रविवार, सितंबर 19, 2010

तुझे भूलूँ बता कैसे

आज कम्प्यूटर पर वायरस का हमला हुआ. सुबह से मोर्चा संभाला हुआ है उनके खिलाफ. देखिये, क्या नतीजा निकलता है. अच्छा है कि ९७% कम्प्यूटर का बैक अप है. याने चार दिन पहले तक का. टेंशन डाटा लूज करने की हमेशा ज्यादा होती है तो उससे मुक्त हूँ. बस, आपसे पूछना चाह रहा था कि आपके पास बैक अप है अपने कम्पयूटर का? क्यूँकि जिस तरह एक आतंकवादी नहीं जानता कि हमले में वो किसे मार रहा है, और किस समय कर रहा है, उसी तरह वायरस की चपेट में भी कोई भी आ सकता है कभी भी. अपनी सुरक्षा का इन्तजाम खुद करें. हर समय तैयार रहें बैक अप के साथ.

अब मौसम जा रहा है. सर्दियाँ लगने को है. फल सब्जी जो भी बगीचे में हुए, तोड़ लिए गये या तोड़े जा रहे हैं. खूब खीरे, मिर्च, टमाटर, चेरी, नाशपाती खाई गई बगीचे की. कल सेब की अंतिम खेप भी तोड़ ली और लौकी (भ्रष्टाचार से तेज गति से बढ़ी) कल तोड़ी जायेगी. तो सेब और लौकी की तस्वीरें:



इन्हीं वजहों के चलते कुछ लिखना नहीं हुआ, बड़ी मिटती उड़ती फाईलें, उनका बचाव दिन ले गया तो बीच में नजर पड़ी अपनी एक पुरानी कविता पर जिसे मैं मंचों से अक्सर सुनाता हूँ मगर आश्चर्य कि वो मेरे ब्लॉग पर नहीं है. न जाने कैसे छूट गई. तो आज वो ही:


तुझे भूलूँ बता कैसे

मैं हूँ इस पार तू उस पार, मगर दिल साथ रहते हैं
हमारे देश में यारों, इसी को प्यार कहते हैं
मुझे तुम भूलना चाहो तो बेशक भूल जाना पर
तुझे मैं भूलता कैसे, तुझे हम यार कहते हैं.

न जाने कौन सा बंधन, न जाने कैसे रिश्ते हैं
दर्द उस पार उठता है, आँसूं इस पार गिरते हैं
ये हैं अहसास के रिश्ते, इसे तुम नाम मत देना
जैसे फूल में खुशबू, ये हर इक दिल में रहते हैं.

इन्हीं रिश्तों के बंधन से, हुआ जो हाल इस दिल का
कई बीमार कहते हैं, कई लाचार कहते हैं
तुझे मैं भूलता कैसे, तुझे हम यार कहते हैं.

मुझे अक्सर रुलाती हैं, सुनहरी याद अपनों की
हमारे साथ के किस्से, लगे है बात सपनों की
मैं उन पत्तों से पूछूंगा, बता दो मुझको मजबूरी
छोड़ कर साथ शाखों का, बना ली तुमने क्यूँ दूरी

यूँ ही रोते बिलखते ही, मिटाने दूरियाँ निकला
हुई है मेरी हालत जो, उसे बेजार कहते हैं
तुझे मैं भूलता कैसे, तुझे हम यार कहते हैं.

जहाँ बचपन ये खेला था, गली वो याद रहती है
जहाँ भी जा बसें हम तुम, याद वो साथ रहती है
उन्हीं यादों के साये में, गुजरती रात की घड़ियाँ
यहाँ अक्सर ही दिन में भी, अँधेरी रात रहती है.

हँसता हूँ यहाँ पर मैं, तुम्हारे बिन ही महफिल में,
मेरी जाँ ये समझ ले तू, इसे व्यवहार कहते हैं
तुझे मैं भूलता कैसे, तुझे हम यार कहते हैं.

--समीर लाल ’समीर’

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बुधवार, सितंबर 15, 2010

जिन्दा सूखा गुलाब...

हरि बाबू, टूटती काया, माथे पर चिन्ता की लकीरें, मोटे चश्में से ताकती बुझी हुई आँखें, शायद ८४ बरस की उम्र रही होगी. हर दोपहर अपने अहाते में कुर्सी पर धूप में बैठे दिखते मानो किसी का इन्तजार कर रहे हों.

दो बेटे हैं. शहर में रहते हैं और हरि बाबू यहाँ अकेले. निश्चित ही बेटों का इन्तजार तो नहीं है, क्योंकि हरि बाबू जानते हैं कि वो कभी नहीं आयेंगे. बहु और बच्चों के लिए हरि बाबू देहाती हैं, तो इनके वहाँ जाने का भी प्रश्न नहीं. फिर आखिर किसका इन्तजार करती हैं वो आँखें?

उम्र की मार के कारण हरि बाबू की स्मृति धोखा देती है, पर बेटों से थोड़ा कम. आसपास देखी घटनायें ४-६ दिन तक याद रह जाती हैं. कुछ पुरानी यादें भी और कुछ पुरानी बातें भी, कुछ टीसें-नश्तर सी चुभती. इतना सा संसार बना हुआ है उनका जिसमें वो जिये जा रहे हैं. यही आधार है उनका और उनकी सोच का.

अकेले आदमी की भला कितनी जरुरतें, खुद से थोप थाप कर एक दो रोटी, कभी गुड़ तो कभी सब्जी के साथ खा लेते हैं और अहाते में बैठे-बैठे दिन गुजार देते हैं. बोलते कुछ नहीं.

जब नहीं रहा गया तो एक दिन उनके पास चला गया. पूछ बैठा कि ’चाचा, किसका इन्तजार करते हो?’

हरि बाबू पहले तो चुप रहे और फिर धीरे से बोले,’देश आजाद हो जाता तो चैन से मर पाता.’

मैं हँसा. मैने कहा कि ’चाचा, देश तो आजाद हो गया…. देश को आजाद हुए तो ६३ बरस हो गये. सन ४७ में ही आजाद हो गया था.’

देश तो आजाद हो गया…. सुनते ही एकाएक हरि बाबू के होंठों पर एक मुस्कान फैली और चेहरा बिल्कुल शांत.

हरि बाबू नहीं रहे.

oldman1

चलते चलते:

देखता हूँ जब

उस अँधेरे कमरे की

खिड़की पर रखा

बुझी लौ लिए एक दीपक,

जिन्दा सूखे हुए गुलाब

फंसे हुए गुलदस्ते में

और उस कोने वाली

दीवार से

टिका

टूटे तारों वाला

सितार....

तब दिखती है

इक रोशनी

उठती हुई दिये से

सुनाई देती है एक धुन

तारों से झंकृत

और

महक उठता है

गुलाब की खुशबू से

मेरा तन-मन!!

-समीर लाल ’समीर’

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रविवार, सितंबर 12, 2010

कुछ शामें और आज का दिन

मालूम तो था ही कि आ रहे हैं मगर कहाँ और कब मिलेंगे, यह आकर बताने वाले थे.

गुरुवार की सुबह बात हुई कि शुक्रवार की शाम को ७ बजे सिनेमा देखकर फुरसत होंगे, तब आ कर ले जाईये. टोरंटो अंतर्राष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में भारत से पधारे हमारे चव्वनी चैप (छाप नहीं) ब्लॉग के मालिक अजय ब्रह्मात्मज को लेने हम पहुँचे घर से ८० किमी दूर, यही विचारते कि अभी खाना खिलवाकर फिर छोड़ने यहीं आना है फिर ८० किमी. ५ बजे शाम से रात १२.३० बजे के बीच हमारी ३६० किमी की ड्राईविंग किन्तु मिलकर इतना आनन्द आया कि पता ही नहीं चला.

८ बजे उनको घर लेकर पहुँचे और फिर जमीं महफिल हमारे बार में. कुछ जाम छलके, अनेको विषयों से लेकर ब्लॉगिंग और फिल्मों की बात चली, भोजन किया गया और फिर उनको होटल छोड़ आये. यादगार शाम थी. अपनी पुस्तक भी उसी दौर में उन्हें टिका दी. कह गये हैं कि पढ़ेंगे. :)

मुलाकात की कुछ तस्वीरें:

 

 

फिर कल शाम अनूप जलोटा जी के साथ गुजरी. एक से एक भजन सुने गये. नई बात जो देखने में आई वो यह कि आजकल उन्होंने भी बीच बीच में कुछ चुटकुले जोड़ना शुरु कर दिया है जिसे पब्लिक ने खूब मस्त होकर सुना. साथ ही चामुंडा स्वामी जी का प्रवचन भी था. तो कल की शाम भी मजेदार गुजरी. उनके चुटकुले की एक बानगी.भजन तो आप यू ट्यूब पर यूँ भी सुन सकते हैं.

आज सुबह से ही एक मित्र के घर जाना हो गया बार-बे-क्यू का इन्तजाम, शहर से १०० किमी दूर. अभी लौटे.

शाम अजय भाई भारत वापस निकल गये. फोन से बातचीत हो गई. उन्होंने हमारी तारीफ की, हमने उनकी. बाय बाय हो गई. अभी वो हवाई जहाज में होंगे.

ये सब इसलिए सुनाया कि इन सब के बीच कुछ लिखने का मौका नहीं लगा, तो आज ये ही. :)

तो आज के लिए:

 

चाहता

तो लिख देता

एक कविता

तुम्हारे लिए

लेकिन

जब कविता

कुछ कह न पाये

तब सोचता हूँ

बेहतर है

चुप रह जाये!!!

-समीर लाल ’समीर’

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बुधवार, सितंबर 08, 2010

नीरो बाँसुरी बजाता है...

गुजरा वक्त लौट कर नहीं आता फिर भी सताता बहुत है.

अवसाद में न घिर जाऊँ इसीलिए डायरी नहीं लिखता. पहले लिखता था. बंद कर दिया. कई बार कलम उठाई, फिर रख दी.

एक गुलाब तोड़ लाया था बगीचे से. कांटा चुभ गया. कुछ देर गुलाब महकता रहा फिर मुरझा गया. ऊँगली में कांटा चुभने का दर्द बना रहा. मुरझाया फूल फेंक दिया.  ऊँगली में जहाँ कांटा गड़ा था, उसे छूकर देखा, तेज दर्द बना है. आँख से एक छोटी सी बूंद लुढ़क चन्द लम्हों में दम तोड़ती है. दर्द कुछ कम तो हुआ.

कुछ ही पन्ने लिखे हुए डायरी के. पन्ने भूरे से हो गये हैं. ज़िल्द की प्लास्टिक उखड़ने को है. अब नहीं लिखता डायरी वरना तो ज़िल्द कब का उखड़ गया होता. क्या लिखा है याद नहीं. पढ़ने का दिल भी नहीं.

डायरी से इतर कुछ घटनायें जेहन में कहीं अंकित हो गई हैं. सबको बसेरा चाहिये. बेहतर होता डायरी में लिखकर संदूक में बंद कर देता. जेहन पर अंकित हैं तो साथ साथ घूमती हैं हर वक्त.

जेहन पर अंकित हर्फ धुँधलाते नहीं. सफ्हे भी उजले के उजले.

