रविवार, सितंबर 19, 2010

तुझे भूलूँ बता कैसे

आज कम्प्यूटर पर वायरस का हमला हुआ. सुबह से मोर्चा संभाला हुआ है उनके खिलाफ. देखिये, क्या नतीजा निकलता है. अच्छा है कि ९७% कम्प्यूटर का बैक अप है. याने चार दिन पहले तक का. टेंशन डाटा लूज करने की हमेशा ज्यादा होती है तो उससे मुक्त हूँ. बस, आपसे पूछना चाह रहा था कि आपके पास बैक अप है अपने कम्पयूटर का? क्यूँकि जिस तरह एक आतंकवादी नहीं जानता कि हमले में वो किसे मार रहा है, और किस समय कर रहा है, उसी तरह वायरस की चपेट में भी कोई भी आ सकता है कभी भी. अपनी सुरक्षा का इन्तजाम खुद करें. हर समय तैयार रहें बैक अप के साथ.

अब मौसम जा रहा है. सर्दियाँ लगने को है. फल सब्जी जो भी बगीचे में हुए, तोड़ लिए गये या तोड़े जा रहे हैं. खूब खीरे, मिर्च, टमाटर, चेरी, नाशपाती खाई गई बगीचे की. कल सेब की अंतिम खेप भी तोड़ ली और लौकी (भ्रष्टाचार से तेज गति से बढ़ी) कल तोड़ी जायेगी. तो सेब और लौकी की तस्वीरें:



इन्हीं वजहों के चलते कुछ लिखना नहीं हुआ, बड़ी मिटती उड़ती फाईलें, उनका बचाव दिन ले गया तो बीच में नजर पड़ी अपनी एक पुरानी कविता पर जिसे मैं मंचों से अक्सर सुनाता हूँ मगर आश्चर्य कि वो मेरे ब्लॉग पर नहीं है. न जाने कैसे छूट गई. तो आज वो ही:


तुझे भूलूँ बता कैसे

मैं हूँ इस पार तू उस पार, मगर दिल साथ रहते हैं
हमारे देश में यारों, इसी को प्यार कहते हैं
मुझे तुम भूलना चाहो तो बेशक भूल जाना पर
तुझे मैं भूलता कैसे, तुझे हम यार कहते हैं.

न जाने कौन सा बंधन, न जाने कैसे रिश्ते हैं
दर्द उस पार उठता है, आँसूं इस पार गिरते हैं
ये हैं अहसास के रिश्ते, इसे तुम नाम मत देना
जैसे फूल में खुशबू, ये हर इक दिल में रहते हैं.

इन्हीं रिश्तों के बंधन से, हुआ जो हाल इस दिल का
कई बीमार कहते हैं, कई लाचार कहते हैं
तुझे मैं भूलता कैसे, तुझे हम यार कहते हैं.

मुझे अक्सर रुलाती हैं, सुनहरी याद अपनों की
हमारे साथ के किस्से, लगे है बात सपनों की
मैं उन पत्तों से पूछूंगा, बता दो मुझको मजबूरी
छोड़ कर साथ शाखों का, बना ली तुमने क्यूँ दूरी

यूँ ही रोते बिलखते ही, मिटाने दूरियाँ निकला
हुई है मेरी हालत जो, उसे बेजार कहते हैं
तुझे मैं भूलता कैसे, तुझे हम यार कहते हैं.

जहाँ बचपन ये खेला था, गली वो याद रहती है
जहाँ भी जा बसें हम तुम, याद वो साथ रहती है
उन्हीं यादों के साये में, गुजरती रात की घड़ियाँ
यहाँ अक्सर ही दिन में भी, अँधेरी रात रहती है.

हँसता हूँ यहाँ पर मैं, तुम्हारे बिन ही महफिल में,
मेरी जाँ ये समझ ले तू, इसे व्यवहार कहते हैं
तुझे मैं भूलता कैसे, तुझे हम यार कहते हैं.

--समीर लाल ’समीर’

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121 टिप्‍पणियां:

Anamikaghatak ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति.............

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

हँसता हूँ यहाँ पर मैं, तुम्हारे बिन ही महफिल में,
मेरी जाँ ये समझ ले तू, इसे व्यवहार कहते हैं

बहुत सटीक कविता ..जीवन के यथार्थ को कहती हुई ...भले ही दूर रहें मन में प्यार की हर याद यूँ हो महकती है ....

रंजन ने कहा…

अब पता चला आपकी तंदुरस्ती का राज.. घर में उगाए.. लोकी.. सेव..

संगीता पुरी ने कहा…

पिछले तीन चार दिनों तक मेरा कंप्‍यूटर भी वायरस के प्रभाव में रहा .. इतने दिनों तक किसी के ब्‍लॉग्‍स तक न देख सकी .. बगीचे के ताजे फलों सब्जियों ने हमें पुराने दिन याद दिलाए .. जब से फ्लैट में रहना हो रहा है .. बागवानी भूल ही गयी हूं .. आपकी यह पुरानी रचना बहुत ही अच्‍छी लगी !!

abhi ने कहा…

क्या कहूँ चचा, कविता ऐ-ग्रेड है...बहुत कुछ याद आ गया :)

प्रवीण त्रिवेदी ने कहा…

बधाई हो !
कोई तो अभी भी आपको हमला करने के लायक समझ रहा है .....जाहिर है हमेशा सजग रहेंगे !

