र वाला खतरा नहीं था. जैसे ही वो मिला बोला क्या बात है, अब क्या कुर्ता पैजामे मे ही रहोगे कि वापस आदमी बनोगे. हमने कहा कि नहीं मित्र, फिर से चुनाव लड़ रहा हूँ, इस बार जरा बड़ा चुनाव है तो मदद मांगने आया था. वो भी छूटते ही बोला, यार तुम भी न!! एक बार तो ठीक है मगर यह रोज रोज की आदत न बनाओ. जब मिले बस शुरु: भईया, एक ठो वोट दे दो.
अब क्या कुर्ता पैजामे मे ही रहोगे कि वापस आदमी बनोगे. हमने कहा कि नहीं मित्र, फिर से चुनाव लड़ रहा हूँ, इस बार जरा बड़ा चुनाव है तो मदद मांगने आया था. वो भी छूटते ही बोला, यार तुम भी न!! एक बार तो ठीक है मगर यह रोज रोज की आदत न बनाओ. जब मिले बस शुरु: भईया, एक ठो वोट दे दो. .

यार, तुमसे अच्छे तो भिखारी हैं. कम से कम से भूख के कारण मांगते हैं और दे दो तो हजार दुआयें. अगर ऐसे ही संबंध रखना है तो माफ करना दोस्त, अपनी न निभ पायेगी. लो, दोस्ती भी गई और उसने भड़ाक से दरवाजा बंद कर लिया. हम तो बहुत उदास हुये. फिर तो कुछ और वाकये हो गये. एक ने कह दिया कि "दाता से सुम भला. ठाड़े दे जवाब" . एक ने कहा कि यह कुछ पैसे रख लो और एक कटोरा खरीद लो कि महावारी वोट की भीख का कटोरा बना घुमा करो. एक बोले कि इस बात की क्या गारंटी कि चलो दूसरी बार देने के बाद अगले महीने फिर मांगने नहीं आओगे. हम तो टूट से गये, आँख से दो बूँद आँसूं गिर पडे और घर लौट पड़े.

रास्ते में एक जगह मंच सजा था, भयंकर भीड़ लगी थी. हमें लगा पता नहीं क्या माजरा है, तो जब कुछ पता नहीं होता, तो एक आम भारतीय की तरह भीड़ का हिस्सा बन कर भीड़ का ईजाफा करने लगे.
रास्ते में एक जगह मंच सजा था, भयंकर भीड़ लगी थी. हमें लगा पता नहीं क्या माजरा है, तो जब कुछ पता नहीं होता, तो एक आम भारतीय की तरह भीड़ का हिस्सा बन कर भीड़ का ईजाफा करने लगे.

तब तक एक कार रुकी, हल्ला मचा, हमने भी सुर मिलाया, स्वामी समीरानन्द की जय. जयकारा गुंजयीमान होने लगा और हम इस गुंजयीमान होने में संपूर्ण योगदान देते रहे बिना जाने कि क्या है और क्यूँ है. यही नियम है.

वो तो जब स्वामी समीरानन्द जी ने बोलना शुरु किया तब समझ आया कि सही जगह रुक गये, वरना ऐसी सब जगह उनकी ही तूती बोलती है जिनका उससे कुछ लेना देना नहीं होता. मंच पर स्वामी जी विराजमान हुये और साथ में उनके पीछे अपनी गर्मजोशी खोये शिष्य गिरिराज जोशी और चार लोग इस बाजू मंच की जमीन पर बैठे और तीन उस बाजू. ध्यान से देखा तो पाया: अरे, यह सात तो वही इंडीब्लागिज वाले नामांकित टॉप सात है जिसमें हम आठवें हैं. सब जनता की मुँह किये, झूठी मुस्कराहट चिपकाये, हाथ जोड़े बैठे थे. सातों ने थोड़े थोड़े पैसे सटाकर यह कार्यक्रम रखवाया था. हमें न शामिल किया, न पूछा. पूछते भी तो हम मना कर देते, क्योंकि हमें तो जो ईश्वर ने दिया है उसमे हम खुश हैं और जब ८वें है तो उसमे क्या मेहनते करना या सटना, सटाना.

स्वामी समीरानन्द ने अनुबंधानुरुप सातों की तारीफ की और उनको जिताने का आग्रह. रह गये तो हम. खैर, हमें तो इससे कुछ लेना देना नहीं था.....स्वामी जी ने एक एक उम्मीदवार का अलग अलग परिचय दिया और कहा:........बाकि अगले अंक में, क्रमशः...यह हम मनीष और अनुराग से सीख गये हैं.

चलते चलते:(एक पुरानी मुंडली, मगर फिर भी बिल्कुल सामायिक, शायद इसी दिन के लिये लिखी गई थी)



विराजमान हैं मंच पर, सब दिग्ग्ज पीठाधीश
हमउ तिलक लगाई लिये, अपनी खड़िया पीस.
अपनी खड़िया पीस कि बिल्कुल चंदन सी लागे
हंसों की इस बस्ती मे, बगुला भी बाग लगावे.
कहे समीर कि भईया, ये तो बहुत बडा सम्मान
इतनी ऊँची पैठ पर, आज हम भी विराजमान.


-समीर लाल 'समीर' Indli - Hindi News, Blogs, Links