हर की पौड़ी- हरिद्वार. गंगा आरती. कुछ यादें दोने में जला कर बहा देता हूँ. दूर जाते देखता हूँ उन्हें. बह गईं? भ्रम है शायद. पाप पुण्य बहते नहीं. पंडा अपने हिस्से के पैसे ले गया. प्रसादी में पेड़ा. ज्यादा मीठा खाकर मूँह में कसैलापन भर जाता है.

रेल भागी जा रही है. दरवाजे पर खड़ा अंधेरे में झांक रहा हूँ. दूर गांव में टिम टिम बत्ती. वो भी पीछे छूटती.

नीरा नाम है उसका. सामने की बर्थ पर. अम्मा ने उसे पुकारा, तो मैं जान गया. वो, उसकी अम्मा और बाबू जी. अगले स्टेशन पर तीनों उतर गये. कौन सा स्टेशन? क्या पता-कोई गांव, अंधेरे में नाम ही नहीं दिखा.

खिड़की से आती हवा सर्द है. कोई बड़ा स्टेशन आने को है. चाय पीने का मन है.

कौन से झौंके के साथ नींद आई-आँख खुली तब ट्रेन मेरे स्टेशन पर रुक रही है.

गरमा गरम चाय..चाय गरम. नहीं ली.

रिक्शे वाला बुढ़ा है, धीरे धीरे चल रहा है.

तिवारी जी टहलने निकल पड़े हैं. उनकी लड़की का नाम भी नीरा है.

डायरी मैं अब नहीं लिखता, कहीं अवसाद से घिर न जाऊँ.

नारंगी सूरज निकल रहा है. घर पर क्यारी में एक गुलाब ऊगा है-लाल रंग का.

ऊँगली को हल्का सा दबा कर देखता हूँ वहाँ जहाँ कांटा गड़ा था, दर्द नहीं है फिर आँख से ये बूंद कैसी? 

 

flute

 

वो
चुपके से
होले होले
कदम संभालते
बढ़ चला है
जाने किस ओर
गीली मिट्टी
उतार लेती है
पद चिन्ह
अपने सीने पर
और
बुढ़ा शजर
बाँह फैलाये खड़ा है
हरियाली के इन्तजार में.

-आज फिर
नीरो बांसुरी बजा रहा है!!
न जाने क्यूँ??

-समीर लाल ’समीर’

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रविवार, सितंबर 05, 2010

अक्सर दिल करता है मेरा

अक्सर दिल करता है मेरा

चलूँ, बादलों के पार चलूँ
देखूँ, कहाँ रहता है वो चाँद
जो झाँकता है अपनी खिड़की से
मेरी खिड़की में सारी रात

चलूँ, उन पहाड़ों के पार चलूँ
देखूँ, कहाँ से आता है सूरज
जिसे देख मेरा चाँद
छुप जाता है
जाने किस परदे की ओट में

चलूँ, नदी की गहराई में चलूँ
मिलूँ, उन मछलियों से
जिनके साथ भी रहता है
एक चाँद
उस रात झील में देखा था उसे

चलूँ, गली के उस मोड़ तक चलूँ
देखूँ, उस कोने वाले मकान को
जहाँ रहती हो तुम..
और साथ दिखती है
चाँद की परछाई...

-समीर लाल ’समीर’

यहाँ सुनिये:

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बुधवार, सितंबर 01, 2010

ओ यारों ये इंडिया बुला लिया...मानो उल्लू बुला लिया!!

पहले दिवाली में गुनिया लोग उल्लू बुलाया करते थे याने वो मंत्रों और तन्त्रों की सहायता से उल्लू को इंसानों की आवाज में बुलवा लेते थे और अपने जंतर सिद्ध किया करते थे. अक्सर सुना करता था कि फलाने गुनिया नें उल्लू बुला लिया और सिद्ध हो चला.

कभी एक्चूवल उल्लू को इन्सानों की आवाज में बोलते तो नहीं देखा और न ही उसे इन्सानो सी हरकत करते देगा है यद्यपि कई इन्सानों को उल्लू की हरकत करते तो हमेशा ही देखता आया हूँ मगर फिर भी जब भी सुना कि किसी गुनिया ने उल्लू बुला लिया तो फिर क्या कहना उस गुनिया का. मानो उसकी किस्मत खुल गई. उसी गुनिया से सब उपाय पूछें हर परेशानी का. लोगों की परेशानी हल हो या न हो मगर उसने उल्लू बुला लिया तो उस पर पैसों की बरसात तय है. उसकी परेशानी तो हल हुई ही समझो.

आज कॉमन वेल्थ का थीम सॉन्ग सुना तो न जाने क्यूँ उस गुनिया वाली बात की याद हो आई जबकि उसका इससे कुछ लेना देना नहीं है.

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कल जब यह गीत सुन रहा था तो मुझे एक बार फिर कवियों पर गुस्सा आया. न जाने क्या सोच कर गीत लिखते हैं कि सामने वाला गीत पढ़ेगा या उनका दिमाग? जाने क्या चल रहा होता है दिमाग में और उसे शब्द दे देते हैं, फिर यह आप पर छोड़ देते हैं कि चलो अब लगाओ इसका अर्थ अपने हिसाब से.

मेरा इतना सा निवेदन करने का मन करता है कि जो भी दिमाग में हो वो लिख दो, फिर उसे कविता के फार्म में सुना देना याने कविता लिखो तो भावार्थ के साथ. जो भाव तुम्हारे मन में हो. हम पर मत डिपेन्ड करो कि हम अटकल लगायें.

बचपन से हिन्दी की पर्चा हल करते करते यह गुस्सा एक एक बूँद बन कर भरता चला आया है. वो मुझे डर है कि यह बूँद बूँद कर बचपन से भरता गुस्सा किसी दिन ज्वालामुखी की शक्ल में न फट पड़े. खैर, अभी तो थामे हैं.

हर परीक्षा में होता था कि फलाने कवि की इन पंक्तियों का भावार्थ संक्षिप्त में बताईये और हम लगे हैं पास होने के जुगाड़ में अपनी अटकल को शब्द देने में. वो तो कविता लिखकर रोयल्टी खा पी कर किनारे हो लिए और पसीने हमारे निकल रहे हैं. अधिकतर तो स्वर्गवासी ही होते थे, अतः पूजनीय भी और उनके चक्कर में हम पहले मास्साब से लात खा रहे होते थे और फिर पिता जी से. जाने क्यूँ पाठयपुस्तक में छपने के पूर्व अधिकतर स्वर्गवासी हो लेते थे, शायद यह हमारे संस्कारों और संस्कृति का भावार्थ हो कि स्वर्गवासी को बड़ा सम्मान मिलता है. जिन्दा रहने पर भले कोई आपको सुने न सुने, मरते ही पहले तो पदवी स्वर्गवासी की और फिर आपके बताये मार्ग पर चलना ही सच्ची श्रृद्धांजलि.

इस गीत को सुन कर भी वही भावार्थ वाली बात दिमाग में आई. अपनी अटकल लगाने का सिलसिला शुरु हुआ. अब आप कॉपी जाचों तो पता चले कि सही के आसपास है कि नहीं. कवि तो फैशन के हिसाब से भावार्थ देने से कतरा ही लिए. थीम और लोकेशन के ज्ञान से उन कविताओं का अर्थ निकाला करते थे तो सो ही यहाँ भी किया.

ओ यारों ये इंडिया बुला लिया

-देखा न?? कैसा बेवकूफ बना कर बुला लिया जबकि हमारी तो तैयारी पूरी है ही नहीं, बस दिखावे के लिए फटाफट लीपापोती में जुटे हैं और रही खेल की बात, तो वो तो हमें खेलना आता ही नहीं. ओलम्पिक से लेकर किसी भी टूर्नामेन्ट का रिकार्ड उठा कर देख लो, हम अपने मूँह से क्या कहें? हमारे पास तो खिलाड़ी ही नहीं है जो जीत सकें..जो जीत सकने लायक तैयार होते हैं वो मॉडलिंग में चले जाते हैं. आजकल हमारे यहाँ खेल के लिए मेहनत कर अच्छा प्रदर्शन करना मॉडलिंग और ग्लैमर की दुनिया में सिक्का जमाने पहुँचने का राजमार्ग है और उतने तक ही अच्छा प्रदर्शन सीमित है. फिर भी देखो, कैसे सब के सब को बुला लिया मानो सबसे बड़े तीस मार खाँ हम ही हैं.

तभी तो कह रहे हैं: यारो, बुला लिया. खैर तुम्हें बुला तो न सिर्फ खेलों के लिए लिया बल्कि:

दीवानों ये इंडिया बुला लिया

सारे होटल, बार, डिस्को सजवा दिये हैं और यहाँ तक की कोठे भी ठीक करवा लिए. ढेरों एस्कार्ट वेब साईटें लॉन्च कर दीं..हिन्दुस्तानी से लेकर विदेशी तक, हर रेट रेन्ज में सरकारी सहमति से इन्तजाम है. दीवानों चले आओ..

दीवानों ये इंडिया बुला लिया

ये तो खेल है, बड़ा मेल है

-ये वो खेल है जिसमें पूरे मेल जोल के साथ एवं संपूर्ण खेल भावना के साथ, सब ठेकेदार, नेता, अधिकारी रह रहे हैं, खा रहे हैं, पी रहे हैं..ऐश कर रहे हैं...

मिला दिया..

पूरे भारत की इज्जत को मिट्टी में मिला दिया..मिला रहे हैं. पूरा विश्व जान रहा है कि भारत का सदी का सबसे बड़ा घोटाला इसी कॉमन वेल्थ (साझा संपति) के माध्यम से हो रहा है..इतना ही नहीं, फिर से कहा...

मिला दिया………….

मिला दिया न मिट्टी में पूरे भारत की तरक्की का सपना भी इज्जत के साथ साथ. हे हे, मिला दिया..ले ठेंगा, जो करना हो सो कर लो..सब मिले हैं, सबको मिला लिया..सबको मिला दिया..तुम कुछ नहीं कर सकते..बस गीत सुनो..सुरबद्ध..रहमान की आवाज में..

रूकना रूकना रूकना रूकना रूकना नहीं

रुकना मत..सुनते रहो..अभी समय बाकी है..अभी तो हम और खायेंगे..रुकेंगे नहीं..मना किया है - रुकना नहीं..खाते चलो..अभी समय बचा है. बाद में ऐसा मौका हाथ नहीं लगेगा..बस, एक महिना और...

हारना हारना हारना हारना हारना नहीं

जो हारा वो बेवकूफ कहालायेगा..उसने एक करोड़ बनाया, तुम दो करोड़ बनाओ और जीत जाओ..यही होड़ है सब अधिकारियों, नेताओं और ठेकेदारों में....हारना मत..जीतना ही ध्येय है. जीत कर दिखा दो...हारना नहीं..

चलो न सिर्फ

सिर्फ चलते रहने से कुछ न होगा..साथ साथ कमाते चलो...चलो न सिर्फ..याने कमाओ भी...खाओ भी..खिलाओ भी...पैसा खिलाओ, दावत खिलाओ..शराब पिलाओ..मजे कराओ..खूब कमाओ..मगर सिर्फ चलो नहीं.

करो न सिर्फ

काम सिर्फ दिखावे को करो कि काम चल जाये...बाद किसने देखा है. सिर्फ करते रहे तो करते ही रह जाओगे..मैदान मारो...लगे कि काम कर रहे हो मगर तुम तो याद रखो कि अपना ही नहीं, अपने परिवार और आने वाली पुश्तों का इन्तजाम कर रहे हो..