....वैसे यह बैक-अप कैसे लिया जाता है ?


न जाने कौन सा बंधन, न जाने कैसे रिश्ते हैं दर्द उस पार उठता है, आँसूं इस पार गिरते हैं ........... ...इसे पढ़ कर कुछ कुछ होता है सर जी !!!!!!!!!!

वाणी गीत ने कहा…

@ न जाने कौन सा बंधन, न जाने कैसे रिश्ते हैं
दर्द उस पार उठता है, आँसूं इस पार गिरते हैं ..

अच्छी लगी कविता !

seema gupta ने कहा…

इन्हीं रिश्तों के बंधन से, हुआ जो हाल इस दिल का
कई बीमार कहते हैं, कई लाचार कहते हैं
तुझे मैं भूलता कैसे, तुझे हम यार कहते हैं.


कविता बेहद ही पसंद आई....ये हरी भरी सब्जियां और फल कुछ यहाँ भी भिजवा दीजिये , एक तो महगाई और बारिश दोनों ने जीना मुहाल किया है.....
regards

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

मेरी जाँ ये समझ ले तू, इसे व्यवहार कहते हैं
..मंच लूट लेने वाली कविता ।
..इसे पढ़कर पता चलता है कि आप भी कभी ज़वान थे और सेव लौकी से आपका प्यार देखकर लगता है कि आप कभी बुढ्ढे भी नहीं होंगे।

Manoj K ने कहा…

backup is necessary. about an year back there was a burglary in our office. the RAM and hard-disk were missing. I had a back-up of the desktop data in my laptop so the damage was not too much..

बेनामी ने कहा…

bahut hi sundar...
achhi rachna....
yeh taaze fal aur sabjiyaan bhi....
----------------------------------
मेरे ब्लॉग पर इस मौसम में भी पतझड़ ..
जरूर आएँ..

Patali-The-Village ने कहा…

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति...

Patali-The-Village ने कहा…

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति...

Madhu chaurasia, journalist ने कहा…

बैकअप की जुगाड़ करनी पड़ेगी सर जी...अच्छा किया समय रहते सतर्क कर दिया आपने...
हर बार की तरह आपकी रचना लाजवाब है....

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

बहुत सुंदर हृदय स्पर्शी कविता
हर उस व्यक्ति के मन की बात जो अपनी गलियों चौराहों से अपनों से दूर है

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बैकअप के साथ हम तैयार हैं।
लौकी की तरह स्वास्थ्यकर नहीं पर भ्रष्टाचार।
प्यार की परिभाषा यदि गेयता में उतारी जा सके तो आपकी कविता एक मानक कहलायेगी।

समयचक्र ने कहा…

सबसे पहले
नेट प्रोटेक्टर लगाएं
और वायरसों से
निजाद पायें ....

मैं हूँ इस पार तू उस पार, मगर दिल साथ रहते हैं
हमारे देश में यारों, इसी को प्यार कहते हैं .

रचना बेहद अच्छी लगी. ... आप १५ नवम्बर को आ रहे हैं ... जानकर बड़ा अच्छा लगा.
आभार

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

बहुत खूब... कविता ... वन्स मोर कहकर खुद ही दुबारा पढ़ ली...

P.N. Subramanian ने कहा…

आपकी स्टाइल बड़ी प्यारी है. लौकी तो कोफ्ता ही बनाते हैं. इतने सारे सेव हों तो फिर जाम. allonge महत्वपूर्ण रहा. .

Shah Nawaz ने कहा…

मुझे तुम भूलना चाहो तो बेशक भूल जाना पर
तुझे मैं भूलता कैसे, तुझे हम यार कहते हैं.


बहुत ही बेहतरीन.....


यह तो आपने सही कहा, वाइरस से तो हर किसी को सावधान रहना चाहिए.

Khushdeep Sehgal ने कहा…

हमने देखी है इन आंखों की महकती खुशबू,
हाथ से छू के इसे रिश्तों का इल्ज़ाम ना दो,
सिर्फ अहसास है ये रूह से महसूस करो,
प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो..

हमने देखी है...

जय हिंद...

सम्वेदना के स्वर ने कहा…

असली ओर्गनिक खेती का मज़ा तो आप ले रहे हो समीर भाई! और इधर हम कीटनाशक पी पी कर हलकान हुए जा रहें हैं।

खैर! अभी तो कविता का स्वाद भरा है मुहँ में, तो कोई रश्क नहीं!