मैदान मारो !!

मैदान मार गये तो बाद में कोई कुछ नहीं पूछने वाला वरना पछताओगे...यहाँ तक कि जो पकड़ायेंगे वो वहीं होंगे जिन्होंने मैदान नहीं मारा होगा मारना तो दूर देखा भी न होगा.. पूछ उसी की होगी जो मैदान मार जाये. हमेशा मैदान मारा ही विजेता कहलाता है...एक बार मैदान मार लो फिर

Lets go

Lets go

- Lets go to Switzerland...वहीं जमा करा देंगे. घूम भी लेंगे. सेकेन्ड हनीमून भी मना लेना..वहाँ के जमा पैसे की चर्चा भले ही कितनी भी हो जाये मगर होता जाता कुछ नहीं...बस, Lets go..हल्ला मचता रहेगा कि पैसा वापस आ रहा है..आयेगा जायेगा कुछ नहीं..इत्मिनान से जमा कराओ...

जियो, उठो, बढ़ो, जीतो

जियो, उठो, बढ़ो, जीतो…..

यही काम आयेगा...सारी दुनिया कहेगी जियो..जब जेब में पैसा होगा...वैसे भी बिना पैसे कैसे जिओ..बेकार है..फिर जब पैसा हो तो उठो..तब भला बैठेगा कौन..जब बैठना नहीं है तो बढ़ो.. बढ़ चल बेटा पैसे भर कर जेब में...तभी तू जीता कहलायेगा...कहता हूँ न जीतो..तब जियो..वरना मरा हुआ तो बाकी का हिन्दुस्तान है ही..उनके लिए थोड़ी न है कि

ओ यारों ये इंडिया बुला लिया

--ये सिर्फ उनके लिए है जिन्हें हमने बेवकूफ बना कर बुला लिया है..अपना काम बन गया अब हारे या जीतें...मगर शुभकामना तो दे ही सकते हैं कॉमन वेल्थ गेम्स की.

इसीलिए तो इस बार नहीं कहा ’ जय हो’ ..खुद को तो हम जानते ही हैं. बेवकूफ बनाते हैं, बेवकूफ हैं नहीं.

पूरा गाना तो और भी है मगर इतना ही काफी है कम्पलीट बात समझ आने को. पूरा पढ़ना चाहो तो यहाँ क्लिक कर लो, मगर इससे ज्यादा निष्कर्ष क्या निकालोगे??

-अब क्या है भई, सुनना भी है गाना तो लो सुनो:

नोट: यह भावार्थ मेरी दिमागी अटकल के हिसाब से है. हो सकता है गलत हो और मुझे बचपन याद आ जाये जीरो अंक प्राप्त करके.

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रविवार, अगस्त 29, 2010

चकमित पत्नी!!

एक दिन अजय , हमारे एक मित्र  मिले. फुटबाल का मैच देखने आये थे. एक आँख दबा कर मुस्कराते हुए अजय ने खुलासा किया कि पत्नी से छिपा कर आया है. पत्नी से कह दिया है कि दफ्तर का काम है. यह बात अजय ने पूरे मैच के दौरान अलग अलग विषयों पर छिड़ी बातचीत के दौरान तीन बार बताई.

वहाँ हम सब मिलाकर करीब पाँच मित्र थे और हमारे एक मित्र विकास पत्नी से अनुमति न मिल पाने के कारण नहीं आये थे.  अजय ने विकास को शिद्दत से अव्वल दर्जे का बेवकूफ ठहराया और कहा कि उसे अकल ही नहीं है कि पत्नी को कैसे चकमा देना है. हालांकि यह अकल तो हममे भी नहीं है किन्तु चूँकि हम वहाँ मौजूद थे, अतः इस इल्जाम से बच गये.

अगले दिन विकास मिला तो हमने उसे अजय के बारे में भी बताया कि कैसे वो पत्नी को चकमा देकर आया था, तुम भी क्यूँ नहीं कुछ तरीके सीखते कि ऐसे मौको पर निकल सको? वरना तो सीधे सरल तरीके से कौन सी पत्नी अकेले किसी को दोस्तों के साथ मौज मनाने जाने देगी. विकास बोला कि जब तुम लोग मैच देखने गये थे तो अजय की वाईफ तो हमारे घर आई थी और मेरी पत्नी से उसने पूछा भी कि भाई साहब मैच देखने नहीं गये अजय के साथ?

पता नहीं कौन किसको चकमा दे रहा है मगर अजय यह सोचते रहे कि उन्होंने पत्नी को चकमा दे दिया और उधर पत्नी जानबूझ कर चकमित रही.

वैसे इस बात के लिए महिला शक्ति को नमन करता हूँ (यूँ तो हर बात के लिए करता हूँ) कि भगवान और भारतीय पुलिस के बाद यदि कोई है जो जब तक खुद न चाह ले, आप उससे छिपा कर कुछ नहीं कर सकते, तो वो सिर्फ माँ और पत्नी ही है. अकसर हम प्रफुल्लित होते हैं, शादी के पहले माँ को बेवकूफ बना कर और शादी के बाद पत्नी को किन्तु यकीन जानिये वो सिर्फ आपका आत्मविश्वास और सम्मान बरकरार रखने के लिए बेवकूफ बनती है वरना वो पूरी बात तब ही जान चुकी होती है जिस वक्त चकमा देने के विचारमात्र आपके दिमाग में जनम लेता है.

वही हाल तो भारतीय पुलिस का है. चोरी और अपराध तो बहुत बाद में होते हैं मगर उसकी पूरी खबर इनको पहले से होती है. अगर ये ठान लें तो अपराध हो ही नहीं सकते.

भारतीय पुलिस कानून की मर्यादा एवं संविधान का सम्मान एवं उन सबके उपर अपनी उपरी कमाई बनाये रखने के लिए मेरी बात से जरुर इन्कार करेगी और वो ही हाल माँ और पत्नियों का होगा जो एक पुरुष की मर्यादा का सम्मान एवं उसका अह्म भाव बरकरार रखने के लिए इस बात को शायद न मानें, मगर है तो ऐसा ही.

तो अगली बार जब माँ या पत्नी को चकमा देने का ख्याल मन में आये तो याद रखना और एक बार सोच कर देखना कि कौन किसको चकमा दे रहा है और किसने किसको बेवकूफ बनाया.

अब ये देखो बेचारे ने कैसे आँसूं बहाते हुए प्रीत की पाती लिखी है.

चलो, इसी बात पर गज़ल के नाम पर एक चकमा :)  बताना जरुर कि चकमा दे पाया कि नहीं वरना फिर उपर भारतीय पुलिस, माँ और पत्नी के साथ हिन्दी ब्लॉगर भी शामिल किया जाये:

मंत्र कुछ सिद्ध  जाप लें तो चलें
तिलक माथे पे थाप लें तो चलें

सुनते हैं बस्ती फिर जली है कोई
चलो हम आग ताप लें तो चलें

मिली है पांच साल को  कुर्सी
नोट दिन-रात छाप लें तो चलें

जिन्दगी का कोई भरोसा नहीं
कफन ख़ुद अपना नाप लें तो चलें

आम लोगों में अब रहें क्यूँ ’समीर’
पाल आस्तीं में सांप लें तो चलें

-समीर लाल ’समीर’

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बुधवार, अगस्त 25, 2010

शीर्षक की तलाश!

 

एक किताब का शीर्षक तलाश रहा हूँ कि क्या रखूँ?

वैसे तो कुछ फार्मुले पता चले हैं बेस्ट सेलर बनाने के. कहते हैं इसके लिए शीर्षक का बहुत महत्व है. वही तो सबसे पहले आकर्षित करता है पाठक को किताब खरीदने के लिए.

मुझे समझाया गया कि शीर्षक कभी सीधा मत रखो वरना न तो किताब कोई खरीदेगा और न ही कोई आपको साहित्यकार मानेगा.

उदाहरण देते हुए उन अनुभवी सज्जन (साहित्यकार)(बेस्ट सेलर) ने बताया कि जैसे अगर उपन्यास का नाम मम्मी (Mummy) या बहन(Sister) रखो तो कौन खरीदेगा भला. शीर्षक को happening बनाओ. जैसे मम्मी की जगह लिखो, माई फादर्स वाईफ (My Father's Wife) और बहन की जगह माई मदर्स डॉटर (My Mother's Daughter).

पड़ोसन लिखने में वो बात कहाँ जो नेबर्स वाईफ लिखने में है.

याद आता है कि यूँ भी गुलाब लिख देने पर जेहन में अक्स लाल गुलाब का ही उभरता है मगर ’लाल गुलाब’ लिखने की बात अलग है. एकदम स्पष्ट.

अब चूँकि किताब तो छपवानी ही है और हिन्दी में भला क्या बेस्ट सेलर-दो चार बेच लो तो कम से कम अपने पेड प्रकाशक के तो बेस्ट सेलर हो ही लिए. विश्व के न सही, देश के ही सही, वरना प्रदेश, शहर, मोहल्ला, कहीं के तो हो ही लेंगे, तब क्यूँ न ऐसा ही कुछ भड़कीला शीर्षक तलाशा जाये. आखिर संतोषी जीव हैं.

वैसे बाँये हाथ से लिखता हूँ तो ख्याल आया था कि ऐसा कुछ रख दूँ: ’बाँये हाथ में लड़खड़ाती कलम’ या ’उल्टे हाथ में सीधी कलम’- कैसा रहेगा?

आप सोच रहे होगे कि भई, कहानी तो बताओ जिसका शीर्षक रखना है..कैसी बातें पूछते हैं आप? उनसे कुछ तो सीखो जो पुस्तक की प्रस्तावना या पुस्तक के बारे में दो शब्द (चार पन्नों में) तक बिना पुस्तक पढ़े या देखे लिख डालते हैं. मुद्दा इतना है कि आप उन्हें कितना जानते हैं.

तो कहानी- उसकी चिन्ता न करें. एक पैराग्राफ शीर्षक आधारित कहीं भी एडजस्ट करके जस्टीफाई कर देंगे, आप तो बस जरा तड़कता भड़कता शीर्षक बताओ और यह गज़ल पढ़ो. महावीर ब्लॉग पर कुछ समय पूर्व छप चुकी है.

अकेले चले हो किधर धीरे-धीरे
युं ही क्या कटेगा सफ़र धीरे-धीरे

दुआओं की खातिर किये थे जो सज़दे
सभी को दिखेगा असर धीरे-धीरे

पिलाई है तुमने जो आँखों से मदिरा
चढ़ेगी वो बन के ज़हर धीरे-धीरे

रहूँगी मैं ज़िंदा सजन बिन तुम्हारे
चलेगी ये सांसें मगर धीरे-धीरे

नहीं मैंने सोचा, जुदा तुमसे होकर
कि बरपेगा ऐसा क़हर धीरे-धीरे

उसे बोलते हैं नज़र का मिलाना
खुशी से मिली हो नज़र धीरे-धीरे

कभी तो कहो प्यार से बात मन की
बना लो मुझे हमसफ़र धीरे-धीरे

-समीर लाल ’समीर’

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रविवार, अगस्त 22, 2010

एक सफ़हा

कुछ जरुरत से ज्यादा व्यस्तताओं ने घेर रखा है. बस, दो दिन और फिर सब पूर्ववत!!