संजय भास्‍कर ने कहा…

बहुत सटीक कविता

रश्मि प्रभा... ने कहा…

न जाने कौन सा बंधन, न जाने कैसे रिश्ते हैं
दर्द उस पार उठता है, आँसूं इस पार गिरते हैं
waah

उम्मतें ने कहा…

आप तो डरा रहे हैं...पर खोने के लिए हमारे पास है ही क्या :)

वैसे ये बैकअप लेते कैसे है ? हम जैसे नाताज़ुर्बेकारों को ये भी बता देते तो कल्याण होता :)

RAJWANT RAJ ने कहा…

kis mulaymiyt se aapne yado ko shej kr rkkha hai ki kya khe .jb ehsas mhsoos kiye jate hai to uska vjn hi kuchh our hota hai .bhut khoobsoorti se unhe ukera hai . dhnywaad .

naresh singh ने कहा…

हम जैसे फक्कड लोग अपने कम्प्यूटर में डाटा ही नहीं रखते है तो उड़ने वाली बात ही नहीं है | वायरस का प्रकोप भी हमारी ज़रा सी लापरवाही से ही होता है | आपकी सेहत का राज है ओर्गेनिक सब्जिया ,आज पता चल गया है |

Creative Manch ने कहा…

मुझे अक्सर रुलाती हैं, सुनहरी याद अपनों की
हमारे साथ के किस्से, लगे है बात सपनों की
........
तुझे मैं भूलता कैसे, तुझे हम यार कहते हैं.


बहुत ही प्यारी दिल को छूती भावमयी कविता
यह रचना कभी पुरानी नहीं हो सकती

आभार & शुभ कामनाएं

सदा ने कहा…

जहाँ बचपन ये खेला था, गली वो याद रहती है
जहाँ भी जा बसें हम तुम, याद वो साथ रहती है
उन्हीं यादों के साये में, गुजरती रात की घड़ियाँ
यहाँ अक्सर ही दिन में भी, अँधेरी रात रहती है.
बहुत ही सुन्‍दर पंक्तियां भावमय कर गईं ।

प्रिया ने कहा…

Wow....aapka garden bahut khoobsoorat hai...aur apple to lajawaap type lag rahe hain ...kheera. nashpaati aur Chery ki tasveere kahan hai .....by the way

हँसता हूँ यहाँ पर मैं, तुम्हारे बिन ही महफिल में,
मेरी जाँ ये समझ ले तू, इसे व्यवहार कहते हैं

Love this one

Pratik Maheshwari ने कहा…

सुन्दर अभिव्यक्ति...

ज्योत्स्ना पाण्डेय ने कहा…

शीर्षक देखा- पोस्ट पर नज़र डाली लगा वायरस को न भूल पाने की बात.... कोई व्यंग्य का टुकड़ा होगा.....पर ये तो कविता थी...जीवन के यथार्थ को उद्धृत करती...


शुभकामनाएं...

Coral ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना है ...

और फल तो लजीज है ...

Parul kanani ने कहा…

न जाने कौन सा बंधन, न जाने कैसे रिश्ते हैं
दर्द उस पार उठता है, आँसूं इस पार गिरते हैं
ये हैं अहसास के रिश्ते, इसे तुम नाम मत देना
जैसे फूल में खुशबू, ये हर इक दिल में रहते हैं.

इन्हीं रिश्तों के बंधन से, हुआ जो हाल इस दिल का
कई बीमार कहते हैं, कई लाचार कहते हैं
तुझे मैं भूलता कैसे, तुझे हम यार कहते हैं.

beautiful...!

एक बेहद साधारण पाठक ने कहा…

@हँसता हूँ यहाँ पर मैं, तुम्हारे बिन ही महफिल में,
मेरी जाँ ये समझ ले तू, इसे व्यवहार कहते हैं
तुझे मैं भूलता कैसे, तुझे हम यार कहते हैं.


उफ्फ्फ ....... दर्द और मुस्कराहट [वाह वाह कैसे कहें ?? अच्छा नहीं लगेगा :)]

शुरूआती पेराग्राफ पढ़ कर एक दम से "माय जापानीज वाइफ" [फिल्म ] की याद आ गयी

http://www.santabanta.com/cinema.asp?pid=18809

मैं तो बेकअप का ख़ास ख़याल नहीं रखता ..... हाँ एक बात है इन्फोर्मेशन का सोर्स [जैसे की वेब साईट का नाम] याद रहे बस काफी है
रही बात खुद के लिखे नोट्स आदि सामग्री की उसे भी नेट पर अपलोड कर देता हूँ , हो गया काम पूरा
वायरस आता भी होगा तो निराश हो कर जाता होगा, या हाथ पर हाथ धर कर बैठा रहता होगा और सोचता होगा "कहाँ आ गया मैं भी" :)

घर में ही सब्जी उगती देख कर आस पास सब्जी वाले आपसे जयादा भाव लगाते होंगे , रोज रोज थोड़ी जाना होता होगा आपका ..... इसलिए कह रहा हूँ :))

कडुवासच ने कहा…

...sundar rachanaa ... badhiyaa post !!!

shikha varshney ने कहा…

आप हमेशा ही बगीचे की तस्वीरें लगा कर ललचाया करते हैं ये बात अच्छी नहीं :) अब मैं ये लौकी की तस्वीर कैसे भूलूं? आपने ही कहा है भूलना संभव नहीं .
बेहद सटीक कविता .