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कुछ उधड़े कुछ जुड़े रिश्ते
चन्द पोशीदा से ज़ज्बात
धुँधली पड़ती कुछ यादें
दिल के फ्रेम में जड़ी
धूल खाई दो चार तस्वीरें
पुश्त पर लदी
मेरे अरमानों को थामे
पैबंद लगी एक गठरी..
आँगन वाले नीम के नीचे पड़ा
तेरी पायल से टूटा घुंघरु...
खिड़की से दिखता
एक मुट्ठी भूरा आसमान
बस! इतना है मेरा
पूरा जहान!!

-एक सफ़हा काफी है
मेरी कहानी कहने को.

-समीर लाल ’समीर’

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बुधवार, अगस्त 18, 2010

एक बेहतरीन कलाकार, गायक एवं इंसान: मिलिये इनसे

आज आपको मिलवाता हूँ एक बेहतरीन कलाकार, गायक और उससे भी उपर एक बेहतरीन इन्सान श्री राजेन्द्र स्वर्णकार से. न कभी मुलाकात हुई, न कभी बात. बस, इन्टरनेट और ब्लॉग के माध्यम से परिचय हुआ और एक आत्मियता का रिश्ता कायम हो गया.

सिलसिला जारी रहा और उन्होंने एक दिन अपनी पसंद से मेरे दो गीतों को अपनी आवाज में रिकार्ड करके भेजा. गीत सुनने के बाद आप सबको सुनवाने का लोभ संवरण नहीं कर पाया और आज वही प्रस्तुत करता हूँ.

भाई राजेन्द्र स्वर्णकार का ब्लॉग शस्वरं है और उस ब्लॉग पर उनकी एक से एक बेहतरीन कृतियाँ उपलब्ध हैं. उनका परिचय, उन्हीं की जुबानी:

मोम हूं , यूं ही पिघलते एक दिन गल जाऊंगा फ़िर भी शायद मैं कहीं जलता हुआ रह जाऊंगा... मूलतः काव्य-सृजक हूं। काव्य की हर विधा में मां सरस्वती की कृपा से लेखनी निरंतर सक्रिय रहती है। अब तक 2500 से अधिक छंदबद्ध गीत ग़ज़ल कवित्त सवैये कुंडलियां दोहे सोरठे हिंदी राजस्थानी उर्दू ब्रज भोजपुरी भाषा में लिखे जा चुके हैं मेरी लेखनी द्वारा । 300 से भी ज़्यादा मेरी स्वनिर्मित मौलिक धुनें भी हैं । मंच के मीठे गीतकार-ग़ज़लकार के रूप में अनेक गांवों-शहरों में काव्यपाठ और मान-सम्मान । आकाशवाणी से भी रचनाओं का नियमित प्रसारण । 100 से ज़्यादा पत्र - पत्रिकाओं में 1000 से अधिक रचनाएं प्रकाशित हैं । अब तक दो पुस्तकें प्रकाशित हैं- राजस्थानी में एक ग़ज़ल संग्रह रूई मायीं सूई वर्ष 2002 में आया था , हिंदी में आईनों में देखिए वर्ष 2004 में । कोई 5-6 पुस्तकें अभी प्रकाशन-प्रक्रिया मे हैं! स्वय की रचनाएं स्वयं की धुनों में स्वयं के स्वर में रिकॉर्डिंग का वृहद्-विशाल कार्य भी जारी है। चित्रकारी रंगकर्म संगीत गायन मीनाकारी के अलावा shortwave listening और DXing करते हुए अनेक देशों से निबंध लेखन सामान्यज्ञान संगीत और चित्र प्रतियोगिताओं में लगभग सौ बार पुरस्कृत हो चुका हूं । CRI द्वारा चीनी दूतावास में पुरस्कृत-सम्मानित … … और यह सिलसिला जारी है … !!

तो चलिए अब आपको अपने दोनों गीत उनके स्वर में:

गीत

मैं जो भी गीत गाता हूँ, वही मेरी कहानी है
मचल जो सामने आती, वही मेरी जवानी है
मैं ऐसा था नहीं पहले, मुझे हालात ने बदला
कोई नाजुक बदन लड़की, मेरे ख्वाबों की रानी है.

नहीं उसको बुलाता मैं, मगर वो रोज आती है
मेरी रातों की नींदों में, प्यार के गीत गाती है
मेरी आँखें जो खुलती हैं, अजब अहसास होता है
नमी आँखों में होती है, वो मुझसे दूर जाती है.

मगर ये ख्वाब की दुनिया, हकीकत हो नहीं सकती
थिरकती है जो सपने में, वो मेरी हो नहीं सकती
भुला कर बात यह सारी, हमेशा ख्वाब देखे हैं
न हो दीदार गर उसके, तो कविता हो नहीं सकती.

-समीर लाल ’समीर’

गज़ल: (यह गज़ल एकदम ताजा है, जो आपने अभी तक नहीं पढ़ी है.)

हमारी महफिल में आज आ कर, हमीं को हमसे मिला रहे हो.
अभी तो तुमसे जमीं न संभली, क्यूँ आसमां को हिला रहे हो.

तुम्हें यह लगता है बिन तुम्हारे, यूँ महफिलें क्यूँ सजी हुई हैं
हमें जलाने की कोशिशों में, क्यूँ खुद को ही तुम जला रहे हो.

गमे जुदाई में जो तुम्हारी, है वो ही हालत हमारी होगी
तुम्हें तो हम यूँ मना भी लेंगे, हमें क्यूँ आखिर रुला रहे हो

तुम्हें मुबारक तुम्हारी शोहरत, हमें भला क्या मलाल होगा
ये नाम बख़्शा है जिसने उसको मिटा के दे क्या सिला रहे हो.

नशा तुम्हारी आँख में जो, डूबा डूबा कर ये होश ले लो
न जाने क्यूँ मैकदे में लाकर, मुझे तुम इतना पिला रहे हो.

हवा की जो तुम सदायें सुन लो, हमारी आहट सुनाई देगी
समीर तेरे ही सामने है, ये किसको फिर तुम बुला रहे हो

-समीर लाल ’समीर’

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रविवार, अगस्त 15, 2010

मुद्दतों बाद….

स्वतंत्रता दिवस के मौके पर आप एवं आपके परिवार का हार्दिक अभिनन्दन एवं शुभकामनाएँ.

आज एक गज़ल, जो चंद रोज पहले महावीर ब्लॉग पर छपी थी. महवीर ब्लॉग से अपनी गज़ल का छपना एक गौरव की अनुभूति देता है, बहुत आभार महावीर जी एवं प्राण जी का इस इस स्नेह के लिए. देखें इस गज़ल को, एक अलग तरह का प्रयोग है हर शेर के शुरुवात में मुद्दतों बाद के इस्तेमाल का:

 

 

मुद्दतों बाद उसे दूर से जाते देखा
धूप को आज यूँ ही नज़रें चुराते देखा

मुद्दतों बाद हुई आज ये कैसी हालत
आँख को बेवज़ह आंसू भी बहाते देखा

मुद्दतों बाद दिखे हैं वो जनाबे आली
वोट के वास्ते सर उनको झुकाते देखा

मुद्दतों बाद खुली नींद तो पाया हमने
खुद को सोने का बड़ा दाम चुकाते देखा

मुद्दतों बाद जो लौटा हूँ मैं घर को अपने
अपने ही भाई को दीवार उठाते देखा

मुद्दतों बाद कोई आने लगा अपने सा
रात भर ख्वाब में मैंने उसे आते देखा

मुद्दतों बाद किसीने यूँ पुकारा है "समीर"
खुद ही खुद से पहचान कराते देखा

-समीर लाल ’समीर’

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बुधवार, अगस्त 11, 2010

कुत्ते- कैसे कैसे?

अन्तर तो खुली आँखों दिखता ही है हर तरफ. तुलना करने की बात ही नहीं है कनाडा और भारत.

मेरा देश भारत मेरा है, उसकी भला क्या तुलना करना और क्यूँ करना?

मगर अब रहता तो कनाडा में हूँ, न चाहते हुए भी स्पष्ट अंतरों पर निगाह टिक ही जाती है, जबकि मैं ऐसा कतई चाहता नहीं. यही तो वजह भी बनता होगा कि हर बार जब भारत जाता हूँ तो सोचता हूँ कि अब लौट कर नहीं आऊँगा और मात्र दो महिने में लगने लगता है कि लौट चलो यार, अब बहुत हुआ.

खैर, यह उहापोह की स्थिति तो बनती बिगड़ती रहती है हर प्रवासी के साथ. यहाँ रहो तो वहाँ, वहाँ जाओ तो यहाँ.

एक बात, यहाँ गलियों में बड़ा सन्नाटा रहता है. मेरे जबलपुर की मुख्य सड़को से बड़ी, साफ सुथरी और गढ्ढा रहित. गाड़ी लेकर चलो, तो आदतन मजा ही नहीं आता. न गढ्ढे, न धूम धड़ाक. गाड़ी चलाते हुए काफी पी रहे हैं मानो ड्राईंग रुम में बैठे हों. सफर में सफर न करें तो कैसा सफर. आदतें तो वो ही हैं न, जो बचपन से पड़ी हैं. फिर मजा कैसे आयेगा.

हाँ तो बात थी गलियों का सन्नाटा. सन्नाटा ऐसा जैसे मनहूसियत पसरी हो. न कहीं से लाऊड स्पीकर बजने की आवाज आती होती है, न दूर मंदिर में होती अखण्ड रामायण के पाठ की आवाज, न जोर जोर से झगड़ते दो लोगों की, न सब्जी वाले की पुकार और न ही रद्दी खरीदने वाला. वैसे तो गली कहना ही इसकी बेज्जती है.  कुत्ता विहिन गलियाँ विधवा की मांग सी सूनी लगती हैं. ठंडी रात में कई बार डर सा लग जाता है कि कहीं मर तो नहीं गये जो शमशान में सोये हैं. न कुत्ता रो रहा है, न ही कोई धत धत बोलता सुनाई दे रहा है. हड़बड़ा कर उठ बैठता हूँ. जब खुद को चिकोटी काट कर दर्द अहसास लेता हूँ तो संतोष हो जाता है कि घर पर ही हूँ, अभी मरा नहीं.

गाड़ियाँ भी निकलती हैं सड़क से. न हार्न, न दीगर कोई आवाज. न गाली गलौज ओवर टेक करने के लिए. अजब गाड़ियाँ है. आवाज क्या सारी भारत एक्सपोर्ट कर दी ट्रक और टैम्पो के लिए? इत्ते भुख्खड़ हो क्या कि आवाज एक्सपोर्ट करके जीवन यापन कर रहे हो.

गलियों में कुत्ते न दिखने का अर्थ यह नहीं कि यहाँ कुत्ते नहीं होते मगर सिर्फ घरों में होते हैं. न जाने कैसे संस्कार हैं उनके? न तो भौंकते हैं और न काटते हैं? कई बार तो उनसे निवेदन करने का मन करता है जब कोई उन्हें घुमाने निकलता है कि हे प्रभु!! आपकी मधुर वाणी सुने एक अरसा बीता. एक बार, बस एक बार, कृपा करते और भौंक देते. जीवन भर आभारी रहूँगा. मगर कनैडियन कुत्ता, काहे सुने हमारी विनती? इन्सान तो सुनने तैयार नहीं, फिर वो तो कुत्ता है.

 

और फिर नफासत और नाज़ों में पले से कैसा निवेदन? उसे क्या पता निवेदन की महत्ता? उसे तो इतना पता है कि घूमने निकले हैं और जहाँ कहीं भी मन करेगा, मल त्याग लेंगे. मालिक तो साथ चल ही रहा है पोली बैग लिए, वो उठा लेगा और फैक देगा लिटर डिस्पोजल में. ये घर जाकर स्पेशल खाना खायेंगे और कूँ कां करके सो जायेंगे अपने गद्देदार मखमली बिस्तर पर एसी में. चोर यहाँ आने नहीं हैं, इनको भौंकना नहीं है. ये मस्त जिन्दगी है. नो टेन्शन!! कुत्तों को देखकर लगता ही नहीं कि कुत्ता हैं.

 

एक हमारे कुत्ते हैं, जिस पर भौंकना चाहिये, उस पर भौंकते नहीं गरीब भिखारी दिखा तो गली के कोने तो भौंकते हुए खदेड़ देंगे. जो दो रोटी डाल दें, उसके घर के सामने पूरी सेवा भाव से डटे रहेंगे और उसके मन की कुंठा के पर्यायवाची बने हर गुजरती कार पर भौंक भौंक कर झपटते रहेंगे. अक्सर तो उस घर पर आने वाले परिचतों पर ही झपट पड़ेगे. लाख पत्थर मारो, भगाओ मगर दो रोटी की लालसा, बस, उसी गली में परेड. गली हमारी, हम गली के मालिक. गली के कुत्ते, सड़क के कुत्ते, मोहल्ले के कुत्ते-किस नाम से नवाजूँ इन्हें!!

कई बार तो अपने नेताओं को सुनकर कि मैं सड़क का आदमी हूँ,  मुझे लगने लगता है कि अम्मा कितना सही कहती थी कि जिनकी संगत करोगे, वैसे ही हो जाओगे. 

इन नेताओं की हरकते देख आपको नहीं लगता कि वैसे ही हो गये हैं, जैसी संगत मिली. जब सड़क के आदमी हैं तो आकाश वालों की संगत तो मिलने से रही. भरे पेट अघाये कहीं भी भौंक रहे हैं बेवजह, किसी को दौड़ा रहे हैं, कहीं भी शीश नवा रहे हैं और बता रहे हैं दूसरे नेताओं को कुत्ता!!!

अखबार में समाचार छपा था कि किसी बड़े नेता ने किन्हीं दो बड़े नेताओं को “किसी बड़े नेता के कुत्ते” कहा! अगर अलग शब्दों में देखें तो कुत्ते ने कुत्ते को किसी कुत्ते का कुत्ता कहा, फिर इस पर बवाल कैसा?

वैसे तो एक और राज की बात बताता चलूँ कि यहाँ के नेताओं को देख कर भी नहीं लगता कि नेता हैं..खुद ही कार चला कर आयेंगे अकेले और कोई पहचानता भी नहीं तो खुद का परिचय देते हुए मुस्कराते हुए हाथ मिलाने लगेंगे. हद है, ऐसा भी कोई नेता होता है मगर फिर वहीं, यहाँ के कुत्ते देख कर भी तो यही लगता है, ऐसा भी कोई कुत्ता होता है!!

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रविवार, अगस्त 08, 2010

वो रिश्ते..

आज कोई भूमिका नहीं. बस, कुछ ख्याल दिल से उपजे हुए:

cash

 

कहते हैं

रिश्ते खून के होते हैं..

या बनते है दिल से..

न जाने क्यूँ

कोई उन रिश्तों की बात नहीं करता

जो उपजते हैं मजबूरी में

पेट की भूख से

और विलीन हो जाते

जिस्म में कहीं!!

शायद जमाने की

चकाचौंध की अभ्यस्त आँखें

अँधेरे में देख नहीं पाती!!

या हम मृत संवेदनाओं के वाहकों को

ऐसी बातें अब नहीं सताती!!

-समीर लाल 'समीर'

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बुधवार, अगस्त 04, 2010

कैसी हत्या? – लघु(त्तम) कथा और कविता

डॉक्टर का कमरा.

महिला अपनी एक साल की बेटी को गोद में और सोनोग्राफी की रिपोर्ट हाथ में लिए होने वाली कन्या का गर्भापात कराना चाहती है.
तर्क है छोटी छोटी दो बेटियों को कैसे संभालेगी?

डॉक्टर ने सलाह दी कि लाओ, इस गोद में बैठी बेटी को मार देते हैं. फिर बस एक होने वाली रह जायेगी.

महिला स्त्ब्ध!!

यह तो पाप होगा.

आज उसके आँगन से दोनों बेटियों के चहकने के आवाज आती है.

motherdaughter

कोई
हत्या महज हत्या नहीं होती!!
परिस्थिति के अनुरूप
समय की गति में

नहीं होती हत्या
जो  होती हैं बहादुरी
आत्मरक्षा
और
कर्तव्य से प्रेरित

कुछ होती हैं कायरता
लाचारी
और
कमजोरी
जैसे की आत्महत्या

कुछ
मानसिक रुग्णता
यानी कि
विद्वेष, नफ़रत
और
बदले की भावना से जनित

किन्तु

कुछ होती हैं मानसिक विकृतता
भयानक रुप
निरीहता पर प्रहार
जो अक्षम्य है
जैसे की
भ्रूण हत्या!!!

-समीर लाल ’समीर’

(कथा की प्रेरणा एक ईमेल से प्राप्त संदेश है एवं चित्र साभार गुगल)

सूचना:

कुछ दिन पूर्व तरुण जी ने निट्ठला चिंतन पर मेरी पुस्तक बिखरे मोती की शानदार समीक्षा की है, यदि नजर न गई हो तो यहाँ क्लिक करें.

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रविवार, अगस्त 01, 2010

बहुत पहले से उन कदमों की आहट....

आप सभी का जन्म दिन पर दी गई शुभकामनाओं एवं स्नेह के लिए बहुत बहुत आभार.

सूचना

HC_July2010 copy

नए तेवर और नए कलेवर के साथ..''हिन्दी चेतना'' का जुलाई-सितम्बर, २०१० अंक प्रिन्ट हो चुका है. हिन्दी चेतना को आप पढ़ सकते हैं-हिन्दी चेतना या विभोम पर.

इस अंक में प्रकाशित मेरा व्यंग्य आलेख नीचे पढ़िये.

बहुत पहले से उन कदमों की आहट....

footstep

जगजीत सिंह-चित्रा सिंह का गाया "बहुत पहले से उन कदमों की आहट जान लेते है”...फिराक गोरखपुरी साहब ने यह गाना जाने कब लिखा, किसके लिए लिखा, क्या सोच के लिखा. किसकी तस्वीर सामने थी? मगर रचा तो भारत में गया यह तय है क्यूँकि हमने सुना भी पहली बार वहीं और फिराक साहब रहते भी वहीं थे. यूँ भी उस समय आज की तरह, जैसा की मुझ जैसे लोग कर रहे हैं, भारत की समस्याओं पर भारत के बाहर बैठे कर भारतीयों के द्वारा लिखने का फैशन नहीं आया था.

खैर, बात चल रही है गाने की "बहुत पहले से उन कदमों की आहट जान लेते है"...

गौरवशाली भविष्यवक्ताओं के महान देश में तो यह मुमकिन हमेशा ही है कि बहुत पहले से उन कदमों की आहट जान लो.

अगले माह मंगल पर शनि की वक्र दृष्टि रहेगी, व्यापार में घाटा पड़ेगा. लो जान ली पहले से उन कदमों की आहट जो अगले महीने आने वाले हैं.

कई तो इन सब भविष्यवाणियों का गणित भी नहीं समझते मगर इस ब्रह्म एवं गुढ़ ज्ञान के आभाव के बावजूद भी आत्मविश्वास का स्तर ऐसा कि वो अपनी बात यहीं से शुरु करते हैं कि अरे, हम तो आपको गारंटी करते हैं कि इस बार बीजेपी सत्ता में आ रही है. न आये तो कहना, जो कहोगे सो हार जायेंगे. अब बीजेपी न आये तो क्या कहें और उनके पास है क्या जो हारेंगे? जहाँ खड़े होकर घोषणा कर रहे हैं उस पान वाले का तो चार महिने का उधार चुका नहीं पा रहे और बात करेंगे कि जो कहो, सो हारे. उनका आत्म विश्वास देख कर कई बार घबराहट होती है मगर ऐसे आत्म विश्वासी हर पान ठेले पर मिल जायेंगे.

मुझे कई बार सही भी लगता है कि बहुत पहले से उन कदमों की आहट जान लेते हैं... जब अपने देश की पुलिस के बारे में सोचता हूँ.

कोई मर्डर कब होना है? कौन करेगा? किसका होना है? चोरी कहाँ होगी? कौन करेगा? सब पुलिस बहुत पहले से जानती है..मगर अफसोस, यह गाना यहीं खत्म हो जाता है इसलिए शायद वो बाद में नहीं जान पाते कि अपराधी कहाँ गया? बेचारे ढूंढते रह जाते हैं और अपराधी कभी मिलता नहीं.

काश, कोई लिखता कि तू छिपा है कहाँ ये भी हम जान लेते हैं!! तो पुलिस को कितनी सुविधा हो जाती.

मगर लिखने वाले..धत्त, बस इतना लिख कर गुजर लिए और भुगतान देने खड़ा है पूरा भारत देश.

अब देखिये, भविष्यवक्ताओं के ऐसे देश में जहाँ यह गीत लब लब गुनगुनाया जाता हो कि बहुत पहले से उन कदमों की आहट जान लेते हैं...उस देश में भला देश के तयशुदा भावी प्रधानमंत्री...जो कि युवा शक्ति का नेतृत्व करता हो और जिसे प्रधानमंत्रित्व का विरासती अधिकार हो, उसके कदमों की आहट न जानें. उनका नाम लेना उचित न होगा. हमारे कदम भी तो आहट करते हैं, कहीं वो इनको जान न लें.

ऐसा युवा भावी प्रधानमंत्री एकाएक गांवों की हालत और ग्रमीणों की जीवनशैली को जानने की जिज्ञासा लिए एक गांव में अपना हेलिकॉप्टर उतरवा देता है. इस एकाएक और आकस्मिक दौरे के लिए वो गाँव भी और उसका पूरा प्रशासन विगत दो माह से तैयारी में जुटा है. हेलीपैड भी इस आकस्मिक दौरे के तैयार है और जिस गरीब की कुटिया में भईया जी ठहरेंगे वो भी और साथ है पूरा तंत्र भी. पूरे दिन में एक घंटे को बिजली के लिए आदिकाल से तरसते इस गांव में उनके आकस्मिक प्रवास के दौरान अचानक पूरे समय बिजली रहती है और उस कुटिया में पोर्टेबल ए सी से ठंडाई ताकि भईया जी मूंझ की खटिया पर बिछे डनलप के गद्दे पर एक रात सो सकें. चुल्हे पर ग्रमीण द्वारा बना, पी एम लेब से चखने के बाद एप्रूव, खाना खा कर ग्रमीण की हालत की पहचान करने के बाद उस पर संसद में एक घंटे का मार्मिक भाषण दे सकें, भला ऐसे अमर गीतों के बिना कैसे संभव हो पाता कि बहुत पहले से उन कदमों की आहट जान लेते हैं.....