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

जहाँ बचपन ये खेला था, गली वो याद रहती है
जहाँ भी जा बसें हम तुम, याद वो साथ रहती है
उन्हीं यादों के साये में, गुजरती रात की घड़ियाँ
यहाँ अक्सर ही दिन में भी, अँधेरी रात रहती है.

आपके जज़्बे को सलाम समीर लाल जी.

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

बहुत अच्छी कविता.. प्रेम के रस मे डूबी हुई..

राजभाषा हिंदी ने कहा…

न जाने कौन सा बंधन, न जाने कैसे रिश्ते हैं
दर्द उस पार उठता है, आँसूं इस पार गिरते हैं
आंसू भरा प्यार बड़ा लुभावना होता है। बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
समझ का फेर, राजभाषा हिन्दी पर संगीता स्वरूप की लघुकथा, पधारें

गुड्डोदादी ने कहा…

समीर जी
आशर्वाद
आपकी कविता
यूं ही रोते बिलखते ही,मिटाने दूरियां निकला हुए हैं मेरी
बहुत स्टीक
फिर आपने लिखा
हँसता हूँ यहाँ पर मै, तुम्हारे बिन ही महफ़िल में
समझ ले तू इसे व्यवहार कहते है
आगे क्या लिखू सभी पंक्तियाँ एक से एक बढ़ कर

Swarajya karun ने कहा…

शानदार गीत, जानदार अभिव्यक्ति .बहुत-बहुत बधाई .

Swarajya karun ने कहा…

शानदार गीत ,जानदार अभिव्यक्ति . बहुत-बहुत बधाई .

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 22 - 9 - 2010 मंगलवार को ली गयी है ...
कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया

http://charchamanch.blogspot.com/

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद ने कहा…

`न जाने कौन सा बंधन, न जाने कैसे रिश्ते हैं'

ऐ दोस्त...... इसी को वायरस कहते हैं :)

vandan gupta ने कहा…

क्या खूब लिखा है………………बडी ही बेजोड कविता है……………सीधे दिल मे उतर गयी।

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

सेव और लौकी तो बढिया और सुंदर लग रही है, खुद के बगीचे की है तो पौष्टिक और कीटनाशक के प्रभाव से भी मुक्त होगी ही. सेहत का राज आज समझ आगया.:)

कविता तो बहुत ही लाजवाब है.

रामराम.

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

और सेव और लौकी पर क्लिक करके सारा फ़ोटूआ देखा, मजा आगया, बहुत धन्यवाद.

रामराम.

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

और एक ठो बात....सेव पर कुछ सफ़ेद सफ़ेद सा दिख रहा है. क्या आप भी कोनू दवाई वगैरह तो नाही छींटते इन पर?

रामराम

बेनामी ने कहा…

शानदार गीत ,जानदार अभिव्यक्ति . बहुत-बहुत बधाई .

मनोज कुमार ने कहा…

मैं उन पत्तों से पूछूंगा, बता दो मुझको मजबूरी
छोड़ कर साथ शाखों का, बना ली तुमने क्यूँ दूरी
क्या सधा हुआ बिम्ब है! बिल्‍कुल अपठनीय और गद्यमय होते जा रहे काव्‍य परिदृश्‍य पर "तुझे कैसे भूलूं बता दे" कविता इसलिए भी महत्‍वपूर्ण है कि आप कविता की मूलभूत विशेषताओं को प्रयोग के नाम पर छोड़ नहीं देते। बेहद संश्लिष्‍ट इस कविता में उपस्थित लयात्‍मकता इसे दीर्घ जीवन प्रदान करती है। यह कविता एक संवेदनशील मन की निश्‍छल अभिव्‍यक्तियों से भरी-पूरी है। इसमें निहित आपकी भाषिक संवेदना पाठक को आपकी आत्‍मीय दुनिया की सैर कराने में सक्षम है। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
और समय ठहर गया!, ज्ञान चंद्र ‘मर्मज्ञ’, द्वारा “मनोज” पर, पढिए!

अरुणेश मिश्र ने कहा…

वायरस का चमत्कार है चतुर्दिक ।

रंजना ने कहा…

हँसता हूँ यहाँ पर मैं, तुम्हारे बिन ही महफिल में,
मेरी जाँ ये समझ ले तू, इसे व्यवहार कहते हैं
तुझे मैं भूलता कैसे, तुझे हम यार कहते हैं.

वाह...वाह...वाह...क्या बात कही....
कविता तो मनमोहक है ही...साथ साथ हृष्ट पुष्ट स्वस्थ सेब लौकी के दर्शन करा मन हरिया दिया आपने..

sanu shukla ने कहा…

बहुत ही उम्दा रचना है भाईसाहब ...!!

दिगम्बर नासवा ने कहा…

न जाने कौन सा बंधन, न जाने कैसे रिश्ते हैं
दर्द उस पार उठता है, आँसूं इस पार गिरते हैं ...