जाने कब रच गये फिराक साहब...ऐसा गीत काश मैं रच पाता. अमर हो जाता. कालजयी कहलाता.

कल अखबार में पढ़ता था कि कॉमनवेल्थ खेलों में आने वाले विदेशी अथिति और खिलाड़ी शौकीन मिजाज हैं अतः भारत में गैर कानूनी ही सही (मगर वो भी धड़ल्ले से धंधा कर लेते है क्यूँकि उन्हें भी पहले से पुलिस से ही पता होता है कब पुलिस का छापा पड़ने वाला है..याने वो भी बहुत पहले से उन कदमों की आहट जान लेते हैं...उन्हें गाना आता है) मगर दिल्ली के कोठों की सबकी सहमति से साज सज्जा, फेस लिफ्ट, एयर कन्डिशनिंग आदि की जा रही है, भले ही हमारे जो खिलाड़ी खेलने वाले हैं, वो आज लॉज का पैसा खुद की जेब से भर पसीना बहाते न सिर्फ प्रेक्टिस कर रहे हैं बल्कि गर्मी से और मच्छरों से जुझते सो भी रहे हैं और सस्ते रेस्टॉरेन्ट की तलाश में पैदल भी चल रहे हैं.

उन्हें जितना दैनिक भत्ता मिल रहा है उसमें न तो ए सी रुम लिया जा सकता है, न ढंग का रेस्टॉरेन्ट और न ही सस्ते रेस्टॉरेन्ट तक पहुँचने की टैक्सी. वो भी तो आहट सुन रहे हैं उन कदमों की, जो विदेशों से आने वाले हैं. जाने कैसे हमारे खिलाड़ियों के कदमों में आहट क्यूँ नहीं? शायद इसीलिए हार जाते होंगे चूँकि बिना आहट के चलते हैं भारत के एक आम आदमी की तरह जिसके कदमों में कोई आहट ही नहीं, जो सरकार भले पहले से नहीं, मगर कभी तो सुन पाती. मुझे लगता है कि हमारे खिलाड़ियों को खेल का रियाज़ करने से ज्यादा अपने कदमों से ऐसे चलने का रियाज़ करना चाहिये कि आहट हो और सरकार जान पाये.

शायद राहू, शानि, मंगल की वक्र दृष्टि के विपरीत, आम आदमी पर सरकार और मंत्रियों की वक्र दृष्टि ज्योतिष पंचाग से आऊट ऑफ सिलेबस हो इसीलिए उन पर यह गीत न लागू होता हो कि बहुत पहले से उन कदमों की आहट जान लेते हैं...
एक अंतरंग खबर यह भी है कि बम्बई, पुणे, बेंगलौर, कलकत्ता, मद्रास जैसे महानगरों की कालगर्ल्स कॉमन वेल्थ गेम्स के समय स्थानीय ग्राहकों के लिए उपलब्ध नहीं हैं..वो भी विदेशी कदमों की आहट जान गई हैं. डॉलर रुपी घूंघरु बँधे कदमों की आहट छन छन बोलती है न...वो ही बहुत पहले से और दूर से ही सुन रही होंगी.

इसी डॉलर घूंघरु ने तो भारत का ब्रेन ड्रेन कर डाला और हम उनकी आहट सुन कर मुग्ध हुए अपने कोठे ठीक कराने में लगे हैं..

इसीलिए तो मेरा भारत महान..जहाँ का हर नेता पहलवान. बस गीत गाना आना चाहिये कि:

बहुत पहले से उन कदमों की आहट जान लेते हैं...

-समीर लाल ’समीर’

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बुधवार, जुलाई 28, 2010

फिर वही दिन…

समय बीतता जाता है और एक एक दिन करके हम न जाने किस गुणा भाग में लगे जान ही नहीं पाते कि कहाँ आ पहुँचे हैं. फिर एकाएक एक दिन साल में वो दिन आ जाता है, जब आप पैदा हुए थे. खुशी इस बात की होती है कि मित्रों और स्नेहीजनों से बधाई मिली, कुछ दावत वगैरह हुई, उत्सव सा मनाया गया. बस, और एक साल गुजर जाता है.

आज वैसा ही दिन है मेरे लिए. आज ही के दिन अभी कुछ ही बरस पहले मैं पैदा हुआ था. :) (२९ जुलाई)

कुछ सालों पहले तक पन्ने पलटा रहा था. कुछ खुद की तस्वीरें, कुछ बदलाव की साक्षी. आपसे बाँटने का मन हो आया.

हर वर्ष की तरह ही, इस वर्ष भी मेरे अग्रज, गुरु राकेश खण्डेलवाल जी का स्नेह एवं शुभकामना एक कविता के माध्यम से प्राप्त हुई. आप सब भी पढ़ें.

भोर की पहली किरण अँगड़ाई लेकर मुस्कुराये
झूमकर प्राची सुरों में कोयलों के गुनगुनाये
एक झरना ताल पर सारंगियों की बह गया सा
एक पाखी नीड़ से उड़ता हुआ, यह कह गया सा
मुस्कुराओ,आज का दिन, आपका शुभ जन्मदिन है

मेघ आषाढ़ी बुलाते सावनों को, झूम आओ
शाख कहती वॄक्ष की, अब डाल पर झूले झुलाओ
मलयजी झोंके खड़े हैं हो गये दहलीज आकर
धूप भी कहने लगी दालान से नवगीत गाकर
साथ गाओ, आज का दिन आपका शुभ जन्मदिन है

बिछ रही हैं आ क्षितिज पर इन्द्रधनुषी कामनायें
हो रही हैं पल्लवित कुछ और नव संभावनायें
स्वप्न के शिल्पी सलौने धार बन कर बह रहे हैं
और मन के भाव प्रमुदित मग्न हो कर कह रहे हैं
साथ मेरे स्वर मिलाओ, आपका शुभ जन्मदिन है

फूल ने भर भर कटोरे, गंध भेजी आज द्वारे
धार नदिया की तटों पर, आरती आकर उतारे
शीश पर टीके लगाती चाँदनी भी जगमगाकर
साज की तंत्री बिखेरे स्वरमयी सौगंध लाकर
यश-कलश से सज खिलें सारी दिशायें, जन्मदिन है
कामना शुभ हो असीमित,आपका यह जन्मदिन है.

-राकेश खण्डेलवाल

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रविवार, जुलाई 25, 2010

एक विचार और फिर..

बहुत सारे ऐसे दिन गुजर जाते हैं जब हम लेखक, कवि, ब्लॉगर आदि होकर भी कुछ नहीं लिख पाते. कुछ इन हालातों में आत्म ग्लानि का बोध पाल लेते हैं तो कुछ अपराध बोध से ग्रसित हो जाते हैं.

हालांकि न लिख पाने की बहुतेरी वजह हो जाती हैं. कभी घरेलू जिम्मेदारियाँ तो कभी व्यवसायिक व्यस्तताएँ मगर कभी कभी तो कोई भी कारण नहीं होता. तब बस सब कुछ आलस्य मान कर संतोष कर लेते हैं.

अक्सर जब एक अंतराल के बाद, खासकर ब्लॉग लेखन में, ब्लॉगर लौटता है तो उसकी शुरुवात ही इस आत्म ग्लानि या अपराध बोध को जाहिर करते हुए क्षमायाचना के साथ होती है. उसे महसूस होता है कि सब उसके लिखे का इन्तजार कर रहे होंगे और उसने इतने दिन से कुछ लिखा नहीं. चलो, भ्रम ही सही लेकिन है तो सुखद अहसास. इस हेतु अगर क्षमायाचना के साथ भी पुनर्लेखन की शुरुवात करनी पड़े तो क्या बुराई है.

बस विचार यह आता है कि एक लेखक या कवि या ब्लॉगर होकर न लिख पाने का अहसास हमें हो जाता है और उसके लिए क्षमायाचना को भी तत्पर रहते हैं मगर एक लेखक या कवि या ब्लॉगर होने से भी पहले हम सब एक इन्सान हैं, एक संवेदनशील इन्सान और हममें से बहुतेरे इन्सानियत और संवेदनाओं से इतने समय से किनारा किए हुए भी अपराध बोध से ग्रसित क्यूँ नहीं होते, क्यूँ नहीं होती कोई आत्मग्लानि. क्यूँ नहीं हम इस हेतु क्षमायाचना को तत्पर नहीं होते. क्यूँ नहीं हम सोचते कि लोग एक बार फिर इन्सानियत और संवेदनाओं का इन्तजार कर रहे होंगे. अगर सभी ऐसा सोच लें तो शायद समाज का एक नया चेहरा सामने आये मगर काश!! ऐसा सोचें तो!!

मुझे ज्ञात है कि यह सब पढ़कर आपके मन में मिश्रित विचार तरंगे मार रहे होंगे किन्तु यहाँ जब मैं लेखन से अंतराल की बात कर रहा हूँ तब यह अर्थ नहीं है कि इस अन्तराल में आपने चिट्ठी पर पता या दूध का हिसाब या दफ्तर के नोटस भी नहीं लिखे बल्कि मैं उस लेखन अंतराल की बात कर रहा हूँ जिस सार्थक लेखन को आप सप्रयास समाज के हित में, चिन्तन में, विकास हेतु, अपने मन में उठ रहे विचारों को प्रकट करने, समस्याओं पर प्रकाश डालने एवं हल के सुझाव हेतु करते हैं और चाहते हैं कि समाज इसे समझे और लाभान्वित हो अतः इन्सानियत से अन्तराल की बात भी उसी परिपेक्ष में लिजियेगा.

humanity

खैर, बस ये तो यूँ ही कुछ आस पास की स्थितियाँ देख विचार उठ गये वरना तो आया था आज एक गज़ल लेकर, जिसे स्वर दिया इंदौर के बेहतरीन गायक, जो किसी परिचय के मोहताज नहीं, भाई दिलीप कवठेकर जी ने. सारे शेर तो नहीं गाये, वजह समय की पाबंदी. अतः पढ़ लें सारे और फिर सुनें उनमें से कुछ उनकी शानदार आवाज में:

 

जिनके छोटे मकान होते हैं
लोग वे भी महान होते हैं

वो ही बचते हैं फूल शाखों में
जिनके काटों में प्राण होते हैं....

जितने हम साथ-साथ चलते हैं
उतने रिश्ते जवान होते हैं

कितनी मोटी करोगे दीवारें
यारो, सबके ही कान होते हैं

कुछ तो पाने का अच्छा मौक़ा है
सुनते हैं, रोज़ दान होते हैं

बुढ़ी माँ को उठाये काँधे पर
कितने बेटे महान होते हैं

छूट जाते हैं ज़ख्म भर के भी
ऐसे भी कुछ निशान होते हैं

क्या बतायें कि दुनिया कैसी है
सबके अपने जहान होते हैं

लब तो चुप हैं "समीर" के लेकिन
आँख के भी बयान होते हैं.