वाह संमीर भाई .... इसी को दिल का रिश्ता कहते हैं ..... बहुत अच्छा लगा कल बात करना ... पर शिकायत रह गई ..... दुबारा सोच लो दुबई होते जाने का .....

वीरेंद्र सिंह ने कहा…

सर ..आपको बहुत तालियाँ मिलती होंगी
इस कविता को सुनाने पर.
बहुत ही उम्दा कविता है .
आभार ......

अजित गुप्ता का कोना ने कहा…

समीर भाई, एण्‍टी वायरस लगाने के बाद भी वायरस आ जाता है क्‍या? सेव दिखाकर तो आप ललचा रहे हैं और लौकी तो अपनी प्रिय है।

अजय कुमार झा ने कहा…

बहुत ही बेहतरीन पोस्ट ..और हां लौकी और सेब दोनों एक साथ माने बाबा रामदेब और बाबा कामदेव दोनों का prescription साथ ले रहे हैं ...॥

डॉ टी एस दराल ने कहा…

बहुत सुन्दर यादों का पिटारा ।
सुन्दर प्रस्तुति ।
बैकप याद दिलाने के लिए धन्यवाद ।

वीना श्रीवास्तव ने कहा…

जहाँ बचपन ये खेला था, गली वो याद रहती है
जहाँ भी जा बसें हम तुम, याद वो साथ रहती है
उन्हीं यादों के साये में, गुजरती रात की घड़ियाँ
यहाँ अक्सर ही दिन में भी, अँधेरी रात रहती है.

हँसता हूँ यहाँ पर मैं, तुम्हारे बिन ही महफिल में,
मेरी जाँ ये समझ ले तू, इसे व्यवहार कहते हैं
तुझे मैं भूलता कैसे, तुझे हम यार कहते हैं.

बहुत सुंदर पंक्तियां

Manish Kumar ने कहा…

sabjiyan dekh man hara ho gaya

ब्लॉ.ललित शर्मा ने कहा…

Vah bhai sahab aaj to is geet ko gaane ka man ho raha hai. lekin sur taal nahi hai. isliye besura hi sahi. lekin ga ke jarur dekhunga.

shubhkamnaye.

संजय @ मो सम कौन... ने कहा…

आप कभी अपनी बार की फ़ोटो दिखाकर और कभी फ़ल सब्जियों की तस्वीर दिखाकर सबको ललचाते रहते हैं। हम भी विंडो शापिंग की तरह विंडॊ पार्टी का लुत्फ़ लेते रहते हैं।
कविता एकदम फ़र्स्ट क्लास लगी जी। कई साल पीछे ले गई। मंच लूट लेते हैं आप इसकी बदौलत, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं।
आभार स्वीकार करें।

VIJAY KUMAR VERMA ने कहा…

मैं हूँ इस पार तू उस पार, मगर दिल साथ रहते हैं
हमारे देश में यारों, इसी को प्यार कहते हैं
मुझे तुम भूलना चाहो तो बेशक भूल जाना पर
तुझे मैं भूलता कैसे, तुझे हम यार कहते हैं.

बहुत ही खूबसूरत रचना ...दिल को छू गयी ..

dhiru singh { धीरेन्द्र वीर सिंह } ने कहा…

आपकी लौकी की बेल पर लटकी लौकी से मुझे जलन हो रही क्योकि मेरे यहा लगी लौकी,तुरई,गंगाफ़ल.भिन्डी आदि बाढ की भेट चढ गये है मेरे फ़ार्म पर पानी ही पानी है . और मेरा एक खेत तो राम गंगा में समा गया है .

Rangnath Singh ने कहा…

हमारा दिल तो आप के बगीचे में ही टिक कर रह गया। :-)

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

न जाने कौन सा बंधन, न जाने कैसे रिश्ते हैं
दर्द उस पार उठता है, आँसूं इस पार गिरते हैं
ये हैं अहसास के रिश्ते, इसे तुम नाम मत देना
जैसे फूल में खुशबू, ये हर इक दिल में रहते हैं.

सुंदर भावपूर्ण रचना...

अजय कुमार ने कहा…

सीधे दिल से दिल तक ।

सु-मन (Suman Kapoor) ने कहा…

वाह क्या बात है.........

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

जहाँ बचपन ये खेला था, गली वो याद रहती है
जहाँ भी जा बसें हम तुम, याद वो साथ रहती है
उन्हीं यादों के साये में, गुजरती रात की घड़ियाँ
यहाँ अक्सर ही दिन में भी, अँधेरी रात रहती है.
--
सुन्दर रचना!
--
सशक्त लेखन!

डॉ महेश सिन्हा ने कहा…

आया है मुझे याद वो जालिम गुजरा जमाना बचपन का

Pt. D.K. Sharma "Vatsa" ने कहा…

आपकी इस पोस्ट नें तो हमारी एक बहुत बडी भ्रान्ती का उन्मूलन कर डाला....वो ये कि हम तो शुरू से यही सोचते थे कि यहाँ जिस चीज का जो रंग होता है...आपके वहाँ उससे अलग होता होगा...मसलन यहाँ सेब लाल होता है तो वहाँ नीला/पीला जैसा कुछ होता होगा...लौकी भी यहँ हरी है तो वहाँ शायद लाल/काली या किसी ओर रंग की होती होगी...अब मालूम पडा कि इहाँ और उहाँ में तो कोई फर्क ही नहीं है...फिर आदमी के रंग में इतना फर्क कैसे :)

Unknown ने कहा…

अति उत्तम प्रसतुति
हम चाहेंगे कि आप अपना ब्लाग
http://bharatvani.feedcluster.com/
पर जोड़ें।

Unknown ने कहा…

खूबसूरत नज़्म से नवाजने के किये शुक्रीया.मेरे जेसे कुछ लोगों के लिए यह नई है. नहीं छापते तो हम मजा लेने से चूक जाते.कतील साब का इक मिसरा है.. चोट तुझ को लगे ओर ज़ख्म आये मुझे .कई वक्त बाद मुझे याद आया आपकी नज़्म के सहारे अपना भी भुला सा शेर याद आ गया है
है कोई तरीका मिलन का पूंछ तो साहिबे तकदीर से
हम तुम किनारे हैं वक्त की नदिया बही जा रही है
अच्छी कविता की यही निशानी है की वो पाठक के भीतर उतर कर उसे हिला देती है.मेरे हिसाब से आप अपने मकसद में कामयाब रहे हैं .

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

इधर मेरा भी 20-25 दिन का काफी काम बैकप न होने के कारण ग़ायब हो गया.पर अब पछताए होत का ...
कविता अच्छी लगी.

रानीविशाल ने कहा…

मुझे अक्सर रुलाती हैं, सुनहरी याद अपनों की
हमारे साथ के किस्से, लगे है बात सपनों की
मैं उन पत्तों से पूछूंगा, बता दो मुझको मजबूरी
छोड़ कर साथ शाखों का, बना ली तुमने क्यूँ दूरी

यूँ ही रोते बिलखते ही, मिटाने दूरियाँ निकला
हुई है मेरी हालत जो, उसे बेजार कहते हैं
तुझे मैं भूलता कैसे, तुझे हम यार कहते हैं.

वैसे तो पूरी की पूरी कविता ही दिल के बहुत करीब सी महसूस हुई ....लेकिन फिर भी इन पंक्तियों गहरी चाप छोड़ी है .....चेरी और खीरों के बारें में पहले नहीं बताया आपने वर्ना इस समर हम पहुच ही जाते स्वाद लेने : )
खैर कोई नहीं अगली समर ही सही .....

VICHAAR SHOONYA ने कहा…

क्या जनाब आपके यहाँ टिप्पणी करने के लिए कितना नीचे गिरना /उतरना पड़ता है. इतनी देर में तो मैं पोस्ट पर क्या पढ़ा था सब भूल जाता हूँ.

Mahak ने कहा…

मुझे तुम भूलना चाहो तो बेशक भूल जाना पर
तुझे मैं भूलता कैसे, तुझे हम यार कहते हैं.



बेहद सुंदर रचना , समीर जी बहुत खूब

बेनामी ने कहा…

bahut hi sundar rachana...... aabhar

डॉ. महफूज़ अली (Dr. Mahfooz Ali) ने कहा…

सेब देख कर तो मुँह में पानी आ गया.... और कविता देख कर कुछ पंक्तियों से आँखों में आँसू.... बहुत अच्छी लगी यह पोस्ट...

Rohit Singh ने कहा…

मैं हूँ इस पार तू उस पार, मगर दिल साथ रहते हैं
हमारे देश में यारों, इसी को प्यार कहते हैं

यही तो हमारे देश का दर्शन है। यही प्यार है। अनदेखी डोर है जो हमें बांधे रखती है।

स्वप्न मञ्जूषा ने कहा…

न जाने कौन सा बंधन, न जाने कैसे रिश्ते हैं
दर्द उस पार उठता है, आँसूं इस पार गिरते हैं

खूबसूरत कविता....

वीरेंद्र रावल ने कहा…

bahut achchha bhavo ko vyakt kiya sir aapne
हँसता हूँ यहाँ पर मैं, तुम्हारे बिन ही महफिल में,
मेरी जाँ ये समझ ले तू, इसे व्यवहार कहते हैं

बस आपके लिए दो पंक्तिया बनायीं हैं , समय नहीं हैं क्योंकि पापी पेट के सवाल हैं .

जिंदगी की सारी खुशिया आप पर बरसती रहे
आकाशो के पार उड़न तश्तरी बढती रहे
ऐसा कुछ हम सब पाताल तक पढ़ जाये
जब हिमालयो से भावो को समीर गढ़ जाये

इतना सुन्दर लिखने पर बधाई सर जी .