-समीर लाल ’समीर’

यहाँ सुनिये:

 

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बुधवार, जुलाई 21, 2010

हर शाख पर उल्लू बैठा है

शाम को टहलने निकलता हूँ लगभग ४५ से ५० मिनट के लिए. शुद्ध हवा मिल जाती है. मन बहल जाता है और स्वास्थय पर भी अगर अच्छा नहीं, तो कम से कम बुरा प्रभाव तो नहीं ही होता है.

वैसे भी यहाँ पूरे शहर भर सड़क के किनारे किनारे वाक वे बने रहते हैं और हम जैसे जो शहर से थोड़ा दूर रहने वाले, रहवासी इलाकों में तो हरियाली, पार्क आदि से इन वाक वे पर चलना बहुत सुखद अनुभूति होता है.

कुछ चित्र संध्या भ्रमण के दौरान लिए गये.

रास्ते में रोज एक खरगोश मिल जाता है. मैने उसका नामकरण भी कर दिया है ’चीकू’.

शायद बचपन में पढ़ी चंपक का असर रहा हो इस नामकरण में. मुझे तो लगता है कि चीकू जान गया है कि कब मैं उसके एरिया से निकलूंगा. कोने में बैठा इन्तजार करते ही मिलता है. बस, देखेगा और फुदक फुदक कर अपनी खुशी जाहिर करेगा.

कई दिन से सोचता था कि अपने इस दोस्त की तस्वीरें ली जाये तो एक दिन कैमरा लेते गया साथ में. बड़ी खुशी खुशी तस्वीरें खिंचवाईं चीकू ने. डरता तो बिल्कुल ही नहीं है. जान गया है कि ये मारेंगे नहीं, बस, और क्या चाहिये.

आज देखा कि उसने दो प्यारे प्यारे बच्चे दिये हैं. दोनों चलने लग गये हैं मगर अभी जरा डरपोक हैं. पास जाओ तो छिप जाते हैं. शायद दो चार दिन में जानने लगेंगे.

क्या नाम रखूँ उनका??

आज एक अजीब बात देखी. आज तो क्या, देख बहुत समय से रहा था, जाना आज. यहाँ बहुत सारे घरों के सामने उल्लू की मूर्ति या पेन्टिंग लगी होती है दरवाजे पर.

बड़ी उत्सुकता थी जानने की कि आखिर उल्लू क्यूँ बैठालते हैं घर के सामने. घर का सामना तो शो रुम सा ही हुआ, उसी को देखकर तो अंदाज लगेगा कि दुकान में घुसा जाये या नहीं. मगर ज्ञात हुआ कि नहीं, घर के सामने से जो हिस्सा घर को रिप्रेजेन्ट करता है अगर वहाँ से उल्लू दिखे तो वह बहुत शुभ माना जाता है. समॄद्धि आती है. नाम होता है.

 

मेरे देश की संसद में बैठे राजनेता भी मेरे देश को रिप्रेजेन्ट करते हैं और जहाँ तक उल्लू बैठालने का सवाल है, उसमें हमने कोई भूल नहीं की. पूरे ५५० बैठाये हुए हैं. फिर आखिर समृद्धि क्यूँ नहीं आ रही है.

जरुर यह इन लोगों का अंध विश्वास होगा. उल्लू है ये भी.  मेरे समझाने से थोड़ी न समझेंगे. जिस दिन धोखा खायेंगे, खुद समझ जायेंगे मगर तब कुछ कर पाने की स्थितियाँ नहीं बचेंगी.

हम ही क्या कर पा रहे हैं.

शायद इनके यहाँ इस श्लोक के पाठ का ज्ञान नहीं है:

बरबाद-ए-गुलिस्तां करने को बस एक ही उल्लू काफी था,
हर शाख पर उल्लू बैठा है, अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा.

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रविवार, जुलाई 18, 2010

कठपुतलियाँ: एक लघु कथा एवं एक कविता

वो सोचा करता था कि एक दिन जब जिन्दगी तो रोज रोज की भाग दौड़ से फुरसत पा लेगा, तब दिल्ली का अपना मकान बेच कर कहीं पहाड़ों में जा बसेगा. जहाँ घर के आसपास होंगे चीड़ देवदार के वृक्ष, चिड़ियों का चहचहाता संगीत, बरामदे में गरम चाय की प्याली लिए नीचे बहती नदी को निहारता वो. तब वह अपना उपन्यास लिखेगा. प्लॉट दिमाग में है बस लिखने का समय नहीं है.

कल ७७ वर्ष की अवस्था में अपोलो अस्पताल में उसने आखिरी सांस ली.

उपन्यास कभी शुरु नहीं हो पाया और प्लॉट बस प्लॉट ही रह गया. कौन जाने क्या प्लॉट था.

काश! वो जान पाता कि समय मिलता नहीं, निकालना पड़ता है.

काश! इन्तजार की बजाय उसने संतुलन के महत्व को समझा होता.

 

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कठपुतलियाँ

चंद धागों में बँधी

इशारों पर

नाचती है,

झुकती हैं,

सलाम करती हैं.

और

जब कोई दर्शक नहीं होता

तो निढाल हो

पड़ी रहती है एक कोने में...

कर्तव्यों,

दायित्वों

और

सामाजिक नियमों

के

धागे में बँधा

नाचता, झुकता और सलाम करता..

अँधेरी घुप्प इस काली रात में

अपनी कमरे की कुर्सी पर

अकेला निढाल पड़ा

सोचता हूँ मैं..

-समीर लाल ’समीर’

यू ट्यूब पर सुनें:

 

मेरे यू ए ई के मित्रों के लिए:

 

या यहाँ पर क्लिक करके सुनें.

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बुधवार, जुलाई 14, 2010

अंतिम फैसला: एक लघु कथा

सामने टीवी पर लॉफ्टर चैलेंज आ रहा है. वो सोफे पर बैठा है और नजरें एकटक टी वी को घूर रही हैं, लेकिन वो टीवी का प्रोग्राम देख नहीं रहा है.

उसके कान से दो हाथ दूर रेडियो पर गाना बज रहा है

’जिन्दगी कितनी खूबसूरत हैssssss!'

साथ में पत्नी गुनगुनाते हुए खाना बना रही है. उसके कान में न रेडियो का स्वर और न ही पत्नी की गुनगुनाहट, दोनों ही नहीं जा रही हैं.

एकाएक वो सोफे से उठता है और अपने कमरे में चला जाता है.

रेडियो पर अब समाचार आ रहे हैं: ’न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेन्ज ७०० पाईंट गिरा’

Suicide

कमरे से गोली चलने की आवाज आती है.

पत्नी कमरे की तरफ भागती है. उसका शरीर खून से लथपथ जमीन पर पड़ा है, उसने खुद को गोली मार ली.

रेडियो पर समाचार जारी हैं कि ७०० पाईंट की गिरावट मानवीय भूलवश हुई है अतः उस बीच हुई सभी ट्रेड रद्द की जाती है.

वो मर चुका है.

-समीर लाल ’समीर’

नोट:  कुछ दिनों पूर्व महावीर जी के ब्लॉग मंथन  पर प्रकाशित

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रविवार, जुलाई 11, 2010

मेरा सजन चॉकलेटी...

तब तो नया नया आया था कनाडा. हालांकि नये पुराने से इस वाकिये पर कोई फरक नहीं पड़ता और न ही इस वजह से कि मैं समीर लाल हूँ. पूरा फरक सिर्फ इस बात का है कि मैं भारतीय पुरुष हूँ.

बहुत पहले भी एक बार मैं जिक्र कर चुका हूँ कि रंगों की पहचान के मामले में भारतीय पुरुष से ज्यादा निर्धन, दयनीय और निरीह प्राणी कोई नहीं होता. हम भारतीय पुरुषों को बस गिने चुने रंग मालूम होते है जैसे नीला, पीला, लाल ,गुलाबी, भूरा, हरा, सफेद और काला आदि. ज्यादा स्मार्ट रहे तो नीला और बैंगनी में फर्क कर लेंगे या काला और सिलेटी में. इसके आगे का काम लगभग से चल जाता है जैसे हल्का, गाढ़ा या करीब करीब हरा कह कर.

हुआ ऐसा कि एक मित्र का फोन आया कि उनके मित्र के पास एक शो के दो पास रखे हैं और वो कल शो देखने नहीं जा पायेंगे. मेरा मित्र जो फोन कर रहा था वो भी बिजी था, अतः मुझसे पूछा कि अगर जाना हो तो आप और भाभी चले जाओ. एक तो हम नये नये और फ्री का पास मिल रहा हो तो क्यूँ मना करते. हाँ कर दी. उसने अपने दोस्त का फोन नम्बर दे दिया और कहा कि जब ऑडिटोरियम जाने लगो तो उसे फोन कर देना. वो टिकिट भिजवा देगा वहीं.

इण्डिया से नये नये आये थे तो कमीज जो सबसे रंगीन सिलवा लाये थे, वही पहन कर निकले. ऑडिटोरियम के पास स्टेशन पर पहुँच कर फोन लगाया तो मित्र के मित्र, जो कि कनेडियन थे, ने कहा कि उनका लड़का ऑडिटोरियम की तरफ ही से निकल रहा है, आप उसको पार्किंग के सामने मिल जाना और टिकिट ले लेना. वैसे आप किस कलर की शर्ट पहने हैं, वो बता दिजिये तो मैं उसे मोबाईल पर इन्फार्म कर देता हूँ वो आपको देख लेगा और हाथ हिला देगा.


अब हमारी रंगीन कमीज फिरोजी. अंग्रेजी मे क्या बोलें?  बचाव का एक ही रास्ता था कि हमने कह दिया कि आप चिन्ता न करें, हम कार पहचान कर खुद ही पहुँच जायेंगे.आप हमें कार के बारे में बता दिजिये. पार्किंग में वो कार ले जाता तो उसे जबरदस्ती पार्किंग चार्जेज लग जाते अतः पार्किंग के बाहर सड़क पर मिलना ही तय पाया. पास भर तो लेना है, रुकने का क्या काम. उन्होंने बताया कि  वो टील कलर की सेडान कार से आयेगा. आप पहचान लेना और हाथ हिला देना.

फोन रख दिया और लगे सोचने कि ये भला कौन सा रंग होता है? आने जाने वाली कारों का ताँता लगा था और उनमें कम से कम पाँच तो ऐसे ऐसे रंग रहे होंगे आती जाती कारों के, जिन्हें हमारी सीमित पहचान क्षमता कोई भी नाम देने से इन्कार कर रही थी. एक होता तो बाकी पहचान कर उसे मान लेते टील. मगर यहाँ तो अनजान रंगों की भीड़ चली जा रही थी. ऐसे में हाथ हिलाने लगे तो सब पागल ही समझेंगे हर कार को हाथ हिलाता देख कर.

दस मिनट खड़े सोचते रहे. अपनी कमीज के रंग का अंग्रेजी भी याद नहीं आ रहा था आखिरकार हार कर बेवकूफ नजर आने से बेहतर विकल्प का सहारा लिया.

उन मित्र के मित्र को फिर से फोन लगाया और कहा कि एकाएक पत्नी की तबीयत खराब लगने लगी है. अतः तुरंत घर वापस जाना होगा. आप अपने बेटे से कह दिजिये कि वो परेशान न हो और किसी को भी पास दे दे या वेस्ट जाने दे.