Ashok Pandey ने कहा…

बहुत खूब समीर भाई। इसी तरह कभी-कभी अपने बागान की हरियाली को ब्‍लॉग पर भी लाते रहें। तबीयत हरी-मनभरी हो गयी। कविता भी अच्‍छी है।

Sunil Kumar ने कहा…

ज्ञानवर्धक लेख, दिल को छू लेने वाली रचना, बधाई

राणा प्रताप सिंह (Rana Pratap Singh) ने कहा…

बेहतरीन ...बहुत सुन्दर कविता ...यादों का कारवां मन मस्तिष्क में कब आ जाये पता ही नहीं चलता है|

PAWAN VIJAY ने कहा…

मैं हूँ इस पार तू उस पार, मगर दिल साथ रहते हैं
हमारे देश में यारों, इसी को प्यार कहते हैं
आपसे भी कुछ इसी किस्म का प्यार है


बहुत ही बढ़िया

आशीष मिश्रा ने कहा…

न जाने कौन सा बंधन, न जाने कैसे रिश्ते हैं
दर्द उस पार उठता है, आँसूं इस पार गिरते हैं
ये हैं अहसास के रिश्ते, इसे तुम नाम मत देना
जैसे फूल में खुशबू, ये हर इक दिल में रहते हैं......
बहोत ही प्यारी बातें कही है आपने बहोत ही सुंदर रचना

उपेन्द्र नाथ ने कहा…

Wah ! Sameer ji seb aur louki dekh ji lalcha gaya. Kavita ne bhi man ko dore dalne me jara bhi kotahi nahi ki

mehhekk ने कहा…

dil ke ehsaas,behad khubsurat.
apple bahut hi shandar hai. ji karta hai photo se churale.

रूप ने कहा…

क्या बताऊँ, क्या याद आ गया

कोई भूला फ़साना याद आ गया

तेरे शब्द गुज़रे जब आँखों से ,

वो गुज़रा ज़माना याद आ गया


समीर जी कभी हमारे ब्लॉग पर आ कर भी मार्गदर्शन करें.

नीरज गोस्वामी ने कहा…

सेब और लौकी देख कर मुंह में पानी आ गया...लौकी काफी हट्टी कट्टी और मख्खन के माफिक चिकनी लग रही है...

कविता तो आपकी तरह बेजोड है ही...उस के लिए और क्या कहें...

नीरज

निर्मला कपिला ने कहा…

जितने मीठै सेव उतनी ही मीठी कविता। बहुत अच्छी प्रस्तुति। बधाई।

SURINDER RATTI ने कहा…

Sameer Ji,

मैं हूँ इस पार तू उस पार, मगर दिल साथ रहते हैं
हमारे देश में यारों, इसी को प्यार कहते हैं
Ek pyar hi sahare to sab zinda hain ... Bahut sunder bhaav se bhari rachna...
Surinder Ratti

Mumbai

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

मुझे तो लगता है इस कविता में आपकी आत्मा बस्ती है कहीं...
और इस कविता की तारीफ में तो क्या कहू इस में समीरलाल जी पूर्णरूप से झलकते हैं...कोई अगर मुझे आ कर कहे की मैं समीर लाल जी को नहीं जानता तो मैं कहूँगी की ये कविता वो पढ़ ले पुरे के पुरे समीर लाल जी को जान जायेगा.

:):)
शुक्रिया.इसे पढाने के लिए.

rashmi ravija ने कहा…

हँसता हूँ यहाँ पर मैं, तुम्हारे बिन ही महफिल में,
मेरी जाँ ये समझ ले तू, इसे व्यवहार कहते हैं

बहुत सटीक कविता

दीपक "तिवारी साहब" ने कहा…

न जाने कौन सा बंधन, न जाने कैसे रिश्ते हैं
दर्द उस पार उठता है, आँसूं इस पार गिरते हैं
ये हैं अहसास के रिश्ते, इसे तुम नाम मत देना
जैसे फूल में खुशबू, ये हर इक दिल में रहते हैं.

बहुत उम्दा रचना.

दीपक "तिवारी साहब" ने कहा…

ये लौकी और सेवफ़ल बडे सुंदर लग रहे हैं. इनका स्वाद भारतीय लैकी सेव जैसा ही होता है या कुछ अलग? यह एक सहज जिज्ञासा है.

makrand ने कहा…

jivan ka yatharth uker kar rakh diya apane.

गब्बर और सांभा ने कहा…

ये लौकी और सेव? मुंह मे पानी आगया....

रचना दीक्षित ने कहा…

वाह!!!!! मेरे घर में सबकी हॉट फेवरेट सब्जी
''लौकी''. अच्छी लगीं तस्वीरें एपल फ्रिताता कब खिला रहे हैं??? बेकअप के बारे में मैं इतना जानती हूँ की पेन ड्राईव और एक्सटर्नल हार्ड ड्राईव इसमें ही स्टोर किया जाता है और मैं इस्तेमाल भी करती हूँ इसके आलावा नया कुछ हो तो उस पर जानकारी जरुर दीजियेगा इंतज़ार रहेगा
कविता लाजवाब है और जो अपने होते हैं उन्हें भूलना चाहो तो भी बहुत याद आते हैं
"भूलना चाहो तो बेशक भूल जाना पर तुझे मैं भूलता कैसे, तुझे हम यार कहते हैं."

डॉ महेश सिन्हा ने कहा…

बैकप पे खयाल आया क्या ज़िंदगी का भी बैकप लिया जा सकता है !!

VIVEK VK JAIN ने कहा…

achhi rachna.

Anita kumar ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति.............

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

कल गल्ती से तारीख गलत दे दी गयी ..कृपया क्षमा करें ...साप्ताहिक काव्य मंच पर आज आपकी रचना है


http://charchamanch.blogspot.com/2010/09/17-284.html

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर ने कहा…

किस वायरस की शामत आई है..........
आप सब ठीक कर लेंगे.
शेष तो रचना अच्छी है ही हमेशा की तरह.....
जय हिन्द, जय बुन्देलखण्ड

विष्णु बैरागी ने कहा…

किसकी बात करें-आपकी प्रस्‍तुति की या आपकी रचनाओं की। सब ही तो आनन्‍ददायक हैं।

आपका ब्‍लॉग ई-मेल से नहीं मिलता। सूचना आती है कि ई-मेल से मिलने की व्‍यवस्‍था लागू नहीं है। कुछ कीजिए।

Kusum Thakur ने कहा…

बड़ी ही प्यारी रचना है !

Asha Joglekar ने कहा…

मैं हूँ इस पार तू उस पार, मगर दिल साथ रहते हैं
हमारे देश में यारों, इसी को प्यार कहते हैं
बहुत सुंदर भाव भीनी प्रस्तुति ।
सेब और लौकी जोरदार । वायरस की भली कही जो इसकी चपेट मे आया बरबाद हो गया तो बैक अप जिन्दाबाद ।

Kailash Sharma ने कहा…

न जाने कौन सा बंधन, न जाने कैसे रिश्ते हैं दर्द उस पार उठता है, आँसूं इस पार गिरते हैं ......
बहुत सुन्दर.....वास्तव में सच्चा प्यार ऐसा ही होता है.....आभार

deepti sharma ने कहा…

bahut hi achhe
bahut achhi kavita hai aapki
deepti sharma

पूनम श्रीवास्तव ने कहा…

आदरणीय सर,इस रचना को यदि आप न प्रकाशित करते तो सचमुच यह पाठकों के साथ नाइंसाफ़ी होती। बहुत सुन्दर और भावपूर्ण रचना---।

डा0 हेमंत कुमार ♠ Dr Hemant Kumar ने कहा…

फ़ल सब्जियों के साथ इतनी शानदार रचना---पढ़ने का आनन्द बढ़ गया।

अनिल ने कहा…

लौकियां और सेब दोनो बढिया हैं...

बैक अप कायम रहे....

कविता बेहतरीन है...

ZEAL ने कहा…

.

ये हैं अहसास के रिश्ते, इसे तुम नाम मत देना
जैसे फूल में खुशबू, ये हर इक दिल में रहते हैं...

कुछ रिश्ते अनाम ही होते हैं...

.

Manish ने कहा…

आप कैसे दोस्त हैं? मेरे रहते किस वायरस ने आपको तकलीफ पहुँचाई? ज़रा उसे मेरे पास भेजिये उसको दंड दिया जायेगा :)

कविता अच्छी लगी… आप बच्चे को फिर से बिगाड़ रहे हैं… आपकी कविता के भावों में बहकर इधर उधर फिर से झाँकना शुर उकर दिया तो?

खैर, आपके पेंडिग वाले काम कब तक पूरा होते है?

पी.सी.गोदियाल "परचेत" ने कहा…

न जाने कौन सा बंधन, न जाने कैसे रिश्ते हैं
दर्द उस पार उठता है, आँसूं इस पार गिरते हैं
ये हैं अहसास के रिश्ते, इसे तुम नाम मत देना
जैसे फूल में खुशबू, ये हर इक दिल में रहते हैं.

क्या बात कहे समीर जी , लाजबाब ! बहुत सुन्दर, बेल से नई निकलती लौंकी कुछ कहते है !!!

Abhishek Ojha ने कहा…

ताज़ी सब्जियां वाह !
कविता तो सेंटी कर गयी.

Anjana Dayal de Prewitt (Gudia) ने कहा…

बहुत अच्छी कविता!

समयचक्र ने कहा…

बहुत सटीक प्रसंग बताया है ये तो होता ही है ... ..

मैं हूँ इस पार तू उस पार, मगर दिल साथ रहते हैं
हमारे देश में यारों, इसी को प्यार कहते हैं
मुझे तुम भूलना चाहो तो बेशक भूल जाना पर
तुझे मैं भूलता कैसे, तुझे हम यार कहते हैं.

जोरदार प्रस्तुति.... आभार

Dr.Bhawna Kunwar ने कहा…

Bahut acha taje fal or sabjiyan khub khayi gayi yaani ki...saat men khubsurat kavita padhane ke liye thanks..