उन्होंने ने भी सॉरी फील किया इस एकाएक तबीयत खराब हो जाने पर और हमारी तारीफ भी की कि हाँ, ऐसे शो तो होते रहेंगे. आप घर लौट जाईये. तबीयत ज्यादा जरुरी है.

पत्नी को बता दिया कि उनका लड़का कहीं जरुरी फंस गया है तो आ नहीं पा रहा है. लौटना पड़ेगा. घर आकर नेट पर अधिक से अधिक रंगों के नाम अंग्रेजी में सीखे. फिरोजी मतलब टर्काईस जान गये. टील रंग भी नेट पर देखा. खड़ी तो थी बिल्कुल उसी रंग की सेडान पार्किंग के सामने. मगर अब क्या, वो तो पास फेंक कर ४ घंटे पहले जा चुका होगा और शो भी खत्म हो चुका होगा.

अब तो मैं मर्जेन्टा, टैन, बर्गेन्डी जैसे कठिन रंग भी पहचान जाता हूँ मगर पत्नी की मूँह से सुना धानी रंग अभी पहचानना बाकी है. नेट पर मिल नहीं रहा और उससे पूँछू तो फिर वो ही-कौन बेवकूफ नजर आना चाहेगा.

कोई बता तो दो जी, कैसा होता है धानी रंग?

वैसे खुद के रंग के बारे में तो एक प्रमोशन तब मिला था, जब कनाड़ा आये थे. भारत में हमारा रंग काला कहलाता था और यदि किसी का जबरदस्त काम हमसे अटका हो तो मैक्सिमम सांवला कह लेता था मगर यहाँ तो सारे साऊथ एशियन ब्राउन कहलाते हैं. काले तो अफ्रीकन होते हैं. तो प्रमोट होकर हम काले से ब्राऊन हो लिए खुशी खुशी.

अभी एक रोज किसी बात पर किसी ने जिक्र के दौरान किसी चीज का रंग बताते हुए एक प्रमोशन और दे दिया..कि अमुक वस्तु लगभग चॉकलेट कलर की है लगभग तुम्हारे कलर के जैसी ही. आह!! वाह!! चॉकलेट कलर!! अब मैं तो इसे भी प्रमोशन ही मान कर चल रहा हूँ.

साधना को भी बता दिया है कि आज से हमारा रंग अंग्रेजी में चॉकलेटी..अब उसकी तरफ से एक गज़ल लिखूँगा..मिसरा है:

मेरा सजन चॉकलेटी, मैं वारी वारी जाऊँ.. :)

 

वैसे, कभी सोचता हूँ कि अगर रंग होते ही न तो क्या होता? दुनिया भले बेरंग होती मगर रंग भेदियों की जमात से तो कितनों को मुक्ति मिल गई होती. लेकिन इन्सान तो इन्सान है, तब झगड़ने का कोई और मुद्दा निकाल लेता.

नोट:
कृपया कोई भारतीय पुरुष सिर्फ इसलिए इस बात से आहत न महसूस करे कि उसे सब रंग मालूम हैं, अपवाद हर तरफ होते हैं और अगर आपको सारे रंग मालूम हैं तो आप अपवाद की श्रेणी के कहलाये.

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गुरुवार, जुलाई 08, 2010

चिन्नी- मंत्री पद की दावेदारी

एक बार आपको बताया था कि कैसे चिन्नी गिलहरी मुझसे घूल मिल गई है. बुलाता हूँ तो चली आती है. खिड़की के बाजू में बैठकर मूँगफली और अखरोट मांगती है. जब दे दो तो एक खायेगी बाकी सारे बैक यार्ड में छिपायेगी बर्फीले दिनों के लिए. हमारे आपकी तरह उसे भी अपने कल की चिन्ता है.

इधर मौसम अच्छा हुआ है. जगह जगह लोग उसे नटस दे रहे हैं तो आजकल जरा कम भाव दे रही है. रहती आस पास ही है. दिन में चार छः बार आ भी जाती है मगर कई बार बुलाओ तो मूँह बना कर निकल जाती है. पेट न दिया होता भगवान ने तो शायद कोई किसी को न पूछता.

 

अक्सर तो खाना खुद ही छिपा कर भूल जाती है फिर जगह जगह गढ्ढे करके ढूंढती है. बगीचा खराब हो सो अलग. नये नये पौधे लगाओ तो जमीन जरा पोली रहती है और वो समझती है कि नीचे उसका छिपाया खाना होगा इसलिए पोली जमीन है और लो, एक मँहगा पौधा उनकी कृपा से नमस्ते. है भोली, तो ज्यादा डांटा भी नहीं जाता.

आज उसकी हरकत देख कर लगा कि बेचारी, कहाँ कनाडा में फंस गई और मुझसे डांट खा रही है. भारत में होती तो जरुर मंत्री बनती और सब उसे नमस्ते करते सो अलग.

दरअसल चेरी में फल पक गये और वो महारानी जी समझ रही हैं कि जैसे हमने चेरी उनके लिए ही लगाई है और जो नेट बाँधी है वो चिड़ियों के लिए बाँध दी है ताकि कोई चिन्नी का खाना न खा जाये. सुबह से बीस चेरी चट कर चुकी है. नेट पर से कूद कर आती है, एक चेरी तोड़ती है और भाग जाती है. साधना डांट डांट कर हैरान हो गई और उसे खेल लग रहा है.

 

जिस घर में पली, जिसके यहाँ साल भर प्रेम से खाना खाया, वहीं लूट मचा रखी है. पूरी चेरी खाने को तत्पर. जिस थाली में खाना सीखे, उसी में छेद. हार कर सब चेरी तोड़ लेना पड़ी. फिर भी उनके लिए कुछ गुच्छे छोड़ दिये हैं कि कहीं गुस्से में महारानी जी दूसरे पेड़ों को नुकसान न पहुँचाने लग जायें. टमाटर भी आने को ही हैं. एक बार आज उसने फिर न्यूसेन्स वेल्यू की वेल्यू साबित कर ही दी और यह भी स्थापित कर दिया कि जगह जगह का फेर कितना प्रभाव डालता है.

अपने ही घर में लूट मचाने की कनाडा में लतियाई जाने वाली हरकत भारत में मंत्री बन जाने की काबिलियत कहलाती.

 

सोचता हूँ शाम को आयेगी तो उससे कहूँगा कि चल चिन्नी ,अपने वतन चलें. तेरे कारण हमारी भी पूछ हो लेगी.

 

 

चलते चलते:

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सोमवार, जुलाई 05, 2010

आज एक खास दिन!

आज मेरी माँ का जन्म दिन है. ५ साल पहले २८ जनवरी, २००५ को वो मुझसे दूर चली गई लेकिन एक वो दिन था और एक आज का, तब से रोज रात में वो मेरे सपने में मेरे पास आती है और मुझे लगता ही नहीं कि वो मुझसे दूर चली गई है.

एक खास बात, मेरी नानी का जन्म दिन भी ६ जुलाई, मेरी माँ का भी और मेरी भतीजी का भी याने मेरी भतीजी के लिए उसकी परदादी, दादी और उसका जन्म दिन एक ही दिन!!

आज इस मौके पर माँ की बहुत याद आ रही है.

 

जब भी मैं

पीछे मुड़कर सोचता हूँ..

अपना बचपन

अपना मकान

वो गलियाँ

वो मोहल्ला

अपना शहर

अपना देश..

या

फिर

खुद अपने आप को..

हर बार मुझे

माँ

याद आती है!!

-समीर लाल ’समीर’

 

जन्म दिन मुबारक, मम्मी!! आज जब रात में सपने में आओगी तब केक काटेंगे, पक्का!! आओगी न!!

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रविवार, जुलाई 04, 2010

संसाधन सीमित हैं, कृपया ध्यान रखें

कुछ दिनों से ब्लॉगवाणी का नियमित अद्यतनीकरण किंचित कारणों से स्थगित चल रहा है. ऐसे वक्त में अधिकाधिक चिट्ठाकार चिट्ठाजगत एवं कुछ चिट्ठाकार अन्य साधनों का प्रयोग कर नई प्रविष्टियों की जानकारी ले रहे हैं.

जब संसाधन सीमित हो जाते हैं तब हमारा ध्यान कुछ ऐसी बातों पर भी जाने लगता है जो कि अन्यथा नजर अंदाज की जाती रही हैं हालांकि खटकती तो हमेशा ही रहती थीं.

मैं आज ध्यान दिलाना चाहता हूँ उन प्रविष्टियों की ओर जिसमें एक ही प्रविष्टी को चिट्ठाकार साथी अलग अलग कुछ एकल और कुछ सामूहिक चिट्ठों से एक के बाद एक पोस्ट कर देते हैं. यहाँ तक देखने में आया कि एक ही प्रविष्टी पाँच से छः बार तक पोस्ट की गई. इससे चिट्ठाजगत के प्रथम पॄष्ठ पर जब वो प्रविष्टियाँ आती है तो उसके पहले की आई सारी प्रविष्टियाँ या तो अगले पन्ने पर चली जाती हैं या नीचे धकेल दी जाती हैं.

मैंने इस तरह से एक ही प्रविष्टी को एकाधिक बार पोस्ट करने के कारण को जानने की जिज्ञासा लिए कई चिट्ठों पर टिप्पणी के माध्यम से यह प्रश्न उठाया. कुछ मित्रों के जबाब आये और उन्होंने मेरी बात को पूर्ण खिलाड़ी भावना से लिया और समझा. मैं उनका आभारी हूँ और आज मात्र इतना निवेदन करना चाहता हूँ कि साधन सीमित हैं. कृपया सभी को यथोचित स्थान और संसाधनों का लाभ उठाने का उचित मौका दें.

अक्सर हो जाता है कि एक पाठक वर्ग व्यस्तता की वजह से एक चिट्ठे की प्रविष्टी पर ध्यान नहीं दे पाता ऐसे में कुछ दिवस के अंतराल के बाद वही पोस्ट दूसरे चिट्ठे से छाप कर उसका ध्यान आकर्षित कराया जा सकता है और ऐसा अलग अलग चिट्ठों से एक अंतराल विशेष के बाद दोहराया भी जा सकता है. किन्तु एक साथ सभी जगह से एक के बाद एक पोस्ट कर देने से तो कुछ भी हासिल न होगा क्यूँकि यदि पाठक किसी समय में व्यस्त है तो वो उस वक्त सभी जगह से अनभिज्ञ एवं अनुपस्थित रहेगा.

मैं स्वयं भी अपनी दीगर चिट्ठों और पत्रिकाओं में छपी प्रविष्टियाँ अपने चिट्ठे पर एक ही स्थान पर सहेजने और अपने पाठकों को पढ़वाने के उद्देश्य से लाता हूँ किन्तु एक अंतराल रखने का प्रयास हमेशा ही होता है.

आशा है आप मेरी बात को अन्यथा न लेते हुए सभी चिट्ठाकारों को उनका उचित स्थान देने में एवं सीमित संसाधनों का सर्वोत्कृष्ट उपयोगिता स्थापित करने में मदद करेंगे.

आज बस इतना ही और साथ में अपनी एक गज़ल का मतला और एक शेर आपकी नजर:

 

slaasman

 

पूरी गज़ल अगर सुनना चाहेंगे तो जरुर सुनाई जायेगी..अन्यथा सुनाई तो जायेगी ही. :)  बस, अंतिम चरणों में है.

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